“भारत माता”… भारत को क्यों “माँ” की उपाधि दी गई

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‘आदि काल से ही पृथ्वी को मातृभूमि की संज्ञा दी गई है... भारतीय अनुभूति में पृथ्वी आदरणीय बताई गई है… इसीलिए पृथ्वी को माता कहा गया…  महाभारत के यक्ष प्रश्नों में इस अनुभूति का खुलासा होता है… यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि आकाश से भी ऊंचा क्या है और पृथ्वी से भी भारी क्या है? युधिष्ठिर ने यक्ष को बताया कि पिता आकाश से ऊंचा है और माता पृथ्वी से भी भारी है… हम उनके अंश हैं… यही नहीं इसका साक्ष्य वेदों (अथर्ववेद और यजुर्वेद) में भी मिलता हैं… यही नहीं सिंधु घाटी सभ्यता जो 3300-1700 ई.पू. की मानी जाती है… विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी… सिंधु सभ्यता के लोग भी धरती को उर्वरता की देवी मानते थे और पूजा करते थे…

  • वेदों का उद्घोष – अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘माता भूमि’:, पुत्रो अहं पृथिव्या:। अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं…  यजुर्वेद में भी कहा गया है- नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:। अर्थात माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।
  • वाल्मीकि रामायण- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ (जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उपर है।)
  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में भारतमाता की छबि बनी।
  • प्रसिद्ध बांगला लेखक और साहित्यकार भूदेव मुखोपाध्याय के 1866 में लिखे व्यंग्य – ‘उनाबिम्सा पुराणा’में ‘भारत-माता’ के लिए ‘आदि-भारती’ शब्द का उपयोग किया गया था।
  • किरण चन्द्र बन्दोपाध्याय का नाटक भारत माता सन् 1873 में सबसे पहले खेला गया था।
  • बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में सन् 1882 में वन्दे मातरम् गीत सम्मिलित था जो शीघ्र ही स्वतंतरता आन्दोलन का मुख्य गीत बन गया।
  • 1905 में प्रसिद्ध चित्रकार अवनींद्र नाथ टैगोर ने भारतमाता को चारभुजाधारी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारन किये हैं; हाथ में पुस्तक, माला, श्वेत वस्त्र तथा धान की बाली लिये हैं।
  • सन् 1936 में बनारस में शिव प्रसाद गुप्त ने भारतमाता का मन्दिर निर्मित कराया। इसका उद्घाटन गांधीजी ने किया।
  • हरिद्वार में सन् 1983 में विश्व हिन्दू परिषद ने भारतमाता का एक मन्दिर बनवाया।

‘अथर्ववेद’ के श्लोक में मातृभूमि का स्पष्ट उल्लेख है… अथर्ववेद 63 ऋचाएं हैं, जो पृथ्वी माता की स्तुति में समर्पित की गई हैं… अथर्ववेद के बारहवें कांड के प्रथम सूक्त में 63 मंत्र हैं, वे सभी मातृभूमि की वंदना में अर्पित किए गए हैं… इस सूक्त को ‘भूमि सूक्त’ कहा जाता है… भूमि सूक्त कहने का कारण संभवत: यही था कि इस सूक्त के मंत्रों में केवल भूमि की चर्चा की गई है… इसी सूक्त के कुछ मंत्रों में भूमि को माता कहकर संबोधित किया गया है तथा उसे राजा (इन्द्र) द्वारा रक्षित बतलाया गया है… अथर्वन ऋषि की इन 63 ऋचाओं में धरती के तमाम अंगों-उपांगों, उसके बदलते रूपों का पूरी आस्था के साथ विवरण है…

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ऐसा नहीं है कि हमारे पूर्वज पृथ्वी के प्रति मात्र अंधश्रद्धा ही रखते थे… धरती से मिलने वाली तमाम सुविधाओं के बारे में भी उन्हें भरपूर जानकारी थी…  इसलिए एक तरफ पर वे-
माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:।
नमो माता पृथिव्यै नमो माता पृथिव्यै।।

‘भूमि सूक्त’ के दसवें मंत्र में मातृभूमि की धारणा को स्पष्टत: इन शब्दों में व्यक्त किया गया है-

सा नौ भूमिविर्सजतां माता पुत्राय मे पय:।

अर्थात मातृभूमि मुझ पुत्र के लिए दूध आदि शक्ति प्रदायी पदार्थ प्रदान करे।

बारहवें मंत्र में कहा गया है-

माता भूमि:, पुत्रो अहं पृथिव्या:!

अर्थात भूमि (मेरा देश) मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं।

अथर्ववेद के अलावा ‘यजुर्वेद’ में भी पृथ्वी को माता कह कर पुकारा गया है…

यजुर्वेद के 9वें अध्याय में कहा गया है-

नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:।

अर्थात माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।

यजुर्वेद के ही दसवें अध्याय में मातृभूमि की वंदना करते हुए कहा गया है-

पृथ्वी मातर्मा हिंसीर्मा अहं त्वाम्।

अर्थात हे मातृभूमि! न तू हमारी हिंसा कर और न हम तेरी हिंसा करें।

कहां से आया ‘भारत माता’ शब्द ?

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Bharat Mata is an epic painting by celebrated Indian painter, Abanindranath Tagore  (7 August 1871 – 5 December 1951)

19वीं सदी में अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ इस तरह का राष्ट्रवादी सोच मातृपूजक बंगाल में उभरा था… उस समय के बंगाली लेखकों ने उसकी स्तुति में गीत व नाटक रचना शुरू किया… तब भी एक स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य की उनकी अवधारणा लोकतांत्रिकता पर यूरोपीय सोच से ही निकली और आगे अन्य धड़ों के बीच पनपी… उस समय सबका दुश्मन अंग्रेज शासन था, इसलिए हिंदू, मुसलमान, सिख आदि अलग-अलग वर्गों के बीच के मतभेद आजादी पाने तक के लिए खुद-ब-खुद स्थगित कर दिए गए…

1866- वहीं वर्तमान समय का पहला लिखित साक्ष्य 19वीं सदी के प्रसिद्ध बांगला लेखक और साहित्यकार भूदेव मुखोपाध्याय के लिखे व्यंग्य – ‘उनाबिम्सा पुराणा’ (‘Unabimsa Purana’) यां ‘उन्नीसवें पुराण’ (‘The Nineteenth Purana’) में मिलता है। लेख का प्रकाशन सन 1866 में किया गया था। इस लेख में ‘भारत-माता’ के लिए ‘आदि-भारती’ शब्द का उपयोग किया गया था।

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1873- भारत को ‘माता’ कहकर संबोधित करने का श्रेय बंगला लेखक किरण चंद्र बन्दोपाध्याय को भी जाता है… इनके नाटक ‘भारत-माता’ में भारत के लिए ‘माता’ शब्द का प्रयोग किया गया था… बन्दोपाध्याय ने सन् 1873 में सबसे पहले नाटक का मंचन किया था…

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1882- बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में ‘भारत माता’ को मानो साकार रूप ही दे दिया… आनंद मठ ने साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह का परचम उठाने वाले संन्यासियों की राष्ट्रभक्ति को बंगाल में घर-घर होने वाली मां काली की पारंपरिक वंदना से एकाकार कर दिया… उसके माध्यम से युग-युग से सामंती शोषण के शिकार रहे अकाल-पीड़ित बंगाल का क्षेत्रीय तादात्म्य-बोध मानो सारे भारत के क्रोध की अभिव्यक्ति और मुक्ति कामना से जुड़ता चला गया… लेकिन चूंकि उस भारत देश का मूलाधार अंग्रेजों द्वारा एकीकृत भारत का भौगोलिक मानचित्र था, इसलिए भारतमाता की दैवी परिकल्पना भी भिन्न् बनी… भारत में पारंपरिक (दुर्गा, काली, सरस्वती) देवियों की तुलना में यह ऐसी पददलित भारतमाता दीन, दु:खी किंतु संतान वत्सला, पतिपरायणा माता-पत्नी थी, जिसका पीड़ादायक स्थिति से उद्धार करना उसकी संतान का कर्तव्य माना गया… यह भी बताया गया कि दुर्दम्य देवियों के विपरीत इस त्यागमयी, वत्सला मां का सम्मान बाहरी हमलावरों या देश में पैठे गद्दारों के हाथों निरंतर खतरे में है और सर्वसमर्थ दुर्गा या काली की तरह यह मातारानी हुंकार सहित खुद अपने आक्रांताओं से नहीं निपट सकती, लिहाजा उसकी रक्षा के लिए उसके बेटों की सशस्त्र और जुझारू सेनाएं यत्र-तत्र तैनात हों… इसी का वर्तमान रूप हैं भारतमाता के पूतों के वे गुट, जो हर संदिग्ध माता विरोधी से जबरन जय बुलवाकर माता की शान के खिलाफ गतिविधि के हर कथित अपराधी को पीटने निकल जाते हैं।

आज़ादी से पहले बंगाल में दुर्गा पूजा लोगों को एकजुट करने और स्वराज (आजादी) पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी हुई थी। इस दौरान बंगाल के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों के लेखों और रचनाओं में मां दुर्गा का गहरा प्रभाव रहा और इनके द्वारा लिखे गए लेखों, नाटकों और कविताओं में भी भारत को दुर्गा की तर्ज पर ‘मां’ और ‘मातृभूमि’ कहकर संबोधित किया जाने लगा।

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Bharat_Mata_literally_constitutes_India,_in_a_print_from_the_1920's-30'sBharat Mata literally constitutes India, in a print from the 1920’s-30’s.

आनन्द मठ/बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय… पढ़ने के लिए क्लिक करें…

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http://www.hindisamay.com/e-content/Bankim-Chandra-Anandmath.pdf

5आनन्द मठ बांग्ला भाषा का एक उपन्यास है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में की थी। इस कृति का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। भारत का राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् इसी उपन्यास से लिया गया है।

आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के सन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है।

आनंदमठ के प्रथम खण्ड में कथा बंगाल के दुर्भिक्ष काल से प्रारम्भ होती है जब लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे थे। सब गाँव छोड़कर यहाँ-वहाँ भाग रहे थे – एक तो खाने के लाले थे दूसरे किसान के पास खेती में अन्न उत्पन्न न होने पर भी अंग्रेजों द्वारा लगान का दबाव उन्हें पीड़ित कर रहा था।

कथा पदचिन्ह गाँव की है। महेन्द्र और कल्याणी अपने अबोध शिशु को लेकर गाँव से दूर जाना चाहते हैं। यहाँ लूट-पाट-डकैती आदि की घटनाएँ हैं। डकैतों ने कल्याणी को पकड़ लिया था पर वह जान बचाती दूर जंगल में भटक जाती है। महेन्द्र को सिपाही पकड़ लेते हैं – जहाँ हाथापाई होती है और भवानन्द नामक संन्यासी उसकी रक्षा करता है। भवानन्द आत्मरक्षा में अंग्रेज साहब को मार देता है – लूट का सामान व्यवस्था में लगाता है। वहाँ दूसरा संन्यासी जीवानन्द पहुँचता है। भवानन्द और जीवानन्द दोनों सन्यासी, प्रधान सत्यानन्द के शिष्य हैं – जो ’आनन्दमठ‘ में रहकर देश सेवा के लिए कर्म करते हैं। महेन्द्र भवानन्द का परिचय जानना चाहता है, क्योंकि यदि भवानन्द न मिलता तो उसकी जान जा सकती थी। भवानन्द ने जवाब दिया- मेरा परिचय जानकर क्या करोगे? महेन्द्र ने कहा – मैं जानना चाहता हूँ, आज आपने मेरा बहुत उपकार किया है। महेन्द्र समझ नहीं पाता कि सन्यासी डकैतों की तरह भी हो सकता है। इतने पर भी भवानन्द महेन्द्र की पत्नी और पुत्री से मिलाने का भी आश्वासन देता है। भवानन्द की मुद्रा सहसा बदल गयी थी। वह अब धीर स्थिर प्रकृति का सन्यासी नहीं लग रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर रही थी। मौन भंग करने के लिए वह व्यग्र हो रहा था, परन्तु महेन्द्र गंभीर था। तब भवानन्द ने गीत गाना शुरू किया-

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`वन्दे मातरम्’ यह  गीत रविवार, कार्तिक शुद्ध नवमी, शके 1779 (7 नोव्हेंबर 1875) इस  दिन  पूरा हुआ.

हे माते, मैं तुम्हें वंदन करता हूं ।

         जलसमृध्द तथा धनधान्यसमृध्द दक्षिणके मलय पर्वतके ऊपरसे आनेवाली वायुलहरोंसे शीतल होनेवाली तथा विपुल खेतीके कारण श्यामलवर्ण बनी हुई, हे माता !

         चमकती चांदनियोंके कारण यहांपर रातें उत्साहभरी होती हैं, फूलोंसे भरे हुए पौधोंके कारण यह भूमि वस्त्र परिधान किए समान शोभनीय प्रतित होती है । हे माता, आप निरंतर प्रसन्न रहनेवाली तथा मधुर बोलनेवाली, वरदायिनी, सुखप्रदायिनी हैं !

         तीस करोड मुखोंसे निकल रही भयानक गरजनाएं तथा साठ करोड हाथोंमें चमकदार तलवारें होते हुए, हे माते आपको अबला कहनेका धारिष्ट्य कौन करेगा ? वास्तवमें माते, आपमें सामर्थ्य हैं । शत्रुसैन्योंके आक्रमणोंको मुंह-तोड जवाब देकर हम संतानोंका रक्षण करनेवाली हे माता, मैं आपको प्रणाम करता हूं ।

         आपसेही हमारा ज्ञान, चरित्र तथा धर्म है । आपही हमारा हृदय तथा चैतन्य हैं । हमारे प्राणोंमें भी आपही हैं । हमारी कलाईयोंमें (मुठ्ठीमें) शक्ति तथा अंत:करणमें काली माता भी आपही हैं । मंदिरोंमें हम जिन मूर्तियोंकी प्रतिष्ठापना करते हैं, वे सभी आपकेही रूप हैं ।

         अपने दस हाथोंमें दस शस्त्र धारण करनेवाली शत्रुसंहारिणी दुर्गा भी आप तथा कमलपुष्पोंसे भरे सरोवरमें विहार करनेवाली कमलकोमल लक्ष्मी भी आपही हैं । विद्यादायिनी सरस्वतीभी आपही हैं । आपको हमारा प्रणाम है । माते, मैं आपको वंदन करता हूं । ऐश्वर्यदायिनी, पुण्यप्रद तथा पावन, पवित्र जलप्रवाहोंसे तथा अमृतमय फलोंसे समृद्ध माता आपकी महानता अतुलनीय है, उसे कोई सीमाही नहीं हैं । हे माते, हे जननी हमारा तुम्हें प्रणाम है ।

         माते, आपका वर्ण श्यामल है । आपका चरित्र पावन है । आपका मुख सुंदर हंसीसे विलसीत है । सर्वाभरणभूषित होनेके कारण आप कितनी सुंदर लगती हैं ! सचमें, हमें धारण करनेवाली तथा हमें संभालनेवालीभी आपही हैं । हे माते, हमारा आपके चरणोंमें पुन:श्च प्रणिपात ।

न्यूज़24 की खास पेशकश… 

Vande Mataram
Album by Hemant Kumar|© Saregama
Released: 31 December 1952
Hemant Kumar, Lata Mangeshkar

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Maa Tujhe Salaam
A.R. Rahman
C) SONY BMG MUSIC ENTERTAINMENT (India) Pvt. Ltd


Vande Mataram by Pt. Bhimsen Joshi

 

Doordarshan Signature Montage Vande Mataram

वंदे मातरम् से जुड़े हैं अनेक पहलू

print1940s2“Bharat Mata,” a print from the 1940’s

  • जब आज़ाद भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था तब वंदे मातरम् को न राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया और न ही उसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला.
  • लेकिन संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है.
  • वंदे मातरम् का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है. बंगाल के महान साहित्यकारों और कवियों में से एक बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में की थी.
  • उन्होंने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस माँ की संतान बताया. भारत को वो माँ बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी है. उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी माँ की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएँ.
  • भारत को दुर्गा माँ का प्रतीक मानने के कारण आने वाले वर्षों में वंदे मातरम् को मुस्लिम लीग और मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग शक की नज़रों से देखने लगा.
  • इसी विवाद के कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वंदे मातरम् को आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे. मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वंदे मातरम् का इस वजह से विरोध किया था कि वो देश को भगवान का रूप देकर उसकी पूजा करने के ख़िलाफ़ थे.
  • नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय माँगी थी. रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए.
  • हालांकि बंकिमचंद्र की राष्ट्रभक्ति पर किसी को शक नहीं था, सवाल यह था कि जब उन्होंने ‘आनंदमठ’ लिखा उसमें उन्होंने बंगाल पर शासन कर रहे मुस्लिम राजाओं और मुसलमानों पर ऐसी कई टिप्पणियाँ की थीं जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ.
  • वंदे मातरम् को हालाँकि कई वर्ष पहले एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन उसे बाद में प्रकाशित हुए आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया.

आनंदमठ को ‘मुस्लिम विरोधी नहीं कह सकते’

  • आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अँग्रेज़ और स्थानीय मुस्लिम राजा के ख़िलाफ़ सन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है.
  • आनंदमठ का सार ये है कि किस प्रकार से हिंदू सन्यासियों ने मुसलमान शासकों को हराया.
  • आनंदमठ में बंकिम चंद्र ने बंगाल के मुस्लिम राजाओं की कड़ी आलोचना की. एक जगह वो लिखते हैं,”हमने अपना धर्म, जाति, इज़्ज़त और परिवार का नाम खो दिया है. हम अब अपनी ज़िंदगी ग़वाँ देंगे. जब तक इन… (को) भगाएँगे नहीं तब तक हिंदू अपने धर्म की रक्षा कैसे करेंगे.”
  • इतिहासकार तनिका सरकार का कहना है,”बंकिम चंद्र इस बात को मानते थे कि भारत में अंग्रेज़ों के आने से पहले बंगाल की दुर्दशा मुस्लिम राजाओं के कारण थी.”
  • ‘बांग्ला इतिहासेर संबंधे एकटी कोथा’ में बंकिम चंद्र ने लिखा,”मुग़लों की विजय के बाद बंगाल की दौलत बंगाल में न रहकर दिल्ली ले जाई गई.”
  • लेकिन प्रतिष्ठित इतिहासकार केएन पणिक्कर का मानना है,”बंकिम चंद्र के साहित्य में मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ कुछ टिप्पणियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बंकिम मुस्लिम विरोधी थे. आनंदमठ एक साहित्यिक रचना है.”
  • उनका कहना है,”बंकिम चंद्र अंग्रेज़ी हुकूमत में एक कर्मचारी थे और उन पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखे गए हिस्से ‘आनंद मठ’ से निकालने का दबाव था. 19वीं शताब्दी के अंत में लिखी इस रचना को उस समय के मौजूदा हालात के संदर्भ में पढ़ना और समझना ज़रूरी है.”

क्या आजादी से पहले इस्लाम विरोधी था ‘वंदे मातरम्’?
सन 1905 में ब्रिटिस वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया गया तो उसके विरोध में ‘ बंग भंग आन्दोलन’ हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिल कर किया । इस आन्दोलन का मुख्य नारा ही ‘वन्दे मातरम्’ था । अन्ततः अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन समाप्त करना पडा ।

वन्दे मातरम् गीत में पूजा एवं अर्चना जैसी भावना नहीं है और न ही इसके शब्द किसी की मजहबी – आस्था को आहत करते है तो इस पर विवाद क्यों ! बंकिम चन्द्र चैटर्जी ने देश प्रेम के उदात्त भाव से अभिभूत होकर यह अमर गीत वन्दे मातरम् लिखा था ।

श्री मौलाना सैयद फजलुलरहमान जी के शब्दों में ‘ वन्दे मातरम् गीत में बुतपरस्ती ( मूर्ति – पूजा ) की गन्ध नहीं आती है , वरन् यह मादरे वतन ( मातृभूमि ) के प्रति अनुराग की अभिव्यक्ति है । ‘

‘नमो नमो माता अप श्रीलंका , नमो नमो माता’ ( श्रीलंका का राष्ट्रगीत )
‘इंडोनेशिया तान्हे आयरकू तान्हे पुम्पहा ताराई’ ( इंडोनेशिया का राष्ट्रगीत )

भारत के वंदे मातरम् में ही भारत माता की वंदना नहीं है , श्रीलंका और मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया के राष्ट्रगीत में भी वही सब कुछ है जो वन्दे मातरम् में है। इनके राष्ट्रगीत में भी राष्ट्र को माता की ही संज्ञा दी गई है ।

जिस आजादी की लडाई में वन्दे मातरम् का हिन्दू – मुस्लिम ने मिलकर उद्घोष किया था तो फिर क्यों आजादी के बाद यह इस्लाम विरोधी हो गया । वंदे मातरम् को गाते – गाते तो अशफाक उल्ला खां फाँसी के फंदे पर झूल गए थे । इसी वंदे मातरम् को गाकर न जाने कितने लोगों ने बलिदान दिया । जब देश के स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत गैर इस्लामी नहीं था , तो आज कैसे हो गया !

मातृभूमि या मदरलैंड का अर्थ क्या है ?

Oxford dictionary – के हिसाब से, motherland का अर्थ होता है एक ऐसी जगह जहाँ आपका जन्म हुआ हो और जिस जगह से आपका इमोशनल सम्बन्ध हो |

Webster dictionary – इस dictionary के मुताबिक motherland का अर्थ इस तरह की जगह से होता है जो कि अपने पिता या माँ की हो, मतलब ये कि जहाँ अपने माता पिता रहते हो उस जगह से|

भारत के साथ अन्य किस देश में है मदरलैंड का कॉन्सेप्ट ?

रूस (Russia) , भारत के अलावा एक और देश है जहाँ motherland का concept है | यहाँ भी मदरलैंड या मातृभूमि का प्रचलन है

भारत के साथ रूस को भी ‘मातृभूमि’ या ‘मदरलैंड’ कहा जाता है।

क्या मदरलैंड के अलावा भी कोई और टर्म प्रचलित हैं ?

हां, अमेरिका में होमलैंड, जर्मनी के लिए फादरलैंड और भारत-रूस मेंमदरलैंड शब्द प्रचलित हैं।

फादरलैंड और होमलैंड क्या हैं ?

फादरलैंड – फादरलैंड का अर्थ ऐसे देश से है जो आपके ‘पिता’ या ‘पूर्वजों’का हो। फादरलैंड शब्द का उपयोग नाजी जर्मनी के कॉन्टेक्स्ट में कियागया जहां इस शब्द को राष्ट्रीय विचारधारा के तौर पर देखा गया।

वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार, फादरलैंड का अर्थ ऐसी जगह से है जोआपके पिता या पूर्वजों की हो और जहां आपका जन्म हुआ हो।

होमलैंड– होमलैंड शब्द का प्रयोग अमेरिका के संदर्भ में किया जाता है।

द अमेरिकन हेरिटेज डिश्नरी के अनुसार,   होम लैंड यानी जन्मस्थान।वह स्थान, क्षेत्र या कोई सीमा जो किसी व्यक्ति विशेष या किसी समुदायकी पहचान हो होमलैंड या गृहस्थान कहलाती है।

भारत में मौजूद मातृसत्तात्मक परंपरा ‘खासी‘

मातृसत्तात्मक परंपरा को मेघालय में रहने वाले खासी ट्राइब के लोगआज भी फॉलो करते हैं। खासी समुदाय में संपत्ति को मां से बेटी के नामकिया जाता है। यहां सबसे रोचक बात है कि सबसे छोटी बेटी को संपत्तिमें सबसे ज्यादा हिस्सा मिलता है।

भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके भारतमाता या ‘भारतम्बा’ कहा जाता है। भारतमाता को प्राय: केसरिया या नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में भगवा ध्वज लिये हुए चित्रित किया जाता है तथा साथ में सिंह होता है।

भारत माता मन्दिर, हरिद्वार

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भारत माता मन्दिर हरिद्वार में स्थित है, जो ‘मदर इण्डिया’ के नाम से प्रसिद्ध है। भारत माता को समर्पित इस मंदिर में आठ मंजिलें हैं और यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है। आठवीं मंजिल प्रकृति प्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्ति दोनों के लिए एक उपहार के सामान है, क्योंकि यहाँ भगवान शिव का मंदिर है।

निर्माण- हरिद्वार का ‘भारत माता मंदिर’ एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर भारत माता को समर्पित है एवं इसका निर्माण प्रसिद्ध धार्मिक गुरु स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी द्वारा करवाया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने वर्ष 1983 में इस मंदिर का उद्घाटन किया था। मंदिर में आठ मंजिलें हैं एवं यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है।

मंदिर की मंजिलें- इस पवित्र स्थल की प्रत्येक मंजिल विभिन्न देवी देवताओं एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को समर्पित है।

  • मंदिर में सबसे प्रमुख पहली मंजिल पर स्थित भारत माता की मूर्ती है।
  • दूसरी मंजिल पर ‘शूर मंदिर’ है, जो भारत के शूर वीरों को समर्पित है।
  • तीसरी मंजिल पर ‘मातृ मंदिर’ है, जो भारत की स्त्री शक्ति को समर्पित है।
  • चौथी मंजिल महान भारतीय संतों को समर्पित है।
  • पांचवी मंजिल विभिन्न धर्मों, इतिहास एवं भारत के विभिन्न भागों की सुंदरता को प्रदर्शित करती है।
  • छठवीं एवं सातवीं मंजिल पर देवी शक्ति एवं भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार देखे जा सकते हैं।
  • आठवीं मंजिल प्रक्रति प्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्ति दोनों के लिए एक उपहार से सामान है, क्योंकि यहाँ शिव का मंदिर है और यहाँ से हिमालय, हरिद्वार एवं सप्त सरोवर के सुंदर दृश्यों को देखा जा सकता है।

Bharat_Mata_at_Indian_Army_base_gateBharat Mata at Indian Army base gate near Leh, Ladakh

800px-Bharat_Mata_statue_2Bharat Mata statue at Kanyakumari,India

 

‘वन्दे मातरम्’ से जुड़ी जानकारी के लिए क्लिक करें…

https://drsandeepkr.wordpress.com/2014/08/13/वन्दे-मातरम्-माँ-तुझे-सला/

vande mataram

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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4 Responses to “भारत माता”… भारत को क्यों “माँ” की उपाधि दी गई

  1. इतनी सारी तथ्यपरक जानकारियों का यह अत्यंत मूल्यवान लेख जान साधरण के लिए प्रस्तुत करने हेतु मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ|

    • drsandeepkr says:

      Pankaj Dwivedi जी… आपके प्रेरणादायक शब्दों के लिए धन्यवाद… कई बार जनता सोशल मीडिया पर बिना जानकारी और तथ्यों के ज्ञान प्रकट करने लगती है… ऐसे में खतरा बना रहता है कि क्या हम जो बोल रहे हैं वह सत्य है… ऐसे में कुछ सही तथ्य जनता तक पहुंचे उसके लिए यह रिसर्च है 🙂

  2. sumit says:

    बहुत बढ़िया काम किया है आप ने

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