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सोमरस- क्या है? शराब या चमत्कारिक औषधि

डॉ. संदीप कोहली… कीबोर्ड के पत्रकारsoma_rasa

वैदिक साहित्य में वनस्पतियों के उल्लेख है-किंशुक, करञ्ज, खदिर, दूर्वा, पिप्पल, कमल,आँवला, सेमल, गोधूम मसूर, बेर, अपामार्ग, अर्क, अश्वत्थ, तिल, अर्जुन, तिलपिप्पली, पृश्नपर्णी, विल्ब, उदुम्बर, इक्षु, ल्णक्षा सहदेवी, सोम, मुञ्ज, गुग्गुल आदि- वैदिक काल में वनस्पतियों का विशेष महत्व था। वनस्पतियां जीवनदायिनी मानी जाती थी। शरीर में हुए रोगों को दूर करती थीं। यजुर्वेद- औषधियों और वनस्पतियों से शान्ति-प्राप्ति की कामना करता है। इससे यही सिद्ध होता है कि मानव जीवन वनस्पतियों पर आधारित रहा है। वेदों में जिन प्रमुख वनस्पतियों का उल्लेख है उसमें से एक है ‘सोम’। और इसी सोम से बनाया जाता था ‘सोमरस’। वही सोमरस जिसका सेवन देवता किया करते थे। देवताओं से जुड़े हर ग्रंथ, कथा, संदर्भ में देवगणों को सोमरस का पान करते हुए बताया जाता है। इन समस्त वर्णनों में जिस तरह सोमरस का वर्णन किया जाता है। अब प्रश्न उठता है- क्या सोमरस मदिरा (शराब) थी या औषधि । 

क्या है सोमरस- सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि सोमरस मदिरा (शराब) की तरह कोई मादक पदार्थ नहीं है। हमारे वेदों में सोमरस का विस्तृत विवरण मिलता है। विशेष रूप से ऋग्वेद में तो कई ऋचाएं विस्तार से सोमरस बनाने और पीने की विधि का वर्णन करती हैं।Somras

सोम एक रस है- रस शब्द का सर्वप्रथम व्यवहार वेदों में हुआ। ऋग्वेद में रस  शब्द का प्रयोग कभी मधु, कभी गौ-क्षीर और कभी सोमरस को प्रकट करने के लिए हुआ है। एक स्थल पर रस को उदक के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वेदों में “रस” शब्द से तात्पर्य किसी भी तरलपदार्थ से है और वह “जल” भी हो सकता है।

अथर्ववेद में रस शब्द से तात्पर्य वनस्पतियों के रस से है । वहाँ वनस्पतियों के रस में जलों के रस के मिलने की कामना की गयी है । इसी संहिता के एक अन्य मन्त्र में जलों के रसको वनस्पतियों के रस से पहले उत्पन्न माना गया है। परन्तु सभी वनस्पतियों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है “सोमरस के अर्थ में रस का प्रयोग।”

सोम हिमालय पर्वत पर प्राप्त होने वाली एक लता है जिसको कूटने के बाद निचोड़कर उसका रस निकाला जाता हे और देवतागण उसका पान करते हैं। यह सोम रस वैदिक देवताओं कासबसे प्रिय पेय था। ऋग्वेद में सोमरस का अत्यधिक उत्कृष्ट वाणी में स्तवन (स्तुति) किया गया है।

सोम संसार को धारण करने वाला, इन्द्रिय पोषक रस को धारण करता हुआ, उत्तम वीरता प्रदान करने वाला और हिंसा से रक्षा करने वाला है । यह सोम अग्नि, वायु और सूर्य इन तीनों रूपों को धारण करने वाला है। सोम की सामर्थ्य इसकी इस विशेषता से ही है कि संसार का प्रत्येक जीव सोम के तेज से उत्पन्न होता है और यह जगत् इसके आश्रित है। यह सोम रस आरम्भिक काल में देवताओं के द्वारा स्फूर्तिदायक पेय के रूप में ग्रहण किया जाता रहा होगा क्योंकि वेद में कुछ ऐसे उद्धरण प्राप्त होते हैं जिनमें देवता लोग सोम को पाने के लिए प्रायः उनकी मंत्रों और स्तुतियों से प्रार्थना करते थे जिस प्रकार मल्लाह नाव चलाता है उसी प्रकार यह सोम यज्ञ में यथार्थ वचन रूप स्तुतियों को प्रेरित करता है। यह सोम चेतना को आत्मसात् कर लेता है । जिस प्रकार रथी अपने अश्व को चलाता है उसी प्रकार यह सोम अपनी तरंगों को चलाता है। सोम को कहीं विश्वस्रष्टा, क्रान्तकर्मा, रक्षक एवं आनन्ददायक के रूप में वर्णित किया गया है।

इस प्रकार सोम के अर्थ में रस का प्रयोग विशिष्ट हो गया। सोमरस का आस्वाद अपूर्व था। इसमें कुछ ऐसी विशेषतायें थीं, जिनके कारण उसके पान करने से विचित्र आनन्द की प्राप्ति होती थी, साथ ही शरीर और मन में स्फूर्ति तथा मद का संचार होता था। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में वाणी के लिए प्रयुक्त स्वादु, मधु आदि विशेषणों का प्रयोग इस विचार को प्रमाणित करता है कि रस के लिये वाक् शब्द के प्रयोग का भी वैदिक साहित्य में विवरण उपलब्ध होता है-

वचः स्वादो स्वादीयो रुद्राय वर्धनम् ।। ‘अर्थात् रुद्र को प्रसन्न करने के लिये स्वादु से भी स्वादु वचन। इसके अतिरिक्त ‘पिबत्वस्य गिर्वणः’, ‘मध्व ऊषु मधुयुवा रुद्रा सिषक्तिं पिप्युषी, वाचा वदामि’मधुमद् भूयासं मधुसन्दृशः’,’ तथा ‘वाचों मधु पृथिवि! छेहि मह्यम्” आदि से यहस्पष्ट हो जाता है कि रस के अर्थ में ‘वाक्’ का प्रयोग किया जाता है

ऋग्वेद में उल्लेखित है- “जो पुरुष पवमान ऋचाओं (सोमयुक्त) के रूप में ऋषियों द्वारा सम्भृत रस का पान करता है, वह पवित्र और स्वादिष्ट अन्न का आनन्द लेता है उस वेद वाणी के लिए देवी सरस्वती दूध, घृत और सोम का दोहन करती हैं। यहाँ ‘पावमान’ शब्द सोम के लिए प्रयुक्त है ।

भौतिक गुणों के साथ आध्यात्मिकता का समावेश- सोम एक प्रकार का भौतिक रस है। परन्तु जब इसका प्रयोग आध्यात्मिक रूप में किया जाता है तो यह विश्वव्यापक और अमरता को प्राप्त कर लेता है। जहां भौतिक रस के रूप में यह केवल मानवीय है, वहीं अध्यात्म के रूप में दैवीय स्पर्श से अलंकृत हो जाता है। रस के इन दोनों ही रूपों से सम्बन्धित मन्त्र ऋग्वेद में सोम की स्तुतियों में प्राप्त होते हैं ।

उपनिषदों में जिस प्रकार वेदों की अनेक भौतिक कल्पनाओं को सूक्ष्म आध्यात्मिक रूप दे दिया गया उसी प्रकार रस का भी आध्यात्मिक रूपान्तर हुआ। जहां वेदों में रस केवल मधु या सोमरस अथवा दुग्ध का ही अर्थ देता रहा। वहीं उपनिषदों में इनके मूल स्थित स्वाद की भावना का आधार लेकर यही रस मुख्यार्थ का बाधक होकर प्राणस्वरूपमाना जाने लगा। दूसरे शब्दों में उपनिषदों में रस द्रव्य के अर्थ में तो नहीं परन्तु द्रव्य-जनितशक्ति और आनन्द के रूप में प्रयुक्त हुआ । इसके अतिरिक्त न केवल द्रव्य-जनितशक्ति के रूप में बल्कि इससे भी सूक्ष्मतर रूप में तन्मात्राओं के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

वृहदारण्यक उपनिषद् में ‘प्राणो वा अंगानां रसः” कहकर रस को सार भूततत्त्व कहा गया है । तैत्तिरीय उपनिषद् में स्वयं ब्रह्म को ही रस स्वरूप कहा गया है ।वह अर्थात् ब्रह्म रस स्वरूप है ।

शक्ति, तन्मयता और आनन्द का समावेश- उपर्युक्त विवरण के अतिरिक्त ‘आनन्द’ तथा ‘काम’ के रूप में भी रस के अर्थका विकास वैदिक युग में ही हुआ । आनन्द शब्द सम्पूर्ण ऋग्वेद में दो बार प्राप्त होताहै । वह भी सोम की स्तुति में ही।एक मन्त्र के अनुसार ऋत्विज जन सोम की स्तुतिमें छन्दोबद्ध वर्णन करते हुये सोम लता को पत्थर पर पीसने से उत्पन्न ध्वनि से आनन्द काअनुभव करते थे । इसका अभिप्रायः यह हो सकता है कि जब ऋत्विज् जन सोम लताको पत्थर पर पीसते थे और साथ-साथ सोम की स्तुति में मंत्रों का पाठ भी करते थे तबपीसने से उत्पन्न ध्वनि और मंत्रों के उच्चारण से एक आनन्द प्राप्त होता था ।

आनन्द की प्रकृति को समझने से “कामस्य यत्राप्ताः कामाः इस विचार कोभी स्थान प्राप्त होता है । इसके अनुसार व्यक्ति की सभी इच्छाओं के पूर्ण होने सेअथवा सभी इच्छाओं से रहित हो जाने से परम आनन्द की प्राप्ति होती है 12 काम(इच्छा) और रस की इस दशा का वर्णन अर्थर्ववेद में इस प्रकार प्राप्त होता है –

“अकामोधीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्च नोनः”

अर्थात् वह आत्मा अकाम् अर्थात्इच्छाओं से रहित, धीर, अमृत, स्वयं उत्पन्न; अपने रस से स्वतः तृप्त रहता है।  अतः कहा जा सकता है कि सोम रस के संसर्ग से रस की अर्थ परिधि में क्रमशः शक्ति, तन्मयता और अन्त में आनन्द का समावेश हो गया ।

सोम और सुरा में अंतर

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हमारे धर्मग्रंथों में मदिरा के लिए मद्यपान शब्द का उपयोग हुआ है, जिसमें मद का अर्थ अहंकार या नशे से जुड़ा है। इससे ठीक अलग सोमरस के लिए सोमपान शब्द का उपयोग हुआ है, जहां सोम का अर्थ शीतल अमृत बताया गया है।

वैदिककाल में मद्यपान का प्रचलन- वैदिक कालीन समाज कृषि प्रधान था। और वैदिक काल में सोम और सुरा का प्रचलन था। सोमयज्ञो में सोम एवं सोत्रामणी में सुरापान किया जाता था। वैदिक आर्य अपने इष्ट देवता इन्द्र को सोम व सुरा अर्पित करने के बाद पीते थे।

ऋग्वेद में दो प्रकार के मादक पेयों सोम और सुरा का उल्लेख है- सोम पुरोहितों और देवताओं द्वारा ग्रहण करने वाला पेय पदार्थ था। सुरा जन-साधारण द्वारा उपयोग किया जाने वाला पेय पदार्थ था। ऋग्वेद‘ में मद्य का एक नाम मत्सर भी है। इसका प्रसिद्ध अर्थ लोभ है।

ऋग्वेद में सोम और सुरा में फर्क बताया गया है ऋग्वेद में सुरा की घोर निंदा करते हुए कहा गया है-

हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।

अर्थात: सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

तैत्तिरीय ब्राह्मण‘ (1-3-3-3) का कहना है:

एतद् वै देवानां परममन्नं यत्सोम:एतन्मनुष्याणां यत्सुरा.

अर्थात: सोम देवताओं का परम अन्न है और सुरा मनुष्यों का परम अन्न है.

शतपथब्राह्मण‘ (12-7-3-94) कहता है:

यशो हि सुरा.

अर्थात: सुरा से यश फैलता/मिलता है

तैत्तिरीय ब्राह्मण‘ ( 1-3-3-4) कहता है:

पुमान् वै सोम: स्त्री सुरा (तैत्तिरीय ब्राह्मण 1-3-3-4)

अर्थात: सोम को पुंलिंग (पुरुष) और सुरा (स्त्री) को उस की पत्नी कहा गया है।

सौत्रामणी नामक यज्ञ में तो सुरापान का विधान है

सौत्रामण्यां सुरां पिबेत्. शतपथब्राह्मण (12-8-1-2)

इसीलिए सौत्रामणी यज्ञ को सुरावाला (सुरावान्) यज्ञ कहा है

सुरावान् वा एष बहिंषद् यज्ञो यत् सौत्रामणी।

देवताओं के लिए सुर‘ शब्द का प्रयोग होता है, जो उन के सुरापान करने के कारण ही अस्तित्व में आया है. आप्टे ने अपने कोश में ‘सुर’ शब्द का अर्थ बताते हुए ‘रामचरितम्’ का उद्धरण दिया है

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्यभिविश्रुता:.

अर्थात: सुरा ग्रहण करते रहने के कारण देवता ‘सुर’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

सोमरस और सुरा में फर्क है ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है-

हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।

अर्थात: सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

सुरा कैसे सोमरस से अलग है… सुरा बनाने की विधि

यजुर्वेद के एक मन्त्र में सुराकार अर्थात्सुरा बनाने वाले की ओर सङ्केत किया गया है – कीलालाय सुराकारम् । इस मन्त्र का कथन है कि सुराबनाने वाला सुराकार है। यजुर्वेद के अन्य मन्त्रों में सुरा निर्माण की प्रक्रिया का भी वर्णन किया गया है-

शष्पाणि… तोक्मानि… सोमस्य लाजा.

सोमांशवो मधु।

मासरं… नग्नहुः । रूपमेतद् उपसदाम्

एतत् तिस्त्रो रात्री: सुराऽऽसुता।

अर्थात: इन मन्त्रों में कहा गया है कि अङ्कुरित चाँवल, अङ्कुरित जौ और खील का चूरा, सोमरस में डालकर तीन रात तक रखने से सुरा तैयार हो जाती है। 

वेदों में दी गई इन ऋचाओं में सोमरस का विस्तृत वर्णन किया गया है… ऋग्वेद की एक ऋचा में लिखा गया है कि ‘यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इन्द्रदेव को प्राप्त हो।। (ऋग्वेद-1/5/5) …हे वायुदेव! यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है। आइए और इसका पान कीजिए।। (ऋग्वेद-1/23/1)

शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदुनिम्नं न रीयते।। (ऋग्वेद-1/30/2)

अर्थात: नीचे की ओर बहते हुए जल के समान प्रवाहित होते सैकड़ों घड़े सोमरस में मिले हुए हजारों घड़े दुग्ध मिल करके इन्द्रदेव को प्राप्त हों।

इन सभी मंत्रों में सोम में दही और दूध को मिलाने की बात कही गई है, जबकि यह सभी जानते हैं कि शराब में दूध और दही नहीं मिलाया जा सकता। भांग में दूध तो मिलाया जा सकता है लेकिन दही नहीं, लेकिन यहां यह एक ऐसे पदार्थ का वर्णन किया जा रहा है जिसमें दही भी मिलाया जा सकता है। अत: यह बात का स्पष्ट हो जाती है कि सोमरस जो भी हो लेकिन वह शराब या भांग तो कतई नहीं थी और जिससे नशा भी नहीं होता था अर्थात वह हानिकारक वस्तु तो नहीं थी। देवताओं के लिए समर्पण का यह मुख्य पदार्थ था और अनेक यज्ञों में इसका बहुविध उपयोग होता था। सबसे अधिक सोमरस पीने वाले इन्द्र और वायु हैं। पूषा आदि को भी यदा-कदा सोम अर्पित किया जाता है, जैसे वर्तमान में पंचामृत अर्पण किया जाता है।

ऋग्वेद में रस शब्द का प्रयोग कभी मधुकभी गौ-क्षीरकभी सोमरस अथवा कभी रस युक्तता को प्रकट करनेके लिए हुआ है ।

ऋग्वेद के मन्त्रों में द्यावापृथिवी में हाइड्रोजन की उपस्थिति सोम के रूप में कही गयी है –

यं सोममिन्द्र पृथिवीद्यावा गर्भं न माता बिभृतस्त्वाया।

धृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते धृतश्रिया धृतपचा धृतावधा।

अर्थात: उपर्युक्त मन्त्रों में हाइड्रोजन की उपस्थिति पृथिवी और आकाश में सर्वत्र बताते हुए हाइड्रोजन को ही द्यावापृथिवी में वृद्धि, विस्तार और प्रकाश का कारण कहा है साथ ही मन्त्र में यह भी कहा गया है किसोम को द्यावापृथिवी ने गर्भस्थ बालक की तरह अपने अन्दर धारण किया हुआ है।

ऋग्वेद के एक मन्त्र का कथन है कि सोम देवों का पेय पदार्थ है –

अश्नवत् सोमसुत्वा।

अर्थात: सोम का अर्क निकालने की प्रक्रिया को सोम सुति और सोमसुत्या कहते थे और इस प्रकिया सेरस निकालने वाले सोमसुत् और सोमसुत्वन् कहलाते हैं। इस कार्य को पवित्र माना गया है। ऋग्वेद कापूर्ण नवम् मण्डल (११०८ मन्त्र) सोम के विषय में हैं। द्राक्षासव के समान ही सोम का भी आसव तैयारकिया जाता था जिसे देवता पेय पदार्थ के रूप में ग्रहण करते थे।

ऋग्वेद में कहा गया है कि जल में सोम आदि रसों को मिलाकर सेवन करने से मनुष्य दीर्घायु होता है-

यद् देवा अदः सलिलेसुसंरब्धा अतिष्ठत।

मन्त्र में कहा गया है कि जल में हमेशा देव तैयार होते हैं तथा जल में कोई भी कभी भी इच्छानुसार परीक्षण कर सकता है

इस मन्त्र का कथन है कि सोम के मिश्रण से तीन प्रकार के पेय बनाये जाते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से त्र्याशिर: कहते हैं।

सोमा इव त्र्याशिरः।

दही के मिश्रण से बना पेय दध्याशिर्, सत्तू के मिश्रण से बना पेय यवाशिर् एवं दूधआदि के मिश्रण से बना पेय गवाशिर् कहलाता है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में मध्वो रसम् कहकर मधुरसायन का भी वर्णन किया गया है। इसमें सोम के तुल्य ही मधु (शहद) का आसव और रसायन तैयारकिये जाने का वर्णन है

एक मन्त्र में सुरा निर्माण करने वाले को सुरावत् कहा गया है। ऋग्वेद के ही एक अन्य मन्त्र मेंसुरा रखने के पात्र, पीने के पात्र एवं उससे उत्पन्न होने वाली बीमारी का सङ्केत किया गया है। इस मन्त्र मेंसुरा रखने के पात्र को सुराधान, सुरा पीने के पात्र को सुराकंस एवं सुरा से उत्पन्न होने वाली बीमारी कोसुराम कहा गया है।

सुरा को समझने के लिए इन दो शब्दों सौत्रामणी’ और किण्वीकरण‘ को समझना होगा-

  • सौत्रामणी यज्ञ क्या है जिसमें सुरा का प्रयोग होता था- सौत्रामणि = सु त्रमण = अर्थात उत्तम प्रकार से रक्षा करना।  तैत्तरीय संहिता में इन्द्र कि बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करने के लिए सौत्रामणि यज्ञ का वर्णन है।
  • सुरा में किण्वीकरण‘ होना आवश्यक- सोम और सुरा में एक मुख्य अंतर यह भी है कि सोमरस सोमलता को कूटकर निकाला हुआ रस है। जबकि सुरा में ‘किण्वीकरण’ होना आवश्यक है। किण्वीकरण एक विधि है इसके द्वारा किसी भी शक्करमय पदार्थ या स्टार्चमय पदार्थ से ऐल्कोहल व्यापारिक मात्रा में बनाई जाती है। इस अभिक्रिया को आज की साइंटिफिक भाषा में लिखा जा सकता है- C6H12O6 → 2 C2H5OH + 2 CO2

सौत्रामणि यज्ञ- इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता हैउसे सौत्रामणि यज्ञ कहते हैं। वह दो प्रकार का होता है- प्रथम स्वतन्त्र और द्वितीय अंगभूत। स्वतन्त्र भूत केवल ब्राह्मणों के लिये विधेय है और अँगभूत, क्षत्रिय और वैश्यों के लिये।

  • इस यज्ञ के दो भेद हैं – 1- कौकिली 2- चरक सौत्रामणि। कौकिली सौत्रामणि में साम मन्त्रों का गायन किया जाता है। चरक सौत्रामणि साधारण सौत्रामणि है जिसका सम्पादन प्रायः राजसूय यज्ञ के एक माह बाद किया जाता है। इस यज्ञ में तीन दिनों तक भिन्न-भिन्न प्रकार की सुरा बनाई जाती है। आजकल सुरा कीजगह दूध का प्रयोग किया जाता है।
  • तैत्तिरीय संहिता (2.5.1) तथा शतपथ ब्रह्माण (1.6.3, 5.5.4) में त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गाथा आयी है। विश्वरूप के तीन सिर थे, एक से वह सोम पीता था, दूसरे से सुरा और तीसरे से भोजन करता था। इन्द्र में विश्वरूप के सिर काट डाले, इस पर त्वष्टा बहुत क्रोधित हुआ और उसने सोमयज्ञ किया जिसमें इन्द्र को आमन्त्रित नहीं किया। इन्द्र ने बिना निमन्त्रित हुए सारा सोम पी लिया। इतना पीने से इन्द्र को महान कष्ट हुआ, अत: देवताओं ने सौत्रामणी नामक इष्टि द्वारा उसे अच्छा किया। सौत्रामणि यज्ञ उस पुरोहित के लिए भी किया जाता था जो अधिक सोम पी जाता था। इससे मदमत्त व्यक्ति वरम या विरेचन करता था। (देखिए कात्यायन श्रौतसूत्र 19.1.14) शतपथ ब्राह्मण (12.7.3.5) एवं कात्यायन श्रौतसूत्र (191.20-27) में सुरा बनाने की विधि बतायी गयी है। जैमिनि (3.5.14-15) में सौत्रामणी यज्ञ के विषय में चर्चा है। इस यज्ञ में कोई ब्राह्मण बुलाया जाता था और उसे सुरा का तलछट पीना पड़ता था।

सुरा के प्रकार

बौधायन ग्रन्थ में सुरा के अलावा वारूणी और शीघ्र का भी वर्णन है।

पचित्तिय में पिठ-सुरा, पूव-सुरा, ओदन सुरा (किण्वयाकिखत्ता संभारसंयुत्ता) तथा मैरेय का उल्लेख है।

कौटिल्य ने बेदक, प्रसन्ना, आसव, अरिष्ठ, मरैय व मधु के अलावा कापिशायन और हारहूरक आदि मद्य का वर्णन है।

रामायण में भी मैरेय, सुरा और वारूणी का उल्लेख है। शर्करासव, माध्वीक, पुष्पासव और फलासवका भी रामायण में वर्णन है।

चरक ने सुरा, मदिरा, अरिष्ट, शार्कर, गौड़, मद्य, मधु आदि को मद्यपेय माना है।

सुश्रुत सूत्र में सामान्य सुरा, श्वेतसुरा यवसुरा, शीधु, नरैया और आसव का वर्णन है।

वाणभट्ट ने सुरा वारूणी, अरिष्ट, मार्दीक, खार्जूर, शर्करा, शीधु, आसव, मध्वासव आदि मद्यों का वर्णन है।

कालीदास ने नारिकेलासव, शीधु, पुष्पासव, मधु, द्राक्षासव, वारूणी व हाला आदि मद्य बताया है।

मादक पेय के रूप में सुरा‘ और मैरेय‘ के उल्लेख मिलते हैं- जातकों में मधुशाला के वर्णन उपलब्ध होते हैं। महावग्ग में मज्जा का उल्लेख है। यह एक प्रकार की सुरा थी जिसका प्रयोग औषधि के रूप में होता था। जातकों से ज्ञात होता है कि लोग उत्सव के दिन जी भरकर खाते पीते और आनन्द मनाते थे जिसमें मद्यपान का प्रमुख स्थान रहताथा। इनमें एक उत्सव का नाम ही सुरानक्षत्र पड़ गया, अनियन्त्रित सुरापान, नृत्य, संगीत और भोजन इसकी प्रमुख विशेषताएँ थी। विनयपिटक के अनुसार श्रमण तथा भिक्षु के लिए सुरापान वर्जित था।

वैदिक काल में मद्यपान का प्रचलन 

सोम का प्रयोग केवल देवगण एवं पुरोहित लोग कर सकते थे, किन्तु सुरा का प्रयोग अन्य कोई भी कर सकता था, और वह बहुधा देवगणों को समर्पित नहीं होती थी। 

सोम के अलावा 13 प्रकार के अन्य मद्यों का उल्लेख आता है- सुरा, हलिप्रिया, हाला, परिसुत, वरूणात्मजा, गन्धोत्तमा, प्रसन्ना, इरा, कादम्बरी, परिसुता, मदिरा, कश्यम् और मद्यम।a-6-abc

मद्य पान का उल्लेख

  • मदिरा पान के समय खाने वाले नमकीन का ‘नाम अवदश बताए गया है।
  • मदिरा पीने की अवसर के भी दो नाम बताए गये हैं – मधुवार, मधुक्रम।
  • महुए की शराब के चार नाम बताए गए हैं- मध्वासन, माधवक, मधु, मार्दीकम।
  • ईख से निर्मित शराब के तीन नाम- मेरेयम, आसव एवं शीधु बताए गए हैं।
  • मदिरा निर्माण के दो नाम- सन्धानम् एवं अभिषव बताए गए हैं।
  • मदिरा पीने के स्थानों के नाम शुण्डा, पानम्, मदस्थानम्, आपानम्पान गोष्ठिका बताए गए हैं।
  • मदिरा के काढ़े के लिए पिसे हुए पदार्थ का नाम मेदक, जगल बताए गया है।
  • मदिरा पीने के चषक के दो नाम – चषक एवं पानपात्रम् बताए गए हैं।
  • शराब पीने या परोसने का नाम सरक अनुतर्षणम् बताया गया है।

याज्ञवल्क्य में रंगरेज, वधिक, रजक, बंदीजन, मद्य बेचने वाले कुलाल, तेलीया गाड़ीवान के घर अन्न ग्रहण करने का निषेध है।

भागवतमहापुराण (स्कन्ध 8, अध्याय 5) के अनुसार चाक्षुष-मन्वन्तर (पौराणिक कालगणनानुसार लगभग 42.89 करोड़ वर्ष पूर्व) भगवान् विष्णु का कच्छप-अवतार हुआ एवं क्षीरसागर के मन्थन से 14 रत्नों में से नौवे क्रम में निकली सुरा लिए हुए वारुणी देवी। भगवान की अनुमति के बाद वारुणी देवी ने सुरा को असुरों को सौंप दिया गया।

ऋग्वेद (7.86.6) में वसिष्ठ ऋषि ने वरिण से प्रार्थना भरे शब्दों में कहा है कि मनुष्य स्वयं अपनी वृत्ति या शक्ति से पाप नहीं करता, प्रत्युत भाग्य, सुरा, क्रोध जुआ एंव असावधानी के कारण वह ऐसा करता है। सोम एवं सुरा के विषय में अन्य संकेत देखिए ऋग्वेद (8.2.12, 1.116.7, 1.191.10, 10.107.9, 10.13.4 एंव 5)।

अथर्ववेद (4.34.6) में ऐसा आया है कि यज्ञ करने वाले को स्वर्ग में घृत एवं मधु की झीलें एवं जल की भांति बहती हुई सुरा मिलती है। ऋग्वेद (10.131.4) में सोम-मिश्रित सुरा को सुराम कहते हैं और इसका प्रयोग इन्द्र ने असुर नमुचि के युद्ध में किया था। अथर्ववेद में सुरा का वर्णन कई स्थानों पर हुआ है, यथा 14.1.35-36, 15.9.2-3। वाजसनेयी संहिता (19.7) में भी सुरा एंव सोम का अन्तर स्पष्ट किया गया है।

शतपथ ब्राह्मण (5.5.4.28) में सोम को ‘सत्य, समृद्धि एंव प्रकाश’ तथा सुरा को ‘असत्य, क्लेश एंव अंधकार’ कहा है। इसी ब्राह्मण (5.5.4.21) ने सोम और सुरा के मिश्रण के भयानक रुप का वर्णन किया है।

काठकसंहिता (12.12) में मनोरंजक वर्णन आया है; प्रौढ़, युवक, वधुएं और श्वशुर सुरा पीते हैं, साथ-साथ प्रलाप करते हैं; मूखर्ता (विचारहीनता) सचमुच अपराध है। इसलिए ब्राह्मण यह सोचकर कि यदि मैं पीऊंगा तो अपराध करूंगा, सुरा नहीं पीता, अत: यह क्षत्रिय के लिए है; ब्राह्मण से कहना चाहिए- यदि क्षत्रिय सुरा पीये तो उसकी हानि नहीं होगी”। इस कथन से स्पष्ट है कि काठकसहिंता के काल में सामान्यत: ब्राह्मण लोग सुरा पीना छोड़ चुके थे। सौत्रामणी यज्ञ में सुरा का तलछट पीने के लिए भी ब्राह्मण का मिलना कठिन हो गया था।

तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.8.6) ऐतरेय ब्राह्मण (37.4) में अभिषेक के समय पुरोहित द्वारा राजा के हाथ में सुरापात्र का रखा जाना वर्णित है। छान्दोग्योपनिषद् (5.10.9) में सुरापान करने वाले को पांच पापियों में परिगणित किया गया है। इसी उपनिषद् (5.11.5) में केकय के राजा अश्वपति ने कहा है कि उसके राज्य में मद्यप नहीं पाये जाते।

कुछ गृह्यसूत्रों में एक विचित्र बात पायी जाती है- अन्वष्टका के दिन जब पुरुष पितरों को पिण्ड दिया जाता है तो माता, पितामही (दादी) एवं प्रपितामही को पिण्डमान के साथ सुरा भी दी जाती है। उदाहरणार्थ, आश्व- लायनगृह्यसूत्रों (2.5.5) में आया है- “पितरों की पत्नियों को सुरा दी जाती है और पके हुए चावल का अवशेष भी”। यही बात पारस्करगृह्यसूत्रों (3.3) में भी पायी जाती है।

काठकगृह्यसूत्र (65.7-8) में आया है कि अन्वष्टका में नारी पितरों के पिण्डों पर चमस से सुरा छिड़की जानी चाहिए और वे पिण्ड नौकरों या निषादों द्वारा खाए जाने चाहिए, या उन्हें पानी या अग्नि में फेंक देना चाहिए या ब्राह्मणों को खाने के लिए दे देना चाहिए। इस विचित्र बात का कारण बताना कठिन है। यदि अंदाजा लगाए तो कहा जा सकता है कि (1) उन दिनों नारियां सुरापान किया करती थीं (सम्भवत: लुक-छिपकर), या (2) गृह्यसूत्रों के काल में अंतर्जातीय विवाह चलते थे और घर में क्षत्रिय और वैश्य पत्नियां सुरापान किया करती थीं।

मनु (11.15) ने ब्राह्मणों के लिए सुरापान वर्जित माना है, किन्तु कुल्लूक का कथन है कि कुछ टीकाकारों के मत से यह प्रतिबन्ध नारियों पर लागू नहीं होता था। गृह्यसूत्रों की दृष्टि में उपर्युक्त छूट के लिए जो भी कारण रहे हों, किन्तु यह बात काठकसंहिता एंव ब्राह्मण ग्रन्थों के लिए ही नहीं प्रत्युत अकमत से धर्मसूत्रों एंव स्मृतियों के लिए पूर्णरूपेण अमान्य रही है।

गौतम (2.25), आपस्तम्बधर्मसूत्र (1.5.17.21), मनु (11.14)  ने एक स्वर से ब्राह्मणों के लिए सभी अवस्थाओं में सभी प्रकार की नशीली वस्तुओं को वर्जित जाना है। सुरा या मद्य का पान एक महापातक कहा गया है (आपस्तम्बधर्मसूत्र 1.7.21.8, वसिष्ठधर्मसूत्र 1.20, विष्णुधर्मसूत्र 15.1, मनु 11.54, याज्ञवल्क्य 3.227)। यह सब होते हुए भी बौधायनधर्मसूत्र (1.2.4) ने लिखा है कि उत्तर के ब्राह्मणों के व्यवहार में लायी जाने वाली विचित्र पांच वस्तुओं में सीधु (आसब) भी है। इस धर्मसूत्र ने उन सभी विलक्षण पांचों वस्तुओं की भर्त्सना की है।

मनु (11.13-14) की ये बातें निबन्धों एंव टीकाकारों ने उद्धत की हैं- “सुरा भोजन का मल है, और पाप को मल कहते हैं, अंत: ब्राह्मणों, राजन्यों (क्षत्रियों) एंव वैश्यों को चाहिए कि वे सुरा का पान न करें। सुरा तीन प्रकार की होती है- गुड़ वाली, आटे वाली तथा मधूक (महुआ) के फूलों वाली (गौड़ी, पैष्टी एंव माध्वी), इनमें किसी को भी ब्राह्मण ने पीये”।

महाभारत (उद्योगपर्व 55.5) में वासुदेव एवं अर्जुन मदिरा (सुरा) पीकर मत्त हुए कह गये हैं। यह मदिरा मधु से बनी थी। तन्त्रवार्तिक (पृ. 209-210) ने लिखा है कि क्षत्रियों को यह वर्जित नहीं थी अत: वासुदेव एवं अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते पापी नहीं हुए।

मनु (11.93-94) एवं गौतम (2.25) ने ब्राह्मणों के लिए सभी प्रकार की सुरा वर्जित मानी है, किन्तु क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिए केवल पैष्टी वर्जित है। शूद्रों के लिए मद्यपान वर्जित नहीं था, यद्यपि वृद्ध हारीत (9.277-278) ने लिखा है कि कुछ लोगों के मत से सत्-शूद्रों को सुरापान नहीं करना चाहिए। मनु की बात करते हुए वृद्ध हारीत ने कहा है कि झूठ बोलने, मांस- भक्षण करने, मद्यपान करने, चोरी करने या दूसरे की पत्नी चुराने से शूद्र भी पतित हो जाता है। प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी को सुरापान से दूर रहना पड़ता था- (आपस्तम्बधर्मसूत्र 1.1.2.23, मनु 2.177 एवं याज्ञवल्क्य 1.33)।

महाभारत (आदिपर्व 76.77) ने शुक्र, उनकी पुत्री देवयानी एवं शिष्य कच की गाथा कही है और लिखा है कि शुक्र ने सबसे पहले ब्राह्मणों के लिए सुरापान वर्जित माना और व्यवस्था दी जी उसके उपरान्त सुरापान करने वाला ब्राह्मण ब्रह्महत्या का अपराधी माना जायेगा। मौशलपर्व (1.29-30) में आया है कि बलराम ने उस दिन से जब कि यादवों के सर्वनाश के लिए मूसल उत्पन्न किया गया, सुरापान वर्जित कर दिया और आज्ञा दी कि अनुशासन का पालन न करने से लोग सूली पर चढ़ा दिए जाएंगे।

शान्तिपर्व (34.20) ने यह भी लिखा है कि यदि कोई भय या अज्ञान से सुरापान करता है तो उसे पुन: उपनयन करना चाहिए। विष्णुधर्मसूत्र (22.83-84) के अनुसार ब्राह्मणों के लिए वर्जित मद्य 10 प्रकार की हैं- माधूक (महुआ वाली) , ऐक्षव (ईख वाली), टांक (टंक या कपित्थ फल वाली) कौल (कोल या बदर या उन्नाव नामक बेर वाली), खार्जूर (खजूर वाली), पानस (कटहर वाली) अंगूर, माध्वी (मधु वाली), मैरेय (एक पौधे के फूलों वाली) एवं नारिकेलज (नारिकेल वाली) किन्तु ये दसों क्षत्रियों एवं वैश्यों के लिए वर्जित नहीं है। सुरा नामक मदिरा चावल के आटे से बनती थी।

मनु (9.80) एवं याज्ञवल्क्य (1.73) के मतानुसार मद्यपान करन वाली पत्नी (चाहे वह शूद्र ही क्यों न हो और ब्राह्मण को ही क्यों न ब्याही गयी हो) त्याज्य है। मिताक्षरा ने उपर्युक्त याज्ञवल्क्य के कथन की टीका में पराशर (10.26) एंव वसिष्ठधर्मसूत्र का हवाला देते हुए कहा है कि मद्यपान करने वाली स्त्री के पति का अर्ध शरीर बड़े भारी पाप का भागी होता है।

धर्मसूत्रों में मद्य के प्रकार 

गौतम धर्मसूत्र में सुरा का ही वर्णन मिलता है। आपस्तम्ब (प्रमुख धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में प्रायश्चित विधान- शिखा शर्मा) ने भी सुरा शब्द का ही प्रयोग किया है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र के अनुसार सुरापान करने वाला व्यक्ति अग्नि पर खौलाई गयी सुरा पिये।  बौधायन (बौधायन धर्मसुत्र) ने सुरा के अलावा वारूणी और शीघ्र का भी वर्णन किया है।

ऋग्वेद के वर्णन से लगता है कि मधु भी मादक पेय था, मधु का प्रयोग रस के संदर्भ में किया गया है। ऋग्वेद के एक श्लोक “स्वादु रसो मधुपेयो वराय” (6.44.21) में इससे राजा के मस्त होने का उल्लेख है।

बौद्ध साहित्य संयुक्त निकाय में सुरा और मैरेय का वर्णन मिलता है। धम्मपद में भी इन्हीं का वर्णन मिलता है। धम्मपद , 22/4,5(5) सुरा – मैरेय – मद्य – विरमणम् – “बौद्धभिक्षवे गृहस्थाय च सुरापानम् , मद्यपानम् , मादक वस्तु सेवनं च वर्जितमस्ति”। महावग्ग (89-223) में मज्जा का उल्लेख है। यह एक प्रकार की सुरा थी जिसका प्रयोग औषधि के रूप में होता था।

पाचित्तिय (भाग-6) में सुरा के अनेक प्रकारों का वर्णन मिलता है- मैरेय एक प्रकार की सुरा है जिसे फूलों के आसव से बनाया जाता था। इसके भी कई प्रकारों का वर्णन मिलता है जैसे – पुष्पों से बना पुष्पासव, फलों से बना फलासव और मधु से बना मध्वासव। पाचवें उपदेश में सूरा, मैरेय और मज्जा (मद्य) के सेवन पर प्रतिबंध की बात की गई है। कई और सुरा का वर्णन भी मिलता है- पिठ-सुरा, पूव-सुरा, ओदन सुरा, जो किण्वयक्खित्ता यानी फर्मेंटेशन के जरिए बनाई जाती थी।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र (अध्यायः25, 02.25.16) में मद्य के कई प्रकारों का वर्णन किया है – मेदक, प्रसन्ना,आसव, अरिष्ट, मैरेय और मधु। कौटिल्य ने कापिशायन और हारहूरक नामक मद्य का भी वर्णन किया है। सुरा के प्रकारों का वर्णन करते हुए कौटिल्य ने इसके चार प्रकार बताये हैं –सहकारसुरा, रसोत्तरा,बीजोत्तरा और सम्भारिका।

रामायण (बालकाण्ड- 1/45-23&25) में मद्य निम्न प्रकार मैरेय, सुरा और वारूणी का वर्णन मिलता है। वरुणस्य ततः कन्या वारुणी रघुनन्दन।। उत्पपात महाभागा मार्गमाणा परिग्रहम्। दितेः पुत्रा न तां राम जगृहुवरुणात्मजाम्।। अदितेस्तु सुता वीर जगृहुस्तामनिन्दिताम् ।असुरास्तेन दैतेयाः सुरास्तेनादितेः सुताः।। इसके अलावा शर्करासव, माध्वीक, पुष्पासव और फलासव का भी वर्णन मिलता है।

रामायण (सुंदरकाण्ड- 5/1120) में रावण की पानशाला के बारे में कहा गया है- दिव्याः प्रसन्ना विविधाः सुराः कृत सुरा अपि। शर्कर आसव माध्वीकाः पुष्प आसव फल आसवाः। वास चूर्णैः च विविधैर् मृष्टाः तैः तैः पृथक् पृथक्।। सदैव मधु-आसव (5/11/23), शर्करासव (2/94/24), पुष्पासव (5/11/23), फलासव(5/11/23), से भरी रहती थी। रामायण में रावण के रनिवास में स्थित पानशाला का विशद वर्णन हैं।

महाभारत काल में अधिकतर सुरा का ही प्रचलन था। परन्तु माध्वीक, कैलावत आदि का भी वर्णन मिलता है। कर्णपर्व- अध्याय:61- सतन्यस्य मातुर मधुसर्पिषॊ वा; माध्वीक पानस्य च सत्कृतस्य। स्त्रीपर्व- अध्याय:20- लज्ज माना पुरैवैनं माध्वीक मदमूर्छिता।

मनु ने मद्य के निम्न प्रकार वारुणी, सुरा और आसव का वर्णन किया है तथा सुरा अधिक बल दिया गया है। मनुस्मृति के श्लोक 11/95 ‘‘यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांस सुरा ऽऽ सवम्। सद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः।” में कहा गया है कि ‘‘मद्य, मांस, सुरा और आसव ये चारों यक्ष, राक्षसों तथा पिशाचों के अन्न (भक्ष्य पदार्थ) हैं, अतएव देवताओं के हविष्य खाने वाले ब्राह्मणों को उनका भोजन (पान) नहीं करना चाहिये।”

हरिवंश पुराण (विष्णु पर्व अध्याय 89 श्लोक 36-52) में मैरेय, माध्‍वीक, सुरा और आसव नाम मधु से भरे हुए कलश का उल्लेख है।

चरक (चरक संहिता, सूत्रस्थान- 27.180) ने निम्न प्रकार के मद्यों का वर्णन किया है – “हिक्काश्वासप्रतिश्यायकासवर्षोंग्रहारुचौं। वम्यानाह विबन्धेषु वातघ्नी मदिरा हिता।।“ आचार्य चरक ने मद्य को अनेक नाम यथा- मदिरा, जगल, अरिष्ट, शार्कर, धातकी (धाय के फूलों से निर्मित)मधुमद्य, सुरा, जौ की सुरा, तुषोदक अम्लकजिक, मैरेय, हाला, आदि से उल्लेख किया है। स्वभाव से सभी प्रकार केमद्य रस में अम्ल उष्णवीर्य आदि विपाक में भी अम्ल होते हैं मदिरा पीने से होने वाले लाभ का भी वर्णन किया है।

सुश्रुत (सुश्रुत संहिता- 174-206) ने भी मद्य के निम्न प्रकारों कावर्णन किया है – द्राक्षा मद्य, खार्जूर, प्रसन्ना, सुरा, इसके कई प्रकार है – सामान्य सुरा, श्वेतसुरा, यवसुरा,शीध्रु, मैरेय और आसव आदि।

वाणभट्ट ने निम्न प्रकार के मद्यों का वर्णन किया है सुरा, वारूणी, अरिष्ट, मार्दीक.खार्जूर, शार्केरा, शीधु, आसव, मध्वासव आदि ।

कालिदास की रचनाओं में मद्य के नारिकेलासव, शीधु, पुष्पासव, मधु, द्राक्षासव, वारूणीऔर हाला आदि प्रकारों का वर्णन मिलता है।’ कालिदास की रचनाओं में मघ के लिये मद्य आसव’ ‘मधामदिरा, कादम्बरी’ आदि पदों का प्रयोग हुआ है। कालिदास विशेषकर मद्य के तीन प्रकारों का उल्लेख करते हैं नारियल से बना हुआ नारिकेलासव, गन्ने के रस से बना हुआ शीघु और पुष्पों से निकाला हुआ पुष्पासव’। बहुधा धनिक वर्ग के लोग सुगंधित मद्य का ही प्रयोग करते थे। मृच्छकटिक में मदिरापान एवं मदिरालय के उल्लेख मिलते हैं।

चतुर्भाणी में आये धूर्तविट संवाद से लगता है कि शराब को सुगन्धित और रूचिकर बनाने के लिए उसमें कमल की पंखड़ियां तथा सहकार तैल डाला जाता था।

सुबन्धु के “वासवदत्ता” में निम्न प्रकार के मद्यों का वर्णन मिलता है यथा – मधु,वारूणी और सुरा ।

बाण के “हर्षचरित’ में कई प्रकार के मद्यों का वर्णन मिलता है – सोम, मधु,मदिरा, प्रसन्ना, सुरा, सीधु, वारूणी और आसव आदि ।

मद्यनिषेध- सुरा-त्याग

उपरोक्त संदर्भों से साफ है कि अलग अलग काल में मद्य का प्रचलन था। लेकिन इसका सेवन सीमित था। ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर सुरा-त्याग का उल्लेख किया गया है। मदिरा पान को पाप की ओर प्रवृत्ति तक कहा गया है।

ऋग्वेद (7.86.6) और अथर्ववेद (6.70.1; 14.1.35-36) में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में आरम्भिक काल से लोग सुरा के गुणों और अवगुणों से परिचित थे। वैदिक साहित्य में स्थान-स्थान पर सुरा की भरपूर निन्दा की गई है। मांस और जुआ के समकक्ष ही इसे बुरा माना गया है।

ऋग्वेद (8.2.12; 8.21.14) में कहा गया है कि मनोरंजन के लिए जो सभायें जुटती थीं, उनमें मदिरा पान करने वाले लोग लड़-झगड़ पड़ते थे। ऋग्वेद (10.131.5) के मुताबिक अधिक मदिरा पान करने वाले लोग सुराग रोग से पीड़ित होते थे। मदिरा पान से पाप की ओर प्रवृत्ति होती थी।

ऋग्वेद (7.86.6) शतपथ ब्राह्मण (5.1.5.28) के अनुसार सुरा का वैदिक काल से ही ऋषियों ने कभी आदर का स्थान नहीं दिया, क्योंकि इसके पीने से मानव की असत्प्रवृत्तियों को उत्तेजना मिलती है।

रघुवंश (4.42), कुमारसंभव (6.42), नैषधीयचरित (16.98) के अनुसार उपनिषद् युग में किसी राजा के लिए गौरव की बात थी कि उसके राज्य में एक भी सुरापायी न था। मदिरापान पांच महापातकों में गिना गया है। मनु ने तो ब्राह्मण, क्षत्रियऔर वैश्य किसी के लिए भी मदिरा पान उचित नहीं माना।

महाभारत, शान्तिपर्व (111.29)- महाभारत के अनुसार सुरा का सिद्धान्त रूप में निषेध किया गया, यद्यपि स्थान-स्थान पर सुरा पीने वालों का उल्लेख मिलता है। मधु, मांस और मद्य का परित्याग करने वाला सभी कठिनाइयों को पार कर जाता है। यदि औषधि रूप में अथवाभूल से भी मद्य पी लिया तो पुन: उपनयन करना पड़ता था

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण (4.33.46) में लिखा है कि धर्म और अर्थ की सिद्धि के लिए मदिरा पान हानिकारक है। मदिरा पान करने में धर्म, अर्थ और काम सभी नष्ट हो जाते है। जो ब्राह्मण सुरापायी होते थे, उन्हें सड़कों पर लोग धिक्कारते चलते थे।

विष्णुपुराण (2.6-9) में विहित है कि मदिरापान करने वाले तथा ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति नरक में जाते हैं। कतिपय उद्धरणों में मदिरा बनाने वाले व्यक्ति को भी निन्द्य बताया गया है।

वायु पुराण (18.33) और ब्रह्माण्ड पुराण (2.12.133) में निरूपित है कि मदिरा बनाने वाला व्यक्ति पूयवह नामक नरक में जाता है।

ऋग्वेद (7.86.6) में एक स्थल पर मदिरा पानको पाप का कारण बताया गया है।

शतपथ ब्राह्मण (5.1.5.28) “अमृतं पाप्मा तमः सुरा” में सुरा की उपमा असत्य, दुःख और अन्धकार से दी गई है।

मनुस्मृति (9.235) में भी मदिरा पान करने वालों को महापापी की संज्ञा दी गई है।

ब्रह्माण्डपुराण (4.7.78) में वर्णित है कि ब्राह्मण को मोह, स्नेह अथवा इच्छा से मदिरापान नहीं करना चाहिए। एक अन्य स्थल पर वर्णन आता है कि आसवपान केवल क्षत्रिय आदि तीन वर्ण कर सकते हैं। ब्राह्मण की भांति ब्राह्मणी के लिए भी इसे वर्जित किया गया है।

मत्स्य पुराण (25.62) के अनुसार मोहवश मदिरा पान करने वाला ब्राह्मण अधार्मिक है। उसे ब्रह्महत्या का दोष लगता है। लोक तथा परलोकमें उसे गर्हित स्थान मिलता है। इन उद्धरणों से व्यक्त होता है कि ब्राह्मणार्थ मदिरापान आज्ञप्त नहीं था। इस सामान्य नियम के अन्तर्गत क्षत्रियादि तीन वर्ण नहीं आते थे।

विष्णुस्मृति (54.7) में भी मदिरापान करने वाले ब्राह्मण को नारकीय बताया गया है। इसी प्रकार महाभारत ने भी ब्राह्मणार्थ मदिरापान वर्जित किया है। इस सम्बन्ध में महाभारत का उद्धरण बिना किसी अन्तर के मत्स्यपुराण के तद्विषक स्थल के साम्य रखता है।

मदिरापान के दुर्गुणों एवं अव्यवस्थित कृत्यों से राज्यों में प्रतिबंध लगाये जाते रहे हैं। ये प्रतिबंध धार्मिक और सामाजिक आचार के स्वरूप थे। गुजरात में चालुक्य कुमारपाल ने मदिरापा नहीं नहीं बल्कि मदिरा-निर्माणशाला भी बन्द करा दी थी। (मोहराजपराजय, अंक 4, पृ. 83)

हेमचन्द्र के एक विवरण से स्पष्ट है कि चौलुक्य-कुल में मद्यपान वैसा ही वर्जित था, जैसा कि ब्राह्मणों से वर्जित था। (मुनिजिनविजय, राजर्षिकुमार पाल, पृ. 19)

सोमलता

सोम नाम से एक “लता” होती थी- सोम पर्वतों पर उगने वाला पौधा है। यह लता या पौध हिमवन्त से मूजवन्त पर्वत श्रृंखला तक मिलता था। ऋग्वेद के सूक्तों में हिमवन्त (एलबुर्ज पर्वत श्रृंखला, अर्थात ईरान) img_3475तथा मूजवन्त (गान्धार-कम्बोज प्रदेश, अर्थात अफगानिस्तान) पर्वत का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सोम को पर्वतों पर रहने वाला (गिरिष्ठा) तथा अनेक बार पर्वतों पर उगने वाला (पर्वतावृधः) कहा गया है। अथर्ववेद में पर्वतों को सोमन्तो पृष्ठ कहा गया है। ये बातें संकेत करती हैं कि सोमपर्वतों पर उगता था।

इसके अलावा कहां-कहां उल्लेख है- राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरी, हिमाचल की पहाड़ियों, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने का उल्लेख भी मिलता है। 

यद्यपि सोम को पर्वतों पर उगने वाला एक पौधा कहा गया है फिर भी इसके उत्पत्ति और आवास को स्वर्गीय ही माना गया है। इसके बारे में ऐसी अवधारणा है कि स्वर्ग से इस पौधे को पृथ्वी पर लाया गया है।

ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित एक कथा वर्णित है- जिसके अनुसार उत्क्रोश पक्षी द्वाराइस पौधे को स्वर्ग से लाया गया है। कथानुसार उत्क्रोश पक्षी सोम-पौधे के पास उड़ कर गया और इस पौधे के मधुर काण्ड को तोड़ कर, अपने पैरों के बीच दबाकर, तीव्र गति से उड़ता हुआ वज्रधर अर्थात् इन्द्र के लिए सोम लाया।

सोम का रंग– विद्वानों का मत है कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर पाया जाने वाली यह सोमलता बिना पत्तियों का गहरे बादामी रंग का पौधा है। वहीं जब इससे सोमरस बनाया जाता था तक यह अरूण वर्ण का होता था। ऋग्वेद के एक मन्त्र में इसे अरूण वृक्ष की शाखाभी कहा गया है। कहीं इसके वर्ण के लिए भूरा तथा कहीं हरित शब्द का प्रयोग किया गया है। ब्राह्ममण ग्रन्थों में सोम लता के अभाव में जिस पौधे को सोमलता का स्थानापन्न किया गया है उसका वर्णभी लाल या अरूण होता था।

ईरान में कुछ वर्ष पहले इफेड्रा नामक पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते थे इफेड्रा की छोटी-छोटी टहनियां बर्तनों में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर परिसर में पाई गई हैं। इन बर्तनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है। हलांकि लोग इसका इस्तेमाल यौन वर्धक दवाई के रूप में करते हैं।

ईरान और आर्यावर्त: माना जाता है कि सोमपान की प्रथा केवल ईरान और भारत के वह इलाके जिन्हें अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है यहीं के लोगों में ही प्रचलित थी। इसका मतलब पारसी और वैदिक लोगों में ही इसके रसपान करने का प्रचलन था। इस समूचे इलाके में वैदिक धर्म का पालन करने वाले लोग ही रहते थे। ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ में बदल जाने के कारण अवेस्ता में सोम के बदले होम शब्द का प्रयोग होता था और इधर भारत में सोम का।

  • कुछ वर्ष पहले ईरान में इंफेड्रा नामक पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते थे। इफेड्रा की छोटी-छोटी टहनियां बर्तनों में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर परिसर में पाई गई हैं। इन बर्तनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है।

सोम को 1. स्वर्ग की लता का रस और 2. आकाशीय चन्द्रमा का रस भी माना जाता है... सोम की उत्पत्ति के दो स्थान हैं- ऋग्वेद अनुसार सोम की उत्पत्ति के दो प्रमुख स्थान हैं- 1.स्वर्ग और 2.पार्थिव पर्वत।

वेदों में सोमलता का विशेष महत्व प्रतिपादित किया गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों में सोमविषयक अनेक उपाख्यान मिलते हैं। एक उपाख्यान के अनुसार गायत्री नेबाज पक्षी का रूप धारण कर धुलोक से सोम का आहरण किया था। वस्तुतःसोमलता विशेष प्रकार की औषधि है जो पर्वतों पर पायी जाती है। शतपथब्राह्मण इसकी उत्पत्ति की चर्चा करता है। आयुर्वेद में सोमलता को सोमवल्ली,सोमक्षीरी और द्विज प्रिया कहा जाता है। यह सोमलता त्रिदोष – कफ, वात औरपित्त को नष्ट करती है। यह कटु और तिक्त होती है। इसमें रसायन की क्षमता है। इसलिए देवता इसे अधिक चाहते रहे। इसीलिए वेदों में सोम की विशेष प्रशंसा की गयी है। सोम को औषधियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा। इसे औषधियों का राजा कहा गया है।

अग्नि की भांति सोम भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया ‘मातरिश्वा ने तुम में से एक को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा; गरुत्मान ने दूसरे को मेघशिलाओं से।’ हे सोम, तुम्हारा जन्म उच्च स्थानीय है; तुम स्वर्ग में रहते हो, यद्यपि पृथ्वी तुम्हारा स्वागत करती है। सोम की उत्पत्ति का पार्थिव स्थान मूजवंत पर्वत (गांधार-कम्बोज प्रदेश) है’। -(ऋग्वेद अध्याय सोम मंडल- 4, 5, 6)

  • स्वर्गीय सोम की कल्पना चंद्रमा के रूप में की गई है। छांदोग्य उपनिषद में सोम राजा को देवताओं में भोज्य कहा गया है। कौषितकि ब्राह्मण में सोम और चन्द्र के अभेद की व्याख्या इस प्रकार की गई है : ‘दृश्य चन्द्रमा ही सोम है। सोमलता जब लाई जाती है तो चन्द्रमा उसमें प्रवेश करता है। जब कोई सोम खरीदता है तो इस विचार से कि ‘दृश्य चन्द्रमा ही सोम है; उसी का रस पेरा जाए।’

वेदों के अनुसार सोम का संबंध अमरत्व से भी है वह पितरों से मिलता है और उनको अमर बनाता है। सोम का नैतिक स्वरूप उस समय अधिक निखर जाता है, जब वह वरुण और आदित्य से संयुक्त होता है- ‘हे सोम, तुम राजा वरुण के सनातन विधान हो; तुम्हारा स्वभाव उच्च और गंभीर है; प्रिय मित्र के समान तुम सर्वांग पवित्र हो; तुम अर्यमा के समान वंदनीय हो।’

त्रित प्राचीन देवताओं में से थे। उन्होंने सोम बनाया था तथा इंद्रादि अनेक देवताओं की स्तुतियां समय-समय पर की थीं। महात्मा गौतम के तीन पुत्र थे। तीनों ही मुनि थे। उनके नाम एकत, द्वित और त्रित थे। उन तीनों में सर्वाधिक यश के भागी तथा संभावित मुनि त्रित ही थे। कालांतर में महात्मा गौतम के स्वर्गवास के उपरांत उनके समस्त यजमान तीनों पुत्रों का आदर-सत्कार करने लगे। उन तीनों में से त्रित सबसे अधिक लोकप्रिय हो गए।

कुछ विद्वान इसे ही ‘संजीवनी बूटी’ कहते हैं- सोम को न पहचान पाने की विवशता का वर्णन रामायण में मिलता है। हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं, एक बार राम और लक्ष्मण दोनों की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर, मगर ‘सोम’ की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। दोनों बार लंका के वैद्य सुषेण ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं।

  • यदि हम ऋग्वेद के नौवें ‘सोम मंडल’ में वर्णित सोम के गुणों को पढ़ें तो यह संजीवनी बूटी के गुणों से मिलते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि सोम ही संजीवनी बूटी रही होगी। ऋग्वेद में सोमरस के बारे में कई जगह वर्णन है। एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्धता और प्रचलन दिखाया गया है कि इंसानों के साथ-साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाए और पिलाए जाने की बात कही गई है।

सोमरस बनाने की विधि

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उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि।। (ऋग्वेद सूक्त 28 श्लोक 9)

अर्थात : उलूखल और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिए पवित्र चर्म पर रखें।

औषधि: सोम: सुनोते: पदेनमभिशुण्वन्ति।- निरुक्त शास्त्र (11-2-2)

अर्थात : सोम एक औषधि है जिसको कूट-पीसकर इसका रस निकालते हैं।

  • सोम को गाय के दूध में मिलाने पर ‘गवशिरम्’ दही में ‘दध्यशिरम्’ बनता है। शहद अथवा घी के साथ भी मिश्रण किया जाता था। सोम रस बनाने की प्रक्रिया वैदिक यज्ञों में बड़े महत्व की है। इसकी तीन अवस्थाएं हैं- पेरना, छानना और मिलाना। वैदिक साहित्य में इसका विस्तृत और सजीव वर्णन उपलब्ध है।
  • सोम के डंठलों को पत्थरों से कूट-पीसकर तथा भेड़ के ऊन की छलनी से छानकर प्राप्त किए जाने वाले सोमरस के लिए इंद्र, अग्नि ही नहीं और भी वैदिक देवता लालायित रहते हैं, तभी तो पूरे विधान से होम (सोम) अनुष्ठान में पुरोहित सबसे पहले इन देवताओं को सोमरस अर्पित करते थे।
  • बाद में प्रसाद के तौर पर लेकर खुद भी तृप्त हो जाते थे। आजकल सोमरस की जगह पंचामृत ने ले ली है, जो सोम की प्रतीति-भर है। कुछ परवर्ती प्राचीन धर्मग्रंथों में देवताओं को सोम न अर्पित कर पाने की विवशतास्वरूप वैकल्पिक पदार्थ अर्पित करने की ग्लानि और क्षमा- याचना की सूक्तियां भी हैं।

सोम को दिन में तीन बार सवन अर्थात् दबाया जाता था… सन्ध्याकालीन दबाने के कृत्य को ऋभुओं से’ तथा मध्याहून और प्रातः का सम्बन्ध इन्दरे से किया गया है, किन्तु यज्ञों से प्रसंग में प्राप्त वर्णनों से पता चलता है कि अनेक देव सोम-पान करते थे। सोम यज्ञों के लिए आपस में प्रतिद्वन्द्विता होती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में इस प्रकार किया गया है वसिष्ठ लोग इन्द्र को पाशघुग्न वायत के सोम-यज्ञ से सुदास् के यहां उठा ले आये थे।

सोमरस पीने के फायदे

वैदिक ऋषियों का चमत्कारी आविष्कार- सोमरस एक ऐसा पदार्थ है, जो संजीवनी की तरह कार्य करता है। यह जहां व्यक्ति की जवानी बरकरार रखता है वहीं यह पूर्ण सात्विक, अत्यंत बलवर्धक, आयुवर्धक व भोजन-विष के प्रभाव को नष्ट करने वाली औषधि है।lord-indra

स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्तीव्र: किलायं रसवां उतायम।

उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रमन कश्चन सहत आहवेषु।।- ऋग्वेद (6-47-1)

अर्थात: सोम बड़ी स्वादिष्ट है, मधुर है, रसीली है। इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है। वह अपराजेय बन जाता है।

शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है, परंतु इसका एक पारलौकिक अर्थ भी देखने को मिलता है। साधना की ऊंची अवस्था में व्यक्ति के भीतर एक प्रकार का रस उत्पन्न होता है जिसको केवल ज्ञानीजन ही जान सकते हैं।

सोमं मन्यते पपिवान् यत् संविषन्त्योषधिम्।

सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन।। (ऋग्वेद-10-85-3)

अर्थात: बहुत से लोग मानते हैं कि मात्र औषधि रूप में जो लेते हैं, वही सोम है ऐसा नहीं है। एक सोमरस हमारे भीतर भी है, जो अमृतस्वरूप परम तत्व है जिसको खाया-पिया नहीं जाता केवल ज्ञानियों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

इसके पीने से शरीर एक विचित्र उत्साह से भर जाता था। ऋग्वेद में इसके उल्लासित और कामनीय गुणों का वर्णन करते हुए कल्पना का भी सहारा लियागया है। सोम-पान से इन्द्र के आनन्दोल्लास का कामनीय वर्णन ऋग्वेद के एक समूचे सूक्त (१०.११६) मेंकिया गया है। इस सूक्त में एक जगह उल्लिखित है कि जिस प्रकार वेग से चलने वाले घोड़े रथ को दूरतक खींच ले जाते हैं, उसी प्रकार ये सोम की घूटें मुझे दूर तक खींच ले जाती है, क्या मैंने सोम का पाननहीं किया है। हन्त! मैं पृथ्वी को यहाँ रखूगा । मैं बड़ों में बड़ा हूँ (महामहः); मैं संसार को नाभि (अन्तरिक्ष)तक उठाये हूँ, क्योंकि मैंने सोम-रस का पान किया है। आर्य भी इसके उल्लासित गुणों से परिचित । प्रगाथ काण्व ऋषि सोम-पान के प्रभाव से आनन्दित होकर कह रहे हैं – “हमने सोम पान किया है, अमरत्व पा लिया है; ज्योर्तिमय स्वर्ग की प्राप्ति कर ली है तथा हमने देवताओं को जान लिया है।’ सामवेदके एक मन्त्र में इसे बुद्धि का विकास करने वाला बताते हुए कहा गया है कि “बुद्धि को बढ़ाने वाला तथास्वयं ज्ञानवान् सोम, सोम-रस निकालने के लिए दो तख्तों के बीच रखा गया। इससे उत्साह और स्फूर्तिदोनों आती थी। सामवेद के एक मन्त्र में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है – “बल बढ़ाने वाला औरउत्साह बढ़ाने वाला तथा चमकने वाला सोम-रस गाय और वीर पुत्रों की इच्छा करने वालों के द्वारा निचोड़ाजाता है। इसके पीने से सम्भवतः विष का भी प्रभाव समाप्त हो जाता है।

कण्व ऋषियों ने मानवों पर सोम का प्रभाव इस प्रकार बतलाया है- ‘यह शरीर की रक्षा करता है, दुर्घटना से बचाता है, रोग दूर करता है, विपत्तियों को भगाता है, आनंद और आराम देता है, आयु बढ़ाता है और संपत्ति का संवर्द्धन करता है। इसके अलावा यह विद्वेषों से बचाता है, शत्रुओं के क्रोध और द्वेष से रक्षा करता है, उल्लासपूर्ण विचार उत्पन्न करता है, पाप करने वाले को समृद्धि का अनुभव कराता है, देवताओं के क्रोध को शांत करता है और अमर बनाता है’।

सोम विप्रत्व और ऋषित्व का सहायक है। सोम अद्भुत स्फूर्तिदायक, ओजवर्द्धक तथा घावों को पलक झपकते ही भरने की क्षमता वाला है, साथ ही अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराने वाला है।

सोमयज्ञ- सोमरस हवन में इस्तमाल होता था

जिन यज्ञों में ‘सोम लता’ से निकाले हुए सोमरस की आहुति प्रदान की जाती है, उन यागों कोसोमयाग कहा जाता है। इसमें सोम नामक लता को कूटकर उसका रस निकालकर उसे हवि के रूप में देवताओं को समर्पित Soma-Yagaकिया जाता है। “यज्ञं व्याख्यास्यामः”, “स त्रिभिदैविधीयते” श्रौतसूत्रकारों का यहकथन सोमयाग के विषय में ही सिद्ध होता है, क्योंकि यह याग तीनों वेदों की सहायता से सम्पन्न होता है। सोमयज्ञ का हवन करने वाले ऋषियों में कण्व,अंगिरा आदि ऋषि हैं।

पूर्ववर्णित अग्निहोत्र आदि यज्ञ केवल यजुर्वेद से तथा दर्शपौर्णमासादि यज्ञ ऋग्वेद एवं यजुर्वेद से सम्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार सोमयज्ञ में तीनों वेदों से सम्बन्धित ऋत्विजों का वरण किया जाता है। सोमयज्ञ के चार प्रकार कहे गए हैं – एकाह, अहीन, साद्यस्क एवं सत्र। दीक्षा और उपसद् आदि के अनेक दिनों में सम्पन्न होने पर भी एक दिन में सम्पन्न होने वाले सोम याग को एकाह कहते हैं। दो सेलेकर बारह दिनों में सम्पादित होने वाले याग को अहीन याग कहते हैं। बारह से अधिक दिनों में सम्पादित सोमयज्ञ की संज्ञा सत्रयाग है। एक दिन में ही दीक्षा से आरम्भ कर अवभृथ पर्यन्त सारे कार्य सम्पन्न हों वह सोमयज्ञ साद्यस्क्र याग कहलाता है।

सोम रस बनाने की प्रक्रिया वैदिक यज्ञों में बड़े महत्व की है। इसकी तीन अवस्थाएं हैं- पेरना, छानना और मिलाना। वैदिक साहित्य में इसका पूरा वर्णन लिखा हुआ है। सोम के डंठलों को पत्थरों से कूट-पीसकर तथा भेड़ के ऊन की छलनी से छानकर प्राप्त किए जाने वाले सोमरस के लिए इंद्र, अग्नि ही नहीं और भी वैदिक देवता लालायित रहते हैं, तभी तो पूरे विधान से होम (सोम) अनुष्ठान में पण्डित सबसे पहले इन देवताओं को सोमरस अर्पित करते थे। बाद में प्रसाद के तौर पर लेकर खुद भी खुश हो जाते थे।

यद्यपि सोमयज्ञ के अङ्गरूप में बहुत सी इष्टियों का सम्पादन किया जाता है फिर भी इसका प्रधान द्रव्य सोम होने के कारण इसके लिए सोमयज्ञ शब्द प्रयोग किया जाता है। सोमयज्ञ की सात संस्थाएं हैं- अग्निष्टोम, अत्याग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम (वाजपेय)13 सोमयाग मेंजिस स्तोम से याग की समाप्ति होती है, उसी के आधार पर उस याग का नामकरण किया जाता है। अग्निष्टोमस्तोम के द्वारा समाप्ति होने के कारण अग्निष्टोम सोमयज्ञ कहलाता है। इसी प्रकार उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र संज्ञक स्तोमों की समाप्ति पर उक्थ्य आदि सोम संस्थाओं का नामकरण हुआ है।

सोमयज्ञ में मुख्य रूप से चार ऋत्विज्होते हैं (ब्रह्मा, उद्गाता, होता, अध्वर्यु) इन चारों ऋत्विजों के तीन-तीन सहायक पुरोहित होते हैं। इस प्रकार सोम याग में कुल सोलह ऋत्विज होते हैं।

सोमरस की जगह पंचामृत

आजकल सोमरस की जगह पंचामृत ने ले ली है, जो सोम की प्रतीति-भर है। कुछ प्राचीन धर्मग्रंथों में देवताओं को सोम न अर्पित कर पाने की स्तिथि में कोई और चीज अर्पित करने पर क्षमा- याचना करने के मंत्र भी लिखे हैं।

मुश्किल होती गई सोम की पहचान

अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद यानी ईसा के काफी पहले ही इस वनस्पति की पहचान मुश्किल होती गई। ऐसा भी कहा जाता है कि सोम (होम) अनुष्ठान करने वाले लोगों ने इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं दी, उसे अपने तक ही सीमित रखा और आजकल ऐसे अनुष्ठानी लोगों की पीढ़ी/परंपरा के लुप्त होने के साथ ही सोम की पहचान भी मुश्किल होती गई।

सोमरस का उल्लेख- शास्त्रों में लिखे हैं सोम के कई चमत्कारी गुण

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अनेक स्थलों पर मिलता है। सोमरस की औषधियों को श्रेष्ठ माना गया है। ऋग्वेद में सोमरस के बारे में कई जगह लिखा है। एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्धता और प्रचलन दिखाया गया है कि इंसानों के साथ-साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाए और पिलाए जाने की बात कही गई है।

वैदिक ऋषियों का चमत्कारी आविष्कार सोमरस एक ऐसा पदार्थ है, जो संजीवनी की तरह कार्य करता है। यह जहां व्यक्ति की जवानी बरकरार रखता है वहीं यह पूर्ण सात्विक, अत्यंत बलवर्धक, आयुवर्धक व भोजन-विष के प्रभाव को नष्ट करने वाली औषधि है।

ऋग्वेद में लिखा है-

“स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्तीव्र: किलायं रसवां उतायम।

उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रमन कश्चन सहत आहवेषु”

यानी की : सोम बड़ी स्वादिष्ट है, मधुर है, रसीली है। इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है। वह अपराजेय बन जाता है।

श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है,

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्र्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || ।।9.20।।

“जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं | वे पापकर्मों से शुद्ध होकर, इन्द्र के पवित्र स्वर्गिक धाम में जन्म लेते हैं, जहाँ वे देवताओं का सा आनन्द भोगते हैं |”

शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है, परंतु इसका एक पारलौकिक अर्थ भी देखने को मिलता है। साधना की ऊंची अवस्था में व्यक्ति के भीतर एक प्रकार का रस उत्पन्न होता है जिसको केवल ज्ञानीजन ही जान सकते हैं।

ब्राह्मण ग्रन्थों में इसकी निर्माण विधि बताई गई है। सोमरस बनाने हेतु इसे धोकर कटा पीसा जाता था तथा रस निचौड लिया जाता था। सोम को कटते समय मंत्र उच्चारण का उल्लेख भी था।

कल्कि कृत सोमरस को मिट्टी या धातु के पात्र में रखते थे। बाद में जल मिलाकर वस्त्र से छानने के बाद इसको बूंद-बूंद के रूप में लोगों कोऔषध के रूप में दिया जाता था।

सोम का सम्बन्ध अमरत्व से भी है । वह स्वयं अमर तथा अमरत्व प्रदान करने वाला है । वह पितरों से मिलता है और उनको अमर बनाता है। कहीं-कहीं उसको देवों का पिता कहा गया है, जिसका अर्थ यह है कि वह उनको अमरत्व प्रदान करता है। अमरत्व का सम्बन्ध नैतिकता से भी है । वह विधि का अधिष्ठान और ॠत की धारा है वह सत्य का मित्र है।

आयुर्वेदिक ग्रंथ सोमरस के बारे में सूचना देते हैं- धन्वन्तरी सोमरस

रसेंद्रचूड़ामणि 6।6-9 में कहा है,

पञ्चांगयुक्पञ्चदशच्छदाढ्या सर्पाकृतिः शोणितपर्वदेशा।

सा सोमवल्ली रसबन्धकर्म करोति एकादिवसोपनीता।।

करोति सोमवृक्षोऽपि रसबन्धवधादिकम्।

पूर्णिमादिवसानीतस्तयोर्वल्ली गुणाधिका।।

कृष्ण पक्षे प्रगलति दलं प्रत्यहं चैकमेकं शुक्लेऽप्येकं प्रभवति पुनर्लम्बमाना लताः स्युः।

तस्याः कन्द: कलयतितरां पूर्णिमायां गृहीतो बद्ध्वा सूतं कनकसहितं देहलोहं विधत्ते।।

इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा।

अनया बद्धसूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते।

जिसके पंद्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है। जहाँ से पत्ते निकलते हैं- वे गठिं जिसकी लाल होती है, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लायी हुई पञ्चांग (मूल, डण्डी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को वद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाए हुआ पञ्चांग से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बधिना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परंतु सोमवल्ली और सोमवृक्ष, इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुणों वाली है।

इस सोमवल्ली का कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है। और शुक्ल पक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह यह लता बढ़ती रहती है। पूर्णिमा के दिन इस लता का कंद निकाला जाए तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है। और इससे बँधा हुआ पारद लक्षवेधी हो जाता है अर्थात एक गुणाबद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त ही दुर्लभ है। कम से कम आज के समय में सोमवल्ली किसी सोमलता से कम नहीं।

कण्व ऋषियों ने मानवों पर सोम का प्रभाव इस प्रकार बतलाया है- ‘यह शरीर की रक्षा करता है, दुर्घटना से बचाता है, रोग दूर करता है, विपत्तियों को भगाता है, आनंद और आराम देता है, आयु बढ़ाता है और संपत्ति का संवर्द्धन करता है। इसके अलावा यह विद्वेषों से बचाता है, शत्रुओं के क्रोध और द्वेष से रक्षा करता है,

कण्व ऋषियों के अनुसार सोमरस उल्लासपूर्ण विचार उत्पन्न करता है, पाप करने वाले को समृद्धि का अनुभव कराता है, देवताओं के क्रोध को शांत करता है और अमर बनाता है’। सोम विप्रत्व और ऋषित्व का सहायक है। सोम अद्भुत स्फूर्तिदायक, ओजवर्द्धक तथा घावों को पलक झपकते ही भरने की क्षमता वाला है, साथ ही आनंद की अनुभूति कराने वाला है।

सोमरस देव और मानव दोनों को यह रस स्फुर्ति और प्रेरणा देने वाला था । देवता सोम पीकर प्रसन्न होते थे; इन्द्र अपना पराक्रम सोम पीकर ही दिखलाते थे । कण्व ॠषियों ने मानवों पर सोम का प्रभाव इस प्रकार बतलाया है: ‘ यह शरीर की रक्षा करता है, दुर्घटना से बचाता है; रोग दूर करता है; विपत्तियों को भगाता है; आनन्द और आराम देता है; आयु बढ़ाता है।

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गणेश चतुर्थी विशेष- भारतीय संस्कृति और भगवान गणेश

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वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

ऊँ गं गणपतये नमो नमः           ऊँ गं गणपतये नमो नमः             ऊँ गं गणपतये नमो नमः

अर्थात्- आपका एक दांत टूटा हुआ है तथा आप की काया विशाल है और आपकी आभा करोड़ सूर्यों के समान है। मेरे कार्यों में आने वाली बाधाओं को सर्वदा दूर करें।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं। एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था। ऋग्वेद में ब्रह्मणस्पति सूक्त में भी गणपति का उल्लेख है-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत्आनशृण्वं नूतिभि: सीडू नादनम्।।

अर्थात्- हे गणपति, तू विद्वानों का विद्वान है, ब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं। आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्री स्कन्दस्वामी अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं-

विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित।

नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते॥

अर्थात्- ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र तथा विष्णु के द्वारा वन्दित है। विघ्नेश गणपति! मन्त्रों के स्वामी ब्रह्मणस्पति! आपको नमस्कार है।

अनेक शास्त्रों में भगवान गणेश के अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। पर ब्रहम गणेश्वर का विशद विवेचन “गणेश-पुराण” में वर्णित है। “पुराण वाङ्‌मय” में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैं। गणेश पुराण के अनुसार गणेश प्रणव रूप में अवस्थित हैं। स्वंय ब्रहमा, विष्णु और शिव उनकी पूजा करते हैं। लिंग पुराण में भगवान गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है। उनकी कृपादृष्टि मात्र से विघ्नों के पर्वत भी धराशायी हो जाते हैं, इसीलिए अनादि काल से किसी भी कार्यारंभ में देवों एवं मानवों के द्वारा उनकी सर्वप्रथम पूजा की जाती है। विद्वानों और पुराणकारों के मत में गणेशजी ही परात्पर ब्रह्म एवं जगदरूप हैं। सगुणोपासना में जिस प्रकार निराकार ब्रह्म अनेक रूपों में अवतरित हुए है। उसी प्रकार उनका एक रूप गजानन का भी है। गणपति गणेश के रूप में वे पार्वती एवं शिव पुत्र है,समस्त देवों द्वारा उन्हें अग्रगण्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं समस्त ग्रन्थों में गणेश की महिमा वर्णित की गई है। हमारे सनातन हिन्दू धर्म के समस्त कार्यों के आरम्भ में श्री गणेश जी के स्मरण, नमनस्तवन और पूजन आदि का विधान है। इसलिये किसी भी कार्य का शुभारम्भ (श्री गणेश) के नामोच्चार से किया जाता हैं। यही नहीं कार्य के आरम्भ के लिए लोक में श्री गणेश यह पर्याय हो चुका हैं। यही नही-

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्”।

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

वास्तव में श्री गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शव इत्यादि देवों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि गणेश शब्द की व्युत्पत्ति-

गणानां जींकजातानाम् ईशः

अर्थात् प्राणिमात्र के स्वामीही गणेश हैं, सृष्टि के आरम्भ में आसुरी शक्तियों द्वारा जो विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कीजाती हैं, उनके निवारण के लिए स्वयं गणपति रूप बनाकर ब्रह्मा जी के सृष्टि कार्य में सहायक होते हैं।

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में जो “गणानां त्वा-” इत्यादि मन्त्रों में गणपति कासुस्पष्ट उल्लेख है, वहीं, ब्रह्मा, विष्णु आदि गणों के अधिपति गणनायक ही परमात्मा कहे गये हैं।

“गणपति” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ- अनादिकाल से ही धर्मप्राण जनता वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है ।’ गणपति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है। ऋग्वेद के मन्त्रों में स्पष्ट रूप से ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित किया गया है अतएव प्रथमपंक्ति का गणपति शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्मणस्पति का अर्थ है – ब्रह्मों कापति ।।

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शुक्ल यजुर्वेद के अश्वमेघाध्याय में भी गणपति शब्द आया है- प्रारम्भिक गणराज्यों के गणपतियों के सम्बन्ध में जो भावना थी उसी आधार पर देवमण्डल के गणपतिकी कल्पना की गयी । रूद्र के गणों से गणपति का सम्बन्ध स्वतन्त्र देवता रूप में है ।

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गणानां पतिगणपतिः

सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्व ही “गणपति” तत्व है ।

समूहान्य वाचक परिकीर्तिनः 

समूहों का पालन करने वाले परमात्मा को ‘गणपति’ कहते हैं… देवादिकों के पतिको भी गणपति कहते हैं

महतत्व गणनां पतिः गणपतिः 

अथवा

निगुर्ण सगुण ब्रह्मागणाना पतिः गणपति ।

सर्वविध गणों को सत्ता देने वाला जो परमात्मा है वही गणपति है।

श्री गणेश भी भगवान का ही एक विशिष्ट स्वरूप है वे पार्वती शिव के पुत्र के रूप में प्रकट हुये । इनकी उपासना कई प्रकार की है। इनके रूप भी अनेक है रूप के अनुसार नाम भी भिन्न-भिन्न हैं, जैसे- महागणपतिचिन्तामणि गणपतिहरिद्रागणपति इत्यादि ।

पुराणों में गणेश वर्णन

पुराणों में गणपति की उत्पत्ति और उनके विविध गुणों का आश्चर्यजनक रूपकों में अतिरंजित वर्णन है- अधिकांश कथाएँ ब्रह्मवैवर्त पुराण में पाई जाती हैं । गणेश को कहीं केवल पार्वती का ही पुत्र माना गया है ।

  • पुराणों में रूद्र के मरूत आदि असंख्य गण प्रसिद्ध हैं । इनके नायक अथवा पतिको विनायक या गणपतिc884c7cc4b0700c5cd523205fdec8f22 कहते हैं। समस्त देवमण्डल के नायक भी गणपति ही हैं। डा0 सम्पूर्णानन्द ने अपने ग्रन्थों “गणेश” तथा “हिन्दू देवपरिवार का विकास” मेंगणेश को आयोत्तर देवता माना है जिसका प्रवेश और आदर हिन्दू देवमण्डल में हो गया ।अधिकांशतः कहना है कि हिन्दू लघु देव मण्डल, अर्थ देवयोनि तथा भूत-पिशाच परिवार मेंबहुत से आर्योत्तर तत्व मिलते हैं ।
  • “गणेश” नामक ग्रन्थ की विदुषी लेखिका एलिस गेट्टी ने गणेश को द्रविड़ों का स्वतन्त्र स्थानीय देवता कहा है। उस समय न उनकी कोई सुनिर्मित प्रतिमा थी न कोई नाम और न देवालय । वे किसी घने वृक्ष के नीचे या पत्थर के चौरे पर अनगढ शिलाखण्ड के रूप में आदिम गिरिजनों के ग्राम देवता रहे हैं ।
  • ऐसा “गणेश” ग्रन्थ की भूमिका में समाजशास्त्री प्रो0 अल्फ्रेड फाउशर का मत है । इस पूजा शिला को युद्ध प्रयाण से पहले ग्रामवासी योद्धा रूधिर से अभिषिक्त करते थे । गणेश का सिन्दूराभिषेक उसी आदिम परम्परा का नया रूप है ।

गणेश की उत्पत्ति से सम्बन्धित वृतान्त स्कन्द, मत्स्य पुराण एवं सुप्रभेदागम में मिलते हैं । उनका सर्वप्रथम उल्लेख एत्रेय ब्राह्माण में आया है जहाँ उन्हें ब्रह्मा, ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति से पहचाना गया है ।

मत्स्य पुराण में ही (180/66) में एक जगह कहा गया है कि महायक्ष कुबेर ने भी वाराणसी में अपना स्वभाव छोड़ दिया और गणेशत्व पद को प्राप्त हो गये । “मत्स्य पुराण के अनुसार ही शंकर से परिणीत होने के उपरान्त पार्वती को पुत्र पाने की, बल इच्छा हुई । उन्होंने एक गजाकृति पुतले को पुत्रवत पालना आरम्भ कर दिया । एक दिन गंगा में इस पुतले को स्नान कराया । उसके बाद वह लम्बा सजीव शरीर वाला हो  गया । इसी कारण वे गजानन और गांगेय कहलाते हैं ।

वराह–पुराण के अनुसार गणेश की उत्पत्ति विध्न विनाशक के रूप में हुई । भगवान गणेश वेद विहित कर्मों के प्रथम पूज्य देव हैं । एक समय देवता तथा ऋषिगणों के पवित्र कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न होने लगी । तो वे शंकर के पास पहुँचे। वहाँ भगवान रूद्र हँस पड़े तो उनके मुख से एक बालक प्रकट हुआ । उस बालक को पार्वती लगातार देखने लगी तो भगवान भोलेनाथ ने श्राप दिया कि कुमार तुम्हारा मुख हाथी जैसा व पेट लम्बा होगा तथा ,सर्प तुम्हारे यज्ञोपवीत होंगे। क्रोधित शंकर का इस पर भी क्रोध शान्त नहीं हुआ तो उनके शरीर से अनेक विनायक गण उत्पन्न हुये, बाद में ब्रह्मा की प्रार्थना पर इन गणों का कुमार को स्वामी बना दिया और ये विनायक गणपति हो गये ।

गणपति का दूसरा नाम विनायक भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी होने के कारण यह तिथि गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध हुई । समस्त देवताओं में गणेशजी सर्वप्रथम पूजे जाते हैं, कारण वे गणनायक, विध्न विनायक, संकटहारी और सिद्धि समृद्धि के दाता हैं । विद्या, बुद्धि, धन, वैभव, शक्ति, तेज अध्यात्म साधना और तन्त्र सिद्धि के लिये भक्त जन गणेशजी की शरण लेते हैं। गणेश जी की पूजा साधना के अनेक मन्त्र हैं व ब्रहद्ध सम्प्रदाय गणेश साधकों के लिये हैं । समस्त हिन्दू जाति गणेशजी का सबसे पहले नमन करती है । गणपति गण अथवा समुदायों के नायक हैं। गणपति का दूसरा नाम विनायक भी है। जो विचारने वाली आत्माओं के लिये प्रयुक्त होता है । “अथर्वशिरस” उपनिषद् में रूद्र के अनेक देवों या आत्माओं का समीकरण करते हुये विनायक का भी नाम आता है।

“महाभारत” में गणेश्वरों और विनायकों का देवताओं के साथ उल्लेख हुआ है। जो मनुष्य कार्य का सर्वत्र अवलोकन करते हैं । किरात प्रजाति (भोट–भ्रन्मा) के अनेक गण (जनजातियाँ) उस समय उत्तरी भारत में रह रही थीं — यक्ष गन्धर्व, किन्नर, गुहक, किं पुरूष, भोट पिशाच आदि । यक्षों के अधिक प्रबल होने पर इन गणों ने भी कुबेर को अपना गणपति या गणेश मान लिया और उसकी पूजा करनी आरम्भ कर दी ।  महाभारत में कुबेर को कुछ स्थानों  पर गणेश कहा गया है ।

लिंग पुराण में गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है । लिंग पुराण के अनुसार देवों ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि आप किसी एक ऐसी शक्ति का प्रादुर्भाव करें जो कि सभी प्रकार के विध्नों का निवारण किया करें । देवों की इस प्रार्थना के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं ही “गणेश” के रूप में जन्म ग्रहण किया ।

वायु पुराण में भगवान शिव को “गजेन्द्रकर्ण”, लम्बोदर, “दृष्ट्रिन” (वा) पुणे 24/147, 30/173) आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गयी है।

ब्रह्मपुराण में गणेश जी का भगवान शिव के लिये उपयोग करके दोनों में पूर्व अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में गणेश को कृष्ण का अवतार कहा गया है । “ब्रह्मवैवर्त पुराण” के ही मतानुसार गणेश जी का विष्णु के साथ तादाम्य है।भगवान विष्णु शिवजी से कहते हैं कि पार्वती जी से एक पुत्र होगा जो समस्त विध्नों का नाश करेगा । इतना कहकर भगवान विष्णु बालक का रूप धारण करके शिव के आश्रम में गये वे पार्वती जी की शैय्या पर बालक रूप में लेट गये । पार्वती जी ने उन्हें अपना पुत्र माना यही पुत्र “गणेश जी” के नाम से लोक विश्रत हुआ ।

सौर पुराण में गणेश जी को साक्षात् शिव ही कहकर यह सिद्ध करने की चेष्टा की गयी है कि श्री गणेश एवं भगवान.. शिव दोनों एक ही हैं । गणेश सम्प्रदाय एवं गणेश पुराण में भगवान गणपति को “महाविष्णु” एवं “सदाशिव” कहा गया है और उन्हें साक्षात् ब्रह्म माना गया है वे ही प्रपच्च की सृष्टि और स्थिति संहार आदि के कारण ही उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रादुर्भाव हुआ है।

शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी ने अपने शरीर के अनुलेप से एक मानवाकृति निर्मित की और उसे आज्ञापति किया कि मैं स्नान करने जा रही हूँ जब तक न कहूँ तक तक तुम किसी को अन्दर मत आने देना । यही गृहद्वार रक्षक शक्ति “गणेश” के नाम सेअभिहित हुई और इन्हीं के साथ भगवान शंकर का संग्राम हुआ ।’ गणपति अथर्वशीर्ष एक नव्य उपनिषद् हैं और अथर्ववेद से सम्बन्धित हैं । इस उपनिषद् में गणेश विद्या बतलायी गयी है । इसी कारण गणेशोपासकों में वह अत्यन्त सम्मानित है । गणपति अथर्वशीर्ष में गणेशजी का सगुण ब्रह्मात्मक वर्णन तो है ही बल्कि उसके अन्त में उन्हें परब्रह्म भी कहा गया है। अथर्वशिरस उपनिषद् में रूद्र का अभिज्ञान अनेक देवताओं से किया गया है, जिनमें एक विनायक कहे गये हैं।

  • ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण तथा शिव पुराण के अनुसार प्रजापति विश्वकर्मा की रिद्धी-सिद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से शुभ और रिद्धी से लाभ नाम के दो कल्याणकारी पुत्र हुए।

पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से एक आकर्षक कृति बनाई, जिसका मुख हाथी के समान था। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।

गणपति नाम के विषय में ऐतरेय ब्राह्मण का कहना है कि यह ब्रह्मणस्पति अथवा वृहस्पति का वाचक है । परम सत्ता को जान लेना ही इस जीवन का चरम शिखर है । “यस्तन्न वेद किमचा करिष्यति” । (ऋ0 1/164/39) अर्थात् जो उस परमात्मा को नहीं जानता वह ऋचा से क्या करेगा । वैदिक ऋषियों की खोज और शिक्षा का सर्वोत्तम सार है, एक परम तत्व का रहस्य “एक सत्” (ऋ0 1/164/46) या “तदेकम” (ऋ0 10/129/2) जो उपनिषद् का महाकाव्य बन गया । सब देव प्रकाश और सत्य की शक्तियां एक (देव) के ही नाम और शक्तियाँ हैं। प्रत्येक देव स्वयं सब देवता हैं और उन्हें अपने में रखे हुए हैं। वह परम सत्य एक है – “तत् सत्यम् (ऋ0 3/39/5. 4/54/4 तथा 8/45/27) इत्यादि ।

अग्नि पुराण में भी गणेश जन्म एवं गणेश गौरव की गाथायें हैं, स्मार्त परम्परा में गणपति विनायक के आवेभव में “विघ्नेश्वर” की जो कल्पना है उसका समर्थन लिंग पुराण भी करता है । असुर और राक्षस तपस्या कर शिव को प्रसन्न कर लेते थे, और विभिन्न वरदान माँग लेते थे । इस पर इन्द्रादि देवों ने शिव से प्रार्थना की कि यह तो ठीक नहीं क्योंकि वरदानों से सम्पन्न ये असुर और राक्षस देवों से युद्ध करते और उन्हें परास्त भी कर देते । देवों ने भगवान से ऐसे व्यक्ति को उत्पन्न करने की प्रार्थना की जो उन असुरों के इन धार्मिक कार्यों में बाधा डाल सके और वे सफल मनोरथ न हो सके । शिव ने देवों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और विध्नेश्वर को उत्पन्न कर उसको असुरों की १,३यादि यागदिक क्रियाओं में विघ्न डालने के लिये नियुक्त किया।

भविष्य पुराण में कथा आती है कि युधिष्ठिर को कृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए गणेश पूजन का परामर्श दिया था – पूजयस्व गणाध्यक्षम् उमामल समुद्रभवम् ।। | प्रो0 एस0 ए0 डांगे ने उमा के रज रक् बिन्दु से गणेशं की उत्पत्ति कीकथाओं में यह “अर्थवाद” सिद्ध किया है कि प्रारम्भ में गाँवों में लोकपाल गणपति की पूजा शिला लाल मुद्रा (रज) से निर्मित होती रही होगी । बाद में गणेश प्रतिमा को सिंदूराभिषिक्त किया जाने लगा । आज भी गणेश को अर्पित किये जाने वाले रक्त चंदन के लेप, लाल वस्त्र और रक्त पुष्पों की अंजलि गणेश के पार्थिव (भौम) देवता होने को सिद्ध करती है । भौम मंगलगृह का नाम है और उसका रंग भी लाल माना गया है। पुराणकार मंगलगृह की उत्पत्ति भी पृथ्वी पर गिरे उमा के ऋतुकालीन रक्त बिन्दु से मानते हैं इसी कारण विनायक को मंगलरूप भी कहा जाता है ।।

गणेश पुराण और मुग्दल पुराण में गणेश पूजा का विस्तृत वर्णन है। ये पुराण उपपुराण है। इसके पांच खंड हैं।

गणेश पुराण में गणेश को ही परमब्रह्म कहा गया है। भगवान् गणेश का आविर्भाव किस प्रकार हुआ उसका पूरा वर्णन इस पुराण में है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है। गणेश पुराण के अनुसार, इसी शुभ दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था।

गणेश पुराण में गणेश के निर्गण स्वरूप के साथ ही उनके सगुण साकार स्वरूप का वर्णन है, जो पूर्व मध्यकालीन गणपति प्रतिमाओं के विकास की अवस्था को प्रकट करता है। इस पुराण में गणेश का विकसित विविध व बहुआयामी स्वरूप व्याख्यायित है। यह विविधता मुद्राओं, अलंकारों, आयुधों, वाहनों, स्वरूपों सभी में परिलक्षित होती है।

गणेश पुराण में गणेश का अत्यन्त मनोरम व भव्य स्वरूप इस प्रकार वर्णित है – विनायक की रत्नकांचन से युक्त महामूर्ति बनाकर, जिसमें उनके चतुर्भुज व त्रिनेती स्वरूप का अंकन हो, तथा जो नाना अलंकारों से शोभायमान हो, षोडशोपचार विधान के साथ पूजा करनी चाहिये।

पुराणकाल तक आते-आते। गणेश की उपासना इतनी व्याप्त हो चुकी थी कि प्रायः सभी पुराणों में गणेशोपासना का उल्लेख किया गया है। गणेश पुराण में वर्णित है-

“प्राच्यां रक्षतु बुद्धिशा, अग्नेयां सिद्धिदायक: दक्षिणस्याम उमापुत्रो,

नैऋत्यं तु गणेश्वर, प्रतिच्यां विघ्नहर्ताव्यां वायव्याम गजकर्णक

अर्थात् गणेशजी के विभिन्न स्वरूप दस दिशाओं में सुरक्षा करते हैं। शास्त्रनुसार गणेशजी की विधिवत स्थापना व पूजा-पाठ से नौ ग्रहों के दोष भी दूर हो जाते हैं।

गणेश पुराण में पूर्वमध्यकालीन समाज में प्रचलित सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का निरूपण हुआ है। इन विशेष सन्दर्भो में गणेशकी आवश्यकता और महत्व को प्रतिपादित किया गया है। गणेश की प्राचीनता को वैदिक परम्परा से जोड़कर उसे तत्कालीन अन्य देवों से श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है।

मालती माघव (छठी शती ई0) वह पहला ग्रन्थ है जिसमें नाटक प्रारम्भ करने से पूर्व ही विनायक वंदना की गई है (प्रथम अंक, श्लोक 2) भवभूति से मात्र वर्ष पूर्व गणेश को वंदनीय एवं स्तुति योग्य माना गया था।

आनन्दतीर्थ (950 ई0) रचित “शंकर दिग्विजय” काव्य के अनुसार तांत्रिक गणपति का पूजन बांये हाथ से किया जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरितमानस” के प्रथम श्लोक में वाणी और विनायक की एक साथ वंदना की है –

वर्णानार्थसंघानां रसानां छंदसामपि ।

मंगला नाज्ञ कर्तारौ वंदे वाणी विनायकौ ।। 

अर्थात् वर्णअर्थसंघरसछंद और मंगल के विधायक वाणी और विनायक को मैं वंदन करता हूँ । यहाँ प्रसंगतः गणपति के नाम में स्थित “गण” और तुलसीकृत वंदना का विचार शब्द शास्त्र की दृष्टि से किया जाय तो “गणपति” की एक नई सूक्ष्म व्याख्या उभरती है।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था।

गणेश जी को क्यों माना गया है प्रथम पूजनीय

ऋग्वेद द्वितीय मंडलके तेईसवें सूत्र के पहले मन्त्र एवं तैतिरीय संहिता में गणपति का उल्लेख आता है.उनका उल्लेख हम गणेश के रूप में पाते हैं :-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

अर्थात्- हे गणपतितू विद्वानों का विद्वान हैब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं।

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

गणेश शब्द की व्युत्पत्ति है-

गणानां जीवजातानां यः ईशः स्वामी सः गणेशः (गणेशः पुं)

अर्थात, जो समस्त जीव जाति के ईश-स्वामी हैं वह गणेश हैं।

इनकी पूजा से सभी विघ्न नष्ट होते हैं-

गणेशं पूजयेद्यस्तु विघ्नस्तस्य न जायते। (पद्म पुराणसृष्टि खंड 51/66)

शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें मन्त्र में भी गणपति शब्द आया है-

नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नम इति ॥” बृहस्पतिः। यथाऋग्वेदे ।२।२३।१।

अर्थात गणों और गणों के स्वामी श्री गणेश को नमस्कार। इस संदर्भ में हिन्दू शास्त्रों और धर्म ग्रन्थों में अनेकानेक कथाएँ प्रचलित हैं। विभिन्न विभिन्न स्थानों पर गणेश जी के अलग अलग रूपों का वर्णन है परन्तु सब जगह एक मत से गणेश जी की विघ्नकारी शक्ति को स्वीकार किया गया है।

वाराह पुराण एवं लिंग पुराण में वर्णन है कि एक बार ऋषि मुनियों ने असुरी शक्तियों से ग्रसित होकर देवाधिदेव भगवान शंकर से सहायता की प्रार्थना की। भगवान आशुतोष ने विनायक रूप से श्री गणेश को प्रगट किया और अपने शरीर को कंपित कर अनेक गणों की सृष्टि की, उनका अधिपति गणेश को नियुक्त किया गया। शास्त्रों में गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा गया है-

वक्रतुंड महाकाय। सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्न कुरु मे देव। सर्व कार्येषु सर्वदा॥

अर्थात् जिनकी सूँड़ वक्र है, जिनका शरीर महाकाय है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, ऐसे सब कुछ प्रदान करने में सक्षम शक्तिमान गणेश जी सदैव मेरे विघ्न हरें।

पुराणों में गणेश जी के जन्म से संबंधित कथाएं विभिन्न रूपों में प्राप्त होती हैं। इस संबंध में शिवपुराण, ब्रह्मवैवत्र्तपुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण एवं अन्य ग्रंथों में विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

कथाएं : गणेश कैसे बने प्रथम पूज्य

हम सभी जानते है की हमारे सभी मंगल कार्यो में हम सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करते है | उन्हें निमंत्रण देते है और अपने सभी कार्यो को निर्विघ्नं सम्पन्न करने की विनती करते है | इन्हे सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता का वरदान प्राप्त है | इसके पीछे दो कथाये जुडी हुई है | पढ़े : भगवान गणेश के लिए गये अवतार कौनसे है

पहली कथा में बताया गया है की इन्हे यह वरदान इनके माता पिता भगवान शिव और पार्वती से प्राप्त हुआ | उन्होंने अपने मातृ पितृ भक्ति और सेवा में उन्हें ही अपना सर्वश्य मान कर परिक्रमा की की | ऐसी भक्ति और सेवा देखकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया गया | ब्रह्मा जी जब ‘देवताओं में कौन प्रथम पूज्य हो’ इसका निर्णय करने लगे, तब यह तय किया गया कि जो पृथ्वी-प्रदक्षिणा सबसे पहले करके आएगा वही सबसे पहले पूज्य माना जाएगा। गणेश जी का छोटा सा मूषक कैसे सबसे आगे दौड़े। पर वे थे बुद्धि के महान देवता | उन्होंने युक्ति निकाली और  अपने पिता और माता भगवान शंकर और पार्वती जी की प्रदक्षिणा करने लगे । उनके लिए उनके  माता-पिता ही सब कुछ थे | उन्होंने सात प्रदक्षिणा कर ली। शिवजी का ह्रदय यह देखकर गदगद हो गया और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। जाहिर है भगवान गणेश शेष देवताओं से सबसे पहले पहुंचे। उनका यह बुद्धि-कौतुक देखकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया।

शिवपुराण में आता हैः

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।

पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम्।

अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्।

पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम्।। (शि.पु., रूद्र.सं., कु. खं- 19.39-42)

‘जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के पति सुन्दर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।’

दूसरी कथा… शिव महापुराण: भगवान शिव ने दिया प्रथम पूजा का वरदान

शिवमहापुराण की रुद्रसंहिता में वर्णन है कि कुमारिका खंड में माता पार्वती जी ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया।

कल्पभेद में भगवान शनि के द्वारा इनका मस्तक काटाजाना, पुनः हाथी का मस्तक लगाना यह कथा है किन्तु श्वेतकल्प में तो स्वयं भगवानशंकर उनका मस्तक छिन्न करते हैं। यह पापनाशिनी कथा शिवपुराण में इस प्रकार वर्णित है-

विचार्यति सा देवी क्पुर्षों मलसंभवम्।

पुरूषं निर्ममौसा तु सर्वलक्षणसंयुतम्।।

सर्वाक्यवनिर्दोषं सर्वाक्यव सुन्दरम्।।

विशालं सर्वंशोभाढयं महबलपराकमम्।।

वस्त्राणिं च तदा तस्मै दत्त्वा सा विविधानीहिं।

नानालंकरणं चैक ब्रह्मशिषमनुत्तमाम्।।

मत्पुत्रस्त्वं मदीयोसि नान्यः कश्चिदिहास्ति में ।

एवमुक्तस्य पुरुषों नमस्कृत्य शिका जगौं।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 13/20-23)

वह शुभ लक्षणों से सुयुक्त था। उसका सारा शरीर सभी अवयवों से सुन्दर था।उसका वह शरीर विशाल,परम शोभायमान व महान बल पराक्रम से सम्पन्न था। मातापार्वती ने उसे विभिन्न प्रकार के आभूषण तथा नाना प्रकार के वस्त्र और बहुत सेआर्शीवाद आदि देकर कहा तुम मेरे पुत्र हो,मेरे अपने ही हो, तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ दूसरा कोई नहीं हैं।

कथानुसार जब भगवान शिव और गणेशजी के बीच युद्ध हुआ और गणेशजी का सिर कट गया तो देवी पार्वती के कहने पर शिवजी ने गणेश जी के शरीर पर हाथी का सिर जोड़ दिया। जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि इस रूप में मेरे पुत्र की पूजा कौन करेगा।

आनने तव सिन्दूरं दृश्यते सांप्रतं यदि ।।

तस्मात्त्वं पूजनीयोसि सिन्दूरेण सदा नरैः ।।

पुष्पैर्वा चन्दनैर्वापि गन्धेनैव शुभेन च ।।

नैवेद्ये सुरम्येण नीराजेन विधानतः ।।

तांम्बूलैरथ दानैश्च तथा प्रक्रमणैरपि ।।

नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति ।।

तस्य वै सकला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः ।।

विघ्नान्यनेकरूपाणि क्षयं यास्यंत्यसंशयम् ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 18/9-12)

तब शिवजी ने वरदान दिया कि सभी देवी-देवताओं की पूजा और हर मांगलिक काम से पहले गणेश की पूजा की जाएगी। इनके बिना हर पूजा और काम अधूरा माना जाएगा।

धन्योसि कृतकृत्योसि पूर्वपूज्यो भवाधुना ।

सर्वेषाममराणां वै सर्वदा दुःखवर्जितः ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख०18.8)

गणेश चतुर्थी

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी महोत्सव पूरे देश में उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है। शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेश पुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण+पति = गणपति। स्कृतकोशानुसार गणअर्थात पवित्रक। पतिअर्थात स्वामी, ‘गणपतिअर्थात पवित्रकों के स्वामी।

  • इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है।
  • गणेश जी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेश जी की) सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।
  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए।
  • गणेश जी की आरती और पूजा किसी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले की जाती है और प्रार्थना करते हैं कि कार्य निर्विघ्न पूरा हो।

श्रीगणेश भगवान का पूजन व व्रत विधि – भगवान गणेश को प्रातःकाल, मध्याह्न और सायाह्न में से किसी भी समय पूजा जा सकता है। परन्तु गणेश-चतुर्थी के दिन मध्याह्न का समय गणेश-पूजा के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मध्याह्न के दौरान गणेश-पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त कहलाता है।

गणेश-पूजा के समय किये जाने वाले सम्पूर्ण उपचारों को नीचे सम्मिलित किया गया है। इन उपचारों में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह उपचार भी शामिल हैं। दीप-प्रज्वलन और संकल्प, पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व किये जाते हैं। अतः दीप-प्रज्वलन और संकल्प षोडशोपचार पूजा के सोलह उपचारों में सम्मिलित नहीं होते हैं।

यदि भगवान गणपति आपके घर में अथवा पूजा स्थान में पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित हैं तो षोडशोपचार पूजा में सम्मिलित आवाहन और प्रतिष्ठापन के उपचारों को त्याग देना चाहिये। आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा नवीन गणपति मूर्ति (मिट्टी अथवा धातु से निर्मित) की ही की जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि घर अथवा पूजा स्थान में प्रतिष्ठित मूर्तियों का पूजा के पश्चात विसर्जन के स्थान पर उत्थापन किया जाता है। गणेश चतुर्थी पूजा के दौरान भक्तलोग भगवान गणपति की षोडशोपचार पूजा में एक-विंशति गणेश नाम पूजा और गणेश अङ्ग पूजा को भी सम्मिलित कर लेते हैं।

  • अपने सामथ्र्य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें (शास्त्रों में मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना को ही श्रेष्ठ माना है)।
  • संकल्प मंत्र के बाद षोडशोपचार पूजन व आरती करें।
  • गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं।
  • मंत्र बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं।
  • 21 लड्डुओं का भोग लगाएं।
  • इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाएं और 5 ब्राह्मण को दे दें। शेष लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें।
  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पूजन के समय यह मंत्र बोलें

ऊं गं गणपतये नम:

दूर्वा दल चढ़ाने का मंत्रगणेशजी को 21 दूर्वा दल चढ़ाई जाती है।

  • ऊं गणाधिपतयै नम:
  • ऊं उमापुत्राय नम:
  • ऊं विघ्ननाशनाय नम:
  • ऊं विनायकाय नम:
  • ऊं ईशपुत्राय नम:
  • ऊं सर्वसिद्धप्रदाय नम:
  • ऊं एकदन्ताय नम:
  • ऊं इभवक्त्राय नम:
  • ऊं मूषकवाहनाय नम:
  • ऊं कुमारगुरवे नम:

इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।

अनंत चतुर्दशी के दिन ही क्यों होता है गणेश विसर्जन- अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है भगवान गणपति जल तत्व के अधिपति है इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को इनका पूजन कर इनकी मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से श्री वेद व्यास जी ने भागवत कथा गणपति जी को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे गणपति जी ने अपने दांत से लिखा था। दस दिन उपरांत जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत अधिक हो गया है तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के कुंड में ले जाकर ठंडा किया था इसलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश स्थापना की जाती है तथा कर भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को उन्हें शीतल कर उनका विसर्जन किया जाता है।

भगवान श्रीगणेश की आरती

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।

नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।

कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।

दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव…

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।

चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।

रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव…

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।

सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।

दास रामाचा वाट पाहे सदना।

संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,

सुरवरवंदना॥ जय देव…।

मान्यताएं- क्या करें क्या ना करें…

  • हिंदू धर्म के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए. यदि आप भूलवश चंद्रमा का दर्शन कर भी लें तो जमीन से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर पीछे की तरफ फेंक दें.
  • गणेश चतुर्थी की पूजा में किसी भी व्यक्ति को नीले और काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए. ऐसे में लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है.
  • गणपति की पूजा करते वक्त कभी तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए. मान्यता है कि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था. गणेश भगवान ने नाराज होकर उन्हें श्राप दिया था.
  • गणपति की पूजा में नई मूर्ति का इस्तेमाल करें. पुरानी मूर्ति को विसर्जित कर दें. घर में गणेश की दो मूर्तियां भी नहीं रखनी चाहिए.
  • भगवान गणेश की मूर्ति के पास अगर अंधेरा हो तो ऐसे में उनके दर्शन नहीं करने चाहिए. अंधेरे में भगवान की मूर्ति के दर्शन करना अशुभ माना जाता है.

तांत्रिक परम्परा और गणेश

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तांत्रिक परम्परा में गणपति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है वे वाममार्ग के आराध्य देवता के रूप में पूजित हुये। शिव की तरह उनके मस्तक पर चन्द्रकला विराजमान हुई और माल पर तीसरा नेत्र । विष्णु के समान चतुर्भुज धारी बनकर उन्होंने शंख, पाश, अंकुश या धनुषबाण धारण किया।’

  • एकदन्त, गजमुख और लम्बोदर, आकृति, परशु आयुद्य – गणपति की प्राचीनतम विशेषताएँ थीं। गुप्तकाल में चार भुजाओं तीन नेत्रों, व्यालयज्ञोपवीत और मूषक वाहन का वर्णन मिलने लगा, मध्ययुग में आकर इन्हीं पूर्व परम्पराओं का सुव्यवस्थितसंकलन किया ।
  • बृहतसंहिता के अनुसार हाथी के समान मुख वाली लम्बे उदर वाली, कुठार धारिणी एक दाँत वाली और मूलकन्द तथा सुनील दलकन्द धारण की हुई प्रतिमा बनायें । चिरकाल से हमारा भारतदेश आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न रहा है। हमारे पूर्वजों ने ऐसे अनेक पर्यों को प्रवर्तित किया है, जिनमें सेतू से लेकर हिमाचल पर्यन्त एक ही रीति से उत्सव मनाये जाते हैं ।
  • उनपर्यों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी विशेष महत्वपूर्ण हैं । प्रान्त के भेद से कोई इसको “विनायक चतुर्थी” कहते हैं तथा कोई “गणेश चतुर्थी” ।’ | गणेश संहारक नहीं है पर आत्मरक्षण में उनके समान समर्थ कोई दूसरा नहीं है । वे विनाशक नहीं है किन्तु उनकी रक्षात्मकता इतनी प्रबल है कि जो उसे क्षुष्ण करने जाता है, वही समाप्त हो जाता है, इसलिये भगवान गणेश विध्न विनाशक हैं

पाँच प्रमुख हिन्दू देवों में गाणपत्य के ईष्टदेव गणपति का महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद, अथर्ववेद, ऐतरेय ब्राह्मण और शुक्ल यजुर्वेद में गणपति शब्द प्रायः किसी भी गण स्वामी के लिये प्रयुक्त होने वाला एक विशेषण है।

भारतीय देव परम्परा में गजानन गणेश आदिदेव है । पौराणिक शिव परिवार में वे अम्बिका और महादेव के द्वितीय पुत्र और ऋद्धि- सिद्धि के स्वामी हैं ।

बौधायन धर्मसूत्र में गणेश

बौधायनगृह्यसूत्र और बौधायन धर्मसूत्र 4 में विध्न के पार्षदों का वर्णन है तथा बौधायन धर्म सूत्र में ही विनायक को रूद्र-पुत्र कहा गया है । ई0पू0 छठवीं शती के बौधायन धर्मसूत्र में गणेश के तर्पण का उल्लेख हुआ है, इसी प्रसंग में गणेश के अनेक नामों की भी चर्चा की गई है, जैसे- विघ्न विनायक, गजमुख, एकदन्त, वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि । पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ है, उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठी शती ई0पू0 के लगभग कर ली गई थी।

  • आठवीं शती में तंत्रयान एवं बज्रयान का उदय हुआ । विशेषकर महायान बौद्ध सम्प्रदाय में उसका प्रभाव गणेश पर भी पड़ा । साधना तंत्र के अनुसार पंचमकार (मत्स्थ, मदिरा, मैथुन, मॉस, मुद्रा) से गणेश की पूजा-अर्चना करनी चाहिए । “शारदा तिलक” तंत्र में उचिष्ट गणेश का उल्लेख है। इस रूप में उनकी प्रतिमाएं अश्लील हैं और उन्हें देवी के साथ मैथुनरत अथवा क्रामक्रीड़ा में निमग्न अंकित किया गया है । (ऐसी ही एक प्रतिमा नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित है जिसमें गणेश की जंघा पर देवी विराजमान है व गणेश आलिंगन बद्ध है)।

Popular Religion and Folklore of Northern India में ब्रिटिश प्राच्यविद William Crooke का विचार है कि गणेश मूल रूप में पशु जाति से सम्बन्धित थे ।’ गणेश का सम्बन्ध नागों से भी है । नाग शब्द संस्कृत में गज के नाम से भी जाना  जाता है ।

  • उत्तर भारत के धर्म और लोकतत्व पर लिखित अपने ग्रन्थ में कुक लिखते हैं कि ,गणेश का सम्बन्ध वन्य पशुपूजकों और ग्रामीण कृषकों के साथ रहा है। गणपति का एक दाँत वस्तुतः हल के फाल का प्रतीक है । जिससे कृषकों को समृद्धि प्राप्त होती है । भाद्रपद मास में जब फसल पकने लगती है। तब गणपति का पूजन कृषको की धन-धान्य कामना का ही ,विस्तृत विकसित रूप है । गणपति का प्रारम्भिक रूप आदिम जातियों से सम्बन्धित रहा होगा । बाद में उनका महत्व बढ़ता गया और जनमानस में लोकप्रिय हो गये । गणपति का महत्व पौराणिक काल में बहुत बढ़ गया था ।

“ब्राह्माण्ड-पुराण” में शिव भगरी वाराणसी में गणेश की नित्य पूजा का उल्लेख है सभी देवों से पूर्व उनकी पूजा करने का आदेश शिव से प्राप्त हुआ था । सभी कार्यों में सफलता प्राप्ति के लिए जातकर्म व गर्भाधान आदि संस्कारों के समय, यात्रा के समय, वाणिज्य में तथा हर तरह के कार्य को कठिनाई में गणेश की स्तुति करनी चाहिए, क्योंकि वे दक्ष्यमाण है । ये शिव के गणों के स्वामी हैं इसलिए गणेश कहे जाते हैं । उनके उदर में भूत, भविष्य तथा वर्तमान अखिल ब्रह्माण्ड व्याप्त है । इसलिये वे लम्बोदर भी  कहे जाते हैं उनका मूल मानव सिर कट गया दुबारा उन्हें गज के सिर से युक्त किये जाने के कारण उन्हें गजानन कहा गया है। प्राचीन समय में सप्त ऋषियों ने शाप से अग्नि को नष्ट ,कर दिया । उसे पुनः प्रदीप्त करने के कारण वे शूपकर्ण कहे जाते हैं । चतुर्थी के दिन ,चन्द्रमा को इन्होंने अपने मस्तक पर धारण किया । अतः वे भालचन्द्र कहे जाते हैं। देवासुर ,राक्षस के संग्राम के समय में देवताओं के विध्न दूर करने के कारण वे विध्न विनाशक कहे गये ।  तुण्ड के वक्र होने के कारण इन्हें वक्रतुण्ड भी कहा जाने लगा ।

गणेश की एकदन्त से सम्बन्धित कई कथायें प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार- जामदमय ने परशु से इनका एक दाँत तोड़ डाला था, जिससे इनका नाम एकदन्त पड़ गया । गणेश के एकदन्ती का प्रसिद्ध कथानक “ब्रह्माण्ड पुराण” में भी किया गया है । जिसके अनुसार एक बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम शिव के दर्शन के लिये कैलाश पर्वत पर गये उस समय शिव और पार्वती वार्तालाप कर रहे थे और किसी का भी प्रवेश प्रतिबन्धित था द्वार पर परशुराम के आते ही गणेश ने आगे जाने से रोक दिया, फलतः परशुराम और गणेशं में संघर्ष हो गया । परशुराम ने अपने परशु से प्रहार कर गणेश का एक दाँत तोड़ दिया, तब से गणेश एकदन्ती हो गये ।

श्री राघव चैतन्य कृत महागणपति स्तोत्र के अनुसार-

इत्वं विष्णुशिवादितत्क्तनवें श्रीं क्क्रतुण्डायहुँ

काराक्षिप्त समस्त दैत्यप्रतनान्नाताय दीप्य विषै।

आनन्दैकरसावबोध लहरीं विध्वस्त सर्वोर्मये

सर्वत्र प्रथमानमुग्धमहसें तस्मैं परस्मैं नमः ।।

अर्थात इस प्रकार विष्णु, शिव आदि तत्व शरीर वाले, हुँकार मात्र से दैत्य समूहको मार डालने में समर्थ अत्यन्त उद्वीप्त दीप्ति वाले आनन्दैकरसमय ज्ञान लहरी से समस्तउर्मियों को विध्वस्त करने वाले उन परमात्मा वक्रतुण्ड को नमस्कार है। जिनका मनोहरतेज सर्वत्र व्याप्त है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में गणेश को ब्रह्मा, विष्णु,शिव इन्द्रादि समस्त देवों  एवं इस सारी सृष्टि का आविर्भाव कर्ता बताते हुए ब्रह्म बताया गया है :-

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेत-

तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता।

तथेन्द्रादयो देवसंघा मनुष्याः ।

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।३।

योगशास्त्र के अनुसार मूलाधार चक्र में गणेश का वास माना गया है। इस प्रकार विश्व के उद्गम एवं विकास के परम कारण ओंकार स्वरूप गणेश ही पर ब्रह्म हैं। वे ही सत्व,रज तथा तम के अधीश्वर जगत के कारण हैं अनेक रूपों में विद्यमान हैं। दीर्घतमा ऋषि के अनुसार “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”। अर्थात एक ही होते हुए उसको अनेकों रूपों में विद्वान् लोग बताते हैं।

भगवान गणेश के विविध नामों का वर्णन

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गणेश वैदिक देव है इसी कारण उनके नामों की विविधता वैदिक वाड्मय और शास्त्रीय ग्रन्थों में बहुलता से पायी गई है। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में मान्य असंख्य देवों में प्रमुख देव अर्थात् विष्णु शिव और देवी दुर्गा एक ही तत्व होने पर क्रमशः विष्णुसहस्त्रनाम’, शिवसहस्त्रनाम और दुर्गाशतनाम सहस्त्रनाम आदि ग्रन्थों में गुण-कर्मानुसार एक हजार नामों से अभिहित किये गये है। उसी प्रकार गकारादि श्रीगणपति सहस्त्रनामस्तोत्रम में श्रीगणेश के एक हजार नाम दिये गये है।

  • इसके अतिरिक्त ‘श्रीवक्रतुण्डमहागणपति सहस्त्रनामावलिः’ और गणेश पुराण के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध ‘गणपतिसहस्त्रनाम’ आदि ग्रन्थों में श्री गणेश के एक हजार नाम है। गणेश पुराण में उपासनाखण्ड के ‘श्री गणपत्यष्टोत्तरशतनाम’ नामक स्तोत्र में गणेश के सौ नाम दिये गये है। गणेश पुराण में दिये गये गणेश कवच में भी गणेश के विविध नाम आयें है।
  • वैदिक वांड्:मय में गणेश के नाम एवं स्वरूप ऋग्वेद और यजुर्वेद के ‘गणानां त्वां गणपति हवामहें’ मंत्र में गणपति शब्द के लिये कविनाकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति और प्रियपति, निधिपति आदि नाम प्रयुक्त हुये है। इन्ही वेदों में उनके माधवन, द्वैमातुर, और वक्रतुण्ड नाम भी मिलते है। लेकिन इन मंत्रों में गणपति शब्द का प्रयोग ‘ब्रह्मणस्पति’ की उपाधि के रूप में आया है।

आचार्य सायण भी लिखते है- यह गणेश के लिये नही ब्रह्मणस्पति के लिये है जो देवादि गुणों के अधिपति है। ऋग्वेद में इन्द्र को गणपति के रूप में सम्बोधित किया गया है। तैत्तिरीय संहिता एवं वाजसनेही संहिता में इस मंत्र का अभिप्राय अश्वमेघ के घोड़े से है न कि गणेश से। ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट आया है कि ‘गणानां त्वां’ नामक मंत्र ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित है। तात्पर्य यह है कि पूर्ववर्ती ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ‘गणपति नाम का प्रयोग हुआ है किन्तु पौराणिक युग के गणपति या गणेश के रूप में उनको कल्पना नहींहुई है। अतः मध्यकाल में गणेश के विलक्षण रूप के अनुरूप जो हस्तिमुख, लम्बोदर आदि वर्णितहै वे वैदिक संहिता में नही पाये जाते है।

गणपति का स्पष्ट उल्लेख मैत्रायणी संहिता की गणेश गायत्री तथ गणपत्यर्थशीर्ष में जिसे गणेशोपनिषद् भी कहते हैं, में मिलता है। गणेश गायत्री में उनके हस्तिमुख, एकदन्त वक्रतुण्ड तथा दन्ती’ नाम मिलते है तो अथर्वशीर्ष के मंत्रों में उन्हें व्रातपति, गणपति, प्रथमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय, श्री वरदमूर्ति कहा गया। लेकिन विद्वानों ने गायत्री वाले इन भागों और गणेशोपनिषद् को बहुत बाद का माना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ईसवी सन् के बहुत पहले गणपति का साहित्य में प्रवेश हो चुका था। मूर्तिकला के क्षेत्र में उनका अस्तित्व बहुत बाद में आया। कदाचित इनकी उपासना को शास्त्रीय धरातल एवं मान्यता प्राप्त करने में समय लग गया होगा।

पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठीं शताब्दी ई०पू० में ही कर ली होगी। क्योंकि ई०पू० छठी शताब्दी के ‘बौधायन धर्मसूत्र’ में गणेश के तर्पण की गणना की गयी है जैसे विघ्नविनायक, गजमुखी, एकदन्त वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि प्रारम्भ में गणेश मानवगृहसूत्र और याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के रूप में उद्धृत हुये। मानवग्रह्य सूत्र में विनायकों का उल्लेख हुआ है। उनकी संख्या चार है- शालकटंक, कुष्माण्ड राजपुत्र, उस्मित और देवयजन।

याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के चार नाम है- मित, सम्मित, शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र । विश्वरूप व अपरार्क ने भी विनायक के चार नाम ही बताये है। किन्तु मिताक्षरा ने शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र के दो-दो भागों में तोड़कर दृढ़ नाम दिये है- मित, सम्मित शाल, कटकट, कूष्माण्ड एव राजपुत्र’ अतः यह कहा जा सकता है कि गणेश वादक दवा का पाक्तमें किसी देशोभ्दव जाति से आये और रूद्र (शिव) के साथ जुड़ गये।

छठीं-सातवीं शताब्दी के लगभग गाणपत्य सम्प्रदाय के अस्तित्व में आने के बाद गणपति-स्वरूप के विभिन्न पक्ष अस्तित्व में आये। उनके स्वरूप की कुछ विशिष्टायें पहले से ही आकार लेने लगी थी। गाणपत्य सम्प्रदाय से सम्बंधित साहित्य में वेदमंत्रों को गणेश से जोड़ते हुये उन्हें इनके लिये प्रयोग किया गया, जिससे गणेश का स्तर, देवसमूह में विशिष्ट हुआ। ऋग्देव, कविनांकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति, माधवन, द्वैमातुर तथा यजुर्वेद के देवता प्रियपतिनं, निधिपतिं वक्रतुण्ड आदि उपाधियॉ गाणपत्य उपनिषदों में गणेश के लिये प्रयुक्त है। गाणपत्य साहित्य ने

गणेश के स्वरूप के विकास में भी वैदिक देवों के स्वरूप से ही तत्व ग्रहण किया। उदाहरणार्थ अंकुश, वज्र व कमल इन्द्र से व्याघ्र चर्म और अर्ध चन्द्रमा शिव से पाश वरूण से, कुठार ब्रह्मणस्पति से ग्रहण किये गये। इस तरह उनका स्वरूप वैदिक देवों के सदृश विकसित हुआ।

पुराणों में गणेश के नाम एवं स्वरूप – परवर्ती विद्वानों ने भी अपने ग्रन्थों में श्री गणेश के अनेकों नाम दिये है। काशी के जंगमवाड़ी मठ के श्री शिवलिंग शिवाचार्य ने श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामवलिः नामकी पुस्तक में 108 नाम दिये है अमरकोश के एक श्लोंक में भी गणेशजी के आठ नाम दिये गये है।

जो इस प्रकार है- विनायकविघ्नराजद्वैमातुरगणाधिपएकदन्तहेरम्बलम्बोदर और गजानन। इनमें से कुछ नाम वेदों में प्रसिद्ध आठ नामों से साम्य रखते है और कुछ उनके प्रमुख आठ अवतरों के समान है।

वेदों में वर्णित आठ नाम है- गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजववत्रं, गुहाग्रजम् ।

प्रमुख आठ अवतार है- वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण।

वेदों के एकदन्त, हेरम्ब और लम्बोदर ये तीन नाम अमरकोश मे मिलते है तो आठ अवतारों के एकदन्त, गजानन, लम्बोदर और विध्नराज नाम मिलते है। इन तीनों में दो-दो नामों को क्रमशः द्वैमातुर, विनायक, गजववत्र, गुहाग्रज और वक्रतुण्ड, धूम्रवर्ण का विशिष्ट विवरण प्राप्त होता है। थानाभाव के कारण उनके आठ अवतारस्वरूप नामों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है- वक्रतुण्ड- उनका यह रूप ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला मत्सरासर का वध करने वाला तथा सिंहवाहन पर चलने वाला है।

गणेश पुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तिम अध्याय में बनारस के 56 गणेश रूपों का वर्णन मिलता है– गणेश के सात आवरणों की चर्चा हैं जिनमें 56 विनायक विद्यमान है-

  1. प्रथम आवरण- मैं दुर्गा विनायक, भीमचण्डी विनायक, देहलीगणप, उदण्ड विनायक, पाशपाणि, सर्वविध्नहरण विनायक।
  2. द्वितीय- आवरण-लम्बोदर, कूटदन्त, शूलंटक, कूष्माण्ड, मुडविनायक, विकटद्विज विनायक, राजपुत्र, व प्रणवाक्य विनायक।
  3. तृतीय आवरण- वक्रतुण्ड, एकदंत, त्रिमुख विनायक, पंचास्य विनायक, हेरम्ब, मोदकप्रिय ।
  4. चतुर्थ आवरण- सिंहतुण्ड  विनायक, पुण्यताक्ष, क्षिप्रप्रसाद, चिंतामणि, दंतहस्त, प्रचण्ड और दण्डमुण्डविनायक।
  5. पाँचवा आवरण- स्थूलदंत, कलिप्रिय, चतुर्दन्त, द्वितुण्ड, गजविनायक, काल विनायक, मार्गेशालयविनायक।।
  6. छठा आवरण- मणिकार्णिका विनायक, आशासृष्टि विनायक, यक्षारण्य, गजकर्ण, चित्रघंट वसुमंगलमित्र विनाय।
  7. सातंवा आवरण- मोद, प्रमोद, सुमुख, दुर्मुख, गणय, एवं ज्ञान विनायक ।

इसके अतिरिक्त अविमुक्त, मोक्षदाता, भगीर विनायक, हरिश्चन्द्र विनायक, कपर्दी व बन्दु विनायक के नामों का भी उल्लेख हुआ है।

पदम् पुराण में उनके 12 नामों का उल्लेख भी मिलता है- गजपति, विघ्नराज,लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्बर, एकदन्त, गणाधिप विनायक, चारूकर्ण, पाशुपाल, भवत्तनय यहनाम उनके कुछ मूर्ति विज्ञानी स्वरूप की भी अभिव्यक्ति करते है।

अग्नि पुराण में जहां गणेश के प्रतिमा शास्त्रीय स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- कि वे गजमुखी, वक्रतुण्ड, एकदन्त बड़े उदर वाले, धूम्रवर्णी चतुर्भुजी है। वहीं गणेश के अनेकनामों का उल्लेख भी इस पुराण में प्राप्त होता है। कुछ नाम उनके प्रतिमा के स्वरूप को उद्घाटितकरते है। जैसे वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजवक्र, लम्बकुक्षी, धूम्रवर्ण।

गरूड़ पुराण में गणेश के बारह नाम दिये गये है- जिनमें एकदन्त, वक्रतुण्ड, त्रयम्बक(त्रिनेत्र.) नीलग्रीवा, लम्बोदर, धूम्रवर्ण, बालचन्द्र, हस्तिख जैसे नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप की ओर इंगित करता है।

स्कन्द पुराण में गणेश के पंचमुखीदशभुजी और त्रिनेत्र स्वरूप का वर्णन करता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उनके आठ नाम- गणेश, एकदन्त, हेरम्बर, विघ्ननायक, लम्बोदर,शूर्पकर्ण, गजववत्र और गुहाग्रज है। इनमें से कुछ नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप जैसे लम्बोदर,एकदन्त शूपकर्ण का उल्लेख करते है।

मुद्गल पुराण में भी गणेश के स्वरूप से सन्दर्भित विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। यहपुराण गणेश के नौ विभिन्न स्वरूपों का विवरण देता है, जिनमें अधिकांश प्रतिशास्त्रीय स्वरूपध्यान से जुड़े हुये है। गणेश के स्वरूप को विवेचित करते हुये एक स्थल पर इसी में उन्हें मनुष्य एकदन्त, दुढिं कहा गया है। उन्हें सिद्धि और बुद्धि का पति भी कहा गया है।

गणपति 108 नामावली

श्री गणेश, गजानन, लंबोदर, विनायक के कई हजार नाम हैं लेकिन उन सभी का वाचन संभव नहीं अत: भक्त अपनी सुविधा से 108 नामों का पाठ कर सकते हैं। यह 108 गजानन नाम श्री गणेश को प्रसन्न करते हैं और वे यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक, ज्ञान और तेजस्विता का आशीष प्रदान करते हैं। श्री गणेश के 108 नामों का अर्थ-

  1. बालगणपति सबसे प्रिय बालक
  2. भालचन्द्र मस्तक पर चंद्रमा
  3. बुद्धिनाथ बुद्धि के भगवान
  4. धूम्रवण धुंए को उड़ाने वाला
  5. एकाक्षर एकल अक्षर
  6. एकदन्त एक दांत वाले
  7. गजकण हाथी की आंखें
  8. गजानन हाथी मुँख वाले
  9. गजनान हाथी के मुख वाले
  10. गजव हाथी की सूंड वाला
  11. गजवक्त्र हाथी जैसा मुंह
  12. गणाध्यक्ष गणों का मालिक
  13. गणपति गणों का मालिक
  14. गौरीसुत माता गौरी का बेटा
  15. लम्बकर्ण बड़े कान वाले देव
  16. लम्बोदर बड़े पेट वाले
  17. महाबल अत्यधिक बलशाली
  18. महागणपति देवातिदेव
  19. महेश्वर ब्रह्मांड के भगवान
  20. मंगलमूर्ति शुभ कार्य के देव
  21. मूषकवाहन जिसका सारथी मूषक
  22. निधिश्वरम  धन और निधि के दाता
  23. प्रथमेश्वर सब के बीच प्रथम 
  24. शूपकर्ण  बड़े कान वाले देव
  25. शुभम शुभ कार्यों के प्रभु
  26. सिद्धिदाता इच्छाओं के स्वामी
  27. सिद्दिविनायक सफलता के स्वामी
  28. सुरेश्वरम देवों के देव
  29. वक्रतुण्ड घुमावदार सूंड
  30. अखूरथ जिसका सारथी मूषक है
  31. अलम्पता अनन्त देव
  32. अमित अतुलनीय प्रभु
  33. अनन्तचिदरुपम अनंत चेतना
  34. अवनीश पूरे विश्व के प्रभु
  35. अविघ्न बाधाओं को हरने वाले
  36. भीम विशाल
  37. भूपति धरती के मालिक
  38. भुवनपति देवों के देव
  39. बुद्धिप्रिय ज्ञान के दाता
  40. बुद्धिविधाता बुद्धि के मालिक
  41. चतुर्भुज चार भुजाओं वाले
  42. देवादेव सभी भगवान में सर्वोपरी
  43. देवांतकनाशकारी बुराइयों और असुरों के विनाशक
  44. देवव्रत तपस्या स्वीकार करने वाले
  45. देवेन्द्राशिक  सभी देवताओं के रक्षक
  46. धामिज्क दान देने वाला
  47. दूजा अपराजित देव
  48. द्वैमातुर दो माताओं वाले
  49. एकदंष्ट एक दांत वाले
  50. ईशानपुत्र शिव के बेटे
  51. गदाधर जिसका हथियार गदा
  52. गणाध्यक्षिण पिंडों के नेता
  53. गुणिन सभी गुणों क ज्ञानी
  54. हरिद्र स्वर्ण के रंग वाला
  55. हेरम्ब मां का प्रिय पुत्र
  56. कपिल पीले भूरे रंग वाला
  57. कवीश कवियों के स्वामी
  58. कीत्ति: यश के स्वामी
  59. कृपाकर कृपा करने वाले
  60. कृष्णपिंगाश पीली भूरी आंखवाले
  61. क्षेमंकरी माफी प्रदान करने वाला
  62. क्षिप्रा  आराधना के योग्य
  63. मनोमय दिल जीतने वाले
  64. मृत्युंजय मौत को हरने वाले
  65. मूढ़ाकरम  जिन्में खुशी का वास
  66. मुक्तिदायी शाश्वत आनंद के दाता
  67. नादप्रतिष्ठित जिसे संगीत से प्यार हो
  68. नमस्थेतु सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
  69. नन्दन भगवान शिव का बेटा
  70. सिद्धांथ सफलता और उपलब्धियों की गुरु
  71. पीताम्बर पीले वस्त्र धारक
  72. प्रमोद आनंद
  73. पुरुष अद्भुत व्यक्तित्व
  74. रक्त लाल रंग के शरीर वाला
  75. रुद्रप्रिय शिव के चहेते
  76. सर्वदेवात्मन सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
  77. सर्वसिद्धांत कौशल और बुद्धि के दाता
  78. सर्वात्मन ब्रह्मांड के रक्षक
  79. ओमकार ओम के आकार वाला
  80. शशिवण रंग चंद्रमा को भाता हो
  81. शुभगुणकानन सभी गुण के गुरु
  82. श्वेता जो सफेद रंग में शुद्ध है
  83. सिद्धिप्रिय इच्छापूर्ति वाले
  84. स्कन्दपूर्व कार्तिकेय के भाई
  85. सुमुख शुभ मुख वाले
  86. स्वरुप सौंदर्य के प्रेमी
  87. तरुण जिसकी कोई आयु न हो
  88. उद्दण्ड शरारती
  89. उमापुत्र पार्व के बेटे
  90. वरगणपति  अवसरों के स्वामी
  91. वरप्रद  इच्छाओं के अनुदाता
  92. वरदविनायक सफलता के स्वामी
  93. वीरगणपति वीर प्रभु
  94. विद्यावारिधि बुद्धि की देव
  95. विघ्नहर बाधाओं को दूर करने वाले
  96. विघ्नहर्ता बुद्धि की देव
  97. विघ्नविनाशन बाधाओं के नाशक
  98. विघ्नराज सभी बाधाओं के मालिक
  99. विघ्नराजेन्द्र बाधाओं के भगवान
  100. विघ्नविनाशाय बाधाओं के नाशक
  101. विघ्नेश्वर बाधाओं के हरने वाले
  102. विकट अत्यंत विशाल
  103. विनायक सब का भगवान
  104. विश्वमुख  ब्रह्मांड के गुरु
  105. विश्वराजा संसार के स्वामी
  106. यज्ञकाय सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
  107. यशस्कर प्रसिद्धि,भाग्य के स्वामी
  108. यशस्विन सबसे लोकप्रिय देव
  109. योगाधिप ध्यान के प्रभु

भगवान गणेश से जुड़ी कथा

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पहली कहानी : गणेश के एकदंत बनने की कथा- आपने देखा होगा भगवान श्री गणेश की मूर्ति में एकदन्त आधा टुटा हुआ है | यह दांत कैसे टुटा , इसके पीछे पुराणों में अलग अलग कथाये बताई गयी है | कही लिखा हुआ है विष्णु के अवतार चिरंजीवी भगवान परशुराम जी ने इसे तोडा है | तो कही महाभारत काव्य को लिखने के लिए | कही यह भी लिखा है की कार्तिकेय ने खेल खेल में गणेश जी का दन्त तोड़ दिया था |

पूरी कथा : कैसे बने गणेश जी एकदंत , कथा

दूसरी कहानी : गणेश और तुलसी जी की कहानी- तुलसी जी और गणेश ने एक दुसरे को श्राप दे दिया जिससे तुलसी का विवाह एक असुर से तो गणेश जी का विवाह अकारण ही हो गया | तभी से तुलसी जी गणेश जी की पूजा में नही चढ़ाई जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी के तुलसी नही चढ़ाई जाती है |

तीसरी कहानी : गणेश ने किया कुबेर का घमंड चूर- एक बार धन के देवता कुबेर को अत्यंत घमंड हो गया | उन्होंने महा भोज आयोजित किया | गणेश जी को उन्हें सबक सिखाना था | इसलिए लम्बोदर गणेश ने कुबेर के सारे खजाने ही खा लिए |

पूरी कथा : कथा , कैसे गणेश ने कुबेर का घमंड दूर किया 

चौथी कहानी : कैसे हुआ गणेश का विवाह एक चूहे ने दिखाई चतुराई- गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश के रूप के कारण उनका विवाह हो नही पा रहा था | वे और उनके मूषक इसी कारण चिढचिढ़े हो गये | जब भी कही विवाह होता उनका मूषक विवाह में खाद सामग्री कुतरना शुरू कर देता।

पूरी कथा : कैसे हुआ गणेश जी का विवाह |

पांचवीं कहानी : गणेश को क्यों प्रिय है दूर्वा- गणेश ने बार बार अवतार लेकर देवी देवताओ और मनुष्यों की रक्षा की है | पर एक बार एक ऐसा असुर हुआ जिसे निगलने से गणेश जी तड़पने लगे|

पूरी कथा : कथा गणेश और दूर्वा की – क्यों गणेश जी को दूर्वा प्रिय है |

छठी कहानी :  इस कारण गणेश और लक्ष्मी के साथ पूजे जाते है- गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा दीपावली पर की जाती है | गणेश प्रथम पूज्य देवता है तो धन की देवी लक्ष्मी जी को माना गया है | व्यक्ति के पास धन के साथ बुद्धि होना भी जरुरी है , इसी कारण गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ की जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश और लक्ष्मी की पूजा एक साथ की जाती है |

सातवीं कहानी :  क्यों गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है – बुद्धि के देवता ने अपने ज्ञान के बल पर छोटे से मूषक से सम्पूर्ण ब्रहमांड के साथ चक्कर लगा लिए थे | तब शिव ने इन्हे प्रथम पूज्य का वरदान दिया |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता का वरदान मिला |

आठवीं कहानी : चंद्रमा को गणेश का श्राप- आपने देखा होगा की भगवान चन्द्र  हर दिन अलग अलग आकार के होते है | अमावस्या पर वे दिखाई नही देते तो पूर्णिमा पर पुरे दिखाई देते है | यह सब हुआ गणेश जी के चन्द्र देवता पर रुष्ट होने के कारण

पूरी कथा :  क्यों गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया |

श्रीगणेश की प्रतिमा के दाईं या बाईं सूंड का क्या है रहस्य

दाईं सूंड- जिस प्रतिमा में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ है दक्षिण दिशा या दाईं बाजू। दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है। जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है।

  • इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को ‘जागृत’ माना जाता है।
  • दाईं सूंड वाली मूर्ति की पूजा में कर्मकांड का विषेश महत्व होता है।
  • पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक होता है।

बाईं सूंड जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है।

  • पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है।
  • इसकी पूजा प्रायिक पद्धति से की जाती है।
  • इन  गणेश जी को गृहस्थ जीवन के लिए शुभ माना गया है।
  • इन्हें विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं लगती। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
  • थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं। त्रुटियों पर क्षमा करते हैं।

गणेश जी का हर अंग है ज्ञान की पाठशाला

गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। इसलिए हर साल भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश उत्सव मनाया जाता है। गणेश को वेदों में ब्रह्मा, विष्णु, एवं शिव के समान आदि देव के रूप में वर्णित किया गया है। इनकी पूजा त्रिदेव भी करते हैं। भगवान श्री गणेश सभी देवों में प्रथम पूज्य हैं। शिव के गणों के अध्यक्ष होने के कारण इन्हें गणेश और गणाध्यक्ष भी कहा जाता है। भगवान श्री गणेश मंगलमूर्ति भी कहे जाते हैं क्योंकि इनके सभी अंग जीवन को सही दिशा देने की सिख देते हैं।

बड़ा मस्तक- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए।

छोटी आंखें- गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाले व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रकृति के होते हैं। गणेश जी की छोटी आंखें यह ज्ञान देती है कि हर चीज को सूक्ष्मता से देख-परख कर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी धोखा नहीं खाता।

सूप जैसे लंबे कान- गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं। बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देते हैं। गणेश जी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं उसे बाहर ही छोड़ दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें।

गणपति की सूंड- गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें ज्ञान देती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी दुखः और गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता है। शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हो उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश की पूजा करनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने एवं ऐश्वर्य पाने के लिए बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश की पूजा लाभप्रद होती है।

बड़ा उदर- गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण इन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली का प्रतीक होता है। गणेश जी का बड़ा पेट हमें यह ज्ञान देता है कि भोजन के साथ ही साथ बातों को भी पचना सीखें। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है वह हमेशा ही खुशहाल रहता है।

एकदंत- बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्घ हुआ था। इस युद्घ में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इस समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेश जी की बुद्घिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए।

गणपति से जुड़ी ऐसी कथाएं जो हमें जीवन का सही मार्ग दिखाती हैं

जब हुए थे माता की सेवा में उपस्थित- गणेश जी के जीवनकाल से जुड़ी यदि सबसे पहली कोई कथा का मनुष्य स्मरण करता है, तो वो माता पार्वती द्वारा गणेश की रचना. यह तब की बात है जब माता पार्वती को स्नान के लिए जाना था लेकिन उनके द्वार पर पहरा देने के लिए कोई नहीं था, तभी मां ने अपने तन की मैल से एक बच्चे की रचना की, वो थे गणेश.

मां पार्वती ने गणेश को द्वारपाल बनाकर किसी को भी अंदर ना आने का आदेश दिया. कुछ ही क्षणों में वहां भगवान शिव उपस्थित हुए, जिन्हें गणेश ने अंदर जाने के अनुमति नहीं दी. अनेक यत्नों के बाद भी जब गणेश ने भगवान शिव को अंदर ना जाने दिया तो इस बात से अंजान कि गणेश उन्हीं का पुत्र है, शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने शस्त्र से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया. अपने पुत्र गणेश को इस तरह धरती पर कटे हुए धड़ के साथ जब माता ने देखा तो वे बेहद क्रोधित हो गईं और शिव से कहा कि वे गणेश को पहले जैसा जीवित कर दें. तभी शिव ने हाथी का सिर गणेश के शरीर से जोड़ दिया.

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे कुछ भी हो जाए हमें अपना काम बिना किसी स्वार्थ व ध्यान को ना भटकाते हुए करना चाहिए. चाहे कोई भी आवस्था हो हमें अपने से बड़ों द्वारा मिले आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए.

आपके पास जो है उसे ही उपयोगी बनाएं- यह तब की बात है जब मां पार्वती और भगवान शंकर ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिक व गणेश की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. दोनों ने अपने पुत्रों को दुनिया का तीन बार चक्कर लगाने को कहा और विजेता को इनाम के रूप में सबसे स्वादिष्ट फल देने का वादा किया. यह सुनकर कार्तिक अपने मोर पर बैठकर दुनिया का भ्रमण करने निकल गए लेकिन दूसरी ओर भगवान गणेश ने अपने माता पिता के ही चारों ओर चक्कर लगाना शुरु कर दिया. जब उनसे इस बात का कारण पूछा गया तो वे बोले कि उनका संसार स्वयं उनके माता पिता हैं, तो वे समस्त संसार का भ्रमण क्यों करें?

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे पास जो भी उपस्थित चीजें हैं हमें उनमें से सबसे मूल्यवान को चुनकर उसे उपयोगी बनाना चाहिए ना कि बिना कुछ सोचे समझे जो चीज हमारे पास ना हो उसके लिए विलाप करना चाहिए. इसके अलावा यह कथा हमें अपने माता पिता को सबसे उच्च मानने की सीख भी देती है.

अच्छे कर्मों के लिए खुद का बलिदान भी करें- भगवान गणेश ने महान ऋषि वेद व्यास के कहने पर महाभारत का महान ग्रंथ स्वयं अपने हाथों से लिखा था. इस ग्रंथ को लिखने के लिए व्यास और गणेश के बीच एक समझौता हुआ था कि व्यास इसे बिना रुके सुनाएंगे व गणेश भी बिना रुके लिखेंगे. लिखते समय अचानक भगवान गणेश की कलम टूट गई लेकिन लिखावट में कोई बाधा ना आए इसके लिए भगवान गणेश ने अपना दंत तोड़कर कलम के रूप में इस्तेमाल किया.

  • सीख: अपने इस महान कार्य से भगवान गणेश हमें यह सीख देतें हैं कि जब भी किसी के भले के लिए हम कोई काम कर रहे हैं तो निस्वार्थ होकर हमें खुद का या अपनी किसी वस्तु का बलिदन करने से पीछे नहीं हटना चाहिए.

क्रोध को शांत करना सीखें- एक बार महान योद्धा परशुराम कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने आए लेकिन वहां गणेश द्वारा उनको भगवान शिव से मिलने से रोक दिया गया. जल्द क्रोधित हो जाने वाले परशुराम ने गणेश जी को युद्ध का आमंत्रण दिया. इस युद्ध में परशुराम ने गणेश जी के बाएं दांत पर प्रहार कर उसे तोड़ दिया. फलतः मां पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं. उन्होंने कहा कि परशुराम क्षत्रियों के रक्त से संतुष्ट नहीं हुए इसलिए उनके पुत्र गणेश को हानि पहुंचाना चाहते हैं. बाद में गणेश जी ने स्वयं हस्तक्षेप कर मां पार्वती को प्रसन्न किया. गणेश जी की इस अनुकम्पा को देख परशुराम जी ने उन्हें अपना परशु प्रदान कर दिया.

  • सीख: पुराणों में विख्यात इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमें खुद के व दूसरों के क्रोध को भी शांत करना आना चाहिए. यदि मनुष्य जीवन के संकटों को हंसी खुशी संभालना सीख जाए तो उसका सफल होना निश्चित है.

गणपति का प्रकृति प्रेम

  • गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहा उनका वाहन है, नंदी उनका मित्र और अभिभावक, मोर और सांप परिवार के सदस्य हैं, पर्वत आवास है, वन क्रीड़ा स्थल, आकाश तले निवास अर्थात छत नाम की कोई चीज है। उनका प्रचलित रूप गढ़ने में नदी की बड़ी भूमिका रही है। मान्यता है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक छोटी-सी आकृति गढ़ी और उसे गंगा में नहला दिया। गंगा के स्पर्श से आकृति में जान आई  और वह विशाल हो गई। पार्वती ने उसे पुत्र कहा, तो देवताओं ने उसे गांगेय  कहकर संबोधित किया।
  • गणेश, गणपति के रूप में गणों के अधिपति हैं, उन्हें जल का अधिपति भी माना गया है। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। उनके दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है। तीसरे हाथ में संगीत की प्रतीक वीणा है। चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या त्रिशूल है। गणेश के नाम में प्रकृति से उनके एकात्म होने का रहस्य छिपा है। यह सर्वमान्य है कि काव्य के छंद की उत्पत्ति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी।
  • गणेश, छंद शास्त्र के आठों गणों के अधिष्ठाता देवता  हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें गणेश नाम दिया गया। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है। जब तक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित न की जाए, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। 
  • शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव का एक प्रमाण यह भी है कि किसी भी मंदिर, घर या दुकान में  गणेश की मूर्ति रखते समय यह ध्यान देना होता है कि उनके पैर जमीन का निश्चित रूप से स्पर्श करें। यदि उनके पैर भूमि से सटे न हों, तो अनिष्ट की आशंका होती है। प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक होने के कारण वह एक मासूम, शक्तिशाली, योद्धा, विद्वान, कल्याणकारी, शुभ-लाभ और कुशल-क्षेम के दाता हैं। 
  • गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। उन्हें आदिदेवता, देवताओं में प्रथम पूज्य और आदिपूज्य भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति पहले, बाकी तमाम शक्तियां  और उपलब्धियां उसके बाद। हिंदू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने और लिखने की परंपरा है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए  की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बैठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि तथा सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा  संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है। 
  • गणेश को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू है और इस संकट में हम  उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना और पाना है, तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हमारे भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और  जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं।

विदेशों में भी श्रीगणेश की पूजन परंपराएं

गणेशजी की मूर्तियां अफगानिस्तान, ईरान, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, थायलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, चाइना, मंगोलिया, जापान, इंडोनेशिया, ब्रुनेई, बुल्गारिया, मेक्सिको और अन्य लेटिन अमेरिकी देशों में मिल चुकी हैं।

  • जापान में भगवान गणपतिजी के 250 मंदिर हैं। जापान में श्रीगणेश को ‘कंजीटेन’ के नाम से जाना जाता है। वे वहां सौभाग्य और खुशियां लाने वाले देवता है।
  • ऑक्सफॉर्ड में छपे एक पेपर के अनुसार श्रीगणेश प्राचीन समय में सेंट्रल एशिया और विश्व की अन्य जगहों पर पूजे जाते थे।
  • श्रीगणेश की मूर्तियों और चित्रों की प्रदर्शनी दुनिया के लगभग सभी खास म्यूजियम और आर्ट गैलरियों में लग चुकी हैं। खासतौर पर यूके, जर्मनी, फ्रांस और स्वीट्जरलैंड में।
  • आयरिश लोगों का गणेशजी द्वारा भाग्य अच्छा रखने में विश्वास है। नई दिल्ली स्थित आयरलैंड एंबेसी में प्रवेश द्वार पर ही श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित की गई है।
  • गणेशजी ग्रीक सिक्के पर भी हैं। हाथी के सिर वाले भगवानों की तस्वीरें भारतीय-ग्रीक सिक्कों पर मिलीं। यह सिक्के करीबी प्रथम और तीसरी सेंचुरी बीसी के आसपास के थे।
  • इंडोनेशिया के करेंसी के नोटों पर भी श्रीगणेश की तस्वीर होती है। इंडोनेशियाई रुपिया का 20,000 का नोट। इस नोट पर की हजर देवान्तर के साथ भगवान गणेश की भी तस्वीर छपी है।

बॉलीवुड और श्रीगणेश

हिंदी फिल्मों में भी दिखती है गणेश उत्सव की धूम-

निर्माता निर्देशक दादा साहब फाल्के की 1925 में रिलीज फिल्म.. गणेशा उत्सव.. संभवत. पहली फिल्म थी जिसमें भगवान गणेश की महिमा को रपहले पर्दे पर पेश किया गया था।

1969 में फिल्म पुजारिन का गीत हो गणपति बप्पा मोरया

1977 में रिलीज फिल्म जय गणेश का गीत- जय गणेश जग गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा

1981 में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म हम से बढकर कौन का गीत देवा हो देवा गणपति देवा

1990 में फिल्म अग्निपथ का गीत गणपति अपने गांव चले कैसे हमलों चैन पडे

1999 में रिलीज वास्तव का गीत जय देव जय देव

2006 शाहरूख खान की फिल्म डॉन का गीत मोरया रे

2007 में बच्चों पर आधारित फिल्म माई फ्रेंड गणेशा और बाल गणेशा आई थी

2009 में रिलीज फिल्म ‘वांटेड’ का गीत ‘जलवा… इस गाने में गणेश चतुर्थी को बखूबी दिखाया गया था

2012 में रिलीज अग्निपथ का गीत देवा श्री गणेशा…

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ऋतु वर्णन- पतझड़, सावन, बसंत, बहार एक बरस के मौसम चार… पर यहां मौसम छह…

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ऋतुएं प्राकृतिक अवस्थाओं के अनुसार वर्ष का छोटा कालखंड है जिसमें मौसम की दशाएं एक खास प्रकार की होती हैं। यह कालखण्ड एक वर्ष को कई भागों में विभाजित करता है जिनके दौरान पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा के परिणामस्वरूप दिन की अवधि, तापमान, वर्षा, आर्द्रता इत्यादि मौसमी दशाएं एक चक्रीय रूप में बदलती हैं। Gregorian calendar के मुताबिक चार ऋतुएं मानी जाती हैं- वसंत (Spring), ग्रीष्म (Summer), शरद (Autumn) और शिशिर (Winter)। लेकिन भारत में चार ऋतुओं का नहीं बल्कि छह ऋतुओं वर्णन किया गया है।

प्राचीन काल में यहां छह ऋतुएं मानी जाती थीं- वसंत (Spring), ग्रीष्म (Summer), वर्षा (Rainy) शरद (Autumn), हेमंत (Pre-Winter) और शिशिर (Winter)। छः ऋतुओं में प्रत्येक ऋतु का चक्र दो-दो महीने का बन जाता है। वैशाख और जेठ के महीने ग्रीष्म ऋतु के होते हैं। आषाढ़ और सावन के महीनों में वर्षा ऋतु होती है। भाद्र और आश्विन के दो महीने शरद् ऋतु के होते हैं। हेमंत का समय कार्तिक और अगहन (मार्गशीर्ष) के महीनों का होता है। शिशिर ऋतु पूस (पौष) और माघ के महीने में उतर आती है, जबकि वसंत का साम्राज्य फाल्गुन और चैत्र के महीनों में होता है। ऋतु वर्णन पर तो महाकवि कालिदास ने पूरी काव्यरचना ही कर डाली थी। ऋतुसंहार महाकवि कालिदास की प्रथम काव्यरचना मानी जाती है, जिसके छह सर्गो में ग्रीष्म से आरंभ कर वसंत तक की छह ऋतुओं का सुंदर प्रकृतिचित्रण प्रस्तुत किया गया है।

ऋतुओं का चक्र फसल, वन, पशु-पक्षियों और भारतीयों को प्रत्येक रूप में प्रभावित करता है। वस्त्र पहनने से लेकर भोजन और देशाटन भी इससे प्रभावित होता है। इस ऋतु की आश्चर्यचकित करने वाली एक अन्य विशेषता भी है। कभी राजस्थान की मरूभूमि जल की बूँद के लिए तरसती है तो चिरापूँजी में वर्षा की झड़ी रूकने का नाम ही नहीं लेती है। जब भारत का दक्षिण भाग गरम रहता है तो उत्तरी भाग शीत से ठिठुर जाता है। कई प्रांत कभी प्रचंड लू में तपने लगते हैं तो दूसरे प्रांतों में पानी को बर्फ में जमा देने वाली ठंड पड़ती है। ऋतुओं का यह चक्र एक ही प्रकार की अनुभूति से बचाता है और बेचैनी के क्षणों को फिर से परिवर्तित कर देता है। कभी धरती तपने लगती है, कभी वर्षा की झड़ी में नहाने लगती है, कभी बर्फ़ की श्वेत चादर ओढ़ लेती है तो कभी वसंत की मादक-मोहक रंगों से सजी धजी नवयौवना बनकर खिलखिलाती है।

क्र.म.

 ऋतुएँ हिंदी माह ग्रेगोरियन माह    तापमान मौसमों के त्यौहार
1. वसंत (Spring) चैत्र और वैशाख मार्च, अप्रैल 20-30 डिग्री सेल्सियस बसंत पंचमी, गुडी पडवा, होली, रामनवमी, वैशाखी/ हनुमान जयंती 
2. ग्रीष्म (Summer) ज्येष्ठ और आषाढ मई, जून बहुत गर्म, 40- 50 डिग्री सेल्सियस वट पूर्णिमा, रथ यात्रा और गुरु पूर्णिमा
3. वर्षा (Rainy) सावन और भाद्रपद जुलाई, अगस्त गर्म, उमस और बहुत ज्यादा वर्षा रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी
4. शरद (Autumn) आश्विन और कार्तिक सितम्बर, अक्टूबर 19-25 डिग्री सेल्सियस नवरात्रि, विजयादशमी, शरद पूर्णिमा
5. हेमंत (pre-winter) मार्गशीर्ष और पौष नवंबर, दिसंबर 20-15 डिग्री सेल्सियस दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा
6. शिशिर (Winter) माघ और फागुन जनवरी, फरवरी 10 डिग्री से काम हो सकता है.

संक्रांति, महाशिवरात्रि

 

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वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर और हेमंत इन 6 ऋतुओं में से वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। जो फरवरी, मार्च माह में अपना सौंदर्य बिखेरती है। ऐसा माना गया है कि माघ महीने की शुक्ल पंचमी से 

giphyवसंत ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास वसंत ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ वसंत में ही होता है। इस ऋतु के  आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। आम बौरों से लद जाते हैं और खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है और इसे ऋतुराज कहा गया है।

इस ऋतु में होली, धुलेंडी, रंगपंचमी, बसंत पंचमी, नवरात्रि, रामनवमी, नव-संवत्सर, हनुमान जयंती और गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाए जाते हैं। इनमें से रंगपंचमी और बसंत पंचमी जहां मौसम परिवर्तन की सूचना देते हैं वहीं नव-संवत्सर से नए वर्ष की शुरुआत होती है।  इसके अलावा होली-धुलेंडी जहां भक्त प्रहलाद की याद में मनाई जाती हैं वहीं नवरात्रि मां दुर्गा का उत्सव है तो दूसरी ओर रामनवमी, हनुमान जयंती और बुद्ध पूर्णिमा के दिन दोनों ही महापुरुषों का जन्म हुआ था।

वसंत ऋतु में वसंत पंचमी, शिवरात्रि तथा होली नामक पर्व मनाए जाते हैं। भारतीय संगीत साहित्य और कला में इसे महत्वपूर्ण स्थान है। संगीत में एक विशेष राग वसंत के नाम पर बनाया गया है जिसे राग बसंत कहते हैं।

‘पौराणिक कथाओं के अनुसार वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है। देव (कवि) ने वसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है कि रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति झूम उठती है। पेड़ों उसके लिए नव पल्लव का पालना डालते है, फूल वस्त्र पहनाते हैं पवन झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है।भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है ऋतुओं में मैं वसंत हूँ— क्या कहा देव (कवि) ने-

डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव केसुमन झिंगूला सोहै तन छबि भारी दै।

पवन झूलावैकेकी-कीर बतरावैं देव’, कोकिल हलावै हुलसावै कर तारी दै।।

पूरित पराग सों उतारो करै राई नोनकंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।

मदन महीप जू को बालक बसंत ताहिप्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दै॥

अर्थात- प्रस्तुत कवित्त में देव (कवि) ने वसंत ऋतू का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया है. उन्होंने वसंत की कल्पना कामदेव के नवशिशु के रूप में की है. पेड़ की डाली बालक का झुला है. वृक्षों के नए पत्ते पलने पर पलने वाले बच्चे के लिए बिछा हुआ है. हवा स्वयं आकर बच्चे को झुला रही है. मोर और तोता मधुर स्वर में बालक का बालक का मन बहला रहे हैं. कोयल बालक को हिलाती और तालियाँ बजाती है. कवि कहते हैं कि कमल के फूलों से कलियाँ मानो पर अपने सिरपर पराग रूपी पल्ला की हुई है, ताकि बच्चे पर किसी की नज़र न लगे. इस वातावरणमें कामदेव का बालक वसंत इस प्रकार बना हुआ है की मानो वह प्रातःकाल गुलाब रूपी चुटकी बजा बजाकर जगा रही है.

वेद और पुराणों में वसंत ऋतु

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवत

अर्थात- ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्घिप्रज्ञा और मनोव्त्तियों की संरक्षिका हैं। हममे जो आचार और मेघा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भूत है।

रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने वसंत का अत्‍यंत मनोहारी चित्रण किया है-

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भगवान कृष्ण ने गीता में ऋतुनां कुसुमाकरः‘ कहकर वसंत को अपनी सृष्टि माना है-

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।

मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकर: ॥

अर्थातृ- गायन-शास्त्र में वृहत् सामवेद हूँ छन्द-गायत्री छन्द-कलाप में। द्वादश-मास में मार्गशीर्ष मास हूँ ऋतुओं में हूँ कुसुमाकर (वसंत) मैं।

वामन पुराण में कामदेव के भस्म होकर अनंग हो जाने का वर्णन नहीं मिलता, बल्कि वह सुगन्धित फूलों के रूप में परिवर्तित हो गया। इस पुराण में बसंत का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया गया है-

ततो वसन्ते संप्राप्ते किंशुका ज्वलनप्रभा:।

निष्पत्रा: सततंरेजु: शोभयन्तो धरातलम्॥ (वामन पुराण 1/6/9)

अर्थातृ- बसन्त ऋतु के आगमन पर ढाक के वृक्षलाल वर्ण वाले पुष्पों के कारण अग्नि के समान प्रभा वाले प्रतीत हो रहे थे। उन लाल पुष्पों के गुच्छों से लदे वृक्षों के कारण धरा शोभायमान हो रही थी।

ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि

शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। – ब्रह्म पुराण

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। वसंत ऋतु में वृक्षलता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं जिसे मधुमास भी कहते हैं। इतना ही यह वसंत ऋतु समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को विभिन्न प्रकार के फूलों से अलंकृत कर जन मानस में नववर्ष की उल्लासउमंग तथा मादकाता का संचार करती है।

कालिदास ने ऋतुसंहार में बसंत का जैसा वर्णन किया हैवैसा कहीं नहीं दिखाई देता-

द्रुमा सपुष्पा: सलिलं सपदमस्त्रीय सकामा: पवन: सुगंधी:।

सुखा: प्रदोषा: दिवसाश्च रम्या:सर्व प्रिये चारुतरं वसंते।।

अलका! यह नाम लेते ही नयनों के सामने एक चित्र उभरता है उस भावमयी कमनीय भूमि का,  जहां चिर-सुषमा की वंशी गूंजती रहती हो, जहां के सरोवरों में सोने के कमल खिलते हों, जहां  मृण-तरू पात चिर वसंत की छवि में नहा रहे हों। अपार यौवन, अपार सुख, अपार विलास की  इस रंगस्थली ने महाकवि कालिदास की कल्पना को अनुप्रमाणित किया। उनकी रस प्राण वाणी  में फूट पड़ी विरही-यक्ष की करुण गाथा।

ऋतुसंहार के षष्ठ सर्ग में गीतकार वसंत को एक आक्रामक योद्धा की तरह चित्रित करता है- बोलता है, प्रियतमे ! देखों यह वसन्त योद्धा कामी जनों के मन को बेचने के लिए आ गया इस बसन्त योद्धा के वाण आम के बौर है और उनमें घूमती हुयी भ्रमर पक्ति ही धनुष की डोरी है। प्रिये, यह बसन्त ऋतुराज है। यहाँ सब सुन्दर ही सुन्दर है। तरू कुसुमों से लदे हैं। जलाशय कमल पुष्पों से सुशोभित हैं, ललनाएँ कामातुर हैं, पवन सुगन्धित है। सुबह से शाम तक सारा दिन रमणीय लगता है। प्रिये, बसन्त में वसुन्धरा नई बहू की तरह प्रतीत होती है। इस समय धरती अंगारे की तरह लाल-लाल पलाश के कुसुमों से छायी है। उसे देखकर लगता है कि वह हैं। कोई नव वधू लाल चूनर ओढ़ आयी है! इस तरह हम देखते है कि प्रस्तुत गीतिकाव्य में कवि ने प्रत्येक ऋतु के सौन्दर्य का चित्रण करते हुए प्रकृति के रंगीन चित्र प्रस्तुत किये हैं। यहाँ हमने विस्तार भय से प्रत्येक ऋतुओं का कुछ ही चित्र चित्रित किये है। ऋतुसंहार को वस्तुतः प्रकृति वर्णन बहुत ही रमणीय और हृदयावर्धक है। इसमें कथानक तक की अल्पता किन्तु चित्रण की बहुलता है।

2.png2a.pngकालिदास ने कुमारसम्भव में भी वसंत का उल्लेख करते हुए लिखा- पार्वती ने वसंत के फूलों से अपने आप को अलंकृत किया है। उसके अशोक ने पद्मराग मणि को धता बता दी है, कर्णिकार ने स्वर्ण की द्युति को खींच लिया है तथा सिंधुवार के पुष्प ही मुक्तामाला बन गये हैं-

अशोकनिर्भर्त्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम्।

मुक्ताकलापीकृतसिन्दुवारं वसंतपुष्पाभरणं वहंती॥

वसंत आता नहींले आया जाता है…जो चाहे- जब चाहे अपने पर ले आ सकता है

कालिदास से लेकर महाप्राण निराला तक. टैगोर से लेकर शैली तक. सब वसंत के दीवाने…! तभी तो कालिदास ने इसे ‘वसंतयोद्धा’ कहा है –

वसंतयोद्धा समुपागतः प्रिये…

वसन्त रूपी वीर आ गया । बौरे हुए आम के अंकुर इसके. बाण हैं, भरी की पंक्ति ही इसके घनुष का रोड़ा है और यह कामुक जनों के मन की बेधन के लिए तैयार है।) इस पद में कवि ने वसन्त की उपमा वीर से की है ।

वसंत का यह ‘योद्धा’ हर्ष और नवोत्कर्ष लाता है. दैहिक उमंगों और प्रकृति के बीच एक अजीब सा साम्य बैठ जाता है. निराला के यहां भी और कालिदास के यहां भी…

सखिवसंत आया…
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया…‘ – निराला

कालिदास के काव्य में भी वसंत जिसे छू जाए, वही सुगंध से भर उठता है – क्या फूल, क्या लताएं, क्या हवा और क्या हृदय – सभी वसंत के प्रहार से विकल हो उठते हैं…

द्रुमा: सपुष्पा: सलिलं स्पद्मं
स्त्रियः सकामः पवनः सुगंधि:,
सुखा: प्रदोषा दिवसाश्च रम्या:
सर्वमम् प्रियम् चारुतरम् वसंते…

‘पवनः सुगंधि:’ कालिदास के यहां विकलता का उत्स है. वह चंचल भी कम नहीं. आम के पेड़ों को हिलाकर भाग जाती है…

‘आकम्पयन कुसुमिता: सहकारशाखा’… कोयल की कूक को सभी दिशाओं में फैला देती है… ‘विस्तारयन परभ्रतस्य वचांसि दिक्षु…’ कोई भी तो ऐसा नहीं, जिसके हृदय को वसंत की यह हवा विचिलित न कर देती हो…! ‘वायुर्विवाति हृदयानि हरंन्नराणाम, नीहारपानविगमात्सुभगो वसंते…’

यह ‘वसंती हवा’ चली ही आ रही है. आज के जन-कवि तक पहुंचते-पहुंचते भी न इसका रूप बदला है, न चंचलता. हां, कालिदास का अपना युग था. राजाओं, सामंतों और कुलीन वर्गों की रुचियां शेष समाज पर भारी थीं. इतिहास और काव्य लिखने वाले राज्याश्रित होते थे. राजाओं और कुलीनों का गुणगान उनका युगीन-बोध था और एक यथार्थ भी, लेकिन ऋतुराज ने अपने प्रभाव में भेदभाव नहीं किया…

शायद इसलिए आज के कवि को शायद इसीलिए वसंत उतना ही पंसद है-

हवा हूंहवा हूंमैं वसंती हवा हूं…
वही हांवहीजो युगों से गगन को,
बिना कष्ट-श्रम के संभाले हुए हूं…
वही हांवहीजो सभी प्राणियों को,
पिला प्रेम-आसव जिलाये हुए हूं…‘- केदारनाथ अग्रवाल

जैसे कालिदास के युग की वासंतिक हवा आम के बौर हिला धमाचौकड़ी मचाती थी. नटखट और शैतान बच्चे की तरह. ठीक उसी तरह वह आज के कवि के यहां भी आम और महुआ के पेड़ों पर चढ़कर थपाथप मचाती है – कितना अदभुत साम्य है…!

चढ़ी पेड़ महुआ थपाथप मचाया,
गिरी धम्म से फिरचढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोराकिया कान में कू‘,
उतर के भगी मैंहरे खेत पहुंची,
वहां गेहुओं में लहर खूब मारी,
पहर दो पहर क्याअनेकों पहर तक,
इसी में रही मैं…
बसंती हवा‘ – केदारनाथ अग्रवाल

वसंत, जो प्रकृति में, पेड़-पौधों पर, और कभी-कभी हृदय में आ धमकता है, क्या इस धरा पर सभी के हृदयों को समान रूप से आनंदित ही करता है? क्या वसंत उद्विग्न नहीं करता! क्या वसंत कालिदास के युग के दरिद्र को भी उसी तरह रुचिकर लगता रहा होगा, जैसा उस युग के भद्र-पुरुषों और कुलीनों को लगता होगा! इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो मिलता नहीं। शायद मिले भी नहीं. संभव है, इस तरह का कोई समूह-बोध रहा ही न हो, लेकिन वसंत ने लोगों को अलग-अलग तो स्पर्श किया ही है. कुछ ने उसे अभिव्यक्तिमय कर दिया तो कोई उसे मौन भोगकर शांत बना रहा. जिसे अपने प्रिय का स्नेह मिले, वह वसंत में भला क्यों खुश न होता!

सरस्वती पूजन एवं ज्ञान का महापर्व है बसंत

वसंत ऋतु के आगमन का समाचार और विद्या की देवी सरस्वती के जन्मदिन की खुशियों को लेकर आज बसंत पंचमी का त्यौहार आया है. प्रकृति और विद्या के प्रति अपने समर्पण को दर्शाने का यह सबसे बेहतरीन मौका है. ठंडी के बाद मौसम अपने सबसे रंगीन रुप में करवट लेता है और पेड़ों पर निकली नई कोपलें इस शुभ-संकेत देती हैं. आज के दिन पितृ तर्पण और कामदेव की पूजा का भी विधान है. बसंत पंचमी को श्री पंचमी तथा ज्ञान पंचमी भी कहते हैं.

बसंत पंचमी मुख्यत: मां सरस्वती के प्रकट होने के उपक्ष्य में मनाया जाता है. धार्मिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि इसी दिन शब्दों की शक्ति मनुष्य की झोली में आई थी. हिंदू धर्म में देवी शक्ति के जो तीन रूप हैं -काली, लक्ष्मी और सरस्वती, इनमें से सरस्वती वाणी और अभिव्यक्ति की अधिष्ठात्री हैं. सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की. पर अपने प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य मूक था और धरती बिलकुल शांत थी. ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिटका दिया., जिससे एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई. जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. इस जल से हाथ में वीणा धारण किए जो शक्ति प्रगट हुई, वह सरस्वती कहलाई. उनके वीणा का तार छेड़ते ही तीनों लोकों में कंपन हो गया (यानी ऊर्जा का संचार आरंभ हुआ) और सबको शब्द और वाणी मिल गई.

ब्राह्मण-ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्वनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है। बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। अतः वागीश्वरी जयंती व श्रीपंचमी नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है। ऋग्वेद के (10/125 सूक्त) में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है। माँ सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। कहते हैं। जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। बहुत लोग अपना ईष्ट माँ सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं। जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं। बसंत पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को ही अर्पित है। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पाण्डालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का विधान चल निकला है। यह ज्ञान का त्योहार है, फलतः इस दिन प्रायः शिक्षण संस्थानों व विद्यालयों में अवकाश होता है। विद्यार्थी पूजा स्थान को सजाने-संवारने का प्रबन्ध करते हैं। महोत्सव के कुछ सप्ताह पूर्व ही, विद्यालय विभिन्न प्रकार के वार्षिक समारोह मनाना प्रारंभ कर देते हैं। संगीत, वाद- विवाद, खेल- कूद प्रतियोगिताएँ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। बसंत पंचमी के दिन ही विजेयताओं को पुरस्कार बांटे जाते हैं। माता-पिता तथा समुदाय के अन्य लोग भी बच्चों को उत्साहित करने इन समारोहों में आते हैं। समारोह का आरम्भ और समापन सरस्वती वन्दना से होता है। प्रार्थना के भाव हैं-

ओ माँ सरस्वती ! मेरे मस्तिष्क से अंधेरे (अज्ञान) को हटा दो तथा मुझे शाश्वत ज्ञान का आशीर्वाद दो!

सरस्वती का जैसा शुभ श्वेत, धवल रूप वेदों में वर्णित किया गया है, वह इस प्रकार है-

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता 

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।

हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

शुक्लवर्ण वाली,संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूं ॥2॥

श्रीकृष्ण ने की प्रथम पूजा : देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी पौराणिक कथा है। इनकी सबसे पहले पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने ही की है। देवी सरस्वती ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो उनके रूप पर मोहित हो गईं और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगीं। भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलने पर उन्होंने कहा कि वे तो राधा के प्रति समर्पित हैं। परंतु सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखनेवाला माघ मास की शुक्ल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा। यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की। सृष्टि निर्माण के लिए मूल प्रकृति के पाँच रूपों में से सरस्वती एक है, जो वाणी, बुद्घि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है। बसंत पंचमी का अवसर इस देवी को पूजने के लिए पूरे वर्ष में सबसे उपयुक्त है क्योंकि इस काल में धरती जो रूप धारण करती है, वह सुंदरतम होता है।

नवीन कार्यों के लिए शुभ है बसंत ऋतु- बसंत को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ ऋतु माना गया है। मुख्यतः विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए बसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, अर्थात उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। सूर्य की क्रांति 22 दिसम्बर को अधिकतम हो जाती है और यहीं से सूर्य उत्तरायण शनि हो जाते हैं। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अगले 6 माह तक उत्तरायण रहते हैं। सूर्य का मकर से मिथुन राशियों के बीच भ्रमण उत्तरायण कहलाता है। देवताओं का दिन माघ के महीने में मकर संक्रांति से प्रारंभ होकर आषाढ़ मास तक चलता है। तत्पश्चात आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास शुक्ल पक्ष एकादशी तक का समय भगवान विष्णु का निद्रा काल अथवा शयन काल माना जाता है। इस समय सूर्यदेव कर्क से धनु राशियों के बीच भ्रमण करते हैं, जिसे सूर्य का दक्षिणायन काल भी कहते हैं। सामान्यतः इस काल में शुभ कार्यों को वर्जित बताया गया है। चूंकि बसंत पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में पड़ता है, अतः इस पर्व का स्वतः ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है।

वसंत को कहते हैं ऋतुओं का राजा- मौसम प्रकृति के बदलाव का अहसास दिलाता है। हर बदलती हुई ऋतु अपने साथ एक संदेश लेकर आती है। भारत की प्रकृति के अनुसार हमारे यहां छ: ऋतुएं प्रमुख रूप से मानी गई है। हेमंत, शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा व शरद ऋतु। इनमें वसंत को सबका राजा कहा गया है।

वसंत को ऋतुओं को राजा कहने के पीछे कई कारण हैं जैसे- फसल तैयार रहने से उल्लास और खुशी के त्यौहार, मंगल कार्य, विवाह , सुहाना मौसम, आम की मोहनी खुशबू, कोयल की कूक, शीतल मन्द सुरभित हवा, खिलते फूल, मतवाला माहौल, सुहानी शाम, फागुन के मदमस्त करने वाले गीत सब मिलकर अनुकूल समां बाधते है। यही कारण है कि वसंत को ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत की उत्पत्ति के संबंध में धर्मग्रंथों में एक कथा भी है जो इस प्रकार है-

अंधकासुर नाम के राक्षस का वध सिर्फ भगवान शंकर के पुत्र से ही संभव था। तो शिवपुत्र कैसे पैदा हो? इसके लिए शिवजी को कौन तैयार करे? तब कामदेव के कहने पर ब्रह्माजी की योजना के अनुसार वसंत को उत्पन्न किया गया था। कालिका पुराण में वसंत का व्यक्तीकरण करते हुए इसे सुदर्शन, अति आकर्षक, सन्तुलित शरीर वाला, आकर्षक नैन-नक्श वाला, अनेक फूलों से सजा, आम की मंजरियों को हाथ में पकड़े रहने वाला, मतवाले हाथी जैसी चाल वाला आदि सारे ऐसे गुणों से भरपूर बताया है।

बसंत पंचमी का दिन अनेक साहित्यकारों तथा महापुरुषों से भी जुड़ा है- बसंत पंचमी वाले दिन वीर हकीकत राय जी का वध इसलिए कर दिया गया था क्योंकि इस वीर बालक ने अपना धर्म त्यागने से इनकार कर दिया था। हिंदी के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्मदिवस भी बसंत  पंचमी वाले दिन ही मानाया जाता है। हिंदी के महान कवि निराला जी ने भी सरस्वती रूप में भारत माता की वंदना कुछ यों की है- 

भारति जय-विजय करे, कनक-शस्य-कमल धरे,
लंका पदतल-शतदल, गर्जितोमिं सागर-जल,
धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु अर्थ भरे।

मां सरस्वती के जन्म बसंत  पंचमी पर्व व वसंत  ऋतु के महत्व को रवींद्रनाथ टैगोर ने कुछ यों वर्णन किया है :

आओ आओ कहे वसंत  धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान।
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नयी कामनाएं घरती पर।

वसंत ऋतु में सर्दी की कंपकंपी कुछ कम होने लगती है। कहावत है ‘आया वसंत, पाला उड़ंत।’ कवि व शिक्षक डॉ. बालकिशन शर्मा ने वसंत  का कुछ यों यशोगान किया है :

फाल्गुण में फिर मस्ती जागी, कण-कण धरती का इतराया,
वसंत  संग ले, कामदेव को, नव-शृंगार सजाने आया॥
पिक  गाती, मैना मदमाती, कुसुमित उपवन, मस्त सुगंध,
पुन: धरा संगीत-भरी, जीवन के टूटे सब बंध॥

धर्म और इतिहास दोनों से जुड़ी है वसंत ऋतु- वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर बसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजाकर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं।

कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए बसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है।

सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। बसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रद्धा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है। मोरारी बापू की प्रेरणा से वहां 10 से 12 फरवरी तक शबरी कुंभ का आयोजन हो रहा है।

बसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना तो जगप्रसिद्ध ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण

ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।

पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी बसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

बसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामतः उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।

कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना बसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अतः पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

बसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में बसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।

गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उद्धार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अतः युद्ध का पासा पलट गया।

इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

बसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाका जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हंे ‘महाप्राण‘ कहते थे। एक बार नेहरूजी ने शासन की ओर से कुछ सहयोग का प्रबंध किया, पर वह राशि उन्होंने महादेवी वर्मा को भिजवाई। उन्हें भय था कि यदि वह राशि निराला जी को मिली, तो वे उसे भी निर्धनों में बांट देंगे। जहां एक ओर वसंत ऋतु हमारे मन में उल्लास का संचार करती है, वहीं दूसरी ओर यह हमें उन वीरों का भी स्मरण कराती है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। आइये, इन सबकी स्मृति में नमन करते हुए हम भी वसंत के उत्साह में सम्मिलित हों।

“वैलंटाइंस डे” यानी हमारा “मदनोत्सव”-  14 फरवरी – वेलेंटाइन डे, प्यार करने वालों के लिए सबसे बड़ा दिन जिसे संत वेलेंटाइन की याद में मनाया जाता है। लेकिन इन प्यार के परिंदों को शायद नहीं पता भारत में ”वेलेंटाइन डे” तो भारतवासी हजारों सालों से मना रहे हैं।बसंत पंचमी, वसंतोत्सव, मदनोत्सव… इसकी प्रक्रिया रति और कामदेव यानी क्यूपिड/ वीनस के श्रृंगाररस से भरी है। उस वैलंटाइन के आगाज में हमारे देश में बसंत पंचमी के बाद पूरे दो महीने रहता है, जो असल में प्रेमी-प्रेमिकाओं का ही पर्व है। होली का उत्सव इसका चरमबिन्दु है, जब रस के रसिया का एकाकार हो जाता है।

हमारा वसंतोत्सव या कामदेव और रति के प्यार का उत्सव वैलंटाइन डे भी एक पाश्चात्य देशों से चला पर्व है, जिसकी शुरुआत तीसरी शताब्दी के दरम्यान हुई। जब इटली में रोमन शासक क्लाडियस द्वितीय अपनी सेना के युवा सैनिकों के लिए बहुत ही कठोर अनुशासन का पालन करवाता था। उसके शासन में प्रत्येक युवा को 20 से 30 साल की आयु के दौरान अनिवार्य रूप से सेना में भर्ती होना पड़ता। इस दौरान उनको अपने प्रियजनों सहित पत्नी/ प्रेमिका से मिलने तक की सख्त पाबन्दी थी। वक्त गुजरने के साथ इस पाबंदी का विरोध होने लगा और रोमन चर्च पादरी सेन्ट वैलंटाइन ने 14 फरवरी के इस परम्परा का विरोध करके चर्च में ऐसे जोडों का विवाह करवाना आरंभ कर दिया। उसके बाद सभी सैनिकों और प्रेमी जोड़ों ने इस परम्परा का स्वागत किया और तब से हर साल की 14 फरवरी वैलंटाइंस डे के नाम से विख्यात हो गई और धीरे-धीरे यूरोप से एशिया और दुनिया के अन्य देशों में भी यह दिन प्रेमी दिवस के रूप में प्रचलित हो गया। भारत में इसे पहुंचने में लगभग 1700 साल लगे और अब सभी महानगरों के प्रेमी युगल इस दिन एक-दूसरे को कार्ड उपहार आदि देकर वैलंटाइंस डे मनाते हैं। बाजारों में 15 दिन पहले से सस्ते और मंहगे गिफ्ट सजे रहते हैं और धड़ल्ले से युवा प्रेमी एक-दूसरे के लिए प्रेम का इजहार करने में आगे रहते हैं। यहां पर यह भी निवेदन है कि नकली और असली युवा रस्म आज पूरा बाजार का रूप ले चुका है। पश्चिमी देशों का तो हम नहीं जानते, लेकिन भारतीय परिवेश में वैलंटाइंस डे का लगभग 50 हजार करोड़ के गिफ्ट आइटम्स का बजट है, जो प्यार के देवताओं को अर्पित होता है।

यही परिष्कृत मदनोत्सव का अधिष्ठाता कामदेव को हिंदू शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता माना गया है। उनका स्वरूप युवा और आकर्षक है। वह विवाहित हैं और रति उनकी पत्नी हैं। वह इतने शक्तिशाली हैं कि उनके लिए किसी प्रकार के कवच की कल्पना नहीं की गई है। उनके अन्य नामों में रागवृंत, अनंग, कंदर्प, मन्मथ, मनसिजा, मदन, रतिकांत, पुष्पवान, पुष्पधन्वा आदि प्रसिद्ध हैं। कामदेव, हिंदू देवी श्रीलक्ष्मी के पुत्र और कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का अवतार हैं। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को हिंदू धर्म में वैष्णव अनुयायियों द्वारा कृष्ण को भी माना जाता है। जिन्होंने रति के रूप में 16 हजार पत्नियों से महारास रचाया था और व्रजमंडल की सभी गोपियां उनपर न्यौछावर थीं।

देशभर में बसंत पंचमी का त्योहर अलग-अलग अंदाज में कैसे मनाया जाता है-

उत्तराखंड- उत्तराखंड की खासियत है, वहां एक के बाद एक त्योहार सालभर मनाए जाते हैं। बसंत पंचमी के दिन यहां के मंदिर बेहद खूबसूरत ढंग से सजाए जाते हैं। बसंत पंचमी मनाने का अर्थ यहां वसंत तु का स्वागत करना है। यहां धरती मां की पूजा भी की जाती है। जौ, मक्का, गेहूं के बाले घर के दरवाजों, खिड़कियों पर व मंदिर में लगाते हैं और दीए जलाए जाते हैं।

हरियाणा- हरियाणा में पतंग उड़ाकर बसंत पंचमी मनाई जाती है। लहलहाते खेतों की पूजा भी की जाती है।

पश्चिमी बंगाल- बसंत पंचमी को बंगाल में पूरी विधि-विधान से देवी सरस्वती की पूजा करके मनाया जाता है। बंगाल में आज भी अधिकतर बच्चों को इस दिन ही स्कूल में दाखिला दिलाया जाता है। बसंत पंचमी आते ही परीक्षाओं के दिन भी नजदीक आ जाते हैं। इस दिन कॉपी, किताब, कलम आदि की पूजा भी की जाती है। प्राचीनकाल में राजा व शासक इस दिन कवि सम्मेलन आदि कराते थे। पुरस्कार व सम्मान बांटते थे।

पंजाब व उत्तर भारत- पंजाब व उत्तरी भारत में लोग सरसों की फसल के लहलहाते खेत देखकर मग्न हो उठते हैं। पीले फूलों से सजावट की जाती है। पीले फूल एक-दूसरे को भेंट स्वरूप भी दिए जाते हैं। भांगड़ा किया जाता है। ज्यादातर सभी लोग पीले रंग के वस्त्र ही पहनते हैं। मीठे पीले चावल पकाए जाते हैं। कुछ लोग पीले वस्त्र से अपना सिर ढकते हैं, तो कुछ पीला तिलक माथे पर लगाते हैं। केसर हलवा भी बनाया जाता है।

बिहार व उड़ीसा- बिहार व उड़ीसा में इसे सिरा पंचमी कहा जाता है। इस दिन वहां लोग हल की पूजा करते हैं और सर्दी के मौसम के बाद खेती के लिए धरती को तैयार करते हैं।

गुजरात और राजस्थान-  बसंत पंचमी में खास तौर से पतंगों का मेला लगता है। पूरा आकाश अलग-अलग आकार की  रंग-रंगीली पतंगों से भर जाता है। पतंग उड़ाते हुए गाने भी गाए जाते हैं व पतंग उड़ाने की कई प्रतियोगिताएं होती हैं।

आयुर्वेद के अनुसार वसंत ऋतु में कौन सा पकवान और मिष्ठान लाभदायक होता है…

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वसंत का असली आनंद जब वन में से गुजरते हैं तब उठाया जा सकता है। रंग-बिरंगे पुष्पों से आच्छादित वृक्ष….. शीतल एवं मंद-मंद बहती वायु….. प्रकृति मानों, पूरी बहार में होती है। ऐसे में सहज ही प्रभु का स्मरण हो आता है, सहज ही में ध्यानावस्था में पहुँचा जा सकता है। ऐसी सुंदर वसंत ऋतु में आयुर्वेद ने खान-पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की नीरोगता का ध्यान रखा है।

जिस प्रकार पानी अग्नि को बुझा देता है वैसे ही वसंत ऋतु में पिघला हुआ कफ जठराग्नि को मंद कर देता है। इसीलिए इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने, ताजी हल्दी, ताजी मूली, अदरक, पुरानी जौ, पुराने गेहूँ की चीजें खाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा मूँग बनाकर खाना भी उत्तम है। नागरमोथ अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। देखो, आयुर्वेद विज्ञान की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है !

मन को प्रसन्न करें एवं हृदय के लिए हितकारी हों ऐसे आसव, अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका आदि पीना इस ऋतु में लाभदायक है।

वसंत में आने वाला होली का त्यौहार पर मुख्य मिठाईयां- गुजिया, गुलाब जामुन, तिल के लड्डू, शकरपारे, कलाकंद बालूशाही, कांजी बड़े

ठंडाई- ठंडाई ऐसा पेय पदार्थ है जो कि होली का मजा दुगुना कर देता हैं। ठंडाई को कई तरह से बनाया जा सकता हैं। इसमें बादाम, पिस्ताह, केसर, गुलाब की पत्तियों और कई मसालों को आराम से मिक्सा किया जा सकता है। ठंडाई में खरबूजे के बीज भी मिलाए जा सकते हैं ये ठंडाई का मजा दुगुना कर देते हैं। ठंडाई को बनाने में विशष बात है कि आप चाहे तो ठंडाई के पाउडर को पहले ही तैयार कर सकते हैं और जब भी ठंडाई बनानी हो तो ठंडे दूध में इसे मिलाकर सर्व किया जा सकता है।

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ज्येष्ठ और आषाढ़ ‘ग्रीष्म ऋतु’ के मास हैं। इसमें सूर्य उत्तरायण की ओर बढ़ता है। ग्रीष्म ऋतु प्राणीमात्र के लिए कष्टकारी अवश्य है, पर तप के बिना सुख-सुविधा को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह ऋतु अंग्रेजी कैलेंडर अनुसार giphy (1).gifमई और जून में रहती है।

मादक वसन्त का अन्त होते ही ग्रीष्म की प्रचंडता आरम्भ हो जाती है। वसन्त ऋतु काम से, ग्रीष्म क्रोध से सम्बन्धित है। ग्रीष्म ऋतु, भारतवर्ष की छह ऋतओं में से एक ऋतु है, जिसमें वातावरण का तापमान प्रायः उच्च रहता है। दिन बड़े हो जाते हैं रातें छोटी।  शीतल सुंगधित पवन के स्थान पर गरम-गरम लू चलने लगती है। धरती जलने लगती है। नदी-तलाब सूखने लगते हैं। कमल कुसुम मुरझा जाते हैं। दिन बड़े होने लगते हैं। सर्वत्र अग्नि की वर्षा होती-सी प्रतीत होती है। शरद ऋतु का बाल सूर्य ग्रीष्म ऋतु को प्राप्त होते ही भगवान शंकर की क्रोधाग्नि-सी बरसाने लगा है। ज्येष्ठ मास में तो ग्रीष्म की अखंडता और भी प्रखर हो जाती है। छाया भी छाया ढूंढने लगती है।–

बैठी रही अति सघन वन पैठी सदन तन माँह

देखी दुपहरी जेठ की छाँहों चाहती छाँह।।

ग्रीष्म की प्रचंडता का प्रभाव प्राणियों पर पड़े बिना नहीं रहता। शरीर में स्फूर्ति का स्थान आलस्य ले लेता है। तनिक-सा श्रम करते ही शरीर पसीने से सराबोर हो जाता है। कण्ठ सूखने लगता है। अधिक श्रम करने पर बहुत थकान हो जाती है। इस मौसम में यात्रा करना भी दूभर हो जाता है। यह ऋतु प्रकृति के सर्वाधिक उग्र रुप की द्योतक है।

भारत में सामान्यतया 15 मार्च से 15 जून तक ग्रीष्म मानी जाती है। इस समय तक सूर्य भूमध्य रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ता है, जिससे सम्पूर्ण देश में तापमान में वृद्धि होने लगती है। इस समय सूर्य के कर्क रेखा की ओर अग्रसर होने के साथ ही तापमान का अधिकतम बिन्दु भी क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता जाता है और मई के अन्त में देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग में 48डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। उत्तर पश्चिमी भारत के शुष्क भागों में इस समय चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवाओं को ‘लू’ कहा जाता है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रायः शाम के समय धूल भरी आँधियाँ आती है, जिनके कारण दृश्यता तक कम हो जाती है। धूल की प्रकृति एवं रंग के आधार पर इन्हें काली अथवा पीली आंधियां कहा जाता है। सामुद्रिक प्रभाव के कारण दक्षिण भारत में इन गर्म पवनों तथा आंधियों का अभाव पाया जाता है।

त्योहार- ग्रीष्म माह में अच्छा भोजन और बीच-बीच में व्रत करने का प्रचलन रहता है। इस माह में निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, शीतलाष्टमी, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा आदि त्योहार आते हैं। गुरु पूर्णिमा के बाद से श्रावण मास शुरू होता है और इसी से ऋतु परिवर्तन हो जाता है और वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है।

रीतिकालीन कवियों में सेनापति का ग्रीष्म ऋतु वर्णन अत्यन्त प्रसिद्ध है।–

वृष को तरनि तेज सहसौं किरन करि

ज्वालन के जाल बिकराल बरखत हैं।

तचति धरनिजग जरत झरनिसीरी

छाँह को पकरि पंथी पंछी बिरमत हैं॥

सेनापति नैकु दुपहरी के ढरतहोत

धमका विषमजो नपात खरकत हैं।

मेरे जान पौनों सीरी ठौर कौ पकरि कोनों

घरी एक बैठी कहूँ घामैं बितवत हैं॥

रासो काव्य रचनाकार ‘अब्दुल रहमान’ द्वारा लिखी गई सन्देश रासक में षड्ऋतुवर्णन ग्रीष्म से प्रारम्भ होता है…

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ग्रीष्म शब्द ग्रसन से बना है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी के रस को ग्रस लेता है।

भागवत पुराण में ग्रीष्म ऋतु में कृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा आती है जिसको उपरोक्त आधार पर समझा जा सकता है । भागवत पुराण का द्वितीय स्कन्ध सृष्टि से सम्बन्धित है जिसकी व्याख्या अपेक्षित है।

शतपथ ब्राह्मण में ग्रीष्म का स्तनयन/गर्जन से तादात्म्य कहा गया है जिसकी व्याख्या अपेक्षित है।

जैमिनीय ब्राह्मण 2.51 में वाक् या अग्नि को ग्रीष्म कहा गया है ।

तैत्तिरीय संहिता में ग्रीष्म ऋतु यव प्राप्त करती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में ग्रीष्म में रुद्रों की स्तुति का निर्देश है। तैत्तरीय संहिता में ऋतुओं एवं मासों के नाम बताये गये है,जैसे :- बसंत ऋतु के दो मास- मधु माधवग्रीष्म ऋतु के शुक्र-शुचिवर्षा के नभ और नभस्यशरद के इष ऊर्जहेमन्त के सह सहस्य और शिशिर ऋतु के दो माह तपस और तपस्य बताये गये हैं।

चरक संहिता में कहा गया हैः …… शिशिर ऋतु उत्तम बलवाली, वसन्त ऋतु मध्यम बलवाली और ग्रीष्म ऋतु दौर्बल्यवाली होती है। ग्रीष्म ऋतु में गरम जलवायु पित्त एकत्र करती है। प्रकृति में होने वाले परिवर्तन शरीर को प्रभावित करते हैं। इसलिए व्यक्ति को साधारण रूप से भोजन तथा आचार-व्यवहार के साथ प्रकृति और उसके परिवर्तनों के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए । तापमान बढ़ने पर पित्त उत्तेजित होता है तथा शरीर में जमा हो जाता है। व्याधियों से बचाव के लिए ऋतु के अनुकूल आहार तथा गतिविधियों का पालन जरूरी है।

होलिकोत्सव में सरसों के चूर्ण से उबटन लगाने की परंपरा है, ताकि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की सुरक्षा रहे। आदिकाल से उत्तर भारत में जहाँ तेज गर्मी होती है, गरम हवाएँ चलती हैं वहाँ पर त्वाचा की लाली के शमन के लिए प्राय: लोग सरसों के बीजों के उबटन का प्रयोग करते हैं।

नवरात्री दुर्गा पूजा वर्ष में दो बार आती है। यह जलवायु प्रधान पर्व है। अतः एक बार यह पर्व ग्रीष्म काल आगमन में राम नवरात्रि चैत्र (अप्रैल मई) के नाम से जाना जाता है। दूसरी बार इसे दुर्गा नवरात्रि अश्विन(सितम्बर-अकतूबर) मास में मनाया जाता है। यह समय शीतकाल के आरम्भ का होता है। यह दोनो समय ऋतु परिवर्तन के है।

प्रकृति-चित्रण में बिहारी किसी से पीछे नहीं रहे हैं। षट ॠतुओं का उन्होंने बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। ग्रीष्म ॠतु का चित्र देखिए –

कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ।

जगत तपोतन से कियोदरिघ दाघ निदाघ।।

कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् और ऋतुसंहार में ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया है-

अभिज्ञानशाकुन्तलम्- नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए लिखा कि वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है।

ऋतुसंहार में महाकवि कालिदास कहते हैं- प्रथम सर्ग के ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में गीतिकार अपनी प्रियतमा को प्यार भरा सम्बोधन कर कहता है। प्रिये देखो, यह घोर गर्मी का मौसम है। इस ऋतु में सूर्य बहुत ही प्रचण्ड हो जाता है, -चन्द्र किरणें सुहानी लगती हैं, जल में स्नान करना भला लगता है। सांयकाल बड़ा रमणीयहो जाता है क्योंकि उस समय सूर्य का ताप नहीं सताता ! काम भावना भी प्रायः शिथिल पड़ जाता है। संभवतः इस सन्दर्भ में युवा कवि की यह सूचना रही हो कि ऋतु राजबसन्त में कामोद्रेक द्विगुणित हो जाता है।

गर्मी की रात में चन्द्र किरणों से रात्रि की कालिमा क्षी हो जाने से चाँदनी राते बहुत ही सुहावनी लगती है। ऐसे ही उष्पकाल में जिन भवनों में जल यन्त्र (फब्बारे) लगे रहते हैं, वे भी अति मनोरम लगते हैं । ठण्डक देने वाले चन्द्रकान्त मणि और सरस चन्दन का सेवन अति सुखकर लगता है। ग्रीष्म की चाँदनी रातों में धवल भवनों की छतों पर सुख से सोई ललनाओं के मुखों की कालि को देखकर चन्द्रमा बहुत ही उत्कण्ठित हो जाता है और रात्रि समाप्ति की वेला में  उनकी सुन्दरता से लजा कर फीका पड़ जाता है।

ग्रीष्म ऋतु में मयूर, सूर्य के आतप से इतने परितप्त हो जाते है कि अपने पंखों की छाया में धूप निवारण के लिए आ छिपे सॉपों को भी नहीं खाते, जबकि यह सर्प उनके भक्ष्य जंगल में फैली हुयी दावाग्नि का भी सरस चित्रण कवि करता है । पर्वत की गुफाओं में हवा का जोर पकड़कर दवानल बढ़ रहा है। सूखे बॉसों में चर-चर की आवाज आ रही है क्योकि जलने से ये शब्द करते है । जो अभभ दूर थी वहीं दावाग्नि सूखे तिनकों में फैलकर बढ़ती ही जाती है । इसी तरह से इधर-उधर घूमने वाले हरेषों को व्याकुल कर देती है। इस तरह से कवि ने प्रथम सर्ग में ग्रीष्म ऋतु का हृदय हारी वर्णन किया है ।

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ज्येष्ठ की गर्मी- ज्येष्ठ हिन्दू पंचांग का तीसरा मास है। ज्येष्ठ या जेठ माह गर्मी का माह है। इस महीने में बहुत गर्मी पडती है। फाल्गुन माह में होली के त्योहार के बाद से ही गर्मियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। चैत्र और बैशाख माह में अपनी गर्मी दिखाते हुए ज्येष्ठ माह में वह अपने चरम पर होती है। ज्येष्ठ गर्मी का माह है। इस माह जल का महत्त्व बढ जाता है। इस माह जल की पूजा की जाती है और जल को बचाने का प्रयास किया जाता है। प्राचीन समय में ऋषि मुनियों ने पानी से जुड़े दो त्योहारों का विधान इस माह में किया है-

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी

इन त्योहारों से ऋषियों ने संदेश दिया कि गंगा नदी का पूजन करें और जल के महत्त्व को समझें। गंगा दशहरे के अगले दिन ही निर्जला एकादशी के व्रत का विधान रखा है जिससे संदेश मिलता है कि वर्ष में एक दिन ऐसा उपवास करें जिसमें जल ना ग्रहण करें और जल का महत्त्व समझें। ईश्वर की पूजा करें। गंगा नदी को ज्येष्ठ भी कहा जाता है क्योंकि गंगा नदी अपने गुणों में अन्य नदियों से ज्येष्ठ(बडी) है। ऐसी मान्यता है कि नर्मदा और यमुना नदी गंगा नदी से बडी और विस्तार में ब्रह्मपुत्र बड़ी है किंतु गुणों, गरिमा और महत्त्व की दृष्टि से गंगा नदी बड़ी है। गंगा की विशेषता बताता है ज्येष्ठ और ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की दशमी गंगा दशहरा के रूप में गंगा की आराधना का महापर्व है।

निर्जला एकादशी- भीषण गर्मी के बीच तप की पराकाष्टा को दर्शाता है यह व्रत। इसमें दान-पुण्य एवं सेवा भाव का भी बहुत बड़ा महत्व शास्त्रों में बताया गया है।  ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। अन्य महीनों की एकादशी को फलाहार किया जाता है, परंतु इस एकादशी को फल तो क्या जल भी ग्रहण नहीं किया जाता। यह एकादशी ग्रीष्म ऋतु में बड़े कष्ट और तपस्या से की जाती है। अतः अन्य एकादशियों से इसका महत्व सर्वोपरि है। इस एकादशी के करने से आयु और आरोग्य की वृद्धि तथा उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुसार अधिक माससहित एक वर्ष की छब्बीसों एकादशियां न की जा सकें तो केवल निर्जला एकादशी का ही व्रत कर लेने से पूरा फल प्राप्त हो जाता है।

वृषस्थे मिथुनस्थेऽर्के शुक्ला ह्येकादशी भवेत्‌

ज्येष्ठे मासि प्रयत्रेन सोपाष्या जलवर्जिता।

नवतपा- नवतपा को ज्येष्ठ महीने के ग्रीष्म ऋतु में तपन की अधिकता का द्योतक माना जाता है। सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के साथ नवतपा शुरू हो जाता है। शुक्ल पक्ष में आर्द्रा नक्षत्र से लेकर 9 नक्षत्रों में 9 दिनों तक नवतपा रहता है। नवतपा में तपा देने वाली भीषण गर्मी पड़ती है। नवतपा में सूर्यदेव लोगों के पसीने छुड़ा देते हैं। पारा एक दम से 48 डिग्री पर पहुंच जाता है। जबकि न्यूनतम तापमान 32 डिग्री तक रहता है। लेकिन नवतपा के बाद एक अच्छी खबर आती है आर्द्रा के 10 नक्षत्रों तक जिस नक्षत्र में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है, आगे चलकर उस नक्षत्र में 15 दिनों तक सूर्य रहते हैं और अच्छी वर्षा होती है।

राग दीपक- ग्रीष्म की जलविहीन शुष्क ऋतु में भी कलाकार की रचनाधर्मिता जागृत रहती है। संगीतकार इस उष्ण वातावरण को राग दीपक के स्वरों में प्रदर्शित करता है तो चित्रकार रंग तथा तूलिका के माध्यम से राग दीपक को चित्र में साकार करता है। भारतीय मान्यताओं के अनुसार राग के गायन के ऋतु निर्धारित है । सही समय पर गाया जाने वाला राग अधिक प्रभावी होता है । राग और उनकी ऋतु इस प्रकार है –

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तानसेन और राग दीपक- परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। ग्रीष्म की तपन के पश्चात आकाश में छाने लगते हैं – श्वेत-श्याम बादलों के समूह तथा संदेश देते हैंजन-जन में प्राणों का संचार करने वाली बर्षा ऋतु के आगमन का। आकाश में छायी श्यामल घटाओं तथा ठंडी-ठंडी बयार के साथ झूमती आती है जन-जन को रससिक्त करतीजीवन दायिनी वर्षा की प्रथम फुहार। वर्षा की सहभागिनी ग्रीष्म की उष्णता आकाश से जल बिंदुओं के रूप में पुन: धरती पर अवतरित होती है किंतु अपने नवीन मनमोहक रूप में। उष्ण वातावरण के कारण घिर आये मेघ तत्पश्चात जीवनदान करती वर्षा का प्रसंग एक किवदंती में प्राप्त होता है जिसके अनुसार बादशाह अकबर ने दरबार में गायक तानसेन से ग्रीष्म ऋतु का राग दीपक‘ सुनने का अनुरोध किया। तानसेन के स्वरों के साथ वातावरण में ऊष्णता व्याप्त होती गयी। सभी दरबारीगण तथा स्वयं तानसेन भी बढ़ती गरमी को सहन नहीं कर पा रहे थे। लगता थाजैसे सूर्य देव स्वयं धरती पर अवतरित होते जा रहे हैं। तभी कहीं दूर से राग मेघ के स्वरों के साथ मेघ को आमंत्रित किया जाने लगा। जल वर्षा के कारण ही गायक तानसेन की जीवन रक्षा हुई। 

आयुर्वेद के अनुसार ग्रीष्म ऋतु में कौन सा पकवान और मिष्ठान लाभदायक होता है…

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वसंत ऋतु की समाप्ति के बाद ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। अप्रैल, मई तथा जून के प्रारंभिक दिनों का समावेश ग्रीष्म ऋतु में होता है। इन दिनों में सूर्य की किरणें अत्यंत उष्ण होती हैं। इनके सम्पर्क से हवा रूक्ष बन जाती है और यह रूक्ष-उष्ण हवा अन्नद्रव्यों को सुखाकर शुष्क बना देती है तथा स्थिर चर सृष्टि में से आर्द्रता, चिकनाई का शोषण करती है। इस अत्यंत रूक्ष बनी हुई वायु के कारण, पैदा होने वाले अन्न-पदार्थों में कटु, तिक्त, कषाय रसों का प्राबल्य बढ़ता है और इनके सेवन से मनुष्यों में दुर्बलता आने लगती है। शरीर में वातदोष का संचय होने लगता है। अगर इन दिनों में वातप्रकोपक आहार-विहार करते रहे तो यही संचित वात ग्रीष्म के बाद आने वाली वर्षा ऋतु में अत्यंत प्रकुपित होकर विविध व्याधियों को आमंत्रण देता है। आयुर्वेद चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार ‘चय एव जयेत् दोषं।’ अर्थात् दोष जब शरीर में संचित होने लगते हैं तभी उनका शमन करना चाहिए। अतः इस ऋतु में मधुर, तरल, सुपाच्य, हलके,जलीय, ताजे, स्निग्ध, शीत गुणयुक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए। जैसे कम मात्रा में श्रीखंड, घी से बनी मिठाइयाँ, आम, मक्खन, मिश्री आदि खानी चाहिए। इस ऋतु में प्राणियों के शरीर का जलीयांश कम होता है जिससे प्यास ज्यादा लगती है। शरीर में जलीयांश कम होने से पेट की बीमारियाँ, दस्त, उलटी, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ग्रीष्म ऋतु में कम आहार लेकर शीतल जल बार-बार पीना हितकर है।

आहारः ग्रीष्म ऋतु में साठी के पुराने चावलगेहूँदूधमक्खनगुलाब का शरबत, आमपन्ना से शरीर में शीतलतास्फूर्ति तथा शक्ति आती है। सब्जियों में लौकीगिल्कीपरवलनींबूकरेलाकेले के फूलचौलाईहरी ककड़ीहरा धनिया,पुदीना और फलों में द्राक्षतरबूजखरबूजाएक-दो-केलेनारियलमौसमीआमसेबअनारअंगूर का सेवन लाभदायी है। इस ऋतु में तीखे, खट्टे, कसैले एवं कड़वे रसवाले पदार्थ नहीं खाने चाहिए। नमकीन, रूखा, तेज मिर्च-मसालेदार तथा तले हुए पदार्थ, बासी एवं दुर्गन्धयुक्त पदार्थ, दही, अमचूर, आचार, इमली आदि न खायें। गरमी से बचने के लिए बाजारू शीत पेय (कोल्ड ड्रिंक्स), आइस क्रीम, आइसफ्रूट, डिब्बाबंद फलों के रस का सेवन कदापि न करें। इनके सेवन से शरीर में कुछ समय के लिए शीतलता का आभास होता है परंतु ये पदार्थ पित्तवर्धक होने के कारण आंतरिक गर्मी बढ़ाते हैं। इनकी जगह कच्चे आम को भूनकर बनाया गया मीठा पनापानी में नींबू का रस तथा मिश्री मिलाकर बनाया गया शरबतजीरे की शिकंजीठंडाईहरे नारियल का पानीफलों का ताजा रसदूध और चावल की खीरगुलकंद आदि शीत तथा जलीय पदार्थों का सेवन करें। इससे सूर्य की अत्यंत उष्ण किरणों के दुष्प्रभाव से शरीर का रक्षण किया जा सकता है।

 

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श्रावण और भाद्रपद ‘वर्षा ऋतु’ के मास हैं। वर्षा नया जीवन लेकर आती है। मोर के पांव में नृत्य बंध जाता है। संपूर्ण giphy (2).gifश्रावण माह में उपवास रखा जाता है। इस ऋतु के तीज, रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी सबसे बड़े त्योहार हैं।

 

वर्षा ऋतु आषाढ़, श्रावण तथा भादो मास में मुख्य रूप से होती है। जून माह से शुरू होने वाली वर्षा ऋतु हमें अप्रैल और मई की भीषण गर्मी से राहत दिलाती है। यह मौसम भारतीय किसानों के लिए बेहद ही हितकारी एवं महत्वपूर्ण है।

1 जून के करीब केरल तट और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में मानसून सक्रिय हो जाता है। हमारे देश में वर्षा ऋतु के अमूमन तीन या चार महीने माने गए हैं। दक्षिण में ज्यादा दिनों तक पानी बरसता है यानी वहां वर्षा ऋतु ज्यादा लंबी होती है जबकि जैसे-जैसे हम दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हैं तो वर्षा के दिन कम होते जाते हैं।

वर्षा का महत्व : वर्षा का मानव जीवन में बेहद ही महत्व है क्योंकि पानी के बिना जीवन संभव नहीं है।  वर्षा से फसलों के लिए पानी मिलता है तथा सूखे हुए कुएं, तालाबों तथा नदियों को फिर से भरने का कार्य वर्षा के द्वारा ही किया जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि जल ही जीवन है।  इस मौसम में छोटे-छोटे जीव-जंतु जो गर्मी के मारे जमीन के नीचे छिप जाते हैं, बाहर निकल जाते हैं। मेंढ़क की टर्र-टर्र की आवाज सुनाई पड़ने लगती है। आकाश में प्राय: बादल छाए रहते हैं। वर्षा ऋतु का आनंद लेने के लिए लोग पिकनिक मनाते हैं। गांवों में सावन के झूलों पर युवतियां झूलती हैं। वर्षा ऋतु में ही रक्षा बंधन, तीज आदि त्योहार आते हैं। इस ऋतु में अनेक बीमारियां भी फैल जाती हैं।

वेदों में वर्षा ऋतु से सम्बंधित अनेक सूक्त हैं- जैसे पर्जन्य सूक्त ( ऋग्वेद 7/101,102 सूक्त), वृष्टि सूक्त (अथर्ववेद 4/12) एवं प्राणसूक्त (अथर्ववेद 11/4 ) मंडूक सूक्त (ऋग्वेद 7/103 सूक्त) आदि।

पर्जन्य सूक्त मेघ के गरजने, सुखदायक वर्षा होने एवं सृष्टि के फलने-फूलने का सन्देश देता हैं।  जबकि मंडूक सूक्त वर्षा ऋतु में मनुष्यों के कर्तव्यों का प्रतिपादन करता हैं।

ऋग्वेद में वर्षा ऋतु को उत्सव मानकर शस्यश्यामला प्रकृति के साथ अपनी हार्दिक प्रसन्नता की अभिव्यक्ति की गयी है –

ब्राह्मणासो अतिरात्रे न सोमे सरो न पूर्णमभितो वर्दन्तः।।

संवत्सरस्य तदहः परि छु यन्मण्डूकाः प्रावृषीण बभूव।।

अर्थात् जिस दिन पहली वर्षा होती हैउस दिन मेढक सरोवरों के पूर्ण रूप से भर जाने की कामना से चारों ओर बोलते हैंइधर-उधर स्थिर होते हैंउसी प्रकार हे ब्राह्मणों ! तुम भी रात्रि के अनन्तर ब्राह्म-मुहूर्त में जिस समय सौम्य-वृद्धि होती हैउस समय वेदध्वनि से परमेश्वर के यज्ञ का वर्णन करते हुए वर्षा-ऋतु के आगमन को उत्सव की तरह मनाओ।

वर्षा ऋतु के साथ श्रावणी पर्व का आगमन होता है- इस पर्व में मनुष्यों को वेद का पाठ करने का विधान हैं।  इस पर्व में वेदाध्ययन को वर्षा आरम्भ होने पर मौन पड़े मेंढक जैसे प्रसन्न होकर ध्वनि करते है। वेद कहते है कि हे वेदपाठी ब्राह्मण वर्षा आरम्भ होने पर वैसे ही अपना मौन व्रत तोड़कर वेदों  सम्भाषण आरम्भ करे। मंडूक सूक्त के प्रथम मन्त्र का सन्देश ईश्वर के महत्त्व गायन से वर्षा का स्वागत करने का सन्देश हैं। इस सूक्त के अगले चार मन्त्रों में सन्देश दिया गया है कि गर्मी के मारे सुखें हुए मंडूक वर्धा होने पर तेज ध्वनि निकालते हुए एक दूसरे के समीप जैसे जाते हैं वैसे ही हे मनुष्यों तुम भी अपने परिवार के सभी सदस्यों, सम्बन्धियों, मित्रों, अनुचरों आदि के साथ संग होकर वेदों का पाठ करों। जब सभी समान मन्त्रों से एक ही पाठ करेंगे तो सभी की ध्वनि एक से होगी। सभी के विचार एक से होंगे। सभी के आचरण भी श्रेष्ठ बनेंगे।

वर्षा काल के इस समय को चातुर्मास‘  भी कहा जाता है क्‍योंकि वर्षा ऋतु चार माह का होता है। जैन प्रथा में आषाढ़ी पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक का समय ‘चातुर्मास‘ कहलाता है जबकी वैदिक प्रथा में आषाढ़ से आसोज तक का समय ‘चातुर्मास‘ कहलाता है। ‘चातुर्मास‘ का समय आत्म-वैभव को पाने और अध्यात्म की फसल उगाने की दृष्टि से  अच्‍छा माना जाता है। इसी कारण से अविरल पदयात्रा करने वाले साधु-संत भी इस समय एक जगह स्थिर प्रवास करते हैं और उन्‍हीं की प्रेरणा से धर्म जागरण में वृद्धि होती है।

मनुस्मृति और मत्स्य पुराण में कहा गया है कि साधु-संन्यासी जन गरमी और सर्दी की  ऋतुओं के आठ महीनों में अविरल पदयात्रा करते रहेंलेकिन सब प्राणियों की दया हेतु वर्षा ऋतु में एकत्र निवास करें।

प्राचीन समय में चातुर्मास की स्थापना के चार उद्देश्य माने जाते थे -आत्म विकास, धर्म का प्रचार, विशिष्ट साधना और क्षेत्रीय स्थिति। साधना का आदि बिंदु है जिज्ञासा। नई जिज्ञासा के बिना आत्मज्ञान में एक प्रकार का ठहराव आ जाता है। वह समाज के लिए शुभ नहीं, कष्टकर हो जाता है। जैसे वर्षों तक एक ही कक्षा में रहने वाला विद्यार्थी एबनॉर्मल माना जाता है। वैसे ही, वर्षों तक धर्म की उपासना करने वाला श्रावक समाज यदि धार्मिकता की पहली-दूसरी कक्षा को भी पार न कर सके, तो उसकी धार्मिकता पर प्रश्न खड़े होते हैं। जहां कुछ व्यक्ति सामूहिक रूप से ध्यान, साधना, तपोयोग या मंत्र अनुष्ठान करना चाहें, उन्हें चातुर्मास का उपहार प्राप्त हो सकता है। जिस क्षेत्र की स्थिति विषम हो, जनता अशांति, अराजकता या अत्याचारी शासक की क्रूरता की शिकार हो, उसके समाधान के लिए भी समता के प्रतीक साधु-साध्वियों का चातुर्मास करवाया जाता था। क्योंकि संत वस्तुतः वही होता है, जो औरों को शांति प्रदान करे।

रामायण के किष्किंधाकाण्ड में वर्षा ऋतु का वर्णन है-

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरत नृपनीति बिबेका॥

बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥4॥

भावार्थ : श्री राम छोटे भाई लक्ष्मणजी से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकाल में आकाश में छाए हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं॥4॥

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥

कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥4॥

भावार्थ : भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं।) जैसे विद्वान्‌ लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं॥4॥

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥

ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥5॥

भावार्थ : चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती। जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता॥5॥

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥

नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥1॥

भावार्थ : चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है॥1॥

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥

सरिता जल जलनिधि महुँ जोई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥4॥

भावार्थ : जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है॥4॥

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।

बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥2॥

भावार्थ : बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान्‌ नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं॥2॥

लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि।

गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥13

भावार्थ : (श्री रामजी कहने लगे-) हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं॥13॥

तुलसीदास रामचरितमानस में एक चौपाई मंडूक सूक्त से सम्बन्ध में आती है-

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥

नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥ -किष्किन्धा काण्ड

अर्थात वर्षा का वर्णन में श्रीराम जी लक्ष्मण को कहते हैं- वर्षा में मेंढको की ध्वनी इस तरह सुनाई देती है जैसे बटुकसमुदाय ( ब्रह्मचारीगण) वेद पढ़ रहे हों। पेड़ों पर नए पत्ते निकल आये है। एक साधक योगी के मन को यह विवेक देने वाला हैं।

शतपथ ब्राह्मण में कथित है कि प्रजापति ने आदित्य से चक्षु को तत्पश्चात् चक्षु द्वारा वर्षा को बनाया। वर्षा की व्युत्पत्ति देते हुए ‘निरुक्त’ में वर्णित है कि इनमें बादल बरसता है, इसीलिए वर्षा नाम पड़ा। वस्तुतः वर्षा ऋतु नभ और नभस्य नामक मासों पर आधारित मानी गई है और इन मासों का स्वभाव है बरसना।

तैत्तिरीय संहिता (१.१.१४) के भट्ट्टभास्कर भाष्य तथा वाजसनेयी संहिता (७.३०) के उवट भाष्य में कथित है कि

“नभ – नह्यति बध्नाति जन्तूनिति नभः।

नभस्य – न भातीति नभः।

अथवा

“नभ और नभस्य – नह्यन्न सूर्यो भाति मेघप्रचुरत्वात् तस्मान्नभो नभस्यश्च।

अर्थात् जिस काल में मेघों की प्रचुरता होती हैवह काल वर्षा ऋतु के नाम से जाना जाता है। वस्तुत: शतपथ ब्राह्मण में वर्षा ऋतु के विषय में सबसे अधिक वर्णन मिलता है। यहाँ वाक्यों में उसकी वास्तविक

स्थितिउसकी रूप-रेखा तथा स्थिति आदि पर विस्तार से चर्चा की गई है।

सर्वप्रथम वर्षा ऋतु की स्थिति को अन्तरिक्ष में बताया गया है। तत्पश्चात् उसके स्वरूप का वर्णन करते हुए जल को इसका वास्तविक स्वरूप कहा गया है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार वसन्त ऋतु में चारों ओर सुगन्ध का, ग्रीष्म ऋतु में उष्णता का एहसास होता है, उसी प्रकार वर्षा ऋतु का स्वरूप जल से ही बनता है। इस विषय में कहा गया है कि वर्षा ऋतु में जो वर्षा आती है, वह अग्नि से बनती है, अर्थात् अग्नि के प्रज्वलित होने से भाप बनती है, जिससे काले-काले मेघ बनते हैं और इस प्रकार वर्षा होती है।

इस प्रकार यहाँ विज्ञान के वाष्पीकरण नामक विख्यात नियम की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। शतपथ ब्राह्मण में वर्षा ऋतु की रूप-रेखा इस प्रकार दी गई है – वर्षा अग्नि है, संवत्स, समिधा, बिजली लौ, बादल धुआँ, चमक अंगारा, गरज चिंगारियाँ है।

आज भी जब-जब वर्षा- काल आता है तो यह स्थिति सामान्यतया देखने को मिलती है-

बादल, गरज, चमक, बिजली, बारिश।  जिस ऋतु में सूर्य की किरणें आर्द्र वायु को लेकर ऊष्मा के बल पर वाष्प बनाकर बरसना प्रारम्भ कर देती हैं, उस काल को वर्षा काल कहा जाता है। शतपथ के वाक्यों में वर्षा के जल का माहात्म्य भी देखने को मिलता है। यहाँ कथित है कि जल की स्वाभाविक विशेषता यह है कि वह शान्ति पहुँचाता है।

अतः वर्षा के जल को पवित्र, स्वच्छ, शुद्ध एवं वज्र की तरह ऋतु-विज्ञान । शतपथ ब्राह्मण के सन्दर्भ में कठोर एवं तेज समझना चाहिए, जो हमारी बुराई को काट भी देता है और धो भी देता है।

पाश्चात्य विद्वान् जे. गोंडा ने भी अपने ग्रन्थ ‘मन्त्र इंटरप्रिटेशन इन द शतपथ ब्राह्मण’ में वर्षा के जल के महत्त्व का कथन किया है। इस प्रकार यहाँ वर्षा के जल को धर्मानुकूल कहकर उसके महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है।

ऋतुसंहार के द्वितीय सर्ग में कवि वर्षा ऋतु का वर्णन करता है- कवि कहता है कि वर्षा का मौसम कामी जनों को प्रिय होता है। वर्षा का मौसम एक राजसी ठाठ-आट से आता प्रतीत होता है । राजा का वाहन यदि हाथी होता है तो वर्षाकाल का वाहन मेघ है। राजा के आगे-आगे ध्वज पताकायें फहराती हैं तो यहाँ बिजली की पताकाएं फहराती है। राजा की यात्रा में नगाड़े बजते हैं तो यहाँ वज्रपात के शब्द नगाड़े का काम करते हैं। वर्षा ऋतु का पवन जो कदम्ब, सर्ज, अर्जुन, केतकी वृक्षों को झकझोरता है। वन उनके पुष्पों के सौरभ से सुगन्धित है! मेघों के सीकरों से शीतल है । वह किसे सुहावना नहीं लगता। अन्त में कवि कहता है वर्षा काल अनेक गुणों से चिताकर्षक होता है। अंगनाओं में चित का हरण करने वाला है। वृक्ष लता वल्लरी, वृक्ष आदि का मित्र है और प्रेमियों का जैसे प्राण ही है।

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कालिदास ने मेघदूत‘ में बादलों और वर्षा ऋतु का जितना खूबसूरत वर्णन किया है वैसा शायद ही किसी ने किया हो-  कालीदास ने मेघ का यक्ष के शब्दों में बखूबी वर्णन किया है. यक्ष बादलों से कहता है, हे मेघ जब तुम आकाश में उमड़ते हुए उठोगे तो प्रवासी पथिकों की स्त्रियां मुंह पर लटकते हुए घुंघराले बालों को ऊपर फेंककर इस आशा से तुम्‍हारी ओर टकटकी लगाएंगी कि अब प्रियतम अवश्‍य आते होंगे. तुम्‍हारे घुमड़ने पर कौन-सा जन विरह में व्‍याकुल अपनी पत्‍नी के प्रति उदासीन रह सकता हैयदि उसका जीवन मेरी तरह पराधीन नहीं है?..”

वहीं बारिश होने के बाद क्या-क्या होगा इसका बहुत खूबसूरत वर्णन किया गया है. बरसात होने पर क्या होगा इसके बारे में यक्ष बताता है, ”पुष्पित कदम्ब को भ्रमर मस्त होकर देख रहे होंगेपहला जल पाकर मुकुलित कन्दली को हरिण खा रहे होंगे और गज प्रथम वर्षाजल के कारण पृथिवी से निकलने वाली गन्ध सूंघ रहे होंगे-इस प्रकार भिन्न-भिन्न यिाओं को देखकर मेघ के गमन मार्ग का स्वत:अनुमान हो जाता है. प्रकृति से मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है. यही कारण है कि वह मनुष्य के अंतकरण को प्रभावित करती है. 

यक्ष पहाड़ों से निकलने वाले बादल का बहुत खूबसूरत वर्णन करता है और कहता है जब काले बादल उन पहाड़ों में दिखते हैं तो कृष्‍ण की छवी बन जाती है. यक्ष कहता है, ” हे मेघ जब तुम उन पहाड़ों से निकलोगे तो तुम्‍हारा सांवला शरीर और भी अधिक खिल उठेगाजैसे झलकती हुई मोरशिखा से गोपाल वेशधारी कृष्‍ण का शरीर सज गया था.

वर्षा ऋतु का इतंजार सबसे ज्यादा किसानों को होता है और इसको बखूबी कालीदास ने यक्ष के जरिए बताया है. यक्ष बादलों से माल क्षेत्र के पठारी (बुन्देलखंड) के इलाकों पर बरसने को कहता है जहां किसान ने फसल बोने के लिए जोती हुई खेत में बरसात का पानी गिरने का इंतजार कर रहा हो. यक्ष कहते हैं, हे मेघ..खेती का फल तुम्‍हारे अधीन है – इस उमंग से ग्राम-बधूटियां भौंहें चलाने में भोलेपर प्रेम से गीले अपने नेत्रों में तुम्‍हें भर लेंगी. माल क्षेत्र के ऊपर इस प्रकार उमड़-घुमड़कर बरसना कि हल से तत्‍काल खुरची हुई भूमि गन्‍धवती हो उठे.

यक्ष मेघ को उत्‍तर दिशा उज्जैन के महलो में ठहरने को कहते हैं और साथ ही कहते हैं कि बरसात में उस नागर की स्त्रियों के नेत्रों की चंचलता को न देखा तो ठगा हुआ महसूस करोगे. वह कहते हैं, ” उज्‍जयिनी के महलों की ऊंची अटारियों की गोद में बिलसने से विमुख न होना. बिजली चमकने से चकाचौंध हुई वहां की नागरी स्त्रियों के नेत्रों की चंचल चितवनों का सुख तुमने न लूटा तो समझना कि ठगे गए. वहां घरों के पालतू मोर भाईचारे के प्रेम से तुम्‍हें नृत्‍य का उपहार भेंट करेंगे. वहां फूलों से सुरभित महलों में सुन्‍दर स्त्रियों के महावर लगे चरणों की छाप देखते हुए तुम मार्ग की थकान मिटाना.

इस तरह कालीदास के मेघदूत के पहले भाग ”पूर्वमेघ” में बादलों का खूबसूरत वर्णन किया गया है. वहीं इस खण्ड काव्य के दूसरे भाग ”उत्तरमेघ” में यक्ष के संदेश का वर्णन है।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में कौन सा पकवान और मिष्ठान लाभदायक होता है…a11.jpg

वर्षा ऋतु में वायु का विशेष प्रकोप तथा पित्त का संचय होता है। वर्षा ऋतु में वातावरण के प्रभाव के कारण स्वाभाविक ही जठराग्नि मंद रहती है, जिसके कारण पाचनशक्ति कम हो जाने से अजीर्ण, बुखार, वायुदोष का प्रकोप, सर्दी,खाँसी, पेट के रोग, कब्जियत, अतिसार, प्रवाहिका, आमवात, संधिवात आदि रोग होने की संभावना रहती है। इन रोगों से बचने के लिए तथा पेट की पाचक अग्नि को सँभालने के लिए आयुर्वेद के अनुसार उपवास तथा लघु भोजन हितकर है। इसलिए हमारे आर्षदृष्टा ऋषि-मुनियों ने इस ऋतु में अधिक-से-अधिक उपवास का संकेत कर धर्म के द्वारा शरीर के स्वास्थ्य का ध्यान रखा है। इस ऋतु में जल की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें। जल द्वारा उत्पन्न होने वाले उदर-विकार, अतिसार, प्रवाहिका एवं हैजा जैसी बीमारियों से बचने के लिए पानी को उबालें, आधा जल जाने पर उतार कर ठंडा होने दें, तत्पश्चात् हिलाये बिना ही ऊपर का पानी दूसरे बर्तन में भर दें एवं उसी पानी का सेवन करें। जल को उबालकर ठंडा करके पीना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। आजकल पानी को शुद्ध करने हेतु विविध फिल्टर भी प्रयुक्त किये जाते हैं। उनका भी उपयोग कर सकते हैं। पीने के लिए और स्नान के लिए गंदे पानी का प्रयोग बिल्कुल न करें क्योंकि गंदे पानी के सेवन से उदर व त्वचा सम्बन्धी व्याधियाँ पैदा हो जाती हैं।

आहारः इस ऋतु में वात की वृद्धि होने के कारण उसे शांत करने के लिए मधुर, अम्ल व लवण रसयुक्त, हलके व शीघ्र पचने वाले तथा वात का शमन करने वाले पदार्थों एवं व्यंजनों से युक्त आहार लेना चाहिए। सब्जियों में मेथी, सहिजन, परवल,लौकी, सरगवा, बथुआ, पालक एवं सूरन हितकर हैं।

सेवफलमूँगगरम दूधलहसुनअदरकसोंठअजवायनसाठी के चावलपुराना अनाजगेहूँचावलजौखट्टे एवं खारे पदार्थदलियाशहदप्याजगाय का घीतिल एवं सरसों का तेलमहुए का अरिष्टअनारद्राक्ष का सेवन लाभदायी है।

मालपूएगुलगुलेकसार जैसे स्वादिस्ट पकवान विशेष रूप से त्यौहारोंवर्षा ऋतु अथवा सावन के महीनों में बनाए जाते थे

 

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शरद उत्तर भारत की सबसे मनोहर ऋतु है। बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद शरद ऋतु का आगमन होता है। इस ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य काफी निराला होता है। इसकी छटा देखते ही बनती है। इसमें आकाश निर्मल हो जाता tenor.gifहै। नदियों का जल (आज भी) स्वच्छ हो जाता है। रेल से यात्रा करें तो रेलवे लाइन से लगे-सटे गड्डों पोखरों में कुमुदिनी खिली हुए दिखलाई पड़ेंगी। खिलती रात में हैं लेकिन दिन में दस-ग्यारह बजे तक खिली रहती हैं। इसी ऋतु में हारसिंगार खिलता है। निराला ने लिखा है, ‘झरते हैं चुंबन गगन के।’

  • आश्विन और कार्तिक शरद् ऋतु के दो मास होते हैं । इस ऋतु में सूर्य पिंगल और उष्ण होता है । आकाश निर्मल और कहीं-कहीं श्वेत वर्ण मेघ युक्त होता है । सरोवर कमलों सहित हंसों से शोभायमान होते हैं । सूखी भूमि चीटियों से भर जाती है ।
  • वर्षा काल में भूमिस्थ जल में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ मिल जाते हैं । मल, मूत्र, कीट, कृमि उनका मल-मूत्र सब कुछ जल में आकर मिल जाता है । इसे निर्विष करने के लिए सूर्य की जीवाणु नाशक प्रखर किरणें, चन्द्रमा की अमृतमय किरणें और हवा आवश्यक है तथा यह सब शरद् ऋतु में प्राप्त होती है ।
  • शरद् ऋतु में रातें ठण्डी और सुहावनी हो जाती है। वन कुमुद और मालती के फूलों से सुशोभित होते हैं। अनगिनत तारों की चमक और चन्द्रमा की चांदनी से रात्रि का अन्धकार दूर हो जाता है । संसार ऐसा लगता है। मानों दूध के सागर में स्नान कर रहा हो ।
  • शरद् ऋतु के सुहावने मौसम में ऐसा कोई सरोवर नहीं है जिस में सुन्दर कमल न हों, ऐसा कोई पंकज नहीं है जिस पर भ्रमर नहीं बैठा हो, ऐसा कोई भौंरा नहीं है जो गूंज न रहा हो । ऐसी कोई भनभनाहट और पक्षियों का कलरव नहीं जो मन न हर रहा हो । कहने का तात्पर्य यह है कि शरद् ऋतु में कमल खिले हुए है, कमलों पर बैठे हुए भौरों की रसीली गूंज मनुष्यों के चित्त को चुरा रही हैं ।
  • इस ऋतु में दिन और रात का तापमान प्राय: सामान्य होता है । आलस्य के स्थान पर शरीर में चुस्ती और कार्य करने का उत्साह बढ़ जाता है । फल और सब्जियों की बहार आ जाती है । विभिन्न पदार्थ खाने को दिल करता है । चेहरे पर खुशी और जीवन में प्रसन्नता आ जाती है ।
  • शरद् ऋतु अपने साथ कई त्यौहार लाती है । जैसे- दशहरा और दीपावली । इसमें लोग मिठाइयां और नाना प्रकार के व्यंजन खाते और खिलाते हैं । खुशियां मनाते हुए इस त्यौहार को विदा करते हैं । इतने में कार्तिक पूर्णिमा का स्नान आता है । इसके साथ ही शरद् ऋतु की समाप्ति, हेमन्त के आगमन को सूचित करती है ।

शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा का पूजन कर खीर का भोग लगाया जाता है, जिससे आयु बढ़ती है व चेहरे पर कान्ति आती है एवं शरीर स्वस्थ रहता है। शरद पूर्णिमा को रातभर पात्र में चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर सुबह खाई जाती है। शरद पूर्णिमा की मनमोहक सुनहरी रात में वैद्यों द्वारा जड़ी बूटियों से औषधि का निर्माण किया जाता है।

त्योहार- श्राद्ध पक्ष, नवरात्रि, दशहरा, करवा चौथ। इस ऋतु में ही शारदीय नवरात्रि की धूम रहती है। जगह-जगह उत्सव का माहौल रहता है। इस ऋतु के अन्य व्रत और उत्सव- छठ पूजा, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी, बैकुंठ चतुर्दशी, कार्तिक पूर्णिमा,उत्पन्ना एकादशी, विवाह पंचमी, स्कंद षष्ठी आदि व्रत-त्योहार भी आते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को चातुर्मास संपन्न होता है और इसी दिन भगवान अपनी योग निद्रा से जागते हैं। भगवान के जागने की खुशी में ही देवोत्थान एकादशी का व्रत इसी ऋतु में संपन्न होता है।

ऋग्वेद में शरद ऋतु का वर्णन करते हुए कहा गया है-

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तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है- पंचवटी में श्रीराम-लक्ष्मण से शरदागम का वर्णन करते हुए कहते हैं:

बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥

फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

अर्थात- हे लक्ष्मण! देखो वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने कास रूपी सफेद बालों के रूप में अपना वृद्घापकाल प्रकट किया है। वृद्घा वर्षा की ओट में आती शरद नायिका ने तुलसीदास के साथ कवि कुल गुरु कालिदास को भी इसी अदा में बाँधा था। ऋतु संहारम के अनुसार लो आ गई यह नव वधू-सी शोभतीशरद नायिका! कास के सफेद पुष्पों से ढँकी इस श्वेत वस्त्रा का मुख कमल पुष्पों से ही निर्मित है और मस्त राजहंसी की मधुर आवाज ही इसकी नुपूर ध्वनि है। पकी बालियों से नतधान के पौधों की तरह तरंगायित इसकी तन-यष्टि किसका मन नहीं मोहती।

जानि सरद ऋतु खंजन आए।

पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥

अर्थात- शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए। जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ जाते हैं अर्थात पुण्य प्रकट हो जाते हैं। बसंत के अपने झूमते-महकते सुमनइठलाती-खिलती कलियाँ हो सकती हैं। गंधवाही मंद बयारभौंरों की गुंजरित-उल्लासित पंक्तियाँ हो सकती हैंपर शरद का नील धवलस्फटिक-सा आकाशअमृतवर्षिणी चाँदनी और कमल-कुमुदिनियों भरे ताल-तड़ाग उसके पास कहाँसंपूर्ण धरती को श्वेत चादर में ढँकने को आकुल ये कास-जवास के सफेद-सफेद ऊर्ध्वमुखी फूल तो शरद संपदा है। पावस मेघों के अथक प्रयासों से धुले साफ आसमान में विरहता चाँद और उससे फूटतीधरती की ओर भागती निर्बाधनिष्कलंक चाँदनी शरद के ही एकाधिकार हैं। शरद में वृष्टि थम जाती है। मौसम सुहावना हो जाता हैं। दिन सामान्य तो रात्रि में ठंडक रहती है। शरद को मनोहारी और स्वस्थ ऋतु मानते हैं। प्रायः अश्विन मास में शरद पूर्णिमा के आसपास शरद ऋतु का सौंदर्य दिखाई देता है।[1]

शरद पूर्णिमा और महारास

शास्त्रों में शरद ऋतु को अमृत संयोग ऋतु भी कहा जाता है, क्योंकि शरद की पूर्णिमा को चन्द्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा का संयोग उपस्थित होता है। वही सोम चन्द्र किरणें धरती में छिटक कर अन्न-वनस्पति आदि में औषधीय गुणों को सींचती है।

आश्विन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा के दिन यमुना के तट पर भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्द में रास पंचाध्यायी में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इसी शरद पूर्णिमा को यमुना पुलिन में गोपिकाओं के साथ महारास के बारे में बताया गया है। मनीषियों का मानना है कि जो श्रद्धालु इस दिन चन्द्रदर्शन कर महारास का स्वाध्याय, पाठ, श्रवण एवं दर्शन करते हैं उन्हें हृदय रोग नहीं होता साथ ही जिन्हें हृदय रोग की संभावना हो गई हो उन्हें रोग से छुटकारा मिल जाता है। रास पंचाध्यायी का आखिरी श्लोक इस बात की पुष्टि भी करता है।

विक्रीडितं व्रतवधुशिरिदं च विष्णों:

श्रद्धान्वितोऽनुुणुयादथवर्णयेघः

भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं

हृद्रोगमाश्वहिनोत्यचिरेण धीरः

वस्तुतः समस्त रोग कामनाओं से उत्पन्न होते हैं जिनका मुख्य स्थान हृदय होता है। मानव अच्छी-बुरी अनेक कामनाएं करता है। उनको प्राप्त करने की उत्कृष्ट इच्छा प्रकट होती है। इच्छा पूर्ति न होने पर क्रोध-क्षोभ आदि प्रकट होने लगता है। वह सीधे हृदय पर ही आघात करता है।

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के लिए कहा है-

पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।।

रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को मैं पुष्ट करता हूं।

ऋतुसंहार में महाकवि कालिदास कहते हैं- तृतीय सर्ग में शरद् ऋतु का चित्रण है- गीतकार शरद् को नववधु की तरह चित्रितकरता है। वह कहता है, प्रिये, देखो, अपने रूप सौन्दर्य से रमणीय नववधू की तरह यह शरद आ गई फूले हुए कांस के फूल ही इसकी साड़ी है ! सरोवर में खिले हुये कमल इसका सुन्दर मुखे है, और हँसों की आवाजें ही इसके नुपूरों की रूनझुना है। पके हुए धनके पौधे के तरह यह गोरी है, और लचकदार शरीर वाली है। प्यारी इस ऋतु में कांस पुष्पों से पूरी पृथ्वी सफेद दिख रही है, रातें चन्द्र किरणों से धवल कान्ति वाली हैं, हंसों के द्वारा सरिताओं का जल उज्जवल है, सरोवर प्रफुल्ल कुमुद के फूलों से श्वेताभ दिख रहे है । वनभाग सप्तच्छद के फूलों से और उपवन मालती पुष्पों सेश्वेतता लिए हुए है। वर्षाकाल चला गया है । मयूरों का नृत्य अब नहीं दिखाई पड़ता, उसके स्थान पर अब सावलि शोभित हो रही है। वर्षा में फूलने वाले कदम्ब, कुटज आदि तरूओं की शोभा अब क्षीण प्राय है। अब उसके स्थान पर सप्तच्छद वृक्षों में पुष्प सौन्दर्य बिखर रहा है ।

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शरद ऋतु में काव्य खिलता है

शरद उत्तर भारत की सबसे मनोहर ऋतु है। इसमें आकाश निर्मल हो जाता है। नदियों का जल (आज भी) स्वच्छ हो जाता है। रेल से यात्रा करें तो रेलवे लाइन से लगे-सटे गड्डों पोखरों में कुमुदिनी खिली हुए दिखलाई पड़ेंगी। खिलती रात में हैं लेकिन दिन में दस-ग्यारह बजे तक खिली रहती हैं। इसी ऋतु में हारसिंगार खिलता है। निराला ने लिखा है, ‘झरते हैं चुंबन गगन के।’ सबसे विशिष्ट शरदकालीन वातावरण का रोमांचक स्पर्श होता है। अब आप से पूछूं कि आपको समकालीन कवियों की लिखी हुई कोई कविता (जाहिर है आपको अच्छी ही कविता याद आएगी) शरद के सौंदर्य पर याद आ रही है, अगर ऐसी कोई दुर्लभ कविता खोजने पर मिल भी जाए तो वह दुर्लभ ही होगी। क्या नए कवियों को शरद का सौंदर्य प्रभावित नहीं करता?  क्या समकालीन कविता ने आस-पास के जीवन जगत को सहज मन से देखना बंद कर दिया है? रीतिकाल को हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए बहुत अच्छा काल नहीं माना जाता। कहते हैं कि वो दरबारी काल था।

फिर भी उस काल के सहृदय कवि सेनापति ने लिखा है-

कातिक की रात थोरी-थोरी सिहरात,

सेनापति को सुहात सुखी जीवन के गन हैं

फूली है कुमुद फूली मालती सघन बन

मानहुं जगत छीर सागर मगन है

 

शरद चाँदनी!-सुमित्रानंदन पंत…

शरद चाँदनी!

विहँस उठी मौन अतल

नीलिमा उदासिनी!

आकुल सौरभ समीर

छल छल चल सरसि नीर,

हृदय प्रणय से अधीर,

जीवन उन्मादिनी!

आयुर्वेद के अनुसार शरद ऋतु में कौन सा पकवान और मिष्ठान लाभदायक होता है…

भाद्रपद एवं आश्विन ये शरद ऋतु के दो महीने हैं। शरद ऋतु स्वच्छता के बारे में सावधान रहने की ऋतु है अर्थात् इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है। रोगाणाम् शारदी माताः। अर्थात् शरद ऋतु रोगों की माता है। शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से ही पित्तप्रकोप होता है। इससे इन दो महीनों में ऐसा ही आहार एवं औषधी लेनी चाहिए जो पित्त का शमन करे। मध्याह्न के समय पित्त बढ़ता है। तीखे नमकीन, खट्टे, गरम एवं दाह उत्पन्न करने वाले द्रव्यों का सेवन, मद्यपान, क्रोध अथवा भय, धूप में घूमना, रात्रि-जागरण एवं अधिक उपवास – इनसे पित्त बढ़ता है। दही, खट्टी छाछ, इमली, टमाटर, नींबू, कच्चे आम, मिर्ची, लहसुन, राई, खमीर लाकर बनाये गये व्यंजन एवं उड़द जैसी चीजें भी पित्त की वृद्धि करती हैं। इस ऋतु में पित्तदोष की शांति के लिए ही शास्त्रकारों द्वारा खीर खाने, घी का हलवा खाने तथा श्राद्धकर्म करने का आयोजन किया गया है। इसी उद्देश्य से चन्द्रविहार, गरबा नृत्य तथा शरद पूर्णिमा के उत्सव के आयोजन का विधान है। गुड़ एवं घूघरी (उबाली हुई ज्वार-बाजरा आदि) के सेवन से तथा निर्मल, स्वच्छ वस्त्र पहन कर फूल, कपूर, चंदन द्वारा पूजन करने से मन प्रफुल्लित एवं शांत होकर पित्तदोष के शमन में सहायता मिलती है।

गुड़ का शीराधृतकुमारी (एलोए वेरा) या तिल की मिठाइयां शरद ऋतु में लाभदायक हैं-

शरदपूनम की शीतल रात्रि छत पर चन्द्रमा की किरणों में रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-चावल की खीर सर्वप्रियपित्तशामकशीतल एवं सात्त्विक आहार है। इस रात्रि में ध्यानभजनसत्संगकीर्तनचन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यंत लाभदायक है।

 

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प्राचीनकाल से शरद पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है। IMG_20190101_074739-ANIMATION.gifशीत ऋतु दो भागों में विभक्त है। हल्के गुलाबी जाड़े को हेमंत ऋतु का नाम दिया गया है और तीव्र तथा तीखे जाड़े को शिशिर। यह दिसंबर से लगभग 15 जनवरी तक रहती है। यह ऋतु हिन्दू माह के मार्गशीर्ष और पौष मास मास के बीच रहती है। इस ऋतु में शरीर प्राय: स्वस्थ रहता है। पाचनशक्ति बढ़ जाती है।

भारत में छःप्रकार की ऋतुएँ पाई जाती हैं, जो कि संसार के किसी अन्य भागों में नहीं होती- (1) ग्रीष्म (2) वर्षा (3) शरद् (4) हेमन्त (5) शिशिरएवं (6) बसन्त ऋतु। वैसे तो अधिकांश ग्रंथों के अनुसार ऋतुओं की इतनीही संख्या है, किन्तु कुछ ग्रंथों में ऋतु की संख्या तीन अथवा पांच भी बताईगई है क्योंकि उन्होंने हेमन्त तथा शिशिर ऋतु को एक ही माना है।’

  • दोनों ऋतुओं ने हमारी परंपराओं को अनेक रूपों में प्रभावित किया है। हेमंत ऋतु अर्थात मार्गशीर्ष और पौष मास में वृश्चिक और धनु राशियां संक्रमण करती हैं। वसंत, ग्रीष्म और वर्षा देवी ऋतु हैं तो शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतु हैं।
  • हेमंत ऋतु में कार्तिक, अगहन और पौष मास पड़ेंगे तो कार्तिक मास में करवा चौथ, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि तीज-त्योहार पड़ेंगे, वहीं कार्तिक स्नान पूर्ण होकर दीपदान होगा।
  • कार्तिक शुक्ल प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह होगा और चातुर्मास की समाप्ति होगी, तो बैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन भी इसी मास में होगा।
  • अगहन अर्थात मार्गशीर्ष मास में गीता जयंती, दत्त जयंती आएगी। पौष मास में हनुमान अष्टमी, पार्श्वनाथ जयंती आदि के अलावा रविवार को सूर्य उपासना का विशेष महत्व है।
  • हेमंत ऋतु में कार्तिक, अगहन और पौष मास पड़ेंगे। कार्तिक मास में करवा चौथ, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि तीज-त्योहार पड़ेंगे, वहीं कार्तिक स्नान पूर्ण होकर दीपदान होगा।

इस ऋतु के वर्णन में तो कवि लोग श्रृंगार के विविध चित्र ही प्रस्तुत करते रहे हैं। षट्ऋतुओं का वर्णन करते समय हेमन्त को अपेक्षाकृत कम स्थान ही मिला है,क्योंकि प्राकृतिक जगत् के सौन्दर्य में इसी ऋतु में भारी कमी आती है। इस काल का शीतही संयोग के लिए बाध्य करता है। रात्रि को बढ़ना संयोगी जनों के लिए सुखद है। उसकादु:ख तो केवल चकवा-चकवी को ही है। इस ऋतु ने सभी को काम के वशीभूत कर दिया कयौ सबै जगु काम बस, जीते जिते अजेइ।कुसुम सरहिं सर धनुष कर अगहनु गहन न देई।

महाकवि कालिदास की मेघदूत कविता पर हरिवंशराय बच्चन ने कहा है – हो धरणि चाहे शरद की, चाँदनी में स्नान करती। वायु ऋतु हेमंत की, चाहे गगन में विचरती। मैं स्वयं बन मेघ जाता… हेमंत में तुषार (पाला) से पूरा वातावरण ढँक जाता है। ठंडी हवाएँ चलना प्रारंभ हो जाती हैं। तापमान गिरने लगता है। दिशाएँ धूल धुसरित होती हैं। सूरज कोहरे से आच्छादित रहता है। प्रियंगु और नागकेसर के वृक्ष फूलने-फलने लगते हैं और हरसिंगार, धतुरा, गेंदा, कचनार, मधुमालती आदि बहार पर होते हैं।

रामायण में लिखा- लक्ष्मण द्वारा राम से हेमन्त ऋतु की ओर संकेत करते समय देखा जा सकता है। लक्ष्मण, राम से कहते है कि इस ऋतु मे अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है । पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है (‘नीहारपुरूषो लोकः पृथिवी सस्यमालिनी/ 3/16/5) । संभवतः इसी ऋतु में प्रायः सभी जनपदों के निवासियों की अन्न प्राप्ति विषयक कामनाएँ प्रचुररूपेण पूर्ण हो जाती थी ।(प्राज्यकामा जनपदाः सम्पन्नतरगोरसा’ / 3/16/7) गोरस भी खूब मात्रा में हुआ करता था ।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार…

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हेमंत आगमन का धार्मिक महत्व : हेमंत ऋतु अर्थात् मार्गशीष और पौष मास में वृश्चिक और धनु राशियाँ संक्रमण करती हैं। बसंत, ग्रीष्म और वर्षा देवी ऋतु हैं तो शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतु है। हेमंत ऋतु में कार्तिक, अगहन और पौष मास पड़ेंगे। कार्तिक मास में करवा चौथ, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि तीज-त्योहार पड़ेंगे, वहीं कार्तिक स्नान पूर्ण होकर दीपदान होगा।  इस माह में उज्जैन में महाकालेश्वर की दो सवारी कार्तिक और दो सवारी अगहन मास में निकलेगी। कार्तिक शुक्ल प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह होगा और चातुर्मास की समाप्ति होगी, तो बैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन भी इसी मास में होगा। अगहन अर्थात् मार्गशीर्ष मास में गीता जयंती, दत्त जयंती, सोमवती अमावस्या के अलावा काल भैरव तथा आताल-पाताल भैरव की सवारी भी निकलेगी। पौष मास में हनुमान अष्टमी, पार्श्वनाथ जयंती आदि के अलावा रविवार को सूर्य उपासना का विशेष महत्व है।

साहित्यिक उल्लेख

महाकवि कालिदास का अमर ग्रंथ ऋतुसंहारम्‌ छहों ऋतुओं का इतना अनूठा वर्णन कर अमर हो गया कि उसके हजारों अनुवाद विश्व की सैकड़ों भाषाओं में उपलब्ध हैं। ऋतुसंहारम्‌ में महाकवि कालिदास ने हेमंत ऋतु का वर्णन कुछ यूँ किया है-

नवप्रवालोद्रमसस्यरम्यः प्रफुल्लोध्रः परिपक्वशालिः।

विलीनपद्म प्रपतत्तुषारोः हेमंतकालः समुपागता-यम्‌॥

अर्थात- बीज अंकुरित हो जाते हैंलोध्र पर फूल आ चुके हैं धान पक गया और कटने को तैयार हैलेकिन कमल नहीं दिखाई देते हैं और स्त्रियों को श्रृंगार के लिए अन्य पुष्पों का उपयोग करना पड़ता है। ओस की बूँदें गिरने लगी हैं और यह समय पूर्व शीतकाल है। महिलाएँ चंदन का उबटन और सुगंध उपयोग करती हैं। खेत और सरोवर देख लोगों के दिल हर्षित हो जाते हैं।

ऋतुसंहार के चतुर्थ सर्ग में हेमन्त ऋतु वर्णन है- गीतकार ऋतु के नये-नये चित्र प्रस्तुत करता है । वह बोलता है, प्रिये, हेमन्त काल में ठण्डक की वजह से विलासिनी स्त्रियाँ अपने बाहुओं में केयूर और बलय आदि आभूषण नहीं धारण करती, नितम्बों में नवीन वस्त्र एवं पयोघरों पर सूक्ष्म रेशमी वस्त्र धारण नहीं करती । प्रियंगु लता ठण्ड से पक गई है । वह ठण्डी हवा से कॉप रही है और उत्तरोत्तर है। पीली पड़ती जा रही है । यह बेचारी अब विरहणी स्त्री सी पीली हो रही है ।

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राजस्थान में तो लोक मानस जाड़े की अनेक मधुर कल्पनाओं से सुरूचित साहित्य रचता रहा है। राजस्थानी में शीतकाल को सियाला कहते हैं। नायिका सियाले में अकेले नहीं रहना चाहती। वह नायक को परदेश जाने से रोकती है “अकेले मत छोड़ोजी सियाला में।”

रचनाकार मलिक मुहम्मद जायसी ने षट् ऋतु वर्णन खंड में कुछ यूँ कहा है-

ऋतु हेमंत संग पिएउ पियाला।

अगहन पूस सीत सुख-काला॥

धनि औ पिउ महँ सीउ सोहागा।

दुहुँन्ह अंग एकै मिलि लागा।

आयुर्वेद में हेमंत ऋतु को सेहत बनाने की ऋतु कहा गया है। हेमंत में शरीर के दोष शांत स्थिति में होते हैं। अग्नि उच्च होती है इसलिए वर्ष का यह सबसे स्वास्थ्यप्रद मौसम होता है, जिसमें भरपूर ऊर्जा, शरीर की उच्च प्रतिरक्षा शक्ति तथा अग्नि चिकित्सकों को छुट्टी पर भेज देती है। इस ऋतु में शरीर की तेल मालिश और गर्म जल से स्नान की आवश्यकता महसूस होती है। कसरत और अच्छी मात्रा में खठ्ठा-मीठा और नमकीन खाद्य शरीर की अग्नि को बढ़ाते हैं। हेमंत ऋतु में शीत वायु के लगने से अग्नि वृद्घि होती है। चरक ने कहा है-

“शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्घो बलिनां बलीः।

पक्ता भवति…”

शरद के बाद इस ऋतु में मौसम सुहावना होता है। जलवायु अच्छी होती है। तेज धूप से कीड़े-मकोड़ों का संहार हो जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उत्तम समय होता है। छः-छः मास के दो अयन होते हैं। दक्षिणायन में पावस, शरद और हेमंत ऋतु तथा शिशिर, बसंत तथा ग्रीष्म उत्तरायन की ऋतुएँ हैं।

सेहत बनाने की ऋतु- इसलिए हेमन्त ऋतु में स्निग्ध घी, तैल आदि से युक्त, अम्ल तथा लवण रस युक्त भोज्य प्रदार्थों का एवं दूध से बने पदार्थों का निरन्तर सेवन करना चाहिए। हेमन्त ऋतु में दूध तथा उससे बनने वाले पदार्थ, ईंख से बनने वाले पदार्थ गुड़,खाण्ड आदि, ‌‌‌तेल, घृत, नये चावलों का भात, उड़द की दाल एवं उष्ण जल का सेवन करने वाले मनुष्यों की आयु क्षीण नहीं होती अर्थात्‌ वे दीर्घायु तथा स्वस्थ रहते हैं।

 

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बसंत, ग्रीष्म और वर्षा देवी ऋतु हैं तो शरद, हेमंत और शिशिर पितरों की ऋतु है।  शिशिर में कड़ाके की ठंड पड़ती है। घना कोहरा छाने लगता है। ओस से कण-कण भीग जाता है। दिशाएं धवल और उज्ज्वल हो जाती हैं मानो वसुंधराsource.gif और अंबर एकाकार हो गए हों।

यह ऋतु हिन्दू माह के माघ और फाल्गुन के महीने अर्थात पतझड़ माह में आती है। इस ऋतु में प्रकृति पर बुढ़ापा छा जाता है। वृक्षों के पत्ते झड़ने लगते हैं। चारों ओर कुहरा छाया रहता है। इस ऋतु से ऋतु चक्र के पूर्ण होने का संकेत मिलता है और फिर से नववर्ष और नए जीवन की शुरुआत की सुगबुगाहट सुनाई देने लगती है।

अंग्रेजी माह अनुसार यह ऋ‍तु 15 जनवरी से पूरे फरवरी माह तक रहती है। इस ऋतु में मकर संक्रांति का त्योहार आता है, जो हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होना शुरू होता है। 

इस ऋतु में मकर संक्रांति का त्योहार आता है, जो हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होना शुरू होता है। इसी ऋतु में हिन्दू मास फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है।

शिशिर में वातावरण में सूर्य के अमृत तत्व की प्रधानता रहती है तो शाक, फल, वनस्पतियां इस अवधि में अमृत तत्व को अपने में सर्वाधिक आकर्षित करती हैं और उसी से पुष्ट होती हैं। मकर संक्रांति पर शीतकाल अपने यौवन पर रहता है।

ऋतुसंहार में महाकवि कालिदास कहते हैं- पञ्चम सर्ग में कवि शिशिर का हृदयहारी वर्णन करता है- वह कहता है प्रिये जाड़े की ऋतु में चन्दन, जो चन्द्र किरणों की तरह शीतल होता है बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। भवनों की छत ठण्डक के कारण सुहावनी नहीं प्रतीत होती। जाड़े की बर्फीली हवा भी नहीं सुहाती। इस शिशिर काल में मीठा भोजन अच्छा लगता है। स्वादिष्ट भाइ, ईख का रस भी सुखकर होता है। इस काल में बिलासिनी की रमजेच्छा बलवती हो जाती है। जिनके पति बाहर हैं ऐसी युवतियों के चित को शिशिर काल व्यथित कर देता है।

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कविशिरोमणि भट्ट मथुरानाथ शास्त्री कहते हैं-

शिशिरे स्वदंते वहितायः पवने प्रवाति!

अर्थात्- शिशिर में ठंढी हवा बहती है, तो आग तापना मीठा लगता है।

ऋग्वेद के अनुसार

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सुश्रुत संहिता के अनुसार

शिशिरे शीते अधिकं वातवृष्टयाकुलादिशा

अर्थात्- शिशिर ऋतु में शीत अधिक होता है दिशाएँ वायु एवं वर्षा से व्याकुल रहती हैं। शेष लक्षण हेमन्त जैसे होते है।

चरक संहिता के अनुसार

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महाकवि श्रीहर्ष  ने अपने संस्कृत महाकाव्य नैषधीयचरित में लिखा है-

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भद्रबाहु संहिता में लिखा है-

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आयुर्वेद के अनुसार शिशिर ऋतु में कौन सा पकवान और मिष्ठान लाभदायक होता है…

शीत ऋतु (दिसंबर-जनवरी) में उपयुक्त आहारa12.jpg

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शीत ऋतु के अंतर्गत हेमंत और शिशिर ऋतु आते हैं। यह ऋतु विसर्गकाल अर्थात् दक्षिणायन काअंतकाल कहलाती है। इस काल में चन्द्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। इसलिए इस ऋतु में औषधियाँ, वृक्ष, पृथ्वी की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है व जीव जंतुभी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है। शीत ऋतु में स्वाभाविक रूप से जठराग्नि तीव्र रहती है, अतः पाचन शक्ति प्रबल रहती है। ऐसाइसलिए होता है कि हमारे शरीर की त्वचा पर ठंडी हवा और हवा और ठंडे वातावरण का प्रभावबारंबारपड़ते रहने से शरीर के अंदर की उष्णता बाहर नहीं निकल पाती और अंदर ही अंदर इकट्ठी होकर जठराग्नि को प्रबल करती है। अतः इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्षभर शरीर को तेज, बल और पुष्टि प्रदान करता है। इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यक्ति को अपनी सेहतकी तंदरूस्ती के लिए किस प्रकार का आहार लेना चाहिए ? शरीर की रक्षा कैसे करनी चाहिए ? आइये, उसे हम जानें-

शीत ऋतु में खारा तथा मधु रसप्रधान आहार लेना चाहिए।पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरम व स्निग्ध प्रकृति के घी से बने पदार्थों का यथायोग्य सेवन करना चाहिए। वर्षभर शरीर की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु शक्ति का भंडार एकत्रित करने के लिए उड़दपाक, सालमपाक, सोंठपाक जैसेवाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए।

मौसमी फल व शाक, दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, मट्ठा, शहद, उड़द, खजूर, तिल, खोपरा, मेथी, पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन योग्य माने जाते हैं। प्रातः सेवन हेतु रात को भिगोये हुए कच्चे चने (खूब चबाकर खाये), मूँगफली, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़ा, आँवला आदि कम खर्च में सेवन किये जाने वाले पौष्टिक पदार्थ हैं।

शीत ऋतु में उपयोगी पाक- अदरक पाकखजूर पाकबादाम पाकमेथी पाकसूंठी पाकअंजीर पाकअश्वगंधा पाक

शीतकाल में पाक का सेवन अत्यंत लाभदायक होता है। पाक के सेवन से रोगों को दूर करने में एवं शरीर में शक्ति लाने में मदद मिलती है। स्वादिष्ट एवं मधुर होने के कारण रोगी को भी पाक का सेवन करने में उबान नहीं आती। पाक में डाली जाने वाली काष्ठ-औषधियों एवं सुगंधित औषधियों का चूर्ण अलग-अलग करके उन्हें कपड़छान कर लेना चाहिए। किशमिश, बादाम, चारोली, खसखस, पिस्ता, अखरोट, नारियल जैसी वस्तुओं के चूर्ण को कपड़छन करने की जरूरत नहीं है। उन्हें तो थोड़ा-थोड़ा कूटकर ही पाक में मिला सकते हैं।

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भारत में ‘जल संकट’…

 

Chennai-water-crisis.gif“रहिमन पानी राखिए, बिना पानी सब सून” रहीम दास जी जल के महत्व को समझाते हुए यह पंक्ति 450 साल पहले कह गए थे। लेकिन क्या आज का मनुष्य इन पंक्तियों के महत्व को समझता है या समझने की जरा सी कोशिश भी कर रहा है? शायद नहीं! नहीं इसलिए, क्योंकि अगर मनुष्य जल के महत्व को समझता तो जल का इस कदर दोहन, बर्बादी ना कर रहा होता। मैं भारत के संदर्भ में बात कर रहा हूं। भारत, जो आबादी की दृष्टि से दुनिया के 17 फीसदी लोगों को अपने में समाए है जबकि कुल जल संसाधनों का महज 4 फीसदी ही उसके पास है। आइए जानते हैं आंकड़े क्या कहते हैं, आप यह आंकड़े देख कर चौंक जरूर जाएंगे…

भारत में औसत वार्षिक जल उपलब्धता

  • केंद्रीय जल आयोग ने देश में औसत वार्षिक जल उपलब्धता- आयोग ने 1869 अरब घन मीटर (billion cubic meters) का आंकलन किया है। लेकिन इसके बावजूद भौगोलिक स्थितियों, जल विज्ञान तथा अन्य समस्याओं के चलते उपयोग करने योग्य अनुमानित जल लगभग 1123 बीसीएम आंका गया है जिसमें 690 बीसीएम सतही जल और 433 बीसीमए भूमिगत जल शामिल है।
  • राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग ने अपनी 1999 की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया था कि वर्ष 2025 और 2050 तक विभिन्न प्रयोजनों के लिए जल की कुल आवश्यकता क्रमश: 843 बीसीएम और 1180 बीसीएम होगी। उन्होंने बताया कि बढ़ती आबादी को देखते हुए भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वर्ष दर वर्ष घटती जा रही है।
भारत में जल संसाधनों से संबंधित आंकड़े
मानदंड इकाई (अरब क्यूबिक मीटर /वर्ष)
वार्षिक जल उपलब्धता 1,869
उपयोग योग्य जल 1,123
सतही जल 690
भूजल 433
Sources: Water and Related Statistics, April 2015, Central Water Commission; PRS.

जल की उपलब्धता प्रति व्यक्ति, प्रतिवर्ष- साल 1951 में 36 करोड़ आबादी पर प्रति व्यक्ति 51.77 लाख लीटर प्रतिवर्ष जल उपलब्ध था। जो 2011 में 121 करोड़ की आबादी पर 15.45 लाख लीटर प्रति वर्ष रह गया। 2050 में तो यह और कम होकर एक अनुमान के अनुसार 164 करोड़ आबादी पर 11.40 लाख लीटर प्रति वर्ष रह जाएगा।

  • अगर विश्व के अन्य देशों की बात करें तो- नार्वे में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता  86 लाख लीटर, अमेरिका में 50 लाख लीटर तथा आस्ट्रेलिया में 32 लाख लीटर है। चीन में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता करीब 20 लाख लीटर है।

प्रति व्यक्ति भूमिगत जल की उपलब्धता- 2001 के आंकड़ों को देखें, तो आज की तस्वीर काफी गंभीर है। देश में प्रति व्यक्ति भूमिगत जल की उपलब्धि 5,120 लीटर हो गई है। 1951 में यह उपलब्धता 14,180 लीटर थी। 1951 की उपलब्धता का अब यह 35 फीसद ही रह गई है। 1991 में यह आधे पर पहुंच गई थी। अनुमान के मुताबिक 2025 तक प्रति व्यक्ति के लिए प्रति दिन के हिसाब से 1951 की तुलना में केवल 25 फीसद भूमिगत जल ही शेष बचेगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के आंकड़ों के मुताबिक साल 2050 तक यह उपलब्धता घटकर केवल 22 फीसद ही बचेगी।

देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की 85 फीसद से ज्यादा घरेलू जरूरतों के लिए भूमिगत जल ही एकमात्र स्रोत है। शहरी इलाकों में 50 फीसद पानी की जरूरत भूमिगत जल से पूरी होती है। देश में होने वाली कुल कृषि में 50फीसद सिंचाई का माध्यम भी भूमिगत जल ही है। जमीन के अंदर का यह जल तेजी से घटता जा रहा है।’ 

Source: केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड

“जल ही जीवन है” हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। यह भी पता है कि धरती की सतह 70 फीसदी पानी से पटी हुई है। लेकिन क्या यह आपको पता है कि दुनिया में पीने के लिए मीठा पानी सिर्फ 3 फीसदी है। और ये इतना सुलभ नहीं है इसमें से भी विश्व की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41,000 घन किमी (cubic kilometer) जल में से 14,000 घन किमी का ही उपयोग किया जा सकता है। इस 14,000 घन किमी जल में भी 5,000 घन किमी जल ऐसे स्थानों से गुजरता है, जहां आबादी नहीं है और यदि है भी तो उपयोग करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार केवल 9,000 घन किमी जल का ही उपयोग पूरे विश्व की आबादी करती है।

दुनिया में 100 करोड़ अधिक लोगों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है. जबकि 270 करोड़ लोगों को साल में एक महीने पीने का पानी नहीं मिलता- साल 2014 में दुनिया के 500 बड़े शहरों में हुई एक जांच में पाया गया है कि एक अनुमान के अनुसार हर 4 में से 1 नगरपालिका ‘पानी की कमी’ की समस्या का सामना कर रही है. संयुक्त राष्ट्र समर्थित विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार साल 2030 तक वैश्विक स्तर पर पीने के पानी की मांग सप्लाई से 40 फ़ीसदी अधिक हो जाएगी. 

Source: संयुक्त राष्ट्र

2030 तक देश के कई शहरों में खत्म हो जाएगा ‘जल’

  • चेन्नई में जल संकट से मची त्राहि-त्राहि
  • तमिलनाडु के बड़े जलाशयों में औसत से 40 फीसदी कम पानी
  • महाराष्ट्र के चार बड़े जलाशयों में महज 2 फीसदी पानी बचा
  • जलवायु परिवर्तन का असर मानसून की दिशा और दशा पर
  • कर्नाटक के 4 बड़े जलाशयों में 1 से 2 फीसदी पानी बचा है
  • जल संकट पर नीति आयोग की रिपोर्ट देश के लिए खतरे का अलार्म
  • दुनिया के 400 करोड़ लोगों के जीवन में पानी का संकट
  • 400 करोड़ लोगों में से 100 करोड़ भारतीय हैं

देश के कई शहरों में जल संकट ने विकराल रूप धारण कर लिया है। भविष्य में इसके और गहराने के आसार दिख रहे हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक पानी खत्म होने की कगार पर आ जाएगा। इस किल्लत का सामना सबसे ज्यादा दिल्ली, बंगलूरू, चेन्नई और हैदराबाद के लोगों को करना पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार 2020 से ही पानी की परेशानी शुरू हो जाएगी। यानी कुछ समय बाद ही करीब 10 करोड़ लोग पानी के कारण परेशानी उठाएंगे।

2030 तक देश के लगभग 40 फीसदी लोगों तक पीने के पानी की पहुंच खत्म हो जाएगी। वहीं चेन्नई में आगामी दिनों में तीन नदियां, चार जल निकाय, पांच झील और छह जंगल पूरी तरह से सूख जाएंगे। जबकि कई अन्य जगहों पर भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि यह रिपोर्ट पहली बार आई है। तीन साल पहले भी नीति आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि देश में जल संरक्षण को लेकर अधिकांश राज्यों का काम संतुष्टिजनक नहीं है।

देश के 91 जलाशयों में सिर्फ 20% ही बचा

  • केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के अनुसार 30 मई 2019 को देश के 91 जलाशयों में सिर्फ 20 फीसदी पानी ही बचा है. जबकि, 23 मई को यह 21 प्रतिशत था. पश्चिम और दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी पिछले 10 वर्षों के औसत से भी नीचे चला गया है.
  • जलाशयों में पानी की कमी की वजह से देश का करीब 42 फीसदी हिस्सा सूखाग्रस्त है. जो पिछले साल की तुलना में 6 फीसदी ज्यादा है. सूखे पर निगरानी रखने वाले ड्रॉट अर्ली वॉर्निंग सिस्टम ने 28 मई को बताया था कि सूखाग्रस्त इलाके का हिस्सा बढ़कर 42.61% हो गया है, जो 21 मई को 42.18 फीसदी था.
  • 91 जलाशयों में अभी 31.65 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पानी है. यह इन जलाशयों की कुल क्षमता का 20 प्रतिशत ही है. इन 91 जलाशयों की कुल क्षमता 161.993 बीसीएम है, जो देश की अनुमानित कुल स्टोरेज 257.812 बीसीएम का लगभग 63 फीसदी है. इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक बिजली पैदा करने में मदद करते हैं.

इन राज्यों में सूखे की सबसे खराब हालत- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान सूखे से बुरी तरह प्रभावित हैं. असामान्य रूप से सूखे वाली कैटेगरी में बीते साल के 0.68% के मुकाबले इस साल 5.66% की बढ़ोतरी हुई है.

मध्यम स्तर की रिपोर्ट वाले राज्यों में त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश का नाम सामने आया था। मौसम विभाग के अनुसार तब बताया गया था कि कई वर्षों से देश के कुछ राज्यों में औसत से भी कम बारिश दर्ज की गई थी। जबकि कई राज्य सूखे की स्थिति से गुजर रहे हैं। यही वजह है कि भू-जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। पानी के संकट से निपटने के लिए नीति आयोग ने देश की आधी, करीब 450 नदियों को आपस में जोड़ने का एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया है। बरसात में या उसके बाद बहुत सी नदियों का पानी समुद्र में जा गिरता है। अगर समय रहते इस पानी को उन नदियों में ले जाया जाए, जहां साल के अधिकतर महीनों में सूखा दिखता है तो आसपास के क्षेत्रों में कृषि हो सकती है।

उत्तर पश्चिम और पूर्वोत्तर में कम बारिश का डर- अब सबकी निगाहें मॉनसूनी बारिश पर हैं. भारतीय मौसम विभाग ने अपने दूसरे अनुमान में दावा किया है कि ये एक सामान्य मॉनसून होगा. लेकिन उत्तर पश्चिम भारत और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है.

सीडब्ल्यूसी रिपोर्टः पिछले साल की तुलना में किस राज्य का कितना स्टोरेज

  • बेहतर स्टोरेजः हिमाचल प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तकर प्रदेश, उत्त राखंड, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु.
  • सामान्य स्टोरेजः एपी एंड टीजी (दोनों राज्योंर में दो संयुक्त् परियोजनाएं) और कर्नाटक.
  • कम स्टोरेजः राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, प. बंगाल, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और केरल.

अब जानिए देश के किस हिस्से के किस जलाशय में कितना पानी बचा है…

पश्चिम- पश्चिम में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं. इस क्षेत्र में 31.26 बीसीएम की कुल स्टोरेज वाले 27 जलाशय हैं. इन जलाशयों में कुल मौजूद स्टोरेज 3.53 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल क्षमता का 11% है. पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 15% थी. पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में स्टोरेज कम है.

दक्षिणी- दक्षिण में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं. इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल स्टोरेज वाले 31 जलाशय हैं. इन जलाशयों में अभी 5.91 बीसीएम है, जो इन जलाशयों के कुल स्टोरेज का 11% है. पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों का स्टोरेज 12 प्रतिशत थी. इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से 1 फीसदी कमी है.

पूर्व- पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं. इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल स्टोरेज वाले 15 जलाशय हैं. इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.02 बीसीएम है, जो इन जलाशयों के कुल स्टोरेज का 21% है. पिछले साल की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 24% थी. पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में स्टोरेज कम है.

मध्य- मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं. इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं. इन जलाशयों में अभी 10.62 बीसीएम पानी है, जो इन जलाशयों की कुल क्षमता का 25% है. पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 23% थी. इस तरह पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में स्टोरेज बेहतर है.

उत्तर- उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं. इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल स्टोरेज वाले छह जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं. इन जलाशयों में अभी 7.56 बीसीएम पानी है. यानी सिर्फ 42 प्रतिशत पानी है. पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 14% प्रतिशत थी. पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में पानी के स्टोरेज बेहतर है.

भू-जल दोहन

नीति आयोग की ‘कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ नाम की इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश की राजधानी दिल्‍ली, बेंगलुरु और हैदराबाद समेत 21 शहरों में भूजल (जमीन के नीचे मौजूद पानी) भंडार सूख जाएंगे…

डे जीरो के कगार पर शहर- मेरठ, दिल्ली, फरीदाबाद, गुरुग्राम, कानपुर, जयपुर, अमरावती, शिमला, धनबाद, जमशेदपुर, आसनसोल, विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि, बंगलुरु, कोयंबटूर, हैदराबाद, सोलापुर और मुंबई शहर में डे जीरो यानी भू-जल खत्म होने के कगार पर है।

राज्य 2011 में भूजल दोहन (प्रतिशत में)
आंध्र प्रदेश 37
अरुणाचल प्रदेश 0
असम 14
बिहार 44
छत्तीसगढ़ 35
दिल्ली 137
गोवा 28
गुजरात 67
हरियाणा 133
हिमाचल प्रदेश 71
जम्मू कश्मीर 21
झारखंड 32
कर्नाटक 64
केरल 47
मध्य प्रदेश 57
महाराष्ट्र 53
मणिपुर 1
मेघालय 0
मिजोरम 3
नागालैंड 6
ओड़िशा 28
पुद्दूचेरी 90
पंजाब 172
राजस्थान 137
सिक्किम 26
तमिलनाडु 77
तेलंगाना 55
त्रिपुरा 7
उत्तर प्रदेश 74
उत्तराखंड 57
पश्चिम बंगाल 40
कुल* 62
नोट: *कुल में केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं

Sources: Ground water scenario in India, November 2014, Central Ground Water Board; PRS.

दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों में भूजल दोहन का स्तर बहुत अधिक है, जहां भूजल दोहन 100% से अधिक है। इसका अर्थ यह है कि इन राज्यों में वार्षिक भूजल उपभोग वार्षिक भूजल  पुनर्भरण (Recharge) से अधिक है। हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश तथा केंद्र शासित प्रदेश पुद्दूचेरी में भूजल विकास का दोहन 70% और उससे अधिक है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भूजल का उपयोग उन क्षेत्रों में बढ़ा है, जहां पानी आसानी से उपलब्ध था। इससे समूचे भूजल दोहन में वृद्धि हुई, जोकि वर्ष 2004 में 58% से बढ़कर 2011 में 62% हो गया। रेखाचित्र 3 में यह प्रदर्शित किया गया है।

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भारत में भूमिगत जल संकट हुआ विकट, 16 फीसद इलाकों में अत्यधिक दोहन- देश के 16 फीसद तालुका, मंडल, ब्लॉक स्तरीय इकाइयों में भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हुआ है। जबकि देश के चार फीसद इलाकों में भूमिगत जल का स्तर इतना गिर चुका है कि इसे ‘विकट स्थिति’ बताया जा रहा है। हद से ज्यादा भूजल का दोहन करने वाले राज्य हैं-: पंजाब (76 फीसद), राजस्थान (66 फीसद), दिल्ली (56 फीसद) और हरियाणा (54 फीसद) है।

केंद्र सरकार के पिछले हफ्ते लोकसभा से साझा किए केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार इस सरकारी संस्थान ने 6,584 ब्लाक, मंडलों, तहसीलों के भूजल के स्तर का मुआयना किया है। इनमें से केवल 4,520 इकाइयां ही सुरक्षित हैं। जबकि 1,034 इकाइयों को अत्यधिक दोहन की जाने वाली श्रेणी में डाला गया है। इसमें करीब 681 ब्लाक, मंडल, तालुका के भूजल स्तर में (जोकि कुल संख्या का दस फीसद है) अ‌र्द्ध विकट श्रेणी में रखा गया है। जबकि 253 को विकट श्रेणी में रखा गया है।

यह आंकड़े सरकार के वर्ष 2013 के मूल्यांकन के आधार पर हैं। वर्ष 2013 के मूल्यांकन के अनुसार कुल 6,584 ब्लाक, तालुका, मंडलों, जल क्षेत्रों में 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 1,034 इकाइयों का अत्यधिक दोहन किया गया है। इसके चलते भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है। अत्यधिक दोहन वाले वह स्थान कहे जाते हैं जहां लंबी अवधि में जलस्तर में कमी देखी गई हो।

जल शक्ति राज्य मंत्री ने पिछले हफ्ते संसद को बताया था कि 253 इकाइयों की स्थिति बेहद विकट है। 681 को अ‌र्द्ध विकट और 4,520 इकाइयों को सुरक्षित बताया गया। जिन राज्यों में भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन नहीं हुआ है, वह हैं:- पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, त्रिपुरा, ओडिशा, नगालैंड, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, जम्मू और कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा। जबकि अरुणाचल, असम, गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, अंडमान एंड निकोबार, चंडीगढ़, दादरा एंड नगर हवेली को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया है।

साफ पानी न मिलने से हर साल दो लाख लोगों की मौतPicture1.jpg

  • नीति आयोग ने पिछले साल पानी पर जारी रिपोर्ट में कहा था कि देश में करीब 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जाएगी और देश की जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी देखी जाएगी। देश में करीब 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। करीब 2 लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा देते हैं।
  • रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जाएगी। जिसका मतलब है कि करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा और देश की जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी देखी जाएगी।’ कुछ स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा जुटाए डाटा का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में दर्शाया गया था कि करीब 70 प्रतिशत प्रदूषित पानी के साथ भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें पायदान पर है।
  • रिपोर्ट में जल संसाधनों और उनके उपयोग की समझ को गहरा बनाने की आसन्न आवश्यकता पर जोर दिया गया है। 2016-17 अवधि की इस रिपोर्ट में गुजरात को जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन के मामले में पहला स्थान दिया गया है। सूचकांक में गुजरात के बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का नंबर था। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों में त्रिपुरा शीर्ष पर रहा था जिसके बाद हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और असम का नंबर था।
  • आंकड़े कहते हैं कि भारत में 1.2 करोड़ कुएं हैं जबकि कुछ ज्यादा भरोसेमंद आंकड़े इस संख्या को तीन करोड़ आंकते हैं। इसी तरह यह रिपोर्ट भारत में तो अपनी तरह की पहली रिपोर्ट हो सकती है, और उसका यह दावा है –  “कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स विकसित करने का नीति आयोग का यह अनूठा और शायद दुनिया में अपनी तरह का पहला काम है।”

भारत में जल संकट का ये है कारण- भारत के लोग सबसे अधिक ग्राउंड वाटर का इस्तेमाल करते हैं. अमेरिका और चीन को मिलाकर जितना पानी जमीन से निकाला जाता है उतना अकेले भारत से निकाला जाता है. यहां पीने के पानी का आधा से अधिक भाग ग्राउंड वाटर से आता है. देश में जितना पानी जमीन के अंदर से निकाला जा रहा है उसका 89 फीसदी इस्तेमाल कृषि कार्य में सिंचाई के लिए होता है. घर के अन्य कार्यों के लिए 9 फीसदी इस पानी का इस्तेमाल होता है जबकि 2 फीसदी पानी का इस्तेमाल उद्योग-धंधों में होता है.

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक ये जल संकट का कारण- साल 2015 में जल संसाधन पर बने एक स्टैंडिंग कमिटी ने पाया कि देश में ग्राउंड वाटर का सबसे अधिक इस्तेमाल कृषि और पीने के लिए होता है. भूमिगत जल के इसी दोहण का परिणाम है कि साल 2007 से 2017 के बीच देश में भूमिगत जल के लेयर में 61 फीसदी की कमी आई है. ये आंकड़े सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) ने पिछले साल लोकसभा में पेश किया था. इस रिपोर्ट का जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत तैयार किया गया है. ग्राउंड वाटर में कमी के पीछे जनसंख्या में वृद्धि, तेजी से शहरीकरण, औद्योगिकरण और कम वर्षा को माना गया है.

देश में पानी का विभाजन असमान है- देश में पानी की उपलब्धता और उसका विभाजन भी असमान है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 84 फीसदी ग्रामीणों के पास सप्लाई वाटर का कनेक्शन नहीं है. वहीं 75 फीसदी घरों में पीने के पानी की उपलब्धता घर के अंदर नहीं है. उन्हें कहीं और से पीने का पानी मंगाना पड़ता है. आईआईटी खड़गपुर और कनाडा की एक यूनिवर्सिटी के द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर भारतीय राज्यों में भूमिगत जल में पूर्वी भारत की तुलना में ज्यादा कमी आई है.

बड़े शहरों के लोग करते हैं पानी का अधिक इस्तेमाल- पानी के असमान विभाजन का इस बात से भी पता चलता है कि देश के बड़े शहरों- दिल्ली और मुंबई में लोग स्टैंडर्ड वाटर लिमिट (150 लीटर पानी हर व्यक्ति प्रतिदिन) से अधिक जल का इस्तेमाल करते हैं जबकि अन्य शहरों के लोगों को सिर्फ 40-50 लीटर पानी ही प्रतिदिन मिल पाता है.

WHO ने 25 लीटर का तय कर रखा है मानक- WHO के मुताबिक, एक व्यक्ति को एक दिन में 25 लीटर पानी की आवश्यकता खाने और पीने की जरूरतों के लिए है. अन्य उपलब्ध पानी से साफ-सफाई और नहाने का काम किया जाता है. लेकिन हम देखते हैं कि इससे कहीं अधिक मात्रा में लोग पानी का इस्तेमाल करते हैं.

देश में 80 फीसदी पानी का नहीं हो पाता शुद्धिकरण- देश में वाटर ट्रीटमेंट की भी हालत बहुत खराब है. घरों से निकलने वाले 80 फीसदी से अधिक पानी का ट्रीटमेंट नहीं हो पाता है और ये दूषित पानी के तौर पर नदियों में जाकर उसे भी दूषित करते हैं. इसी के साथ देश में सिर्फ 8 फीसदी बारिश के जल का भंडारण किया जाता है जो कि विश्व में सबसे कम है. पहले के समय में जिस तरह तालाबों के माध्यम से बारिश के जल को जमीन के अंदर पहुंचाया जाता था वह भी अब आबादी बढ़ने और शहरीकरण के कमजोर कानूनों के कारण खत्म होता जा रहा है.

सिर्फ अमीर ही आने वाले समय में जरूरतों को पूरी कर पाएंगे- यूएन रिपोर्ट- वहीं, यूएन ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट का कहना है कि विश्व उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है जहां सिर्फ अमीर लोग ही मूलभूत जरूरतों की भी पूर्ति कर सकेंगे. यूएन रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक पानी की जरूरतें दोगुनी बढ़ जाएंगी. इससे करोड़ों लोग जलसंकट की चपेट में आ सकते हैं. इसी संस्था की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत जनसंख्या में चीन को अगले एक दशक में पीछे छोड़ देगा जबकि साल 2050 तक 41.6 करोड़ लोग शहरों में बस जाएंगे.

महाराष्ट्र में भी जलाशय सूखे

Picture3.jpgभीषण सूखे का सामना कर रहा महाराष्ट्र- महाराष्ट्र के 3,262 जलाशयों में सिर्फ 19% पानी बचा है, जो पिछले साल 33% था। मराठवाड़ा की स्थिति सबसे खराब है। यहां सिर्फ 5% पानी बचा है। 19 बांध बिना पानी के हैं। 23 जिलों के 4 हजार गांवों में टैंकर से पानी पहुंचाया जा रहा है। कई जगह टैंकर 15 दिन में एक बार ही पहुंच पा रहा है।

40 फीट गहरे कुएं में उतरकर लोग भर रहे पानी- महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में पानी की किल्लत है। इन इलाकों के 1787 गांव और 625 कस्बों में 2470 टैंकरों से पानी की सप्लाई हो रही है। इसके अलावा नादेंड़ जिले में लोगों को 40 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी का जुगाड़ करना पड़ रहा है।

महाराष्ट्र के 4बड़े जलाशयों में भी महज 2 फीसदी पानी बचा है। वहां के छह बड़े जलाशयों का पानी इस्तेमाल के लायक नहीं बचा है। राज्य में मांग हो रही है कि सरकार जलाशयों को जोड़ने की योजना और इस पर कानून बनाए। लिंकिंग से जिन जलाशयों में ज्यादा पानी है वहां से पानी का संकट झेल रहे जलाशयों में पानी ट्रांसफर किया जा सकता है। कई सांसद ये मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर मानसून की दिशा और दशा पर पड़ रहा है। और इसी की वजह से कृषि के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण राज्यों में मानसून को लेकर अनिश्चितता भी बढ़ रही है। ऐसे में अब सरकर को इस पानी के संकट का दूरगामी हल खोजना होगा।

महाराष्ट्र सरकार का दावा- वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने विधानसभा में 2019-20 के लिए अतिरिक्त बजट पेश करते हुए कहा कि 26 से अधिक सूखा-प्रभावित जिलों के 17,985 गांवों में 66,88,422 किसानों के बैंक खातों में 4,461 करोड़ रुपये की राशि जमा कर दी गई है। उन्होंने सरकार द्वारा सूखे से निपटने के लिए उठाये गये कदमों के बारे में जानकारी दी। मंत्री ने कहा कि पेयजल की कमी के मुद्दे से निपटने के लिए प्रत्येक कलेक्ट्रेट में एक नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि 10 जून तक 6,597 टैंकरों के जरिये 5,243 गांवों में स्थित झोपड़ियों और बस्तियों में पेयजल की आपूर्ति की गई।

पानी की समस्‍या को देखते हुए उन्‍होंने कुछ गंभीर कदम उठाए- जैसे ज्‍यादा पानी से तैयार होने वाली फसलें गन्‍ना और केले की खेती पर उन्‍होंने प्रतिबंध लगा दिया. उन्‍होंने गांव का अलग से जल बजट बनाना शुरू किया. इस गांव का बारिश का आंकड़ा प्रति वर्ष मात्र 172 मिमी था, लेकिन भूमिगत जल का स्‍तर बहुत अच्‍छा था. यहां पर केवल 30-40 फीट पर ही पानी मौजूद था.

यहां पर सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी ‘इंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट’ बनाई गई. इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया. इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद मिली.

जब वर्ष 1994-95 में गांव में आदर्श योजना आई तो उसने गांव के प्‍लान को और बल दिया. इस गांव में 300 से ज्‍यादा कुएं खोदे गए. इस गांव में ट्यूबवेल खत्‍म हो गए हैं और पानी का लेबल पहले से भी सुधर गया है. महाराष्‍ट्र में ही जल नियामक प्राधिकरण (WRA) की स्थापना की थी. लेकिन महाराष्ट्र के डब्ल्यूआरए ने सूखे और पेयजल समस्‍या को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है.

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महाराष्ट्र में किसानों के ये आंकड़ें डरा देंगे

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बुंदेलखंड में सूखा

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उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के 14 जिले मिला कर बुंदेलखंड बनता है। 14 में से औसतन 8 जिले हर साल जिला प्रशासन द्वारा सूखाग्रस्त घोषित किए जाते हैं।

इनमें से टीकमगढ़, बांदा, महोबा, जालौन, निवाड़ी जिले लगभग हर साल सूखाग्रस्त घोषित किए जाते हैं। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में स्थानीय लोग उम्मीदवारों के वोट मांगने आने पर नारा लगाते हैं ”गांव गांव तालाब बनेगा, तभी हमारा वोट मिलेगा।”

80 फीसद किसान कर्जदार- बुंदेलखंड किसान यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रवण कुमार के मुताबिक उनके सर्वे में अभी तक दस सालों में करीब 10-11 हजार किसानों ने आत्महत्या की और 80 फीसद किसान कर्जदार हैं।

बुंदेलखंड में सूखते तलाब- चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के पुनरुद्धार के लिये अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं बुंदेलखंड में लगभग 10 हजार छोटे बड़े तालाब थे। इनमें से 80 प्रतिशत तालाब पिछले दो दशक में उपेक्षा का शिकार होकर अपना वजूद या उपयोगिता खो चुके हैं। 10 हजार तालाबों से तीन फसलों को पानी मिलता था। लेकिन अब करीब दो हजार तालाबों से केवल एक फसल का ही पानी मिल पाता है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में किसान पलायन करते हैं। पलायन का कोई आंकड़ा प्रशासन के पास नहीं है।

2008 में यूपीए सरकार में सूखे से निजात के लिए बुंदेलखंड को 7,200 करोड़ रु. का पैकेज दिया गया था, लेकिन ये पैकेज भी बुंदेलखंड की दशा और दिशा नहीं बदल सका

15 फरवरी 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (20 हजार करोड़ के योजनाओं की सौगात दी, 9 हजार करोड़ की पेयजल योजना परियोजना से बुंदेलखंड की प्यास बुझाई जाएगी।

29, मई – यूपी के बुंदेलखंड जिले में सूखे के कारण करीब 400 लोगों ने अपना गांव छोड़ दिया है बुंदलेखंड में 100 से अधिक गांव सूखे की चपेट में 8 किमी दूर तक पानी की तलाश में जाना पड़ता है

भीषण जल’संकट’ में चेन्नई

Featured-dry-lakes.jpgठीक एक वर्ष के अंतराल पर 15 जून 2018 और 15 जून 2019 उपग्रह से ली गई तस्वीरें संकटपूर्ण स्थिति की पुष्टि करती हैं. चेन्नई को पेयजल आपूर्ति करने वाले प्रमुख स्रोतों में से एक, वर्षा आश्रित पुझल झील में जल के स्तर में भारी अंतर देखा जा सकता है. इसे रेड हिल्स लेक के नाम से जाना जाता है. ये झील चेन्नई के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में करीब 1,800 एकड़ क्षेत्र में फैली है. औसत 20 मीटर के जलस्तर के साथ झील में लगभग 360 अरब लीटर जल संग्रहित रह सकता है. पर इस साल, इसके 360 हेक्टेयर इलाके में ही पानी है और वो भी बहुत कम गहरा.

स्कूलों को करना पड़ा था बंद, ऑफिस में करनी पड़ी हाफ डे की छुट्टी

इन दिनों दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पानी भरने के लिए लगी लंबी-लंबी कतारें और कतारों में लगे लोगों के बीच होती लड़ाई किसी भी जगह देखी जा सकती है। कई लोग पानी की किल्लत के चलते नहा नहीं पा रहे हैं। होटल में लोगों को पानी के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी जा रही है।

यह हाल है भारत के छठे सबसे बड़े शहर चेन्नई का है जहां इसी सप्ताह चार जलाशय सूख गए हैं। और अब जबकि बहुत कम मात्रा में पानी बचा हुआ है तो ये बता पाना मुश्किल है ये पानी आखिर कब तक चलेगा। पानी की इस किल्लत का परिणाम ये है कि चेन्नई की लगभग चालीस लाख से ज्यादा आबादी के लिए एकमात्र आसरा अब सिर्फ सरकारी पानी टैंकर ही हैं।

कुछ जगहों पर तो लोग कुंए से भी पानी निकालने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पानी जमीन के बहुत नीचे जा चुका है। यह भयावह स्थिति देश के अधिकांश शहरों मे हैं। लोगों को इस बात का डर भी है कि कब उनके घर में लगे नल से पानी आना बंद हो जाए।

शहर के छोटे रेस्टोरेंट्स को बंद किया जा रहा है जबकि कुछ दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) का नियम लागू किया गया है ताकि कार्यालयों में पानी बचाया जा सके। शहर के मेट्रो सिस्टम ने अपने स्टेशनों पर एयर कंडीशनिंग का उपयोग करना भी बंद कर दिया है ताकि पानी बचाया जा सके।

जलाशय और झील सूखने से किल्लत- बारिश नहीं होने से शोलावरम (पूर्ण क्षमता 1,081 मिलियन क्यूबिक फीट) और रेडहिल्स (पूर्ण क्षमता 3,300 मिलियन क्यूबिक फीट) जलाशय, जो चेन्नई को पानी की आपूर्ति करते हैं, सूख गए हैं। वहीं, चेम्बरामबक्कम झील में केवल 1 मिलियन क्यूबिक फीट (एमसीएफटी) पानी बचा है और पूंडी जलाशय में 21 एमसीएफटी पानी ही बचा है। बारिश की कमी के कारण भूजल स्तर भी नीचे चला गया है।

पानी की किल्लत के कारण- लेकिन चार साल पहले उत्तरी-पूर्वी मॉनसून के दौरान इसी शहर को बाढ़ का सामना करना पड़ा था. लेकिन 2018 में मॉनसून के कमजोर रहा. इसके बाद छह महीने के समय में चेन्नई के चार बड़े जलाशयों में पानी निचले स्तरों में पहुंच गया. पॉंन्डी जलाशय की क्षमता 3231 मिलियन क्युबिक फीट है लेकिन इसमें सिर्फ 26 मिलियन क्युबिक फीट पानी था. वहीं, चोलावरम की कुल क्षमता 1081 मिलियन क्युबिक फीट और रेड हिल्स की क्षमता 3300 मिलियन क्युबिक फीट है. लेकिन इन दोनों जलाशयों में बिलकुल पानी नहीं है. इसके साथ ही चेमपाराबक्कम जलाशय की क्षमता 3654 मिलियन क्युबिक फीट है.

साल 2015 में इसी जलाशय में पानी ज़्यादा भरने की वजह से चेन्नई में बाढ़ आई थी. लेकिन बीती 16 जून को इस जलाशय में मात्र 1 मिलियन क्युबिक फीट पानी बचा है. चेन्नई नगर निगम जलापूर्ति और सीवरेज़ बोर्ड ने ये सभी आंकड़े चेन्नई हाईकोर्ट में पानी की कमी पर दाखिल की गई एक पेटिशन की सुनवाई के दौरान दिए हैं. चेन्नई में सिर्फ एक मॉनसून के दौरान बारिश होती है. जबकि पूरे देश को दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून आने पर वर्षाजल प्राप्त होता है. इसकी वजह से पानी की कमी 38 फीसदी तक पहुंच चुकी है. 74 लाख लोगों वाला ये शहर 436 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है. लेकिन ये शहर अपनी पानी की कमी पूरी करने के लिए खेती के लिए प्रयोग होने वाले कुओं का प्रयोग करते हैं.

जब चेन्नई में पानी लेकर पहुंची वॉटर ट्रेन…

भारी जल संकट से जूझ रहे चेन्नई में 2.5 मिलियन लीटर पानी ले जाने वाली पहली 50 बोगियों वाली ट्रेन शुक्रवार (12 जनवरी 2019) को शहर में पहुंची, लेकिन विशेष ट्रेनों द्वारा लाया गया यह पानी भी पूरे शहर की प्यास नहीं बुझा सकी. क्योंकि चेन्नई में हर रोज कम से कम 525 मिलियन लीटर पानी की आवश्यकता है.

चेन्नई में पानी पहुंचाने के लिए यह ट्रेन तमिलनाडु के वेल्लार जिले के जोलारपेट्टाई स्टेशन से रवाना हुई थी. इस बात की दक्षिणी रेलवे के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी थी. अधिकारियों के अनुसार, हर बोगी में 50,000 लीटर पानी ढोने की क्षमता है.

पानी के 4 विशेष ट्रेनों के लिए राज्य रेलवे को हर दिन 32 लाख रुपये दे रहा है. हालांकि इन विशेष ट्रेनों के लिए पानी का सोर्स बने मेट्टूर डैम का जलस्तर वर्तमान में आधे से भी कम है. इसलिए अभी यहां के लोगों में पानी के लिए संघर्ष जारी रहेगा.

वर्तमान में चेन्नई महानगर जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड (चेन्नई मेट्रो जल) राज्य की राजधानी में लगभग 525 मिलियन लीटर पानी प्रति दिन (एमएलडी) आपूर्ति कर रहा है. वाटर टैंकर दिनभर में 12,000 चक्कर लगा रहे हैं.

 डे-जीरो (Day Zero) जैसे हालात

day zero.jpgअंतरराष्ट्रीय संस्था वाटर एड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक दुनिया के 21 शहरों में डे-जीरो (Day Zero) जैसे हालात बन जाएंगे। 2040 तक भारत समेत 33 देश पानी के लिए तरसने लगेंगे। जबकि वर्ष 2050 तक दुनिया के 200 शहर खुद को डे-जीरो वाले हालात में पाएंगे।

अभी दिल्ली को रोजाना लगभग 450 से 470 करोड़ लीटर पानी चाहिये, लेकिन केवल 75 प्रतिशत पानी की आपूर्ति ही हो पा रही है। आपूर्ति होने वाला 340 से 350 करोड़ लीटर पानी का आधा हिस्सा हरियाणा से आता है। जबकि बाकी पानी गंगा नदी और भूमिगत जल से प्राप्त होता है। दिल्ली का 90 फीसदी भूमिगत जल का स्तर गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। यहां के अलग-अलग क्षेत्रों में जलस्तर दो मीटर तक प्रति वर्ष के हिसाब से घट रहा है। दिल्ली का 15 प्रतिशत क्षेत्र अब नाजुक माना जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2028 तक दिल्ली टोक्यो को पीछे छोड़कर सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर बन जाएगा। तब तक इस शहर की जनसंख्या तीन करोड़ 72 लाख के पार पहुंच सकती है। यानी तब दिल्ली में पानी की कमी 40 प्रतिशत ज्यादा बढ़ जाएगी।

यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक दुनिया में 32 करोड़ ट्रिलियन गैलन पानी है। एक गैलन में 3.7 लीटर पानी होता है। चौंकाने वाली बात ये है कि दुनिया में मौजूद कुल पानी का केवल दो प्रतिशत ही पीने लायक है और इसमें से आधे यानी एक फीसदी पानी तक हमारी पहुंच आसान है। इसमें भी भारत के पास सिर्फ चार प्रतिशत ही पानी है। जबकि भारत में दुनिया के 18 फीसदी लोग रहते हैं।

जमीन के लिहाज से भारत के पास पृथ्वी का केवल 2.5 फीसदी हिस्सा है। दुनिया में पीने के पानी का बड़ा हिस्सा भूमिगत जल से मिलता है। भारत में जरूरत से 70 प्रतिशत ज्यादा भूमिगत निकाला जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड मुताबिक भारत में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। दुनिया भर के कुल भूमिगत जल का 24 प्रतिशत हिस्सा हमारे देश में इस्तेमाल हो रहा है।

जल की उत्पत्ति

Vishnu calendra 1.pngजल, सलिल, पय, मेघपुष्प, वारि, नीर, तोय, अम्बु, उदक, क्षीर,सर… पानी।

पृथ्वी पर पानी का जन्म कैसे और क्यों हुआ, बहुत स्पष्ट नहीं है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने पानी के जन्म के बारे में गहन चिन्तन किया है। उन्होंने पानी को उसके मौलिक रूप में नारायण माना है। वह पुरुषोत्तम (नर) से उत्पन्न हुआ है इसलिये उसे नार कहा जाता है। सृष्टि के पूर्व वह अर्थात नार (जल) ही भगवान का अयन (निवास) था। नारायण का अर्थ है भगवान का निवास स्थान। पानी में आवास होने के कारण भगवान को नारायण कहते हैं। पानी अविनाशी, अनादि और अनन्त है। उसके बारे में कहा गया है-

आपो नारा इति प्रोक्तानारो वै नर सूनवः। 

अयनं तस्य ताः पूर्वततो नारायणः स्मृतः ।।

अर्थात ‘आपः’ (जल के विभिन्न प्रकार) को ‘नाराः’ कहा जाता है क्योंकि वे ‘नर’ से उत्पन्न हुए हैं। चूँकि ‘नर’ का मूल निवास ‘जल’ में है। इसीलिये जल में निवास करने वाले (जल में व्याप्त) ‘नर’ को ‘नारायण’ कहा जाता है।

भारतीय दर्शन ने जल को शक्ति या पदार्थ माना है। भारतीय दर्शन मानता है कि पानी अजर अमर है। वह सृष्टि के पहले मौजूद था, वह मौजूदा काल में मौजूद है और भविष्य में सृष्टि का विनाश होने के बाद भी मौजूद रहेगा।

भारतीय पुरातन जल वैज्ञानिकों के अनुसार ‘जल’ आकाश, वायु और ‘तेजस’ के पारस्परिक-क्षोभ के कारण उत्पन्न हुआ है। भारतीय मनीषियों के अनुसार आकाश, पंचमहाभूतों का जनक है। आकाश के कारण ही शब्द, नाद या ध्वनि सुनाई देती है। वे कहते हैं कि यदि आकाश का अस्तित्व नहीं होता तो किसी भी प्रकार का नाद (ध्वनि) न तो उत्पन्न होता और न सुनाई देता।

बाइबल और कुरान के मुताबिक- पानी की उत्पत्ति का उल्लेख कुरान में भी मिलता है। कुरान के अनुसार, अल्लाह ने 6 दिनों में स्वर्ग तथा पृथ्वी का निर्माण किया। कुरान के अनुसार, अल्लाह ने पानी से सभी जीवित प्राणियों तथा पशुओं का निर्माण किया। बाइबल के अनुसार ईश्वर ने सबसे पहले स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया। उन्होंने सितारों का भी निर्माण किया।

बाइबल के उल्लेखों से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहले निष्कर्ष के अनुसार, पानी, सृष्टि के प्रारम्भ से है। प्रारम्भ में, वह पूरी पृथ्वी पर मौजूद था। महाद्वीप बाद में अस्तित्व में आये। दूसरे निष्कर्ष के अनुसार, पानी, समस्त जीवधारियों के योगक्षेम का आधार है। बाईबिल के अनुसार, ईश्वर ने पानी का निर्माण किया है पर बाइबल, जीवधारियों की उत्पत्ति के लिये, पानी की भूमिका को प्रतिपादित नहीं करती।

पौराणिक सिद्धान्त के अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’ की प्रतिक्रिया के कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है। यदि वायु को गैसों का समुच्चय एवं तेज को विद्युत माना जाये तो इन दोनों ही सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं है। अतः जल की उत्पत्ति का पौराणिक सिद्धांत पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है। आधुनिक वैज्ञानिक आकाश, वायु तेज, जल और पृथ्वी को तत्व नहीं मानते। न मानने का कारण ‘तत्व’ संबंधी अवधारणा है। तत्व के सम्बन्ध में पौराणिक अवधारणा यह है कि जिसमें ‘तत्’ (अर्थात् पुरुष/विष्णु/ब्रह्म) व्याप्त हो, वह ‘तत्व’ कहलाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ‘तत्व’ केवल मूल पदार्थ (Element) होता है। वस्तुतः ‘तत्त्व’ और ‘तत्व’ में बहुत अन्तर है। ‘तत्त्व’ वास्तविक रूप में एक ‘भूत’ है। किन्तु तत्व या Element एक पदार्थ मात्र है। अतः यह भेद मात्र अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ है।

इस सम्बन्ध में विष्णु पुराण’ का निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है-

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।

सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्।। -श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-2/श्लोक -68

अर्थात्- पृथिवी, आपः (जल), तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इत्यादि जितना भी यह जगत् (गतिशील संसार है, सब ‘पुरुष रूप’ है।

महर्षि पाराशर का कथन है कि सृष्टि की रचना में भगवान् तो केवल निमित्त-मात्र हैं (क्योंकि) उसका प्रधान कारण तो ‘सृज्य पदार्थों’ की शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त मात्र को छोड़कर और किसी बात की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही (परिणाम) शक्ति से ‘वस्तुता’ (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है-

निमित्तमात्रमेवासौ सृ्ज्यानां सर्गकर्मणि।

प्रधान कारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।

निमित्त मात्रं मुक्त्वैवं नान्यक्तिञ्चिदपेक्षते।

नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।।

जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-

आपो नारा इति प्रोक्ताआपो वै नरसूनवः।

अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।। -ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38

विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-

जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।

अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।। -अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2

हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-

ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।

अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।

हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।

तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।

इस हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।

आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।

अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।

जल’ केवल नारायण’ ही नहींब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय

वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है-

ततोSभिसृष्टास्तनव एषां नाम्ना स्वयंभुवा।

सूर्यो मही जलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।।

दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येते ब्रह्मघातवः।

तेषु पूज्यश्च वन्द्यः स्याद् रुद्रस्तान्न हिनस्तिवै।।

ये आठ प्रतीक क्रमशः सूर्य, मही, जल, वह्नि(पशुपति), वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र हैं। रूद्र की जो आठ मूर्तियाँ निश्चित हैं, उनकी पूजा (क्रमशः) सूर्य (रूद्र), मही (शर्व), जल (भव), वह्नि (पशुपति), वायु (ईशान), आकाश (भीम), दीक्षित ब्राह्मण (उग्र) तथा चन्द्र (महादेव) में करने से रूद्र कभी भी उपासक को हानि नहीं पहुँचाते।

इनमें शिव का जो ‘रसात्मक’ रूप है वह ‘भव’ कहलाता है और जल में निवास करता है। इसलिए ‘भव्’ और ‘जल’ से सम्पूर्ण भूत समूह (प्राणी) उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है। अतः ‘भवन-भावन-सम्बंध’ होने के कारण ‘जल जीवों का संभव’कहलाता है-

यस्माद्भवन्ति भूतानि ताम्यस्ता भावयन्ति च।

भवनाद्भवनाच्चैव भूतानां संभवः स्मृतः।।22।।

इसी कारण कहा गया है कि जल में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। न थूकना चाहिए। नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए। जल में मैथुन नहीं करना चाहिए। शिरः स्नान नहीं करना चाहिए। स्थिर या बहते हुए जल के प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए। पवित्र या अपवित्र शरीर के स्पर्श से जल कभी-भी दूषित नहीं होता। किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल का उपयोग नहीं करना चाहिए। समुद्र जल का उत्पत्ति स्थान है। इसलिए जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को पाकर पवित्र और अमृतमय हो जाता है। बहते हुए जल को रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार ‘जल तत्त्व’ को जानकर जो जल में रहता है, उसकी ‘हिंसा’ भव-देवता नहीं करते हैं।

भगवान् महादेव ही अमृतात्मा जलमय चन्द्रमा कहे जाते हैं। (महादेवोSमृतात्माSसौ द्यृम्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः)।

जलरूप भव की पत्नि उषा’ और पुत्र उशना’ माने गये हैं-

भवस्य या द्वितीया तु तनुरापः स्मृता तु वै।

तस्योषाSन्न स्मृता पत्नी पुत्रश्चाप्युशना स्मृतः।।-वायुपुराण/अ.-27/श्लोक-50

पुराणों और स्मृतियों के अनुसार ‘जल’ आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक तीनों रूपों में विद्यमान है।

वेदों में जल को आपो देवता’ कहा गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओं में, यद्यपि जल के लिए पूरे एक सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्द का हुआ है, इसका करण हैवस्तुत: आपः शब्द ‘आप्’ धातु का विकसित रूप है। आप् धातु का प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहने के अर्थ में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है। ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वाचक हैं। अतः वेदों में यदि जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है तो ठीक ही है। वह पूर्ण उपयुक्त है। साथ ही उपवृंहण करने पर पुराणों की विचारधारा से भी मेल खाता है।

वेदों में जल’ को देवता माना गया है– किन्तु उसे जल न कहकर ‘आपः’ या ‘आपो देवता’ कहा गया है।

‘ऋग्वेद’ के पूरे चार सूक्त ‘आपो देवात’ के लिए समर्पित हैं- (1) ऋग्वेद प्रथम मण्डल के तेईसवें सूक्त के मन्त्रदृष्टा ऋषि मेघातिथि काण्व हैं। इस सूक्त के मन्त्र क्र.- 16, 17, 18 गायत्री छन्द में, 19 वाँ मन्त्र पुर उष्णिक् छन्द में, 21 वाँ मन्त्र प्रतिष्ठा छन्द में एवं मन्त्र क्र.-20 तथा 22, 23 क्रमशः अनुष्टुप छन्द में निबद्ध है।

अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्।।

पृञ्चतीर्मधुना पयः।।16।।

यज्ञ की इच्छा करने वालों के सहायक मधुर रस जल-प्रवाह, माताओं के सदृश पुष्टिप्रद हैं। वे दुग्ध को पुष्ट करते हुए यज्ञ-मार्ग से गमन करते हैं।

अमूया उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह।।

ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्।।17।।

जो ये जल सूर्य में (सू्र्य किरणों में) समाहित हैं। अथवा जिन (जलों) के साथ सूर्य का सान्नध्य है, ऐसे ये पवित्र जल हमारे ‘यज्ञ’ को उपलब्ध हों।

अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः।।

सिन्धुभ्यः कर्त्व हविः।।18।।

हमारी गायें जिस जल का सेवन करती हैं, उल जलों का हम स्तुतिगान करते हैं। अन्तरिक्ष एवं भूमि पर प्रवहमान उन जलों के लिए हम हवि अर्पित करते हैं।

अप्स्व अन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये।।

देवा भवत वाजिनः।।19।।

जल में अमृतोपम गुण है। जल में औषधीय गुण है। हे देवो! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें।

अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा।।

अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः।।20।।

मुझ (मंत्रदृष्टा ऋषि) से सोमदेव ने कहा है कि जल में (जलसमूह में) सभी औषधियाँ समाहित हैं। जल में ही सर्व सुख प्रदायक अग्नि तत्व समाहित है। सभी औषधियाँ जलों से ही प्राप्त होती हैं।

आपः पृणीत भेषजं वरुथं तन्वे 3 मम।।

ज्योक् च सूर्यं दृशे ।।21।।

हे जल समूह! जीवनरक्षक औषधियों को हमारे शरीर में स्थित करें, जिससे हम निरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें।।21।।

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि।।

यद्वाहमभिदु द्रोह यद्वा शेप उतानृतम्।।22।।

हे जलदेवों! हम (याजकों) ने अज्ञानतावशं जो दुष्कृत्य किये हों, जानबूझकर किसी से द्रोह किया हो, सत्पुरुषों पर आक्रोश किया हो या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के हमारे जो भी दोष हों, उन सबको बहाकर दूर करें।।22।।

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि।।

पयस्वानग्न आ गहि तंमा सं सृज वर्चसा ।।23।।

आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवमृथ स्नान किया है। इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुए हैं। हे पयस्वान्! हे अग्निदेव! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ। हम आपका स्वागत करते हैं।

वदों में जल के महत्त्व का वर्णन

ऋग्वेद में कहा गया है-

अप्सु अंत: अमृतं,अप्सु भेषजं’,

अर्थात जल में अमृत है। इसमें औषधि गुण हैं। ऐसे में जरूरत है जल की शुद्धता को बनाए रखना।

” इदमाप: प्र वहत यत् किं च दुरितं मयि
यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेष उतानृतम् 
| | “ऋग्वेद 10 . 2 . 8 .

हे जल देवता ! मुझसे जो भी पाप हुआ हो, उसे तुम दूर बहा दो अथवा मुझसे जो भी द्रोह हुआ हो , मेरे किसी कृत्य से किसी को पीड़ा हुई हो अथवा मैंने किसी को गालियाँ दी हों, अथवा असत्य भाषण किया हो , तो वह सब भी दूर बहा दो |

जल में अखण्ड प्रवाह , दया , करुणा , उदारता , परोपकार और शीतलता , ये सभी गुण विद्यमान रहते हैं | मनुष्य कितना भी दुखी क्यों न हो , ठंडे जल से स्नान करते ही वह शान्त हो जाता है | जल ही जीवन है | जल मानव को पुण्य – कर्म करने की प्रेरणा देता है |भारतीय संस्कृति पूजा प्रधान है | यहाँ किसी भी कार्य का प्रारम्भ पूजा से होता है और प्रत्येक कार्य का विसर्जन भी पूजा से ही होता है | पूजा हेतु सर्वप्रथम , पवित्रीकरण की आवश्यकता होती है और पवित्रीकरण के लिए जल की आवश्यकता होती है | इसी प्रकार पूजा का विसर्जन , शान्ति – पाठ से होता है और शान्ति – पाठ में जब मंत्रों का उच्चारण किया जाता है , तो पवित्र जल का अभिसिंचन किया जाता है , इस प्रकार जल के बिना, किसी भी तरह की पूजा सम्भव नहीं है | वैदिक – वांग्मय में जल के महत्त्व को सर्वात्मना स्वीकार किया गया है और जल की गरिमा – महिमा का बखान , श्रुतियों में सर्वत्र किया गया है |

“रूपरसस्पर्शवत्य आपोद्रवा: स्निग्धा: | | २ | | “

वैशेषिक दर्शन , द्वितीय अध्याय, प्र.आ. जल तत्व में रूप , रस और स्पर्श , इन तीन गुणों का समावेश है | जल, स्निग्ध होने के साथ – साथ प्रवाहित भी होता है | प्रगट स्वरूप होने के कारण जल रूपवान भी है | जल को मुख में डालने पर , शीतल , गर्म , खारा एवं मधुर आदि का , रसास्वादन होने से, यह रस है | जल का स्पर्श करने पर , उसके शीत और उष्ण होने का पता चलता है इसलिए जल, स्पर्श गुण से सम्पन्न है और अग्नि तथा वायु के गुणों का सम्मिश्रण भी है | जल का उपयोग चिकित्सा के लिए भी किया जाता रहा है , जैसा कि ” यजुर्वेद ” में कहा गया है –

” युष्माSइन्द्रोSवृणीत वृत्रतूर्य्ये यूयमिन्द्र्मवृणीध्वं
वृत्रतूर्य्ये प्रोक्षिता स्थ | अग्नये त्वा जुष्टं
प्रोक्षाम्यग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि |
दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्यायै यद्वोSशुध्दा:
पराजघ्नुरिदं वस्तच्छु न्धामि | | १ ३ | |”

यजुर्वेद प्रथम अध्याय जैसे यह सूर्यलोक , मेघ के वध के लिए , जल को स्वीकार करता है , जैसे जल , वायु को स्वीकार करते हैं , वैसे ही हे मनुष्यों ! तुम लोग उन जल औषधि – रसों को शुद्ध करने के लिए , मेघ के शीघ्र – वेग में , लौकिक पदार्थों का अभिसिंचन करने वाले , जल को स्वीकार करो और जैसे वे जल शुद्ध होते हैं , वैसे ही तुम भी शुद्ध हो जाओ |

परमेश्वर ने सूर्य एवं अग्नि की रचना इसलिए की, कि वे सभी पदार्थों में प्रवेश कर उनके रस एवं जल को तितर – बितर कर दें ताकि वह पुन: वायुमंडल में जाकर और वर्षा के रूप में फिर धरती पर आ कर सबको शुचिता और सुख प्रदान कर सके |

“आपोSअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व: पुनन्तु ।
विश्व हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूतSएमि |
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा शग्मां परिदधे भद्रं वर्णम पुष्यन् ।”
।। यजुर्वेद, ४ , २ ।।

मनुष्य को चाहिए कि जो सब सुखों को देने वाला , प्राणों को धारण करने वाला तथा माता के समान , पालन – पोषण करने वाला जो जल है , उससे शुचिता को प्राप्त कर , जल का शोधन करने के पश्चात ही , उसका उपयोग करना चाहिए , जिससे देह को सुंदर वर्ण , रोग – मुक्त देह प्राप्त कर , अनवरत उपक्रम सहित , धार्मिक अनुष्ठान करते हुए , अपने पुरुषार्थ से आनंद की प्राप्ति हो सके ।

वैदिक ऋषियों ने वैज्ञानिकों की तरह जल एवं वायु को प्रदूषण – मुक्त करने की बात कही है । यजुर्वेद में उन्होंने यह परामर्श भी दिया है कि हम वर्षा – जल को भी , किस प्रकार औषधीय गुणों से परिपूर्ण कर सकते हैं ।

” अपो देवीरुपसृज मधुमतीरयक्ष्मार्य प्रजाभ्य: ।
तासामास्थानादुज्जिहतामोषधय: सुपिप्पला: । । ”
यजुर्वेद / ११ / ३८ /

राजा के पास दो तरह के वैद्य होना चाहिए । एक वैद्य , सुगन्धित पदार्थों के होम से , वायु , वर्षा – जल एवं औषधियों को शुद्ध करे । दूसरा श्रेष्ठ विद्वान् , वैद्य बनकर , प्राणियों को रोग -रहित रखे , ” सर्वे भवन्तु सुखिन:” हमारा आदर्श है और इस आदर्श के निर्वाह के लिए इन दोनों दायित्वों का निर्वाह अनिवार्य है ।

वेद में मानव जीवन को ‘ कृषि – जीवन ‘ कहा गया है और इसीलिए , जलश्रोतों से हमारा रागात्मक सम्बन्ध रहा है । नदियों को हमने , देवी – स्वरूपा , माता की संज्ञा से अभिहित किया है ।’ ऋग्वेद ‘ की इस ऋचा में ‘ सरस्वती ‘नदी की महिमा गाई गई है –


” अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति ।
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमंब नस्कृधि ।। “
ऋग्वेद / २ / ८ / १४ /

हे सर्वोत्तम माते सरस्वती ! तू सर्वोत्तम नदी के समान है । जिन नदियों का प्रवाह प्रकट है , वे गंगा – यमुना जैसी , श्रेष्ठ नदियाँ हैं , परन्तु तेरा प्रवाह गुप्त है , इसलिए तू श्रेष्ठ्तम है । तू सभी देवताओं में श्रेष्ठ , आलोक प्रदाता है । हमारा जीवन अप्रशस्त जैसा बन गया है । हे माता ! तू उसे प्रशस्त कर । हम उपेक्षित हैं , निन्दित हैं । हे माता ! तू हमारा पथ प्रशस्त कर ।

” यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूवु:।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमि: पूर्व पेये दधातु ।। ”
अथर्ववेद / द्वादश – काण्डम् / ३ /

सागर ,नदी , कुआँ और वर्षा का जल तथा कृषि कार्य आदि से , जो मनुष्य , नाव , जहाज कला – यंत्र आदि का , विधेयात्मक प्रयोग करता है , वह सबको आनन्द प्रदान करता है । ऐसा व्यक्ति स्वत: भी श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है ।

“शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या: ।
शं ते सनिष्पदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:।। ”
अथर्ववेद/ एकोनविंश काण्डम् / १ /

मनुष्य को चाहिए कि वह वर्षा , कुऑ ,नदी और सागर के जल को , अपने खान-पान , खेती और शिल्प- कला आदि के लिए उपयोग करे एवम् अपने जीवन को सम्पूर्ण बनाए और चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करे ।


“अनभ्रय: खनमाना विप्रा गम्भीरे अंपस: ।”
भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि ।।”
अथर्ववेद / एकोनविंश काण्डम् / 3 /

विद्वान् ,जिज्ञासु , वैद आदि तपस्वी साधक , अनेक तरह के रोगों में , जल के प्रयोग के द्वारा , जल के अनन्त गुणों की आपस में व्याख्या करें और समाज के हित में उसका भरपूर उपयोग करें ।

वैदिक ऋषियों का जीवन एक प्रयोग- शाला थी । उन्होंने चिन्तन, मनन और निदिध्यासन से जो उपलब्धि हासिल की , उसे जन- कल्याण हेतु समर्पित कर दिया।

“अपामह दिव्यानामपां स्त्रोतस्यानाम् ।
अपामह प्रणेजनेSश्वा भवथ वाजिन: ॥”
अथर्ववेद / एकोनविंश / काण्डम् / 4 /

जल – चिकित्सा बहुत ही प्रभावी चिकित्सा पद्धति है , समस्त रोगों का निदान इससे सम्भव है। मनुष्य को चाहिये कि वह सागर , वर्षा , नदी , सरोवर आदि के जल को आवश्यकतानुसार चिकित्सा मे उपयोग कर के खेती के संसाधन की तरह , जल का प्रयोग करके , निरोग. वेगवान , प्रखर , एवम् बलशाली बने और समाज के हित में अपनी प्रतिभा एवम् अपने बल का समुचित उपयोग कर सके ।


“ता अप: शिवा अपो
Sय मं करणीरप: ।
यथैव तप्यते मयस्तास्त आ दत्त भेषजी:।।”
अथर्ववेद / एकोनविंश / काण्डम् / 5 /

वेदों में जल संरक्षण

पर्यावरण का स्वच्छ एवं सन्तुलित होना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। पाश्चात्य सभ्यता को यह तथ्य बीसवीं शती के उत्तारार्ध्द में समझ में आया है, जबकि भारतीय मनीषा ने इसे वैदिक काल में ही अनुभूत कर लिया था। हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, अन्तरिक्ष तथा वायु इन पंचतत्वों से ही मानव शरीर निर्मित है-

पंचस्वन्तु पुरुष आविवेशतान्यन्त: पुरुषे अर्पितानि।

उन्हें इस तथ्य का भान था कि यदि इन पंचतत्वों में से एक भी दूषित हो गया तो उसका दुष्प्रभाव मानव जीवन पर पड़ना अवश्यम्भावी है। इसलिए उन्होंने इसके सन्तुलन को बनाए रखने के लिए प्रत्येक धार्मिक कृत्य करते समय लोगों से प्रकृति के समस्त अंगों को साम्यावस्था में बनाए रखने की शपथ दिलाने का प्रावधान किया था, जो आज भी प्रचलित है-

द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रौषधय: शान्ति।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिर्ब्रह्मं शान्ति: सर्वशान्तिदेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि।2

अत: स्पष्ट है कि यजुर्वेद का ऋषि सर्वत्र शान्ति की प्रार्थना करते हुए मानव जीवन तथा प्राकृतिक जीवन में अनुस्यूत एकता का दर्शन बहुत पहले कर चुका था। ऋग्वेद का नदी सूक्त एवं पृथिवी सूक्त तथा अथर्ववेद का अरण्यानी सूक्त क्रमश: नदियों, पृथिवी एवं वनस्पतियों के संरक्षण एवं संवर्धन की कामना का संदेश देते हैं। भारतीय दृष्टि चिरकाल से सम्पूर्ण प्राणियों एवं वनस्पतियों के कल्याण की आकांक्षा रखती आई है। ‘यद्पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे’ सूक्ति भी पुरुष तथा प्रकृति के मध्य अन्योन्याश्रय सम्बन्ध की विज्ञानपुष्ट अवधारणा को बताती है।

स्वच्छ जल एवं स्वच्छ परिवेश किसी भी सामाजिक वातावरण के पल्लवन एवं विकसन की अपरिहार्य आवश्यकता है। जीव-जन्तुओं हेतु अनुकूल परिस्थितियों में ही जीव-जन्तुओं का समाज पुष्पित-पल्लवित होता है। अत: सामाजिक विकास में पर्यावरण तथा जल संरक्षण की अनिवार्यता को विस्मृत नहीं किया जा सकता।

अथर्ववेद में कहा गया है कि अग्नि (यज्ञाग्नि) से धूम उत्पन्न होता है, धूम से बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा होती है। वेदों में यज्ञ का अर्थ ‘प्राकृतिक चक्र को सन्तुलित करने की प्रक्रिया’ कहा गया है। वैज्ञानिकों ने भी यह स्वीकार किया है कि यज्ञ द्वारा वातावरण में ऑक्सीजन तथा कॉर्बन डाइ ऑक्साइड का सही सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है। अत: यह तथ्य भी विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरा है। वेदों तथा वेदांगों में अनेक स्थलों पर यज्ञ द्वारा वर्षा के उदाहरण मिलते हैं, जिनकी भारत सरकार के तत्तवावधान में 12 फरवरी, सन् 1976 को हुए भारतीय वैज्ञानिकों के सम्मेलन में पुष्टि की जा चुकी है। यही नहीं जून 2009 में भारतीय वैज्ञानिकों ने उ.प्र. के उन्नाव जिले के कुछ खेतों में वैदिक ऋचाओं के समवेत गायन के कैसेट बजाने से पैदावार में दो से तीन गुनी तक अधिक वृद्धि लक्षित की है।

यास्कीय निघण्टु में वन का अर्थ जल तथा सूर्यकिरण एवं पति का अर्थ स्वामी माना गया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषि इस विज्ञानसम्मत धारणा से अवगत थे कि वन ही अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि से उनकी रक्षा कर सकते हैं। इसलिए ऋग्वेद में वनस्पतियों को लगाकर वन्य क्षेत्र को बढ़ाने की बात कही गयी है। सम्भवत: इसी कारण से उन्होंने वन्य क्षेत्र को ‘अरण्य’ अर्थात रण से मुक्त या शान्ति क्षेत्र घोषित किया होगा, ताकि वनस्पतियों को युद्ध की विभीषिका से नष्ट होने से बचाया जा सके। अथर्ववेद में जल की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि जिससे बढ़ने वाली वनस्पतियाँ आदि अपना जीवन प्राप्त करती हैं, वह जीवन का सत्व पृथ्वी पर नहीं है और न द्युलोक में है, अपितु अन्तरिक्ष में है तथा अन्तरिक्ष में संचार करने वाले मेघमण्डल में तेजस्वी पवित्र और शुद्ध जल है। जिन मेघों में सूर्य दिखाई देता हो, जिनमें विद्युत रूपी अग्नि कभी व्यक्त और कभी गुप्त रूप से दिखाई देती हो, वह जल ही हमें शुद्धता, शान्ति और आरोग्य दे सकता है, जिसे विज्ञान भी स्वीकार करता है।

सुप्रसिद्ध इन्द्रवृत्र आख्यान भी जल के महत्तव को प्रतिपादित करता है। इन्द्र वर्षा के जल को बाधित करने वाले दैत्य वृत्रासुर रूपी अकाल का ऋषि दधीचि की सहायता से संहार करते हैं तथा स्वच्छ वारिधाराओं का धरती पर निर्बाध विचरण सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि इन्द्र को जल के देवता की भी संज्ञा दी गई है। वैदिक ऋषि जल के औषधीय स्वरूप से भी भली-भाँति परिचित थे, सम्भवत: इसी कारण उन्होंने जल को ‘शिवतम रस’ की संज्ञा दी थी। ऋग्वेद का ऋषि प्रार्थना करते हुए कहता है कि हे सृष्टि में विद्यमान जल ! तुम हमारे शरीर के लिए औषधि का कार्य करो ताकि हम नीरोग रहकर चिर काल तक सूर्य का दर्शन करते रहें, अर्थात् दीर्घायु हों। यजुर्वैदिक ऋषि शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शन्योरभिस्त्रवन्तु न: कहकर शुद्ध जल के प्रवाहित होने की कामना करता है। अथर्ववेद में पृथिवी पर शुद्ध पेय जल के सर्वदा उपलब्ध रहने की ईश्वर से कामना की गयी है-

शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो न: सेदुरप्रिये तं नि दध्म:।

पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि॥

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवद्गीता में स्वयं को नदियों में भागीरथि गंगा तथा जलाशयों में समुद्र बताकर (स्त्रोतसास्मि जाह्नवी सरसामस्मि सागर:) जल की महत्ता को स्वीकृति प्रदान की है। भारतीय मनीषा की दृष्टि में जलस्त्रोत केवल निर्जीव जलाशय मात्र नहीं थे, अपितु वरुण देव तथा विभिन्न नदियों के रूप में उसने अनेक देवियों की कल्पना की थी। इसी कारण स्नान करते समय सप्तसिन्धुओं में जल के समावेश हेतु आज भी इस मंत्र द्वारा उनका आह्वान किया जाता है-

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिम् कुरु॥

वैदिक काल में भी पर्यावरण के प्रदूषित होने की समस्या उपस्थित हुई थी तथा समुद्र मन्थन और कुछ नहीं, अपितु देवताओं एवं असुरों द्वारा प्रकृति का निर्दयतापूर्वक दोहन था, जिससे अमृत के साथ-साथ हलाहल के रूप में प्रदूषण ही निकला होगा। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि यह जहरीली फास्जीन गैस थी। 15 उस समय भगवान शिव ने प्रदूषण रूपी हलाहल का पान का सृष्टि को प्रदूषण मुक्त किया था। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्भवत: भगवान शिव ने प्रदूषण फैलाने वाले स्त्रोतों को नष्ट कर धरती को प्रदूषण से रहित किया होगा।

बृहदारण्यकोपनिषद में जल को सृजन का हेतु स्वीकार किया गया है और कहा गया है कि पंचभूतों का रस पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प हैं, पुष्पों का रस फल हैं, फल का रस पुरुष हैं तथा पुरुष का रस वीर्य है, जो सृजन का हेतु है। मत्स्य पुराण में पादप का अर्थ पैरों से जल पीने वाला बताया गया है। इस तथ्य से भी वनस्पतियों एवं जल के वैज्ञानिक सम्बन्धों की पुष्टि की गई है।

आधुनिक विज्ञान की अवधारणाओं के अनुसार

asteroid-impact-dinosaur-extinction.jpgआधुनिक विज्ञान की अवधारणाओं की। पानी के पृथ्वी पर जन्म को लेकर वैज्ञानिक जगत में अनेक विचार तथा परिकल्पराएँ प्रचलन में हैं जिन्हें मौटे तौर पर दो अवधारणाओं में वर्गीकृत किया जा सकता है। पहली अवधारणा के अनुसार पानी की उत्पत्ति पृथ्वी के जन्म के साथ हुई है। दूसरी अवधारणा के अनुसार पानी, पृथ्वी के बाहर से आया है पर इस बात से लगभग सभी वैज्ञानिक सहमत हैं कि पृथ्वी पर पानी का जन्म कैसे और क्यों हुआ, अस्पष्ट है। इसे अभी तक पूरी तरह समझा नहीं जा सका है।

अमेरिकी वैज्ञानिक माइक ड्रेक के अनुसार पानी, पृथ्वी के जन्म के समय से ही मौजूद है। उनका कहना है कि जब सौर मण्डलीय धूल कणों से पृथ्वी का निर्माण हो रहा था, उस समय, धूल कणों पर पहले से ही पानी मौजूद था। यह परिकल्पना, उसी स्थिति में ग्राह्य है जब यह प्रमाणित किया जा सके कि ग्रहों के निर्माण के समय की कठिन परिस्थितियों में सौर मण्डल के धूल कण, पानी की बूँदों को सहजने में समर्थ थे।

कुछ वैज्ञानिकों का विश्वास है कि पृथ्वी के जन्म के कुछ समय बाद उस पर, पानी से सन्तृप्त करोड़ों धूमकेतुओं तथा उल्का पिंडों की वर्षा हुई। धूमकेतुओं तथा उल्का पिंडों का पानी धरती पर जमा हुआ और उसी से महासागरों का जन्म हुआ।

खगोल-भौतिकी की आधुनिकतम खोजों के अनुसार पानी, सौरमण्डल के बाह्य किनारों से पृथ्वी पर आया। खगोल-भौतिकी की खोजों से पता चलता है कि जन्म के समय पृथ्वी पर बहुत ही कम (शायद नहीं) पानी था। पृथ्वी पर नमी का आगमन धूमकेतुओं तथा जलीय उल्कापिंडों से हुआ है। ये धूमकेतु और जलीय उल्कापिंड सौरमण्डल के बाहरी किनारे पर क्यूपर बेल्ट और वरुण ग्रह के आगे स्थित हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि धरती पर पानी का आगमन लगभग 400 करोड़़ साल पहले हुआ होगा।

अमरीकी भूवैज्ञानिकों ने अमेरिका महाद्वीप की सतह से लगभग 700 किलोमीटर नीचे रिंगवूडाइट (Ringwoodite) नामक चट्टान खोजी है। इस चट्टान में पानी के विशाल भण्डार (किसी भी महासागर से तीन गुना अधिक) मौजूद हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी चट्टान से रिसकर पानी धरती पर आया।

पानी रिसने के पक्ष में वैज्ञानिकों की दलील है कि 700 किलोमीटर की गहराई पर पानी के ऊपर रिसने के लिये उपयुक्त दबाव तथा तापमान मौजूद है। इस खोज का आधार कतिपय अप्रत्यक्ष साक्ष्य हैं जो केवल अमेरिका महाद्वीप के नीचे की जानकारी प्रदान करते हैं। अन्य महाद्वीपों के नीचे की स्थिति अज्ञात है।

बिग-बैंग घटना विश्व के प्रारम्भिक विकास की अवधारणा को प्रस्तुत करती है। कुछ वैज्ञानिक, पृथ्वी पर पानी के आगमन का सम्बन्ध बिग-बैंग घटना से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार विश्व, प्रारम्भ में अत्यन्त गर्म तथा बहुत अधिक भारी था। उसका निर्माण मूलतः ऊर्जा से हुआ था। उसकी तुलना ब्लेक होल से की जा सकती है। लगभग 1370 करोड़ साल पहले अचानक विश्व का फैलना शुरू हुआ जिसके कारण विश्व का तापमान तथा घनत्व घटा और अपार ऊर्जा उत्पन्न हुई।

ऊर्जा के उत्पन्न होने के कारण अन्तरिक्ष के बहुत बड़े इलाके के तापमान में वृद्धि हुई। तापमान में वृद्धि के कारण पूरा अन्तरिक्ष गर्म कणों से भर गया। गर्म कणों के संयोग से अनेक प्रक्रियाएँ हुईं। परिणामस्वरूप पहली बार अणु की नाभि अस्तित्व में आई। गणितीय विवरणों के आधार पर, आधुनिक अन्तरिक्ष विज्ञान, अणु-नाभियों के अस्तित्व को प्रमाणित करता है।

गणनाओं से पता चलता है कि बिग-बैंग घटना के दौरान अन्तरिक्ष में बहुत अधिक संख्या में आणविक नाभियाँ मौजूद थीं। इन नाभियों में हाइड्रोजन के अणुओं की बहुतायत थी। दूसरे क्रम पर हीलियम तथा बहुत ही कम मात्रा में लीथियम मौजूद थी। उस काल में, ऑक्सीजन, जो पानी का निर्माण करने के लिये जरूरी है, सम्भवतः अनुपस्थित थी।

बिग-बैंग घटना के लगभग सौ करोड़ साल बाद, विश्व में तारों का आगमन हुआ। सभी जानते हैं कि तारों के अन्दरुनी भाग का तापमान बहुत अधिक होता है। तापमान की अधिकता के कारण उन्हें अत्यधिक गर्म भट्टी भी कहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तारे जब सुपरनोवा की स्थिति में पहुँचते हैं तो उनमें होने वाला विस्फोट, तत्वों को अन्तरिक्ष में बिखेर देता है। सम्भवतः यही हुआ और विस्फोट से उत्पन्न तापमान ने अन्तरिक्ष में मौजूद आणविक नाभियों को जटिल तत्वों में बदल दिया। इन जटिल तत्वों में कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन सम्मिलित हैं।

हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से पानी का जन्म हुआ। निश्चय ही यह प्रक्रिया धरती के ठंडे होने तथा वायुमण्डल के अस्तित्व में आने के बाद ही सम्पन्न हुई होगी।

राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘जल चेतना’ के खण्ड तीन, अंक 1, जनवरी 2014 में प्रकाशित लेख से पता चलता है कि आकाश गंगा के अन्तरतारकीय मेघों में पानी मौजूद है। अन्य आकाश गंगाओं में भी पानी मौजूद हो सकता है क्योंकि ब्रह्माण्ड में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है।

इसी प्रकार, सौरमण्डल के विभिन्न ग्रहों में भी जल उपलब्ध है। बुध ग्रह के वायुमण्डल में भाप के रूप में 3.4 प्रतिशत, शुक्र ग्रह के वायुमण्डल में 0.002 प्रतिशत और पृथ्वी के वायुमण्डल में उसकी मात्रा लगभग 0.4 प्रतिशत, मंगल ग्रह के वायुमण्डल में 0.03 प्रतिशत, बृहस्पति ग्रह के वायुमण्डल में 0.00004 प्रतिशत और शनि ग्रह के वायुमण्डल में वह केवल बर्फ के रूप में मौजूद है।

ढेर सारी उपलब्धियों के बावजूद अभी तक, आधुनिक विज्ञान, पानी के जन्म की गुत्थी नहीं सुलझा पाया है। पानी के जन्म की कहानी की असली चुनौती, उसका जन्म कहाँ, क्यों और कैसे हुआ है। लेखक को लगता है, विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं और आधुनिक सोच के बीच की कड़ियों को जोड़कर शायद पानी के जन्म की कहानी की गुत्थियों को समझने तथा सुलझाने में मदद मिल सकती है। भारतीय वैज्ञानिकों को इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

जल के महत्व पर महात्मा गांधी का विचार

gandhi-2011-4-1.jpgकिसी भी वस्तु का आवश्यकता से अधिक उपयोग करना वे उचित नहीं समझते थे। आश्रमवासी कार्यकर्ताओं के द्वारा थोड़ा भी जल का अपव्यय उन्हें सहन नहीं होता था। एक लोटे पानी से कुल्ला करने तथा हाथ-मुंह धोने का काम पूरा कर लेते थे। एक दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू आश्रम में उनस मिलने आये। उनसे वार्तालाप करते समय गांधीजी से कुल्ले में अधिक पानी का उपयोग हो गया। उन्होंने पंडितजी के समक्ष इसका अफसोस प्रकट किया। पंडितजी ने कहा-‘आश्रम के पास नदी बह रही है। आप इतने से पानी के लिए क्या विचार करते हैं?’ गांधीजी ने कहा-‘देश में पानी की बहुत समस्या है, हमें एक-एक बूंद का उपयोग सावधानी से करना चाहिए। यह नदी मेरे लिए ही नहीं बहती, समस्त देशवासियों को इसके पानी पर अधिकार है।’ पंडित गांधीजी के इन विचारों से बहुत प्रभावित हुए। 

संत कबीरदास ने पानी के महत्व पर कई दोहे लिखे

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होये

जैसा पानी पीजिये तैसी बानी सोये।

अर्थ: तामसी भोजन से मन भी तामसी और सात्विक भोजन से मन भी सात्विक हो जाता है। स्वच्छ और शीतल जल पीने से बोली-वाणी भी पवित्र और शीतल हो जाता है।

स्वामी है संग्रह करै, दुजै दिन का नीर

तारै ना तरै और को, यो कथि कहै कबीर।

अर्थ: कबीर कहते हैं जो संत दूसरे दिन के लिये भी जल का संगंह करता है वह न तो स्वंय मुक्ति पा सकता है और नहीं अन्यों को इस भवसागर से मुक्त कर सकता है।

जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।

मैं बौरी ढूंढन गई, रही किनारे बैठ।।

अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छबाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करता सुभाय।।

अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

रहीम दास ने भी पानी के महत्व पर कई दोहे लिखे

रहिमन पानी राखिए, बिना पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती-मानुस-चुन।।

अर्थ : इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है. पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब इज्जत से है. रहीम कह रहे हैं कि मनुष्य में हमेशा इज्जत (पानी) से रहना चाहिए. पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज या चमक से है जिसके बिना मोती का कोई मूल्य नहीं. पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे (चून) से जोड़कर दर्शाया गया है. रहीम का कहना है कि जिस तरह आटा पानी के बिना काम नहीं आ सकता और मोती का मूल्य उसकी आभा के बिना नहीं हो सकता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा इज्जत से रहना चाहिए, जिसके बिना उसका कोई मूल्य नहीं होता है.

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।

कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥2॥

अर्थ: वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं और सरोवर भी अपना पानी स्वयं नहीं पीती है। इसी तरह अच्छे और सज्जन व्यक्ति वो हैं जो दूसरों के कार्य के लिए संपत्ति को संचित करते हैं।

एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।

रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥15॥

अर्थ: एक को साधने से सब सधते हैं। सब को साधने से सभी के जाने की आशंका रहती है। वैसे ही जैसे किसी पौधे के जड़ मात्र को सींचने से फूल और फल सभी को पानी प्राप्त हो जाता है और उन्हंव अलग-अलग सींचने की जरूरत नहीं होती है।

जाल परे जल जात बहि तजि मीनन को मोह

रहिमन मछरी नीर को तउ न छाॅड़ति छोह ।

अर्थ: पानी में जाल डालते ही फंसी मछली का मोह छोड़कर सब पानी बह जाता है। लेकिन तब भी मछली जल का मोह नही छोड़ती और दुख में जान दे देती है। 

जल पर कविताएं

जल ही जीवन है… शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

जल ही जीवन है

जल से हुआ सृष्टि का उद्भव जल ही प्रलय घन है

जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है।।

शीत स्पर्शी शुचि सुख सर्वस

गन्ध रहित युत शब्द रूप रस

निराकार जल ठोस गैस द्रव

त्रिगुणात्मक है सत्व रज तमस

सुखद स्पर्श सुस्वाद मधुर ध्वनि दिव्य सुदर्शन है ।

जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है ।।

भूतल में जल सागर गहरा

पर्वत पर हिम बनकर ठहरा

बन कर मेघ वायु मण्डल में

घूम घूम कर देता पहरा

पानी बिन सब सून जगत में ,यह अनुपम धन है ।

जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है ।।

नदी नहर नल झील सरोवर

वापी कूप कुण्ड नद निर्झर

सर्वोत्तम सौन्दर्य प्रकृति का

कल-कल ध्वनि संगीत मनोहर

जल से अन्न पत्र फल पुष्पित सुन्दर उपवन है ।

जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है ।।

बादल अमृत-सा जल लाता

अपने घर आँगन बरसाता

करते नहीं संग्रहण उसका

तब बह॰बहकर प्रलय मचाता

त्राहि-त्राहि करता फिरता, कितना मूरख मन है ।

जल पीकर जीते सब प्राणी जल ही जीवन है ।।

नदी को बोलने दो… रत्नाकर दीक्षित

नदी को बोलने दो

शब्द स्वरों के खोलने दो

उसकी नीरव निस्तब्धता

एक खतरे का संकेत है

यह इस बात की प‍ुष्टि है

कि नदी हुई समाप्त

शेष रह गई रेत है

बहती हुई नदी

जीवन का प्रमाण है

राष्ट्र का है गौरव

जीवंतता की पहचान है

यह उर्वरता और जीवन

प्रदान करती है

खुद कष्ट सहकर

दूसरों का कष्ट हरती है

यह जीवनदायिनी है

इसे अपने दुष्कर्मों से

न भयभीत करो

यह नीर नहीं संचती है

इसे नाले में न तब्दील करो

तुम्हारे पाप को ढोते-ढोते

वह कुछ थक-सी गई है

ऐसा लग रहा है कि

वह कुछ सहम-सिमट-सी गई है।

नहीं व्यर्थ बहाओ पानी / श्याम सुन्दर अग्रवाल

सदा हमें समझाए नानी,

नहीं व्यर्थ बहाओ पानी ।

हुआ समाप्त अगर धरा से,

मिट जायेगी ये ज़िंदगानी ।

नहीं उगेगा दाना-दुनका,

हो जायेंगे खेत वीरान ।

उपजाऊ जो लगती धरती,

बन जायेगी रेगिस्तान ।

हरी-भरी जहाँ होती धरती,

वहीं आते बादल उपकारी ।

खूब गरजते, खूब चमकते,

और करते वर्षा भारी ।

हरा-भरा रखो इस जग को,

वृक्ष तुम खूब लगाओ ।

पानी है अनमोल रत्न,

तुम एक-एक बूँद बचाओ ।

जल नहीं है / अश्वघोष

अब नदी में जल

नहीं है

पत्थरों पर

लेटकर खामोश,

बादलों का पढ़ रही अफसोस

सत्य है अटकल नहीं है

अब नदी में जल

नहीं है

दूर, कितने

दूर हैं अब तट,

आती नहीं पदचाप की आहट

पक्षियों की भी, कोई

हलचल नहीं है

अब

नदी में

जल नहीं है

पानी की बर्बादी- रवि श्रीवास्तव  

मत करो मुझको बर्बाद, इतना तो तुम रखो याद,

प्यासे ही तुम रह जाओगे, मेरे बिना न जी पाओगे।

कब तक बर्बादी का मेरे, तुम तमाशा देखोगे,

संकट आएगा जब तुम पर, तब मेरे बारे में सोचोगे।

संसार में रहने वालों को, मेरी जरूरत पड़ती है,

मेरी बर्बादी के कारण, मेरी उम्र भी घटती है।

ऐसा न हो इक दिन मैं, इस दुनिया से चला जाऊं,

खत्म हो जाए खेल मेरा, लौट के फिर न वापस आऊं।

पछताओगे-रोओगे तुम, नहीं बनेगी कोई बात,

सोचो-समझो करो फैसला, अब तो ये है तुम्हारे हाथ।

मेरे बिना इस दुनिया में, जीना सबका मुश्किल है,

अपनी नहीं भविष्य की सोचो, भविष्य भी इसमें शामिल है।

मुझे ग्रहण कर सभी जीव, अपनी प्यास बुझाते हैं,

कमी मेरी पड़ गई अगर तो, हर तरफ सूखे पड़ जाते हैं।

सतर्क हो जाओ बात मान लो, मेरी यही कहानी है।

करो फैसला मिलकर आज, मत करो मुझको बर्बाद,

इतना तो तुम रखो याद।

कल का जल… सुशील कुमार शर्मा

जल ही जीवन जल सा जीवन, जल्दी ही जल जाओगे,

अगर न बची जल की बूंदें, कैसे प्यास बुझाओगे।

नाती-पोते खड़े रहेंगे जल, राशन की कतारों में,

पानी पर से बिछेंगी लाशें, लाखों और हजारों में।

रिश्ते-नाते पीछे होंगे, जल की होगी मारामारी,

रुपयों में भी जल न मिलेगा, जल की होगी पहरेदारी।

हनन करेंगे शक्तिशाली, नदियों के अधिकारों का,

सारे जल पर कब्जा होगा, बाहुबली मक्कारों का।

गंगा जल अमृत बन जाएगा… शम्भू नाथ

नदियों के जल जब निर्मल होंगे,

गंगा जल अमृत बन जाएगा।  

जन-जन में जब आस जागेगी,

गंदगी न कोई फैलाएगा।

मुर्दाघाट जब अलग बनेगा,

कोई लाश नहीं दफनाएगा।

स्नान हेतु लोग आया करेंगे,

कर के स्नान चले जाएंगे।

फिर दूषित न हो पाएगा,

सब जल में दीप जलाएंगे।

हर-हर गंगा लोग करेंगे,

फिर वह मौसम आएगा।

जल की कविता / प्रकाश

मैं जल के तल में उतर गया

वहाँ जल नहीं जल का शब्द था

मैं जल के शब्द में उतर गय

वहाँ जल के शब्द में स्वयं जल था !

०००

मैं जल को उसके नाम से पुकारता था

मैं उसके मुख पर जल फेंकता था

जल के चेहरे पर हरक़त होती थी

वह धीरे-धीरे नींद से बाहर निकलता था

मैंने जल को उसके नाम से पुकारता था

उसके प्राण लौटते थे !

०००

मैंने जल को उच्चरित किया

भागकर मेरी जिह्वा पर रस चला आया

मैं रस में डूबा हुआ था

बाहर जल का छिलका पड़ा हुआ था !

०००

मैंने जल में झाँका

वहाँ जल से जल की रोशनी लिपटी हुई थी

मैं एक युगल को अलग-अलग नहीं पुकार सकता था

मैंने आवाज़ दी — ‘जल-रोशनी !’

पानी है धरती की शान -प्रदीप कुमार पटेल

पानी है धरती की शान, पानी बचत हमारा काम

जीवन का ऐसा कोई काज नही,

बिना नीर हो उसका नाम अम्बु है अम्बर तक फैला,

सजते सागर नदी तालाब गीता और कुरान कहे है,

बिन जल बजे न कोई राग धरा में जल का सीमित भंडार,

जल सरंक्षण है हमारी जान बिन जल के समस्त चराचर,

ये दुनिया हो जाती शमशान जल से ही बनता है खून,

बिन जल के न होता शाम पानी है धरती की शान,

पानी बचत हमारा काम बिन पानी सब सून है,

खुद रहीम ने कह डाला जल से ही होती हरियाली,

चले झूम के हस्ती मतवाला फसलें भी चमकती सलिल से,

बसती इसमे सबकी जान पंछी भी कोकिल है मारे,

मछली की है जल में प्रान कोई पेय पीने को तरसे,

किसी की रहती जल में प्रान न करेंगे जल को जाया,

इसकी महत्ता का हो गया है ज्ञान जिस दिन सूखा वारि वसुधा से,

उस दिन आये संकट में प्राण जल से चले हैं सारे उद्योग,

जल से ही होती हमारी आन व्यर्थ करो न जल को तुम,

करो जरूरी अपना काम पानी है धरती की शान,

पानी बचत हमारा काम

जल संरक्षण

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आज जल संरक्षण विश्व की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है… जल संरक्षण हमे घर में, घर के बाहर, बाग बगीचों, खेत-खलिहानों हर जगह करना चाहिये…

छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातेंजिनका ध्यान रखकर बचाया जा सकता है पानी

  • फव्वारे से या नल से नहाने पर लगभग 180 लीटर पानी का प्रयोग होता है जबकि बाल्टी से स्नान करने पर सिर्फ 18 लीटर पानी प्रयोग में आता है। तो हम बाल्टी से स्नान करके प्रतिदिन 162 लीटर पानी की बचत प्रति व्यक्ति के हिसाब से कर सकते हैं।
  • शौचालय में फ्लश टैंक का उपयोग करने में एक बार में 13 लीटर पानी का प्रयोग होता है जबकि यही काम छोटी बाल्टी से किया जाए तो सिर्फ चार लीटर पानी से यह काम हो जाता है ऐसा करके हम हर बार नौ लीटर पानी की बचत कर सकते हैं।
  • काफी लोगों की आदत होती है कि दाढ़ी बनाते वक्त नल को खुला रखते हैं तो ऐसा करके ऐसे लोग 11 लीटर पानी बर्बाद करते हैं जबकि वे यह काम एक मग लेकर करें तो सिर्फ एक लीटर में हो सकता है और प्रतिव्यक्ति 10 लीटर पानी की बचत हो सकती है।
  • दंत मंजन करते वक्त नल खोलकर रखने की आदत से 33 लीटर पानी व्यर्थ बहता है जबकि एक मग में पानी लेकर दंत मंजन किया जाए तो सिर्फ एक लीटर पानी ही खर्च होता है और प्रति व्यक्ति 32 लीटर पानी की बचत प्रतिदिन की जा सकती है।
  • महिलाएं जब घरों में कपड़े धोती हैं तो नल खुला रखना आम बात है ऐसा करते वक्त 166 लीटर पानी बर्बाद होता है जबकि एक बाल्टी में पानी लेकर कपड़े धोने पर 18 लीटर पानी में ही यह काम हो जाता है तो सिर्फ थोड़ी सी सावधानी जिम्मेदारी के साथ रखकर प्रति दिन 148 लीटर पानी प्रतिघर के हिसाब से बचाया जा सकता है।
  • घास के मैदान में बेहिसाब पानी देने में 10 से 12 किलो लीटर पानी काम आता है और इतने पानी से एक छोटे परिवार हेतु एक माह का जल उपलब्ध हो सकता है। तो अब राष्ट्र के प्रति और मानव सभ्यता के प्रति जिम्मेदारी के साथ सोचना आम आदमी को है कि वो कैसे जल बचत में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा सकता है।
  • याद रखें पानी पैदा नहीं किया जा सकता है यह प्राकृतिक संसाधन है जिसकी उत्पत्ति मानव के हाथ में नहीं है। पानी की बूंद-बूंद बचाना समय की मांग है और हमारी वर्तमान सभ्यता की जरूरत भी। हम और आप क्या कर सकते हैं ये आपके और हमारे हाथ में है। समय है कि निकला जा रहा है।

घरेलू जल सरंक्षण

  • दाढ़ी बनाते समय, ब्रश करते समय, सिंक में बर्तन धोते समय, नल तभी खोलें जब सचमुच पानी की ज़रूरत हो।
  • गाड़ी धोते समय पाइप की बजाय बाल्टी व मग का प्रयोग करें, इससे काफी पानी बचता है।
  • नहाते समय शॉवर की बजाय बाल्टी एवं मग का प्रयोग करें,काफी पानी की बचत होगी। इस काम के लिए आप भारत रत्न सचिन तेंदुलकर से प्रेरणा ले सकते हैं जो सिर्फ १ बाल्टी पानी से ही नहाते हैं।
  • वाशिंग मशीन में रोज-रोज थोड़े-थोड़े कपड़े धोने की बजाय कपडे इकट्ठे होने पर ही धोएं।
  • ज्यादा बहाव वाले फ्लश टैंक को कम बहाव वाले फ्लश टैंक में बदलें। सम्भव हो तो दो बटन वाले फ्लश का टैंक खरीदें। यह पेशाब के बाद थोड़ा पानी और शौच के बाद ज्यादा पानी का बहाव देता है।
  • जहाँ कहीं भी नल या पाइप लीक करे तो उसे तुरन्त ठीक करवायें। इसमें काफी पानी को बर्बाद होने से रोका जा सकता है।
  • बर्तन धोते समय भी नल को लगातार खोले रहने की बजाये अगर बाल्टी में पानी भर कर काम किया जाए तो काफी पानी बच सकता है।

घर के बाहर जल संरक्षण

  • सार्वजनिक पार्क, गली, मौहल्ले, अस्पताल, स्कूलों आदि में जहाँ कहीं भी नल की टोंटियाँ खराब हों या पाइप से पानी लीक हो रहा हो तो तुरन्त जलदाय ऑफिस में या सम्बन्धित व्यक्ति को सूचना दें, इसमें हजारों लीटर पानी की बर्बादी रोकी जा सकती है।
  • बाग बगीचों एवं घर के आस पास पौधों में पाइप से पानी देने के बजाय वाटर कैन द्वारा पानी देने से काफी पानी की बचत हो सकती है
  • बाग़ बगीचों में दिन की बजाय रात में पानी देना चाहिये। इससे पानी का वाष्पीकरण नहीं हो पाता। कम पानी से ही सिंचाई हो जाती है
  • सिंचाई क्षेत्र हेतु कृषि के लिये कम लागत की आधुनिक तकनीकों को अपनाना जल सरंक्षण हतु उपयोगी है।

वर्षा का जल संचयन

  • हम लोगों की अकेली यह आदत ही जल संरक्षण हेतु मील का पत्थर साबित हो सकती है। एक बारिश के बाद अगली बारिश से छतों से वर्षा जल का संचय करें। यह पीने, कपड़े धोने, बागवानी आदि सभी कार्यों हेतू उत्तम है। इसके लिये गाँव, शहरों में भवन निर्माण सम्बन्धी नियमों में वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया जाना चाहिये तथा लोगों को वर्षा जल संचय हेतु प्रोत्साहित किये जाने वाले उपाय ढूंढे जाने चाहियें।

जल जागरूकता कार्यक्रम

  • पानी की बर्बादी रोकने, वर्षा जल का संचयन करने, लगातार वृक्षारोपण करने तथा पानी को प्रदुषण से बचाने हेतु लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाते रहना चाहिये और यह प्रयास हम सबको मिलकर करना चाहिए।
  • वृक्ष हमारे अभिन्न मित्र हैं ये हमें छाया,फल,लकड़ी प्रदान करते हैं जमीन का कटाव रोकते हैं, बाढ़ से सुरक्षा करते हैं। जहाँ ज्यादा वृक्ष होते हैं वहां अच्छी बारिश होती है जिससे बारिश में नदी नाले भर जाते हैं और पानी की कमी नहीं हो पाती। इसलिए लगातार वृक्षा रोपण करते रहना चाहिये।

छतों पर लगी टंकियों में वाटर ओवरफ्लो अलार्म लगाएं

  • छतों पर लगी टंकियों से पानी गिरकर बर्वाद होना एक आम दृश्य है। हमें इसे रोकना होगा और इसके लिए सबसे सरल उपाय है कि आप अपनी टंकी को एक water overflow alarm से जोड़ दें। इस बारे में हम डिटेल में अगली पोस्ट में बात करेंगे।

उतना ही पानी लें जितना पीना है

  • जब आप 1 glass RO water पीते हैं तो ध्यान रखिये कि इसे फ़िल्टर करने के प्रोसेस में 3 glass पानी waste किया जाता है। इसलिए जब भी आप गिलास में RO वाटर लें तो पूरा भर के लेने की बजाये उतना ही लें जितना पीना है। और किसी को देना भी हो तो उसे पानी ग्लास में भर कर देने की बजाये जग या water bottle के साथ गिलास दे सकते हैं। इस तरह से काफी पानी बचाया जा सकता है। यदि आप किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं तो सबसे पहले वेटर पानी ला कर रख देता है, तब भी जब आपको उसकी ज़रूरत न हो! इसलिए जब आप ऐसी जगह जाइए तो तभी पानी लीजिये जब वाकई में आपको उसकी need हो।

RO मशीन या AC से निकलने वाले वेस्ट वाटर को उपयोग करें

  • RO मशीन द्वारा लिए गए कुल पानी का 75% हिस्सा वेस्ट  हो जाता है। इसलिए कोशिश करिए कि मशीन की वास्ते पाइप से जो पानी निकला रहा है उसे बकेट में इकठ्ठा कर लिया जाए या पाइप लम्बी करके उसे पौधों को सींचने के काम में लाया जाये। इसी तरह AC से निकलने वाले पानी को भी सही तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।

22 मार्च- विश्व जल दिवस

वैश्विक जल संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लिये 22 मार्च को UN ने विश्व जल दिवस मनाने का फैसला किया गया। 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) में विश्व जल water-conservation1.gifदिवस की पहल की गई थीl इसके परिणामस्वरूप 1993 में 22 मार्च को पहली बार “विश्व जल दिवस” का आयोजन किया गयाl इसके बाद से हर वर्ष लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये 22 मार्च को “विश्व जल दिवस” मनाया जाता हैl

वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये विश्व जल दिवस को सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल से संबंधित मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन भी शामिल है। इस कार्यक्रम की शुरूआत से ही विश्व जल दिवस पर वैश्विक संदेश फैलाने के लिये थीम (विषय) का चुनाव करने के साथ ही विश्व जल दिवस को मनाने की सारी जिम्मेवारी संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण तथा विकास एजेंसी की हैl

विश्व जल दिवस का थीम- संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण तथा विकास एजेंसी द्वारा हर वर्ष विश्व जल दिवस को एक थीम के तहत मनाया जाता हैl वर्ष 2019 के लिए विश्व जल दिवस का थीम “किसी को पीछे नहीं छोड़ना” (Leaving no one behind) घोषित किया गया हैl इस थीम के जरिए यह बताया जा रहा है कि साफ और स्वच्छ जल सभी का अधिकार है, इससे कोई भी वंचित नहीं रहना चाहिए.

पिछले वर्षों में विश्व जल दिवस का थीम

  • 2016 के विश्व जल दिवस का थीम “जल और नौकरियाँ”
  • 2015 के विश्व जल दिवस का थीम “जल और दीर्घकालिक विकास”
  • 2014 के विश्व जल दिवस का थीम “जल और ऊर्जा”
  • 2013 के विश्व जल दिवस का थीम “जल सहयोग”
  • 2012 के विश्व जल दिवस उत्सव का थीम “जल और खाद्य सुरक्षा”
  • 2017 के विश्व जल दिवस उत्सव का थीम “अपशिष्ट जल”
  • 2018 के लिए विश्व जल दिवस का थीम “जल के लिए प्रकृति के आधार पर समाधान”
  • 2019 के लिए विश्व जल दिवस का थीम ‘वाटर फॉर ऑल, लीविंग नो वन बिहाइंड’

जल संरक्षण के ‘सिपाहियों’ की कुछ कहानियां

हजारीबाग (झारखंड)- हजारीबाग के वॉटरमैन ने जल संरक्षण कर बदली गांव की तस्‍वीरपीएम मोदी ने मन की बात‘ में की प्रशंसा… झारखंड के हजारीबाग जिले के लुपुंग पंचायत के मुखिया और वॉटरमैन‘ दिलीप कुमार रविदास की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात‘ कार्यक्रम में जमकर प्रशंसा की। इस तारीफ से उत्‍साहित रविदास को अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा है कि जल संरक्षण के लिए गांव में चलाई गई उनकी मुहिम की पीएम मोदी ने प्रशंसा की। रविदास के प्रयासों की बदौलत एक गांव जो पूरी तरह से सूख गया थाअब बिना डीएम या मुख्‍यमंत्री की मदद के पर्याप्‍त पानी से लबालब हो गया है। 30 वर्षीय किसान ने कहा कि वह भाग्‍य से मुखिया बने थे और यह उनके अजेंडे में नहीं था। गांव में स्‍कूलों और इमारतों के पास 50 सोख्‍ता गड्ढे – रविदास ने हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज से आर्ट्स में ग्रैजुएशन किया है। वह शादीशुदा हैं और दो बच्‍चों के पिता हैं। अपने काम के बारे में रविदास बताते हैं कि अनियमित मौसम की वजह से उनका गांव जल संकट-सिंचाई और घरेलू इस्‍तेमाल से जूझ रहा था। इसका समाधान तलाशने के लिए उन्‍होंने काफी मेहनत की। रविदास ने कहा, ‘मैं टीवी पर कृषि दर्शन प्रोग्राम देख रहा था और मैंने सीखा कि किस तरह से सोख्‍ता गड्ढों के जरिए पानी का संरक्षण किया जा सकता है। यह मुझे काफी पसंद आया। मैंने ग्राम सभा में सोख्‍ता गड्ढों को बनाने का प्रस्‍ताव दिया और लोगों को इसके प्रति शिक्षित और जागरूक किया। आज हमारे गांव में स्‍कूलों और इमारतों के पास 50 सोख्‍ता गड्ढे हैं।

लापोड़िया गांव (जयपुर)- शोध का विषय बनी जल संरक्षण की यह विधिपानी बचाकर दुनियाभर में मिसाल बना राजस्थान का यह गांव राजस्थान में लापोड़िया गांव के लोग इसका प्रमाण हैं। जब पूरा राजस्थान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा होता हैइस गांव में भरपूर पानी होता है। चारों तरफ व्याप्त हरियाली जल संरक्षण की चौका विधि की कहानी बयां कर रही होती है। गुलाबी शहर जयपुर से 90 किमी दूर स्थित लापोड़िया गांव भी चार दशक पहले तक सूखाग्रस्त थालेकिन अब ऐसा नहीं है। वर्ष 1997 से 2007 तक राजस्थान में नौ बार सूखे के हालत बनेलेकिन लापोड़िया गांव में कभी पानी की कमी नहीं हुई। गांव की हर बस्ती में अपना तालाब हैजो पानी से लबालब है। गांव की यह तस्वीर कोई एक दिन में नहीं बनी बल्कि इस बदलाव में लंबा समय लगा। करीब 35 साल पहले गांव के ही 17 वर्षीय लक्ष्मण सिंह ने नवयुवक मंडल’ बनाकर बारिश के पानी की एक-एक बूंद को बचाने की शुरुआत की। आज यह गांव दुनियाभर के लोगों के लिए शोध का विषय बन हुआ है। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने लक्ष्मण सिंह को वर्ष 2007 में जल संरक्षण पुरस्कार प्रदान किया। जयपुर में हुए ब्रिक्स देशों की महिला सांसदों के सम्मेलन में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्र महाजन ने लापोड़िया और लक्ष्मण सिंह की चर्चा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मन की बात’ में जल संरक्षण को लेकर यहां हो रहे कार्यो की चर्चा कर चुके हैं। लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में ग्रामीणों की मेहनत का परिणाम है कि 2000 लोगों की आबादी वाले लापोड़िया की 1400 बीघा जमीन सिंचित होने के साथ ही आसपास के 58 गांवों को पानी मुहैया कराया जा रहा है। हालत यह है कि लापोड़िया से शुरू बदलाव की बयार पूरे प्रदेश में बहने लगी है। पानी बचाने के लिए यहां अपनाई गई चौका विधि का अध्ययन करने के लिए कुछ समय पूर्व इजराइल का प्रतिनिधिमंडल आया था।

पालड़ी गांव (गुड़गांव)-पंचायत की अनोखी पहलवर्षा जल का संचय कर गांव में बना दी मीठे पानी की झील – गुड़गांव में औसतन 600 एमएम से ज्यादा बारिश होती है। फिर भी संचय नहीं होने से\B \Bगिरते भू-जल स्तर से स्थिति काफी विकट हो गई है। पालड़ी गांव में कुछ साल पहले तक पानी खारा होने से पीने योग्य नहीं था। लोगों को चर्म रोग व पेट की समस्या भी होने लगी थी। इसके समाधान के लिए गांव में जोहड़ की खुदाई की गई। पंचायत ने साल्हावास नहर से भूमिगत पाइपलाइन बिछवाईं और नहर से जोहड़ को जोड़कर पानी से भर दिया गया। साथ ही बरसात के पानी को भी इसमें इकट्ठा किया गया। 3-4 वर्षों में हालात बदले और अब भूमिगत जलस्तर बढ़ गया है व पानी पीने योग्य मीठा हो गया। जल संचय के लिए कुछ और भी सुझाव हैंजिन्हें अपनाने के लिए सभी को आगे आना होगा।

फरीदाबाद (Sec-15)- स्थानीय लोगों की कोशिश रंग लाई और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के प्रयासों से भूजल स्तर बढ़ा… डार्क जोन में तब्दील हो चुके फरीदाबाद को फिर से गुलजार करने व भूजल स्तर बढ़ाने के लिए जहां शहर के कुछ लोग सराहनीय प्रयास कर रहे हैंवहीं सेक्टर-15 में कुछ लोगों ने अपने स्तर पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बना रखा है। इससे भूजल स्तर तो बढ़ ही रहा हैसाथ ही गली में जलभराव की समस्या भी नहीं होती है। जलभराव के बाद आया आइडिया सेक्टर-15 के मकान नंबर 876 में रहने वाले हर्ष रामपाल ने बताया कि उनकी गली में 10 से 12 मकान हैं। गली में बरसात के दिनों में घुटनों तक पानी जमा हो जाता था। धीरे-धीरे बरसात का पानी सीवर लाइन के माध्यम से निकल जाता था। यह देखने के बाद उन्हें रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाने का विचार आया। इसके लिए गली में ही छोटी-छोटी नालियों का निर्माण कराने का प्लान बनाया गया। उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया और पैसा जमाकर वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तैयार किया। सेक्टर के आर्किटेक्ट ने तैयार किया मॉडल हर्ष रामपाल ने बताया कि सबसे अहम बात यह थी कि हार्वेस्टिंग सिस्टम ऐसा बने जिसमें बरसात का पानी आसानी से चला जाए।

मोगा (पंजाब) का गांव निहाल सिंह वाला में आकर योजनाबद्ध तरीके से बसाए गए किसी आधुनिक शहर का अहसास होता है। नालियांपार्कपेड़ पौधे और इंटरलॉक टाइलों से सजी गलियां और संस्कृति की झांकी दिखाती पेंटिंग और मूर्तियां। लेकिन सबसे अनोखा है गांव का अपना सीवरेज सिस्टम। दिलचस्प बात है कि गांव के नौजवान सरपंच मिंटू रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात सुनकर इतने प्रभावित हुए कि गांव की तस्वीर बदल डाली। गांव में रोज 4 लाख लीटर पानी रिसाइकल किया जाता है। गंदे पानी को नालियों के जरिए तीन कुंओं और तीन तालाबों वाले ट्रीटमेंट प्लांट में लाया जाता है। यहां पानी से गाद हटाने और उसे फिल्टर करने के बाद खेतों तक पहुंचाया जाता है और इसी पानी से 100 एकड़ में खेती की जाती है। ये पूरा सिस्टम बनाने में गांववालों ने खुद मेहनत-मजदूरी की। करीब 5 करोड़ का खर्च आया जिसमें से 80 फीसदी पैसा खुद गांव वालों ने जुटाया और 20 फीसदी पैसा पंचायत को मिले सरकारी फंड से लिया गया। अब ट्रीटमेंट प्लांट के पास ही गांव वाले करीब एकड़ जमीन पर एक झील बना रहे हैं ताकि बारिश का पानी जमा किया जा सके।

लोहाघाट (चंपावत)उत्तराखण्ड- रिटायर्ड फौजी की सोच ने बदल डाली सूखे‘ गांव की तस्वीर- चंपावत की पाटी विकासखंड का तोली गांव। अब से करीब ढाई दशक पहले तक इस गांव की कहानी भी पानी के लिए तरसते गांवों जैसी थीलेकिन एक रिटायर्ड फौजी की सोच ने गांव की तस्वीर बदल डाली। जल संकट ही दूर नहीं हुआतोली की पहचान मछलीपालक गांव रूप में हो गई। कामयाबी के झंडे गाड़ने के बाद अब वे दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। तोली के रिटायर्ड सूबेदार कृष्णानंद गहतोड़ी (68) को 1990 तक पानी के लिए 700 मीटर से एक किमी दूर स्रोत तक जाना पड़ता था। इस दिक्कत ने उन्हें फौज में तैनाती के दौरान सिक्किम में प्लास्टिक पाइप के उपयोग की याद दिला दी। उनके जेहन में एकाएक यह आइडिया आया। प्लास्टिक के पाइप से पानी को आंगन तक पहुंचाया। अब संकट पानी का नहींबल्कि पानी को बर्बाद होने से बचाने का था। जल संचय की इसी थीम ने उन्हें मत्स्यपालक बना डाला। उन्होंने खेत में गड्ढा खोदा और नदी की मछलियों को पानी में डाल दिया। 1990 के दौरान पिथौरागढ़ के तत्कालीन डीएम क्षेत्र भ्रमण करते हुए तोली पहुंचे। मछली तालाब देख उन्होंने कृष्णानंद का उत्साह बढ़ाया और वैज्ञानिकों की टीम को गांव में भेजकर उन्नत प्रजाति का मछली बीज उपलब्ध कराया।

माहुर गांव, पुणे- पानी पंचायत” ने बदल दी तस्वीर और तकदीर महाराष्ट्र के पुणे जिले की पुरन्दर तहसील का एक गाँव है -माहुर। झुलसा देने वाले सूखे से त्रस्त इस जिले में चारों तरफ़ हरियाली की चादर वाला माहुर नामक यह गाँव एक प्रकार से रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा ही लगता है। पास की छोटी सी पहाड़ी पर खड़े होकर देखें तो पूरा का पूरा क्षेत्र मानो हरा-भरा मैदान ही लगता है। इसी पहाड़ी के सबसे शुरुआती पायदान पर स्थित है एक छोटा सा तालाबइसी तालाब में वर्षा का अमूल्य जल संग्रहीत किया जाता हैया कहें कि एक तरह से पानी की खेती” करता है यह अनूठा गाँव। इस चमत्कार के पीछे जिस व्यक्ति का सबसे बड़ा हाथ हैउनका नाम है विलासराव सालुंखे। अपने तकनीकी कौशलइंजीनियरी दिमाग और गाँववासियों की भलाई के जज़्बे ने उन्हें इस जल योजना” का अगुआ बनने की प्रेरणा दी।

केरडारी लोचर गांव (हजारीबाग)- मीनू महतो की मेहनत ने बदल दी गांव की तस्वीरबंजर ज़मींन हरियाली से लहलहाया- पनपते हैं पौधे भी जब सूखे रगिस्तान मेंबंजर में भी उपज सकता है सोना जो इरादे हों इंसान में..। इसे हकीकत में अंजाम दिया है हजारीबाग स्थित केरडारी लोचर गांव के किसान मीनू महतो ने। आज वह सूबे के किसानों के लिये आदर्श हैं तो यूं हीं नहीं!. सदियों से झारखंड के किसानों की नियति मानसून तय करता रहा। बामुश्किल एक फसल के लिये भी वह आकाश की ओर तकते थे। मीनू ने इस मिथक को तोड़ डाला। अमूमन जहां झाारखंडी किसान र्का में डूबे रहते हैंमीनू के बच्चे इंजनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैँ। मेहनत और थोड़ी सूझ-बूझ से जिंदगी ठाठ से गुजर रही है। मीनू का बचपन भी गोरबत में गुजरा। दो जून की रोटी मुश्किल थी। पढाई छोड़ना पड़ा। लेकिन आज यह बदलावइसका श्रेय वह देते हैं रडियो के खेतीबारी कार्यक्रम को। पहले अपने बंजर खेतों को सीढ़ीनुमा बनाया। फिर थोड़ी मगजमारी कर दो किलोमीटर तक सिंचाई के लिये बना डाला लिफ्ट एरिगेशन टावर सिस्टम। आज मीनू के खेत यूं लहलहाते हैं जसे उगलता सोना।इसके अलावा वह एक एकड़ जमीन में तरबूजदलहनतेलहन के साथ टमाटरबैंगनगोभीनींबू आदि सब्जियां उपजाते हैं। केवल सब्जियों से सालाना ढ़ाई से तीन लाख की आमद है। किसान मीनू को राज्य सरकार ने सर्वश्रेष्ठ कृषक पुरस्कार से नवाजा है।मीनू कहते हैं कि रोटी की जुगाड़ में मुंबई जाकर जान गंवाने की क्या जरूरत हैहम अपने घर में खेती कर जीविकोपार्जन कर सकते हैं।

जखनी गांव (बाँदा) पानी के लिए हाहकारलेकिन सूखे बुंदेलखंड के इस जलग्राम ने निकाला समाधान- बुंदेलखंड पानी के लिए तरस रहा हैलेकिन इस गांव में पानी ही पानी है। जखनी गांव (बाँदा) में 32 कुएं हैं। जिनमें पर्याप्त पानी है। यहां 25 हैंडपंप हैं। साथ हीयहां 6 तालाब हैंजिनमें से 4 में लबालब पानी है। बाकी 2 में इस समय साफ सफाई का काम किया जा रहा है। जखनी में जल के ये सोते जून के तपते महीने में भी पानी से लबालब भरे हुए हैं। पानी को बर्बाद होने से बचाने का विचार यहाँ के लोगों के मन में लगभग 8 साल पहले आयाऔर इस मुहिम की शुरुआत हुईसर्वोदय आदर्श जल ग्राम स्वराज अभियान समिति’ के गठन से। समिति के संयोजन उमाशंकर पांडेय के अनुसार गाँव के घरों से निकलने वाले और हैण्डपंपों से नालियों में बहने वाला पानी बर्बाद न होइसके लिए इन्होंने इस पानी को खेतों की तरफ मोड़ दिया। इसके पीछे सोच यह थी कि गांव का पानी गांव में ही रहना चाहिएजिसके बाद यह बिना खर्च के सिंचाई का उत्तम साधन बन गया। इसके जरिए न सिर्फ खेतों में सब्जियों की पैदावार में बढ़ोत्तरी हुईबल्कि सब्जियां बेच कर लोगों ने पैसे कमाने भी शुरू कर दिए। इनके प्रयास को देखते हुए जखनी गांव को जलग्राम का नाम दिया गया है।

Bundelkhand Jal Saheli Manch- बुन्देलखण्ड के हमीरपुर ,जालौनललितपुर के 100 गांव की घूंघट में रहने वाली जल सहेलियों ने बदल दी तस्वीर… लगातार सूखे के कारण पलायन की त्रासदी झेल रहे बुंदेलखंड को महिलाओं का समूह जल सहेली’ पानीदार बनाने में जुटा हुआ है। 400 सदस्यों वाला जल सहेली समूह उत्तर प्रदेश के झांसीललितपुरहमीरपुरजालौन और मध्य प्रदेश के टीकमगढ़छतरपुर जिलों के 100 से ज्यादा गांवों में पानी बचाने और उसे संरक्षित करने की मुहिम चला चला रहा है। इन्हीं जिलों में पानी की स्थिति सबसे चिंताजनक है। जल सहेलियों ने इन जिलों में अब तक 25 से ज्यादा तालाबों को संवारा और उनमें दोबारा पानी लाने में सफल रहीं। हमीरपुरजालौन और ललितपुर की 60 ग्राम पंचायतों की जल सहेलियों ने तस्वीर ही बदल दी है। वहांइन्होंने हैंडपंप सुधरवाकरपानी की टंकी बनवाकरपाइपलाइन डलवाकर और अन्य उपाय कर पीने के पानी की समस्या हल करवाई है। अब ये जल सहेलियां ललितपुरहमीरपुर और टीकमगढ़ के 50 तालाबों का जनसहयोग से गहरीकरण कर रही हैं। लक्ष्य है कि आगामी बारिश में ये पानी से लबालब हो जाएं। जल सहेली समूह ने भोपाल में जल पंचायत में चंदेलकालीन तालाबों के गहरीकरण और उन्हें संवारने की जिम्मेदारी देने का आग्रह किया है। हालांकि इस पर फैसला बाकी है।

छतरपुर (मध्‍यप्रदेश)– ‘हरितिका‘ NGO ने छतरपुर के पटना गांव के निवासियों की बदल दी जिंदगी… बुंदेलखंड और मध्‍यप्रदेश के ज्‍यादातर इलाके पानी की किल्‍लत से जूझ रहे हैंलेकिन एक एनजीओ के प्रयास से मध्य प्रदेश के छतरपुर में पटना गांव के निवासियों को अब पानी की समस्‍या नहीं होती। पहले इस गांव के लोगों को पानी के लिए कई-कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी। लेकिन अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। यहां बने एक चेक डैम ने लोगों की पानी की किल्‍लत को दूर कर दिया है। कोकाकोला इंडिया फाउंडेशन के प्रोग्राम मैनेजर हिमांशु थपलियाल बताते हैं कि खुजराहो से 80 किलोमीटर दूर स्थित पटना गांव में एक चेक डैम बनने से सारी समस्‍या खत्‍म हो गई। उन्‍होंने बताया कि यह हरितिका‘ NGO का काम हैजिसे उनके फाउंडेशन ने आर्थिक मदद की है। उन्‍होंने बताया कि इस प्रॉजेक्ट के तहत एक चेक डैम, 15 सोलर लाइट्स, 1,300 मीटर की पक्की सड़क और पीने के पानी के लिए एक तालाब के सुधार का काम किया गया है।

सहसिया हुसैनपुर गांव (बरेली)– गांव को जिंदगी देने के लिए सूखे तालाब को लोगों ने किया जिंदा- पानी की जरूरत ने बरेली के सहसिया हुसैनपुर के लोगों को इतना जिम्मेदार बना दिया कि उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के एक सूख चुके तालाब को जिंदा कर दिया। करीब 500 मीटर के इस सूखे गड्ढे में तब्दील तालाब को ग्रामीणों ने दस मीटर लंबे और दस मीटर गहराई तक खोद कर लबालब कर दिया है। सरकारी विभाग के मुताबिक 6000 से अधिक तालाब वाले बरेली जिले का यह तालाब स्थानीय जिला प्रशासन की सूची में नहीं है। इसलिए यहां प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं की गई। गांववालों के श्रमदान से अब इस तालाब में आसपास के खेतों का पानी जाता है और बारिश का भी पानी इकट्ठा होता है। जब बारिश से अच्छी मात्रा में पानी भर जाता है तो इसका उपयोग ग्रामीण सिंचाई के लिए भी करते हैं। बरेली जिले में यही एक तालाब है जो लोगों के श्रमदान से लबालब है। बरेली शहर से आठ किलोमीटर दूर इस गांव के लोगों को एकजुट कर रहे हैं राजनारायण गुप्ता। बरेली जिले के सहसिया हुसैनपुर गांव के राजनारायण बताते हैं कि 40 दिन तालाब को खोदने के लिए काम किया गया थाजिसमें गांव के सौ से अधिक लोग जुटे थे। पहले कठोर मिट्टी को गीला करने के लिए बारिश का इंतजार किया गया और फिर फावड़े और कुदाल लेकर लोगों ने कायाकल्प कर दिया। इस गांव में दो सरकारी तालाब हैं लेकिन वहां इतना पानी नहीं है।

रालेगण सिद्धिे (महाराष्ट्र)- 1980 के हालात: 1,700 एकड़ भूमि में से सिर्फ 80 एकड़ भूमि पर सिंचाई संभव थी। पुरुष ईंट-भट्ठों में काम करने बाहर जाते थे। जो गांव में थे वे अवैध शराब बनाकर परिवार का पेट पालते थे। परिवार दिनोंदिन कर्ज में डूब रहे थे। शिशु मृत्यु दर अधिक थी।समाजसेवी अन्ना हजारे ने 18 साल पहले गांव में वर्षा जल संचयन की शुरुआत की। तालाबचेक डैम और कुएं बनाए गए। आज 1200 एकड़ कृषि भूमि सिंचाई योग्य हो गई है। किसान 60 लाख रुपये कीमत की तीन फसल प्रति वर्ष उगा रहे हैं। सब्जीराशन और दूध भी बेच रहे हैं। गांव में चार लाख पौधरोपण हुआ। गांव में शराबबंदी हो गई है। गांव के बच्चे तालाबों में तैराकी सीखकर राज्य स्तरीय पुरस्कार जीत रहे हैं।

राज समधियालो राजकोटगुजरात- 1985 के हालात: भूजल स्तर घटकर 250 मीटर तक पहुंच गया था। डिस्ट्रिक्ट रूरल डेवलपमेंट अथॉरिटी कार्यक्रम से प्राप्त धन से ग्रामीणों ने करीब दो हजार हेक्टेयर भूमि पर 45 चेक डैम बनाए और 35 हजार पौधे रोपे। 2001 में गांव की आय 4.5 करोड़ हो गई। एक ही ऋतु में तीन फसलें उगने लगीं। इससे लोगों की आय में तेज इजाफा हुआ 2003 में तो एक बूंद बारिश नहीं हुईफिर भी भूजल स्तर बढ़कर 15 मीटर तक आ गया था। 1985 में मीठे पानी के बारहमासी कुएं दो थे जो 2002 में 14 हो गए। 1985 की तुलना में प्रति हेक्टेयर औसत आय 4,600 से बढ़कर 2002 में 31 हजार हो गई। गुजरात के इस गांव ने पानी और पर्यावरण के बूते इस मुकाम को हासिल किया।

माहुदी दाहोदगुजरात- 1999 से पहले के हालात: गांव विकट जल संकट से जूझ रहा था। ग्रामीणों ने स्थानीय मचान नदी के मुहाने के आसपास बड़ी संख्या में चेक डैम बनाए। सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था की। सैकड़ों पौधे लगाए। वार्षिक कृषि उत्पादन 900 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर चार हजार क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया। साल में तीन फसलें उग रही हैं। पलायन घटापीने का स्वच्छ जल मिला। 1999 में सालाना औसत आय 35 हजार से ऊपर पहुंच गई। घर-घर में नल प्रणाली के जरिये पानी पहुंचाया गया। चारा बढ़ा तो दुग्ध उत्पादन बढ़ा।

कच्छगुजरात- 2000 से पहले के हालात: पानी संकट से खेती में बाधा उत्पन्न होती थी। ग्रामीणों ने पांच बड़े चेक डैम72 छोटे चेक डैम और 72 छोटे-बड़े नालों का निर्माण किया। इससे 2001 में जब 165 मिमी वर्षा हुई तब भी गांव के तालाबों और अन्य जल स्रोतों में पानी उचित मात्रा में मौजूद था। कुओं से ग्रामीणों को पानी नलों के जरिये मिलने लगा। किसान गेहूंप्याज और जीरे जैसी नई फसलें उगाने लगे। रोजगार बढ़ा। बैंक से लोन लेकर ग्रामीणों ने एक बांध बनाया।

डेरवाड़ी गांव अहमद नगरमहाराष्ट्र- 1996 के हालात: सूखा प्रभावित गांव में पीने और सिंचाई का पानी मिलने की संभावना कम थी। ठीकठाक बारिश के बावजूद कृषि उत्पादन काफी कम था। ग्रामीणों ने वन विभाग से प्रतिबंधित वन क्षेत्र में खेती करने की अनुमति ली। उन्होंने रिज टू वैली अवधारणा पर काम किया। किसानों को पानी मिलने लगाजिससे वे विभिन्न फसलें उगाने लगे। रोजगार बढ़ाडेयरीनर्सरीपॉल्ट्री क्षेत्र में विकास हुआ गांव में महिला सहायता समूह बने।

पाटन (गुजरात)- खारे पानी में जगी मीठी आस– उत्तरी गुजरात के पाटन जिले में सालाना बारिश 650 मिलीमीटर यानी 25 इंच से भी कम होती है। जब बारिश होती है तो नमकीन मिट्टी के कारण पानी जमीन में उतर नहीं पाता। सालभर किसान तालचैक डैम और नहरों के जरिए सिंचाई करते हैंलेकिन यह पर्याप्त नहीं होती। ऐसे में अहमदाबाद के इनोवेटर बिप्लब केतन पाॅल ने यहां वर्षा जल संचय का तरीका भूंगरू’ लागू किया। इसमें कंक्रीट का घेरा बनाकर जमीन में 8 फीट का पाइप उतारा जाता है। सारा पानी इकट्ठा होकर इससे होता हुआ जमीन में चला जाता है। इस काम से महिलाओं को भी जोड़ा गया है ताकि वे भुंगरू’ का प्रबंधन करती रहें

कंडवांचीजालना (मराठवाड़ा)- पानीदार गांव की कहानी– महाराष्ट्र का मराठवाड़ा पानी की कमी के कारण पूरे देश में सुर्खियों में रहता है। इस इलाके में जालना जिले में एक गांव है कंडवांची। इस गांव ने पानी को बचाने की तैयारी वर्ष 2000 से भी पहले शुरू कर दी थी। 1995-96 में कृषि विज्ञान केंद्रजालना द्वारा कुछ काम हुए थे। इस गांव ने उन कामों के मर्म को समझा और खाली जमीनों पर जल संरचनाएं बनाईं। बीते 15-20 वर्ष में गांव के लोगों ने चैक डैम बनाए और 347 तालाबों की खुदाई की। 40 नए तालाब भी जोड़े ताकि पानी की एक बूंद भी व्यर्थ न जाए। गांव में अब अंगूर की खेती तक होती है। जिले का नंदापुर और वाघरूल भी ऐसा ही गांव है।

 

सूरत (गुजरात)- सूरत के पर्यावरण प्रेमी दर्शन देसाई ने 25 साल पहले ही बारिश के पानी का संग्रह करना शुरू कर दिया था। साथ ही अपनी पूरी सोसायटी को भी पानी संग्रह करने के लिए जागरूक किया। भटार स्थित परिमल संकुल निवासी दर्शन देसाई शहर में प्रयास नामक संस्था चलाते हैं। यह संस्थान प्राणी और पक्षिओं के लिए कार्य करती है। पशु-पक्षियों को बचाने वाले दर्शन पानी को भी बचाने का प्रयास कर रहे हैं। आज से 25 साल पहले दर्शन ने अपने घर में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित किया। इसको लगाने में दर्शन को 15 हजार का खर्च आया। इस प्रणाली से बारिश का पानी घर में जमा होता है। इसी पानी को पूरे साल तक घर के उपयोग में लाया जाता है। इसके लिए इसमें दो फिल्टर लगाए गए हैं। इनकी सहायता से पानी साफ होकर घर के उपयोग में लिया जाता है।

दर्शन मात्र खुद ही बारिश के पानी का संचय नहीं करते है बल्कि उन्होंने अपनी सोसायटी के लोगो को भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने के लिए जागरूक किया। दर्शन की सोसायटी के ज्यादातर लोगों ने इस प्रणाली को अपने घर में लगाया है। आज सभी इस प्रणाली की सहायता से बारिश का पानी जमा करते हैं और उसे वापस पुन: उपयोग में ले रहे हैं। दर्शन पानी बचाने के लिए प्रेरणा बने हैं।

5 Water Warriors of India

1. Amla Ruia:

Amla Ruia, a Mumbai-based social activist, has transformed many lives in over 100 villages in Rajasthan by using traditional water harvesting techniques and building check dams. With a view towards creating a sustainable and permanent solution for conserving water in drought hit regions of Rajasthan, she founded Aakar Charitable Trust. Up until now, the Trust has helped in the construction of 200 check dams in 100 villages of Rajasthan, and impacted over 2 lakh people who earn a combined income of Rs. 300 crore every year.

एक महिला ने बदल दी राजस्थान के 100 गांवों की किस्मत एक महिला ने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से चेक डैम बनाकर राजस्थान के 100 गांवों की तस्वीर बदल दी है। सूखे से परेशान गांव के 2 लाख लोगों को डैम बनने के बाद पानी मिलने लगा है।

  • अखबार में खबर पढ़कर आई थीं गांव– इस बदलाव की वजह से गांव वालों की लाइफ नए ट्रैक पर आ गई है। आज सभी गांवों की कुल सालाना आय करीब 300 करोड़ रुपए से ज्यादा तक है। यह कारनामा किया है मुंबई की रहने वाली सोशल वर्कर अमला रुइया ने। 1999-2000 में सूखे से परेशान राजस्थान के गांवों की खबर पढ़कर वे यहां आ गईं और अपनी चैरिटेबल ट्रस्ट की मदद से डैम बनाया। पानी मिलने के बाद अब यहां के किसान एक साल में तीन-तीन फसल उगाने लगे और घरों में पशुपालन का काम-धंधा शुरू कर दिया।
  • अब तक 100 गांवों में बनवा चुकी हैं 200 डैम– रुइया ने अपना पहला प्रोजेक्ट मंदवार गांव में शुरू किया था। यहां उनके ट्रस्ट की ओर से बनाए गए दो डैम से किसानों की आय एक साल में करीब 12 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। इसके बाद वे राजस्थान के 100 गांवों में 200 डैम बनवा चुकी हैं। अमला का कहना है कि डैम में जमा पानी का इस्तेमाल खेती के लिए होता है। किसान अब एक साल में तीन फसलों की खेती करते हैं। रुइया का कहना है कि आने वाले समय में वे और उनकी टीम अन्य राज्यों में भी ऐसा ही काम करेगी। उनकी टीम छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भी काम कर रही है। बता दें कि वे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में भी इस तरह का काम कर चुकी हैं।

2. Aabid Surti:

Aabid Surti runs a one-man NGO named the Drop Dead Foundation, which is saving tonnes of water by taking care of plumbing problems such as leaks that cause water wastage in Mumbai households. The 80-year-old does it all for free, with his team of one volunteer and a plumber. In 2007, the first year of the Foundation’s existence, Aabid visited 1666 houses on Mira Road, fixed 414 leaking taps free of charge, and saved about 4.14 lakh litres of water. His work has now inspired other people across the country to take up his example and help save water in their cities.

जिंदगी के लिए पानी की बूंद-बूंद बचाता है ये 80 साल का बुजुर्ग

हर रविवार की सुबह 84 साल के एक नौजवान मुंबई के उपनगर मीरा रोड की सड़कों पर निकलते हैं। जब लोग छुट्टी के आलस में होते हैंतब वह किसी सोसायटी में घुसकर हर फ्लैट की घंटी बजाते हैं। उनके साथ एक प्लंबर और एक वॉलंटियर होता है। वह हर फ्लैट के नल चेक करके उनकी मरम्मत कराते हैं। इस तरह बूंद-बूंद टपकता पानी बचाकर उन्होंने पिछले 12 साल में करीब 3 करोड़ लीटर पानी को बर्बाद होने से बचाया है। वह शख्स हैं आबिद सुरती। लेखकनाटककारपटकथाकारकार्टूनिस्टचित्रकारपत्रकार और पर्यावरणविद आबिद सुरती। वह 80 साल की उम्र तक 80 किताबें लिख चुके हैं। उन्होंने भारत को पहला सुपर हीरो बहादुर दिया और लाखों-करोड़ों लोगों की होठों पर मुस्कान लाने वाला किरादार ढब्बूजी भी रचा।

12 साल पहले शुरू हुआ अभियान – 12 साल पहले की बात है। आबिद अपने दोस्त के घर गएतो वहां एक नल से पानी टपकता देखा। उन्होंने अंदाजा लगाया कि एक महीने में एक हजार लीट पानी इसी टप-टप में बह जाता होगा। बस उसी दिन ठान लिया कि यह टप-टप रोकनी है। आबिद कहते हैं, ‘मैं बेहद मामूली जगहों पर रहा हूं। वहां मैंने जरा से पानी पर लोगों को किट-किट करते देखा है। इसलिए मैं पानी बचाने में जुट गया।‘ उनका कहना है, ‘मैं गंगा को तो नहीं बचा सकतालेकिन पानी की बर्बादी तो रोक ही सकता हूं।

मुफ्त में करते हैं नल ठीक – आबिद ने मुहिम शुरू करने के लिए एक बूढ़े प्लंबर से पूछा था, ‘मैं हर रविवार को तीन घंटे तक लोगों के घर जाकर उनके नल मुफ्त में दुरुस्त कराऊंगा। आप इस काम के कितने पैसे लोगे?’ प्लंबर सिर खुजाते हुए बोला था, ‘जब आप किसी से इस काम के पैसे नहीं लोगेतो मैं आपसे कैसे लूंगा?’ आबिद ने इस काम के लिए वन मैन एनजीओ ड्रॉप डेड फाउंडेशन‘ बनाया। उन्हें उत्तर प्रदेश साहित्य संस्थान का एक लाख रुपये और महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी का 50 हजार रुपये का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिलातो पानी बचाने की मुहिम के लिए पैसों का इंतजाम हो गया। वह रकम खत्म हुईतो अमिताभ बच्चन ने अपने शो आज की रात है जिंदगी‘ में बुलाकर उन्हें 11 लाख रुपये का चेक दिया। इस तरह काम रुकने की कभी नौबत नहीं आई। आबिद बताते हैं, ‘बहुत से लोग मेरे एनजीओ से जुड़ना चाहते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि यह तो वन मैन एनजीओ हैआप भी इसी तरह काम शुरू कर दो। जगह-जगह बहुत से लोग ऐसा करने भी लगे हैं।‘ आबिद की मुहिम की गूंज दुनिया भर में है। आबिद के काम की डॉक्यूमेंट्री फिल्में यूरोपअमेरिकाऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में दिखाई गईंतो वहां से उनके पास बधाई के फोन आने लगे।

3. Ayyappa Masagi:

Ayyappa Masagi has changed the lives of thousands of people by getting them to practise rainwater harvesting and water conservation. This Karnataka resident purchased six acres of land in a village in Gadag, a dry region, where he started planting rubber and coffee to prove that one can grow these crops irrespective of the amount of rain one gets. However, after failing several times and after years of research, he found that recharging borewells and practising non-irrigational agriculture methods could help more. Using these methods, he reaped a good harvest in the two subsequent years and then started spreading the message about these methods in neighbouring areas. Today, Ayyappa has developed thousands of conservation projects across 11 states and has also created over 600 lakes in the country.

वॉटर गांधी से जर्मनजापानीअमेरिकी भी सीख रहे पानी बचाने के उपाय

  • पांच सौ झीलें और एक लाख बोरवेल रिचार्ज करने पर कर्नाटक के गांव गडाग निवासी वॉटर मैजीशियन‘ अयप्पा मसागी लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। उन्हे कर्नाटक के लोग पानी का डॉक्टर‘, ‘वॉटर गांधी‘ भी कहते हैं।
  • दक्षिण के जो भी राज्य अवर्षण और पानी के संकट से जूझ रहे हैंउनमें एक कर्नाटक भी है। उसी कर्नाटक के हैं, ‘पानी का डॉक्टर‘, ‘वॉटर मैजीशियन‘, ‘वॉटर गांधी‘ कहे जाने वाले अयप्पा मसागीजिन्होंने अपने खेत को ही रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब‘ बना दिया। पांच सौ झीलें और एक लाख बोरवेल रिचार्ज करने पर अयप्पा मसागी लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा चुके है।

जन्म उत्तरी कर्नाटक के गडग जिले में एक गरीब किसान परिवार में हुआ। बचपन में अक्सर मैं देखता था कि मेरे पिता खेतों में पानी की कमी से जूझते रहते थे। तभी से मेरा सपना था कि गांवों के विकास के लिए साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करूं। मैंने पिताजी की अनिच्छा के बावजूद मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी कराने के लिए मेरी मां को अपने गहने तक बेचने पड़े। इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करते ही मुझे बंगलूरू के भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) में नौकरी मिल गई। वहां कुछ दिन काम करने के बाद मैं लार्सन ऐंड टूब्रो (एलएंडटी) में आ गया। लेकिन कुछ साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से जल संरक्षण की मुहिम में लग गया। अपने पैतृक गांव गडग में छह एकड़ जमीन खरीद कर मैंने उसे ही रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट लैब‘ बना दिया। उसी दौरान कर्नाटक में सूखा पड़ गया। उसके बाद आई बाढ़ से मेरी सारी फसल खराब हो गई। बाढ़ में फंसने के कारण एक बार तो मुझे पेड़ पर बैठकर रात गुजारनी पड़ी। उस आपदा के दौरान ही मेरे मन में विचार आया कि क्यों न बाढ़ के पानी को जमा करने के उपायों पर कुछ काम किया जाए। इस विचार को जमीन पर उतारने के लिए मैंने अन्ना हजारे और जलपुरुष राजेंद्र सिंह से मुलाकात की। इसके बाद धीरे-धीरे मैंने बोरवेल रिचार्ज की अपनी तकनीक विकसित कर ली। मुझे लगता है कि धरती सबसे बड़ी फिल्टर है। अपने मॉडल के तहत मैं पहले एक बड़े गड्ढे में बड़े पत्थरबजरीरेत और कीचड़ की मदद से एक ढांचा बना देता हूं। जब पानी गिरता है तो यह पानी बजरी और रेत से होता हुआ नीचे तक जाता है। मैं प्रति एकड़ आठ ऐसी संरचना बनाता हूं। इसमें बारिश का पानी जमा होने लगता है। मैं पानी को इकट्ठा करता हूं और उसे जमीन में उतार देता हूं। पानी के गड्ढे में जमा होने के बाद वह रेत और बोल्डर से छनते हुए नीचे चला जाता है जिससे,ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ने लगता है। जब जमीन में पूरी तरह से पानी चला जाता हैतो उस गड्ढे में बुलबुले नजर आने लगते हैं। हमेशा मेरी कोशिश यह रहती है कि जो पानी जमा हो रहा हैवह गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ न जाए

वर्ष 2014 में मैंने आंध्र प्रदेश के सूखा प्रभावित चिलमाचुर में 82 एकड़ बंजर जमीन खरीदी और उसे 37 कंपार्टमेंट में बांटकर पानी से लबालब कर डालासाथ हीपेड़ लगाकर उसे हरा-भरा कर दिया। मैं वॉटर लिटरेसी फाउंडेशन‘ भी चलाता हूंजो वॉटर वॉरियर्स तैयार कराता है। मैं स्कूलों में जाकर बच्चों को पानी के महत्व और उसे बचाने के उपायों के बारे में बताता हूं। मैं लैपटॉप और सीडी लेकर कर्नाटक के गांव-गांव में जाता हूं। इस दौरान किसानों को पानी के प्रति सावधानी बरतने से संबंधित एक बुकलेट भी देता हूं। अब तक तकरीबन 100 से ज्यादा इंटर्न्स मेरे मॉडल की ट्रेनिंग ले चुके हैं। अब तो जर्मनीजापान और अमेरिका के लोग भी मेरे पास पानी बचाने के उपाय सीखने आ रहे हैं। इस तरह मेरे मॉडल से पांच सौ झीलें और एक लाख बोरवेल रिचार्ज हो चुके हैंजिससे लगभग बीस लाख से अधिक लोगों की पानी पर आधारित निर्भरता पूरी हूई है। इसके लिए मुझे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह भी मिली है। पानी को लेकर इतना काम करने के बाद अब सरकार भी मेरे मॉडल की तरफ ध्यान देने लगी है और उसे अन्य जगहों पर लागू करना चाहती है। -विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

4. Rajendra Singh:

Rajendra Singh, popularly known as ‘The Water Man of India,’ has been widely recognised and appreciated for his water restoration efforts in rural India. When Rajendra reached Rajasthan in the year 1959 to set up health centres in the region, he realised that people there needed water more than they needed health care. So he started working with the villagers to build mud dams called johads – a traditional technique of collecting rainwater. Today, after about 20 years of work, there are nearly 8,600 johads and other similar structures that collect water in the state, providing water to over 1,000 villages across Rajasthan.

अलवर (राजस्थान)- इस व्यक्ति की मेहनत से