दीपावली का इतिहास और महत्व

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दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधि से बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपों की पंक्ति। भारतवर्ष में मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं।

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दीपावली कैसे शुरु हुई, अलग-अलग मान्यताएं

पौराणिक

  • भगवान राम का चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटना- त्रेतायुग में भगवान राम रावण को हराकर और चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या वापस लौटे तब अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए, यह थी भारतवर्ष की पहली दीपावली।

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* जिस दिन श्री राम अयोध्या लौटे, उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी अर्थात आकाश में चाँद बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऐसे माहौल में अयोध्यावासियों ने भगवान राम के स्वागत में पूरी अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो धरती पर ही सितारों को उतार दिया। तभी से दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज भी दीपावली के दिन भगवान राम, लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अपनी वनवास स्थली चित्रकूट में विचरण कर श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। यही कारण है कि दीपावली के दिन लाखों श्रद्धालु चित्रकूट में मंदाकिनी नदी में डुबकी लगाकर कामद्गिरि की परिक्रमा करते हैं और दीप दान करते हैं।

  • कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाई थीं।

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* दक्षिण में, दीपावली त्‍यौहार अक्‍सर नरकासुर, जो असम का एक शक्तिशाली राजा था, और जिसने हजारों निवासियों को कैद कर लिया था, पर विजय की स्‍मृति में मनाया जाता है। ये श्री कृष्‍ण ही थे, जिन्‍होंने अंत में नरकासुर का दमन किया व कैदियों को स्‍वतंत्रता दिलाई। इस घटना की स्‍मृति में प्रायद्वीपीय भारत के लोग सूर्योदय से पहले उठ जाते हैं, व कुमकुम अथवा हल्‍दी के तेल में मिलाकर नकली रक्‍त बनाते हैं। राक्षस के प्रतीक के रूप में एक कड़वे फल को अपने पैरों से कुचलकर वे विजयोल्‍लास के साथ रक्‍त को अपने मस्‍तक के अग्रभाग पर लगाते हैं। तब वे धर्म-विधि के साथ तैल स्‍नान करते हैं, स्‍वयं पर चन्‍दन का टीका लगाते हैं।

  • हिरण्यकश्यप वध- एक पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था।

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* दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद की विष्णु भक्ति से अप्रसन्न हो उसे जान से मारना चाहा। इसके लिए उसने अनेक उपाय किए पर उसे सफलता नहीं मिल पाई तब वह कुपित हो खड्ग उठा कर उसे स्वयं ही मारने चला। दैत्यराज को वरदान प्राप्त था कि उनकी मृत्यु ने दिन में होगी न रात में, न घर में होगी न बाहर, न अस्त्रा से होगी न शस्त्रा से। इसी वजह से वे स्वयं को अमर समझता था। कार्तिक अमावस्या के सायंकाल का समय था। विष्णु भक्त प्रहलाद खम्भे से बंधा हुआ था। जब दैत्यराज ने खड्ग से प्रहार किया। तो भयंकर गर्जना के साथ खम्भा टूट गया और भगवान नरसिंह का प्रादुर्भाव हुआ। शीश सिंह के समान और शेष शरीर मानव जैसा। न पूरा मानव, न पूरा पशु, न अस्त्र न शस्त्र। भगवान नरसिंह ने केवल अपने नख से दैत्यराज का वध कर डाला। दैत्यराज की मृत्यु पर प्रजा ने घी के दिए जलाकर दीवाली मनाई थी।

  • समुद्रमंथन से लक्ष्मी व कुबेर का प्रकट होना- इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। एक पौराणिक मान्यता है कि दीपावली के दिन ही माता लक्ष्मी दूध के सागर, जिसे केसर सागर के नाम से जाना जाता है, से उत्पन्न हुई थीं। माता ने सम्पूर्ण जगत के प्राणियों को सुख-समृद्धि का वरदान दिया और उनका उत्थान किया। इसलिए दीपावली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऎसा माना जाता है कि श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजन करने से माता लक्ष्मी अपने भक्तजनों पर प्रसन्न होती हैं और उन्हें धन-वैभव से परिपूर्ण कर मनवांछित फल प्रदान करती हैं।

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* दीपावली के संबंध में एक प्रसिद्ध मान्यतानुसार मूलत: यह यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग- बिरंगी आतिशबाजी, लज़ीज़ पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ़ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में भौव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया है।

  • महाकाली की पूजा- राक्षसों का वध करने के लिए माँ देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

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  • राजा बलि और वामन अवतार- महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रूप में माँगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएँगे।

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  • युद्धिधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ- महाराज धर्मराज युद्धिधिष्ठिर ने इसी दिन राजसूय यज्ञ किया था। अतएव दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

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ईसा-पूर्व (BC) की दीपावली

मोहनजोदड़ो सभ्यता की दीपावली

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सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी। मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।

बौद्ध धर्म की दीपावली

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बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध जब 17 वर्ष बाद अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिल वस्तु लौटे तो उनके स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। साथ ही महात्मा बुद्ध ने अपने प्रथम प्रवचन के दौरान `अप्पों दीपो भव´ का उपदेश देकर दीपावली को नया आयाम प्रदान किया था।

जैन धर्म की दीपावली

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जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत्‌ इसके दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं। दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर-निर्वाण के साथ जो अन्तर्ज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएँ।

मौर्य साम्राज्य की की दीपावली

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ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्‍य के अर्थशास्त्र के अनुसार आमजन कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे। साथ ही मशालें लेकर नाचते थे और पशुओं खासकर भैंसों और सांडो की सवारी निकालते थे।

सम्राट अशोक की दीपावली

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मौर्य राजवंश के सबसे चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने दिग्विजय का अभियान इसी दिन प्रारम्भ किया था। इसी खुशी में दीपदान किया गया था।

गुप्त वंश की दीपावली

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मौर्य वंश के पतन के बाद गुप्त वंश की दीपावली- सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ईसा से 269 वर्ष पूर्व दीपावली के ही दिन तीन लाख शकों व हूणों को युद्ध में खदेड़ कर परास्त किया था। जिसकी खुशी में उनके राज्य के लोगों ने असंख्य दीप जला कर जश्न मनाया था।

सम्राट समुद्र गुप्त, अशोकादित्य, प्रियदरर्शन ने अपनी दिग्विजय की घोषणा दीपावली के ही दिन की थी।

सम्राट विक्रमादित्य की दीपावली 57 ईपू

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विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए दीप जलाकर खुशियाँ मनाई गईं।

ईसा-बाद (AD) की दीपावली

सिखों की दीपावली

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सिखों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। और इसके अलावा 1618 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को बादशाह जहाँगीर की कैद से जेल से रिहा किया गया था।

मुगलकाल में दीपावली

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  • बाबर प्रकाश की जगमग और उल्लास भरे दीपावली के पर्व ने मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर को भी आकर्षित किया। बाबर ने दीवाली के त्योहार को ‘एक खुशी का मौका’ के तौर पर मान्यता प्रदान की।
  • हुमायूं बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को भी दीवाली के जश्न में शामिल होने की प्रेरणा दी। बाबर के उत्तराधिकारी के रूप में हुमायूं ने इस परंपरा को न केवल अक्षुण्ण रखा, अपितु इसे व्यक्तिगत रुचि से और आगे बढ़ाया। हुमायूं के शासन-काल में दीवाली के मौके पर पूरे राजमहल को झिलमिलाते दीपों से सजाया जाता था और आतिशबाजी की जाती थी। हुमायूं खुद दीवाली उत्सव में शरीक होकर शहर में रोशनी देखने निकला करते थे। हुमायूं – ‘तुलादान’ की हिंदू परंपरा में भी रुचि रखते थे।
  • अकबर- मुगल-सल्तनत के तीसरे उत्तराधिकारी को इतिहास अकबर महान के नाम से जानता है। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर द्वारा सभी हिन्दू त्योहारों को पूर्ण मनोयोग और उल्लास के साथ राजकीय तौर पर मनाया जाता था। दीवाली अकबर का खास पसंदीदा त्योहार था। अबुल फजल द्वारा लिखित आईने अकबरी में उल्लेख मिलता है कि दीवाली के दिन किले के महलों व शहर के चप्पे-चप्पे पर घी के दीपक जलाए जाते थे। अकबर के दौलतखाने के बाहर एक चालीस गज का दीपस्तंभ टांगा जाता था, जिस पर विशाल दीपज्योति प्रज्जवलित की जाती थी। इसे ‘आकाशदीप’ के नाम से पुकारा जाता था। दीवाली के अगले दिन सम्राट अकबर गोवर्धन पूजा में शिरकत करते थे। इस दिन वह हिन्दू वेशभूषा धारण करते तथा सुंदर रंगों और विभिन्न आभूषणों से सजी गायों का मुआयना कर ग्वालों को ईनाम देते थे।
  • जहाँगीर- अकबर के बाद मुगल सल्तनत की दीवाली परंपरा उतनी मजबूत न रही, मगर फिर भी अकबर के वारिस जहांगीर ने दीवाली को राजदरबार में मनाना जारी रखा। जहांगीर दीवाली के दिन को शुभ मानकर चौसर अवश्य खेला करते थे। राजमहल और निवास को विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता था और जहांगीर रात्रि के समय अपनी बेगम के साथ आतिशबाजी का आनंद लेते थे।
  • शाहजहां- मुगल बादशाह शाहजहां जितनी शानोशौकत के साथ ईद को मनाते थे उसी तरह दीपावली का त्यौहार भी मनाते थे। बादशाह शाहजहां दीपावली पर्व पर यहां स्थित किले को रोशनी कर सजाते थे तथा किले के अंदर स्थित मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती थी। शाहजहां अपने दरबारियों, सैनिकों और जनता में इस अवसर पर मिठाई बंटवाते थे। उनके बेटे दारा शिकोह ने भी दीवाली परंपरा को जीवित रखा। दारा शिकोह इस त्योहार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते और अपने नौकरों को बख्शीश बांटते थे। उनकी शाही सवारी रात्रि के समय शहर की रोशनी देखने निकलती थी। पुस्तक ‘ तुजुके जहांगीरी ‘ में इस दीपावली पर्व की भव्यता और रौनक का विस्तृत वर्णन किया गया है।
  • बहादुर शाह जफर- मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर का दीवाली मनाने का निराला ही अंदाज था। जफर की दीवाली तीन दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। दीवाली के दिन वे तराजू के एक पलड़े में बैठते और दूसरा पलड़ा सोने-चांदी से भर दिया जाता था। तुलादान के बाद यह सब गरीबों को दान कर दिया जाता था। तुलादान की रस्म-अदायगी के बाद किले पर रोशनी की जाती थी। कहार खील-बतीशे, खांड और मिट्टी के खिलौने घर-घर जाकर बांटते। गोवर्धन पूजा के दिन नागरिक अपने गाय-बैलों को मेंहदी लगाकर और उनके गले में शंख और घुंघरू बांधकर जफर के सामने पेश करते। जफर उन्हे इनाम देते व मिठाई खिलाते थे।

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पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली।

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आर्य समाज की स्‍थापना के रूप में- इस दिन आर्य समाज के संस्‍थापक महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया था। इसके अलावा मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा दीप जलाकर लटकाया जाता है। वहीं शाह आलम द्वितीय के समय में पूरे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था इस मौके पर हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर पूरे हर्ष और उल्‍लास के साथ त्‍योहार मनाते थे।

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नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।

भारत के विभिन्न राज्यों में दीपावली को विभिन्न रूपों मे मनाया जाता है

  • गुजरात में नमक को साक्षात लक्ष्मी का प्रतीक मान दीपावली के दिन नमक खरीदना व बेचना शुभ माना जाता है
  • राजस्थान में दीपावली के दिन घर में एक कमरे को सजाकर व रेशम के गद्दे बिछाकर मेहमानों की तरह बिल्ली का स्वागत किया जाता है। बिल्ली के समक्ष खाने हेतु तमाम मिठाइयाँ व खीर इत्यादि रख दी जाती हैं। यदि इस दिन बिल्ली सारी खीर खा जाए तो इसे वर्ष भर के लिए शुभ व साक्षात लक्ष्मी का आगमन माना जाता है।
  • उत्तरांचल के थारू आदिवासी अपने मृत पूर्वजों के साथ दीपावली मनाते हैं
  • हिमाचल प्रदेश में कुछ आदिवासी जातियाँ इस दिन यक्ष पूजा करती हैं।
  • पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में दीपावली को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अत: इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यहाँ पर यह तथ्य गौर करने लायक है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है, वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।
  • मध्य प्रदेश- दीवाली को जश्न-ए-चिराग के रूप में मनाते है मालवा के मुस्लिम… मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय दीपावली को जश्न-ए-चिराग के रूप में मनाता है। इस अंचल में मुस्लिम समाज द्वारा दीपावली पर्व मनाए जाने की प्राचीन परम्परा आज भी कायम है। इस पर्व को उमंग और उल्लास के परम्परागत तरीके से मनाने वाले रूस्तम खान पठान ने कहा कि यहां दीपावली को अमन , भाईचारे एवं सद्भाव के साथ मनाने की पुरानी परम्परा रही है। उन्होंने बताया कि मुगल बादशाह शाहजहां , दीपावली पर्व पर यहां स्थित किले को रोशनी कर सजाते थे और किले के अंदर स्थित मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती थी। उन्होंने कहा कि उदारवादी व समन्वयकारी मुगल शासक अकबर ने दीपावली पर्व मनाने की मुगलिया परम्परा का आगाज किया था। पवित्र त्योहार ईद और रमजान की तरह दीपों का यह पर्व भी मुस्लिम समुदाय द्वारा घरों की साफ-सफाई के साथ मनाया जाता है।

साईं बाबा ने दीपावली पर पानी से दिए जलाए

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साईं बाबा संध्या समय गाँव में जा कर दुकानदारों से भिक्षा में तेल मांगते और मस्जिद में दिए जलाया करते थे दिवाली के दिन साईं बाबा गाँव के दुकानदारों से तेल मांगने गए लेकिन वाणी (तेल देने वालों) ने तेल देने से मना कर दिया | सभी दुकानदारों ने आपस में यह निश्चित किया था की वह बाबा को भिक्षा में तेल न दे कर अपना महत्व दर्शाएंगे |

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अहंकार से भरकर उन्होंने यह भी कहा की देखते है बाबा! आज किस प्रकार मस्जिद में दिए जलाते है? अत: बाबा को खाली हाथ ही मस्जिद में लौटना पड़ा |

साईं बाबा के मस्जिद खाली हाथ लौटने पर उनके शिष्यों को बड़ी निराशा हुई|  गांव का प्रत्येक दुकानदार यही कहता है कि आज तो उसके पास अपने घर में जलाने के लिए भी तेल की एक बूंद भी नहीं है|

साईं बाबा ने मस्जिद के अंदर बने कुएं पर जाकर कुएं में से एक घड़ा पानी भरकर खींचा| भक्त चुपचाप खड़े उनको यह सब करते देखते रहे| साईं बाबा ने अपने डिब्बे, जिसमें वह तेल मांगकर लाया करते थे, उसमें से बचे हुए तेल की बूंदे उस घड़े के पानी में डालीं और घड़े के उस पानी को दीयों में भर दिया| फिर रूई की बत्तियां बनाकर उन दीयों में डाल दीं और फिर बत्तियां जला दीं| सारे दिये जगमग कर जल उठे| यह देखकर शिष्यों और भक्तों की हैरानी का ठिकाना न रहा|साईं बाबा के शिरडी में आने के बाद में शिरडी और आस-पास के मुसलमान हिन्दुओं के साथ दीपावली का त्यौहार बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाने लगे थे|

इस चमत्कार को शिरडी वालों ने अपनी आंखों से देखा। इसके दीपक और दिवाली पर्व का त्यौहार साई बाबा ने मनाना शुरू किया। उसी के बाद से दिवाली मनाने का प्रचलन बढ़ा। साई भक्त दिवाली के दिन भगवान का पूजन कर उनकी आरती करते आ रहे है।

पहला दिन- धनतेरस

  • धनतेरस पूजन से मिलता है अकाल मृत्यु से छुटकारा

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यमराजमृत्यु के देवता की प्रार्थना की जाती है, जिन्हें मृत्यु का देवता कहा जाता है और असमय मौत से बचने के लिए उनकी प्रार्थना की जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रियोदशी पर घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपदान करना चाहिए। जिससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।

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यमराज के नागपाश से बदल डाली राजा हेम की मृत्यूरेखा

  • राजा हेम की राशि में लिखी थी शादी की चौथी रात को मौत
  • नागराज आएगें डसने ले जाएगें यमराज
  • मौत के देव यमराज के कब्जे से छुड़ा लाई हेमारानी
  • धनतेरस पूजन से मिलता है अकाल मृत्यु से छुटकारा

एक बार यमराज ने अपने दूतों से प्रश्न पूछा कि क्या जीवों के प्राण लेते समय तुम्हें किसी पर दया आती है। इस प्रश्न पर यमदूतों ने कहा कि नहीं, हम तो केवल आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। यमराज ने दुबार पूछा कि निर्भय होकर प्रश्न का उत्तर दो। तब यमदूतों ने बताया कि एक बार हमारा हृदय कांप उठा था। यमदूतों ने बताया कि एक बार राजा हेम की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन ज्योतिषियों ने बताया कि बालक विवाह के चार दिन बाद मर जाएगा। यह सुनने के बाद राजा हेम ने स्त्रियों के सान्ध्यि से बालक को बचाने के लिए उसे एक गुफा में ब्रह्माचारी रूप में रखा।

कुछ समय पश्चात राजा हंस की बेटी यमुना के तट पर पहुंच गई और उस बालक ने उससे गंधर्व विवाह कर लिया। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। विवाह के चौथे दिन वह राजकुमार मृत्यु को प्राप्त हुआ। उन दोनों की जोड़ी अत्यंत खूबसुरत थी और वे दोनों कामदेव और रति से किसी भी प्रकार कम नहीं थे। अत्यंत दुखी मन से यमदूतों ने यमराज से कहा कि उस राजकुमारी का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय कांप गया। यह कहानी सुनकर यमराज अत्यंत दुखी हुए। तभी एक यमदूत ने यमराज से अकाल मृत्यु से बचने का उपाय पूछा। यमराज ने कहा- धनतेरस के पूजन व दीपदान को विधिपूर्वक करने से अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलता है। जिस घर में यह पूजन होता है, वहां अकाल मृत्यु का भय पास भी नहीं फटकता। इसी घटना से धनतेरस के दिन धन्वन्तरि पूजन सहित दीपदान की प्रथा का प्रचलन शुरू हआ।

यम दीपदान करके मृत्यु के भय से मुक्ति

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  • यमराज को करो खुश
  • दक्षिण दिशा की प्रार्थना करके
  • चमत्कारी मंत्र का मनोरथ पाऐं
  • तेरस के सांयकाल किसी पात्र में तिल के तेल से युक्त दीपक प्रज्वलित करें।
  • पश्चात गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें
  • दक्षिण दिशा की ओर मुंह करें

यम का चमत्कारी मंत्र पढें

       मृत्युना दंडपाशाभ्याम कालेन श्यामाहा सहा।

       त्रयोदश्यां दीपदानात सूर्यज: प्रयतां मम।

  • अब इन दीपकों को सार्वजनिक स्थलों को प्रकाशित करें
  • एक अखंड दीपक घर के प्रमुख द्वार की देहरी पर अन्न बिछाकर उस पर रखें।

यमराज पूजन

  • आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखें।
  • रात को घर की स्त्रियां दीपक में तेल डालकर चार बत्तियां जलाएं।
  • जल, रोली, चावल, फूल, नैवेद्य, गुड़ आदि सहित दीपक जलाकर यम पूजन करें।

शुभ संयोग : करें कुबेर को खुश

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श्री योग का विलक्षण संयोग

कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी गुरुवार को धनतेरस पर एक साथ होने वाली विशेष तिथियों के कारण श्री योग का संयोग भी बन रहा है जो धनलक्ष्मी के साथ ही सुख-समृद्धि लाने वाला है। धनतेरस के दिन बर्तन,आभूषण सहित अन्य स्थाई वस्तुओं की खरीदी शुभ मानी जाती है। ज्योतिषाचार्य पं.प्रहलाद कुमार पण्ड्या के अनुसार धनतेरस के दिन सोने और चांदी के आभूषणों के अलावा बर्तन, भूमि, भवन आदि के साथ ही सभी वस्तुओं की खरीदी शुभ मानी जाती है। ये वस्तुएँ वर्षभर लाभकारी होती हैं। सायंकाल में यम पूजा के साथ ही दीपदान तथा स्थाई संपत्ति, तिजोरी आदि की पूजा का विधान है। इस दिन समृद्धि की देवी लक्ष्मी, धनदेव कुबेर और वैदिक देवनारायण इन्द्र की पूजा-अर्चना होती है।

ऐसे करें कुबेर को खुश
– शुद्ध होवें। पूर्व दिशा में मुख रखकर आसन बिछाएँ।
– लकड़ी के पटा में पीला या लाल कपड़ा बिछाएँ।
– कलश जलाएँ। घी का दीपक जलाएँ।
– पृथ्वी और कलश का पूजन करें।
– पूजन में हो सके तो चार कौड़ियों को विशेष रूप से रखें।
– भगवान गणपति का ध्यान कर पंचामृत से अभिषेक करें।
– कुबेर यंत्र और भगवान धनवंतरी का चित्र पूजन में रखें।
– धना और गुड़ अर्पण करें।
– सोना-चांदी के सिक्के, आभूषण धोकर पवित्र जल से स्नान करें।
– काँसा या पीतल में आभूषण रखकर कुमकुम, सिंदूर, अक्षत से पूजन करें।
– ॐ गं गणपतयै नमः का जाप करें। (5 बार)
– ॐ श्री कुबेराय नमः और ॐ श्री महालक्ष्मयै नमः का जाप 108 बार कमलगट्टा या तुलसी की माला से करें। घर में स्वास्तिक चिन्ह बनाएं।

दूसरा दिन- 3 त्यौहार के संग आती है छोटी दीपावली

  • रूप चतुर्दशी :- सौंदर्य सिद्धी दिवस
  • नरक चौदस :- नरक से मुक्ति के लिए दीप-दान
  • काली चतुर्दशी :- गुजरात में कालि चौदस  पर बलिप्रथा

इस दिन का पौराणिक महत्व

  • वामन अवतार लेकर राजा बलि से पृथ्वी-आकाश-पाताल को तीन पगों में नाप लिया
  • श्रीकृष्ण-सत्यभामा ने नरकासुर को मारकर पृथ्वी का कल्याण किया
  • हनुमानजी का जन्म लेकर कार्तिक मास पावन किया

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नरक चौदस: नरकासुर वध कथा  

विष्णु पुराण में नरकासुर वध की कथा का उल्लेख मिलता है। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को सागर से निकाला था। द्वापर युग में भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। अत्यंत क्रूर असुर होने के कारण उसका नाम नरका सुर पड़ा।

प्रागज्योतिषपुर का राजा बना और उसने देवताओं और मनुष्यों को बहुत तंग कर रखा था। उसने गंधर्वों और देवों की सोलह हजार अप्सराओं को नरकासुर ने अपने अंत:पुर में कैद किया। नरकासुर एक बार अदिति के कर्णाभूषण उठाकर भाग गया। इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर की नगरी पर अपनी पत्नी सत्यभामा और साथी सैनिकों के साथ भयंकर आक्रमण किया।

इस युद्ध में उन्होंने मुर, हयग्रीव और पंचजन आदि राक्षसों का संहार करने के बाद कृष्ण ने लड़ते-लड़ते थक कर क्षण भर को अपनी आँखें बन्द कर ली तो नरकासुर ने हाथी का रूप धारण कर लिया।सत्यभामा ने उस असुर से लोहा लिया और नरकासुर का वध किया।

श्रीकृष्ण ने वध के बाद किया था,  और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को राक्षसों के चंगुल से छुड़ाया था। इसलिए भी यह त्योहार मनाया जाता है। इसलिए इस त्योहार का नाम नरक चौदस पड़ा।

यमराज की प्रार्थना का दिन

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहकर अकाल मृत्यु के निवारण और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए यमराज की प्रार्थना का दिन माना गया है। चौमासे की बीमारियों से बचकर शरीर और त्वचा के स्वास्थ्य के लिए “स्नेहक” यानी चिकने पदार्थो का प्रयोग शुरू करते समय आप मृत्यु के देवता यमराज से प्रार्थना करें कि हम रोग और अकाल मृत्यु के ग्रास न हों यह स्वाभाविक ही है।इस चौदस के दिन यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैनस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दग्ध, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त- इन चौदह नामों से प्रत्येक बार एक अंजलि जल छोड़ते हुए जो यमराज का तर्पण करते हैं, उन्हें कभी अकाल मृत्यु प्राप्त नहीं होती, ऎसा मंत्रशास्त्रीय प्रयोग भी मिलता है।

नरक से मुक्ति के लिए दीप-दान

  • पुराणों में नरककुंडों की संख्या 86 मानी गई है
  • नरक चतुर्दशी इन्हीं नरक कुंडों से ही तो सावधान करती है।
  • नरकासुर आसुरी नरक कुंडों का प्रतीक है।
  • जहां दुष्टों को कई तरह की यातनाएं दी जाती हैं उसे नरक कुंड कहते हैं।
  • धर्म से विमुख होना,अनाचार,वासनाएं ही नरक कुंड हैं।
  • देवी तत्व दर्शन में कई किस्म के नरक कुंड बताए गए हैं।
  • अहं पालने वाला अग्नि कुंड में जाता है।
  • इसलिए छोटी दीवाली अर्थात नरक चौदस को घर को साफ-सुथरा रखा जाता है।

नरक मुक्ति का जादूई टोटका

  • इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने सिर के ऊपर से एक लंबा घीया (कद्‌दू) को वार कर नरक से बचाने की भगवान सूर्य से प्रार्थना करते हैं।

वामन अवतार और राजा बलि की कथा

राजा बलि अत्यंत पराक्रमी और महादानी था। देवराज इंद्र उससे डरते थे। उन्हें भय था कि कहीं वह उनका राज्य न ले ले। इसीलिए उन्होंने उससे रक्षा की भगवान विष्णु से गुहार लगाई। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धर कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांग ली और उसे पाताल लोक का राजा बना कर पाताल भेज दिया।दक्षिण भारत में मान्यता है कि ओणम के दिन हर वर्ष राजा बलि आकर अपने पुराने राज्य को देखता है। विष्णु भगवान की पूजा के साथ-साथ राजा बलि की पूजा भी की जाती है। नरक चौदस के दिन दीपक जलाने से वामन भगवान खुश होते हैं तथा मनचाहा वरदान देते हैं।

रूप चतुर्दशी

Picture17दीपावली पर दीपों से कैसे सजाएँ घर

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दीपावली पर रंगोली से सजाएँ घर-आंगन

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तीसरा दिन- दीपावली पर पूजन

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दीपावली पूजा पर राशि अनुसार किस रंग के कपड़े पहनें

इस दीपावली आप अपने कपड़ों से लक्ष्मी को खुश कर सकते हैं और अपने घर आने को मजबुर कर सकते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब आप लक्ष्मी पूजा में राशि अनुसार कपड़े पहनें। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूजा पाठ के साथ ही हमारे कपड़ों और सफलता में बहुत गहरा संबंध है। राशि अनुसार रंगों के कपड़े पहनने से हमें अपने कार्यों में सफलता मिलने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। अगर राशि अनुसार कपड़े पहनें तो आपको पूजा का पूरा फल मिलेगा।

जानें किस राशि के लोग कैसे कपड़ें पहनें-

मेष और वृश्चिक- मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है और इस राशि के स्वामी का प्रिय रंग लाल है।  इसलिए इन राशि के लोग धन पाने के लिए लक्ष्मी पूजा करते वक्त लाल रंग या लाल रंग से संबंधित शेड वाले कपड़े पहनें।

वृष और तुला- वृष और तुला का ग्रह स्वामी शुक्र है इसका प्रिय रंग सफेद है इसलिए इन राशि वाले लोगों को अधिक से अधिक सफेद रंग की ड्रेस पहनना चाहिए और लक्ष्मी पूजा के लिए तो इस रंग को न भूलें। इसके साथ ही इस राशि वालों को हल्के शेड्स के कपड़े पहनना चाहिए।

मिथुन और कन्या- यह दोनों राशियां बुध ग्रह की हैं। बुध का प्रिय रंग हरा है। अगर इस राशि के लोग लक्ष्मी पूजा के समय हरे रंग के कपड़े या इससे संबंधित शेड पहने तो लक्ष्मी आपके घर से कहीं नहीं जाएगी।

कर्क- कर्क राशि के स्वामी चंद्र का प्रिय रंग सफेद होता है और ज्योतिष में बनने वाले धन योग में चंद्रमा का बहुुत बड़ा रोल है। इसलिए कर्क राशि के लोग अपने घर लक्ष्मी बुलाने के लिए इस रंग का उपयोग करें।

सिंह- अगर इस दीपावली पर सिंह राशि के लोग पीले और सुनहरे रंगों के कपडा़े पर ज्यादा ध्यान दे तो पैसा ही पैसा आएगा।

धनु और मीन- धनु और मीन राशि का ग्रह स्वामी गुरु है और इसका प्रिय रंग पीला है। अत: इस राशि के लोगों को पूजा में पीले रंग के परिधान पहनना चाहिए। इससे सफलता की काफी संभावना बढ़ जाती है।

मकर और कुम्भ- मकर और कुंभ राशि का स्वामी शनि है और शनि का प्रिय रंग नीला और गहरे रंग हैं। अत: इन राशि के लोगों को लक्ष्मी पूजा करते समय बैंगनी या नीले रंग के कपड़े पहनना चाहिए।

दीपावली पर राशि अनुसार कैसे आसन पर बैठना चाहिए…

दीपावली पर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजन अर्चन किया जाता है। ऐसा माना जाता है इस दिन मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होने पर सालभर घर में पैसों से जुड़ी कोई समस्या नहीं रहती है। इसके साथ ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए कई नियम बताए गए हैं। इन्हीं नियमों में से एक हैं कि आपका आसन पवित्र और पूजन के लिए श्रेष्ठ होना चाहिए। ज्योतिष में सभी राशियों के अनुसार कैसे आसन का प्रयोग करना चाहिए, जानिए…

लक्ष्मीजी के पूजन में आसन का प्रयोग भी महत्वपूर्ण होता हैं। राशिनुसार आप कैसे रंग के आसन का प्रयोग करें जानिए

– मेष एवं मंगल राशि वालों को केसरी या लाल ऊनी आसन श्रेष्ठ रहता है।
– वृषभ एवं शुक्र वालों को सफेद ऊनी आसन का उपयोग करना चाहिए।
– मिथुन एवं कन्या राशि के लोगों को हरा ऊनी आसन पूजन में उपयोग करना चाहिए।
– कर्क राशि के लोगों को सफेद रंग का आसन पूजा के समय प्रयोग किया जाना चाहिए।
– सिंह राशि वालों को लाल रंग के आसन का उपयोग करना चाहिए।
– मकर एवं कुंभ राशि के लोगों को काले अथवा नीले आसन का प्रयोग करना उचित होगा।
– धनु एवं मीन को पीले रंग के आसन का प्रयोग करना चाहिए।

अगर किसी व्यक्ति को राशि अनुसार बताए गए आसन न मिले तो वे कुश के आसन का प्रयोग ही करें।

131 साल बाद विशेष दुर्लभ योग, दीपावली लाएगी सुख-समृद्धि

दीपावली पर रहेगा त्रिकोण योग, वैभव और समृद्धि का होगा वास – धन की देवी मां लक्ष्मी का पर्व दीपावली इस बार विशेष दुर्लभ योग में पड़ेगी। इस योग में गुरु और राहु के साथ रहते हुए सौभाग्य, बुधादित्य और धाता योग बनेगा। ज्योतिष शास्त्र में इन तीन योगों को मां लक्ष्मी के पूजन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इसकी वजह से 11 नवंबर के दिन पड़ने वाली दीपावली लोगों के जीवन में सुख-समृद्धि लाएगी।

ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश सोनी के अनुसार वर्तमान में गुरु, सिंह राशि और राहु, कन्या राशि में भ्रमणरत है। दीपावली पर विशाखा नक्षत्र में इन दोनों के साथ सौभाग्य, बुधादित्य और धाता योग बन रहा है। इन योगों में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

इससे पहले 1884 में बना था

  • इससे पहले यह योग 1884 में बना था। इस दीपावली के बाद अब यह योग वर्ष 2145 में बनेगा। इस योग के कारण लक्ष्मी प्राप्ति के लिए किए गए कार्य एवं उपायों से सफलता मिलती है।ये योग भी रहेंगे
  • सौभाग्य योग – लक्ष्मी सौभाग्य का कारक हैं और सौभाग्य योग में दीपावली पड़ने से यह अधिक शुभ होगी
  • बुधादित्य योग – सूर्य और बुध के साथ युति बनने पर बुधादित्य योग बनता है। यह योग राजयोग कहलाता है। इस योग में किसी भी कार्य को करने से श्रेष्ठता प्राप्त होती है।
  • धाता योग – धाता योग को सौभाग्य और बुधादित्य योग का पूरक माना गया है।

ये रहेगा राशि पर प्रभाव
मेष – कार्य क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलेगी, भूमि लाभ।

वृषभ – अचानक यात्रा का योग।
मिथुन – अधिकारियों से लाभ मिलेगा, करियर के क्षेत्र में अच्छे अवसर मिलेंगे।
कर्क – अविवाहित को विवाह प्रस्ताव मिलेंगे।
सिंह – संचार से जुड़े उपकरण की खरीद के योग बनेंगे।
कन्या – किसी पुराने व्यक्ति से मुलाकात होगी।
तुला – यश बढ़ेगा, सफलता मिलेगी।
वृश्चिक – किसमत का साथ होगा, रुके कार्य में उन्न्ति मिलेगी।
धनु – नई योजना के क्रियान्वयन में सफलता मिलेगी।
मकर – कार्य में पदोन्न्ति मिलेगी।
कुंभ – नई ऊर्जा का संचार होगा।
मीन – उन्न्ति के अवसर मिलेंगे।

दीपावली पर पूजन कैसे करें

दीपावली पर पूजन के लिए सामग्री

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महालक्ष्मी पूजन में केसर, रोली, चावल, पान का पत्ता, सुपारी, फल, फूल, दूध, खील, बतासे, सिन्दूर, सूखे मेवे, मिठाई, दही गंगाजल धूप, अगरबत्ती दीपक रुई, कलावा, नारियल और कलश के लिए एक ताम्बे का पात्र चाहिए.

कैसे करें दीपावली पर पूजन की तैयारी

1.एक थाल में या भूमि को शुद्ध करके नवग्रह बनाएं या नवग्रह का यंत्र स्थापित करें. इसके साथ ही एक ताम्बे का कलश रखें, जिसमें गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, सिक्के और लौंग आदि डालकर उसे लाल कपड़े से ढक कर उसपर एक कच्चा नारियल कलावे से बांध कर रख दें.

  1. जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया है, वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी-गणेश सरस्वती या ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवी देवताओं की मूर्तियां या चित्र सजायें.
  1. कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रूप मानकर दूध, दही और गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फल-फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने ओर एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है.
  1. दीवाली के दिन की विशेषता लक्ष्मी जी के पूजन से संबन्धित है. इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी जी के पूजन के रूप में उनका स्वागत किया जाता है. दीवाली के दिन जहां गृहस्थ और कारोबारी धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि और धन की कामना करते हैं, वहीं साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिए रात्रिकाल में अपने तांत्रिक कर्म करते हैं.

दीपावली पर पूजा का विधान

  1. घर के बड़े-बुजुर्गों को या नित्य पूजा-पाठ करने वालों को महालक्ष्मी पूजन के लिए व्रत रखना चाहिए. घर के सभी सदस्यों को महालक्ष्मी पूजन के समय घर से बाहर नहीं जाना चाहिए. सदस्य स्नान करके पवित्र आसन पर बैठकर आचमन, प्राणायाम करके स्वस्ति वाचन करें. फिर गणेशजी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, द्रव्य और जल आदि लेकर दीपावली महोत्सव के निमित्त गणेश, अम्बिका, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, कुबेर आदि देवी-देवताओं के पूजनार्थ संकल्प करें.
  1. कुबेर पूजन करना लाभकारी होता है. कुबेर पूजन करने के लिये सबसे पहले तिजोरी अथवा धन रखने के संदूक पर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें, और कुबेर का आह्वान करें.
  1. सबसे पहले गणेश और अम्बिका का पूजन करें. फिर कलश स्थापन, षोडशमातृका पूजन और नवग्रह पूजन करके महालक्ष्मी आदि देवी-देवताओं का पूजन करें. पूजन के बाद सभी सदस्य प्रसन्न मुद्रा में घर में सजावट और आतिशबाजी का आयोजन करें.
  1. आप हाथ में अक्षत, पुष्प, जल और धन राशि ले लें. यह सब हाथ में लेकर यह संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि ‘मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान और समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो’. सबसे पहले गणेश जी और गौरी का पूजन कीजिए.
  1. हाथ में थोड़ा-सा जल ले लें और भगवान का ध्यान करते हुए पूजा सामग्री चढ़ाएं. हाथ में अक्षत और पुष्प ले लें. अंत में महालक्ष्मी जी की आरती के साथ पूजा का समापन करें. घर पूरा धन-धान्य और सुख-समृद्धि हो जाएगा.
  1. दीपावली का विधिवत-पूजन करने के बाद घी का दीपक जलाकर महालक्ष्मी जी की आरती की जाती है. आरती के लिए एक थाली में रोली से स्वास्तिक बनाएं. उस में कुछ अक्षत और पुष्प डालें, गाय के घी का चार मुखी दीपक चलायें. और मां लक्ष्मी की शंख, घंटी, डमरू आदि से आरती उतारें.
  1. आरती करते समय परिवार के सभी सदस्य एक साथ होने चाहिए. परिवार के प्रत्येक सदस्य को माता लक्ष्मी के सामने सात बार आरती घूमानी चाहिए. सात बात होने के बाद आरती की थाली को लाइन में खड़े परिवार के अगले सदस्य को दे देना चाहिए. यही क्रिया सभी सदस्यों को करना चाहिए.
  1. दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है. इसके लिए लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात मां सरस्वती का भी पूजन करना चाहिए. 9.

दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ-साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है. कुबेर पूजन करने से घर में स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है. इनका पूजन इस प्रकार करें.

कैसे करें बही-खाता पूजन

  1. बही खातों का पूजन करने के लिए पूजा मुहुर्त समय अवधि में नवीन खाता पुस्तकों पर केसर युक्त चंदन से या फिर लाल कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना चाहिए. इसके बाद इनके ऊपर ‘श्री गणेशाय नम:’ लिखना चाहिए. इसके साथ ही एक नई थैली लेकर उसमें हल्दी की पांच गांठे, कमलगट्ठा, अक्षत, दुर्गा, धनिया व दक्षिणा रखकर, थैली में भी स्वास्तिक का चिन्ह लगाकर सरस्वती मां का स्मरण करना चाहिए.
  1. मां सरस्वती का ध्यान करें. ध्यान करें कि जो मां अपने कर कमलों में घटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, चन्द्र के समान जिनकी मनोहर कांति है. जो शुंभ आदि दैत्यों का नाश करने वाली है. ‘वाणी’ जिनका स्वरुप है, तथा जो सच्चिदानन्दमय से संपन्न हैं, उन भगवती महासरस्वती का मैं ध्यान करता हूं. ध्यान करने के बाद बही खातों का गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्ध से पूजन करना चाहिए.
  1. जहां पर नवग्रह यंत्र बनाया गया है. वहां पर रुपया, सोना या चांदी का सिक्का, लक्ष्मी जी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी-गणेश-सरस्वती जी की मूर्तियां सजायें. कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रुप मानकर दूध, दही ओर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फूल आदि से सजाएं. इसके ही दाहिने और एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें, जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है.

लक्ष्मी पूजा का स्थान ईशान कोण

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मत्स्य पुराण के अनुसार अनेक दीपकों से लक्ष्मीजी की आरती करने को दीपावली कहते हैं। धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मीपूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमहालक्ष्मी पूजन, मंत्रजाप, पाठ तंत्रादि साधन के लिए प्रदोष, निशीथ, महानिशीथ काल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग-अलग महत्व रखते हैं। पूजा के लिए पूजास्थल तैयार करते समय दिशाओं का भी उचित समन्वय रखना जरूरी है।

  • दिशा: पूजा का स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर बनाना शुभ है। इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं, जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं। पूजास्थल पूर्व या उत्तर दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है।
  • रंग: पूजास्थल को सफेद या हल्के पीले रंग से रंगें। ये रंग शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक प्रगति के प्रतीक हैं।
  • मूर्तियां:  देवी-देवताओं की मूर्तियां तथा चित्र पूर्व-उत्तर दीवार पर इस प्रकार रखें कि उनका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की तरफ रहे।
  • कलश; पूजा कलश पूर्व दिशा में उत्तरी छोर के समीप रखा जाए
  • हवनकुंड या यज्ञवेदी का स्थान पूजास्थल के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) की ओर रहना चाहिए।
  • दीप: लक्ष्मीजी की पूजा के दीपक उत्तर दिशा की ओर रखे जाते हैं।
  • बैठना: पूजा, साधना आदि के लिए उत्तर या पूर्व या पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना उत्तम है।
  • तंत्रसाधना के लिए पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखा जाता है।
  • श्रीयंत्र दीपावली में दक्षिणवर्ती शंख का विशेष महत्व है। इस शंख को विजय, सुख-समृद्धि व लक्ष्मीजी का साक्षात प्रतीक माना गया है। दक्षिणवर्ती शंख को पूजा में इस प्रकार रखें कि इसकी पूंछ उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का प्रिय है। इसकी स्थापना उत्तर-पूर्व दिशा में करनी चाहिए।
  • मंत्र: लक्ष्मीजी के मंत्रों का जाप स्फटिक व कमलगट्टे की माला से किया जाता है। इसका स्थान पूजास्थल के उत्तर की ओर होना चाहिए। श्री आद्यशंकराचार्य द्वारा विरचित ‘श्री कनकधारा स्रोत’ का पाठ वास्तुदोषों को दूर करता है। दीपावली के दिन श्रीलक्ष्मी पूजन के पश्चात श्रीकनकधारा स्रोत का पाठ किया जाए तो घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाने से सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

दीपावली और कुछ प्रभावशाली टिप्स…….घर में कैसे करें लक्ष्मी को खुश

दीपावली की रात सिद्धियों की रात होती है। ये सिद्धियां प्राप्त करना आम जन के लिए अत्यधिक कठिन होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यहां कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, जिन्हें दीपावली के अवसर पर अपना कर आम लोग भी अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं।

टिप्स

  • दीपावली के पूजन के दौरान संपूर्ण परिसर में दक्षिणावर्ती शंख से गंगाजल का छिड़काव करें, नारायण का वास बना रहेगा। जहां नारायण का वास हो, वहां लक्ष्मी स्वतः विराजमान हो जाती हैं।
  • दीपावली पूजन के पश्चात्‌ संपूर्ण परिसर में गुग्गुल का धुआं दें। यह बुरी आत्माओं और आसुरी शक्तिओं से रक्षा करता है।
  • पूजन के दौरान माता लक्ष्मी को बेलपत्र व कमल का फूल अवश्य चढ़ाएं। कुछ लोग कमल के फूल व बेलपत्र को केवल भगवान शिव हेतु उपयुक्त मानते हैं, जबकि बेलपत्र व कमल के फूल की माला लक्ष्मी को अर्पित करने से वैभव  की प्राप्ति होती है।
  • पूजन के पश्चात्‌ मध्य रात्रि में परिवारजनों के साथ बैठकर श्रद्धापूर्वक श्री विष्णुसहस्रनाम अथवा श्री गोपाल सहस्रनाम तथा श्री लक्ष्मी सहस्रनाम का 11 या कम से कम एक बार पाठ अवश्य करें।
  • साधक जिस मंत्र का जप नित्य करते हों, या जो उनका प्रिय मंत्र हो अथवा जिस मंत्र का जप वह भविष्य में करना चाहते हों, उसे दीपावली की रात सिद्ध कर सकते हैं। मध्य रात्रि में इस मंत्र का 108 या 11 या फिर कम से कम एक माला जप संबंधित देवी देवता का ध्यान करके करें। इससे मंत्र सिद्ध हो जाएगा तथा उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
  • घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के स्थायी वास के लिए दीपावली पूजन के समय श्री नारायण सूक्त व श्री सूक्त का पाठ अवश्य करें।
  • दीपावली पूजन में सोने के आभूषण या सिक्के का अधिक महत्व है। इसे पूजा स्थल पर रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें, माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से घर धन-धान्य और स्वर्णाभूषणां से भरा रहेगा। सोने के अभाव में चांदी का उपयोग भी कर सकते हैं।
  • दीपावली पूजन में भगवान कुबेर का पूजन अवश्य करें, घर अन्न-धन से भरा  रहेगा।
  • बहुत से विद्वान दीपावली की मध्य रात्रि में बगलामुखी मंत्र सिद्धि का परामर्श देते हैं। किंतु ध्यान रहे कि यह एक परम शक्तिशाली मंत्र है, इसलिए केवल गंभीर परिस्थितियों में और किसी योग्य गुरु की देखरेख में ही इसे सिद्ध करना चाहिए।
  • दीपावली के दिन वस्तुओं को लांघना अशुभ होता है। अतः इस अत्यधिक सावधानी बरतें। चौक-चौराहों को देखकर ही पार करें।
  • ऊपर वर्णित टिप्स आम जन को ध्यान में रखकर बताए गए हैं। लोग पंडित, पुजारी या तांत्रिक से मार्गदर्शन लेकर अन्य साधनाएं भी कर सकते हैं। दीपावली का मुहूर्त एक दुर्लभ और प्रभावशाली मुहूर्त होता है। अतः हर व्यक्ति को इसका लाभ उठाना चाहिए।

लक्ष्मी किस घर में करती हैं निवास

लक्ष्मी कहां रहती हैं

  • मधुर बोलने वाला, कर्तव्यनिष्ठ, ईश्वर भक्त, कृतज्ञ, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, उदार, सदाचारी, धर्मज्ञ, माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, पुण्यात्मा, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों के घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है।
  • जिसके घर में पशु-पक्षी निवास करते हों, जिसकी पत्नी सुंदर हो, जिसके घर में कलह नहीं होता हो, उसके घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से रहती हैं।
  • जो अनाज का सम्मान करते हैं और घर आए अतिथि का स्वागत सत्कार करते हैं, उनके घर लक्ष्मी निश्चत रूप से रहती हैं।
  • जो व्यक्ति असत्य भाषण नहीं करता, अपने विचारों में डूबा हुआ नहीं रहता, जो घमंडी नहीं होता, जो दूसरों के प्रति प्रेम रखता है, जो दूसरों के दुख से दुखी होकर उसकी सहायता करता है और जो दूसरों के कष्ट को दूर करने में आनंद अनुभव करता है, लक्ष्मी उसके घर में स्थायी रूप से वास करती हैं।
  • जो नित्य स्नान करता है, स्वच्छ वस्त्र धारण करता है, जो दूसरी स्त्रियों पर कुदृष्टि नहीं रखता, उसके जीवन तथा घर में लक्ष्मी सदा बनी रहती हैं।
  • आंवले के फल में, गोबर में, शंख में, कमल में और श्वेत वस्त्र में लक्ष्मी का वास होता है।
  • जिसके घर में नित्य उत्सव होता है, जो भगवान शिव की पूजा करता है, जो घर में देवताओं के सामने अगरबत्ती व दीपक जलाता है, उसके घर में लक्ष्मी वास करती है।
  • जो स्त्री पति का सम्मान करती है, उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, घर में सबको भोजन कराकर फिर भोजन करती है, उस स्त्री के घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहता है।
  • जो स्त्री सुंदर, हरिणी के समान नेत्र वाली, पतली कटि वाली, सुंदर केश श्रृंगार करने वाली, धीरे चलने वाली और सुशील हो, उसके शरीर में लक्ष्मी वास करती हैं।
  • जिसकी स्त्री सुंदर व रूपवती होती है, जो अल्प भोजन करता है, जो पर्व के दिनों में मैथुन का परित्याग करता है, लक्ष्मी उसके घर में निश्चित रूप से वास करती हैं।
  • जो सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) उठकर स्नान कर लेता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।
  • जो गया धाम में, कुरुक्षेत्र में, काशी में, हरिद्वार में अथवा संगम में स्नान करता है, वह लक्ष्मीवान होता है।
  • जो एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को आंवला फल भेंट करता है, वह सदा लक्ष्मीवान बना रहता है।
  • जिन लोगों की देवता, साधु और ब्राह्मण में आस्था रहती है, उनके घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
  • जो घर में कमल गट्टे की माला, लघु नारियल, दक्षिणावर्त शंख, पारद शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति, मंत्रसिद्ध श्री यंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र आदि स्थापित कर नित्य उनकी पूजा करता है, उसके घर से लक्ष्मी पीढ़ियों तक वास करती हैं।
  • धर्म और नीति पर चलने वाले तथा  कन्याओं का सम्मान करने लोगों के जीवन और घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से वास करती हैं।

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दीपावली लक्ष्मी पूजा श्रीयंत्र  की स्थापना कैसे करें

लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए दीपावली के शुभ अवसर पर उनके विभिन्न यंत्रों की पूजा साधना की जाती है। श्रीयंत्र का सीधा अर्थ है- लक्ष्मी प्राप्ति का यंत्र।

  • श्री यंत्र कुबेर यंत्र और लक्ष्मी गणेश यंत्र की स्थापना
  • और सिद्धि महालक्ष्मी की रात्रि

आठों सिद्धियां प्रदान करने वाली अष्टलक्ष्मी इस प्रकार हैं- धन लक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी और अधि लक्ष्मी।

  • लक्ष्मी जी देवलोक में स्वर्गलक्ष्मी के नाम से
  • पाताललोक में नागलक्ष्मी
  • राजाओं के यहां राजलक्ष्मी तथा
  • गृहस्थों के यहां गृहलक्ष्मी के रूप में जानी जाती हैं

श्री यंत्र

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The Shri Yantra is a Yantra formed by Nine interlocking triangles That surround and radiate out from the bindu point, the junction point between the physical universe and its unmanifest source. It represents Sri Lakshmi, the goddess of abundance on all levels, in abstract geometric form.

Four of the triangles point upwards, representing Shiva or the Masculine.

Five of these triangles point downwards, representing Shakti or the Feminine. Thus the Sri Yantra also represents the union of Masculine and Feminine Divine. Because it is composed of Nine triangles, it is known as the Navayoni Chakra.

Together the nine triangles are interlaced in such a way as to form 43 smaller triangles in a web symbolic of the entire cosmos or a womb symbolic of creation.

This is surrounded by a lotus of eight petals, a lotus of sixteen petals, and an earth square resembling a temple with four doors.

The Shri Yantra is based on the Hindu philosophy of Kashmir Shaivism.

श्रीयंत्र साधना : श्रीयंत्र का अर्थ है- लक्ष्मी प्राप्ति का यंत्र

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श्रीयंत्र साधना तंत्र-विज्ञान की सर्वोत्कृष्ट देन है। श्री यंत्र के अर्चन से श्री, धन, लक्ष्मी, यश, समृद्धि में परिपुष्टता प्राप्त होती है। हमने यहाँ श्रीयंत्र साधना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी उपलब्ध कराई है। दीपावली की रात्रि में: को पूजा स्थल पर दीपावली पर स्थापित करें और वर्ष भर प्रतिदिन किसी भी लक्ष्मी मंत्र का एक माला जप करते रहें। इससे धन आगमन बना रहता है।

श्री यंत्र की स्थापना और पूजन का विधान

श्री यंत्र की घर में स्थापना करनी हो तो साथ में इन चार तांत्रिक प्रभाव वाली वस्तुओं की स्थापना भी करनी चाहिए-

1- श्वेतार्क गणपति   2- पारद शिवलिंग   3-दक्षिणावर्ती शंख और   4- एकाक्षी श्रीफल

श्री यंत्र की स्थापना और पूजा विधिवत की जाए और दक्षिणावर्ती शंख से इसका अभिषेक किया जाए तो कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रह सकती। श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर सुंदरी का विधिवत श्रीयंत्र पर आवाहन पूजन करके मंत्र जप करना चाहिए।

मंत्र : ॥ ह्रीं दक्षिणावर्ती शंखाय मम सर्व क्लेश हराय संकट मोचनाय हीं नम:॥

सब काम सिद्ध करता है श्रीयंत्र

श्रीयंत्र विद्या के अधिपति साक्षात ब्रह्माजी हैं।

भगवान ब्रह्मा ने मानव कल्याण के लिए कई सार्थक यंत्रों की खोज की।

इनकी पूजा एवं प्रतिष्ठा आज भी पुष्करराज में होती है।

श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी श्री त्रिपुर सुंदरी

इसका नियमित पूजन करने से रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं और सभी इच्छाएं भी पूर्ण हो जाती हैं।

  • इसकी रचना आदि शंकराचार्य द्वारा आदि देव महादेव की सहायता से की गई थी।
  • आदि गुरु शंकराचार्य ने विश्व की शांति और प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त रखने के उद्देश्य से इस स्फटिक श्रीयंत्र की स्थापना की थी।
  • यक्ष, किन्नर, दानव, मानव आदि सभी लोग यंत्र और तंत्र का प्रयोग करते थे।

भगवान दत्तात्रेय द्वारा रचित इंद्रजाल ग्रंथ में

कई लोकोपयोगी यंत्रों की महिमा का बखान है। इन यंत्रों की सिद्धि और सफलता सार्थक श्रम पर निर्भर करती है। यंत्रों की स्थापना दीपावली की महारात्रि पर करना विशेष फलदायक माना जाता है।

श्रीयंत्र की महिमा

  • जिस तरह सभी कवचों में जिस तरह चंडी कवच श्रेष्ठ है,
  • उसी तरह यंत्रों में श्रीयंत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है
  • इसे यंत्रराज व यंत्र शिरोमणि नाम से भी माना गया है

यह यंत्र बेहद शक्तिशाली है और ललित-देवी का पूजा चक्र है। इसको त्रैलौक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का सम्मोहन करने वाला भी माना गया है। श्रीयंत्र को रोग और कष्ट दूर करने वाला यानी सर्वव्याधि निवारक माना गया है। इसका नियमित पूजन करने वाले के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इसके पूजन से सभी तरह की इच्छाएं पूरी होती हैं।

श्रीयंत्र का आकार

इसके मध्य भाग में बिंदु व छोटे-बड़े मुख्य नौ त्रिकोण होते हैं। बिंदु, त्रिकोण, अष्टकोण, अंतर्दशा कोण, बहिर्दश कोण, चतुर्दश कोण, अष्टदल, षोडशदल एवं भूपुर यह सब मिलकर श्रीयंत्र के नौ चक्र बनाते हैं। इन नौ त्रिकोणों से बने 43 त्रिकोण, दो कमल दल भूपुर, एक चतुर्रस 43 त्रिकोणों से र्निर्मित उन्नत श्रंग के समान मेरुपृष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति एवं चमत्कारों से भरपूर होता है।

श्रीयंत्र की स्थापना

श्रीयंत्र को गंगाजल, दूध से स्वच्छ करके पूजा स्थान में स्थापित करना चाहिए। व्यापारिक स्थान या अन्य शुद्ध स्थानों पर भी पूर्व दिशा में इसकी स्थापना कर नियमित रूप से पूजा-अर्चना करें। इसकी पूजा पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही की जाती है। अतः इस बात का ध्यान रखें कि इसकी स्थापना घर, मकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि जगहों पर पूर्व दिशा की ओर ही होनी चाहिए।

स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त

दीपावली, धनतेरस, बसंत पंचमी, या पौष मास की संक्राति के दिन अगर रविवार हो, तो इस यंत्र का निर्माण एवं पूजन विशेष महत्वपूर्ण माना गया है.

समृद्धि के लिए घर में हो श्रीयंत्र

दीपावली पर स्थापित करें स्फटिक का ‘श्रीयंत्र’। इससे समृद्धि आती है।

  1. स्फटिक का श्रीयंत्र अध्यात्म जगत में रत्नगर्भा लक्ष्मी यंत्र के नाम से विख्यात है। श्रीयंत्र को अष्ठ लक्ष्मी श्रीयंत्र के रूप में भी जाना जाता है।
  2. 16 शक्तियों, 64 योगिनियों और नव दुर्गा की शक्ति स्फटिक श्रीयंत्र में निहित है। अभिमंत्रित किया हुआ श्रीयंत्र ही शुभ फलदायी माना जाता है। इसे लक्ष्मी पूजन पंचामृत से स्नान कराकर स्थापित करके मां लक्ष्मी की अराधना करनी चाहिए। इसे पूर्ण प्रतिष्ठा से स्थापित करें।
    3. इस यंत्र को स्थापित करने से मां लक्ष्मी की कृपा से जीवन में उन्नति,धन, रोजगार, व्यापार में वृद्धि, सुख, सौभाग्य, निरोगिता, कर्ज से मुक्ति, सुपुत्र प्राप्ति आदि की
    इच्छाएं पूरी होती हैं। ये कामधेनु की तरह फल देने वाला और कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है।

अन्य यंत्र

कनकधारा यंत्र

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आज के युग में हर व्यक्ति शीघ्रातिशीघ्र धनवान बनना चाहता है। धन प्राप्ति हेतु कनकधारा यंत्र के सामने बैठकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इस यंत्र की उपासना से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती है। साथ ही बेरोजगारों को रोजी मिलती है और व्यापारियों के व्यापार में उन्नति होती है। कनकधारा स्तोत्र की रचना ही कुछ इस प्रकार से गुच्छित है कि एक विशेष अलौकिक दिव्य प्रभाव उत्पन्न होता है। यह यंत्र अत्यंत दुर्लभ परंतु लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण और यह स्तोत्र अपने आप में अचूक, स्वयंसिद्ध तथा ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ है। इस यंत्र की उपासना से रंक भी धनवान हो जाता है। परंतु इसकी प्राण प्रतिष्ठा की विधि जटिल है। इस जटिल विधि के कारण इसे कम ही लोग सिद्ध कर पाते हैं। कथा है कि जगद्गुरु शंकराचार्य ने एक दरिद्र ब्राह्मण के घर इस स्तोत्र का पाठकर स्वर्ण वर्षा कराई थी। प्रसिद्ध गं्रथ शंकर दिग्विजय के चौथे सर्ग में इस घटना का उल्लेख है। मंत्र- ÷ ओम वं श्रीं वं ऐं ह्रीं-श्रीं क्लीं कनक धारयै स्वाहा’

हम सभी जीवन में ‍आर्थिक तंगी को लेकर बेहद परेशान रहते हैं। धन प्राप्ति के लिए हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करना चाहते हैं। धन प्राप्ति और धन संचय के लिए पुराणों में वर्णित कनकधारा यंत्र एवं स्तोत्र चमत्कारिक रूप से लाभ प्रदान करते हैं। इस यंत्र की विशेषता भी यही है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, पूजन, विधि-विधान की माँग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है।

साथ ही प्रतिदिन इसके सामने दीपक और अगरबत्ती लगाना आवश्यक है। अगर किसी दिन यह भी भूल जाएँ तो बाधा नहीं आती क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है। वेबदुनिया के यूजर्स के लिए हम दे रहे हैं कनकधारा स्तोत्र का संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अनुवाद। आपको सिर्फ कनकधारा यंत्र कहीं से लाकर पूजाघर में रखना है।

यह किसी भी तंत्र-मंत्र संबंधी सामग्री की दुकान पर आसानी से उपलब्ध है। माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए जितने भी यंत्र हैं, उनमें कनकधारा यंत्र तथा स्तोत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं अतिशीघ्र फलदायी है।

बीसा यंत्र

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व्यापार में वृद्धि और उन्नति के लिए इस यंत्र को दीपावली के दिन लक्ष्मी गणेश के पूजन स्थान के समीप या दुकान अथवा फैक्ट्री में स्थापित कर इसका धूप, दीप आदि से पूजन अर्चन करना चाहिए।

तंत्र शास्त्र में चमत्कारी बीसा यंत्र का उल्लेख मिलता है। इस यंत्र के कई स्वरूप हैं, जो धन, समृद्धि, वैभव प्राप्ति के लिए, तनाव, कष्ट, विपदाओं से बचने के लिए और रोग-व्याधियों से मुक्ति के लिए लाभदायक रहते हैं। इन यंत्रों को शुभ मुहूर्त में शास्त्रोक्त विधि से तैयार करके और अभिमंत्रित द्वारा सिद्ध करके यदि पूजा-अर्चना की जाए तो मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

बीसा यंत्र को रवि-पुष्य, रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली या सूर्य-चंद्रग्रहण में लाभ के चौघड़िए में शास्त्रोक्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए। शुभ मुहूर्त में अनार की डाली तोड़कर पत्थर पर घिसकर कलम तैयार करनी चाहिए। इस यंत्र को भोजपत्र पर, भोजपत्र की अनुपलब्धि में कोरे कागज पर अष्टगंध स्याही (अर्थात- केसर, कस्तूरी, गोरोचन, लाल चंदन, सफेद चंदन, कपूर, अगर-तगर और कुमकुम मिलाकर बनाई स्याही), यदि यह उपलब्ध न हो तो केसर की स्याही से अंकित करना चाहिए।

इस यंत्र का विधिवत पूजन कर मंत्रोच्चारण के साथ ध्यान करने पर कार्य सिद्धि तथा विपत्ति निवारण होता है। बीसा यंत्रों की आकृतियाँ निम्नानुसार दी जा रही हैं- 1. धन संपत्ति, व्यापार में सफलता एवं निरंतर उन्नति करने के लिए बीसा यंत्र :

बीसा यंत्र को रवि-पुष्य, रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली या सूर्य-चंद्रग्रहण में लाभ के चौघड़िए में शास्त्रोक्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए। शुभ मुहूर्त में अनार की डाली तोड़कर पत्थर पर घिसकर कलम तैयार करनी चाहिए।

दीपावली के पूर्व आने वाले पुष्य नक्षत्र में, धनतेरस या दीपावली के दिन लाभ के चौघड़िए में घर में, पूजागृह में, मंदिर, दुकान या व्यापार के स्थान पर ईशान कोण की पश्चिम मुखी दीवार पर शुद्ध घी-सिंदूर से इन्हें अंकित करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि एवं वैभव बना रहता है। शुभ मुहूर्त में ‘ओम्‌ हीं हीं श्रीं श्रीं क्रीं क्रीं स्थिरां ओम्‌’ का 11 बार जाप करें, साथ में लक्ष्मीजी एवं गणेशजी के अष्टकम्‌ स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इसके साथ लक्ष्मीजी-गणेशजी की पूजा करें तो उत्तम रहेगा। समस्या, तनाव, विपत्ति दूर करने के लिए तथा शत्रुनाश हेतु निम्नांकित बीसा यंत्रों को विधिवत तैयार करके पूजा-आराधना करनी चाहिए। साथ ही दुर्गा देवी के दुर्गा स्तोत्र का वाचन शीघ्र लाभ करता है।

देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों है?

  • हिंदू देवताओं के वाहनों में पशु व पक्षियों के उपयोग को लेकर अक्सर जिज्ञासाएं उठती रही हैं। ये सभी देव शक्तियों के साथ प्रतिकात्मक है, लेकिन इनके स्थूल अर्थ ग्रहण किए जाने से प्रतीकों में जो अर्थ होता है उसे समझने में आम लोगों को मुश्किल होती है। लक्ष्मी के वाहन रूप में उल्लू की मान्यता इसी तरह की एक जिज्ञासा है। एक पौराणिक मान्यता है कि लक्ष्मीजी समुद्र से प्रकट हुई और भगवान विष्णु की सेवा में लग गईं। लक्ष्मीजी का स्वभाव चंचल माना गया।
  • इसलिए उनकी आराधना व उपयोग के मामले में भी सावधानी की आवश्यकता होती है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू स्वभाव से रात में देखने में सक्षम होता है। उल्लू अज्ञान का प्रतीक है। वह अंधकार में ही जाग्रत होता है। लक्ष्मी उल्लू पर बैठी है, इसका अर्थ यह है कि वे अज्ञान की सवारी करती हैं और सही ज्ञान को जाग्रत करने में सहयोगी होती हैं।यदि लक्ष्मी का उपयोग अज्ञान के साथ होगा तो वह भोग और नाश तक ही सीमित रह जाएगा। यदि ज्ञान के साथ होगा तो दान व परोपकार की दिशा में लगेगा। संकेत यही है कि रीति से कमाया हुआ धन नीति से खर्च करें।

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उल्लू की सवारी का धार्मिक तर्क: धार्मिक शास्त्रों में लक्ष्मी जी के वाहन के चार भेद बताएं गए हैं अर्थात चतुर्भुजी लक्ष्मी जी के चार प्रकार बताए गए हैं। पहला गरुड़-वाहिनी दूसरा गज-वाहिनी तीसरा सिंह-वाहिनी और चौथा उलूक-वाहिनी। लक्ष्मी जब गरुड़ पर सवार होती हैं, तब वो भगवान विष्णु के साथ विराजमान होती हैं। तब वह आकाश भ्रमण करती हैंं तथा गरुड़ वाहिनी कहलाती हैं।
  • लक्ष्मी जी जब श्वेत हाथी पर सवार होती है, तब वह धर्म लक्ष्मी कहलाती है। हाथी कर्मठ और बुद्धिमान प्राणी है। हाथी के समूह में हथनीयों को प्राथमिकता तथा सम्मान दिया जाता है। हाथी अपने परिवार के लिए कर्म करके भोजन अर्जित करता है। हाथी समूह में रहकर एकता बनाए रखता है तथा पारिवारिक धर्म का निर्वाह करता है।
  • लक्ष्मी जी जब सिंह पर सवार होती हैं तब वह कर्म लक्ष्मी कहलाती हैं। ये लक्ष्मी का अघोर स्वरुप हैं जब व्यक्ति साम दाम दंड भेद और नीति से पैसे कमाता है तब सिंह पर सवार लक्ष्मी का उद्गमन होता है।
  • चौथा जब लक्ष्मी जी घुग्घू अर्थात उल्लू की सवारी करती हैं। महालक्ष्मी मूलतः रात्रि की देवी हैं तथा रात के समय उल्लू सदा क्रियाशील रहता है। उल्लू पेट भरने हेतु दिन के समय में अंधा बनकर अर्थात कोलुह का बैल बनकर कार्य करता है तथा संपूर्ण दिमाग के साथ रात में जागकर और आंखें खोलकर कार्य करता है। उल्लू पर सवार लक्ष्मी को उल्लूक वाहिनी कहा गया है।
चमत्कारी उल्लू: तंत्र शास्त्र के अनुसार लक्ष्मी वाहन उल्लू रहस्यमयी शक्तियों का स्वामी है। प्राचीन ग्रीक में उल्लू को सौभाग्य और धन का सूचक माना जाता था। यूरोप में उल्लू को काले जादू का प्रतीक माना जाता है। भारत में उल्लूक तंत्र सर्वाधिक प्रचलित है। चीनी वास्तु शास्त्र फेंगशुई में उल्लू को सौभाग्य, स्वा स्य्उल  और सुरक्षा का भी पर्याय माना जाता है। जापानी लोग उल्लू को कठिनाइयों से बचाव करने वाला मानते हैं। चूंकि उल्लू को निशाचर यानी रात का प्राणी माना जाता है और यह अंधेरी रात में भी न सिर्फ देख सकता है बल्कि अपने शिकार पर दूर दृष्टि बनाए रख सकता है।

उल्लू की सवारी का ज्योतिष तर्क: महालक्ष्मी जी मूलतः शुक्र ग्रह की अधिष्टात्री देवी हैं तथा लक्ष्मी जी की हर सवारी गरुड़, हाथी, सिंह और उल्लू सभी राहू घर को संबोधित करते हैं। कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार शुक्र धन और वैभव के देवता हैं और व्यक्ति की कुण्डली में शुक्र धन और दाम्पत्य के स्वामी है तथा शुक्र का पक्का घर आकाश है अर्थात बारवां भाव। कापुरुष सिद्धांत के अनुसार राहू को पाताल का स्थान प्राप्त है तथा कुण्डली में राहू का पक्का घर छठा स्थान होता है और राहू को कुण्डली के भाव नंबर आठवें, तीसरे और छठे में श्रेष्ठ स्थान में माना गया है। कुण्डली में काला धन अथवा छुपा हुआ धन छठे और आठवें भाव से दिखता है।

पौराणिक कहानियों में उल्लू का जिर्क… लक्ष्मी का वाहन वैसे तो भारतीय परंपरा में उल्लू माना जाता है, लेकिन भारतीय ग्रंथों में ही इनके कुछ अन्य वाहनों का उल्लेख है। महालक्ष्मी सोत्र में गरूड़ को इनका वाहन बताया गया है, जबकि अथर्ववेद के वैवर्त में हाथी को लक्ष्मी का वाहन कहा गया है। प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू है, लेकिन प्राचीन यूनान में धन संपदा की देवी के तौर पर पूजी जाने वाली हेरा का वाहन मयूर है। लक्ष्मी पूजन के बारे में मार्कंडेय पुराण के अनुसार लक्ष्मी का पूजन सर्वप्रथम नारायण ने किया। बाद में ब्रह्मा फिर शिव समुद्र मंथन के समय विष्णु उसके बाद मनु और नाग तथा अंत में मनुष्यों ने लक्ष्मी पूजन शुरू किया। उत्तर वैदिक काल से ही लक्ष्मी पूजन होता रहा है।

दीपावली पर धन वृद्घि के लिए उल्लू के टोटके किए जाते रहे हैं…
उल्लू देवी लक्ष्मी का वाहन है। माना जाता है कि दीपावली की रात इसके दर्शन हो जाएं तो पूरे साल धन का आगमन बना रहता है। लेकिन इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। इसलिए दीपावली की रात उल्लू से संबंधित टोटके भी प्रचलित हैं जिनसे लक्ष्मी की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

उल्लू को लेकर मान्यताएं…

  • उल्लू की तस्वीर लगाएं- दीपावली की शाम दीप जालने के बाद तिजोरी अथवा जहां भी आप धन रखते हैं वहां उल्लू की एक तस्वीर लगाएं। पूरे साल आर्थिक लाभ के अवसर मिलते रहेंगे।
  • रोग भगाएं समृद्घि लाएं- दीपावली की रात में गणेश लक्ष्मी की पूजा से पहले उल्लू और मोर के पंख को लाल धागे में बांधकर घर के मुख्य द्वार पर लटकाएं। इससे नजर दोष एवं नकारात्मक उर्जा का घर में प्रवेश नहीं होता है। घर में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य एवं धन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • व्यापार में उन्नति के टोटके- व्यापार में उन्नति की रफ्तार को बढ़ाने के लिए दीपावली की मध्य रात्रि में काले कपड़े में काली कौड़ी और उल्लू के पंख को बांधकर तिजोरी में रख दें। इस पोटली को दुकान या ऑफिस के मुख्य दरवाजे पर बांधने से भी कारोबार में उन्नति होती है। धन लाभ बढ़ता है।
  • दांपत्य जीवन में प्रेम और समृद्घि लाएं- पति-पत्नी अपने दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ाने के लिए दीपावली की रात उल्लू के नाखून को सिंदूर के साथ लाल कपड़े में लपेटकर बाजू में बांध लें या फिर श्रृंगार पेटिका में रखें तो पति-पत्नी के संबंध मजबूत होते हैं। आर्थिक तंगी के कारण परिवार में मनमुटाव नहीं होता है।
  • जेब रहेगी हरी भरी- अगर आपकी शिकायत रहती है कि जो भी कमाते हैं खर्च हो जाता है। पैसा जेब में टिकता ही नहीं तो दीपावली की रात एक आसान सा उपाय आजमा सकते हैं। तांबे के एक ताबीज में गोरोचन और उल्लू के पंख को भरकर अपनी जेब में रख लें। लक्ष्मी माता की कृपा से जेब हरी भरी रहेगी।

संकट में है धन की देवी की सवारी ‘उल्लू’

धन की देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू पर संकट गहराता जा रहा है। अधिक संपन्न होने के चक्कर मे लोग दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओं की बलि चढ़ाने मे जुट गए हैं यह बलि सिर्फ दीपावली की रात को ही पूजा अर्चना के दौरान दी जाती है। माना ऐसा जाता है कि उल्लू की बलि देने वाले को बेहिसाब धन मिलता है इसी कारण उल्लुओं का कत्लेआम जारी है।
  • लोग उल्लू को अशुभ मानते हैं लेकिन देश में एक ऐसी भी जगह हैं जहां मां लक्ष्मी की सवारी उल्लू की पूजा होती है।
  • उल्लुओं के अंगों का दवा के तौर पर गलत उपयोग और तंत्र-मंत्र के लिए किये जा रहे अनियंत्रित अवैध व्यापार के कारण भारत में यह जीव गंभीर खतरे में है।
  • डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट काला जादू और तंत्र-मंत्र में अंधविश्वास के कारण उल्लू विलुप्त होने के कगार पर है।
  • उल्लुओं के व्यापार को उजागर करने के लिए पूरे देश भर में वर्ष 1998 से लेकर 2008 तक के अध्ययन और जांच को शामिल किया गया है।
  • बीएनएचएस ने उल्लुओं के शिकार और उसके अंगों के अवैध व्यापार पर कठोरता पूर्वक रोक लगाने के लिए सरकार से आग्रह किया है।
  • कहा जाता है कि दीपावली की रात उल्लू के लिए काली रात होती है।

Owls parts for sale
Owl parts for sale for folk medicinal use / black magic

Out of 30 known species, 15 species are caught up in the trade: the spot-bellied eagle owl, spotted owlet, barn owl, Asian barred owlet, dusky eagle owl, collared owl, oriental scops owl, tawny fish owl, rock eagle owl, eastern grass owl, jungle owlet, brown fish owl, mottled wood owl, collared scops owl and the brown wood owl. Hunting and trading of Indian owl species is banned under the Wildlife (Protection) Act 1972 of India, still they are highly sought after by traders.

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चंबल के उल्लू… चंबल सेंचुरी क्षेत्र में यूरेशियन आउल अथवा ग्रेट होंड आउल तथा ब्राउन फिश आउल संरक्षित घोषित हैं। इसके अलावा भी कुछ ऐसी प्रजातियाँ है जिन्हें पकड़ने पर प्रतिबंध है।  संकट में उल्लूचंबल सेंचुरी क्षेत्र में यूरेशियन आउल अथवा ग्रेट होंड आउल तथा ब्राउन फिश आउल संरक्षित घोषित हैं। इसके अलावा भी कुछ ऐसी प्रजातियाँ है जिन्हें पकड़ने पर प्रतिबंध है। चंबल सेंचुरी क्षेत्र में इनकी खासी संख्या है क्योंकि इस प्रजाति के उल्लू चंबल किनारे स्थित करारों में घोंसला बनाकर रहते हैं। इस प्रकार की करारों की सेंचुरी क्षेत्र में कमी नहीं है। अभी तक इस बात का कोई अध्ययन भी नहीं किया गया कि आखिर चंबल में उल्लुओं की वास्तविक तादत क्या है, अब इन उल्लुओं की बरामदगी के बाद इनकी गणना का काम शुरू करने बात कही जा रही हैं। अभी तक चंबल से मछलियों एवं कछुओं की तस्करी के अलावा किसी और जीव की तस्करी की कोई खबर नहीं हुआ करती थी, लेकिन उल्लू की तस्करी ने वन्य जीव विभाग को अब सोचने पर मजबूर कर दिया है कि चंबल घाटी में किस तरह के तस्कर सक्रिय हो चले हैं यहां यह कहने में कोई संकोच नहीं हैं कि बिना स्थानीय मददगार के कोई बाहरी सक्रिय हो ही नहीं सकता, कहीं ना कहीं कोई स्थानीय मददगार है तभी तो चंबल से उल्लुओं की तस्करी शुरू की गई है।

उल्लू की प्रजातियाँ-
उल्लू छोटे और बड़े दोनों तरह के होते हैं और इनकी कई जातियाँ भारत वर्ष में पाई जाती हैं। बड़े उल्लुओं को दो मुख्य जातियाँ मुआ और घुग्घू है। मुआ पानी के पास और घुग्घू पुराने खंडहरों और पेड़ों पर रहते हैं।

मुवाँ या मुआँ उल्लू की ऊँचाई लगभग 22 इंच होती है। ये नर और मादा एक ही रंगरूप के, ऊपर के पर कत्थई, डैने भूरे जिनपर सफ़ेद और काले निशान, दुम गहरी भूरी जिसके सिरे पर सफेदीपन लिए भूरे रंग की धारी और गला सफेद होता है।

इसकी चोंच मुड़ी हुई और गहरी गंदली हरी तथा पैर धूमिल पीले रंग के होते हैं। यह भारत का बारहमासी पक्षी है जो नदी के किनारों के ऊँचे कगार, पानी का ओर झुकी हुई पेड़ की किसी डाल या किसी वीरान खंडहर में अक्सर दिखाई पड़ता है। इसका मुख्य भोजन चिड़िया, चूहे, मेढक और मछलियाँ हैं।

घुग्घू भी लगभग 22 इंच का पक्षी है जिसके नर मादा एक ही रंग रूप के होते हैं। इनका एक नाम मरचिरैया भी है। घूग्घु के सारे शरीर का रंग भूरा रहता है। इसकी आँख की पुतली पीली, चोंच सींग के रंग की, और पैर रोएँदार तथा काले होते हैं। यह चूहे, मेंढक और ज़्यादातर कौओं के अंडों पर हमला कर के खाता है। यह घने जंगल, बस्ती या वीरान के किसी बड़े पेड़ पर छिपा सोता है लेकिन रात में घुग्घूऊ ऊऊ की आवाज़ से इसकी उपस्थिति का पता चल जाता है।

 धनतेरस से परेवा तक… होती है तंत्र साधना
दीपावली जैसे जैसे करीब आती जाती है, तथाकथित तांत्रिक अपनी साधना को फलीभूत करने के लिए तेजी से काम शुरू कर देते हैं. धनतेरस से लेकर परेवा तक वो अपनी साधना को सिद्ध करने के लिए तंत्र व मंत्र की साधना में लीन हो जाते हैं. इसमें भी वो दिवाली की रात को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं. वहीं, कुछ लोग ऐसे तांत्रिकों के बहकावे में आकर वशीकरण, कोर्ट कचहरी से छुटकारा, दुश्मन पर विजय आदि जैसे काम कराने के लिए ऐसे तंत्र-मंत्र का सहारा लेने लगते हैं. इसके लिए उल्लू की बलि दी जाती है. इतना ही नहीं, उल्लू के सभी अंग इस कथित तंत्रविद्या में इस तरह काम आते हैं कि उनका डिस्क्रिपशन, इनकी वीभत्सता के चलते करना मुमकिन नहीं है. 10 हजार से 25 लाख तक हो सकती है कीमत
कथित तंत्र-मंत्र में उल्लू की उपयोगिता के चलते इसकी मार्केट इस टाइम आसमान छू रही है. उल्लुओं की प्रजाति भी इनके रेट्स का एक डिसाइडिंग फैक्टर बनी हुई है. वहीं, एक तांत्रिक के मुताबिक ग्राहकों की क्रयशक्ति के आधार पर उल्लू दस हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक बिक रहे हैं. कुछ विशेष कस्टमर्स ने तो दो-दो लाख में भी उल्लू खरीदे हैं. तांत्रिक ने बताया कि इस टाइम अघोरपंथ से जुड़े लोग भैरव मंदिर से लेकर श्मशान घाट तक में अपनी-अपनी ‘तंत्र विद्या’ को जागृत करने में जुटने की तैयारी कर रहा है.
बार्न आऊल सबसे महंगे… 25 से 30 लाख रुपये तक हो सकती है कीमत… तंत्र क्रियाओं के लिए कुछ लोग दिवाली पर उल्लू की मुंहमांगी कीमत देने को तैयार रहते हैं… कहा जाता है कि 10 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक की कीमत आम उल्लू की होती है…  अगर सूत्रों द्वारा किये दावे पर भरोसा करें तो इस समय एक बार्न आऊल की कीमत 25-30 लाख रुपये से भी अधिक है। सफेद रंग वाले हलके कत्थई दागों वाले ये उल्लू दिखने में बेहद सुंदर होते हैं और शायद सबसे महंगे बिकते हैं।

  • सामान्य तौर पर इस प्रजाति के उल्लू डेढ़ से दो किलो के होते हैं।
  • बार्न आऊल जैसे दुर्लभ उल्लुओं का वजन साढ़े चार किलो से भी अधिक होता है और यह बहुत महंगा बिकता है।
  • उल्लुओ की करीब 30 प्रजातियों में से 15 से 20 प्रजातियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ने की आशंका पैदा हो गई है।
  • बार्न आऊल जैसे दुर्लभ किस्म के उल्लुओं की सर्वाधिक तस्करी भी किए जाने की खबर मिलती रहती है।
उल्लू और देश-विदेश की मान्यताएं
पूरी दुनिया में उल्लू की लगभग 225 प्रजातियाँ हैं। हालांकि कई संस्कृतियों के लोकाचार में उल्लू को अशुभ माना जाता है, लेकिन साथ ही संपन्नता और बुद्धि का प्रतीक भी। यूनानी मान्यताओं में उल्लू का संबंध कला और कौशल की देवी एथेना से माना गया है और जापान में भी इसे देवताओं का संदेशवाहक समझा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी उल्लू पर विराजती हैं और भारत में यही मान्यता इस पक्षी की जान की दुश्मन बन गई है। यही वजह है कि दीपावली के ठीक पहले के कुछ महीनों में उल्लू की तस्करी काफी बढ़ जाती है। हर साल भारत के विभिन्न हिस्सों में दीपावली की पूर्व संध्या पर उल्लू की बलि चढ़ाने के सैकड़ों मामले सामने आते हैं।

Dyed Owls
Spotted Owlet, Dyed Spotted Owlet with coloured eyes, and Dyed Spotted Owlet
उल्लू और देश-विदेश की मान्यताएं… जो प्रचलित रही हैं…

पुराने समय से लोगों का यह विश्वास है कि उल्लुओं को किसी भी आदमी की मृत्यु के समय का पहले से ही पता चल जाता है और तब यह आसपास के पेड़ पर आकर अक्सर बोलने लगते हैं। उल्लू अपनी आंख और गोल चेहरे के कारण बहुत प्रसिद्ध है। यह बहुत कम रोशनी में भी देख लेते हैं। इसलिए इन्हें रात्रि में शिकार करने में ज्यादा परेशानी नहीं होती है। यह एक रात्रिचारी पक्षी है। इसके बारे में बहुत सारी मान्यताएं प्रचलित है। विभिन्न देशों एवं संस्कृतियों में इस पक्षी से जुड़े शकुन-अपशकुन इस प्रकार हैं : –
  • ब्रिटेन में उल्लू के रुखे तथा करूण विलाप से निकट भविष्य में भय या दुर्भाग्य का संकेत समझा जाता है।
  • दक्षिण अफ्रीका में उल्लू की आवाज मृत्यु सूचक कहा जाता है।
  • कनाडा में उल्लू का तीन रात्रि लगातार किया गया शब्द परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है।
  • पोलीनेशिया में गंतव्य दिशा के अनुसार शुभ या अशुभ माना जाता है।
  • अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी भाग में उल्लू दिखाई दे तो अशुभ समझा जाता है।
  • चीन में उल्लू दिखाई देने पर पड़ोसी की मृत्यु का सूचक मानते है।
  • ईरान में स्वर के मधुर अथवा कर्णपटु होने के अनुसार शुभाशुभ माना जाता है।
  • तुर्की में भी उल्लू के शब्द को अशुभ किंतु श्वेत उल्लू को शुभ माना जाता है।
  • न्यूजीलैंड में सिवाय बुद्ध परिषद के अन्य मंत्रणाओं के समय उल्लू का शब्द अशुभ समझा जाता है।
  • भारत में प्रचलित लोक विश्वासों के अनुसार उल्लू का घर के ऊपर घत पर स्थि‍त होना निकट संबंधी की अथवा परिवार के सदस्य की मृत्यु का सूचक समझा जाता है।

उल्लू की गर्दन 270 डिग्री तक मुड़ने का राज खुला… अंधेरे में देख सकने की विलक्षण क्षमता वाला उल्लू अपनी लचीली गर्दन के लिए मशहूर है और अब वैज्ञानिकों ने इसके कारण का भी पता लगा लिया है। उल्लू किसी भी दिशा में अपनी गर्दन को लगभग पूरा [270 डिग्री तक] घुमा सकता है और खास बात यह है कि ऐसा करने में उसकी गर्दन के रास्ते मस्तिष्क तक जाने वाली एक भी रक्त वाहिका को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। उल्लू की शारीरिक संरचना के अध्ययन के लिए दर्जनों उल्लुओं के एक्स-रे और सीटी स्कैन्स किए गए। वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता फिलिप्पे गैलौड ने कहा कि उल्लुओं का गर्दन घुमाना हमेशा से एक रहस्य रहा लेकिन अब यह सुलझ गया है। इस अध्ययन के लिए उल्लू की नसों में रंगीन तरल प्रवाहित कर कृत्रिम रक्त प्रवाह बढ़ाया गया। उल्लू के जबड़े की हड्डी से ठीक नीचे सिर के आधार में स्थित रक्त वाहिकाएं रंगीन तरल के पहुंचने के साथ-साथ लंबी होती गई। यह प्रक्रिया तब तक चली जब तक कि यह रंगीन तरल रक्त भंडार में जमा नहीं हो गया।उल्लू में पाया जाने वाला यह गुण बिल्कुल अनोखा है जबकि मनुष्य में ऐसा नहीं होता है। मनुष्य में ठीक इसके विपरीत क्रिया होती है। मनुष्य में गर्दन घुमाने से ये वाहिकाएं छोटी होती जाती हैं। शोधकर्ताओं के इस अध्ययन को एक फरवरी की साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

उल्लू की नज़र… उल्लुओं के बारे में उस समय कम ही जानती थी लेकिन उन्हें पहचानने में कभी दिक्कत नहीं होती थी। उनके चेहरे का नक्शा और उनकी आँखें अन्य पक्षियों से काफी अलग जो हैं। उल्लुओं की आँखें सचमुच बहुत बड़ी होती हैं – शरीर के आकार को ध्यान में रखते हुए शायद ही किसी और जन्तु की आँखें उल्लू जितनी बड़ी होंगी। 2-3 फुट के कुछ उल्लुओं की आँखें 5-6 फुट के मनुष्यों की आँखों जितनी होती हैं। इनकी आँखें ही नहीं, पुतलियाँ भी बड़ी होती हैं जो ज़्यादा-से-ज़्यादा प्रकाश आँख के अन्दर आ पाए यह सम्भव बनाती हैं।

दीपावली और दीए… दिवाली में मिट्टी के दीयों का महत्व… क्यों चाइनीज के आगे मिट्टी की महक हुई कम

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दीपावली का अर्थ ही है दीपों की पंक्ति। दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग मान्यता है। मिथिलांचल में धनतेरस के दिन से ही दीये जलाए जाने की परंपरा है। दिवाली के एक दिन पूर्व छोटी दिवाली को लोग यम दिवाली भी कहा करते हैं। इस दिन यम पूजा हेतु घर के बाहर दीये जलाए जाते हैं।

दीयों का प्रामाणिक इतिहास… भारत में दिये का इतिहास प्रामाणिक रूप से 5000 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है जब इसे मोहनजोदड़ों में ईंटों के घरों में जलाया जाता था। खुदाइयों में वहां मिट्टी के पके दीपक मिले है। कमरों में दियों के लिये आले या ताक बनाए गए हैं, लटकाए जाने वाले दीप मिले हैं और आवागमन की सुविधा के लिए सड़क के दोनों ओर के घरों तथा भवनों के बड़े द्वार पर दीप योजना भी मिली है। इन द्वारों में दीपों को रखने के लिए कमानदार नक्काशीवाले आलों का निर्माण किया गया था। आरंभिक दीप पात्र स्फटिक, पाषाण या सीप का था। मिट्टी को गढने और पकाने के आविष्कार के साथ यह मिट्टी का बना। आज जिस दिये को हम जलाते है वह अनादिकाल से वैसा ही चला आ रहा है। सदियों के बाद भी उसमें विशेष फेरबदल नहीं हुआ।

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मिट्टी के दीयों को रोशनी करने के लिए पहले दीयों को पानी में भिगोना पड़ता है़  फिर दीयों में सरसों तेल डाल कर रूई से बने बत्ती से रोशनी की जाती है़

इसे विडंबना ही कहेंगे कि कि दुनिया को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में अहम भूमिका अदा करने वाले कुम्हारों की खुद की हालत अंधेरे में है… महंगाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है लेकिन उनके उत्पाद की कीमत आज भी लोग मिट्टी के भाव में ही आंकते हैं। मिट्टी की व्यवस्था कर खरीदना, पूरी मेहनत व लगन से उसे बनाने के बाद भी बाजार में उसकी सही कीमत नहीं मिल पाती।

  • जबकि अब मिट्टी भी महंगे और पकाने के लिए जलावन भी महंगा। श्रम की तो कीमत भी नहीं जोड़ी जाती। हर तरफ महंगाई है लेकिन दीये के भाव में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। बाजार में भी प्रभाव पड़ा है। लोगों का झुकाव बिजली की रोशनी की ओर अधिक हुआ है जिससे दीये की बिक्री कम पड़ने लगी है। लेकिन पारंपरिक रूप से आज भी और हमेशा मिट्टी के बने दीये का महत्व ही अधिक है।

कुम्हार की मेहनत… क्या सही फल मिल रहा है… कुम्हारों पर कबीर दास जी का कहा हुआ दोहा- “माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौदूंगी तोय”, चरितार्थ हो रही है। दिन रात हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी कुम्हारों को एक मजदूर की मेहनताना के बराबर भी आमदनी नहीं हो पा रही है। दिनभर की मेहनत के बाद मात्र 100-120 रुपए की ही कमाई हो पा रही है। इससे उनके परिवार का गुजारा भी नहीं हो पाता।

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कुम्हार मिट्टी से सिर्फ दीये ही नहीं बल्कि गुड़्डा-गुड्डी, लकड़ी की गाड़ी, हाथी, घोड़ा, मिट्टी के खिलौने, मिट्टी का खरगोश, मिट्टी के बर्तनों, मिट्टी की लालटेन, विंड चिम, गणेश-लक्ष्मी सहित अन्य मूर्तियां या फिर सुराही, कुल्हड़, परई, बच्चों के गुल्लक आदि बनाता है।

दिल्ली के नजदीक एक कुम्हार की कहानी… दीपावली के समय करीब डेढ़ लाख दीये बिक जाते थे ने इस बार 20 हजार दीये भी नहीं बेचे हैं। 50 हजार के करीब दीये उनके घर पर बने हुए पड़े हैं लेकिन खरीददार नहीं आ रहे हैं। क्योंकि पहले जहां 101 से 501 तक दीये जलाना प्रतिष्ठा माना जाता था वहीं अब इनकी संख्या शगुन के तौर पर 5 से 21 तक रह गई है।

लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया के नारे से इनको कुछ आश जगी लेकिन इस बार की दीपावली में भी लोगों को मिट्टी के दीयों का क्रेज देखने को नहीं मिल रहा है…कुम्हार बताता है इस समय एक ट्राली मिट्टी मंगवाने के लिए उन्हें दो हजार रुपये देने पड़ रहे हैं। आठ रुपये में एक किलो लकड़ी और चार रुपये एक किलो लकड़ी का बुरादा आता है। ऊपर से दिनभर की मेहनत लेकिन 400 रुपये में एक हजार दीये खरीदने वाले भी इस कला की मार्केटिंग नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि अब हाथ के काम की कीमत नहीं रही।

मिट्टी की जगह मोमबत्ती का बढ़ता महत्व… अब मोमबत्तियां कई डिजाइन में भी आने लगी हैं। केरोसिन तेल की अनुपलब्धता और अन्य चीजों की ऊंची कीमत के कारण मोमबत्ती की खरीदारी की ओर लोगों का रुझान बढ़ा है। इस्तेमाल में आसानी से भी लोग इसकी तरफ बढ़े हैं। इस साल भी तरह-तरह की आकृति की मोमबत्तियां लोगों का अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

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चाइनीज इलेक्ट्रॉनिक बत्तियों से पटा बाजार… रोशनी का त्योहार दीपावली के मात्र 10 दिन शेष बचे है़ं बाजार अभी से ही चाइनीज इलेक्ट्रोनिक बत्तियों से पट चुका है़ लोगों को लुभाने के लिए डिस्को, म्यूजिक एवं मिरचाई बम के आवाज वाले तरह-तरह के लाइटें काफी किफायती कीमत पर बाजार में उपलब्ध है़ं।

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  • 85740 हजार करोड़ से ज्यादा का है चाइनीज व्यापार फेडरेशन आफ इंडियन चैंबर्स आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के सर्वे के अनुसार चीन से करीब 22 प्रकार के ऐसे उत्पाद आयात हो रहे हैं जो भारतीय बाजार के उत्पादों की कीमत से 10 से 70 प्रतिशत तक सस्ते हैं। वर्ष 2009-10 में जहां इनका 9.45 बिलियन डॉलर (9.45 अरब डॉलर यानी कि 56 हजार, 700 करोड़ रुपये) का आयात होता था वहीं वर्ष 2011-12 में यह बढ़कर 14.29 बिलियन डॉलर (14.29 अरब डॉलर करीब 85 हजार, 740 करोड़ रुपये) हो गया था। अब तो इससे भी ज्यादा है।

Happy-Diwali

चीनी पटाखों के कारण शिवकाशी का पटाखा उद्योग संकट में

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·         शिवकाशी में इस समय 728 पटाखा निर्माता इकाइयां हैं जिनमें से 200 बड़ी इकाइयां शामिल हैं

·         इंडस्ट्री का कारोबार 3.5 हजार करोड़ रुपए का है और यहां 5 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है

·         इनमें से 1.75 लाख लोग सीधे तौर पर इंडस्ट्री से जुड़े हैं

·         शिवकाशी और विरुदुनगर जिले के गांवों में देश के कुल 80 फीसदी पटाखे तैयार किए जाते रहे हैं

·         लेकिन अब भारतीय पटाखा बाजार में पटाखों का हिस्सा अब सिर्फ 60 प्रतिशत रह गया है

·         भारत में इनकी तस्करी की शुरूआत वर्ष 1999 से हुई उत्तर भारत में तो इन्होंने शिवकाशी के 25 प्रतिशत बाजार पर कब्जा कर लिया है

·         चीन ने करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा के बाजार पर कब्जा कर लिया है

According to The Hindu… Aug, 25 2014 ‘2,000 containers of Chinese crackers stocked in yards’… Stating that over 2,000 containers of Chinese crackers, worth Rs.600 crore, were illegally stocked in yards and private magazines in North India, he said, “The importers and dealers are waiting for Deepavali season to begin to flood the market with the imported items through licensed and illegal retail outlets.”

चीनी पटाखों की दिल्ली के बाजार में भरमार

  • चीन के पॉप-अप पटाखे बड़ी संख्या में खरीदे जा रहे हैं। इन पटाखों की कीमत महज 20 रुपये से शुरू होती है।
  • सस्ता होने के कारण लोग इन्हें खरीद रहे हैं। ये पटाखे गोली के आकार के हैं, जिन्हें जमीन पर पटकने से आवाज होती है।
  • चीन के पुलिंग पावर पटाखों की भी बाजार में काफी चर्चा है। ये पटाखे एक धागे से बंधे हैं। धागा खींचते ही ये पटाखे तेज आवाज के साथ फटते हैं। इन्हें धागा बम भी कहा जाता है।
  • इनकी कीमत भी महज 30 रुपये से शुरू होती है। चीन के सस्ते उत्पादों पर प्रतिबंध कड़ाई का पालन किया जाना चाहिए।
  • अवैध रूप से बाजार में बेचे जा रहे इन उत्पादों के कारण घरेलू कारीगरों एवं व्यापारियों को काफी नुकसान हो रहा है।

क्यों खतरे में है शिवकाशी का पटाखा उद्योग

  • भारत में तस्करी करके आने वाले चीनी पटाखों से शिवकाशी में पटाखा कारोबार खतरे में पड़ गया है
  • इस वर्ष दीवाली के लिए लगभग 500 कंटेनर भर कर चीनी पटाखे देश में तस्करी करके लाए गए हैं
  • चीनी पटाखों को गैर-कानूनी रूप से भारतीय बाजार में आने से रोका नहीं गया तो उन्हें बहुत ज्यादा नुक्सान होगा
  • चीनी पटाखों में क्लोराइड तथा पर-क्लोराइड होता है जिनका उपयोग देश में प्रतिबंधित है क्योंकि ये रसायन बेहद अस्थिर होते हैं एवं पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते हैं
  • इनके विपरीत भारतीय पटाखों में एल्युमिनियम पाऊडर तथा नाइट्रेट्स का प्रयोग होता है
  • जहां एक किलो एल्युमिनियम पाऊडर का मूल्य 300 रुपए है, वहीं 1 किलो पोटाशियम क्लोराइड केवल 40 से 60 रुपए किलो में मिलता है
  • इतना ही नहीं चीनी पटाखों में जहां केवल 5 से 10 ग्राम क्लोराइड से ही काम चल जाता है
  • वहीं शिवकाशी में बनने वाले पटाखों में समान असर पैदा करने के लिए 100 से 200 ग्राम एल्युमिनियम पाऊडर इस्तेमाल करना पड़ता है
  • ऐसे में भारतीय पटाखों से 40 प्रतिशत सस्ते होने के साथ-साथ चीनी पटाखे उनसे अधिक रंग-बिरंगी रोशनी भी पैदा करते हैं

– शिवकाशी के उघोग को 20 मार्च को तब तगड़ा झटका लगा, जब तमाम शुल्कों में भारी संशोधनों को अधिसूचित किया गया

– 200 टन तक पटाखों के भंडारण पर सालाना शुल्क 15,000 रुपये से 25 गुना बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दिया गया

– एक विनिर्माण इकाई के फोरमैन के लिए अनिवार्य 4 महीने के योग्यता प्रमाण पत्र का शुल्क 100 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये कर दिया गया

– इसके विरोध में तमिलनाडु के शिवकाशी शहर में 7 से 16 अप्रैल के बीच तमाम इकाइयां हड़ताल पर चली गई थीं

– उद्योग संगठन तमिलनाडु फायरवक्र्स ऐंड अमॉर्सेज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (टीएएनएफएएमए) ने औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग (डीआईपीपी) द्वारा जारी  ‘यूजर फीस नोटिस (एक्सप्लोसिव्स)’ के विरोध को अस्थायी रूप से वापस ले लिया है

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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