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यात्रा ‘हरि के द्वार’ हरिद्वार की

काफी समय से परिवार के साथ हरिद्वार जाने की सोच रहा था। लेकिन ऐसे जाना पड़ेगा, सोचा नहीं था। 9 जनवरी को पिता जी का स्वर्गवास हो गया था परिवारजनों ने कहा की माता जी को चालीस दिनों के बाद गंगा जी में स्नान कराना जरूरी है। सो चालीस दिन निकलते-निकलते तीन महीने निकल गए। अब आखिरकार इस रविवार को मौका मिल ही गया। ‘हर की पौड़ी’ यानी हरिद्वार जाने का। पूरे 10 साल बाद हरिद्वार जाना हुआ। और वो भी सिर्फ एक दिन में अप-डाउन। काफी हैक्टिक था। मेरे घर(दिल्ली) से हरिद्वार कोई 250 किमी यानी आना-जाना 500 किमी है। रविवार अपनी कार में ‘पूरे परिवार’ के साथ निकल पड़ा। पिता जी की सीट खाली थी। आज तक पिता जी के बगैर कहीं नहीं गए थे। पहली बार जा रहे थे, बिना उनके।

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कहने को तो हम जा रहे थे उनके बिना। लेकिन वास्तव में हम लोग वहां जा रहे थे उन्हें देखने। हरिद्वार यानि ‘हरि का द्वार’। कहते हैं इंसान मरने के बाद ईश्वर के घर जाता है। और हरिद्वार ईश्वर के घर जाने की पहली सीढ़ी। सो हम उन्हें पहली सीढ़ी से खड़े हो कर देखने जा रहे थे कि वे वहां कैसे हैं। पौराणिक मान्यता है कि हरिद्वार में ही भगवान विष्णु ने अपने धाम जाते समय एक पत्थर पर अपने पग-चिन्ह छोड़े है जो हर की पौडी में एक उपरी दीवार पर स्थापित है, जहां हर समय पवित्र गंगाजी इन्हें छूती रहतीं हैं।

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कुम्भ- हरिद्वार हिन्दुओ का सबसे बड़े तीर्थ स्थलों में से एक है। गंगा नदी, माता जी की ‘गंगा मईया’, बच्चों के लिए ‘रिवर’, पत्नी के लिए ‘आस्था’ और मेरे लिए ‘परम्परा’ पहाड़ों से उतरकर हरिद्वार में ही मैदानों में प्रवेश करती हैं। इसलिए हरिद्वार का एक नाम गंगा द्वार भी हैं। हरिद्वार कुम्भ कि भी नगरी हैं। हर बाहर साल बाद यहां पर कुम्भ मेले का आयोजन होता हैं। जिसमे पूरे भारतवर्ष से साधु संत, सन्यासी, तीर्थ यात्री आते हैं और महीने भर चलने वाले इस आयोजन में, अलग अलग तिथियों में गंगा जी में स्नान करते हैं। कहा जाता है कि देवासुर संग्राम में जब असुर अमृत लेकर के भाग रहे थे, तब अमृत कि बूंदे जहां जहां गिरी थी, वहीं पर अमृत कुंड बन गए थे। उन्हीं स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन होता हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार देवताओं के बारह दिन अर्थात मनुष्यों के बारह वर्ष माने गए हैं इसीलिए कुंभ का आयोजन भी प्रत्येक बारह वर्ष में ही होता है। हरकी पौड़ी पर भी अमृत कि बूंदे गिरी थी। ये अमृत कुंड हर कि पौड़ी पर स्थित हैं, इसीलिए हर की पौड़ी पर स्नान करने कि महत्ता हैं। कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।

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मायापुरी- भारत के पौराणिक ग्रंथों और उपनिषदों में हरिद्वार को मायापुरी कहा गया है। हरिद्वार के बीचोंबीच स्थित है पौराणिक माया देवी मंदिर है। हरिद्वार को पंचपुरी भी कहा गया है, क्योंकि यहां पर कनखल, हरिद्वार, ज्वालापुर, भीमगोड़ा और मायापुर नामक पांच प्राचीन पुरियां हैं। गरुड़ पुराण में भारत की मोक्षदायिनी सप्तपुरियों का उल्लेख इस प्रकार आता है-अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥

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भोलेनाथ कि नगरी- पंचपुरी हरिद्वार के केंद्रीय स्थान को मायापुरी इसलिए कहा गया है, क्योंकि यहां की अधिष्ठात्री देवी भगवती मायादेवी हैं। हरिद्वार को भोले कि नगरी भी कहा जाता है। यहां से दक्षिण दिशा में कनखल में भगवान शिव दक्षेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं और यहां उनके वाम पाश्र्व में उनकी स्वरूप-भूता पराशक्ति के रूप में भगवती मायादेवी का स्थान है। शिव की पत्नी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने जब कनखल में ‘वृहस्पतिस्व’ नामक यज्ञ में अपने जामाता शिव को न बुला कर और उस यज्ञ में उनका भाग न रख कर उनका अपमान किया था, तब महामाया सती उस स्थान के उत्तर दिशा में, जहां वर्तमान में यह मंदिर स्थित है, आकर बैठ गई थीं और यहीं उन्होंने योगक्रियाओं द्वारा अपने शरीर का त्याग किया था। भगवान शिव के यहां आकर उस शरीर को उठा ले जाने तक वह यहीं पर रहा। बाद में विष्णु भगवान ने अपने चक्र से उनके शरीर के 51 हिस्से किए, जो जहां-जहां गिरे वहां इक्यावन शक्तिपीठ स्थापित हुए। महामाया सती का शरीर क्षत-विक्षत हुए बिना जिस स्थान पर अखंड रूप में रहा, यह वही  मायापुरी (हरिद्वार) का मायादेवी मंदिर है। हालांकि कुछ एक जगहों पर यह उल्लेख भी आता है कि यहां पर सती की नाभि गिरी थी। महामाया सती के इस स्थान और कनखल स्थित दक्षेश्वर महादेव के स्थान का भ्रमण हरिद्वार की तीर्थयात्रा में आवश्यक बताया गया है।

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कपिल ऋषि का आश्रम भी यहाँ स्थित था, जिससे इसे इसका प्राचीन नाम कपिल या कपिल्स्थान मिला। पौराणिक कथाओं के अनुसार भागीरथ जो सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र (श्रीराम के एक पूर्वज) थे, गंगाजी को सतयुग में वर्षों की तपस्या के पश्चात् अपने साठ हजार पूर्वजों के उद्धार और कपिल ऋषि के श्राप से मुक्त करने के लिए के लिए पृथ्वी पर लाये। ये एक ऐसी परंपरा है जिसे करोडों हिंदू आज भी निभाते है, जो अपने पूर्वजों के उद्धार की आशा में उनकी अस्थियां लाते हैं और गंगाजी में विसर्जित कर देते हैं।

हरिद्वार में पंडो के पास पूर्वजो कि वंशावली… प्राचीन रिवाजों के अनुसार हिन्दू परिवारों की पिछली कई पीढियों की विस्तृत वंशावलियां हिन्दू ब्राह्मण पंडितों जिन्हें पंडा भी कहा जाता है द्वारा हरिद्वार में हस्त लिखित दस्तावेज ‘पंजिका’ हैं। सकड़ों सालों से यह हस्त लिखित दस्तावेज एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किए जाते हैं। जिलों, गांवों के आधार पर यह दस्तावेज वर्गीकृत किए गए हैं। प्रत्येक जिले की पंजिका का विशिष्ट पंडित होता है। यहां तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गांव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहां हैं। कई स्थितियों में उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम और ईसाई भी हैं। किसी के लिए किसी की अपितु सात वंशों की जानकारी पंडों के पास रखी इन वंशावली पंजिकाओं से लेना असामान्य नहीं है। हरिद्वार जाने वाले कई लोग हक्के-बक्के रह जाते हैं जब वहां के पंडित उनसे उनके नितांत अपने वंश-वृक्ष को नवीनीकृत कराने को कहते हैं।

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बेटे की नजर से- हम लोग ग्यारह बजे हरिद्वार पहुंच चुके थे। गाड़ी से कदम बाहर निकलते ही एक अलग अनुभूति। हम हर की पौड़ी के लिए पैदल ही निकल पड़े। रास्ते में चारों ओर से आ रही भजनों की आवाज, मंदिर के घंटों का शोर और मंत्रों का उच्चारण कानों में पड़ने लगा। हर की पौड़ी पहुंचते ही विशेष प्रकार की अनुभूति का अहसास हो रहा था। चारों ओर गंगा तेज वेग से बह रही थी। थोड़ी देर सीढ़ियों पर ही विश्राम किया। उसके बाद स्नान के लिए चल दिए। छोटे बेटे को अभी समझ नहीं है लेकिन बड़ा समझदार हो रहा है। उसने मुझ से कहा पापा रिवर में देखो क्या बह रहा है? गंगा की जल धारा में पोलीथिन, फूल माला, आटा, कपड़े जाने क्या क्या लोग डाल रहे थे? बड़े बेटे ने कहा पापा ये लोग रिवर गंदा कर रहे हैं। हम कैसे नहाऐंगे? इनको डांटों। मैं सन्न खड़ा था मेरे पास उसके सवालों का कोई जवाब नहीं था। आस्था तुरन्त गुस्से में बदल गई। मैंने घाट की सफाई कर रहे एक कर्मचारी से कहा आप इन लोगों को मना क्यों नहीं करते? वो बड़े कटाक्ष भरे अंदाज में बोला साहब आप जैसे ही पढ़े-लिखे लोग है। सब जानते हैं लेकिन फिर भी कर रहे हैं। क्या करें पिछले तीस सालों से देख रहा हूं?

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बहराल इसके बावजूद हम स्नान के लिए चल दिए। पहले माता जी को स्नान करवाया उसके बाद हम सबने किया। घारा में कदम रखते ही रोम रोम प्रसन्न हो गया। गुस्सा शांत हो फिर आस्था में बदल गया। एक एक करके सात बार डूबकी लगाई। बच्चों ने जल में खूब खेला। काफी देर तक स्नान करते रहे। स्नान के बाद सीढ़ियों पर बैठ धूप का आनंद लिया। लेकिन थोड़ी ही देर में धूप चुभने लगी। सोचा अब चलना चाहिए काफी देर हो गई। वापस दिल्ली भी तो जाना है। लेकिन मन वहां से जाने को कर ही नहीं रहा था। दिल कर रहा था शाम की आरती देखने के बाद ही जाएं। पर अगले दिन ऑफिस भी जाना है, ऐसा सोच निकल पड़े।

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मनसा देवी- हर की पौड़ी से कुछ दूर मनसा देवी का मंदिर है। मंदिर करीब 25 मिनट दूर है। मनसा देवी जाने के दो रास्ते हैं। एक पैदल, दूसरा ट्रॉली से। यह मंदिर बिल्व पर्वत के शिखर पर स्थित हैं। मान्यता है कि मनसा देवी अपने भक्तो के मन की सभी इच्छाओ को पूरा करती हैं। यहां पर एक वृक्ष पर मनौती का धागा भी बांधा जाता हैं। लेकिन विडम्बना देखिए जिस पर्वत पर माता का मंदिर है। उसकी हालत आज बेहद खराब है। इंसान ने चारों ओर से पड़ाह को ऐसे घेर लिया है कि वृक्षों की संख्या लगातार कम हो रही है। और पहाड़ सरक रहा है। मंदिर की नींव को भी खतरा बताया जा रहा है। फिलहाल सरकार का इस ओर घ्यान गया है। अब जगह-जगह वृक्षारोपण किए जा रहे हैं।

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प्रदूषण- गंगा मईया का भी यही हाल है। हरिद्वार पहुंचते पहुंचते गंगा बिल्कुल शांत और बहुत ज्यादा फैली हुई दिखती है जिसे निहारना एक अलग ही अहसास देता है। लेकिन इंसानों ने इस जीवनदायनी नदी जिसे मां का दर्जा देते हैं को इस कदर गंदा कर दिया है कि शहर का कचरा, नाले सब गंगा में गिरते हैं। गंगा का पानी यूं ही नहीं पवित्र माना जाता। इसका वैज्ञानिक आधार है। इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। 2510 किमी के अपने सफर में गंगा के तटों पर तकरीब 29 बड़े, 23 मंझोले और 48 महानगर, नगर और कस्बे पड़ते हैं। यहां हर जगह मैली हो रही है गंगा और सरकार सिर्फ मंत्रणा कर रही हैं कमेटियां बिठा रही है। 1986 में गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए एक्शन प्लान शुरु हुआ। 1800 करोड़ पानी की तरह बहाया गया लेकिन 25 साल बाद भी रहा वही ढाक के तीन पात। गंगा जस की तस मैली। हाल ही में वैज्ञानिकों ने नदी में कुछ प्रयोग किए हैं जो बताते हैं कि हरिद्वार, ऋषिकेश और गंगोत्री के गंगा जल में रोगाणुओं को मारने की क्षमता बरकरार है। मगर कानपुर और इलाहाबाद में गंगा के पानी में जानलेवा बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु जीवित हैं। ऐसा ही चलता रहा तो वह समय दूर नहीं जब बीमारी पैदा करने वाले यह जीवाणु हरिद्वार, ऋषिकेश तक पहुंच जाएं। और हमारे बच्चे जब बड़े हो तो गंगा में स्नान करने से भी कतराएं। मन में यह दुविधा लिए मैं वापस घर को चल दिया। न जाने अगली बार किस रुप में गंगा के दर्शन हों?

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