Posted in Bollywood, Culture, Election, News, Personality, Religion, Uncategorized, Yatra

भारत-चीन संबंध: प्राचीन काल से लेकर वर्तमान संदर्भ तक…

डॉ. संदीप कोहली… कीबोर्ड के पत्रकारIMP

भारत और चीन की गणना विश्व की पांच महानतम सभ्यताओं (सिन्धु घाटी, मेसोपोटामिया, मिस्र, माया और चीनी सभ्यता) में की जाती हैं। दोनों पड़ोसी राष्ट्र हैं। अपने-अपने लंबे इतिहास में दोनों राष्ट्रों की जनता के बीच दुर्गम रास्तों के उपरान्त भी यात्रा का क्रम चलता रहा। दोनों ही राष्ट्रों के लोग एक-दूसरे से अनेक बातें सीखते आए हैं। इस पारस्परिक सम्बन्ध ने दोनों राष्ट्रों के बीच संस्कृति के विकास में महान योगदान ही नहीं दिया बल्कि विश्व संस्कृति के संवर्धन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राचीन काल से लेकर आज तक भारत और चीन की जनता पारस्परिक आदान-प्रदान के अटूट सूत्र में बंधी रही है। महाभारत काल से स्थापित यह सम्बन्ध बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के बाद खूब फला-फूला। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ जिसने भारत-चीन संबंधों को अत्यंत कटुतापूर्ण बना दिया। आइए जानते हैं-

भारतीय वाङ्मय (साहित्य) में चीन

भारत और चीन में प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्ध रहे हैं। भारत से बौद्ध धर्म का प्रचार चीन की भूमि पर हुआ है। चीन के लोगों ने प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भारत के विश्वविद्यालयों अर्थात् नालन्दा विश्वविद्यालय एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय को चुना था भारत की प्राचीन पुस्तकों में भी चीन का उल्लेख मिलता है-

भारत और चीन के सम्बन्ध प्राचीन काल से हैं। यद्यपि चीन शब्द का प्रथम अभिलिखित उल्लेख 1555 ई. से किया जाता है, किन्तु ऐसा माना जाता है कि चीन शब्द की उत्पत्ति प्राचीनतम भारतीय भाषा संस्कृत के शब्द ‘सिना’ (cina) से हुई है।

  • Sanskrit word meaning China, was transcribed into various forms including 支那 (Zhīnà), 芝那 (Zhīnà), 脂那 (Zhīnà) and 至那 (Zhìnà). Thus, the term Shina was initially created as a transliteration of Cina, and this term was in turn brought to Japan with the spread of Chinese Buddhism. Traditional etymology holds that the Sanskrit name, like Middle Persian Čīn and Latin Sina, derives from the Qin state or dynasty which ruled China in 221–206 BC, and so Shina is a return of Qin to Chinese in a different form.

भारत के महाकाव्य ‘महाभारत’ में इस शब्द का प्रयोग- युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ करने के दौरान- अर्जुन का युद्ध प्राग्ज्योतिष पुर (वर्तमान असम) के नरेश राजा भगदत्त से हुआ। भगदत्त का साथ किरात, ‘सिना’ (cina) तथा समुद्र के टापुओं में रहने वाले योद्धाओं ने दिया था। इस कथन के अनुसार चीनियों ने राजा भगदत्त की सहायता की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ सम्पन्न के दौरान चीनी लोग भी उन्हें भेंट देने आए थे। भीष्मपर्व में भी लिखा है कि भगदत्त की सेना किरात और “पीले रंग के” Cinas से युक्त है- महाभारत: सभा पर्व: षड्विंश अध्याय: श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

  • The existence of the word Cīna in ancient Hindu texts was noted by the German Sanskrit scholar Hermann Jacobi who pointed out its use in the Book-2 of Arthashastra with reference to silk and woven cloth produced by the country of Cīna, although textual analysis suggests that Book-2 may not have been written long before 150 AD. The word is also found in other Sanskrit texts such as the Mahābhārata and the Laws of Manu.

कई प्राचीन धर्मग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, मनुस्मृति आदि में चीन का जिक्र ‘सिना’ के रूप में आता है।

मनुस्मृति के अनुसार उपनयन आदि क्रियाओं के लोप हो जाने के कारण पौंड्रक, औद्र, द्रविड़, कंबोज, यवन, शक, पारद, पह्नव चीन, किरात, आदि क्षत्रिय जातियां संसार में वृषलत्व को प्राप्त हो गईं। जो क्षत्रिय लोग वैदिक क्रियाओं से उदासीन हो जाते थे , उन्हें धार्मिक दृष्टि से वृषलत्व प्राप्त होता था। (मनुस्मृति 43-44)

श्रीमद्भागवत् पुराण के अनुसार पृथ्वी के सात द्वीपों का उल्लेख मिलता है। उन सातों द्वीपों में से एक है जम्बू द्वीप। पुराणों के अनुसार जम्बू द्वीप के नौ देश इस प्रकार बताए जाते हैं: इलावृत्त (पामीर), रम्यक (तुर्किस्तान), कुरु (रूस), हरिवर्ष (अफगानिस्तान), किंपुरुष (तिब्बत), भारतवर्ष, भद्राश्व (चीन) तथा केतुमाल (यूरोप)।

श्रीमद्भागवत् पुराण के पांचवें स्कन्ध के अनुसार मेरू पर्वत पर गिरने के पश्चात आकाशगंगा की सीता धारा भद्राश्व वर्ष (चीन) की गंगा कही गई है। इसके संबंध में लिखा गया है:

”सीता तु ब्रह्मसदनात् केशवाचलादि गिराशिखरेम्योडधोडध: प्रसवन्ती

गन्धमादनमूर्द्धसु पतित्वाडन्तरेण भ्रदाश्वं वर्ष प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्र अभिप्रविशति।

महाभारत में चीनांशुक (रेशमी वस्त्र) शब्द का उल्लेख है। महाभारत, सभापर्व में कीटज तथा पट्टज कपड़े का चीन के संबंध में उल्लेख है। इस प्रकार का वस्त्र पश्चिमोत्तर प्रदेशों के अनेक निवासी (शक, तुषार, कंक, रोमश आदि) युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भेंट स्वरूप लाए थे-

‘प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं वाल्ही चीनसमुद्भवम् ओर्ण च रांकवंचैव कीटजं पट्टजं तथा।’

महाभारत, सभापर्व में चीनियों का शकों के साथ उल्लेख है। ये युधिष्ठिर की राज्य सभा में भेंट लेकर उपस्थित हुए थे-

‘चीनाछकांस्तथा चौड्रान् बर्वरान् वनवासिन:, वार्ष्णेयान् हारहूणांश्च कृष्णान् हैमवतांस्तथा।’

भीष्मपर्व में विजातीयों की नामसूची में चीन के निवासियों का भी उल्लेख है-

‘उत्तराश्चापरम्लेच्छा: क्रूरा भरतसत्तम यवनश्चीनकाम्बोजा दारुणाम्लेच्छजातय:।

सकृद्ग्रहा कुलत्थाश्चहूणा: पारसिकै: सह, तथैव रमणाश्चीनास्तथैवदशमाल।।

चिनांशुक का उल्लेख कालिदास के साहित्य में भी मिलता है। कालिदास की काव्य-कामिनियाँ ‘चीनांशुक’, बढ़िया रेशमी वस्त्रों का परिधान पहनकर तितलियों-सी बनी रहती थीं। कालिदास ने ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ में ‘चीनांशुक’ का वर्णन बड़े काव्यात्मक प्रसंग में किया है-

‘गच्छति पुर: शरीरं धावति पश्चादसंस्थितश्चेत: चीनांशुकमिवकेतो: प्रतिवातं नीयमानस्य।’

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में चीन से आने वाले कपड़ों को चीन पट्ट (चिनांशुक) कहा है।

‘हर्षचरित’ के प्रथमोच्छवास में बाणभट्ट ने शोण के पवित्र और तरंगित बालुकामय तट को चीन के बने रेशमी कपड़े के समान कोमल बताया है।

तीसरी सदी ईसापूर्व के बाद भारत-चीन सम्बन्ध

बौद्ध साहित्य के विभिन्न ग्रन्थों का अन्वेषण करने वाले विद्वानों में डॉ. बागची, श्री पणिक्कर और डॉ. मजूमदार आदि विद्वानों के मतानुसार, चीन और भारत का सम्बन्ध बड़ा पुराना है। चीनी अनुश्रुतियों से प्रकट होता है कि चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार का प्रयत्न ई. पू. छठी शताब्दी में किया गया था, परन्तु उसे सफलता न मिली। चीन में बौद्ध धर्म सरकारी तौर पर द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में प्रारम्भ हुआ था।

चीनी विद्वान लेखकों के अनुसार चीन और भारत के बीच द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से ही चीन और दक्षिणी भारत के सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे। चीनी लेखक पानकाऊ के अनुसार कांची नरेशों ने हानवंश की राजसभा में अपने राजदूत भेजे थे। चीनी सम्राट वाँगकिंग ने तो प्रथम शताब्दी में कांचीनरेश के लिए बहुमूल्य उपहार भी भेजे थे ।

भारत और चीन का अतीतकालीन तुलनात्मक अध्ययन करते समय एक प्रमुख नाम उभरता है- वह है ‘कुमारजीव’। कुमारजीव भारतीय बौद्ध भिक्षु थे, जिसका जन्म शिनच्याङ के खूछा नाम के एक स्थान पर हुआ था। वह उत्तरकालीन छिन राज्य काल (364-417 ई) में छाङआन (वर्तमान चीन के शेनशी प्रांत के शीआन के उत्तर-पश्चिम में) आया था। जहां उसने अपनी प्रवास अवधि में लगभग 300 बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद किया था । भारत तथा चीन के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान के विकास में कुमारजीव का योगदान उल्लेखनीय है। यह इतिहास का वह काल था जब भारतीय कला, चिकित्सा, स्वरविज्ञान का चीन में प्रवेश प्रारम्भ हुआ।

चीन जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों और विद्वानों में कश्यप मातंग और धर्मरत्न के नामों का उल्लेख किया है। ये विद्यार्थी और विद्वान 65 ईसवी में चीन गए थे। चौथी शताब्दी में कुमारजीव की चीन- यात्रा का उल्लेख मिलता है। 670 ईसवी में एक अन्य चीनी तीर्थयात्री, इत्सिंग नालन्दा आए और उन्होंने केवल 3000 भिक्षुओं के रहने का उल्लेख किया।

मात्वानलिन (Ma-twan-lin) चीनी इतिहासकार के अनुसार छठी शताब्दी में चीन और भारतवर्ष के मध्य व्यापारिक आदान-प्रदान हुआ करता था जिसके अन्तर्गत भारतवर्ष हर साल प्रचुर मात्रा में मोती, शंख तथा हाथी दाँत की वस्तुएँ चीन को भेजा करता था। आठवीं शताब्दी से लेकर बारहवी शताब्दी तक चोलवंश के शासकों ने भी चीन के साथ अपने सम्बन्ध बनाये रखे थे।

सम्राट हर्षवर्धन ने अपना एक राजदूत तांग राजवंश के समय चीन भेजा था। इसके बदले में तांग राजवंश के सम्राट तांग ताइजॉन्ग ने 648 ईसवीं में एक चीनी राजदूत वाँग-ह्यान-त्से (Wang-hiuen-tse) को भारत भेजा। लेकिन 647 ईसवीं में सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई।

649 ईसवीं- चीन ने पहली बार भारत पर आक्रमण- हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद अवसर पाकर हर्ष के मंत्री अर्जुन (अरुणाश्व) ने कन्नौज के सिंहासन पर अधिकार जमा लिया। वाँग-ह्यान-त्से अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ कन्नौज आए तो अर्जुन ने उनका विरोध किया और वाँग के साथ आए रक्षकों की या तो हत्या कर दी या उन्हें बंदी बना लिया गया। दूत-मंडल की की सम्पत्ति और भारतीय राजाओं द्वारा उसे दिए गए उपहार को लूट लिया गया। लेकिन वाँग किसी तरह अपनी जान बचा कर नेपाल भाग गया। तिब्बत में उस समय स्त्राँग-त्सान गैम्पो का राज्य था। उसका विवाह एक चीनी राजकुमारी से हुआ था। उसने वाँग-ह्यान-त्से को 1,200 चुने हुए सैनिक दिए और उनके अतिरिक्त वाँग-ह्यान-त्से नेपाल से 7,000 अश्वारोही प्राप्त करने में भी सफल हो गया।  कामरूप के राजा भास्करवर्मा ने भी उसकी सहायता की और उसने तिरहुत के मुख्य नगर पर आक्रमण कर दिया। वहाँ की सेना के 3,000 सैनिकों की हत्या कर दी गई और 10,000 व्यक्ति नदी में डूब गये। अर्जुन परास्त हुआ और बंदी बना लिया गया। वाँग-ह्यान-त्से ने 1,000 बंदियों का वध कर दिया और संपूर्ण राजवंश को बंदी बना लिया। उसने 12,000 व्यक्ति बंदी बनाए और 13,000 से अधिक घोङे, गाएँ और बैल आदि भी प्राप्त किये। इस युद्ध में 580 प्राचीर-नगरों ने समर्पण कर दिया। वाँग-ह्यान-त्से अर्जुन को बंदी बना कर अपने साथ चीन ले गया।

पल्लव सम्राट नरेश नरसिंह वर्मन ने भी एक दूत 720 ईसवी में चीन भेजा था। इसके बदले चीनी दूत पल्लव राजसभा में आया था। भारत और चीन के मध्य इस प्रकार के राजनीतिक और व्यापारिक सम्बन्ध 14वीं शताब्दी तक चलते रहे। ये सम्बन्ध तब समाप्त हो गए जब श्रीविजय आदि भारतीय उपनिवेशों पर मुसलमानों का आधिपत्य हो गया।

जहां एक ओर फाह्यान (Fa-hien), ह्वेनसांग (Hiuen-Tsang) तथा इत्सिंग (I-Tsing) की भारत यात्राओं से दोनों के सांस्कृतिक संबन्धों को एक ठोस आधार मिला, वहीं 65 ई0 से भारतीय बौद्ध भिक्षुओं द्वारा प्रारम्भ सतत् धर्म यात्राओं से दोनों राष्ट्रों के मध्य धार्मिक,सामाजिक व राजनैतिक संबन्धों का आधार और मधुर व सुदृढ़ हुआ।’

हिमालय के पार स्थित तिब्बत की सुदृढ़, अर्थव्यवस्था हेतु जहांभारत-तिब्बत व्यापारिक संबन्धों की निरंतरता अपरिहार्य थी वहीं तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत व मानसरोवर जैसे पवित्र तीर्थ स्थल हिंदुओं के लिए श्रद्धास्थल के रूप में भारत व तिब्बत को मैत्रीसूत्र में बांधे रखने में प्रमुख थे। इसी प्रकार भारत स्थित सारनाथ, गया व साची जैसे प्रमुख बौद्ध स्थल तिब्बती तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करते रहे हैं।

भारत आए तीन प्रमुख चीनी यात्रीPicture1

चीनी राजवंश और भारत चीन संबंध

e71ab90b143ea8d51299851c0803a3a1

 चिन राजवंश (Qin dynasty) (ई.पू. 214-206)

चीन का प्रथम सम्राट चिन-शि-हुआंग (Qin Shi Huang) ने सबसे पहले चीन के लोगों एकीकृत करने का काम किया। चिन वंश शान्शी प्रांत से उभर कर निकला और इसका नाम भी उसी प्रांत का परिवर्तित रूप है। यह प्रान्त चीन के केन्द्रीय भाग में स्थित है। यह पीली नदी (ह्वांग हो) के मध्य भाग में आने वाले लोएस पठार और चिनलिंग पहाड़ों तक फैला हुआ है। कुछ विद्वानों का मानना है कि चीन शब्द छिन राजवंश के ‘छिन’ शब्द का ध्वन्यानुवाद है। इस तरह चीन और भारत के संबन्धों के इतिहास का आरंभ कम-से-कम छिन वंश और हान वंश (ईसा पूर्व पहली-दूसरी शताब्दी) के पहले हुआ था। दोनों राष्ट्र की मैत्री का इतिहास दो हजार से अधिक पुराना है। हालांकि कुछ विद्वान इस तथ्य से सहमत नहीं हैं।

हान राजवंश (Han dynasty, 206BC–220AD)

हान वंश के समय चीन और भारत के मध्य बड़े पैमाने पर प्रमाणित रूप से आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरूआत हुई- During the Regime of Emperor Wu of Han of the Han dynasty (ruling from 141–87 BC)- Zhang Qian, who served as an imperial envoy to the world outside of China in the late 2nd century BC during the Han dynasty. He was one of the first official diplomats to bring back valuable information about Central Asia, including the Greco-Bactrian remains of the Macedonian Empire as well as the Parthian Empire, to the Han dynasty imperial court, then ruled by Emperor Wu of Han.

Zhang Qian also reports about the existence of India south-east of Bactria. The name Shendu (身毒) comes from the Sanskrit word “Sindhu”, meaning the Indus river of Pakistan. Sindh was one of the richest regions of India at the time, ruled by Indo-Greek Kingdoms, which explains the reported cultural similarity between Bactria and India:

  • “Southeast of Daxia is the kingdom of Shendu (Sindh)… Shendu, they told me, lies several thousand li south-east of Daxia (Bactria). The people cultivate the land and live much like the people of Daxia. The region is said to be hot and damp. The inhabitants ride elephants when they go in battle. The kingdom is situated on a great river (Indus)” (Shiji, 123, Zhang Qian quote, trans. Burton Watson).

भारत-चीन का प्रथम सांस्कृतिक संपर्क 67 A.D में आरंभ (Han dynasty के समय) हुआ, जब चीन में बौद्धमत का प्रवेश हुआ। कुछ अन्य ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार चीन में बौद्धमत का प्रवेश, ईसा से दो शताब्दियाँ पूर्व से भी पहले हुआ था। ‘Before the “official” introduction of Buddhism into China in A.D. 67, Buddhism had been known there. According to the Wei shuv (“History of the Wei Period”)

साहित्य के क्षेत्र में आदान-प्रदान- उत्तरी हान राजवंश काल में बौद्ध सूत्रों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ- चिन राजवंश के बाद अनूदित साहित्य और भी समृद्ध हुआ। बौद्ध धर्म में भूत-प्रेत से संबन्धित नीति कथाओं का बाहुल्य है। चीन में मूलतः परियों और देवी-देवताओं की कहानियां प्रचलित थीं। छह राजवंशों के काल में भारत से आयातित बौद्ध साहित्य की भूत-प्रेत की कथाओं काजब चीनी जनता में प्रचार हुआ।

चिकित्सा क्षेत्र में आदान-प्रदान- चीन में बौद्ध धर्म के प्रवेश के बाद भारतीय चिकित्सा शास्त्र के जानकार कई बौद्ध भिक्षु बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से चीन आए- इस तरह क्रमिक रूप से भारतीय चिकित्सा के सिद्धांत उपचार की पद्धति, औषधि आदि से चीनी जनता परिचित हुई। पूर्वी हान राजवंश के अंतिम वर्षों में ‘शरीर के 404 रोगों का ग्रंथ’ नामक भारतीय पुस्तक का चीनी भाषा में अनुवाद किया। इसके बाद भारतीय चिकित्सा शास्त्र एवं उपचारविधि से संबद्ध पुस्तकों का अनवरत रूप से चीनी भाषा में अनुवाद हुआ और उनका चीनी जनता में प्रचलन हुआ।2

History of Chinese Medicine By Zhi Dao

उदाहरणार्थ, चीन के Sui राजवंश के काल में तथाकथित चीनी भाषा में उनूदित विदेशी नुस्खों को चीन में बहुत लोकप्रियता मिली। Sui राजवंश के ऐतिहासिक अभिलेखों में ‘नागार्जुन की उपचार विधि’, ‘पश्चिमी क्षेत्र के विभिन्न ऋषियों की उपचार विधि, ‘पश्चिमी क्षेत्र के ब्राह्मण ऋषियों की उपचार विधि’ आदि ग्रंथों का वर्णन मिलता हैं। बौद्ध ग्रंथों में भारतीय चिकित्सा शास्त्र का उल्लेख मात्र न होकर चिकित्सा शास्त्र के विभिन्न क्षेत्रों यथा शिशु रोग, नेत्र रोग, बवासीर, गुदा रोग आदि की चिकित्सा के बारे में विस्तृत विवरण है।

व्यापारिक रिश्ते- चौथी-पॉचवी सदी में गुप्त राजवंश के काल में भारत का विदेश व्यापार अत्यंत विकसित था। भारत का विदेशों के साथ विस्तृत पैमाने पर व्यापारिक संबन्ध था। यह संबन्धचीन के साथ भी था। उस समय भारत में ‘चीनांकुश’ नाम से विख्यात चीनी रेशम भारत केअनेक नगरों में बहुत बिकता था। कालिदास के ग्रंथ ‘कुमारसंभव’ में इसका उल्लेख है।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान- थाङ वंश सामंती युग का एक समृद्ध और शक्तिशाली राजवंश था। इसके काल में आर्थिक उन्नत थी सांस्कृतिक विकसित थी और चीन का भू–भाग एकीकृत था। थाङ राजवंशमें चीन और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की गतिविधियाँ अनेक क्षेत्रों में विकासकी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थीं। दानों राष्ट्रों के मध्य नियमित रूप से आवागमन हुआ,दोनों राष्ट्रों ने अपने-अपने दूतों को एक-दूसरे के राष्ट्र में भेजा। इस प्रकार सांस्कृतिक एवंराजनयिक संबन्धों में बहुत विस्तार आया। राजनीति, अर्थ, धर्म, कला, तकनीक, विद्या, व्यापारआदि क्षेत्रों में भी दोनों राष्ट्रों ने पारस्परिक सहयोग के संबन्ध स्थापित किए। इस युग कोचीन और भारत के सौहार्दपूर्ण संबन्धों का स्वर्णयुग कहा जा सकता है।

सुई राजवंश (Sui dynasty, 581–619 AD)

सुई राजवंश के शासनकाल में बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया। बौद्ध धर्म को भी सरकारी प्रोत्साहन मिला और उसके ज़रिये चीन की भिन्न जातियों और संस्कृतियों को एक-दुसरे के समीप लाया गया। Buddhism was popular during the Sixteen Kingdoms and Northern and Southern dynasties period that preceded the Sui dynasty,spreading from India through Kushan Afghanistan into China during the Late Han period. Buddhism gained prominence during the period when central political control was limited. Buddhism created a unifying cultural force that uplifted the people out of war and into the Sui dynasty. In many ways, Buddhism was responsible for the rebirth of culture in China under the Sui dynasty.

While early Buddhist teachings were acquired from Sanskrit sutras from India, it was during the late Six dynasties and Sui dynasty that local Chinese schools of Buddhist thoughts started to flourish. Most notably, Zhiyi founded the Tiantai school and completed the Great treatise on Concentration and Insight, within which he taught the principle of “Three Thousand Realms in a Single moment of Life” as the essence of Buddhist teaching outlined in the Lotus Sutra. In the year 601 AD, Emperor Wen had relics of the Buddha distributed to temples throughout China, with edicts that expressed his goals.

तांग राजवंश (Tang dynasty, 618 -907 AD)

सुई राजवंश के समय में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार बढ़ा तथा चीन में बौद्ध भिक्षुओं और बिहारों की संख्या अधिकहो गयी। तत्पश्चात् सुई एवं तांग राजवंश का शासन काल आया। इस समय भी बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया। इन सभी प्रयासों के बाद बौद्ध धर्म चीन का लोकप्रिय धर्म बन गया।

चीन में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का प्रधान कारण धर्म-प्रचारकों का उत्साह था। ये प्रचारक भिन्न-भिन्न स्थानों से वहाँ गये थे। मध्य एशिया केबौद्ध प्रचारकों में धर्मरक्ष तथा कुमारजीव के नाम प्रमुख हैं। भारत के प्रारम्भिक प्रचारकों में धर्मक्षेम, गुणभद्र, बुद्धभद्र, धर्मगुप्त, उपशून्य, परमार्थआदि उल्लेखनीय हैं। तांग काल में प्रभाकर मिश्र, दिवाकर, बोधिरूचि, अमोघवज, बज्र मिश्र जैसे बौद्ध प्रचारक चीन पहुंचे। कश्मीर में बौद्धों का प्रसिद्ध मठ था, जहाँ से संगभूति, धर्मयशस, बुद्धयशस, विमलाक्ष, बुद्धजीव, धर्ममित्र आदि बौद्ध विद्वान चीन गये। इन सभी के प्रयासों के परिणामस्वरूपबौद्ध धर्म चीन का अत्यन्त लोकप्रिय धर्म बन गया। तांग वंश के तियेन-शाऊ ( ई० 690 – 92 ) के शासन काल में भारत से चीन सम्राट के पास दूत भेजे गये थे।

Chinese envoys have been sailing through the Indian Ocean to India since perhaps the 2nd century BC, yet it was during the Tang dynasty that a strong Chinese maritime presence could be found in the Persian Gulf and Red Sea, into Persia, Mesopotamia (sailing up the Euphrates River in modern-day Iraq), Arabia, Egypt in the Middle East and Aksum (Ethiopia), and Somalia in the Horn of Africa. The Tang dynasty Chinese diplomat Wang Xuance traveled to Magadha (modern northeastern India) during the 7th century. Afterwards he wrote the book Zhang Tianzhu Guotu (Illustrated Accounts of Central India), which included a wealth of geographical information.

सुङ राजवंश (Song dynasty, 960-1279)

सुङ राजवंश काल में भारत का चीन के साथ न केवल आर्थिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों मेंघनिष्ट संबन्ध था, बल्कि दोनों राष्ट्रों के मध्य मैत्रीपूर्ण आदान-प्रदान भी बहुत रहा था। सन् 974 में पूर्वी भारत के राजकुमार ने चीन का भ्रमण किया, सन् 1015 में दक्षिण भारत के चोलराजवंश ने पच्चीस लोगों को आपसी मित्रता के प्रतीक के रूप में सुङ राजवंश के दरबार में भेजा, उसके बाद सन् 1020,1033 और 1077 में तीन बार चोल के सद्भाव दलों ने चीन कीयात्रा की। उस समय चीन और भारत के बौद्ध भिक्षुओं तथा व्यापारियों ने अनवरत एक दूसरे के राष्ट्रों का भ्रमण किया। सन् 966 में भिक्षु शिङ छिन तथा अन्य एक सौ सत्तावन लोगों ने बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्थल मार्ग से भारत की यात्रा की। उसके बाद बौद्ध भिक्षुओं ने जलमार्ग से भारत का भ्रमण किया और ताड़पत्र पर लिखे बौद्ध ग्रन्थों एवं अन्यसामग्री को साथ लेकर वे स्वदेश लौटे। अनेक भारतीय भिक्षुओं ने भी चीन की यात्रा की औरइसी प्रकार की सामग्री का भी आदान-प्रदान हुआ। सुङ राजवंश के इतिहास में इससे संबन्धित अनेक उल्लेख मिलते है। सुङ राजवंश काल में भारत जाने वाले चीनी भिक्षुओं ने गया में चीनी भाषा में एक प्रस्तरलेख का निर्माण किया। भारत के दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र केनीकापाटन में सुङ राजवंश काल के बौद्ध भिक्षुओं ने ऊचे चतुर्भुजीय स्तूप का निर्माण किया। उन्नीसवीं सदी तक ये ऐतिहासिक अवशेष अक्षुण्ण रहे। इन अवशेषों से यह प्रमाणित होता हैकि सुङ राजवंश काल में चीन भारत के मध्य मैत्रीपूर्ण संबन्ध थे

य्वान राजवंश (Yuan dynasty, 1271-1368 AD)

य्वान राजवंश कालीन चीन विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र था। य्वान राजवंशकालमें राज्य सीमा का अभूतपूर्व विकास हुआ और उसका प्रभाव एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप केसुदूर राष्ट्रों तक फैला। इस काल में विश्व के हर राष्ट्र से राजदूतों के दल, व्यापारी, पर्यटक, धर्म प्रचारक, चिकित्सक आदि चीन आए। विदेशों के साथ चीन का आदान प्रदान चरम सीमापर पहुँच चुका था। आर्थिक और सांस्कृतिक संबन्ध भी बहुत घनिष्ट थे। इस छोटी सी अवधिमें भारत के साथ चीन का राजनयिक और व्यापारिक संबन्ध विकास की अभूतपूर्व सीमा छूचुका था। संस्कृति के क्षेत्र में भी दोनों राष्ट्रों के मध्य पर्याप्त आदान प्रदान हुआ। य्वानराजवंश ने भारत के साथ शांति और सद्भाव के संबन्ध स्थापित करने की दृष्टि से भारत केअनेक राज्यों में दूत भेजे। ‘वान शि’ (य्वान राजवंश का इतिहास) के विदेश वर्णन खण्ड के अनुसार सन् 1279 से सन् 1286 के बीच चीन और भारतीय राज्य मालाबार एवं कुईलोन केराजनयिकों ने एक दूसरें राष्ट्रों की सद्भावपूर्ण यात्रा की और दोनों राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्णसंबन्ध स्थापित किए।’ तत्कालीन मोरक्को के निवासी इब्नबतूता के यात्रा वृतान्त में लिखा हैकि चीन के राजदूतों ने दिल्ली का भी भ्रमण किया। उस समय चीन और भारत के बीच काव्यापारिक संबन्ध अत्यन्त विकसित था। चीनी जलपोत प्रायः रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन औरविभिन्न धातुओं से बनें सामान आदि से लदे हुए भारत के बन्दरगाह तक आते थे। जैसा किसर्वविदित है, चीन में स्वान राजवंश का ओपेरा (गीतिनाट्य) अत्यंत प्रसिद्ध है। इन गीतिनाट्योंमें से कई की कथावस्तुए भारत से प्रभावित है या भारतीय विषयों पर आधारित हैं

मिङ राजवंश (Ming dynasty 1368–1644 AD)

मिङ राजवंश काल में भारत और चीन के बीच आदान-प्रदान मुख्यतः जलमार्ग से होता था। मिङ काल में व्यापारिक मार्ग की सुरक्षा हेतु 10 लाख सेना के साथ एक सशक्त जलसेना भी थी। चीन के Zheng He (was a Chinese mariner, explorer, diplomat, fleet admiral, and court eunuch during China’s early Ming dynasty) नामक व्यक्ति ने सात बार दक्षिण एशिया और भारतीय महासागर क्षेत्र के राष्ट्रों का भ्रमण किया, यह बात समस्त विश्व में विख्यात है। Zheng He ने सम्राट के आदेश से सात बार भारत की राजकीय यात्रा की, जिसमें उसे अट्ठाइस वर्षों कासमय लगा। उसने भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण किया, जिनमें प्रमुख हैं- कालीकट, कच्छऔर बंगाल। उसने भारतीय उपमहाद्वीप के समुद्रवर्ती क्षेत्रों का भी भ्रमण किया। Zheng He आदि राजदूतों की एशिया-अफ्रीका के राष्ट्रों की अनेक बार यात्रा से न केवल एक दूसरे के राष्ट्रों के बीच बहुमूल्य उपहारों का आदान-प्रदान हुआ, बल्कि उनके साथ बहुत से जलपोत भीगए। इससे बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार संभव हुआ और दोनों राष्ट्रों के बीच के आर्थिक और सांस्कृतिक संबन्धों में पर्याप्त प्रगति हुई।

Zheng He आदि राजदूतों की भारत यात्रा से यह प्रमाणित होता है कि उस समयजलमार्ग विकसित था और चीन व भारत के मध्य संबन्ध घनिष्ट थे। दोनों राष्ट्रों की जनता केमन में एक दूसरे के प्रति मैत्रीपूर्ण भाव थे। Zheng He के साथ Ma Huan और Fei Xin जैसे अनुवादक भी थे। जिन्होंने कई भारत यात्रा के बारे में अपनी पुस्तकों में वर्णन किया।

Ma Huan ने अपनी पुस्तक Yingya Shenglan (The Overall Survey of the Ocean’s Shores) में  भारतीय जीवन रहन सहन और रीति रिवाज आदि का जीवन्त चित्र प्रस्तुत किया। चीन में उस समय भारतीय संस्कृति को समझने के लिए यह पुस्तकें महत्वपूर्ण एतिहासिक स्त्रोत थीं। उस समय चीन से भारत आने वाली सामग्रियों में कपड़े, रेशम,मरकरी, कस्तूरी, चटाई आदि साम्मिलित हैं।

मिङ राजवंश के बाद चीन और भारत की जनता के बीच आवागमन की श्रृंखला हालांकि पूरी तरह नहीं टूटी, फिर भी सांस्कृतिक क्षेत्र में आपसी प्रभाव का वातावरण पूर्ववत्जीवंत नहीं रहा। उस समय यूरोप में पूंजीवाद एक नई मंजिल पर पहुंच रहा था और उपनिवेशवादी ताकतें यथा शक्ति विदेशी उपनिवेशों की ताक में थीं। समुद्री लुटेरों ने आधुनिक हथियारों का सहारा लेकर लूटमार की और एशिया के राष्ट्रों पर क्रूरता से आक्रमण किया। सन् 1510 में पुर्तगालियों ने भारत के गोवा पर कब्जा किया और दूसरे वर्ष मलक्का पर अधिकार जमाया। सन् 1557 में पुर्तगाल ने चीन के मकाओं को भी हथिया लिया। चीन और भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर थी जिससे उन्हें उपनिवेशवादी ताकतों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शासन को झेलना पड़ा। इससे भारत और चीन के बीच सीधे आवागमन को गहरा धक्का लगा।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में पूंजीवादी राष्ट्रों ने अपने उपनिवेशों एवं आश्रित राष्ट्रों में भारी शोषण और दमन शुरू किया। इसके परिणाम स्वरूप भारत और चीन साम्राज्यवादी आक्रमण के शिकार हुए, इसलिए चीन और दक्षिण एशियाई राष्ट्रों का समान लक्ष्य उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष करना था। यह प्रधान कारण था जिसकी वजह से चीन और दक्षिण एशियाई राष्ट्रों में समीपता स्थापित हुई थी। चीन के दूरदर्शी विचारको ने उस काल में इसे अनुभव किया था।

चीन के विचारक और साहित्यकार Sun Yat-sen और Lu Xun

  • चीन के विचारक व लेखक Sun Yat-sen और Lu Xun ने इसमें उल्लेखनीय योगदान किया था। ये सभी लोग इस मत के थे कि चीन और भारत को साथ लेकर साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। चीन को लोकतांत्रिक क्रांति के अग्रदूत Sun Yat-sen भारत में लोकतांत्रिक आंदोलन की प्रगति पर दृष्टि रखे हुए थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वे अपने भाषणों व रचनाओं में भारत का बार-बार उल्लेख करते थे तथा भारतीय जनता के प्रति गहरी सहानुभूति रखते थे। वे अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रवाद’ में लिखते है कि ‘उपनिवेशवादी ब्रिटेन ने आज के भारत में भयानक स्थिति पैदा कर दी है, यह वैसी ही स्थिति है जैसी उसने हांगकांग में पैदा कर रखी है, एक इंच भूमि भी ऐसी नहीं है, जिसे ब्रिटेन ने प्रभुत्ववाद के जरिए न पैदा किया हो।’
  • चीन के विचारक और साहित्यकार Lu Xun भी भारत के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक आंदोलन की प्रगति पर हमेशाध्यान देते रहे। और स्वतंत्रता आंदोलन की उपलब्धियों का हृदय से स्वागत करते थे। एक जगह भारतीय राष्ट्रीय लोकतांत्रिक आंदोलन पर अपनी समीक्षा व्यक्त करते हुए Lu Xun कहते हैं कि “भारत अतीत काल से ही हमारे राष्ट्र के संपर्क में रहा है और इसने चीन को बेहद मूल्यवान् उपहार दिए हैं। ये उपहार विचारधारा, विश्वास, नैतिकता, कला, साहित्य आदि हर क्षेत्र में हैं। भाई भी इतनी विशाल हृदयता का परिचय नहीं दे सकता जैसा कि भारत ने दिया है। वे लिखते हैं कि “यदि कोई चीज ऐसी है जो दोनों राष्ट्रों को नुकसान पहुंचा सकती है, तो हमें उससे संघर्ष करना चाहिए। यदि दोनों राष्ट्रों का उससे पतन होता है तो मैं उसके विरुद्ध आवाज उठाऊंगा। यदि दोनों राष्ट्रों को किसी तरह की विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता है तो मैं ईश्वर से यह प्रार्थना करूँगा कि भारत हमारे राष्ट्र चीन के साथ अनंत काल तक मित्रवत् रहे।”

भारत के महान् साहित्यकार और विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर

  • रवींद्रनाथ टैगोर ने भी अपनी लेखनी के माध्यम से आजीवन चीनी जनता का ध्यान रखा था। जब वे बीस साल के थे तो उन्होंने अपने एक निबंध ‘मौत के सौदागर'(1889) में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को चीनी जनता पर अत्याचार करने से मना किया था। जब वे 1824 में चीन आए तो उन्होंने कई स्थानों पर भारत-चीन मैत्री एवं चीनी संस्कृति के महत्व पर अनेक भाषण दिए थे। उन्होने जापानी फासिस्टों द्वारा चीन के नगरों पर बम बरसाए जाने का तीव्र विरोध किया था।

चीन-जापान युद्ध- भारत की चीन के प्रति सहानुभूति- 1931 में जब जापान द्वारा मंचूरिया पर आक्रमण किया गया तो चीन के प्रति सहानुभूति प्रदर्शन करने के लिए ‘चीन दिवस’ (China day) मनाया गया और भारत में जापानी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया गया। फिर सन् 1937 में जब चीन-जापान युद्ध शुरू हुआ तो भारत ने पुनः चीन के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की। इस पृष्ठभूमि में यह स्वाभाविक था कि स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद स्वाधीन भारत अपने इस पड़ोसी राष्ट्र के साथ अच्छे संबन्ध बनाये रखने का प्रयास करे।

चीनी गृह युद्ध और चीन में साम्यवादी सरकार- चीन गणराज्य की नेतृत्व कर रही Kuomintang सरकार और चीनी साम्यवादी दल के बीच 1945 से 1949 तक संघर्ष चला। Kuomintang सरकार के पतन के पश्चात् 1 अक्टूबर 1949 को चीन में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई।

भारत-चीन संबंधों की पुनर्स्थापना

संबंधों का प्रमोद काल (1949 से 1957 तक)

16THNEHRU

भारत द्वारा नई सरकार का स्वागत और मैत्रीपूर्ण सम्बंधों की स्थापना- चीन में 1949 की साम्यवादी क्रांति और 1947 में भारत की आज़ादी के बाद दोस्ती का दौर भी चला। भारत ने नव-स्थापित सरकार का हृदय से स्वागत किया तथा उसको तुरंत मान्यता प्रदान करके अपने मैत्रीपूर्ण व्यवहार का परिचय दिया। कोमिन्तांग सरकार के समय चीन में भारतीय राजदूत के पद पर सरदार के.एम. पणिक्कर काम कर रहे थे। अतः 1949 में उन्हीं को दुबारा भारतीय राजदूत बना कर चीन भेजा गया। पणिक्कर के प्रयत्नों से भारत और चीनके बीच उत्तम मैत्री संबन्धों की शुरुआत हुई। पणिक्कर ने जहां चीन की जनता को भारतीय दृष्टिकोण से परिचित कराया वही भारतीय जनता को भी चीनी क्रांति के आधारभूत तत्वों सेजानकारी करवाई। उन्होंने बताया कि चीनी क्रांति एशिया के नवजागरण का प्रतीक है और चीन के नव-स्थापित सरकार वहां के लगभग सौ वर्ष पुराने विकास का अनिवार्य परिणाम है। सदियों से गुलामी के बाद स्वाधीनता प्राप्त करने वाला भारत इस क्रांति में आरम्भ से ही सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण बनाये रहा और इसलिए पणिक्कर के प्रयत्नों ने इस सहानुभुति में और भी वृद्धि की। दोनों राष्ट्रों के मध्य प्रारम्भ से अत्यन्त मुधर और मैत्रीपूर्ण संबन्ध स्थापित हुआ। भारत ने हर मौके पर चीन का साथ दिया और उसकी सहायता करने की कोशिश की।

भारत ने चीन का उतना समर्थन किया था जितना चीन को भाई और भारत को दोस्त कहने वाले रुस सोवियत संघ ने भी नहीं किया था- गैर कम्युनिस्ट राष्ट्रो में भारत एक ऐसा राष्ट्र था जिसने कम्युनिस्ट चीन को शीघ्र मान्यता प्रदान की और चीन के नये गणराज्य को संयुक्त राष्ट्र संघ में उनका उचित स्थान दिलाने केलिए प्रयत्नशील रहा। इसके कारण भारत को कई राष्ट्रों के साथ विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मनमुटाव भी पैदा हुआ। लेकिन वह जमाना ‘हिन्दी–चीनी भाई-भाई’ का था। भारत ने अमेरिका की नाराजगी की अवेहलना करते हुए चीन का समर्थन किया। कोरियाई युद्ध के समय भारत ने चीन का जितना समर्थन किया उतना शायद सोवियत संघ ने भी नहीं किया था।

चीन से दोस्ती के लिए अमेरिका की नाराजगी झेली- अमेरिका की नाराजगी की कीमत पर भी भारत ने कोरियाई युद्ध में चीन का समर्थन किया। यू.एन.ओ में भारत ने उस प्रस्ताव का विरोध किया जिसमें चीन को आक्रान्ता घोषित किया गया था। सितम्बर, 1950 में सेनफ्रांसिस्को में 49 राष्ट्रों के साथ होने वाली जापानी सन्धि में भारत इसलिए शामिल नहीं हुआ क्योंकि चीन को उसमें शामिल नहीं किया गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन को मान्यता दिलाने का भारत ने भरसक प्रयत्न किया। भारत ने उस समय भी चीन को मान्यता दिलाने का प्रयास किया जब चीन का भारत के प्रति दृष्टिकोण शत्रुतापूर्ण था। भारत ने अमरीका की उन नीतियों की सर्वदा आलोचना की जो चीन को अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों या संस्थाओं में ‘उचित स्थान’ दिलाने में बाधा प्रस्तुत करती थीं।

सन् 1954-57 का काल भारत-चीन सम्बन्धों में प्रमोद काल कहलाता है- 1954 के बाद से भारत की विदेशनीति को ‘पंचशील’ के सिद्धांतों ने एक नई दिशा दी। ‘पंचशील’ से तात्पर्य है-आचरण के पाँच सिद्वान्त। जिस प्रकार बौद्ध धर्म में ये व्रत एक व्यक्ति केलिए होता है उसी प्रकार आधुनिक पंचशील के सिद्धांतों के द्वारा राष्ट्रों के लिएएक दूसरे के साथ आचरंण के सम्बन्ध में निश्चित किये गए। इन सिद्वान्तों केनाम निम्न प्रकार दिये गये है-अनाक्रमण की नीति, एक-दूसरे की प्रादेशिकअखण्डता और सर्वोच्च सत्ता के लिए पारंपरिक सम्मान की भावना, समानता एवंपारस्परिक लाभ, एक दूसरे के आन्तरिक मामलों में अहस्तक्षेप और शांतिपूर्णसह–अस्तित्व । यदि विश्व स्तर पर देखा जाए तो पंचशील के इन सिद्वान्तों कोसर्वप्रथम 29 अप्रैल 1954 को तिब्बत के सम्बन्ध में भारत और चीन के बीच हुएएक समझौते में प्रतिपादित किया गया था। 28 जून 1954 को चीन के प्रधानमंत्रीचाऊ-एन-लाई तथा भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने ‘पंचशील’ द्वारा अपने विश्वासकी पुनरावृत्ति की। एशिया के प्रायः सभी देशों ने ‘पंचशील’ के सिद्धांतों कोअपनाया।

पंचशील समझौता

हिंदी चीनी भाई भाई के नारों के बीच  29 अप्रैल 1954 को भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हो गया। चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था.“Agreement on Trade and Intercourse between the Tibet region of China and India”

पंचशील शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पांच निषेध होते हैं. तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था.

इस समझौते की प्रस्तावना में 5 सिद्धांत थे जो 1962 से पहले तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे.

  • – एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
  • – परस्पर अनाक्रमण
  • – एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
  • – समान और परस्पर लाभकारी संबंध
  • – शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व

इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया… इस तरह उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था.

भारत को 1904 की ऐंग्लो तिबतन संधि के तहत तिब्बत के संबंध में जो अधिकार मिले थे भारत ने वे सारे इस संधि के बाद छोड़ दिए, हालाँकि बाद में ये भी सवाल उठे कि इसके एवज में भारत ने सीमा संबंधी सारे विवाद निपटा क्यों नहीं लिए.

मगर इसके पीछे भी भारत की मित्रता की भावना मानी जाती है कि उसने चीन के शांति और मित्रता के वायदे को मान लिया और निश्चिंत हो गया. पंडित नेहरू ने अप्रैल 1954 में संसद में इस संधि का बचाव करते हुए कहा था, “ये वहाँ के मौजूदा हालात को सिर्फ़ एक पहचान देने जैसा है. ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों से ये क़दम उठाया गया.” उन्होंने क्षेत्र में शांति को सबसे ज़्यादा अहमियत दी और चीन में एक विश्वसनीय दोस्त देखा.

चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई की पहली भारत यात्रा (25-28 जून 1954)

चीन का प्रधानमंत्री चाउ-इन-लाई 25 जून, 1954 को राजकीय यात्रा पर दिल्ली आया। 28 जून को पं.जवाहरलाल नेहरू तथा चीन के प्रधानमंत्री ने पंचशील की संयुक्त घोषणा की।

3

डेढ़ महीने बाद ही चीन ने आंख दिखाना किया शुरु- 28 जून का संयुक्त घोषणा के लगभग डेढ़ महीने पश्चात् 17 जुलाई, 1954 को चीन ने सीधे भारत के साथ छेड़छाड़ प्रारम्भ कर दी। भारत-चीन संबंधों की जानकारी यहीं से पहले श्वेत पत्र द्वारा मिलती है। 17 जुलाई को चीन ने भारत के कन्सुलेट से शिकायत कि भारत के 30 सैनिक चीन के अंतर्गत तिब्बत क्षेत्र के अली क्षेत्र में बूजे (wu-je) में घुस आए हैं।

भारतीय सीमा पर ‘चीनी अतिक्रमण’

4

चीनी अतिक्रमण की घटना के बाद पं. नेहरू ने चीन की यात्रा- अक्टूबर 1954 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने चीन की यात्रा की। वहां उनका अभूतपूर्व स्वागत किया गया। पं. नेहरू अपने इस मान-सम्मान से अत्यधिक प्रभावित हुए।

When Nehru and Mao met- October 19, 1954 in Beijing, Mao gets straight down to business, talking about how the people of the East had been “bullied” by Western imperialist powers. “In spite of differences in our ideologies and social systems, we have an overriding common point, that is, all of us have to cope with imperialism,” he says. Both show themselves to be keen analysts of the international situation — exchanging notes on foreign affairs and the likely fallout of a possible third World War on their two countries, the region and the world.

  • Focus on imperialism- A common enemy, imperialism, with a special focus on the United States, is a visible thread through all the three meetings, on October 19, October 23 and October 26. When Nehru suggests that India and China, which had a population of one billion between them, should play “more important” roles in Asia, an issue being discussed to this day, Mao responds: “But the United States does not recognise our two countries as great powers.”
  • Nehru, in turn, says: “The ruler [scale] that the United States uses to measure other countries will no longer be useful in future.” When Nehru talks about the U.S. being both powerful and afraid, Mao remarks, “It is inconceivable that any country would march its troops into the United States.”
  • Nehru doesn’t take a fully blanket view and points out to Mao that some Americans were against British and French colonialism, but adds that since the U.S. had “vested interests”, it was nervous and afraid. In response, Mao reveals that U.S. defence lines extending to South Korea, Taiwan and Indochina had made China’s sleep “unsound”.

1955 से चीन ने भारतीय सीमाओं पर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ानी शुरु कर दी-

56

चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई की नवम्बर 1956 तथा जनवरी 1957 में भारत यात्रा- नवम्बर 1956 तथा जनवरी 1957 में चीनी प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई भारत आये तो हमारे प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने उनसे चीनी सैनिक टुकड़ियों द्वारा भारतीय सीमा के उल्लंघन के बारे में बातचीत की। चीनी प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने जवाहर लाल नेहरू को कहा कि चीन ने वर्मा से लगी परम्परागत सीमा मैकमोहन रेखा को मान्यता दे दी है और चीन की सरकार इस बारे में परम्परागत सीमा को भी मान्यता देने की सोच रही है और इस बारे में वह तिब्बत की सरकार से विचार विमर्श करेगी। इससे जवाहर लाल सन्तुष्ट हो गये। चाऊ-एन-लाई के आश्वासन के बाद एकचीनी सैनिक टुकड़ी ने अक्टुबर 1957 में उत्तर पूर्वी सीमा एजेन्सी के लोहित सम्भाग के वालोंग क्षेत्र का अतिक्रमण किया। 1957 ई. में चीनियों ने तिब्बत को सिक्यांग से मिलाने वाली सड़क का निर्माण किया जो भारत के लद्दाखप्रदेश के एक भाग अक्साई चिन से होकर गुजरती थी।

चीन ने छापा विवादास्पद नक्शा- जुलाई, 1958 में चीन की एक सरकारी पत्रिका ‘चाइना पिक्टोरिअल’ में कुछ विवादास्पद नक़्शे छापे गए. इन नक्शों में नेफा (नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी आज का अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख के बड़े इलाके को चीन का हिस्सा दिखाया गया था। इस नशे में प्रदर्शित निम्न क्षेत्रों पर भारत को आपत्ति थी

  1. इसमें भारत के उत्तर पूर्वी सीमान्त एजेन्सी नेफा केपांच में से चार डिवीजन सम्मिलित हैं।
  2. इसमें उत्तर प्रदेश के कुछ उत्तरी भाग प्रदर्शित किए गये हैं।
  3. जम्मू-कश्मीर राज्य के पूर्वी लद्दाख के बड़े भू-भाग को प्रदर्शितकिया गया है।

7

भारत सरकार का विरोध- 10 दिसम्बर, 1958 को प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत-चीन सीमा समस्या के बारे में चीन के प्रधानमन्त्रीचाऊ-एन-लाई को एक विस्तृत पत्र लिखा। इस पत्र में श्री जवाहर लाल नेहरूने चाऊ-एन-लाई को लिखा: “जब आप नवम्बर 1956 में भारत आये थे तोउस समय आपके साथ मैकमोहन रेखा के बारे में विस्तृत वार्ता हुई थी । उससमय आप ने ही कहा था कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा निर्धारित कीगयी यह सीमा रेखा ठीक नहीं है, फिर भी क्योंकि यह सिद्ध तथ्य बन गयाहै और चीन, भारत तथा बर्मा में मैत्रीपूर्ण पूर्ण सम्बन्ध है अतः चीन सरकार की सम्मति है कि मैकमोहन रेखा को उसे स्वीकृति दे देनी चाहिए परन्तु इसविषय में अभी तक तिब्बती अधिकारियों से परामर्श नहीं किया है। उनका ऐसा करने का विचार है।

इस पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने आगे लिखा है कि कुछ महीने बाद जब हमारा ध्यान चीनी सरकारी पत्रिका ‘चाइना पिक्टोरिअल’ की ओर आकर्षित हुआ जिसमें नेफा का काफी भाग तथा भारत के दूसरे भागों को चीन में दिखाया गया है। वर्तमान चीनी सरकार की स्थापना को जब नौ वर्ष हो गये हैं और इन नक्शों में भारत के कुछ भाग को चीन का भागदिखाया जाना हमारे लिए बड़ी परेशानी का कारण है। चीनी नक्शों में दिखाये गये ये भाग निश्चित रूप से भारत के अंग हैं।

चीनी प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई का जवाब- जवाहर लाल नेहरू के इस पत्र का उत्तर चीनी प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने 23 जनवरी 1959 को दिया। 1954 की सन्धि काउदाहरण पेश करते हुए चाऊ-एन-लाई ने ध्यान आकृष्ट किया कि, “उस समय भारत चीन सीमा का प्रश्न का अध्ययन करने के लिए समय नहीं था। चीनी प्रधानमन्त्री ने आगे कहा कि चीन और भारत की सीमा का कभी अंकन नहीं हुआ था। चीनी नक्शों के बारे में चाऊ-एन-लाई ने कहा- हमारे देश में आजकल प्रकाशित होने वाले मानचित्रों में चीनी सीमाएं कई शताब्दियों से चीनी नक्शों में अंकित की जाने वाली सीमाओं के अनुसार छापी गयी हैं। हमारा यह मत नहीं है कि सीमान्त रेखा का प्रत्येक भाग पर्याप्त प्रमाणों केआधार पर खींचा गया है। परन्तु सम्बद्ध देशों से परामर्श किये बिना इसमें परिवर्तन करना अनुचित होगा। इसके अतिरिक्त इससे जनता में भ्रम पैदा होगाजिससे हमारी जनता का विश्वास सरकार से उठ जायेगा।

8

22 मार्च 1959 को दोबारा जवाहर लाल नेहरू ने भारत चीन सीमा विवाद के बारे में एक पत्र लिखा– इसमें जवाहर लाल ने चाऊ-एन-लाईके इस कथन की खण्डन किया कि भारत और चीन के बीच में सीमांकन कभी नहीं हुआ या चीन पर बन्धनकारी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों द्वारा इसकी स्वीकृति नहीं हुई। अपने इस पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने परम्परागत भारतीय सीमा के बारे में अकाट्य तर्क प्रस्तुत किये।

चाऊ-एन-लाई की नेपाल को भड़काने की कोशिश- जनवरी 1957 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई नेपाल आए। अपनीयात्रा में चाऊ ने कहा नेपाल को भारत से खतरा है। उन्होंने नेपालियों की एक सभा मेंयह घोषणा की थी कि नेपालियों और चीनियों में एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है। इसरक्त सिद्धांत का नेपाली जनता पर कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा। यह वास्तव में एक कूटनीतिक कथन था। इसका अर्थ यह था, कि चीनियों और नेपालियों दोनों के पूर्वज मंगोल वंश के थे, अतः इस हिसाब से चीन, तिब्बत, नेपाल, भूटान और सिक्किम कोएक सूत्र में बँध जाना चाहिए।

तिब्बत में चीन के खिलाफ बगावत- 10 मार्च 1959 को चीन के कब्जे के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ। चीनी सेना ने तिब्बतियों पर यातनाएं शुरु कर दी। माना जाता है कि इस लड़ाई में लगभग 87,000 तिब्बती मारे गए। चीनी सेना ने दलाई लामा को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। 17 मार्च 1959 की रात को उन्हें तिब्बत छोड़कर निकलना पड़ा। 31 मार्च को भारत के तवांग इलाके में प्रवेश कर गए। पंडित नेहरू ने मसरी जाकर 28 अप्रैल को उनसे मुलाकात की। यह बात चीन को पसंद नहीं आयी। इधर देश में और संसद में नेहरू की चीन नीति पर सवाल उठने लगे। उनकी आलोचना होने लगी।

सन् 1950 में चीनियों के आने से पहले तक पूरे तिब्बत में 6,000 मठ और मंदिर थे, जहां 6 लाख से ज्यादा बौद्ध भिक्षु रहते थे. चीनी हमले और दमन ने धर्म व राज्य दोनों को कुचला. सन् 1979 में हुए एक सर्वे के अनुसार उस समय तक तिब्बत में सिर्फ 60 मठ बचे थे, वे भी जर्जर और नष्ट होने के कगार पर थे. इन मठों में रहनेवाले भिक्षु अधिकांश मार दिए गए या लापता थे. मठों को डायनामाइट से उड़ाया गया था, ताकि धर्म के साथ ही धार्मिक चिह्न और अवशेष भी समाप्त हों. तिब्बत को दुनिया की छत कहा जाता था. वह अपनी जड़ी-बूटियां और हर्बल वनक्षेत्र के लिए प्रख्यात था. ऐसे बेशकीमती और परंपरागत जंगल के 70 फीसदी हिस्से को सुरक्षा के नाम पर चीनियों ने काट डाला।

Genocide in Tibet: 1966-76

Starting in 1949, Tibet was invaded by 35,000 Chinese troops who systematically raped, tortured and murdered an estimated 1.2 million Tibetans, one-fifth of the country’s population. Since then over 6000 monasteries have been destroyed, and thousands of Tibetans have been imprisoned. According to different sources, it is estimated that up to 260,000 people died in prisons and labor camps between 1950 and 1984.

Records show that between 1949 and 1979 the following deaths occurred:

  • 173,221 Tibetans died after being tortured in prison.
  • 156,758 Tibetans were executed by the Chinese.
  • 432,705 Tibetans were killed while fighting Chinese occupation.
  • 342,970 Tibetans have starved to death.
  • 92,731 Tibetans were publicly tortured to death.
  • 9,002 Tibetans committed suicide. Source: thetibetpost.com

चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई की चौथी भारत यात्रा (19-25 अप्रैल 1960)

भारत व चीन के मध्य सीमा पर झड़पों और आरोप-प्रत्यारोप के बीच चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने 1960 में भारत की यात्रा की। परन्तु उनकी यह यात्रा भीसीमा विवाद का कोई सर्वमान्य हल न निकाल सकी। अब तक व्यापक आधारपर सैनिक टकराव की जमीन तैयार हो चुकी थी।

910

1962 भारत-चीन युद्ध की अधिक जानकारी नीचे दी गई है…

क्या नेहरू चीन पर चूक गए थे?

17A Time magazine cover from 1962 featuring Mao and Nehru. Image: Time

चाऊ-एन-लाई की चालाकी और पं. नेहरू का आर्दशवादी रुख- जवाहर लाल नेहरू ने नये चीनी शासकों को मान्यता देते हुए तिब्बत पर उनकी सार्वभौम सत्ता को स्वीकार कर चीन को अपनी सीमा भारतीय सीमा से सटाने का मौका दिया। पहले तिब्बत भारत-चीन का बफर राज्य था। उसका “आटोनामस” स्वरूप चीन के शासक निगल गये । भारतने अपनी आँखें बन्द रखी। यही नहीं, भारत और तिब्बत के विशेष सम्बन्ध को भी नजर अन्दाज कर दिया गया। भारतीय विदेश मन्त्रालय ने इतनी भी परवाह नहीं की कि चीनी शासकों से सीमा सम्बन्धित प्रश्न, विशेषकर भारत-तिब्बत सीमा निर्धारित करने वाली मैकमोहन रेखा की चीन से स्वीकृति करा लें। उधर तिब्बत लूट गया और इधर चीन भारत की सीमा पर आ धमका। आगे खिसकता आया, खिसकता ही रहा है ।

चाऊ-एन-लाई जवाहर लाल से बात करते थे। नेहरू का ख्याल थाकि तिब्बत भारत-सीमा रेखा और मैकमोहन रेखा का कड़ा रूख अपनाना शायद सीमाओं का मामला तय करने में और चीन से सामान्य दोस्ती कायम करने में बाधा बनेगा। नेहरू की यह समझ चीन को बहुत पसन्द थी। 1949 में चीन में राज बदल होने के बाद से ही साम्यवादी स्वरूप धीरे-धीरे चीन का परंपरावादी राष्ट्रीय अहंकार और प्रसारवादी व्यक्तित्व प्रभावी होने लगा। साम्यवादी स्कूप को दबाते-दबाते आज तो चीनी शासक दुनिया की चोटी की पंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों के साथ जुड़ते जा रहे हैं। यथार्थवादी चीन ने लद्दाख क्षेत्र में अक्साई चीन सड़क बना ली है। पहले भेड़ चराने के नाम पर मध्य क्षेत्र कब्जा कर लिया। अब मैकमोहन रेखा को पार कर पांचल में हेलीपैड बनवाकर शांति के लिए काम करने का अनोखा उदाहरण पेश कर रहा है। चीन के शासकों ने शुरू से ही एक ही रास्ता पकड़ा, “बात करो, सीमा गरम रखो और धीरे-धीरे जमीन पर अपने अधिकार को फौजी बल पर बढ़ाते जाओ। ‘इस आधार पर उन्होंने सीमा पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया है।

तिब्बत को स्वयत्त इकाई का दर्जा दिया– स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत ने भी तिब्बत को चीनी अधिराज्य के रूप में स्वीकार किया और तिब्बत को स्वयत्त इकाई का दर्जा दिया। परन्तु नई दिल्ली उस समय आश्चर्यचकित हो गयी जब चीन की इस नवगठित साम्यवादी सरकार ने भारत से मान्यता मिलने के तीसरे दिन की 1 जनवरी 1950 (नव वर्ष का दिन) को “न्यू चाइना न्यूज एजेन्सी के प्रसारण द्वारा यह घोषणा किया कि- “The tasks for the peoples’ Liberation Army (PLA) for 1950 are to liberate Taiwan, Hainas and Tibet………… Tibet is an integrat part of china. Tibet has fallen under the influence of the imperialits.” (Source: South Asian Defence and Strategic Year Book (New Delhi, 2007), page- 42)

चीन का तिब्बत पर कब्जा- 7 अक्टूबर 1950 को बिना किसी पूर्व सूचना के चीनी सेना ने तिब्बत की सीमाओं का अतिक्रमण करके विभिन्न दिशाओं से ल्हासा की ओर बढ़ना प्रारम्भ कर दिया। 10 अक्टूबर को ल्हासा से 300 मील पूर्व स्थित चामड़ो तथा 23 अक्टूबर तक चीनी सेना ने ल्हासा के पूर्व क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके पश्चात् चीन ने 25 अक्टूबर, 1950 कोन्यू चाइना न्यूज ऐजेन्सी द्वारा यह प्रसारित किया कि- “चीन की सेना कोतिब्बतियों को स्वतन्त्र कराने के लिए, चीन के एकीकरण को पूर्ण करने के लिए,पितृ-भूमि के एक-एक इंच को साम्राज्यवादी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए तथा देशके सीमान्त प्रदेशों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में आगे बढ़ने का आदेश दिया गया है।”

ल्हासा: एक प्रतिबन्धित शहर- चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया. तिब्बत में चीनी सेना तैनात कर दी गई, राजनीतिक शासन में दख़ल किया गया जिसकी वजह से तिब्बत के नेता दलाई लामा को भाग कर भारत में शरण लेनी पड़ी. फिर तिब्बत का चीनीकरण शुरू हुआ और तिब्बत की भाषा, संस्कृति, धर्म और परम्परा सबको निशाना बनाया गया। किसी बाहरी व्यक्ति को तिब्बत और उसकी राजधानी ल्हासा जाने की अनुमति नहीं थी, इसीलिये उसे प्रतिबन्धित शहर कहा जाता है. विदेशी लोगों के तिब्बत आने पर ये पाबंदी 1963 में लगाई गई थी. हालांकि 1971 में तिब्बत के दरवाज़े विदेशी लोगों के लिए खोल दिए गए थे.

भारतीय प्रतिक्रिया- चीन द्वारा तिब्बत में की गयी सैन्य कार्यवाहियों की भारतीय संसद में व इससेबाहर भी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। जैसा उस समय विदेश मंत्रालय के महासचिव जी०एस०वाजपेयी ने अनुभव किया कि- “India would now have on it northern frontiers a “Militaristic and aggressive nation”

Brigadier John Dalvi ने 1968 में अपनी पुस्तक “Himalayan Blunder” में इन प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- …….

भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और सांसद प्रो० एनजी रंगा का विचार थाकि ‘प्रधानमंत्री हमारी सीमा की सुरक्षा पर भय के बादल इकट्ठा कर रहे है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उसी समय यह भविष्यवाणी की थी कि वह दिन दूर नहीं जब कि चीन भारत पर आक्रमण करेगा।

लौह-पुरूष सरदार बल्लभभाई पटेल चीन के साथ बल परीक्षा के पक्ष में थे लेकिन दुर्भाग्यवश अपने विचारों को कार्य रूप में परिणत करने के पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी……. (Source: Brig. J.P. Dalvi; “Himalayan Blunder” (New Delhi, 1969), page-21)

चीन के तिब्बत पर आक्रमण के बाद प्रतिकिया देते हुए डा० राममनोहर लोहिया ने तिब्बत पर चीनी हमले को उन्होंने ‘शिशु हत्या’ करार देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि वे तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता न दें।

चीन पर नेहरू से सहमत नहीं थे सरदार पटेल- उल्लेखनीय है कि तिब्बत में चीनी सेना के अभियान के संदर्भ में तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल ने 7 नवम्बर 1950 को जो पत्र नेहरू को लिखा वह निश्चित ही भारतीय सीमान्तों पर चीनी खतरे को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करता है।

12

उन्होंने नेहरू को सम्बोधित करते हुए लिखा था कि-

प्रिय जवाहरलाल,……… विदेश मंत्रालय तथा पेकिंग में हमारे राजदूत और उसके जरिये चीन सरकार के बीच जोपत्र-व्यवहार हुआ है उसका मैंने सूक्ष्मता से अध्ययन किया है इस पत्र-व्यवहार का अध्ययन करते हुए, जहांतक सम्भव हुआ है, मैने हमारे राजदूत तथा तथा चीन की सरकार के बारे में अच्छा सोचने का प्रयत्न किया है,लेकिन मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि इन पन्नों को पढ़ाने के बाद दोनों में से किसी के बारे में अच्छीराय कायम नहीं कर सका हूँ शांतिपूर्ण इरादो का स्वांग करके चीन की सरकार ने बराबर हमें छलने का प्रयत्नकिया है। मेरी अपनी धारणा है कि एक मार्के के समय उन्होंने हमारे राजदूत में यह भ्रामक विश्वास पैदा करदिया है कि तिब्बत के प्रश्न को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की उनकी इच्छा वास्तविक है। इस बात में कोईसंदेह नहीं हो सकता है कि जिस काल में इन पत्रों का आदान-प्रदान हो रहा था, उसी समय चीन तिब्बत पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था। मेरी राय में चीन के इस कार्य को विश्वासघात कहा जा सकता है….

Sardar Patel’s Letter to Prime Minister Jawaharlal Nehru

New Delhi

7 November 1950

My Dear Jawaharlal,

Ever since my return from Ahmedabad and after the cabinet meeting the same day which I had to attend at practically 15 minutes’ notice and for which I regret I was not able to read all the papers, I have been anxiously thinking over the problem of Tibet and I thought I should share with you what is passing through my mind.

I have carefully gone through the correspondence between the External Affairs Ministry and our Ambassador in Peking and through him the Chinese Government. I have tried to peruse this correspondence as favourably to our Ambassador and the Chinese Government as possible, but I regret to say that neither of them comes out well as a result of this study. The Chinese Government has tried to delude us by professions of peaceful intention. My own feeling is that at a crucial period they manage to instil into our Ambassador a false sense of confidence in their so-called desire to settle the Tibetan problem by peaceful means. There can be no doubt that during the period covered by this correspondence the Chinese must have been concentrating for an onslaught on Tibet. The final action of the Chinese, in my judgment, is little short of perfidy. The tragedy of it is that the Tibetans put faith in us; they choose to be guided by us, and we have been unable to get them out of the meshes of Chinese diplomacy or Chinese malevolence. From the latest position, it appears that we shall not be able to rescue the Dalai Lama. Our Ambassador has been at great pains to find an explanation or justification for Chinese policy and actions. As the External Affairs Ministry remarked in one of their telegrams, there was a lack of firmness and unnecessary apology in one or two representations that he made to the Chinese Government on our behalf. It is impossible to imagine any sensible person believing in the so-called threat to China from Anglo-American machinations in Tibet. Therefore, if the Chinese put faith in this, they must have distrusted us so completely as to have taken us as tools or stooges of Anglo-American diplomacy or strategy. This feeling, if genuinely entertained by the Chinese in spite of your direct approaches to them, indicates that even though we regard ourselves as friends of China, the Chinese do not regard us as their friends. With the Communist mentality of “whoever is not with them being against them,” this is a significant pointer, of which we have to take due note. During the last several months, outside the Russian camp, we have practically been alone in championing the cause of Chinese entry into UN and in securing from the Americans assurances on the question of Formosa. We have done everything we could to assuage Chinese feelings, to allay its apprehensions and to defend its legitimate claims in our discussions and correspondence with America and Britain and in the UN. In spite of this, China is not convinced about our disinterestedness; it continues to regard us with suspicion and the whole psychology is one, at least outwardly, of scepticism perhaps mixed with a little hostility. I doubt if we can go any further that we have done already to convince China of our good intentions, friendliness and goodwill. In Peking, we have an Ambassador who is eminently suitable for putting across the friendly point of view. Even he seems to have failed to convert the Chinese. Their last telegrame to us is an act of gross discourtesy not only in the summary way it disposes of our protest against the entry of Chinese forces into Tibet but also in the wild insinuation that our attitude is determined by foreign influences. It looks as though it is not a friend speaking in that language but a potential enemy.

In the background of this, we have to consider what new situation now faces us as a result of the disappearance of Tibet, as we knew it, and the expansion of China almost up to our gates. Throughout history we have seldom been worried about our north-east frontier. The Himalayas have been regarded as an impenetrable barrier against any threat from the north. We had friendly Tibet which gave us no trouble. The Chinese were divided. They had their own domestic problems and never bothered us about frontiers. In 1914, we entered into a convention with Tibet which was not endorsed by the Chinese. We seem to have regarded Tibetan autonomy as extending to independent treaty relationship. Presumably, all that we required was Chinese counter-signature. The Chinese interpretation of suzerainty seems to be different. We can, therefore, safely assume that very soon they will disown all the stipulations which Tibet has entered into with us in the past. That throws into the melting pot all frontier and commercial settlements with Tibet on which we have been functioning and acting during the last half a century. China is no longer divided. It is united and strong. All along the Himalayas in the north and north-east, we have on our side of the frontier a population ethnologically and culturally not different from Tibetans and Mongoloids. The undefined state of the frontier and the existence on our side of a population with its affinities to the Tibetans or Chinese have all the elements of the potential trouble between China and ourselves. Recent and bitter history also tells us that communism is no shield against imperialism and that the communist are as good or as bad imperialist as any other. Chinese ambitions in this respect not only covered the Himalayan slopes on our side but also include the important part of Assam. They have their ambitions in Burma also. Burma has the added difficulty that it has no McMohan line round which to build up even the semblance of an agreement. Chinese irredentism and communist imperialism are different from the expansionism or imperialism of the western powers. The former has a cloak of ideology which makes it ten times more dangerous. In the guise of ideological expansion lie concealed racial, national or historical claims. The danger from the north and north-east, therefore, becomes both communist and imperialist. While our western and non-western threat to security is still as prominent as before, a new threat has developed from the north and north-east. Thus, for the first time, after centuries, India’s defence has to concentrate itself on two fronts simultaneously. Our defence measures have so far been based on the calculations of superiority over Pakistan. In our calculations we shall now have to reckon with communist China in the north and in the north-east, a communist China which has definite ambitions and aims and which does not, in any way, seem friendly disposed towards us.

Let us also consider the political conditions on this potentially troublesome frontier. Our northern and north-eastern approaches consist of Nepal, Bhutan, Sikkim, the Darjeeling (area) and tribal areas in Assam. From the point of view of communication, there are weak spots. Continuous defensive lines do not exist. There is almost an unlimited scope for infiltration. Police protection is limited to a very small number of passes. There, too, our outposts do not seem to be fully manned. The contact of these areas with us is by no means close and intimate. The people inhabiting these portions have no established loyalty or devotion to India even the Darjeeling and Kalimpong areas are not free from pro-Mongoloid prejudices. During the last three years we have not been able to make any appreciable approaches to the Nagas and other hill tribes in Assam. European missionaries and other visitors had been in touch with them, but their influence was in no way friendly to India/Indians. In Sikkim, there was political ferment some time ago. It is quite possible that discontent is smouldering there. Bhutan is comparatively quiet, but its affinity with Tibetans would be a handicap. Nepal has a weak oligarchic regime based almost entirely on force; it is in conflict with a turbulent element of the population as well as with enlightened ideas of modern age. In these circumstances, to make people alive to the new danger or to make them defensively strong is a very difficult task indeed and that difficulty can be got over only by enlightened firmness, strength and a clear line of policy. I am sure the Chinese and their source of inspiration, Soviet Union would not miss any opportunity of exploiting these weak spots, partly in support of their ideology and partly in support of their ambitions. In my judgment, the situation is one which we cannot afford either to be complacent or to be vacillating. We must have a clear idea of what we wish to achieve and also of the methods by which we should achieve it. Any faltering or lack of decisiveness in formulating our objectives or in pursuing our policies to attain those objectives is bound to weaken us and increase the threats which are so evident.

Side by side with these external dangers, we shall now have to face serious internal problems as well. I have already asked (HVR) Iyengar to send to the EA Ministry a copy of the Intelligence Bureau’s appreciation of these matters. Hitherto, the Communist party of India has found some difficulty in contacting communists abroad, or in getting supplies of arms, literature, etc., from them. They had to contend with the difficult Burmese and Pakistan frontiers on the east with the long seaboard. They shall now have a comparatively easy means of access to Chinese communists and through them to other foreign communists. Infiltration of spies, fifth columnists and communists would now be easier. Instead of having to deal with isolated communist pockets and Telengana and Warangal we may have to deal with communist threats to our security along our northern and north-eastern frontiers, where, for supplies of arms and ammunition, they can safely depend on communist arsenals in China. The whole situation thus raises a number of problems on which we must come to early decision so that we can, as I said earlier, formulate the objectives of our policy and decide the method by which those objectives are to be attained. It is also clear that the action will have to be fairly comprehensive, involving not only our defence strategy and state of preparations but also problem of internal security to deal with which we have not a moment to lose. We shall also have to deal with administrative and political problems in the weak spots along the frontier to which I have already referred.

It is of course, impossible to be exhaustive in setting out all these problems. I am, however, giving below some of the problems which in my opinion, require early solution and round which we have to build our administrative or military policies and measures to implement them.

(a) A military and intelligence appreciation of the Chinese threat to 61 India both on the frontier and internal security.

(b) An examination of military position and such redisposition of our forces as might be necessary, particularly with the idea of guarding important routes or areas which are likely to be the subject of dispute.

(c) An appraisement of strength of our forces and, if necessary, reconsideration of our retrenchment plans to the Army in the light of the new threat. A long-term consideration of our defence needs. My own feeling is that, unless we assure our supplies of arms, ammunition and armour, we should be making a defence position perpetually weak and we would not be able to stand up to the double threat of difficulties both from the west and north and north-east.

(d) The question of Chinese entry into UN. In view of rebuff which China has given us and the method which it has followed in dealing with Tibet, I am doubtful whether we can advocate its claims any longer. There would probably be a threat in the UN virtually to outlaw China in view of its active participation in the Korean War. We must determine our attitude on this question also.

(e) The political and administrative steps which we should take to strengthen our northern and north-eastern frontier. This would include whole of border, i.e., Nepal, Bhutan, Sikkim, Darjeeling and tribal territory of Assam.

(f) Measures of internal security in the border areas as well as the states flanking those areas such as U.P., Bihar, Bengal and Assam.

(g) Improvement of our communication, road, rail, air and wireless, in these areas and with the frontier outposts.

(h) The future of our mission at Lhasa and the trading post of Gyangtse and Yatung and the forces which we have in operation in Tibet to guard the trade routes.

(i) The policies in regards to McMohan line.

These are some of the questions which occur to my mind. It is possible that a consideration of these matters may lead us into wider question of our relationship with China, Russia, America, Britain and Burma. This, however would be of a general nature, though some might be basically very important, i.e., we might have to consider whether we should not enter into closer association with Burma in order to strengthen the latter in its dealings with China. I do not rule out the possibility that, before applying pressure on us, China might apply pressure on Burma. With Burma, the frontier is entirely undefined and the Chinese territorial claims are more substantial. In its present position, Burma might offer an easier problem to China, and, therefore, might claim its first attention.

I suggest that we meet early to have a general discussion on these problems and decide on such steps as we might think to be immediately necessary and direct, quick examination of other problems with a view to taking early measure to deal with them.

Yours,

11

Vallabhbhai Patel

सरदार पटेल द्वारा लिखे पत्र से यह स्पष्ट है कि उन्हें आने वाली परिस्थितियों का पूर्वाभास हो गया था और वे चाहते थे कि भारत को कोई कारगर कदम उठानाचाहिए जिससे उत्तरी सीमा पर पैदा हुई परिस्थितियों से तुरन्त निपटा जा सके। उन्होंने एवं यथार्थवादी के रूप में उभरती हुई परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया।

6 दिसम्बर 1950 को लोक सभा में दिया नेहरू का वक्तव्य- परन्तु पं० नेहरू का आदर्शवादी व्यक्तित्व इन वास्तविकताओं को अनदेखा कर गया। पं० नेहरू एशियाई शक्तियों में भातृत्व की बात ही सोचते रहे। इस बात की पुष्टि तिब्बत पर चीनी सेना के अभियान के लगभग दो मास बाद 6 दिसम्बर 1950 को भारतीय लोक सभा में परराष्ट्र नीति पर बहस प्रारम्भ करते हुए नेहरू ने तिब्बत के सम्बन्ध में जो वक्तव्य दिया-

“तिब्बत में चीनी सेना के अभियान के सम्बन्ध में इससे पूर्व प्रात: कुछ प्रश्न किये गये थे……. जहां तक हमारा सम्बन्ध है, तिब्बत का मामला बहुत साधारण है। जब चीनी लोक गणतन्त्र की सरकार ने,’तिब्बत की मुक्ति के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करना प्रारम्भ किया तभी भारत की ओर से चीन-स्थित उसके राजदूत ने चीन सरकार को भारत के मत से अवगत करा दिया था। हमने अपनी यह हार्दिक आशा प्रकट की कि चीन और तिब्बत शांति पूर्वक समस्या हल कर लेंगे… “हमें यह विश्वास हो गया था कि समस्या शांतिपूर्ण ढंग से आपसी वार्ता के द्वारा हल कर ली जायेगी जब हमें चीनी सेना के अभियान का समाचार मिला, हमारे दिल पर धक्का लगा….. कहा जाता है कि अन्य देश तिब्बत में षडयन्त्र रच सकते है। मैं इसके संबन्ध में कुछ भी नहीं कह सकता, क्योंकि मै कुछ जानता ही नहीं हूँ। फिर भी यह निश्चित है कि तत्काल कोई संकट न था…… यही कारण है कि चीनी कार्यवाही से हमे आश्चर्य हुआ।”(Source: Jawahar Lal Nehru’s Speeches – 1949-1953, page- 187-188)

तिब्बत के प्रश्न पर नेहरू द्वारा व्यक्त किये गये विचारों से यह स्पष्ट हो जाता हैकि वे तिब्बत पर चीनी अधिपत्य को स्वीकार कर चुके थे। वास्तव में उत्तर में परिस्थितियां इतनी तेजी से बदल जाएंगी पं० नेहरू ने ऐसा शायद नहीं सोचा था।

आखिरकार पं नेहरू ने भी इस वास्तविकता से सहमति प्रकट की और सरदार पटेल को लिखे पत्र में अपने विचार प्रकट करते हुए स्पष्ट किया कि भारत-तिब्बत कीरक्षा के लिए क्यों कदम नहीं उठा सका? उन्होंने कहा …….

“हम चाहते हुए भी तिब्बतको नहीं बचा सकते, तथा हमें डर है कि हमारी इस ओर कोशिश कहीं उन्हें और अधिकखतरे में न डाल दे। हमारे लिए यह सही नहीं होगा कि हम तिब्बत को इस संकट मेंडाले। विशेषकर उस समय जबकि हम उनकी मदद करने में सक्षम नहीं है। यह अवश्यसम्भव हो सकता है कि तिब्बत की प्रभुसत्ता किसी तरह कायम रह सके, इसके लिए हम उनकी मदद करे। यही तिब्बत के लिए व भारत के लिए हितकर होगा। जहां तक मेरा विचार है, इस सब के लिए भारत व चीन के बीच जो मतभेद है उन्हें अधिक गहरे होनेसे रोका जाए।”

तिब्बत पर पूरी तरह से चीन का कब्जा

स्पष्ट है कि इस समय भारतीय दृष्टिकोण ऐन केन प्राकेण चीन को प्रसन्न रखने का था शायद यही कारण है कि जब तिब्बत सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में मदद की अपील (11 नवम्बर 1950) की गयी और इस संबन्ध में जब तिब्बत की समस्या को लेक रलैटिन अमेरिका के एक छोटे से राष्ट्र एल. सेल्वाडोर के प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार के हनन का प्रश्न उठाया तो श्रीकृष्ण मेनन ने उसके उत्तर में यह दलील पेश की, कि चूंकि पेकिंग की सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं है इसलिए तिब्बत में मानवीय अधिकारों को कुचलने के लिए संयुक्त राष्ट्र उसे दोषी नहीं ठहरा सकता। इस समय भारत सरकार का यह रूख था कि चीन या तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखल देने की उनकी कोई इच्छा नहीं है क्योंकि इससे केवल शीत युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है।

परिणामस्वरूप 24 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की संचालन समिति ने तिब्बत की अपील पर चर्चा स्थगित कर दी। संचालन समिति ने यहपाया कि भारतीय प्रतिनिधि इस मामले क शांतिपूर्ण हल चलाते हैं। भारत ने यह पक्ष तब अख्तियार किया जब अक्टूबर 1950 में चीन के आक्रमण से पूर्व इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट तिब्बत को स्वतन्त्र क्षेत्र का दर्जा प्रदान कर चुका था।

अतः भारत सरकार द्वारा तिब्बत के प्रति इस ढीले रवैये के कारण तिब्बत को असहाय की स्थिति में 23 मई 1951 को चीन द्वारा प्रस्तावित 17 सूत्री मसौदे के समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा। इस समझौते में तिब्बत की सीमित स्वायत्तता स्वीकार करते हुए यह प्रावधान किया गया कि चीन तिब्बत के विदेश संबन्धों का संचालन करेगा, तिब्बत की पूर्ण सुरक्षा के लिए चीन की सेनाएं तिब्बत में तैनात की जाएंगी और तिब्बत की सेनाओं का पुनर्गठन किया जाएगा ताकि आगे चलकर चीन की सेना में उसका विलय हो जाए। यह भी वचन दिया गया कि ल्हासा वापस आने पर दलाई लामा को पूर्ण सम्मान दिया जाएगा, तिब्बत मे पूरी धार्मिक स्वतन्त्रता सुनिश्चित की जायेगी, तिब्बत के विकास में चीन पूर्ण सहयोग देगा और यह भी कि चीन का एक प्रशासकीय तथा सैनिक मिशन तिब्बत में नियुक्त किया जायेगा (हालांकि चीन ने इसका कभी पालन नहीं किया)। इस प्रकार तिब्बत को पूरी तरह चीनी प्रदेश में परिवर्तित कर दिया गया।

1954 में नेहरू ने औपचारिक तौर पर मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है…

भारत सरकार ने 1954 में चीन के साथ तिब्बत को लेकर एक संधि की, जिसे ‘पंचशील संधि’ के नाम से जाना जाता है। इस संधि में भारत सरकार ने पहली बार लिखित रूप में तिब्बत को चीन का स्वायत्त प्रदेश स्वीकार किया और तिब्बत में भारतीय दूतावास, जो उन दिनों मिशन के नाम से जाना जाता था को बंद कर दिया। स्वतंत्र तिब्बत के साथ भारत के शताब्दियों पुराने व्यापार के अधिकारों को समाप्त करने की बात भी भारत सरकार ने स्वीकार कर ली।

2Source: http://www.mea.gov.in/Uploads/PublicationDocs/191_panchsheel.pdf

तिब्बत कभी नहीं रहा चीन का हिस्सा…

तिब्बत सदियों से एक स्वतंत्र देश था लेकिन मंगोल राजा कुबलई खान ने युवान राजवंश की स्थापना की और उसने तब तिब्बत, चीन, वियतनाम और कोरिया तक अपने राज्य का परचम लहराया था। फिर सत्रहवहीं शताब्ती में चीन के चिंग राजवंश के तिब्बत के साथ रिश्ते बने और फिर लगभग 260 वर्ष के बाद चीन की चिंग सेना ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया लेकिन 3 वर्ष के भीतर विदेशी शासन को उखाड़ फेंका और 1912 में 13वें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतंत्रता की घोषणा की। तब से लेकर 1951 तक तिब्बत एक स्वंत्र देश के रूप में जाना जाता था।

  • 1912: चीन में किंग वंश के पतन के बाद चीनी सेना तिब्बत की राजधानी ल्हासा से बाहर कर दी गई।
  • 13वें दलाई लामा ने स्वतंत्रता की घोषणा की और 1950 तक तिब्बतियों ने वहां शासन किया।
  • 1935: 6 जुलाई को 14वें दलाई लामा का जन्म हुआ। नवंबर 1950 चौदहवें दलाई लामा की ताजपोशी हुई।
  • 1950: अक्टूबर में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी तिब्बत में दाखिल हुई।
  • 1951: मई में तिब्बत के प्रतिनिधियों ने दबाव में आकर चीन के साथ एक 17-सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें तिब्बत को स्वायत्तता देने का वादा किया गया था।
  • 1951: सितंबर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ल्हासा में दाखिल हो गई।
  • 1954: दलाई लामा ने पीकिंग की यात्रा की।
  • 1959: 10 मार्च को चीन के कब्जे के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ।
  • 1965: चीन ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र का गठन किया।
  • 1979: तिब्बत में मंद गति से उदारीकरण शुरू हुआ।
  • 1985: तिब्बत को बड़े पैमाने पर पर्यटन के लिए खोल दिया गया।
  • 1987: ल्हासा और शिगात्से में विद्रोह शुरू हुआ।
  • 1989: हू जिंताओ और उनकी पार्टी के नेताओं के नेतृत्व में तिब्बत में दमनचक्र चला।
  • 2002: चीन की सरकार ने दलाई लामा के साथ बातचीत प्रारंभ की। लेकिन वार्ता बेनतीजा रही।
  • 2008: 14 मार्च को ल्हासा में चीन विरोधी दंगे के बाद तिब्बत में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ।
  • चीन की सरकार ने इस प्रदर्शन को शक्ति से दबाया, कई लोगों की गिरफ्तारी हुई।

चीन का कहना है, “सात सौ साल से भी ज़्यादा समय से तिब्बत पर चीन की संप्रभुता रही है और तिब्बत कभी भी एक स्वतंत्र देश नहीं रहा है. दुनिया के किसी भी देश ने कभी भी तिब्बत को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी है.”

दलाई लामा की भूमिकाचीन और दलाई लामा का इतिहास ही चीन और तिब्बत का इतिहास है. सन 1409 में जे सिखांपा ने जेलग स्कूल की स्थापना की थी. इस स्कूल के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार किया जाता था. यह जगह भारत और चीन के बीच थी जिसे तिब्बत नाम से जाना जाता है. इसी स्कूल के सबसे चर्चिच छात्र थे गेंदुन द्रुप. गेंदुन आगे चलकर पहले दलाई लामा बने. बौद्ध धर्म के अनुयायी दलाई लामा को एक रूपक की तरह देखते हैं. इन्हें करुणा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. दूसरी तरफ इनके समर्थक अपने नेता के रूप में भी देखते हैं. दलाई लामा को मुख्य रूप से शिक्षक के तौर पर देखा जाता है. लामा का मतलब गुरु होता है. लामा अपने लोगों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं. तिब्बती बौद्ध धर्म के नेता दुनिया भर के सभी बौद्धों का मार्गदर्शन करते हैं.

1630 के दशक में तिब्बत के एकीकरण के वक़्त से ही बौद्धों और तिब्बती नेतृत्व के बीच लड़ाई है. मान्चु, मंगोल और ओइरात के गुटों में यहां सत्ता के लिए लड़ाई होती रही है. अंततः पांचवें दलाई लामा तिब्बत को एक करने में कामयाब रहे थे. इसके साथ ही तिब्बत सांस्कृतिक रूप से संपन्न बनकर उभरा था. तिब्बत के एकीकरण के साथ ही यहां बौद्ध धर्म में संपन्नता आई.

बौद्धों ने 14वें दलाई लामा को भी मान्यता दी. दलाई लामा के चुनावी प्रक्रिया को लेकर ही विवाद रहा है. 13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था. करीब 40 सालों के बाद चीन के लोगों ने तिब्बत पर आक्रमण किया. चीन का यह आक्रमण तब हुआ जब वहां 14वें दलाई लामा के चुनने की प्रक्रिया चल रही थी. तिब्बत को इस लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा. कुछ सालों बाद तिब्बत के लोगों ने चीनी शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. ये अपनी संप्रभुता की मांग करने लगे.

हालांकि विद्रोहियों को इसमें सफलता नहीं मिली. दलाई लामा को लगा कि वह बुरी तरह से चीनी चंगुल में फंस जाएंगे. इसी दौरान उन्होंने भारत का रुख किया. दलाई लामा के साथ भारी संख्या में तिब्बती भी भारत आए थे. साल 1959 का था. चीन को भारत में दलाई लामा को शरण मिलना अच्छा नहीं लगा. तब चीन में माओत्से तुंग का शासन था. दलाई लामा और चीन के कम्युनिस्ट शासन के बीच तनाव बढ़ता गया. दलाई लामा को दुनिया भर से सहानुभूति मिली लेकिन अब तक वह निर्वासन की ही ज़िंदगी जी रहे हैं.

सि‍द्धों की भूमि है तिब्बत- तिब्बत प्राचीन काल से ही योगियों और सिद्धों का घर माना जाता रहा है तथा अपने पर्वतीय सौंदर्य के लिए भी यह प्रसिद्ध है। संसार में सबसे अधिक ऊंचाई पर बसा हुआ प्रदेश तिब्बत ही है। तिब्बत मध्य एशिया का सबसे ऊंचा प्रमुख पठार है। वर्तमान में यह बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र है। राहुलजी सांस्कृतायन के अनुसार तिब्बत के 84 सिद्धों की परम्परा ‘सरहपा’ से आरंभ हुई और नरोपा पर पूरी हुई। सरहपा चौरासी सिद्धों में सर्व प्रथम थे। इस प्रकार इसका प्रमाण अन्यत्र भी मिलता है लेकिन तिब्बती मान्यता अनुसार सरहपा से पहले भी पांच सिद्ध हुए हैं। इन सिद्धों को हिन्दू या बौद्ध धर्म का कहना सही नहीं होगा क्योंकि ये तो वाममार्ग के अनुयायी थे और यह मार्ग दोनों ही धर्म में समाया था। बौद्ध धर्म के अनुयायी मानते हैं कि सिद्धों की वज्रयान शाखा में ही चौरासी सिद्धों की परंपरा की शुरुआत हुई, लेकिन आप देखिए की इसी लिस्ट में भारत में मनीमा को मछींद्रनाथ, गोरक्षपा को गोरखनाथ, चोरंगीपा को चोरंगीनाथ और चर्पटीपा को चर्पटनाथ कहा जाता है। यही नाथों की परंपरा के 84 सिद्ध हैं।

भारत का तीर्थ- कैलाश पर्वत और मानसरोवर तिब्बत में ही स्थित है। यहीं से ब्रह्मपुत्र नदी निकलती हैं। तिब्बत स्थित पवित्र मानसरोवर झील से निकलने वाली सांग्पो नदी पश्चिमी कैलाश पर्वत के ढाल से नीचे उतरती है तो ब्रह्मपुत्र कहलाती है। तिब्बत के मानसरोवर से निकलकर बाग्लांदेश में गंगा को अपने सीने से लगाकर एक नया नाम पद्मा फिर मेघना धारण कर सागर में समा जाने तक की 2906 किलोमीटर लंबी यात्रा करती है। कालिदास ने कैलाश और मानसरोवर के निकट बसी हुई कुबेर की नगरी ‘अलकापुरी’ का ‘मेघदूत’ में वर्णन किया है।

प्राचीन काल में इसे त्रिविष्टप कहते थे- प्राचीनकाल में तिब्बत को त्रिविष्टप कहते थे। भारत के बहुत से विद्वान मानते हैं कि तिब्बत ही प्राचीन आर्यों की भूमि है। पौराणिक ग्रंथों अनुसार वैवस्वत मनु ने जल प्रलय के बाद इसी को अपना निवास स्थान बनाया था और फिर यहीं से उनके कुल के लोग संपूर्ण भारत में फैल गए थे। वेद-पुराणों में तिब्बत को त्रिविष्टप कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था।

जब भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना

साल 2003 के जून महीने में भारत ने ये आधिकारिक रूप से मान लिया था कि तिब्बत चीन का हिस्सा है. चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन के साथ तत्कालानी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाकात के बाद भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का अंग मान लिया था. हालांकि तब ये कहा गया था कि ये मान्यता परोक्ष ही है. लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों में इसे एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा गया था.

3Source: https://timesofindia.indiatimes.com/pm-on-china-visit/news/India-recognises-Tibet-as-part-of-China/articleshow/41145.cms

क्या तिब्बत पर भारत ने बड़ी भूल की थी…

19 जुलाई 2017 को लोकसभा में मुलायम सिंह ने कहा कि भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी. मुलायम सिंह ने यहां तक कह दिया कि चीन ने भारत पर हमले की तैयारी कर ली है. क्या भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर वाकई भूल की थी?

आरसएस की पत्रिका ऑर्गेनाइजर के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी भी मुलायम सिंह की बातों से सहमत हैं कि भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी. उन्होंने कहा कि पहली बार 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना और चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा.

तिब्बत पर भारत का स्टैंड- हालांकि शेषाद्री चारी कहते हैं कि यह भारत का दूरदर्शी भरा क़दम नहीं था. प्रधानमंत्री बनने से पहले वाजपेयी तिब्बत को स्वतंत्र देश के रूप में रेखांकित करते थे. ऐसे में प्रधानमंत्री बनने के बाद वाजपेयी का यह क़दम सबको हैरान करने वाला था. शेषाद्री चारी भी वाजपेयी के क़दम से हैरान हुए थे. आख़िर वाजपेयी के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद तिब्बत पर अपना रुख बदल लिया.

शेषाद्री चारी कहते हैं, “हमारी वो रणनीतिक भूल थी और हमने बहुत जल्दीबाजी में ऐसा किया था. हमें तिब्बत को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए था. शुरू से हमें एक स्टैंड पर कायम रहना चाहिए था. हमें बिल्कुल साफ़ कहना चाहिए था कि चीन ने तिब्बत पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है और यह स्वीकार नहीं है.”

चारी ने कहा, “वाजेपयी सरकार को रणनीतिक तौर पर इसे टालना चाहिए था. उस वक़्त हमने तिब्बत के बदले सिक्किम को सेट किया था. चीन ने सिक्किम को मान्यता नहीं दी थी लेकिन जब हमने तिब्बत को उसका हिस्सा माना तो उसने भी सिक्किम को भारत का हिस्सा मान लिया.” उनका कहना है कि “इसके बाद ही नाथुला में सरहद पर ट्रेड को मंजूरी दी गई. नाथुला से इतना बड़ा व्यापार नहीं होता है कि इतनी बड़ी क़ीमत चुकानी चाहिए थी. तब ऐसा लगता था कि यह एक अस्थाई फ़ैसला है और बाद में स्थिति बदलेगी.

1914 का शिमला समझौता- शेषाद्री चारी ने कहा कि “जब भी कोई रणनीतिक फ़ैसला होता है तो आने वाले वक़्त में ग़लत साबित होने की आशंका बनी रहती है. ऐसा पंडित नेहरू के साथ भी हुआ था. चीन की जैसी आक्रामकता है उसे देख ऐसा लगता है कि वह भूटान को दूसरा तिब्बत बना देगा.”

जेएनयू में सेंटर फोर चाइनिज़ एंड साउथ ईस्ट एशिया स्टडीज के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक का मानना है कि “तिब्बत के मामले में भारत की बड़ी लचर नीति रही है. साल 1914 में शिमला समझौते के तहत मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना गया लेकिन 1954 में नेहरू ने औपचारिक तौर पर मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ पंचशील समझौते पर दस्तखत कर दिया। Source: BBC

सीमा विवाद

22

सन 1950 से लेकर 1954 तक अनेक अवसरों पर लोक-सभा में परराष्ट्र-नीति पर होने वाली बहस में सीमान्त की सुरक्षा का प्रश्न उठया जाता रहा क्योंकि तिब्बत में अपनी स्थिति पूरी तरह सुदृढ़ करके चीन ने भारतीय सीमान्तों पर अतिक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया था। उल्लेखनीय है कि चीन की पिपुल्स सरकार ने प्रारम्भ में इन सीमाओं के विषय में कोई विरोध प्रकट नहीं किया क्योंकि वे परम्परागत सीमाओं को मानते थे। अतः सीमाओं पर कमी भी संदेह की स्थिति न उत्पन्न हो इसलिए नेहरू ने 20 नवम्बर 1950 को लोक सभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि- Map or nomap. The McMahon Line is our definitive frontier, and no one will be allowed to cross that frontier.” (Source: Nevile Maxwell; “India’s China War” (Bombay, 1971), page- 75)

  • चीन की प्रतिक्रिया- शुरु में चीनी अधिकारियों ने इस नीति की घोषणा का कोई विरोध नहीं किया लेकिन बाद में सितम्बर 1951 को चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-इन-लाई ने भारतीय राजदूत K.M Pannikar को परामर्श दिया कि तिब्बत और भारत की सीमा का सवाल शीघ्र हलकर लिया जाना चाहिए ताकि उसे एक स्थायी रूप मिल सके। इस प्रकार चीन ने पहली बार खुले रूप में भारत-तिब्बत अर्थात भारत-चीन सीमा को वार्ता हेतु प्रस्तुत किया। चाऊ ने नेपाल को भी वार्ता में शामिल करने का सुझाव दिया। इस वार्ता के प्रस्ताव के सम्बन्ध में मैक्सवेल ने यह भी उल्लेख किया है कि- Chou also stated,according to the Indian record of the conversation, that there was no territorial dispute or controversy between India and China.” (Source: Nevile Maxwell; “India’s China War” (Bombay, 1971), page- 76)
  • भारत की प्रतिक्रिया- चाऊ-इन-लाई के इस प्रस्ताव के उत्तर में भारत की ओर से यह कहा गया किवैसे तो दोनों देशों की सीमा कहीं विवादास्पद नहीं है, लेकिन यदि चीन चाहता है तोइस पर विचार-विमर्श हो सकता है। जनवरी 1952 में चीन में भारतीय राजदूत पाणिक्कर को तिब्बत तथा उससे लगी भारतीय सीमा के सम्बन्ध में प्रतिरक्षा जैसे मुद्दो से अवगत कराया गया।
  • चीनी पीएम का टाल-मटोल वाला रवैया- Pannikar चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-इन-लाई से कई बार मिले लेकिन चाऊ-इन-लाई सीमा मुद्दों को छोड़कर सिर्फ सांस्कृतिक और व्यापारिक मुद्दों पर ही बात करते। इस पर Indian Ambassador to the United Nations वीके कृष्ण मेनन (1957 में रक्षा मंत्री बने थे) का विचार था- China’s attitude was ‘cunning’. मेनन आगे कहते हैं- चेंगटू (Chengtu) की मिलिट्री एकेडमी की दीवार पर चीन का एक ऐसा मानचित्र बना था जो उसका वास्तविक मानचित्र था और इस मानचित्र में कश्मीर का तथा मैकमोहन रेखा के दक्षिण का कुछ भाग शामिल किया गया था। शायद यही कारण था कि चीन की सरकार तिब्बत के मुद्दे पर बात करने से कतराती थी।(Source: Note by Menon, April, 11, 1952, Vijayalakshmi Pandit Papers)

मैकमोहन रेखा ग्रेट ब्रिटेन और तिब्बत के बीच हुए ‘शिमला सम्मेलन’ (अक्टूबर, 1913-जुलाई, 1914) की समाप्ति पर निर्धारित तिब्बत और ब्रिटिश भारत के बीच की सीमांत रेखा, जिसका नाम ब्रिटिश वार्ताकार सर हेनरी मैकमोहन के नाम पर पड़ा।

1958- चीन ने अपने एक MAP में छापा था नेफा से लेकर लद्दाख तक का कुछ हिस्सा

  • जुलाई 1958 में चीन ने अपने एक मासिक पत्रिका ‘चाइना पिक्टोरियल’ में एक मानचित्र प्रकाशित किया जिसमें नेफा का एक बहुत बड़ा हिस्सा तथा लद्दाख के कुछ हिस्सों को चीन की सीमा के अंदर दिखाया गया।(Source: Srinath Raghavan ; “Sino-Indian Boundary Dispute, 1948-60 : A Reappraisal.” Economic And Political Weekly, September 9, 2006, pge- 3886.)
  • जब भारत सरकार ने 21 अगस्त 1958 को एक पत्र द्वारा चीन सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया तो चीन ने उत्तर दिया कि चीन ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण नहीं किया और न ही सीमा समस्या से संबन्धित देशों से विचार-विमर्श किया है। इसलिए इस नवीन मानचित्र को बदला नहीं जा सकता। “In this note, for the first time objection was taken by the Government of India about large areas of Ladakh, Eastern Part of Kashmir Territory- disputed between India and Pakistanbeing shown as chinese territory.” – Karunakar Gupta ; “The Hidden History of the SinoIndia Frontier” (Calcutta, 1974), page-

साफ था इस उत्तर ने चीन की पूर्व स्थिति से हटने के साफ संकेत दे दिए थे- “चीन ने पहले कहा था- कि मानचित्र पुराने हैं और समय आने पर इनमें सुधार कर लिया जाएगा।“ यह चीन की विस्तारवादी नीति के एक साफ पहलु था।

तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार करना

Bundesarchiv_Bild_135-S-11-07-17,_Tibetexpedition,_Militärparade

इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया. इस तरह उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था. भारत को 1904 की ऐंग्लो तिबतन संधि के तहत तिब्बत के संबंध में जो अधिकार मिले थे भारत ने वे सारे इस संधि के बाद छोड़ दिए,

  • बाद में उठे सवाल- हालाँकि बाद में ये भी सवाल उठे कि इसके एवज में भारत ने सीमा संबंधी सारे विवाद निपटा क्यों नहीं लिए. मगर इसके पीछे भी भारत की मित्रता की भावना मानी जाती है कि उसने चीन के शांति और मित्रता के वायदे को मान लिया और निश्चिंत हो गया.
  • पंडित नेहरू ने अप्रैल 1954 में संसद में इस संधि का बचाव करते हुए कहा था, “ये वहाँ के मौजूदा हालात को सिर्फ़ एक पहचान देने जैसा है. ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों से ये क़दम उठाया गया.” उन्होंने क्षेत्र में शांति को सबसे ज़्यादा अहमियत दी और चीन में एक विश्वसनीय दोस्त देखा. (Source: BBC)

अक्साई चिन विवाद

Map_western-sector_DBO_Daulat_Beg

भारत और चीन के बीच जिन दो क्षेत्रों को लेकर सीमा विवाद है, उनमें से एक अरुणाचल प्रदेश है तो वहीं दूसरा अक्साई चिन ही है। अक्साई चिन, जम्मू-कश्मीर का उत्तर-पूर्वी हिस्सा है और पूरे प्रदेश के क्षेत्रफल का करीब 20 प्रतिशत भाग है। चीनी कब्जे से पहले ये प्रदेश के लद्दाख क्षेत्र में आता था, जिसकी एक सीमा तिब्बत से तो दूसरी सीमा चीन से लगती थी। इस इलाके के कुछ हिस्से पर 1950 के दशक में चीन ने कब्जा करते हुए वहां से तिब्बत तक जा रही सड़क बना ली थी। हालांकि भारत को इस बात का पता देर से चला। इसके बाद साल 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने इस पर पूरी तरह अपना कब्जा कर लिया और इसे अपने शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र से मिला लिया था। तब से ये उसी के कब्जे में है।

  • क्षेत्रफल अक्साई चिन का क्षेत्रफल करीब 37,244 वर्ग किलोमीटर (14,380 स्क्वेयर मील) है। बर्फीला इलाका होने की वजह से इसे सफेद पत्थरों का रेगिस्तान भी कहा जाता है। काफी ज्यादा ठंडा और पथरीला इलाका होने की वजह से यहां कुछ भी नहीं उगता है, इसलिए इसे बर्फीला रेगिस्तान भी कहते हैं। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई करीब 5000 मीटर (16,000 फीट) है। जम्मू-कश्मीर और अक्साई चिन को जो रेखा अलग करती है, उसे LAC (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) कहा जाता है।
  • कहां है ये इलाका और कब से है विवादअक्साई चिन का ये इलाका तिब्बती पठार के उत्तर-पश्चिम में है. ये कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे का इलाका है. अगर ऐतिहासिकता में देखा जाए तो ये इलाका भारत को मध्य एशिया से जोड़ने वाले सिल्क रूप का हिस्सा था. सैंकड़ों सालों तक ये मध्य एशिया और भारत के बीच संस्कृति, बिजनेस और भाषा को जोड़ने का माध्यम रहा है. ये इलाका निर्जन है यहां स्थाई बस्तियां नहीं हैं.

सीमा विवाद से जुड़ा है मामला

  • भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की जड़ में अक्साई चिन भी शामिल है। भारत इस हिस्से पर अपना दावा करता है, तो वहीं चीन इसे अपना इलाका बताता रहा है। 1865 में सर्वे ऑफ इंडिया के अफसर William Johnson ने इलाके का जो नक्शा बनाया, उसमें अक्साई चिन को कश्मीर के साथ बताया। इस सीमा रेखा को लानाक-ला-पास (जॉनसन लाइन 1865) के नाम से जाना गया। इसके बाद जॉनसन को हटा दिया गया। भारत इसी लाइन के आधार पर अपना दावा अक्साई चिन पर करता है।
  • इसके कुछ सालों बाद साल 1889 तक ब्रिटेन और चीन के रिश्ते काफी सुधर गए। जिसके बाद ब्रिटेन ने एकबार फिर इलाके का पुनर्निधारण करने का सोचा और इसका जिम्मा George Macartney (the British consul general at Kashgar, Xinjiang, China) और Claude Maxwell MacDonald (British Diplomat) को दिया। जिन्होंने अक्साई चिन का ज्यादातर हिस्सा चीन में डाल दिया। इस लाइन को कोंगका-ला-पास (मैकार्टनी-मैक्डॉनाल्ड 1899) के नाम से जाना गया। चीन इसी लाइन के आधार पर अक्साई चिन पर अपना हक जताता है।
  • Macartney–Macdonald Line का उपयोग 1908 तक भारत के ब्रिटिश मानचित्रों पर किया गया था। लेकिन 1911 के Xinhai Revolution के बाद चीन में केंद्रीय शक्ति का पतन हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक, ब्रिटिश आधिकारिक Johnson Line को आधिकारिक लाइन बना लिया। 1927 में सीमा रेखा को फिर से समायोजित किया गया और Johnson Line को ही आधिकारिक लाइन माना गया। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत सरकार ने अपनी आधिकारिक सीमा के आधार के रूप में जॉनसन लाइन का उपयोग किया, जिसमें अक्सिन चिन शामिल था। On 1 July 1954 Prime Minister Jawaharlal Nehru wrote a memo directing that the maps of India be revised to show definite boundaries on all frontiers. Up to this point, the boundary in the Aksai Chin sector, based on the Johnson Line, had been described as “undemarcated.”

चीन द्वारा सड़क निर्माण- During the 1950s, the People’s Republic of China built a 1,200 km (750 mi) road connecting Xinjiang and western Tibet, of which 179 km  ran south of the Johnson Line through the Aksai Chin region claimed by India. Aksai Chin was easily accessible to the Chinese, but was more difficult for the Indians on the other side of the Karakorams to reach.The Indians did not learn of the existence of the road until 1957, which was confirmed when the road was shown in Chinese maps published in 1958.

चीन ने अक्साई चिन के इलाके पर 1950 के दशक में कब्जा कर लिया था. भारत लंबे समय तक इस मामले से अनभिज्ञ रहा. 1957 में भारत को पता चला कि इलाके में चीन ने सड़क निर्माण तक शुरू कर दिया है. भारत ने इसकी खबर मिलते ही विरोध जताया. 1962 के कैबिनेट सचिव एस.एस खैरा लिखते हैं- “Information about activities of the chinese on the Indo-Tibetan border particularly in the Aksai Chin area had began to come in by 1952 or earlier”.

इस इलाके में बनाई गई सड़क को पहली बार चीन ने 1958 में अपने नक्शे में दिखाया था. ये भारत द्वारा जताए गए विरोध के खिलाफ चीनी दादागीरी थी

28 अगस्त 1959 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बयान दिया था कि – Making a statement in Lok Sabha on August 28, 1959 (Jawaharlal Nehru: Selected Speeches, Volume 4, by Publications Division), Nehru said: “There is a large area in eastern and north-eastern Ladakh which is practically uninhabited. It is mountainous, and even the valleys are at an altitude generally exceeding 13,000 feet. To some extent, shepherds use it during the summer months for grazing… The Government of India have some police check-posts in this area but, because of the difficulties of terrain, most of these posts are at some distance from the International Border.”

  • “Some reports reached us between October 1957 and February 1958 that a Chinese detachment had crossed the international frontier and visited Khurnak Fort, which is within Indian territory. The attention of the Chinese Government was drawn to this, and they were asked to desist from entering our territory… there is no physical demarcation of the frontier in these mountainous passes, although our maps are quite clear on the subject. Thereafter, at the end of July 1959… a small Indian reconnaissance police party was sent to this area. When this party… was proceeding towards Khurnak Fort, it was apprehended, some miles from the border inside our territory, by a stronger Chinese detachment. This happened on July 28.”
  • “…the Chinese claimed that that part of the territory was theirs, but added that they would release the persons who had been apprehended. We sent a further Note to them expressing surprise at this claim and giving them the exact delineation of the traditional international frontier in this sector… No reply has yet been received to this Note. Our party was released on August 18.”
  • Three days later, Nehru confirmed the worst Indian fears — the Chinese had built a road via Aksai Chin. “According to an announcement made in China, the Yehcheng-Gartok Road, which is also called the Sinkiang-Tibet Highway, was completed in September 1957… Two reconnaissance parties were accordingly sent last year. One of these parties was taken into custody by a superior Chinese detachment. The other returned and gave us some rough indication of this newly constructed road in the Aksai Chin area,” he informed Rajya Sabha.

इन बयान के तीन दिन बाद नेहरू ने एक बहुत बड़ी कड़वी सच्चाई से देशवासियों को रू-ब-रू करा दिया कि चीन ने अक्साई चिन होते हुए एक सडक़ बना दी है। नेहरू ने राज्यसभा को बताया – ‘ चीन में की गई एक घोषणा के अनुसार येशेंग-गारतोक सडक़ जिसे सिंक्यिांग – तिब्बत हाईवे भी कहते हैं, इसका निर्माण सितम्बर 1957 में पूरा हो गया था।

राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद का पं. नेहरू को लिखा पत्र

13

क्या अक्साई चिन नेहरू सरकार की सबसे बड़ी एतिहासिक भूल थी?- भूल यह कि चीन ने भारतीय क्षेत्र में लंबी-चौड़ी सडक़ बना डाली और दिल्ली सरकार को इसकी भनक तक न लग पाई। सीआईए ने 2017 में लाखों गोपनीय जानकारियां सार्वजिनक की थीं जिसमें भारत और भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ी भी कई रिपोर्ट्स हैं। ऐसी ही एक रिपोर्ट में लिखा है – ‘ अक्टूबर 1957 को एक चीनी अखबार ने खबर छापी कि दुनिया की सबसे ऊंची हाईवे सिंक्यिांग – तिब्बत सडक़ का निर्माण पूरा हो गया है।

  • नेहरू ने दो साल बाद संसद को दी जानकारी- अखबार ने लिखा कि ये हाईवे 1979 किमी लंबा है और इस पर ट्रकों की आवाजाही शुरू हो गई है।’यानी दिल्ली में बैठी सरकार को कुछ पता ही नहीं था या पता होने के बावजूद देश को इसकी जानकारी नहीं दी गई। नेहरू ने दो साल बाद संसद को यह जानकारी दी।
  • ये जानकारी भी इसलिए दी क्योंकि 22 अप्रैल 1959 को संसद में एक सदस्य ने कहा कि कई अखबारों में खबर छपी है कि चीन ने हमारे 30 हजार वर्ग मीटर इलाके पर दावा कर दिया है। तथा नक्शे में अक्साई चिन को चीनी इलाका दिखाया गया है।
  • सांसद के सवाल पर नेहरू ने कहा – ‘माननीय सदस्य हांगकांग या ऐसी ही अन्य जगहों से उत्पन्न हुई ऐसी खबरों पर ज्यादा ध्यान न दें। हमारे (क्षेत्र पर) ऐसा कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दावा नहीं किया गया है।’ नेहरू ने अपने बयान में अक्साई चिन का नाम ही नहीं लिया था।
  • अप्रैल 1960 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई हफ्ते भर की यात्रा पर दिल्ली आए। उन्होंने नेहरू को बातचीत के दौरान बताया कि अक्साई चिन हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है। चाऊ एन लाई ने कहा – ‘हम भारत पर अपने नक्शे नहीं थोपते हैं और हम चाहेंगे कि भारत भी ऐसा न करे। अगर हमें कोई समझौता करना है तो हम दोनों के नक्शे बदलने होंगे। ये तभी होगा जब चीन सीमा के सवाल को हल कर ले।’ चाऊ एन लाई की यात्रा के दो साल बाद चीन ने अक्साई चिन में और भीतर तक कब्जा जमा लिया।
  • चीन ने अपनी कूटयोजना के तहत 2 मार्च 1963 को पाकिस्तान के साथ समझौता करके काराकोरम क्षेत्र के उत्तर में पाक अधिकृत कश्मीर के 5180 वर्ग किमी क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया- पाकिस्तान ने चीन-भारत युद्ध से पहले ही 3 मई, 1962 को चीन के सामने एक और जिनजियांग और दूसरी ओर गिलगित के बीच सीमा निर्धारण का प्रस्ताव रखा था। चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते पर 2 मार्च, 1963 पर हस्ताक्षर किए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि चीन ने उससमय कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन किया।

Nehru’s Aksai Chin Blunder- ‘Delhi was not concerned.’ ‘It would continue sleeping for several more years, with the result that Indian territory is still occupied by China today,’ says Claude Arpi (s French-born author, journalist, historian and tibetologist). One of the Nehru government’s biggest historical blunders has been the Aksai Chin road built by China on Indian soil without Delhi noticing it. Among the several lakhs of recently released historical documents by the Central Intelligence Agency, a couple of Information Reports dating from 1953 shed some light on the issue.

Let us look at some facts.

On October 6, 1957, a Chinese newspaper, Kuang-ming Jih-pao reported: ‘The Sinkiang-Tibet — the highest highway in the world — has been completed.’

‘During the past few days, a number of trucks running on the highway on a trial basis have arrived in Ko-ta-k’e in Tibet from Yecheng in Sinkiang (Xinjiang),’ the newspaper reporter.’The Sinkiang-Tibet Highway… is 1,179 km long, of which 915 km are more than 4,000 metres above sea level; 130 km of it over 5,000 metres above sea level, with the highest point being 5,500 meters.’ Rediff.com- February 03, 2017 Click to see more

1962 युद्ध

sunday-standard-china-war-october-21-1962-ft-121023

The front page headlines in The Sunday Standard dated October 211962, announcing the other kind of Chinese invasion that happened half-a-century ago.

तनाव की शुरुआत- मार्च 1959 में दलाई लामा शरण लेने के लिए भारत आए तो यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। फिर कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग ने भारत पर तिब्बत में ल्हासा विद्रोह को भड़काने का आरोप लगाया। इसके बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा।

छिटपुट संघर्ष की घटनाएं

  • 1959 के बाद से 1962 के बीच भारत और चीन के बीच छिटपुट संघर्ष होने लगा। 10 जुलाई1962 को करीब 350 चीनी सैनिकों ने चुशुल स्थित एक भारतीय चौकी को घेर लिया। चीनी सैनिकों ने लाउडस्पीकर्स पर गोरखा सैनिकों को समझाने की कोशिश की कि वे भारत के लिए नहीं लड़ें।

युद्ध की शुरुआत

  • युद्ध की शुरुआत 20 अक्टूबर1962 को हुई। चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी ने लद्दाख पर और नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) में मैकमोहन लाइन के पार हमला कर दिया। युद्ध के शुरू होने तक भारत को पूरा भरोसा था कि युद्ध शुरू नहीं होगाइस वजह से भारत की ओर से तैयारी नहीं की गई।
  • युद्ध से 10 महीने पहले 21 दिसम्बर1961 को नेहरू ने कहा कि वे विश्वास से कहते हैं कि हम चीन से हर प्रकार से निपटने में सक्षम हैं। इसी तरह के वक्तव्य 1962 के प्रारम्भ में भी दिये गये। उधर चीनी सेना ने 8 सितम्बर,1962 को थागला रिज को पार कर लिया। यह चीन के 20 अक्टूबर 1962 के विशाल आक्रमण की पूर्व पीठिका थी।
  • 20 अक्टूबर 1962 को छिटपुट गोलीबारी ने युद्द की शक्ल ले ली। नेफा से लेकर लद्दाख तक की सीमाओं पर चीन ने हमला कर दिया। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, “चीनी फौज ने हमारे ऊपर हमला किया और हमारे मुल्क में घुस आए।
  • यही सोचकर युद्ध क्षेत्र में भारत ने सैनिकों की सिर्फ दो टुकड़ियों को तैनात किया जबकि चीन की वहां तीन रेजिमेंट्स तैनात थीं। चीनी सैनिकों ने भारत के टेलिफोन लाइन को भी काट दिए थे। इससे भारतीय सैनिकों के लिए अपने मुख्यालय से संपर्क करना मुश्किल हो गया था।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण घटना 10 जुलाई1962 को गलवान घाटी में उस समय घटित हुई जब चीनी टुकड़ियों ने भारतीय सैनिक चौकी को घेर लिया और चेतावनी दी कि यदि भारतीय टुकड़ियों ने स्थान खाली न किया तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे। भारत सरकार ने चीन की इस धमकी का जवाब देते हुए कहा कि यदि चीनी फौजें सामने आ टकरायेंगी ते भारतीय सिपाही भी आत्मरक्षार्थ गोलियाँ चलायेंगे।
  • पहले दिन चीन की पैदल सेना ने पीछे से भी हमला किया। लगातार हो रहे नुकसान की वजह से भारतीय सैनिकों को भूटान से निकलना पड़ा। चीन के शुरुआती हमलों का तो भारत की ओर से मोर्टार दागकर सामना किया गया। जब भारतीय सैनिकों को पता चला गया कि चीनी सैनिक एक दर्रे में जमा हुए हैं तो इसने मोर्टार और मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में चीन के करीब 200 सैनिक मारे गए।
  • भारतीय सेना पूरी तरह तैयार नहीं थीइस वजह से चीन की सेना तेजी से भारतीय इलाकों में घुसती गई। 24 अक्टूबर तक चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में 15 किलोमीटर अंदर तक आ गए।

चीन की ओर से संघर्ष विराम की पहली पेशकश… नेहरू ने रद्द की

  • चीनी प्रधानमंत्री लाई ने 24 अक्टूबर 1962 को नेहरू को एक पत्र लिखकर संघर्षविराम के लिए तीन-सूत्रीय प्रस्ताव रखे। इन-लाई ने प्रस्ताव रखा कि भारत और युद्ध समाप्त कर दें। इन-लाई ने प्रस्ताव रखा था कि चीन अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन NEFA-नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) से वापस निकल जाएगा और भारत एवं चीन को अकसाई चीन पर यथापूर्व स्थिति बनाए रखना चाहिए।
  • 27 अक्टूबर1962 को नेहरू ने चीन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि अकसाई चीन पर चीन का दावा अवैध है। इसीबीच सोवियत यूनियन ने भी अपना रुख बदलते हुए चीन का समर्थन कर दिया था और कहा था कि मैकमोहन लाइन ब्रिटिश साम्राज्यवाद का खतरनाक परिणाम है।

देश में आपात काल की घोषणा- भारत में चीनी आक्रमण से उत्पन्न स्थिति का सामना करने के लिए राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन् नें 26 अक्टूबर,1962 को देश में आपात काल की घोषणा कर दी। उन्होंने उसी रात भारत रक्षा अध्यादेश भी जारी कर दिया।

नेहरू ने रक्षा मंत्री का पद अपने हाथ में लिया- उत्तरी सीमा पर हो रही गतिविधियों के लिए नेहरू को दोष नहीं दिया गया बल्कि रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन पर गुस्सा उतारा गया। चीन आक्रमण के तीन दिन बाद दिल्ली में 23 अक्टूबर 1962 को कांग्रेस के 30 सांसदो ने अपनी एक शिकायत में कहा- कि न तो संसद और न ही देश को सरकार द्वारा अंधेरे में रखा गयाअपितु नेहरूसंसद और देश को कृष्ण मेनन द्वारा अंधेरे में रखा गया। इस पर कई सांसदों ने नेहरू को रक्षा मंत्री का पद स्वंय संभालने को कहा। 31 अक्टूबर को नेहरू ने रक्षा विभाग अपने हाथ में ले लिया। हालांकि मेनन कैबिनेट में रहे

चीनी पीएम चाउ एन लाई की कूटनीतिक चाल में उलझे नेहरू- उधर चीनी पीएम चाउ एन लाई ने कूटनीतिक चाल चलते हुए दुनिया को यह साबित करने में लगे कि 20 अक्टूबर को भारत ने चीन पर हमला किया और चीन ने उसका सिर्फ जवाब दिया। 4 नवंबर 1962 को लाई नेहरू को एक पत्र लिख था जिसमें उन्होंने कहा कि नामका-चू-घाटी में भारतीय टुकड़ियों ने विशाल आक्रमण के लिए भारी सैनिक जमाव किया। इसके दस दिन पश्चात AFRO-ASIAN देशों की सरकारों को लिखे पत्र में चाउ एन लाई ने लिखा- कि भारत ने पूरी सीमा पर विशाल आक्रमण प्रारम्भ कर दिया है।

चीन का जोरदार हमला- 14 नवंबर को फिर से दोनों देश के बीच युद्ध शुरू हो गया। 15 नवंबर1962: पूर्वी सीमा और पश्चिमी क्षेत्र में चीन का जोरदार हमला। 18 नवंबर1962: चीन ने नेफा में बोमडिला पर कब्जा किया

15 नवंबर1962: पूर्वी सीमा और पश्चिमी क्षेत्र में चीन का जोरदार हमला

18 नवंबर1962: चीन ने नेफा में बोमडिला और दक्षिण लद्दाख के रेज़ांग ला में एक साथ हमला कर दिया।

युद्ध विराम की घोषणा- 21 नवंबर1962: चीन ने एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा की और अपने सैनिकों को वास्तविक नियंत्रण रेखा के 20 किलोमीटर पीछे लौटने को कहा। चीन की घोषणा में यह भी कहा गया कि वह अवैध मैकमोहन रेखा के उत्तर में हट जायेगा परन्तु नियन्त्रण रेखा के अन्तर्गत वह कुछ असैनिक निरीक्षक चौकियाँ रखेगा। चीन की इस घोषणा के बाद युद्ध बन्द हो गया।

1962 के संघर्ष के बाद नेहरू की काफी आलोचना हुई और अनेक विचारकों ने अपने मत प्रकट किया कि भारत की विदेशनीति असफल है- लेकिन भारत की विदेशनीति चीन के सन्दर्भ में ही असफल हुई क्योंकि इसमें आदर्शवादी बातें ज्यादा था और अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए किसी देश को जो आवश्यक उपाय करने चाहिए थे वे नहीं किए गए।

  • एक तरफ भारत अपनी आस्थाओंवसुधैव कुटुम्बकम्पंचशीलशान्तिपूर्ण सहअस्तित्व का पालन करने के लिए कटिबद्ध थाऔर पूर्णत आर्दशवादी विचारधारा अपनाकर अपना लक्ष्य सिद्ध करना चाहता था तो दूसरी तरफ चीन आक्रमणतोड़-फोड़विस्तारवाद के नक्शेकदम पर चल रहा था और उसके पास शक्ति भी थी।
14Source: Dinman Patrika- 17-23 Nov 1985
15Source: K. Subrahmanyam in the Indian Foreign Policy, the Nehru years edited by BR Nanda

भारत की सैन्य कमजोरियों की पुष्टि जनरल थिमैया के जुलाई 1962 में लिखे लेख से हो जाती है- 

16

चीन का धोखा

हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा आजादी के वक्त से ही भारत चीन के साथ अच्छे संबंध चाहता था। भारत जापान के साथ एक समझौते में इसलिए नहीं शामिल हुआ था क्योंकि चीन को उस समझौते से दूर रखा गया थालेकिन चीन भारत के खिलाफ दोस्ती के बजाए अपनी नई चाल चल रहा था। चीन ने जब तिब्बत पर कब्जा किया तो भारत ने इसका विरोध किया और बातचीत के लिए कहा। चीन और भारत ने 1954 में एक संधि की जिसके तहत भारत ने तिब्बत में चीनी शासन को मान लिया। इसी दौरान दोनों देशों की दोस्ती का मजबूत करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया।

नेहरु को था भरोसाचीन नहीं करेगा हमला- भारत-चीन युद्ध के कुछ महीने पहले तक नेहरु और देश को भरोसा था कि दोनों देशों में अच्छे संबंध बने रहेंगे और चीन हमला नहीं करेगा। जिस वजह से विवादित क्षेत्र में भारत ने दो डिवीजन तैनात किया था जबकि चीनी सैनिकों ने वहां तीन रेजिमेंट को लगा दी थी।

चीन ने भारत के क्षेत्र का अपना बताया

इस संधि के कुछ दिन बाद ही चीन ने अपने नक्शे में भारत के 12 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने हिस्से में दिखा दिया। 4 सितंबर1958: भारत ने चाइना पिक्टोरियल में उत्तरी असम और नेफा को शामिल करने पर आपत्ति जताई। 23 जनवरी1959: जो एनलाई ने औपचारिक रूप से भारत के अंदर नेफा और लद्धाख के 40,000 वर्गमीटर पर दावा जताय। जिस पर तुरंत संज्ञान लेते हुए पंडित नेहरु ने नक्शे को सुधरने के निर्देश दिए। इस घटना के पांच साल बाद 1959 में दलाई लामा चीन छोड़कर भारत की शरण में आ गए। चीन को उम्मीद थी कि भारत चीन की वजह से दलाई लामा का विरोध करेगा लेकिन इससे उलट भारत में दलाई लामा का भव्य स्वागत हुआ। जिससे बुरी तरह भड़के चीन ने भारत पर तिब्बत में विद्रोह करवाने का आरोप लगा दिया। चीन को लगने लगा कि भारत उसके लिए तिब्बत में बड़ा खतरा बन सकता है। चीन भारत को लेकर बौखलाया हुआ था।

दलाई लामा के भारत आने के बाद 1962 तक भारत-चीन के सैनिकों में कई हिंसक झड़पे हुईं-

  • 25 अगस्त1959: लद्दाख में चीनी सैनिकों ने भारतीय चौकी पर हमला किया
  • 8 सितंबर1959: चीन ने मैकमोहन लाइन को स्वीकार करने से इनकार किया
  • 20 अक्टूबर1959: चीनी सैनिकों ने अकसाई चीन में गश्त कर रहे भारतीय सैनिकों पर हमला किया। भारत के 9 सैनिकों की मौत और 10 को बंदी बनाया।
  • 7 नवंबर1959: जो इनलाई ने मैकमोहन लाइन के दोनों तरफ 20 किलोमीटर हटने का प्रस्ताव रखा
  • 25 अप्रैल1960: विवादित क्षेत्र पर भारत के दस्तावेजी साक्ष्यों को चीन ने खारिज किया
  • 3 जून1960: चीनी सैनिकों ने नेफा में भारतीय सीमा का उल्लंघन किया
  • 31 अक्टूबर1961: चीन ने सीमा पर गश्त में आक्रामकता दिखाईभारत में सैन्य दस्ते भेजे
  • अप्रैल 1962: चीन ने अल्टिमेटम दियाअग्रिम चौकियों से भारतीय सैनिकों को वापस लेने की मांग की
  • 10 जून1962: भारत और चीनी सैनिक लद्दाख में आमने-सामनेसशस्त्र संघर्ष टला
  • 13 सितंबर1962: चीन ने फिर सीमा के दोनों तरफ दोनों फौजों को 20-20 किलोमीटर वापस लौटने का प्रस्ताव रखा
  • 20 सितंबर1962: चीनी सैनिकों ने NEFA में मैकमोहन लाइन पार कीभारतीय चौकियों पर हमला
  • 29 सितंबर1962: चीनी सैनिकों ने नेफा में दूसरा जोरदार हमला किया

1962 के भारत-चीन युद्ध में कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग की बहुत बड़ी भूमिका थी… किस तरह तैयार की थी माओ ने ये योजना… और कैसे अमेरिका और रूस ने दिया था भारत को धोखा… क्या यहां नेहरू की विदेश नीति की कमजोर हुई…

  • माओ ने भारत से युद्ध की रणनीति दो साल पहले ही बना ली थी- चीन में भारत के ऑशार डी फ़ेयर्स रहे लखन मेहरोत्रा सितंबर 2016 बीबीसी को बताते हैं, “कहने को तो चीन ने ये कहा कि भारत के साथ लड़ाई के लिए उसकी फ़ारवर्ड नीति ज़िम्मेदार थीलेकिन माओ ने दो साल पहले 1960 में ही भारत के ख़िलाफ़ रणनीति बनानी शुरू कर दी थी.
  • चीन ने पहले अमेरिका से किया समझौता- यहां तक कि उन्होंने अमरीका तक से पूछ लिया कि अगर हमें किसी देश के ख़िलाफ़ युद्ध में जाना पड़े तो क्या अमरीका ताइवान में उसका हिसाब चुकता करेगाअमरीका का जवाब था कि आप चीन या उससे बाहर कुछ भी करते हैंउससे हमारा कोई मतलब नहीं है. हम बस ताइवान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
  • बाद में भारत को दोस्त करने वाले रूस को भी अपने साथ मिला लिया- लखन मेहरोत्रा आगे बताते हैं, “अगले साल उन्होंने यही बात ख़्रुश्चेव से पूछी. उस ज़माने में तिब्बत की सारी तेल सप्लाई रूस से आती थी. उन्हें डर था कि अगर उनकी भारत से लड़ाई हुई तो सोवियत संघ कहीं पेट्रोल की सप्लाई बंद न कर दे. उन्होंने ख़्रुश्चेव से ये वादा ले लिया कि वो ऐसा नहीं करेंगे और उन्हें बता दिया कि भारत से उनके गहरे मतभेद हैं. ख़्रुश्चेव ने उनसे सौदा किया कि आप दुनिया में तो हमारा विरोध कर रहे हैंलेकिन जब हम क्यूबा में मिसाइल भेजेंगे तो आप उसका विरोध नहीं करेंगे. ख़्रुश्चेव को ये पूरा अंदाज़ा था कि चीन भारत पर हमला कर सकता है. यहाँ तक कि मिग युद्धक विमानों की सप्लाई के लिए हमारा उनसे समझौता हो गया था. लेकिन जब लड़ाई शुरू हुई रूस ने वो विमान भेजने में देरी की लेकिन चीन को पेट्रोल की सप्लाई नहीं रोकी गई. बाद में जब ख़ुश्चेव से जब ये पूछा गया कि आप ऐसा कैसे कर सकते थे तो उनका जवाब था भारत हमारा दोस्त है लेकिन चीन हमारा भाई है.”

‘चीन से हार के लिए नेहरू भी ज़िम्मेदार’

Source: ToI & BBC… 18 मार्च 2014

Mar 2014- Australian journalist Neville Maxwell finally made part of the Henderson Brooks report public, by putting it up on his blog. The report was an internal Indian Army enquiry into its rout in the 1962 war with China — Maxwell was the New Delhi correspondent for The Times, London, at the time — but since the report was written up by Lt Gen Henderson Brooks and Brig PS Bhagat, successive Indian governments have refused to make it public. Only two copies of the report were thought to be in existence, although there was never any doubt that Maxwell had had access to the report for his 1970 book India’s China War quoted extensively from it. In his first interview to the Indian media since he made the report public, the now 88-year-old Maxwell tells TOI that he had been trying to make the report public for years but that nobody would publish it.

फॉरवर्ड पॉलिसी

इस रिपोर्ट में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यालय और रक्षा मंत्रालय की नीतियों ख़ासकर उसकी ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ के लिए आलोचना की गई है.

इस पॉलिसी के तहत कथित तौर पर सैन्य मोर्चे पर मौजूद सैन्य अधिकारियों की सलाह के विपरीत सीमा पर आक्रामक नीति अपनाई गई, जबकि सीमा पर मौजूद सेना के पास संसाधनों का सख्त अभाव था.

सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर एजेएस बहल उस समय सेकेंड लेफ्टिनेंट थे. वो सात महीने तक युद्ध बंदी के रूप में रहे थे. बहल इस बात से ख़ुश हैं कि ‘सच आख़िरकार सामने आ गया.’ वे कहते हैं कि इस युद्ध में चीन के हाथों बुरी तरह हारने के लिए अक्सर भारतीय सेना को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

वे कहते हैं, “अब लोगों को पता चल जाएगा कि सेना क्यों विफल हुई थी. अब इसकी ज़िम्मेदारी और लोगों जैसे ख़ुफिया सेवाओं, सैन्य अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं पर आएगी.”

यह रिपोर्ट भारत सरकार को साल 1963 में सौंपी गई थी. भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली मौजूदा गठबंधन सरकार से इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का आग्रह किया था.

लेकिन भारत के मौजूदा रक्षा मंत्री एके एंटनी ने संसद में कहा कि इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें संवेदनशील जानकारियाँ हैं.

‘पूरा सच’

ब्रिगेडियर बहल चाहते हैं कि इस रिपोर्ट को पूरी तरह सार्वजनिक किया जाए. वे कहते हैं, “भारत का हर सैनिक पूरा सच जानना चाहेगा.” ‘द हेंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट’ भारत सरकार ने तैयार कराई थी. इसे कभी भी उजागर नहीं किया गया. पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह राजीव डोगरा कहते हैं कि यह बिल्कुल सही समय है जब भारत सरकार को इस रिपोर्ट को पूरा जारी किया जाए.

वे कहते हैं, “गुप्त और गोपनीय रिपोर्टों को भारतीय क़ानून के अनुसार तीस साल बाद जारी किया जाना चाहिए. अगर कोई रिपोर्ट बहुत ज़्यादा संवेदनशील है तो इसे नहीं भी जारी किया जा सकता है. लेकिन मुझे यह नहीं समझ आता कि भारत सरकार इस रिपोर्ट को क्यों नहीं जारी करना चाहती क्योंकि चीन के हाथों भारत की हार के ज़्यादातर कारण पहले से ही सार्वजनिक जानकारी में है.”

मैक्सवेल के पास यह रिपोर्ट साल 1970 से मौजूद है जब उन्होंने अपनी किताब लिखी थी. उन्होंने अपनी वेबसाइट पर इस रिपोर्ट के हिस्से जारी करते हुए लिखा कि इस रिपोर्ट का सार्वजनिक न किए जाने के पीछे कारण ‘राजनीतिक, विभाजन पैदा करने वाले और शायद पारिवारिक’ हैं.

1962 युद्ध में वो चार टक्कर… जिसको चीन आज भी याद कर कांप जाता है…

1- 17 Nov 1962- Battle of Nuranang Rifleman Jaswant Singh Rawat

17 नवंबर, 1962 को चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के उद्देश्य से हमला कर दिया। इस 18दौरान सेना की एक बटालियन (4th battalion, 4th Garhwal Rifles) की एक कंपनी नूरानांग ब्रिज की सेफ्टी के लिए तैनात की गईजिसमें जसवंत सिंह रावत भी शामिल थे। चीनी सेना हावी होती जा रही थीइसलिए भारतीय सेना ने गढ़वाल यूनिट की चौथी बटालियन को वापस बुला लिया। लेकिन इसमें शामिल जसवंत सिंहलांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी और गोपाल गुसाई नहीं लौटे। ये तीनों सैनिक एक बंकर से गोलीबारी कर रही चीनी मशीनगन को छुड़ाना चाहते थे। तीनों जवान चट्टानों और झाड़ियों में छिपकर भारी गोलीबारी से बचते हुए चीनी सेना के बंकर के करीब जा पहुंचे और महज 15 यार्ड की दूरी से हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए दुश्मन सेना के कई सैनिकों को मारकर मशीनगन छीन लाए। इससे पूरी लड़ाई की दिशा ही बदल गई और चीन का अरुणाचल प्रदेश को जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका। हालांकिइस गोलीबारी में त्रिलोकी और गोपाल मारे गए। वहींजसवंत को दुश्मन सेना ने घेर लिया। इस लड़ाई में जसवंत सिंह ने शहीद होने से पहले अकेले ही 300 से ज़्यादा चीनी सैनिकों को मार गिराया था। इस बहादुरी के लिए जसवंत सिह को महावीर चक्र और त्रिलोक सिंह और गोपाल सिंह को वीर चक्र दिया गया। जिस चौकी पर जसवंत सिंह ने आखिरी लड़ाई लड़ी थी उसका नाम अब जसवंतगढ़ रख दिया गया है और वहां उनकी याद में एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर में उनसे जुड़ीं चीजों को आज भी सुरक्षित रखा गया है।

2- 21 Oct 1962- चीनी सेना ने सरिजान इंडियन पोस्‍ट पर किया था हमला और Lt Col Dhan Singh Thapa

लद्दाख के पांगोंग झील के उत्तर में स्थित सिरीजाप घाटी को चुशुल एयरफील्ड की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था. इस क्षेत्र में किसी भी दुश्मन अतिक्रमण और घुसपैठ को रोकने के लिए 1/8 गोरखा राइफल्स19 ने सरिजाप -1 नामक एक चौकी स्‍थापित की थी. सरिजाप -1 नामक इन चौकी की कमान उन दिनों मेजर धन सिंह थापा की डी‘ कंपनी के एक प्लाटून के पास थी. 1962 में चीनी सेना इने इसी चौकी के रास्‍ते भारत पर हमला किया था. यह वाकया 21 अक्टूबर 1962 का है.

सुबह करीब 6 बजे चीनी सेना ने अपने नापाक मंसूबों के तहत इस चौकी पर तोप और मोर्टार से हमला किया था. भारतीय सेना की स्थिति कमजोर करने के लिए चीनी सेना तोप और मोर्टार से लगातार बमबारी कर रही थी. बम बारी के दौरान दुश्‍मन सेना विशेषतौर पर भारतीय कमांड पोस्‍ट को अपना निशाना बना रही थी. बमबारी के चलते इस कमांड सेंटर का वायरलेस पूरी तरह से क्षतिग्रस्‍त हो गया था. जिसके चलते कमांड पोस्‍ट पर तैनात जवानों का संपर्क मुख्‍य कमांड से टूट गया था.

लिहाजाइस पोस्‍ट पर तैनात जवान अब अपनी मदद के लिए रिइंफोसर्समेंट भी नहीं बुला सकते थे. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मेजर धन सिंह थापा ने दुश्‍मनों से मोर्चा लेने का फैसला किया. इसी बीचचीनी सेना के पैदल सैनिकों ने भी इस भारतीय पोस्‍ट पर हमला बोल दिया. दुश्‍मन सेना के इस हमले का मेजर थापा ने मुंहतोड़ जवाब दिया. नतीजनतदुश्‍मन सेना के कई लड़ाके युद्ध क्षेत्र में मारे गए. अपने सैनिकों को लगातार मरता हुआ देख चीनी सेना ने अपने पैर खींचने में ही अपनी भलाई समझी.

चीनी सेना के बचे हुए जवान मौके से भाग खड़े हुए. चीनी सैनिक भले ही इस हमले में नाकाम हो गए होंलेकिन अभी तक उन्‍होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी थी. इस बार उसने अपने सैन्‍य बेड़े में टैंक भी शामिल कर लिए थे. दुश्‍मन सेना ने तीसरी बार अपनी पूरी ताकत के साथ भारत की इस पोस्‍ट पर हमला बोला. वहींअब तक दो हमलों का सामना कर चुके मेजर थापा के सैनिक या तो शहीद हो चुके थे या फिर गंभीर रूप से घायल हो चुके थे. चीनी सेना से लगातार लड़ते हुए मेजर थापा के मौजूद गोलाबारूद और गोलियां भी खत्‍म होने लगी थी. मेजर थापा और उनके बचे हुए जवान जब तक गोलाबारूद थातब तक वे दुश्‍मन सेना को मुंहतोड़ जवाब देते रहे.

गोला बारूद और गोली खत्‍म होने पर मेजर थापा और उनके जवान संगीन लेकर चीनी दुश्‍मन पर टूट पड़े. उन्‍होंने अपनी संगीन से कई दुश्‍मनों को मार गिराया. इस युद्ध खत्‍म होने के बाद यह धारणा बनी कि युद्ध के दौरान मेजर थापा शहीद हो गए हैं. लेकिनबाद में पता चला कि मेजर थापा को चीनी दुश्‍मन ने बंधक बना लिया है. इस जानकारी के आधार पर मेजर थापा को चीनी दुश्‍मनों के चंगुल से मुक्‍त कराया गया. युद्ध के दौरानमेजर थापा के युद्ध कौशलसाहसनेतृत्‍व झमता के मद्देनजर उन्‍हें सेना के सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया.

3- 23 Oct 1962- ‘बुम ला‘ युद्ध और Subedar Joginder Singh Sahnan

चीनी सेना ने 20 अक्टूबर को नमखा चू सेक्टर और लद्दाख समेत पूर्वी सीमा के अन्य हिस्सों पर एक साथ 20हमले शुरू कर दिए. तीन दिनों में उसने बहुत सारी जमीन पर कब्जा कर लिया और धोला-थगला से भारतीय उपस्थिति को बाहर कर दिया. अब चीन को तवांग पर कब्जा करना था जो उसकी सबसे बड़ी चाहत थी. उसे तवांग पहुंचने से रोकने का काम भारतीय सेना की 1st battalion of Sikh Regiment को दिया गया था.

चीन ने अपनी सेना की एक पूरी डिविजन बमला इलाके में जमा करनी शुरू कर दी जहां से तवांग पैदल जाने का एक रास्ता सिर्फ 26 किलोमीटर का था. लेकिन बमला के उस रास्ते से 3 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में ट्विन पीक्स नाम की एक जगह थी जिस पर खड़े होकर मैकमोहन लाइन तक चीन की हर हरकत पर नजर रखी जा सकती थी. अब दुश्मन को बमला से ट्विन पीक्स तक पहुंचने से रोकना. इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण जगह थी जिसका नाम था आईबी रिज.

ट्विन पीक्स से एक किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में टॉन्गपेंग ला पर पहली सिख बटालियन की एक डेल्टा कंपनी ने अपना बेस बनाया था जिसके कमांडर थे लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक. उनकी डेल्टा कंपनी की 11वीं प्लाटून आईबी रिज पर तैनात थी जिसके कमांडर थे सूबेदार जोगिंदर सिंह. सिखों की इस पलटन को तोपों और गोलाबारी से कवर देने के लिए 7वीं बंगाल माउंटेन बैटरी मौजूद थी

23 अक्टूबर की सुबह 4.30 बजे चीनी सेना ने मोर्टार और एंटी-टैंक बंदूकों का मुंह खोल दिया ताकि भारतीय बंकर नष्ट किए जा सकें. फिर 6 बजे उन्होंने असम राइफल्स की पोस्ट पर हमला बोला. सुबह की पहली किरण के साथ फिर चीनी सेना ने आईबी रिज पर आक्रमण कर दिया ताकि ट्विन पीक्स को हथिया लिया जाए.

सूबेदार जोगिंदर सिंह को ये पता था कि चीनी फौज बमला से तीखी चढ़ाई करके आ रही है और वे लोग ज्यादा मजबूत आईबी रिज पर बैठे हैं. यानी सिख पलटन अपनी पुरानी पड़ चुकी ली एनफील्ड 303 राइफल्स से भी दुश्मन को कुचल सकते हैं. इसके अलावा उनके पास गोलियां कम थीं इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों से कहा कि हर गोली का हिसाब होना चाहिए. जब तक दुश्मन रेंज में न आ जाए तब तक फायर रोक कर रखो उसके बाद चलाओ.

जल्द ही इस फ्रंट पर लड़ाई शुरू हो गई. पहले हमले में करीब 200 चीनी सैनिक सामने थेवहीं भारतीय पलटन छोटी सी. लेकिन बताया जाता है कि जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने चीनी सेना का बुरा हाल किया. उनके बहुत सारे सैनिक घायल हो गए. उनका जवाब इतना प्रखर था कि चीनी सेना को पहले छुपना पड़ा और उसके बाद पीछे हटना पड़ा. लेकिन इसमें भारतीय पलटन को भी नुकसान पहुंचा. इसके बाद जोगिंदर ने टॉन्गपेंग ला के कमांड सेंटर से और गोला-बारूद भिजवाने के लिए कहा. ये हो रहा था कि 200 की क्षमता वाली एक और चीनी टुकड़ी फिर से एकत्रित हुई और दूसरी बार फिर से आक्रमण कर दिया. भयंकर गोलीबारी हुई. जोगिंदर को मशीनगन से जांघ में गोली लगी. वे एक बंकर में घुसे और वहां पट्टी बांधी. एकदम विपरीत हालात में भी वे पीछे नहीं हटे और अपने साथियों को चिल्लाकर निर्देश देते रहे. जब उनका गनर शहीद हो गया तो उन्होंने 2-इंच वाली मोर्टार खुद ले ली और कई राउंड दुश्मन पर चलाए. उनकी पलटन ने बहुत सारे चीनी सैनिकों को मार दिया था। लेकिन उनके भी ज्यादातर लोग मारे जा चुके थे या बुरी तरह घायल थे.

कुछ देर बाद उनकी पलटन के पास बारूद खत्म हो चुका था. सूबेदार सिंह ने इसके अपनी पलटन के बचे-खुचे सैनिकों को तैयार किया और आखिरी धावा शत्रु पर बोला. बताया जाता है कि उन्होंने अपनी-अपनी बंदूकों पर बेयोनेट यानी चाकू लगाकर, ‘जो बोले सो निहालसत श्री अकाल’ के नारे लगाते हुए चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया और कईयों को मार गिराया. लेकिन चीनी सैनिक आते गए. बुरी तरह से घायल सूबेदार जोगिंदर सिंह को युद्धबंदी बना लिया गया. वहां से तीन भारतीय सैनिक बच निकले थे जिन्होंने जाकर कई घंटों की इस लड़ाई की कहानी बताई. उसके कुछ ही देर बाद पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बंदी के तौर पर सूबेदार जोगिंदर सिंह की मृत्यु हो गई. इस अदम्य साहस से लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सबसे ऊंचा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र प्रदान किया गया.

4- 18 Nov 1962- रेजांग ला का युद्ध और Major Shaitan Singh Bhati

18 नवंबर 1962– 13 कुमायूं बटालियन की सी’ कम्पनी चुशूल सेक्टर में तैनात थी. बटालियन में 120 जवान थेजिनके पास इस पिघला देने वाली ठंड से बचने के लिए कुछ भी नहीं था. वो इस माहौल के21लिए नए थे. इसके पहले उन्हें इस तरह बर्फ के बीच रहने का कोई अनुभव न था. तभी सुबह के धुंधलके में रेजांग ला (रेजांग पास) पर चीन की तरफ से कुछ हलचल शुरू हुई. बटालियन के जवानों ने देखा कि उनकी तरफ रोशनी के कुछ गोले चले आ रहे हैं. टिमटिमाते हुए. बटालियन के अगुआ मेजर शैतान सिंह थे. उन्होंने गोली चलाने का आदेश दे दिया. थोड़ी देर बाद उन्हें पता चला कि ये रोशनी के गोले असल में लालटेन हैं. इन्हें कई सारे यॉक के गले में लटकाकर चीन की सेना ने भारत की तरफ भेजा था. ये एक चाल थी. अक्साई चीन को लेकर चीन ने भारत पर हमला कर दिया था.

चीनी सेना पूरी तैयारी से थी. ठंड में लड़ने की उन्हें आदत थी और उनके पास पर्याप्त हथियार भी थे. जबकि भारतीय टुकड़ी के पास 300-400 राउंड गोलियां और 1000 हथगोले ही थे. बंदूकें भी ऐसी जो एक बार में एक फायर करती थीं. इन्हें दूसरे वर्ल्ड-वार के बाद बेकार घोषित किया गया था. चीन को इस बात की जानकारी थी. इसीलिए उसने टुकड़ी की गोलियां ख़त्म करने के लिए ये चाल चली थी. चीन के सैनिकों ने आगे बढ़ना शुरू कर दिया था.

मेजर शैतान सिंह ने वायरलेस पर सीनियर अधिकारियों से बात की. मदद मांगी. सीनियर अफसरों ने कहा कि अभी मदद नहीं पहुंच सकती. आप चौकी छोड़कर पीछे हट जाएं. अपने साथियों की जान बचाएं. मेजर इसके लिए तैयार नहीं हुए. चौकी छोड़ने का मतलब था हार मानना. वे अपनी टुकड़ी के साथ वहीं डटे रहे. चीनी सेना ने तोपों और मोर्टारों का हमला शुरू हो गया. चीनी सैनिकों से ये 120 जवान लड़ते रहे. दस-दस चीनी सैनिकों से एक-एक जवान ने लोहा लिया. इन्हीं के लिए कवि प्रदीप ने लिखा दस-दस को एक ने माराफिर गिर गए होश गंवा के. जब अंत समय आया तो कह गए कि हम चलते हैं. खुश रहना देश के प्यारोंअब हम तो सफ़र करते हैं.’‘

ज्यादातर जवान शहीद हो गए और बहुत से जवान बुरी तरह घायल हो गए. मेजर खून से सने हुए थे. दो सैनिक घायल मेजर शैतान सिंह को एक बड़ी बर्फीली चट्टान के पीछे ले गए. मेडिकल हेल्प वहां मौजूद नहीं थी. इसके लिए बर्फीली पहाड़ियों से नीचे उतरना पड़ता था. मेजर से सैनिकों ने मेडिकल हेल्प लेने की बात की लेकिन उन्होंने मना कर दिया.

उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि एक मशीन गन लेकर आओ. मशीन गन आ गई. उन्होंने कहा कि गन के ट्रिगर को रस्सी से मेरे एक पैर से बांध दो. उनके दोनों हाथ लथपथ थे. उन्होंने रस्सी की मदद से अपने एक पैर से फायरिंग करनी शुरू कर दी. उन्होंने दोनों जवानों से कहा कि सीनियर अफसरों से फिर से संपर्क करो. दोनों सैनिक वहां से चले गए.

मेजर वहां लड़ते रहे. बाद में उनके बारे में कुछ नहीं पता चला. तीन महीने बाद जब बर्फ पिघली और रेड क्रॉस सोसायटी और सेना के जवानों ने उन्हें खोजना शुरू किया तब एक गड़रिये ने बताया कि एक चट्टान के नीचे कोई दिख रहा है. लोग उसी चट्टान के नीचे पहुंचे जहां मेजर ने मशीन-गन से चीनी सैनिकों का मुकाबला किया था. उस जगह उनका शव मशीन-गन के साथ मिला. पैरों में अब भी रस्सी बंधी हुई थी. बर्फ की वजह से उनका शरीर जम गया था.

पता नहीं कितनी देर तक वो चीनी सैनिकों से लड़ते रहे और कब बर्फ ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया. उनके साथ उनकी टुकड़ी के 114 जवानों के शव भी मिले. बाकी लोगों को चीन ने बंदी बना लिया था. हालांकि भारत युद्ध हार गया था लेकिन बाद में पता चला कि चीन की सेना का सबसे ज्यादा नुकसान रेजांग ला पर ही हुआ था. चीन के करीब 1800 सैनिक इस जगह मारे गए थे. ये एकमात्र जगह थी जहां भारतीय सेना ने चीनी सेना को घुसने नहीं दिया था. बाद में मेजर शैतान सिंह को उनकी वीरता के लिए देश का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से नवाजा गया।

INDIAN FATALITIES

  • The Indian Defense Ministry, in 1965, showed 1,383 Indian soldiers killed, 1,696 missing in action, 3,968 soldiers captured, and 1,047 soldiers wounded.
  • According to PLA records from archives, Indian casualties during the war were 4,897 killed or wounded and 3,968 captured.

CHINESE FATALITIES

25

1962 के बाद चीन भारत से 3 बार और युद्ध लड़ चुका है

1- 1967 की पहली लड़ाई- 1967 को ऐसे साल के तौर पर याद किया जाता रहेगा जब हमारे सैनिकों ने चीनी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए सैकड़ों चीनी सैनिकों को न सिर्फ मार गिराया था, बल्कि उनके कई बंकरों को ध्वस्त कर दिया था. रणनीतिक स्थिति वाले नाथु ला दर्रे में हुई उस भिड़ंत की कहानी हमारे सैनिकों की जांबाजी की मिसाल है.

  • 14,200 फीट पर स्थित नाथु ला दर्रा तिब्बत-सिक्किम सीमा पर है, जिससे होकर पुराना गैंगटोक-यातुंग-ल्हासा व्यापार मार्ग गुजरता है. यूं तो सिक्किम-तिब्बत सीमा निर्धारण स्पष्ट ढंग से किया जा चुका है, पर चीन ने कभी भी सिक्किम को भारत का हिस्सा नहीं माना. 1965 के भारत-पाक युद्घ के दौरान चीन ने भारत को नाथु ला एवं जेलेप ला दर्रे खाली करने को कहा. भारत के 17 माउंटेन डिविजन ने जेलेप ला को तो खाली कर दिया, लेकिन नाथु ला पर भारत का आधिपत्य जारी रहा. आज भी जेलेप ला चीन के कब्जे में है.
  • नाथू ला दोनों देशों के बीच टकराव का बिंदु बन गया. 1967 के टकराव के दौरान भारत की 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन के जिम्मे नाथु ला की सुरक्षा थी. इस बटालियन की कमान तब ल़े कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) राय सिंह के हाथों में थी. इस बटालियन की कमान तब ब्रिगेडियर एम़ एम़ एस़ बक्शी, एमवीसी, की कमान वाले माउंटेन बिग्रेड के अधीन थी.
  • भारतीय सेना के एक सूत्र के मुताबिक नाथु ला दर्रे पर सैन्य गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच अक्सर जुबानी जंग का माहौल बना रहता था जो शीघ्र ही धक्कामुक्की में तब्दील हो गया. तब चीन पक्ष में टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने वाला एक मात्र शख्स उसका पॉलिटिकल कमीसार (राजनीतिक प्रतिनिधि) था, जिसकी भाषा भारतीय सैनिकों को समझ में आती थी.
  • 6 सितंबर, 1967 को धक्कामुक्की की एक घटना का संज्ञान लेते हुए भारतीय सेना ने तनाव दूर करने के लिए नाथु ला से लेकर सेबू ला तक के दर्रे के बीच में तार बिछाने का फैसला किया. यह जिम्मा 70 फील्ड कंपनी ऑफ इंजीनियर्स एवं 18 राजपूत की एक टुकड़ी को सौंपा गया. जब बाड़बंदी शुरू हुई तो चीन के पॉलिटिकल कमीसार ने राय सिंह से फौरन यह काम रोकने को कहा. दोनों ओर से कहासुनी शुरू हुई और चीनी अधिकारी के साथ धक्कामुक्की से तनाव बढ़ गया. चीनी सैनिक तुरंत अपने बंकर में लौट गए और भारतीय इंजीनियरों ने तार डालना जारी रखा.
  • चंद मिनटों के अंदर चीनी सीमा से ह्न्सिल की तेज आवाज आने लगी और फिर चीनियों ने मेडियम मशीन गनों से गोलियां बरसानी शुरू कीं. भारतीय सैनिकों को शुरू में भारी नुकसान झेलना पड़ा, क्योंकि उन्हें चीन से ऐसे कदम का अंदेशा नहीं था. राय सिंह खुद जख्मी हो गए, वहीं दो जांबाज अधिकारियों 2 ग्रेनेडियर्स के कैप्टन डागर एवं 18 राजपूत के मेजर हरभजन सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों के एक छोटे दल ने चीनी सैनिकों का मुकाबला करने की भरपूर कोशिश की और इस प्रयास में दोनों अधिकारी शहीद हो गए.
  • प्रथम 10 मिनट के अंदर करीब 70 सैनिक मारे जा चुके थे और कई घायल हुए. इसके बाद भारत की ओर से जो जवाबी हमला हुआ उसने चीन का इरादा चकनाचूर कर दिया. सेबू ला एवं कैमल्स बैक से अपनी मजबूत रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत ने जमकर आर्टिलरी पावर का प्रदर्शन किया. कई चीनी बंकर ध्वस्त हो गए… Indian Defence Ministry reported: 88 killed and 163 wounded on the Indian side, while 340 killed and 450 wounded on the Chinese side, during the two incidents.
  • भारत की ओर से लगातार तीन दिनों तक दिन-रात फायरिंग जारी रही. चीन को सबक सिखाया जा चुका था. 14 सितंबर को चीनियों ने धमकी दी कि अगर भारत की ओर से फायरिंग बंद नहीं हुई तो वह हवाई हमला करेगा. तब तक चीन को सबक मिल चुका था और फायरिंग रुक गई. रात में चीनी सैनिक अपने मारे गए साथियों की लाशें उठाकर ले गए और भारत पर सीमा का उल्लंघन करने का आरोप गढ़ा गया. 15 सितंबर को ले.ज. जगजीत अरोरा एवं ले. ज. सैम मानेकशॉ समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में शवों की अदला-बदली हुई.

2- 1967 की दूसरी लड़ाई- 1 अक्टूबर 1967 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने चाओ ला इलाके में फिर से भारत के सब्र की परीक्षा लेने का दुस्साहस किया, पर वहां मुस्तैद 7/11गोरखा राइफल्स एवं 10 जैक राइफल्स नामक भारतीय बटालियनों ने इस दुस्साहस को नाकाम कर चीन को फिर से सबक सिखाया. इस बार चीन ने सितंबर के संघर्ष विराम को तोड़ते हुए हमला किया था. दरअसल, सर्दी शुरु होते ही भारतीय फौज करीब 13 हजार फुट ऊंचे चो ला पास पर बननी अपनी चौकियों को खाली कर देती थी. गर्मियों में जाकर सेना दोबारा तैनात हो जाती थी. चीन ने 1 अक्टूबर का हमला यह सोचकर किया था कि चौकियां खाली होंगी, लेकिन चीन की मंशा को देखते हुए हमारी सेना ने सर्दी में भी उन चौकियों को खाली नहीं किया था. इसके बाद आमने सामने की सीधी लड़ाई शुरु हो गई.

  • हमारी सेना ने भी इस बार चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए गोले दागने शुरू कर दिए. इस लड़ाई का नेतृत्व करने वाले थे 17 वीं माउंटेन डिवीजन के मेजर जनरल सागत सिंह. लड़ाई के दौरान ही नाथू ला और चो ला दर्रे की सीमा पर बाड़ लगाने का काम किया गया ताकि चीन फिर इस इलाके में घुसपैठ की हिमाकत नहीं कर सके.
  • इस तरह 1967 की इस लड़ाई में भारतीय सेना ने चीनी हमलों को नाकाम कर दिया. लड़ाई के बाद घायल कर्नल राय सिंह को महावीर चक्र, शहादत के बाद कैप्टन डागर को वीर चक्र और मेजर हरभजन सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. बताया जाता है कि लड़ाई के दौरान जब भारतीय सेना के जवानों की गोलियां खत्म हो गईं तो बहादुर अफसरों एवं जवानों ने अपनी खुखरी से कई चीनी अफसरों एवं जवानों को मौत के घाट उतार दिया था.
  • 1967 के ये दोनों सबक चीन को आज तक सीमा पर गोली बरसाने से रोकते हैं. तब से आज तक सीमा पर एक भी गोली नहीं चली है, भले ही दोनों देशों की फौज एक दूसरे की आंखों में आंख डालकर सीमा का गश्त लगाने में लगी रहती है. क्या ऐसे सबक के बाद भी चीन भारत के साथ दुस्साहस करेगा?
  • चीन को याद रखना चाहिए जब 1962 के भारत एवं 1967 के भारत में इतना अंतर केवल 5 वर्षों में हो गया. ऐसे में 2017 के परमाणु शक्ति संपन्न भारत से चीन की लड़ाई मुश्किल ही है. इस तरह चीन को अतीत की घटनाओं में 1967 को कभी भूलना नहीं चाहिए.

3- 1987 की तीसरी लड़ाई- 86 में चीन को फिर लगा झटका- 1967 के 20 वर्ष बाद भारत से चीन को फिर से गहरा झटका लगा। जिसकी बुनियाद 1986 में चीन की ओर से रखी गयी। इस बार फिर टकराव पर चीन ने कहा कि भारत को इतिहास का सबक नहीं भूलना चाहिए, पर लगता है कि चीन भी कुछ भूल गया है।

  • 1986-87 में भारतीय सेना ने शक्ति प्रदर्शन में चीनी सेना यानि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को बुरी तरह से हिला दिया था। इस संघर्ष की शुरुआत तवांग के उत्तर में समदोरांग चू रीजन में 1986 में हुई थी. जिसके बाद उस समय के सेना प्रमुख जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के नेतृत्व में ऑपरेशन फाल्कन हुआ था.
  • नामका चू से हुई शुरूआत- 1987 की झड़प की शुरुआत नामका चू से हुई थी। भारतीय फौज नामका चू के दक्षिण में ठहरी थीं। लेकिन एक आईबी टीम समदोरांग चू में पहुंच गई। यह जगह नयामजंग चू के दूसरे किनारे पर है। समदोरंग चू और नामका चू दोनों नाले इस उत्तर से दक्षिण को बहने वाली नयामजंग चू नदी में गिरते है।
  • 1985 में भारतीय फौज पूरी गर्मी में यहां डटी रही, लेकिन 1986 की गर्मियों में पहुंची तो यहां चीनी फौजें मौजूद थीं। समदोरांग चू के भारतीय इलाके में चीन अपने तंबू गाड़ चुका था।.भारत ने पूरी कोशिश की कि चीन को अपने सीमा में लौट जाने के लिए समझाया जा सके, लेकिन अड़ियल चीन मानने को तैयार नहीं था।
  • ऑपरेशन फाल्कन- 2017 की तरह 1987 में भी चीन और भारत की सेना आंखों में आंख डाले सामने खड़ी थीं, लेकिन इस बार भी चीन को जवाब मिलने वाला था। चीन ने पूर्व में लड़ाई की तैयारी पूरी कर ली थी।
  • भारतीय सेना ने ऑपरेशन फाल्कन तैयार किया, जिसका उद्देश्य सेना को तेजी से सरहद पर पहुंचाना था। तवांग से आगे कोई सड़क नहीं थी, इसलिए जनरल सुंदर जी ने जेमीथांग नाम की जगह पर एक ब्रिगेड को एयरलैंड करने के लिए इंडियन एयरफोर्स को रूस से मिले हैवी लिफ्ट MI-26 हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करने का फैसला किया।
  • जनरल सुंदरजी व्यूह रचना- भारतीय सेना ने हाथुंग ला पहाड़ी पर पोजीशन संभाली,जहां से समदोई चू के साथ ही तीन और पहाड़ी इलाकों पर नजर रखी जा सकती थी। 1962 में चीन ने ऊंची जगह पर पोजीशन लिया था, परंतु इस बार भारत की बारी थी। जनरल सुंदर जी की रणनीति यही पर खत्म नहीं हुई थी।
  • ऑपरेशन फाल्कन के द्वारा लद्दाख के डेमचॉक और उत्तरी सिक्किम में T -72 टैंक भी उतारे गए। अचंभित चीनियों को विश्वास नहीं हो रहा था। भारत ने 7 लाख सैनिकों की तैनाती की थी।
  • चीनियों ने घुटने टेक दिये- फलत: लद्दाख से लेकर सिक्किम तक चीनियों ने घुटने टेक दिए। इस ऑपरेशन फाल्कन ने चीन को उसकी औकात दिखा दी। भारत ने शीघ्र ही इस मौके का लाभ उठाकर अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया।
  • वियतनाम युद्ध के बाद चीनी सेनाओं ने कोई भी लड़ाई नहीं लड़ी है, जबकि भारतीय सेना सदैव पाकिस्तानी सीमा पर अघोषित युद्ध में संघर्षरत है। हिमालयी सरहदों में चीन की इतनी काबिलियत नहीं है कि वह भारत का मुकाबला कर सके।
  • तुलनात्मक तौर पर भारत चीन के समक्ष भले ही कमजोर लग सकता है, परंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। 1967 के दोनों युद्धों से स्पष्ट है कि अपनी विशिष्ट एवं अचूक रणनीति के द्वारा भारत न्यूनतम संसाधनों के बीच भी चीन को हराने में सक्षम है।

राजनयिक घटनाक्रम 1986 में डेंग शियाओपिंग Deputy premier of China ने भारत को चेतावनी दी कि यदि वह अपनी सेना को वापस नहीं बुलाता है तो उसे ‘सबक’ सिखाया जायेगा। तब अमेरिकी रक्षामंत्री कैस्पर वेनबर्गर ने भारत-चीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। लेकिन भारत अपने रुख पर डटा रहा। इसके चलते सैन्य गतिरोध की स्थिति पैदा हो गयी। इसके बाद मई, 1987 में तत्कालीन विदेश मंत्री एनडी तिवारी ने चीन का दौरा किया। उन्होंने चीन को स्पष्ट किया कि भारत की तनाव बढ़ाने की कोई इच्छा नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस सिलसिले में प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी चीन दौरे पर आ सकते हैं। हालांकि राजीव गांधी ने नवंबर, 1988 में चीन का दौरा किया और डेंग ने खुद ‘युवा’ भारतीय प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए भारत के साथ अच्छे संबंधों की इच्छा जतायी थी। इसके बावजूद चीन ने 1993 में जाकर सुमदोरोंग चू से पूरी तरह अपनी सेना हटाई। सुमदोरोंग चू में चीन की दुर्गति के चलते ही 20 फरवरी 1987 में अरुणाचल भारतीय संघ का राज्य बन पाया।

1962 के बाद भारत-चीन संबंध

1962 में सीमा संघर्ष से द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर झटका लगा और बाद में 1976 को दोनों राज्यों के संबंध दोबारा बहाल किए गए। इसके बाद द्विपक्षीय संबंधों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिला।

1963 कोलम्बो प्रस्ताव- भारत चीन संघर्ष से उत्पन्न विवाद एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा को संकट मानकर वर्मा, श्रीलंका, इण्डोनेशिया, मिश्र तथा हाना आदि देशों ने कोलम्बों में एक सम्मेलन का आयोजन किया जिसका उद्देश्य सीमा विवाद का हल करना था। श्रीलंका के प्रधानमंत्री श्रीमती भण्डारनायके के प्रयासों से 19 जनवरी 1963 को कोलम्बो प्रस्ताव को प्रकाशन किया जिसके अंतर्गत भारत वचीन ने सीमा विवाद के हल हेतु प्रयास किये जायेंगे। परंतु चीन के असहयोग रवैये के कारण यह प्रस्ताव विफल रहा। कोलम्बो प्रस्ताव से मिलता जुलता ए कप्रस्ताव मिश्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर ने 3 अक्टूबर 1963 को प्रस्तुत किया, किंतु यह भी विफल रहा।

संबंधों में गतिरोध- अप्रैल 1965 के बाद भारत चीन सम्बंधों में गतिरोध व्याप्त रहा। लेकिन अप्रैल 1971 में कैटन के व्यापारिक मेले में हांगकांग स्थित भारतीय वाणिज्य आयुक्त को आमंत्रित करने से दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों में कुछ नरमी आयी। फरवरी 1972 में पौलेण्ड में चीन व भारत के राजदूतों की हुई मुलाकात तथा 15 अगस्त 1962 को लाल किले समारोह पर चीनी दूतावासों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति का भी कोई ठोस महत्वपूर्ण परिणाम नहीं निकला। दूसरी ओर भारत चीन से मधुर संबंधों की स्थापना हेतु प्रयत्न रह। सन् 1976 में इंदिरा गांधी ने एक पक्षीय कार्यवाही द्वारा राजदूतों का आदान प्रदान करके के.आर. नारायण की चीन में राजदूत के रूप में नियुक्ति की। सन् 1977 में सत्ता में आयी जनता पार्टी ने भी चीन से मधुर संबंधों की नीति के अंतर्गत विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चीन भेजा परंतु उसी समय वियतनाम पर चीन के आक्रमण होने से भारत चीन संबंधों को सामान्य बनानेके प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लग गया। तथापि कालान्तर में दोनों देश सीमाविवाद के हल आर्थिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक समझौतों हेतु प्रयत्नशील दृष्टिगत हुए।

दोनों देशों ने 1976 में राजदूत स्तर पर अपने संबंधों को बहाल किया-  फिर भी, दिसंबर, 1988 में प्रधान मंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा से ही वास्तकव में द्विपक्षीय संबंध पुनरूज्जी वित हुए तथा भारत-चीन संबंधों के लिए एक नए सिद्धांत का निर्माण हुआ।

दिसबंर 1988प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन की ऐतिहासिक यात्रा- 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन का दौरा किया। 34 साल के बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर गया था। इस यात्रा के बाद दोनों देश सीमा विवाद का समाधान और दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से द्विपक्षीय संबंधों को विकसित करने के लिये सहमत हुए।

  • साल 1988 में चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग की ओर से तत्‍कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 19 से 23 दिसंबर के बीच चीन की यात्रा का न्‍यौता दिया गया था। 34 वर्षों में किसी भारतीय पीएम की यह पहली चीन यात्रा थी। चीन के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक उस यात्रा को भारत-चीन के रिश्‍तों में एक बड़ी घटना माना गया था। चीनी पीएम ली पेंग ने राजीव गांधी के साथ वार्ता की। इसके अलावा उस समय के चीनी राष्‍ट्रपति यांग शांगकुन और चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के चेयरमैन डेंग जियाओपिंग ने भी राजीव से मुलाकात की थी। दोनों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और आपसी हितों से जुड़े अंतरराष्‍ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई थी। दोनों देशों के नेताओं की ओर से व्‍यापार, संस्‍कृति, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, एविएशन और दूसरे क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग और आदान-प्रदान में हुई प्रगति की तारीफ की गई थी।
  • सीमा विवाद पर क्‍या हुई थी बात
  • चीनी विदेश मंत्रालय की वेबसाइट की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक उस समय भारत और चीन दोनों देशों ने साथ-साथ मौजूदगी के शांतिपूर्ण तरीके के लिए पांच सिद्धांतों पर जोर दिया था। इन सिद्धांतों की पहल चीन और भारत दोनों की तरफ से की गई थी। इसके अलावा दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर भी चर्चा हुई थी। सीमा विवाद पर चीन के पीएम ली पेंग ने कहा था लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर चीन मानता है कि दोनों देशों की आपसी समझ से ही इस मुद्दे को सुलझाया जा सकता है। दोनों देश इस बात को लेकर राजी भी हुए थे कि शांति और मित्रता के माहौल में सीमा विवाद को सुलझाया जाएगा। इसके अलावा राजीव गांधी के चीन दौरे पर दोनों देशों के बीच साइंस एंड टेक्‍नोलॉजी में आपसी सहयोग और सिविल एविएशन ट्रांसपोर्टेशन को लेकर समझौता हुआ था। इसके साथ ही 1988 से 1990 तक दोनों देशों ने आपस में सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान पर एक द्विपक्षीय समझौते को साइन किया था। अंत में राजीव और ली पेंग ने एक ज्‍वॉइन्‍ट प्रेस कांफ्रेंस भी की थी।
  • चीन के पूर्व डिप्लोमैट जेंग शियॉन्ग ने राजीव गांधी को नई पीढ़ी के नेता बताया- चीन के पूर्व डिप्लोमैट जेंग शियॉन्ग ने आर्टिकल में लिखा है, “राजीव नई पीढ़ी के नेता थे, वे इकोनॉमिक रिफॉर्म्स के जरिये भारत के उदय को बढ़ावा देना चाहते थे, लेकिन माहौल ने उनको अपना मकसद पूरा करने में अड़चनें पैदा कीं।” जेंग का ये आर्टिकल एक बुक में पब्लिश हुआ है, जिसका नाम है- ‘स्टोरीज ऑफ चाइना एंड इंडिया’। जेंग ने इस आर्टिकल के जरिये राजीव के बीजिंग दौरे और टॉप चीनी नेताओं के साथ उनकी मीटिंग को चीन के नजरिये से देखा है।

राष्ट्राध्यक्ष दौरों की शुरुआत मई, 1992 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमण चीन की राजकीय यात्रा पर गए। राष्ट्राध्यक्ष स्तर पर दोनों देशों के बीच यह पहली यात्रा थी। परिणामस्वरूप नवंबर, 1996 में चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने भारत का राजकीय दौरा किया। यह चीन के राष्ट्राध्यक्ष की पहली यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान दोनों पक्षों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग बढ़ाने के लिए चार महत्वपूर्ण समझौते किए गए।

सितंबर, 1993 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने चीन का दौरा किया- उनकी इस यात्रा के दौरान भारत-चीन सीमा क्षेत्र में वास्त विक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति एवं अमन चैन बनाए रखने पर महत्वपूर्ण करार पर हस्ताक्षर किया गया जो दोनों पक्षों द्वारा सीमा पर यथास्थिति का सम्माहन करने का प्रावधान करता है। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के दौरे से पहले दिसंबर, 1991 में चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग ने भारत दौरा किया था।

मई 1998, परमाणु परीक्षण की तपिश: मई, 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा पोखरण में परमाणु विस्फोट किया गया। भारत को परमाणु ताकत का आधिकारिक दर्जा देने वाली यह घटना पड़ोसी को नागवार गुजरी। लिहाजा इस घटना पर उसकी तीखी प्रतिक्रिया ने दोनों के बीच संबंधों को करीब झुलसा ही दिया। जून, 1999 में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने चीन दौरा किया। इस दौरे में दोनों पक्षों ने एक दूसरे को धमकी न देने के वचन को दोहराया। मई-जून, 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन की यात्रा से दोनों के बीच उच्च स्तरीय आदान-प्रदान की वापसी हुई। जनवरी, 2002 में चीनी प्रधानमंत्री झू रोंगजी भारत आए।

जून 2003, संबंधों में मजबूती- प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने 22 से 27 जून, 2003 के दौरान चीन का आधिकारिक दौरा किया जिसके दौरान वह बीजिंग, शंघाई तथा लोयांग गए, जो मध्य चीन के हेनान प्रांत में एक प्राचीन शहर है। उन्होंने चीन के संपूर्ण शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकात की जिसमें राष्ट्रपति हू जिंताओ तथा प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ शामिल हैं। उनकी इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों को परस्पर सूझबूझ के एक नए स्तर पर पहुंचाया गया तथा पूर्ण स्तर पर सहयोग में संबंधों का विस्तार किया गया।

  • प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की यात्रा भारत-चीन संबंधों में मील पत्थर साबित हुई तथा द्विपक्षीय संबंधों के विकास पर अब तक का पहला व्यापक दस्तावेज – संबंधों एवं व्यापक सहयोग के लिए सिद्धांतों पर घोषणा- जिस पर यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किया जा रहा है। उनकी इस महत्वपूर्ण यात्रा के दौरान ही दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने समग्र द्विपक्षीय संबंधों की राजनीतिक दृष्टिकोण से जांच करने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति की जो सीमा प्रश्नर के समाधान की रूपरेखा है।

अप्रैल, 2005 में चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की यात्रा के दौरान दोनों देशों के संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए।

नवंबर, 2006 में चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में सहमति का संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया।

13-15 जनवरी, 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीन गए। दोनों देशों ने 21वीं सदी के लिए साझा दृष्टिकोण पर संयुक्त दस्तावेज जारी किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधान मंत्री वेन‍ जियाबाओ के साथ व्यारप विचार-विमर्श किया तथा राष्ट्रपति हू जिंताओ के साथ भी बैठक की। इस यात्रा के दौरान “भारत गणराज्य  तथा चीन जनवादी गणराज्य की 21वीं शताब्दी  के लिए साझा विजन” नामक एक संयुक्त दस्तावेज जारी किया गया जो अनेक अंतर्राष्ट्रीय तथा कुछ द्विपक्षीय मुद्दों पर साझे दृष्टिकोणों को रेखांकित करता है।

26-31 मई, 2010 को राष्ट्रपति ने चीन का राजकीय दौरा किया।

15-17 दिसंबर, 2010 को चीनी प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ ने भारत दौरा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच छह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। 2015 तक द्विपक्षीय कारोबार को 100 अरब डॉलर का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

2011 को चीन-भारत विनिमय वर्षऔर साल 2012 को चीन-भारत मैत्री और सहयोग का वर्षके रूप में मनाया गया।

पीएम मोदी और और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकातें

  • 17-19 सितंबर, 2014- 17 सितंबर को शी जिनपिंग अपनी पत्नी पेंग लियुआन के साथ अहमदाबाद पहुंचे थे. दौरे के पहले दिन भारत-चीन के बीच तीन समझौतों पर दस्तख़त हुए थे. फिर साबरमती के तट पर जिनपिंग के स्वागत में पारंपरिक नृत्य पेश किए गए. यहां मोदी ने जिनपिंग को झूला भी झुलाया. इसके बाद जिनपिंग दिल्ली लौट आए थे, जहां उन्होंने कुछ और समझौतों पर दस्तख़त किए थे.
  • 14-16 मई, 2015 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन यात्रा पर। यह पहला मौका था, जब चीन के राष्ट्रपति ने आधिकारिक यात्रा पर आए किसी नेता का स्वागत बीजिंग से बाहर आकर किया। जिनपिंग ने अपने गृह प्रांत शियान में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया।
  • 27- 28 अप्रैल, 2018 (Informal Summit): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन पहुँचे। वुहान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से वार्ता।
  • 11-12 अक्टूबर 2019(Informal Summit)-  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तमिलनाडु के महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) में अनौपचारिक मुलाक़ात हुई।

2017 डोकलाम और 2020 गलवान में चीन से भिड़ंत

2020- गलवान घाटी में चीन के साथ कैसे बिगड़ी बात, कब-क्या हुआ

  • अप्रैल- के अंत से लद्दाख के पेंगांग झील के किनारे भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव बढ़ना शुरू हुआ।
  • 5-6- मई को लद्दाख में पेंगांग झील के पास दोनों देशों के सैकड़ों सैनिक इकट्ठा हो गए, दोनों ओर के सैनिकों के बीच झड़प हुई. इस झड़प में दोनों ओर से कई सैनिक घायल हुए। पेंगांग झील के किनारे झड़प 5 मई की रात से शुरू हुई थी जो 6 मई की सुबह तक चलती रही, झड़प में लोहे की रॉड, डंडों और पत्थरों का भी जमकर इस्तेमाल किया गया।
  • 9 मई- को उत्तरी सिक्किम में बॉर्डर के पास चीनी सैनिकों की भारतीय सैनिकों के साथ झड़प हो गई, यहां भी झड़प में दोनों ओर से सैनिक घायल हुए. हालांकि सैन्य स्तर पर मामले को सुलझा लिया गया।
  • 12 मई- को चीन के हेलिकॉप्टर LAC के पास उड़ान भरते रहे, लेकिन भारत के सुखोई लड़ाकू विमानों ने उन्हें खदेड़ दिया।
  • 18 मई- लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच एक बार तनाव की खबरें आ रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गालवन नदी के किनारे चीनी सेना के कुछ टेंट देखे गए हैं। इसके बाद भारत ने भी यहां फौज की तैनाती बढ़ा दी है।
  • 23 मई- को आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने लद्दाख में सीमा का दौरा किया और चीन से तनाव के हालात का जायजा लिया।
  • 25 मई- को लद्दाख के पेगांग झील और गलवान घाटी में चीन से तनाव और बढ़ गया.लद्दाख में भारत और चीन के जवानों में तनाव बरकरार, चीन विवादित क्षेत्र में बंकर बनाने के लिए मशीनें ला रहा।
  • 26 मई- को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के हालात पर अहम बैठक की।
  • 26 मई- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनएसए अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा हुई. इससे पहले तीनों सेना प्रमुखों ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को जानकारी दी थी।
  • 26 मई- चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग ने सेना से कहा है कि ट्रेनिंग और जंग की तैयारियां तेज कर दें। सबसे मुश्किल हालात को ध्यान में रखते हुए खुद को तैयार करें और देश के आधिपत्य (सॉव्रिन्टी) के लिए मजबूती से डटे रहें। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक जिनपिंग ने कहा कि उलझे हुए मसलों को मुस्तैदी और असरदार तरीके से डील करें।
  • 26 मई- प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से चर्चा की- इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई को हाईलेवल मीटिंग बुलाई। इसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, एनएसए अजीत डोभाल, सीडीएस बिपिन रावत और तीनों सेना प्रमुख शामिल हुए।
  • 27 मई: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात कही।
  • 27 मई को चर्चा- सैन्य कमांडरों ने 27 मई को भी तीन दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन पूर्वी लद्दाख की स्थिति पर गहन चर्चा की थी। सूत्रों ने बताया कि थलसेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की अध्यक्षता में हो रहे सम्मेलन में जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर के कुछ खास क्षेत्रों में आतंकवाद रोधी अभियानों पर भी चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना पूर्वी लद्दाख में सभी विवादित क्षेत्रों में आक्रामक हावभाव जारी रखेगी और यथास्थिति कायम होने तक पीछे नहीं हटेगी।
  • 28 मई: अमेरिका के प्रस्ताव पर भारत ने कहा कि हम शांतिप्रिय तरीके से मसले को सुलझाने पर चीन से बात कर रहे हैं।
  • 28 मई को चर्चा- भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में चीन के आक्रामक सैन्य व्यवहार को ‘मजबूती से’ रोकने के लिए रणनीति के तहत एक ओर जहां अतिरिक्त सैनिक और अस्त्र-शस्त्र भेजे हैं, वहीं दूसरी तरफ सैन्य कमांडरों ने क्षेत्र में नाजुक स्थिति पर 28 मई को लगातार दूसरे दिन चर्चा की। अधिकारियों ने बताया कि पैंगोंग त्सो, गलवान घाटी, देमचोक और दौलत बेग ओल्डी में भारत की मौजूदगी को मजबूत करने के लिए सैनिक, वाहन और उपकरण आदि भेजे गए हैं।
  • 1 जून: चीन ने कहा कि बॉर्डर पर हालात स्थिर और कंट्रोल में है, चीन के कुछ फाइटर प्लेन पूर्वी लद्दाख से 30-35 किलोमीटर मौजूद थे।
  • 2 जून: रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया कि पूर्वी लद्दाख में LAC पर चीनी  सैनिक अच्छी-खासी तादाद में मौजूद हैं. उन्होंने ये भी कहा कि हम अपना रुख बदलने वाले नहीं हैं. इसी दिन डिविजन कमांडर स्तर पर दोनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों के बीच बैठक हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।
  • 6 जून: लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने चीन के मेजर जनरल लियु लिन से मोल्डो में बातचीत की. मोल्डो LAC पर चीन के हिस्से में है. इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तीनों सेनाओं के प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के साथ एक लंबी बैठक की. बैठक में रक्षा मंत्री को बताया गया कि चीन की ओर से बॉर्डर पर बड़ी संख्या में सैन्य मौजूदगी की गई है।
  • कमांडर स्तर की बातचीत 6 जून सुबह लगभग 9 बजे लद्दाख में चुशूल के पास चीन की सीमा में मोल्दो में शुरू हो गई थी. भारतीय सैनिक दल का नेतृत्व लेह स्थित 14 वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने किया था। चीन की तरफ से साउथ शिनजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के कमांडर, मेजर जनरल लिउ लिन ने हिस्सा लिया था।बैठक में भारत ने स्पष्ट कर दिया कि सीमा पर अप्रैल, 2020 से पहले वाली स्थिति बहाल होनी चाहिए।भारत की ओर से कहा गया है कि हम अपनी सीमा के भीतर कोई भी निर्माण कार्य कर सकते हैं।बैठक में हुई बातचीत की सारी जानकारी पीएमओ को दे दी गई है।
  • 8 जून- रंग लाई भारतीय कूटनीति, पूर्वी लद्दाख में कई जगहों से ढाई किलोमीटर पीछे हटा चीन- पूर्वी लद्दाख एलएसी पर जारी गतिरोध को खत्‍म करने के लिए भारतीय कूटनीति का बड़ा असर सामने आया है। पूर्वी लद्दाख में चीन के सैनिकों ने कई बिंदुओं को छोड़ा है। सरकार के शीर्ष सूत्रों ने बताया कि गलवन क्षेत्र में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने पैट्रोलिंग प्वाइंट 15 और हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से ढाई किलोमीटर पीछे हटी है जबकि भारत ने अपने सैनिकों को कुछ पीछे हटाया है। इससे पहले चार जून को भी ऐसी रिपोर्ट आई थी कि चीनी सेना दो किलोमीटर पीछे हट गई है। चीन ने उक्‍त कदम छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बैठक से पहले उठाए थे।
  • 10 जून: भारत और चीन के मेजर जनरल रैंक के सेना के अफसरों ने बातचीत की. ये बातचीत सकारात्मक बताई गई. लेकिन भारत सरकार के सूत्रों ने बताया कि LAC पर चीनी सैनिकों की तैनाती जारी रहने तक बात नहीं बनने वाली है.
  • 11 जून: चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से बयान दिया गया है दोनों देश इस मसले को आपस में बिल्कुल सही तरीके से निपटा रहे हैं. भारत और चीन के बीच इस मसले पर सैन्य और राजनयिक स्तर पर बात हो रही है. दोनों ही देश इस वक्त माहौल को शांत करने में जुटे हुए हैं.
  • 11 जून: खबर आई कि चीनी फौज लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक डटी हुई है, लिहाजा भारत ने भी इसके जवाब में बड़ी संख्या में अपनी सेना तैनात की है. सीमा विवाद को देखते हुए भारत ने इस इलाके में रिजर्व फौज भी भेजी है.
  • 12 जून: भारत और चीन के कमांडरों के बीच मेजर जनरल स्तर की वार्ता हुई. इस दौरान भारत और चीन के बीच लद्दाख के गलवान इलाके के PP 14, PP 15 और 17A में तनाव को कम करने और गतिरोध को खत्म करने पर फोकस किया गया. ये दोनों देशों के बीच सैन्य कमांडरों के मेजर जनरल स्तर की 5 राउंड की वार्ता थी.
  • 13 जून: आर्मी चीफ एम एम नरवणे ने कहा कि चीन के साथ सीमा पर हालात काबू में है. उन्होंने कहा कि चीन और भारत के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत हो रही है और बातचीत के जरिए हम हर तरह के विवादित मुद्दों को सुलझाने में सक्षम हैं.
  • 14 जून: जम्मू जन संवाद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि चीन के साथ कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर वार्ता जारी है और इस मुद्दे पर देश की सरकार लोगों को भरोसा दिलाना चाहती है कि राष्ट्रीय स्वाभिमान को किसी भी कीमत पर झुकने नहीं दिया जाएगा.
  • 15 जून: दोनों देशों के बीच ब्रिगेडियर कमांडर, कमांडर ऑफिसर लेवल की बातचीत हुई. ये बातचीत PP14 इलाके के पास की गई. इसमें गलवान घाटी में सैनिकों को वापस भेजने और फिर अप्रैल से पहले जैसी सामान्य स्थिति कायम करने को लेकर चर्चा हुई.
  • इसके बाद ताजा घटना- 15-16 जून की दरमियानी रात की है जिसमें चीन के साथ हुई झड़प में भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए. इससे पहले मंगलवार को दोपहर में एक अफसर और दो जवानों के शहीद होने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन बाद में 20 जवानों के शहीद होने की पुष्टि हुई.
  • 17 जून- भारत और चीन के बीच जारी तनाव के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत हुई है.
  • 17 जून- पीएम मोदी ने 15 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक से पहले गलवान घाटी में चीनी सेना से हिंसक झड़प में शहीद हुए 20 भारतीय जवानों के नाम दो मिनट का मौन भी रखा- चीन से विवाद को लेकर पीएम मोदी ने साफ कहा, मैं देश को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हमारे लिए भारत की अखंडता और संप्रभुता सर्वोच्च है। इसके साथ हम कोई समझौता नहीं करेंगे और इसकी रक्षा करने से हमें कोई भी रोक नहीं सकता। भारत शांति चाहता है लेकिन भारत उकसाने पर हर हाल में यथोचित जवाब देने में सक्षम है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, शहीद जवानों पर देश को गर्व है। हमारे दिवंगत शहीद वीर जवानों के विषय में देश को इस बात का गर्व होगा कि वे मारते-मारते मरे हैं।
  • 19 जून- चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाऊ लिजियन ने 19 जून को कहा था- सही क्या है और गलत क्या है, यह एकदम साफ है। जो कुछ हुआ, उसकी पूरी जिम्मेदारी भारत की है। भारत-चीन बातचीत कर रहे हैं।’  चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने 18 जून को कहा था- भारतीय फ्रंट-लाइन के सैनिकों ने समझौता तोड़ा और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) को पार कर उकसाया और अफसरों-सैनिकों पर हमला किया। इसके बाद ही झड़प हुई और जान गई।’ उन्होंने कहा कि भारत मौजूदा हालात पर गलत राय न बनाए और चीन की अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करने की इच्छाशक्ति को कमजोर करके न देखे।
  • 20 जून- भारत के विदेश मंत्रालय ने 20 जून शाम इस पर जवाब देते हुए कहा कि मई की शुरुआत से चीन भारत की नॉर्मल पेट्रोलिंग में बाधा डाल रहा है। इसी वजह से विवाद की स्थिति बनी। हम इस बात को नहीं मानते हैं कि भारत सीमा पर एकतरफा कोई कदम रहा था। हम तो इसे मेंटेन कर रहे थे। भारत ने कहा कि गलवान पर चीन के दावे का कोई आधार नहीं है।  उनका दावा का कोई आधार नहीं है।
  • 20 जून- अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने कहा था कि चीनी सेना भारतीय सीमा पर तनाव को ‘भड़का’ रही है। उन्‍होंने चीन की सत्‍तारूढ़ कम्‍युनिस्‍ट पार्टी को ‘दुष्‍टता’ करने वाली पार्टी करार दिया था।
  • 21 जून- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ‘यह बहुत मुश्किल स्थिति है। हम भारत से बात कर रहे हैं, हम चीन से बात कर रहे हैं। उनके बीच वहां बड़ी समस्या हो गई है। उनके बीच झड़प हो रही है। हम देखेंगे कि क्या कर सकते हैं। हम कोशिश करेंगे और उनकी मदद करेंगे।’

2017- डोकलाम विवाद

The 73-day Doklam stand-off between India and China along the Sikkim border  

  • भारत और चीन चुंबी घाटी के इलाके में आमने-सामने है, जहां भारत-भूटान और चीन तीन देशों की सीमाएं मिलती हैं.
  • डोका ला (चीन इसेडोकलाम कहता है) पठार चुंबी घाटी (सिक्किम की सीमा से लगे) का ही हिस्सा है जहां भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव हुआ है.
  • डोका ला पठार से सिर्फ 10-12 किमी पर ही चीन का शहर याडोंग है, जो हर मौसम में चालू रहने वाली सड़क से जुड़ा है डोका ला पठार नाथूला से सिर्फ 15 किमी की दूरी पर है.
  • जून की शुरुआत में चीन ने याडोंग से इस इलाके में सड़क को आगे बढ़ाने की कोशिश की, जिसकी वजह से ठीक इसी इलाके में भारतीय जवानों ने 20 जून को उन्हें ऐसा करने से रोका.
  • भूटान सरकार भी डोका ला इलाके में चीन की मौजूदगी का विरोध कर चुकी है, जो कि जोम्पलरी रिज में मौजूद भूटान सेना के बेस से बेहद करीब है.
  • इस पूरे विवाद से भारत की चिंता इस बात को लेकर है इस इलाके से चीन की तोपें चिकेन्स नेक कहे जाने वाली इस संकरी पट्टी के बेहद करीब तक आ सकती हैं, जो उत्तर पूर्व को पूरे भारत से जोड़ती है.
  • 28 अगस्त कोभारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर 73 दिनों से चला आ रहा विवाद महज 3 घंटे की सकारात्मक बातचीत से सुलझ गया.
  • June first week:  China removed an old bunker of the Indian Army at the tri-junction by using a bulldozer after the Indian side refused to accede to its request to dismantle it.
  • Intervening night of June 4-5: Chinese road-construction unit stopped by India at the Dokalam plateau
  • June 16: People’s Liberation Army (PLA) attempts to construct a road in Doka La area
  • June 20: Ambassador of Bhutan to India ‘Vetsop Namgyel’ lodges protest against Chinese intervention
  • June 23: China stops first batch of Kailash Mansarovar pilgrims, cites damage to roads from rains in Tibet region
  • June 28: Army chief Bipin Rawat visits Sikkim to take a stock of the situation at the tri-junction
  • June 29: China shows Doklam as part of its territory in a map
  • June 29: China tests a 35-tonne military tank near the Nathu La border
  • July 6: PM Modi meet President Xi during G20 Meet
  • August 2: Chinese foreign ministry released a 15-page official position statement
  • August 3: Foreign Minister Sushma Swaraj told the Rajya Sabha “War is not a solution to anything.
  • August 4: On Doklam Standoff, China Says ‘Our Restraint Has A Bottom Line’- Chinese Foreign Ministry
  • August 4: China’s CCTV on Aug 4, 2017 shows video of live-fire exercises in Tibet. 
  • August 20: People’s Liberation Army’s Western Theatre Command, Tibet  has conducted military exercises involving armoured forces
  • August 21: Home Minister Rajnath Singh Says China Tension To End Soon.
  • August 28: India and China on disengaged their troops at Doklam. 

चीनी सेना ने LAC पर कब-कब की घुसपैठ

232020- The first four months of this year, according to official data, witnessed 170 Chinese transgressions across the LAC, including 130 in Ladakh. There were only 110 such transgressions in Ladakh during the same period in 2019. But in 2019, the year when Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping met at Bishkek and Mahabalipuram, there was also a 75 per cent surge in Chinese transgressions in Ladakh — 497 as against 284 transgressions in 2018. Nearly three-quarters of the transgressions, data since 2015 show, have taken place in the western sector of the LAC, which falls in Ladakh. The eastern sector, which falls in Arunachal Pradesh and Sikkim, witnessed almost one-fifth of the Chinese transgressions. 

भारत-चीन सीमा विवाद 

आखिर क्या है भारत चीन सीमा विवाद… कैसे शुरु हुआ सीमा विवाद… कितनी बार सीमाओं का हुआ निर्धारण… कहां और कौन सी सीमा भारत और चीन के बीच लगती हैं… पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम में लद्दाख पर चीन क्यों इतना बौखलाया हुआ है… सब कुछ जानिए एक साथ…

भारत से लगती चीन की सीमा-

27

Johnson Line, 1865- भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की जड़ में अक्साई चिन शामिल है। भारत इस हिस्से पर अपना दावा करता है, तो वहीं चीन इसे अपना इलाका बताता रहा है। इसकी शुरुआत होता है 1865 में। 1865 में सर्वे ऑफ इंडिया के अफसर William Johnson ने इलाके का जो नक्शा बनाया, उसमें अक्साई चिन को कश्मीर के साथ बताया। इस सीमा रेखा को लानाक-ला-पास (जॉनसन लाइन 1865) के नाम से जाना गया। इसके बाद जॉनसन को हटा दिया गया। भारत इसी लाइन के आधार पर अपना दावा अक्साई चिन पर करता है।

Macartney–MacDonald Line, 1899- इसके कुछ सालों बाद साल 1889 तक ब्रिटेन और चीन के रिश्ते काफी सुधर गए। जिसके बाद ब्रिटेन ने एकबार फिर इलाके का पुनर्निधारण करने का सोचा और इसका जिम्मा George Macartney (the British consul general at Kashgar, Xinjiang, China) और Claude Maxwell MacDonald (British Diplomat) को दिया। जिन्होंने अक्साई चिन का ज्यादातर हिस्सा चीन में डाल दिया। इस लाइन को कोंगका-ला-पास (मैकार्टनी-मैक्डॉनाल्ड 1899) के नाम से जाना गया। चीन इसी लाइन के आधार पर अक्साई चिन पर अपना हक जताता है।

  • Macartney–Macdonald Line का उपयोग 1908 तक भारत के ब्रिटिश मानचित्रों पर किया गया था। लेकिन 1911 के Xinhai Revolution के बाद चीन में केंद्रीय शक्ति का पतन हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक, ब्रिटिश आधिकारिक Johnson Line को आधिकारिक लाइन बना लिया। 1927 में सीमा रेखा को फिर से समायोजित किया गया और Johnson Line को ही आधिकारिक लाइन माना गया। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत सरकार ने अपनी आधिकारिक सीमा के आधार के रूप में जॉनसन लाइन का उपयोग किया, जिसमें अक्सिन चिन शामिल था। On 1 July 1954 Prime Minister Jawaharlal Nehru wrote a memo directing that the maps of India be revised to show definite boundaries on all frontiers. Up to this point, the boundary in the Aksai Chin sector, based on the Johnson Line, had been described as “undemarcated.”

McMahon Line, 1914- साल 1913-1914 में जब ब्रिटेन और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण के लिए ‘शिमला सम्मेलन’ हुआ तो इस बातचीत के मुख्य वार्ताकार थे सर हेनरी मैकमोहन. इसी वजह से इस रेखा को मैकमोहन रेखा के नाम से जाना जाता है. शिमला समझौते के दौरान ब्रिटेन, चीन और तिब्बत, अलग-अलग पार्टी के तौर पर शामिल हुए थे. भारतीय साम्राज्य में तत्कालीन विदेश सचिव सर हेनरी मैकमहोन ने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किलोमीटर लंबी सीमा खींची. इसमें तवांग (अरुणाचल प्रदेश) को ब्रिटिश भारत का हिस्सा माना गया. मैकमहोन लाइन के पश्चिम में भूटान और पूरब में ब्रह्मपुत्र नदी का ‘ग्रेट बेंड’ है. यारलुंग जांगबो के चीन से बहकर अरुणाचल में घुसने और ब्रह्मपुत्र बनने से पहले नदी दक्षिण की तरफ बहुत घुमावदार तरीके से बेंड होती है. इसी को ग्रेट बेंड कहते हैं।

  • 1937 में मिली थी अंतरराष्ट्रीय मान्यता- शिमला समझौता प्रथम विश्व युद्ध से पहले हुआ था. लेकिन वर्ल्ड वॉर के दौरान स्थितियां बदल गईं. काफी समय बाद 1937 में अंग्रेज़ों की- अ कलेक्शन ऑफ ट्रीटीज़, ऐंगेज़मेंट्स ऐंड सनद्स रिलेटिंग टू इंडिया ऐंड नेबरिंग कंट्रीज़ नाम से एक किताब आई. विदेश विभाग में ब्रिटिश भारत सरकार के अंडर सेक्रटरी सी यू एचिसन ने इसे तैयार किया था. ये भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच हुई संधियां और समझौते का आधिकारिक संग्रह था. इसमें नई जानकारियां भी अपडेट हुई और मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली।
  • चीन नहीं मानता इस रेखा को- वहीं चीन इसे मानने से ये कहते हुए इनकार करता है कि मैकमहोन लाइन के बारे में उसको बताया ही नहीं गया था. उससे बस इनर और आउटर तिब्बत बनाने के प्रस्ताव पर बात की गई थी. उसे अंधेरे में रखकर तिब्बत के प्रतिनिधि लोनचेन शातरा और हेनरी मैकमहोन के बीच हुई गुप्त बातचीत की अंडरस्टैंडिंग पर मैकमहोन रेखा खींच दी गई।

LAC (Line of Actual Control) पर क्या है असल विवाद… जानिए

भारत का मानना है कि चीन के साथ लगी एलएसी करीब 3,488 किलोमीटर की है, जबकि चीन का कहना है यह बस 2000 किलोमीटर तक ही है। LAC (Line of Actual Control) दोनों देशों के बीच वह रेखा है जो दोनों देशों की सीमाओं को अलग-अलग करती है। लेकिन चीन की अड़ंगी के कारण से LAC की स्पष्ट परिभाषा आजतक तय नहीं हो पाई है।

LAC तीन सेक्‍टर्स में बंटी हुई है जिसमें पहला है

  1. अरुणाचल प्रदेश से लेकर सिक्किम तक का हिस्‍सा,
  2. मध्‍य में आता है हिमाचल प्रदेश और उत्‍तराखंड का हिस्‍सा
  3. पश्चिम सेक्‍टर में आता है लद्दाख का भाग

पूर्वी सेक्‍टर में LAC पर विवाद- दोनों देशों के बीच पूर्वी सेक्‍टर में मैक्‍मोहन रेखा है(According to 1914 Simla Convention- It extends for 890km from Bhutan in the west to 260km east of the great bend of the Brahmaputra River in the east, largely along the crest of the Himalayas) और यहीं पर स्थिति को लेकर विवाद है। भारत और चीन के बीच पूर्वी सेक्‍टर में जो LAC है, वहीं भारत की अंतरराष्‍ट्रीय सीमा भी है। लेकिन कुछ हिस्‍से जैसे Longju और Asaphila तक ही यह सीमा है। मध्‍य क्षेत्र में भी एलएसी को लेकर विवाद है लेकिन संक्षिप्‍त में बॉर्डर Barahoti मैदान तक है।

पश्चिम सेक्‍टर में LAC पर विवाद- दोनों देशों के बीच पश्चिमी सेक्‍टर में उस समय बड़ा विवाद हुआ था जब सन् 1959 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई और भारत के पीएम जवाहरलाल नेहरु के बीच चिट्ठियों का आदान-प्रदान हुआ था। सन् 1956 में पहली बार दोनों ने इस प्रकार की रेखा का जिक्र हुआ था। उस समय चिट्ठी में झोऊ ने कहा था कि एलएसी पूर्व में मैकमोहन लाइन से लेकर पश्चिम के छोर तक है। इस बात की जानकारी पूर्व नेशनल सिक्‍योरिटी एडवाइजर रहे Shivshankar Menon की किताब से मिलती है- Choices: Inside the Making of India’s Foreign Policy। किताब में स्पष्ट है- LAC was “described only in general terms on maps not to scale” by the Chinese.

1962 युद्ध के बाद चीन ने दावा किया कि 1959 में वह LAC से 20 किलोमीटर पीछे चला गया था। चाऊ-एन-लाई ने युद्ध के बाद नेहरु को फिर चिट्ठी लिखी और इस बार लिखा- “To put it concretely, in the eastern sector it coincides in the main with the so-called McMahon Line, and in the western and middle sectors it coincides in the main with the traditional customary line which has consistently been pointed out by China” अर्थात ‘संक्षिप्‍त में पूर्वी सेक्‍टर में यह मैकमोहन लाइन से मिलती है और पश्चिम और मध्‍य सेक्‍टर में यह पारंपरिक रेखा के साथ मिलती है।’ चीन ने बार-बार इस तरफ इशारा किया था।

चीन द्वारा LAC के नाम पर भारत की प्रतिक्रिया क्या थी- डोकलाम विवाद के दौरान चीन के विदेश मंत्रालय ने भारत से 1959 की LAC पर टिके रहने के लिए कहा था। हालांकि भारत ने 1959 और फिर 1962 दोनों ने ही साल में LAC की संकल्‍पना को मानने से इनकार कर दिया था। यहां तक युद्ध के समय भी नेहरु की तरफ से कहा गया था- “There is no sense or meaning in the Chinese offer to withdraw twenty kilometres from what they call ‘line of actual control’. What is this ‘line of control’? Is this the line they have created by aggression since the beginning of September?” अर्थात ‘इस बात का कोई तर्क या फिर कोई मतलब नहीं है कि चीनी 20 किलोमीटर पीछे चले गए हैं और इसे वह लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल कह रहे हैं। यह ‘नियंत्रण रेखा’ क्या है? क्या यह रेखा उन्होंने सितंबर की शुरुआत में अपनी आक्रामकता से निर्मित की है?’ भारत की तरफ से होने वाले इस विरोध चीन की तरफ से उस लाइन को लेकर था जो कई तरह से गलत थी।

मेनन द्वारा वर्णित भारत की आपत्ति थी- Chinese line “was a disconnected series of points on a map that could be joined up in many ways; the line should omit gains from aggression in 1962 and therefore should be based on the actual position on September 8, 1962 before the Chinese attack; and the vagueness of the Chinese definition left it open for China to continue its creeping attempt to change facts on the ground by military force”.

भारतीय राजनयिक Shyam Saran की किताब, ‘How India Sees the World’ के मुताबिक 1991 में तत्‍कालीन चीनी पीएम Li Peng भारत दौरे पर आए थे। यहां पर तत्‍कालीन भारतीय पीएम पीवी नरसिम्‍हा राव ने ली के साथ LAC शांति और स्थिरता बनाए रखने की अहमियत पर जोर दिया था। इसी समय भारत ने औपचारिक तौर पर LAC की संकल्‍ना को स्‍वीकार कर लिया था।

भारत ने LAC कब स्वीकार किया- इसके बाद राव सन् 1993 में चीन के दौरे पर गए और यहां पर दोनों देशों के बीच LAC पर शांति बरकरार रखने के लिए एक समझौते पर साइन हुए। इस एग्रीमेंट में LAC का जो जिक्र था। वह LAC 1959 या फिर 1962 की LAC नहीं थी। वह सिर्फ समझौता साइन होने वाली LAC से था। कुछ क्षेत्रों में मौजूद मतभेदों को समेटने के लिए, दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि सीमा मुद्दे पर ज्वॉइन्‍ट वर्किंग ग्रुप अस्तित्‍व में आएगा। यह ग्रुप LAC पर स्थिति को स्‍पष्‍ट करेगा। मेनन के मुताबिक भारत और चीन के बीच 80 के दशक के मध्‍य तेजी से संपर्क बढ़ा था। सन् 1976 में भारत सरकार की तरफ से चाइना स्‍टडी ग्रुप का गठन किया गया था। इसके बाद गश्‍ती सीमा, आपसी संपर्कों के नियम और बॉर्डर पर भारत की मौजूदगी के लिए कुछ नियम तय किए गए थे।

LAC की परिभाषा तय करने का अनुरोध खारिज- 1988 में तत्‍कालीन पीएम राजीव गांधी चीन के दौरे पर गए थे। इस समय दोनों देशों के बीच Sumdorongchu में टकराव जारी था। मेनन के मुता‍बिक दोनों देश एक सीमा समझौते पर राजी हुए थे। साथ ही बॉर्डर पर शांति और स्थिरता को बरकरार रखने पर बात हुई थी। मेनन की मानें तो साल 2002 से ही LAC को स्‍पष्‍ट करने की प्रक्रिया जारी है, लेकिन LAC की परिभाषा तय करने वाला कोई आधिकारिक नक्‍शा सार्वजनिक तौर पर उपलब्‍ध नहीं है।

2015 में LAC की स्‍पष्‍ट परिभाषा तय करने का दिया प्रस्‍ताव, चीन ने किया खारिज- 2015 में पीएम नरेंद्र मोदी चीन की यात्रा पर गए थे। इस दौरान उन्‍होंने चीन से LAC की स्‍पष्‍ट परिभाषा तय करने का प्रस्‍ताव दिया था लेकिन चीन ने उसे मानने से इनकार कर दिया। During his visit to China in May 2015, PM Narendra Modi’s proposal to clarify the LAC was rejected by the Chinese. Deputy Director General of the Asian Affairs at the Foreign Ministry, Huang Xilian later told Indian journalists that “We tried to clarify some years ago but it encountered some difficulties, which led to even complex situation. That is why whatever we do we should make it more conducive to peace and tranquillity for making things easier and not to make them complicated.”

क्या LAC दोनों देशों के बीच claim line है- Not for India. India’s claim line is the line seen in the official boundary marked on the maps as released by the Survey of India, including both Aksai Chin and Gilgit-Baltistan. In China’s case, it corresponds mostly to its claim line, but in the eastern sector, it claims entire Arunachal Pradesh as South Tibet. However, the claim lines come into question when a discussion on the final international boundaries takes place, and not when the conversation is about a working border, say the LAC.

लद्दाख में क्या सीमा विवाद है- जब भारत स्वतंत्र हुआ तो को अंग्रेजों द्वारा की गई संधियां भारत को हस्तांतरित कर दी गई थीं लेकिन जब McMahon Line पर 1914 में Shimla Agreement हुआ जिस पर ब्रिटिश भारत ने हस्ताक्षर किए थे, उस समय जम्मू और कश्मीर की रियासत के लद्दाख प्रांत का अक्साई चिन British India का हिस्सा नहीं था, हालांकि यह British Empire का हिस्सा था। पूर्वी सीमा को तो 1914 में अच्छी तरह से परिभाषित किया गया था, लेकिन पश्चिम में लद्दाख में यह नहीं हो पाया था।

AG Noorani (Lawyer, constitutional expert and political commentator) अपनी किताब “India-China Boundary Problem 1846-1947” में लिखते हैं- Sardar Vallabhbhai Patel’s Ministry of States published two White Papers on Indian states. The first, in July 1948, had two maps: one had no boundary shown in the western sector, only a partial colour wash; the second one extended the colour wash in yellow to the entire state of J&K, but mentioned “boundary undefined”. The second White Paper was published in February 1950 after India became a Republic, where the map again had boundaries which were undefined.

जुलाई 1954 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक निर्देश जारी किया- “all our old maps dealing with this frontier should be carefully examined and, where necessary, withdrawn. New maps should be printed showing our Northern and North Eastern frontier without any reference to any ‘line’. The new maps should also be sent to our embassies abroad and should be introduced to the public generally and be used in our schools, colleges, etc”. यह मानचित्र, जैसा कि आधिकारिक तौर पर आज तक इस्तेमाल किया जाता है, चीन के साथ व्यवहार का आधार बना।

LAC पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा LoC से कैसे अलग है- कश्मीर युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1948 की संघर्ष विराम रेखा से एलओसी का उदय हुआ। दोनों देशों के बीच शिमला समझौते के बाद 1972 में इसे LoC के रूप में नामित किया गया था। एलएसी, इसके विपरीत, केवल एक अवधारणा है- यह दोनों देशों द्वारा सहमत नहीं है, न तो नक्शे पर चित्रित किया गया है और न ही जमीन पर सीमांकित किया गया है। अक्टूबर 2013 में, दोनों पक्षों ने सीमांकित रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो कि सीमांकित सीमा के साथ किसी भी भड़क को रोकने के लिए थे। इसमें सैन्य स्तर और राजनयिक स्तर के संवाद तंत्र दोनों शामिल हैं। उम्मीद है कि भारत अपनी बनाई हुई स्तिथि को क़ायम रखेगा और संवाद बरक़रार रखेगा।

India-China-Relations

Posted in Election, News, Personality, Uncategorized

LOK SABHA ELECTIONs 2019- Uttar Pradesh Phase 4- April 29, 2019

उत्तर प्रदेश- चौथे चरण  80 में से 13 सीटों पर होगा मतदान 

 2019 में किसकी किससे जंगPhase4.jpg

Akbarpur29 akb.jpg

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के अंबेडकरनगर जिले में अकबरपुर एक शहर और प्रशासनिक मुख्यालय है। अकबरपुर भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी राम मनोहर लोहिया (1910-1967) का जन्मस्थल भी है। अकबरपुर, तमसा नदी (टोंस नदी) के तट पर स्थित है। रामायण के अनुसार, यह वह स्थल जहां राजा दशरथ ने श्रवण कुमार को मारा था, जिस वजह से इस स्थान का नाम श्रवण क्षेत्र पड़ गया। ऋषि श्रृंगी का आश्रम भी यहां स्थित है। तमसा नदी, अंबेडकरनगर को दो हिस्सों अकबरपुर और शहजादपुर में बांटती है। लोरपुर (अकबरपुर शहर का हिस्सा) को लोरपुर के किले के लिए और इमामबरगाह के लिए भी जाना जाता है। अकबरपुर का यह स्थल उन वीरों की स्मृति से भी जुड़ा है, जहां 1857 की क्रांति में आजादी के दीवानों के सिर कलम कर अंग्रेजों द्वारा जुल्मों सितम की इम्तहां पार की गयी थी। बताते चलें कि कानपुर में सत्तावनीं क्रांति देश की आजादी मे मील का पत्थर साबित हुयी थी, जिसने 1947 में स्वराज का मार्ग प्रशस्त किया था। क्षेत्र के बुजुर्गों द्वारा बताया गया कि जब 1556 में सम्राट अकबर आगरा की गद्दी पर बैठे, तब उन्होंने उसी वर्ष नत्थे खां को अकबरपुर का आमिल नियुक्त किया था। परंतु बाद में बीरबल ने 1563 मे शीतल प्रसाद शुक्ल को भी यहां का दीवान नियुक्त करा दिया था। बताया जाता है कि सन 1578 में जब अकबरपुर क्षेत्र मे भयावह अकाल पड़ा तो नत्थे खां व शीतल प्रसाद शुक्ल ने राजस्व का एकत्र धन राजकोष में न जमा करवा कर लोगों को राहत दिलाने के उद्देश्य से यहां पक्का तालाब व बारादरी आदि का निर्माण कराया था। उस दौरान अकबर को यहाँ स्वयं आना पडा था तथा उन्होने इस अचल राजस्व की खुलकर प्रशंसा की थी। तभी से इस नगर का नाम अकबरपुर और शीतल शुक्ल के नाम से तालाब का नाम शुक्ल तालाब पड़ गया। अकबरपुर टेरीकाट औऱ सूती कपड़े उद्योग के लिए भी जाना जाता है, जबकि यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि का काम करता है।

लोकसभा सीट- उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर से सटा कानपुर देहात जिसे अकबरपुर लोकसभा सीट के नाम से जाना जाता है। यह लोकसभा सीट 2009 में वजूद में आई है। इससे पहले यह सीट बिल्लौर लोकसभा सीट के तहत आती थी। गंगा और यमुना के मध्य दोआब में बसे अकबरपुर सीट राजनीतिक रूप से एक दौर में कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था। 90 के दशक में कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ बगावत करने वाले अरुण नेहरू ने जनता दल से मैदान में उतरकर जीत हासिल की थी। बाद में ये इलाका बीजेपी के लिए काफी उपजाऊ साबित हुआ। अकबरपुर लोकसभा सीट जिसे पहले बिल्हौर संसदीय सीट के रूप में जाना जाता था, लेकिन 2009 में परिसीमन के बाद यह अकबरपुर लोकसभा सीट के रूप में अस्तित्व में आया। बसपा से नाता तोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले राजाराम पाल 2009 में सांसद बने। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर पर सवार बीजेपी ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली। 2014 में बीजेपी से देवेंद्र सिंह उर्फ भोले सिंह ने यहां जीत हासिल की।

बिल्लौर लोकसभा सीट पर 1962 में पहली बार आम चुनाव हुआ था उस वक़्त यह उतरप्रदेश की 27वीं लोकसभा सीट हुआ करती थी और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी, पहली बार हुए चुनावों में कांग्रेस के पन्ना लाल ने यहां जीत दर्ज की थी, 1967 के चुनावों में रिपब्लिक पार्टी ऑफ़ इंडिया ने कांग्रेस को यहां हराया था। 1998 में इस सीट से बहुजन समाजवादी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भारी जीत दर्ज की थी, वो समाजवादी पार्टी के डॉक्टर लालता प्रसाद को हराकर इस सीट से पहली महिला सांसद के रूप में निर्वाचित हुई थीं, 2002 में हुए उपचुनावों में यह सीट सामान्य श्रेणी में आ गई, जहां से बसपा के त्रिभुवन दत्त विजयी हुए और इसके बाद साल 2004 में यह सीट एक बार फिर से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई और जिसके बाद मायावती फिर यहां से लोकसभा पहुंचीं लेकिन साल 2009 में ये सीट कांग्रेस के खाते में चली गई और साल 2014 में इस सीट पर भाजपा ने कब्जा किया और भारतीय जनता पार्टी के नेता देवेन्द्र सिंह उर्फ़ भोले सिंह यहां से एमपी बने।

समीकरणचुनावी विश्लेषकों की मानें तो यह सीट पिछड़ा और दलित बहुल है जबकि तीसरे नंबर पर यहां ठाकुर वर्ग आता है। यहां राजपूत और ब्राह्मण वर्ग भी निर्णायक भूमिका में है। लोकसभा सीट अकबरपुर के जातिगत आंकड़े- ब्राम्हण – 2.95 लाख, ठाकुर – 2.15 लाख, वैश्य – 0.80, पिछड़ा वर्ग- 5 लाख, दलित वर्ग- 6.20 लाख, मुस्लिम – 1.20 लाख।

वोटर- वोटर- अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र 17,30,947  वोटर हैं. इनमें 9,44,240 पुरुष व 7,86,590 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 54.93 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें कुल पांच विधानसभा सीटें- अकबरपुर रानिया, बिठूर, कल्याणपुर, महाराजापुर और घाटमपुर। 2017 विधानसभा चुनावों में बीजेपी का सभी पांचों सीटों पर कब्जा है।

बीजेपी में शामिल हो गए थे अनिल शुक्ल वारसी- 2014 में बीजेपी की ओर से अकबरपुर लोकसभा सीट के लिए प्रत्याशी बने देवेंद्र सिंह भोले ने उस दौरान बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के प्रत्याशी अनिल शुक्ल वारसी को बड़े अंतर से शिकस्त दी थी। भोले को 4,81,584 वोट मिले थे जबकि बीएसपी की ओर से अनिल शुक्ल वारसी को 2,02,587 वोट मिले। 2014 के चुनाव के बाद अनिल शुक्ल वारसी ने अपनी पत्नी प्रतिभा शुक्ला समेत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया। इसके बाद बीजेपी ने विधानसभा चुनाव के वक्त प्रतिभा शुक्ला को अकबरपुर-रनियां से टिकट दिया और उन्होंने यूपी विधानसभा में पार्टी की एक सीट बढ़ा दी। इन सबमें खास बात यह है कि पिछले चुनाव (2014) में बीएसपी को 20.86 फीसदी और समाजवादी पार्टी (एसपी) को 15.13 प्रतिशत वोट मिला था।

बीएसपी से निकाल दिए गए थे राजाराम पाल- अकबरपुर लोकसभा सीट ज्यादातर कांग्रेस और बीएसपी के खाते में ही जाती रही है। 1996 से 2004 तक के लोकसभा चुनावों में यहां से बीएसपी ने जीत दर्ज की लेकिन 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस के राजाराम पाल ने यहां जीत का परचम बुलंद किया। इससे पहले वर्ष 2004 में राजाराम पाल को इसी सीट से बीएसपी ने उम्मीदवार बनाया था, तब यहां पाल ने जीत हासिल की थी। बाद में वर्ष 2005 में राजाराम पाल पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने के मामले में फंस गए थे, जिसकी वजह से बीएसपी से उन्हें निकाल दिया गया।

स्थानीय मुद्दे

  • जाम की समस्या- अकबरपुर बाजार मे जाम की समस्या दिन प्रतिदिन विकराल रुप लेते जा रहा है। जहां लोगों को घंटों जाम के कारण परेशानी झेलनी पड़ी। जाम के कारण अकबरपुर चौक से लेकर आधा किलोमीटर तक जाम लगा रहा।
  • कानपुर देहात के बीहड़ पट्टी का यह मुद्दा इटावा लोकसभा के प्रत्याशियों के लिए बन सकता है चुनौती- 8 किमी लंबा अमराहट पम्प कैनाल को पहले भी राजनैतिक दल चुनाव के समय मुद्दा बनाकर भुनाते रहे हैं, जो आज यहां के किसानों के लिए नासूर बनकर रह गया है।

उम्मीदवार

  • देवेंद्र सिंह भोले (वर्तमान सांसद) (बीजेपी प्रत्याशी, अकबरपुर)- वर्तमान सांसद देवेंद्र सिंह भोले के मजबूत विरोध की एक वजह ये भी है कि उनको एक “खास सिंडीकेट” टाइप का ग्रुप घेरे रहता है। जिसकी वजह से ये आम आदमी से सीधे मिल नहीं पाते हैं। जो इस चुनाव में साफ तौर पर दिखाई भी दे रहा है। देवेंद्र सिंह भोले का चुनाव मैनेजमेंट कुछ खास लोगों के हाथों में है। इन खास लोगों के व्यवहार की वजह से आम कार्यकर्ता दूरी बनाए हुए है। यही वजह है कि उन्होंने अपने बेटे और भाई को इन सारी कमियों को दूर करने के लिए आगे लाए हैं। पुत्र और भाई काफी हद तक कामयाब होते भी दिख रहे हैं। भोले शुरु से ही करीब दो लाख ठाकुर वोटों पर मजबूत पकड़ बनाए हैं। नाराज ब्राम्हण वोटर्स को यदि वो मनाने में कामयाब हो गए तो एक बार फिर से सांसद बनने में कामयाब हो जाएंगे।
  • कांग्रेस प्रत्याशी राजाराम पाल- सरल स्वभाव और मीठी वाणी की वजह से कांग्रेस प्रत्याशी राजाराम पाल आम आदमी के बेहद करीब रहते हैं। समाज के सभी वर्गों और जातियों में उनकी ठीक-ठाक पकड़ है। राजाराम पाल की सबसे मजबूत पकड़ गरीब तपके में हैं। हमेशा जनता के बीच रहने वाले राजाराम पाल की एक बड़ी खासियत ये है कि हर वक्त वे जनता के लिए शुलभ रहते हैं। फिर चाहे किसी के दुःख की घड़ी हो या फिर सुख की, राजाराम सभी में शामिल होते हैं। यही वजह है कि राजाराम पाल समाज के हर वर्ग के बीच में चुनाव लड़ रहे हैं। पाल वोट के साथ मुस्लिम और दलित वोट भी राजाराम पाल के खाते में अभी तक जाता हुआ दिखाई दे रहा है। ऐसे में यदि ब्राम्हण वर्ग का आशीर्वाद राजाराम पाल को मिला तो उनकी जीत पक्की है।
  • निशा सचान (बीएसपी-एसपी गठबंधन प्रत्याशी, अकबरपुर लोकसभा)- निशा सचान जातीय और पार्टी का आंकड़ा लेकर चल रही हैं। चुनाव यदि जातिवाद का चुनाव हुआ तो निशा सचान त्रिकोणीय लड़ाई में आ जाएंगी। हालांकि कुर्मी वोट बैंक इस लोकसभा में बहुत अधिक नहीं है। दलित, अति पिछड़े के साथ यदि यादव वर्ग ने पूरी तरह से गठबंधन को वोट किया तो परिणाम चौंकाने वाले ही आएंगे। हालांकि निशा सचान की अपनी खुद की कोई राजनीति पृष्ठभूमि नहीं है। उनके पति लगातार दूसरी बार पालिका चेयरमैन बने हैं। बिरादरी के वोट बैंक पर ही उनकी व्यक्तिगत पकड़ है।

Etawah29 etaw.jpg

यमुना नदी के किनारे बसे बड़े शहरों में से एक इटावा शहर यूपी के पुराने और ऐतिहासिक शहरों में से एक है। पौराणकि कथाओं के अनुसार इटावा भगवान श्रीकृष्ण की विश्रामस्थली था। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग की पुस्तक ”इतिहास के झरोखे में इटावा” के अनुसार मथुरा से अयोध्या जाते समय भगवान श्रीकृष्ण ने इटावा में जिस स्थान पर विश्राम किया था, उसे वृन्दावन के नाम से पुकारा जाता है। यह शहर 1857 के विद्रोह के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था (ए.ओ ह्यूम, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक थे तब जिला कलेक्टर थे)। यमुना और चंबल के बीच भी संगम या संगम का स्थान है। यह भारत के महान बाड़ा के अवशेषों की भी साइट है। प्रसिद्ध हिंदी लेखक गुलाबराई इटावा के मूल निवासी थे। इटावा के पास एक समृद्ध और समृद्ध इतिहास है। यह माना जाता है कि मध्ययुगीन काल में कांस्य युग से ही जमीन अस्तित्व में थी। आर्यन जाति के सबसे पहले लोग जो एक बार यहां रहते थे उन्हें पांचाल के नाम से जाना जाता था। यहां तक ​​कि पौराणिक किताबों में, इटावा महाभारत और रामायण की कहानियों में प्रमुख रूप से प्रकट होता है। बाद के वर्षों के दौरान, इटावा चौथी शताब्दी ईस्वी में गुप्त राजवंश के शासन के अधीन थे। इटावा 1857 के विद्रोह के दौरान एक सक्रिय केंद्र था और ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने विद्रोह के कार्यकाल के दौरान यहां रहने का प्रयास किया था। आज भी, इटावा के शहर में भारत के महान बाड़ा  से कुछ अवशेष हैं, जो ब्रिटिश शासकों द्वारा स्थापित अंतर्देशीय लाइन थी। इटावा शुद्ध देशी घी का बड़ा केंद्र है। इसके अलावा कपास और रेशम बुनाई के महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं तो तिलहन व आलू यहां की मुख्य फसल है।

लोकसभा सीट- इटावा लोकसभा क्षेत्र को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे मुलायम सिंह के गृह जनपद की सीट होने के कारण और ज्यादा खास हो जाती है। यही कारण है कि मोदी लहर से पहले इटावा लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी की ही मानी जाती थी. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने यह सीट लगातार तीन बार जीती थी।

इटावा लोकसभा सीट पर कुल 16 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें से 4-4 बार सपा और कांग्रेस ने जीत हासिल की है। जबकि 2 बार बीजेपी और 1-1 बार बसपा, जनता दल, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी जीत दर्ज की हैं। 2009 में परिसीमन के बाद इटावा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गई और यहां से सपा के प्रेमदास कठेरिया ने जीत दर्ज की, लेकिन 2014 में मोदी लहर के सहारे अशोक कुमार दोहरे बीजेपी का कमल खिलाने में कामयाब रहे। अशोक कुमार दोहरे ने 4 लाख 39 हजार 646 मतों से जीत हासिल की थी। वहीं, उनके प्रतिद्वंद्वी प्रेमदास कठेरिया 2 लाख 66 हजार 700 मतों के साथ दूसरे नंबर पर रहे। वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह सीट एसपी-बीएसपी गठबंधन में समाजवादी पार्टी के पास आई है। यहां से समाजवादी पार्टी ने कमलेश कठेरिया को टिकट दिया है। उधर, बीजेपी ने 2014 में आगरा से सांसद चुने गए राम शंकर कठेरिया को इस बार (2019 लोकसभा चुनाव) इटावा लोकसभा सीट से प्रत्याशी घोषित किया है। अशोक दोहरे ने बीजेपी से टिकट न मिलने पर नाराजगी जताते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस ने अशोक दोहरे को इटावा से प्रत्याशी बनाया है।

समीकरण सियासी समीकरण की बात करें तो यहां 4.20 लाख दलित, 2 लाख ब्राह्मण, 1.70 लाख यादव, 1.20 लाख राजपूत और 1 लाख मुस्लिम वोटर्स हैं।

वोटर- इटावा लोकसभा क्षेत्र 17,39,462 वोटर हैं. इनमें 9,45,186 पुरुष व 7,94,182 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 55.04फीसदी वोट डाले गए थे।

स्थानीय मुद्दे

  • रोजगार का मुद्दा, किसान छुट्टा पशुओं के आतंक से परेशान हैं, सिंचाई की समस्या, फुटपाथ का अतिक्रमण,जाम की समस्या,सिकन्दरा क्षेत्र के लोगों के मुताबिक सिंचाई की समस्या होने से किसान भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। रोजी रोटी के लिए बीहड़ पट्टी केलोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं। प्रत्येक चुनाव में नेता पम्प कैनाल का कार्य पूरा कराने का आश्वासन देकर चुनाव जीतकर इस समस्या को भूलजाते हैं।

सियासी शोर में दब गई सफारी पार्क के शेरों की दहाड़ सियासत की अंधी दौड़ कुछ नहीं देखती, भले ही विकास पीछे क्यों न छूट जाए। उद्योगविहीन जिले में पर्यटन के बल पर समृद्धि लाने के लिए वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की निगाह में यमुना नदी का फिशर वन फॉरेस्ट आया। उन्होंने लायन सफारी (शेरों के लिए) बनाने का प्रस्ताव किया था। अब यह अन्य वन्य जीवों जैसे तेंदुआ, भालू, काला हिरन, चीतल सफारी के साथ मिलकर इटावा सफारी पार्क के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना का उद्देश्य यह था कि चंबल-यमुना की नैसर्गिक खूबसूरती को वन्य जीवों के साथ आकर्षण का केंद्र बनाया जाए ताकि आगरा आने वाले पर्यटक यहां खिंचे चले आएं। मगर, सियासी प्रतिद्वंद्विता के चलते 16 साल बाद भी इटावा सफारी पार्क आम लोगों के लिए खोला नहीं जा सका। मार्च 2017 में प्रदेश में योगी सरकार बनी। जिसके बाद इस प्रोजेक्ट को खास तवज्जो नहीं मिली।

उम्मीदवार

  • रामशंकर कठेरिया (बीजेपी)- मौजूदा वक्त में आगरा लोकसभा सीट से भाजपा सांसद और अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं। वे मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री भी रह चुके हैं। संघ के प्रचारक रहे सांसद कठेरिया पहली बार 2009 में चुनाव जीते थे। उन्होंने दस हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। वर्ष 2014 की मोदी लहर में उनकी जीत का अंतर बढ़कर तीन लाख तक पहुंच गया था। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने आगरा से उनका टिकट काटकर एसपी बघेल को टिकट दिया था, जिसके बाद कठेरिया ने नाराजगी जताई थी। उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए उनको अब इटावा से टिकट दिया।
  • अशोक दोहरे (कांग्रेस)- हाल ही में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए है, 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अशोक कुमारयहां से चुनाव जीते थे। अशोक दोहरे वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले शामिल हुए थे। तब भाजपा में उन्हें टिकट इटावा लोकसभा दे दिया था। इससे पहले वे बहुजन समाज पार्टी में रहे थे। वर्ष 2007 की मायावती सरकार में वे कैबिनेट मंत्री भी रहे थे। वह औरैया जनपद के अजीतमल तहसील के ग्राम रमपुरा के मूल रूप से रहने वाले हैं। इनका जन्म 23 सितंबर 1970 को हुआ है। इनकी शिक्षा स्नातक तक है। वे औरैया जनपद में ग्राम पंचायत अधिकारी के पद पर भी तैनात रहे हैं।
  • कमलेश कठेरिया (सपा)- इटावा लोकसभा सीट (सुरक्षित) से इस बार सपा ने युवा चेहरे कमलेश कठेरिया को अपना उम्मीदवार बनाया है। कमलेश कठेरिया सपा-बसपा गठबंधन के इटावा लोकसभा सीट से उम्मीदवार होंगे। वह पूर्व सांसद प्रेमदास कठेरिया के पुत्र है पिछली बार विधानसभा चुनाव में भरथना सीट से भाजपा की सावित्री कठेरिया से कमलेश कठेरिया 1968 वोट से हार गए थे। इटावा के एसडी इंटर कॉलेज में लिपिक के पद पर कार्यरत स्नातक कमलेश कठेरिया की पत्नी पूजा कठेरिया इस समय जिला पंचायत सदस्य हैं। पिता प्रेमदास कठेरिया वर्ष 2009 में इटावा सीट से सांसद रहे हैं। कमलेश जिला पंचायत अध्यक्ष व ब्लॉक प्रमुख महेवा भी रह चुके हैं। प्रेमदास कठेरिया को मुलायम सिंह परिवार के विश्वसनीय लोगों में से एक माना जाता है।

Farrukhabad29 farru.jpg

उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों में से फर्रुखाबाद संसदीय सीट भी काफी अहम है। ये इलाका सूबे के आलू उत्पादन में अव्वल है। यूपी सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है। यहां देश का 35 से 38 फीसदी आलू पैदा होता है और फर्रुखाबाद आलू उत्पादन का बड़ा केंद्र है। इसीलिए फर्रुखाबाद शहर को Potato City (आलू का शहर) के नाम से जाना जाता है। यहां की संसदीय सीट पर मौजूदा समय में बीजेपी का कब्जा हैय़ जबकि इससे पहले कांग्रेस की मनमोहन सरकार में विदेश मंत्री रहे सलमान खुर्शीद इसी सीट से चुनकर संसद पहुंचे थे। ये ऐसी सीट है जहां से 1962 में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया भी जीत हासिल कर चुके हैं।

लोकसभा सीट- आजादी के बाद से ही फर्रुखाबाद लोकसभा सीट पर अभी तक करीब 15 बार लोकसभा सभा और 1 उपचुनाव हुए हैं। इनमें से 7 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है. जबकि 3 बार बीजेपी, 2 बार सपा, 2 बार जनता पार्टी और एक-एक बार जनता दल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को जीत मिली है. आजादी के बाद 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में फर्रुखाबाद का इलाका कानपुर संसदीय सीट के तहत आता था. 2009 के चुनाव में कांग्रेस से सलमान खुर्शीद एक बार फिर जीतने में कामयाब रहे. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मुकेश राजपूत 20 साल बाद फर्रुखाबाद सीट पर कमल खिलाने में कामयाब रहे.

समीकरण- फर्रुखाबाद संसदीय सीट पर राजपूत और ओबीसी समुदाय में लोध और यादव मतदाताओं के साथ-साथ ब्राह्मण मतदाता काफी निर्णायक भूमिका में हैं. जबकि 14 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं।

वोटर- फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र पर 16,88,871 वोटर है इनमें 9,17,257 पुरुष व 7,71,536 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 60.15 फीसदी वोट डाले गए थे।

मुद्दे

  • BJP का हाजमा खराब करेगा आलू- पहले चरण में पश्चिमी यूपी की सीटों पर गन्ना भुगतान एक प्रमुख मसला था। वहीं दूसरे चरण में पश्चि‍मी यूपी की कम से कम चार ऐसी सीटें हैं, जहां आलू एक निर्णायक मसला बन सकता है। जिसमें फर्रूखाबाद भी शामिल है। Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises के आंकड़ों के मुताबिक फर्रूखाबाद में लगभग 80 लाख टन आलू उत्पादन होता है और स्टोरेज के लिए केवल 61 Cold Storage है।
  • फर्रुखाबाद के टेक्सटाइल उद्योग की दुनिया भर में छाप है… स्कार्फ, स्टोल, बेडशीट, टेवल कवर, रजाई, साड़ी एवं ड्रेस मैटेरियल को विदेशों में निर्यात किया जाता है। काफी समय से फर्रूखाबाद टेक्सटाइल पार्क के निर्माण की मांग की जा रही है लेकिन अभी तक सरकारी दिक्कतों के चलते पेंच फसी है।
  • फर्रुखाबाद के छपाई उद्योग को दुनिया भर में पहचान मिली… लेकिन मई 2018 में देश भर में गंगा स्वच्छता अभियान को लेकर केंद्र सरकार ने उन छपाई उद्योगों को बन्द कराने के आदेश दिए 90 कारखानों को बंद करने का नोटिस जारी किया गया।

शिवपाल यादव की प्रसपा लगाएगी गठबन्धन के वोटों में सेंध- लोकसभा चुनाव में नये चेहरे के रुप में सपा-बसपा गठबन्धन के प्रत्याशी मनोज अग्रवाल मैदान में हैं। इस गठबंधन की गांठ को कमजोर करने के लिए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव चुनावी समर में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं। उन्होंने इस सीट से अपना उम्मीदवार भी उतारा है।

उम्मीदवार

  • मुकेश राजपूत (बीजेपी)-फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से सांसद मुकेश राजपूत को भाजपा ने दोबारा टिकट दिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मुकेश राजपूत 20 साल बाद फर्रुखाबाद सीट पर कमल खिलाने में कामयाब रहे। उन्होंने ने सपा के उम्मीदवार रामेश्वर को 1,50,502 मतों के बड़े अंतर से हराया था। उनके पास लोधी राजपूत समुदाय का ठोस समर्थन है। मुकेश राजपूत जिला पंचायत, फर्रुखाबाद के दो बार (2000-2005 और 2006-2012) अध्यक्ष रह चुके हैं। 2014 कृषि पर स्थायी समिति के सदस्य रह चुके हैं। हाल ही में मुकेश राजपूत पर बिजली विभाग के एक अधिकारी ने धमकी देने का आरोप लगाया था। आरोप है कि मुकेश राजपूत बिजली विभाग के अधिशासी अभियंता पर भड़क गए और हड़काते हुए कहा, तू पीटने का काम कर रहा है।
  • सलमान खुर्शीद (कांग्रेस)-कांग्रेस ने सलमान खुर्शीद को मैदान में उतारा। सलमान खुर्शीद एक भारतीय राजनीतिज्ञ, नामित वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रख्यात लेखक हैं। वे मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में विदेश मंत्री रहे हैं। सलमान खुर्शीद ने अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत 1980 की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान पीएमओ ऑफिस में ओएसडी के तौर पर की। बाद में भारत सरकार में उन्हें डिप्टी मिनिस्टर ऑफ कॉमर्स औहर उसके बाद 1991-1996 के दौरान भारत सरकार में विदेश राज्य मंत्री बनाया गया। इस दौरान वे यूपी के फर्रुखाबाद संसदीय सीट से सांसद चुने गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से वह फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से 1,69351 वोटों के साथ कांग्रेस टिकट पर शानदार जीत दर्ज की। उसके बाद उन्हें भारत सरकार में कंपनी मामलों और अल्पसंख्यक मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया।
  • मनोज अग्रवाल (बसपा)-फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से मनोज अग्रवाल को गठबंधन का प्रत्याशी घोषित किया है। बसपा ने मनोज को फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र प्रभारी बनाया गया था। मनोज इससे पहले एक बार एमएलसी रह चुके हैं। एक बार वह फर्रुखाबाद नगर पालिका अध्यक्ष रहे। दो बार से उनकी पत्नी वत्सला अग्रवाल पालिका अध्यक्ष हैं। मनोज फर्रुखाबाद सदर विधानसभा क्षेत्र से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि उन्हें जीत हासिल नहीं हुई। वह बसपा से फर्रुखाबाद-कन्नौज-इटावा सीट पर एमएलसी भी रह चुके हैं।

Hamirpur29 hamir.jpg

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की हमीरपुर लोकसभा सीट चित्रकूट धाम बांदा मंडल का हिस्सा है। हमीरपुर में यमुना किनारे लगा दुर्लभ कल्पवृक्ष जिसे कल्पतरु के नाम से भी जाना जाता है। कल्पवृक्ष का पुराणों में भी जिक्र मिलता है। हमीरपुर का कल्पवृक्ष जनपदवासियों के लिए गौरव का केंद्र है, लेकिन लगभग 1500 वर्ष पुराने इस कल्पवृक्ष के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। उचित देखभाल और पर्याप्त  रखरखाव की कमी से जूझ रहा है कल्पवृक्ष। हमीरपुर का जिक्र महाभारतकाल के दौरान भी आता है। हमीरपुर से 85 किमी दूर राठ नगर स्थित है, जो महाभारत काल में महाराजा विराट की राजधानी थी। उन्हीं के नाम से यह नगर विराट नगर जाना जाता रहा है। 12 बरस के अज्ञातवास में युधिष्ठर, भीम, अर्जुन नकुल व सहदेव ने यहां आए थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हमीरपुर जिले में पूर्व अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग भड़की थी। उसी दिन ट्रेजरी में तैनात सशस्त्र सरकारी गार्डों ने बगावत कर दिया था। यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेज कलेक्टर टीके लायड व ज्वाइंट मजिस्ट्रेट डोनाल्ड को कचहरी में सरेआम गोलियों से भून डाला था। इस सनसनीखेज वारदात से बौखलायें अंग्रेज सैनिकों ने सुरौली बुजुर्ग गांव को ही उजाड़ दिया था। हालांकि, एक वृत्तांत के अनुसार 11वीं शताब्दी में हमीरपुर शहर की स्थापना हमीरा देवा द्वारा की गई थी, जो एक कलचुरी राजपूत थे, जो अलवर से वहां आए थे और एक अहीर के साथ शरण ली थी।

लोकसभा सीट- मौजूदा समय में इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है। राजनीतिक रूप से इस संसदीय सीट पर सपा, बसपा, कांग्रेस और बीजेपी चारों पार्टियां जीत दर्ज कर चुकी हैं। हमीरपुर लोकसभा सीट पर आजादी के बाद से अब तक 16 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। इनमें से 7 बार कांग्रेस को जीत मिली जबकि बीजेपी को 4 बार, बसपा को 2 बार के अलावा एक-एक बार सपा, जनता दल और लोकदल को जीत मिल चुकी है। आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मनुलाल द्विवेदी जीतकर सांसद पहुंचे थे। इसके बाद 1971 तक कांग्रेस लगातार पांच पार जीतने में कामयाब रही। कांग्रेस के जीत का सिलसिला 1977 में लोकदल ने रोका। भारतीय लोकदल से तेज प्रताप चुनावी मैदान में उतरे और जीत दर्ज की, लेकिन कांग्रेस ने 1980 में एक बार फिर वापसी की। इसके बाद कांग्रेस लगातार दो बार चुनाव जीतने में सफल रही। 1989 में जनता दल ने कांग्रेस को मात देकर जीत दर्ज की। इसके बाद कांग्रेस दोबारा वापसी नहीं कर सकी है। हमीरपुर लोकसभा सीट पर 1991 में बीजेपी ने विश्वनाथ शर्मा को उतारकर कमल खिलाने में कामयाब रही थी। इसके बाद 1998 तक बीजेपी लगातार तीन चुनाव जीतने में कामयाब रही। 1999 में बसपा ने अशोक चंदेल उतरे जीतकर संसद पहुंचे, लेकिन 2004 में सपा ने राजनारायण भदौरिया को उतारकर जीत दर्ज की। हालांकि पांच साल बाद 2009 में हुए आम चुनाव में बसपा ने फिर वापसी और विजय बहादुर सिंह जीतने में कामयाब रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मोदी लहर में जीत दर्ज की और यहां से कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल सासंद बने।

समीकरण- हमीरपुर लोकसभा सीट पर 2011 के जनगणना के मुताबिक 82.79 फीसदी ग्रामीण और 17.21 फीसदी शहरी आबादी है। अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 22.63 फीसदी है। इसके अलावा राजपूत, मल्लाह और ब्राह्मण मतदाता काफी निर्णायक भूमिका में हैं। 8.26 फीसदी मुस्लिम मतदाता भी हैं।

वोटर- कुल मतदाताओं की संख्या 17,38,107 है। जिसमें पुरुष मतदाता की संख्या 9,47,611 है वहीं 7,90,451 महिला मतदाता है, 2014 में इस सीट पर 56.11 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीट- इस सीट के तहत 5 सीटें आती हैं- हमीरपुर, राठ, महोबा, चरखारी और तिंदवारी, जिसमें से राठ विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. मौजूदा समय में पांचों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।

स्थानीय मुद्दे हमीरपुर सीट बुंदेलखंड की सबसे पिछड़ी सीट में से एक है लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय मानी जाती है। सूखा-पलायन-गरीबी ने इस क्षेत्र को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। यमुना-बेतवा जैसी बड़ी और कई छोटी नदियां गुजरती हैं, जो खनन माफियाओं के लिये स्वर्ग के समान हैं, नियमित पड़ने वाले सूखे से छुटकारा, युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर, उच्च शिक्षा के लिए बेहतर संसाधन और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं यहां की बुनियादी जरूरतें हैं। विकास के मामले में शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ ही पर्यटन भी पूरी तरह बदहाल है। पर्यटन के कई प्रस्ताव शासन में लंबित हैं। स्थानीय मुद्दों में स्वास्थ्य सेवा, बेहतर शिक्षा, रोजगार और इन सभी की पूर्ति की लिए बंदुलेखंड राज्य की मांग प्रमुख है। बुंदेलखंड के ग्रामीणों के लिए कर्ज़ चुकाने में असमर्थ होना भी एक मुद्दा है,खेती किसानो की समस्याएं।

उम्मीदवार

  • कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल (बीजेपी)– 2014में 16वीं लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए, मूल रूप से महोबा निवासी पुष्‍पेंद्र सिंह ने बुंदेलखंड विश्‍व‍विद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल की है। 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से भारतीय जनता पार्टी के कुंवर पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने 4 लाख 53 हजार 884 वोट हासिल किये थे और 2 लाख 66 हजार 788 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी। हमीरपुर लोकसभा सीट पर दूसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी के बिशम्बर प्रसाद निशाद रहे थे जिन्होंने 1 लाख 87 हजार 096 वोट हासिल किये थे। बहुजन समाज पार्टी के राकेश कुमार गोस्वामी 1 लाख 76 हजार 356 वोट पाकर तीसरे तो कांग्रेस पार्टी के प्रीतम सिंह लोधी “किसन” 78 हजार 229 वोट पाकर चौथें स्थान पर रहे थे।
  • दिलीप सिंह (कांग्रेस)-किसान परिवार से जुड़े दिलीप सिंह खेती-बाड़ी ही कराते हैं। बांदा की तिंदवारी तहसील के महोखर गांव के रहने वाले दिलीप सिंह पेट्रोल पंप चलाते हैं और आधुनिक मशीनों से कृषि कार्य कराते हैं। इससे पहले दिलीप न तो किसी पार्टी से जुड़े रहे और न ही कोई चुनाव लड़ा। उनके चाचा रणविजय सिंह ब्लाक प्रमुख रह चुके हैं और भाई राहुल सिंह बीडीसी रहे हैं। उनके बाबा स्व. बद्री सिंह हमेशा निवर्रिध प्रधान बनते रहे।
  • प्रीतम सिंह (बसपा) कांग्रेस के उम्मीदवार प्रीतम सिंहहमीरपुर जिले के राठ क्षेत्र के मूल निवासी हैं और तीसरी बार चुनाव दंगल में दो-दो हाथ करने आये हैं। भाजपा ने 2007 में राठ विधानसभा क्षेत्र से प्रीतम सिंह को चुनावी महासमर में उतारा था लेकिन हार का सामना करना पड़ा था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रीतम सिंह ने भाजपा छोड़ कांग्रेस में इन्ट्री मारी और लोकसभा चुनाव के लिये कांग्रेस के टिकट से किस्मत आजमाई लेकिन उन्हें दोबारा पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस बार फिर कांग्रेस ने प्रीतम सिंह पर दांव लगाया है।

Hardoi29 har.jpg

मान्यता अनुसार हरदोई जिले के संबंध में “हिरणकश्यप” के साथ संबंधित है इसका वर्तमान नाम हरदोई इसके पहले नाम “हरि-द्रोही” है। कुछ लोगों के नजदीक में यह जिला हरदेवबक्ष द्वारा उपनिवेश में था और सिर्फ इसलिए इस वजह से शहर में एक पुरानी स्थानीयता हरिदेवगंज मौजूद है। मल्लवा, बिल्ग्राम, पिहानी, शाहबाद, सांदीला और रुईया ऐतिहासिक महत्व के स्थान हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार मल्लावा को बौद्धों द्वारा उपनिवेशित किया गया था, जबकि कुछ मानते हैं कि सय्यद सलासर मसूद गाजी यहां आए थे। इससे पहले यह क्षेत्र मल्लावा जिला मुख्यालय था। बिल्ग्राम का प्राचीन नाम “श्रीनगर” है वर्तमान का नाम बिल्ग्राम कुछ एसोसिएट्स द्वारा दिया गया था। ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्थान काफ़ी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसमें मुग़ल और अफ़ग़ान शासकों के बीच कई युद्ध हुए है। बिलग्राम और सांदी शहर के मध्य हुए युद्ध में हुमायूँ को शेरशाह सूरी ने हराया था। 1904 के गजेटियर में प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन 1857 के दौरान धटित घटनाक्रम के रूप में लिखा है कि हरदोई के कटियारी श्रेत्र का तालुकेदार हरदेव बक्श फतेहगढ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लगातार भय के बावजूद पूरे संघर्ष में वफादार बना रहा। मुख्य सेनानायक के निर्देश पर ब्रिटिश सेना की तीन टुकडियां उस समय उत्तर पश्चिम अवध में विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यरत थी। इनमें से एक को ब्रिगेडियर हाल के अधीन फतेहगढ से जनपद मल्लावां में होते हुये सीतापुर की ओर बढने का आदेश था।

लोकसभा सीट- आजादी के बाद से ही हरदोई सुरक्षित सीट है और अभी तक करीब 16 बार लोकसभा सभा चुनाव हुए हैं। पहले हरदोई फर्रूखाबाद उत्तरी संसदीय क्षेत्र में आता है। 1952 में चुनाव में बुलाकी राम वर्मा सांसद चुने गए थे. इसके बाद 1957 में हरदोई लोकसभा सीट बनी। कांग्रेस 6 बार यहां से चुनाव जीतने में सफल रही, जबकि 3-3 बार बीजेपी और सपा इस सीट पर जीत का परचम लहरा चुकी हैं। 1957 में लोकसभा चुनाव में ही जनसंघ ने हरदोई सीट पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही है, लेकिन 1957 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद से 1977 में कांग्रेस के हाथों से ये सीट निकली, लेकिन 1980 और 1984 में फिर जीत का परचम लहराया। साल 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता दल के परमई लाल यहां से जीतकर संसद पहुंचे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इस सीट पर कब्जा जमाया और लगातार दो बार जय प्रकाश यहां से सांसद चुने गए, लेकिन 1998 में ऊषा वर्मा ने सपा उम्मीदवार के तौर पर उतरकर बीजेपी के जीत का सिलसिले को रोक दिया। इसके बाद नरेश अग्रवाल ने जब कांग्रेस छोड़कर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया तो 1999 में जय प्रकाश इसी पार्टी के उम्मीदवार बनकर उतरे और ऊषा वर्मा से अपनी हार का बदला लिया। इसके बाद 2004 और 2009 में ऊषा वर्मा ने सपा उम्मीदवार को तौर पर जीत दर्ज की, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में अंशुल वर्मा जीत हासिल कर बीजेपी के वनवास को खत्म किया।

समीकरण- हरदोई संसदीय क्षेत्र मं अनुसूचित जाति की आबादी 30.79 फीसदी । मामूली संख्या में अनुसूचित जनजाति भी हैं। इनकी आबादी तकरीबन 0.01 फीसदी है। इसके अलावा यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 13 फीसदी के करीब है। दलित और मुस्लिम गठजोड़ जीत में अहम भूमिका निभाता है। जबकि, कुर्मी, ब्राह्मण और ओबीसी भी हार जीत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

वोटर- यहां पर  17,94,142 मतदाता हैं, इनमें से  9,74,153  पुरुष वोटर और 8,19,932 महिला मतदाता हैं। 2014 में यहां 56.75 फीसदी मतदान हुआ था। बीजेपी की अंशुल वर्मा ने बसपा के शिवप्रसाद वर्मा को 83 हजार 343 वोटों से मात दी थी।

विधानसभा सीटें- पांच विधानसभा सीटें- सवैजपुर, शाहाबाद, हरदोई, गोपामऊ और संदी विधानसभा सीटें शामिल हैं। 2017 विधानसभा चुनावों में पांच में से 4 पर बीजेपी और एक पर सपा की विजयी रही थी।

स्थानीय मुद्दे आजादी के बाद से ही हरदोई सुरक्षित लोकसभा सीट है। हरदोई में पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें सवैजपुर, शाहाबाद, हरदोई, गोपामऊ और संदी विधानसभा सीटें शामिल हैं। यहां के प्रमुख मुद्दों में सवायजपुर में अर्जुनपुर रामगंगा तट पर पुल निर्माण, सडीला को जिला बनाने की मांग, बिलग्राम मल्लावां में सई नदी पुल, राजघाट पर पक्का घाट का निर्माण, गोपामऊ में पिहानी में तहसील मुख्यालय की स्थापना, शाहाबाद में बाईपास का निर्माण, सांडी में रेल लाइन की मांग, हरदोई शहर में नगर पालिका की सीमा विस्तार और इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना प्रमुख हैं।

उम्मीदवार

  • जयप्रकाश (बीजेपी)- हरदोई सदर सीट से भारतीय जनता पार्टी से दो बार सांसद रहे जयप्रकाश रावत ने एक लंबे अरसे के बाद घर वापसी की है। भाजपा से जाने और फिर वापस आने की बीच की लंबी अवधि में वह लखनऊ के मोहनलालगंज से भी सांसद रहे और उन का सियासी सफर सपा और बसपा में भी रहा। जयप्रकाश रावत 2014 के लोकसभा चुनाव में ही वह घर वापसी करना चाहते थे लेकिन जब नहीं हो सकी तो उन्होंने सपा की टिकट पर मिश्रिख लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा जोकि हरदोई जिले से भी संबंधित है, हालांकि वह यहां से चुनाव हार गए। 1991 की राम लहर में पहली बार हरदोई से भाजपा सांसद बने जयप्रकाश रावत को सत्ता का साथ और दल बदलने में महारथ हासिल है।
  • वीरेंद्र वर्मा (कांग्रेस)- 2007 में तत्कालीन अहिरोरी विधानसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे। बदले परिसीमन में वह बसपा के टिकट पर 2012 और 2017 में सांडी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े थे। 2012 में सपा प्रत्याशी राजेश्वरी से और 2017 में भाजपा प्रत्याशी प्रभाष कुमार से वीरेंद्र वर्मा हार गए थे ,वीरेंद्र वर्मा हाल ही में सपा छोड़ कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए
  • ऊषा वर्मा (सपा)- वर्ष 1998, 2004 और 2009 में हरदोई संसदीय क्षेत्र से सांसद रह चुकी हैं। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव भी उन्होंने लड़ा था, लेकिन भाजपा प्रत्याशी अंशुल वर्मा से हार गईं थीं। ऊषा वर्मा ने अपना राजनीतिक करियर वर्ष 1995 में अहिरोरी की ब्लॉक प्रमुख बनने के साथ शुरू किया था। वह वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में अहिरोरी से सपा के टिकट पर विधायक भी चुनी गई थीं और सपा की सरकार बनने पर उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार राज्य मंत्री बनाया गया था। ऊषा वर्मा को मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव का बेहद करीबी माना जाता है।

Jalaun29 jalu.jpg

उत्तर प्रदेश के जालौन लोकसभा आरक्षित सीट है। कहा जाता है कि ऋषि जलवान के नाम पर इस जिले का नाम जालौन पड़ा था। 7वीं सदी में इस इलाके पर राजा हर्षवर्धन का शासन बना रहा। गंगा के जलोढ़ मैदानों पर बसा जालौन के उत्तर में यमुना नदी और तो दूसरी तरफ बेतवा नदी बहती है। जालौन 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब कानपुर में बढ़ती खबरें कालपी पहुंचीं, 53 वें मूल इन्फैंट्री के जवानों ने विद्रोह कर दिया था। कालपी में ही आचार्य भवभूति ने सूर्य (कालप्रियनाथ) में अपने नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन किया था। जालौन का कालपी नगर हमें सम्राट अकबर के उन हाजिर जवाब नवरत्न बीरबल की याद दिलाता है जो यहीं पैदा हुये थे। कालपी में अकबर द्वारा शाही मस्जिद और टकसाल का निर्माण कराया गया था।कालपी नगर के दक्षिण में चौरासी गुम्बद का मकबरा भी मौजूद लोदी का है, जो सिकन्दर लोदी का सूबेदार था। वैदिक ग्रंथों व महाभारत के अनुसार महर्षि वेदव्यास का जन्म यमुना के तट पर हुआ था। यहां एक भव्य व्यास मंदिर भी दर्शनीय स्थलों में से एक है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर पर सवार बीजेपी ने सपा से यह सीट छीन ली थी।

लोकसभा सीट अभी तक कुल 14 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं. इनमें से 5 बार कांग्रेस और 5 बार ही बीजेपी ने जीत दर्ज की है. जबकि सपा, बसपा,जनता दल और लोकदल को एक-एक बार जीत मिली है। जालौन में 1984 तक तो कांग्रेस का इतिहास बेतहरीन रहा। सन् 1952 से 1984 तक हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट से केवल 1977 में छोड़कर बाकी सभी चुनावों में कांग्रेस के ही सांसद चुने गए। 1977 में यहां से भारतीय लोकदल के रामचरन सांसद चुने गए। इसके अलावा कांग्रेस से जीतने वाले सांसदों में लोटन राम, होती लाल, चौधरी रामसेवक, नाथूराम शाक्यवार व चौधरी लच्छीराम शामिल रहे। जालौन सीट पर 1989 के चुनाव के बाद तस्वीर बदलने लगी। 1989 के चुनाव में जनता दल के रामसेवक भाटिया सांसद चुने गए। वहीं, बसपा ने इस चुनाव में धमाकेदार एंट्री मारी। बसपा के बाबू रामाधीन दूसरे नंबर पर रहे। इसके बाद 1991 के चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर पहली बार जीत का स्वाद चखा। भाजपा के गयाप्रसाद कोरी सांसद चुने गए और दूसरे नंबर पर रहे बसपा के बाबू रामाधीन। 1996 के चुनाव में यहां से भाजपा के भानु प्रताप सिंह वर्मा सांसद चुने गए। बसपा के चैनसुख भारती दूसरे नंबर पर रहे। 1998 में फिर एक बार भाजपा के भानु वर्मा सांसद चुने गए और दूसरे नंबर पर फिर बसपा रही। बसपा के प्रत्याशी थे मानसिंह। फिर 1999 में हुए चुनाव में पहली बार बसपा ने इस सीट पर जीत का परचम फहराने में कामयाबी पाई। बसपा के टिकट पर बृजलाल खाबरी सांसद चुने गए और दूसरे नंबर पर रहे भाजपा के भानु वर्मा। 2004 के चुनाव में भाजपा के भानु वर्मा ने फिर बाजी मारी और दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी घनश्याम कोरी ने जगह बनाई। इसके बाद 2009 के अगले ही चुनाव में इस सीट पर घनश्याम ने जीत दर्ज करके समाजवादी पार्टी का झंडा ऊंचा कर दिया। दूसरे नंबर पर बसपा के तिलक अहिरवार रहे। 2014 के चुनाव में फिर भाजपा ने यह सीट वापस हासिल कर ली। भाजपा के भानु वर्मा यहां से एक बार फिर सांसद चुने गए। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के बृजलाल खाबरी।

समीकरण- जालौन में 25 फीसदी दलित, 16 फीसदी ब्राह्मण मतदाता है। इस सुरक्षित सीट पर जबकि अति पिछड़े वोटर भी प्रभावी हैं।

वोटर- जालौन लोकसभा क्षेत्र 19,17,700 वोटर हैं. इनमें 10,40,835 पुरुष व 8,76,769 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 58.78 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- कुल पांच विधानसभा सीटें- भोगनीपुर, माधवगढ़, कालपी, उरई और गरौठा विधानसभा सीट है. मौजूदा समय में पांचों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है.

स्थानीय मुद्दे

  • बुंदेलखंड का पंजाब कहे जाने वाले जालौन में 5 नदियों का संगम है, लेकिन यहां की धरा पिछले कई सालों से सूखे की मार झेल रही है। यमुना, बेतवा, सिंधु, क्वारी, पहुज, चंबल, सिंध आदि नदियों वाले जालौन संसदीय क्षेत्र में सूखा प्रमुख मुद्दा है।
  • बीते बीस सालों में यहां फोरलेन बने। रेलवे लाइन का दोहरीकरण हुआ है। यहां के प्रमुख सिंचाई, पचनद बांध और रोजगार के साधनों की कमी है।

उम्मीदवार

  • भानू प्रताप वर्मा-वर्तमान सांसद भानू प्रताप वर्मा बीजेपी ने फिर से जालौन लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा है। भानू प्रताप वर्मा भाजपा से 4 बार 1996, 98, 2004, 2014 में सांसद रहे और अब पांचवी बार फिर से भाजपा से ही टिकट मिला है। भानू प्रताप वर्मा ने अपना राजनीतिक सफर 1989 में कोंच नगर पालिका के भाजपा से सभासद से किया था 1991 में उस समय की सुरक्षित कोंच विधानसभा से भाजपा का टिकट भानु को मिला। वह पहली बार में ही विधायक भी चुन लिए गए।
  • बृजलाल खाबरी-कांग्रेस ने उरई-जालौन में बसपा के पूर्व सांसद बृजलाल खाबरी को मैदान में उतारा है। इसके अलावा जालौन संसदीय सीट की जनता के लिए बृजलाल खाबरी बहुत पुराना चेहरा हैं, लेकिन उनका दल नया है। वह 1999 में इसी सीट से बहुजन समाज पार्टी के हाथी पर बैठकर संसद में दाखिल हुए। इसके बाद बसपा ने ही उन्हें राज्यसभा का भी सांसद बनवाया। इस बार वह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे हैं।
  • अजय सिंह (पंकज)-महागंठबंधन का प्रत्याशी अजय सिंह पंकज को घोषित किया गया. बसपा द्वारा उम्मीदवार बनाये गए अजय सिंह पंकज 2007 में कोंच क्षेत्र से बसपा के ही टिकट पर विधायक चुने गए थे । इसके बाद पार्टी ने 2012 और 2017 में न केवल उन्हे उम्मीदवार नहीं बनाया बल्कि पार्टी से भी निष्कासित कर दिया था । कुछ ही दिन पहले उनकी पार्टी में वापसी हुई । पंकज के पिता राम प्रसाद अहिरवार भी 1980 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर विधायक रह चुके हैं ।

Jhansi29 jhas.jpg

रानी लक्ष्मी बाई की झांसी अपने गौरवमयी इतिहास के कारण प्रसिद्ध है। वीरता-त्याग और आत्मम्मान का पर्याय झांसी उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एक है। झांसी पर शुरुआत में चंदेल राजाओं का नि‍यंत्रण था। उस समय इसे बलवंत नगर के नाम से जाना जाता था। झांसी का महत्‍व सत्रहवीं शताब्‍दी में ओरछा के राजा वीर सिंह देव के शासन काल में बढ़ा। इस दौरान राजा वीर सिंह और उनके उतराधि‍कारि‍यों ने झांसी में अनेक ऐति‍हासि‍क इमारतों का नि‍र्माण करवाया। एक दि‍न ओरछा के कि‍ले पर वीर सिंह और जैतपुर के राजा आपस में बात कर रहे थे। बातों-बातों में जैतपुर के राजा ने कहा कि‍ बलवंत नगर यहां से ‘झाईं सी’ लग रहा है। यह शब्‍द वीर सिंह को काफी पसंद आया और धीरे-धीरे इतना प्रचलि‍त हुआ कि‍ बलवंत नगर का नाम झांसी पड़ गया। रानी लक्ष्मी बाई की झांसी अपने गौरवमयी इतिहास के कारण प्रसिद्ध है। वीरता-त्याग और आत्मम्मान का पर्याय झांसी उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एक है। झांसी भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है। यह शहर उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है और बुंदेलखंड क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। झांसी एक प्रमुख रेल एवं सड़क केन्द्र है और झांसी जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी है। झांसी शहर पत्थर निर्मित किले के चारों तरफ फैला हुआ है । यह किला शहर के मध्य स्थित बंगरा नामक पहाड़ी पर निर्मित है। वैसे झांसी, चंदेल राजाओं का गढ़ था। झांसी शहर पहुंज और बेतवा नदी से घिरा हुआ है। वर्तमान में झांसी डिवीजनल कमिश्नर का मुख्यालय है, जिसमे झाँसी, ललितपुर और जालौन जनपद शामिल हैं।

लोकसभा सीट- झांसी में हुए 16 लोकसभा चुनाव में 9 बार कांग्रेस, पांच बार भारतीय जनता पार्टी और एक-एक बार भारतीय लोकदल व समाजवादी पार्टी ने अपना परचम लहराया है। इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी अब तक अपना खाता नहीं खोल सकी है। झांसी-ललितपुर सीट से 1952 से 1971 तक लगातार कांग्रेस विजयी रही है। 1977 में भारतीय लोकदल इस सीट पर कब्जा जमाने में कामयाब रही लेकिन अगले ही चुनाव में इस सीट पर फिर से कांग्रेस का कब्जा हो गया। 1980 और 1984 में इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा लेकिन 1989 में बीजेपी ने अपना खाता खोला। 1991 के चुनाव में बीजेपी इस सीट को बचाने में कामयाब रही लेकिन अगले चुनाव में इस सीट पर बसपा का कब्जा हो गया। 1998 में बीजेपी ने फिर वापसी की लेकिन 1999 में कांग्रेस के हाथों उसे हार का मुंह देखना पड़ा। जहां 2004 में सपा ने इस सीट पर विजय पताका फहराया वहीं 2009 में कांग्रेस ने। 2014 के चुनाव में इस सीट पर बीजेपी ने कब्जा जमाया।

समीकरण- अनुसूचित जाति की आबादी इस सीट पर 24 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी 2.27 फीसदी है. जातिगत आधार पर देखें तो कुशवाहा सवा 2 लाख, अहिरवार 2 लाख 20 हजार, ब्राह्मण 2 लाख 15 हजार, लोधी डेढ लाख, यादव एक लाख 60 हजार,मुस्लिम,पाल और रायकवार एक-एक लाख, साहू 80 हजार, कोरी 75 हजार, कुर्मी 60 हजार हैं।

वोटर- झांसी लोकसभा क्षेत्र 20,15,365 वोटर हैं। इनमें 10,66,673 पुरुष व 9,48,589 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 58.78 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- पांच विधानसभा सीटें आती हैं- बबीना, ललितपुर, झांसी नगर, महरौनी और मऊरानीपुर, जिनमें से महरौनी और मऊरानीपुर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. 2017 के विधानसभा चुनाव में पांच में से चार सीटों पर बीजेपी और झांसी नगर सीट पर बीएसपी को जीत मिली थी।

स्थानीय मुद्दे

  • हाइवे पर अन्ना जानवरों की समस्या।
  • पानी को लेकर मचने वाली त्राहि-त्राहि।
  • प्रमुख बाजारों में पार्किंग की व्यवस्था।
  • अधूरे पड़े ओवरब्रिज के निर्माण।
  • सरकारी स्कूलों की जर्जर भवन।
  • अंग्रेजी विद्यालयों की अनियंत्रित फीस।
  • कुओं व बावड़ियों पर दबंगों के कब्जे।
  • प्रमुख बाजारों में जाम की समस्या।
  • बरसात में कई इलाकों में जलभराव की समस्या।
  • ऐतिहासिक धरोहरों का रखरखाव।
  • पर्यटन को बढ़ावा न मिलना।
  • ग्रामीण क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक और कर्मचारियों की कमी।
  • किसानों की बदहाली
  • रोजगार के लिए पलायन

उम्मीदवार

  • अनुराग शर्मा (बीजेपी)- झांसी सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं। अनुराग शर्मा देश की जानी-मानी आयुर्वेदिक दवाओं की कंपनी के कर्ताधर्ता हैं, वे पहली बार चुनाव मैदान में उतरे हैं पर उनके पिता दो बार सांसद रह चुके हैं। अनुराग झांसी में 1980 में कांग्रेस से सांसद रहे स्वर्गीय विश्वनाथ शर्मा के पुत्र हैं। उनके पिता बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे और 1991 में हमीरपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता था। अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ने रहे अनुराग शर्मा के सामने कई तरह की मुश्किलें हैं। सबसे पहले तो उनका पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव नहीं रहा है। इसलिए उन्हें पार्टी वर्कर्स से कनेक्ट करने की मुश्किल है। हालांकि, उनके चुनाव की जिम्मेदारी पार्टी के बड़े नेताओं को सौंपी गई है।
  • शिवशरण कुशवाहा (कांग्रेस)- यूपी में कांग्रेस ने एनआरएचएम घोटाले के आरोपी व पूर्व बसपा नेता बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी के साथ गठबंधन किया है। झांसी में जन अधिकार पार्टी के नेता शिवशरण कुशवाहा चुनाव लड़ रहे हैं। ये बाबू सिंह कुशवाहा के भाई हैं। कांग्रेस ने उन्हें अपने सिंबल पर मैदान में उतारा है।
  • श्यामसुंदर सिंह यादव (सपा) ग्राम पारीछा के रहने वाले हैं। वह लगातार दो बार समाजवादी पार्टी से झांसी-ललितपुर-जालौन स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं। पहला चुनाव उन्होंने 1998 में व दूसरा 2004 में जीता था। 2011 में वह भाजपा में शामिल हो गए थे और 2012 में बबीना से विधानसभा का चुनाव लड़ा था और हार गए थे, श्याम सुन्दर सिंह यादव किसान परिवार मै पैदा होने के कारन इन्हे हर तरह कि खेती करने का अनुभव है इसलिये किसानों कि हर समस्या का निराकरन करने मै सक्षम होंगे , श्याम सुन्दर सिंह यादव की छवि क्षेत्र में ईमानदार नेता की रही है

Kannauj29 kanu.jpg

खुशबू का शहर कन्नौज। एशिया का पेरिस। सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी। सातवीं सदी में कन्नौज पूरे उत्तर भारत की राजनीति का केंद्र था। चीनीपर्यटक ह्वेनसांग ने कन्नौज को खुशहाल और संपन्न राज्य बताया था। इस ऐतिहासिक इलाके का जिक्र आज की राजनीति में भी मौजूं है।

कन्नौज भारत की सबसे प्राचीन जगहों में से एक है जिसमें समृद्ध पुरातात्विक और सांस्कृतिक विरासत है, इस स्थान का प्राचीन नाम कन्याकुज्जा या महोधी है (बाल्मीकि रामायण, महाभारत और पुराण के अनुसार) बाद में कन्याकुज्जा को कन्नौज के रूप में परिवर्तित किया गया था, जो कि वर्तमान का नाम है । कांस्य युग के दौरान कई पूर्व ऐतिहासिक हथियार और उपकरण यहां मिले थे। पत्थर की मूर्तियों की बड़ी संख्या यहां पाए जाते हैं। कन्नौज मूर्तिकला में महान पुरातनता का दावा कर सकते हैं। इस क्षेत्र में आर्यन बसे हुए थे, जो कुरुस के करीबी मित्र थे। महाभारत युद्ध के अंत तक प्राचीन काल से जिला का पारंपरिक इतिहास पुराणों और महाभारत से प्राप्त होता है।

वर्तमान में 100 से ज्यादा छोटे-बड़े इत्र कारखानों वाले इस शहर में कारोबार के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। हर साल एक करोड़ रुपये से ज्यादा का इत्र निर्यात करने वाले व्यवसायी कहते हैं, सरकारी बेरुखी से कन्नौज का इत्र दुनिया में उस ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाया, जहां तक पहुंच सकता था। हमें कर्ज नहीं, सुविधाएं चाहिए। कन्नौज के दिल में क्या है? इस सवाल के जवाब में वे खुलकर किसी दल का नाम नहीं लेते। अलबत्ता आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार के कदम की तारीफ करते हैं। उन्होंने कहा, 1971 के बाद भारत ने पहली बार उन्हें (पाकिस्तान को) दो टूक बताया है कि अब बदमाशियां बर्दाश्त नहीं होंगी। कन्नौज के उपनगर की तरह विकसित हुए मकरंद नगर की एक गली में कुछ लोग खड़े हैं। इनमें एक बेरोजगार देशदीपक से बात शुरू करते हैं, ‘किसे जिताएगा कन्नौज?’ देशदीपक ने जवाब दिया, ‘सब कहते हैं हमने रोजगार दिया। लेकिन कहां मिला रोजगार? सबको वोट चाहिए। अब किसी के वायदों पर भरोसा नहीं होता।’ साथ खड़े व्यापारी राजनारायण गुप्ता कहते हैं, ‘चुनाव कन्नौज का नहीं, देश का है। आतंकवाद का इलाज तो यही सरकार कर सकती है। ‘ व्यापारी अतहर अली बात बीच में ही काटते हैं, ‘गरीबों को 72 हजार देने का वायदा तो कांग्रेस ने भी किया है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में उसने किसानों का कर्ज माफ किया कि नहीं।’

लोकसभा सीट- आजादी के बाद 1952 में पहली बार हुए चुनाव में कन्नौज लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार शंभूनाथ मिश्रा ने जीत दर्ज करकेबाजी मारी। इसके बाद 1957 में वो दोबारा चुने गए और साल 1962 में मूलचंद्र दुबे, लेकिन 1963 में शंभूनाथ मिश्रा एक बार फिर सांसद बने। 15 साल तक कांग्रेस की तूती बोलती रही, जिस पर समाजवादी विचारधारा के जनक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ब्रेक लगाया और 1967 के चुनाव मेंकांग्रेस के शंभूनाथ को करारी मात देकर वह संसद बने। 1971 में कांग्रेस ने एक बार फिर से जीत हासिल की, लेकिन 1977 में जनता पार्टी के रामप्रकाश त्रिपाठी, 1980 में छोटे सिंह यादव जीते। 1984 मेंशीला दीक्षित ने कन्नौज से चुनावी मैदान में उतरकर कांग्रेस की इस सीट पर वापसी कराई। 1989 और 1991 में छोटे सिंह यादव ने लोकदल काझंडा बुलंद करते हुए जीत हासिल की।

सपा का गढ़- इस सीट पर 1996 में बीजेपी चंद्रभूषण सिंह ने पहली बार कमल खिलाकर भगवा ध्वजफहराया, लेकिन दो साल बाद 1998 के चुनाव में प्रदीप यादव ने बीजेपी से यह सीट छीनी और उसके बाद से लगातार हुए 6 चुनाव से यह सीटसपा की झोली में है। 1999 में सपा के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव जीते, लेकिन उन्होंने बाद में इस्तीफा दे दिया। इसके बाद अखिलेश यादव ने अपनी सियासी पारी का आगाज कन्नौज संसदीय सीट पर 2000 में हुए उपचुनाव से किया। इसके बाद अखिलेश यादवने 2004, 2009 में लगातार जीत कर उन्होंने पहली बार हैट्रिक लगाकर इतिहास रचा, लेकिन 2012 में यूपी के सीएम बनने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद उनकी पत्नी डिंपल यादव निर्विरोध चुनकर लोकसभा पहुंचीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज सीट काफी मशक्कत के बाद एसपी के खाते में आई थी। यहां से डिंपल यादव ने महज 19 हजार 907 वोटों केअंतर से जीत हासिल की थी।

समीकरण- कन्नौज में 16 फीसदी यादव मतदाता हैं, वहीं मुस्लिम वोटर करीब 36 फीसदी हैं। इसके अलावा ब्राह्मण मतदाता 15 फीसदी के ऊपर हैं. करीब 10 फीसदी राजपूत हैं तो वहीं ओबीसी मतदाताओं में लोधी, कुशवाहा, पटेल बघेल मतदाता अच्छे खासे हैं। ऐसे में अखिलेश की जीत में अगर मुस्लिम वोटर बिदके तो फिर राह मुश्किलों भरी होंगी।

वोटर- कन्नौज लोकसभा क्षेत्र 18,55,121 वोटर हैं। इनमें 10,14,618 पुरुष व 8,40,406 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 61.62 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- पांच विधानसभा सीटें- इनमें कन्नौज जिले के तीन विधानसभा क्षेत्र कन्नौज, तिरवा और छिबरामऊ शामिल हैं। इसके अलावा कानपुर देहात की रसूलाबाद और औरेया जिले की बिधूना विधानसभा सीट कन्नौज लोकसभा सीटका हिस्सा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पांच में से चार सीट पर बीजेपी और महज एक पर सपा जीती थी।

स्थानीय मुद्दे 100 से ज्यादा छोटे-बड़े इत्र कारखानों वाले इस शहर में कारोबार के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं।, सरकारी बेरुखी से कन्नौज काइत्र दुनिया में उस ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाया, इत्र निर्यात करने वाले व्यवसायी कहते हैं हमें कर्ज नहीं, सुविधाएं चाहिए , गांव के नौजवानों के बीचरोजगार बड़ा मुद्दा है , आवारा जानवरों से फसलों को होने वाले नुकसान से भी चिंतित दिखे। सरकार ने आलू खरीद की घोषणा की हुई है, पर हमें फायदा नहीं हुआ। आलू छांट कर अलग कर दिया जाता है। यह छांटा गया आलू लेकर फिरबाजार जाना पड़ता है। इसलिए हम सरकार को फसल बेचना नहीं चाहते। सरकार को बेचें तो पूरी लागत भी न मिले।’

 उम्मीदवार

  • डिंपल यादव- सपा नेता डिंपल यादव उत्तर प्रदेश के सबसे मजबूत राजनीतिक घराने की बहू हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेशयादव की पत्नी हैं। वह दो बार सांसद रह चुकी हैं। 2012 में अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। तब वह कन्नौज सीट से सांसद थे। उनकेमुख्यमंत्री बनने से यह सीट खाली हो गई थी। तब यहां हुए उपचुनाव में डिंपल पहली बार निर्विवाद रूप से सांसद चुनी गई थीं। वह यहां से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी सुब्रत पाठक को हराने में कामयाब रही थीं।
  • सुब्रत पाठक- सुब्रत पाठक को भाजपा ने मौजूदा लोकसभा चुनाव में कन्नौज से अपना उम्मीदवार बनाया है, दरअसल पार्टी ने 2014 के लोकसभाचुनाव में उन्हें यहां से तत्कालीन सपा सांसद डिंपल यादव के खिलाफ मैदान में उतारा था। लेकिन मोदी लहर के बावजूद पाठक लगभग 20 हजारवोटों के अंतर से डिंपल से हार गए थे। पाठक फिलहाल उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदेश महामंत्री हैं। वह भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भीरह चुके हैं।

Kanpur29 kanp.jpg

उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे बसा औद्योगिक शहर कानपुर देश की हाई प्रोफाइल लोकसभा सीटों मे से एक है। इसे ‘लेदर सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है। एक दौर में कपड़ा उद्योग के चलते इसे ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता था. हालांकि वक्त और सरकार की उपेक्षा के चलते यह शहर अपनी पहचान खोता चला गया और देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया। गंगा के पानी को प्रदूषित करने के लिए कानपुर के चमड़ा कारखाने से निकलने वाले कचरे को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है।

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी को मैदान में उतारकर कांग्रेस की ओर से जीत की हैट्रिक लगा चुके श्रीप्रकाश जायसवाल को करारी मात दे दी और यहां से भगवा ध्वज फहराने में कामयाब रही. आजादी के बाद से अब तक कानपुर संसदीय सीट पर 16 बार चुनाव और 2 बार उपचुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस इस सीट पर महज 7 बार जीत का परचम लह रहा चुकी है, बाकी 4 बार निर्दलीय और 4 बार बीजेपी ने जीत हासिल की थी। एक बार भारतीय लोकदल और एक बार सीपीएम के उम्मीदवार भी जीत दर्ज कर चुके हैं।

पहली लोकसभा में ही हुए थे दो उपचुनाव चुनाव- 1952 में हुए चुनाव में कांग्रेस के हरिहरनाथ शास्त्री ने जीत दर्ज की थी। जब 1954 में उनकी मृत्यु के बाद कांग्रेस के शिव नारायण टंडन ने उपचुनाव जीता। 1955 में बमुश्किल छह महीने के बाद टंडन ने इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद 1955 में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजाराम शास्त्री को कानपुर से जीत दर्ज की।

कांग्रेस की हैट्रिक- कांग्रेस ने 1999 लोकसभा चुनाव में श्रीप्रकाश जायसवाल को उतारकर बीजेपी के मजबूत हो रहे दुर्ग को भेदने में सफल रही. इसके बाद वो 2004 और 2009 में भी यहां से जीतने कामयाब रहे. लेकिन 2014 के चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी का इस सीट पर फिर से कब्जा हो गया.

समीकरण- कानपुर लोकसभा सीट में कुल जनसंख्या लगभग 16 लाख है। इसमें ब्राह्मण वोटरों की संख्या छह लाख से ज्यादा होने के चलते कानपुर लोकसभा सीट ब्राह्मण बहुल मानी जाती है। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या इस सीट पर चार लाख से ज्यादा एवं दलित, अन्य पिछड़े वर्गों की संख्या तकरीबन दो लाख है।

वोटर- कानपुर लोकसभा क्षेत्र 15,97,591 वोटर हैं, इनमें 8,74,299 पुरुष व 7,23,147 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 51.83 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- 5 विधानसभा सीटें- इनमें गोविंदनगर, सिसामऊ, आर्यनगर, किदवईनगर और कानपुर कैंट विधानसभा सीट शामिल हैं. मौजूदा समय में इनमें से 2 सीटों पर सपा, 2 पर बीजेपी और 1 सीट पर कांग्रेस का कब्जा है।

स्थानीय मुद्देबीते बीस सालों में यहां से दिल्ली के लिए दो ट्रेनें मिलीं। टूलरूम का काम चल रहा है। आइएसआइ (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल्स की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। 1980 मेगावाट के बिजलीघर की अनुमति मिली। कानपुर-सागर हाईवे का चौड़ीकरण हुआ। कांशीराम ट्रामा सेंटर मिला। हवाई सेवाएं मिलीं। इंजीनियर डॉक्टर बनाने वाले वाले और देश में नामचीन ब्रांड देने वाले इस शहर में कपड़ा मिलों को दोबारा चालू करना और औद्योगिक विकास  की मांग अलग अलग फोरम पर उठती रही है, हालांकि कभी चुनावी मुद्दा नहीं रहा। इस समय अनवरगंज से फर्रुखाबाद जाने वाली रेल लाइन को मंधना से पनकी तक मोडऩा और टेनरी शिफ्टिंग व प्रदूषण के नाम पर टेनरी बंद करना बड़ा मुद्दा है।

उम्मीदवार

  • सत्यदेव पचौरी (BJP)- बीजेपी ने कानपुर संसदीय सीट से सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी का टिकट काट दिया है। उनके स्थान पर पार्टी ने प्रदेश के लघु उद्योग मंत्री सत्यदेव पचौरी को टिकट दिया है। पचौरी अभी गोविंद नगर विधानसभा सीट से विधायक हैं। 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सत्यदेव पचौरी को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वह चुनाव हार गए थे। 2009 में पार्टी ने पचौरी को मौका नहीं दिया। 2017 विधानसभा चुनाव में गोविंदनगर से सत्‍यदेव पचौरी ने बड़ी जीत दर्ज की थी।
  • श्रीप्रकाश जायसवाल (Cong) कानपुर से पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को छठवीं बार मैदान में उतारा है। श्रीप्रकाश जायसवाल लगातार 1999 से लेकर 2014 तक लगातार सांसद रहे हैं। यूपीए सरकार में वो गृहराज्य मंत्री और फिर केंद्रीय कोयला मंत्री भी रह चुके हैं। इससे पहले 1989 में कानपुर शहर के मेयर भी रह चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने श्रीप्रकाश जायसवाल की हैट्रिक को तोड़ते हुए शानदार जीत दर्ज की थी 19 अप्रैल को कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का कानपुर में रोड शो किया औक श्रीप्रकाश जायसवाल के लिए लोगों को वोट की अपील की।
  • रामकुमार (SP)- समाजवादी पार्टी ने कानपुर लोकसभा सीट पर पिछड़ा कार्ड चलने का फैसला लिया है। पूर्व सांसद मनोहर लाल के पुत्र एवं उन्नाव के पूर्व विधायक रामकुमार को सपा ने कानपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया है। गठबंधन प्रत्याशी रामकुमार का भाजपा प्रत्याशी सत्यदेव पचौरी और कांग्रेस प्रत्याशी श्रीप्रकाश जायसवाल से मुकाबला होगा। रामकुमार 1977 में भारतीय लोकदल से कानपुर संसदीय सीट से सांसद चुने गए मनोहर लाल के पुत्र हैं। उनके छोटे भाई दीपक कुमार 1999 में उन्नाव से सांसद चुने गए। उनके सांसद बनने पर उन्नाव सदर सीट पर हुए उपचुनाव में सपा प्रत्याशी के रूप में रामकुमार लड़े और जीते। उसके बाद 2004 का विधानसभा चुनाव हार गए थे।

Kheri29 kheri.jpg

लखीमपुर खीरी का प्राचीन इतिहास इस स्थान को हस्तिनापुर की चंद्र जाति से जोड़ता है। खीरी की कई जगह महाभारतकालीन हैं। खैराबाद के पास एक पत्थर का घोड़ा खुदाई के दौरान मिला था जो चौथी सदीं में समुंद्र गुप्त के शिलालेख दर्शाता है। लखीमपुर खीरी के उत्तरी भाग पर 10वीं शताब्दी में राजपूतों द्वारा कब्जा किया गया था। उत्तरी सीमांत पर कई किलों का निर्माण कराया गया था ताकि नेपाल से हमलों को रोका जा सके। 17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के दौरान, अकबर के शासन में जिले ने अवध का हिस्सा बनाया था। 1801 में जब रोहिलखंड को अंग्रेजों को सौंप दिया गया था, तब इस जिले का कुछ हिस्सा कब्जे में शामिल था।

उत्तर प्रदेश की 28वीं लोकसभा सीट खीरी इस समय भारतीय जनता पार्टी के पास है. पीलीभीत से सटी इस सीट पर जनता का रुख काफी रोचक रहा है, इस सीट पर पार्टियों ने लगातार तीन-तीन बार जीत दर्ज की है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अजय कुमार मिश्र ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. इस सीट को लखीमपुर खीरी के नाम से भी जाना जाता है.

लोकसभा सीट- आजादी के बाद इस सीट पर 1957 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए, इन चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की. लेकिन उसके बाद 1962 से 1971 तक यहां कांग्रेस का राज रहा। आपातकाल के बाद 1977 में जब चुनाव हुए तो कांग्रेस को यहां नुकसान उठाना पड़ा और भारतीय लोकदल ने यहां पर जीत दर्ज की। लेकिन अगले ही चुनाव में कांग्रेस ने यहां जबरदस्त वापसी की, 1980, 1984, 1989 में कांग्रेस बड़े अतंर से जीती। 1990 के दौर में चले मंदिर आंदोलन ने यहां बीजेपी को भी फायदा पहुंचाया, 1991 और 1996 में यहां से बीजेपी चुनाव जीती। हालांकि, मंदिर आंदोलन के बाद ही वर्चस्व में आई समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को अगले ही चुनाव में करारी मात दी। 1998, 1999 और 2000 के चुनाव में समाजवादी पार्टी यहां से लगातार तीन बार चुनाव जीती। 2009 के लोकसभा चुनाव में यहां पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की और साल 2014 में ये सीट BJP की झोली में चली गई।

समीकरण- लखीमपुर खीरी में तकरीबन 3.25 लाख मुस्लिम आबादी है। यहां 4.25 लाख दलित हैं, जबकि 4.75 लाख ओबीसी हैं। गोटैयाबाज के अमित कहते हैं कि वोटों का गणित इतना बढ़िया बैठता तो पिछली बार भाजपा सरकार नहीं बनती। भले ही हमें सांसद से नाराजगी हो लेकिन पुलवामा के नाम पर प्रधानमंत्री को एक मौका देना तो बनता है।

वोटर- खीरी लोकसभा क्षेत्र 17,57,116 वोटर हैं। इनमें 9,39,958 पुरुष व 8,17,117 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 64.18 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- कुल 5 विधानसभा आती हैं, जिसमें पलिया, निघासन, गोला गोकरनाथ, श्रीनगर और लखीमपुर आते हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इन सभी सीटों पर बीजेपी ने ही जीत दर्ज की थी।

स्थानीय मुद्दे

बाढ़  का प्रकोप- तराई में बाढ़ का सबसे ज्यादा प्रकोप खीरी में होता है। इससे निपटने के लिए समुचित नीतियों और पुख्ता इंतजाम की कमी है। शारदा नदी में गाद भर गई है। गाद निकाले जाने के दावों के बावजूद समस्या बरकरार है। नेपाल से आने वाली सुहैली नदी सूख गई है, जिससे पानी की कमी से जूझना पड़ता है।

तस्करी की समस्या- नेपाल सीमा से करीबी के कारण हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर, कपड़े और अन्य सामान के अलावा जंगलों के रास्ते हेरोइन और चरस की तस्करी एक अहम मुद्दा है। इससे सरकार को राजस्व का काफी नुकसान होता है।

शिक्षा का सवाल- लखीमपुर लोकसभा क्षेत्र के युवा तकनीकी शिक्षा का अभाव महसूस करते हैं। बीएड-बीटीसी के डिग्री कॉलेजों में गुणवत्तापरक शिक्षा की कमी है। बेरोजगार युवाओं की तादाद काफी है, जबकि कौशल विकास मिशन के नाम पर केवल खानापूरी की गई, जिससे युवाओं की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं।

रेलमार्ग की सुविधा नहीं- फोर लेन पूरी नहीं हुई, हालांकि पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार में काम शुरू हुआ था। ओयल में अभी तक अधिग्रहण भी नहीं हुआ। रेल मार्ग 2016 से बंद है। सात साल पहले ब्रॉडगेज का काम शुरू हुआ था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ। लखनऊ जाने के लिए ट्रेन की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

नेशनल हाईवे पर गड्ढे- नेशनल हाईवे 730 पर इतने बडे़-बड़े गड्ढे हैं कि बसें तक रुक जाती हैं। गोला गोकर्णनाथ से लखनऊ जाने वाले लोग इस हाईवे से ही होकर जाते हैं। मैलानी से पलिया के बीच सड़क खराब है। पचास से 65 किलोमीटर की इस दूरी को पार करने में 2.5 घंटे लगते हैं।

उम्मीदवार

  • अजय कुमार मिश्रा (बीजेपी)-भारतीय जनता पार्टी के अजय कुमार मिश्र यहां से सांसद हैं। यहां से सांसद अजय कुमार मिश्रा का राजनीतिक सफर ज्यादा लंबा नहीं है. 2012 में अजय कुमार निघासन विधानसभा सीट से विधायक चुने गए. इसके बाद2014 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद चुने गए.
  • जफर अली नकवी (कांग्रेस)-जफर अली नकवी प्रदेश सरकार में मंत्री समेत कई पदों पर रह चुके हैं। जफर अली ने 1980 ने पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लखीमपुर खीरी सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1980-1991 तक उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। साथ ही 1980 से 81 तक के लिए उन्हें कांग्रेस (आई) के उत्तरप्रदेश विधान मंडल दल का सचिव बनाया गया। 1996 से 1999 तक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य के रूप में ज़िम्मेदारी सम्हाली। 2000 से 2003 तक दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य बनाया गया। 2004 से 2009 तक अल्पसंख्यक शिक्षा के स्थाई समिति के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे।
  • डॉ. पूर्वी वर्मा (सपा)-डॉ. पूर्वी वर्मा पूर्व केंद्रीय मंत्री बालगोविंद वर्मा और पूर्व सांसद ऊषा देवी वर्मा की पौत्री और सपा के राज्यसभा सांसद रविप्रकाश वर्मा की पुत्री हैं। डॉ. पूर्वी वर्मा ने एमबीबीएस की शिक्षा ग्रहण करने के बाद प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से मास्टर इन पब्लिक हेल्थ की उपाधि हासिल की। इसके बाद वे पब्लिक हेल्थ में जेएनयू से पीएचडी के साथ सेंटर फॉर अर्बन एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के सम्मिलित एवं न्यायपूर्ण समाज की रचना के लिए निरंतर कार्य कर रही है।

Misrikh29 misk.jpg

उत्तर प्रदेश की मिश्रिख लोकसभा सीट UP की सीतापुर, हरदोई और कानपुर जिलों की विधानसभा सीटों को मिलाकर बनाई गई है. मिश्रिख महर्षि दधीचि की वजह से प्रसिद्ध है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि दधीचि ने असुरों को मारने के लिए भगवान इंद्र को अपनी अस्थियां दान कर दी थी. इस शहर का अपना धार्मिक महत्व भी है।

लोकसभा सीट- इस संसदीय इतिहास की बात की जाए तो 1962 में संसदीय सीट के रूप में वजूद में आई, तब से लेकर अभी तक अनुसूचित जाति के लिए यह सीट आरक्षित रही है. बीजेपी के लिहाज से मिश्रिख संसदीय क्षेत्र ज्यादा मुफीद नहीं रही. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सहारे में बीजेपी की अंजू बाला यहां से चुनाव जीतने में सफल रही थीं. इस तरह बीजेपी दूसरी बार जीतने में कामयाब रही. मिश्रिख लोकसभा सीट पर 2014 तक 14 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से 7 बार कांग्रेस, 3 बार बसपा और 2 बार बीजेपी ने जीत हासिल की है. वहीं, सपा,भारतीय लोकदल और जनसंघ एक-एक बार जीत चुकी है.

समीकरण- मिश्रिख लोकसभा सीट पर 2011 के जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या 25,66,927 है. इसमें 90.33 फीसदी ग्रामीण और 9.67 शहरी आबादी है. अनुसूचित जाति की आबादी 33 फीसदी के करीब है।  

वोटर- मिश्रिख लोकसभा क्षेत्र 17,79,700 वोटर है इनमें 9,67,830 पुरुष व 8,11,793 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 57.85 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- पांच विधानसभा सीटें- बालामऊ, संडीला, बिल्हौर, मिसरिख और मल्लावां विधानसभा सीटें शामिल हैं. इनमें मिसरिख सीट सीतापुर जिले में बिल्हौर कानपुर और बाकी तीन सीटें हरदोई जिले में पड़ती हैं. 5 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।

उम्मीदवार

  • अशोक रावत(BJP)- बीजेपी ने मिश्रिख लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद का टिकट काट दिया है। मिश्रिख से भाजपा प्रत्याशी घोषित किए गए अशोक रावत दो बार इसी क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं। वर्ष 2004 और वर्ष 2009 में बसपा के टिकट पर अशोक रावत सांसद चुने गए थे। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव भी उन्होंने बसपा के टिकट पर लड़ा था, लेकिन भाजपा प्रत्याशी अंजू बाला से हार गए थे। अशोक रावत के चाचा पूर्व मंत्री रामपाल वर्मा इन दिनों बालामऊ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक हैं, तो चचेरे भाई प्रभाष कुमार सांडी सीट से भाजपा के विधायक हैं। अशोक रावत वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद वर्ष 2018 में भाजपा में शामिल हुए थे।
  • मंजरी राही (Cong)-मिश्रिख सीट के लिए मंजरी राही को प्रत्याशी के रूप में उतारा है। मंजरी चार बार सांसद व दो बार विधायक रहे राम लाल राही की पुत्रवधू हैं। वह स्वयं 1995 से 2000 व 2010 तक दो सत्र तक जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। समाज सेवाओं में वह सक्रिय रहतीं हैं। वर्ष 2012 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हरगांव विधानसभा क्षेत्र से चुनावी लड़ी थीं, लेकिन 40 हजार वोट पाकर भी उनको हार का सामना करना पड़ा था। पारिवारिक पृष्ठ भूमि के मामले में उनके ससुर रामलाल राही वर्ष 1969 से 1977 तक दो बार हरगांव से विधायक रहे। चार बार 1977, 1980, 1989, 1991 वर्ष में कांग्रेस से ही सांसद रहे। 1991 से 1996 तक उप गृह राज्यमंत्री भारत सरकार रहे। उनकी सास सुंदरी राही वर्ष 1995 से 2000 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं। पति रमेश राही वर्ष 1996 से 2002 तक हरगांव से ही सपा से विधायक रहे। उनके देवर सुरेश राही हरगांव से मौजूदा समय में भाजपा से विधायक हैं।
  • डॉ. नीलू सत्यार्थी-मिश्रिख लोकसभा क्षेत्र बसपा के लिए मुफीद रहा है। साल 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में अशोक रावत सांसद चुने जा चुके हैं। फिलहाल अशोक रावत भाजपा में हैं। बसपा ने ट्रांसपोर्ट कमिश्नर पीएस सत्यार्थी की पत्नी डॉ. नीलू सत्यार्थी को प्रत्याशी घोषित किया है। नीलू सत्यार्थी साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बालामऊ विधानसभा क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन वह चुनाव हार गई थीं।

Shahjahanpur29 Shah.jpg

मुगल बादशाह जहांगीर की सेना के सिपाही दरिया खान के बेटे बहादुर खान ने शाहजहांपुर शहर को बसाया। उन्होंने शहर का नाम शाहजहांपुर रखा। दिलेर खान की सेवाओं को देखते हुये शाहजहां ने एक किले का निर्माण करने के लिये 14 गांव भेंट के रूप में दे दियेl दिलेर खान ने “नैनार खेरा गांव” में एक किले का निर्माण करवाया था। शाहजहांपुर शहर की तरह, तिलहर राजपूत – त्रिलोक चन्द्र राजपूत द्वारा विकसित किया गया था l यह जिले का सबसे पुराना शहरी क्षेत्र हैl सेना को “धनुष” की आपूर्ति के कारण इस शहरी क्षेत्र को “तीर कमान नगर” के रूप में बुलाया जाता था l शाहजहांपुर ने 1857 के जिला बरेली और लखनऊ के बीच स्वतंत्रता आंदोलन में एक बड़ी भूमिका निभाई। एक समय में, दिल्ली से शेख जाद, नाना शहर पहोवा, फैजाबाद से अहमद उल्लाह शाह और बरेली खान से खान बहरुढ़ खान ने यहां एकजुट किया और संघर्ष में और सुधार के लिए योजना बनाई लेकिन सफल नहीं हो पाई। 9 अगस्त, 1925 को, चंद्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, अशफाक़उल्ला खान और लाहिरी ने “ककोरी” रेलवे स्टेशन के निकट सरकारी फंड को लूट लिया। 26 दिसंबर, 1 925, 40 व्यक्तियों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक़ुल्ला खान, रोशन सिंह, प्रेमकिशन खन्ना, बनवारी लाल, हरगोविंद, इंद्र भूषण, जगदीश और बनारसी शाहजहांपुर से थे।

लोकसभा सीट- 1962 के लोकसभा चुनाव के दौरान ये सीट वर्चस्व में आई, शुरुआती तीन चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस ही विजय रही। लेकिन 1977 में चली सरकार विरोधी लहर में कांग्रेस यहां पर टिक नहीं पाई थी और जनता दल ने यहां से जीत हासिल की थी। हालांकि,3 साल बाद जब देश में फिर चुनाव हुए तो कांग्रेस ने यहां वापसी की। 1980, 1984 में कांग्रेस के जितेंद्र प्रसाद एक बार फिर बड़े अंतर से जीत हासिलकर यहां जीते। 1990 के आसपास जब देश में राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, तो बीजेपी ने भी यहां पैर पसारे। 1989, 1991 के चुनाव में इस सीट परभारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की। राम मंदिर आंदोलन के बाद बनी समाजवादी पार्टी ने 1996 के चुनाव में इस सीट से जीत दर्ज की। लेकिन 1998 में एक बार फिर बीजेपी यहां से जीत कर आई। हालांकि, एक बार फिर 1999 में चुनाव हुए और जितेंद्र प्रसाद जीतकर सांसद बने। 2001 में उनका निधन हो गया। जिसके बाद 2004 के चुनाव में उनके बेटे जितिन प्रसाद इस सीट से चुनाव जीते। 2009 काचुनाव समाजवादी पार्टी के खाते में गया, लेकिन 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर विजयी हुई।

समीकरण- इस सीट पर भी मुस्लिमो मतदाताओं का खासा प्रभाव है, यहां करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है। दलित आबादी लगभग 26 फीसदी है।

वोटर- यहां पर 20,97,166 मतदाता हैं, इनमें से 11,48,951 पुरुष मतदाता और 9,48,032 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 57.09 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- कुल 6 विधानसभा सीटें- कटरा, जलालाबाद, तिलहर, पुवायां, शाहजहांपुर और ददरौल शामिलहैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां सिर्फ जलालाबाद में समाजवादी पार्टी जीत पाई थी, बाकी 5 विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने अपना परचम लहराया था।

उम्मीदवार

  • अरुण सागर (बीजेपी)- अरुण सागर चार बार बसपा जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। जोकि बाद में भाजपा में शामिल हो गए। 2012 में बसपा के टिकट पर पुवायां से विधानसभा चुनाव लड़े। हालांकि 50 हजार से अधिक मत पाकर भी हार का सामना करनापड़ा। 15 जून 2015 को बसपा से उन्हें संगठन विरोधी गतिविधियों में फिर से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली।
  • ब्रह्मस्वरूप सागर (कांग्रेस)- शाहजहांपुर में कांग्रेस के प्रत्याशी ब्रह्मस्वरूप सागर का यह पहला चुनाव होगा। ब्रह्मस्वरूप सागर बसपा के जोन कोआर्डिनेटर रह चुके हैं। बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए और अब प्रत्याशी हैं।
  • अमर चंद्र जौहर (बसपा)- सपा-बसपा गठबंधन से प्रत्याशी अमर चंद्र जौहर भी पहली बार किसी आम चुनाव में उतरेंगे। बसपा प्रत्याशी अमर चंद्र जौहर संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं।

Unnao29 unno.jpg

उन्नाव लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और औद्योगिक नगरी कानपुर से सटी हुई है. लखनऊ और कानपुर के बीच में स्थित है, उन्नाव ज़िला मुख्यालय लखनऊ से लगभग 60 किलोमीटर और कानपुर से 18 किलोमीटर दूर है। यह शहर अपने चमड़े, मच्छरदानी, जरदोजी और रासायनिक उद्योगों के लिए प्रसिद्ध है। उन्नाव अपने समोसे (कचौड़ी गली) चाट (छोटा चौराहा में मुन्ना की चाट) पाव भाजी और काला जामुन के लिए जाना जाता है।

लोकसभा सीट- सियासी तौर पर यह इलाका किसी दौर में कांग्रेस का मजबूत दुर्ग हुआ करता था, लेकिन वक्त के साथ बीजेपी अपनी जगह बनाती चली गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी के साक्षी महाराज को उतारकर यहां से कमल खिलाने में कामयाब रही थी. आजादी के बाद से 2014 तक उन्नाव संसदीय सीट पर 16 बार आम चुनाव और 1 बार उपचुनाव हुए हैं. इनमें से कांग्रेस 9 बार जीतने में सफल रही जबकि 4 बार बीजेपी जीत चुकी है और सपा, बसपा और जनता पार्टी और जनता दल एक-एक बार जीतने में सफल रही हैं।

समीकरण उन्नाव में 10 लाख लोधी, निषाद और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के वोटर्स हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के साढ़े छ: लाख लोग हैं, क्षत्रिय और ब्राहमण के कुल मिलाकर महज तीन लाख वोट हैं। वहीं 1 लाख 20 हजार मुस्लिम वोट है।

वोटर – उन्नाव में कुल 21,77,079 वोटर हैं, जिसमें पुरुष मतदाता- 11,93,514 और महिलाएं -9,83,468 हैं। 2014 में इस सीट पर 55.53 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीट- उन्नाव लोकसभा सीट में 6 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें मोहान, उन्नाव, बांगरमऊ, सफीपुर, भगवंतनगर और पुरवा विधानसभा सीटें आती हैं, पुरवा पर बसपा बाकि 5 पर बीजेपी का कब्जा है।

स्थानीय मुद्दे- यह जिला विकास की दृष्टि से पिछड़ा है। तमाम गांव सड़कों से नहीं जुट पाये हैं। 55 गांव अभी भी विद्युतीकरण से अछूते हैं। यहां के मुद्दों में साफ पानी, और बेहतर स्वास्थ्य सेवा है। पानी में फ्लोराइड की समस्या दूर करने की मांग 20 सालों से हो रही है। हाईवे होने के बाद भी मुख्यालय के ट्रामा सेंटर की सौगात अभी भी अधूरी पड़ी है। शुक्लागंज अभी  भी बिना सीवर लाइन के है।

उम्मीदवार

  • साक्षी महाराज- साक्षी महाराज अपने विवादित बयानों से सुर्खियों में रहते हैं, मार्च में साक्षी महाराज ने कहा था कि अगर उन्नाव सीट से उन्हें दोबारा टिकट नहीं दिया गया तो बीजेपी हार जाएगी, साक्षी महाराज के उत्तर प्रदेश और यहां से बाहर उनके बहुत से आश्रम और स्कूल चल रहे हैं. साक्षी महाराज ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत 1990 में बीजेपी के साथ की थी। इससे पहले वह मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से जुड़े। वही उन्होंने कल्याण सिंह की पार्टी राष्ट्रीय क्रांति दल भी ज्वाइन की थी। साल 1991 में वह मथुरा लोकसभा क्षेत्र से पहली बार सांसद चुने गए। इसके बाद वह 1996 से 1998 से फर्रुखाबाद से सांसद चुने गए। ये क्षेत्र लोध समुदाय का गढ़ माना जाता है। साक्षी महाराज रामजन्मभूमि आंदोलन में प्रमुख रूप से शामिल थे और उन्हें बाबरी मस्जिद केस में आरोपी भी बनाया गया था। वर्ष 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में साक्षी महाराज ने बीजेपी का दामन छोड़ते हुए समाजवादी पार्टी के टिकट पर फर्रुखाबाद से चुनाव में खड़े हुए थे। इसी सीट से बीजेपी की ओर से टिकट न दिए जाने पर साक्षी महाराज बीजेपी से नाराज हो गए थे। वर्ष 2000 में समाजवादी पार्टी की ओर से उन्हें राज्यसभा के लिए भेजा गया। साल 2012 में साक्षी महाराज फिर से बीजेपी में शामिल हो गए
  • अन्नू टंडन- कांग्रेस से 2009 में सांसद रही अन्नू टंडन इस बार भी पंजे के सहारे मैदान में हैं। अन्नू पेशे से बिजनेसमैन और समाजसेवी हैं। साल 2009 में बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को अपने उन्नाव जिले में बुलाकर चुनाव प्रचार कराने की वजह से भी अन्नू टंडन चर्चा में आई थीं। लोगों से बातचीत करते हुए सलमान ने कहा था कि ‘मैं अन्नू टंडन को काफी अर्से से जानता हूं।’ सलमान ने अन्नू के लिए लोगों से अपील की थी कि जाति-धर्म के भेदभाव को छोड़कर टंडन को वोट करें। 2014 में साक्षी महाराज से हार कर अन्नू को चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा था।
  • अरुण शंकर शुक्ल- उन्नाव से पूर्व घोषित प्रत्याशी पूजा पाल का टिकट काटकर अरुण शंकर शुक्ल उर्फ अन्ना को दिया गया है। अन्ना, जिले के मतदाताओं में उनकी अच्छी पैठ है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में अलग-अलग दलों से किस्मत आजमा चुके अन्ना ने 2009 का चुनाव बसपा से लड़ा था। दोनों ही बार वह दूसरे नंबर पर रहे थे।

 

Posted in Election, News, Personality, Uncategorized

LOK SABHA ELECTIONs 2019- Uttar Pradesh Phase 3- April 23, 2019

उत्तर प्रदेश- तृतीय चरण  80 में से 10 सीटों पर होगा मतदान 

 2019 में किसकी किससे जंग

3RD PHASE.jpg

Aonla23-ANO.jpgउत्तर प्रदेश का आंवला शहर एक समय रोहिलखंड की राजधानी हुआ करता था। रोहिला सरदार अली मुहम्मद खान ने 1730 में आंवला को अपनी राजधानी बनाया था लेकिन 1749 में अली मुहम्मद खान की मौत के बाद आंवला से राजधानी शिफ्ट कर दी गई। रामपुर से करीब 72 किलोमीटर दूर बरेली जिले में स्थित आवंला रोहिलखंड की राजधानी हुआ करती थी। इस स्थान का नाम अधिक संख्या में पाए जाने वाले आवंले के पेड़ों के कारण ही आवंला पड़ा। रोहिलखंड के निर्माण के पहले भी यहाँ का एक ऐतिहासिक महत्व था। यह अहिक्षेत्र जो कि पंचाल की राजधानी थी के अत्यंत समीप बसा हुआ है जिससे यहाँ का ऐतिहासिक महत्त्व और भी प्राचीन हो जाता है। इतिहासकारों के अनुसार सन् 1200 के आसपास आँवला में दिल्ली के सुल्तानों का टकसाल था जहाँ सिक्के ढला करते थे। 500 वर्षो तक रुहेलों के आने से पूर्व आँवला कठेरिया राजपूतों का गढ़ हुआ करता था। रुहेलों के शासन काल (1730-1774) में यहाँ 1700 मस्जिदें व 1700 कुएँ हुआ करते थे। उस समय दुनिया के सबसे खूबसूरत शहर बुखारा में इसकी तुलना की जाती थी। सन् 1774 में अंग्रेजों व अवध (लखनऊ) के नवाब ने मिलकर आँवला को खूब लूटा और पूरी तरह से नष्ट कर दिया। सन् 1801 के बाद नेस्तनाबूद खण्डहरों पर यह शहर फिर से बसाया गया। सन् 1730 से 1774 तक आँवला रुहेलखण्ड रियासत की राजधानी रहा। अंग्रेजो ने जब स स्थाव पर कब्जा कर लिया और आँवला के स्थान पर बरेली को रुहेलखण्ड का मुख्यालय बनाया। आँवला को केवल तहसील रहने दिया। सन् 1857 में आँवला 11 महीने अंग्रेजों से आज़ाद रहा। उस समय कल्लनखाँ यहाँ के नाजिम बने। सन् 1920 के बाद सभी स्वतन्त्रता आन्दोलनों में यहाँ की जनता ने हिस्सा लिया, यातनाएँ झेलीं और जेल भी गये।

उत्तर प्रदेश की आंवला लोकसभा सीट पर फिलहाल पिछले दो चुनावों से तो BJP का कब्जा है। लेकिन, लोकसभा चुनाव 2019 की राह में कांटे ही कांटे हैं और इन कांटों की वजह है SP-BSP महागठबंधन। महागठबंधन ने BJP के कब्जे वाली इस लोकसभा सीट का पूरा समीकरण ही बदल दिया है। 2014 लोकसभा चुनावों के आंकड़े कहते हैं आंवला लोकसभा सीट पर जो पहले कभी नहीं हुआ वो हो सकता है। यहां से BSP को लोकसभा चुनाव में अभी तक जीत नहीं मिली है…

लोकसभा सीट बरेली लोकसभा का गठन तो देश की आजादी के समय ही हो गया था, लेकिन आंवला लोकसभा सीट देश की आजादी से 20 साल बाद बनी थी। 1967 के चौथे आम चुनाव में होने वाले परिसीमन में आंवला लोकसभा का गठन किया गया था। उससे पहले यह सीट बरेली लोकसभा का हिस्सा था। 1967, 1971 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी बड़े अंतर के साथ यहां से विजयी रही। 1977 के चुनाव में चली सत्ता विरोधी लहर का असर यहां भी दिखा और भारतीय लोकदल ने जीत दर्ज की, 1980 में भी कांग्रेस को यहां से जीत नहीं मिल सकी और जनता पार्टी यहां से विजयी हुई। 1984 में कांग्रेस जीती लेकिन उसके बाद से ही यहां वापसी को तरसती रही। 1989, 1991 BJP, 1996 में सपा, 1998 में BJP , 1999 का सपा, 2004 में JDU। पिछले दो चुनाव में बीजेपी का इस सीट पर कब्जा है, 2009 का चुनाव मेनका गांधी ने यहां से बड़े अंतर से जीता. और 2014 में इस सीट पर बीजेपी को मोदी लहर का फायदा मिला और धर्मेंद्र कुमार कश्यप एकतरफा लड़ाई में जीते।

समीकरण बरेली जिले में आने वाला आंवला लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों का खासा प्रभाव है. जिले में करीब 35 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि 65 फीसदी संख्या हिंदुओं की है। मुस्लिम: 2.83 से 3 लाख, दलित: 2.65 लाख, ठाकुर: 2 से 2.25 लाख, यादव: 1.05 लाख से अधिक, कश्यप: 80 से 90 हजार, वैश्य: 65 से 70 हजार, मौर्य : 65 हजार से अधिक हैं। बीते काफी समय से यहां मुस्लिम-दलित वोटरों का समीकरण नतीजे तय करता आया है, इनके अलावा क्षत्रीय-कश्यप वोटरों का भी यहां खासा प्रभाव है. ऐसे में इस बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन होने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है।

वोटर- आंवला लोकसभा क्षेत्र 17,70,446 वोटर हैं. इनमें 9,68,996 पुरुष व 8,01,342 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 60.22 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें कुल 5 विधानसभा सीटें- शेखपुर, दातागंज, फरीदपुर, बिथरीचैनपुर और आंवला विधानसभा सीटें आती हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें से यहां सभी सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी।

स्थानीय मुद्दे

  • रेलवे स्टेशन का उच्चीकरण नहीं हो सका है।
  • एक फुटओवर ब्रिज तक का कार्य कोई सांसद नहीं करा सका है।
  • क्षेत्र के आंवला, बिथरी चैनपुर व दातागंज ऐसे क्षेत्र है जहां पर प्रत्येक सांसद ने चीनी मिल लगाने का वायदा किया लेकिन आज तक यह सपना पूरा नहीं हो सका है।
  • क्षेत्र में कृषि अनुसंधान केन्द्र व राजकीय कृषि विश्वविधालय की स्थापना का वायदा भी अधूरा है।
  • विकास के नाम पर बिथरी चैनपुर, शेखूपुर व दातागंज व फरीदपुर काफी पिछड़ा हुआ है।
  • केवल आंवला में पूर्व सांसद स्व. जयपाल सिंह कश्यप के प्रयासों से इफको की स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी। शिक्षा के क्षेत्र में केवल आंवला व फरीदपुर में राजकीय डिग्री कॉलेज स्थापित है, अन्य स्थानों पर अभी तक यह व्यवस्था नहीं हो सकी है।
  • आंवला में लम्बे समय से बीकॉम, बीएड, व एलएलबी की कक्षाओं की मांग की जा रही है, लेकिन अभी तक इसे पूरा नहीं किया जा सका है।

उम्मीदवार

  • धर्मेंद्र कुमार कश्यप (BJP) स्थानीय सांसद धर्मेंद्र कुमार कश्यप काफी लंबे समय से राजनीति में एक्टिव हैं। धर्मेंद्र कश्यप पहली बार बसपा की टिकट 2002 में विधायक चुने गए थे। बाद में राजनीतिक उठापटक के बीच वह सपा में चले गए और उन्हें दर्जा राज्यमंत्री भी मिल गया। 2007 में सपा के ही टिकट पर विधायक बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने आंवला सीट से किस्मत अजमाई, मगर कड़े मुकाबले में मेनका गांधी से पराजित हो गए। 2012 बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से लड़े लेकिन हारे। बादे में सपा से नाराजगी के चलते मई 2013 में बीजेपी में शामिल हो गए।
  • कुंवर सर्वराज सिंह (Cong)- 1993 में सपा से विधायक रहे। 1996 एवं 1999 में सपा से आंवला संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे तथा 2004 में जेडीयू से सांसद रहे। बीते लोकसभा चुनाव 2014 में सपा से प्रत्याशी रहे एवं दूसरे स्थान पर रहे। पिछले महीने ही कांग्रेस में शामिल हुए। कुंवर सर्वराज सिंह के बागी होने से सपा संगठन को तगड़ा झटका लगा है। वह प्रोफेसर रामगोपाल यादव के करीबी माने जाते थे। सपा-बसपा के गठबंधन से उन्हें उम्मीद जगी थी कि एक बार फिर सांसद बन सकते हैं।
  • रुचि वीरा (BSP) बिजनौर के राजघराने की रुचि वीरा आंवला लोकसभा क्षेत्र से गठबंधन की प्रत्याशी बनीं है वह 2012 में सदर बिजनौर सीट से सपा की विधायक रह चुकी हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष भी रहीं। सपा से निष्कासित रुचि वीरा ने 22 दिसंबर 2018 को बसपा का दामन थामा । रुचि वीरा बिजनौर लोकसभा से बसपा का टिकट मांग रही थीं। रुचि वीरा को बिजनौर लोकसभा का प्रभारी भी बनाया गया था। कुछ लोगों के विरोध करने पर उन्हें बिजनौर लोकसभा से हटा दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक बसपा हाईकमान ने रुचि वीरा को बिजनौर लोकसभा सीट से टिकट देने के लिए मना कर दिया। उन्हें आंवला लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए कहा। रुचि वीरा ने आंवला सीट से चुनाव लड़ने के लिए हामी भर दी है। खुद रुचि वीरा ने आंवला सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने की बात कही है।

Badaun23- BADA.jpgबदायूं उत्तर प्रदेश के बरेली मंडल में आता है। रूहेलखण्ड का यह महत्वपूर्ण जिला भगवान महात्मा बुद्घ और सम्राट अशोक की भूमि रहा है। प्राचीन काल से उत्तर पांचाल की राजधानी था। इतिहासकार पहले से ही मानते हैं कि बदायूं का इतिहास करीब 2500 साल पुराना है। कहा यह भी जाता है कि भगवान बुध्द यहां आ चुके हैं। बाद में बदायूं सम्राट अशोक के राजवंश का हिस्सा भी रहा। बदायूं का सूर्य कुंड करीब 1500 वर्ष पुराना है, कहा जाता है कि यहां महिलायें पति की मृत्यु के बाद सती होती थीं। 13 वीं शताब्दी में यह दिल्ली के मुस्लिम राज्य की एक महत्त्वपूर्ण सीमावर्ती चौकी था और 1657 में बरेली द्वारा इसका स्थान लिए जाने तक प्रांतीय सूबेदार यहीं रहता था। 1838 में यह ज़िला मुख्यालय बना। कुछ लोगों का यह मत है कि बदायूँ की नींव अजयपाल ने 1175 ई. में डाली थी। राजा लखनपाल को भी नगर के बसाने का श्रेय दिया जाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बदायूं लोकसभा क्षेत्र समाजवादी पार्टी का गढ़ है। पिछले 6 लोकसभा चुनाव से समाजवादी पार्टी इस सीट पर अजेय है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव अभी यहां से सांसद हैं। वह लगातार दो बार यहां से चुनाव जीत चुके हैं। बीते चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद समाजवादी पार्टी यहां से बड़े अंतर से जीती, ऐसे में अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद भी BJP की जीत इतनी आसान नहीं दिख रही है।

लोकसभा सीट बीते करीब दो दशक में समाजवादी पार्टी का गढ़ बन चुकी बदायूं लोकसभा सीट पर शुरुआती दौर में कांग्रेस का मिला जुला असर था. शुरुआती दो चुनाव में यहां कांग्रेस के उम्मीदवार जीते, लेकिन 1962 और 1967 में यहां भारतीय जनसंघ ने चुनाव बड़े अंतर से जीता. अगर 1977 चुनाव को छोड़ दें तो कांग्रेस ने 1971, 1980 और 1984 का चुनाव इस सीट से जीता. लेकिन इसके बाद कांग्रेस इस सीट पर कभी कांग्रेस वापसी नहीं कर पाई. 1989 का चुनाव जनता दल के खाते में गया और 1991 में BJP ने इस सीट पर कब्जा जमाया. 1996 में समाजवादी पार्टी के सलीम इकबाल ने यहां पर चुनाव जीता, जिसके बाद यहां सपा का एक छत्र राज शुरू हुआ. सलीम इकबाल ने लगातार चार बार यहां से चुनावी परचम लहराया. 2009 में इस सीट पर यादव परिवार की एंट्री हुई और मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेंद्र यादव ने जीत दर्ज की. पिछले चुनाव में भी उन्होंने आसानी से बीजेपी के प्रत्याशी को मात दी।

समीकरण बदायूं लोकसभा सीट में यादव और मुस्लिम मतदाताओं का वर्चस्व है. यहां दोनों ही मतदाता करीब 15-15 फीसदी हैं।

वोटर- यहां करीब 18,81,754 मतदाता हैं, इसमें 10,22,099 पुरुष और 8,59,552 महिला मतदाता हैं। 2014 के चुनाव में इस सीट पर कुल 58 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें कुल 5 विधानसभा सीटें- गुन्नौर, बिसौली, सहसवान, बिल्सी और बदायूं शामिल हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इसमें से सिर्फ सहसवान सीट पर ही समाजवादी पार्टी जीत पाई थी, जबकि बाकी सभी सीटों पर BJP ने बाजी मारी थी।

स्थानीय मुद्दे

  • गन्ना किसानों का अब भी पिछले साल का करोड़ों रुपये चीनी मिलों पर बकाया है।
  • किसान संगठन इस मुद्दे को लेकर लगातार आंदोलन करते रहे हैं।
  • बड़ी रेलवे लाइन से जुड़ने के बाद भी यहां से बड़े शहरों के लिए ट्रेनों की कमी।
  • सिंचाई,बाढ़ की दोहरी समस्या से निदान के लिए शुरू हुई बदायूं सिंचाई परियोजना अभी अधूरी पड़ी है।
  • राजकीय मेडिकल कॉलेज में ओपीडी तो शुरू हो गई, लेकिन एमबीबीएस की पढ़ाई और इमरजेंसी अभी तक शुरू न हो पाने से जनता में आक्रोश है।

उम्मीदवार

  • संघमित्रा मौर्य(BJP) यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी हैं। संघमित्रा इससे पहले 2014 के लोकसभा में बसपा के टिकट पर यूपी की मैनपुरी सीट से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ भी चुनाव लड़ चुकी हैं। उस समय उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा में थे। 2016 में बीजेपी में शामिल हो गए थे। इसके अलावा 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी वो एटा जिले की अलीगंज विधानसभा सीट से सपा के खिलाफ बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं थी। हालांकि इन दोनों ही चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। भाजपा ने अब उन्हें सपा के मजबूत गढ़ बदायूं से टिकट दिया है। बदायूं सीट पर पिछले लंबे समय से समाजवादी पार्टी का कब्जा है।
  • सलीम इकबाल शेरवानी(Cong) कांग्रेस ने बदायूं लोकसभा सीट से पांच बार सांसद रह चुके सलीम इकबाल शेरवानी को उम्मीदवार बनाया है. शेरवानी भी गांधी परिवार के बेहद खास और पुराने साथी माने जाते हैं.सलीम शेरवानी मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले हैं और राजीव गांधी के दोस्त रहे हैं. 1985 में पहली बार वे बदायूं से चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे थे. लेकिन 1989 में जनता दल के शरद यादव को बदायूं से जीत हासिल हुई और 1991 में भाजपा के स्वामी चिन्म्यानंद बदायूं से सांसद बने.साल 1996 में शेरवानी सपा के खेमे में शामिल हो गए और बदायूं से संसद पहुंचे. 1998, 1999 और 2004 में भी सलीम शेरवानी बदायूं से सांसद रहे. केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं शेरवानी।
  • धर्मेंद्र यादव(SP)- उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार से आने वाले धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे हैं। धर्मेंद्र सिंह यादव मुलायम सिंह के बड़े भाई अभय राम यादव के बेटे हैं। वह इस सीट से लगातार दो बार चुनाव जीत चुके हैं. अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने बतौर ब्लॉक प्रमुख के तौर पर की थी। 2004 में वह मैनपुरी से उपचुनाव जीते थे, लेकिन 2009 और 2014 में उन्होंने यहां से जीत दर्ज की। पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने यहां एक तरफा जीत हासिल की, उन्हें करीब 48 फीसदी वोट मिले थे. 2014 में मोदी लहर के भरोसे चुनाव में उतरी बीजेपी का जादू यहां नहीं चला।

Bareilly23- BARE.jpgबरेली उत्तर प्रदेश का आठवां और भारत का 50वां सबसे बड़ा शहर है. बरेली को बांस बरेली भी कहते हैं, बरेली का कोई शाब्दिक अर्थ नहीं है। यहां के राजा बरेल देव के नाम पर बरेली पड़ा। झुमकों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की बरेली लोकसभा सीट राजनीतिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि बरेली जिले को झुमका सिटी बनाने में बॉलीवुड का पूरा योगदान है। बरेली में झुमके का कारोबार कोई प्राचीनतम कारोबार का हिस्सा नहीं है। सर्राफे का कारोबार बरेली में बहुत समय से चलता चला आ रहा है। लेकिन उस समय इस गाने के बाद से झुमके की मांग ज्यादा बढ़ गई थी। बरेली रामगंगा नदी के तट पर बसा यह शहर रोहिलखंड के ऐतिहासिक क्षेत्र की राजधानी था। इतिहास में यहीं पांचाल क्षेत्र था। द्रौपदी ‘पांचाली’ यहीं से थीं। यह 1857 में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ हुए भारतीय विद्रोह का एक केंद्र भी था। बरेली को नाथ नगरी (शहर के चार ओर प्राचीन शिव मंदिर – धोपेश्वर नाथ, मढ़ी नाथ, अलख नाथ तथा त्रिवटी नाथ), बरेली शरीफ (आला हजरत की दरगाह, शाह शराफत मियां की मज़ार, खानकाह ए नियाजिया आदि मुस्लिम धार्मिक स्थान), ज़री नगर भी कहलाता है | यह कृषि उत्पादों का व्यापारिक केंद्र है और यहाँ कई उद्योग, चीनी प्रसंस्करण, कपास ओटने और गांठ बनाने आदि भी हैं। लकड़ी का फ़र्नीचर बनाने के लिए यह नगर काफ़ी प्रसिद्ध है। इसके निकट दियासलाई, लकड़ी से तारपीन का तेल निकालने के कारख़ाने हैं। यहाँ पर सूती कपड़े की मिलें तथा गन्धा बिरोजा तैयार करने के कारख़ाने भी है।

पिछले करीब तीन दशक से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का एक छत्र राज रहा है. यहां से सांसद संतोष गंगवार कई बार इस सीट पर चुनाव जीत चुके हैं और इस समय केंद्र सरकार में मंत्री है. बरेली क्षेत्र में संतोष गंगवार का राजनीतिक दबदबा है. 2019 में एक बार फिर बीजेपी को उम्मीद रहेगी कि संतोष गंगवार पार्टी के लिए यहां से कमल खिलाएं.

लोकसभा सीट- बरेली लोकसभा सीट पर अभी तक 16 बार बार चुनाव हुए हैं, इनमें से 7 बार भारतीय जनता पार्टी ने बाजी मारी है. जिसमें से 6 बार तो लगातार जीत दर्ज की गई थी. 1952, 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की. लेकिन 1962 और 1967 के चुनाव में यहां कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और भारतीय जनसंघ ने यहां जीत दर्ज की. हालांकि, उसके बाद हुए तीन चुनाव में से दो बार कांग्रेस चुनाव जीती. 1989 के चुनाव में यहां बीजेपी की ओर से संतोष गंगवार जीते, जिसके बाद तो उन्होंने इस क्षेत्र को अपना गढ़ बना लिया. 1989 से लेकर 2004 तक लगातार 6 बार संतोष गंगवार यहां से चुनाव जीते. हालांकि, 2009 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन 2014 में एक बार फिर वह बड़े अंतर से जीत कर लौटे।

समीकरण बरेली लोकसभा सीट कुर्मी बहुल मानी जाती है। बरेली में कुर्मी मतदाता लगभग साढ़े तीन लाख हैं, समाजवादी पार्टी के भगवतशरण गंगवार और बीजेपी के संतोष गंगवार दोनों ही कुर्मी समुदाय से आते हैं, क्षत्रीय — 70 हजार , ब्राह्मण – एक लाख , मौर्य – 1.50 लाख , दलित – 1. 75 लाख,  वैश्य – 1.25 लाख.  मुस्लिम – 4.50 लाख, कश्यप – एक लाख, कुर्मी– 3.50 लाख ,लोध – एक लाख, कायस्थ – एक लाख, यादव – 70 हजार

वोटर- यहां करीब 1796930 मतदाता हैं, इसमें 995263 पुरुष और 801563 महिला मतदाता हैं। 2014 के चुनाव में इस सीट पर कुल 611 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें- 5 विधानसभा सीटें- मीरगंज, भोजीपुरा, नवाबगंज, बरेली और बरेली छावनी आती हैं. 2017 में सभी 5 सीटों पर बीजेपी का कब्जा रहा था।

स्थानीय मुद्दे

बरेली में छोटे व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग भी मौजूदा सरकार की नीतियों से नाराज है, जिसे जीएसटी लागू होने के बाद काफी नुकसानझेलना पड़ा। दरअसल बरेली में दरी और जरदोजी के कारोबारी ज्यादा हैं लेकिन इन्हें जीएसटी में लग्जरी टैक्स स्लैब के दायरे में लाने के बादव्यापारियों के साथ बुनकरों पर भी इसकी मार देखने को मिली और धंधे बंद होने के कगार पर आ गए।

उम्मीदवार

  • संतोष कुमार गंगवार(BJP)- संतोष कुमार गंगवार कई बार इस सीट पर चुनाव जीत चुके हैं और नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री भी रहे, संतोष गंगवारपहले भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पेट्रोलियम राज्यमंत्री रह चुके हैं। पढ़ाई के दौरान वह छात्र राजनीति से जुड़े रहे , लगातार 6 बारलोकसभा चुनाव जीतने वाले संतोष गंगवार देश में आपातकाल के दौरान सरकार विरोधी आंदोलन को लेकर जेल भी जा चुके हैं। वह 1996 मेंउत्तर प्रदेश भाजपा इकाई के महासचिव बनाए गए थे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में पार्टी इकाई के कार्य समिति के सदस्य भी रह चुके हैं।बरेली से 1989 से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। हालांकि 15वीं (2009-2014) लोकसभा में उन्हें कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन के हाथों हारझेलनी पड़ी थी। संतोष गंगवार बरेली में विकास पुरुष के नाम से प्रसिद्ध हैं
  • प्रवीण सिंह ऐरन (Cong)- प्रवीण सिंह ऐरन पर एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने विश्वास जताते हुए बरेली लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रवीण सिंह ऐरन ने संतोष गंगवार को तकरीबन 50000 वोट से हराया।
  • भगवत शरण गंगवार (SP)- राममंदिर लहर के दौरान हुए 1991 और 1993 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा था और उन्होंनेदोनों ही चुनाव में जीत हासिल की थी।1996 में समाजवादी पार्टी के छोटेलाल गंगवार ने भगवत शरण को हराकर सीट पर कब्जा जमाया। जिसकेबाद 2002 के चुनाव में भगवतशरण गंगवार कमल का साथ छोड़ कर साइकिल पर सवार हुए और 2002,2007 और 2012 में लगातार तीन बारजीत दर्ज की। 2012 में चुनाव जीतेने के बाद भगवत शरण प्रदेश सरकार में स्वतन्त्र प्रभार के मंत्री भी बनाए गए जिन्हें बाद में मंत्री पद से हटादिया गया। भगवत शरण गंगवार इसके पहले 2009 का भी लोकसभा चुनाव लड़े थे और वो 73 हजार वोट हासिल कर चौथे स्थान पर आए थे।

Firozabad23- FIZO.jpgफिरोजाबाद उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं जिला मुख्यालय है। चूड़ियों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध इस शहर का प्राचीन नाम चन्द्वार था। जो मुगलों के शासन काल में बदला गया था। राजा चन्द्रसेन और मुहम्मद ग़ोरी के बीच 1194 में युद्ध लड़ा गया जिसमें राजा चन्द्रसेन की हार हुई थी। फ़िरोज़ाबाद का नाम अकबर के शासन में फिरोज शाह मनसब दार द्वारा 1566 में दिया गया था। कहते हैं कि राजा टोडरमल गया से तीर्थ यात्रा कर के इस शहर के माध्यम से लौट रहे थे, तब उन्हें लुटेरो ने लूट लिया था। उनके अनुरोध पर अकबर महान ने मनसबदार फिरोज शाह को यहां भेजा था। ब्रिटिश शासन की शुरुआत में फिरोजाबाद इटावा जिले में था। लेकिन कुछ समय बाद यह अलीगढ़ जिले से जुड़ा था।

उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेता अक्षय यादव सांसद हैं. 2014 के चुनाव में उन्होंने यहां पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की और पहली बार लोकसभा में पहुंचे. जाट और मुस्लिम वोटरों के वर्चस्व वाली इस सीट पर इस बार भी निगाहें टिकी हैं. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन और शिवपाल यादव के सपा से अलग होने से 2019 का लोकसभा चुनाव यहां दिलचस्प हो गया है।

लोकसभा सीट शुरुआती चुनावों में ये सीट कभी किसी एक पार्टी के हक में नहीं रही और लगातार जनता ने अपना मिजाज यहां पर बदला। इस सीट पर 1957 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। 1967 में सोशलिस्ट पार्टी ने यहां से चुनाव जीता, 1971 में कांग्रेस ने यहां पर जीती। 1977 से लेकर 1989 तक हुए कुल चार चुनाव में भी कांग्रेस सिर्फ एक बार ही जीत पाई। 1991 के बाद लगातार तीन बार यहां भारतीय जनता पार्टी जीती, BJP के प्रभु दयाल कठेरिया ने यहां जीत की हैट्रिक लगाई। उसके बाद 1999 और 2004 में समाजवादी पार्टी के रामजी लाल सुमन ने बड़ी जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी 2009 से इस सीट पर चुनाव लड़ा और जीते हालांकि चुनाव के बाद उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया था। 2009 में कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने चुनाव जीता और 2014 में समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव ने यहां से बड़ी जीत हासिल की।

समीकरण इस सीट पर  यादव वोटर की संख्या 4.31 लाख के करीब है, इसके अलावा 2.10 लाख जाटव, 1.65 लाख ठाकुर, 1.47 लाख ब्राह्मण, 1.56 लाख मुस्लिम और 1.21 लाख लोधी मतदाता हैं।

वोटर- यहां करीब 1740562 मतदाता हैं, इसमें 950486 पुरुष और 789989 महिला मतदाता हैं। 2014 के चुनाव में इस सीट पर कुल 67.49 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें कुल 5 विधानसभा सीटें- टुंडला, जसराना, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद और सिरसागंज सीटें शामिल हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में सिर्फ सिरसागंज पर सपा ने बाजी मारी थी और चारों सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं।

उम्मीदवार

  • अक्षय यादव- समाजवादी पार्टी के उमेमीदवार अक्षय यादव उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार से आते हैं. वह पूर्व मुख्यमंत्रीमुलायम सिंह यादव के भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव के बेटे हैं. अक्षय यादव ने 2014 के लोकसभा चुनाव से ही राजनीति में एंट्री ली और मोदीलहर के बावजूद जीत दर्ज करने में कामयाब हुए. अक्षय यादव मौजूदा समय में संसद की कई कमेटियों के सदस्य हैं.
  • शिवपाल यादव- उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘चाचा’ के नाम से मशहूर शिवपाल सिंह यादव की सियासी पहचान बहुत बड़ी है. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई, अखिलेश यादव के चाचा और अब प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. शिवपाल की इन दिनों एक और पहचान बन गई है, वो है बागी शिवपाल. भतीजे अखिलेश और चचेरे भाई राम गोपाल यादव से बागी होकर शिवपाल उसी समाजवादी पार्टी को शिकस्त देने के लिए फिरोजाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। समाजवादी पार्टी में शिवपाल सिंह यादव की हैसियत नंबर दो की थी। 90 के दशक में शिवपाल इटावा जिला पंचायत के अध्यक्ष बने। अहम बात है कि शिवपाल ने अपनी राजनीति को-ऑपरेटिव से शुरू की. को-ऑपरेटिव के जरिये हर जिले में समाजवादी पार्टी की पकड़ बनाई. उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के अध्यक्ष बने। मैनपुरी की जसवंतनगर विधानसभा सीट जब मुलायम सिंह ने छोड़ी तो शिवपाल उस सीट से लड़े और 1996 से लेकर अबतक इस सीट से वह जीतते आ रहे हैं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले चाचा का भतीजे अखिलेश यादव के साथ तकरार बढ़ती गई। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी को अलविदा कहकर अपनी नई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया है।
  • चंद्रसेन जादौन- जनसंघ के जमाने से जुड़े डॉ. चंद्रसेन जादौन ने 1996 में घिरोर विस से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ा था, मगरतीसरे नंबर पर रहे थे। 2002 में डॉ. चंद्रसेन जादौन भाजपा के जिला महामंत्री रहे। वर्तमान में सिरसागंज विस के संयोजक थे। सिरसागंज मेंहैवतपुर रोड पर हेल्थ केयर के नाम से अपनी क्लीनिक चलाते हैं। वह बीएएमएस हैं।

 Mainpuri23- MAIN.jpgउत्तर प्रदेश के मैनपुरी सीट बेहद खास है। यह वह सीट है जो यादव परिवार का गढ़ मानी जाती है। इस सीट पर आज तक बीजेपी अपनी जीत दर्ज नहीं कर पाई है। 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर थी तब भी इस सीट पर उनका जादू नहीं चला। मैनपुरी से चुनाव लड़े समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव को ही जीत हासिल हुई। मुलायम दो संसदीय सीटों आजमगढ़ और मैनपुरी से चुनाव लड़े थे और उन्हें दोनों ही सीटों पर जीत हासिल हुई थी इसलिए मैनपुरी सीट उन्होंने छोड़ दी थी और फिर इस सीट पर तेज प्रताप यादव उपचुनाव जीते थे।

लोकसभा सीट देश में हुए पहले चुनाव के समय से ही चर्चा में रही है. 1952 से लेकर 1971 तक हुए देश में कुल 5 चुनाव में यहां से कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. हालांकि, 1977 की सत्ता विरोधी लहर में जनता पार्टी ने कांग्रेस को मात दी थी, पर अगले ही साल 1978 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने सीट वापस ले ली. उसके बाद 1980 में कांग्रेस से सीट छिनी पर 1984 की लहर में फिर वापस आई. 1984 में यहां कांग्रेस को आखिरी बार जीत नसीब हुई थी, जिसके बाद से ही ये सीट क्षेत्रीय दलों के कब्जे में रही है. 1989 और 1991 में यहां लगातार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की. लेकिन 1992 में पार्टी गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव ने यहां से 1996 का चुनाव यहां से लड़ा और बड़े अंतर से जीता भी. उसके बाद 1998, 1999 में भी ये सीट समाजवादी पार्टी के पास ही रही.

मुलायम ने जीत के बाद दो बार सीट छोड़ी- 2004 में मुलायम ने एक बार फिर इस सीट पर वापसी की, लेकिन बाद में सीट को छोड़ दिया. 2004 में धर्मेंद्र यादव यहां से उपचुनाव में जीते. हालांकि, 2009 के चुनाव में मुलायम यहां दोबारा लौटे और सीट को अपने पास ही रखा. 2014 के चुनाव में भी मुलायम ने यहां से जीत दर्ज कर अपने पोते तेजप्रताप सिंह यादव को ये सीट दे दी.

शिवपाल यादव का प्रभाव क्षेत्र- गौरतलब है कि मैनपुरी क्षेत्र में ही जसवंतनगर आता है, जो कि शिवपाल यादव का विधानसभा क्षेत्र है. शिवपाल यादव इस बार समाजवादी पार्टी से अलग होकर अपनी नई पार्टी बना चुनाव लड़ रहे हैं, ऐसे में उनका भी इस सीट पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी में रहते हुए भी शिवपाल यादव की संगठन पर मजबूत पकड़ थी.

समीकरण जातीय समीकरण को देखें तो इस सीट पर यादव वोटरों का वर्चस्व है, यहां करीब 35 फीसदी मतदाता यादव समुदाय से हैं. जबकि करीब 2.5 लाख वोटर शाक्य हैं. यही कारण रहा है कि यहां समाजवादी पार्टी का एक छत्र राज चलता है.

वोटर- मैनपुरी लोकसभा में 17,02,320 वोटर हैं. इनमें 9,20,070 पुरुष व 7,82,192 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 60.46 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभाएं आती हैं. इनमें मैनपुरी, भोगांव, किषनी, करहल और जसवंतनगर है. बता दें कि जसवंतनगर शिवपाल यादव का विधानसभा क्षेत्र है. 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ भोगांव ही BJP के खाते में गई थी, जबकि बाकी सभी 4 सीटें सपा के खाते में गई थी.

उम्मीदवार

मुलायम सिंह यादव- समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव मैनपुरी सीट से चार बार सांसद रह चुके हैं. साल 2014 में उन्होंने मैनपुरी के साथ ही आजमगढ़ सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था. मुलायम ने दोनों ही सीटों से जीत हासिल कर ली थी, बाद में उन्होंने मैनपुरी सीट छोड़ दी. इसके बाद इस सीट पर उपचुनाव हुए, जिसमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार तेज प्रताप यादव जीतने में कामयाब रहे. मैनपुरी सीट से मुलायम 1996, 2004 और 2009 से चुनाव जीत चुके हैं…

  • विधान सभा 1967, 1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 आठ बार विधायक निर्वाचित हुए
  • आपातकाल का दौर मुलायम सिंह के लिए अहम मोड़ साबित हुआ
  • 1977 में पहली बार यूपी सरकार में मंत्री बने
  • 1982-85 तक यूपी विधान परिषद् के सदस्य रहे
  • 1985-87 तक यूपी विधानसभा में नेता विपक्ष रहे
  • 1989 में पहली बार बने मुख्यमंत्री
  • 1992 में बनाई समाजवादी पार्टी
  • 1993 में बसपा से गठजोड़ कर सीएम बने, लेकिन 1995 गेस्ट हाउस प्रकरण के बाद बसपा का साथ छूटा
  • केंद्रीय कैबिनेट मंत्री- रक्षा मंत्री 1996-1998
  • 2003 में मुलायम सिंह की फिर यूपी में वापसी हुई और वो 2007 तक मुख्यमंत्री रहे
  • दूसरी तरफ उन्होंने 2004 व 2009 में मैनपुरी सीट से लोकसभा चुनाव जीता
  • 2014 में भी वह मैनपुरी,आजमगढ़ से सांसद निर्वाचित हुए, लेकिन मैनपुरी सीट उन्होंने खाली कर दी

प्रेम सिंह शाक्य- मैनपुरी लोकसभा सीट से प्रेम सिंह शाक्य को प्रत्याशी बनाया गया है। इससे पहले कई दिनों तक प्रत्याशी को नाम को लेकर जबर्दस्त सस्पेंस बना हुआ था, कई दिग्गजों के नाम भी जोरों से उछले थे। शाक्य वर्तमान में मैनपुरी शहर में रह रहे हैं। करीब 16 साल से भाजपा से जुड़े प्रेम सिंह शाक्य संगठन में विधानसभा प्रभारी, क्षेत्रीय मंत्री के पद पर रह चुके हैं। प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य के तौर पर भी उन्होंने काम किया है। प्रेम सिंह शाक्य को वर्ष 2014 के लोकसभा उप चुनाव में भाजपा ने प्रेम सिंह शाक्य को प्रत्याशी बनाया था। तब प्रेम सिंह शाक्य 3.32 लाख वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रहे थे। उस चुनाव में बसपा और कांग्रेस मैदान में नहीं थी। हालांकि तब उनकी हार का अंतर 3.21 लाख वोटों का रहा था। अब इस चुनाव में जीत की दहलीज पहुंचना उनके लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि भाजपा जातीय समीकरणों के सहारे मैदान फतह करने की रणनीति बना रही है।

Etah

23- ETAH.jpg

उत्तर प्रदेश की एटा लोकसभा सीट 2019 के चुनाव से काफी वीआईपी सीट मानी जा रही है. 2014 में हुए चुनाव में यहां से प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह BJP के टिकट पर चुनाव जीते थे. एटा के पटियाली में ही मशहूर सूफी संत अमीर खुसरो का जन्म हुआ था. ऐसे में ना सिर्फ राजनीतिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका महत्व बढ़ जाता है.2009 से पहले यह सीट सपा का गढ़ हुआ करती थी। लेकिन परिसीमन के बाद स्थित बदल चुकी है।

लोकसभा सीट कानपुर और फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट से सटे एटा में पहला चुनाव कांग्रेस ने जीता था. लेकिन उसके बाद यहां से हिंदू महासभा ने भी 1957 और 1962 में जीत दर्ज की थी. हालांकि, उसके बाद 1967 और 1971 का चुनाव जीत कांग्रेस ने यहां से वापसी की. लेकिन 1977 में चली कांग्रेस विरोधी लहर में चौधरी चरण सिंह की भारतीय लोकदल ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. 1980 के हुए चुनाव में यहां से आखिरी बार कांग्रेस जीत पाई थी.

उसके बाद 1984 में लोक दल के जीत दर्ज करने के बाद ये सीट भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई. 1989, 1991, 1996 और 1998 में यहां भारतीय जनता पार्टी के महकदीप सिंह शाक्य ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. 1999 और 2004 एटा से लगातार दो बार समाजवादी पार्टी का परचम लहराया. 2009 के लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भारतीय जनता पार्टी से अलग हो अपनी पार्टी बना यहां से चुनाव लड़ा और जीता. पिछले चुनाव में कल्याण सिंह माने और उनके बेटे राजवीर सिंह को टिकट मिला. राजवीर सिंह ने दोगुने अंतर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को मात दी.

समीकरण जातीय समीकरण के अनुसार एटा का क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है. एटा क्षेत्र में लोध, यादव और शाक्य जातीय बहुल है. यादव यहां अच्छी संख्या में मतदाता हैं, लेकिन एटा लोकसभा क्षेत्र में अब एल-आर यानि लोधी और राजपूत मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. 2 लाख 30 हजार यादव मतदाताओं के विपरीत 2 लाख 60 हजार के आस-पास लोधी-राजपूत मतदाता हैं. साथ ही लोधी-राजपूत का सहयोगी शाक्य समुदाय भी 2 लाख के आस-पास है. ऐसे में ये मानसिकता गलत है कि एटा लोकसभा सीट यादव बाहुल्य है. इसके अलावा इस सीट पर डेढ़ लाख मुस्लिम मतदाता, 2 लाख 30 हजार यादव, 1 लाख 80 हजार जाटव मतदाता भी है।

कांटे की टक्कर- जानकारों का मानना है कि यदि सपा यहां अकेले लड़ती तो निश्चित रूप से उसे पराजित होना था क्योंकि जातीय समीकरण संतुलन के आंकड़े उनके पक्ष में नहीं थे. हां, बसपा से गठबंधन के बाद सपा-बसपा संघर्ष की स्थित में है और बीजेपी को अच्छी टक्कर देगी.

वोटर- एटा लोकसभा में 16,07,290 वोटर हैं. इनमें 8,70,601 पुरुष व 7,36,641 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 58.72 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें एटा लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं, इनमें कासगंज, अमॉपुर, पटियाली, एटा और मारहरा विधानसभा सीटें शामिल हैं. 2017 विधानसभा चुनावों में पांचों पर बीजेपी ने कब्जा किया था।

उम्मीदवार

  • राजवीर सिंह(राजू भैया) बीजेपी- स्थानीय सांसद राजवीर सिंह अपने क्षेत्र में राजू भैया के नाम से मशहूर हैं. कल्याण सिंह जैसे बड़े राजनेता का बेटा होने के कारण उन्हें राजनीति विरासत में मिली. हालांकि, सांसद चुने जाने से पहले उन्होंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा. 2002 में वह विधायक चुने गए और 2003 से 2007 तक की यूपी सरकार में मंत्री भी रहे. 2014 में वह राष्ट्रीय राजनीति में आए और एटा से उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता. इस सीट पर राजवीर से पहले 2009 में इनके पिता कल्याण सिंह का कब्जा था लेकिन वह अपनी बनाई पार्टी जन क्रातिं पार्टी से उम्मीदवार थे.
  • सूरज सिंह शाक्य (कांग्रेस समर्थित जन अधिकारी पार्टी)- कांग्रेस ने जन अधिकार पार्टी से गठबंधन कर सूरज सिंह शाक्य को एटा के चुनावी मैदान में उतारा है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के करीबी रहे हैं सूरज सिंह शाक्य। सूरज सिंह शाक्य के पिता प्यारे लाल शाक्य 1974 में सकीट विधानसभा से जनसंघ से चुनाव जीते। अपने पिता की विरासत को पूर्व मंत्री सूरज सिंह ने इसी विधान सभा को आगे बढ़ाया। 1991 विधानसभा, 1993 मध्यावधि चुनाव जीते। इसके बाद उनका पार्टी से मोहभंग हो गया तो वे सपा में चले गए। 2002 में सपा की टिकट पर जीते और सरकार में राज्यमंत्री बने। 2007 में वे फिर विधानसभा पहुंचे। सपा से मोहभंग होने पर वे बसपा में चले गए। बसपा ने उनको पटियाली विधानसभा से चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन वे हार गए। 2014 में कल्याण सिंह के कहने पर भाजपा में वापस आए। 2017 में विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने बेटे किशन कुमार शाक्य के लिए पटियाली से टिकट मांगी, लेकिन पार्टी नहीं दी, जिसके बाद बीजेपी से नाराज चल रहे थे।
  • देवेंद्र सिंह (सपा)- सैफई परिवार के करीबी देवेंद्र सिंह एक बार फिर टिकट पाने में कामयाब रहे। कांग्रेस से कैरियर शुरू करने वाले देवेंद्र सिंह 1989 में पटियाली विधानसभा से विधायक चुने गए। 1991 व 1993 में भाजपा के रज्जन पाल सिंह चौहान से हारने के बाद 1996 में सपा से विधायक चुने गए। इसी दौरान 1999 में हुए लोकसभा चुनावों में सपा ने इन पर दांव लगाकर पहली बार एटा सीट पर कब्जा किया। 2004 लोकसभा चुनाव में फिर सपा का परचम लहराने वाले देवेंद्र 2009 में टिकट न मिलने पर बसपाई हो गए। और सपा समर्थन से चुनाव लड़े कल्याण को चुनौती दी। लेकिन हार गए। 2014 में भाजपा प्रत्याशी कल्याण पुत्र राजवीर सिंह से सपा प्रत्याशी के रूप में हारे देवेंद्र इस बार भी राजवीर सिंह के सामने होंगे।

Moradabad23- mor.jpgपीतल नगरी नाम से भी मशहूर मुरादाबाद उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में से एक है। मुरादाबाद सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान चौपाला परगना के लिए एक कार्यालय के रूप में स्थापित किया गया था। 1624 ईस्वी में संधाल के तत्कालीन गवर्नर रुस्तम खान ने इसे कब्जा कर लिया था, जिसने इसे रुस्तम नगर का नाम दिया था। बाद में, 1625 ईस्वी में मुगल शासक शाहजहां के पुत्र राजकुमार मुराद बख्श के नाम के बाद इसका नाम बदलकर मुरादाबाद कर दिया गया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में से एक मुरादाबाद लोकसभा सीट राजनीतिक मायनों से काफी अहम है। कभी कांग्रेस का गढ़ रही ये सीट कई बार समाजवादी पार्टी के कब्जे में भी आई, लेकिन 2014 में पहली बार यहां भारतीय जनता पार्टी का परचम लहराया और कुंवर सर्वेश कुमार यहां से सांसद चुने गए। इस सीट से भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन भी सांसद रह चुके हैं। मुरादाबाद पश्चिम की पीतल नगरी के नाम से भी मशहूर है।

लोकसभा सीट- मुरादाबाद सीट पर 1952 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए। लगातार दो बार यहां से कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 1967 और 1971 में ये सीट जनसंघ के खाते में गई। इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में यहां से चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोकदल ने जीत दर्ज की थी। 1980 में एक बार फिर जनता दल यहां से जीता लेकिन 1984 में देश में चली कांग्रेस की लहर में सीट फिर कांग्रेस के खाते में गई। जिसके बाद 1989, 1991 में ये सीट जनता दल ने जीती। 1996, 1998 में सपा के खाते में गई। कांग्रेस से टूटकर बनी जगदंबिका पाल की अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस ने 1999 चुनाव में इस सीट से जीत दर्ज की थी। 2004 में इस सीट पर सपा का कब्जा हुआ तो वहीं 2009 में पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन यहां से सांसद चुने गए. 2014 में भारतीय जनता पार्टी पहली बार यहां से जीती थी।

समीकरण मुरादाबाद लोकसभा सीट पर सत्ता की चाबी मुस्लिम वोटरों के हाथ में मानी जाती है. यहां पर कुल 52.14% हिन्दू और 47.12% मुस्लिम जनसंख्या है।

वोटर- मुरादाबाद लोकसभा में 1941267 वोटर हैं। इनमें 1039035 पुरुष व 902114 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 58.72 फीसदी वोट डाले गए थे। पिछले लोकसभा चुनाव में इस सीट पर कुल 63.7 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें कुल पांच विधानसभा सीटें- बढ़ापुर, कांठ, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद ग्रामीण और मुरादाबाद नगर शामिल हैं। इन पांच में मुरादाबाद ग्रामीण और ठाकुरद्वारा 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के खाते में गई थीं जबकि बाकी तीन सीटों पर बीजेपी ने कब्जा किया था।

पहली बार लहराया भाजपा का परचम 2014 में पहली बार मुरादाबाद लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई. उत्तर प्रदेश में बीजेपी 71 सीटें जीत कर आई थी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसने क्लीन स्वीप किया था. कुंवर सर्वेश कुमार ने अपने प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के डॉ. एसटी हसन को मात दी थी. सर्वेश कुमार ने करीब 87 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस इस सीट पर पांचवें नंबर पर रही थे।

उम्मीदवार

  • कुंवर सर्वेश कुमार- पेशे से बिजनेसमैन कुंवर सर्वेश कुमार को उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेताओं में से एक माना जाता है. सर्वेशकुमार ठाकुर जाति से आते हैं. सांसद बनने से पहले वह ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट से पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं. सर्वेश कुमार केबेटे कुंवर सुशांत सिंह मुरादाबाद लोकसभा में ही आने वाली बढ़ापुर विधानसभा सीट से विधायक हैं. 2014 में कांठ विधानसभा क्षेत्र में हुएलाउडस्पीकर विवाद के दौरान भी सर्वेश कुमार काफी चर्चा में रहे थे.
  • इमरान प्रतापगढ़ी- राजनीतिक गलियारों में शायर इमरान प्रतापगढ़ी बेहद नए हैं। इमरान प्रतापगढ़ी सोशल मीडिया पर काफीसक्रिय रहते हैं। प्रतापगढ़ में जन्म की वजह से इमरान ने अपने नाम के आगे ‘प्रतापगढ़ी’ जोड़ लिया। इमरान प्रतापगढ़ी अपने खास उर्दू-हिंदीशायरी के लिए युवाओं के बीच में काफी फेमस हैं। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई की है। साल 2016 में पूर्व अखिलेश कीसरकार में इन्हें यश भारती पुरस्कार से नवाजे जा चुके। युवाओं के बीच लोकप्रियता और मुस्लिम समाज से आने के कारण मुरादाबाद सीट परइमरान प्रतापगढ़ी एक मजबूत प्रत्याशी के रूप में देखे जा रहे हैं। टिकट पाने के बाद इमरान प्रतापगढ़ी ने एक शायरी ट्वीट किया , इसमें उन्होंने लिखा कि बुज़ुर्गों की विरासत पर अभी तक नाज़ करता हूँ, ज़मीं का साथ देने के लिये परवाज़ करता हूँ !, सियासत जंग है इस दौर में जम्हूरियत वालों, मुरादाबाद से इस जंग का आग़ाज़ करता हूँ !
  • डॉ. एसटी हसन- डॉ.एसटी हसन आजम खान के नजदीकी माने जाते है, डा. हसन पूर्व मेयर एवं पिछला चुनाव लड़ चुके हैं।एसटीहसन ने ‘वंदे मातरम’ को धर्म से जोड़ते हुए कहा कि वह इस बारे में धार्मिक गुरु से विचार करेंगे, अगर उनका धर्म उन्हें इजाजत नहीं देता तोवो भी ‘वंदे मातरम’ के विरोध में खड़े हैं।

Pilibhit23- pili.jpgपीलीभीत उत्तर प्रदेश के 85 जिलों में से एक है, पीलीभीत जिला बरेली मण्डल में आता है। पीलीभीत जिले का उत्तर-पूर्वी खंड सबसे ज़्यादा रोहिलखंड में आता है जो नेपाल की सीमा पर हिमालय के उप बेल्ट में स्थित है। 1801 में जब रोहिलखंड को अंग्रेजों को सौंप दिया गया था, तो पीलीभीत जिला बरेली का परगना था, जिसे 1833 में हटा दिया था यह व्यवस्था अस्थायी थी और 1841 में बरेली के साथ एक बार फिर से एकजुट हुआ। 1871 में परगना जहानाबाद, पीलीभीत और पुरनपुर के इलाके को संयुक्त कर पीलीभीत तहसील का निर्माण हुआ।  यहां पर सिखों की आबादी ज्यादा होने के कारन इसको मिनी पंजाब भी कहा जाता है, 1947 के विभाजन के बाद यहां पर पंजाबी और बंगाली लोग आकर बस गए थे।

उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली के अलावा एक और लोकसभा सीट है जिसे गांधी परिवार का गढ़ माना जाता है. पीलीभीत लोकसभा सीट पर पिछले करीब तीन दशक से संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी और बेटे वरुण गांधी का ही राज रहा है. मेनका गांधी मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं और पीलीभीत से 6 बार सांसद चुनी जा चुकी हैं।

लोकसभा सीट- पीलीभीत लोकसभा सीट पर कभी कांग्रेस पार्टी का दबदबा नहीं रहा. 1951 में हुए लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस ने यहां से जीत हासिल की हो लेकिन उसके बाद 1957, 1962, 1967 के चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की थी. हालांकि, 1971 में फिर कांग्रेस ने यह वापसी की. लेकिन 1977 में चली सरकार विरोधी लहर में कांग्रेस की करारी हार हुई. 1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से बड़ी जीत हासिल की, लेकिन उसके बाद कांग्रेस यहां कभी वापसी नहीं कर पाई. संजय गांधी की मौत के बाद गांधी परिवार से अलग हुई मेनका ने 1989 में जनता दल के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा और जीता. लेकिन दो साल बाद हुए चुनाव में ही बीजेपी ने यहां से जीत हासिल की.  उसके बाद 1996 से 2004 तक मेनका गांधी ने लगातार चार बार यहां से चुनाव जीता, इनमें दो बार निर्दलीय और 2004 में बीजेपी के टिकट से चुनाव में जीत हासिल की थी. 2009 में मेनका गांधी ने अपने बेटे वरुण गांधी के लिए ये सीट छोड़ी और वरुण यहां से सांसद चुने गए. लेकिन 2014 में एक बार फिर वह यहां वापस आईं और छठीं बार यहां से सांसद चुनी गईं।

समीकरण- पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में हिंदू वोटरों के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों का भी खास प्रभाव है. पीलीभीत जिले में करीब 30 फीसदी मुस्लिम नागरिक हैं, ऐसे में मुस्लिम वोटों को अनदेखा ठीक नहीं होगा। ब्राम्हण लगभग 50-60 हजार, ठाकुर 1 लाख,  यादव 50 हजार,  दलित 2.5-3 लाख,  मुसलमान 5 लाख,  वैश्य 1 लाख, कुर्मी 2.5लाख, कायस्थ 20 हजार, लोध किसान 3.5 लाख,  सिख 70-75 हजार, बंगाली 60 हजार और लगभग अन्य 1 लाख की जनसंख्या है।

वोटर- पीलीभीत सीट पर 17,47,654 मतदाता है। 9,41,480 पुरुष और 8,06,096 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 62.86 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें- इस क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें बहेड़ी, पीलीभीत, बड़खेड़ा, पूरनपुर और बिसालपुर शामिल हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इन सभी पांच सीटों पर बीजेपी ने ही बाजी मारी थी।

स्थानीय मुद्देपीलीभीत टाइगर रिजर्व घोषित हो जाने के बाद यहां के जंगल में बाघों की संख्या बढ़ गई है, बाघ हमले में पांच साल के दौरानलगभग दो दर्जन लोग मर चुके हैं। स्थानीय लोगो के लिए मानव-बाघ संघर्ष को रोकना बड़ा स्थानीय मुद्दा है। वर्ष 2001 में शाहजहांपुर के 94 गांव पीलीभीत जिले में शामिल किए गए लेकिन इस गांवों में शिक्षा, चिकित्सा जैसी सुविधाओं का अकाल बना हुआ है।

उम्मीदवार

  • वरुण गांधी- गांधी परिवार से होने के बावजूद कांग्रेस विरोध की राजनीति में वरुण गांधी बड़ा नाम हैं। वह भाजपा के बड़े नेताओं में शुमारहोते हैं। उन्होंने चुनाव मैदान में कभी मात नहीं खाई। हालांकि कांग्रेसी राजनीति से इतर रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मुकाम पाने काइंतजार अब भी वरुण गांधी को है। इस आम चुनाव में भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश की पीलीभीत सीट से उ मां मेनका गांधी की तरह उन्होंने भीकभी नहीं चाहा कि लोग उन्हें विरासत में मिली पारिवारिक राजनीति का नेता मानें। वह 2009 में पीलीभीत से सांसद रह चुके हैं। 2014 मेंसुलतानपुर से सांसद चुन कर आए,  मां मेनका गांधी की तरह उन्होंने भी कभी नहीं चाहा कि लोग उन्हें विरासत में मिली पारिवारिक राजनीतिका नेता मानें। इस जिद के साथ राजनीति में उतरे वरुण भाजपा के अब तक के सबसे कम उम्र के महासचिव बने। 2004 में पार्टी ने उन्हें मुख्यप्रचारकों में शामिल किया था।
  • हेमराज वर्मा- पीलीभीत से सपा-बसपा-रालोद के उम्मीदवार हेमराज वर्मा साल 2007 में बसपा ज्वॉइन कर सदर विधानसभा से चुनाव लड़े, लेकिन हारगए। वर्ष 2012 में सपा से बरखेड़ा विधानसभा से चुनाव लड़कर विधायक बने। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उन्हें खाद्य एवंरसद राज्यमंत्री बनाया।

Rampur23- ram.jpgउत्तर प्रदेश लोक सभा निर्वाचन क्षेत्रों में रामपुर लोकसभा क्षेत्र सातवां है। किसी जमाने में जरायम की दुनिया से लेकर बॉलीवुड की फिल्मों तक रामपुरी चाकुओं की धूम रही है लेकिन रामपुर की असल पहचान इसके उद्योगों और विश्व प्रसिद्ध रजा लाइब्रेरी से है। रजा लाइब्रेरी में 12,000 से ज्यादा दुर्लभ मनुस्मृतियां और मुग़ल लघु चित्रों का संग्रह है। कठेरिया राजपूतों के द्वारा शासन किये जाने के कारण चार गांवों के समूह का नाम कठार था। पहले नवाब ने इसका नाम फैजाबाद रखने का प्रस्ताव रखा था मगर इस नाम से कई और नगर होने के नाते इसका नाम मुस्तफाबाद या रामपुर रखा गया । 1775 में नवाब फैज़ुल्लाह खान ने रामपुर किले की नीवं रखी थी और इस तरह रामपुर नगर का निर्माण हुआ। फैज़ुल्लाह खान ने 1794 तक यहाँ शासन किया। 1857 के समय में रामपुर में नवाब युसुफ अली खान का शासन था, नवाब युसुफ अंग्रेजों के विश्वासपात्र थे। इस कारण रूहेलखंड के स्वतंत्रता संग्राम को गहरी क्षति का सामना करना पड़ा था। कई बार यह कहा जाता है की नवाब के अंग्रेजों के विश्वासपात्र होने के कारण रामपुर रियासत में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष नहीं हुआ था जबकि रामपुर रियासत में स्वतंत्रता संघर्ष के लिए क्रांतिकारियों ने भाग लिया था। परन्तु क्रांतिकारी रामपुर शहर में क्रांति का बिगुल फूक पाने में असफल रहे। संस्कृति और सियासत रामपुर के दो पहलू हैं। एक ओर नवाबी खानदान इस शहर को अब भी रियासती रवायत से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर सपा के कद्दावर नेता आजम खां ने 10 बार रामपुर विधानसभा सीट जीत कर एक ऐसी बड़ी सियासी लकीर खींची है जो किसी भी दूसरे सियासतदां के लिए ख्वाब है। पहली लोकसभा में देश को अबुल कलाम आजाद सरीखा सांसद देने वाले रामपुर ने 1998 में भाजपा के अल्पसंख्यक चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी और 2004 और 2009 में फिल्मों से सियासत के मैदान में उतरीं जया प्रदा को संसद में भेजा।

लोकसभा सीट- उत्तर प्रदेश में कई लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट इन्हीं में से एक है। यहां पर 50 फीसदी से भी अधिक जनसंख्या मुस्लिम आबादी की है, ये क्षेत्र समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान का गढ़ माना जाता है।

1952 में हुए चुनाव में यहां से कांग्रेस की ओर से डॉ. अबुल कलाम आजाद ने जीत दर्ज की थी। 1952 से लेकर 1971 तक इस सीट पर कांग्रेस ने ही जीत दर्ज की, 1977 में एक बार भारतीय लोकदल के प्रत्याशी यहां से जीते। लेकिन दोबारा कांग्रेस का दबदबा इस सीट पर रहा। कांग्रेस के ज़ुल्फिकार अली खान ने लगातार 3 बार यहां से चुनाव जीते। ज़ुल्फिकार कुल 5 बार इस सीट से सांसद रहे। 1991 और 1998 में इस सीट पर बीजेपी ने जीत दर्ज की। 1998 में मुख्तार अब्बास नकवी यहां से जीते थे। उसके बाद 2004 और 2009 में समाजवादी पार्टी की तरफ से बॉलीवुड अभिनेत्री जयाप्रदा यहां से सांसद चुनी गई थीं। यहां हुए कुल 16 चुनाव में से 10 बार कांग्रेस जीती, 3 बार बीजेपी, दो बार सपा और एक बार बीएलडी।

समीकरण– 2011 की जनगणना के अनुसार रामपुर क्षेत्र में कुल 50.57 % मुस्लिम आबादी है, जबकि 45.97 % हिंदू जनसंख्या है।

वोटर- रामपुर लोकसभा क्षेत्र में 16,68,479 मतदाता हैं, इनमें 8,97,237 पुरुष और 7,71,080 महिला वोटर हैं। 2014 में यहां कुल 59.2 फीसदी वोट पड़े थे।

विधानसभा सीटें- कुल 5 विधानसभा सीटें- सुआर, चमरौआ, बिलासपुर, रामपुर और मिलक… इनमें बिलासपुर और मिलाक सीट पर बीजेपी जबकि अन्य तीन सीटों पर सपा का कब्जा है। यहां की रामपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के आजम खान विधायक हैं।

उम्मीदवार

  • जयाप्रदा (बीजेपी)- समाजवादी पार्टी से दो बार रामपुर का सदन में प्रतिनिधित्व कर चुकीं सिने तारिका जयाप्रदा इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं , फिल्मी दुनिया में खास मुकाम रखने वाली जयाप्रदा ने वर्ष 2004 के चुनाव में रामपुर कीसरजमीं पर कदम रखा था। उन्होंने कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले नूरमहल से सांसद की कुर्सी छीन ली थी। इसके बाद वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव जीत कर दोबारा संसद चुनी गई , 2014 के चुनाव में उन्हें रामपुर को अलविदा कहना पड़ा था। सपासे आउट होने के बाद वह बिजनौर चली गईं और रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ा यहां वह हार गई थीं। अब वह फिर रामपुर लौट आयी हैं और इस बार भाजपा के टिकट से चुनाव मैदान में हैं। वैसे तो  ज्याप्रदा 1994 में तेलुगम देशम पार्टी सेराजनीति की शुरुआत हुई , 1996 में आंध्र प्रदेश से ही पहली बार राज्यसभा सदस्य बनीं। 2004 में समाजवादी पार्टी ज्वाइन की, सपा से दो बार सांसद रहीं
  • संजय कपूर (कांग्रेस)- कांग्रेस ने रामपुर लोकसभा सीट से संजय कपूर को उम्मीदवार बनाया है, संजय दो बार बिलासपुर सीट से विधायक रहे हैं संजयकपूर बिलासपुर विधानसभा क्षेत्र से 2007 और 2012 में विधायक रह चुके हैं। इस समय पार्टी के राष्ट्रीयसचिव हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में पीलीभीत से कांग्रेस प्रत्याशी थे, लेकिन हार गए थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में वह बिलासपुर से कांग्रेस और सपा गठबंधन के प्रत्याशी रहे, लेकिन इस चुनाव में भी हार गए।
  • आजम खां (सपा)- रामपुर शहर विधायक मोहम्मद आजम खां पहली बार लोकसभा चुनाव में ताल ठोक रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने उन्हें रामपुर संसदीय सीट से प्रत्याशी घोषित किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यलय से आजम खां छात्र राजनीति से अपनेकॅरियर की शुरूआत की थी लेकिन शहर विस क्षेत्र से वह पहली बार 1977 में चुनाव लड़े थे। हालांकि, तब कांग्रेस के मंजूर अली खां उर्फ शन्नू खां ने उन्हें शिकस्त दी थी , जून 1980 से अक्तूबर 1995 तक लगातार 15 साल। इसके बाद फरवरी 2002 से आज तक वह विधायक हैं। कुल नौ बार विधायक रहे हैं। वर्ष 1992 में अयोध्या कांड के बाद यूपी की सियासत में बड़ा बदलाव आया और आजम खां समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य बने और फिर 1993 के चुनाव में सपा के सिंबल पर शहरविस क्षेत्र से ही ताल ठोंकी, तब से लगातार वह सपा से ही चुनाव लड़ते रहे। सपा की जब-जब सरकार आयी, आजम खां ताकतवर मंत्री रहे। चाहें वह मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की सरकार रही हो या अखिलेश यादव के दौर की। वर्ष1996 में जब वह विस चुनाव हार गए तो सपा ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाकर भेज दिया। आजकल उनकी पत्नी तंजीन फात्मा राज्यसभा सदस्य हैं। अपने बयानों की वजह से सुर्खियों मंल रहते हैं

Sambhal 23-sam.jpgसंभल ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। कहा जाता है चारों युगों में संभल का वजूद रहा और इसे अलग अलग नामों से जाना गया। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कलियुग में भगवान विष्णु संभल में ही कल्कि के रूप में अवतार लेंगे। मुगल शासक अकबर के शासनकाल में संभल क्षेत्र का काफी महत्वपूर्ण रहा लेकिन उसी के बाद के शासन में संभल की हालत काफी बिगड़ गई। यहां लंबे समय तक शासकों और सम्राटों ने शासन किया। लोधियों से लेकर मुगलों तक ने यहां शासन किया। खास यह कि संभल अशोक साम्राज्य का भी अहम हिस्सा रहा।

समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाने वाले संभल पर 2019 लोकसभा चुनाव में सभी की नजर होगी। मुस्लिम बहुल इलाका होने के बावजूद 2014 के चुनाव में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी, जिसे समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना गया। यहां से बीजेपी के सत्यपाल सैनी चुनाव जीतकर आए। इस सीट से समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और दिग्गज नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव भी सांसद चुने जा चुके हैं।

लोकसभा सीट- संभल 1977 में अस्तित्व में आई, इमरजेंसी के बाद देश में पहली बार चुनाव हो रहे थे यहां से चरण सिंह की पार्टी ने जीत दर्ज की। उसके बाद 1980, 1984 में लगातार कांग्रेस फिर 1989, 1991 में जनता दल ने ये सीट जीती। 1996 में बाहुबली डीपी यादव ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर इस सीट पर कब्जा किया। 1998 में ये सीट वीआईपी सीटों की गिनती में आ गई, तत्कालीन समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने 1998, 1999 में यहां से चुनाव जीता. 2004 में उनके भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव यहां से सांसद चुने गए। लेकिन 2009 में ये सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई।

समीकरण- रामपुर, अमरोहा और मुरादाबाद जैसी सीटों से सटी हुई संभल लोकसभा में भी मुस्लिम वोटरों का वर्चस्व है. यही कारण रहा कि बीजेपी के लिए ये सीट मुश्किल मानी जाती थी। लेकिन 2014 में बीजेपी ने यहां फतह हासिल की। 18 लाख मतदाताओं वाली इस लोकसभा क्षेत्र में 8.50 लाख मुस्लिम और 9.50 लाख हिंदुओं में 2.75 लाख अनुसूचित जाति,1.50 लाख यादव तथा 5.25 लाख अन्य पिछड़ा व सामान्य वर्ग के मतदाताओं में यूं तो समीकरण के एतबार से सपा बसपा गठबंधन की एकतरफा जीत के आसार नजर आते हैं परंतु किसी भी चुनाव के समीकरण और संभावनाएं आखिरी वक्त तक बदलने के हालात हर वक्त रहते हैं।

वोटर- यहां पर 18,13,839 मतदाता हैं, इनमें से 9,78,321 पुरुष मतदाता  और 8,35,392 महिला मतदाता हैं। 2014 में यहां 62.4 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें- कुल 5 विधानसभा सीटें- कुन्दरकी, बिलारी, चंदौसी, असमोली और संभल शामिल हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ चंदौसी विधानसभा ही बीजेपी के खाते में गई थी, जबकि अन्य सभी सीटों पर सपा का कब्जा रहा।

उम्मीदवार

  • परमेश्वर लाल सैनीबीजेपी ने मौजूदा सांसद सत्यपाल सैनी का टिकट परमेश्वर लाल सैनी को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। चन्दौसी के रहने वाले भाजपा के परमेश्वर लाल सैनी को राजनीति का अच्छा खासा अनुभव है। और वो विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं सैनी बीजेपी के पिछड़ा वर्ग के प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं, सैनी की संगठन में अच्छी पकड़ बताई जाती है। 2010 से 2016 के बीच स्थानीय निकाय के चुनाव में 19 विधानसभा क्षेत्र तथा 5 लोकसभा क्षेत्र के अंदर अपनी घुसपैठ कर परमेश्वर लाल सैनी विधान परिषद के सदस्य बने थे। यानी की संगठन स्तर पर भी भाजपा में उन्होंने अच्छी खासी पहचान बना ली थी। उनके आने से अब यहां चुनाव रोचक होगा।
  • मेजर जगत पाल सिंह- दो बार विधायक रहे मेजर जे पी सिंह ने बीते दिनों भाजपा छोड़कर कांग्रेस ज्वाइन कर लिया था 28 मार्च को कांग्रेस ने उन्हें सम्भल से अपना लोकसभा का उम्मीदवार घोषित कर दिया। राजनीति के अच्छे खिलाड़ी माने जाने वाले जेपी सिंह संभल में कांग्रेस के जरिए अपने चुनावी पारी का आगाज करेंगे।
  • डॉ. शफीकुर रहमान- सपा प्रत्याषी डॉ.शफीकुर रहमान (बर्क) चार बार सांसद रहे ,यूपी सरकार में मंत्री भी रहे हैं। वह दो बार मुरादाबादऔर दो बार संभल से सांसद चुने गए हैं। 2009 में वह बहुजन समाज पार्टी से संभल लोकसभा सीट से सांसद रहे थे। उस दौरान 2013 मेंउन्होंने कहा था कि मैं वंदेमातरम का बहिष्कार को संसद से अनुपस्थित रहूंगा। इसके साथ ही उन्होंने उस वक्त कहा था कि 1997 में संसद के50 साल पूरे होने पर आयोजित हुए स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी मैंने वंदेमातरम का बहिष्कार किया था। इस पर उन्होंने तर्क दिया था कि वंदेमातरम का मतलब भारत माता की पूजा या वंदना करना होता है और इस्लाम में पूजा करना जायज नहींहै। इस दौरान उनकी खूब आलोचना भी हुई थी। 2016 में शफीकुर्रहमान जब सपा में थे तब उन्होंने संभल में आचार्य प्रमोद कृष्णम केकल्किधाम में मंदिर निर्माण के शिलान्यास का भी विरोध किया था। इस शिलान्यास में सपा सरकार के मंत्री शिवपाल यादव आ रहे थे। जिसेविवाद बढ़ने पर रोक दिया गया था।
Posted in Election, News, Personality, Uncategorized

LOK SABHA ELECTIONs 2019- Uttar Pradesh Phase 2- April 18, 2019

उत्तर प्रदेश- द्वितीय चरण  80 में से 8 सीटों पर होगा मतदान 

 2019 में किसकी किससे जंगf0.jpg

Naginaf1.jpgइतिहास- नगीना का शाब्दिक अर्थ है ‘रत्‍न’ या ‘रत्‍न जड़ित आभूषण’। इसे सैय्यद शासकों ने मुगलों से जागीर के रूप में पाया था। बाद में यह क्षेत्र 1857 के विद्रोह में मशहूर हुआ जब नजीबाबाद के नवाब और ब्रिटिश सेना के बीच बिजनौर में युद्ध हुआ। कहा जाता है कि यहां 1919 के जलियांवाला बाग की तरह ही एक घटना हुई थी। यहां स्थित ‘पाईबाग’ में ब्रिटिश सेना ने निहत्‍थे लोगों पर गोलियां बरसाकर उनकी हत्‍या कर दी थी। अनुमान है कि इसमें करीब 150 लोगों की मौत हुई थी। इसे नगीना का जलियांवाला बाग भी कहा जाता है।

लोकसभा सीट- नगीना लोकसभा सीट का इतिहास इतना पुराना नहीं है, पहले ये हिस्सा बिजनौर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत ही आता था. लेकिन 2008 में हुए परिसीमन के दौरान इसे अलग क्षेत्र बनाने की मांग शुरू हुई और 2009 के लोकसभा चुनाव में इसे अलग कर दिया गया. 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के यशवीर सिंह ने यहां पर जीत दर्ज की. लेकिन अगले ही चुनाव में उन्हें मुंह की खानी पड़ी. 2014 में चली बीजेपी की आंधी में यहां पर भी पार्टी को फायदा मिला। मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भी ये सीट बीजेपी के पास गई, अब इस चुनाव में एक बार फिर बीजेपी की नजर यहां से जीत हासिल करने पर है। यशवंत सिंह ने बड़े अंतर से सीट दर्ज की।

समीकरण नगीना लोकसभा सीट आरक्षित सीट है, यहां करीब 21 फीसदी अनुसूचित जाति के वोटर हैं हालांकि, यहां मुस्लिम वोटर अधिक हैं लगभग 42 फीसदी। नगीना सीट पर जहां अनुसूचित जाति के 3 लाख से ज्यादा, वहीं मुस्लिम 6 लाख से ज्यादा हैं। 1.5 लाख से ज्यादा स्वर्ण जाति के वोटर हैं। यही कारण हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में यहां भाजपा के यशवंत सिंह को 39 पर्सेंट वोट हासिल हुए थे, सपा के कैंडिडेट को 29 प्रतिशत जबकि 26 प्रतिशत वोट के साथ बसपा को मिले थे।

वोटर- राजनीतिक लिहाज से ये सीट काफी अहम है. बिजनौर जिले की नगीना लोकसभा सीट पर न्यूनतम 15,74,994 लाख मतदाता हैं। इनमें 8,38,144 पुरुष व 7,36,788 महिला मतदाता हैं। 2014 में इस सीट पर 63.1 फीसदी वोट डाले गए थे।

विधानसभा सीटें नगीना लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें नजीबाबाद, नगीना, धामपुर, नहटौर और नूरपुर की सीट शामिल है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में तीन सीटें भारतीय जनता पार्टी और दो सीटें समाजवादी पार्टी के पास गई थीं। हालांकि, इनमें से 2018 में नूरपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को हराकर जीत दर्ज की थी। नूरपुर का उपचुनाव कैराना के उपचुनाव के साथ ही हुआ था।

स्थानीय मुद्दे

  • मंजूरी के बाद भी मेडिकल कॉलेज न बनना।
  • गन्ने का मूल्य न बढ़ना।
  • बकाया गन्ना भुगतान।
  • किसान खाद, डीजल, बिजली के दाम बढ़ने से वह नाराज हैं।

उम्मीदवार

  • सांसद यशवंत सिंह- नगीना से दलित सांसद यशवंत सिंह ने हाल ही में सुर्खियां बटोरी थीं जब उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. दरअसल, यशवंत सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिख कहा था कि केंद्र सरकार ने अपने कार्यकाल में दलितों के लिए कुछ भी नहीं किया है और जल्द से जल्द दलितों के लिए आरक्षण बिल पास करने की मांग की थी.
  • गिरीशचंद्र- बसपा ने नगीना सीट से गिरीशचंद्र पर दाव खेला है। गिरीशचंद्र 2014 में भी नगीना सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। तब उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। नगीना सीट पर गिरीशचंद्र को बसपा ने लोकसभा प्रभारी बना रखा था। उनका टिकट शुरू से ही पक्का माना जा रहा था। हालांकि बीच में बसपा सुप्रीमो मायावती के इस सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा शुरू हो गई।
  • ओमवती- नगीना से कांग्रेस प्रत्याशी ओमवती का सियासी सफर कई अलग-अलग दलों से गुजरा । सियासत की शुरूआत कांग्रेस से की थी, 1985 में नगीना सीट से विधायक बनीं। इसके बाद सपा में चली गईं पहले 1996 में विधायक और 1997 में सांसद बनीं। 2002 में फिर विधायक बनीं। 2007 में वे सपा का दामन छोड़कर बसपा का थामा और चुनाव जीतकर विधायक बनीं। मायावती सरकार में राज्यमंत्री बनी। 2012 का विधानसभा चुनाव हारीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी में शामिल हो गईं। लेकिन बीजेपी ने टिकट नहीं दी। बीजेपी ने 2017 विधानसभा चुनाव में उतारा तो हार गईं। 2019 चुनाव से पहले बसपा में जाने की कोशिश की थी। लेकिन आखिर में 9 मार्च 2019 को कांग्रेस में शामिल हो गईं।

Amroha f2.jpgइतिहास- कमाल अमरोही जैसे महान फिल्मकार और जौन एलिया जैसे सरीखे शायरों की नगरी कही जाने वाली उत्तर प्रदेश की अमरोहा पर सभी की नजरें टिकी हैं। 15 अप्रैल 1997 को इसे एक अलग जिला बनाया गया था, पहले यह मुरादाबाद जिले का एक हिस्सा था। अमरोहा का इतिहास बड़ा ही समृद्ध है। 3000 साल पहले हस्तिनापुर के राजा Amarjodh द्वारा बसाया गया था। प्राचीन समय में इसको लेकर पांचाल प्रदेश और हस्तिनापुर के कुरु राजाओं में युद्ध हुआ था। कुषाण एवं नंद साम्राज्य के पतन के बाद इस क्षेत्र पर मौर्य वंश का शासन रहा। कई सदी बाद जब पृथ्वीराज चौहान की शाहबुद्दीन गौरी के हाथों हार हुई उसके बाद मुस्लिम प्रभुत्व बढ़ना प्रारम्भ हुआ। आम और मछली यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसा भी कहा जाता है कि जब जनाब हज़रत शरफुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह इस जगह पर आये थे तब स्थानीय लोगों ने उन्हें आम और मछली पेश की थी। इसके बाद ही से इस जगह को अमरोहा के नाम से जाना जाने लगा।

लोकसभा सीट- 1952 से लेकर 1971 तक इस सीट पर शुरुआती तीन बार कांग्रेस और फिर लगातार दो बार सीपीआई ने जीत दर्ज की थी। 1977, 1980 में जनता पार्टी, 1984 में कांग्रेस और 1989 में एक बार फिर जनता दल ने यहां जीत दर्ज की। 1991, 1998 में इस सीट पर बीजेपी की तरफ से पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान सांसद चुने गए। इस लोकसभा क्षेत्र की विधानसभा सीटों में वर्चस्व रखने वाली समाजवादी पार्टी सिर्फ 1996 में यहां से चुनाव जीत पाई है। 1999 में बसपा के राशिद अल्वी ने चुनाव जीता, 2004 में ये सीट निर्दलीय और 2009 में रालोद के खाते में गई। मुस्लिम बहुल इस सीट पर 2014 में सभी को चौंकाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी। मुस्लिमों के अलावा इस सीट पर जाटों का भी वर्चस्व रहा है।

NIA की छापेमारी के कारण सुर्खियों में मेरठ, मुरादाबाद और संभल से सटा अमरोहा बीते दिनों NIA की छापेमारी के कारण सुर्खियों में भी रहा था. जनवरी 2019 में अमरोहा के सैदपुर इम्मा गांव में NIA ने जांच की थी।

समीकरण- इस सीट पर दलित, सैनी और जाट वोटर अधिक मात्रा में हैं, जबकि मुस्लिम वोटरों की संख्या भी 20 फीसदी से ऊपर है। 5.5 लाख मुस्लिम वोटर, 1.20 लाख जाट, 1 लाख गुर्जर, 2.5 से 3 लाख दलित, 1.5 lakh सैनी और 50,000 ब्राह्मण वोटर हैं।

वोटर- अमरोहा लोकसभा क्षेत्र में 16,33,186 वोटर हैं, इनमें से 8,68,912 वोटर पुरुष और 7,64,166 महिला वोटर हैं। 2014 में यहां करीब 71 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें- अमरोहा लोकसभा क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें धनौरा, नौगावां सादत, अमरोहा, हसनपुर और गढ़मुक्तेश्वर भी शामिल हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ अमरोहा सीट ही समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी, जबकि अन्य सभी सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।

उम्मीदवार

  • कंवर सिंह तंवर(BJP)- देश के सबसे अमीर सांसदों में गिने जाते हैं. उन्हें महंगी गाड़ियां रखने का काफी शौक है. इनके काफिले में लैंड क्रूज,बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ियां शामिल हैं. 2014 में वह पहली बार सांसद चुने गए. 2011 में कंवर सिंह तंवर के बेटे की शादी हुई थी, जिसने काफी सुर्खियां बटोरीं थीं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके बेटे की शादी में करोड़ों का खर्च हुआ था. भाजपा से पहले वह बसपा और कांग्रेस में भी रह चुके हैं।2008 में उन्‍होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ज्‍वाइन की थी। 2008 के विधानसभा चुनाव में वह मैदान में उतरें और उस समय 150 करोड़ की कुल संपत्ति के साथ सबसे अमीर उम्‍मीदवार बने थे। उसमें उन्‍हें जीत हासिल नहीं हुई थी। इसके बाद उन्‍होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। लोकसभा चुनाव से पहले उन्‍होंने भाजपा का कमल थाम लिया था। उनको भाजपा से टिकट मिलने में बाबा रामदेव का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने सपा की हुमेरा अख्‍तर को शिकस्‍त दी थी।
  • सचिन चौधरी(Cong) मूलत: गांव रनिया कल्याणपुर थाना बाबूगढ़ जिला हापुड़ के निवासी हैं। मौजूदा समय में नया मुरादाबाद में रहते हैं। लोकसभा चुनाव से पूर्व सचिन चौधरी ने अमरोहा लोकसभा क्षेत्र में हस्ताक्षर अभियान के जरिये अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। इस दौरान उन्होंने जिले में शौचालय घोटाला होने का आरोप लगाते हुए कलेक्ट्रेट पर कुछ दिन आमरण अनशन भी किया था। शुरुआत में वह सपा से टिकट पर दावेदारी जता रहे थे, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन के बाद जब अमरोहा सीट बसपा के खाते में चली गई तो वह कांग्रेस का टिकट हासिल करने की दौड़ में लग गए।
  • कुंवर दानिश अली(BSP) जनता दल (सेक्युलर) के महासचिव हाल ही में छोड़कर बसपा में शामिल हुए थे।मूल रूप से हापुड़ के रहने वाले कुंवर दानिश अली दक्षिण भारत में कांग्रेस व जेडीएस गठबंधन समन्वय समिति के संचालक रहे। पिछले हफ्ते ही बसपा की सदस्यता ग्रहण की। पांच भाइयों में सबसे छोटे दानिश अली जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र राजनीति से भी जुड़े रहे हैं। उनके दादा दादा कुंवर महमूद अली दूसरे विधानसभा चुनाव (1957) में डासना विधानसभा क्षेत्र से विधायक तथा 1977 में हापुड़ लोकसभा सीट से जनता दल के टिकट पर सांसद चुने गए थे।

Bulandshahrf3.jpgइतिहास- बुलंदशहर का इतिहास 1200 वर्ष पुराना है। महाभारतकाल में हस्तिनापुर के पतन के बाद, अहार जो बुलंदशहर के उत्तर-पूर्व में स्थित है पांडवों के लिए एक महत्वपूर्ण जगह बन गया था। बाद में अहिबरन नाम के एक राजा ने बरन (बुलंदशहर) नामक एक टावर की नींव रखी। अहिबरन सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे। महमूद गजनवी ने जब कन्नौज पर आक्रमण किया था उस समय उसने बुलंदशहर के शासक हरदत्त को पराजित किया था। स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर आजादी मिलने तक बुलंदशहर ने आजादी की लड़ाई में पूरे दम-खम से भाग लिया। 10 मई 1857 को देश की आजादी की प्रथम जंग शुरू हुई। बुलंदशहर जिले में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल वीर गुर्जरों ने फूंका। यहां अंग्रेजों और स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ कई बार युद्ध छिड़ा। बुलंदशहर में काला आम नाम का चौराहा जंग ए आजादी का मुख्य गवाह है जहां 1857 क्रांति के दौरान अंग्रेजों का विरोध करने वालों को पकड़-पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया था।

2018 बुलंदशहर हिंसा- उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में होने वाला लोकसभा चुनाव इस बार अहम होने वाला है। पिछले साल 3 दिसंबर को गोहत्या के शक में हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या की गई जिसके बाद पूरे देश में बुलंदशहर की चर्चा हुई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ये सीट बीते कुछ समय से बीजेपी का गढ़ रही है। अभी भी यहां से बीजेपी के भोला सिंह ही सांसद हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने यहां से प्रचंड जीत हासिल की थी। गोहत्या के शक में हाल ही में हुई हिंसा के बाद इस सीट पर सभी की निगाहें हैं। बुलंदशहर आरक्षित सीट है।

लोकसभा सीट- बुलंदशहर लोकसभा सीट 1952 से ही महत्वपूर्ण रही है। यहां 1952 से लेकर 1971 तक यहां हुए पांच चुनाव में कांग्रेस ने लगातार जीत दर्ज की। लेकिन उसके बाद यहां पर मतदाताओं ने लगातार हुए चुनावों में अलग-अलग पार्टियों को तवज्जो दी। 1977 में भारतीय लोक दल, 1980 में जनता दल ने यहां कांग्रेस को करारी मात दी थी। लेकिन 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने यहां फिर वापसी की। 1989 के बाद से लगातार यहां कांग्रेस वापसी के लिए तरस रही है. 1989 चुनाव में जनता दल के जीत दर्ज करने के बाद 1991 से लेकर 2004 तक लगातार पांच बार बीजेपी ने चुनाव जीता. इस दौरान 1991 से 1999 तक बीजेपी के छतरपाल सिंह ने अपना दबदबा इस सीट पर बनाए रखा. 2009 में यहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार ने बड़ी जीत दर्ज की, लेकिन 2014 में उत्तर प्रदेश में चली मोदी लहर का असर यहां भी दिखा।

समीकरण बुलंदशहर जिले में करीब 77.37 फीसदी हिंदू जनसंख्या और 22.22 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या हैं।

वोटर- लोकसभा चुनाव के अनुसार इस सीट पर कुल 17,76,567 वोटर हैं. इनमें 9,45,340 पुरुष और करीब 8,31,100 महिला वोटर हैं।2014 के चुनाव में यहां सिर्फ 58 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें इनमें अनूपशहर, बुलंदशहर, डिबाई, शिकारपुर और स्याना विधानसभा सीटें हैं. 2017 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में ये सभी पांच सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थीं. बुलंदशहर की ही स्याना विधानसभा सीट वही जगह है जहां पर 2018 के आखिर में गोहत्या के शक में हिंसा हुई थी. इस हिंसा में एक पुलिसकर्मी और एक युवक की मौत हो गई थी. बुलंदशहर हिंसा ने राजनीतिक तौर पर काफी सुर्खियां बटोरी थीं.

उम्मीदवार

  • भोला सिंह- बुलंदशहर लोकसभा सीट से भाजपा के बड़े दलित चेहरे और वर्तमान सांसद भोला सिंह फिर से चुनावी मैदान में उतरें हैं। भाजपा का गढ़ रही बुलंदशहर सीट से साल 2004 में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी जीत हासिल कर चुके हैं। सांसद भोला सिंह कई बार अपने बयानों के कारण चर्चा में रह चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर वह पहली बार सांसद बने थे। उनकी प्रचंड जीत ने हर किसी को चौंका कर रख दिया था। भोला सिंह 4 लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे। 2014 के चुनाव में भोला सिंह को 60 फीसदी वोट मिले थे, कुल पड़े 10 लाख वोटों में से उन्हें करीब 6 लाख वोट मिले थे। भोला सिंह को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है। यह भी कहा जाता है कि इस सीट पर कल्याण सिंह के आशीर्वाद के बिना उम्मीदवार को टिकट मिलना आसान नहीं होता है।
  • बंसी सिंह- बुलंदशहर सुरक्षित लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने पूर्व विधायक बंसी सिंह पहाड़िया को प्रत्याशी घोषित किया है। बुलंदशहर के खुर्जा रहने वाले बंसी लाल पहाड़िया पूर्व विधायक खुर्जा से हैं। जिनका कांग्रेस हाईकमान ने लोकसभा बुलंदशहर सीट से नाम घोषित कर दिया है और उसके बाद कांग्रेस पार्टी कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है। कांग्रेस से बंसी लाल 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को हराकर खुर्जा विधानसभा सीट पर विधायक चुने गए थे।उन्हें 2017 विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था।अब फिर कांग्रेस ने अपने पुराने नेता पर दावा खेला है।कांग्रेस द्वारा सोमवार को घोषित पांचवी लिस्ट में बंसी लाल पहाड़ियां को बुलंदशहर लोकसभा उम्मीदवार बनाया गया है।
  • योगेश वर्मा पहली बार बसपा के टिकट पर 2007 में हस्तिानपुर से चुनाव लड़कर विधायक बने थे। जिसके बाद से वे चर्चा में रहने लगे उसका कारण था जमीनों पर अवैध कब्जा। इन्हीं कारणों से बसपा ने साल 2012 में उनका इनका टिकट काट दिया। जिसके बाद योगेश वर्मा बसपा सुप्रिमो मायावती के खिलाफ हो गए और खुलकर उनके खिलाफ बयानबाजी की, इसके बाद वे पीस पार्टी से चुनाव लड़े लेकिन हार गए। मगर उस सीट से बसपा भी नहीं जीत सकी। 2013 में फिर बसपा में आए और 2014 में दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन मोदी लहर में मात खा गए। 2017 में हस्तिनापुर से विधानसभा चुनाव लड़ा वो भी बीजेपी से हारे। 2019 में एक बार फिर मैदान में हैं। योगेश वर्मा 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद के दौरान मेरठ में हुई हिंसा के मुख्य आरोपी हैं। इस मामले में योगेश वर्मा को जेल भी जाना पड़ा था।

Aligarhf4.jpgइतिहास- 18वीं शताब्दी से पहले अलीगढ़ को कोल नाम से जाना जाता था। कोल नाम की उत्पत्ति अस्पष्ट है। 12वीं शताब्दी से पहले का अलीगढ़ का प्रारंभिक इतिहास अस्पष्ट है। 1875 में एंटोमॉलोजिस्ट एडविन टी. एटकिन्सन ने “किंवदंती” को बताया कि कोल की स्थापना 372 ईस्वी में दोर जनजाति के राजपूतों द्वारा की गयी थी। 1194 ईस्वी में, कुतुब-उद-दीन अयबाक ने हिसम-उद-दीन उलबाक को कोइल के पहले मुस्लिम गवर्नर के रूप में नियुक्त किया। इब्राहिम लोधी के समय इसका नाम मुहम्मदगढ़ रखा गया। 1753 में नाम रामगढ़ हुआ और आखिरकार, जब शिया कमांडर नजाफ खान ने कोल पर कब्जा कर लिया, तो उन्होंने इसे अलीगढ़ का वर्तमान नाम दिया। 1875 में सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की और यह तालीम का शहर बन गया। सन् 1870 ई. में इंग्लैड में एक व्यक्ति ने कम्पनी खोली और वह कम्पनी अलीगढ़ की जॉनसंस कम्पनी से तालों का व्यापार करने लगी, वहीं से ताला उद्योग ने जोर पकड़ा। आज अलीगढ़ में देश के कुल तालों के 75 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन होता है। 10 करोड़ ताले बनाने वाली 5000 इकाइयों हैं, जो एक लाख पुरुषों को रोजगार प्रदान करती हैं। नोटबंदी के बाद इस इंडस्ट्री को जबरदस्त झटका लगा था 80 प्रतिशत उत्पादन प्रभावित हुआ था।

विवादों में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी- पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख सीट होने के अलावा यहां की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी भी काफी सुर्खियां बटोरती है। 2 मई 2018 को अलीगढ़ पाकिस्तान के जनक माने जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर काफी बवाल हुआ था। 12 फरवरी 2019 को एएमयू के एक छात्र गुट व उनके समर्थक भाजयुमो नेताओं और एएमयू छात्रों में हुए झगड़े और हंगामे के बाद एएमयू छात्रसंघ अध्यक्ष सहित 14 लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था।

लोकसभा सीट- शुरुआत से ही काफी चर्चा में रहने वाली सीट रही, 1952 और 1957 के चुनाव में यहां कांग्रेस ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. लेकिन इन चुनाव के बाद लगातार चार चुनाव यहां गैर कांग्रेसी दल ने जीते. इसमें 1967, 1971 भारतीय क्रांति दल और 1977, 1980 में जनता दल ने जीत दर्ज की थी.हालांकि, 1984 में चली कांग्रेस पक्ष की लहर में कांग्रेस ने यहां वापसी की. पर 1989 के चुनाव में जनता दल के सत्यपाल मलिक ने फिर कांग्रेस को पटखनी दी. इसके बाद से ही ये सीट एक तरह से बीजेपी का गढ़ बन गई. 1991, 1996, 1998 और 1999 में यहां बीजेपी की शीला गौतम ने लगातार जीत दर्ज की. लेकिन 2004 के चुनाव में कांग्रेस और 2009 के चुनाव में बसपा ने यहां से बाजी मारी.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मोदी लहर के दम पर सतीश गौतम ने बड़ी जीत दर्ज की थी. 2014 के चुनाव में बीजेपी के सतीश गौतम ने यहां एक तरफा जीत दर्ज की थी. उन्हें कुल 48 फीसदी वोट मिले थे, जबकि बहुजन समाज पार्टी के उनके प्रतिद्वंदी अरविंद कुमार सिंह को 21 फीसदी वोट मिले थे. यहां समाजवादी पार्टी तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर रही थी।.

समीकरण अलीगढ़ जिले में करीब 19.85 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या और करीब 79.05 फीसदी हिंदू मतदाता हैं।

वोटर- लोकसभा चुनाव के अनुसार यहां 1876818 मतदाता हैं, इनमें करीब 1005371 पुरुष और 871294 महिला मतदाता हैं. 2014 में यहां कुल 59 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें अलीगढ़ लोकसभा क्षेत्र के तहत कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें खैर, बरौली, अतरौली, कोल और अलीगढ़ सीटें आती हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में ये सभी पांचों सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थीं. बीते साल मई में यहां की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर पर काफी बवाल हुआ था.

उम्मीदवार

  • सतीश गौतम– अलीगढ़ संसदीय क्षेत्र से भाजपा ने सांसद सतीश कुमार गौतम पर फिर विश्वास जताया है। भाजपा के अलीगढ़ के इतिहास में पूर्व सांसद शीला गौतम के बाद सतीश कुमार गौतम दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्हें पार्टी ने दोबारा मौका दिया है। सांसद सतीश कुमार गौतम नोएडा में राजनीति में सक्रिय रहे। भाजपा में कई पदों पर रहने के बाद वर्ष 2014 में उनका टिकट घोषित हुआ था और उन्हें दो लाख से अधिक मतों से जीत मिली थी। तब माना जा रहा था कि कल्याण सिंह का उनपर आशीर्वाद था। हालांकि, इधर कुछ दूरियां बढ़ीं थीं। 22 मार्च को जब वे राज्यपाल कल्याण सिंह से मिलने उनके आवास राज पैलेस पहुंचे तो सतीश गौतम को चौकीदारों ने अंदर नहीं घुसने दिया। यही नहीं कल्याण सिंह के समर्थकों ने सतीश गौतम के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की। जनवरी 2019 सतीश गौतम ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि,विश्वविद्यालय के नाम से ‘मुस्लिम’ शब्द हटना चाहिए। मुस्लिम शब्द कठोर लगता है।
  • चौधरी बिजेन्द्र सिंहकांग्रेस ने चौथी लिस्ट अलीगढ़ लोकसभा से चौधरी बिजेन्द्र सिंह को टिकट दिया है। चौधरी बिजेन्द्र सिंह ने अलीगढ़ लोकसभा से लगातार तीन बार सांसद रहीं शीला गौतम को लोकसभा चुनाव 2004 में करारी शिकस्त देते हुये ये सीट कांग्रेस के खाते में पहुंचाई। चौधरी बिजेन्द्र सिंह की जाट मतदाताओं में अच्छी पकड़ मानी जाती है। महज 26 वर्ष की उम्र में चौधरी बिजेन्द्र सिंह ने इगलास विधानसभा से चुनाव जीता और विधायक बने। इसके बाद कांग्रेस की टिकट पर इस विधानसभा से लगातार चार बार जीत दर्ज की। 2004 में कांग्रेस ने इन्हें लोकसभा का टिकट दिया।
  • अजीत बालियान मायावती ने अलीगढ़ से अजीत बालियान को प्रभारी बनाया है। सबसे अमीर गठबंधन प्रत्याशी अजीत बालियान पर है 15 करोड़ से अधिक की संपत्ति। अजीत बालियान की हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा, अलीगढ़ के ही सांसद सतीश गौतम के संग ली गईं तस्वीरें वायरल होने से सियासी गरमाहट बढ़ गई। चौ. अजित बालियान ने भाजपा और कांग्र्रेस में साठगांठ का आरोप लगाते हुए तस्वीरों को गलत तरीके से प्रचारित करने का आरोप लगाया।

Hathrasf5.jpgइतिहास- हाथरस ऐतिहासिक शहर है। आप किसी भी दिशा से प्रवेश करें, किला अवश्य नजर आएगा। इनमें ब्रज की देहरी (द्वार) भी कहा जाता है। पुराण कथ्यों के अनुसार हाथरस का इतिहास महाभारतकालीन माना जाता है। देवी पार्वती के रुप की हाथरस में ‘हाथरसी देवी’ के नाम से पूजा की जाती है। संभवत: हाथरस देवी के स्थान के रूप में इस स्थान को हाथरस कहा जाने लगा। इस शहर का निर्माण कब हुआ और किसने इसे बसाया, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन शहर के पुराने किले के अवशेष अपनी कहानी समेटे हुए हैं। जाट, कुशन, गुप्त साम्राज्य और मराठा शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। सन 1716 में  जाट शासक भोज सिंह ने राजपूत शासकों से शासन अपने हाथ लिया था। 1803 में इस क्षेत्र को ब्रिटिश द्वारा कब्जा कर लिया गया था। शहर के पूर्वी छोर पर राजा दयाराम का किला रोचक इतिहास समेटे हुए है तथा इस शहर की पहचान भी है। अंग्रेजी हुकूमत के आगे न झुकने की गवाही किले पर बने दाऊजी मंदिर की प्राचीर आज भी देता है। बताते हैं कि 1857 में क्रांतिवीरों के लिए यही किला उनकी शरणस्थली भी बना था। अंग्रेजों के हमले के बाद 1817 में जब राजा दयाराम ने किला छोड़ा था, तब से दाऊजी मंदिर के पट भी बंद थे। 1912 में मंदिर के पट खोले गए। तबसे पूजा विधिवत चली आ रही है।

लोकसभा सीट- मशहूर हास्य कवि और व्यंग्यकार काका हाथरसी (प्रभुनाथ गर्ग) की नगरी हाथरस पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक महत्वपूर्ण लोकसभा सीट है। पिछले करीब दो दशक से यहां पर बीजेपी का वर्चस्व रहा है। इस सीट पर 1962 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पार्टी ने जीत दर्ज की थी। उसके बाद 1967 और 1971 में भी कांग्रेस सत्ता में आई। 1977 में इंदिरा विरोधी लहर के चलते भारतीय लोक दल ने जीत हासिल की। 1984 में फिर कांग्रेस की वापसी हुई। 1989 में जनता दल और 1991 के बाद से यह सीट बीजेपी का गढ़ बन गई। 1991 के बाद 1996, 1998, 1999 और 2004 में बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की। 2009 में यहां से राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की, हालांकि तब रालोद-बीजेपी का गठबंधन था। वहीं 2014 में मोदी लहर के साथ सीट बीजेपी के हाथ में आई। एक बार फिर 2019 में बीजेपी को यहां कमल खिलाने की उम्मीद है।

समीकरण पश्चिमी यूपी की महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों में से एक हाथरस सीट पर मुस्लिम-जाट वोटरों का प्रभुत्व है। जिले में करीब 13.54 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या और करीब 84.89 फीसदी हिंदू मतदाता हैं। 2014 के अनुमान के आधार पर यहां जाट- 1.80 लाख, मुसलमान- 1.45 लाख, दलित 2.75 लाख, यादव- 1 लाख और ब्राह्मण 1.5 लाख के करीब हैं।

वोटर- यहां पर 18,31,216 मतदाता हैं, इनमें से करीब 9,90,708 पुरुष वोटर और 8,40,439 महिला मतदाता हैं। 2014 में 59.94 फीसद मतदाताओं ने अपने मतदान का प्रयोग किया था।

विधानसभा सीटें बीते कई चुनावों में बसपा को यहां पर लगातार लाखों वोट मिले हैं, इसलिए बसपा को इस सीट पर कमतर नहीं आंका जा सकता है। हाथरस लोकसभा सीट के अंतर्गत 5 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें छर्रा, इगलास, हाथरस, सादाबाद और सिकंदरा राऊ सीटें शामिल हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां सिर्फ सादाबाद में बसपा ने जीत दर्ज की थी, जबकि बाकी अन्य सीटों पर बीजेपी ने झंडा गाढ़ा था।

उम्मीदवार

  • राजवीर सिंह दिलेर- भाजपा सांसद राजेश दिवाकर का टिकट कट गया है। भाजपा ने हाथरस संसदीय क्षेत्र से इगलास के विधायक राजवीर सिंह दिलेर को प्रत्याशी घोषित किया है। राजवीर दिलेर 2017 के विधानसभा के चुनाव में इगलास से विधायक चुने गए थे। उनके पिता किशनलाल दिलेर भी हाथरस से चार बार सांसद रह थे।
  • त्रिलोकीराम- हाथरस संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी हैं त्रिलोकीराम। पूर्व विधायक हैं। राष्ट्रीय लोकदल में थे। हाल ही में कांग्रेस की सदस्यता ली और प्रत्याशी घोषित कर दिया।
  • रामजीलाल सुमन- पूर्व केंद्रीय मंत्री व पार्टी के कद्दावर नेता रामजीलाल सुमन चार बाद सांसद रह चुके हैं , मूल रूप से सादाबाद के गांव बहरदोई निवासी रामजीलाल सुमन की शिक्षा-दीक्षा हाथरस में हुई, विद्यार्थी जीवन से ही सुमन राजनीति में सक्रिय हो गए , सुमन की मानें तो देश में जब इमरजेंसी लगी तो सबसे पहले आगरा में उन्हीं की गिरफ्तारी हुई। वह एक साल से ज्यादा जेल में भी रहे। 1977 में वह मात्र 26 वर्ष की आयु में फिरोजाबाद से जनता पार्टी से सांसद निर्वाचित हुए। उसके बाद वह 1989 में जनता दल से जीतकर संसद में पहुंचे। उसके बाद फिरोजाबाद से ही सपा से1999 और वर्ष 2004 में सांसद चुने गए। वह चंद्रशेखर की सरकार में श्रम और कल्याण मंत्री भी रहे।

Mathura f6.jpgइतिहास- मथुरा का एक प्राचीन, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है मथुरा। पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार मथुरा का उल्लेख सबसे पुराने भारतीय महाकाव्य रामायण में किया गया है। महाकाव्य में, इक्ष्वाकू राजकुमार शत्रुघ्न ने लवणसुरा नामक राक्षस को मार दिया और भूमि का दावा किया था। इसके बाद, यह स्थान मधुवन के रूप में जाना जाने लगा, फिर मधुपुरा और बाद में मथुरा। ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी में मथुरा सुरसेना साम्राज्य की राजधानी बन गई थी। चौथी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व मथुरा पर मौर्य साम्राज्य का शासन था। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी यात्री मेगास्थेनिस ने मथुरा को (मेथोरा) नाम के तहत एक महान शहर के रूप में उल्लेख किया है। कनिष्क के शासनकाल में 130 ईसवीं में मथुरा उसकी राजधानियों में से एक था। 1017-18 ईसवीं में महमूद गजनवी ने जब भारत पर आक्रमण किया तो वो भी मथुरा को देखकर आश्चर्यचकित रह गया था। उसके मीर मुंशी अल उत्बी ने अपनी पुस्तक तारीखे यामिनी में लिखा है कि गनजवी ने मंदिर की भव्यता देखकर कहा था कि इस मंदिर के बारे में शब्दों या चित्रों से बखान करना नामुमकिन है। उसका अनुमान था कि वैसा भव्य मंदिर बनाने में दस करोड़ दीनार खर्च करने होंगे और इसमें दो सौ साल लगेंगे। महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए। मथुरा के मंदिरों के टूटने और बनने का सिलसिला भी कई बार चला। मुगल सम्राट औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान शाही-ईदगाह मस्जिद का निर्माण किया, जो श्रीकृष्ण जन्मभूमि के निकट है। मथुरा को ‘मंदिरों की नगरी’ भी कहा जाता है। मथुरा में लगभग 7 हजार मंदिर हैं। श्रीकृष्ण की नगरी के पेड़े भी दुनियाभर में मशहूर हैं।

लोकसभा सीट भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा राजनीतिक इतिहास से भी एक वीआईपी सीट मानी जाती है। 2014 के चुनाव से यहां पर बीजेपी ने बॉलीवुड अभिनेत्री हेमा मालिनी को मैदान में उतारा था। जिसके बाद ये सीट हाईप्रोफाइल मानी गई थी। इस सीट के इतिहास को देखें तो शुरुआती चुनावों में यहां कांग्रेस का दबदबा रहा था, लेकिन बीते दो दशकों में भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व यहां बढ़ा है।

मथुरा लोकसभा सीट पर पहले चुनाव से ही राजनीतिक रण होता रहा है, पहले और दूसरे लोकसभा चुनाव में यहां से निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में दूसरे आम चुनाव में न केवल मथुरा से चुनाव हार गए थे, बल्कि उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी। लेकिन उसके बाद 1962 से 1977 तक लगातार तीन बार कांग्रेस पार्टी ने यहां जीत दर्ज की। 1977 में चली सत्ता विरोधी लहर में कांग्रेस को यहां से हार का सामना करना पड़ा और भारतीय लोकदल ने जीत हासिल की। 1980 में जनता दल यहां से चुनाव जीता, लेकिन 1984 में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से जोरदार जीत हासिल की। इस जीत के साथ ही कांग्रेस के लिए यहां लंबा वनवास शुरू हुआ और 1989 में जनता दल के प्रत्याशी ने यहां जीत दर्ज की। इसके बाद यहां लगातार 1991, 1996, 1998 और 1999 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। इस दौरान चौधरी तेजवीर सिंह लगातार 3 बार यहां से चुनाव जीते। 2004 में कांग्रेस के मानवेंद्र सिंह ने यहां से वापसी की. 2009 में बीजेपी के साथ लड़ी रालोद के जयंत चौधरी ने यहां से एकतरफा बड़ी जीत दर्ज की। लेकिन 2014 में चली मोदी लहर में अभिनेत्री हेमा मालिनी ने 50 फीसदी से अधिक वोट पाकर जीत दर्ज की।

समीकरण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इस सीट पर जाटों का वर्चस्व रहा है। आबादी का 20 फीसदी जाट हैं। 2014 में भी जाट और मुस्लिम वोटरों के अलग होने का नुकसान ही रालोद को भुगतना पड़ा था। जाटों ने एकमुश्त होकर बीजेपी के हक में वोट किया। इसके अलावा ठाकुर, ब्राह्मण, दलित अहम हैं।

वोटर- मथुरा लोकसभा क्षेत्र में कुल 17,86,187 मतदाता हैं, इनमें 9,70,318 पुरुष और 8,15,660 महिला वोटर हैं। 2014 में इस सीट पर 64 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें मथुरा लोकसभा में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें छाता, मांट, गोवर्धन, मथुरा और बलदेव की विधानसभा सीट शामिल हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां मांट सीट पर बहुजन समाज पार्टी को जीत मिली थी, जबकि बाकी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी।

उम्मीदवार

  • हेमा मालिनी 2014 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीता और धमाकेदार जीत दर्ज की थी। वैसे हेमा मालिनी लंबे समय से वह राजनीति में एक्टिव थीं। हेमा मालिनी ने पहली बार 1999 में बीजेपी से लोकसभा चुनाव लड़े विनोद खन्ना के लिए पंजाब में कैंपेनिंग की थी। फरवरी 2004 में उन्होंने ऑफीशियली बीजेपी ज्वाइन की। 2003 से 2009 के बीच हेमा राज्यसभा की नॉमिनेटेड मेंबर रहीं। मार्च 2010 में उन्हें बीजेपी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया। 2014 के लोकसभा इलेक्शन में हेमा खुद मथुरा से बीजेपी कैंडिडेट बनकर उतरीं। उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी को 3 लाख से ज्यादा वोटों से हराया था।
  • महेश पाठक तीर्थ पुरोहित संघ के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस में कई पदों पर रह चुके हैं। महेश पाठक को वर्ष 1998 में कांग्रेस ने लोकसभा के चुनावी मैदान में उतारा था, लेकिन तब उन्हें हार मिली थी। उस चुनाव में चौथे स्थान पर आए थे।
  • कुँवर नरेंद्र सिंह अवागढ़ राजघराने से ताल्लुक रखते हैं, कुँवर नरेंद्र सिंह 1991 और 2017 में मथुरा और गोवर्धन विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा था। वह 1978 से 1980 तक सहकारी बैंक वृन्दावन के चेयरमेन रहे तो 1982 से दो बार लगातार मथुरा ब्लॉक प्रमुख रहे। कुँवर नरेंद्र सिंह के बड़े भाई मानवेन्द्र सिंह मथुरा से 3 बार सांसद रहे हैं ,यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय लोकदल ने गैर जाट पर दांव खेला है। इस बार ठाकुर कुंवर नरेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया है। यह भी ऐसे वक्त फैसला लिया है, जब पार्टी सपा और बसपा के साथ गठबंधन करते हुए चुनाव मैदान में उतर रही है। जाटों की पार्टी कहे जाने वाली लोकदल ने इस बार ठाकुरों को साधने के लिए यह दांव खेला है।

Agraf7.jpgइतिहास मुगलकालीन राजधानी रहा आगरा ताजमहल के लिए दुनिया में विख्‍यात है। पूर्व में यमुना नदी के तट पर बसा यह शहर ऐतिहासिक नगर भी माना जाता है। मान्यता है कि आगरा महाभारत के समय से एक प्राचीन शहर था। इसकी स्थापना 1504 में दिल्ली सल्तनत के शासक सिकंदर लोदी ने की थी और राजधानी दिल्ली से आगरा स्थानांतरित की। सुल्तान की मृत्यु के बाद शहर पर इब्राहिम लोदी ने शासन किया। 1526 में बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत की पहली जंग हुई, जिसके बाद आगरा समेत उत्तर भारत का पूरा साम्राज्य बाबर के पास चला गया। अकबर, जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की राजधानी बना रहा आगरा। बादशाह अकबर ने यहीं से दीन-ए-इलाही धर्म की शुरुआत की थी। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद 1835 में जब अंग्रेजों द्वारा आगरा की प्रेसीडेंसी की स्थापना हुई।  1857 में मेरठ से शुरू हुई चिंगारी, आगरा में भी फैली। 1857 की क्रांति का गवाह बना था आगरा। जंग-ए-आजादी में अंग्रेज पलटनों को यहां करारी टक्कर मिली थी। सुचेता गांव में हिंदुस्तानी सिपाहियों से हुई जंग में 41 अंग्रेज मारे गए थे।  आगरा को ‘ताज नगरी’ के साथ साथ ‘पेठा नगरी’ के रूप में भी जाना जाता है। यहां 50 तरह के पेठे बनाए जाते हैं। इसके अलावा आगरा में जूते का कारोबार और लैदर का काम बड़े पैमाने पर होता है।

लोकसभा सीट- आजादी से लेकर आपातकाल तक यहां कांग्रेस का एकक्षत्र राज रहा। इमरजेंसी के बाद 1977 में आम चुनाव में भारतीय लोक दल के प्रत्‍याशी शंभूनाथ चतुर्वेदी ने कांग्रेस से 5 बार सांसद रहे सेठ अचल सिंह को हराया। हालांकि, उसके बाद हुए लगातार दो चुनाव 1980, 1984 में फिर यहां पर कांग्रेस ही जीती। लेकिन उसके बाद कांग्रेस दोबारा इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई। 1989, जनता दल ने इस सीट पर कब्जा किया। फिर लगातार तीन लोकसभा चुनाव 1991, 1996 और 1998 में बीजेपी यहां से जीती। 1999 और 2004 में सपा की ओर से बॉलीवुड अभिनेता राज बब्बर ने यहां पर चुनाव जीते। 2009, 2004 में बीजेपी के रामशंकर कठेरिया यहां से बड़े अंतर से जीत दर्ज करते रहे हैं।

समीकरण- आगरा दलित और मुस्लिम वोटरों का गढ़ माना जाता है। यहां करीब 37 फीसदी वोटर दलित और मुस्लिम ही हैं। 25 फीसदी दलित जनसंख्‍या के कारण आगरा लोकसभा सीट यूपी की उन 17 सीटों में शामिल है जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। उत्तर प्रदेश में दलितों का गढ़ माने जाना वाला आगरा क्षेत्र लोकसभा चुनाव के लिहाज से भी काफी अहम है। 2 अप्रैल 2018 को अनुसूचित जाति अध्‍यादेश में संशोधन को लेकर शहर में जमकर बवाल हुआ था। केन्द्र सरकार और बीजेपी के खिलाफ दलितों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी।

वोटर- यहां 19,04,706 वोटर हैं, जिसमें 10,40,087 पुरुष और 8,64,522 महिला वोटर शामिल हैं। 2014 में यहां कुल 59 फीसदी मतदान हुआ था। 2014 में बीजेपी के रामशंकर कठेरिया ने प्रचंड जीत हासिल की थी। कठेरिया को यहां लगभग 55 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उनके सामने बसपा के उम्मीदवार को सिर्फ 26 फीसदी वोट मिले थे। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के सामने पिछले प्रदर्शन को दोहराना एक चुनौती होगा।

विधानसभा सीटें- आगरा लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें एतमादपुर, आगरा छावनी, आगरा दक्षिण, आगरा उत्तर और जलेसर शामिल हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी।

स्थानीय मुद्दे और विधानसभा क्षेत्र यमुना स्‍वच्‍छता और जल संकट प्रमुख समस्या है। तीन विधानसभा शहर में आती हैं। जो स्मार्ट सिटी का हिस्सा है, लेकिन विकास लचर है। बैराज, एयरपोर्ट, हाईकोर्ट बेंच का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। दक्षिण, उत्तरी, छावनी, एत्मादपुर, जलेसर (एटा जिले की विधानसभा है) विधानसभा क्षेत्र हैं।

इस सीट पर एक बार भी नहीं बनी महिला सांसद आजादी के बाद से अब तक 16बार हुए लोकसभा चुनाव में आगरा को एक बार भी महिला सांसद नहीं मिल पाई है. इस लोकसभा सीट पर महिला वोटरों की संख्या बेशक बराबर ही रहती हो, लेकिन संसद में आगरा सीट का प्रतिनिधित्व करने का गौरव किसी महिला को नहीं मिला है। कांग्रेस ने यहां से प्रीता हरित को प्रत्याशी बनाया है।

स्थानीय बनाम बाहरी का मसला- बीजेपी उम्मीदवार एसपी बघेल बघेल आगरा के रहने वाले हैं और इसीलिए स्थानीय बनाम बाहरी का मसला उछाला जा रहा है। विपक्षी गठबंधन में यह सीट बसपा के पास है और मायावती ने यहां से मनोज सोनी को टिकट दिया है, जो नोएडा के व्यवसायी हैं। इसी तरह कांग्रेस ने भी प्रीता हरित को उम्मीदवार बनाया है जो आइआरएस से वीआरएस लेकर राजनीति में कूदी हैं और आगरा में उनकी सक्रियता न के बराबर रही है।

उम्मीदवार

  • एसपी सिंह बघेल- योगी सरकार ने कैबिनेट मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल पर भरोसा जताकर पार्टी ने उन्हें आगरा से प्रत्याशी बनाया है। बघेल आगरा के रहने वाले हैं और इसीलिए स्थानीय बनाम बाहरी का मसला उछाला जा रहा है। उच्च शिक्षा ग्रहण कर वह 1993 में आगरा कॉलेज में सैन्य विज्ञान के प्रोफेसर बने। 1999 और 2004 में भी प्रो. बघेल चुनाव जीते और फिर 2010 में बसपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा और पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव भी बनाया। वर्ष 2014 में वह सपा के महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय के मुकाबले फिरोजाबाद सीट से चुनाव लड़े और हार गये। प्रो. बघेल ने उस वक्त जबरन चुनाव हरवाने का आरोप लगाया था। जिसके बाद उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा। भाजपा में वह पिछड़ा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और 2017 में टूण्डला विधानसभा सीट से जीत दर्ज करने के बाद योगी सरकार में मंत्री बने।
  • प्रीता हरित- कांग्रेस ने आगरा से आईआरएस अफसर रहीं प्रीता हरित को उम्मीदवार बनाया है। मेरठ में तैनात रहीं इनकम टैक्स विभाग की प्रिंसिपल कमिश्नर प्रीता ने अपने पद से इस्तीफा देकर 20 मार्च को ही कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। हाल ही में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ पहली बैठक के दौरान इतनी खींचतान हुई कि वे रोने लगीं थी। उन पर बाहरी होने का आरोप लग रहा है। लेकिन प्रीता हरित का कहना है कि वृंदावन में ननिहाल है और दिल्ली की रहने वाली हूं। वहीं पढ़ाई-लिखाई की है। आईआरएस में चयन के बाद भी समाज सेवा से विमुख नहीं हुईं। एक एनजीओ का गठन करके समाज के दबे, कुचले वर्ग के लिए काम कर रही हूं।
  • मनोज सोनी- बसपा ने आगरा लोकसभा सीट पर मनोज सोनी को प्रभारी बनाया था। मनोज सोनी 2014 में हाथरस से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। मोदी लहर में भी उन्हें अच्छे वोट मिले थे। वह दूसरे स्थान पर रहे थे। बसपा प्रमुख मायावती के भाई आनंद कुमार के करीबी माने जाने वाले मनोज उत्तराखंड के कुमायूं मंडल के 2009 से प्रभारी रहे। आगरा में रहकर पढ़ाई करने वाले मनोज सोनी की गिनती बड़े ठेकेदारों में होती है।

Fatehpur Sikri

f8.jpgइतिहास फतेहपुर सीकरी आगरा से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है। खूबसूरत और लाल पत्थरों से निर्मित यह शहर हिंदू और पारसी वास्तुकला के समावेश को संजोए है। मुगल बादशाह बाबर ने राणा सांगा को सीकरी नमक स्थान पर हराया था और इस जगह​ पर अपना अधिकार कर लिया। कहा जाता है कि एक बार अकबर संतान प्राप्ति की अर्जी लेकर अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जा रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात सूफी फकीर शेख सलीम चिश्ती से हुई थी। फकीर ने अकबर से कहा बेटा तू मेरे ठहरने का बंदोबस्त कर दे, तेरी मुराद पूरी होगी। उस समय अकबर ने उनका इंतजाम सीकरी में ही करवा दिया। अकबर की मुराद पूरी हुई जिसके बाद अकबर ने खुश होकर फतेहपुरी सीकरी को बनाने की योजना तैयार की। जिसमें 15 साल लगे। 1571 से 1585 तक फतेहपुर सीकरी मुगलों की राजधानी रही। इतिहास और भौगोलिक दृष्टि से भी यह लोकसभा सीट अपने आप में बेहद खास है। एक कौने (सीकरी) पर शेख सलीम चिश्‍ती की दरगाह है तो दूसरे छोर (बेटश्वर) पर कालिंदी के तट पर 108 शिवालय हैं।

लोकसभा सीट- आगरा से अलग कर फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। इस सीट पर अभी तक दो बार ही चुनाव हुआ है जिसमें एक बार बसपा और दूसरी बार बीजेपी का कब्जा रहा। 2014 के चुनाव में बीजेपी ने यहां से एक तरफा जीत दर्ज की थी और चौधरी बाबूलाल चुनाव जीत कर आए थे। अब एक बार फिर उनके सामने कमल खिलाने की चुनौती रहेगी। फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट पर सिने स्टार राजबब्बर की वापसी ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है।  हालांकि 2009 का चुनाव राजबब्बर मात्र 9936 वोटों से हारे थे।

2014 में बीजेपी को यहां मोदी लहर फायदा मिला, जाट नेता चौधरी बाबूलाल ने पिछले चुनाव में करीब 45 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंदी को करीब पौने दो लाख वोटों से मात दी थी। 2014 के चुनाव में यहां से समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता रहे अमर सिंह ने भी राष्ट्रीय लोक दल के टिकट से चुनाव लड़ा, लेकिन जमानत भी नहीं बचा सके।

समीकरण जातिगत आंकड़ों को देखें तो ये सीट भी जाट बहुल बेल्ट के अंतर्गत ही आती है, राष्ट्रीय लोकदल का भी यहां पर बड़ा प्रभाव रहा है। फतेहपुर सीकरी में कही 2 लाख जाट और करीब 1.50 लाख कुशवाहा वोटर हैं। इसके अलावा एक लाख से ज्यादा मुस्लिम मतदाता भी इस सीट पर हैं।

वोटर- फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट पर 16,92,961 वोटर हैं, इनमें 9,24,551 पुरुष और 7,68,357 महिला वोटर हैं। 2014 में यहां करीब 61 फीसदी मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें इस सीट के अंतर्गत कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं, जिसमें आगरा ग्रामीण, फतेहपुर सीकरी, खेरागढ़, फतेहाबाद और बाह विधानसभा सीट शामिल है. 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव यहां पांचों सीटों पर बीजेपी ने ही जीत दर्ज की थी.

क्षेत्र में पेयजल संकट बड़ी समस्या- पेयजल संकट यहां की बड़ी समस्या है। फतेहपुर सीकरी और खेरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के गांवों के लोग दूर-दराज से पानी भरकर लाते हैं। बेरोजगारी का यहां के युवाओं को सामना करना पड़ता है। उद्योग न होने के कारण बाह क्षेत्र से बड़ी संख्या में युवकों का दिल्ली और अन्य शहरों में पलायन होता रहा है।

उम्मीदवार

  • राजकुमार चाहर- फतेहपुर सीकरी के सांसद चौधरी बाबूलाल का टिकट काट दिया गया उनकी जगह राजकुमार चाहर को टिकट मिला। राजकुमार फतेहपुर सीकरी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार हार चुके हैं। पहला चुनाव 2002 में बसपा की टिकट पर लड़ा लेकिन रालोद से हारे। दूसरा चुनाव 2007 में बीजेपी की टिकट पर लड़ा लेकिन बसपा से हारे। फिर तीसरे चुनाव 2012 में उन्हें बीजेपी ने टिकट नहीं दिया तो वे निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे और बसपा से हारे। इस तरह राजकुमार चाहर ने तीन बार विधानसभा चुनाव एक ही सीट से तीन अलग अलग चुनाव चिन्हों पर लड़ा, लेकिन जीत का स्वाद नहीं चख सके। इस बार उनके लिए भाजपा की सीट बरकरार रखने की चुनौती है।
  • राज बब्बर- फिल्म अभिनेता राजबब्बर यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद भी हैं। 1952 को उत्तर प्रदेश के टूंडला में जन्में राजबब्बर ने 1989 में जनता दल से राजनीति में इंट्री की थी। इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। सपा से तीन बार सन 1994 से 1999 तक राज्यसभा सांसद रहे। राजबब्बर को सपा ने 2004 में आगरा से लोकसभा का चुनाव लड़ाया और वह जीत भी गए। 2006 में सपा ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। सपा से निकलने के बाद राजबब्बर ने अपना जनमोर्चा बनाया। 2008 में कांग्रेस का दामन थाम लिया। राजबब्बर ने कांग्रेस से 2009 में आगरा के फतेहपुरसीकरी से सांसद का चुनाव लड़ा और हार गए। राजबब्बर कांग्रेस से फिरोजाबाद से 2009 में हुए उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को हराकर सांसद बने। 2014 में लोकसभा का चुनाव गाजियाबाद से लड़े और जनरल वीके सिंह से हार गए। गाजियाबाद की हार के बाद 2015 में कांग्रेस ने उन्हें उत्तराखंड के कोटे से राज्यसभा सदस्य (सांसद) बनाया।
  • गुड्डू पंडित- बसपा की ओर से प्रत्याशी बनाए गए गुड्डू पंडित की छवि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता की है। उन पर कई मुकदमें दर्ज हैं। बुलंदशहर की डिबाई विधानसभा से दो बार विधायक रहे गुड्डू पंडित बसपा के अलावा, सपा, भाजपा और रालोद में भी में रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस नेताओं से भी उनके टिकट से लिए सपंर्क करने की चर्चा थी। उत्तर प्रदेश में मंत्री रहे अमरमणि त्रिपाठी के साथ रहते हुए गुड्डू पंडित राजनीति में आए थे। 2007 के चुनाव में गुड्डू पंडित बसपा से टिकट पर विधायक बने। पंडित 2012 के चुनाव में सपा के टिकट पर दोबारा से विधायक बनने में कामयाब रहे। 2016 के राज्यसभा चुनावों में सपा विधायक रहते गुड्डू पंडिचत ने बीजेपी के उम्मीदवार को वोट दिया लेकिन 2017 में बीजेपी ने गुड्डू पंडित को टिकट देने से मना कर दिया। गुड्डू पंडित ने राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर वो चुनाव लडा लेकिन हार गए2012 में उन्होंने जो हलफनामा दाखिल किया उसके मुताबिक उन पर 13 आपराधिक मामले चल रहे हैं। 2008 में उन पर एक लड़की ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।

    आपराधिक मामले- गुड्डू पंडित के खिलाफ अलीगढ़, नोएडा, बुलंदशहर में कुल सात आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन मामलों में चौथ वसूली, जान से मारने की धमकी देना,घर में घुसकर मारपीट करना, गाली गलौज करना, झगड़ा करना, भड़काऊ भाषण देने के मामले हैं। सभी मामले अभी विचाराधीन हैं।

Posted in Election, News, Uncategorized

LOK SABHA ELECTIONs 2019- Uttar Pradesh Phase 1- April 11, 2019

उत्तर प्रदेश- प्रथम चरण  80 में से 8 सीटों पर होगा मतदान 

 2019 में किसकी किससे जंग

UP-1

अपने लोकसभा क्षेत्र को जाने…

Saharanpur

UP-2दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर सहारनपुर जनपद का इतिहास काफी पुराना है। सहारनपुर जनपद गंगा-यमुना दोआब का इलाका है और गंगा-जमुनी तहज़ीब का संवाहक रहा है। माँ शाकुम्बरी देवी जैसे धार्मिक स्थल और दारुल उलूम जैसे इस्लामिक शिक्षा के केन्द्र के कारण विश्व के कोने-कोने में जाना जाता है।

लोकसभा सीट- पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सहारनपुर लोकसभा सीट राजनीतिक और जातीय समीकरण के हिसाब से काफी मायने रखती है। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में ये सीट भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थी। इस सीट से BJP के राघव लखनपाल ने बड़ी जीत हासिल की थी। लखनपाल ने अपने करीबी प्रतिद्वंदी कांग्रेस के इमरान मसूद को 65 हजार से अधिक वोटों से हराया था। याद होगा इमरान मसूद 2014 में अपने बयानों के कारण काफी चर्चा में रहे थे। 2019 के चुनाव में भी दोनों एक बार फिर आमने सामने हैं। लेकिन इस बार सपा-बसपा-आरएलडी का महागठबंधन दोनों के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा।

इतिहास- सहारनपुर सीट पर सबसे पहला चुनाव 1952 में हुआ था, तब से लेकर 1977 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा था। 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव से लेकर 1996 में तक इस सीट पर जनता दल या जनता पार्टी का कब्जा रहा। हालांकि बीच में 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की थी। 1996 के बाद ये सीट दो बार भारतीय जनता पार्टी, दो बार बसपा, एक बार सपा के पास रही।

समीकरण- सहारनपुर में कुल 56.74 फीसदी हिंदू, 41.95 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है (2011 के जनगणना के अनुसार)। सहारनपुर सीट पर मुस्लिम और दलित भी निर्णायक वोटर हैं। सहारनपुर में करीब साढ़े 6 लाख मुस्लिम, 5 लाख दलित और 1 लाख वोट के करीब जाट मतदाता हैं।

वोटर- यहां कुल 17,22,580  वोटर हैं. इनमें 9,22,046 पुरुष, 8,00,393 महिला वोटर हैं. 2014 में इस सीट पर कुल 74.2 फीसदी वोट डले थे।

विधानसभा सीटें- सहारनपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. जिनमें बेहट, सहारनपुर नगर, सहारनपुर, देवबंद और रामपुरमनिहारन शामिल हैं. इन पांच सीटों में से 2 सीटें BJP, 2 Cong और 1 SP के खाते में आई थी.

2017 जातीय हिंसा- योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद ही मई 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलित और ठाकुर समुदाय के बीच जातीय हिंसा हुई थी। हिंसा में भीड़ ने 25 घर जला दिए थे, 14 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे. भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर को मई 2017 में सहारनपुर में जातीय दंगा फैलाने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासूका) के तहत जेल भेजा गया था, बाद में छोड़ा गया।

स्थानीय मुद्दे-

  • भूमि अधिग्रहण की समस्या
  • किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाना
  • बिजली की दरों में वृद्धि
  • बेसहारा पशुओं का उत्पात
  • चीनी मिलों का किसानों का बकाया गन्ना मूल्य का समय से भुगतान नहीं
  • आलू संकट का स्थायी समाधान नहीं होना

उम्मीदवार

  • सांसद राघव लखनपाल (BJP)युवा सांसदों में से एक गिने जाने वाले राघव लखनपाल अपने पिता निर्भयपाल शर्मा की हत्या होने के बाद राजनीति में आए. निर्भयपाल शर्मा भारतीय जनता पार्टी की ओर से पूर्व में विधायक रह चुके हैं, 2000 में उनकी हत्या कर दी गई थी. इसी के बाद राघव लखनपाल राजनीति में आए, लगातार तीन बार विधायक चुने जाने के बाद 2014 में वह लोकसभा का चुनाव लड़े और सांसद चुने गए. 2017 में सहारनपुर में हुई हिंसा के दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था, उनपर हिंसा को भड़काने का आरोप था. 2014 के आंकड़ों के अनुसार, राघव लखनपाल के पास कुल 3 करोड़ 54 लाख रुपये की संपत्ति है. इसमें 3 करोड़ की अचल और 54 लाख चल संपत्ति शामिल है.
  • इमरान मसूद (Cong) का परिवार सहारनपुर के दिग्गज राजनैतिक घरानों में शुमार किया जाता है. उनके चाचा काजी राशिद मसूद 8 बार सांसद और केन्द्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं. इस परिवार ने 25 साल तक लगातार सहारनपुर का प्रतिनिधित्व किया है. 2007 के विधानसभा चुनाव में इमरान मसूद पहली बार मुजफ्फराबाद सीट से विधायक निर्वाचित हुए थे. 2012 और 2017 का विधानसभा चुनाव हारे. 2014 में भी सहारनपुर सीट से लोकसभा के चुनाव में उन्हें जीत नही मिल सकी. मगर अब कांग्रेस पार्टी ने फिर से इमरान के ऊपर दांव खेल दिया है. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान इमरान मसूद ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. बोटी-बोटी नाम से चर्चा में आई इस टिप्पणी के बाद इमरान के खिलाफ केस दर्ज हुआ और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था.
  • हाजी फजलुर्रहमान (BSP) बसपा के पुराने साथी हैं। फजलुर्रहमान सहारनपुर से मेयर का चुनाव लड़ चुके हैं। उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया था। बीजेपी के उम्मीदवार से केवल 1986 वोटों से हारे थे। भाजपा प्रत्याशी संजीव वालिया को 1,21,179 वोट मिले हैं। दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी हाजी फजलुर्रहमान रहे हैं, इन्हें 1,19,193 वोट मिले थे। मेयर चुनाव में बेहतर परफार्मेंस देखते हुए उन पर लोकसभा चुनाव में दांव लगाया गया है।

Kairana

UP-3.jpgमान्यता है कि कैराना प्राचीन काल में कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था। हालांकि इसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं मिला। माना जाता है कि महाभारत काल में कर्ण का जन्म यहीं हुआ था। माना जाता है कि राजस्थान के अजमेर से आए राणा देव राज चौहान और राणा दीप राज चौहान ने कैराना की नींव रखी। सोलहवीं सदी में मुगल बादशाह जहांगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में कैराना की अपनी यात्रा के बारे में लिखा है और मुकर्रब खान की बनाई कई इमारतों, एक शानदार बाग और बड़े तालाब का जिक्र किया है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में बेहतरीन मुकाम हासिल करने वाला खयाल गायकी के “किराना” घराने का मुख्यालय कैराना था। इसी घराने ने भारत रत्न पं भीमसेन जोशी, गजल गायिका बेगम अख्तर और संवाई गंधर्व जैसे महान संगीतज्ञ दिए।

लोकसभा सीट- पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट राजनीतिक लिहाज से काफी अहम सीट है. 2014 में मोदी लहर के बीच इस सीट पर BJP के हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी, लेकिन उनके निधन के बाद 2018 में हुए उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार ने BJP को मात दी और समूचे देश को बड़ा संदेश भेजा. राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन को समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने समर्थन दिया था. 2017 में प्रचंड बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने वाली बीजेपी के लिए इस हार को बड़े झटके के तौर पर देखा गया।

इतिहास- कैराना लोकसभा सीट 1962 अस्तित्व में आई. पहले ही चुनाव में इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी. उसके बाद इस सीट पर सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी और कांग्रेस के पास ही रही. लेकिन 1996 में इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की, 1998 में भारतीय जनता पार्टी, फिर लगातार दो बार राष्ट्रीय लोक दल, 2009 में बहुजन समाज पार्टी और 2014 में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. 2018 में जब उपचुनाव हुए तो बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी।

समीकरण- जातीय समीकरण के लिहाज से इस सीट पर सबसे ज्यादा 5 लाख मुस्लिम, 4 लाख बैकवर्ड (जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप, प्रजापति और अन्य शामिल) और 2.5 लाख दलित हैं। इसके अलावा 2 लाख के करीब जाट वोटर हैं।

वोटर- आंकड़ों के अनुसार इस सीट पर कुल 16,43,934 वोटर हैं, इनमें 8,87,718 पुरुष, 7,56,115 महिला वोटर हैं। 2014 में जहां इस सीट पर 73.10 फीसदी वोट पड़े थे वहीं उपचुनाव में आंकड़ा 54 फीसदी रहा था।

विधानसभा सीटें- कैराना लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं। पांच में से चार विधानसभा सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थीं। इनमें नकुड़ BJP, गंगोह BJP, कैराना SP, थाना भवन BJP, शामली BJP के खाते में ही गई थीं।

2016 में उठा था पलायन का मुद्दा कैराना में नाकुर, गंगोह, कैराना, थाना भवन और शामली विधानसभा सीटें आती हैं। केंद्र में सरकार बनने के दो साल बाद और राज्य विधानसभा चुनाव से एक साल पहले भारतीय जनता पार्टी सांसद हुकुम सिंह ने कैराना में साल 2016 में कानून व्यवस्था की बदहाली के चलते इलाके से हिंदू परिवारों के पलायन का बड़ा आरोप जड़ दिया। कैराना उस वक्त देशभर के सामने इस बात को लेकर चर्चा में आया जब 2016 में विधायक हुकुम सिंह ने पलायन के पीछे अल्पसंख्यक समुदाय के डर को बड़ा कारण बताया।

जाट-किसान आंदोलन का असर2018 के उपचुनावों में सभी पार्टियों ने अपनी सारी ताकत झोंक दी। बीजेपी ने जहां पलायन को मुद्दा बनाए रखने की कोशिश की वहीं विपक्षी दलों ने गन्ना किसानों की स्थिति को लेकर सरकार को घेरा। बीजेपी ने गन्ना किसानों से वादा किया था कि तय समय पर उनकी फसल के बकाये का भुगतान कर दिया जाएगा। इस वादे के सहारे पार्टी ने किसानों का भरोसा जीतने की कोशिश की थी लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो इलाके के किसानों का गुस्सा फूट पड़ा।

उम्मीदवार

  • प्रदीप चौधरी (BJP)- BJP ने 2018 का लोकसभा उप चुनाव हारने वाली मृगांका सिंह का टिकट काट गंगोह विधानसभा सीट से अपने विधायक प्रदीप चौधरी को कैराना लोकसभा सीट से उतारने का फैसला किया है। प्रदीप पहले कांग्रेस के विधायक थे और 2017 में वह भाजपा में शामिल हुये थे। प्रदीप चौधरी गंगोह से विधायक हैं और गुर्जर बिरादरी से ताल्‍लुक रखते हैं। इसके पीछे कांग्रेस उम्‍मीदवार हरेंद्र मलिक को भी वजह माना जा रहा है। अगर मृगांका सिंह को टिकट मिलता तो जाट वोटर बंट सकता था। इसे देखते हुए भी भाजपा ने प्रदीप चौधरी पर दांव खेला है।
  • हरेंद्र मलिक (Cong) इस बार कांग्रेस ने अपना अलग प्रत्याशी मैदान में उतारा है वैसे तो कांग्रेस का कैराना लोकसभा सीट पर कोई खास असर नहीं है लेकिन कांग्रेस ने जो जाट कार्ड खेला है और कैराना से जाट प्रत्याशी हरेंद्र मलिक को मैदान में उतारा है। हरेंद्र मलिक सबसे पहले 1985 में मुजफ्फरनगर के खतौली से विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने मुजफ्फरनगर की ही बकरा विधानसभा सीट से 1989, 91, 93 चुनाव लड़ा था, वहां से भी उन्होंने जीत हासिल की थी। जिसके बाद लोकसभा का चुनाव भी उन्होंने कई बार लड़ा लेकिन वह जीत नहीं सके और हरेंद्र मलिक कद्दावर नेता होने के साथ ही उन्हें 2002-08 राज्यसभा का सांसद बनाया गया था।
  • तबस्सुम हसन (SP) मौजूदा सांसद तबस्सुम हसन राजनीति परिवार से ही आती हैं. 2018 का उपचुनाव तबस्सुम उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार के तौर पर जीतीं लेकिन इससे पहले वह 2009 में बहुजन समाज पार्टी की तरफ से जीत दर्ज कर चुकी हैं. इस बार सपा के चिन्ह पर चुनाव मैदान में हैं। 2014 में उनके ही बेटे नाहिद हसन ने ही हुकुम सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था. इतना ही नहीं कैराना सीट से ही तबस्सुम हसन के ससुर चौधरी अख्तर हसन सांसद रह चुके हैं. तबस्सुम के पति मुनव्वर हसन भी कैराना से दो बार विधायक, दो बार सांसद रह चुके हैं।

Muzaffarnagar

UP-4.jpgआम चुनाव 2019 में मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। पश्चिमी यूपी के जाटलैंड के नाम से मशहूर इस लोकसभा सीट को 2014 में बीजेपी ने कब्जा किया था। संजीव बालियान ने यहां भारी मतों से जीत हासिल की थी। 2013 के दंगों के बाद यह सीट हमेशा से ही सुर्ख़ियों में रही है। इस सीट पर जाट और मुस्लिम वोटर हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहे हैं। गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के मध्य में बसा मुजफ्फरनगर शाहजहां के शासनकाल के दौरान एक मुगल कमांडर सय्यद मुजफ्फर खान के पुत्र ने सरवट ग्राम के पास 1633 में इस शहर की स्थापना की थी। 1901 में, ब्रिटिश राज के दौरान, यह आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत में मेरठ प्रभाग का जिला था। मुजफ्फरनगर में स्थित जैन मंदिर काफी खूबसूरत है। इसके अतिरिक्त एक विशाल सराय भी है। इनका निर्माण शाहजहां द्वारा करवाया गया था।

इतिहास 1952 के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर 1962 तक इस सीट पर कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा। जिसके बाद लगातार दो बार 1967, 1971 में CPI ने जीत दर्ज की थी। 1977 से 1991 तक ये सीट जनता दल, कांग्रेस के खाते में रही। 1990 में जब देश में राम मंदिर का मुद्दा चरम पर था तो उसका असर यहां भी देखने को मिला। 1991, 1996 और 1998 के लोकसभा चुनाव में यहां पर लगातार BJP ने जीत दर्ज की थी। 1999 चुनाव में कांग्रेस ने सीट छीन ली थी। हालांकि, 2004 और 2009 में ये सीट समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई। 2014 में चली मोदी लहर ने इस सीट को BJP ने दोबारा कब्जा किया।

समीकरण- यहां 57.51% आबादी हिंदू है जबकि 41.30% मुस्लिम है। यहां करीब 5.5 लाख मुस्लिम, 2.5 लाख दलित, और 2.15 लाख के करीब जाट मतदाता हैं। इसके अलावा सैनी और कश्यप वोट भी करीब 2 लाख के करीब है। सबसे प्रतिष्ठापूर्ण मुकाबला मुजफ्फरनगर में है, जहां रालोद प्रमुख अजित सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. अजीत सिंह पिछली बार बागपत से उतरे थे और तीसरे नंबर पर रहे थे. वे गठबंधन के उम्मीदवार हैं. इस सीट पर करीब 38% मुसलमान और करीब 14% दलित वोटर हैं. इसके साथ ही दो लाख जाट मतदाता हैं. जिसके सहारे अजित सिंह यहां मजबूत हैं.

वोटर-  आंकड़ों के अनुसार इस सीट पर कुल 16,85,594 वोटर हैं, इनमें 9,12,745 पुरुष, 7,72,733 महिला वोटर हैं। 2014 में जहां इस सीट पर  69.74 फीसदी वोट पड़े थे।

वोटर मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर 16.85 लाख मतदाता हैं. इनमें पुरुष वोटर 9.12 लाख  और 7.72 लाख महिला वोटर हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर 69.7 फीसदी वोट डाले गए थे। 2014 चुनाव में संजीव बालियान ने कादिर राणा को करीब 4 लाख वोटों से हराया था।

विधानसभा सीटें मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के अंतर्गत कुल पांच विधानसभाएं आती हैं। इनमें बुढ़ाना, चरथावल, मुजफ्फरनगर, खतौली, सरधना सीट आती हैं। ये पांचों ही सीटें BJP के खाते में हैं। इनमें सरधना सीट से संगीत सोम विधायक हैं, जो अपने बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं।

दंगे की आग देहरादून नैशनल हाइवे के बीच पड़ने वाला मुजफ्फरनगर साल 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद से तनाव कारण चर्चा में रहा है। मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में 27 अगस्त, 2013 को शाहनवाज की हत्या 8 लोगों ने कथित तौर पर कर दी थी। गुस्साई भीड़ ने दो आरोपियों को पकड़कर पीट दिया था जबकि 6 भाग निकले थे। इसके बाद हुए दंगों में 63 लोग मारे गए थे जबकि 50,000 से भी अधिक विस्थापित हो गए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक दंगों से जुड़े 184 में से 87 मामलों की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है। बाकी मामलों को बंद करने की रिपोर्ट दाखिल हो चुकी है। 26 मामले ऐसे थे जो दो बार दर्ज हो गए थे जबकि 10 को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सांसद संजीव बाल्यान, साध्वी प्राची, बिजनौर के सांसद कुंवर बारतेंद्र सिंह और बीजेपी विधायक उमेश मलिक, संगीत सिंह सोम और सुरेश राणा के खिलाफ हेट स्पीट के साथ ही कई आरोप हैं।

स्थानीय मुद्दे

  • स्थानीय मुद्दों में गन्ने के बकाए को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार दोनों से नाराज़गी है।
  • बुढ़वल चीनी मिल शुरू न होने से लोग नाराज हैं

उम्मीदवार

  • डॉ. संजीव बालियान (BJP) मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री व वर्तमान सांसद डॉ. संजीव बालियान को दोबारा प्रत्याशी बनाया गया है। बालियान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े जाट नेता हैं। किसान बैकग्राउंड से आने वाले संजीव बालियान ने 2013 में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं थीं। बालियान पर दंगों के दौरान भड़काऊ भाषण देने का आरोप था। उनपर आरोप था कि सितंबर 2013 में उन्होंने एक महापंचायत की थी, जिसके कारण इलाके में माहौल बिगड़ा था। नवंबर 2015 में उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किए गए थे। इसके बाद दिसंबर 2015 में बालियान ने मुजफ्फरनगर की एक अदालत में आत्मसमर्पण कर जमानत प्राप्त की थी। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने नाराज जाटों को मनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। मोदी सरकार में शुरू में वह कृषि राज्य मंत्री रहे जिसके बाद उन्हें जल राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। हालांकि, 2017 में हुए कैबिनेट विस्तार में उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया।
  • अजित सिंह (RLD) लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने गठबंधन किया है और मुजफ्फरनगर की सीट से आरएलडी प्रमुख अजित सिंह ने मैदान में उतरने का फैसला किया है। अजित सिंह पश्चिमी यूपी के बड़े नेता हैं और पूर्व पीएम प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विरासत के साथ उनका नाम जुड़ा है। उन्हें इसका फायदा मिलने की संभावना है। अजित सिंह अगर जाट-मुस्लिम के बीच की खांई को पाटने में सफल रहते हों तो चौधरी परिवार की राजनीति के लिए संजीवनी का काम करेगी, नहीं तो आरएलडी के लिए वजूद का खतरा है। अजीत पहली बार 1986 में राज्‍यसभा चुनावों में निर्वाचित हुए। इसके बाद 1987 में उन्‍हें लोक दल का अध्‍यक्ष बनाया गया। 1988 में अजीत जनता पार्टी के अध्‍यक्ष घोषित किए गए। 1989 के बाद वे बागपत से लगातार सांसद रहे हैं सिवाय 1999 के। उनकी दूसरी पराजय हुई 2014 में जब वे मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह से हार गए।

Bijnor

UP-5.jpgबिजनौर उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण लोकसभा संसदीय सीट है। हिमालय की तराई में स्थित यह जिला इतिहास में प्रसिद्ध दुष्‍यंत और भरत जैसे महान राजाओं के लिए जाना जाता है। इसके अलावा यह ऋषि कण्‍व और महात्‍मा विदुर की भूमि के नाम से भी मशहूर है। आधुनिक समय में यह डॉ. आत्‍माराम जैसे विश्‍वप्रसिद्ध रसायनशास्‍त्री के जन्‍मस्‍थान के नाम से प्रसिद्ध है।

लोकसभा सीट बिजनौर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की VIP सीटों में से एक मानी जाती है। इस सीट पर कई राजनीतिक दिग्गज अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। फिर चाहे वह BSP सुप्रीमो मायावती हों या फिर लोक जनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान। 2014 लोकसभा चुनाव में अभिनेत्री जयाप्रदा ने RLD की टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा था। हालांकि देशभर में चली मोदी लहर से यह सीट को BJP के खाते में गई। बीजेपी के कुंवर भारतेंद्र सिंह ने यहां 2014 में 2 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी।

इतिहास बिजनौर लोकसभा सीट पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण सीटों में से एक है, यही कारण है कि इसका इतिहास भी बहुत दिलचस्प है। मेरठ, नगीना, मुजफ्फरनगर जैसे शहरों से जुड़ी इस सीट पर शुरुआत में कांग्रेस का दबदबा रहा था। देश में हुए पहले चुनाव यानी 1952 से लेकर 1971 तक ये सीट कांग्रेस के खाते में ही रही। फिर इमरजेंसी के दौर के बाद कांग्रेस का मोहभंग हुआ तो 1977 और  1980 में इस सीट पर जनता दल ने जीत हासिल की। हालांकि एक बार फिर ये सीट कांग्रेस के पास गई। 1984 में गिरधारी लाल, 1985 उपचुनाव में पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार यहां से चुनाव जीती थीं। इस चुनाव में उनके खिलाफ रामविलास पासवान और मायावती मैदान में थे। 1989 में मायावती ने फिर से यहीं से चुनाव लड़ा और इस बार जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बनीं। उसके बाद हुए इस सीट पर कुल 7 चुनाव में चार बार BJP, दो बार RLD और एक बार SP ने जीत दर्ज की थी।

समीकरण- 2011 की जनगणना के अनुसार, बिजनौर में कुल 55.18 % हिंदू और 44.04% मुस्लिम आबादी हैं। बिजनौर सीट पर 2 लाख से ज्यादा गुर्जर और इतने ही जाट, लगभग 5 लाख मुस्लिम, 4 लाख से ज्यादा दलित, और 2.30 लाख अन्य बिरादरियों के मतदाता हैं।

वोटर- बिजनौर लोकसभा सीट पर कुल 16,51,105 वोटर हैं, जिनमें 8,87,589 पुरुष और 7,63,432 महिला वोटर हैं। 2014 में इस सीट पर 67.9 फीसदी वोट डाले गए थे।

वोटर बिजनौर लोकसभा सीट पर कुल 16.51 लाख वोटर हैं, जिनमें 8.87 लाख पुरुष और 7.63 लाख महिला वोटर हैं। 2014 में इस सीट पर 67.9 फीसदी वोट डाले गए थे। बीजेपी उम्मीदवार भारतेंद्र ने अपने प्रतिद्वंदी शाहनवाज राना को 2 लाख से अधिक वोटों से मात दी थी।

विधानसभा सीटें बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं। ये सीटें पुरकाजी, मीरापुर, बिजनौर, चांदपुर और हस्तिनापुर है। 2017 विधानसभा चुनाव में सभी सीटें BJP के खाते में गई थीं ऐसे BJP की नजर एक बार फिर इस लोकसभा सीट पर परचम लहराने की होगी।

स्थानीय मुद्दे

  • मंजूरी के बाद भी मेडिकल कॉलेज न बनना।
  • गन्ने का मूल्य न बढ़ना।
  • बकाया गन्ना भुगतान।
  • किसान खाद, डीजल, बिजली के दाम बढ़ने से वह नाराज हैं।

उम्मीदवार

  • कुंवर भारतेंद्र सिंह (BJP) BJP ने बिजनौर लोकसभा सीट से अपने पुराने खिलाड़ी कुंवर भारतेंद्र सिंह पर ही दांव खेला है। भारतेंद्र सिंह जाट बिरादरी के बड़े नेता हैं। 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़कर मोदी लहर में पहली बार सांसद बने थे। वे 2002 और 2012 में बिजनौर विधानसभा से विधायक रह चुके हैं। 2002 में बनी राज्य सरकार में सिंचाई राज्यमंत्री रहे। भारतेंद्र सिंह का नाम 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में भी आया था, उनपर भड़काऊ भाषण देने का आरोप था। हालांकि, उन्हें मुजफ्फरनगर की कोर्ट से जमानत मिल गई थी। भाजपा ने इस बार भी भारतेंद्र सिंह पर ही अपना विश्वास जताया है। भारतेंद्र सिंह हिंदुत्व के कार्ड के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश करेंगे। लेकिन भारतेंद्र सिंह से कई जगह जाट बिरादरी के वोटर नाराज हैं। इस नाराजगी को दूर करना भी भाजपा सांसद के लिए कड़ी चुनौती होगा।
  • नसीमुद्दीन सिद्दीकी- कांग्रेस ने ऐसे में बड़े मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर दांव खेला है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा के भी बड़े नेता रहे हैं। उनको बसपा सरकार में मिनी सीएम भी कहा जाता था। कांग्रेस में भी उनकी गिनती बड़े नेताओं में होती है। वह उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। नसीमुद्दीन राजनीति में आने से पहले रेलवे कांट्रेक्‍टर थे। उन्‍होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1988 में की थी। 1988 में बसपा में शामिल हो गए।  1991, 1995, 2007 और 2012 विधानसभा पहुंचे और मायावती सरकार में मंत्री भी बने। मई 2017 में उन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर बसपा से निकाल दिया गया था। फरवरी 2018 में नसीमुद्दीन ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के आने से बिजनौर लोकसभा सीट पर समीकरण गड़बड़ा गए हैं। बसपा व कांग्रेस को मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में करना बड़ी चुनौती होगी। बिजनौर लोकसभा सीट पर पांच लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। मुस्लिम इस सीट पर निर्णायक हालत में हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के मैदान में आने से भाजपाइयों के चेहरों पर रौनक बढ़ी है। क्योंकि मुस्लिम समुदाय का वोट बंटने से फायदा भाजपा को होगा।
  • मलूक नागर (BSP) बसपा ने बिजनौर लोकसभा सीट पर मलूक नागर पर दांव खेला है। गुर्जर जाति से ताल्लुक रखने वाले मलूक नागर 2014 में भी बिजनौर लोकसभा सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। मोदी लहर में वह तीसरे नंबर पर रहे थे। बसपा ने पूर्व विधायक इकबाल ठेकेदार का टिकट काटकर मलूक नागर को थमाया है। वेस्ट यूपी के अमरोहा और सहारनपुर सीट पर मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव खेलने की वजह से बिजनौर में गुर्जरों को साधने के लिए मलूक नागर को टिकट दिया गया है।

Meerut

UP-6.jpgपश्चिमी उत्तर प्रदेश का केंद्र और क्रांतिधरा मेरठ राजनीतिक संदेश के हिसाब से अहम सीट मानी जाती है। आपकी नजर में मेरठ की पहचान क्या है- सिर्फ 1857 की क्रांति का बिगुल बजाने वाला जिला, ऐतिहासिक नौचंदी मेले वाला शहर या फिर वह शहर जहां का बल्ला थामकर सचिन, धोनी और विराट जैसे क्रिकेटरों ने देश-दुनिया में अपना परचम लहराया। मेरठ की कोई एक खासियत नहीं है। पौराणिक कहानियों में मेरठ को रावण का ससुराल भी कहा गया है और महाभारत में पांडवों-कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर।फिलहाल चुनाव की बात करें तो इस समय इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है और राजेंद्र अग्रवाल यहां से सांसद हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने मौजूदा सांसद को ही टिकट दिया है। तो कांग्रेस ने हरेंद्र अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। गठबंधन ने हाजी याकूब कुरैशी को प्रत्याशी घोषित किया है। पिछले दो दशकों से ये सीट BJP का गढ़ रही है।

लोकसभा सीट- 2014 चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत यहीं से की थी। 2019 में भी चुनाव प्रचार की शुरुआत 28 मार्च से मेरठ से ही होगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में मेरठ में भारतीय जनता पार्टी को करीब 48 फीसदी वोट मिले थे. मेरठ में राजेंद्र अग्रवाल ने स्थानीय नेता मोहम्मद शाहिद अखलाक को दो लाख से अधिक वोटों से मात दी थी. इस सीट पर बॉलीवुड अभिनेत्री नगमा कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ी थीं, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

इतिहास देश में हुए पहले लोकसभा चुनाव 1952 में यहां कांग्रेस का परचम लहराया था। लेकिन 1967 में सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस को मात दी। 1971 में एक बार फिर कांग्रेस ने बाजी मारी, लेकिन उसके अगले चुनाव में इमरजेंसी के खिलाफ चली लहर में जनता पार्टी ने बाजी मारी। हालांकि, 1980, 1984 में कांग्रेस की ओर से मोहसिना किदवई और 1989 में जनता पार्टी ने ये सीट जीती। 1990 के दौर में देश में चला राम मंदिर आंदोलन का मेरठ में सीधा असर दिखा और इसी के बाद ये सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ बन गई। 1991, 1996 और फिर 1998 में यहां से लगातार भारतीय जनता पार्टी के दबंग नेता अमरपाल सिंह ने जीत दर्ज की। उसके बाद 1999, 2004 में क्रमश कांग्रेस और बसपा ने यहां से बाजी मारी। हालांकि, 2009 और 2014 में फिर यहां भारतीय जनता पार्टी का परचम लहराया।

समीकरण- 2011 के आंकड़ों के अनुसार मेरठ की आबादी करीब 35 लाख है, इनमें 65 फीसदी हिंदू, 36 फीसदी मुस्लिम आबादी हैं। दलित-मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर मुस्लिम आबादी 5.64 लाख है। वहीं दलितों की आबादी 3.75 लाख है। इस सीट पर ब्राह्मण 1.18 लाख, वैश्य 1.83 लाख है। वहीं पिछड़े वर्ग में जाटों की आबादी 1.30 लाख के आसपास है जिसमें गुर्जर- 56300, सैनी- 41150, प्रजापति- 46800, पाल- 27000 और कश्यप 30 हजार है।

वोटर- मेरठ में कुल वोटरों की संख्या 18,72,146 इसमें 10,21,484 पुरुष और 8,50,529 महिला वोटर हैं। इस बार मतदाता सूची में करीब 1 लाख नए युवा मतदाता जुड़े हैं।  2014 में यहां मतदान का प्रतिशत 63.12 फीसदी रहा।

विधानसभा सीटें मेरठ लोकसभा के साथ हापुड़ का कुछ क्षेत्र भी जुड़ता है, कुल मिलाकर यहां 5 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण और हापुड़ की सीट है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें मेरठ शहर  सपा और बाकि चार पर BJP का कब्जा है।

गन्ना किसान, SC-ST Act जैसे मुद्दे अहम साबित होंगे- SC-ST Act में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधन के बाद 2 अप्रैल 2018 को दलित आंदोलन की आग में मेरठ भी जला था। जिसके बाद दलित समुदाय ने सरकार से नाराजगी जाहिर की थी। वहीं बाद में सरकार ने कानून में बदलाव करते हुए पुराने प्रावधानों को बहाल कर दिया था जिसके बाद सवर्णों की नाराजगी भी खुलकर सामने आई और 6 सितंबर 2018 को सवर्ण आंदोलन हुआ। यानी इस बार के चुनाव में एससी-एसटी ऐक्ट फैक्टर भी अहम साबित हो सकता है।

गन्ना किसान नाराज- इस बेल्ट के गन्ना किसानों में भी सरकार के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आई। गन्ना किसानों का असंतोष और बकाया भुगतान इस बार कैराना, नूरपुर उपचुनाव में भी मुख्य मुद्दा रहा। कहीं न कहीं किसानों का विद्रोह ही बीजेपी की हार का कारण भी बना।

उम्मीदवार

  • राजेंद्र अग्रवाल मेरठ से बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल मौजूदा सांसद हैं। राजेंद्र अग्रवाल वैश्य समाज के बड़े नेता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैकग्राउंड से आने वाले सांसद राजेंद्र अग्रवाल मेरठ जैसी मुस्लिम बहुल सीट से लगातार दो बार सांसद चुनकर आए हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत प्रचारक के रूप में की, इमरजेंसी और अयोध्या आंदोलन के दौरान उनपर कई मामले भी दर्ज हुए हैं.
  • हरेंद्र अग्रवाल मेरठ में अपनी जमीन खोज रही कांग्रेस ने भी वैश्य समाज के हरेंद्र अग्रवाल को टिकट दिया है। हरेंद्र अग्रवाल पार्टी के विभिन्न पदों के साथ ही एमएलसी रहे हैं। मूल रूप से बुलंदशहर निवासी हरेंद्र अग्रवाल लंबे समय तक मेरठ में रहे हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल वे गाजियाबाद में रह रहे हैं, लेकिन 2002 तक सर्किट हाउस के निकट ऑफिसर्स हॉस्टल में रहे हैं और मेरठ से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। 2014 में साकेत स्थित हरेंद्र अग्रवाल की कोठी से ही नगमा ने 2014 से चुनाव लड़ा था। हरेंद्र अग्रवाल के पिता बाबू बनारसी दास स्वतंत्रता सेनानी थे। वे 27 फरवरी 1979 से 17 फरवरी 1980 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। इससे पहले वे बुलंदशहर से सांसद चुने गए थे। छोटे भाई अखिलेश दास बसपा से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। वे लखनऊ के मेयर भी थे।
  • हाजी याकूब कुरैशी- बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों से वैश्य समाज के उम्मीदवारों की टक्कर का फायदा एसपी-बीएसपी के गठबंधन को हो सकता है। गठबंधन के तहत यह सीट बीएसपी के पास है और यहां से पार्टी ने हाजी याकूब कुरैशी को टिकट दिया है। आरोप लगाया कि वर्ष 2002 में याकूब ने बसपा के टिकट पर विधायक बनने के बाद 40 विधायक तोड़ने का काम किया जिससे बसपा के कार्यकर्ता नाराज हुए। साल 2007 में यूडीएफ बनाकर जीते और मंत्री बनने के चक्कर में यूडीएफ तोड़ दी जिससे मुस्लिम भी नाराज हैं। इसके बाद साल 2014 में मुरादाबाद से लोकसभा चुनाव हारे। साल 2017 में मेरठ दक्षिण से विधानसभा चुनाव में हारे और उनके पुत्र सरधना में हारे।

Baghpat

UP-7.jpgबागपत पश्चिमी उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण जिला है। इस नगर का प्राचीन नाम ‘व्याघ्रप्रस्थ’ या ‘वृषप्रस्थ’ (Land of Tigers) कहा जाता था। क्योंकि बाघों की आबादी कई शताब्दियों पहले मिली थी। मान्यता यह भी है कि बागपत उन 5 गांवों में एक है, जिनकी मांग युद्ध से पहले पांडवों की ओर श्रीकृष्ण ने कौरवों से की थी। इतिहासकारों के अनुसार, महाभारत काल के दौरान बागपत कुरू जनपद का हिस्सा था। ऐसे संस्करणों से प्रेरित होकर शहर को आखिरकार ‘बागपत’ या ‘बाघपत’ नाम दिया गया। मुगल काल के दौरान 1857 के विद्रोह के बाद, शहर को महत्व मिला और इसे तहसील के रूप में स्थापित किया गया था। बागपत उत्तर में मुजफ्फरपुर ज़िला, दक्षिण में गाजियाबाद जिला और पश्चिम में यमुना नदी तथा रोहतक से घिरा हुआ है। एक अलग जिले के रूप में बागपत की स्थापना 1997 ई. में हुई थी। भारत के कई शहरों की तरह ही यह जिला भी यमुना नदी के तट पर ही बसाया गया था।

बागपत लोकसभा सीट- पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी गढ़ और जाटलैंड माने जाने वाली लोकसभा सीट बागपत में इस बार भी पूरे देश की नजरें हैं। 1967 में अस्तित्व में आई, पहले चुनाव में यहां जनसंघ और दूसरे चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। लेकिन इमरजेंसी के बाद यहां 1977 में हुए चुनाव से ही क्षेत्र की राजनीति पूरी तरह से बदल गई। 1977, 1980 और 1984 में लगातार पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह यहां से चुनाव जीते। उनके बाद बेटे अजित सिंह 6 बार यहां से सांसद रहे। 1989, 1991, 1996, 1999, 2004 और 2009 में अजित सिंह बागपत से सांसद रहे। सिर्फ 1998 में हुए चुनाव में यहां हार का सामना करना पड़ा। और 2014 में तो वह तीसरे नंबर पर ही पहुंच गए।

समीकरण- जाट समुदाय के वोटरों के बाद यहां मुस्लिम वोटरों की संख्या सबसे अधिक है। 4.35 हजार जाट मतदाता हैं। उसके बाद 3.25 लाख मुस्लिम और 2.25 लाख अनुसूचित जाति,2.70 लाख स्वर्ण और बाकी पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग के मतदाता हैं। 

वोटर- बागपत में मतदाताओं की संख्या 15,92,290 लाख है। पुरुष मतदाताओं की संख्या 8,80,339 है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 7,11,845 है। युवाओं को पहली बार मतदान करने का अधिकार मिलेगा।

विधानसभा सीटें- बागपत लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इसमें सिवालखास, छपरौली, बड़ौत, बागपत और मोदीनगर विधानसभा सीटें हैं. इसमें सिवालखास मेरठ जिले की और मोदीनगर गाजियाबाद जिले से आती हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इसमें सिर्फ छपरौली में राष्ट्रीय लोकदल ने जीत दर्ज की थी, जबकि बाकी 4 सीटों पर बीजेपी जीती थी.

स्थानीय मुद्दे

  • बागपत संसदीय क्षेत्र में किसान और उसकी समस्याएं सबसे बड़ा मुद्दा है
  • गन्ना भुगतान, गोवंश से फसलों को हो रहा नुकसान
  • यमुना नदी पर पुल, दिल्ली-सहारनपुर हाईवे, मेरठ-सोनीपत मार्ग, बड़ौत-बुढ़ाना मार्ग
  • मेरठ-पानीपत रेललाइन, दिल्ली-सहारनपुर रेल लाइन का दोहरीकरण
  • शिक्षा, बेरोजगारी, खेल की ट्रेनिंग की व्यवस्था नहीं होना
  • महिलाओं की सुरक्षा और कानून व्यवस्था

चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी यानी पौत्र जयंत चौधरी मैदान में हैं। सपा-बसपा-रालोद के बीच गठबंधन है। रालोद के समर्थन में कांग्रेस का उम्मीदवार न उतराने का फैसला जयंत चौधरी को राहत दे रहा है। क्षेत्र में यूं तो 13 उम्मीदवार हैं लेकिन, भाजपा और रालोद के बीच आमने-सामने की टक्कर दिख रही है।

  • डॉ. सत्यपाल सिंह- मुंबई पुलिस कमिश्नर के तौर पर मजबूत पहचान बनाने वाले सत्यपाल सिंह ने 2014 के चुनाव से पहले चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें बागपत से मौका दिया. सत्यपाल सिंह 2 लाख से अधिक वोटों से जीत कर भी आए. सत्यपाल सिंह 2012 से 2014 तक मुंबई पुलिस के कमिश्नर रहे.2014 में चुनाव जीतने के बाद वह केंद्र सरकार में मंत्री बने, अभी भी वह शिक्षा राज्य मंत्री और गंगा मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं. बीते चार साल में कई बार सत्यपाल सिंह अपने बयानों के कारण चर्चा में रहे हैं. फिर चाहे डॉल्फिन नीति से जुड़े उनके बयान ने काफी चर्चा बटोरी थी.
  • जयंत चौधरी- RLD के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है. जयंत चौधरी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पोते और आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह के बेटे हैं. 1978 में जन्मे जयंत चौधरी ने भी अपने पिता अजित सिंह की तरह विदेश में पढ़ाई की है. जयंत चौधरी 15वीं लोकसभा में उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट से सांसद रहे हैं. हालांकि 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बदलते सियासी समीकरण और मोदी लहर के चलते जयंत मथुरा में हेमा मलिनी के चुनावी मैदान में उतरने के चलते हार गए थे. वहीं इससे पहले जयंत 2012 विधानसभा चुनाव में मांट से विधायक चुने गए थे.2019 का लोकसभा चुनाव आरएलडी के लिए अस्तित्व की लड़ाई माना जा रहा है।

Ghaziabad

UP-8.jpgगाजियाबाद को गेटवे ऑफ यूपी यानि यूपी का दरवाजा भी कहा जाता है। इसका गठन मेरठ से अलग होकर 14 नवंबर 1976 को हुआ था। दिल्ली मेट्रो नेटवर्क से जुड़ा यह शहर बड़े बड़े मॉल और मल्टीप्लेक्स के लिए भी जाना जाता है। इस औद्योगिक जिले का नाम ग़ाज़ी-उद्-दीन के नाम पर पड़ा माना जाता है। माना जाता है कि गाजियाबाद 1740 में मुगल वजीर ग़ाज़ी-उद्-दीन खान ने बसाया था। इस शहर को यूपी का एंट्री गेट भी माना जाता है। एक समय था जब यह शहर 4 गेटों के बीच बसा हुआ था। सिहानी गेट, डासना गेट, दिल्ली गेट और जवाहर गेट।

लोकसभा सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आ गाजियाबाद लोकसभा सीट काफी नई है. अभी तक यहां पर दो बार ही चुनाव हुआ है पहला 2009 और फिर 2014. ये सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद ही अस्तित्व में आई. साल 2008 से पहले तक यह लोकसभा क्षेत्र हा‍पुड़ लोकसभा सीट का का हिस्सा थी. पहली बार 2009 में जब यहां से चुनाव हुए तो मौजूदा केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रह चुके राजनाथ सिंह ने यहां से बड़े अंतर से चुनाव जीता था. लेकिन 2014 में राजनाथ सिंह लखनऊ चले गए और ये सीट वीके सिंह को मिली. हालांकि, चुनाव से पहले वीके सिंह को टिकट दिए जाने का काफी विरोध हुआ था.

समीकरण वोटरों की संख्या के हिसाब से देखें तो गाजियाबाद प्रदेश की बड़ी लोकसभा सीटों में से गिनी जाती है. इस सीट पर SC समुदाय की आबादी- 13.7 फीसदी, ST की आबादी 0.2 फीसदी है। वहीं हिंदुओं की आबादी 82.5 फीसदी, मुस्लिम आबादी 14.18 फीसदी है।

वोटर मतदाताओं की संख्या 26,56,779 लाख है। पुरुष मतदाताओं की संख्या 14,80,510 है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 11,76,108 है। 18 से 19 साल की आयु वाले पहली बार वोट करने वालों की संख्या 51,685 है। 2014 में यहां पर 56.94 फीसदी ही मतदान हुआ था।

विधानसभा सीटें गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें लोनी, मुरादनगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद और धोलाना जैसी सीटें शामिल हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ धोलाना सीट BSP के खाते में गई थी, जबकि अन्य सभी 4 सीटों पर BJP का कब्जा था।

स्थानीय मुद्दे

  1. प्रदूषण में समस्या से जूझ रहा है शहर
  2. नागरिकों को नहीं मिल पा रहा भरपूर पानी
  3. कूड़ा निस्तारण न होना सबसे बड़ी समस्या
  4. जाम से घिरा रहता है शहर

मुख्य उम्मीदवार

  • जनरल वीके सिंह (रि.)- सेना प्रमुख रह चुके वीके सिंह ने 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले ही भारतीय जनता पार्टी में एंट्री मारी थी। 2010 से लेकर 2012 तक वह सेना प्रमुख रहे, हालांकि यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में उनकी उम्र को लेकर काफी बड़ा विवाद छिड़ा था। 2014 में गाजियाबाद से बड़ी जीत हासिल करने का ईनाम वीके सिंह को केंद्र सरकार में मंत्री बनकर मिला। वीके सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार रहे राजबब्बर को करीब 5 लाख से भी अधिक वोटों से हराया था। 2014 से ही वह विदेश राज्य मंत्री के पद पर हैं, सीरिया-इराक जैसे देशों में मुश्किल समय में भारतीयों को निकालने में वीके सिंह ने काफी अहम भूमिका निभाई थी। मंत्री पद पर रहने के बाद वीके सिंह अपने बयानों के कारण चर्चा में भी रहे थे।
  • सुरेश बंसल- लोकसभा चुनाव 2019 के लिए समाजवादी पार्टी ने गाजियाबाद लोकसभा सीट से पूर्व में घोषित अपने उम्मीदवार सुरेंद्र