अयोध्या विवाद: पढ़ें- कब-कब, क्या-क्या हुआ

राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद…. टाइटल विवाद

1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर के सिपहसालार मीर बांकी ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.  When the Muslim emperor Zāhir ud-Dīn Muḥammad Babur came down from Farghana in 1527, he defeated the Hindu King of Chittorgarh, Rana Sangram Singh at Fatehpur Sikri, using cannon and artillery. After this victory, Babur took over the region, leaving his general, Mir Banki, in charge as Viceroy. 

1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.

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1885: 
इस विवादित मामले की गहराई में जाए तो पता चलता है कि यह अभी का झगड़ा नहीं है बल्कि 1885 से चला आ रहा है। कुछ हिंदू संगठन के दस्तावेजों पर नजर डाली जाए तो उससे पता चलता है कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर इस विवादित स्थल पर मस्जिद बनवाई थी। लेकिन इतिहास कुछ और ही कहता है। जिसके तहत बाबर कभी अयोध्या गया ही नहीं। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि जन्म स्थान एक चबूतरा जो मस्जिद से अलग उसके सामने है जिसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम इक्कीस फिट और चैड़ाई उत्तर दक्षिण सतरह फीट है। महंत स्वयं व हिंदू इसकी पूजा करते हैं। इस दावे में यह भी कहा गया था कि यह चबूतर चारों ओर से खुला है। सर्दी गर्मी और बरसात में पूजा करने वालों को कठिनाई होती है। इस लिए इस पर मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मंदिर बनाने से रोक दिया है। इस लिए न्यायालय सरकार को आदेश दे कि वह मंदिर बनाने दे। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 24 दिसंबर 1885 को फैजाबाद के सब जज पं. हरिकृष्ण ने महंत रघुवीरदास की अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मस्जिद के सामने मंदिर की इजाजत देने से हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी। फैसले में यह भी कहा गया था कि मंदिर मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक दूसरे से अलग साबित करती है। मंदिर और मस्जिद के बीच यह दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी। फैजाबाद के सब जज पं. हरि कृष्ण के फैसले के खिलाफ राम जन्म स्थान के महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल जे आर्य के यहां अपील की जिसका मुआयना करने के बाद इसे 16 मार्च 1886 को खारिज दिया गया। जिला जज के इस फैसले के खिलाफ महंत रघुवीर दास ने ज्यूडीशिनल कमिश्नर जिसके पास पूरे अवध के लिए हाईकोर्ट के समान अधिकार थे, ने भी अपने फैसले के जरिए इस अपील को एक नवंबर 1886 को खारिज कर दिया।

इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ी जाती रही, राम जन्म स्थान चबूतरों पर हिन्दू पूजा अर्चना करते रहे। हिंदू-मुस्लिम के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। सन 1934 में गो-वध को लेकर अयोध्या में एक दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुंची। जिसे सरकार ने अपने खर्चे से बनवा दिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। कहा तो यह जाता है कि आजाद मिलने के बाद कांग्रेस ने राजनीतिक फायदा उठाने के लिए (इस समय देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू थे) बाबरी मस्जिद पर कब्जा करने की योजना बनाई, 22/23 दिसंबर 1949 की रात्रि कुछ शरारती लोगों ने बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रख दी। जिसकी सूचना संबंधित थाने के कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। राम दुबे ने एक नामदर्ज एफ आई आर की जिसमें कहा गया कि मुल्जिमान रामास, राम शुक्ल दास सुदर्शन दास व पचास साठ आदमी अज्ञात ने बलवा करके मस्जिद में मूर्तियां रख कर उसे नापाक किया। मुल्जिमान को ड्यूटी पर लगे लोगों और दूसरे आदमियों ने देखा। जिससे मुदकमा तैयार किया गया जो सही है। थाना इंचार्ज राम दुबे की एफ आई आर की बुनियाद पर मार्कण्डे सिंह एडीशनल सिटी मजिस्ट्रेट ने 29 दिसंबर 1949 को धारा 145 के तहत बाबरी मस्जिद कुर्क कर दी। इसके बाद बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि के तमाम मुकदमों को यकजा कर दावा नंबर 12, 1261 हाईकोर्ट लखनऊ के हवले कर दिया गया।

1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.

1949: वैसे तो राम मंदिर बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला तो सौ बरस से भी अधिक पुराना है. लेकिन यह अदालत पहुँचा 1949 में. यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ जब सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाज़ा खोलने पर पाया गया कि उसके भीतर हिंदुओं के आराध्य देव राम के बाल रूप की मूर्ति रखी थी. इस जगह हिंदुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि होने का दावा करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों ने कहा था कि “रामलला यहाँ प्रकट हुए हैं.” लेकिन मुसलमानों का आरोप है कि रात में किसी ने चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर ये मूर्ति वहां रख दी थी.

9 अगस्त 1991 को भारतीय संसद में पेश की गई जानकारी के अनुसार फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने घटना की जो रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी उसमें लिखा था, “रात में जब मस्जिद में कोई नहीं था तब कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ एक मूर्ति रख दी.”

अगले दिन वहां हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई और पाँच जनवरी 1950 को जिलाधिकारी ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका से बाबरी मस्जिद को विवादित इमारत घोषित कर दिया और उस पर ताला लगाकर इसे सरकारी कब्ज़े में ले लिया.

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैज़ाबाद की ज़िला अदालत में अर्ज़ी दी कि हिंदुओं को उनके भगवान के दर्शन और पूजा का अधिकार दिया जाए. मुकदमा संख्या 2 /1950 दर्ज करवाकर अनुरोध किया कि गर्भगृह में रखी मूर्तियां न हटाने और पूजा व दर्शन की अनुमति मांगी। उसी दिन इसका अस्थायी आदेश दिया गया।

पूजा शुरू- 19 जनवरी 1950 को फ़ैजाबाद के सिविल जज ने इन दोनों अर्ज़ियों पर एक साथ सुनवाई की और मूर्तियां हटाने की कोशिशों पर रोक लगाने के साथ साथ इन मूर्तियों के रखरखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाज़त दे दी.

साथ ही, अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस ‘विवादित मस्जिद’ के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएँ.

दिगंबर अखाड़ा के महंत और राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास (अब दिवंगत) ने भी ऐसी ही एक अर्ज़ी दी.

1959: में हिन्दू पक्ष की ओर से तीसरा दावा निर्मोही अखाड़े की ओर से दाखिल किया गया जो मुकदमा संख्या 26 /1959 दर्ज किया गया। इस मुकदमे में रिसीवर से कब्जा दिलाए जाने की बात कही गई।

1961: इन तीनों मुकदमों के लंबित रहने के कारण 1961 तक नहीं हो सका तो मूर्तियां रखने की तारीख से 12 साल के अन्दर मुसलमानों की ओर से एक दावा मालिकाना हक और कब्जा वापसी के बाबत 18 दिसम्बर, 1961 को दाखिल किया गया।

In 1961, yet another suit was filed by Mohammad Hashim (He is still alive), pleading restoration of property to Muslims. By 1964, the issues were settled and date was fixed for final hearing. However, the appointment of a new receiver in 1968 was obstructed by yet another appeal before the Allahabad High Court in 1971.

Subsequently, the case was not taken up until 1983, when the Vishwa Hindu Parishad launched its temple movement in a big way.

1984:  कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को “मुक्त” करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.

फरवरी, 1986 ताला खुला: उमेश चंद्र पांडे की एक याचिका पर फ़ैज़ाबाद के ज़िला मजिस्ट्रेट के एम पांडे ने एक फ़रवरी 1986 को विवादित मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को उसके भीतर जाकर पूजा करने की इजाज़त दे दी. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति (एकशन कमेटी) का गठन किया.

Judge KM Pandey observed, “After having heard the parties, it is clear that the members of the other community — namely Muslims– are not going to be affected by any stretch of imagination if the locks of the gates were opened and idols inside the premises are allowed to be seen and worshipped by the pilgrims and devotees.”

His observation, “heavens will not fall if the locks of the gates are removed”, however, fell flat as the order sparked off nationwide rioting and communal violence.

पहली फरवरी, 1986 के इस आदेश को मोहम्मद हाशिम अंसारी की ओर एक रिट पिटीशन दायर करके चुनौती दी गई जिसमें 3 फरवरी, 1986 ई. को हाईकोर्ट ने विवादित भवन में कोई बदलाव न करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए।

The Sunni Waqf Board and Babri Masjid Action Committee moved the Allahabad High Court against the district judge’s order. However, the order was not stayed. Meanwhile, all cases pertaining to the Ayodhya dispute were referred to the Lucknow bench of the court.

11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया.

1987  में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए.

इस अर्ज़ी पर विचार चल ही रहा था कि 1989 में अयोध्या की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर कर मांग की गई कि विवादित मस्जिद को मंदिर घोषित किया जाए.

10 जुलाई 1989 उच्च न्यायालय ने पाँचों मुक़दमों को साथ जोड़कर तीन जजों की एक बेंच को सौंप दिया. तीन जजों की एक बेंच 21 साल (1989-2010) से सुनवाई कर रही थी. इस बीच कई जज रिटायर हो गए या उनके तबादले हो गए.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी. 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ लेकिन अगले ही दिन फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधीश ने आगे निर्माण पर रोक लगा दी.

1989-91: Meanwhile, a ‘shilaniyas’ (laying of foundation stone) for the proposed temple in 1989 gave the whole issue a hype and the police firing ordered on violent karsevaks by the Mulayam Singh government in 1990  polarised votes in favour of the BJP, forging Kalyan Singh to power in 1991. Kalyan ordered acquisition of 2.75 acres of land around the mosque in his bid to show his party’s seriousness towards building the temple.

However, BMAC convenor Zafaryab Jilani promptly moved yet another writ to prevent any kind of construction on the acquired land.

Meanwhile, Aslam Bhure moved the Supreme Court against the acquisition. But the apex court transferred the case to high court here directing for maintenance of status quo until the high court decided the five writs that were by then pending there.

1990- Advani’s Rath Yatra: Chariot of fire

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  • 1986 May: Becomes chief of the BJP
  • 1989 June: Drafts the Palampur resolution, aligning the BJP with VHP’s Ram temple agitation.
  • December: Allies with JD for LS polls. Lends outside support to the V.P. Singh government, as does the Left.
  • 1990 September 25: Launches rath yatra from Somnath for temple construction.
  • October 23: Yatra is stopped at Samastipur, Bihar; withdraws support to VP government.
  • 1992 December: Babri Masjid demolished by kar sevaks on Dec 6. Advani prime accused.

Advani’s phenomenal rath yatra changed the course of the BJP.

It was in September 1990 when BJP president L.K. Advani decided to go for a padyatra to educate the people about the Ayodhya movement. This had been the BJP’s main election plank during the 1989 elections. However, when the late Pramod Mahajan heard about this, he pointed out that Advani would make slow progress on foot. “A jeep yatra, then ?” asked Advani. It was then that Mahajan suggested that they take a mini-bus and redesign it as a rath.

And that is how Advani embarked on his first Toyota rath yatra, catalysing a chain of events that resulted in the demolition of the Babri Masjid two years later. He took off from Somnath in Gujarat and worked his way to Ayodhya via central India. The idea of a chariot worked as a great mobiliser. Hindutva supporters rang temple bells, beat thalis and shouted slogans to welcome the rath. Some smeared the rath with a tilak and smeared the dust from its wheels on their forehead.

As expected, there was a communal backlash as riots broke out in Gujarat, Karnataka, Uttar Pradesh and Andhra. Advani was arrested in Samastipur on October 23 by then chief minister Lalu Prasad Yadav before he could reach the kar seva at Ayodhya on October 30. Although in his autobiography, My Country My Life, Advani calls this rath yatra, “an exhilarating period in my political life”, it was much more than that.

It whipped up a strong Hindu fervour and increased the party’s votebank from 85 in 1989 to 120 in the 1991 general elections. It also launched Advani’s career as the Eternal Yatri as he undertook four other rath yatras. However, the rath yatra also hung the albatross of Hindutva round the BJP’s neck, an accessory that the BJP and Advani alternately embrace and at times try hard to shrug off.

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The main event: The Mandal report

The crisis, the likes of which has rarely engulfed the nation with such overwhelming intensity and rage,was of his own making and,as it mounted with increasing ferocity, PM V.P. Singh found himself facing it almost alone. The very people who had pushed him into taking the controversial decision were nowhere to be seen. Having taken the big bite from the forbidden apple of the Mandal Commission, Singh found himself unable to swallow it or to spit it out. Even as he found himself paralysed in grappling with the consequences of the hasty decision he had made, his government watched in stunned horror as city after city exploded in violent anti-Mandal agitations.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर सोमनाथ गुजरात से 25 सितम्बर 1990 से शुरू हुई रथयात्रा को 30 अक्टूबर तक अयोध्या में ख़त्म होना था. आडवाणी को 23अक्टूबर को समस्तीपुर बिहार में ग़िरफ़्तार कर लिया गया।  

1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएँ विफल हो गईं.

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1990 में देश के पूर्व प्रधान मंत्री चंद्र शेखर ने इस विवाद का हल निकालना चाहा उन्होंने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिंदू परिषद को आमने सामने बैठा दिया। दोनों के बीच सरकार ने भैरोसिंह शेखावत और शरद पवार को नियुक्त किया। बातचीत के कई दौर चले आखिर में यह तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने-अपने कागज और सबूत पेश करें, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने तो दस्तावेज पेश किए लेकिन विश्व हिन्दू परिषद ने दस्तावेज नहीं पेश किए।

30 अक्टूबर 1992: the fifth Dharma Sansad met in Keshavpuram New Delhi and decided to start the Kara Save on 6th December, 1992.

On the morning of 8th December, 1992 the Central Government took over the complete Shri Rama Janmabhoomi Parisar area under its control. The pooja for Ram Lala did continue.

अंत में 6 दिसंबर 1992 को केन्द्र में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार के रहते कार सेवा के दौरान मस्जिद को ढहा दिया गया। पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे हुए। विदेशों में भी इस घटना की निंदा हुई। जिसके दबाव में आकर केन्द्र में स्थापित कोंग्रेस सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने 26 जनवरी 1993 को लाल किले से घोषणा की कि वह उसी स्थान पर पुनः मस्जिद का निर्माण कराएंगे।

1992, 6 दिसंबर को क्या हुआ, कैसे हुआ

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1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.

5 दिसंबर, 1992

  • इस दिन अयोध्या में लाखों कारसेवक एक और नारा बार-बार लगा रहे थे। मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे। ये तैयारी एक दिन पहले की थी।
  • कारसेवकों ने अगले दिन 12 बजे का वक्त तय किया था कारसेवा शुरू करने का। एक अजीब का जोश सबसे चेहरे पर साफ देखा जा सकता था।

6 दिसंबर, सुबह 11 बजे

  • सुबह 11 बजे के करीब कारसेवकों के एक बड़े जत्थे ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की लेकिन उन्हें वापस धकेल दिया गया। इसी वक्त वहां नजर आए वीएचपी नेता अशोक सिंघल, कारसेवकों से घिरे हुए और उन्हें कुछ समझाते हुए।
  • थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी भी जुड़ गए।
  • तुरंत ही इस भीड़ में लाल कृष्ण आडवाणी भी नजर आए। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद थे और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे। तभी पहली बार मस्जिद का बाहरी दरवाजा तोड़ने की कोशिश हुई लेकिन पुलिस ने उसे नाकाम कर दिया।
  • तस्वीरें गवाह हैं कि इस दौरान पुलिस अधिकारी दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।

6 दिसंबर, सुबह साढ़े 11 बजे

  • मस्जिद अब भी सुरक्षित खड़ी थी। तभी वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचा। उसने पहले से मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाने की कोशिश की। जैसे वो किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे थे।
  • कुछ ही देर में बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी वहां से बाहर निकलती नजर आई। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह।
  • पुलिस की इस टुकड़ी को दूर मचान पर बैठे पुलिस अधिकारी सिर्फ देखते रहे, कुछ किया नहीं। मस्जिद से पुलिस के हटने के तुरंत बाद मेन गेट पर दूसरा और बड़ा धावा बोला गया। जो कुछ पुलिसवाले वहां बचे रह गए थे वो भी पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।

6 दिसंबर, दोपहर के 12 बजे

  • दोपहर 12 बजे एक शंखनाद पूरे इलाके में गूंज उठा। कारसेवकों के नारों की आवाज पूरे इलाके में गूंजती जा रही थी। कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगा। बाड़े में लगे गेट का ताला भी तोड़ दिया गया।
  • कुछ ही देर में मस्जिद कारसेवकों के कब्जे में थी। इस वक्त की एक और तस्वीर गौर करने लायक है। तत्कालीन एसएसपी डीबी राय पुलिसवालों को मुकाबला करने के लिए कह रहे थे लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी।
  • उस वक्त भी ये सवाल उठा था कि क्या ये पुलिस का विद्रोह था या फिर कैमरे के सामने किया गया सोचा-समझा ड्रामा। इस वक्त तक पुलिसवाले पूरी तरह हथियार डाल चुके थे।
  • कुदाल लिए हुए कारसेवक तब तक मस्जिद गिराने का काम शुरू कर चुके थे। एक दिन पहले की गई रिहर्सल काम आई और कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया गया।

1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता का बयान: 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं और उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। वे फिलहाल रिसर्च एंड एनालाइसिस विंग (रॉ) में पदस्थ हैं। उनका बयान भी कोर्ट में दर्ज हुआ है। जिसके मुताबिक़ —

6 दिसंबर 1992 को विवादित स्थल से 150 मीटर दूर मंच बनाया गया था।

  • इस मंच पर आडवाणी के अलावा मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, विहिप के अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतंभरा मौजूद थे।
  • तीनों गुंबद गिरने के बाद मंच पर खुशी और जश्न का माहौल था।
  • विवादित ढांचे का पहला गुंबद दोपहर 2 बजे, दूसरा 3 बजे और तीसरा 4:30 बजे गिरा।
  • अंजु गुप्ता के मुताबिक, घटना वाले दिन वहां मौजूद भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कारसेवकों को खुश करने के लिए जोशीला भाषण दिया था। वे बार-बार कह रहे थे कि मंदिर वहीं बनेगा।
  • गुप्ता ने यह भी कहा कि विनय कटियार, उमा भारती व साध्वी ऋतंभरा ने भी उकसाने वाले भाषण दिए थे।
  • गुप्ता ने कहा कि आडवाणी के रामकथा कुंज में आते ही माहौल गर्म हो गया था। तब कुंज में भाजपा के कलराज मिश्र, दिवंगत प्रमोद महाजन और आचार्य धर्मेंद्र के अलावा भाजपा व विहिप के करीब 100 नेता मौजूद थे। आडवाणी ने अपने भाषण में बार-बार कहा कि मंदिर विवादित करार दिए गए 2.77 एकड़ में ही बनेगा।
  • गुप्ता के अनुसार उन्होंने आडवाणी के पूछने पर बताया था कि लोग गुंबदों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर आडवाणी ने विवादित स्थल पर जाने और लोगों से गुंबद से उतरने की अपील करने की इच्छा जताई। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद आडवाणी को बताया गया कि वहां जाना ठीक नहीं होगा। यदि वे किसी दुर्घटना की चपेट में आ गए तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी।
  • गुप्ता के मुताबिक, बाद में आडवाणी ने भारती को भेजा। वे जल्द ही वापस आ गईं। भारती ने बताया कि उन्होंने लोगों को छड़ों, हथौड़े आदि के साथ देखा है। जब मस्जिद के गुंबद गिरा दिए गए तब भारती व ऋतंभरा परस्पर गले लग र्गई और उन्होंने मिठाइयां बांटीं। उन्होंने आडवाणी और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को भी बधाई दी। किसी भी नेता ने विध्वंस रोकने की अपील नहीं की।
  • गुप्ता ने बताया कि तत्कालीन डीजीपी एससी दीक्षित ने ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को बधाई दी। दीक्षित ने यह भी कहा कि सहयोग करने और कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए उनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा।

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1992: Demolition of the mosque on December 6, 1992 led the Muslims to move contempt application against which Kalyan Singh was awarded a day’s imprisonment.

While January 15 was fixed for the next hearing , the then Central government under PV Narasimha Rao issued an ordinance for acquisition of as many as 67 acres in and around the disputed site.

  • दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया था.
  • जस्टिस बाहरी आयोग की सिफारिश पर नरसिंह राव की सरकार ने विहिप पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था.

जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया. वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया.

फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.

13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.

15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं.

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला.

मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया.

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला.

मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.

जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए.

जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद चरमपंथियों ने अयोध्या के विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान ‘भड़काऊ भाषण’ देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था.

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.

04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा.

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की ‘मिलीभगत’ थी.

19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई.

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी.

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7 जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं.

24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश. आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी.

20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज.

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के स्वत्व निर्धारण या Title Suit पर सुनवाई पूरी. अपने दावे के पक्ष में हिंदुओं ने 54 और मुस्लिम पक्ष ने 34 गवाह पेश किए. इनमे धार्मिक विद्वान, इतिहासकार और पुरातत्व जानकार शामिल हैं. मुस्लिम पक्ष ने अपने समर्थन में 12 हिंदुओं को भी गवाह के तौर पर पेश किया. दोनों पक्षों ने लगभग 15 हज़ार पेज दस्तावेज़ी सबूत पेश किए. कई पुस्तकें भी अदालत में पेश की गईं.

अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है. इस तरह 1989 से अब तक कुल 18 हाईकोर्ट जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं.

30 सितंबर 2010- अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर किसी एक पक्ष में फैसला नहीं आया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पूरे जमीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। फैसले के मुताबिक विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। एक हिस्सा हिंदुओं को दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को मिलेगा। हाईकोर्ट ने माना है जिस स्थान पर भगवान राम की मूर्ति रखी हुई है वही रामजन्म स्थान है और यही हिस्सा हिंदुओं को मिलेगा। हालांकि तीन महीने तक विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी। कोर्ट ने कहा है कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए सभी पक्षों के पास तीन महीने का वक्त रहेगा।

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17 Nov 2011- सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन भाग में विभाजित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि यह ‘कुछ अजीब’ फैसला है क्योंकि किसी पक्ष ने भूमि को तीन भाग में बांटने की मांग नहीं की थी।

30 सितंबर 2010 निर्णय आने तक 21 साल13 बेंच18 जज

अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है.

पहली पूर्ण पीठ

  • विवाद की सुनवाई के लिए 21 जुलाई 1989 को तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केसी अग्रवाल, जस्टिस यूसी श्रीवास्तव और जस्टिस सैयद हैदर अब्बास रज़ा की पहली विशेष पूर्ण पीठ बनी.
  • अगले साल 1990 में जस्टिस रज़ा के साथ दो नए जजों जस्टिस एससी माथुर और जस्टिस ब्रजेश कुमार को मिलाकर नई बेंच बनी.
  • विवादित मस्जिद गिरने के बाद केंद्र सरकार ने जनवरी 1993 में अध्यादेश लाकर मालिकाना हक़ के चारों मामले समाप्त करके सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी कि क्या वहाँ कोई पुराना मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.
  • वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अपनी राय देने से इनकार कर दिया और मामलों को पुनर्जीवित करते हुए हाईकोर्ट को फ़ैसला करने को कहा.
  • तब 1994 में जस्टिस एपी मिश्र, जस्टिस सीए रहीम और जस्टिस आईपी वशिष्ठ की नई बेंच बनी.
  • जस्टिस रहीम के चले जाने के बाद 1996 में जस्टिस एसआर आलम को लेकर चौथी बेंच बनी. सितंबर, 1997 में जस्टिस एपी मिश्र के हटने पर जस्टिस देवकांत त्रिवेदी को मिलाकर पांचवी पीठ बनी.
  • जनवरी, 1999 में जस्टिस आईपी वशिष्ठ हटे. उनकी जगह जस्टिस जेसी मिश्र को लेकर नई बेंच बनी.

सातवीं बेंच

  • जुलाई, 2000 में जस्टिस मिश्र चले गए और उनकी जगह जस्टिस भंवर सिंह आए तो सातवीं बेंच बनी.
  • सितंबर, 2001 में जस्टिस देवकांत त्रिवेदी की जगह जस्टिस सुधीर नारायण आए.
  • जुलाई, 2003 में फिर नवीं बार बेंच पुनर्गठित हुई और जस्टिस सुधीर नारायण की जगह जस्टिस खेमकरण आ गए.
  • अगस्त, 2005 में जस्टिस खेमकरण की जगह जस्टिस ओपी श्रीवास्तव आए. जस्टिस श्रीवास्तव को एक साल का सेवा विस्तार मिला फिर भी सुनवाई पूरी नही हुई.
  • जनवरी, 2007में जस्टिस भंवर सिंह की जगह जस्टिस धर्मवीर शर्मा आए.
  • सितंबर, 2008 में जस्टिस ओपी श्रीवास्तव की जगह जस्टिस सुधीर अग्रवाल आ गए.

13वीं पूर्ण पीठ

  • फिर दिसंबर, 2009 में जस्टिस सैयद रफ़त आलम मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हो गए. उनके तबादले पर जस्टिस एसयू ख़ान को लेकर 13वीं बार विशेष पूर्ण बनी.
  • अब वर्तमान बेंच के एक सदस्य जस्टिस धर्मवीर शर्मा एक अक्टूबर को रिटायर होने वाले हैं.
  • इस तरह 1989 से अब तक कुल 18 हाईकोर्ट जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं.
  • विवाद से जुड़े अन्य मामलों को जोड़ा जाए तो यह संख्या कहीं अधिक होगी.

अयोध्या स्वत्व निर्धारण Title Suits: कितने दीवानी मामले

अयोध्या विवाद से सम्बंधित 4 मुकदमे चल रहे हैं… 23 अगस्त 1990 : महंत परमहंस ने 40 साल पहले दायर अपना मुकदमा वापस लिया… बाद में सिविल मामलों के चारों केस हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने पास ट्रांसफर कर लिए…

16 जनवरी 1950 : गोपालसिंह विशारद (उनकी मृत्यु हो चुकी है. अब उनके बेटे राजेन्द्र सिंह वादी हैं) द्वारा सिविल जज की अदालत में मुकदमा। मूर्तियाँ न हटाने तथा पूजा की अनुमति देने के बाबत जज द्वारा अंतरिम आदेश पारित करने के साथ फैसला कि इस संपत्ति में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

  • प्रथम वाद 1950 में गोपाल सिंह विशारद द्वारा (सिविल वाद संख्या 2/1950) सिविल जज फैजाबाद की अदालत में दायर किया था जिसमें मांग की गयी थी कि भगवान के निकट जाकर दर्शन और पूजा करने का वादी का अधिकार सुरक्षित रखा जाएइसमें किसी प्रकार की बाधा या विवाद प्रतिवादियों द्वारा खड़ा न किया जाए तथा ऐसी निषेधाज्ञा जारी की जाए ताकि प्रतिवादी भगवान को अपने वर्तमान स्थान से हटा न सके।

दिसंबर, 1950: महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया।

  • इसी प्रकार की मांग करते हुए दूसरा वाद (संख्या 25/1950) परमहंस रामचन्द्रदास महाराज ने दायर किया। श्री विशारद के वाद में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने अन्तरिम निर्णय देकर श्रीरामलला की मूर्तियाँ उसी स्थान पर बनाए रखने तथा हिन्दुओं द्वारा उनकी पूजा अर्चाआरती व भोग निर्बाध जारी रखने का आदेश दिया तथा एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। इस अन्तरिम आदेश की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल1955 में कर दी गई।

17 दिसंबर, 1959: निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

  • तृतीय वाद सन् 1959 में निर्मोही अखाड़ा द्वारा (संख्या 26/1959) दायर करके मांग की गई कि श्रीराम जन्मभूमि की पूजा व्यवस्था की देखभाल का दायित्व निर्मोही अखाड़े को दिया जाए और रिसीवर को हटा दिया जाए।

18 दिसंबर, 1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमादायर किया।

  • चतुर्थ वाद 18 दिसम्बर1961 को (11 वर्ष 11 माह व 26 दिन बाद) उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा (संख्या 12/1961) दायर किया गया। अपने वाद में विवादित ढांचे को मस्जिद” घोषित करने तथा पूजा सामग्री हटाने और ढांचे के चारों ओर के आसपास के भू-भाग को कब्रिस्तान घोषित करने की मांग की। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने हकदारी मुकदमा दायर कर माँग की थी कि विवादित ढाँचे से मूर्तियाँ हटायी जाए तथा कब्जा मुसलमानों को दे दिया जाए और उस स्थान को मस्जिद घोषित कर दी जाए। इस मामले में 22 विपक्षी पार्टियाँ हैं। इस मुकदमें में राहत माँगी गई कि वाद पत्र के साथ नत्थी किए गए नक्शे में एबीसीडी अक्षरों से दिखाई गई सम्पत्ति को मस्जिद घोषित कर दिया जाए और उस स्थान पर कब्जा मुसलमानों को दिलाया जाए एवं वहाँ पर जो विराजमान मूर्तियाँ हैंउनको हटाया जाए। उल्लेखनीय है कि सिविल जज फैजाबाद द्वारा 6 जनवरी 1964 को दिए गए आदेश के माध्यम से उपरोक्त चारों मुकदमे की सुनवाई के लिए एक साथ जोड़ दिए गए।

जुलाई, 1989: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया।

  • अन्तिम व पंचम वाद भगवान रामलला विराजमान की ओर से 01 जुलाई1989 को देवकीनन्दन अग्रवाल (पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट देवकी नंदन अग्रवाल की मृत्यु के बाद विश्व हिंदू परिषद के त्रिलोकी नाथ पाण्डेय राम लला के मित्र के तौर पर पैरोकार हैं) द्वारा (संख्या 236/1989) दायर किया गया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति एक जीवित इकाई है अपना मुकदमा लड़ सकती है परन्तु प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति अवयस्क मानी जाती है। अत: उनका मुकदमा लड़ने के लिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। अत: न्यायालय ने रामलला का मुकदमा लड़ने के लिए देवकीनन्दन अग्रवाल को रामलला के अभिन्न सखा (Next Friend) के रूप में अधिकृत कर दिया। इस वाद में अदालत से मांग की गई थी कि राम जन्मभूमि अयोध्या का सम्पूर्ण परिसर वादी (देव-विग्रह) का हैअत: राम जन्मभूमि पर नया मन्दिर बनाने का विरोध करने वाले अथवा इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या बाधा खड़ी करने वाले प्रतिवादियों के विरूध्द स्थायी स्थगन आदेश जारी किया जाये।

इन चार मुकदमों में वादी प्रतिवादी मिलाकर अनेक पक्षकार हैं.

  • हिंदुओं की ओर जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है उनमे हिंदू महासभा, श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति और रामजन्म भूमि सेवा समिति प्रमुख हैं.
  • मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अलावा जमीयते उलेमा ए हिंद, हाशिम अंसारी, मोहम्मद फारुख़, मोहम्मद महफ़ूज़ुर रहमान और मिस्बा उद्दीन प्रमुख हैं.

राम मंदिर मुद्दा- सुप्रीम कोर्ट के गलियारे से राजनीतिक हलकों तक

30 सितंबर 2010- अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया…विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर किसी एक पक्ष में फैसला नहीं आया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पूरे जमीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। फैसले के मुताबिक विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। एक हिस्सा हिंदुओं को दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को मिलेगा।

9 मई 2011- सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगाया, सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया…

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बादअयोध्या की विवादित जमीन पर दावा जताते हुए रामलला विराजमान की तरफ से हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की।
  • दूसरी तरफसुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद कई और पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशंस दायर कर दीं।
  • इन सभी पिटीशंस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट नेमई, 2011 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। तब से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है।

6 फरवरी 2012- राम मंदिर बिना बीजेपी को सत्ता नहीं : योगी आदित्यनाथ… बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि बीजेपी जब तक राम मंदिर के मुद्दे पर ताल ठोककर मैदान में नहीं उतरेगी यूपी की सत्ता में आना मुश्किल है।

26 फरवरी 2012- सत्ता में आने पर राम मंदिर का निर्माण कराएगी भाजपा : उमा… भाजपा नेता उमा भारती ने शनिवार को कहा कि उनकी पार्टी यदि सत्ता में आई तो वह अयोध्या में राम मंदिर बनाएगी। उन्होंने मुस्लिमों के विकास के लिए काम करने की भाजपा की प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया।

6 जुलाई 2013- अमित शाह ने अयोध्या में कहाभव्य राम मंदिर बनाएंगे…  अमित शाह ने अयोध्या में कहा,भव्य राम मंदिर बनाएंगे उत्तर प्रदेश प्रदेश बीजेपी के प्रभारी और नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह आज पार्टी की बैठक में शामिल होने के लिए अयोध्या पहुंचे थे।

अगस्त 2013– वीएचपी की 84 कोसी यात्रा- यूपी सरकार ने लगाया बैन… उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विश्व हिन्दू परिषद की चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा पर रोक लगाए जाने के बाद विहिप ने भी साफ कर दिया है कि वह अपने कार्यक्रम में बदलाव नहीं करेगी

18 अक्टूबर 2013– वीएचपी की संकल्प रैलीछावनी में तब्दील हुई अयोध्या गोरखपुर के बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ को फैजाबाद−गोंडा बॉर्डर से हिरासत में ले लिया है। योगी आदित्यनाथ संकल्प दिवस रैली के लिएअयोध्या आ रहे थे।

7 अप्रैल  2014  भाजपा के घोषणा-पत्र में सुशासन की बात के साथ राम मंदिर और अनुच्छेद 370 का मुद्दा बरकरार

मई 2014– अपार लोकप्रियता और लोकसभा चुनाव में जबर्दस्‍त सफलता हासिल कर नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्‍ता में पहुंचे

दिसम्बर 12, 2014 – यूपी के राज्यपाल राम नाइक ने कहाअयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीयों की इच्छा‘… उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने अयोध्या मुद्दे को लेकर फिर एक विवादित बयान दिया है। फैजाबाद में अवध यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में राम नाइक ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर जल्द से जल्द बनना चाहिए, क्योंकि भारत के नागरिकों की यही इच्छा है।

10 मई 2015- अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए कानून नहीं बनाएगी केंद्र सरकार : राजनाथ सिंह… केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने रविवार को अयोध्या में कहा कि मंदिर बने या नहीं यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगी। इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि सरकार इस बाबत कानून नहीं बना सकती, क्योंकि उनके पास राज्य सभा में बहुमत नहीं है।

जून 72015- कानून नहींसिर्फ कोर्ट के आदेश से निकलेगा अयोध्या मामले का समाधान : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

8 जून 2015- बीजेपी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा राम मंदिर… बीजेपी सासंद साक्षी महाराज उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज हमेशा अपने विवादित बयानों की वजह से सुर्खियों में रहते हैं। एक बार फिर उनके एक बयान पर सियासत गरमा गई है।

जून 2015- अयोध्या में रामायण संग्रहालय…  केंद्र सरकार ने अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर अयोध्या में रामायण संग्रहालय बनाने की घोषणा की, मार्च 2017 में योगी सरकार ने इसके लिए 25 एकड़ जमीन देने का ऐलान किया…

16 अक्टूबर 2015  पीएम मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिए दो साल का वक्त मांगा है- अखिल भारतीय दिगंबर अखाड़ा (अयोध्या) के महंत सुरेश दास ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए दो साल का समय मांगा है और अगर वह अपना वादा पूरा नहीं करते तो आंदोलन शुरू किया जाएगा।

23 नवम्बर 2015- राम मंदिर निर्माण का संकल्प पूरा होगा- आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि राम मंदिर के निर्माण का संकल्प पूरा होगा। भागवत विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता रहे अशोक सिंघल के लिए आयोजित एक शोक सभा में बोल रहे थे।

दिसंबर 2015- राम मंदिर निर्माण के लिए विहिप के पत्थरों से लदे पहले दो ट्रक अयोध्या पहुंचे… तत्कालीन समाजवादी सरकार ने उस समय वणिज्यिक कर विभाग से फॉर्म 39 दिए जाने से मना कर पत्थरों के आने पर रोक लगा दी थी। 2015: The VHP announces a nationwide drive to collect stones for the construction of the Ram Mandir. Six months later, in December, two trucks of stones arrive at the disputed site. Mahant Nritya Gopal Das claims there is a green signal from the Modi government that the temple will be built now. The Uttar Pradesh government led by Akhilesh Yadav says it will not allow the arrival of the stones in Ayodhya for the construction of the Ram Mandir.

6 जनवरी 2016- इस साल के अंत तक शुरू हो जाएगा राम मंदिर पर काम- सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया कि इस साल के अंत से पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा और 9 जनवरी को दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में इसकी कार्य योजना की घोषणा की जाएगी।

20 फरवरी 2016- स्वामी के राम मंदिर पुनर्निर्माण की याचिका पर सुनवाई को SC तैयार- देश की सर्वोच्च अदालत ने अयोध्या में राममंदिर के पुनर्निर्माण की बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की अर्जी को मुख्य मामले के साथ जोड़ दिया है. अदालत ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में ही सिविल याचिका पर सुनवाई लंबित है. ऐसे में इस याचिका पर सुनवाई नहीं हो सकती.  बता दें कि बीजेपी नेता स्वामी ने इस ओर नई याचिका दायर कर कहा था कि राम मंदिर का पुर्ननिर्माण उसी जगह किया जाए, जहां राम का जन्म हुआ था. साल 1994 में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दाखिल कर कहा था कि अगर साबित हो जाए कि मंदिर यहीं था तो मंदिर बनाएंगे. जबकि ASI ने कहा है कि राम मंदिर के अवशेष मिले हैं.

12 नवम्बर 2016  भाजपा अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए कटिबद्ध : अमित शाह… अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आज कहा कि उनकी पार्टी मंदिर बनाने के लिए कटिबद्ध है.

25 जनवरी 2017 यूपी भाजपा अध्यक्ष केशव मौर्य (वर्तमान में उत्तरप्रदेश के उप मुख्‍यमंत्री) का बड़ा बयानकहा – पूर्ण बहुमत मिला तो बनेगा राम मंदिर

28 जनवरी 2017 यूपी चुनाव के दौरान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का ऐलानयूपी में राम मंदिर के लिए संवैधानिक तरीके से काम करेगी बीजेपी

4 फरवरी 2017 बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ बोले – राम मंदिर निर्माण जल्द शुरू होगा

6 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने कहा आडवाणी और दूसरे नेताओं के खिलाफ केस वापस नहीं लिया जाएगा।

11 मार्च 2017: 403 में से 325 सीटें जीतकर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इतिहास रचा

21 मार्च 2017: कोर्ट के बाहर सुलझाएं राम मंदिर मुद्दाअगर दोनों पक्षों की वार्ता रही नाकामतो जज देंगे दखल : सुप्रीम कोर्ट

  • सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर ने कहा कि यह मामला धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ हैइसलिए दोनों पक्ष आपस में बैठें और बातचीत के ज़रिये हल निकालने की कोशिश करें. हालांकि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि दोनों समुदाय इस मुद्दे को लेकर हठी हैंऔर साथ नहीं बैठेंगे.
  • चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि इस मामले में ज़रूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट के जज भी मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि अगर दोनों पक्ष आपसी बातचीत से कोई हल नहीं निकाल पातेतो फिर कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर फैसला देने के लिए तैयार रहेगालेकिन फिलहाल दोनों पक्षों के सभी लोग टेबल पर बैठकर बातचीत करेंगेतो ज्यादा अच्छा होगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को31 मार्च को फिर से मेंशन करने को कहा है.

31 मार्च 2017  राम जन्‍मभूमि-बाबरी केस : सुप्रीम कोर्ट का जल्‍द सुनवाई से इनकार- कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जल्‍द सुनवाई संभव नहीं है.

21 जुलाई 2017- सुप्रीम कोर्ट ने कहा सुनवाई तेज करने के लिए वह जल्द फैसला लेंगे.

11 अगस्त2017- राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में 5 दिसंबर से शुरू होगी सुनवाईअयोध्या के राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में सात साल बाद एक बार फिर सुनवाईशुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 5 दिसंबर से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी. कोर्ट ने सभी पक्षों से कहा कि वे जिन दस्तावेज को आधार बना रहे हैं, उनका 12 हफ्तों के भीतर अंग्रेजी में अनुवाद करायें. ये दस्तावेज आठ भाषाओं में हैं.

भाषाओं में हैं दस्तावेज…

– इस केस से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज अरबीउर्दूफारसीपाली और संस्कृत समे भाषाओं में हैं।

– जस्टिस दीपक मिश्राजस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की स्पेशल बेंच इस मामले की सुनवाईकर रही है।

सबूतों के ट्रांसलेशन के लिए यूपी सरकार को 10 हफ्तों का वक्त

– बेंच ने टाइटल विवाद केस में फैसले के लिए जुटाए गए सबूतों का ट्रांसलेशन करने के लिए यूपी सरकार को10 हफ्तों का वक्त दिया है।

– बेंच ने ये साफ कर दिया कि तय समयसीमा के भीतर ही ट्रांसलेशन का काम पूरा किया जाएकिसी भी हालातमे और ज्यादा वक्त नहीं दिया जाएगा।

इलाहाबाद HC के फैसले के खिलाफ दायर पिटीशन पर होगी सुनवाई

– इस मामले मे 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ भी सुनवाई शुरू की जाएगी।

– डेढ़ घंटे तक विचार के बाद बेंच इस मुद्दे पर एक राय हुई। बता दें कि इस फैसले के खिलाफ 13 अपील दायर की गई हैं।

पहले साफ करेंकौन किसकी तरफ से पक्षकार

– मामले की सुनवाई के दौरान सबसे पहले एसोसिएट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दलील दीं। उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए सुनवाई जल्द पूरी करने की मांग की।

– इस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ऑब्जेक्शन लियाकहा कि यह सुनवाई सही प्रॉसेस का इस्तेमाल किए बगैर हो रही है।

– सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सभी पिटीशनर्स से पहले यह स्पष्ट करने को कहा कि कौन किसकी तरफ से पक्षकार है।

– इसके बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इस केस से जुड़े कुछ पक्षकारों का निधन हो गया हैइसलिए उन्हें बदलने की जरूरत है।

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दीपावली का इतिहास और महत्व

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दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधि से बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपों की पंक्ति। भारतवर्ष में मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं।

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दीपावली कैसे शुरु हुईअलग-अलग मान्यताएं

पौराणिक

  • भगवान राम का चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटना- त्रेतायुग में भगवान राम रावण को हराकर और चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या वापस लौटे तब अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए, यह थी भारतवर्ष की पहली दीपावली।

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क्या है वैराग और हिंदू संत परम्परा में कौन हैं वैरागी

प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे- (1) ब्रह्मचर्य, (2) गार्हस्थ्य, (3) वानप्रस्थ और (4) संन्यास।

वैदिक साहित्य में सन्यासी को वानप्रस्थी, वैरागी, तापसी, योगी, यति, , मुनि और  वैखानस कहा गया है।

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भारत में वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त संप्रदाय हैं… लेकिन हिंदू संत समाज मुख्यत दो भागों में विभाजित है वैष्णव और शैव… और इस विभाजन का कारण आस्था और साधना पद्धतियाँ हैं, लेकिन तीनों ही सम्प्रदाय वेद और वेदांत पर एकमत है। वैरागी परम्परा वैष्णव और शैव दोनों में मिलती है, स्मृति संप्रदाय सिर्फ एक निराकार परमेश्वर को मानता है।

वैरागी बनना बहुत कठिन है संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब 

ही उसे शैव या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। हिंदू संन्यास की कुछ पद्धतियाँ है। इन पद्धतियों के सम्प्रदायों में ‍दीक्षित व्यक्ति को ही हिंदुओं का संत माना जाता है।

शैव संप्रदाय में वैरागी

शिव को मानने वाले शैव संप्रदाय वाले हैं। शैव परंपरा के अनेक संप्रदाय हैं। इनमें शैव, पाशुपत, वीरशैव, कालामुख, कापालिक, काश्मीर शैव मत तथा दक्षिणी मत और दसनामी अधिक प्रसिद्ध हैं। शाक्त और नाथ संप्रदाय भी शैव संप्रदाय का ही अंग है।

भगवान शिव जो खुद परम वैरागी’ हैं… पहाड़ पर रहते। जंगलों में घूमते। सांपों, जानवरों, भूत-प्रेतों संग रमते। एक हाथ में त्र‌िशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, स‌िर पर त्र‌िपुंड चंदन लगा हुआ है। शिव वैरागी हैं इसीलिए उन्हें आम ज़िन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं चढ़ाई जाती हैं। भगवान भोलेनाथ को खुश करने के लिए आप उन्हें भांग-धतूरा, दूध, चंदन, और भस्म चढ़ाते हैं।

शैव संप्रदाय के संतों के नाम के आगे- परमहंस, महर्षि, ऋषि, स्वामी, आचार्य, महंत, संन्यासी, नाथ और आनंद आदि। दसनामी संप्रदाय में गिरि, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम। शैव के प्रमुख अखाड़े: जूना अखाड़ाअग्नि अखाड़ाआह्वान अखाड़ानिरंजनी अखाड़ाआनंद अखाड़ामहानिर्वाणी अखाड़ा एवं अटल अखाड़ा।

नाथ व्यक्ति ही होते हैं वैरागी: परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे ‘सिले’ कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को ‘सींगी सेली’ कहते हैं।

इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर ‘आदेश’ या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें वैरागी, उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है।

शैव संप्रदाय के वैरागी कैसे रहते हैं- वैरागी की अलग दुनियां होती हैं जहां इन सांसारिक चीजों के बदले दूसरी चीजें महत्वापूर्ण होती है । शरीर में भस्म, जटाएं, कानों में कुंडल, गले में रुद्राक्ष का माला और कुछ तो अर्धनग्न और हाथ में चिमटा, त्रिशुल और कंमडल लिए रहते है

वैष्णव संप्रदाय में वैरागी

वैष्णव भगवान विष्णु और उनके अवतारों को मानने वालों का संप्रदाय है। इसे भागवत संप्रदाय भी कहते हैं। मुख्यत: ईश्वर के अलावा ये लोग, विष्णु, राम और कृष्ण के भक्त होते हैं। इसलिए इसके मुख्यत: तीन विभाजन है कृष्णनामी, रामनामी और नारायण।

वैष्णव संप्रदाय के संतों के नाम के आगे महर्षि या स्वामी और नाम के अंत में आचार्य का प्रयोग होता है। वैष्णव सम्प्रदाय के अनेकों उप संप्रदाय भी हो चले हैं उनमें प्रमुख हैं- 1.वल्लभ 2.रामानंद 3.माधव 4.बैरागी, 5.दास 6.निम्बार्क, 7.गौड़ीय, 8.श्री संप्रदाय आदि। इसमें बैरागी और रामानंद का संप्रदाय ही अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णवों के प्रमुख अखाड़ों में से बैरागीउदासीनरामादंन और निर्मल अखाड़ा है।

रामानंद संप्रदाय की वैरागी परंपरा

स्वामी रामानंद़ को मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का महान संत माना जाता है। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के निचले तबके तक पहुंचाया.वे पहले ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया। उनके बारे में प्रचलित कहावत है कि -द्वविड़ भक्ति उपजौ-लायो रामानंद.यानि उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय स्वामी रामानंद को जाता है। उन्होंने तत्कालीन समाज में ब्याप्त कुरीतियों जैसे छूयाछूत, ऊंच-नीच और जात-पात का विरोध किया .

स्वामी रामानंद ने राम भक्ति का द्वार सबके लिए सुलभ कर दिया. उन्होंने अनंतानंद, भावानंद, पीपा, सेन, धन्ना, नाभा दास, नरहर्यानंद, सुखानंद, कबीर, रैदास, सुरसरी, पदमावती जैसे बारह लोगों को अपना प्रमुख शिष्य बनाया, जिन्हे द्वादश महाभागवत के नाम से जाना जाता है। इनमें कबीर दास और रैदास आगे चलकर काफी ख्याति अर्जित किये. कबीर औऱ रविदास ने निर्गुण राम की उपासना की.इस तरह कहें तो स्वामी रामानंद ऐसे महान संत थे जिसकी छाया तले सगुण और निर्गुण दोनों तरह के संत-उपासक विश्राम पाते थे। जब समाज में चारो ओर आपसी कटूता और वैमनस्य का भाव भरा ङुआ था, वैसे समय में स्वामी रामानंद ने नारा दिया-जात-पात पूछे ना कोई-ङरि को भजै सो हरी का होई.

उनके द्वारा स्थापित रामानंद सम्प्रदाय या रामावत संप्रदाय आज वैष्णवों का सबसे बड़ा धार्मिक जमात है। वैष्णवों के 52 द्वारों में 36 द्वारे केवल रामानंदियों के हैं। इस संप्रदाय के संत बैरागी भी कहे जाते हैं। इनके अपने अखाड़े भी हैं। यूं तो रामानंद सम्प्रदाय की शाखाएं औऱ उपशाखाएँ देश भर में फैली हैं। लेकिन अयोध्या,चित्रकूट,नाशिकहरिद्वार में इस संप्रदाय के सैकड़ो मठ-मंदिर हैं। 

प्राचीनकाल में भी गृहस्थ संन्यासी

गृही-वैरागी होते थे और अब भी वही प्रक्रिया अध्यात्म मार्ग पर द्रुत गति से आगे बढ़ने वाले साधनों के लिए उपयुक्त है।

प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि आज के साधु बाबाओं से सर्वथा भिन्न थे। उनमें से अधिकांश गृहस्थ संन्यासी-गृही विरागी थे। प्रकृति के समीप शुद्ध जल-वायु का आश्रय लेकर वे विरल प्रदेशों में रहते थे। गो पालन, फल, शाक उत्पादन आदि निर्वाह की उपयुक्त व्यवस्था वही बना लेते थे। आश्रम में स्त्री-बच्चों समेत रहते थे। अपने परिवार को भी सुसंस्कारी और लोकोपयोगी बनाते थे। साथ ही गुरुकुल, चिकित्सा तप, शास्त्र चिन्तन, आगन्तुकों को परामर्श विभिन्न विषयों के शोधकार्य जैसी प्रवृत्तियाँ वहाँ रह कर चलाते थे और आवश्यकतानुसार भ्रमण करके जन-जागरण की आवश्यकता पूरी करते थे। यही ऋषि जीवन था। संन्यास तो जीवन के अन्तिम एवं अशक्त भाग में लिया जाता था। इससे पूर्व तो वानप्रस्थ की-ऋषि-मुनि की भूमिका ही समस्त आत्म-परायण व्यक्ति निबाहते थे।

प्राचीनकाल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थेस्त्री बच्चे भी साथ रहते थे उसके कुछ प्रमाण देखिये-

तारावृहस्पतेर्भार्य्या वशिष्ठस्याप्यरुन्धती। अहल्या गौतमस्त्री साप्यनस्यात्रिकामिनी॥

देहहूती कर्दमस्य प्रसूतिर्द क्षकामिनी। पितृणाँ मानसी कन्या मेनका साम्बिकाप्रसूः॥

लोपामुदा तथाहूती कुबेरकामिनी तथा। बरुणामी यमस्त्री चबलेर्विन्ध्यावलीति च॥ ब्रह्म वैवर्त पुराण 

सुर गुरु बृहस्पति की भार्या का नाम तारा देवी है, वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धती है, गौतम ऋषि की पत्नी का नाम अहल्या है, अत्रि की पत्नी अनसूया नाम वाली है, देवहूति नाम वाली कर्दम की पत्नी है तथा दक्ष की पत्नी प्रसूति नाम धारिणी है। पितृगण की मानसी कन्या मेनका अम्बिका प्रसू है। लोपामुद्रा तथा आहुति कुबेर की कामिनी है यम की वरुणानी है और राजा बली की पत्नी विन्ध्यावली है।

तस्य प्रधायमानस्य कश्यपस्य महात्मनः। ब्रह्माणोऽशौ सुतौ पश्चात् प्रादुर्भूतौ महौजसौ॥

वत्सारश्चासिश्चैव ताबुभौ ब्रह्मवादिनौ। वायु पुराण

महात्मा कश्यप के दो पुत्र उत्पन्न हुए वात्सर और असित। वे दोनों ही ओजस्वी और ब्रह्मवादी थे।

तस्य कन्या त्विडविडा रुपेणाप्रतिमाभवत्। पूलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत्॥

ऋषिरिडविडायान्त विश्रवाः समपद्यत। वायु पुराण 

तृतीय त्रेता युग में मुख में राजा हुआ था। उसकी इडविडा थी जो कि रूप में अप्रतिम थी। उस राजर्षि ने वह परम सुन्दरी कन्या पुलस्त्य के लिये दे दी थी। ऋषि पुलस्त्य ने इडविडा में विश्रवा को जन्म दिया।

बृहस्पतेबृहत्कीर्तिर्दे वाचार्यस्य कीर्तितः। कन्याँःतस्योपयेमे स नाम्ना वै देववर्णिनीम्। वायु पुराण

देवों के आचार्य बृहस्पति को बृहत्कीर्ति कहा गया है नाम से देववर्णिनी उसकी कन्या के साथ उसने विवाह किया था।

शुकस्याऽस्याभवन् पुत्राः पश्चाऽत्यन्ततपस्विनः। भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भु कृष्णो गौरश्च पश्चमः॥ कन्याकीर्तिमतीचैवयोग माताधृतव्रता। कूर्म पुराण

इन शुकदेव के पाँच अत्यन्त तपस्वी पुत्र हुए थे जिनके नाम भूरिश्रवा-प्रभु-शम्भु-कृष्ण और गौर थे। एक कन्या थी जो कीर्तिमती- योग माता और धतवृता थी।

अरुन्धत्याँ वशिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत्सुतम्। शंक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्व्वज्ञस्तपतां वरः॥

आराध्य देवदेवेशमीशानंत्रिपुरान्तकम्। लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायं प्रभुम्॥ कूर्म पुराण

कश्यप ऋषि ने पुत्रों की कामना करते हुए इस प्रकार से प्रजा को सन्तान के कारण से पुत्रों को समुत्पन्न करके फिर सुमहान् तप किया था। उनके इस भाँति तप करने पर ये दो सुत समुत्पन्न हुए थे जिनमें एक वत्सर और दूसरा असित था। वे दोनों की ब्रह्मवादी थे।

पाण्डुश्चैव मृकण्डुश्च ब्रह्मकोशौ सतातनो। मनस्विन्याँ मृकण्डोश्च मार्कण्डेयो बभूव हे॥

प्रजायते पूर्णमासं कन्याश्चेमा निबोधत। तृष्टि पृष्टिस्त्विष चैव तथा चापचितिः शुभा॥

स्मृतिश्चाडिरसः पत्नी जज्ञे तावात्मसम्भवौ। पुत्रौ कन्याश्चतस्त्रश्च पुण्यास्ता लोकविश्रुता॥

अनसूयापि जज्ञे तान् पश्चात्रे यानकल्मषान्। कन्याँचैव श्रुति नाम माता शख्पादस्य या। कर्म मस्य तु या पत्नी पुलहस्य प्रजापतेः॥

ऊर्जायान्तु वशिष्ठस्य पुत्रा वै सप्त जज्ञिरे। ज्यायसी च स्वसा तेषाँ पुण्डरीका समुध्यमा॥ वायु पुराण

पांडु और मृकण्डु ब्रह्मकोश तथा सनातन हुए। मनस्विनी में मृकण्डु से मार्कंडेय उत्पन्न हुए। मारीचि की पत्नी सम्भूति नाम वाली थी उसने अपत्य पुत्र उत्पन्न किया जो पूर्णमास उत्पन्न होता है। और उसके कन्यायें हुई उन्हें समझ लो तुष्टि, पुष्टि, त्विषा, अत्यचिति और शुभा ये कन्याएं हुईं। अंगिरा की पत्नी स्मृति ने दो पुत्र पैदा किए और चार परम पवित्र तथा लोक विश्रुत कन्या उत्पन्न की थी। अनसूया ने भी अकल्मष पाँच अत्रियों को जन्म दिया और एक कन्या उत्पन्न की जिसका नाम श्रुति था और जो शंखपद की माता थी जो प्रजापति पुलह कर्दम की पत्नी थी। ऊर्जा में वसिष्ठ के सात पुत्र उत्पन्न हुए और ज्यायसी (बड़ी) उनकी बहिन सुमध्यमा पुण्डरीका थी।

स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः। तेषाँ विख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ सुमहौजसौ॥ दत्तात्रेयस्तस्य ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः। -वायु पुराण

स्वस्त्यात्रेय इस नाम से विख्यात वेद के पुरोगामी ऋषिगण थे उनमें विख्यात यश वाले महान् ओज से युक्त परम ब्रह्मिष्ठ दो पुत्र थे। उनमें दत्तात्रेय सबसे बड़ा था उसका छोटा भाई दुर्वासा था।

गृहस्थ में रहते हुए-स्वावलम्बी आजीविका उपार्जन करते हुए राजा जनक की तरह जल में कमल पत्र व्रत रहना सम्भव है (1) उच्च मनोभूमि (2) सत्कर्म (3) वाणी का श्रेष्ठतम सदुपयोग करना यह तीन दण्ड है। उन्हें धारण करने वाला व्यक्ति बिना वेष धारण किये त्रिदण्डी संन्यासी हो सकता है।

वस्तुतः शारीरिक और मानसिक उत्कृष्टता को धारण करना ही योगी यति होने का वास्तविक आधार है घर छोड़ देना या वेष धारण करना उसके लिए आवश्यक नहीं। प्राचीन परम्परा ऐसी ही साधना की है। जिसमें मन की क्रिया को निर्मल उत्कृष्ट बनाने पर ही सारा जोर दिया जाता रहा है। ऋषि-मुनि इसी स्तर के होते रहे है इसका उल्लेख शास्त्रों में सर्वत्र उपलब्ध है-

गृहस्थश्चाप्यनासक्तः स मुक्तो योगसाधनात्। योगक्रियाभियुक्तानाँ तस्मात्संयतते गृही॥

गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सगंत्यक्त्वा चान्तरे योगमार्गे। सिद्धे चिन्ह वीक्ष्य पश्चाद्गृहस्थः क्रीडेत्सों वै सम्मत साधयित्वा॥ शिव गीता

योग साधना में संलग्न साधक गृहस्थ रहते हुए भी संयम पूर्वक साधना करने से सिद्धि प्राप्त करता है। घर में रह कर स्त्री पुत्र आदि की व्यवस्था अनासक्त भाव से करते हुए योग साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है।

बाग्दण्डःकर्मदण्डश्चमनोदण्डश्चतेत्रयः। यस्यैतैनियतादण्डाःसत्रिदण्डीमहायतिः॥ मारकण्डेय पुराण

जिसके पास (1) वाक् दण्ड (2) कर्म दण्ड (3) मनः दण्ड है वही त्रिदण्डी है। वही महा यति है।

इन्द्रियाणि वशीकृत्य गृह एवं वसैन्नरः। तत्र तस्य कुरुक्षेत्र नैमिष पुष्कराणि च॥

गडद्वारच्च् केदारं सन्निहत्यां तथैव च। एतानि सर्वतीर्थानि कृत्वा पापैः प्रमुच्यते॥ व्यास स्मृति 

अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य यदि घर में ही रहे तो उसके लिए वह घर ही नैमिषारण्य, कुरु क्षेत्र एवं पुष्कर के समान है। जिसने अपने मन को जीत लिया उसके लिये गंगा द्वार, केदारनाथ आदि सभी तीर्थों का लाभ अपने पास ही मिल जाता है।

वैराग का अर्थ होता है- राग-रहित होना 

राग का अर्थ- आसक्ति, लगाव या मोह-जनित प्रेम है। दूसरे शब्दों में आसक्ति-रहित, लगाव-रहित वा मोह-रहित होना वैराग है।

  • ‘राग’ में ‘अनु’ उपसर्ग जुड़ने से ‘अनुराग’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है- शुध्द, सात्विक और निर्मल प्रेम। इस तरह वैराग और अनुराग दो परस्पर विरोधी भाव हैं। अर्थात् एक के होने में दूसरे का अभाव है।
  • अनुराग कहता है-अपनाओ, पकड़ो, सन्मुख चलो। वैराग कहता है- त्यागो, छोड़ो, उलट चलो, भागो। इस तरह दोनों एक दूसरे से विपरीत दिशा की ओर अग्रसर होने का निर्देश देते हैं।
  • साधारणत: मानवीय चित्त का संबंध जिस किसी व्यक्ति, वस्तु वा स्थान से होता है, वहां अनुरागभाव माना जाता है और मानवीय चित्त का संबंध जिन चीजों से नहीं होता, वहां उन सबसे वैरागभाव माना जाता है।

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Source: Aatm Chintnam: Swaroop gnan… By Gokuldas Bagree

माया को छोड़ वैराग की ओर- हमारे ऋषियों, आत्म-तत्वदर्शियों ने परमात्मा की सम्पूर्ण सृष्टि को अपने दिव्य ज्ञान से मंथन कर दो तत्वों का सार निकाला है- (1) आत्मतत्व और (2) अनात्मतत्व।

  • संसार अर्थात् माया के प्रवाह से सतत प्रवहमान-जीवन-मरण चा‘ आवागमन का महादु:ख सागर। माया। मा‘ का अर्थ होता है- नहीं और या‘ का अर्थ होता है- जो। माया अर्थात् जो वास्तविक नहीं हैवरन् असत्यअनित्य एवं नाशवान है। इस मायिक संसार में दूसरा सबसे उत्कृष्ट तत्व है-आत्मतत्वजो सदा एक-सा रहनेवालानित्यसत्य एवं सनातन है। इसी आत्मतत्व से संबंध जोड़कर जड़ माया भी सत्य-सी जान पड़ती है।

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मोक्ष-प्राप्ति के चार साधनों में वैराग‘ को प्रथम स्थान- ‘विवेक चूड़ामणि’ में श्रीमदाद्य शंकराचार्यजी महाराज ने मोक्ष-प्राप्ति के चार साधनों में ‘वैराग’ को प्रथम स्थान प्रदान किया है- मोक्षस्य हेतु प्रथमो निगयते वैराग्यमनित्य वस्तुषु।

  • अर्थात् मोक्ष का प्रथम हेतु अनित्य या अनात्म वस्तुओं से वैराग होते ही मोक्ष अर्थात् आत्मानुराग उत्पन्न होता है। गीता अध्याय 13 के श्लोक 5 और 6 के अन्तर्गत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का वर्णन करते हुए 31 अनात्म-तत्वों के समूह को क्षेत्र कहा गया हैजो दृश्य हैं, यथा-पांच स्थूल तत्व (पृथ्वीजलअग्निवायु और आकाश)पांच सूक्ष्म तत्व (रूपरसशब्दगंध और स्पर्श)दश इन्द्रियां (पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रिय)चार अन्त:चतुष्ट्य (मनबुध्दिचितअहंकार)का चेतनसंघात (कहे गये का संघ रूप)धृति (धारण करने की शक्ति) और इसके विकार-इच्छाद्वेषसुख और दु:ख-ये 31 अनात्म-तत्व हैं। इन सबसे वैरागभाव रखने से क्षेत्रज्ञ वा आत्म-तत्व से अनुराग होता है।
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1942 भारत छोड़ो आंदोलन, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें


देश को आजादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली थी लेकिन आजादी की नींव 1857 के स्वतंत्रता संग्राम ने रख दी थी और उसके 85 साल बाद यानी 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन ने उस नींव पर इमारत खड़ी करना आरम्भ कर दिया था। सन 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्‍व में शुरु हुआ यह आंदोलन बहुत ही सोची-समझी रणनीति का हिस्‍सा था, इसमें पूरा देश शामिल हुआ। कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसने पूरी ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दी थीं। जानिए ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की पूरी कहानी… 

क्रिप्स मिशन का आगमन… 
– 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया, जापान, जर्मनी ने इंगलैंड और उसके उपनिवेशों पर हमला कर दिया। 
– युद्ध के दौरान इंगलैंड के प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल ने अपने युद्धकालीन मंत्रिमण्डल स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। 
– स्टैफोर्ड क्रिप्स के मिशन को ही क्रिप्स मिशन कहा जाता है, जो सिर्फ एक सदस्यीय था। 
– क्रिप्स 30 मार्च 1942 को एक प्रस्ताव के साथ भारत आए। 
– इसमें सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान भारत से ब्रिटिश सरकार की मदद की मांग की गई थी। 
– 1942 में जापान की फौजों के रंगून पर कब्जा करने से भारत के सीमांत क्षेत्रों पर खतरा पैदा हो गया था। 
– ब्रिटेन युद्ध में भारत का सक्रिय सहयोग पाना चाहता था। 
– इसके बदले कहा गया कि लड़ाई खत्म होने के बाद भारतीयों को एडमिनिस्ट्रेशन के पूरे पॉवर्स दे दिए जाएंगे। 
– लेकिन यहां भी ब्रिटिश हुकूमत ने ‘डोमिनियम स्टेट’ अवधारणा रखी। 
– यानी संविधान का निर्माण तो भारतीय करेंगे लेकिन रक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार का होगा। 
– इसे कांग्रेस और महात्मा गांधी ने नामंजूर कर दिया। 
– महात्मा गांधी ने इस मिशन को ‘पोस्ट डेटेड चैक’ की संज्ञा दी। 
– अर्थात अंग्रेज एक ऐसा दिवालिया बैंक है जो भविष्य में कभी भी फेल हो सकता है। 
– महात्मा गांधी ने 9 अगस्त 1942 को भारत छोडो आंदोलन का आवाह्न किया। 
– अगस्त में होने की वजह से इसे इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। 

भारत छोड़ो आंदोलन का आवाह्न… 
– 14 जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें भारत से ब्रिटिश शासन तत्काल समाप्त करने की घोषणा की गई। 
– इसी मिटिंग में भारत छोड़कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर करने के लिए 1942 में सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का आवाह्न किया गया। 
– सविनय अवज्ञा आन्दोलन का यह तीसरा चरण था, इससे पहले 1929 और 32 में आंदोलन हुआ था। 
– 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया जिसे भारत छोड़ो प्रस्ताव के नाम से जाना गया। 
– गोवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने भाषण दिया, जिसमें कहा, ‘मैं आपको एक मंत्र देना चाहता हूं जिसे आप अपने दिल में उतार लें, यह मंत्र है, ‘करो या मरो’। 
– इसी गोवालिया टैंक मैदान आगे चलकर अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। 
– 9 अगस्त को गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 
– इसके बाद जनता ने खुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और इसे आगे बढाया क्योंकि उस समय नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। 
– आंदोलन में रेलवे स्‍टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों तथा उपनिवेश राज के संस्‍थानों पर बड़े स्‍तर पर हिंसा शुरू हो गई। 
– इसमें तोड़ फोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने हिंसा की इन गतिविधियों के लिए कांग्रेस और गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया। 
– कांग्रेस पर प्रतिबंद लगा दिया गया और आंदोलन को दबाने के लिए सेना को बुला लिया गया। 
– सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 942 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए। 
– इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए। 
– ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया। 
– 1942 में जापान की फौजों के साथ मिल भारत की और रूख किया। 
– ब्रिटिश और कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। 
– भारत छोड़ो आंदोलन की विशालता और व्यापकता को देखते हुए अंग्रेजों को विश्वास हो गया था कि उन्हें अब इस देश से जाना पड़ेगा। 

9 अगस्त का ही दिन क्यों चुना गया… 
– 6 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से ‘बिस्मिल’ के नेतृत्व में 10 जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी कांड किया था। 
– काकोरी कांड ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी।
– जिसकी यादगार ताजा रखने के लिए पूरे देश में हर साल 9 अगस्त को काकोरी काण्ड स्मृति-दिवस मनाने की परंपरा भगत सिंह ने प्रारंभ कर दी थी। 
– इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे। कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन के लिए 9 अगस्त का दिन एक सोची-समझी रणनीति के तहत चुना था। 
– 900 से ज्‍यादा लोग मारे गए, हजारों लोग गिरफ्तार हुए इस आंदोलन की व्‍यूह रचना बेहद तरीके से बुनी गई। 

नेताओं की गिरफ्तारी, जनता ने संभाली आंदोलन की बागडोर… 
– 9 अगस्त 1942 को दिन निकलने से पहले ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य गिरफ्तार कर लिया गया।
– ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। 
– सभी बड़े नेताओं तो ‘ऑपरेशन जीरो ऑवर’ के तहत जेलों में ठूस दिया गया। 
– गांधी जी के साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू को यरवदा पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद कर दिया गया।
– डॉ.राजेंद्र प्रसाद को पटना जेल व अन्य सभी सदस्यों को अहमदनगर के किले में नजरबंद किया गया था। 
– इसके बाद जनता ने खुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और इसे आगे बढाया क्योंकि उस समय नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। 
– आंदोलन की अगुवाई छात्रों, मजदूरों और किसानों ने की, बहुत से क्षेत्रों में किसानों ने वैकल्पिक सरकार बनाई।
– उत्तर और मध्य बिहार के 80 प्रतिशत थानों पर जनता का राज हो गया।
– पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार में गया, भागलपुर, पूर्णिया और चंपारण में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ। 
– आंदालेन की बागडोर अरुणा आसफ अली, राममनोहर लेाहिया, सुचेता कृपलानी, छोटू भाई पुराणिक, बीजू पटनायक और जयप्रकाश नारायण ने संभाली। 
– भूमिगत आंदोलनकारियों की मुख्य गतिविधि होती थी- संचार साधनों को नष्ट करना। 
– उस समय रेडियो का भी गुप्त संचालन होता था, राममनोहर लेाहिया कांग्रेस रेडियो पर देश की जनता को संबोधित करते थे। 
– ब्रिटिश सरकार को इस जनविद्रोह को काबू करने में एक साल लग गए, विद्रोह थोड़े समय तक चला, पर यह तेज था। 

क्‍या उद्देश्‍य था इस आंदोलन का 
– सही मायने में यह एक जन आंदोलन था, जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी चाहे अमीर हो, गरीब हो सभी लोग शामिल थे। 
– इस आंदोलन की सबसे बड़ी खास बात यह थी कि इसने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। 
– कॉलेज छोड़कर युवा जेल की कैद हंसते-हंसेत स्‍वीकार कर रहे थे। 
– सबसे बड़ी बात यह थी कि इस आंदोलन का प्रभाव ही इतना ज्‍यादा था कि अंग्रेज हुकूमत पूरी तरह हिल गई थी। 
– उसे इस आंदोलन को दबाने के लिए ही साल भर से ज्‍यादा का समय लगा। 
– जून 1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था, तब गांधी जी को रिहा किया गया। 

आजाद भारत…
– सेकंड वर्ल्ड वार की समाप्‍ति के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्‍लेमेंट रिचर्ड एटली के नेतृत्‍व में लेबर पार्टी की सरकार बनी। 
– लेबर पार्टी आजादी के लिए भारतीय नागरिकों के प्रति सहानुभूति की भावना रखती थी। 
– मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया, जिसके बाद भारतीय राजनैतिक परिदृश्‍य का सावधानीपूर्वक अध्‍ययन किया । 
– एक अंतरिम सरकार के निर्माण का प्रस्‍ताव दिया गया और प्रां‍तों और राज्‍यों के मनोनीत सदस्यों को लेकर संघटक सभा का गठन किया गया। 
– जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्‍व ने एक अंतरिम सरकार का निर्माण किया गया। 
– मुस्लिम लीग ने संघटक सभा के विचार विमर्श में शामिल होने से मना कर दिया और पाकिस्‍तान के लिए एक अलग राज्‍य बनाने में दबाव डाला। 
– भारत के वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत और पाकिस्‍तान के रूप में भारत के विभाजन की एक योजना प्रस्‍तुत किया। 
– तब भारतीय नेताओं के सामने इस विभाजन को स्‍वीकार करने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं था, क्‍योंकि मुस्लिम लीग अपनी बात पर अड़ी हुई थी। 
– भारत में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई 5 लाख लोग मारे गए, 1.5 करोड़ लोगों को दोनों तरफ से घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
– इस प्रकार 14 अगस्‍त 1947 की मध्‍य रात्रि को भारत आजाद हुआ तब से हर साल भारत में 15 अगस्‍त को स्‍वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। 

2014 - 1

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Independence Day: कैसे बना INDIA… 200 साल की गुलामी से आजादी की पहली सांस तक का सफर…

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‘तृष्णा’- अजर… अमर… और… अविनाशी है

जवानी गई, बुढ़ापा आ गया है, इन्द्रियों की शक्ति जाती रही, सब तरह से दूसरों के मुहं की ओर ताकना पड़ता है, परन्तु तृष्णा नहीं मिटती… ‘कुछ और जी लूँ, बच्चों के लिए कुछ और कर जाऊं, दवा लेकर जरा ताजा हो जाऊं तो संसार का कुछ सुख और भोग लूं… मरना तो है ही,परन्तु हाथ से बच्चों का विवाह हो जाये तो अच्छी बात है, दूकान का काम बच्चे ठीक से संभाल ले, इतना सा उन्हें और ज्ञान हो जाये’, या बच्चों को अच्छी नौकरी मिल जाए, उन का घर परिवार बस जाए, बहुत से वृद्ध पुरुष ऐसी बातें करते देखे जाते है… इंसान जीवनभर यही सोचता रहता है अपने लिए उसके पास समय नहीं, कब जवानी गई और बुढ़ापा आ गया पता ही नहीं चलता… अब व्यक्ति जवानी की इच्छाएं बुढ़ापे में पूरा करने की सोचता है… तीर्थ यात्रा,समाजिक कार्य, धार्मिक कार्यों में रुचि लेना, अब पुराने जमाने की बातें हो गई हैं अब बुढ़ापा भी जवानी से कम नहीं है… रूस के पीएम ब्लादिमीर पुतिन को लीजिए 57 साल की उम्र और इश्क 27 साल की लड़की से… और इन्हें देखिए 73 साल के इटली के पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी पिछले दो वर्षों से लगातार सेक्स स्कैंडलों से घिरे हुए हैं… हरियाणा के सोनीपत जिले में 102 वर्ष की उम्र में एक वृद्ध पिता बन रहे हैं…

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इक्कीसवीं शताब्दी की एक विशेषता यह है कि इसमें लोगों की औसत आयु बढ़ गई है. साथ ही एक कालक्रम में आयु सीमा में हुए इस परिवर्तन से नयी पीढ़ी पर दबाव भी बढ़ गया है. भारत सहित दुनिया की जनसंख्या पर नजर डालें तो सन् 2000 से 2050 तक पूरी दुनिया में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोगों की तादाद 11 फीसद से बढ़कर 22 फीसद तक पहुंच जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुमान के अनुसार वृद्ध लोगों की आबादी 605 मिलियन(6 करोड़ 5 लाखद्ध से बढ़कर 2 बिलियन ;2अरब)  हो जाएगी.  

डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन् 2050 में 300 मिलियन (30 करोड़) 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है. बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चैंकाने वाले आंकड़े भी हैं. जैसे 60 वर्र्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है. 80 वर्ष से ज्यादा के उम्र वाले वृद्ध सन 2050तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे. अगले 5 वर्षों में ही 65 वर्ष से ज्यादा के लोगों की तादाद 5 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी. सन् 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी. और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें.

इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती…

डॉ. प्रकाश कोठारी (देश के टॉप सेक्स विशेषज्ञों में से एक) कहते हैं कि सेक्स की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। इसकी ख्वाहिश मरते दम तक बनी रह सकती है। जो सत्ता में होते हैंउनके पास अवसर होते हैं। कुछ दूसरे ऐसे होंगे जिनमें इच्छा होगी पर अवसर नहीं होगा या अवसर का लाभ उठाने का साहस नहीं होगा।

57 साल के रूस के पीएम ब्लादिमीर पुतिन को ही लीजिए उनकी प्रेमिका 27 साल की जवान रिदमिक जिमनास्ट एलिना काबएवा हैं। खबर है कि वह शीघ्र ही उससे शादी करने वाले हैं। कुछ दिनों पहले एक रूसी वेबसाइट ने दावा किया कि पुतिन और एलिना मास्को के एक रेस्तरां में एक-दूसरे को चूमते देखे जा चुके हैं। और कुछ ब्लॉगर तो कहते हैं कि उसे पुतिन से एक संतान भी है। लेकिन इस उम्र में भी दिल दे बैठने वाले पुतिन अकेले नहीं हैं। कुछ ही दिनों पहले इटली के पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी ने कहा है कि युवतियों को युवकों के पीछे नहीं भागना चाहिएबल्कि उनके जैसे अनुभवी और लोडेड‘ लोगों के पास आना चाहिए। बर्लुस्कोनी 73 साल के हैं और पिछले दो वर्षों से लगातार सेक्स स्कैंडलों से घिरे हुए हैं।

डॉ. अरुणा ब्रूटा (प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक) इसकी व्याख्या दूसरी तरह से करती हैं। वे कहती हैं कि बहुत सारे पुरुष अपने बूढ़े होने की वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाते। युवा स्त्रियों से संबंध बना कर वे अपना सेल्फ एस्टीम बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इससे उन्हें लगता है कि वे बूढ़े हो रहे दूसरे आम पुरुषों से अलग हैं।

समाजशास्त्री पुष्पा वर्मा कहती हैं कि असल में शिखर पर पहुंचने के बाद स्त्री-पुरुष – किसी भी व्यक्ति को सत्ता की निस्सारता और शुष्कता का एहसास होने लगता है। तब वह भोजन और सेक्स जैसी दो आदिम सुखों की ओर भागता है – शरीर से नहीं तो मानसिक रूप से ही सही। आप वाजिद अली शाह की कहानी याद कीजिए।

यौन संबंधों में आड़े नहीं आ रहा बुढ़ापा… एक शोध में कहा गया है कि अमरीकी लोगों के लिए बुढ़ापा यौन संबंधों के आड़े नहीं आ रहा है और 70-80 साल की उम्र में भी वे यौन संबंध बना रहे हैं. 57 से 85 साल उम्र के 3005 लोगों के बीच उनके यौन जीनव या सेक्स लाइफ़ के बारे में एक शोध किया गया और बड़ी संख्या में लोगों ने कहा कि वे अभी भी यौन संबंध बनाते हैं. इस सर्वेक्षण या शोध से पता चला कि इस उम्र में भी यौन संबंधों के लिए सबसे बड़ी बाधा के रुप में साथी की कमी का ज़िक्र किया गया और यौनेच्छा की कमी और बीमारी को छोटी बाधा बताया गया.

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हरियाणा के सोनीपत जिले में 102 वर्ष की उम्र में एक वृद्ध पिता बना है। रामजीत नामक वृद्ध की 52 वर्षीय पत्नी शकुंतला ने हाल ही में अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया है।

“बुढापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छायें एक ही केंद्र पर आ जाती हैं |” – मुँशी प्रेमचंद

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि- “हमने तप नहीं तपा, किंतु तप ने हमें ताप डाला। काल जीर्ण न हुआ, किंतु हमारा शरीर ही जीर्ण हो चला है। तृष्णा को बुढ़ापा नहीं आया, पर हमें बुढ़ापा आ गया। अर्थात सांसारिक भोगों को मनुष्य नहीं भोगता अपितु यह भोग ही मुनष्य को भोग लेते हैं”।

गौतम बुद्ध ने कहा था कि संसार ‘दुखमय है और दुख का कारण ‘तृष्णा’ है, पर उम्र के साथ ये सब तृष्णायें जब मर जाती है तब दुख कम होता जाना चाहिए। किन्तु सारे संसार में वृद्धत्व आज जितना दुखी और पीड़ा में है उतना शायद ही वह कभी रहा होगा।

बौद्ध दर्शन के अनुसार दुख के 12 कारण हैं तृष्णा 5वें स्थाप पर है

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तृष्णा से मुक्ति भोग से नहीं शमन से संभव

महाभारत में राजा ययाति की कथा का उल्लेख है । कहा जाता है कि किसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री शर्मिष्ठा की शिकायत पर ययाति को शाप दे डाला कि वृद्धावस्था उन्हें समय से पूर्व ही शीघ्र आ घेरेगी । शाप के फलस्वरूप ययाति देह से जल्दी ही बूढ़े हो गयेकिंतु उनकी दैहिक भोगेच्छाएं-कामनाएं समाप्त नहीं हो सकीं थीं । उन्होंने ऋषि शुक्राचार्य से क्षमा-याचना की तो उन्हें यह वरदान मिला कि वे अपने बुढ़ापे की किसी युवक की जवानी से अदला-बदली कर सकेंगे ।

भला कौन वृद्धावस्था स्वीकारने के लिए राजी होता ? राजा ययाति ने सबसे पहले अपने ही पांच पुत्रों के समक्ष अपनी चाहत की बात रखी । राजकुमार पुरु को छोड़कर शेष सब ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया । राजा ने पुत्र का यौवन प्राप्त कर लंबे समय तक दैहिक सुखों का भोग किया । अंत में उन्हें यह अनुभव हुआ कि दैहिक आनंद से उन्हें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती । तब उन्होंने अपने इस पुत्र को ‘उधार’ का यौवन लौटा दिया और उसे राजपाठ सोंपते हुए वानप्रस्थ आश्रम में चले गये । (कौरव-पांडव इन्हीं पुरु के कई पीढ़ियों के बाद के वंशज थे ।)

तृष्णा, अर्थात् भौतिक मूल के सुखों की कामना की तृप्ति, उन सुखों के अधिकाधिक भोग से नहीं बल्कि उनके ‘शमन’, यानी लालसाओं से स्वयं को मुक्त करने के माध्यम, से ही संभव है । राजा ययाति का उक्त ‘बुद्धत्व’ इस श्लोक में व्यक्त हैः

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एव अभिवर्तते ।।

(महाभारतआदि पर्वअध्याय 75श्लोक 50)

अर्थात् मनुष्य की इच्छा कामनाओं के अनुरूप सुखभोग से नहीं तृप्त होती है । यानी व्यक्ति की इच्छा फिर भी बनी रहती है । असल में वह तो और बढ़ने लगती है, ठीक वैसे ही जैसे आग में इंधन डालने से वह अधिक प्रज्वलित हो उठती है । इसलिए इच्छाओं पर नियंत्रण (शमन) ही विवेकशील व्यक्ति के लिए अनुकरणीय मार्ग है ।

उक्त श्लोक का उल्लेख दो स्थलों पर दिखा । अध्याय 85 में भी यह श्लोक शब्दशः दुबारा शामिल है (महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 85, श्लोक 11) ।

पृथिवी रत्नसंपूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।।

(महाभारतआदि पर्वअध्याय 75श्लोक 51)

इसका अर्थ यूं दिया जा सकता हैः पृथिवी रत्नों से भरी है; यह स्वर्ण (मूल्यवान धातुएं आदि), पशुधन, तथा स्त्रियों का भंडार है । यह सब एक व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं है ऐसा मानते हुए मनुष्य शमन का रास्ता अपनाये । ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सब मिल जाने पर भी असंतुष्ट बना रहेगा और काश! कि मेरे पास और अधिक होता जैसे भाव उसके मन में उत्पन्न होते रहते।

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ।।

(महाभारतआदि पर्वअध्याय 85श्लोक 12)

इस श्लोक के अर्थ पहले उल्लिखित श्लोक के अर्थ के समान ही हैं । अर्थानुसार इस पृथिवी पर जो भी धान-जौ (अन्न), स्वर्ण, पशुधन एवं स्त्रियां हैं वे सब एक मनुष्य को मिलें तो भी पर्याप्त नहीं होंगे । इस तथ्य को जानते हुए व्यक्ति को चाहिए कि तृष्णा का परित्याग करे ।

इन सभी श्लोकों में जिस जीवन-दर्शन का उल्लेख है वह सार्थक है । परंतु एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि क्यों स्त्री को भी भोग्य वस्तुओं में शामिल किया गया है । ऐसा लगता है कि समस्त बातें पुरुषों को ध्यान में रखकर कही गयी हैं और धन-धान्य, रत्न, स्वर्ण, आदि एवं स्त्रियां पुरुषों के सुख-भोग के साधनों के तौर पर स्वीकारे गये हैं । मुझे ऐसी सोच आपत्तिजनक लगती है । तृष्णा के संदर्भ में कही गयी बातें तो स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिए समान रूप से लागू होती हैं; फिर क्यों केवल पुरुषों का नाम लिया गया । महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास ने स्त्री-पुरुषों के मध्य ऐसा भेद क्यों किया होगा ? प्रश्न विचारणीय है, पर इसका उत्तर मेरे पास तो नहीं है; कदाचित् संतोषप्रद उत्तर किसी के भी पास न हो ।

ययाति ग्रंथि

ययाति ग्रंथि वृद्धावस्था में यौवन की तीव्र कामना की ग्रंथि मानी जाति है। किंवदंति है कि, हस्तिनापुर के महाराज ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। ययाति पराक्रम, ऐश्वर्य और भोग-विलास करने के लिए अपने पुत्र पुरू से उसका यौवन लेते हैं और उसे अपनी जरावस्था दे देते हैं। ययाति को विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्हों ने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया। ययाति को वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने कहा-

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।

कालो न यातो वयमेव याताः

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥

अर्थातहमने भोग नहीं भुगतेबल्कि भोगों ने ही हमें भुगता हैहमने तप नहीं कियाबल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैंकाल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गयेतृष्णा जीर्ण नहीं हुईपर हम ही जीर्ण हुए हैं !

तृष्णा अतृप्त है, कभी मर नहीं सकती है, कभी पूरी नहीं हो सकती

डॉऊजियिन ने सिकंदर से पूछा कि सिकंदर जब तू पूरा विश्व जीत लेगा तो उसके बाद क्या करेगा। सिकंदर उदास हो गया उसने कहा कि अरे इसके बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था । अतृप्ति किसी को सुख नहीं दे सकती है। मन रोज नयी चीजें मांगता है। हर बार उसे कुछ नया चाहिए। उसे एक कार की इच्छा आ गयी है। अब उसे कार में नहीं, कारों में दिलचस्पी है, संग्रह में दिलचस्पी है। धन कमाने वाला कभी धन को नहीं भोगता। कमाया फिर उसी में लगा दिया। नित नयी योजनाएँ फ़ैलाने में। योजनाएँ फ़ैलाने की इसी उधेड़बुन में पूरा जीवन चला गया। आखिरी पड़ाव पर जागा तो अब तो अकाउंट ही समाप्त हो गया। जो लोग संसार में रहते हैं वे अपने आखिरी क्षण में बहुत ही ज्यादा अस्वस्थ हो जाते है । शरीर में कमजोरीचेहरे पर झुर्रियाँ क्योंकि अब उन्हें यह भय सताता है बुलावे का कि अब गया तब गया । पूरे जीवन भर क्या किया । चक्रव्यूह में जीवन को सही मायने में जीया ही नहींबस काटा है । परमात्मा में जीने की कला किसी बिरले में ही मिलती है । एक बच्चे के चेहरे को आप गौर से देखोबड़ा ही निर्दोषनिर्भयकोई डर नहींचिंता नहींहमेशा खिला-खिला तरोताजा । पर जब उम्र बढ़ीसमाज की परतें चढ़ी तो बाहर के धन को अंदर के धन से श्रेष्ठ समझ कर जीवन गुजारा । अंदर जो बीज परमात्मा से मिलन करवा सकता थायूँ ही पड़ा रहा गया ।

कभी न बुढ़ाने वाली तृष्णा- नीतिवचन महाभारत से

महाकाव्य महाभारत के कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद उसके दुष्परिणामों से व्यथितयुधिष्ठिर शरशय्या पर पड़े पितामह भीष्म के समक्ष अपनी विविध शंकाएं-समस्याएं रखते हैं और उनसे उपदेशात्मक वचन सुनते हैं । तत्संबंधित अनुशासन पर्व में नीति संबंधी अनेक बातों का जिक्र मिलता है । एक स्थल पर भीष्म युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए मनुष्य की सहज वृत्ति ‘तृष्णा’ की चर्चा करते हैं – तृष्णा अर्थात् ऐहिक सुख-सुविधा, धन-संपदा, मान-प्रतिष्ठा, अधिकार-वर्चस्व आदि पाने-बटोरने की भूख । दो श्लोकों पर ध्यान विशेष तौर पर जाता है वे हैं:

या दुर्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।

यो९सौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ।।

(महाभारतअनुशासन पर्वअध्याय ७श्लोक २१)

जो तृष्णा सुमतिहीन व्यक्तियों द्वारा न छोड़ी जाती है, जो मनुष्य के वृद्धावस्था में पहुंच जाने पर भी स्वयं बुढ़ी नहीं होती, जो रोग की भांति प्राणघातक बनी रहती है, उस तृष्णा को त्याग देने पर ही वास्तविक सुखानुभूति मिलती है ।२१।

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।

चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते ।।

(यथा पूर्वोक्तश्लोक २४)

मनुष्य के जराप्राप्त होने यानी बुढ़ा जाने पर उसके बाल भी वृद्ध हो जाते हैं, दांत भी उसके बूढ़े हो जाते हैं, आंख-कान भी वृद्ध हो जाते हैं, किंतु उसकी तृष्णा फिर भी यथावत् युवा बनी रहती है ।२४।

वास्तव में उम्र बढ़ने पर शरीर के विभिन्न अंग अपनी शक्ति-सामर्थ्य के चरम तक पहुंचते हैं और फिर उनमें विकार एवं ह्रास आरंभ हो जाते हैं । हमारी काया धीरे-धीरे अशक्त होने लगती है, बाल, दांत, आंख तथा कान जैसे अंग वृद्धावस्था के अनुरूप ढलने लगते हैं । सभी अंग नैसर्गिक नाश की ओर बढ़ने के संकेत देने लगते हैं । लेकिन मनुष्य की इच्छाएं तब भी सदैव की भांति तीव्र बनी रहती हैं । असहाय हो चुकने पर भी उसकी जिजीविषा, संपदा अर्जित करने की इच्छा तथा और अधिक समय तक सुख भोगने की लालसा तब भी बनी रहती हैं । अब मुझे अधिक कुछ नहीं चाहना है, बल्कि संसार से किसी समय पूर्वतः अघोषित क्षण पर अलविदा करने के लिए तैयार हो जाना चाहिये, यह भाव आम तौर पर किसी के मन में नहीं जगता है ।  इस भावना को वैदिक भारत में संन्यास कहा गया है । आज जो भी कदाचरण और आर्थिक भ्रष्टाचार अपने देश ही में नहीं बल्कि सारे विश्व में न्यूनाधिक मात्रा में देखने को मिल रहा है, वह इसी अदम्य तृष्णा या मानव मन में व्याप्त अतृप्त भूख का परिणाम है । पेट की भूख तो एक हद के बाद शांत हो जाती है, किंतु मन की भौतिक जगत् संबंधी पिपासा उतनी ही बढ़ती जाती है जितनी उसकी तृप्ति का प्रयास किया जाता है ।

Panchatantra Of Vishnu Sharma (Sampurna)

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Kabeer… Hazari Prasaad Dwivedi

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बौद्ध दर्शन के अनुसार दुख के 12 कारण हैं तृष्णा 5वें स्थाप पर है

वासना, आकर्षण व आसक्ति

चिकित्‍सा विज्ञान मानता है कि मानव शरीर प्रकृति की एक जटिलतम संरचना है। इसे नियंत्रित करने के लिए स्‍नायु तंत्र यानी नर्वस सिस्‍टम का एक बड़ा संजाल भी है, जो स्‍पर्श, दाब, दर्द की संवेदना को त्‍वचा से मस्तिष्‍क तक पहुंचाता  है। किशोरावस्‍था में विशिष्‍ट रासायनिक तत्‍व निकलते हैं जो स्‍नायुतंत्र द्वारा शरीर के विभिन्‍न हिस्‍सों तक पहुंचते हैं। इन्‍हीं में शामिल प्‍यार के कई रसायन भी हैं जो उम्र के विभिन्‍न पड़ावों पर इसकी तीव्रता या कमी का निर्धारण करते हैं। प्‍यार की तीन अवस्‍थाएं हैं-

वासना/तीव्र लालसा

इस अवस्‍था में विपरीत लिंगी को देखकर वासना का भाव उत्‍पन्‍न होता है, जो दो तरह के हार्मोन से नियंत्रित होता है। पुरुषों में ‘टेस्‍टोस्‍टेरोन’ तथा महिलाओं में ‘इस्‍ट्रोजेन’ हार्मोन होते हैं, जो वासना की आग भड़काते हैं। वासना या लालसा का दौर क्षणिक होता है।

आकर्षण
वासना की तीव्रतर उत्कंठा के बाद आकर्षण या प्रेम का चिरस्थायी दौर प्रारंभ होता है जो व्यक्ति में अनिद्रा, भूख न लगना, अच्छा न लगना, प्रेमी को तकते रहना, यादों में खोए रहना, लगातार बातें करते रहना, दिन में सपने देखना, पढ़ने या किसी काम में मन न लगना जैसे लक्षणों से पीड़ित कर देता है। इस अवस्था में डोपामिन, नॉर-एपिनेफ्रिन तथा फिनाइल-इथाइल-एमाइन नामक हारमोन रक्त में शामिल होते हैं।

डोपामिन को ‘आनन्द का रसायन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह ‘परम सुख की भावना’ उत्पन्न करता है। नॉर-एपिनेफ्रिन नामक रसायन उत्तेजना का कारक है जो प्यार में पड़ने पर आपकी हृदय गति को भी तेज कर देता है। डोपामिन और नॉर-एपिनेफ्रिन मन को उल्लास से भर देते हैं। इन्हीं हारमोनों से इंसान को प्यार में ऊर्जा मिलती है। वह अनिद्रा का शिकार होता है।  प्रेमी को देखने या मिलने की अनिवार्य लालसा प्रबल होती जाती है। वह सारा ध्यान प्रेमी पर केन्द्रित करता है।

लगाव/ अनुराग/ आसक्ति

प्यार की इस अवस्था में प्रीति-अनुराग बढ़कर उस स्तर पर पहुंच जाती है कि प्रेमी संग साथ रहने को बाध्य हो जाते हैं। उन्हें किसी अन्य का साथ अच्छा नहीं लगता और `एक में लागी लगन´ का भाव  स्थापित हो जाता है। इस अवस्था का रसायन है ऑक्सीटोसिन तथा वेसोप्रेसिन।ऑक्सीटोसिन जहां `निकटता का हार्मोन´ है, वहीं वेसोप्रेसिन प्रेमियों के मध्य लंबे समय तक सम्बंधों के कायम रखने में अपनी भूमिका निभाता है। वेसोप्रेसिन को `जुड़ाव का रसायन´ कहा जाता है।

हार्मोन का स्‍तर उम्र के साथ बदलता रहता है

शरीर में इन हार्मोंस तथा रसायनों का आवश्यक स्तर बना रहने से आपसी सम्बंधों में उष्णता कायम रहती है। शरीर में स्वाभाविक रूप से किशोरावस्था, यौवनावस्था या  विवाह के तुरन्त पूर्व व बाद में इन रसायनों व हार्मोंस का उच्च स्तर कायम रहता है। उम्र ढलते-ढलते इनका स्तर घटने लगता है और विरक्ति, विवाहेत्तर सम्बंध जैसी भूल/गलती घटित हो जाती है।

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रामनवमी विशेष… राम नाम का रहस्य!

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राम सिर्फ एक नाम नहीं हैं। राम हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक विरासत हैं राम हिन्दुओं की एकता और अखंडता का प्रतीक हैं। राम सनातन धर्म की पहचान है। लेकिन आज हिन्दु धर्म के ही कुछ लोगों ने राम को राजनीति का साधन बना दिया है। अपनी ही सांस्कृतिक विरासत पर सवाल उठाते हैं। राम के अस्तित्व का प्रमाण मांगते हैं। राम सिर्फ दो अक्षर का नाम नहीं, राम तो प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है, राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। अगर राम नहीं तो जीवन मरा है। इस नाम में वो ताकत है कि मरा-मरा करने वाला राम-राम करने लगता है। इस नाम में वो शक्ति है जो हजारों-लाखों मंत्रों के जाप में भी नहीं है। आइए इस राम नाम की शक्ति को जानिए-

हिन्दू धर्म भगवान विष्णु के दशावतार (दस अवतारों) का उल्लेख है। राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि।

राम का जीवनकाल एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में लिखा गया है| बाद में तुलसीदास ने भी भक्ति काव्य श्री रामचरितमानस की रचनाकर राम को आदर्श पुरुष बताया। राम का जन्म त्रेतायुग में हुआ था।

भगवान राम आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। परिदृश्य अतीत का हो या वर्तमान का, जनमानस ने राम के आदर्शों को खूब समझा-परखा है राम का पूरा जीवन आदर्शों, संघर्षों से भरा पड़ा है। राम सिर्फ एक आदर्श पुत्र ही नहीं, आदर्श पति और भाई भी थे। जो व्यक्ति संयमित, मर्यादित और संस्कारित जीवन जीता है, निःस्वार्थ भाव से उसी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की झलक परिलक्षित हो सकती है। राम के आदर्श लक्ष्मण रेखा की उस मर्यादा के समान है जो लांघी तो अनर्थ ही अनर्थ और सीमा की मर्यादा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन।

वर्तमान संदर्भों में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों का जनमानस पर गहरा प्रभाव है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, उनसे उत्तम कोई व्रत नहीं, कोई श्रेष्ठ योग नहीं, कोई उत्कृष्ट अनुष्ठान नहीं। उनके महान चरित्र की उच्च वृत्तियाँ जनमानस को शांति और आनंद उपलब्ध कराती हैं। संपूर्ण भारतीय समाज के जरिए एक समान आदर्श के रूप में भगवान श्रीराम को उत्तर से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण जनमानस ने स्वीकार किया है। उनका तेजस्वी एवं पराक्रमी स्वरूप भारत की एकता का प्रत्यक्ष चित्र उपस्थित करता है।

आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। राम के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के दर्शन होते हैं। राम ने साक्षात परमात्मा होकर भी मानव जाति को मानवता का संदेश दिया। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है। इसीलिए तो भगवान राम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा।

राम के जन्म का रहस्य

श्रीराम की असली जन्म दिनांक- जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद…

सदियों से भगवान राम की कथा भारतीय संस्कृति में रची बसी है, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन चरित्र लोगों को सही राह पर चramchld.gifलने की शिक्षा देता आ रहा है, लेकिन क्या भगवान राम से जुड़ी कहानी सिर्फ कथा है, क्या भगवान राम कल्पना हैं, आखिर हमारे पास भगवान राम के सच होने का क्या प्रमाण है?

कहा जाता है कि पांचवी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व जिस काल को ऋग्दवेद का काल कहा जाता है, तभी महर्षि वाल्मिकी ने रामायण की रचना की। लेकिन अब तक इस बात इतिहासकारों की राय बंटी हुई थी, लेकिन अब इस बात के सच होने का वैज्ञानिक प्रमाण मिल गया है।

दिल्ली में स्थित एक संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा यानी आई सर्व ने लंबे वैज्ञानिक शोध के बाद चौंकाने वाला दावा किया है। आई सर्व ने आधुनिक विज्ञान से जुड़ी 9 विधाओं, अंतरिक्ष विज्ञान, जेनेटिक्स, जियोलॉजी, एर्कियोलॉजी और स्पेस इमेजरी पर आधारित रिसर्च के आधार पर दावा किया है।

भारत में पिछले 10 हजार साल से सभ्यता लगातार विकसित हो रही है। वेद और रामायण में विभिन्न आकाशीय और खगोलीय स्थीतियों का जिक्र मिलता है, जिसे आधुनिक विज्ञान की मदद से 9 हजार साल ईसा पूर्व से लेकर 7 हजार साल ईसा पूर्व तक प्रमाणिक तरीके से क्रमानुसार सिद्ध किया जा सकता है।

पहली मान्यता- First Theory… वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का क्या वर्णन है कि —

ततो य्रूो समाप्ते तु ऋतुना षट् समत्युय: ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ॥
नक्षत्रेsदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह॥
प्रोद्यमाने जनन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजयद् रामं दिव्यलक्षसंयुतम् ॥

भावार्थ- चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवन्दित श्री राम को जन्म दिया। यानी जिस दिन भगवान राम का जन्म हुआ उस दिन अयोध्या के ऊपर तारों की सारी स्थिति का साफ-साफ जिक्र है… अब अगर रामायण में जिक्र नक्षत्रों की इस स्थिति को नासा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर प्लैनेटेरियम गोल्ड में उस वक्त की सितारों की स्थिती से मिलान और तुलना करें तो आईए जानते हैं कि क्या नतीजा मिलता है?

  1. सूर्य मेष राशि (उच्च स्थान) में।
  2. शुक्र मीन राशि (उच्च स्थान) में।
  3. मंगल मकर राशि (उच्च स्थान) में।
  4. शनि तुला राशि (उच्च स्थान) में।
  5. बृहस्पति कर्क राशि (उच्च स्थान) में।
  6. लगन कर्क के रूप में।
  7. पुनर्वसु के पास चन्द्रमा मिथुन से कर्क राशि की ओर बढता हुआ।

शोध संस्था आई सर्व के मुताबिक वाल्मीकि रामायण में जिक्र श्री राम के जन्म के वक्त ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का सॉफ्टवेयर से मिलान करने पर जो दिन मिला, वो दिन है 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व। उस दिन दोपहर 12 बजे अयोध्या के आकाश पर सितारों की स्थिति वाल्मीकि रामायण और सॉफ्टवेयर दोनों में एक जैसी है। लिहाजा, रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे कि रामलाला का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को हुआ।

  • आई सर्व के रिसर्चरों ने जब धार्मिक तिथियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चंद्र कैलेंडर की इस तिथि कोआधुनिक कैलेंडर की तारीख में बदला तो वो ये जान कर हैरान रह गए कि सदियों से भारतवर्ष में रामलला का बर्थ डे बिल्कुल सही तिथि पर मनाया जाता आया है।

आई-सर्व की दिल्ली शाखा की निदेशक सरोज बाला के मुताबिक… जो जन्मतिथि आती है वो है 10 जनवरी 5114 बीसी अब इसे लूनर कैलेंडर में कन्वर्ट कार वो चैत्र मास का शुक्ल पक्ष का नवमी निकला। अब हम सब जानते हैं कि चैत्र शुक्ल की नवमी को राम नवमी मनाते हैं, तो वही दोपहर को 12 से 2 बजे के बीच समान तिथि निकली है। सॉफ्टवेयर की मदद से रिसर्चरों ने भी ये भी पता लगाया की रामलला के भाईयों का बर्थडे कब पड़ता है। इस मॉडल के मुताबिक भरत का जन्म पुष्प नक्षत्र तथा मीन लग्न में 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को सुबह चार बजे लक्ष्मण और शत्रुध्न का जन्म अश्लेषा नक्षत्र एंव कर्क लग्न में 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को 11 बज कर 30 मिनट पर हुआ।

दूसरी मान्यता- Second Theory… 

हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। लेकिन असल में वैज्ञानिक शोधकर्ताओं अनुसार राम की जन्म दिनांक वाल्मीकि द्वारा बताए गए ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर अनुसार 4 दिसंबर 7323 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9334 वर्ष पूर्व हुआ था।

वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, ब्रहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. वर्तक पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर श्रीराम का जन्म 7129 वर्ष पूर्व अर्थात 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है।

राम के नाम का रहस्य

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राम या मार : राम का उल्टा होता है म, अ, र अर्थात मार। मार बौद्ध धर्म का शब्द है। मार का अर्थ है- इंद्रियों के सुख में ही रत रहने वाला और दूसरा आंधी या तूफान। राम को छोड़कर जो व्यक्ति अन्य विषयों में मन को रमाता है, मार उसे वैसे ही गिरा देती है, जैसे सूखे वृक्षों को आंधियां।

तारणहार राम का नाम : श्रीराम-श्रीराम जपते हुए असंख्य साधु-संत मुक्ति को प्राप्त हो गए हैं। प्रभु श्रीराम नाम के उच्चारण से जीवन में सकारात्क ऊर्जा का संचार होता है। जो लोग ध्वनि विज्ञान से परिचित हैं वे जानते हैं कि ‘राम’ शब्द की महिमा अपरम्पार है।

जब हम ‘राम’ कहते हैं तो हवा या रेत पर एक विशेष आकृति का निर्माण होता है। उसी तरह चित्त में भी विशेष लय आने लगती है। जब व्यक्ति लगातार ‘राम’ जप करता रहता है तो रोम-रोम में प्रभु श्रीराम बस जाते हैं। उसके आसपास सुरक्षा का एक मंडल बनना तय समझो। प्रभु श्रीराम के नाम का असर जबरदस्त होता है। आपके सारे दुःख हरने वाला सिर्फ एकमात्र नाम है- ‘हे राम।’

व्यर्थ की चिंता छोड़ो :
होइहै वही जो राम रचि राखा।
को करे तरफ बढ़ाए साखा।।

‘राम’ सिर्फ एक नाम नहीं हैं और न ही सिर्फ एक मानव। राम परम शक्ति हैं। प्रभु श्रीराम के द्रोहियों को शायद ही यह मालूम है कि वे अपने आसपास नर्क का निर्माण कर रहे हैं। इसीलिए यह चिंता छोड़ दो कि कौन प्रभु श्रीराम का अपमान करता है और कौन सुनता है।

नीति-कुशल व न्यायप्रिय नरेश

भगवान राम विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। उन्होंने वेदों और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावना व सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। फिर चाहे राज्य त्यागने, बाली का वध करने, रावण का संहार करने या सीता को वन भेजने की बात ही क्यों न हो।

सहनशील व धैर्यवान

सहनशीलता व धैर्य भगवान राम का एक और गुण है।

राम का संयमी होना माता कैकेयी की उस शर्त का अनुपालन था जिसमें उन्होंने राजा दशरत से मांग की थी-

तापस बेष बिसेषि उदासी।
चौदह बरिस रामु बनवासी।।
सीता हरण के बाद संयम से काम लेना
समुद्र पर सेतु बनाने के लिए तपस्या करना,

सीता को त्यागने के बाद राजा होते हुए भी संन्यासी की भांति जीवन बिताना उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा है।

संयमित- यानि समय-यमय पर उठने वाली मानसिक उत्तेजनाओं जैसे- कामवासना, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मोह आदि पर नियंत्रण रखना। राम-सीता ने अपना संपूर्ण दाम्पत्य बहुत ही संयम और प्रेम से जीया। वे कहीं भी मानसिक या शारीरिक रूप से अनियंत्रित नहीं हुए।

दयालु व बेहतर स्वामीImage

भगवान राम ने दया कर सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उनकी सेना में पशु, मानव व दानव सभी थे और उन्होंने सभी को आगे बढ़ने का मौका दिया। सुग्रीव को राज्य, हनुमान, जाम्बवंत व नल-नील को भी उन्होंने समय-समय पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया।

मित्र
केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण। हर जाति, हर वर्ग के मित्रों के साथ भगवान राम ने दिल से करीबी रिश्ता निभाया। दोस्तों के लिए भी उन्होंने स्वयं कई संकट झेले।

बेहतर प्रबंधक

भगवान राम न केवल कुशल प्रबंधक थे, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। वे सभी को विकास का अवसर देते थे व उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते थे। उनके इसी गुण की वजह से लंका जाने के लिए उन्होंने व उनकी सेना ने पत्थरों का सेतु बना लिया था।

भाई
भगवान राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न सौतेली माँ के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने सभी भाइयों के प्रति सगे भाई से बढ़कर त्याग और समर्पण का भाव रखा और स्नेह दिया। यही वजह थी कि भगवान राम के वनवास के समय लक्ष्मण उनके साथ वन गए और राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भरत ने भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता को न्याय दिलाया।

संतान

दाम्पत्य जीवन में संतान का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। पति-पत्नी के  बीच के संबंधों को मधुर और मजबूत बनाने में बच्चों की अहम् भूमिका  रहती है। राम और सीता के बीच वनवास को खत्म करने और सीता को पवित्र साबित करने में उनके बच्चों लव और कुश ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के लिए स्वामी, प्रजा के लिए नीति-कुशल व न्यायप्रिय राजा, सुग्रीव व केवट के परम मित्र और सेना को साथ लेकर चलने वाले व्यक्तित्व के रूप में भगवान राम को पहचाना जाता है। उनके इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है। सही भी है, किसी के गुण व कर्म ही उसकी पहचान बनाते हैं।

नाम की महिमा: सेतुबंध बनाया जा रहा था तब सभी को संशय था कि क्या पत्थर भी तैर सकते हैं। क्या तैरते हुए पत्थरों का बाँध बन सकता है तो इस संशय को मिटाने के लिए प्रत्येक पत्थर पर राम का नाम लिखा गया। हनुमान जी भी सोच में पड़ गए कि बिना सेतु के मैं लंका कैसे पहुँच सकता हूँ….लेकिन राम का नाम लेकर वे एक ही फलांग में पार कर गए समुद्र।

भगवान राम के जन्म के पूर्व इस नाम का उपयोग ईश्वर के लिए होता था अर्थात ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर आदि की जगह पहले ‘राम’ शब्द का उपयोग होता था, इसीलिए इस शब्द की महिमा और बढ़ जाती है तभी तो कहते हैं कि राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। राम’ शब्द की ध्वनि हमारे जीवन के सभी दुखों को मिटाने की ताकत रखती है। यह हम नहीं ध्वनि विज्ञान पर शोध करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि राम नाम के उच्चारण से मन शांत हो जाता।

कलयुग में यही सहारा: कहते हैं कि कलयुग में सब कुछ महँगा है, लेकिन राम का नाम ही सस्ता है। सस्ता ही नहीं सभी रोग और शोक की एक ही दवा है राम। वर्तमान में ध्यान, तप, साधना और अटूट भक्ति करने से भी श्रेष्ठ राम का नाम जपना है। भागमभाग जिंदगी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, धोखे पर धोखे, माया और मोह आदि सभी के बीच मानवता जब हताश और निराश होकर आत्महत्या करने लगती है तब सिर्फ राम नाम का सहारा ही उसे बचा सकता है।

राम रहस्य: प्रसिद्ध संत शिवानंद निरंतर राम का नाम जपते रहते थे। एक दिन वे जहाज पर यात्रा के दौरान रात में गहरी नींद में सो रहे थे। आधी रात को कुछ लोग उठने लगे और आपस में बात करने लगे कि ये राम नाम कौन जप रहा है। लोगों ने उस विराट, लेकिन शांतिमय आवाज की खोज की और खोजते-खोजते वे शिवानंद के पास पहुँच गए।सभी को यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ की शिवानंद तो गहरी नींद में सो रहे है, लेकिन उनके भीतर से यह आवाज कैसे निकल रही है। उन्होंने शिवानंद को झकझोर कर उठाया तभी अचानक आवाज बंद हो गई। लोगों ने शिवानंद को कहा आपके भीतर से राम नाम की आवाज निकल रही थी इसका राज क्या है। उन्होंने कहा मैं भी उस आवाज को सुनता रहता हूँ। पहले तो जपना पड़ता था राम का नाम अब नहीं। बोलो श्रीराम।

कहते हैं जो जपता है राम का नाम राम जपते हैं उसका नाम।–शतायु

तुलसीदास के राम

इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास, जिनका जन्म सन् 1554 ई. हुआ था, ने रामचरित मानस की रचना की। सत्य है कि रामायण से अधिक रामचरित मानस को लोकप्रियता मिली है लेकिन यह ग्रंथ भी रामायण के तथ्यों पर ही आधारित है।

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भगवान राम नीले और कृष्ण काले क्यों?

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अक्सर मन में यह सवाल गूंजता है कि कृष्ण का काला रंग तो फिर भी समझ में आता है लेकिन भगवान राम को नील वर्ण भी कहा जाता है। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है? वहीं काले रंग के कृष्ण इतने आकर्षक कैसे थे? इन भगवानों के रंग-रूप के पीछे क्या रहस्य है। राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है। ये अनंतता का भाव हमें आकाश से मिलता है। आकाश की कोई सीमा नहीं है। वह अंतहीन है। राम और कृष्ण के रंग इसी आकाश की अनंतता के प्रतीक हैं। राम का जन्म दिन में हुआ था। दिन के समय का आकाश का रंग नीला होता है। इसी तरह कृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था और रात के समय आकाश का रंग काला प्रतीत होता है। दोनों ही परिस्थितियों में भगवान को हमारे ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने आकाश के रंग से प्रतीकात्मक तरीके से दर्शाने के लिए है काले और नीले रंग का बताया है।

भगवान राम आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। परिदृश्य अतीत का हो या वर्तमान का, जनमानस ने रामजी के आदर्शों को खूब समझा-परखा है रामजी का पूरा जीवन आदर्शों, संघर्षों से भरा पड़ा है। राम सिर्फ एक आदर्श पुत्र ही नहीं, आदर्श पति और भाई भी थे। जो व्यक्ति संयमित, मर्यादित और संस्कारित जीवन जीता है, निःस्वार्थ भाव से उसी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की झलक परिलक्षित हो सकती है। राम के आदर्श Imageलक्ष्मण रेखा की उस मर्यादा के समान है जो लाँघी तो अनर्थ ही अनर्थ और सीमा की मर्यादा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन।

वर्तमान संदर्भों में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों का जनमानस पर गहरा प्रभाव है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, उनसे उत्तम कोई व्रत नहीं, कोई श्रेष्ठ योग नहीं, कोई उत्कृष्ट अनुष्ठान नहीं। उनके महान चरित्र की उच्च वृत्तियाँ जनमानस को शांति और आनंद उपलब्ध कराती हैं। संपूर्ण भारतीय समाज के जरिए एक समान आदर्श के रूप में भगवान श्रीराम को उत्तर से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण जनमानस ने स्वीकार किया है। उनका तेजस्वी एवं पराक्रमी स्वरूप भारत की एकता का प्रत्यक्ष चित्र उपस्थित करता है।

आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। राम के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के दर्शन होते हैं। राम ने साक्षात परमात्मा होकर भी मानव जाति को मानवता का संदेश दिया। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है। इसीलिए तो भगवान राम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम समसामयिक है। भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसे श्रीराम की महिमा अपरंपार है।

एक राम राजा दशरथ का बेटा,
एक राम घर-घर में बैठा,
एक राम का सकल पसारा,
एक राम सारे जग से न्यारा।

भगवान श्री विष्णुजी के बाद श्री नारायणजी के इस अवतार की आनंद अनुभूति के लिए देवाधिदेव स्वयंभू श्री महादेव ग्यारहवें रुद्र बनकर श्री मारुति नंदन के रूप में निकल पड़े।

यहाँ तक कि भोलेनाथ स्वयं माता उमाजी को सुनाते हैं कि मैं तो राम नाम में ही वरण करता हूँ। जिस नाम के महान प्रभाव ने पत्थरों को तारा है।

हमारी अंतिम यात्रा के समय भी इसी ‘राम नाम सत्य है’ के घोष ने हमारी जीवनयात्रा पूर्ण की है और कौन नहीं जानता आखिर बापू ने अंत समय में ‘हे राम’ किनके लिए पुकारा था।

आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। राम के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के दर्शन होते हैं। राम ने साक्षात परमात्मा होकर भी मानव जाति को मानवता का संदेश दिया। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है। इसीलिए तो भगवान राम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा।

राम नाम उर मैं गहिओ जा कै सम नहीं कोई।।
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुम्हारे होई।।

जिनके सुंदर नाम को ह्रदय में बसा लेने मात्र से सारे काम पूर्ण हो जाते हैं। जिनके समान कोई दूजा नाम नहीं है। जिनके स्मरण मात्र से सारे संकट मिट जाते हैं। ऐसे प्रभु श्रीराम को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं।

कलयुग में न तो योग, न यज्ञ और न ज्ञान का महत्व है। एक मात्र राम का गुणगान ही जीवों का उद्धार है। संतों का कहना है कि प्रभु श्रीराम की भक्ति में कपट, दिखावा नहीं आंतरिक भक्ति ही आवश्यक है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं – ज्ञान और वैराग्य प्रभु को पाने का मार्ग नहीं है बल्कि प्रेम भक्ति से सारे मैल धूल जाते हैं। प्रेम भक्ति से ही श्रीराम मिल जाते हैं।

छूटहि मलहि मलहि के धोएं।
धृत कि पाव कोई बारि बिलोएं।
प्रेम भक्ति जल बिनु रघुराई।
अभि अंतर मैल कबहुं न जाई।।

अर्थात् मैल को धोने से क्या मैल छूट सकता है। जल को मथने से क्या किसी को ‍घी मिल सकता है। कभी नहीं। इसी प्रकार प्रेम-भक्ति रूपी निर्मल जल के बिना अंदर का मैल कभी नहीं छूट सकता। प्रभु की भक्ति के बिना जीवन नीरस है अर्थात् रसहीन है। प्रभु भक्ति का स्वाद ऐसा स्वाद है जिसने इस स्वाद को चख लिया, उसको दुनिया के सारे स्वाद फीके लगेंगे।

भक्ति जीवन में उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना स्वादिष्ट भोजन में नमक।

भगति हीन गुण सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु व्यंजन जैसे।।

अर्थात – जिस तरह नमक के बिना उत्तम से उत्तम व्यंजन स्वादहीन है, उसी तरह प्रभु के चरणों की ‍भक्ति के बिना जीवन का सुख, समृद्धि सभी फीके है।

श्रीराम ने तोड़ा था भगवान भोलेनाथ का पिनाक

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भगवान भोलेनाथ के पास एक ऐसा धनुष था जिसकी टंकार ( धनुष की रस्सी को खींचने के बाद अचानक छोड़ देने वाली आवाज) से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। इसी धनुष के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को भगवान शंकर ने ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था।

शिव पुराण में भगवान शंकर के इस धनुष का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जब राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए तो उन्होंने सभी देवताओं को अपने धनुष (पिनाक) से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।

देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को यह धनुष दिया था। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे

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प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।

रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।

जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…

1.केवट प्रसंग : राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

‘सिंगरौर’ : इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

‘कुरई’ : इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।

इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

2.चित्रकूट के घाट पर : कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

3.अत्रि ऋषि का आश्रम : चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।

अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपने तपोबल से बालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद ही तीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओं के वरदान से उन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरे पुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासा ऋषि को कौन नहीं जानता?

अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।

प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’

राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।

चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलों में…

4. दंडकारण्य : अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।

‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।

वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।

दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण के सहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसका इन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर की नींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था। यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापना की। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।

इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

-डॉ. रमानाथ त्रिपाठी ने अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘रामगाथा’ में रामायणकालीन दंडकारण्य का विस्तृत उल्लेख किया है।

5. पंचवटी में राम : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।

उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 किमी) दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।

अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।

यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।

मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

6.सीताहरण का स्थान ‘सर्वतीर्थ’ : नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

पर्णशाला : पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।

इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

7.सीता की खोज : सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

8.शबरी का आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।

शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा।

पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।

केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

9.हनुमान से भेंट : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।

ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।

ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

10.कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।

तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।

लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

11.रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

12.धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।

छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।

धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।

30 मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

13.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला : वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए हैं।

श्रीवाल्मीकि ने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू के आसपास की होगी (1/4/1 -2)। श्रुति स्मृति की प्रथा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसको लिखित रूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं। रामायण की कहानी के संदर्भ निम्नलिखित रूप में उपलब्ध हैं-

* कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू)
* बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू)
* कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू)
* नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी)
* नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी)
* श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना ‘जानकी हरण’ (सातवीं शताब्दी)

वनवास के 14 वर्षो में नही सोये थे लक्ष्मण

रामायण के अभी इतने रहस्य अनजाने है की हम लोग आश्चर्य चकित हो जाते है, जब राम लक्ष्मण भारत शत्रुधन का GZwEc.jpgजन्म हुआ तो चारो भाइयो में से शुरू में रोने के बाद सब चुप हो गए थे, परन्तु लक्ष्मण रोते ही रहे जब तक की उन्हें राम के पास नही सुलाया गया था. तब से लक्ष्मण राम की परछाई बन ही रहे चाहे वो कोई भी काम हो वाल्मीकि के साथ यज्ञ की रखा हो या सीता स्वयंवर लक्ष्मण साथ ही रहे.

जब वनवास का समय आया तो लक्ष्मण राम के साथ जाने को तैयार हो गए, इस पर पत्नी उर्मिला भी उनके साथ जाने तैयार हो गई. लेकिन लक्ष्मण ने अपनी पत्नी से भीख मांगी की मैं रामसीता की सेवा करना चाहता हूँ तुम साथ होगी तो उसमे विध्न पड़ेगा तब जाके उर्मिला मानी.

जब वनवास में पहली रात को राम सीता कुटिया में रोये तो लक्ष्मण के पास निंद्रा देवी आई तब लक्ष्मण ने उन्हें चौदह साल दूर रहने का वरदान माँगा पर उस नींद को किसी को वहां करना था. ऐसे में लक्ष्मण ने नींद को अपनी पत्नी उर्मिला के पास भेज दिया और अपना सन्देश भी भेज दिया, तब लक्ष्मण के हिस्से की नींद उर्मिला को मिली.

उर्मिला लगातार चौदह वर्षो तक सोती रही और लक्ष्मण जागते रहे थे, ये बात उन्हें युद्ध में भी सहायक हुई क्योंकि इंद्रजीत को वही मार सकता था जो पिछले चौदह सालो से सोया न हो. तब लक्ष्मण इंद्रजीत की काली शक्तियों से लड़ उसे मारने में सफल हुआ, जब अयोध्या में राम का राजतिलक हो रहा था तो लक्ष्मण जोर जोर से हंसने लगे. जब सबने उससे कारण पूछा तो लक्ष्मण ने कहा की उर्मिला सो रही है जब में उबासी लूंगा तब ही वो जागेगी इस पर सब हंस पड़े और उर्मिला उठ के समारोह में आई.

14 वर्ष वनवास औक राम के बिना अयोध्या

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अयोध्या स्वयं श्रीराम के बिना अधूरा थी, राज्य के लोग, पशु-पक्षी, हर एक वस्तु श्रीराम के बिना अधूरे थे। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के जाने के बाद मानो अयोध्या पर दुःख का बांध टूट पड़ा था।

  • अयोध्या में क्या हुआ- श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के जाने के बाद अयोध्या में क्या-क्या हुआ इस बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। जो सबसे अधिक सुनी गई हैं वह है पिता दशरथ की कहानी, जो अपने पुत्र के दुख में एक पल भी सांस ना ले सके। माता उर्मिला श्रीराम के जाने के बाद 14 वर्षों के लिए नींद में चली गईं, यह कुछ ऐसी कहानियां हैं जो सभी ने सुनी हैं।
  • कुछ ऐसी अनसुनी कहानियां- लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसी अनसुनी बातें हैं जो श्रीराम के अयोध्या छोड़ने के बाद घटित हुईं। यहां हम एक-एक करके आपको उन कहानियों से परिचित कराएंगे जो तब घटीं जब श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण अयोध्या में उपस्थित नहीं थे।
  • भाई भरत- यह सब जानते हैं कि श्रीराम के जाने की खबर जैसे ही अनुज भरत को मिली, वह अपना ननिहाल छोड़कर अयोध्या दौड़े चले आए। वापस आते ही जब उन्हें यह मालूम हुआ कि स्वयं उनकी माता कैकेयी ने ही भाई राम को अयोध्या छोड़ने के लिए विवश किया तो भरत ने अपनी मां को अपनाने से मना कर दिया।
  • कैकेयी और भरत- उन्होंने अपनी मां को खरी-खोटी सुनाई, ऐसे में जैसे ही मंथरा ने आगे बढ़कर भरत को मां कैकेयी की ममता की व्याख्या देना चाहा और यह समझाना चाहा कि कैकेयी ने यह सब कुछ केवल ममता की खातिर किया है, अपने पुत्र के लिए किया है, तो तभी भरत ने गुस्से में मंथरा को ध्क्का मार दूर फेंक दिया।
  • भरत का क्रोध- मौके पर भाई शत्रुघ्न ने आकर भरत को रोका और एक स्त्री पर हाथ उठाकर किए जाने वाले पाप से रोका। उन्होंने भरत को समझाया कि हमारे संस्कार एक नारी पर अत्याचार करना नहीं सिखाते, फिर चाहे उसने कितने ही बुरे कर्म क्यों ना किए हों।
  • भरत ने ठुकराया अपनी मां को- लेकिन भरत की उन भावनाओं को समझने वाला कोई नहीं था, पिता समान भाई की जुदाई भरत सहन ना कर सके और अंत में उन्होंने अपने खुद की मां कैकेयी को ठुकराकर माता कौशल्या और सुमित्रा की सेवा करने का निर्णय लिया।
  • राजा दशरथ की मृत्यु- लेकिन भरत के अलावा कोई और भी था जो राम की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाया, वे थे राजा दशरथ जिन्होंने पत्नी के कहने पर पुत्र को खुद से दूर तो कर लिया लेकिन जीवन के उस पड़ाव को जी ना सके और अंतत: मृत्यु को प्राप्त हुए। यह कहानी हम सभी जानते हैं कि राजा दशरथ की मृत्यु की खबर श्रीराम को दी गई थी, लेकिन ये बहुत कम लोग जानते हैं कि चार भाइयों ने मिलकर अपने पिता का अंतिम संस्कार किया था। पिता को अंतिम विदाई देने के पश्चात भरत ने बहुत कोशिश की कि श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण को लेकर वापस अयोध्या लौट आएं लेकिन उनकी यह कोशिश कामयाब ना हुई। श्रीराम ने अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहने का फैसला किया और भरत को राज्य का कार्यभार संभालने का आदेश दिया।
  • भरत ने राज्य संभाला- भरत ने भाई की आज्ञा का पालन तो किया, लेकिन अपने अंदाज़ में। उन्होंने श्रीराम की ‘पादुका’ को राजगद्दी पर स्थापित किया और खुद एक सेवक बनकर अयोध्या की सेवा की। भरत की पत्नी माण्डवी ने भी अपने पति के इस फैसले को सम्मानित किया और राज्य की शानो-शौकत छोड़कर सादगी से जीवन व्यतीत करने को अपना धर्म समझा। कहते हैं जमीन की जिस सतह पर श्रीराम का पलंग लगा था, भरत ने उस जमीन पर 1 फीट का गढ्डा खोदकर वहां अपना पलंग लगाया था। इसके बाद माण्डवी ने भरत के पलंग से भी 2 फीट नीचे अपना पलंग लगाया।
  • अयोध्या छोड़ने का फैसला- इतिहासकारों की मानें तो भरत एवं माण्डवी दोनों ने ही अयोध्या के महल में रहने से इनकार कर दिया था। अयोध्या और कौशल, दोनों राज्यों के कार्य को संभालने की जिम्मेदारी होने के कारण भरत एवं माण्डवी ने नंदीग्राम में रहने का फैसला किया जो अयोध्या एवं कौशल के बीचो-बीच एक जगह थी।
  • शत्रुघ्न एवं उनकी पत्नी- अंत में अयोध्या के महल में यदि कोई राजकुमार था तो वह थे शत्रुघ्न एवं उनकी पत्नी श्रुतकीर्ति, जिन्होंने महल में रुक कर श्रीराम की अनुपस्थिति में माता कैकेयी, माता कौशल्या और माता सुमित्रा की सेवा की।

नारद के श्राप की वजह से हुआ राम अवतार

एक दिन आकाश मार्ग से गमन करते हुये नारद मुनि को हिमालय में एक सुंदर गुफा दिखाई दी। नारद जी को वहाँ श्री विष्णु की भक्ति करने का मन हुआ और वे वहाँ बैठकर श्रीविष्णु की तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या को जब इंद्र ने देखा तो narada_and_shrimati.jpgउनको लगा की कहीं नारद मुनि उनके स्वर्ग को न हड़प लें अतः उन्होने कामदेव को आज्ञा की उनका ताप भंग करने के लिए। कामदेव, अप्सरा आदि ने खूब प्रयत्न किया परंतु वे नारद मुनि की तपस्या भंग नहीं कर सके। कामदेव ने श्राप के भय से नारद मुनि से क्षमा मांगी, नारद मुनि ने भी उन्हें क्षमा कर दिया। अब यहाँ नारद मुनि को अहंकार हो गया की उन्होने भी श्री विष्णु और महादेव की तरह कामदेव को जीत लिया है।

उन्होने जाकर यह बात महादेव को बताई और श्री विष्णु के पास जाकर भी अपनी प्रशंसा खुद करने लगे। श्री हरी विष्णु को यह बात बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी की उनका परम भक्त अहंकारी हो। अपने भक्त को इस अहंकार से मुक्त करने के लिए उन्होने लीला रची। अपनी माया से उन्होने एक नगर रच दिया। उस नगर में एक राजा और उसकी मोहिनी जैसी सुंदर कन्या थी। एक दिन नारद मुनि उस नगर से होकर निकले। सुंदर नगर को देख वे उस नगर के अतिथि बने। नगर के राजा ने उनका खूब आतिथ्य सत्कार किया। राजा ने अपनी पुत्री को नारद मुनि का आशीर्वाद लेने के लिए बुलाया, नारद उसे देख कर सबकुछ भूल गए और उस पर मोहित गए।

अब नारद के मन में उस सुंदर कन्या से विवाह का मन हुआ, और उस समय उस नगर का राजा अपनी पुत्री के स्वयंबर का आयोजन भी कर रहा था। नारद मुनि तुरंत भगवान विष्णु के पास गए और बोले- हे प्रभु एक नगर की सुंदर राजकुमारी मेरे मन को भा गयी है उस से विवाह करने की मेरी इच्छा है अतः आप मुझे अपना रूप प्रदान करने की कृपा करें ताकि वह कन्या स्वयंबर में मुझे अपना पति स्वीकार कर ले।

भगवान विष्णु ने सुंदर रूप की जगह नारद मुनि को एक वानर का रूप दे दिया और स्वयं भी उस स्वयंबर में जा पहुंचे। स्वयंबर में नारद मुनि को पूरा विश्वाश था की वह कन्या उनके ही गले में वरमाला डालेगी किन्तु ऐसा नहीं हुआ, उस कन्या ने नारद मुनि की तरफ देखा और आगे बढ़ गयी और श्री विष्णु के गले वरमाला डाल दी।

यह सब देख नारद मुनि को बड़ा आश्चर्य हुआ, इधर सारे राजा महाराजा नारद मुनि पर हस रहे थे। क्रोधित होकर नारद मुनि ने सबको श्राप देने की चेतावनी दी। तब सबने नारद मुनि से अपना मुख देखने को कहा। नारद मुनि ने पानी में अपना मुख देखा तो उन्हें अपना मुख वानर जैसा दिखाई दिया। अब नारद मुनि का क्रोध और बढ़ गया और जा पहुंचे वैकुंठ धाम।

वैकुंठ धाम आकर उन्होने श्रीविष्णु को श्राप दिया की आपने अपने भक्त के साथ ऐसा किया, आपने मुझे एक स्त्री से दूर किया है जाइए आपको भी किसी स्त्री का वियोग सहना पड़ेगा। ये वानर मुख जो आपने मुझे दिया है, यही वानर आपकी उस समय सहायता करेगा। इस श्राप को श्री विष्णु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसीलिए श्रीविष्णु को राम अवतार में सीता का वियोग सहना पड़ा और श्राप के अनुसार हनुमान जी ने उनकी सहायता की थी।

श्रीराम और हनुमान मिलन का रहस्य… जानिए कैसे हुई हनुमान जी और प्रभु श्री राम की प्रथम भेंट

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एक बार हनुमान जी ऋष्यमूक पर्वत की एक बहुत ऊंची चोटी पर बैठे हुए थे। उसी समय भगवान श्रीराम चंद्र जी सीता जी की खोज करते हुए लक्ष्मण जी के साथ ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुंचे। ऊंची चोटी पर से वानरों के राजा सुग्रीव ने उन लोगों को देखा। उसने सोचा कि ये बाली के भेजे हुए दो योद्धा हैं, जो मुझे मारने के लिए हाथ में धनुष-बाण लिए चले आ रहे हैं।

दूर से देखने पर ये दोनों बहुत बलवान जान पड़ते हैं। डर से घबरा कर उसने हनुमान जी से कहा, ‘‘हनुमान! वह देखो, दो बहुत ही बलवान मनुष्य हाथ में धनुष-बाण लिए इधर ही बढ़े चले आ रहे हैं। लगता है, इन्हें बाली ने मुझे मारने के लिए भेजा है। ये मुझे ही चारों ओर खोज रहे हैं। तुम तुरंत तपस्वी ब्राह्मण का रूप बना लो और इन दोनों योद्धाओं के पास जाओ तथा यह पता लगाओ कि ये कौन हैं और यहां किसलिए घूम रहे हैं। अगर कोई भय की बात जान पड़े तो मुझे वहीं से संकेत कर देना। मैं तुरंत इस पर्वत को छोड़कर कहीं और भाग जाऊंगा।’’

सुग्रीव को अत्यंत डरा हुआ और घबराया देखकर हनुमान जी तुरंत तपस्वी ब्राह्मण का रूप बनाकर भगवान श्रीरामचंद्र और लक्ष्मण जी के पास जा पहुंचे। उन्होंने दोनों भाइयों को माथा झुकाकर प्रणाम करते हुए कहा, ‘‘प्रभो! आप लोग कौन हैं? कहां से आए हैं? यहां की धरती बड़ी ही कठोर है। आप लोगों के पैर बहुत ही कोमल हैं। किस कारण से आप यहां घूम रहे हैं? आप लोगों की सुंदरता देखकर तो ऐसा लगता है-जैसे आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई हों या नर और नारायण नाम के प्रसिद्ध ऋषि हों। आप अपना परिचय देकर हमारा उपकार कीजिए।’’

हनुमान जी की मन को अच्छी लगने वाली बातें सुनकर भगवान श्री रामचंद्र जी ने अपना और लक्ष्मण का परिचय देते हुए कहा कि, ‘‘राक्षसों ने सीता जी का हरण कर लिया है। हम उन्हें खोजते हुए चारों ओर घूम रहे हैं। हे ब्राह्मण देव! मेरा नाम राम तथा मेरे भाई का नाम लक्ष्मण है। हम अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र हैं। अब आप अपना परिचय दीजिए।’’ भगवान श्रीरामचंद्र जी की बातें सुनकर हनुमान जी ने जान लिया कि ये स्वयं भगवान ही हैं। बस वह तुरंत ही उनके चरणों पर गिर पड़े। श्री राम ने उठाकर उन्हें गले से लगा लिया।

हनुमान जी ने कहा, ‘‘प्रभो! आप तो सारे संसार के स्वामी हैं। मुझसे मेरा परिचय क्या पूछते हैं? आपके चरणों की सेवा करने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है। अब मुझे अपने परम पवित्र चरणों में जगह दीजिए।’’

भगवान श्री राम ने प्रसन्न होकर उनके मस्तक पर अपना हाथ रख दिया। हनुमान जी ने उत्साह और प्रसन्नता से भरकर दोनों भाइयों को उठाकर कंधे पर बैठा लिया। सुग्रीव ने उनसे कहा था कि भय की कोई बात होगी तो मुझे वहीं-से संकेत करना। हनुमान जी ने राम लक्ष्मण को कंधे पर बिठाया-यही सुग्रीव के लिए संकेत था कि इनसे कोई भय नहीं है। उन्हें कंधे पर बिठाए हुए ही वह सुग्रीव के पास आए और उनसे सुग्रीव का परिचय कराया। भगवान श्री राम ने सुग्रीव के दुख और कष्ट की सारी बातें जानीं। उसे अपना मित्र बनाया और दुष्ट बाली को मार कर उसे किष्किंधा का राजा बना दिया। इस प्रकार हनुमान जी की सहायता से सुग्रीव का सारा दुख दूर हो गया।

रामसेतू का रहस्य… राम नाम से कैसे पानी में तैरा पत्थर

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कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपने कोई पत्थर पानी में फेंका और वह डूबा नहीं, बल्कि पानी की सतह पर तैरता चला गया हो? शायद नहीं, क्योंकि पत्थर का एक पर्याप्त वजन पानी को चीरते हुए खुद को उसमें डुबो ही लेता है। फिर आश्चर्य की बात है कि सदियों पहले श्रीराम की वानर सेना द्वारा बनाए गए रामसेतु पुल के पत्थर पानी में डालते ही डूबे क्यों नहीं?

  • एडेम्स ब्रिज- जी हां, वही रामसेतु जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘एडेम्स ब्रिज’ के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथ रामायण के अनुसार यह एक ऐसा पुल है, जिसे भगवान विष्णु के सातवें एवं हिन्दू धर्म में विष्णु के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रहे अवतार श्रीराम की वानर सेना द्वारा भारत के दक्षिणी भाग रामेश्वरम पर बनाया गया था, जिसका दूसरा किनारा वास्तव में श्रीलंका के मन्नार तक जाकर जुड़ता है।
  • पत्थर पानी में नहीं डूबे- ऐसी मान्यता है कि इस पुल को बनाने के लिए जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था वह पत्थर पानी में फेंकने के बाद समुद्र में नहीं डूबे। बल्कि पानी की सतह पर ही तैरते रहे। ऐसा क्या कारण था कि यह पत्थर पानी में नहीं डूबे? कुछ लोग इसे धार्मिक महत्व देते हुए ईश्वर का चमत्कार मानते हैं लेकिन साइंस इसके पीछे क्या तर्क देता है यह बिल्कुल विपरीत है। धार्मिक मान्यता अनुसार जब असुर सम्राट रावण माता सीता का हरण कर उन्हें अपने साथ लंका ले गया था, तब श्रीराम ने वानरों की सहायता से समुद्र के बीचो-बीच एक पुल का निर्माण किया था। यही आगे चलकर रामसेतु कहलाया था। कहते हैं ram_navmi_01_1460527.jpgकि यह विशाल पुल वानर सेना द्वारा केवल 5 दिनों में ही तैयार कर लिया गया था। कहते हैं कि निर्माण पूर्ण होने के बाद इस पुल की लम्बाई 30 किलोमीटर और चौड़ाई 3 किलोमीटर थी।
  • कैसे पार करें समुद्र? तब श्रीराम ने फैसला किया कि वे स्वयं अपनी सेना के साथ लंका जाकर ही सबको रावण की कैद से छुड़ाएंगे। लेकिन यह सब कैसे होगा, यह एक बड़ा सवाल था। क्योंकि निश्चय तो था लेकिन रास्ते में था एक विशाल समुद्र जिसे पार करने का कोई जरिया हासिल नहीं हो रहा था।
  • समुद्र देवता की पूजा – एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि अपनी मुश्किल का हल निकालने के लिए श्रीराम द्वारा समुद्र देवता की पूजा आरंभ की गई। लेकिन जब कई दिनों के बाद भी समुद्र देवता प्रकट नहीं हुए तब क्रोध में आकर श्रीराम ने समुद्र को सुखा देने के उद्देश्य से अपना धनुष-बाण उठा लिया।
  • समुद्र देवता प्रकट हुए- उनके इस कदम से समुद्र के प्राण सूखने लगे। तभी भयभीत होकर समुद्र देवता प्रकट हुए और बोले, “श्रीराम! आप अपनी वानर सेना की मदद से मेरे ऊपर पत्थरों का एक पुल बनाएं। मैं इन सभी पत्थरों का वजन सम्भाल लूंगा। आपकी सेना में नल एवं नील नामक दो वानर हैं, जो सर्वश्रेष्ठ हैं।“
  • नल-नील का उपयोग- “नल, जो कि भगवान विश्वकर्मा के पुत्र हैं उन्हें अपने पिता द्वारा वरदान हासिल है। उनकी सहायता से आप एक कठोर पुल का निर्माण कराएं। यह पुल आपकी सारी सेना का भार संभाल लेगा और आपको लंका ले जाने में सफल होगा”, ऐसा कहते हुए समुद्र देव ने श्रीराम से पुल बनाने का विनम्र अनुरोध किया। अंत में नल तथा नील की देखरेख तथा पूर्ण वैज्ञानिक योजनाओं के आधार पर एक विशाल पुल तैयार किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि नल तथा नील शायद जानते थे कि कौन सा पत्थर किस प्रकार से रखने से पानी में डूबेगा नहीं तथा दूसरे पत्थरों का सहारा भी बनेगा।

72 दिनों तक चला था राम-रावण युद्ध

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  • स्कंद पुराण के अनुसार- रावण वध के सम्बन्ध में स्कंद पुराण के धर्मारण्य महात्म्य में दी गई कथा के अनुसार राम-रावण युद्ध माघ शुक्ल द्वितीया से लेकर चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक 87 दिन तक चला। लक्ष्मण मूर्छा के कारण बीच में केवल 15 दिन संग्राम बंद रहा और शेष 72 दिन तक दोनों पक्षों में युद्ध हुआ था। इस पौराणिक कथा के अनुसार माघ शुक्ल प्रतिपदा को अंगद जी दूत बनकर रावण के दरबार में गए। इसके बाद द्वितीया को सीताजी को माया से उनके पति के कटे हुए मस्तक का दर्शन कराया गया और उस दिन से अष्टमी तक राक्षसों और वानरों के बीच घमासान युद्ध हुआ।
  • माघ कृष्ण नवमी से चार दिन तक कुंभकर्ण ने घोर युद्ध किया और बहुत से वानरों को मार डाला। अंत में श्री रामजी के हाथों कुंभकर्ण मारा गया। बाद में फाल्गुन शुक्ल द्वादशी से चैत्र चतुदर्शी तक 18 दिनों तक युद्ध करके श्रीराम ने रावण को मार डाला और अमावस्या के दिन रावण आदि राक्षसों के दाह संस्कार किए गए। जाने-माने रामायणविद आचार्य हंसादत्त त्रिपाठी भी रावण वध का वास्तविक समय चैत्र मास में ही बताते हैं।

10 करोड़ थी रावण की सेना फिर भी 72 दिन ही चला था रामायण का युद्ध!
अश्विन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को शुरू हुआ था रामायण का युद्ध, दशहरे के दिन यानि दशमी को रावण वध के साथ ही समाप्त हो गया था. पढ़ने वालो को लगता है की ये तो रातो रात ही हो गया लेकिन वो रात कितनी लम्बी थी इसका अंदाजा आप और मैं नही सिर्फ देवता ही लगा सकते है.

इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की रावण की सेना की संख्या 10, 00,00,000 थी, इसके बावजूद भी सिर्फ वानरों की सेना के सहारे ही भगवान राम ने सिर्फ आठ दिन में ही युद्ध समाप्त कर रावण का वध किया.

युद्ध में एक बार श्री राम और दो बार लक्ष्मण हार गए थे, लेकिन फिर भी रावण ने मर्यादा रखी और मूर्छित और युद्ध से अपहृत ही राम सेना पर आक्रमण नही किया था.

रावण की सेना में उसके सात पुत्र और कई भाई सेना नायक थे इतना ही नहीं रावण के कहने पर उसके भाई अहिरावण और महिरावण ने भी श्री राम और लक्ष्मण का छल से अपहरण कर खात्मे की कोशिश की थी. रावण स्वयं दशग्रीव था और उसके नाभि में अमृत होने के कारन लगभग अमर था.

रावण का पुत्र मेघनाद ( जन्म के समय रोने की नहीं बल्कि मुख से बदलो की गरज की आवाज आई थी) को स्वयं ब्रह्मा ने इंद्र को प्राण दान देने पर इंद्रजीत का नाम दिया था. ब्रह्मा ने उसे वरदान भी मांगने बोला तब उसने अमृत्व माँगा पर वो न देके ब्रह्मा ने उसे युद्ध के समय अपनी कुलदेवी का अनुष्ठान करने की सलाह दी, जिसके जारी रहते उसकी मृत्यु असंभव थी.

रावण का पुत्र अतिक्या जो की अदृश्य होने युद्ध करता था, अगर उसकी मौत का रहस्य देवराज इंद्र लक्ष्मण को न बताते तो उसकी भी मृत्यु होनी असंभव थी. रावण का भाई कुम्भकरण जिसे स्वयं नारद मुनि ने दर्शन शाश्त्र की शिक्षा दी थी, उससे इंद्र भी ईर्ष्या करता था ये जान कर की वो अधर्म के पक्ष में है भाई के मान के लिए अपनी आहुति दी थी.

अदृश्य इंद्रजीत के बाण से लक्ष्मण का जीवित रहना असंभव था, ये सोच कर ही श्रीराम का दिल बैठ रहा था की वो अयोध्या में अपनी माँ से कैसे नज़ारे मिलाएंगे, उनका कलेजा बैठ गया था. लक्ष्मण अगले दिन का सूर्य न देखते अगर हहमान संजीवनी बूटी वाला पर्वत न उठा लाते ( एक भाई के लिए वो रात कितनी लम्बी रही होगी).

इंद्रजीत के नागपाश के कारन श्री राम और लक्ष्मण का अगले दिन की सुबह देखना नामुमकिन था तब हनुमान वैकुण्ठ से विष्णु के वाहन गरुड़ को लेके आये और उनके प्राण बचे. समस्त वानर सेना जो राम के भरोसे लंका पर चढ़ाई कर चली थी उनके लिए ये रात कितनी लम्बी थी.

अहिरावण और महिरावण शिविर में सोये रामलखन को मूर्छित कर अपहृत कर ले गए और दोनों भाइयो की बलि देने लगे, तब हनुमान ने अहिरावण और महिरावण की ही बलि दे दी. वो रात भी वानर शिविर के लिए किसी युग से कम न थी, ऐसे बहुत से विस्मयकारण है जो रामायण के युद्ध को महान बनाते है।

प्रभु श्रीराम से जुड़े कुछ अन्य रहस्य…

कौन थीं भगवान राम की बहन

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दुनियाभर में 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं। उनमें वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण और रामचरित मानस, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण की चर्चा ज्यादा होती है। उक्त रामायण का अध्ययन करने पर हमें रामकथा से जुड़े कई नए तथ्‍यों की जानकारी मिलती है। इसी तरह अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम की एक बहन भी थीं, जो उनसे बड़ी थी।

अब तक आप सिर्फ यही जानते आए हैं कि राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे, लेकिन राम की बहन के बारे में कम लोग ही जानते हैं। बहुत दुखभरी कथा है राम की बहन की, लोग उनकी सच्चाई जानेंगे तो राम को कठोर दिल वाला मानेंगे और दशरथ को स्वार्थी। आओ जानते हैं कि राम की यह बहन कौन थीं। इसका नाम क्या था और यह कहां रहती थी।

श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। हम यहां आपको शांता के बारे में बताएंगे। दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार राम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था।

भगवान राम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात राम की मौसी थीं।

इस संबंध में तीन कथाएं हैं:

  • पहली कथा : वर्षिणी नि:संतान थीं तथा एक बार अयोध्या में उन्होंने हंसी-हंसी में ही बच्चे की मांग की। दशरथ भी मान गए। रघुकुल का दिया गया वचन निभाने के लिए शांता अंगदेश की राजकुमारी बन गईं। शांता वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं और वे अत्यधिक सुंदर भी थीं।
  • दूसरी कथा : लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती धूल-धूल हो गई। चिंतित राजा को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। कहते हैं कि दशरथ उसे अयोध्या बुलाने से डरते थे इसलिए कि कहीं फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।
  • तीसरी कथा : कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।

राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद ऋंग ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

दशरथ ने उनके मंत्री सुमंत की सलाह पर पुत्रकामेष्ठि यज्ञ में महान ऋषियों को बुलाया। इस यज्ञ में दशरथ ने ऋंग ऋषि को भी बुलाया। ऋंग ऋषि एक पुण्य आत्मा थे तथा जहां वे पांव रखते थे वहां यश होता था। सुमंत ने ऋंग को मुख्य ऋत्विक बनने के लिए कहा। दशरथ ने आयोजन करने का आदेश दिया। पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंग ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे। लेकिन दशरथ ने केवल ऋंग ऋषि (उनके दामाद) को ही आमंत्रित किया लेकिन ऋंग ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। ऋंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

लेकिन जब पुत्र की कामना से पुत्र कामेष्ठि यज्ञ के दौरान उन्‍होंने अपने दामाद ऋंग ऋषि को बुलाया, तो दामाद ने शां‍ता के बिना आने से इंकार कर दिया।

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा ऋंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि ‘हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।’ जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि ‘वो उनकी पुत्री शांता है।’ दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।

दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब ऋंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ। -सत्यसाई बाबा।

कहते हैं कि पुत्रेष्ठि यज्ञ कराने वाले का जीवनभर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता है। इस पुण्य के बदले ही राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। राजा दशरथ ने ऋंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत-सा धन दिया जिससे ऋंग ऋषि के पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुआ और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंग ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे।

जनता के समक्ष शान्ता ने कभी भी किसी को नहीं पता चलने दिया कि वो राजा दशरथ और कौशल्‍या की पुत्री हैं। यही कारण है कि रामायण या रामचरित मानस में उनका खास उल्लेख नहीं मिलता है।

कहते हैं कि जीवनभर शांता राह देखती रही अपने भाइयों की कि वे कभी तो उससे मिलने आएंगे, पर कोई नहीं गया उसका हाल-चाल जानने। मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं, शायद वे भी रामराज्‍य में अकाल पड़ने से डरते थे।

कहते हैं कि वन जाते समय भगवान राम अपनी बहन के आश्रम के पास से भी गुजरे थे। तनिक रुक जाते और बहन को दर्शन ही दे देते। बिन बुलाए आने को राजी नहीं थी शांता। सती माता की कथा सुन चुकी थी बचपन में, दशरथ से। ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।

नहीं किया था प्रभु राम ने सीता का परित्याग
सीता 2 वर्ष तक रावण की अशोक वाटिका में बंधक बनकर रहीं लेकिन इस दौरान रावण ने सीता को छुआ तक नहीं। इसका कारण था कि रावण को स्वर्ग की अप्सरा ने यह शाप दिया था कि जब भी तुम किसी ऐसी स्त्री से प्रणय करोगे, जो तुम्हें नहीं चाहती है तो तुम तत्काल ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे अत: रावण किसी भी स्त्री की इच्छा के बगैर उससे प्रणय नहीं कर सकता था। सीता को मु‍क्त करने के बाद समाज में यह प्रचारित है कि अग्निपरीक्षा के बाद राम ने प्रसन्न भाव से सीता को ग्रहण किया और उपस्थित समुदाय से कहा कि उन्होंने लोक निंदा के भय से सीता को ग्रहण नहीं किया था। किंतु अब अग्निपरीक्षा से गुजरने के बाद यह सिद्ध होता है कि सीता पवित्र है, तो अब किसी को इसमें संशय नहीं होना चाहिए। लेकिन इस अग्निपरीक्षा के बाद भी जनसमुदाय में तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगीं, तब राम ने सीता को छोड़ने का मन बनाया। यह बात उत्तरकांड में लिखी है। यह मूल रामायण में नहीं है।

राजा राम या भगवान
हिन्दू धर्म के आलोचक खासकर ‘राम’ की जरूर आलोचना करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि ‘राम’ हिन्दू धर्म का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। इस स्तंभ को गिरा दिया गया तो हिन्दुओं को धर्मांतरित करना और आसान हो जाएगा। इसी नी‍ति के चलते तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर ‘राम’ को एक सामान्य पुरुष घोषित करने की साजिश की जाती रही है। वे कहते हैं कि राम कोई भगवान नहीं थे, वे तो महज एक राजा थे। उन्होंने समाज और धर्म के लिए क्या किया? वे तो अपनी स्त्री के लिए रावण से लड़े और उसे उसके चंगुल से मुक्त कराकर लाए। इससे वे भगवान कैसे हो गए? भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा गया है अर्थात पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ उत्तम पुरुष। अपने वनवास के दौरान उन्होंने देश के सभी आदिवासी और दलितों को संगठित करने का कार्य किया और उनको जीवन जीने की शिक्षा दी। इस दौरान उन्होंने सादगीभरा जीवन जिया। उन्होंने देश के सभी संतों के आश्रमों को बर्बर लोगों के आतंक से बचाया। इसका उदाहरण सिर्फ रामायण में ही नहीं, देशभर में बिखरे पड़े साक्ष्यों में आसानी से मिल जाएगा।

दुनिया में भगवान राम पर लिखे गए सबसे ज्यादा ग्रंथ
रामायण को वा‍ल्मीकि ने भगवान राम के काल में ही लिखा था इसीलिए इस ग्रंथ को सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। रामचरित मानस को गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा जिनका जन्म संवत्‌ 1554 को हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधी भाषा में की। कितनी रामायण? एक लिस्ट तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण। कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलित हैं। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है।

भगवान राम के काल के महत्वपूर्ण लोग
गुरु वशिष्ठ और ब्रह्माजी की अनुशंसा पर ही प्रभु श्रीराम को विष्णु का अवतार घोषित किया गया था। राम के काल में उस वक्त विश्‍वामित्र से वशिष्ठ की अड़ी चलती रहती थी। उनके काल में ही भगवान परशुराम भी थे। उनके काल के ही एक महान ऋषि वाल्मीकि ने उन पर रामायण लिखी। भगवान राम की वंश परंपरा राम ने सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए संपाति, जटायु, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, मैन्द, द्विविद, जाम्बवंत, नल, नील, तार, अंगद, धूम्र, सुषेण, केसरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कंपन (गवाक्ष), दधिमुख, गवय और गन्धमादन आदि की सहायता ली। राम के काल में पाताल लोक का राजा था अहिरावण। अहिरावण राम और लक्ष्मण का अपहरण करके ले गया था। राम के काल में राजा जनक थे, जो उनके श्‍वसुर थे। जनक के गुरु थे ऋषि अष्टावक्र। जनक-अष्टावक्र संवाद को ‘महागीता’ के नाम से जाना जाता है। राम परिवार : दशरथ की 3 पत्नियां थीं- कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी। राम के 3 भाई थे- लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। राम कौशल्या के पुत्र थे। सुमित्रा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो पुत्र थे। कैकयी के पुत्र का नाम भरत था।

भगवान राम के काल के महत्वपूर्ण लोग
लक्ष्मण की पत्नी का नाम उर्मिला, शत्रुघ्न की पत्नी का नाम श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी का नाम मांडवी था। सीता और उर्मिला राजा जनक की पुत्रियां थीं और मांडवी और श्रुत‍कीर्ति कुशध्वज की पुत्रियां थीं। लक्ष्मण के अंगद तथा चंद्रकेतु नामक 2 पुत्र थे तो राम के लव और कुश। महत्वपूर्ण घटनाक्रम : गुरु वशिष्ठ से शिक्षा-दीक्षा लेना, विश्वामित्र के साथ वन में ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करना और राक्षसों का वध, राम स्वयंवर, शिव का धनुष तोड़ना, वनवास, केवट से मिलन, लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा (वज्रमणि) की नाक काटना, खर और दूषण का वध, लक्ष्मण द्वारा लक्ष्मण रेखा खींचना, स्वर्ण हिरण-मारीच का वध, सीताहरण, जटायु से मिलन। इसके अलावा कबन्ध का वध, शबरी से मिलन, हनुमानजी से मिलन, सुग्रीव से मिलन, दुंदुभि और बाली का वध, संपाति द्वारा सीता का पता बताना, अशोक वाटिका में हनुमान द्वारा सीता को राम की अंगूठी देना, हनुमान द्वारा लंकादहन, सेतु का निर्माण, लंका में रावण से युद्ध, लक्ष्मण का मूर्छित होना, हनुमान द्वारा संजीवनी लाना और रावण का वध, पुष्पक विमान से अयोध्या आगमन।

वनवास के दौरान प्रभु राम कहां-कहां रहे?
रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ, तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा, उनमें से 200 से अधिक घटनास्थलों की पहचान की गई है। जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की।

लव और कुश
भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया। राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला।

  • इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लवपुरी नगर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं। राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से
  • और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ। कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो लव और कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व। इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए।

मर्यादा पुरुषोत्तम थे राम… लेकिन चमत्कारों से दूर

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भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वे मर्यादा का पालन हमेशा करते थे। उनका जीवन बिल्कुल मानवीय ढंग से बीता बिना किसी चमत्कार के। आम आदमी की तरह वे मुश्किल में पड़ते हैं। उस समस्या से दो चार होते हैं, झलते हैं लेकिन चमत्कार नहीं करते। कृष्ण हर क्षण चमत्कार करते हैं। लेकिन राम उसी तरह जुझते हैं जैसे आज का आम आदमी। पत्नी का अपहरण हुआ तो उसे वापस पाने के लिए रणनीति बनाई। लंका पर चड़ाई की तो सेना ने एक-एक पत्थर जोड़कर पुल बनाया। रावण को किसी चमत्कारिक शक्ति से नहीं बल्कि समझदारी के साथ परास्त किया। राम कायदे कानूनों से बंधे हैं। जब धोबी ने सीता पर टिप्पणी की तो वे उन आरोप का निवारण चले आ रही कानूनी नियमों से करते हैं। जो आम जनता पर लागू होता था। वे चाहते तो नियम बदल सकते थे। पर उन्होंने नियम कानून का पालन किया। सीता का परित्याग किया।

प्रसिद्ध उद्धरण

श्रीराम नाम के दो अक्षरों में ‘रा’ तथा ‘म’ ताली की आवाज की तरह हैं, जो संदेह के पंछियों को हमसे दूर ले जाती हैं। ये हमें देवत्व शक्ति के प्रति विश्वास से ओत-प्रोत करते हैं। इस प्रकार वेदांत वैद्य जिस अनंत सच्चिदानंद तत्व में योगिवृंद रमण करते हैं उसी को परम ब्रह्म श्रीराम कहते हैं- गोस्वामी तुलसीदास

राम मर्यादा पुरूषोत्तम हैं। करूणानिधि हैं। मनुष्य के आदर्श और सुंदरतम अभिव्यक्ति हैं। वे मनुष्य ही नहीं, प्राणीमात्र के मित्र हैं, अभिरक्षक हैं और विश्वसनीय हैं। वे दूसरों के दुख से द्रवित होनेवाले दयानिधि हैं। उनके स्वयं के जीवन में भी इतने दुख-दर्द हैं, फिर भी वे सत्य और आदर्श की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं।

आदि कवि वाल्मीकि ने उनके संबंध में कहा है कि वे गाम्भीर्य में समुद्र के समान हैं।

समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्यण हिमवानिव।

राम के महान चरित्र-विषयक अनुभूति भी बराबर बदलती रही है। भवभूमि के राम ठीक वे नहीं हैं जो वाल्मीकि के राम हैं और तुलसी के राम वाल्मीकि तथा भवभूति, दोनों के रामों से भिन्न हैं -रामधारी सिंह दिनकर

राम आधारहीन सत्ता के ऐसे प्रत्युत्तर हैं कि उनकी याद इस जमाने में कुछ और सार्थक हो जाती है- प्रख्यात विद्वान पं. विद्यानिवास मिश्र

राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘यशोधरा’ में राम के आदर्शमय महान जीवन के विषय में कितना सहज व सरस लिखा है- राम। तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है॥

राम का उल्टा होता है म, अ, र अर्थात मार। मार बौद्ध धर्म का शब्द है। मार का अर्थ है- इंद्रियों के सुख में ही रत रहने वाला और दूसरा आंधी या तूफान। राम को छोड़कर जो व्यक्ति अन्य विषयों में मन को रमाता है, मार उसे वैसे ही गिरा देती है, जैसे सूखे वृक्षों को आंधियां।

कालिदास के महाकाव्य रघुवंश

  • रघुवंश में चाहे दिलीप हों अथवा रघु, गुरु के आज्ञापालक एवं धर्मपरायण है। महाराज दिलीप सर्वगुणसम्पन्न आदर्श राजा हैं।
  • रामचन्द्र का चित्रण कवि ने बड़ी सावधानी से किया है। उनके अन्दर दिलीप, रघु और अज के गुणों का समंवय है। रघुवंश के चतुर्दश सर्ग श्लोक में चित्रित, राजाराम के द्वारा परित्यक्ता जानकी का चित्र तथा उनका राम को भेजा गया सन्देश अत्यंत भावपूर्ण, गम्भीर तथा मर्मस्पर्शी है। राम के लिए ‘राजा’ शब्द का प्रयोग विशुद्ध तथा पवित्र चरित्र धर्मपत्नी के परित्याग के अनौचित्य का मार्मिक अभिव्यञ्जक है।
  • महाकवि ने राम को हरि या विष्णु का ही पर्यायवाची माना है। राम प्रजारक्षक राजा हैं। लोकाराधन के लिए तथा अपने कुल को निष्कलंक रखने के लिए उनके द्वारा अपनी प्राणोपमा धर्मपत्नी सीता का निर्वासन आदर्श पात्र-सृष्टि का सुन्दर दृष्टांत है।

कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय लोग भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।– “रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय”

‘मैनेजमेंट गुरु हैं भगवान श्रीराम’  कवि और लेखक डॉ. सुनील जोगी

‘राम प्रतीक हैं- साधारण जन; मानवीय स्वतंत्रता-स्वायत्तता; लोक-तांत्रिक मूल्यवत्ता एंव सामूहिकता को समर्पित व्यक्तित्व के’ कवि नरेश मेहता

‘कहते हैं जो जपता है राम का नाम राम जपते हैं उसका नाम’–शतायु

‘राम देश की एकता के प्रतीक हैं’- डॉ राममनोहर लोहिया

‘भगवान राम एक आदर्श सुपुत्र, आदर्श भाई, आदर्श सखा, आदर्श पति और आदर्श राष्ट्रभक्त हैं’-आचार्य गोविन्द बल्लभ जोशी

राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई- कबीर 

जनतंत्र में सत्ता के प्रति उच्च स्तर की निरासक्ति आवश्यक है। भगवान राम की तरह, जनतंत्र में राजनीतिज्ञ को, आह्वान मिलने पर सत्ता स्वीकार करने और क्षति की चिंता किए बिना उसका परित्याग कर देने के लिए भी सदा तैयार रहना चाहिए- पं. दीनदयाल उपाध्याय

भगवान राम  मानवमात्र बल आदर्श हैं, रामायण लोकतंत्र का आदि शाम है- सावरकर

डॉ. लोहिया कहते हैं “जब कभी महात्मा गांधी ने किसी का नाम लिया तो राम का ही क्यों लिया? कृष्ण और शिव का भी ले सकते थे। दरअसल राम देश की एकता के प्रतीक हैं। गांधी राम के जरिए  हिन्दुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर रखते थे।” वे उस राम राज्य के हिमायती थे। जहां लोकहित सर्वोपरि था।

विदेशों में राम के प्रमाण

  • संस्कृत के अलावा तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि को प्राचीनकाल में ही लिख दिया गया था।
  • भारत के अलावा विदेशी भाषा में भी रामायण की रचना हुई जिनमें कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम, मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रमुख हैं।

श्रीलंका- संस्कृत और पालि साहित्य का प्राचीनकाल से ही श्रीलंका से गहरा संबंध रहा है। रामायण समेत अन्य कई भारतीय महाकाव्यों के आधार पर रचित जानकी हरण के श्रीलंकाई रचनाकार और वहां के राजा, कुमार दास को कालिदास के घनिष्ठ मित्र की संज्ञा दी जाती है। इतना ही नहीं सिंघली भाषा में लिखी गई मलेराज की कथा भी राम के जीवन से ही जुड़ी हुई है।

बर्मा (म्यंमार)- शुरुआती दौर में बर्मा को ब्रह्मादेश के नाम से जाना जाता था। बर्मा की प्राचीनतम रचना रामवत्थु श्री राम के जीवन से ही प्रभावित है। इसके अलावा लाओस में भी रामकथा के आधार पर कई रचनाओं का विकास हुआ, जिनमें फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई आदि प्रमुख हैं।

इंडोनेशिया और मलेशिया- प्रारंभिक काल में इंडोनेशिया और मलेशिया में पहले हिन्दू धर्म के लोग ही रहा करते थे लेकिन फिलिपींस के इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बाद वहां धार्मिक हिंसा ने जन्म लिया, जिसकी वजह से समस्त देश के लोगों ने इस्लाम को अपना लिया। इसलिए जिस तरह फिलिपींस में रामायण का एक अलग ही स्वरूप विद्यमान है कुछ उसी तरह इंडोनेशिया और जावा की रामायण भी उसी से मिलती-जुलती है।

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महाशिवरात्रि विशेष… ‘शिव’ का रहस्य

कीबोर्ड के पत्रकार

Lord-Shiva

देवों के देव ‘महादेव’…शिव को महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है| हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी(शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं। हिंदू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं।

अधिक्तर चित्रों में शिव योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है | इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व…

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