मेरे बारे में

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंज़िलें मिली..
कम्बख़्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं…

पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा… ‘लगना’… यह लगना ही सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह है जीवन का! खैर, अठारह साल हो गए एक ‘बड़ा’ पत्रकार बनने की कोशिश करते! बड़ा तो नहीं बन पाया हां एक ‘आम’… वो ‘आप’ वाला ख़ास ‘आम’ नहीं… मज़बूरी वाला आम ‘आम’। शब्दों में कुछ उल्लझन है लेकिन ‘आम विद्वान’ समझ ही गए होंगे।

देश में पत्रकारिता के सर्वोत्तम संस्थान [Indian Institute of Mass Communication (भारतीय जन संचार संस्थान)] से 2003 में पत्रकारिता की। पत्रकारिता जगत में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर शोध (आम भाषा में Ph.D) कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा (UPSC) की तैयारी में रात-दिन जुटा था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा? शायद हो भी जाता! तभी भारतीय जन संचार संस्थान की परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। सिविल्स की राह छोड़, पत्रकारिता की राह पर निकल पड़ा।

खाटी “दिल्ली वाला” हूं। सो थोड़ा दिल भी है तो थोड़ा जज़्बात भी। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। ज़िन्दगी ख़ूबसूरत थी। तभी कोरोना नाम का तूफ़ान आया और इस ‘परिंदे का घोसला’ उजाड़ बढ़ चला। राज कपूर साहब की एक फ़िल्म का संवाद है ‘शो मस्ट गो ऑन’ यानी हर तकलीफ़ झेलने के बाद भी अपनी रफ़्तार से चलती रहे वही ‘शो’ यानी ‘ज़िन्दगी’ है। जीवन के तमाम झंझावातों को झेलता मैं एक आम ‘शोमैन’।

अठारह सालों से नोएडा के बड़े मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिका हूं? आप लोगों को लगेगा यह मेरी बड़ी उपलब्धि है। नहीं! ऐसा बिल्कुल नहीं है। हक़ीक़त में यह मेरी “मजबूरी” है। और कुछ आता ही नहीं (अर्थात् कोई विशेष योग्यता यानी टेक्निकल नॉलेज नहीं है)। या तो सरकारी अफ़सर बनते, नहीं बने तो पत्रकार। 90 के दशक के सिविल सर्विस अभ्यर्थियों में से 90 फ़ीसद आपको सरकारी महकमों में दिखेंगे या ‘पत्रकार’। दो दशक पहले पेशे को लेकर मार्केट में इतनी वैरायटी नहीं थी, जितनी आज है। सच्चाई तो यह भी है कि उतनी सोच ही नहीं थी। आर्ट्स स्ट्रीम का पढ़ने-लिखने वाला, एक अध्यापक का मेधावी सुपुत्र हूं। सो सरकारी अफ़सर बनता या नहीं बन पाया तो पत्रकार बन गया। 

मीडिया जगत में इतने सालों से टिका हूं तो उसका एक बड़ा और दूसरा पहलू भी है। शुरु में ही मुझे मेरे वरिष्ठों ने सीखा दिया गया था, हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा, तो कभी खट्टा, तो कभी नमकीन, कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है।

सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन अठारह सालों के दरम्यां कई ख़बरिया चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़-24 और टीवी-9) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का ‘सिपाही’ तो नहीं बन पाया, हां कीबोर्ड पर बहुत तेजी से ‘खट’ ‘खट’ कर लेता हूं। हां खटखट करते हुए थोड़ा दिमाग पर जोर भी लगा लेता हूं। वो यह परिचय लेख पढ़कर लग ही रहा होगा आपको। अब इस कंप्यूटर युग में ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ कहलाने से गुरेज़ भी नहीं है। ख़बरों की लत ऐसी लग गई कि अब छोड़ना मुश्किल है। यह लत किसी ‘मादक पदार्थ’ की लत से कम नहीं है। अब लत लगे भी तो क्यों न लगे? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है।

ख़बरों के अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे मित्र बनना (विशेष नोट: उनमें मित्राणी भी शामिल हैं)। उनके साथ खाना-पीना और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन समझने-समझाने वाले मित्र बहुत मुश्किल से मिलते हैं।

ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है, बीच-बीच में ब्लॉगिंग का ‘भूत’ चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और विभिन्न विषयों पर जानकारी उपलब्ध कराने में ज्यादा मजा आता है। किसी भी मित्र को शोध में मदद की जरूरत हो… तो जरूर बताएं। बाकि सब कुशल-मंगल 🙂🙏

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