Posted in Bollywood, News, Personality, Religion, Uncategorized, Yatra

गणेश चतुर्थी विशेष- भारतीय संस्कृति और भगवान गणेश

giphy (2).gif

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

ऊँ गं गणपतये नमो नमः           ऊँ गं गणपतये नमो नमः             ऊँ गं गणपतये नमो नमः

अर्थात्- आपका एक दांत टूटा हुआ है तथा आप की काया विशाल है और आपकी आभा करोड़ सूर्यों के समान है। मेरे कार्यों में आने वाली बाधाओं को सर्वदा दूर करें।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं। एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था। ऋग्वेद में ब्रह्मणस्पति सूक्त में भी गणपति का उल्लेख है-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत्आनशृण्वं नूतिभि: सीडू नादनम्।।

अर्थात्- हे गणपति, तू विद्वानों का विद्वान है, ब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं। आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्री स्कन्दस्वामी अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं-

विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित।

नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते॥

अर्थात्- ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र तथा विष्णु के द्वारा वन्दित है। विघ्नेश गणपति! मन्त्रों के स्वामी ब्रह्मणस्पति! आपको नमस्कार है।

अनेक शास्त्रों में भगवान गणेश के अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। पर ब्रहम गणेश्वर का विशद विवेचन “गणेश-पुराण” में वर्णित है। “पुराण वाङ्‌मय” में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैं। गणेश पुराण के अनुसार गणेश प्रणव रूप में अवस्थित हैं। स्वंय ब्रहमा, विष्णु और शिव उनकी पूजा करते हैं। लिंग पुराण में भगवान गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है। उनकी कृपादृष्टि मात्र से विघ्नों के पर्वत भी धराशायी हो जाते हैं, इसीलिए अनादि काल से किसी भी कार्यारंभ में देवों एवं मानवों के द्वारा उनकी सर्वप्रथम पूजा की जाती है। विद्वानों और पुराणकारों के मत में गणेशजी ही परात्पर ब्रह्म एवं जगदरूप हैं। सगुणोपासना में जिस प्रकार निराकार ब्रह्म अनेक रूपों में अवतरित हुए है। उसी प्रकार उनका एक रूप गजानन का भी है। गणपति गणेश के रूप में वे पार्वती एवं शिव पुत्र है,समस्त देवों द्वारा उन्हें अग्रगण्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं समस्त ग्रन्थों में गणेश की महिमा वर्णित की गई है। हमारे सनातन हिन्दू धर्म के समस्त कार्यों के आरम्भ में श्री गणेश जी के स्मरण, नमनस्तवन और पूजन आदि का विधान है। इसलिये किसी भी कार्य का शुभारम्भ (श्री गणेश) के नामोच्चार से किया जाता हैं। यही नहीं कार्य के आरम्भ के लिए लोक में श्री गणेश यह पर्याय हो चुका हैं। यही नही-

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्”।

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

वास्तव में श्री गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शव इत्यादि देवों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि गणेश शब्द की व्युत्पत्ति-

गणानां जींकजातानाम् ईशः

अर्थात् प्राणिमात्र के स्वामीही गणेश हैं, सृष्टि के आरम्भ में आसुरी शक्तियों द्वारा जो विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कीजाती हैं, उनके निवारण के लिए स्वयं गणपति रूप बनाकर ब्रह्मा जी के सृष्टि कार्य में सहायक होते हैं।

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में जो “गणानां त्वा-” इत्यादि मन्त्रों में गणपति कासुस्पष्ट उल्लेख है, वहीं, ब्रह्मा, विष्णु आदि गणों के अधिपति गणनायक ही परमात्मा कहे गये हैं।

“गणपति” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ- अनादिकाल से ही धर्मप्राण जनता वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है ।’ गणपति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है। ऋग्वेद के मन्त्रों में स्पष्ट रूप से ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित किया गया है अतएव प्रथमपंक्ति का गणपति शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्मणस्पति का अर्थ है – ब्रह्मों कापति ।।

g1

शुक्ल यजुर्वेद के अश्वमेघाध्याय में भी गणपति शब्द आया है- प्रारम्भिक गणराज्यों के गणपतियों के सम्बन्ध में जो भावना थी उसी आधार पर देवमण्डल के गणपतिकी कल्पना की गयी । रूद्र के गणों से गणपति का सम्बन्ध स्वतन्त्र देवता रूप में है ।

g2.png

g3.png

g4.png

गणानां पतिगणपतिः

सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्व ही “गणपति” तत्व है ।

समूहान्य वाचक परिकीर्तिनः 

समूहों का पालन करने वाले परमात्मा को ‘गणपति’ कहते हैं… देवादिकों के पतिको भी गणपति कहते हैं

महतत्व गणनां पतिः गणपतिः 

अथवा

निगुर्ण सगुण ब्रह्मागणाना पतिः गणपति ।

सर्वविध गणों को सत्ता देने वाला जो परमात्मा है वही गणपति है।

श्री गणेश भी भगवान का ही एक विशिष्ट स्वरूप है वे पार्वती शिव के पुत्र के रूप में प्रकट हुये । इनकी उपासना कई प्रकार की है। इनके रूप भी अनेक है रूप के अनुसार नाम भी भिन्न-भिन्न हैं, जैसे- महागणपतिचिन्तामणि गणपतिहरिद्रागणपति इत्यादि ।

पुराणों में गणेश वर्णन

पुराणों में गणपति की उत्पत्ति और उनके विविध गुणों का आश्चर्यजनक रूपकों में अतिरंजित वर्णन है- अधिकांश कथाएँ ब्रह्मवैवर्त पुराण में पाई जाती हैं । गणेश को कहीं केवल पार्वती का ही पुत्र माना गया है ।

  • पुराणों में रूद्र के मरूत आदि असंख्य गण प्रसिद्ध हैं । इनके नायक अथवा पतिको विनायक या गणपतिc884c7cc4b0700c5cd523205fdec8f22 कहते हैं। समस्त देवमण्डल के नायक भी गणपति ही हैं। डा0 सम्पूर्णानन्द ने अपने ग्रन्थों “गणेश” तथा “हिन्दू देवपरिवार का विकास” मेंगणेश को आयोत्तर देवता माना है जिसका प्रवेश और आदर हिन्दू देवमण्डल में हो गया ।अधिकांशतः कहना है कि हिन्दू लघु देव मण्डल, अर्थ देवयोनि तथा भूत-पिशाच परिवार मेंबहुत से आर्योत्तर तत्व मिलते हैं ।
  • “गणेश” नामक ग्रन्थ की विदुषी लेखिका एलिस गेट्टी ने गणेश को द्रविड़ों का स्वतन्त्र स्थानीय देवता कहा है। उस समय न उनकी कोई सुनिर्मित प्रतिमा थी न कोई नाम और न देवालय । वे किसी घने वृक्ष के नीचे या पत्थर के चौरे पर अनगढ शिलाखण्ड के रूप में आदिम गिरिजनों के ग्राम देवता रहे हैं ।
  • ऐसा “गणेश” ग्रन्थ की भूमिका में समाजशास्त्री प्रो0 अल्फ्रेड फाउशर का मत है । इस पूजा शिला को युद्ध प्रयाण से पहले ग्रामवासी योद्धा रूधिर से अभिषिक्त करते थे । गणेश का सिन्दूराभिषेक उसी आदिम परम्परा का नया रूप है ।

गणेश की उत्पत्ति से सम्बन्धित वृतान्त स्कन्द, मत्स्य पुराण एवं सुप्रभेदागम में मिलते हैं । उनका सर्वप्रथम उल्लेख एत्रेय ब्राह्माण में आया है जहाँ उन्हें ब्रह्मा, ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति से पहचाना गया है ।

मत्स्य पुराण में ही (180/66) में एक जगह कहा गया है कि महायक्ष कुबेर ने भी वाराणसी में अपना स्वभाव छोड़ दिया और गणेशत्व पद को प्राप्त हो गये । “मत्स्य पुराण के अनुसार ही शंकर से परिणीत होने के उपरान्त पार्वती को पुत्र पाने की, बल इच्छा हुई । उन्होंने एक गजाकृति पुतले को पुत्रवत पालना आरम्भ कर दिया । एक दिन गंगा में इस पुतले को स्नान कराया । उसके बाद वह लम्बा सजीव शरीर वाला हो  गया । इसी कारण वे गजानन और गांगेय कहलाते हैं ।

वराह–पुराण के अनुसार गणेश की उत्पत्ति विध्न विनाशक के रूप में हुई । भगवान गणेश वेद विहित कर्मों के प्रथम पूज्य देव हैं । एक समय देवता तथा ऋषिगणों के पवित्र कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न होने लगी । तो वे शंकर के पास पहुँचे। वहाँ भगवान रूद्र हँस पड़े तो उनके मुख से एक बालक प्रकट हुआ । उस बालक को पार्वती लगातार देखने लगी तो भगवान भोलेनाथ ने श्राप दिया कि कुमार तुम्हारा मुख हाथी जैसा व पेट लम्बा होगा तथा ,सर्प तुम्हारे यज्ञोपवीत होंगे। क्रोधित शंकर का इस पर भी क्रोध शान्त नहीं हुआ तो उनके शरीर से अनेक विनायक गण उत्पन्न हुये, बाद में ब्रह्मा की प्रार्थना पर इन गणों का कुमार को स्वामी बना दिया और ये विनायक गणपति हो गये ।

गणपति का दूसरा नाम विनायक भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी होने के कारण यह तिथि गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध हुई । समस्त देवताओं में गणेशजी सर्वप्रथम पूजे जाते हैं, कारण वे गणनायक, विध्न विनायक, संकटहारी और सिद्धि समृद्धि के दाता हैं । विद्या, बुद्धि, धन, वैभव, शक्ति, तेज अध्यात्म साधना और तन्त्र सिद्धि के लिये भक्त जन गणेशजी की शरण लेते हैं। गणेश जी की पूजा साधना के अनेक मन्त्र हैं व ब्रहद्ध सम्प्रदाय गणेश साधकों के लिये हैं । समस्त हिन्दू जाति गणेशजी का सबसे पहले नमन करती है । गणपति गण अथवा समुदायों के नायक हैं। गणपति का दूसरा नाम विनायक भी है। जो विचारने वाली आत्माओं के लिये प्रयुक्त होता है । “अथर्वशिरस” उपनिषद् में रूद्र के अनेक देवों या आत्माओं का समीकरण करते हुये विनायक का भी नाम आता है।

“महाभारत” में गणेश्वरों और विनायकों का देवताओं के साथ उल्लेख हुआ है। जो मनुष्य कार्य का सर्वत्र अवलोकन करते हैं । किरात प्रजाति (भोट–भ्रन्मा) के अनेक गण (जनजातियाँ) उस समय उत्तरी भारत में रह रही थीं — यक्ष गन्धर्व, किन्नर, गुहक, किं पुरूष, भोट पिशाच आदि । यक्षों के अधिक प्रबल होने पर इन गणों ने भी कुबेर को अपना गणपति या गणेश मान लिया और उसकी पूजा करनी आरम्भ कर दी ।  महाभारत में कुबेर को कुछ स्थानों  पर गणेश कहा गया है ।

लिंग पुराण में गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है । लिंग पुराण के अनुसार देवों ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि आप किसी एक ऐसी शक्ति का प्रादुर्भाव करें जो कि सभी प्रकार के विध्नों का निवारण किया करें । देवों की इस प्रार्थना के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं ही “गणेश” के रूप में जन्म ग्रहण किया ।

वायु पुराण में भगवान शिव को “गजेन्द्रकर्ण”, लम्बोदर, “दृष्ट्रिन” (वा) पुणे 24/147, 30/173) आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गयी है।

ब्रह्मपुराण में गणेश जी का भगवान शिव के लिये उपयोग करके दोनों में पूर्व अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में गणेश को कृष्ण का अवतार कहा गया है । “ब्रह्मवैवर्त पुराण” के ही मतानुसार गणेश जी का विष्णु के साथ तादाम्य है।भगवान विष्णु शिवजी से कहते हैं कि पार्वती जी से एक पुत्र होगा जो समस्त विध्नों का नाश करेगा । इतना कहकर भगवान विष्णु बालक का रूप धारण करके शिव के आश्रम में गये वे पार्वती जी की शैय्या पर बालक रूप में लेट गये । पार्वती जी ने उन्हें अपना पुत्र माना यही पुत्र “गणेश जी” के नाम से लोक विश्रत हुआ ।

सौर पुराण में गणेश जी को साक्षात् शिव ही कहकर यह सिद्ध करने की चेष्टा की गयी है कि श्री गणेश एवं भगवान.. शिव दोनों एक ही हैं । गणेश सम्प्रदाय एवं गणेश पुराण में भगवान गणपति को “महाविष्णु” एवं “सदाशिव” कहा गया है और उन्हें साक्षात् ब्रह्म माना गया है वे ही प्रपच्च की सृष्टि और स्थिति संहार आदि के कारण ही उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रादुर्भाव हुआ है।

शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी ने अपने शरीर के अनुलेप से एक मानवाकृति निर्मित की और उसे आज्ञापति किया कि मैं स्नान करने जा रही हूँ जब तक न कहूँ तक तक तुम किसी को अन्दर मत आने देना । यही गृहद्वार रक्षक शक्ति “गणेश” के नाम सेअभिहित हुई और इन्हीं के साथ भगवान शंकर का संग्राम हुआ ।’ गणपति अथर्वशीर्ष एक नव्य उपनिषद् हैं और अथर्ववेद से सम्बन्धित हैं । इस उपनिषद् में गणेश विद्या बतलायी गयी है । इसी कारण गणेशोपासकों में वह अत्यन्त सम्मानित है । गणपति अथर्वशीर्ष में गणेशजी का सगुण ब्रह्मात्मक वर्णन तो है ही बल्कि उसके अन्त में उन्हें परब्रह्म भी कहा गया है। अथर्वशिरस उपनिषद् में रूद्र का अभिज्ञान अनेक देवताओं से किया गया है, जिनमें एक विनायक कहे गये हैं।

  • ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण तथा शिव पुराण के अनुसार प्रजापति विश्वकर्मा की रिद्धी-सिद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से शुभ और रिद्धी से लाभ नाम के दो कल्याणकारी पुत्र हुए।

पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से एक आकर्षक कृति बनाई, जिसका मुख हाथी के समान था। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।

गणपति नाम के विषय में ऐतरेय ब्राह्मण का कहना है कि यह ब्रह्मणस्पति अथवा वृहस्पति का वाचक है । परम सत्ता को जान लेना ही इस जीवन का चरम शिखर है । “यस्तन्न वेद किमचा करिष्यति” । (ऋ0 1/164/39) अर्थात् जो उस परमात्मा को नहीं जानता वह ऋचा से क्या करेगा । वैदिक ऋषियों की खोज और शिक्षा का सर्वोत्तम सार है, एक परम तत्व का रहस्य “एक सत्” (ऋ0 1/164/46) या “तदेकम” (ऋ0 10/129/2) जो उपनिषद् का महाकाव्य बन गया । सब देव प्रकाश और सत्य की शक्तियां एक (देव) के ही नाम और शक्तियाँ हैं। प्रत्येक देव स्वयं सब देवता हैं और उन्हें अपने में रखे हुए हैं। वह परम सत्य एक है – “तत् सत्यम् (ऋ0 3/39/5. 4/54/4 तथा 8/45/27) इत्यादि ।

अग्नि पुराण में भी गणेश जन्म एवं गणेश गौरव की गाथायें हैं, स्मार्त परम्परा में गणपति विनायक के आवेभव में “विघ्नेश्वर” की जो कल्पना है उसका समर्थन लिंग पुराण भी करता है । असुर और राक्षस तपस्या कर शिव को प्रसन्न कर लेते थे, और विभिन्न वरदान माँग लेते थे । इस पर इन्द्रादि देवों ने शिव से प्रार्थना की कि यह तो ठीक नहीं क्योंकि वरदानों से सम्पन्न ये असुर और राक्षस देवों से युद्ध करते और उन्हें परास्त भी कर देते । देवों ने भगवान से ऐसे व्यक्ति को उत्पन्न करने की प्रार्थना की जो उन असुरों के इन धार्मिक कार्यों में बाधा डाल सके और वे सफल मनोरथ न हो सके । शिव ने देवों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और विध्नेश्वर को उत्पन्न कर उसको असुरों की १,३यादि यागदिक क्रियाओं में विघ्न डालने के लिये नियुक्त किया।

भविष्य पुराण में कथा आती है कि युधिष्ठिर को कृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए गणेश पूजन का परामर्श दिया था – पूजयस्व गणाध्यक्षम् उमामल समुद्रभवम् ।। | प्रो0 एस0 ए0 डांगे ने उमा के रज रक् बिन्दु से गणेशं की उत्पत्ति कीकथाओं में यह “अर्थवाद” सिद्ध किया है कि प्रारम्भ में गाँवों में लोकपाल गणपति की पूजा शिला लाल मुद्रा (रज) से निर्मित होती रही होगी । बाद में गणेश प्रतिमा को सिंदूराभिषिक्त किया जाने लगा । आज भी गणेश को अर्पित किये जाने वाले रक्त चंदन के लेप, लाल वस्त्र और रक्त पुष्पों की अंजलि गणेश के पार्थिव (भौम) देवता होने को सिद्ध करती है । भौम मंगलगृह का नाम है और उसका रंग भी लाल माना गया है। पुराणकार मंगलगृह की उत्पत्ति भी पृथ्वी पर गिरे उमा के ऋतुकालीन रक्त बिन्दु से मानते हैं इसी कारण विनायक को मंगलरूप भी कहा जाता है ।।

गणेश पुराण और मुग्दल पुराण में गणेश पूजा का विस्तृत वर्णन है। ये पुराण उपपुराण है। इसके पांच खंड हैं।

गणेश पुराण में गणेश को ही परमब्रह्म कहा गया है। भगवान् गणेश का आविर्भाव किस प्रकार हुआ उसका पूरा वर्णन इस पुराण में है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है। गणेश पुराण के अनुसार, इसी शुभ दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था।

गणेश पुराण में गणेश के निर्गण स्वरूप के साथ ही उनके सगुण साकार स्वरूप का वर्णन है, जो पूर्व मध्यकालीन गणपति प्रतिमाओं के विकास की अवस्था को प्रकट करता है। इस पुराण में गणेश का विकसित विविध व बहुआयामी स्वरूप व्याख्यायित है। यह विविधता मुद्राओं, अलंकारों, आयुधों, वाहनों, स्वरूपों सभी में परिलक्षित होती है।

गणेश पुराण में गणेश का अत्यन्त मनोरम व भव्य स्वरूप इस प्रकार वर्णित है – विनायक की रत्नकांचन से युक्त महामूर्ति बनाकर, जिसमें उनके चतुर्भुज व त्रिनेती स्वरूप का अंकन हो, तथा जो नाना अलंकारों से शोभायमान हो, षोडशोपचार विधान के साथ पूजा करनी चाहिये।

पुराणकाल तक आते-आते। गणेश की उपासना इतनी व्याप्त हो चुकी थी कि प्रायः सभी पुराणों में गणेशोपासना का उल्लेख किया गया है। गणेश पुराण में वर्णित है-

“प्राच्यां रक्षतु बुद्धिशा, अग्नेयां सिद्धिदायक: दक्षिणस्याम उमापुत्रो,

नैऋत्यं तु गणेश्वर, प्रतिच्यां विघ्नहर्ताव्यां वायव्याम गजकर्णक

अर्थात् गणेशजी के विभिन्न स्वरूप दस दिशाओं में सुरक्षा करते हैं। शास्त्रनुसार गणेशजी की विधिवत स्थापना व पूजा-पाठ से नौ ग्रहों के दोष भी दूर हो जाते हैं।

गणेश पुराण में पूर्वमध्यकालीन समाज में प्रचलित सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का निरूपण हुआ है। इन विशेष सन्दर्भो में गणेशकी आवश्यकता और महत्व को प्रतिपादित किया गया है। गणेश की प्राचीनता को वैदिक परम्परा से जोड़कर उसे तत्कालीन अन्य देवों से श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है।

मालती माघव (छठी शती ई0) वह पहला ग्रन्थ है जिसमें नाटक प्रारम्भ करने से पूर्व ही विनायक वंदना की गई है (प्रथम अंक, श्लोक 2) भवभूति से मात्र वर्ष पूर्व गणेश को वंदनीय एवं स्तुति योग्य माना गया था।

आनन्दतीर्थ (950 ई0) रचित “शंकर दिग्विजय” काव्य के अनुसार तांत्रिक गणपति का पूजन बांये हाथ से किया जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरितमानस” के प्रथम श्लोक में वाणी और विनायक की एक साथ वंदना की है –

वर्णानार्थसंघानां रसानां छंदसामपि ।

मंगला नाज्ञ कर्तारौ वंदे वाणी विनायकौ ।। 

अर्थात् वर्णअर्थसंघरसछंद और मंगल के विधायक वाणी और विनायक को मैं वंदन करता हूँ । यहाँ प्रसंगतः गणपति के नाम में स्थित “गण” और तुलसीकृत वंदना का विचार शब्द शास्त्र की दृष्टि से किया जाय तो “गणपति” की एक नई सूक्ष्म व्याख्या उभरती है।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था।

गणेश जी को क्यों माना गया है प्रथम पूजनीय

ऋग्वेद द्वितीय मंडलके तेईसवें सूत्र के पहले मन्त्र एवं तैतिरीय संहिता में गणपति का उल्लेख आता है.उनका उल्लेख हम गणेश के रूप में पाते हैं :-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

अर्थात्- हे गणपतितू विद्वानों का विद्वान हैब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं।

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

गणेश शब्द की व्युत्पत्ति है-

गणानां जीवजातानां यः ईशः स्वामी सः गणेशः (गणेशः पुं)

अर्थात, जो समस्त जीव जाति के ईश-स्वामी हैं वह गणेश हैं।

इनकी पूजा से सभी विघ्न नष्ट होते हैं-

गणेशं पूजयेद्यस्तु विघ्नस्तस्य न जायते। (पद्म पुराणसृष्टि खंड 51/66)

शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें मन्त्र में भी गणपति शब्द आया है-

नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नम इति ॥” बृहस्पतिः। यथाऋग्वेदे ।२।२३।१।

अर्थात गणों और गणों के स्वामी श्री गणेश को नमस्कार। इस संदर्भ में हिन्दू शास्त्रों और धर्म ग्रन्थों में अनेकानेक कथाएँ प्रचलित हैं। विभिन्न विभिन्न स्थानों पर गणेश जी के अलग अलग रूपों का वर्णन है परन्तु सब जगह एक मत से गणेश जी की विघ्नकारी शक्ति को स्वीकार किया गया है।

वाराह पुराण एवं लिंग पुराण में वर्णन है कि एक बार ऋषि मुनियों ने असुरी शक्तियों से ग्रसित होकर देवाधिदेव भगवान शंकर से सहायता की प्रार्थना की। भगवान आशुतोष ने विनायक रूप से श्री गणेश को प्रगट किया और अपने शरीर को कंपित कर अनेक गणों की सृष्टि की, उनका अधिपति गणेश को नियुक्त किया गया। शास्त्रों में गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा गया है-

वक्रतुंड महाकाय। सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्न कुरु मे देव। सर्व कार्येषु सर्वदा॥

अर्थात् जिनकी सूँड़ वक्र है, जिनका शरीर महाकाय है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, ऐसे सब कुछ प्रदान करने में सक्षम शक्तिमान गणेश जी सदैव मेरे विघ्न हरें।

पुराणों में गणेश जी के जन्म से संबंधित कथाएं विभिन्न रूपों में प्राप्त होती हैं। इस संबंध में शिवपुराण, ब्रह्मवैवत्र्तपुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण एवं अन्य ग्रंथों में विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

कथाएं : गणेश कैसे बने प्रथम पूज्य

हम सभी जानते है की हमारे सभी मंगल कार्यो में हम सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करते है | उन्हें निमंत्रण देते है और अपने सभी कार्यो को निर्विघ्नं सम्पन्न करने की विनती करते है | इन्हे सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता का वरदान प्राप्त है | इसके पीछे दो कथाये जुडी हुई है | पढ़े : भगवान गणेश के लिए गये अवतार कौनसे है

पहली कथा में बताया गया है की इन्हे यह वरदान इनके माता पिता भगवान शिव और पार्वती से प्राप्त हुआ | उन्होंने अपने मातृ पितृ भक्ति और सेवा में उन्हें ही अपना सर्वश्य मान कर परिक्रमा की की | ऐसी भक्ति और सेवा देखकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया गया | ब्रह्मा जी जब ‘देवताओं में कौन प्रथम पूज्य हो’ इसका निर्णय करने लगे, तब यह तय किया गया कि जो पृथ्वी-प्रदक्षिणा सबसे पहले करके आएगा वही सबसे पहले पूज्य माना जाएगा। गणेश जी का छोटा सा मूषक कैसे सबसे आगे दौड़े। पर वे थे बुद्धि के महान देवता | उन्होंने युक्ति निकाली और  अपने पिता और माता भगवान शंकर और पार्वती जी की प्रदक्षिणा करने लगे । उनके लिए उनके  माता-पिता ही सब कुछ थे | उन्होंने सात प्रदक्षिणा कर ली। शिवजी का ह्रदय यह देखकर गदगद हो गया और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। जाहिर है भगवान गणेश शेष देवताओं से सबसे पहले पहुंचे। उनका यह बुद्धि-कौतुक देखकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया।

शिवपुराण में आता हैः

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।

पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम्।

अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्।

पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम्।। (शि.पु., रूद्र.सं., कु. खं- 19.39-42)

‘जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के पति सुन्दर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।’

दूसरी कथा… शिव महापुराण: भगवान शिव ने दिया प्रथम पूजा का वरदान

शिवमहापुराण की रुद्रसंहिता में वर्णन है कि कुमारिका खंड में माता पार्वती जी ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया।

कल्पभेद में भगवान शनि के द्वारा इनका मस्तक काटाजाना, पुनः हाथी का मस्तक लगाना यह कथा है किन्तु श्वेतकल्प में तो स्वयं भगवानशंकर उनका मस्तक छिन्न करते हैं। यह पापनाशिनी कथा शिवपुराण में इस प्रकार वर्णित है-

विचार्यति सा देवी क्पुर्षों मलसंभवम्।

पुरूषं निर्ममौसा तु सर्वलक्षणसंयुतम्।।

सर्वाक्यवनिर्दोषं सर्वाक्यव सुन्दरम्।।

विशालं सर्वंशोभाढयं महबलपराकमम्।।

वस्त्राणिं च तदा तस्मै दत्त्वा सा विविधानीहिं।

नानालंकरणं चैक ब्रह्मशिषमनुत्तमाम्।।

मत्पुत्रस्त्वं मदीयोसि नान्यः कश्चिदिहास्ति में ।

एवमुक्तस्य पुरुषों नमस्कृत्य शिका जगौं।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 13/20-23)

वह शुभ लक्षणों से सुयुक्त था। उसका सारा शरीर सभी अवयवों से सुन्दर था।उसका वह शरीर विशाल,परम शोभायमान व महान बल पराक्रम से सम्पन्न था। मातापार्वती ने उसे विभिन्न प्रकार के आभूषण तथा नाना प्रकार के वस्त्र और बहुत सेआर्शीवाद आदि देकर कहा तुम मेरे पुत्र हो,मेरे अपने ही हो, तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ दूसरा कोई नहीं हैं।

कथानुसार जब भगवान शिव और गणेशजी के बीच युद्ध हुआ और गणेशजी का सिर कट गया तो देवी पार्वती के कहने पर शिवजी ने गणेश जी के शरीर पर हाथी का सिर जोड़ दिया। जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि इस रूप में मेरे पुत्र की पूजा कौन करेगा।

आनने तव सिन्दूरं दृश्यते सांप्रतं यदि ।।

तस्मात्त्वं पूजनीयोसि सिन्दूरेण सदा नरैः ।।

पुष्पैर्वा चन्दनैर्वापि गन्धेनैव शुभेन च ।।

नैवेद्ये सुरम्येण नीराजेन विधानतः ।।

तांम्बूलैरथ दानैश्च तथा प्रक्रमणैरपि ।।

नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति ।।

तस्य वै सकला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः ।।

विघ्नान्यनेकरूपाणि क्षयं यास्यंत्यसंशयम् ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 18/9-12)

तब शिवजी ने वरदान दिया कि सभी देवी-देवताओं की पूजा और हर मांगलिक काम से पहले गणेश की पूजा की जाएगी। इनके बिना हर पूजा और काम अधूरा माना जाएगा।

धन्योसि कृतकृत्योसि पूर्वपूज्यो भवाधुना ।

सर्वेषाममराणां वै सर्वदा दुःखवर्जितः ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख०18.8)

गणेश चतुर्थी

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी महोत्सव पूरे देश में उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है। शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेश पुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण+पति = गणपति। स्कृतकोशानुसार गणअर्थात पवित्रक। पतिअर्थात स्वामी, ‘गणपतिअर्थात पवित्रकों के स्वामी।

  • इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है।
  • गणेश जी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेश जी की) सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।
  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए।
  • गणेश जी की आरती और पूजा किसी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले की जाती है और प्रार्थना करते हैं कि कार्य निर्विघ्न पूरा हो।

श्रीगणेश भगवान का पूजन व व्रत विधि – भगवान गणेश को प्रातःकाल, मध्याह्न और सायाह्न में से किसी भी समय पूजा जा सकता है। परन्तु गणेश-चतुर्थी के दिन मध्याह्न का समय गणेश-पूजा के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मध्याह्न के दौरान गणेश-पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त कहलाता है।

गणेश-पूजा के समय किये जाने वाले सम्पूर्ण उपचारों को नीचे सम्मिलित किया गया है। इन उपचारों में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह उपचार भी शामिल हैं। दीप-प्रज्वलन और संकल्प, पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व किये जाते हैं। अतः दीप-प्रज्वलन और संकल्प षोडशोपचार पूजा के सोलह उपचारों में सम्मिलित नहीं होते हैं।

यदि भगवान गणपति आपके घर में अथवा पूजा स्थान में पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित हैं तो षोडशोपचार पूजा में सम्मिलित आवाहन और प्रतिष्ठापन के उपचारों को त्याग देना चाहिये। आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा नवीन गणपति मूर्ति (मिट्टी अथवा धातु से निर्मित) की ही की जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि घर अथवा पूजा स्थान में प्रतिष्ठित मूर्तियों का पूजा के पश्चात विसर्जन के स्थान पर उत्थापन किया जाता है। गणेश चतुर्थी पूजा के दौरान भक्तलोग भगवान गणपति की षोडशोपचार पूजा में एक-विंशति गणेश नाम पूजा और गणेश अङ्ग पूजा को भी सम्मिलित कर लेते हैं।

  • अपने सामथ्र्य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें (शास्त्रों में मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना को ही श्रेष्ठ माना है)।
  • संकल्प मंत्र के बाद षोडशोपचार पूजन व आरती करें।
  • गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं।
  • मंत्र बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं।
  • 21 लड्डुओं का भोग लगाएं।
  • इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाएं और 5 ब्राह्मण को दे दें। शेष लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें।
  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पूजन के समय यह मंत्र बोलें

ऊं गं गणपतये नम:

दूर्वा दल चढ़ाने का मंत्रगणेशजी को 21 दूर्वा दल चढ़ाई जाती है।

  • ऊं गणाधिपतयै नम:
  • ऊं उमापुत्राय नम:
  • ऊं विघ्ननाशनाय नम:
  • ऊं विनायकाय नम:
  • ऊं ईशपुत्राय नम:
  • ऊं सर्वसिद्धप्रदाय नम:
  • ऊं एकदन्ताय नम:
  • ऊं इभवक्त्राय नम:
  • ऊं मूषकवाहनाय नम:
  • ऊं कुमारगुरवे नम:

इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।

अनंत चतुर्दशी के दिन ही क्यों होता है गणेश विसर्जन- अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है भगवान गणपति जल तत्व के अधिपति है इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को इनका पूजन कर इनकी मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से श्री वेद व्यास जी ने भागवत कथा गणपति जी को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे गणपति जी ने अपने दांत से लिखा था। दस दिन उपरांत जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत अधिक हो गया है तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के कुंड में ले जाकर ठंडा किया था इसलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश स्थापना की जाती है तथा कर भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को उन्हें शीतल कर उनका विसर्जन किया जाता है।

भगवान श्रीगणेश की आरती

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।

नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।

कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।

दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव…

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।

चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।

रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव…

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।

सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।

दास रामाचा वाट पाहे सदना।

संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,

सुरवरवंदना॥ जय देव…।

मान्यताएं- क्या करें क्या ना करें…

  • हिंदू धर्म के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए. यदि आप भूलवश चंद्रमा का दर्शन कर भी लें तो जमीन से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर पीछे की तरफ फेंक दें.
  • गणेश चतुर्थी की पूजा में किसी भी व्यक्ति को नीले और काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए. ऐसे में लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है.
  • गणपति की पूजा करते वक्त कभी तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए. मान्यता है कि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था. गणेश भगवान ने नाराज होकर उन्हें श्राप दिया था.
  • गणपति की पूजा में नई मूर्ति का इस्तेमाल करें. पुरानी मूर्ति को विसर्जित कर दें. घर में गणेश की दो मूर्तियां भी नहीं रखनी चाहिए.
  • भगवान गणेश की मूर्ति के पास अगर अंधेरा हो तो ऐसे में उनके दर्शन नहीं करने चाहिए. अंधेरे में भगवान की मूर्ति के दर्शन करना अशुभ माना जाता है.

तांत्रिक परम्परा और गणेश

ezgif-5-0327abd209b8.gif

तांत्रिक परम्परा में गणपति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है वे वाममार्ग के आराध्य देवता के रूप में पूजित हुये। शिव की तरह उनके मस्तक पर चन्द्रकला विराजमान हुई और माल पर तीसरा नेत्र । विष्णु के समान चतुर्भुज धारी बनकर उन्होंने शंख, पाश, अंकुश या धनुषबाण धारण किया।’

  • एकदन्त, गजमुख और लम्बोदर, आकृति, परशु आयुद्य – गणपति की प्राचीनतम विशेषताएँ थीं। गुप्तकाल में चार भुजाओं तीन नेत्रों, व्यालयज्ञोपवीत और मूषक वाहन का वर्णन मिलने लगा, मध्ययुग में आकर इन्हीं पूर्व परम्पराओं का सुव्यवस्थितसंकलन किया ।
  • बृहतसंहिता के अनुसार हाथी के समान मुख वाली लम्बे उदर वाली, कुठार धारिणी एक दाँत वाली और मूलकन्द तथा सुनील दलकन्द धारण की हुई प्रतिमा बनायें । चिरकाल से हमारा भारतदेश आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न रहा है। हमारे पूर्वजों ने ऐसे अनेक पर्यों को प्रवर्तित किया है, जिनमें सेतू से लेकर हिमाचल पर्यन्त एक ही रीति से उत्सव मनाये जाते हैं ।
  • उनपर्यों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी विशेष महत्वपूर्ण हैं । प्रान्त के भेद से कोई इसको “विनायक चतुर्थी” कहते हैं तथा कोई “गणेश चतुर्थी” ।’ | गणेश संहारक नहीं है पर आत्मरक्षण में उनके समान समर्थ कोई दूसरा नहीं है । वे विनाशक नहीं है किन्तु उनकी रक्षात्मकता इतनी प्रबल है कि जो उसे क्षुष्ण करने जाता है, वही समाप्त हो जाता है, इसलिये भगवान गणेश विध्न विनाशक हैं

पाँच प्रमुख हिन्दू देवों में गाणपत्य के ईष्टदेव गणपति का महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद, अथर्ववेद, ऐतरेय ब्राह्मण और शुक्ल यजुर्वेद में गणपति शब्द प्रायः किसी भी गण स्वामी के लिये प्रयुक्त होने वाला एक विशेषण है।

भारतीय देव परम्परा में गजानन गणेश आदिदेव है । पौराणिक शिव परिवार में वे अम्बिका और महादेव के द्वितीय पुत्र और ऋद्धि- सिद्धि के स्वामी हैं ।

बौधायन धर्मसूत्र में गणेश

बौधायनगृह्यसूत्र और बौधायन धर्मसूत्र 4 में विध्न के पार्षदों का वर्णन है तथा बौधायन धर्म सूत्र में ही विनायक को रूद्र-पुत्र कहा गया है । ई0पू0 छठवीं शती के बौधायन धर्मसूत्र में गणेश के तर्पण का उल्लेख हुआ है, इसी प्रसंग में गणेश के अनेक नामों की भी चर्चा की गई है, जैसे- विघ्न विनायक, गजमुख, एकदन्त, वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि । पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ है, उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठी शती ई0पू0 के लगभग कर ली गई थी।

  • आठवीं शती में तंत्रयान एवं बज्रयान का उदय हुआ । विशेषकर महायान बौद्ध सम्प्रदाय में उसका प्रभाव गणेश पर भी पड़ा । साधना तंत्र के अनुसार पंचमकार (मत्स्थ, मदिरा, मैथुन, मॉस, मुद्रा) से गणेश की पूजा-अर्चना करनी चाहिए । “शारदा तिलक” तंत्र में उचिष्ट गणेश का उल्लेख है। इस रूप में उनकी प्रतिमाएं अश्लील हैं और उन्हें देवी के साथ मैथुनरत अथवा क्रामक्रीड़ा में निमग्न अंकित किया गया है । (ऐसी ही एक प्रतिमा नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित है जिसमें गणेश की जंघा पर देवी विराजमान है व गणेश आलिंगन बद्ध है)।

Popular Religion and Folklore of Northern India में ब्रिटिश प्राच्यविद William Crooke का विचार है कि गणेश मूल रूप में पशु जाति से सम्बन्धित थे ।’ गणेश का सम्बन्ध नागों से भी है । नाग शब्द संस्कृत में गज के नाम से भी जाना  जाता है ।

  • उत्तर भारत के धर्म और लोकतत्व पर लिखित अपने ग्रन्थ में कुक लिखते हैं कि ,गणेश का सम्बन्ध वन्य पशुपूजकों और ग्रामीण कृषकों के साथ रहा है। गणपति का एक दाँत वस्तुतः हल के फाल का प्रतीक है । जिससे कृषकों को समृद्धि प्राप्त होती है । भाद्रपद मास में जब फसल पकने लगती है। तब गणपति का पूजन कृषको की धन-धान्य कामना का ही ,विस्तृत विकसित रूप है । गणपति का प्रारम्भिक रूप आदिम जातियों से सम्बन्धित रहा होगा । बाद में उनका महत्व बढ़ता गया और जनमानस में लोकप्रिय हो गये । गणपति का महत्व पौराणिक काल में बहुत बढ़ गया था ।

“ब्राह्माण्ड-पुराण” में शिव भगरी वाराणसी में गणेश की नित्य पूजा का उल्लेख है सभी देवों से पूर्व उनकी पूजा करने का आदेश शिव से प्राप्त हुआ था । सभी कार्यों में सफलता प्राप्ति के लिए जातकर्म व गर्भाधान आदि संस्कारों के समय, यात्रा के समय, वाणिज्य में तथा हर तरह के कार्य को कठिनाई में गणेश की स्तुति करनी चाहिए, क्योंकि वे दक्ष्यमाण है । ये शिव के गणों के स्वामी हैं इसलिए गणेश कहे जाते हैं । उनके उदर में भूत, भविष्य तथा वर्तमान अखिल ब्रह्माण्ड व्याप्त है । इसलिये वे लम्बोदर भी  कहे जाते हैं उनका मूल मानव सिर कट गया दुबारा उन्हें गज के सिर से युक्त किये जाने के कारण उन्हें गजानन कहा गया है। प्राचीन समय में सप्त ऋषियों ने शाप से अग्नि को नष्ट ,कर दिया । उसे पुनः प्रदीप्त करने के कारण वे शूपकर्ण कहे जाते हैं । चतुर्थी के दिन ,चन्द्रमा को इन्होंने अपने मस्तक पर धारण किया । अतः वे भालचन्द्र कहे जाते हैं। देवासुर ,राक्षस के संग्राम के समय में देवताओं के विध्न दूर करने के कारण वे विध्न विनाशक कहे गये ।  तुण्ड के वक्र होने के कारण इन्हें वक्रतुण्ड भी कहा जाने लगा ।

गणेश की एकदन्त से सम्बन्धित कई कथायें प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार- जामदमय ने परशु से इनका एक दाँत तोड़ डाला था, जिससे इनका नाम एकदन्त पड़ गया । गणेश के एकदन्ती का प्रसिद्ध कथानक “ब्रह्माण्ड पुराण” में भी किया गया है । जिसके अनुसार एक बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम शिव के दर्शन के लिये कैलाश पर्वत पर गये उस समय शिव और पार्वती वार्तालाप कर रहे थे और किसी का भी प्रवेश प्रतिबन्धित था द्वार पर परशुराम के आते ही गणेश ने आगे जाने से रोक दिया, फलतः परशुराम और गणेशं में संघर्ष हो गया । परशुराम ने अपने परशु से प्रहार कर गणेश का एक दाँत तोड़ दिया, तब से गणेश एकदन्ती हो गये ।

श्री राघव चैतन्य कृत महागणपति स्तोत्र के अनुसार-

इत्वं विष्णुशिवादितत्क्तनवें श्रीं क्क्रतुण्डायहुँ

काराक्षिप्त समस्त दैत्यप्रतनान्नाताय दीप्य विषै।

आनन्दैकरसावबोध लहरीं विध्वस्त सर्वोर्मये

सर्वत्र प्रथमानमुग्धमहसें तस्मैं परस्मैं नमः ।।

अर्थात इस प्रकार विष्णु, शिव आदि तत्व शरीर वाले, हुँकार मात्र से दैत्य समूहको मार डालने में समर्थ अत्यन्त उद्वीप्त दीप्ति वाले आनन्दैकरसमय ज्ञान लहरी से समस्तउर्मियों को विध्वस्त करने वाले उन परमात्मा वक्रतुण्ड को नमस्कार है। जिनका मनोहरतेज सर्वत्र व्याप्त है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में गणेश को ब्रह्मा, विष्णु,शिव इन्द्रादि समस्त देवों  एवं इस सारी सृष्टि का आविर्भाव कर्ता बताते हुए ब्रह्म बताया गया है :-

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेत-

तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता।

तथेन्द्रादयो देवसंघा मनुष्याः ।

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।३।

योगशास्त्र के अनुसार मूलाधार चक्र में गणेश का वास माना गया है। इस प्रकार विश्व के उद्गम एवं विकास के परम कारण ओंकार स्वरूप गणेश ही पर ब्रह्म हैं। वे ही सत्व,रज तथा तम के अधीश्वर जगत के कारण हैं अनेक रूपों में विद्यमान हैं। दीर्घतमा ऋषि के अनुसार “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”। अर्थात एक ही होते हुए उसको अनेकों रूपों में विद्वान् लोग बताते हैं।

भगवान गणेश के विविध नामों का वर्णन

KLE.gif

गणेश वैदिक देव है इसी कारण उनके नामों की विविधता वैदिक वाड्मय और शास्त्रीय ग्रन्थों में बहुलता से पायी गई है। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में मान्य असंख्य देवों में प्रमुख देव अर्थात् विष्णु शिव और देवी दुर्गा एक ही तत्व होने पर क्रमशः विष्णुसहस्त्रनाम’, शिवसहस्त्रनाम और दुर्गाशतनाम सहस्त्रनाम आदि ग्रन्थों में गुण-कर्मानुसार एक हजार नामों से अभिहित किये गये है। उसी प्रकार गकारादि श्रीगणपति सहस्त्रनामस्तोत्रम में श्रीगणेश के एक हजार नाम दिये गये है।

  • इसके अतिरिक्त ‘श्रीवक्रतुण्डमहागणपति सहस्त्रनामावलिः’ और गणेश पुराण के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध ‘गणपतिसहस्त्रनाम’ आदि ग्रन्थों में श्री गणेश के एक हजार नाम है। गणेश पुराण में उपासनाखण्ड के ‘श्री गणपत्यष्टोत्तरशतनाम’ नामक स्तोत्र में गणेश के सौ नाम दिये गये है। गणेश पुराण में दिये गये गणेश कवच में भी गणेश के विविध नाम आयें है।
  • वैदिक वांड्:मय में गणेश के नाम एवं स्वरूप ऋग्वेद और यजुर्वेद के ‘गणानां त्वां गणपति हवामहें’ मंत्र में गणपति शब्द के लिये कविनाकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति और प्रियपति, निधिपति आदि नाम प्रयुक्त हुये है। इन्ही वेदों में उनके माधवन, द्वैमातुर, और वक्रतुण्ड नाम भी मिलते है। लेकिन इन मंत्रों में गणपति शब्द का प्रयोग ‘ब्रह्मणस्पति’ की उपाधि के रूप में आया है।

आचार्य सायण भी लिखते है- यह गणेश के लिये नही ब्रह्मणस्पति के लिये है जो देवादि गुणों के अधिपति है। ऋग्वेद में इन्द्र को गणपति के रूप में सम्बोधित किया गया है। तैत्तिरीय संहिता एवं वाजसनेही संहिता में इस मंत्र का अभिप्राय अश्वमेघ के घोड़े से है न कि गणेश से। ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट आया है कि ‘गणानां त्वां’ नामक मंत्र ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित है। तात्पर्य यह है कि पूर्ववर्ती ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ‘गणपति नाम का प्रयोग हुआ है किन्तु पौराणिक युग के गणपति या गणेश के रूप में उनको कल्पना नहींहुई है। अतः मध्यकाल में गणेश के विलक्षण रूप के अनुरूप जो हस्तिमुख, लम्बोदर आदि वर्णितहै वे वैदिक संहिता में नही पाये जाते है।

गणपति का स्पष्ट उल्लेख मैत्रायणी संहिता की गणेश गायत्री तथ गणपत्यर्थशीर्ष में जिसे गणेशोपनिषद् भी कहते हैं, में मिलता है। गणेश गायत्री में उनके हस्तिमुख, एकदन्त वक्रतुण्ड तथा दन्ती’ नाम मिलते है तो अथर्वशीर्ष के मंत्रों में उन्हें व्रातपति, गणपति, प्रथमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय, श्री वरदमूर्ति कहा गया। लेकिन विद्वानों ने गायत्री वाले इन भागों और गणेशोपनिषद् को बहुत बाद का माना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ईसवी सन् के बहुत पहले गणपति का साहित्य में प्रवेश हो चुका था। मूर्तिकला के क्षेत्र में उनका अस्तित्व बहुत बाद में आया। कदाचित इनकी उपासना को शास्त्रीय धरातल एवं मान्यता प्राप्त करने में समय लग गया होगा।

पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठीं शताब्दी ई०पू० में ही कर ली होगी। क्योंकि ई०पू० छठी शताब्दी के ‘बौधायन धर्मसूत्र’ में गणेश के तर्पण की गणना की गयी है जैसे विघ्नविनायक, गजमुखी, एकदन्त वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि प्रारम्भ में गणेश मानवगृहसूत्र और याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के रूप में उद्धृत हुये। मानवग्रह्य सूत्र में विनायकों का उल्लेख हुआ है। उनकी संख्या चार है- शालकटंक, कुष्माण्ड राजपुत्र, उस्मित और देवयजन।

याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के चार नाम है- मित, सम्मित, शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र । विश्वरूप व अपरार्क ने भी विनायक के चार नाम ही बताये है। किन्तु मिताक्षरा ने शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र के दो-दो भागों में तोड़कर दृढ़ नाम दिये है- मित, सम्मित शाल, कटकट, कूष्माण्ड एव राजपुत्र’ अतः यह कहा जा सकता है कि गणेश वादक दवा का पाक्तमें किसी देशोभ्दव जाति से आये और रूद्र (शिव) के साथ जुड़ गये।

छठीं-सातवीं शताब्दी के लगभग गाणपत्य सम्प्रदाय के अस्तित्व में आने के बाद गणपति-स्वरूप के विभिन्न पक्ष अस्तित्व में आये। उनके स्वरूप की कुछ विशिष्टायें पहले से ही आकार लेने लगी थी। गाणपत्य सम्प्रदाय से सम्बंधित साहित्य में वेदमंत्रों को गणेश से जोड़ते हुये उन्हें इनके लिये प्रयोग किया गया, जिससे गणेश का स्तर, देवसमूह में विशिष्ट हुआ। ऋग्देव, कविनांकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति, माधवन, द्वैमातुर तथा यजुर्वेद के देवता प्रियपतिनं, निधिपतिं वक्रतुण्ड आदि उपाधियॉ गाणपत्य उपनिषदों में गणेश के लिये प्रयुक्त है। गाणपत्य साहित्य ने

गणेश के स्वरूप के विकास में भी वैदिक देवों के स्वरूप से ही तत्व ग्रहण किया। उदाहरणार्थ अंकुश, वज्र व कमल इन्द्र से व्याघ्र चर्म और अर्ध चन्द्रमा शिव से पाश वरूण से, कुठार ब्रह्मणस्पति से ग्रहण किये गये। इस तरह उनका स्वरूप वैदिक देवों के सदृश विकसित हुआ।

पुराणों में गणेश के नाम एवं स्वरूप – परवर्ती विद्वानों ने भी अपने ग्रन्थों में श्री गणेश के अनेकों नाम दिये है। काशी के जंगमवाड़ी मठ के श्री शिवलिंग शिवाचार्य ने श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामवलिः नामकी पुस्तक में 108 नाम दिये है अमरकोश के एक श्लोंक में भी गणेशजी के आठ नाम दिये गये है।

जो इस प्रकार है- विनायकविघ्नराजद्वैमातुरगणाधिपएकदन्तहेरम्बलम्बोदर और गजानन। इनमें से कुछ नाम वेदों में प्रसिद्ध आठ नामों से साम्य रखते है और कुछ उनके प्रमुख आठ अवतरों के समान है।

वेदों में वर्णित आठ नाम है- गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजववत्रं, गुहाग्रजम् ।

प्रमुख आठ अवतार है- वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण।

वेदों के एकदन्त, हेरम्ब और लम्बोदर ये तीन नाम अमरकोश मे मिलते है तो आठ अवतारों के एकदन्त, गजानन, लम्बोदर और विध्नराज नाम मिलते है। इन तीनों में दो-दो नामों को क्रमशः द्वैमातुर, विनायक, गजववत्र, गुहाग्रज और वक्रतुण्ड, धूम्रवर्ण का विशिष्ट विवरण प्राप्त होता है। थानाभाव के कारण उनके आठ अवतारस्वरूप नामों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है- वक्रतुण्ड- उनका यह रूप ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला मत्सरासर का वध करने वाला तथा सिंहवाहन पर चलने वाला है।

गणेश पुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तिम अध्याय में बनारस के 56 गणेश रूपों का वर्णन मिलता है– गणेश के सात आवरणों की चर्चा हैं जिनमें 56 विनायक विद्यमान है-

  1. प्रथम आवरण- मैं दुर्गा विनायक, भीमचण्डी विनायक, देहलीगणप, उदण्ड विनायक, पाशपाणि, सर्वविध्नहरण विनायक।
  2. द्वितीय- आवरण-लम्बोदर, कूटदन्त, शूलंटक, कूष्माण्ड, मुडविनायक, विकटद्विज विनायक, राजपुत्र, व प्रणवाक्य विनायक।
  3. तृतीय आवरण- वक्रतुण्ड, एकदंत, त्रिमुख विनायक, पंचास्य विनायक, हेरम्ब, मोदकप्रिय ।
  4. चतुर्थ आवरण- सिंहतुण्ड  विनायक, पुण्यताक्ष, क्षिप्रप्रसाद, चिंतामणि, दंतहस्त, प्रचण्ड और दण्डमुण्डविनायक।
  5. पाँचवा आवरण- स्थूलदंत, कलिप्रिय, चतुर्दन्त, द्वितुण्ड, गजविनायक, काल विनायक, मार्गेशालयविनायक।।
  6. छठा आवरण- मणिकार्णिका विनायक, आशासृष्टि विनायक, यक्षारण्य, गजकर्ण, चित्रघंट वसुमंगलमित्र विनाय।
  7. सातंवा आवरण- मोद, प्रमोद, सुमुख, दुर्मुख, गणय, एवं ज्ञान विनायक ।

इसके अतिरिक्त अविमुक्त, मोक्षदाता, भगीर विनायक, हरिश्चन्द्र विनायक, कपर्दी व बन्दु विनायक के नामों का भी उल्लेख हुआ है।

पदम् पुराण में उनके 12 नामों का उल्लेख भी मिलता है- गजपति, विघ्नराज,लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्बर, एकदन्त, गणाधिप विनायक, चारूकर्ण, पाशुपाल, भवत्तनय यहनाम उनके कुछ मूर्ति विज्ञानी स्वरूप की भी अभिव्यक्ति करते है।

अग्नि पुराण में जहां गणेश के प्रतिमा शास्त्रीय स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- कि वे गजमुखी, वक्रतुण्ड, एकदन्त बड़े उदर वाले, धूम्रवर्णी चतुर्भुजी है। वहीं गणेश के अनेकनामों का उल्लेख भी इस पुराण में प्राप्त होता है। कुछ नाम उनके प्रतिमा के स्वरूप को उद्घाटितकरते है। जैसे वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजवक्र, लम्बकुक्षी, धूम्रवर्ण।

गरूड़ पुराण में गणेश के बारह नाम दिये गये है- जिनमें एकदन्त, वक्रतुण्ड, त्रयम्बक(त्रिनेत्र.) नीलग्रीवा, लम्बोदर, धूम्रवर्ण, बालचन्द्र, हस्तिख जैसे नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप की ओर इंगित करता है।

स्कन्द पुराण में गणेश के पंचमुखीदशभुजी और त्रिनेत्र स्वरूप का वर्णन करता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उनके आठ नाम- गणेश, एकदन्त, हेरम्बर, विघ्ननायक, लम्बोदर,शूर्पकर्ण, गजववत्र और गुहाग्रज है। इनमें से कुछ नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप जैसे लम्बोदर,एकदन्त शूपकर्ण का उल्लेख करते है।

मुद्गल पुराण में भी गणेश के स्वरूप से सन्दर्भित विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। यहपुराण गणेश के नौ विभिन्न स्वरूपों का विवरण देता है, जिनमें अधिकांश प्रतिशास्त्रीय स्वरूपध्यान से जुड़े हुये है। गणेश के स्वरूप को विवेचित करते हुये एक स्थल पर इसी में उन्हें मनुष्य एकदन्त, दुढिं कहा गया है। उन्हें सिद्धि और बुद्धि का पति भी कहा गया है।

गणपति 108 नामावली

श्री गणेश, गजानन, लंबोदर, विनायक के कई हजार नाम हैं लेकिन उन सभी का वाचन संभव नहीं अत: भक्त अपनी सुविधा से 108 नामों का पाठ कर सकते हैं। यह 108 गजानन नाम श्री गणेश को प्रसन्न करते हैं और वे यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक, ज्ञान और तेजस्विता का आशीष प्रदान करते हैं। श्री गणेश के 108 नामों का अर्थ-

  1. बालगणपति सबसे प्रिय बालक
  2. भालचन्द्र मस्तक पर चंद्रमा
  3. बुद्धिनाथ बुद्धि के भगवान
  4. धूम्रवण धुंए को उड़ाने वाला
  5. एकाक्षर एकल अक्षर
  6. एकदन्त एक दांत वाले
  7. गजकण हाथी की आंखें
  8. गजानन हाथी मुँख वाले
  9. गजनान हाथी के मुख वाले
  10. गजव हाथी की सूंड वाला
  11. गजवक्त्र हाथी जैसा मुंह
  12. गणाध्यक्ष गणों का मालिक
  13. गणपति गणों का मालिक
  14. गौरीसुत माता गौरी का बेटा
  15. लम्बकर्ण बड़े कान वाले देव
  16. लम्बोदर बड़े पेट वाले
  17. महाबल अत्यधिक बलशाली
  18. महागणपति देवातिदेव
  19. महेश्वर ब्रह्मांड के भगवान
  20. मंगलमूर्ति शुभ कार्य के देव
  21. मूषकवाहन जिसका सारथी मूषक
  22. निधिश्वरम  धन और निधि के दाता
  23. प्रथमेश्वर सब के बीच प्रथम 
  24. शूपकर्ण  बड़े कान वाले देव
  25. शुभम शुभ कार्यों के प्रभु
  26. सिद्धिदाता इच्छाओं के स्वामी
  27. सिद्दिविनायक सफलता के स्वामी
  28. सुरेश्वरम देवों के देव
  29. वक्रतुण्ड घुमावदार सूंड
  30. अखूरथ जिसका सारथी मूषक है
  31. अलम्पता अनन्त देव
  32. अमित अतुलनीय प्रभु
  33. अनन्तचिदरुपम अनंत चेतना
  34. अवनीश पूरे विश्व के प्रभु
  35. अविघ्न बाधाओं को हरने वाले
  36. भीम विशाल
  37. भूपति धरती के मालिक
  38. भुवनपति देवों के देव
  39. बुद्धिप्रिय ज्ञान के दाता
  40. बुद्धिविधाता बुद्धि के मालिक
  41. चतुर्भुज चार भुजाओं वाले
  42. देवादेव सभी भगवान में सर्वोपरी
  43. देवांतकनाशकारी बुराइयों और असुरों के विनाशक
  44. देवव्रत तपस्या स्वीकार करने वाले
  45. देवेन्द्राशिक  सभी देवताओं के रक्षक
  46. धामिज्क दान देने वाला
  47. दूजा अपराजित देव
  48. द्वैमातुर दो माताओं वाले
  49. एकदंष्ट एक दांत वाले
  50. ईशानपुत्र शिव के बेटे
  51. गदाधर जिसका हथियार गदा
  52. गणाध्यक्षिण पिंडों के नेता
  53. गुणिन सभी गुणों क ज्ञानी
  54. हरिद्र स्वर्ण के रंग वाला
  55. हेरम्ब मां का प्रिय पुत्र
  56. कपिल पीले भूरे रंग वाला
  57. कवीश कवियों के स्वामी
  58. कीत्ति: यश के स्वामी
  59. कृपाकर कृपा करने वाले
  60. कृष्णपिंगाश पीली भूरी आंखवाले
  61. क्षेमंकरी माफी प्रदान करने वाला
  62. क्षिप्रा  आराधना के योग्य
  63. मनोमय दिल जीतने वाले
  64. मृत्युंजय मौत को हरने वाले
  65. मूढ़ाकरम  जिन्में खुशी का वास
  66. मुक्तिदायी शाश्वत आनंद के दाता
  67. नादप्रतिष्ठित जिसे संगीत से प्यार हो
  68. नमस्थेतु सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
  69. नन्दन भगवान शिव का बेटा
  70. सिद्धांथ सफलता और उपलब्धियों की गुरु
  71. पीताम्बर पीले वस्त्र धारक
  72. प्रमोद आनंद
  73. पुरुष अद्भुत व्यक्तित्व
  74. रक्त लाल रंग के शरीर वाला
  75. रुद्रप्रिय शिव के चहेते
  76. सर्वदेवात्मन सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
  77. सर्वसिद्धांत कौशल और बुद्धि के दाता
  78. सर्वात्मन ब्रह्मांड के रक्षक
  79. ओमकार ओम के आकार वाला
  80. शशिवण रंग चंद्रमा को भाता हो
  81. शुभगुणकानन सभी गुण के गुरु
  82. श्वेता जो सफेद रंग में शुद्ध है
  83. सिद्धिप्रिय इच्छापूर्ति वाले
  84. स्कन्दपूर्व कार्तिकेय के भाई
  85. सुमुख शुभ मुख वाले
  86. स्वरुप सौंदर्य के प्रेमी
  87. तरुण जिसकी कोई आयु न हो
  88. उद्दण्ड शरारती
  89. उमापुत्र पार्व के बेटे
  90. वरगणपति  अवसरों के स्वामी
  91. वरप्रद  इच्छाओं के अनुदाता
  92. वरदविनायक सफलता के स्वामी
  93. वीरगणपति वीर प्रभु
  94. विद्यावारिधि बुद्धि की देव
  95. विघ्नहर बाधाओं को दूर करने वाले
  96. विघ्नहर्ता बुद्धि की देव
  97. विघ्नविनाशन बाधाओं के नाशक
  98. विघ्नराज सभी बाधाओं के मालिक
  99. विघ्नराजेन्द्र बाधाओं के भगवान
  100. विघ्नविनाशाय बाधाओं के नाशक
  101. विघ्नेश्वर बाधाओं के हरने वाले
  102. विकट अत्यंत विशाल
  103. विनायक सब का भगवान
  104. विश्वमुख  ब्रह्मांड के गुरु
  105. विश्वराजा संसार के स्वामी
  106. यज्ञकाय सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
  107. यशस्कर प्रसिद्धि,भाग्य के स्वामी
  108. यशस्विन सबसे लोकप्रिय देव
  109. योगाधिप ध्यान के प्रभु

भगवान गणेश से जुड़ी कथा

10924.gif

पहली कहानी : गणेश के एकदंत बनने की कथा- आपने देखा होगा भगवान श्री गणेश की मूर्ति में एकदन्त आधा टुटा हुआ है | यह दांत कैसे टुटा , इसके पीछे पुराणों में अलग अलग कथाये बताई गयी है | कही लिखा हुआ है विष्णु के अवतार चिरंजीवी भगवान परशुराम जी ने इसे तोडा है | तो कही महाभारत काव्य को लिखने के लिए | कही यह भी लिखा है की कार्तिकेय ने खेल खेल में गणेश जी का दन्त तोड़ दिया था |

पूरी कथा : कैसे बने गणेश जी एकदंत , कथा

दूसरी कहानी : गणेश और तुलसी जी की कहानी- तुलसी जी और गणेश ने एक दुसरे को श्राप दे दिया जिससे तुलसी का विवाह एक असुर से तो गणेश जी का विवाह अकारण ही हो गया | तभी से तुलसी जी गणेश जी की पूजा में नही चढ़ाई जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी के तुलसी नही चढ़ाई जाती है |

तीसरी कहानी : गणेश ने किया कुबेर का घमंड चूर- एक बार धन के देवता कुबेर को अत्यंत घमंड हो गया | उन्होंने महा भोज आयोजित किया | गणेश जी को उन्हें सबक सिखाना था | इसलिए लम्बोदर गणेश ने कुबेर के सारे खजाने ही खा लिए |

पूरी कथा : कथा , कैसे गणेश ने कुबेर का घमंड दूर किया 

चौथी कहानी : कैसे हुआ गणेश का विवाह एक चूहे ने दिखाई चतुराई- गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश के रूप के कारण उनका विवाह हो नही पा रहा था | वे और उनके मूषक इसी कारण चिढचिढ़े हो गये | जब भी कही विवाह होता उनका मूषक विवाह में खाद सामग्री कुतरना शुरू कर देता।

पूरी कथा : कैसे हुआ गणेश जी का विवाह |

पांचवीं कहानी : गणेश को क्यों प्रिय है दूर्वा- गणेश ने बार बार अवतार लेकर देवी देवताओ और मनुष्यों की रक्षा की है | पर एक बार एक ऐसा असुर हुआ जिसे निगलने से गणेश जी तड़पने लगे|

पूरी कथा : कथा गणेश और दूर्वा की – क्यों गणेश जी को दूर्वा प्रिय है |

छठी कहानी :  इस कारण गणेश और लक्ष्मी के साथ पूजे जाते है- गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा दीपावली पर की जाती है | गणेश प्रथम पूज्य देवता है तो धन की देवी लक्ष्मी जी को माना गया है | व्यक्ति के पास धन के साथ बुद्धि होना भी जरुरी है , इसी कारण गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ की जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश और लक्ष्मी की पूजा एक साथ की जाती है |

सातवीं कहानी :  क्यों गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है – बुद्धि के देवता ने अपने ज्ञान के बल पर छोटे से मूषक से सम्पूर्ण ब्रहमांड के साथ चक्कर लगा लिए थे | तब शिव ने इन्हे प्रथम पूज्य का वरदान दिया |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता का वरदान मिला |

आठवीं कहानी : चंद्रमा को गणेश का श्राप- आपने देखा होगा की भगवान चन्द्र  हर दिन अलग अलग आकार के होते है | अमावस्या पर वे दिखाई नही देते तो पूर्णिमा पर पुरे दिखाई देते है | यह सब हुआ गणेश जी के चन्द्र देवता पर रुष्ट होने के कारण

पूरी कथा :  क्यों गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया |

श्रीगणेश की प्रतिमा के दाईं या बाईं सूंड का क्या है रहस्य

दाईं सूंड- जिस प्रतिमा में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ है दक्षिण दिशा या दाईं बाजू। दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है। जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है।

  • इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को ‘जागृत’ माना जाता है।
  • दाईं सूंड वाली मूर्ति की पूजा में कर्मकांड का विषेश महत्व होता है।
  • पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक होता है।

बाईं सूंड जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है।

  • पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है।
  • इसकी पूजा प्रायिक पद्धति से की जाती है।
  • इन  गणेश जी को गृहस्थ जीवन के लिए शुभ माना गया है।
  • इन्हें विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं लगती। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
  • थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं। त्रुटियों पर क्षमा करते हैं।

गणेश जी का हर अंग है ज्ञान की पाठशाला

गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। इसलिए हर साल भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश उत्सव मनाया जाता है। गणेश को वेदों में ब्रह्मा, विष्णु, एवं शिव के समान आदि देव के रूप में वर्णित किया गया है। इनकी पूजा त्रिदेव भी करते हैं। भगवान श्री गणेश सभी देवों में प्रथम पूज्य हैं। शिव के गणों के अध्यक्ष होने के कारण इन्हें गणेश और गणाध्यक्ष भी कहा जाता है। भगवान श्री गणेश मंगलमूर्ति भी कहे जाते हैं क्योंकि इनके सभी अंग जीवन को सही दिशा देने की सिख देते हैं।

बड़ा मस्तक- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए।

छोटी आंखें- गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाले व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रकृति के होते हैं। गणेश जी की छोटी आंखें यह ज्ञान देती है कि हर चीज को सूक्ष्मता से देख-परख कर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी धोखा नहीं खाता।

सूप जैसे लंबे कान- गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं। बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देते हैं। गणेश जी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं उसे बाहर ही छोड़ दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें।

गणपति की सूंड- गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें ज्ञान देती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी दुखः और गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता है। शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हो उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश की पूजा करनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने एवं ऐश्वर्य पाने के लिए बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश की पूजा लाभप्रद होती है।

बड़ा उदर- गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण इन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली का प्रतीक होता है। गणेश जी का बड़ा पेट हमें यह ज्ञान देता है कि भोजन के साथ ही साथ बातों को भी पचना सीखें। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है वह हमेशा ही खुशहाल रहता है।

एकदंत- बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्घ हुआ था। इस युद्घ में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इस समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेश जी की बुद्घिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए।

गणपति से जुड़ी ऐसी कथाएं जो हमें जीवन का सही मार्ग दिखाती हैं

जब हुए थे माता की सेवा में उपस्थित- गणेश जी के जीवनकाल से जुड़ी यदि सबसे पहली कोई कथा का मनुष्य स्मरण करता है, तो वो माता पार्वती द्वारा गणेश की रचना. यह तब की बात है जब माता पार्वती को स्नान के लिए जाना था लेकिन उनके द्वार पर पहरा देने के लिए कोई नहीं था, तभी मां ने अपने तन की मैल से एक बच्चे की रचना की, वो थे गणेश.

मां पार्वती ने गणेश को द्वारपाल बनाकर किसी को भी अंदर ना आने का आदेश दिया. कुछ ही क्षणों में वहां भगवान शिव उपस्थित हुए, जिन्हें गणेश ने अंदर जाने के अनुमति नहीं दी. अनेक यत्नों के बाद भी जब गणेश ने भगवान शिव को अंदर ना जाने दिया तो इस बात से अंजान कि गणेश उन्हीं का पुत्र है, शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने शस्त्र से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया. अपने पुत्र गणेश को इस तरह धरती पर कटे हुए धड़ के साथ जब माता ने देखा तो वे बेहद क्रोधित हो गईं और शिव से कहा कि वे गणेश को पहले जैसा जीवित कर दें. तभी शिव ने हाथी का सिर गणेश के शरीर से जोड़ दिया.

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे कुछ भी हो जाए हमें अपना काम बिना किसी स्वार्थ व ध्यान को ना भटकाते हुए करना चाहिए. चाहे कोई भी आवस्था हो हमें अपने से बड़ों द्वारा मिले आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए.

आपके पास जो है उसे ही उपयोगी बनाएं- यह तब की बात है जब मां पार्वती और भगवान शंकर ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिक व गणेश की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. दोनों ने अपने पुत्रों को दुनिया का तीन बार चक्कर लगाने को कहा और विजेता को इनाम के रूप में सबसे स्वादिष्ट फल देने का वादा किया. यह सुनकर कार्तिक अपने मोर पर बैठकर दुनिया का भ्रमण करने निकल गए लेकिन दूसरी ओर भगवान गणेश ने अपने माता पिता के ही चारों ओर चक्कर लगाना शुरु कर दिया. जब उनसे इस बात का कारण पूछा गया तो वे बोले कि उनका संसार स्वयं उनके माता पिता हैं, तो वे समस्त संसार का भ्रमण क्यों करें?

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे पास जो भी उपस्थित चीजें हैं हमें उनमें से सबसे मूल्यवान को चुनकर उसे उपयोगी बनाना चाहिए ना कि बिना कुछ सोचे समझे जो चीज हमारे पास ना हो उसके लिए विलाप करना चाहिए. इसके अलावा यह कथा हमें अपने माता पिता को सबसे उच्च मानने की सीख भी देती है.

अच्छे कर्मों के लिए खुद का बलिदान भी करें- भगवान गणेश ने महान ऋषि वेद व्यास के कहने पर महाभारत का महान ग्रंथ स्वयं अपने हाथों से लिखा था. इस ग्रंथ को लिखने के लिए व्यास और गणेश के बीच एक समझौता हुआ था कि व्यास इसे बिना रुके सुनाएंगे व गणेश भी बिना रुके लिखेंगे. लिखते समय अचानक भगवान गणेश की कलम टूट गई लेकिन लिखावट में कोई बाधा ना आए इसके लिए भगवान गणेश ने अपना दंत तोड़कर कलम के रूप में इस्तेमाल किया.

  • सीख: अपने इस महान कार्य से भगवान गणेश हमें यह सीख देतें हैं कि जब भी किसी के भले के लिए हम कोई काम कर रहे हैं तो निस्वार्थ होकर हमें खुद का या अपनी किसी वस्तु का बलिदन करने से पीछे नहीं हटना चाहिए.

क्रोध को शांत करना सीखें- एक बार महान योद्धा परशुराम कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने आए लेकिन वहां गणेश द्वारा उनको भगवान शिव से मिलने से रोक दिया गया. जल्द क्रोधित हो जाने वाले परशुराम ने गणेश जी को युद्ध का आमंत्रण दिया. इस युद्ध में परशुराम ने गणेश जी के बाएं दांत पर प्रहार कर उसे तोड़ दिया. फलतः मां पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं. उन्होंने कहा कि परशुराम क्षत्रियों के रक्त से संतुष्ट नहीं हुए इसलिए उनके पुत्र गणेश को हानि पहुंचाना चाहते हैं. बाद में गणेश जी ने स्वयं हस्तक्षेप कर मां पार्वती को प्रसन्न किया. गणेश जी की इस अनुकम्पा को देख परशुराम जी ने उन्हें अपना परशु प्रदान कर दिया.

  • सीख: पुराणों में विख्यात इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमें खुद के व दूसरों के क्रोध को भी शांत करना आना चाहिए. यदि मनुष्य जीवन के संकटों को हंसी खुशी संभालना सीख जाए तो उसका सफल होना निश्चित है.

गणपति का प्रकृति प्रेम

  • गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहा उनका वाहन है, नंदी उनका मित्र और अभिभावक, मोर और सांप परिवार के सदस्य हैं, पर्वत आवास है, वन क्रीड़ा स्थल, आकाश तले निवास अर्थात छत नाम की कोई चीज है। उनका प्रचलित रूप गढ़ने में नदी की बड़ी भूमिका रही है। मान्यता है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक छोटी-सी आकृति गढ़ी और उसे गंगा में नहला दिया। गंगा के स्पर्श से आकृति में जान आई  और वह विशाल हो गई। पार्वती ने उसे पुत्र कहा, तो देवताओं ने उसे गांगेय  कहकर संबोधित किया।
  • गणेश, गणपति के रूप में गणों के अधिपति हैं, उन्हें जल का अधिपति भी माना गया है। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। उनके दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है। तीसरे हाथ में संगीत की प्रतीक वीणा है। चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या त्रिशूल है। गणेश के नाम में प्रकृति से उनके एकात्म होने का रहस्य छिपा है। यह सर्वमान्य है कि काव्य के छंद की उत्पत्ति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी।
  • गणेश, छंद शास्त्र के आठों गणों के अधिष्ठाता देवता  हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें गणेश नाम दिया गया। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है। जब तक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित न की जाए, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। 
  • शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव का एक प्रमाण यह भी है कि किसी भी मंदिर, घर या दुकान में  गणेश की मूर्ति रखते समय यह ध्यान देना होता है कि उनके पैर जमीन का निश्चित रूप से स्पर्श करें। यदि उनके पैर भूमि से सटे न हों, तो अनिष्ट की आशंका होती है। प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक होने के कारण वह एक मासूम, शक्तिशाली, योद्धा, विद्वान, कल्याणकारी, शुभ-लाभ और कुशल-क्षेम के दाता हैं। 
  • गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। उन्हें आदिदेवता, देवताओं में प्रथम पूज्य और आदिपूज्य भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति पहले, बाकी तमाम शक्तियां  और उपलब्धियां उसके बाद। हिंदू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने और लिखने की परंपरा है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए  की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बैठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि तथा सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा  संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है। 
  • गणेश को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू है और इस संकट में हम  उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना और पाना है, तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हमारे भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और  जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं।

विदेशों में भी श्रीगणेश की पूजन परंपराएं

गणेशजी की मूर्तियां अफगानिस्तान, ईरान, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, थायलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, चाइना, मंगोलिया, जापान, इंडोनेशिया, ब्रुनेई, बुल्गारिया, मेक्सिको और अन्य लेटिन अमेरिकी देशों में मिल चुकी हैं।

  • जापान में भगवान गणपतिजी के 250 मंदिर हैं। जापान में श्रीगणेश को ‘कंजीटेन’ के नाम से जाना जाता है। वे वहां सौभाग्य और खुशियां लाने वाले देवता है।
  • ऑक्सफॉर्ड में छपे एक पेपर के अनुसार श्रीगणेश प्राचीन समय में सेंट्रल एशिया और विश्व की अन्य जगहों पर पूजे जाते थे।
  • श्रीगणेश की मूर्तियों और चित्रों की प्रदर्शनी दुनिया के लगभग सभी खास म्यूजियम और आर्ट गैलरियों में लग चुकी हैं। खासतौर पर यूके, जर्मनी, फ्रांस और स्वीट्जरलैंड में।
  • आयरिश लोगों का गणेशजी द्वारा भाग्य अच्छा रखने में विश्वास है। नई दिल्ली स्थित आयरलैंड एंबेसी में प्रवेश द्वार पर ही श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित की गई है।
  • गणेशजी ग्रीक सिक्के पर भी हैं। हाथी के सिर वाले भगवानों की तस्वीरें भारतीय-ग्रीक सिक्कों पर मिलीं। यह सिक्के करीबी प्रथम और तीसरी सेंचुरी बीसी के आसपास के थे।
  • इंडोनेशिया के करेंसी के नोटों पर भी श्रीगणेश की तस्वीर होती है। इंडोनेशियाई रुपिया का 20,000 का नोट। इस नोट पर की हजर देवान्तर के साथ भगवान गणेश की भी तस्वीर छपी है।

बॉलीवुड और श्रीगणेश

हिंदी फिल्मों में भी दिखती है गणेश उत्सव की धूम-

निर्माता निर्देशक दादा साहब फाल्के की 1925 में रिलीज फिल्म.. गणेशा उत्सव.. संभवत. पहली फिल्म थी जिसमें भगवान गणेश की महिमा को रपहले पर्दे पर पेश किया गया था।

1969 में फिल्म पुजारिन का गीत हो गणपति बप्पा मोरया

1977 में रिलीज फिल्म जय गणेश का गीत- जय गणेश जग गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा

1981 में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म हम से बढकर कौन का गीत देवा हो देवा गणपति देवा

1990 में फिल्म अग्निपथ का गीत गणपति अपने गांव चले कैसे हमलों चैन पडे

1999 में रिलीज वास्तव का गीत जय देव जय देव

2006 शाहरूख खान की फिल्म डॉन का गीत मोरया रे

2007 में बच्चों पर आधारित फिल्म माई फ्रेंड गणेशा और बाल गणेशा आई थी

2009 में रिलीज फिल्म ‘वांटेड’ का गीत ‘जलवा… इस गाने में गणेश चतुर्थी को बखूबी दिखाया गया था

2012 में रिलीज अग्निपथ का गीत देवा श्री गणेशा…

giphy.gif

Posted in Bollywood, News, Personality

100 करोड़ का ‘CLUB’ या 100 करोड़ का ‘FUNDA’

Picture2

  • 100 करोड़ क्लब यानी ऐसा क्लब जिसमें भारतीय सिनेमाघरों से 100 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा का कलेक्शन करने वाली फिल्में शामिल हैं।
  • 100 करोड़ क्लब मेंबैंग बैंग को मिलाकर 2014 तक 32 फिल्में शामिल हो चुकी हैं।
  • 100 करोड़ क्लब में जगह बनाने वाली बॉलीवुड की पहली फिल्म थी ‘गजनी’, 2008 में हुई थी रिलीज।
  • 100 करोड़ क्लब जगह बनाने वाली दूसरी फिल्म थी ’थ्री-इडियट’ ये भी अमिर खान की ही।
  • थ्री-इडियट्स, चेन्नई-एक्सप्रेस, धूम-3, कृष-3 और किक पांच ऐसी फिल्में हैं जिन्होंने डबल सेंचुरी यानी 200 करोड़ से ज्यादा की कमाई भारत में की है।
  • सर्वाधिक कलेक्शन का रिकॉर्ड धूम-3 के नाम है। इस फिल्म ने भारत में 260 करोड़ रुपये के साथ दुनियाभर में 533 करोड़ का  कलेक्शन किया था।
  • क्या शाहरुख की ‘हैप्पी न्यू ईयर‘ तोड़ पाएंगी धूम-3 का रिकॉर्ड???

Bollywood-s-100-Crore-Club-Now-Has-21-Films-Pic-1 (1)

सलमान खान- 100 करोड़ के क्लब का ‘KING’ सलमान खान को कहा जा सकता है क्योंकि उनकी सबसे ज्यादा सात फिल्में (एक था टाइगर, दबंग-2, दबंग, रेडी, बॉडीगार्ड, जय हो और किक) इस क्लब में शामिल हैं। सात में से किक200 करोड़ (भारतीय कलेक्शन के मुताबिक) के क्लब में शामिल है।

timthumb

शाहरुख खान- सलमान के बाद दूसरे नंबर पर शाहरुख खान हैं उनकी 5 फिल्में 100 करोड़ के क्लब में शामिल हैं, चेन्नई एक्सप्रेस, रा-वन, जब तक है जान, डॉन 2 और माई नेम इस खान। पांच में से चेन्नई एक्सप्रेस 200 करोड़ (भारतीय कलेक्शन के मुताबिक) के क्लब में शामिल है।

अजय देवगन- चार फिल्में इस क्लब में शामिल हैं। अजय देवगन की सन ऑफ सरदार, गोलमाल-3, सिंघम-रिटर्न्स और बोल बच्चन शामिल हैं।

  • शाहरुख  और अजय  की ‘Fight’… इस क्लब में शामिल दो फिल्में, जब तक है जान और सन ऑफ सरदार, एक ही दिन रिलीज हुई हैं।

आमिर खान- तीन फिल्में (3-इडियट्स, धूम-3 और गजनी), आमिर के नाम 200 करोड़ क्लब में दो फिल्में (3-इडियट्स और धूम-3) का रिकॉर्ड है।

अक्षय कुमार- तीन फिल्में (राउडी राठौर, हाउसफुल-2 और हॉलिडे)

रितेश देशमुख के नाम पर भी तीन फिल्में हैं, लेकिन इन फिल्मों की कामयाबी में उनका योगदान खास नहीं है सिवाय ‘एक विलेन’ को छोड़ कर।

रितिक रोशनदो फिल्में इस क्लब में शामिल हैं, लेकिन डबल सेंचुरी नहीं लगा पाईं।

रणबीर कपूर और जॉन अब्राहम ने दो-दो फिल्में इस क्लब को दी हैं।

सैफ अली खान जैसे सितारे को एक फिल्म से ही संतोष करना पड़ रहा है।

रणवीर सिंह, सिद्धार्थ मल्होत्रा और अर्जुन कपूर के नाम भी एक-एक फिल्में इस क्लब में हैं। ये इस बात का संकेत है कि आने वाला वक्त इनका हो सकता है।

फरहान अख्तर, जिन्हें कि स्टार नहीं माना जाता है, ने भी अपने दम पर ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी शानदार फिल्म इस क्लब को दी है।

ये तो थी कलाकारों की बात.. अब बारी निर्देशकों की

रोहित शेट्टी एकमात्र निर्देशक ऐसे हैं जिनकी चार फिल्में (चेन्नई-एक्सप्रेस, बोल बच्चन, सिंघम रिटर्न्स  और गोलमाल-3) इस क्लब की मेंबर हैं। तभी तो उन्हें ‘RO-HIT’ शेट्टी कहा जाता है। धूम-3 तथा चेन्नई एक्सप्रेस ऐसी दो फिल्में हैं जिन्होंने सौ करोड़ का आंकड़ा छूने में महज 3 दिन का समय लगा। बोल बच्चन को सौ करोड़ का आंकड़ा छूने में सर्वाधिक 45 दिन का समय लिया। फिल्म (चेन्नई-एक्सप्रेस) ने दो सौ करोड़ का आंकड़ा छुआ।

निर्देशक साजिद नाडियाडवाला इस क्लब के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं जिनके द्वारा निर्देशित पहली फिल्म (किक) ने ही दो सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया।

निर्देशकों के बाद… अब बात अभिनेत्रियों की

हीरोइन की बात की जाए तो सोनाक्षी सिन्हा सबसे आगे हैं। सौ करोड़ क्लब में उनकी पांच फिल्में (हॉलिडे, सन ऑफ सरदार, राउडी राठौर, दबंग, दबंग-2) शामिल हैं। तभी तो उन्हें बॉलीवुड की ‘लकी गर्ल’ कहा जाता है।

चार हीरोइनों के नाम चार-चार फिल्में हैं।

  1. दीपिका (चेन्नई एक्सप्रेस, ये जवानी है दीवानी, रामलीला, रेस 2),
  2. प्रियंका (कृष 3, अग्निपथ, डॉन 2, बर्फी),
  3. करीना (बॉडीगार्ड, 3 इडियट्स, रा-वन, गोलमाल 3)
  4. असिन (रेडी, गजनी, हाउसफुल 2, बोल बच्चन)…असिन के नाम चार फिल्मों से जुड़े होने के बावजूद उन्हें बड़ा स्टार नहीं माना जाता।
  5. कैटरीना कैफ के नाम पर तीन फिल्में (एक था टाइगर, जब तक है जान और धूम 3)
  6. जैकलीन भी तीन फिल्मों (किक, रेस 2 और हाउसफुल 2) को देकर तेजी से उभर रही हैं
  7. श्रद्धा कपूर (एक विलेन) और आलिया भट्ट (2 स्टेट्स) भी चुनौती बन कर उभर रही हैं

2014 का ‘RECORD’

बॉलिवुड में हर साल 100 से भी ज्यादा फिल्में बनती हैं लेकिन उनमें से गिनी चुनी फिल्में ही ऐसी हैं जो 100 करोड़ क्लब तक पहुंच पाती हैं। 2014 में रिलीस हुई उन फिल्मों पर जो 100 करोड़ क्लब में शामिल हुईं…

  1. बैंग बैंग- 2 अक्टूबर को रिलीस हुई रितिक-कटरीना स्टारर फिल्म ‘बैंग बैंग’ दर्शकों को काफी पसंद आ रही है और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकॉर्ड कायम कर लिए हैं। खास बात ये है कि ‘बैंग बैंग’ अपनी रिलीस के महज 5 दिन के अंदर ही 100 करोड़ क्लब में शामिल हो चुकी है। और फिल्म दुनिया भर में बेहतरीन बिजनेस कर रही है।
  2. किक- इसी साल ईद पर आयी सलमान खान की फिल्म ‘किक’ ने भी वैसा ही बिजनेस किया था जैसी उससे उम्मीद की जा रही थी। फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिली और ‘किक’ भी महज 5 दिनों में 100 करोड़ क्लब में शामिल हो गई थी। कुल कमाई की बात करें तो फिल्म ‘किक’ अबतक 233 करोड़ का कारोबार कर चुकी है।
  3. सिंघम रिटर्न्स- 2011 में आयी रोहित शेट्टी और अजय देवगन की फिल्म ‘सिंघम’ की ही तरह 2014 में आए फिल्म के सीक्वल ‘सिंघम रिटर्न्स’ ने भी अच्छा कारोबार किया। और रिलीस के 5 से 6 दिन के अंदर ही ‘सिंघम रिटर्न्स’ भी 100 करोड़ क्लब में शामिल हो गई थी।
  4. एक विलेन- सिद्धार्थ मल्होत्रा, रितेश देशमुख और श्रद्धा कपूर स्टारर फिल्म ‘एक विलेन’ के म्यूजिक को जितना पसंद किया गया, फिल्म को उतनी ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। बावजूद इसके फिल्म अपनी रिलीस के 14 दिन बाद 100 करोड़ क्लब में शामिल हो गई थी। फिल्म ने 105 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया।
  5. हॉलिडे- इसी साल जून में आयी अक्षय कुमार की ऐक्शन थ्रिलर फिल्म हॉलिडे…फिल्म ने कुल 112 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया और 100 करोड़ क्लब तक पहुंचने में फिल्म को 15 दिन का वक्त लगा था।
  6. 2 स्टेट्स- चेतन भगत के नॉवल ‘2 स्टेट्स’ पर बनी अर्जुन कपूर और आलिया भट्ट की फिल्म ‘2 स्टेट्स’ ने भले ही बहुत ज्यादा पैसे ना कमाएं हो लेकिन फिल्म को दर्शकों का काफी प्यार मिला। फिल्म ने 104 करोड़ का कारोबार किया और 100 करोड़ क्लब तक पहुंचने में फिल्म को 28 दिन का वक्त लगा।

TOP 15 BOLLYWOOD MOVIES 100 CRORE CLUB

FILM

Picture3

आखिर बॉलीवुड ने ऎसा क्या फॉर्मूला ईजाद कर लिया है, जिसके चलते फिल्में 100 करोड़ के क्लब में हो जाती हैं शामिल?

डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स, सैटेलाइट राइट्स, म्यूजिक राइट्स रिलीज होने से पहले ही बचे कर निर्माता करोड़ो की कमाई कर लेते हैं

  • FOR EXAMPLE: (The worldwide distribution rights were sold to Yash Raj Films for INR 125CR, the satellite rights were sold to Zee Network for INR 65CR and the music rights to T-Series for INR 12CR, earning a total pre-release revenue of INR 202CR.)

डिजिटाइजेशन बॉक्स ऑफिस

  • जहां तक कारोबार की बात है, तो निश्चित तौर पर डिजिटाइजेशन बॉक्स ऑफिस के कारोबार को बढ़ाने में सबसे ज्यादा कारगार साबित हो रहा है।
  • उदाहरण के लिए, पहले कोई भी बड़ी फिल्म करीबन 500 थिएटर्स में रिलीज होती थी। अब औसतन एक बड़ी फिल्म करीब 2000-2500 स्क्रीन्स पर रिलीज होती है।
  • सैटेलाइट डिलीवरी से यह सम्भव हुआ है कि फिल्म रिलीज के पहले सप्ताह का पहला शो, जो कि फिल्म के लिए बहुत महत्व रखता है।
  • इस शो में ज्यादा से ज्यादा दर्शकों पहुंचते हैं, जिसके कारण बॉक्स ऑफिस के कलेक्शंस में भारी वृद्धि होती है।
  • यही वह मुख्य वजह है, जिसके चलते बालाजी की क्या सुपर कूल हैं हम जैसी एक हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्म पहले तीन दिन में ही 26 करोड़ रूपए का आंकड़ा पार कर जाती है।

15 हजार करोड़ का बॉलीवुड

  • 2011 में फिल्म उद्योग का कुल कारोबार करीब 9300 करोड़ रूपए तक पहुंच गया था। विश्लेषकों के अनुसार, सिने जगत का यह कारोबार 10 प्रतिशत के चक्रवृद्धि विकास दर से आगे बढ़ेगा और 2016 में इसके 15000 करोड़ का आंकड़ा छू जाने की आशा है।

बढ़ते थिएटर्स और मल्टीप्लेक्स

  • पिछले दो साल के दौरान देश में स्क्रीन्स की संख्या में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और औसतन 15 प्रतिशत ही सिनेमा टिकटों की कीमतें बढ़ी हैं।
  • देश में करीब 11,000 सिनेमा हॉल में से 1000 मल्टीप्लेक्स स्क्रीन हैं। इन मल्टीप्लेक्स स्क्रीन में करीब 750 इन 8 बड़े शहरों (दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे और बेंगलुरु) में ही हैं जबकि सिर्फ 250 के करीब मल्टीप्लेक्स छोटे शहरों के खाते में हैं।
  • फिल्मों से होने वाली आय में बॉक्स ऑफिस से प्राप्त राजस्व का प्रमुख हिस्सा है, इसमें काफी वृद्धि हुई है और इस तरह फिल्म की आय का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा थिएटर्स से संग्रहित राशि से प्राप्त होता है और बाकी राशि सैटेलाइट, ओवरसीज, संगीत और डिजीटल राइट्स से प्राप्त होती है।

कितने सिनेमाहॉल (मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन) में एक साथ रिलीज

 as

100 करोड़ क्लब में शामिल होने का नया फॉर्मूलाटीवी पर दिखाने का अधिकार

फिल्म इंडस्ट्री में 100 करोड़ की रेस अब छोटे होने वाली है… चर्चा में रहने वाली और बड़ी स्टारकॉस्ट से सजी फिल्में रिलीज से पहले ही 100 करोड़ के क्लब में शामिल हो जा रही हैं… इंडस्ट्री पैसा कमाने के नए फॉर्मूले पर चल चुकी है… टीवी पर दिखाने का अधिकारयह फॉर्मूला है रिलीज से पहले टीवी पर फिल्म को सबसे पहले दिखाने का अधिकार के बेचने का।

  • आमिर खान की दो फिल्मों- हाल ही आमिर खान की दो फिल्मों ‘पीके’ और ‘धूम 3’ के सेटलाइट अधिकार एक मनोरंजन चैनल द्वारा खरीद लिए गए हैं। ‘पीके’ को 118 करोड़ में ‘धूम 3’ को 75 करोड़ में खरीद लिया गया है।
  • शाहरुख की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस-  इसके अलावा ईद के मौके पर रिलीज हो रही शाहरुख की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ को भी रिलीज के पहले ही 105 करोड़ में एक टीवी चैनल द्वारा खरीद लिया गया है। आने वाली इन तीन फिल्मों का टीवी चैनल द्वारा महंगी दरों में खरीदना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में 100 करोड़ का आंकड़ा छोटा पड़ने वाला है।
  • अजय और सलमान पहले ही कर चुके हैं डील- अजय देवगन और सलमान खान अपनी-अपनी फिल्मों को टीवी पर दिखाने की डील पहले ही कर चुके हैं। अजय देवगन ने एक मनोरंजक चैनल के साथ चार सौ करोड़ रुपये का करार किया है। सलमान खान उनसे आगे हैं उन्हें उनकी फिल्मों के दिखाने के एवज में पांच सौ करोड़ मिलेंगे। इस करार के अनुसार साल 2018 तक रिलीज होने वाली इन दोनों की सभी सभी फिल्मों के प्रसारण अधिकार उसी चैनल के पास ही रहेंगे। इससे पहले सलमान खान भी एक अन्य मनोरंजन चैनल के साथ ऐसा ही करार कर चुके हैं। सलमान ने पांच सालों के लिए यह करार पांच सौ करोड़ रुपये में किया था। अपनी हालिया रिलीज हुई फिल्मों की सफलता के चलते अजय सैटेलाइट चैनलों पर काफी लोकप्रिय हैं। ‘बोल बच्चन’, ‘सिंघम’, ‘सन ऑफ सरदार’ और ‘गोलमाल’ सीरिज की फिल्मों ने जमकर कमाई की।

हैप्पी न्यू ईयर‘… क्या शाहरुख तोड़ पाएंगे अपना ही रिकॉर्ड???

Picture1

  • 150 करोड़ रुपये की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ लेकर दिवाली पर शाहरुख खान आ रहे हैं
  • दिवाली पर शाहरुख की फिल्में कभी असफल नहीं हुईं लिहाजा किंग खान ने अपनी इस मेगा बजट की फिल्म के लिए सबसे सुरक्षित सप्ताह को चुना
  • विभिन्न राइट्स को बेच शाहरुख ने 202 करोड़ रुपये जमा कर‍ लिए हैं, यानी कि रिलीज के पहले ही शाहरुख ने फायदा कर लिया है
  • (The worldwide distribution rights were sold to Yash Raj Films for INR 125CR, the satellite rights were sold to Zee Network for INR 65CR and the music rights to T-Series for INR 12CR, earning a total pre-release revenue of INR 202CR.)
  • आदित्य चोपड़ा ने लगभग 125 करोड़ रुपये में फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन के अधिकार खरीदे हैं
  • देश के साथ-साथ विदेश में भी शाहरुख खान लोकप्रिय हैं, लिहाजा दोनों ओर से फिल्म के कलेक्शन अच्छे आने की उम्मीद है
  • फिल्म दुनियाभर में 6000 मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमाहॉल में रिलीज होगी
  • भारत में 5000 और विदेशों में 1000 मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमाहॉल में
  • दिवाली के समय आमतौर पर फिल्में चल ही जाती है, लेकिन ‘हैप्पी न्यू ईयर’ को पूरे सप्ताह बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा
  • हैप्पी न्यू ईयर’ 24 अक्टूबर को सिनेमाघरों में आ रही है. दर्शक भी छुट्टी के समय कोई बडी फिलम देखना चाहते है
  • शाहरुख खान के ‘रेड चिलीज एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड’ के बैनर तले बनी फिल्म काफी उत्साहित है कि अब सभी आयु वर्गों के दर्शक फिल्म देख सकेंगे

क्‍या शाहरुख-फराह की जोडी इस बार भी लगा पाएगी हैट्रिक

फराह खान के साथ शाहरुख ‘ओम शांति ओम’ और ‘मैं हूं न’ फिल्‍म कर चुके है. फराह और शाहरुख बहुत अच्‍छे दोस्‍त है

  • मैं हूं न’ : वर्ष 2004 में फराह खान की फिल्‍म मैं हूं न’ को भी दर्शकों ने खासा पसंद किया. फिल्‍म में शाहरुख खान, सुष्मिता सेन, जायद खान, अमृता राव, बोमन ईरानी और सुनील शेट्टी मुख्‍य भूमिकाओं में थे. फिल्‍म में जायद खान ने शाहरुख के भाई की भूमिका अदा की थी. फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस पर धमाकेदार कमाई की थी. फराह और शाहरुख की दोस्‍ती रंग लाई.
  • ओम शांति ओम’ : वर्ष 2007 में फराह खान निर्देशित फिल्‍म ‘ओम शांति ओम’ में शाहरुख ने काम किया था. फिल्‍म का नृत्‍य निर्देशन भी फराह खान ने ही किया था. फिल्‍म में शाहरुख के अलावा दीपिका पादुकोण, श्रेयस तलपडे, अर्जुन रामपाल और किरण खेर मुख्‍य भूमिकाओं में थे. फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस पर 149 करोड की कमाई की थी. अर्जुन रामपाल ने फिल्‍म में खलनायक की भूमिका निभाई थी.
Posted in Bollywood, News, Personality, Religion, Yatra

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

dbe0944ad52e3a5b5d06b0919d3a120d

योगेश्वर श्रीकृष्ण अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। उनका चंचल बचपन हो या श्रेष्ठ आदर्श जीवन, उनके चमत्कार हों या श्रीमद्भगवदगीता में उनके द्वारा अर्जुन को दिया गया धर्म और कर्म का उपदेश। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब कण-कण में विद्यमान है। श्रीकृष्ण निष्काम कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्ज महान पुरुष थे। श्रीकृष्ण लगभग 5,200 वर्ष से कुछ पूर्व (द्वापरयुग) इस भारत भूमि में जन्मे थे। हिंदू धर्म के अनुसार त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ। श्रीकृष्ण को द्वापरयुग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। श्रीकृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तुत रूप से लिखा गया है।

वर्तमान काल में भी श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन उतना ही प्रासंगिक है जितना द्वापरयुग में था। श्रीमद्भगवदगीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से धर्म का समझाया है- जो मनुष्य धर्म का पालन करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है और जो धर्म का पालन न कर अधर्म का सेवन करता है धर्म भी उसकी रक्षा नहीं करता।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिभज़्वति भारत:।

अभ्युत्थानमधमज़्स्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (चतुथज़् अध्याय, श्लोक 7)

अर्थात्- इस श्लोक का अथज़् है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।

धमज़्संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥ (चतुथज़् अध्याय, श्लोक 8)

अर्थात्- इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कमिज़्यों के विनाश के लिए… और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

k2.jpg

जिस तरह श्रीमद्भगवदगीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से धर्म को समझाया है उसी प्रकार कर्म का भी पूर्ण वर्णन किया है। गीता के माध्यम से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अनासक्त कर्म यानी ‘फल की इच्छा किए बिना कर्म’ करने की प्रेरणा दी। 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थात्: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।

k3.jpg

de45e0a9a213ec8354c0447bf133dfc1

कृष्ण और उनका जीवन

gif1RvQLobaYW

श्रीकृष्ण पूर्ण योगी थे तो यौद्धा भी थे। उनके प्रत्येक रूप मनोहारी है। उनका बालस्वरूप तो इतना मनमोहक है कि वह बचपन का एक आदर्श बन गया है। इसीलिए जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के इसी रूप की पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें वे चुराकर माखन खाते हैं, गोपियों की मटकी तोड़ते हैं और खेल-खेल में असुरों का सफाया भी कर देते हैं। यमुना के तट पर और यमुना के ही जंगलों में गाय और गोपियों के संग-साथ रहकर बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना वध, शकटासुर वध, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय दमन, धेनुक वध, प्रलंब वध, अरिष्ट वध, कालयवन वध आदि का संहार किया तो किशोरावस्था में बड़े भाई बलदेव के साथ कंस का वध किया। इसी प्रकार उनकी रासलीला, गोपियों के प्रति प्रेम वाला स्वरूप भी मनमोहक है। इसी प्रकार उनका योगेश्वर रूप और महाभारत में अर्जुन के पथ-प्रदर्शक वाला रूप सभी को लुभाता और प्रेरणा देता है। अपनी लीलाओं में वे माखनचोर हैं, अर्जुन के भ्रांति-विदारक हैं, गरीब सुदामा के परम मित्र हैं, द्रौपदी के रक्षक हैं, राधाजी के प्राणप्रिय हैं, इंद्र का मान भंग करने वाले गोवर्धनधारी हैं। उनके सभी रूप और उनके सभी कार्य उनकी लीलाएं हैं। उनकी लीलाएं इतनी बहुआयामी हैं कि उन्हें सनातन ग्रंथों में लीलापुरुषोत्तम कहा गया है।

चौंसठ विद्याओं और सोलह कलाओं के ज्ञाता कहे जाने वाले कला मर्मज्ञ चंद्रवंशी श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अ‌र्द्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। धर्मग्रंथों में इसे जन्म के बजाय प्रकट होना बताया गया है। उनके अनुसार, इसी तिथि को कारागारगृह में भगवान विष्णु देवकी और वसुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और कमल लिए प्रकट हुए थे, किन्तु माता देवकी के अनुरोध पर उन्होंने शिशु रूप धारण कर लिया। यही कारण है कि कुछ लोग जन्माष्टमी को गोपाल कृष्ण का जन्मोत्सव कहते हैं, तो कुछ उनका प्राकट्योत्सव।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 51वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपना परिचय इस प्रकार देते हैं: ब्रह्मा जी ने मुझसे धर्म की रक्षा और असुरों का संहार करने के लिए प्रार्थना की थी। उन्हीं की प्रार्थना से मैंने यदुवंश में वसुदेव जी के यहां अवतार ग्रहण किया है। अब मैं वसुदेव जी का पुत्र हूं, इसलिए लोग मुझे वासुदेव कहते हैं।’ महाभारत के अश्वमेध पर्व में भगवान श्रीकृष्ण अवतार लेने का कारण बताते हैं, ‘मैं धर्म की रक्षा और उसकी स्थापना के लिए बहुत सी योनियों में जन्म (अवतार) धारण करता हूं।’

जन्माष्टमी पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है झांकियां सजती हैं, मटकी फोड़ प्रतिस्पर्धाएं होती हैं। ‘गोविंदा आला रे’ गूंजता है। लीला पुरुषोत्तम का प्रत्येक प्रसंग प्रेरणा प्रदान करता है। जब मन अशांत हो, तब भगवान श्रीकृष्ण की वाणी ‘गीता’ घोर निराशा के बीच आशा की किरण दिखाने लगती है। तभी तो श्रीकृष्ण को ‘आनंदघन’ अर्थात आनंद का घनीभूत रूप कहा जाता है। नंदघर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की..। उन्होंने सिर्फ नंद के घर को आनंद से नहीं भरा, अपितु सभी के आनंद का मार्ग प्रशस्त किया।

कृष्ण जन्म

पुराणों अनुसार आठवें अवतार के रूप में विष्णु ने यह अवतार लिया। मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में जन्म हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

k1.jpg

श्रीकृष्ण का परिवार

  • कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था।
  • वे माता देवकी और पिता वसुदेव की 8वीं संतान थे।
  • श्रीमदभागवत् के वर्णन अनुसार द्वापरयुग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे।
  • उग्रसेन का एक आततायी पुत्र कंस था और देवकी राजा उग्रसेन के भाई देवक की कन्या थी।
  • देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था जो कृष्ण के पिता थे।
  • वसुदेव के पिता राजा शूरसेन वृष्णि वंश और यादव कुल के थे।
  • शूरसेन सुधर्मा सभा के एक वरिष्ठ सदस्य थी, उनकी एक बेटी प्रीथा और एक बेटा वसुदेव थे।
  • प्रीता को भोज राजवंश के महाराजा कुन्तिभोज ने गोद लिया था, जिससे उनका नाम कुन्ती हुआ।
  • कुन्ती का विवाह हस्तिनापुर के राजा पांडु से हुआ।
  • वसुदेव की बहन होने के नाते पांडवों की माता कुन्ती श्रीकृष्ण की बुआ लगीं।
  • वसुदेव और नन्द (कृष्ण के पालक पिता) दोनों ही चचेरे भाई थे।
  • नन्द हरिवन्श व पुराणो के अनुसार “पावन ग्वाल” के रूप मे विख्यात गोपालक जाति के मुखिया थे।
  • वसुदेव ने अपने नवजात शिशु कृष्ण को लालन पालन हेतु नन्द को सौंप दिया था।
  • नन्द व उनकी पत्नी यसोदा ने कृष्ण व बलराम दोनों को पाला पोसा।
  • कृष्ण के बड़े भाई थे उनकी माता रोहिणी थी, रोहिणी वसुदेव की पत्नी थीं।

k1.jpg

कृष्ण की बहनें

  1. एकांगा (यह यशोदा की पुत्री थीं)। उन्होंने एकांत ग्रहण कर लिया था। इन्हें यादवों की कुल देवी भी माना गया है। कुछ लोग इन्हें योगमाया भी कहते हैं।
  2. सुभद्रा : वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम और सुभद्र का जन्म हुआ। वेबदुनिया के शोधानुसार वसुदेव देवकी के साथ जिस समय कारागृह में बंदी थे, उस समय ये नंद के यहां रहती थीं। सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। जबकि बलराम दुर्योधन से करना चाहते थे।
  3. द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी हालांकि कृष्ण की बहन नहीं थी, लेकिन श्रीकृष्ण इसे अपनी मानस भगिनी मानते थे।
  4. महामाया : देवकी के गर्भ से सती ने महामाया के रूप में इनके घर जन्म लिया, जो कंस के पटकने पर हाथ से छूट गई थी। कहते हैं,विन्ध्याचल में इसी देवी का निवास है। यह भी कृष्ण की बहन थीं।

कृष्ण के गुरु- गुरु संदीपनि ने कृष्ण को वेद शास्त्रों सहित 14 विद्या और 64 कलाओं का ज्ञान दिया था। गुरु घोरंगिरस ने सांगोपांग ब्रह्म ‍ज्ञान की शिक्षा दी थी।

कृष्ण के नाम- नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव। बाकी बाद में भक्तों ने रखे जैसे मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि।

श्रीकृष्ण की आठ रानियों और संतानों के नाम- महाभारत युद्ध के पश्‍चात्य वे 35 वर्षों तक जिंदा रहे और द्वारिका में अपनी आठ पत्नियों के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत किया। यहां प्रस्तुत है उनकी प्रत्येक पत्नी से उत्पन्न हुए 80 संतानों के नाम। हालांकि संतानें तो उनकी और भी थीं।

1.रुक्मिणी : प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू और चारू।

2.सत्यभामा : भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु।

3.जाम्बवंती : साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु।

4.सत्या : वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुन्ति।

5.कालिंदी : श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास और सोमक।

6.लक्ष्मणा : प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित।

7.मित्रविन्दा : वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महांस, पावन, वह्नि और क्षुधि।

8.भद्रा : संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।

श्रीकृष्ण की बड़ी बहन “योगमाया यानी महामाया” 

श्रीमद्भागवत पुराण‘ के अनुसार देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी (वसुदेव की दूसरी पत्नी) के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम (शेषनाग के अवतार) का जन्म हुआ। योगमाया ने स्वंय यशोदा के गर्भ 30_06_2016-yogmaya.jpgसे जन्म लिया। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी नींद में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। वहीं कंस के कारागार में देवकी के आठवें पुत्र के जन्म लेने के बाद वसुदेव उस बालक को नंद के यहां यशोदा के पास लिटा दिया, जिससे बाद में आंख खुलने पर यशोदा ने बालिका के स्थान पर पुत्र को ही पाया। और वसुदेव यशोदा के यहां जन्मी बालिका( योगमाया) को मथुरा वापस आ गये। 

श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध अध्याय 4 श्लोक 1-14

बंदीगृह पहुँचने पर सती देवकी ने बड़े दुःख और करुणा के साथ अपने भाई कंस से कहा- ‘मेरे हितैषी भाई! यह कन्या तो तुम्हारी पुत्रवधू के सामान है, स्त्री जाति की है, तुम्हें स्त्री की हत्या कदापि नहीं करनी चाहिए। भैया! तुमने द्वेषवश मेरे बहुत-से अग्नि के समान तेजस्वी बालक मार डाले। अब केवल यही एक कन्या बची है, इसे तो मुझे दे दो। अवश्य ही मैं तुम्हारी छोटी बहिन हूँ। मेरे बहुत-से बच्चे मर गये हैं, इसलिए मैं अत्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ भाई! तुम मुझ मन्दभागिनी को यह अंतिम सन्तान अवश्य दे दो।’

श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! कन्या को अपनी गोद में छिपा कर देवकी जी ने अत्यन्त दीनता के साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकी जी को झिड़ककर उनके हाथ से वह कन्या छीन ली। अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भान्जी के पैर पकड़कर कंस ने उसे बड़े ज़ोर से एक चट्टान पर दे मारा। स्वार्थ ने उसके हृदय से सौहार्द को समूल उखाड़ फेंका था। परन्तु श्रीकृष्ण की वह छोटी बहिन साधारण कन्या तो थी नहीं, देवी थी; उसके हाथ से छूटकर तुरंत आकाश में चली गयी और अपने बड़े-बड़े आठ हाथों में आयुध लिये हुए दीख पड़ी। वह दिव्य माला, वस्त्र, चन्दन और मणिमय आभूषणों से विभूषित थी। उसके हाथों में धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा – ये आठ आयुध थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर और नागगण बहुत-सी भेंट की सामग्री समर्पित करके उसकी स्तुति करने लगे।

उस समय देवी ने कंस से कहा- ‘रे मूर्ख! मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए किसी स्थान पर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकों की हत्या न किया कर। कंस से इस प्रकार कहकर भगवती योगमाया वहाँ से अन्तर्धान हो गयीं और पृथ्वी के अनेक स्थानों में विभिन्न नामों से प्रसिध्द हुईं।

देवी की यह बात सुनकर कंस को असीम आश्चर्य हुआ। उसने उसी समय देवकी और वसुदेव को कैद से छोड़ दिया और बड़ी नम्रता से उनसे कहा।

देवी विंध्यवासिनी और कृष्ण के बीच क्या था रिश्ता…

देवी विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण का नाता : भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था। भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है।इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं। इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी।

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और इसके बाद योगमाया, विंध्याचल पर्वत पर रहने चली गई महायोगिनी महामाया के विंध्याचल पर्वत पर रहने के कारण , उनका नाम विंध्यवासिनी देवी पड़ा।

मार्कण्डेय पुराण के श्री दुर्गासप्तशती के एकादश अध्याय के 42वें श्लोक में भी यही वर्णन है-

” नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा।

ततस्तौ नाशयिष्यामि विंध्याचलनिवासिनी।।”

गर्ग पुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के ७वें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे।

श्रीमद्भागवद्पुराण में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है।

शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।

मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं।

वैसे कृष्ण जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद है… अलग-अलग शोध में कृष्ण के जन्म की तारीख अलग-अलग बताई गई है…

4597695560

पहला शोध- 3112 ईसा पूर्व (यानी आज से 5125 वर्ष पूर्व) को हुआ…

ब्रिटेन में रहने वाले शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं, पुरातात्विक तथ्यों आदि के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय का वर्णन किया है।ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलिय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। इन गणनाओं के अनुसार कृष्ण का जन्म ईसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानि महाभारत युद्ध के समय कृष्ण की उम्र 54-55 साल की थी।

उन्होंने अपनी खोज के लिए टेनेसी के मेम्फिन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. नरहरि अचर द्वारा 2004-05 में किए गए शोध का हवाला भी दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने पुरातात्विक तथ्यों को भी शामिल किया। जैसे कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत, पानी में डूबी द्वारका और वहाँ मिले कृष्ण-बलराम के की छवियों वाले पुरातात्विक सिक्के और मोहरे, ग्रीक राजा हेलिडोरस द्वारा कृष्ण को सम्मान देने के पुरातात्विक सबूत आदि।

‘Krishna existed… Aug 29, 2009 Agency: DNA

Dr Manish Pandit, sutradhar of the documentary Krishna: History or Myth, uses four pillars archaeology, linguistics, what he calls the living tradition of India, and astronomy to arrive at the circumstantial verdict that Krishna was for real, because the Mahabharata and the battle of Kurukshetra did indeed happen. In an interview with DNA, Pandit outlines his documentary journey. Excerpts:

दूसरा शोध- 3228 ईसा पूर्व (यानी आज से 5114 वर्ष पूर्व) को हुआ

Krishna (b. July 21, 3228 BC)

 MAGAZINE | SEP 13, 2004

With some deft computer astrology, mythic Krishna gets a date of birth, and some planetary influence

Even gods come to earth with their destinies chalked out for them. So claims astrology, at any rate. So when Arun K. Bansal, the father of computer astrology in India, says that Hindu god Krishna was born on July 21, 3228 bc, it feels momentous somehow. The date essentially transforms Krishna in our minds: from a mythological figure of mystery, even if a much-loved one, into well a flesh and blood entity.  You can almost see him gurgling in Yashoda’s lap as Rishi Garg performs his naming ceremony in a cow shed more than 50 centuries ago.

But backtracking into the past can be a sloppy misadventure if you don’t get your calculations right. So Bansal rests his claims on two of his software packages—the Leo Gold and the Palm computer programmes. They can simulate any planetary configuration that has occurred or could occur in time.

All they need is a date. And July 21, 3228 bc, according to Bansal, satisfies every condition described during Krishna’s birth. Krishna was born in the Rohini nakshatra, in the Hindu month of Bhadrapada, on the 8th day of the waning moon at midnight. Bansal says this was enough information for him to nail the date, working backwards from Krishna’s death, which he says occurred at 2 pm on February 18, 3102 bc.

His entire case rests on the accuracy of this date, however. Bansal quotes extensively from the Shrimad Bhagwat and the Shri Vishnu Puranas, old Hindu calendars and the Mahabharata to illuminate the clues he chose to follow. “A shloka in the 38th chapter of the Shri Vishnu Puran, says that Kaliyuga started on the day Krishna died.” He unearths another shloka in the Shrimad Bhagwat Purana (part 11, chapter 6) where Brahma himself speaks to Krishna about how old he is. “Brahma says that 125 years have passed since Krishna’s birth; this is just before Krishna plans his death.”

Though not empirically verifiable, the advent of Kaliyuga is traditionally taken to be 3102 bc, because all our panchangas or astrological journals maintain that 5,100 years of Kaliyuga had passed before 1999 AD. The belief is supported by mathematician Aryabhatta’s astronomy treatise Aryabhattiya, the Surya Siddhanta, an astronomical text that dates back to 400 AD, and a 5th century inscription from a temple in Aihole.

Deleting 125 years from the date, Bansal figured Krishna was born either in 3327 or 3228 bc. The rest he left up to his software, merely feeding in the planetary configuration that Krishna was supposedly born under, to generate the row of figures that conforms to the epochal moment.

विशेषज्ञों ने कृष्ण जन्म को लेकर ऐतिहासिक प्रमाणिकता साबित की है…

भारतवर्ष में मानव सभ्यता का इतिहास कितना प्राचीन है, इसका अंदाजा हम हडप्पा और मोहन जोदाडों से लेकर पुरातत्व के अवशेषों से लगा सकते हैं। इस अति प्राचीन और पवित्र धरती पर कई महापुरुष भी हुए। ऐसा ही ऐतिहासिक नाम है, भगवान श्री कृष्ण का, जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों से लेकर आज भी जीवंत है। लेकिन उनका जन्म किस सन् में हुआ इसकी अभी तक कोई पुष्ट जानकारी नहीं थी, परंतु खगोलीय गणनाओं,गणितीय संक्रियाओं एवं आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद की गई। एक खोज के अनुसार यह दावा किया गया है कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व में हुआ था।

आधुनिक साफ्टवेयर की ली मदद

विशेषज्ञों के अनुसार श्रीकृष्ण के जन्म के समय वर्णित घटनाओं को संदर्भ लेने पर 5 हजार वर्ष पूर्व जाना दुस्साहस हो सकता है, परंतु इन गणितीय खगोलीय संक्रियाओं को हम पारंपरिक गणितीय विधियों द्वारा हल कर सकते हैं। इसमें आधुनिक साफ्टवेयरों की सहायता से किसी भी पूर्व या संभावित ग्रह स्थिति का पुनः चित्रण कर क्रास चैक किया जा सकता है।

संकेतों और श्लोंकों का अध्ययन

अध्ययन के मुताबिक पहले भारतीय पंचांग सातवर्षीय रहा है, जिसमें 2700 वर्षों का एक चक्र था। इसकी गणना आकाश में सप्तर्षि तारामंडल की गति के संक्रमण द्वारा की जाती थी। जिसे 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया था। धर्मग्रंथों में श्रीकृष्ण जन्म के संदर्भ में जो संकेत हैं, वे भाद्रपद माह की अष्टमी को रोहणी नक्षत्र में अर्धरात्रि को हुए। उपरोक्त सकेतों का वर्णन विस्तार से श्री विष्णु पुराण, महाभारत व श्रीमदभागवत में हैं। श्री विष्णु पुराण के 38 वें अध्याय में एक श्लोंक के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु के दिन कलियुग का प्रारंभ हुआ। श्रीमदभागवत पुराण के खंड 11 के अध्याय छह में एक श्लोक में ब्रम्हा, श्रीकृष्ण की आयु के संदर्भ म कहते हैं, कि श्रीकृष्ण के जन्म के 125 वर्ष हो चुके हैं।

कर्नाटक मंदिर में भी है अभिलेख

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलियुग का आरंभ 3102 ईसा पूर्व से माना जाता है, क्यों हमारे सभी पंचांग या ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर 1991ई. तक कलियुग के 5100 वर्ष बीत चुके हैं। इस तरह गणितज्ञ आर्यभट्ट ने खगोलीय निबंध आर्यभट्टीय एवं संदर्भ में महाभारत के समय की खगोलीय घटनाओं का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण 90 वर्ष के थे। तब दुर्लभ चंद, सूर्यग्रहण दोनों का होना। औष्ण पक्ष की अवधि घटकर 13 दिन हो जाना एवं आकाश में एक धूमकेतू का चमकते हुये गुजर जाना। उपरोक्त खगोलीय घटनाओं का वर्णन कर्नाटक के एक मंदिर में पाए गए अभिलेख के अनुसार भी सही पाया गया है।

श्रीकृष्ण की कुंडली भी तैयार

विशेषज्ञों के अनुसार कलियुग प्रारंभ होने यानी 3102 ईसा पूर्व से 125 वर्ष घटाने पर कृष्ण के जन्म का वर्ष निकलता है जो कि 3228 ईसा पूर्व है। बाकी का कार्य ग्रहों की स्थिति डालते हुये श्री कृष्ण भगवान की कुंडली बन जाती है। 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व कृष्ण के जन्म के समय वर्णित सभी परिस्थितियों को संतुष्ट करने वाली तिथि है, इसी अधार पर कृष्ण की आयु में 125 वर्ष जोडने पर कृष्ण का अवसान 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व दोपहर को हुई थी। मृत्यु की घटनाओं से पूर्णतः मल खाती है।

कृष्ण निवास : गोकुल, वृंदावन और द्वारिका में कृष्ण ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण क्षण गुजारे। पूरे भारतवर्ष में कृष्ण अनेकों स्थान पर गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए उक्त स्थान से जुड़ी उनकी गाथाएँ प्रचलित है लेकिन मथुरा उनकी जन्मभूमि होने के कारण हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

कृष्ण लीलाएँ : बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना वध, शकटासुर वध, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय दमन, धेनुक वध, प्रलंब वध, अरिष्ट वध, कालयवन वध किया…

कृष्ण के जीवन में बहुत रोचकता और उथल-पुथल रही है। बाल्यकाल में वे दुनिया के सर्वाधिक नटखट बालक रहे, तो किशोर अवस्था में गोपियों के साथ पनघट पर नृत्य करना और बाँसुरी बजाना उनके जीवन का सबसे रोचक प्रसंग है। कुछ और बड़े हुए तो मथुरा में कंस का वध कर प्रजा को अत्याचारी राजा कंस से मुक्त करने के उपरांत कृष्ण ने अपने माता-पिता को भी कारागार से मुक्त कराया। इसके अलावा कृष्ण ने पूतना,शकटासुर, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय-दमन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ट आदि राक्षसों का संहार किया था। श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। और उनमें सभी तरह की शक्तियाँ थी।

कालिया नाग दमन की कथा: कालिया नागराज, जो पहले रमण द्वीप में रहता था। गरुड़ के डर से कालिया नंदगांव के पास यमुना में जा छिपा। उसके विष से यमुना का जल जहरीला हो गया। उसे पीकर गाएं और गोप मरने लगे। एक बार जब खेलते समय गेंद यमुना में गिर जाने से कृष्ण उसे निकालने के लिए यमुना में कूदे और कालिया का दमन किया और उसके फण पर नाचने लगे। कालिया नाग के माफी मांगने के बाद कृष्ण ने से वरदान देकर दोबारा रमण द्वीप भेज दिया। यमुना का यह स्थान आज भी ‘कालियदह’ कहलाता है। इसी प्रकार वहीं ताल वन में दैत्य जाति का धनुक नाम का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसे बलदेव ने मार डाला था। उक्त दोनों घटना के कारण दोनों भाइयों की ख्यायति फैल गई थी।

इसलिए गोवर्धन पर्वत उठाया कृष्ण ने: वर्षा ऋतु के बाद गांवों में देवराज इंद्र का आभार प्रकट करने के लिए यज्ञ किए जाते थे। इंद्र मेघों के देवता हैं और उन्हीं के आदेश से मेघ धरती पर पानी बरसाते हैं। हमेशा मेघ पानी बरसाते रहें, जिससे गांव और शहरों में अकाल जैसी स्थिति ना बने, इसके लिए यज्ञ के जरिए इंद्र को प्रसन्न किया जाता था। ब्रज मंडल में भी उस दिन ऐसे ही यज्ञ का आयोजन था। लोगों का मेला लगा देख, यज्ञ की तैयारियों को देख कृष्ण ने पिता नंद से पूछा कि ये क्या हो रहा है।

नंद ने उन्हें यज्ञ के बारे में बताया। कृष्ण ने कहा इंद्र को प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ क्यों? पानी बरसाना तो मेघों का कर्तव्य है और उन्हें आदेश देना इंद्र का कर्तव्य। ऐसे में उनको प्रसन्न करने का सवाल ही कैसे उठता है? ये तो उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए रिश्वत देने जैसी बात है। ब्रजवासियों ने कृष्ण को समझाया कि अगर यज्ञ नहीं हुआ तो इंद्र क्रोधित हो जाएंगे। इससे पूरे ब्रजमंडल पर संकट आ सकता है। कृष्ण ने कहा कि अगर पूजा और यज्ञ ही करना है तो गोवर्धन पर्वत का किया जाना चाहिए, क्योंकि वो बिना किसी प्रतिफल की आशा में हमारे पशुओं का भरण-पोषण करता है, हमें औषधियां देता है।

बहुत बहस के बाद ब्रजवासी कृष्ण की बात से सहमत हो गए और उन्होंने इंद्र के यज्ञ की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल पर भयंकर बरसात शुरू कर दी। ब्रजवासी डर गए। नदियां, तालाब सभी उफन गए। बाढ़ आ गई। ब्रज डूबने लगा और लोगों के प्राण संकट में आ गए। सभी ने कृष्ण से कहा कि देखो तुम्हारे कहने पर इंद्र को नाराज किया तो उसने कैसा प्रलय मचा दिया है। अब ये गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा क्या? कृष्ण ने कहा – हां, यही गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा। कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ ही छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सारे गांव वाले उसके नीचे आ गए।

वे बारिश की बौछारों से बच गए। भगवान ने ग्वालों से कहा कि सभी मेरी तरह गोवर्धन को उठाने में सहायता करो। अपनी-अपनी लाठियों का सहारा दो। ग्वालों ने अपनी लाठियां गोवर्धन से टिका दी। इंद्र को हार माननी पड़ी। उसका अहंकार नष्ट हो गया। वो कृष्ण की शरण में आ गया। भगवान ने उसे समझाया कि अपने कर्तव्यों के पालन के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं करनी चाहिए। जो हमारा कर्तव्य है, उसे बिना किसी लालच के पूरा करना चाहिए।

कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेक गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थीं। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रृंगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थीं। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थीं जिनके नाम इस तरह हैं:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता,विशाखा तथा भद्रा।

कंस का वध : किसी ने कंस को बताया कि वासुदेव और देवकी की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण होगी। अत: कंस उक्त दोनों की संतान के उत्पन्न होते ही मार डालता था। कृष्ण वासुदेव की सातंवी संतान थे। वासुदेव इस संतान को चोरी-चोरी नंदग्राम में नंद ग्वाले के घर रख आए और फिर कृष्ण का वहीं पालन-पोषण हुआ। इसी काल में कृष्ण की दूसरी माँ के पुत्र बलराम को भी वहाँ लाकर रख दिया था। दोनों भाई वहीं पले-बढ़े।

कालिया और धनुक का सामना करने के कारण दोनो भाइयों की ख्याति के चलते कंस समझ गया कि ज्योतिष भविष्यवाणी अनुसार इतने बलशाली तो वासुदेव और देवकी के पुत्र ही हो सकते हैं। तब कंस ने दोनों भाइयों को पहलवानी के लिए निमंत्रण ‍दिया क्योंकि कंस चाहता था कि इन्हें पहलवानों के हाथों मरवा दिया जाए, लेकिन दोनों भाइयों ने पहलवानों के शिरोमणि चाणूर और मुष्टिक को मारकर कंस को पकड़ लिया और सबके देखते-देखते ही उसको भी मार दिया।

कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा: योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर हासिल की थी। उस काल में उज्जैन को उज्जयिनी व अवंतिका कहा जाता था। वहाँ से शिक्षा पाकर वे मथुरा की रक्षा करने लगे। कंस के मरने पर उन्होंने मथुरा में वृष्णि, अंधक, भोज और शनि वंशों का गणराज्य स्थापित किया था।

जरासंघ का आक्रमण: जरासंघ कंस का श्वसुर था। कंस की पत्नी मगथ नरेश जरासंघ को बार-बार इस बात के लिए उकसाती थी कि कंस का बदला लेना है। इस कारण जरासंघ ने मथुरा के राज्य को हड़पने के लिए कई आक्रमण किए तब अंतत: कृष्ण ने अपने सजातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया। वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए।- महाभारत मौसल- 14.43-50

भौमासुर से युद्ध : इस पलायन के दौरान हिमालय जिसे देवलोक कहा जाता था वहाँ भौमासुर का राज्य हो चला था जो देवताओं को सताया करता था। उसने इंद्र की माता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और वह उसे वापस नहीं कर रहा था। तब देवों के कहने पर कृष्ण ने भौमासुर से युद्ध करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उन्होंने दो शर्तें उपस्थित कर दीं। एक तो उन्होंने सुदर्शन चक्र माँगा और दूसरा युद्ध के लिए गरुड़ यान। तब ही वे युद्ध करेंगे। देवराज इंद्र ने यह स्वीकार कर लिया। चक्र और गरुढ़ यान होने के कारण उन्हें विष्णु का अवतार माना जाने लगा। क्योंकि यह दोनों ‍वस्तुएँ सिर्फ विष्णु के पास ही होती थीं। सुदर्शन चक्र को उस काल में बहुत ही घातक अस्त्र माना जाता था।

द्वारिका निर्माण : कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने गुजरात के समुद्र के तट पर द्वारिका का निर्माण कराया और वहाँ एक नए राज्य की स्थापना की। कालांतर में यह नगरी समुद्र में डूब गई, जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ भी यहीं पर स्थित है। हिंदुओं को चार धामों में से एक द्वारिका धाम को द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ कहा जाता है। स्कंदपुराण में श्रीद्वारिका महात्म्य का वर्णन मिलता है।

कृष्ण की गीता : वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार ‘गीता’ को माना है। कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो ज्ञान दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में सब कुछ है- दर्शन है, योग है, धर्म है और नीति भी। गीता कृष्ण द्वारा महाभारत के भीष्मपर्व में अर्जुन को दिया गया ज्ञान है। इसे महाभारत के साथ पढ़ने और समझने से ही लाभ मिलता है। अन्यत्र से नहीं।

स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि युद्ध क्षेत्र में जो ज्ञान मैंने तुझे दिया था उस वक्त मैं योगयुक्त था। अत: उस अवस्था में परमात्मा की बात कहते हुए, वह परमात्मा के प्रतिनिधि बनते हुए परमात्मा के लिए मैं, मेरा, मुझे इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं इससे यह आशय नहीं कि वे खुद परमात्मा हैं या उनमें किसी प्रकार का अहंकार है।

कर्म योगी कृष्ण : गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। गीता में कर्म बंधन से मुक्ति के साधन बताएँ हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से मुक्ति आवश्यक है।

कृष्ण ने जो भी कार्य किया उसे अपना कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका पालन करते थे। न अतीत में और न भविष्य में, जहाँ हैं वहीं पूरी सघनता से जीना ही उनका उद्देश्य रहा।

महाभारत युद्ध : विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध के नाम से जाना जाता है।

कृष्ण इस युद्ध में पांडवों के साथ थे। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। एक अन्य शोधानुसार यह युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी। तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है।

कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ग्रह-नक्षत्रों की जो स्थिति थी उस आधार पर ज्योतिषियों अनुसार कृष्ण की आयु 125 वर्ष आँकी गई है।

महाभारत युद्ध चंद्रवंशियों के दो परिवार कौरव और पांडव के बीच हुआ था। उक्त लड़ाई आज के हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुई मानी गई है। इस युद्ध में पांडव विजयी हुए थे। इस लड़ाई में कृष्ण पांडवों के साथ थे। बलदेव दुर्योधन की ओर से लड़ना चाहते थे लेकिन कृष्ण के पांडवों की ओर होने से उन्होंने युद्ध का त्याग कर दिया। इस युद्ध के बाद यदुवंशियों में आपसी फूट पड़ गई और वे सभी आपस में लड़कर ही मर गए। पारिवारिक युद्ध के चलते कृष्ण के पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण, और प्रद्युम्न तथा पोते अनिरुद्ध भी जब युद्ध में मारे गए तो कृष्ण ने क्रोधवश शेष बचे यादवों का नाश कर दिया।- महाभारत मौसल-3.41-3.46

तपस्या और महाप्रयाण : यादवों का नाश होने के पश्चात्य उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपने यदुवंशियों का विनाश देखा इससे पूर्व आपने कुरुवंशियों का नाश देखा। अब मैं यादवों के बिना द्वारिका की रक्षा करने में असमर्थ हूँ। अंत: वन में जाकर बलदेवजी के साथ तपस्या करूँगा।- महाभारत मौसल-4-6

वन में श्रीकृष्ण भूमि पर लेटे थे। उस समय एक व्याघ मृगों को मारने की इच्छा से उधर आ निकला। व्याघ ने दूर से श्रीकृष्ण को मृग समझकर उन पर बाण चला दिया। जब वह पास आया तो पीताम्बरधारी कृष्ण को वहाँ देख भयभीत हो खड़ा रह गया। 125 वर्ष की उम्र में कृष्ण ने देह छोड़ दी।

krishna_by_vishnu108-d291k8z

ग्रंथों में श्रीकृष्ण जयंती का नाम

zzz5h

ग्रहों ने बनाया हर कला में माहिर कृष्णको

1683 Krishna laying on feathers in universe

ईश्वर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का ही नाम आता है व इन्हीं त्रिदेवों ने संसार को रचा। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो भगवान विष्णु बने पालनहार तो भगवान शिव ने संहार किया। वैसे शिवजी को आदि और अंत कहा जाता है तो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को 16 कलाओं का ज्ञाता।

अवतार की श्रेणी में देखा जाए तो सिर्फ भगवान विष्णुजी ने ही अवतार लिए। वे त्रेतायुग में राम के अवतार में अवतरित हुए तो द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के। जहाँ राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता रहे।

कृष्ण की कुंडली… कृष्ण का जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगनमें हुआ था। उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लगन में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठेभाव में शुक्र और शनि बैठे थे। जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु थे।कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में थे. कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव कीकुंडली है।

image003

  • भगवान श्री कृष्ण की शक्तियों का राज उनके जन्म समय में छुपा है।
  • जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तब सभी ग्रह-नक्षत्र अपनी शुभ स्थिति में आकर विराजमान हो गए।
  • श्री कृष्ण की कुण्डली बताती है कि कृष्ण का जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगन में हुआ था।
  • उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लग्न में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठे भाव में शुक्र और शनि बैठे हैं।
  • जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु बैठे हैं।
  • कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में हैं।
  • कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव की कुंडली है।
  • ग्रहों की इन शुभ स्थितियों के कारण ही श्री कृष्ण ने अपनी अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन किया।

राम आदर्शवादी थे तो श्रीकृष्ण ने छल, बल, कपट का सहारा लिया लेकिन उन्होंने जग की भलाई के लिए ही कार्य किया क्योंकि आज का युग कलियुग भगवान श्रीकृष्ण के गुणों वाला ही है।

श्रावण के बाद भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में नंदगाँव मथुरा की जेल में पिता वसुदेव, माता देवकी के यहाँ हुआ।

कहते हैं भगवान ने माता कैकई को वचन दिया था कि माँ मैं तेरी कोख से द्वापर युग में जन्म लूँगा तो आपने अपना वचन निभाया। आपका जन्म वृषभ लग्न में हुआ। लग्न में तृतीयेश पराक्रम व भाई सखा आपका स्वामी चंद्रमा उच्च का होकर लग्न में होने से आपका व्यक्तित्व शानदार उत्तम कद-काठी के, हर कला में माहिर हुए। मंगल की नीच दृष्टि से आपके सगे भाई बलरामजी ने दूसरी माता रोहिणी की कोख से जन्म लिया। आज के युग में उसे परखनली या टेस्ट ट्‍यूब के रूप में जन्माते हैं।

आपकी पत्रिका में द्वितीय वाणी, धन-कुटुंब भाव का स्वामी बुध उच्च का होकर पंचम भाव विद्या-संतान-मनोरंजन में होने से आपकी वाणी में विशेष प्रभाव होता है तभी आपकी वाणी के सशक्त प्रभाव से सभी प्रभावित थे।

लेकिन आपको एक संतान प्रद्युम्न हुई जो पराक्रमी न होकर कायर थी। जनता के बीच प्रसिद्ध होना चतुर्थेश सूर्य का चतुर्थ भाव में होना रहा। सूर्य ने आपको महाप्रतापी राजा बनाया। लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव में स्वराशि का होकर भाग्येश, कर्मेश शनि के साथ केतु भी होने से आप शत्रुओं के काल रहे।

आपने बचपन से लेकर युवावस्था तक अनेक शत्रुओं को परास्त किया जिसमें आपके मामा कंस प्रमुख रहे। वैसे कालिया नाग, पूतना को भी मारा वहीं मल्लयुद्ध में अनेक पहलवानों को पछाड़ने के बाद हाथी को भी मारा। आप पराक्रमी न होकर चतुर थे अत: चतुराई से जहाँ जैसी जरूरत पड़ी वैसा काम किया। कभी युद्ध से भागे भी तभी तो रणछोड़ कहलाए।

शनि, शुक्र, केतु साथ होने से आप प्रेमी भी थे तभी आपने अपनी रणनीति के अनुसार रुक्मणि द्वारा भगाए गए। ताकि संसार ये न कहे कि श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का हरण किया। वैसे आपकी तीन पत्नियाँ रुक्मणि, सत्यभामा व जामवंती थीं।

प्रेमिकाओं में राधा का प्रेम जगजाहिर है तभी तो राधेकृष्ण यानी राधा पहले बाद में कृष्ण आते हैं। आप सखाओं के सखा,प्रेमियों में प्रेमी हैं। महाभाग्यवान मंगल का उच्च होना व शनि का उच्च होना परमोच्च कहलाया।

एकादश भाव में गुरु स्वराशि का होने से अपनी सेना व अर्थ धर्मक्षेत्र में लगाया। गुरु की उच्च दृष्‍टि पराक्रम पर होने से भाई महाबली बलरामजी का साथ रहा। सप्तम भाव पर मित्र ‍दृष्टि व मंगल सप्तमेश का उच्च होने से अनेक स्त्रियों से संबंध स्वच्छ रूप से रहे।

आपने संसार को कर्मयोग सिखाया। द्वादश भाव में राहु होने से बाहरी दुश्मन बहुत रहे। लेकिन शनि के उच्च होकर षष्ठ भाव में केतु शुक्र के साथ होने से सभी को नष्‍ट किया। आपकी आयु भी 100 वर्ष पूर्ण करने के बाद एक बहेलिए के तीर से आपकी मृत्यु हुई। ऐसे महान कर्मयोद्धा भगवान श्रीकृष्ण को शत्-शत् नमन।

16 कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण

jay_sri_krishna_by_vishnu108

श्रृंगार कला – भगवान श्रीकृष्ण को श्रृंगार की बारिकियों का इतना ज्यादा ज्ञान था कि उसके श्रृंगार रूप को देखकर गोकुल की कन्याएं (गोपिया) उनके मनमोहक रूप को निहारती रहती थी। उनके गले में दुपट्टा, कमर पर तगड़ी, पीताम्बर अंग वस्त्र, सिर पर छोटा मुकुट तथा उसपर मोर पंख श्री की सुन्दरता में चार चांद लगाता था

वादन कला – भगवान को वादन के सभी स्वरों का पूर्ण ज्ञान था, जिसके परिणास्वरूप वे अपनी बांसूरी से बड़े बड़ों को अपने अनुचर बना लेते थे।

नृत्य कला – श्रीकृष्ण को नृत्य का पूर्ण ज्ञान था, इसी लिए गोकुल की देवियां उनके नृत्य की प्रशंसा करते-करते श्रीकृष्ण का नृत्य देखने की हठ करती थी।

गायन कला – श्रीकृष्ण एक अच्छे गायक भी थे। वेद के मंत्रों का गायन कर उन्होंने अर्जुन को मोहपाश के मुक्त कर दिया था।

वाकमाधूर्य कला – श्रीकृष्ण की वाणी में विलक्षण मधुरता व्याप्त थी। वे जिस किसी से भी वार्ता करते थे, वह हमेशा के लिए उनका हो जाता था।

वाकचातुर्य कला – उनकी वाणी में चतुरता भी थी। वे बडे़ सहज भाव से अपनी बात को मनवा लेते थे और सामने वाले को अपना विरोद्घि भी नही बनने देते थे। महाभारत में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आए हैं।

वक्तृत्व कला – भगवान एक महान वक्ता थे। बड़े-बड़े धूरंधरों को उन्होंने अपने प्रभावशाली वक्तव्यों से धराशाही कर उनको उनके ही बनाए जाल में फांस लिया था। कालयवन उसका एक अच्छा उदाहरण है।

लेखन कला – श्रीकृष्ण ने मात्र एक घंटे के सुक्ष्मकाल में गीता की रचना कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है। उनका मुकाबला आज तक या इससे पहले कोई नही कर सका। अतः भगवान एक उत्तम कोटी के लेखक भी थे।

वास्तुकला – भगवान श्रीकृष्ण को वास्तुकला का भी अकाटय ज्ञान था। पांडवों के लिए इन्द्रप्रस्थ और स्वयं अपने लिए राजधानी द्वारका का निर्माण वास्तुकला के बेजोड़ नमूने थे।

पाककला – भगवान श्रीकृष्ण पाक शास्त्र के भी महान पंडित थे। सम्राट युधिष्ठर के राजसूय यज्ञ के दौरान खाने-पीने का पूरा सामान उनकी देख-रेख में ही तैयार किया गया था।

नेतृत्व कला – कृष्ण में नेतृत्व करने की क्षमता बेजोड थी। वे जहां भी गए नेतृत्व उनके पीछे-पीछे हो जाता था। सभी युद्घों से लेकर आम सभाओं में हमेशा सभी ने उन्हीं के नेतृत्व को स्वीकार किया था।

युद्घ कला – श्रीकृष्ण की अधिकतर आयु युद्घों में ही व्यतीत हुई थी परन्तु हमेशा उन्होंने सभी में विजय प्राप्त की। वे युद्घ की सभी विधाओं का सम्पूर्ण ज्ञान रखते थे।

शस्त्रास्‍त्र कला – योगेश्वर श्रीकृष्ण को युद्घ में प्रयोग होने वाले सभी व्यूहों की रचना, उन्हें भंग करने की कला तथा आग्नेयास्त्र, वरूणास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र सहित सभी अस्त्र शस्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था।

अध्यापन कला – भगवान श्रीकृष्ण एक सफल अध्यापक भी थे। युद्घ क्षेत्र में जिस प्रकार उन्होंने अर्जुन को निष्कामकर्म योग, सांख्य योग, विभूति योग, भक्ति योग, मोक्ष सन्यास योग तथा विश्वरूप दर्शन योग का पाठ पढाया, वह हमेशा अनुक्रणीय रहेगा।

वैद्यक कला – श्रीकृष्ण आयूर्वेद के भी सम्पूर्ण ज्ञाता थे। कंस की फूल चुनने वाली दासी कुबड़ी के शरीर को सीधा करना तथा महाभारत युद्घ में अश्वथामा के प्रहार से मृतप्रायः हुए परीक्षित को जीवन दान देना इसके अकाट्य उदाहरण है।

पूर्वबोध कला – भगवान ने तप से अपनी आत्मा को इतना पवित्र और उर्द्घव गति को प्राप्त करवा लिया था कि उन्हें किसी भी घटना का पहले से ही अनुमान हो जाता था।

64 विद्याओं में माहिर थे श्रीकृष्ण? जानेंगे तो चौंक पड़ेंगे

भगवान श्रीकृष्ण ‘लीलाधर’ पुकारे जाते हैं. श्रीकृष्ण ने हर लीला के जरिए अधर्म को सहन करने की आदत से सभी के दबे व सोए आत्मविश्वास और पराक्रम को जगाया. भगवान होकर भी श्रीकृष्ण का सांसारिक जीव के रूप में लीलाएं super_excellent_qualities_of_sri_krsna_idk761करने के पीछे मकसद उन आदर्शों को स्थापित करना ही था, जिनको साधारण इंसान देख, समझ व अपनाकर खुद की शक्तियों को पहचाने और ज़िंदगी को सही दिशा व सोच के साथ सफल बनाए.

इसी कड़ी में श्रीकृष्ण का सांसारिक धर्म का पालन कर, गुरुकुल जाना, वहां अद्भुत 16 कलाओं व 64 विद्याओं को सीखने के पीछे भी असल में, गुरुसेवा व ज्ञान की अहमियत दुनिया के सामने उजागर करने की ही एक लीला थी. यह इस बात से भी जाहिर होता है कि साक्षात जगतपालक के अवतार होने से श्रीकृष्ण स्वयं ही सारे गुण, ज्ञान व शक्तियों के स्त्रोत थे. यानी श्रीकृष्ण और बलराम ही जगत के स्वामी हैं. सारी विद्याएं व ज्ञान उनसे ही निकला है और स्वयंसिद्ध है. फिर भी उन दोनों ने मनुष्य की तरह बने रहकर उन्हें छुपाए रखा. दरअसल, किताबी ज्ञान से कोई भी व्यक्ति भरपूर पैसा और मान-सम्मान तो बटोर सकता है, किंतु मन की शांति भी मिल जाए, यह जरूरी नहीं. शांति के लिए अहम है – सेवा. क्योंकि खुद की कोशिशों से बटोरा ज्ञान अहंकार पैदा कर सकता है व अधूरापन भी. किंतु सेवा से, वह भी गुरु सेवा से पाया ज्ञान इन दोषों से बचाने के साथ संपूर्ण, विनम्र व यशस्वी बना देता है. श्रीकृष्ण व बलराम ने भी अंवतीपुर (आज के दौर का उज्जैन) नगरी में गुरु सांदीपनी से केवल 64 दिनों में ही गुरु सेवा व कृपा से ऐसी 64 विद्याओं में दक्षता हासिल की, जो न केवल कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में बड़े-बड़े सूरमाओं को पस्त करने का जरिया बनी, बल्कि गुरु से मिले इन कलाओं और ज्ञान के अक्षय व नवीन रहने का आशीर्वाद श्रीमद्भगवद्गगीता के रूप में आज भी जगतगुरु श्रीकृष्ण के साक्षात ज्ञानस्वरूप के दर्शन कराता है और हर युग में जीने की कला भी उजागर करने वाला विलक्षण धर्मग्रंथ है. गुरु संदीपन ने श्रीकृष्ण व बलराम को सारे वेद, उनका गूढ़ रहस्य बताने वाले शास्त्र, उपनिषद, मंत्र व देवाताओं से जुड़ा ज्ञान, धनुर्वेद, मनुस्मृति सहित सारे धर्मशास्त्रों, तर्क विद्या या न्यायशास्त्र का ज्ञान दिया. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध व आश्रय जैसे 6 रहस्यों वाली राजनीति भी सिखाई. यही नहीं, दोनों भाइयों ने केवल गुरु के 1 बार बोलनेभर से ही 64 दिन-रात में 64 अद्भुत विद्याओं को भी सीख लिया.

  1. गानविद्या
  2. वाद्य-भांति-भांतिके बाजे बजाना
  3. नृत्य
  4. नाट्य
  5. चित्रकारी
  6. बेल-बूटे बनाना
  7. चावल और पुष्पादिसे पूजा के उपहार की रचना करना
  8. फूलों की सेज बनान
  9. दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
  10. मणियों की फर्श बनाना
  11. शय्मा-रचना
  12. जलको बांध देना
  13. विचित्र सििद्धयां दिखलाना
  14. हार-माला आदि बनाना
  15. कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना
  16. कपड़े और गहने बनाना
  17. फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
  18. कानों के पत्तों की रचना करना
  19. सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना
  20. इंद्रजाल-जादूगरी
  21. चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
  22. हाथ की फुतीकें काम
  23. तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना
  24. तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
  25. सूई का काम
  26. कठपुतली बनाना, नाचना
  27. पहली
  28. प्रतिमा आदि बनाना
  29. कूटनीति
  30. ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी
  31. नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
  32. समस्यापूर्ति करना
  33. पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना
  34. गलीचे, दरी आदि बनाना
  35. बढ़ई की कारीगरी
  36. गृह आदि बनाने की कारीगरी
  37. सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
  38. सोना-चांदी आदि बना लेना
  39. मणियों के रंग को पहचानना
  40. खानों की पहचान
  41. वृक्षों की चिकित्सा
  42. भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
  43. तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना
  44. उच्चाटनकी विधि
  45. केशों की सफाई का कौशल
  46. मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
  47. म्लेच्छ-काव्यों का समझ लेना
  48. विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान
  49. शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
  50. नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना
  51. रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना
  52. सांकेतिक भाषा बनाना
  53. मनमें कटकरचना करना
  54. नयी-नयी बातें निकालना
  55. छल से काम निकालना
  56. समस्त कोशों का ज्ञान
  57. समस्त छन्दों का ज्ञान
  58. वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
  59. द्यू्त क्रीड़ा
  60. दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
  61. बालकों के खेल
  62. मन्त्रविद्या
  63. विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
  64. बेताल आदि को वश में रखने की विद्या

आठ के अंक का है कान्हा से खास ताल्लुक

gopala-krishna-with-eight-gopis-BZ47_l

इस बार जन्माष्टमी 17 अगस्त को पड़ रही है। वो भी दो दिवसीय। लेकिन पूर्णावतार माने जाने वाले कन्हैया के जन्म को आठ के अंक से हर बार जोड़ कर देखा जाता है। उनकी बारे में बताने वाले ग्रंथ, गीता-वेदशास्त्र भी उनकी पूरी महिमा से अछूते हैं यह माना जाता भी है, क्योंकि उनके छोर का कोई विकल्प ही नहीं है। उनके जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरू हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं, तब उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। इसीलिए जरूरी है कि उनकी आठ के अंक से जुडी विशेष बातें सब जानें।

आठवीं संतान थे वसुदेव जी के

  • ब्रज में रास रचाने वाले कान्हा और भक्तों के पालनहार श्री कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है।
  • उनका जन्म आठवें मनु के काल में हुआ था।
  • राक्षस राज कंस ने उनके माता-पिता वसुदेव और देवकी को कैद में रख रखा था।
  • ऎसा उसने एक भविष्यवाणी में खुद के अंत की सुने जाने के कारण किया था।
  • जिसमें उसकी बहन की आठवीं संतान द्वारा उसका वध करने का सत्य छुपा हुआ था।

अष्टमी को जन्मे थे

  • कंस द्वारा देवकी के सात बच्चों को मार देने के पश्चात् भगवान विष्णु ने स्वंय को साधारण इंसान की तरह आश्चर्यजनिक रूप से कृष्ण के अवतार में प्रकट किया।
  • वे आठवें पुत्र के रूप में अष्टमी के दिन जन्मे थे, तब से लोग कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं।

आठ प्रमुख नाम लेते हैं उनके भक्त

  • श्री कृष्ण के भक्त उनकी पूजा में सर्वाधिक इन नामों को लेते हैं- नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव।
  • बाद में भक्तों ने रखे जैसे मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि।

आठ सखियां

  • वैसे तो भगवान् कृष्ण की काफी भक्त थीं, लेकिन ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा और भद्रा आदि आठ सखियां हैं।

आठ ही पत्नियां हैं

  • विभिन्न शास्त्रों में वर्णन है कि कान्हा जब बडे हो गए थे तो दैत्यों के वध के दौरान 16 हजार कन्याओं को उन्होंने कैद से मुक्त कराया। वे कृष्ण की ही भक्त थीं।
  • मगर मान्यता है कि रूक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी ही उनकी पत्नी थीं, यानी इस तरह आठ का अंक संयोग रखता है।

आठ चिह्न में विराजमान हैं

  • आज भक्त भगवान की पूजा के लिए जिन शुद्घ चीजों का प्रयोग करते हैं, उनमें से आठ चिह्न कृष्ण जी के हैं-सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी,पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री।

आठ नगर, जो पहचाने जाते हैं श्रीकृष्ण की स्थली

  • ब्रजभूमि कई शहरों को मिलाकर बना है, जिनका मुख्यालय मथुरा है। गोकुल, नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन कस्बे श्रीकृष्ण की लीलाओं के लिए जाने जाते हैं।
  • कंस के वध के बाद वे जहां दूसरी जगह बसे वह आज गुजरात राज्य में हैं।
  • द्वारिका नामक यह नगर विश्वकर्मा महाराज द्वारा समुद्र के सहारे स्थापित कराया गया। यह कुल आठ हो गए।

कृष्ण की 8 सखियां

  • राधा, ललिता आदि सहित कृष्ण की 8 सखियां थीं। सखियों के नाम निम्न हैं- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार इनके नाम इस तरह हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।
  • कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी।
  • कुछ जगह पर- ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रादेवी, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और कृत्रिमा (मनेली)। इनमें से कुछ नामों में अंतर है।

कृष्ण के आठ मित्र

  • श्रीदामा, सुदामा, सुबल, स्तोक कृष्ण, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, सुभग, बली और प्राणभानु। इनमें से आठ उनके साथ मित्र थे। ये नाम आदिपुराण में मिलते हैं। 

कृष्ण के शत्रु

  • कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कंस तो मामा था। कंस का श्वसुर जरासंध था। शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। कालयवन यवन जाति का मलेच्छ जा था जो जरासंध का मित्र था। पौंड्रक काशी नरेश था जो खुद को विष्णु का अवतार मानता था।

कृष्ण चिन्ह

  • सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी, पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री।

श्रीकृष्ण की 5 महत्वपूर्ण शिक्षाएं

4575997560

संपूर्ण पुरुष माने जाने वाले भगवान श्री कृष्ण ने जीवन को देखने का एक नया नजरिया अपने भक्तों को दिया। जानिए श्री कृष्ण की उन 5 शिक्षाओं को जिन्हें अगर आप आत्मसात कर लें तो परमात्मा के निकट पहुंच सकेंगे…

  1. निष्काम स्वधर्माचरणम् : बिना फल की इच्छा किए या उस कार्य की प्रकृति पर सोच-विचार किए अपना कर्म करते जाओ।
  2. अद्वैत भावना सहित भक्ति : परमात्मा के प्रति अद्वैत भावना से स्वयं को उस परम शक्ति के हाथों समर्पित कर दो। उसी की भक्ति करो।
  3. ब्रह्म भावना द्वारा सम दृष्टि : सारे संसार को समान दृष्टि से देखो। सदैव ध्यान रखो कि संसार में एक सर्वव्यापी ब्रह्म है जो सर्वोच्च शक्ति है।
  4. इंद्रीय निग्रहम् और योग साधना : इंद्रियों को उनके साथान पर केंद्रित करो। सभी प्रकार की माया से स्वयं को मुक्त करने और अपनी इंद्रियों का विकास करने का निरंतर प्रयास करते रहो।
  5. शरणगति: जिन चीजों को तुम अपना कहते हो उसे उस दिव्य शक्ति को समर्पित कर दो और उस समर्पण को सार्थक बनाओ।

गीता के जरिए यह 12 उपदेश देने में सफल रहे श्रीकृष्ण

  1. गुस्से पर काबू – ‘क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है.’
  2. देखने का नजरिया – ‘जो ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान और कर्म को एक रूप में देखता है, उसी का नजरिया सही है.’
  3. मन पर नियंत्रण – ‘जो मन को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है.’
  4. खुद का आकलन – ‘आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो. अनुशासित रहो, उठो.’
  5. खुद का निर्माण – ‘मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है. जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है.’
  6. हर काम का फल मिलता है – ‘इस जीवन में ना कुछ खोता है ना व्यर्थ होता है.’
  7. प्रैक्टिस जरूरी – ‘मन अशांत है और उसे नियंत्रित करना कठिन है, लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है.’
  8. विश्वास के साथ विचार – ‘व्यक्ति जो चाहे बन सकता है, यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करे.’
  9. दूर करें तनाव – ‘अप्राकृतिक कर्म बहुत तनाव पैदा करता है.’
  10. अपना काम पहले करें – ‘किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि अपना काम करें, भले ही उसे अपूर्णता से करना पड़े.’
  11. इस तरह करें काम – ‘जो कार्य में निष्क्रियता और निष्क्रियता में कार्य देखता है वह एक बुद्धिमान व्यक्ति है.’
  12. काम में ढूंढें खुशी – ‘जब वे अपने कार्य में आनंद खोज लेते हैं तब वे पूर्णता प्राप्त करते हैं.’

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक किस्से तथा उनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र बता रहे हैं-

इसलिए बढ़ गई थी द्रौपदी की साड़ी

2605_j

द्रौपदी का चीरहरण होते समय भगवान ने उसकी सहायता की और उसकी साड़ी को इतना बढ़ा दिया कि दु:शासन उतार न सका। इसके पीछे क्या कारण है कि कृष्ण ने द्रौपदी की सहायता की।

महाभारत में इस बात का जवाब है। बात उस समय की है जब पांडवों ने हस्तिनापुर से अलग होकर अपने लिए इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया। भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में ही सारा निर्माण हुआ। उसके बाद युधिष्ठिर का राजतिलक करके राजसूय यज्ञ किया गया। इसमें दुनियाभर के राजाओं ने भाग लिया। यज्ञ में अग्रपूजा की बात आई। पंडितों ने युधिष्ठिर से कहा कि सबसे पहले वे किसकी पूजा करेंगे। भीष्म के कहने पर भगवान कृष्ण का नाम अग्रपूजा के लिए तय हुआ।

लगभग सभी राजा इसके लिए तैयार थे, लेकिन कृष्ण की बुआ का बेटा शिशुपाल इसके लिए तैयार नहीं था। उसका कहना था कि राजाओं की सभा में एक ग्वाले की अग्रपूजा करना सभी राजाओं का अपमान करने जैसा है। उसने कृष्ण को गालियां देना शुरू कर दिया। शिशुपाल के जन्म के समय ही यह भविष्यवाणी हो चुकी थी कि इसकी मौत कृष्ण के हाथों होगी, लेकिन कृष्ण ने अपनी बुआ को ये भरोसा दिलाया था कि वे सौ बार शिशुपाल से अपना अपमान सहन करेंगे।

इसके बाद ही उसका वध करेंगे। सभा में शिशुपाल ने सारी मर्यादाएं तोड़ दी और अनेकों बार कृष्ण का अपमान किया। सौ बार पूरा होते ही कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। चक्र के प्रयोग से उनकी उंगली कट गई और उसमें से खून बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। उस समय कृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया था कि इस कपड़े के एक-एक धागे का कर्ज वे समय पडऩे पर चुकाएंगे। यह ऋण उन्होंने चीरहरण के समय चुकाया।

लाइफ मैनेजमेंट- अच्छा काम भविष्य के फिक्स डिपॉजिट की तरह होता है, जो समय आने पर आपको पूरे ब्याज सहित वापस मिलता है।

इसलिए गोवर्धन पर्वत उठाया कृष्ण ने?

2607_a

वर्षा ऋतु के बाद गांवों में देवराज इंद्र का आभार प्रकट करने के लिए यज्ञ किए जाते थे। इंद्र मेघों के देवता हैं और उन्हीं के आदेश से मेघ धरती पर पानी बरसाते हैं। हमेशा मेघ पानी बरसाते रहें, जिससे गांव और शहरों में अकाल जैसी स्थिति ना बने, इसके लिए यज्ञ के जरिए इंद्र को प्रसन्न किया जाता था। ब्रज मंडल में भी उस दिन ऐसे ही यज्ञ का आयोजन था। लोगों का मेला लगा देख, यज्ञ की तैयारियों को देख कृष्ण ने पिता नंद से पूछा कि ये क्या हो रहा है।

नंद ने उन्हें यज्ञ के बारे में बताया। कृष्ण ने कहा इंद्र को प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ क्यों? पानी बरसाना तो मेघों का कर्तव्य है और उन्हें आदेश देना इंद्र का कर्तव्य। ऐसे में उनको प्रसन्न करने का सवाल ही कैसे उठता है? ये तो उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए रिश्वत देने जैसी बात है। ब्रजवासियों ने कृष्ण को समझाया कि अगर यज्ञ नहीं हुआ तो इंद्र क्रोधित हो जाएंगे। इससे पूरे ब्रजमंडल पर संकट आ सकता है। कृष्ण ने कहा कि अगर पूजा और यज्ञ ही करना है तो गोवर्धन पर्वत का किया जाना चाहिए, क्योंकि वो बिना किसी प्रतिफल की आशा में हमारे पशुओं का भरण-पोषण करता है, हमें औषधियां देता है।

बहुत बहस के बाद ब्रजवासी कृष्ण की बात से सहमत हो गए और उन्होंने इंद्र के यज्ञ की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल पर भयंकर बरसात शुरू कर दी। ब्रजवासी डर गए। नदियां, तालाब सभी उफन गए। बाढ़ आ गई। ब्रज डूबने लगा और लोगों के प्राण संकट में आ गए। सभी ने कृष्ण से कहा कि देखो तुम्हारे कहने पर इंद्र को नाराज किया तो उसने कैसा प्रलय मचा दिया है। अब ये गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा क्या? कृष्ण ने कहा – हां, यही गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा। कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ ही छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सारे गांव वाले उसके नीचे आ गए।

वे बारिश की बौछारों से बच गए। भगवान ने ग्वालों से कहा कि सभी मेरी तरह गोवर्धन को उठाने में सहायता करो। अपनी-अपनी लाठियों का सहारा दो। ग्वालों ने अपनी लाठियां गोवर्धन से टिका दी। इंद्र को हार माननी पड़ी। उसका अहंकार नष्ट हो गया। वो कृष्ण की शरण में आ गया। भगवान ने उसे समझाया कि अपने कर्तव्यों के पालन के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं करनी चाहिए। जो हमारा कर्तव्य है, उसे बिना किसी लालच के पूरा करना चाहिए।

लाइफ मैनेजमेंट- कृष्ण ने यहां सीधे रूप से लाइफ मैनेजमेंट के तीन सूत्र दिए हैं। पहला यह कि भ्रष्टाचार बढ़ाने में दो पक्षों का हाथ होता है। एक जो कर्तव्यों के पालन के लिए अनुचित लाभ की मांग करता है, दूसरा वह पक्ष जो ऐसी मांगों पर बिना विचार और विरोध के लाभ पहुंचाने का काम करता है। इंद्र मेघों का राजा है, लेकिन पानी बरसाना उसका कर्तव्य है। इसके लिए उसकी पूजा की जाए या उसके लिए यज्ञ किए जाएं, आवश्यक नहीं है। अनुचित मांगों पर विरोध जरूरी है। जो लोग किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को उसके कर्तव्य की पूर्ति के लिए रिश्वत देते हैं तो वे भी भ्रष्टाचार फैलाने के दोषी हैं।

कृष्ण ने द्वारिका को राजधानी के लिए क्यों चुना?

krishna.in.dwaraka.story

मथुरा में कंस वध के बाद भगवान कृष्ण को वसुदेव और देवकी ने शिक्षा ग्रहण करने के लिए अवंतिका नगरी (वर्तमान में मध्यप्रदेश के उज्जैन) में गुरु सांदीपनि के पास भेजा। बड़े भाई बलराम के साथ कृष्ण पढऩे के लिए आ गए। यहीं पर सुदामा से उनकी मित्रता हुई। शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब गुरुदक्षिणा की बात आई तो ऋषि सांदीपनि ने कृष्ण से कहा कि तुमसे क्या मांगू, संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुमसे मांगी जाए और तुम न दे सको। कृष्ण ने कहा कि आप मुझसे कुछ भी मांग लीजिए, मैं लाकर दूंगा। तभी गुरु दक्षिणा पूरी हो पाएगी।

ऋषि सांदीपनि ने कहा कि शंखासुर नाम का एक दैत्य मेरे पुत्र को उठाकर ले गया है। उसे लौटा लाओ। कृष्ण ने गुरु पुत्र को लौटा लाने का वचन दे दिया और बलराम के साथ उसे खोजने निकल पड़े। खोजते-खोजते सागर किनारे तक आ गए। यह प्रभास क्षेत्र था। जहां चंद्रमा की प्रभा यानी चमक समान होती थी। समुद्र से पूछने पर उसने भगवान को बताया कि पंचज जाति का दैत्य शंख के रूप में समुद्र में छिपा है। हो सकता है कि उसी ने आपके गुरु पुत्र को खाया हो। भगवान ने समुद्र में जाकर शंखासुर को मारकर उसके पेट में अपने गुरु पुत्र को खोजा, लेकिन वो नहीं मिला। शंखासुर के शरीर का शंख लेकर भगवान यमलोक गए। इसी शंख का नाम पांचजन्य शंख पड़ा।

भगवान ने यमराज से अपने गुरु पुत्र को वापस ले लिया और गुरु सांदीपनि को उनका पुत्र लौटाकर गुरु दक्षिणा पूरी की। भगवान कृष्ण ने तभी प्रभास क्षेत्र को पहचान लिया था। यहां बाद में उन्होंने द्वारिका पुरी का निर्माण किया। भगवान ने प्रभास क्षेत्र की विशेषता देखी। उन्होंने तभी विचार कर लिया था कि समुद्र के बीच में बसाया गया नगर सुरक्षित हो सकता है। जरासंघ ने 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया। उसके बाद कालयवन के साथ मिलकर फिर हमला बोला। तब कृष्ण ने प्रभास क्षेत्र में द्वारिका निर्माण का निर्णय लिया ताकि मथुरावासी आराम से वहां रह सकें। कोई भी राक्षस या राजा उन पर आक्रमण न कर सके।

लाइफ मैनेजमेंट-कई बार वर्तमान में भी भविष्य की समस्याओं का हल छुपा होता है। बस जरूरत होती है सही नजरिये और दूरदृष्टि की।

जब कृष्ण ने खेल-खेल में किया यमुना को प्रदूषण मुक्त

Kaliya-Mardan1

एक बार भगवान कृष्ण मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद से खेल रहे थे। भगवान ने जोर से गेंद फेंकी और वो यमुना में जा गिरी। भारी होने से वो सीधे यमुना के तल पर चली गई। मित्रों ने कृष्ण को कोसना शुरू किया। कहने लगे कि तुमने गेंद को यमुना में फेंका है, तुम ही बाहर लेकर आओ। समस्या यह थी कि उस समय यमुना में कालिया नाग रहता था। पांच फनों वाला नाग बहुत खतरनाक और विषधर था। उसके विष से यमुना काली हो रही थी और उसी जहर के कारण गोकुल के पशु यमुना का पानी पीकर मर रहे थे। कालिया नाग गरूड़ के डर से यमुना में छिपा था।

कान्हा बहुत छोटे थे, लेकिन मित्रों के जोर के कारण उन्होंने तय किया कि गेंद वो ही निकाल कर लाएंगे। कान्हा ने यमुना में छलांग लगा दी। सीधे तल में पहुंच गए। वहां कालिया नाग अपनी पत्नियों के साथ रह रहा था। कान्हा ने उसे यमुना छोड़कर सागर में जाने के लिए कहा, लेकिन वो नहीं माना और अपने विष से उन पर प्रहार करने लगा। कृष्ण ने कालिया नाग की पूंछ पकड़कर उसे मारना शुरू कर दिया। बहुत देर हो गई तो मित्रों को चिंता होने लगी। उन्हें गलती का एहसास हुआ और वे रोने-चिल्लाने लगे। कुछ दौड़ कर नंद-यशोदा और अन्य गोकुलवासियों को बुला लाए। यमुना के किनारे सभी चिल्लाने लगे।

यशोदा सहित सभी औरतें रोने लगीं। इधर, कृष्ण और कालिया नाग का युद्ध जारी था। भगवान ने उसके फन पर चढ़कर उसका सारा विष निकाल दिया। विषहीन होने और थक जाने पर कालिया नाग ने भगवान से हार मानकर उनसे माफी मांगी। भगवान कृष्ण ने उसे पत्नियों सहित सागर में जाने का आदेश दिया। खुद कालिया नाग भगवान को अपने फन पर सवार करके यमुना के तल से ऊपर लेकर आया। गोकुलवासियों को शांति मिली। कालिया नाग चला गया। यमुना को उसके विष से मुक्ति मिल गई।

लाइफ मैनेजमेंट-वास्तव में कालिया नाग प्रदूषण का प्रतीक है। हमारे देश की अधिकतर नदियां अभी भी प्रदूषण के जहर से आहत हैं। भगवान कृष्ण इस कथा के जरिए ये संदेश दे रहे हैं कि नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। अगर हम अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं तो इसका नुकसान भी हमें ही उठाना होगा। जैसे गोकुलवासियों ने विष के डर के कारण कालिया नाग को यमुना से भगाने का प्रयास नहीं किया तो उनके ही पशु उसके विष से मारे गए।

कृष्ण से सीखिए कैसी तैयारी हो युद्ध में जाने की?

KrishnaPromise

महाभारत युद्ध में भीष्म के तीरों की शय्या पर सो जाने के बाद गुरु द्रोणाचार्य को कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया गया। द्रोण को हराना मुश्किल होता जा रहा था और वो पांडवों की सेना को लगातार खत्म कर रहे थे। ऐसे में सभी पांडव भाई कृष्ण की शरण में आए। उन्होंने कृष्ण से पूछा कि गुरु द्रोण को कैसे रोका जाए? तब कृष्ण ने एक युक्ति सुझाई। उन्होंने कहा कि अवंतिका के राजपुत्रों विंद और अनुविंद की सेना में अश्वत्थामा नाम का हाथी है। उसे खोजकर मारा जाए और गुरु द्रोण तक ये संदेश पहुंचाया जाए कि अश्वत्थामा मारा गया।

अश्वत्थामा द्रोण के पुत्र का भी नाम था, जो उन्हें बहुत प्रिय था। भीम ने उस हाथी को खोजकर मार डाला और गुरु द्रोण के सामने चिल्लाने लगा कि मैंने अश्वत्थामा को मार दिया। गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर से पूछा तो उसने कहा कि अश्वत्थामा मरा है, वो हाथी है या नर, ये पता नहीं। इस पर गुरु द्रोण ध्यान लगाकर अपनी शक्ति से ये पता लगाने के लिए बैठे और धृष्टधुम्न ने उनको मार दिया।

लाइफ मैनेजमेंट- किसी भी युद्ध में जहां योद्धाओं के नाम याद रखना मुश्किल होता है, कृष्ण ने एक हाथी तक का नाम याद रखा। इसी तरह इस प्रतियोगी दुनिया में किसी भी तरह की जानकारी का होना अच्छा है, लेकिन उस जानकारी का सही उपयोग ही आपको सफल बना सकता है।

कृष्ण ने सिखाया हमेशा होना चाहिए ‘प्लान बी’

krishna_arjuna_Mahabharata-Kurukshetra1

एक बार की बात है। भगवान कृष्ण ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए बहुत दूर तक निकल गए। उन्हें भूख लगने लगी। आसपास कोई साधन नहीं था। उन्होंने ग्वालों से कहा कि पास ही एक यज्ञ का आयोजन हो रहा है। वहां जाओ और भोजन मांग कर ले आओ। ग्वालों ने वैसा ही किया। वे यज्ञ मंडप में गए और वहां भोजन की मांग की। ग्वालों ने कहा कि नंद पुत्र कृष्ण थोड़ी दूरी पर ठहरे हुए हैं, उन्हें भूख लगी है। थोड़ा भोजन दे दीजिए। यज्ञ का आयोजन कर रहे ब्राह्मणों ने भोजन देने से मना कर दिया। उनका मत था कि जब तक यज्ञ देवता को भोग न लग जाए तब तक किसी को भोजन नहीं दे सकते।

ग्वाले लौट आए। कृष्ण ने उनसे पूछा कि भोजन क्यों नहीं लाए तो ग्वालों ने ब्राह्मणों की बात उनसे कह दी। कृष्ण ने उनसे कहा एक बार फिर जाकर मांगो शायद इस बार भोजन मिल जाए। ग्वालों ने फिर वैसा ही किया, लेकिन फिर वही जवाब लेकर खाली हाथ लौट आए। भगवान ने कहा एक बार फिर जाओ। इस बार ब्राह्मणों से नहीं, उनकी पत्नियों से भोजन मांगना। ग्वालों ने कहा वे भी वही जवाब देंगी, जो उनके पतियों ने दिया है। कृष्ण ने कहा – नहीं, वे मुझे चाहती हैं, वे तुम्हें भोजन अवश्य देंगी। ग्वालों ने वैसा ही किया। ब्राह्मण की पत्नियों से कृष्ण के लिए भोजन मांगा तो वे तत्काल उनके साथ भोजन लेकर वहां आ गईं, जहां कृष्ण ठहरे थे।

सबने प्रेम से भोजन किया। ब्राह्मण पत्नियों ने कृष्ण को अपने हाथों से परोसा और भोजन कराया। ग्वाले इस बात से हैरान थे। भोजन करके सभी तृप्त हो गए। ये कहानी बहुत साधारण और छोटी है, लेकिन इसके पीछे का संदेश बहुत ही काम का है। कृष्ण ने ग्वालों को बार-बार भोजन लेने भेजा। आखिरी बार को छोड़कर हर बार निराशा ही हाथ लगी। कृष्ण कह रहे हैं कि व्यक्ति को कभी प्रयास करना नहीं छोडऩा चाहिए। सफलता के लिए लगातार प्रयास करते रहें, लेकिन अगर एक ही प्रयास में बार-बार असफलता मिले तो खुद की योजना पर भी विचार आवश्यक है।

लाइफ मैनेजमेंट- अगर एक ही दिशा में लगातार प्रयासों में असफलता मिल रही है तो अपने प्रयासों की दिशा भी बदल देनी चाहिए। किसी भी समस्या पर हमेशा दो नजरिये से सोचना चाहिए, अर्थात् आपके पास हमेशा दूसरा प्लान जरूर होना चाहिए।

श्रीमद् भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने  जन्म और मृत्यु का वर्णन किया

श्रीमद् भगवद्गीता-  अध्याय 2 श्लोक 20

आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा | वह अजन्मा, नित्य, शाश्र्वत तथा पुरातन है | शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता |

अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2.20

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |

अजो नित्यः शाश्र्वतोSयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे || २० ||

भावार्थ: आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु | वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा | वह अजन्मा, नित्य, शाश्र्वत तथा पुरातन है | शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता |

तात्पर्य: गुणात्मक दृष्टि से, परमात्मा का अणु-अंश परम से अभिन्न है | वह शरीर की भाँति विकारी नहीं है | कभी-कभी आत्मा को स्थायी या कूटस्थ कहा जाता है | शरीर में छह प्रकार के रूपान्तर होते हैं | वह माता के गर्भ से जन्म लेता है, कुछ काल तक रहता है, बढ़ता है, कुछ परिणाम उत्पन्न करता है, धीरे-धीरे क्षीण होता है और अन्त में समाप्त हो जाता है | किन्तु आत्मा में ऐसे परिवर्तन नहीं होते | आत्मा अजन्मा है, किन्तु चूँकि यह भौतिक शरीर धारण करता है, अतः शरीर जन्म लेता है | आत्मा न तो जन्म लेता है, न मरता है | जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है | और चूँकि आत्मा जन्म नहीं लेता , अतः उसका न तो भूत है, न वर्तमान न भविष्य | वह नित्य, शाश्र्वत तथा सनातन है – अर्थात् उसके जन्म लेने का कोई इतिहास नहीं है| जैम शरीर के प्रभाव में आकर आत्मा के जन्म, मरण आदि का इतिहास खोजते हैं | आत्मा शरीर की तरह कभी भी वृद्ध नहीं होता, अतः तथाकथित वृद्ध पुरुष भी अपने में बाल्यकाल या युवावस्था जैसी अनुभूति पाटा है | शरीर के परिवर्तनों का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं होता | शरीर की उपसृष्टि संतानें हैं और वे भी व्यष्टि आत्माएँ है और शरीर के कारण वे किसी न किसी की सन्तानें प्रतीत होते हैं | शरीर की वृद्धि आत्मा की उपस्थिति के कारण होती है, किन्तु आत्मा के न तो कोई उपवृद्धि है न ही उसमें कोई परिवर्तन होता है | अतः आत्मा शरीर के छः प्रकार के परिवर्तन से मुक्त है |

श्रीमद् भगवद्गीता-  अध्याय 2 श्लोक 22

जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है |

वांसासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोSपराणि |

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा – न्यन्यानि संयाति नवानि देहि || २२ ||

भावार्थ: जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है |

तात्पर्य: अणु-आत्मा द्वारा शरीर का परिवर्तन एक स्वीकृत तथ्य है | आधुनिक विज्ञानीजन तक, जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्र्वास नहीं करते, पर साथ ही हृदय से शक्ति-साधन की व्याख्या भी नहीं कर पाते, उन परिवर्तनों को स्वीकार करने को बाध्य हैं, जो बाल्यकाल से कौमारावस्था औए फिर तरुणावस्था तथा वृद्धावस्था में होते रहते हैं | वृद्धावस्था से यही परिवर्तन दूसरे शरीर में स्थानान्तरित हो जाता है | इसकी व्याख्या एक पिछले श्लोक में (२.१३) की जा चुकी है |

अणु-आत्मा का दूसरे शरीर में स्थानान्तरण परमात्मा की कृपा से सम्भव हो पाता है | परमात्मा अणु-आत्मा की इच्छाओं की पूर्ति उसी तरह करते हैं जिस प्रकार एक मित्र दूसरे की इच्छापूर्ति करता है | मुण्डक तथा श्र्वेताश्र्वतर उपनिषदों में आत्मा तथा परमात्मा की उपमा दो मित्र पक्षियों से दी गयी है और जो एक ही वृक्ष पर बैठे हैं | इनमें से एक पक्षी (अणु-आत्मा) वृक्ष के फल खा रहा है और दूसरा पक्षी (कृष्ण) अपने मित्र को देख रहा है | यद्यपि दोनों पक्षी समान गुण वाले हैं, किन्तु इनमें से एक भौतिक वृक्ष के फलों पर मोहित है, किन्तु दूसरा अपने मित्र के कार्यकलापों का साक्षी मात्र है | कृष्ण साक्षी पक्षी हैं, और अर्जुन फल-भोक्ता पक्षी | यद्यपि दोनों मित्र (सखा) हैं, किन्तु फिर भी एक स्वामी है और दूसरा सेवक है | अणु-आत्मा द्वारा इस सम्बन्ध की विस्मृति ही उसके एक वृक्ष से दूसरे पर जाने या एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का कारण है | जीव आत्मा प्राकृत शरीर रूपी वृक्ष पर अत्याधिक संघर्षशील है, किन्तु ज्योंही वह दूसरे पक्षी को परम गुरु के रूप में स्वीकार करता है – जिस प्रकार अर्जुन कृष्ण का उपदेश ग्रहण करने के लिए स्वेच्छा से उनकी शरण में जाता है – त्योंही परतन्त्र पक्षी तुरन्त सारे शोकों से विमुक्त हो जाता है |

श्रीमद् भगवद्गीता-  अध्याय 2 श्लोक 23

यह आत्मा न तो कभी किसी शस्त्र द्वारा खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, न अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगोया या वायु द्वारा सुखाया जा सकता है |

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः || २३ ||

भावार्थ: यह आत्मा न तो कभी किसी शस्त्र द्वारा खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, न अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगोया या वायु द्वारा सुखाया जा सकता है |

तात्पर्य: सारे हथियार – तलवार, आग्नेयास्त्र, वर्षा के अस्त्र, चक्रवात आदि आत्मा को मारने में असमर्थ हैं | ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक आग्नेयास्त्रों के अतिरिक्त मिट्टी, जल, वायु, आकाश आदि के भी अनेक प्रकार के हथियार होते थे | यहाँ तक कि आधुनिक युग के नाभिकीय हथियारों की गणना भी आग्नेयास्त्रों में की जाती है, किन्तु पूर्वकाल में विभिन्न पार्थिव तत्त्वों से बने हुए हथियार होते थे | आग्नेयास्त्रों का सामना जल के (वरुण) हथियारों से किया जाता था, जो आधुनिक विज्ञान के लिए अज्ञात हैं | आधुनिक विज्ञान को चक्रवात हथियारों का भी पता नहीं है | जो भी हो, आत्मा को न तो कभी खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, न किन्हीं वैज्ञानिक हथियारों से उसका संहार किया जा सकता है, चाहे उनकी संख्या कितनी ही क्यों न हो |

श्रीमद् भगवद्गीता-  अध्याय 2 श्लोक 24

यह आत्मा अखंडित तथा अघुलनशील है | इसे न तो जलाया जा सकता है, न ही सुखाया जा सकता है | यह शाश्र्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर तथा सदैव एक सा रहने वाला है |

अच्छेद्योSयमदाह्योSयमक्लेद्योSशोष्य एव च |

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोSयं सनातनः || २४ ||

भावार्थ: यह आत्मा अखंडित तथा अघुलनशील है | इसे न तो जलाया जा सकता है, न ही सुखाया जा सकता है | यह शाश्र्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर तथा सदैव एक सा रहने वाला है |

तात्पर्य: अणु-आत्मा के इतने सारे गुण यही सिद्ध करते हैं कि आत्मा पूर्ण आत्मा का अणु-अंश है और बिना किसी परिवर्तन के निरन्तर उसी तरह बना रहता है | इस प्रसंग में अद्वैतवाद को व्यवहृत करना कठिन है क्योंकि अणु-आत्मा कभी भी परम-आत्मा के साथ मिलकर एक नहीं हो सकता | भौतिक कल्मष से मुक्त होकर अणु-आत्मा भगवान् के तेज की किरणों की आध्यात्मिक स्फुलिंग बनकर रहना चाह सकता है, किन्तु बुद्धिमान जीव तो भगवान् की संगति करने के लिए वैकुण्ठलोक में प्रवेश करता है।

बालकृष्ण की लिलाएं… बालपन में ही श्रीकृष्ण ने किन राक्षसों का वध कैसे किया था…

ब्रह्मांड के दर्शन 

Krishna-universe-in-mouth
बाल लीला के अंतर्गत कृष्ण ने एक बार मिट्टी खा ली। बलदाऊ ने मां यशोदा से इसकी शिकायत की तो मां ने डांटा और मुंह खोलने के लिए कहा। पहले तो उन्होंने मुंह खोलने से मना कर दिया, जिससे यह पुष्टि हो गई कि वास्तव में कृष्ण ने मिट्टी खाई है। बाद में मां की जिद के आगे अपना मुंह खोल दिया। कृष्ण ने अपने मुंह में यशोदा को संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए। बचपन में गोकुल में रहने के दौरान उन्हें मारने के लिए आततायी कंस ने शकटासुर, बकासुर और तृणावर्तजैसे कई राक्षस भेजे, जिनका संहार कृष्ण ने खेल-खेल में कर दिया।

माखनचोर कन्हैया 

989KrsnaBalbutter
माखनचोरी की लीला से कृष्ण ने सामाजिक न्याय की नींव डाली। उनका मानना था कि गायों के दूध पर सबसे पहला अधिकार बछड़ों का है। वह उन्हीं के घर से मक्खन चुराते थे, जो खानपान में कंजूसी दिखाते और बेचने के लिए मक्खन घरों में इकट्ठा करते थे। वैसे माखन चोरी करने की बात कृष्ण ने कभी मानी नहीं। उनका कहना था कि गोपीकाएं स्वयं अपने घर बुलाकर मक्खन खिलाती हैं। एक बार गोपिकाओं की उलाहना से तंग आकर यशोदा उन्हें रस्सी से बांधने लगीं। लेकिन वे कितनी भी लंबी रस्सी लातीं, छोटी पड़ जाती। जब यशोदा बहुत परेशान हो गईं तो कन्हैया मां के हाथों से बंध ही गए। इस लीला से उनका नाम दामोदर (दाम यानी रस्सी और उदर यानी पेट) पड़ा।

स्नान की मर्यादा 

31 Due to remaining in the water for a long time the gopis felt cold and were shivering p154
यमुना किनारे काली नाग का बड़ा आतंक था। उसके घाट में पानी इतना जहरीला था कि मनुष्य या पशु-पक्षी पानी पीते ही मर जाते थे। कृष्ण ने नाग को नाथ कर वहां उसे भविष्य में न आने की हिदायत दी। कृष्ण जब गाय चराने जाते, तो उनके सभी सखा साथ रहते थे। सब कृष्ण के कहे अनुसार चलते थे। ब्रह्मा जी को ईर्ष्या हुई और एक दिन सभी गायों को वे अपने लोक भगा ले गए। जब गाएं नहीं दिखीं तो गोकुलवासियों ने कृष्ण पर गायों चुराने का आरोप लगा दिया। कृष्ण ने योगमाया के बल पर सभी ग्वालों के घर उतनी ही गाएं पहुंचा दीं। ब्रह्मा ने जब यह बात सुनी तो बहुत लज्जित हुए। इंद्र पूजा का विरोध करते हुए सात वर्ष की आयु में सात दिन और सात रात गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली में उठाकर कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से गोकुल वासियों की रक्षा की। बाल लीला में ही कृष्ण ने एक बार नदी में निर्वस्त्र स्नान कर रहीं गोपिकाओं के वस्त्र चुराकर पेड़ में टांग दिए। स्नान के बाद जब गोपीकाओं को पता चला तो वे कृष्ण से मिन्नतें करने लगीं। कृष्ण ने आगाह करते हुए कहा कि नग्न स्नान से मर्यादा भंग होती है और वरुण देवता का अपमान होता है, वस्त्र लौटा दिए।

राक्षसों का वध कैसे किया था…

1krishna-killing-demons

पुतना का वध

बालकृष्ण ने सबसे पहले पुतना का उद्धार किया। पुतना के विषय में काफी लोग जानते भी हैं। वह कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। चूंकि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान ही हैं, अत: स्तनपान करते-करते ही उन्होंने पुतना का वध कर दिया।

तृणावर्त का वध

जब कंस को यह मालूम हुआ कि पुतना का वध हो गया है तो उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए तृणावर्त नामक राक्षस को भेजा। तृणावर्त बवंडर के रूप धारण करके बड़े-बड़े पेड़ों को भी उखाड़ सकता था। तृणावर्त बवंडर बनकर गया और उसने बालकृष्ण को भी अपने साथ उड़ा लिया। कृष्ण ने अब अपना भार बहुत बड़ा लिया, जिसे तृणावर्त भी संभाल नहीं पा रहा था। जब बवंडर शांत हुआ तो बालकृष्ण ने राक्षस का गला पकड़कर उसका वध कर दिया।

यमलार्जुन का उद्धार

माता यशोदा श्रीकृष्ण की शरारतों से परेशान हो गईं और उन्होंने कान्हा को ऊखल से बांध दिया, ताकि कृष्ण इधर-उधर न जा सके। जब माता यशोदा घर के दूसरों कामों में व्यस्त हो गई तब कृष्ण ऊखल को ही खींचने लगे। वहां आंगन में दो बड़े-बड़े वृक्ष भी लगे हुए थे, कृष्ण ने उन दोनों वृक्षों के बीच में ऊखल फंसा दिया और जोर लगाकर खींच दिया। ऐसा करते ही दोनों वृक्ष जड़ सहित उखड़ गए। वृक्षों के उखड़ते ही उनमें से दो यक्ष प्रकट हुए, जिन्हें यमलार्जुन के नाम से जाना जाता था।

ये दोनों यक्ष पूर्व जन्म कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे। इन दोनों ने एक बार देवर्षि नारद का अपमान कर दिया था, इस कारण देवर्षि ने वृक्ष बनने का शाप दे दिया था। श्रीकृष्ण ने वृक्षों को उखाड़कर इन दोनों यक्षों का उद्धार किया।

वत्सासुर का वध

जब कंस को मालूम हुआ कि कृष्ण ने पुतना के बाद तृणावर्त का भी वध कर दिया है तब उसने वत्सासुर को भेजा। वत्सासुर एक बछड़े का रूप धारण करके श्रीकृष्ण की गायों के साथ मिल गया। कान्हा उस समय गायों का चरा रहे थे। बालकृष्ण ने उस बछड़े के रूप में दैत्य को पहचान लिया और उसकी पूंछ पकड़ घुमाया और एक वृक्ष पर पटक दिया। यहीं उस दैत्य का वध हो गया।

बकासुर का वध

वत्सासुर के बाद कंस ने बकासुर को भेजा। बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए पहुंच गया। उस समय कान्हा और सभी बालक खेल रहे थे। तब बगुले ने कृष्ण को निगल लिया और कुछ ही देर बाद कान्हा ने उस बगुले को चीरकर उसका वध कर दिया।

अघासुर का वध

बकासुर के वध के बाद कंस ने कान्हा को मारने के लिए अघासुर को भेजा। अघासुर पुतना और बकासुर का छोटा भाई था। अघासुर बहुत ही भयंकर राक्षस था, सभी देवता भी उससे डरते थे। अघासुर ने कृष्ण को मारने के लिए विशाल अजगर का रूप धारण किया। इसी रूप में अघासुर अपना मुंह खोलकर रास्ते में ऐसे बन गया जैसे कोई गुफा हो। उस समय श्रीकृष्ण और सभी बालक वहां खेल रहे थे। एक बड़ी गुफा देखकर सभी बालकों ने उसमें प्रवेश करने का मन बनाया। सभी ग्वाले और कृष्ण आदि उस गुफा में घुस गए। मौका पाकर अघासुर ने अपना मुंह बंद कर लिया। जब सभी को अपने प्राणों पर संकट नजर आया तो श्रीकृष्ण से सबको बचाने की प्रार्थना करने लगे। तभी कृष्ण ने अपना शरीर तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया। अब कान्हा ने भी विशाल शरीर बना लिया था, इस कारण अघासुर सांस भी नहीं ले पा रहा था। इसी प्रकार अघासुर का भी वध हो गया।

कौन थे कृष्ण के पांच बड़े शत्रु

justice-krishna-paintings-HD-Wallpapers

1-कंस

भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कालनेमि विरोचन का पुत्र था। देवासुर संग्राम में कालनेमि ने भगवान हरि पर अपने सिंह पर बैठे ही बैठे बड़े वेग से त्रिशूल चलाया, पर हरि ने उस त्रिशूल को पकड़ लिया और उसी से उसको तथा उसके वाहन को मार डाला। अन्य कथा अनुसार युद्ध में उसने अनेक प्रकार की माया फैलाई और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। वर तारकामय में हरि के चक्र में मारा गया।

कंस ने मथुरा को भी अपने शासन के अधीन कर लिया था और वह प्रजा को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा। कंस की इस शक्ति का मुख्‍य कारण यह था कि उसे आर्यावर्त के तत्कालीन सर्वप्रतापी राजा जरासंध का सहारा प्राप्त था। जरासंध पौरव वंश का था और मगध के विशाल साम्राज्य का शासक था। जरासंध कंस का ससुर भी था।

कंस क्यों कृष्ण का शत्रु था? : कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था और शूरसेन के पुत्र वसुदेव का विवाह कंस की बहन देवकी से हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह रखता था, लेकिन एक दिन वह देवकी के साथ रथ पर कहीं जा रहा था, तभी आकाशवाणी सुनाई पड़ी- ‘जिसे तू चाहता है, उस देवकी का आठवां बालक तुझे मार डालेगा।’

इस भयंकर आकाशवाणी को सुनकर कंस भयभीत हो गया और उसने अपनी बहन को मारने के लिए तलवार निकाल ली। वसुदेव ने उसे जैसे-तैसे समझाकर शांत किया और वादा किया कि वे अपने पुत्र उसे सौंप देंगे।

पहला पुत्र होने पर जब वसुदेव कंस के पास पहुंचे तो कंस ने कहा कि मुझे तो आठवां बेटा चाहिए। बाद में नारद ने बताया कि तुम्हें मारने के लिए देवकी के उदर से स्वयं भगवान विष्णु जन्म लेंगे तो कंस और भयभीत हो गया और उसने वसुदेव और देवकी को कैद कर लिया। बाद में कंस ने एक-एक करके देवकी के 6 बेटों को जन्म लेते ही मार डाला।

7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। तदनंतर 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया। कृष्ण के जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सभी संतरी सो गए और जेल के दरवाजे अपने आप खुलते गए। वसुदेव मथुरा की जेल से शिशु कृष्ण को लेकर नंद के घर पहुंच गए।

बाद में कंस को जब पता चला तो उसने वसुदेव तथा देवकी को छोड़ दिया, लेकिन उसके मंत्रियों ने अपने प्रदेश के सभी नवजात शिशुओं को मारना प्रारंभ कर दिया। बाद में उसे कृष्ण के नंद के घर होने के पता चला तो उसने अनेक आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों से कृष्ण को मरवाना चाहा, पर सभी कृष्ण तथा बलराम के हाथों मारे गए।

तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया। वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की।

2- जरासंध

कंस के मारे जाने के बाद उसका ससुर जरासंध कृष्ण का कट्टर शत्रु बन गया। जरासंध मगध का अत्यंत क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है। जरासंध कंस का ससुर था।

पुराणों के अनुसार जरासंध के नाम का अर्थ भी उसके जन्म की कहानी में छुपा हुआ है। वह बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था।

कंस के मारे जाने के बाद शूरसेन जनपद के सिंहासन पर श्रीकृष्ण बैठे थे। जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद (मथुरा) पर एक बार नहीं, कई बार चढ़ाई की, लेकिन हर बार वह असफल रहा। पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासन कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया।

कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा।

उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले। वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज, शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग कोसल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज गंधार का राजा सुबल नग्नजित का मीर का राजा गोभर्द, दरद देश का राजा आदि। महाभारत युद्ध में भीम ने जरासंध के शरीर को 2 हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था।

3- कालयवन

यह जन्म से ब्राह्मण लेकिन कर्म से असुर था और अरब के पास यवन देश में रहता था। पुराणों में इसे म्लेच्छों का प्रमुख कहा गया है। कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था। गर्ग गोत्र के ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे।

उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की और उनसे एक अजेय पुत्र की मांग की। शिव ने कहा- ‘तुम्हारा पुत्र संसार में अजेय होगा। कोई अस्त्र-शस्त्र से हत्या नहीं होगी। सूर्यवंशी या चंद्रवंशी कोई योद्धा उसे परास्त नहीं कर पाएगा।’

वरदान प्राप्ति के पश्चात ऋषि शेशिरायण एक झरने के पास से जा रहे थे कि उन्होंने एक स्त्री को जल नहाते हुए देखा, जो अप्सरा रम्भा थी। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए और उनका पुत्र कालयवन हुआ। ‘रंभा’ समय समाप्ति पर स्वर्गलोक वापस चली गई और अपना पुत्र ऋषि को सौंप गई।

काल जंग नामक एक क्रूर राजा मलीच देश पर राज करता था। उसे कोई संतान न थी जिसके कारण वह परेशान रहता था। उसका मंत्री उसे आनंदगिरि पर्वत के बाबा के पास ले गया। बाबा ने उसे बताया की वह ऋषि शेशिरायण से उनका पुत्र मांग ले।

ऋषि शेशिरायण ने बाबा के अनुग्रह पर पुत्र को काल जंग को दे दिया। इस प्रकार कालयवन यवन देश का राजा बना। उसके समान वीर कोई न था। एक बार उसने नारदजी से पूछा कि वह किससे युद्ध करे, जो उसके समान वीर हो। नारदजी ने उसे श्रीकृष्ण का नाम बताया।

राम के कुल के राजा शल्य ने जरासंध को यह सलाह दी कि वे कृष्ण को हराने के लिए कालयवन से दोस्ती करें। कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण के लिए सब तैयारियां कर लीं। दूसरी ओर जरासंध भी सेना लेकर निकल गया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश कृष्ण के नाम संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में संदेश भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं। कालयवन ने स्वीकार कर लिया।

अक्रूरजी और बलरामजी ने कृष्ण को इसके लिए मना किया, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कालयवन को शिव द्वारा दिए वरदान के बारे में बताया और यह भी कहा कि उसे कोई भी हरा नहीं सकता। श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि कालयवन राजा मुचुकुंद द्वारा मृत्यु को प्राप्त होगा।

एक बार इक्ष्वाकुवंशी मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद देवताओं की सहायता के लिए दानवों से युद्ध करने देवलोक पहुंच गए थे। उन्होंने देवताओं का साथ देकर और दानवों का संहार किया जिसके कारण देवता युद्ध जीत गए, तब इन्द्र ने उन्हें वर मांगने को कहा।

मुचुकुंद ने वापस पृथ्वीलोक जाने की इच्छा व्यक्त की, तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि पृथ्वी और देवलोक में समय का बहुत अंतर है जिस कारण अब वह समय नहीं रहा। अब तक तो तुम्हारे सभी बंधु-बांधव मर चुके हैं। उनके वंश का भी कोई नहीं बचा।

यह जानकर मुचुकुंद बहुत दु:खी हुए और वर मांगा कि उन्हें कलियुग के अंत तक सोना है। तब इन्द्र ने मुचुकुंद को वरदान दिया कि किसी धरती के निर्जन स्थान पर जाकर सो जाएं और यदि कोई तुम्हें उठाएगा तो तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जाएगा। इसी वरदान का प्रयोग श्रीकृष्ण कालयवन को मृत्यु देने के लिए करना चाहते थे।

श्रीकृष्ण और कालयवन का संघर्ष : जब कालयवन और कृष्ण में द्वंद्व युद्ध का जय हो गया तब कालयवन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण तुरंत ही दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और कालयवन उन्हें पकडऩे के लिए उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा।

श्रीकृष्ण लीला करते हुए भाग रहे थे, कालयवन पग-पग पर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा।

उसे देखकर कालयवन ने सोचा, मुझसे बचने के लिए श्रीकृष्ण इस तरह भेष बदलकर छुप गए हैं:- ‘देखो तो सही, मुझे मूर्ख बनाकर साधु बाबा बनकर सो रहा है।’ उसने ऐसा कहकर उस सोए हुए व्यक्ति को कसकर एक लात मारी।

वह पुरुष बहुत दिनों से वहां सोया हुआ था। पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया। वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाए जाने से कुछ रुष्ट हो गया था।

उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गई और वह क्षणभर में जलकर राख का ढेर हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकुवंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद थे। इस तरह कालयवन का अंत हो गया।

4- शिशुपाल

शिशुपाल 3 जन्मों से श्रीकृष्ण से बैर-भाव रखे हुआ था। इस जन्म में भी वह विष्णु के पीछे पड़ गया। दरअसल, शिशुपाल भगवान विष्णु का वही द्वारपाल था जिसे कि सनकादि मुनियों ने शाप दिया था।

वे जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा अंतिम तीसरे जन्म में कंस और शिशुपाल बने। कृष्ण ने प्रण किया था कि मैं शिशुपाल के 100 अपमान क्षमा करूंगा अर्थात उसे सुधरने के 100 मौके दूंगा।

शिशुपाल का वध : एक बार की बात है कि जरासंघ का वध करने के बाद श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम इन्द्रप्रस्थ लौट आए, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारी करवा दी। उस यज्ञ के ऋतिज आचार्य होते थे।

यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेद व्यास, भारद्वाज, सुनत्तु, गौतम, असित, वशिष्ठ, च्यवन, कण्डव, मैत्रेय, कवष, जित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिन, क्रतु, पैल, पाराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतहोत्र, मधुद्वंदा, वीरसेन, अकृतब्रण आदि सभी को आमंत्रित किया। इसके अलावा सभी देशों के राजाधिराज को भी बुलाया गया।

यज्ञ पूजा के बाद यज्ञ की शुरुआत के लिए समस्त सभासदों में इस विषय पर विचार होने लगा कि सबसे पहले किस देवता की पूजा की जाए? तब सहदेवजी उठकर बोले- श्रीकष्ण ही सभी के देव हैं जिन्हें ब्रह्मा और शंकर भी पूजते हैं, उन्हीं को सबसे पहले पूजा जाए।

पांडु पुत्र सहदेव के वचन सुनकर सभी ने उनके कथन की प्रशंसा की। भीष्म पितामह ने स्वयं अनुमोदन करते हुए सहदेव का समर्थन किया। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने शास्त्रोक्त विधि से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आरंभ किया।

इस कार्य से चेदिराज शिशुपाल अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘हे सभासदों! मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कालवश सभी की मति मारी गई है। क्या इस बालक सहदेव से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति इस सभा में नहीं है, जो इस बालक की हां में हां मिलाकर अयोग्य व्यक्ति की पूजा स्वीकार कर ली गई है? क्या इस कृष्ण से आयु, बल तथा बुद्धि में और कोई भी बड़ा नहीं है? क्या इस गाय चराने वाल ग्वाले के समान कोई और यहां नहीं है? क्या कौआ हविश्यान्न ले सकता है? क्या गीदड़ सिंह का भाग प्राप्त कर सकता है? न इसका कोई कुल है, न जाति, न ही इसका कोई वर्ण है। राजा ययाति के शाप के कारण राजवंशियों ने इस यदुवंश को वैसे ही बहिष्कृत कर रखा है। यह जरासंघ के डर से मथुरा त्यागकर समुद्र में जा छिपा था। भला यह किस प्रकार अग्रपूजा पाने का अधिकारी है?’

इस प्रकार शिशुपाल श्रीकृष्ण को अपमानित कर गाली देने लगा। यह सुनकर शिशुपाल को मार डालने के लिए पांडव, मत्स्य, केकय और सृचयवर्षा नरपति क्रोधित होकर हाथों में हथियार ले उठ खड़े हुए, किंतु श्रीकृष्ण ने उन सभी को रोक दिया। वहां वाद-विवाद होने लगा, परंतु शिशुपाल को इससे कोई घबराहट न हुई। कृष्ण ने सभी को शांत कर यज्ञ कार्य शुरू करने को कहा।

किंतु शिशुपाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने फिर से श्रीकृष्ण को ललकारते हुए गाली दी, तब श्रीकृष्ण ने गरजते हुए कहा, ‘बस शिशुपाल! मैंने तेरे एक सौ अपशब्दों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की थी इसीलिए अब तक तेरे प्राण बचे रहे। अब तक सौ पूरे हो चुके हैं। अभी भी तुम खुद को बचा सकने में सक्षम हो। शांत होकर यहां से चले जाओ या चुप बैठ जाएं, इसी में तुम्हारी भलाई है।’

लेकिन शिशुपाल पर श्रीकृष्ण की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ अतः उसने काल के वश होकर अपनी तलवार निकालते हुए श्रीकृष्ण को फिर से गाली दी। शिशुपाल के मुख से अपशब्द के निकलते ही श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चला दिया और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर कटकर गिर गया। उसके शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गई।

वचन क्यों दिया था? : शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था। माता-पिता उससे घबराकर उसका परित्याग कर देना चाहते थे, लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा।

इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया। अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया। इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की।

श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया।

शिशुपाल क्यों करता था अपमान? : क्योंकि शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था और रुक्मणि के माता-पिता रुक्मणि का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्म ने शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं।

5- पौंड्रक

चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी की तट पर किरात, वंग, एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है।

राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों को एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।’

यह सुनकर, पौंड्रक कृष्ण के विरुद्ध युद्ध की तैयारी शुरू करने लगा। अपने मित्र काशीराज की सहायता प्राप्त करने के लिए यह काशीनगर गया। यह सुनते ही कृष्ण ने ससैन्य काशीदेश पर आक्रमण किया।

कृष्ण आक्रमण कर रहे हैं- यह देखकर पौंड्रक और काशीराज अपनी अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर आए। युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं यह गरूड़ पर आरूढ़ था।

नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपटरूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।

स्वयं श्री कृष्ण के मुख से जानिए, कौन हैं उनके प्रिय भक्त

lord-krishna-and-arjuna-gif-6.gif

गीता के बारहवें अध्याय में कहा है, ‘‘मुझे प्राप्त करने के लिए सब कर्मों के फल का त्याग करने से तत्काल ही परम शांति प्राप्त होती है।’’

अद्वैष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एवं च।

निर्ममो निरहंकार: समदु:ख सुख: क्षमी।। 13।।

इस प्रकार शांति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित एवं स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित, सुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देता है।

संतुष्ट : सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चय:।

मध्यॢपतमनोबुद्धियों मदभक्त: स मे प्रिय:।। 14।।

तथा जो ध्यान योग में युक्त हुआ निरंतर लाभ-हानि में संतुष्ट है तथा मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है वह मेरे में अर्पण किए हुए मन बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

यस्मान्नाद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।

हर्षामर्ष भयोद्वेगैमुक्तो य: स च मे प्रिय:।। 15।।

तथा जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है तथा जो हर्ष-अहर्ष दूसरे की उन्नति देखकर दुखी होना, भय और उद्वेग आदि से रहित है वह भक्त मुझे प्रिय है।

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदा सी नो गतव्यथ:।

सर्वारम्भत्यागी यो मदभक्त: स मे प्रिय: ।। 16।।

और जो पुरुष आकांक्षा से रहित तथा बाहर-भीतर से शुद्ध और चतुर है अर्थात जिस काम के लिए आया था उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है वह सर्व आरंभों का त्यागी अर्थात मन, वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वाभाविक कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्यागी मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

यो न दुष्यति न दृष्टि न शोचति न कांक्षति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: ।। 17।।

और जो न कभी हर्षित होता है न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्यागी है वह भक्ति युक्त पुरुष मुझे प्रिय है।

सम: शत्रौ च मिंत्रे च तथा माना पमान यो:।

शीतोष्णसुख दु:सेषु सम: संगविवॢजत: ।। 18।।

और जो पुरुष शत्रु मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी-गर्मी और सुख-दुख आदि द्वंद्वों में सम है और सब संसार में आसक्ति से रहित है।

तुल्य निन्दास्तुति मौंनी संतुष्टों ये न केनचित।

अनिकेत: स्थिरमतिर्भक्ति मान्मे प्रियो नर:।। 19।।

तथा जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है अर्थात ईश्वर के स्वरूप का निरंतर मनन करने वाला है एवं जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता से रहित है वह स्थिर बुद्धि वाला भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

ये तु धम्र्यामृतमिदं यथोक्तं पर्मुपासते।

श्रद्धाना मत्परमा भक्त स्तेऽतीव में प्रिया:।। 20।।

और जो मेरे परायण हुए अर्थात मुझे परम आश्रय और परम गति और सबका आत्मरूप और सबसे परे परम पूज्य समझकर विशुद्ध प्रेम से मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर हुए श्रद्धायुक्त पुरुष ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते हैं वे भक्त मुझे अतिशत प्रिय हैं।

आखिर क्यों, भगवान श्री कृष्ण को प्यारी हैं यह छह चीजें?

बांसुरी

1589620-krishna-eyes-bansuri-oilcanvas-paintings

बांसुरी भगवान श्री कृष्‍ण को अत्यंत प्रिय है, क्योंकि बांसुरी में तीन गुण है। पहला बांसुरी मं गांठ नहीं है। जो संकेत देता है कि अपने अंदर किसी भी प्रकार की गांठ मत रखो यानी मन में बदले की भावना मत रखो। दूसरा बिना बजाये यह बजती नहीं है। मानो बता रही है कि जब तक ना कहा जाए तब तक मत बोलो। और तीसरा जब भी बजती है मधुर ही बजती है। जिसका अर्थ हुआ जब भी बोलो, मीठा ही बोलो। जब ऐसे गुण किसी में भगवान देखते हैं, तो उसे उठाकर अपने होंठों से लगा लेते हैं। ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से देखें तो बांसुरी नकारात्मक उर्जा और कालसर्प के प्रभाव को दूर करता है। श्री कृष्ण की कुण्डली में भी कालसर्प योग था। इसलिए श्री कृष्ण का बांसुरी से स्नेह है।

कृष्ण को प्यारी है गाएं

Lord-Krishna-In-a-Forest-With-Cow-Natural-Image

  • भगवान श्रीकृष्ण को गाय अत्यंत प्रिय है।
  • इसका कारण यह है कि गाय सब कार्यों में उदार तथा समस्त गुणों की खान है।
  • गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी, इन्हे पंचगव्य कहते हैं।
  • मान्यता है कि इनका पान कर लेने से शरीर के भीतर पाप नहीं ठहरता।
  • जो गौ की एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग का सुख भोगता है।

मोर से कृष्ण का स्नेह

Krishnasperfectreciprocation

  • मोर को चिर-ब्रह्मचर्य युक्त प्राणी समझा जाता है।
  • अतः प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को समाहित करने के प्रतीक रूप में कृष्ण मोर पंख धारण करते हैं।
  • मोर मुकुट का गहरा रंग दुःख और कठिनाइयों, हल्‍का रंग सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • यह भी कालसर्प के अशुभ प्रभाव से बचाता है।

कमल से कृष्ण का प्रेम

radha_krishna_lotus_by_vishnu108-d41xlio

  • कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है।
  • इसलिए कमल पवित्रता का प्रतीक है। इसकी सुंदरता और सुगंध सभी का मन मोहने वाली होती है।
  • साथ ही कमल यह संदेश देता है कि हमें कैसे जीना चाहिए?
  • सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए इसका सरल तरीका बताता है कमल।

माखन मिसरी भाए गोपाल को

pt1189

  • कृष्ण को माखन मिसरी बहुत ही प्रिय है।
  • मिसरी का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि जब इसे माखन में मिलाया जाता है, तो उसकी मिठास माखन के कण-कण में घुल जाती है।
  • माखन के प्रत्येक हिस्से में मिसरी की मिठास समा जाती है।
  • मिसरी युक्त माखन जीवन और व्यवहार में प्रेम को अपनाने का संदेश देता है।
  • यह बताता है कि प्रेम में किसी प्रकार से घुल मिल जाना चाहिए।

कृष्ण को भाए वैजयंती माला

krishna-lotus-mala1a

  • भगवान के गले में वैजयंती माला है, जो कमल के बीजों से बनी हैं।
  • दरअसल, कमल के बीज सख्त होते हैं। कभी टूटते नहीं, सड़ते नहीं, हमेशा चमकदार बने रहते हैं।
  • इसका तात्‍पर्य है, जब तक जीवन है, तब तक ऐसे रहो जिससे तुम्हें देखकर कोई दुखी न हो।
  • दूसरा यह माला बीज है, जिसकी मंजिल होती है भूमि।
  • भगवान कहते हैं जमीन से जुड़े रहो, कितने भी बड़े क्यों न बन जाओ। हमेशा अपने अस्तित्व की असलियत के नजदीक रहो।

कृष्ण और गोपियां

4ef26b0142a970df61d2e52e1c3fa539.jpg

धीरे-धीरे कृष्ण भक्त संप्रदायों, विशेषत: गौड़ीय वैष्णव चैतन्य संप्रदाय में, गोपी का चित्रण कृष्ण की शक्ति तथा उनकी लीला में सहयोगी के रूप में होने लगा। काव्य में स्थान कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है।

  • सूरदास के राधा और कृष्ण प्रकृति और पुरुष के प्रतीक हैं और गोपियाँ राधा की अभिन्न सखियाँ हैं। राधा कृष्ण के सबसे निकट दर्शाई गई हैं, किंतु अन्य गोपियाँ उससे ईर्ष्या नहीं करतीं। वे स्वयं को कृष्ण से अभिन्न मानती हैं।
  • ऋग्वेद में विष्णु के लिए प्रयुक्त ‘गोप’, ‘गोपति’ और ‘गोपा’ शब्द गोप-गोपी-परम्परा के प्राचीनतम लिखित प्रमाण कहे जा सकते हैं। इन उरूक्रम त्रिपाद-क्षेपी विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप परमपद में मधु के उत्स और भूरिश्रृंगा-अनेक सींगोंवाली गउएँ हैं। कदाचित इन गउओं के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है।
  • इस आलंकारिक वर्णन में अनेक विद्वानों ने विष्णु को सूर्य माना है, जो पूर्व दिशा से उठकर अन्तरिक्ष को नापते हुए तीसरे पाद-क्षेप में आकाश में फैल जाता है। कुछ लोगों ने ग्रह-नक्षत्रों को ही गोपी कहा है, जो सूर्य मण्डल के चारों ओर घूमते हैं।

वेद-पुराण में उल्लेख

मध्ययुग में कृष्ण-भक्ति-सम्प्रदायों ने पुराणों, मुख्य रूप में ‘श्रीमद्भागवत’ का आधार लेकर गोपी-कृष्ण के प्रेमाख्यान को धार्मिक सन्दर्भ में आध्यात्मिक रूप दे दिया और गोपी, गोपी-भाव तथा राधा-भाव की अत्यन्त गम्भीर और रहस्यपूर्ण व्याख्याएँ होने लगीं। निश्चय ही इन व्याख्याओं के मूलाधार पुराण ही हैं, परन्तु उनके विवरण और विस्तार कहीं-कहीं स्वतन्त्र रूप में कल्पित किये गये जान पड़ते हैं। उनका प्रयोजन प्रतीकात्मक है।

महाभारत में गोपियों के सम्बन्ध में कोई आध्यात्मिक व्याख्या नहीं मिलती।

हरिवंशपुराण में, जिसे महाभारत का ‘खिल’ कहा जाता है, कृष्णावतार का हेतु बताते हुए कहा गया है कि “वसुदेव पहले कश्यप थे और कुबेर की गाय हरण करने के अपराध में शापित होकर उन्होंने गौओं के बीच स्थित गोपरूप में जन्म लिया था। कश्यप की स्त्री अदिति और सुरभी, देवकी और रोहिणी थीं। इन्हीं के यहाँ कृष्ण ने देवताओं को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा देकर, स्वयं जन्म लेने की इच्छा की थी। सैकड़ो-सहस्रों देवता पांचाल देश के कुरुवंश और वृष्णिवंश में उत्पन्न हुए। हरिवंश में स्पष्टत: कहा नहीं गया है, परन्तु यह ध्वनित होता है कि गोप-गोपियाँ भी देव-देवियाँ ही थे।

‘हरिवंशपुराण’ में गोप-गोपियों को देवता बताया गया है, जो भगवान श्रीकृष्ण के ब्रज में जन्म लेने पर पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।

“ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिका:।

मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गता:॥”

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “उन गोपियों का मन मेरा मन हो गया है; उनके प्राण, उनका जीवनसर्वस्व मैं ही हूँ। मेरे लिये उन्होंने अपने शरीर के सारे सम्बन्धों को छोड़ दिया है। उन्होंने अपनी बुद्धि से केवल मुझको ही अपना प्यारा, प्रियतम और आत्मा मान लिया है।”

हरिवंश के बाद वैष्णव पुराणों में गोप-गोपियों का दैवी उत्पत्ति-विषयक न्यूनाधिक उल्लेख बराबर पाया जाता है।

श्रीमद्भागवत में भी गोपियों को देवताओं की स्त्रियाँ कहा गया है, जो वसुदेव के भवन में जन्म लेने वाले साक्षात भगवान विष्णु का प्रिय करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, परन्तु ‘हरिवंशपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ और ‘भागवतपुराण’ की गोपियाँ फिर भी लौकिक रूप में ही चित्रित की गयी हैं, उनके विषय में कोई रहस्य-संकेत नहीं है।

‘पद्मपुराण’ और ‘ब्रह्मवैवर्त्तपुराण’ पुराणों में गोलोक के नित्य वृन्दावन की विशद कल्पना मिलती है, जिसमें परमानन्दरूप परब्रह्म श्रीकृष्ण राधा तथा गोपियों के साथ नित्य क्रीड़ारत रहते हैं।

ब्रह्मवैतर्त में वर्णन है कि नन्द ब्रज में अवतीर्ण होने के पूर्व श्रीकृष्ण ने राधा तथा गोलोक के सब गोप और गोपियों को ब्रज में जन्म लेने की आज्ञा दी। साथ ही देवी-देवताओं ने भी ब्रज में जन्म लेने के लिए गोप-गोपी का रूप धारण किया था।

पद्मपुराण‘ के अनुसार दण्डकारण्यवासी कृष्ण-भक्त मुनियों ने भी सौन्दर्य-माधुर्य का आस्वादन करने के हेतु गोपियों का जन्म पाया था। यहीं एक दूसरे स्थल पर तांत्रिक प्रभाव के कारण वंशीरव को अनाहत नाद, कालिन्दी को सुषुम्णा तथा गोपियों को योगिनी कहा है। एक तीसरे स्थल पर इन्हें ‘श्रुतिरूपिणी’ भी कहा गया है।

दशश्लोकी‘ में उल्लेख- इस प्रकार राधा तथा अन्य गोपियाँ कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं। निम्बार्करचित ‘दशश्लोकी’ में कहा गया है-

“अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूप सौभगाम्।

सखीसहस्रै: परिसेवितां सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्॥”

अर्थात “अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।”

गोपी सम्बन्धी सबसे अधिक विस्तार गौडीय वैष्णव (चैतन्य) सम्प्रदाय और पुष्टिमार्ग (वल्लभ-सम्प्रदाय) में मिलते हैं… गौडीय वैष्णव मत के अनुसार गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं। वे अप्रकट तथा प्रकट दोनों लीलाओं में उनके नित्य परिकर के यप में निरन्तर उनके साथ रहती हैं। श्रीकृष्ण की तरह गोप-गोपियों की प्रकट और अप्रकट, दोनों शरीर होते हैं। वृन्दावन की प्रकट लीला में गोपियाँ भगवान की स्वरूप-शक्ति-प्रादुर्भाव-रूपा हैं। भगवान की आह्लादिनी गुह्यविद्या के रहस्य का प्रवर्तन उन्हीं के द्वारा होता है। वे नित्यसिद्ध हैं। रूपगोस्वामी प्रभृति चैतन्य-मत के विवेचकों ने गोपियों का वर्गीकरण करके कृष्ण की ब्रज वृन्दावन की प्रेमलीला में उनके विभिन्न स्थानों का निर्देश किया है।

कृष्णवल्लभा‘ का उल्लेख- ‘उज्ज्वल नीलमणि’ के ‘कृष्णवल्लभा’ अध्याय के अनुसार कृष्णवल्लभाओं को पहले ‘स्वकीया’ और ‘परकीया’, इन दो भागों में बाँटा गया है।

  1. स्वकीया – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ स्वकीया हैं।
  2. परकीया – श्रीकृष्ण की प्रेयसी गोपियाँ परकीया हैं।

परन्तु गोपियों का परकीयत्व लौकिक दृष्टिमात्र से है। वास्तव में तो वे सभी स्वकीया हैं, क्योंकि उन्होंने प्राण, मन और शरीर सभी कुछ कृष्णार्पण कर रखा है। फिर भी प्रकट लीला में इन गोपियों का परकीयात्व ही स्वीकार किया गया है। परकीया गोपियाँ-कन्या और परोढा दो प्रकार की हैं। कन्या अविवाहित कुमारियाँ हैं, जो कृष्ण को ही अपना पति मानती हैं। प्रेम-भक्ति में श्रेष्ठता परोढाओं की ही है।

ऐसा भी कहा जाता है की श्रीकृष्ण ने दिया था गोपी बनने का वरदान- कोशल देश की ओर लौटते हुए दूल्हा श्रीराम को देखकर न जाने कितनी पुररमणियां विमोहित हुईं और अशेषदर्शी कोशलेन्द्र-नन्दन ने उन्हें भी एक मूक स्वीकृति दी थी- “ब्रजे गोप्यो भविष्यथ।” प्रभु ने यही वरदान दिया- “देवियो ! शोक मत करो,

 मा शोकं कुरुत स्त्रियःद्वापर के अन्त में तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा-

“द्वापरान्ते करिष्यामि भवतीनां मनोरथम्।”

पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के द्वारा तुम सब ब्रज में गोपी बनोगी-

“श्रद्धया परया भक्त्या व्रजे गोप्यो भविष्यथ।”

परोढा गोपियाँ- परोढा गोपियाँ पुन: तीन प्रकार की हैं-

  1. नित्यप्रिया
  2. साधन-परा
  3. देवी

नित्यप्रिया- जो गोपियाँ नित्यकाल के लिए नित्य वृन्दावन में श्रीकृष्ण के लीला-परिकर की अंग हैं, वे नित्यप्रिया हैं। ये वस्तुत: वे भक्त जीव हैं, जिन्होंने प्रेम-भक्ति के द्वारा भगवत्-स्वरूप में प्रवेश पा लिया है और जो नित्यसिद्ध गोपी-देह से उनकी लीला के अभिन्न अंग बन गये हैं। नित्यप्रिया गोपियों को प्राचीना भी कहा गया है, क्योंकि ये वे जीव हैं, जो बहुत लम्बी साधना के फलस्वरूप गोपी-देह पाते हैं। इनका गोपी-भाव भक्तों का साध्य नहीं है। नित्यप्रिया गोपियों में आठ प्रधान गोपियाँ यूथेश्वरी होती है। प्रत्येक यूथ में यूथेश्वरी गोपी के भावकी असंख्य गोपियाँ होती हैं। राधा और चन्द्रावली सर्वप्रधान यूथेश्वरी गोपियाँ हैं। इनमें भी राधा सर्वश्रेष्ठ-महाभाव-स्वरूपा हैं। उनका साध्य साधना-परा गोपियों का रूप है।

साधन-परा- ये साधना-परा गोपियाँ, ‘यौथिकी’ और ‘अयौथिकी’ दो प्रकार की हैं।

यौथिकी – ये अपने गण के साथ प्रेम-साधना में संलग्न रहती हैं। यौथिकी पुन: दो प्रकार की होती हैं- मुनि और उपनिषद। पौराणिक प्रमाणों के अनुसार अनेक मुनिगण जो कृष्ण के माधुर्यरूप का आव्वाद लेने के लिए गोपी-भावकी आकांक्षा करते हैं, गोपियों का जनम पाकर कृष्ण की ब्रजलीला में सम्मिलित होने का सौभाग्य लाभ करते हैं। ये ही मुनि-यूथकी गोपियाँ हैं। उपनिषद-यूथ की गोपियाँ पूर्वजन्म के उपनिषदगण हैं, जिन्होंने तपस्या करके ब्रज में गोपी रूप पाया है।

अयौथिकी – गोपियों का ये रूप उन कृपा प्राप्त जीवों को मिलता है, जो गोपी-भाव से भगवान कृष्ण के प्रेम में रत रहते हैं और अनेक योनियों में जन्म लेने के बाद गोपीरूप पाते हैं। ये अयौथिकी गोपियाँ नवीना भी कहलाती हैं और इन्हें भक्ति के फलस्वरूप प्राचीना नित्यप्रिया गोपियों के साथ सालोक्य प्राप्ति होती है।

देवी- देवी उन गोपियों का नाम है, जो नित्यप्रियाओं के अशं से श्रीकृष्ण के सन्तोष के लिए उस समय देवी के रूप में जन्म लेती हैं, जब स्वयं श्रीकृष्ण देवयोनि में अंशावतार धारण करते हैं। उपर्युक्त कन्या गोपियाँ ये ही देवियाँ हैं जो नित्यप्रियाओं की परम प्रिय सखियों का पद पाती हैं।

कृष्ण का ‘महारास’ और गोपियां- महारास भगवान श्रीकृष्ण से सम्बंधित है। चैत्र मास की पूर्णिमा को ‘चैते पूनम’ भी कहा जाता है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में उत्सव रचाया था, जिसे ‘महारास’ के नाम से जाना जाता है। यह महारास कार्तिक की पूर्णिमा को शुरू होकर चैत्र की पूर्णिमा को समाप्त हुआ था। वृन्दावन में स्थित निधिवन को वह स्थान माना जाता है, जहाँ श्रीकृष्ण ने एक साथ कई गोपियों संग रास रचाकर ‘महारास’ किया।

श्रीमद्भागवत के दसवें भाग के 29 वें अध्याय के प्रथम श्लोक में लिखा है: ‘ भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमिलका! ‘जो यह संकेत करता है कि भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है।

जैसे कृष्ण ने गोपियों से कहा- ‘ कहो , कैसे आना हुआ इस घोर रात्रि में ? अपने पति , पुत्र , सगे-सम्बन्धी , गुरु और प्रियजनों की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। तुम लौट जाओ अपने घर! ‘ गोपियां स्वर्ग-मोक्ष-काम आदि से रहित हैं। उन्होंने उत्तर दिया: ‘ पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद , याम: कथं ब्रजमधो करवाम किं वा।। ‘ ( श्रीमद्भागवत्- 10.29.34) अर्थात ‘( हे गोविन्द!) हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे ? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना वहां हम क्या करें ? तब कृष्ण ने अपने अंतिम प्रश्न में गोपियों को उनके संतान मोह की ओर इशारा करते हुए कहा: ‘ तो क्या तुम्हें अपने पुत्रों का भी मोह नहीं है ?’ गोपियों का उत्तर था- ‘ हे मोहन! आप में ही हमारा मोह सर्वोपरि है , क्योंकि पुत्रादि में भी आप ही स्थित हैं। ऐसी कौन सी वस्तु है , जो आपसे अलग है ? कृष्ण उनके प्रेम में रम गए और उनके साथ नृत्य करने लगे। नृत्य करते हुए कृष्ण ने महसूस किया कि गोपियों को उनके साथ नृत्य करने , उन्हें पा लेने का अभिमान होने लगा है। लेकिन कृष्ण और राधा के इस रास में जैसे दैहिक वासना की कोई जगह नहीं है , उसी तरह किसी अभिमान के लिए भी जगह नहीं है। गोपियों में व्याप्त अभिमान के इस भाव को दूर करने के लिए वे एकाएक उनके बीच से अर्न्तध्यान हो गए। ऐसे में गोपियां अपने प्रियतम को न देखकर स्वयं को भूल जाती हैं और कृष्णमयी होकर उन्हीं की पूर्व लीलाओं का अनुकरण करने में लीन हो जाती हैं। वे श्रीकृष्ण की चाल-ढाल , हास-विलास और चितवन आदि में उनके समान ही बनकर सुख पाती हैं। यह देख कर कृष्ण द्रवित हो जाते हैं और पुन: उनके बीच प्रकट हो कर कहते हैं , मैं तुम्हारे त्याग और प्रीति का ऋणी हूं और अनन्त जन्मों तक ऋणी बना रहूंगा। वे अपने हाथ आगे पसारते हुए कहते हैं- ‘ आओ , महारास करें! ‘ कृष्ण प्रत्येक दो गोपियों के बीच में प्रकट होकर सोलह हजार गोपियों के साथ नृत्य करने में लीन हो गए। सभी गोपियों के हाथ उनके हाथ में थे। यह महारास देखते-देखते ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता) सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं , फिर भी देह का भान भूलकर इस प्रकार क्रीड़ा करने से क्या व्यवस्था , शास्त्र और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा ? वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास , विलास नहीं , धर्म का फल है , यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे।

गोपी’ शब्द का अर्थ- गोपी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ है पान करना। ‘गोभि: इन्द्रियै: भक्तिरसं पिबति इति गोपी।’ जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है।

गोपी का एक अन्य अर्थ है केवल श्रीकृष्ण की सुखेच्छा… जिसका जीवन इस प्रकार का है, वही गोपी है। गोपियों की प्रत्येक इन्द्रियां श्रीकृष्ण को अर्पित हैं। गोपियों के मन, प्राण–सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए हैं। उनका जीवन केवल श्रीकृष्ण-सुख के लिए है। सम्पूर्ण कामनाओं से रहित उन गोपियों को श्रीकृष्ण को सुखी देखकर अपार सुख होता है। उनके मन में अपने सुख के लिए कल्पना भी नहीं होती। श्रीकृष्ण को सुखी देखकर ही वे दिन-रात सुख-समुद्र में डूबी रहती हैं।

  • गोपी श्रीकृष्ण से अपने लिए प्रेम नहीं करती अपितु श्रीकृष्ण की सेवा के लिए, उनके सुख के लिए श्रीकृष्ण से प्रेम करती है।
  • गोपी की बुद्धि, उसका मन, चित्त, अहंकार और उसकी सारी इन्द्रियां प्रियतम श्यामसुन्दर के सुख के साधन हैं। उनका जागना-सोना, खाना-पीना, चलना-फिरना, श्रृंगार करना, गीत गाना, बातचीत करना–सब श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाने के लिए है।
  • गोपियों का श्रृंगार करना भी भक्ति है। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने के विचार से श्रृंगार किया जाए तो वह भी भक्ति है।
  • मीराबाई सुन्दर श्रृंगार करके गोपालजी के सम्मुख कीर्तन करती थीं। उनका भाव था–’गोपालजी की नजर मुझ पर पड़ने वाली है। इसलिए मैं श्रृंगार करती हूँ।’
  • भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा है–‘हे अर्जुन ! गोपियां अपने शरीर की रक्षा उसे मेरी वस्तु मानकर करती हैं। गोपियों को छोड़कर मेरा निगूढ़ प्रेमपात्र और कोई नहीं है।’
  • यही कारण है कि श्रीकृष्ण जोकि स्वयं आनन्दस्वरूप हैं, आनन्द के अगाध समुद्र हैं, वे भी गोपीप्रेम का अमृत पीकर आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रेम का ही अद्वैत स्वरूप है कृष्ण का ‘महारास’

raas-leela-qi90_l

सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ है। यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रीड़ा है , जो शृंगार और रस से पूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत के प्रेम व वासना से मुक्त है। इस रासलीला में वे अपने अंतरंग विशुद्ध भक्तों (जो उनकी निज रसरूपा राधा की सोलह हजार कायरूपा गोपियां हैं) के साथ शरत् की रात्रियों में विलास करते हैं। कृष्ण की इस रासलीला में दो धाराएं हैं , जो दोनों ओर से आती हैं और एकाकार हो जाती हैं। हर क्षण नया मिलन , नया रूप , नया रस और नई तृप्ति- यही प्रेम-रस का अद्वैत स्वरूप है और इसी का नाम रास है। श्रीमद्भागवत के दसवें भाग के 29 वें अध्याय के प्रथम श्लोक में लिखा है: ‘ भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमिलका! ‘ जो यह संकेत करता है कि भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में , इस मधुर रस लीला में शुद्ध जीव का ब्रह्म से विलासपूर्ण मिलन है , जिसमें लौकिक प्रेम व काम अंशमात्र भी नहीं है। शुद्ध जीव का अर्थ है- माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। इसीलिए गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व ‘ चीरहरण ‘ की लीला की थी। जीवात्मा का परमात्मा के सामने कोई पर्दा नहीं रह सकता। पर्दा माया में ही है। पर्दा होने से वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। चीर-हरण से गोपियों का उक्त मोह भंग हुआ। जीव का ब्रह्म से मिलन सहज नहीं होता। वह जब परमात्मा के निकट पहुंचता है , तब वे उससे पूछते हैं- मेरे पास क्यों आया है ? जैसे कृष्ण ने गोपियों से कहा- ‘ कहो , कैसे आना हुआ इस घोर रात्रि में ? अपने पति , पुत्र , सगे-सम्बन्धी , गुरु और प्रियजनों की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। तुम लौट जाओ अपने घर! ‘ गोपियां स्वर्ग-मोक्ष-काम आदि से रहित हैं। उन्होंने उत्तर दिया: ‘ पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद , याम: कथं ब्रजमधो करवाम किं वा।। ‘ ( श्रीमद्भागवत्- 10.29.34) अर्थात ‘( हे गोविन्द!) हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे ? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना वहां हम क्या करें ? तब कृष्ण ने अपने अंतिम प्रश्न में गोपियों को उनके संतान मोह की ओर इशारा करते हुए कहा: ‘ तो क्या तुम्हें अपने पुत्रों का भी मोह नहीं है ?’ गोपियों का उत्तर था- ‘ हे मोहन! आप में ही हमारा मोह सर्वोपरि है , क्योंकि पुत्रादि में भी आप ही स्थित हैं। ऐसी कौन सी वस्तु है , जो आपसे अलग है ? कृष्ण उनके प्रेम में रम गए और उनके साथ नृत्य करने लगे। नृत्य करते हुए कृष्ण ने महसूस किया कि गोपियों को उनके साथ नृत्य करने , उन्हें पा लेने का अभिमान होने लगा है। लेकिन कृष्ण और राधा के इस रास में जैसे दैहिक वासना की कोई जगह नहीं है , उसी तरह किसी अभिमान के लिए भी जगह नहीं है। गोपियों में व्याप्त अभिमान के इस भाव को दूर करने के लिए वे एकाएक उनके बीच से अर्न्तध्यान हो गए। ऐसे में गोपियां अपने प्रियतम को न देखकर स्वयं को भूल जाती हैं और कृष्णमयी होकर उन्हीं की पूर्व लीलाओं का अनुकरण करने में लीन हो जाती हैं। वे श्रीकृष्ण की चाल-ढाल , हास-विलास और चितवन आदि में उनके समान ही बनकर सुख पाती हैं। यह देख कर कृष्ण द्रवित हो जाते हैं और पुन: उनके बीच प्रकट हो कर कहते हैं , मैं तुम्हारे त्याग और प्रीति का ऋणी हूं और अनन्त जन्मों तक ऋणी बना रहूंगा। वे अपने हाथ आगे पसारते हुए कहते हैं- ‘ आओ , महारास करें! ‘ कृष्ण प्रत्येक दो गोपियों के बीच में प्रकट होकर सोलह हजार गोपियों के साथ नृत्य करने में लीन हो गए। सभी गोपियों के हाथ उनके हाथ में थे। यह महारास देखते-देखते ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता) सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं , फिर भी देह का भान भूलकर इस प्रकार क्रीड़ा करने से क्या व्यवस्था , शास्त्र और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा ? वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास , विलास नहीं , धर्म का फल है , यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे। गोपियां हैं कहां ? महारास प्रेम का अद्वैत स्वरूप है, जिसमें भगवत् स्वरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व नहीं रहता है।

गोपी विरह

निसदिन बरसत नैन हमारे ।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर जब ते स्याम सिधारे ॥१॥

अंजन थिर न रहत अँखियन में कर कपोल भये कारे ।
कन्चुकिपट सूखत नहिं कबहुँ उरबिच बहत पनारे ॥२॥

आँसू सलिल भए पग थाके बहे जात सित तारे ।
सूरदास अब डूबत है ब्रज काहे न लेत उबारे ॥३॥

सूरदास के पदों में गोपियों का विरह भाव स्वष्ट झलकता है। इस प्रसिद्ध पद में कृष्ण के वियोग में गोपियों की क्या दशा हुई, उसी का वर्णन सूरदास ने किया है। कृष्ण को संबोधन देते हुए गोपियां कहती हैं कि हे कन्हाई! जब से तुम ब्रज को छोडकर मथुरा गए हो, तभी से हमारे नयन नित्य ही वर्षा के जल की भांति बरस रहे हैं अर्थात् तुम्हारे वियोग में हम दिन-रात रोती रहती हैं।

रोते रहने के कारण इन नेत्रों में काजल भी नहीं रह पाता अर्थात् वह भी आंसुओं के साथ बहकर हमारे कपोलों (गालों) को भी श्यामवर्णी कर देता है। हे श्याम! हमारी कंचुकि (चोली या अंगिया) आंसुओं से इतनी अधिक भीग जाती है कि सूखने का कभी नाम ही नहीं लेती। फलत: वक्ष के मध्य से परनाला-सा बहता रहता है।

इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है। सूरदास के शब्दों में गोपियां कृष्ण से कहती हैं कि हे श्याम! तुम यह तो बताओ कि तुमने गोकुल को क्यों भुला दिया है।

फिर कृष्ण की लीला गोपियों को याद आने लगी हैं।

बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं।
तब ये लता लगति अति सीतल¸ अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं।

गोपाल के बिना हमें ये ब्रज की कुंजे अपनी बेरि लगती हैं। जो लता शीतलता प्रदान करती हैं उनमे से अब आग की लपटे निकल रही हैं।

उद्धव हम तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म का उपदेश लेकर क्या करें! हमें तो वो शरद की पूर्णिमा की रात्रि याद आती है जब हमने भगवान के उस रसमय रूप का दर्शन किया था। और भगवान ने हमारे साथ रास रचाया था। वह पल हमे एक क्षण के लिए भी नही भूलता और ना ही हम उसे भूलना चाहती हैं।

तुम कहते हो की तुम कृष्ण के मित्र हो। यदि मित्र होते तो हमारी विरह दशा को समझ पाते। कैसे मित्र हो तुम कृष्ण के? तुम्हे हमारी दशा समझ नही आती।

उद्धव कहते हैं – गोपियों तुम समाधि लगाकर भगवान का ध्यान करो। उस निर्गुण और निराकार ब्रह्म का ध्यान करो। भगवान ने ये सन्देश दिया है।

फिर एक गोपी कहती हैं- उद्धव तुम यहाँ से चले जाओ। तुम गलती से ब्रज में आ गए हो। तुम योग की बात कर रहे हो तुम्हे जरा भी लज्जा नही आती। तुम इतने चतुर हो गए हो की उचित-अनुचित का तुम्हे ज्ञान ही नही। अपने निर्गुण ब्रह्म का राग अलापना बंद करो। अरे जो है ही नही वही निर्गुण है। जिसमे कोई गुण नहीं है जिसमे कोई रस नहीं है। वो क्या ख़ाक दिखेगा।

एक गोपी कहती है – जैसे कुत्ते की पूंछ को करोडो भांति सीधा करने का प्रयास करो, लेकिन उसे कोई भी सीधा नही कर सकता। जैसे कौवा कितना भी प्रयत्न करे वो अभक्ष्य चीजे खाना नही छोड़ता। जैसे काले कम्बल को कितना भी धो लो लेकिन उसका रंग तो काला ही रहेगा ना।  ऐसे ही उस काले(कृष्ण) का रंग हम पर चढ़ गया है तुम लाख कोशिश करलो वो रंग अब उतरने वाला नही है।

एक गोपी कहती है- उद्धव! एक बात कहें! आज हम धन्य हो गई हैं क्योंकि एक तो तुम्हे हमारे प्यारे कृष्ण ने हमारे लिए भेजा है। और दूसरा अपनी आँखों से तुम्हे हमारे प्यारे कृष्ण को देखा है। जिन नेत्रों से तुमने कृष्ण को देखा है उन नेत्रों से तुम मुझे झांक रही हो।

उद्धव कहते हैं- हे गोपियों! तुम जान बूझकर बावली मत बनो। तत्व(निर्गुण ब्रह्म) के भजन से तुम भी इसी प्रकार तत्वमय(निर्गुण ब्रह्म में रमण करने वाली) हो जाओगी। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। तुम सब सांसारिक मोह बंधन छोड़ दो।

एक गोपी उद्धव का उपहास उड़ाकर कहती है- हे उद्धव! तुम्हारी तो अच्छी-खासी सद्बुद्धि थी, किन्तु निर्गुण ब्रह्म के चक्कर में पड़कर तुमने उसे भी खो दिया है। तुम्हारे इस उपदेश के कारण तुम्हारी ब्रज में हंसी हो रही है। तुम इसे अपने अंदर ही छिपाकर रखो, किसी को मत दिखाओ। तुम्हारी उल्टी-सीधी बातें कौन सुनता रहेगा।

यदि तुम ग्वालिनो को योग सीखने का काम करोगे तो लोग तुम्हे मूर्ख ही कहेंगे। तुम्हे एक बात बताएं उद्धव-

अँखियाँ हरि दर्शन की भूखी। अँखियाँ हरि दर्शन की प्यासी।

हमारी आँखे तो केवल श्रीहरि के दर्शनों के लिए ही अत्यधिक भूखी हैं, हमारी आँखें तो केवल हरि दर्शन की प्यासी हैं।

जबसे श्यामसुंदर ब्रज से गए हैं ना उद्धव तभी से हमारा मन उनमे अटक गया है। हमने बहुत निकलने की कोशिश की लेकिन मन वहां से हट ही नही रहा है। उद्धव वैसे तो हमारे सारे अंग दुखी हैं लेकिन विशेष रूप से हमारी आँखें रात-दिन उनके जाने के कष्ट से दुखती रहती हैं। एक क्षण के लिए भी चैन से नही बैठती। बस उनके आने के मार्ग देखती रहती हैं। एक क्षण के लिए भी पालक नही झपकती की ना जाने कब श्यामसुंदर आ जाये और हम उनके दर्शन से वंचित रह जाएँ।

फिर एक सखी कहते है – देखो, आओ सखियों! मथुरा से पांडे जी योग सीखने आये हैं। जो पांडे खा पीकर मस्त रहते है वो आज योग की चिट्ठी लेकर आये हैं।

उद्धव जी कहते हैं- हे गोपियों !(आत्म व निर्गुण) ज्ञान के बिना कहीं भी, कुछ भी सुख नहीं है। तुम लोग निर्गुण को छोड़कर सगुण के पीछे क्यों दौड़ती हो? अच्छा चलो , ये बताओ वो सगुण ब्रह्म किसके पास, और फिर तुम्हे उससे क्या मिल गया?(केवल विरह ही तो मिला जिसे तुम दिन रात भोग रही हो)

गोपियाँ कहती हैं- उद्धव तुमने बहुत बोल लिया। अब एक शब्द ना बोलना। कृष्ण की आराधना छोड़कर निर्गुण की बात कहने से हमारे प्राणों पर आघात होता हैं, फिर चाहे तुम्हारे लिए ये हंसी की बात हो। हमें हर पल मोहन का ध्यान रहता हैं। उनके दर्शनों के बिना तो जिन ही बेकार हैं। हमें तो रात-दिन श्याम का ही स्मरण रहता हैं, तुम्हारे योग की अग्नि में यहाँ कौन जलेगा।

अरे उद्धव! तुम हरि को अंतर्यामी बताते हो, पर वे काहे के अंतर्यामी हैं, अगर अंतर्यामी होते तो कये वे यह न जानते की उनके बिना हम गोपियाँ किस प्रकार विरह में व्याकुल होकर एक-एक पल काट रही हैं? इतने दुखी होने पर भी वो एक बार हमसे मिलने नही आये।

तुम निर्गुण ब्रह्म की बात कर रहे हो, यह बताओ वह निर्गुण ब्रह्म रहता कहाँ हैं? वो किस देश का वासी हैं। उसकी माँ कौन हैं? पिता कौन हैं? वह किस नारी का दास हैं। उसका रंग कैसा हैं? उसका वेश कैसा हैं? वह कैसा श्रृंगार करता हैं और उसकी रूचि किस चीज में हैं?

गोपियाँ कहती हैं-उद्धव! अब तुम्हारे पास हमारी इन बातों का कोई जवाब नही हैं। हमें तो लगता हैं एक ओर वो कृष्ण हैं जिसके दास ब्रह्मा हैं। दूसरी ओर वो कुब्जा हैं जो कंस की दासी हैं। वो कुब्जा से प्रेम करके मथुरा में रह रहे हैं। अब तो कृष्ण मथुरावासी हो गए हैं ना! अरे उस कन्हैया ने क्या सोचकर कुब्जा से प्रेम कर लिया। उन्हें हमारी जरा भी याद नही आई। उद्धव तुम एक बात कान खोलकर सुन लो।

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे। मूरि के पातिन के बदलैकौ मुक्ताहल देहै।।

तुम्हारा यह योग रूपी ठगी का सौदा ब्रज में नही बिकेगा। तुम्हे मूली के पत्तों के बदले कौन मोतियों का हार देगा।

यह ब्यौपार तुम्हारो उधौऐसे ही धरयौ रेहै। जिन पें तैं लै आए उधौतिनहीं के पेट समैंहै।।

उद्धव तुम्हारा यह व्यापार ऐसे ही धरा का धरा रह जायेगा। ये तो उन्ही के पेट में समां सकता हैं जहाँ से तुम इसे लाये हो।

दाख छाण्डि के कटुक निम्बौरीकौ अपने मुख देहै। गुन किर मोहि सूर साँवरेकौ निरगुन निरवेहै॥

ऐसा कौन मूर्ख होगा जो मीठी किश्मिश(दाख) को छोड़कर कड़वी नीम की निम्बोली को अपने मुह में लेगा। हमने कृष्ण से प्रेम किया हैं उद्धव! उनके गुणों पर मोहित होकर प्रेम किया हैं, अब तुम्हारे इस निर्गुण ब्रह्म का निर्वाह कौन करेगा।

हे उद्धव! जबसे यहाँ से गोपाल गए हैं ना तबसे यह पूरा व्रज विरह की अग्नि में जल रहा हैं। बस हम उन्ही को याद करती हैं।

उदव जी बोले – गोपियों! हरि का सन्देश सुनो! हम तुम पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बने हैं। मैं जिस ब्रह्म की बात कर रहा हूँ ना, उसकी ना कोई माँ हैं, ना कोई पिता हैं। ना स्त्री हैं। ना उसका कोई नाम हैं और ना कोई रूप ठिकाना हैं।

गोपियाँ कहती हैं- उद्धव ऐसी बात मत कहो। सुनो हमारे भगवान कैसे हैं। तुम्हारे नही दीखते होंगे ठीक हैं लेकिन हमारे भगवान को देखो। हमारे भगवान सुबह उठकर माखन चुराने के लिए गोपियों के घर चले जाते है। फिर वो गौए चराने जाते हैं। और जब श्याम को वो लौटते हैं ना तो उनकी शोभा देखकर हम अपना तन मन भूल जाती हैं ।

तू योग की बात करता हैं ना तेरा योग और निर्गुण ब्रह्म की बात हमें ऐसे कष्ट दे रही हैं जैसे जले पे नमक।

योगी जिस ब्रह्म तक कभी पहुंचा नही होगा उसी भगवान को माँ माखन के चुराने पर ऊखल से बाँध देती है।

उद्धव काश हमारे पास दस-बीस मन होते। एक मन हम तुम्हारे उस निर्गुण ब्रह्म को भी दे देती।

उधौ मन ना भए दस बीस।
एक हुतौ सौ गयौ स्याम संगको आराधे ईस।।

इंद्री सिथिल भई केसव बिनुज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहित तन स्वासाजीवहिं कोटि बरीस।

तुम तौ सखा स्याम सुंदर केसकल जोग के ईस।
सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस॥॥

अब थक हार कर गोपियाँ व्यंग्य करना बंद कर उद्धव को अपने तन मन की दशा कहती हैं। उद्धव हतप्रभ हैं, भक्ति के इस अदभुत स्वरूप से। हे उद्धव हमारे मन दस बीस तो हैं नहीं, एक था वह भी श्याम के साथ चला गया। अब किस मन से ईश्वर की अराधना करें? उनके बिना हमारी इन्द्रियां शिथिल हैं, शरीर मानो बिना सिर का हो गया है, बस उनके दरशन की क्षीण सी आशा हमें करोड़ों वषर् जीवित रखेगी। तुम तो कान्ह के सखा हो, योग के पूणर् ज्ञाता हो। तुम कृष्ण के बिना भी योग के सहारे अपना उद्धार कर लोगे। हमारा तो नंद कुमार कृष्ण के सिवा कोई ईश्वर नहीं है।

गोपियाँ कहती हैं उद्धव! हम तुम्हारी बात केवल एक शर्त पर मान सकती हैं- यदि तुम अपने निर्गुण ब्रह्म को मोर मुकुट और पीताम्बर धारण किये हुए दिखा दो तो।

उद्धव सच मानना हम तुम्हारी योग के योग्य नही हैं। हम कभी पढ़ने लिखने स्कूल नही गई तो हम ये सब बातें क्या जाने। पर उद्धव जब हम आँख बंद करती हैं तो हमें अपने भगवान की मूरत सामने दिखाई पड़ती है। तुम्हे नही दीखता होगा लेकिन हमें तो दीखता है।

उद्धव-गोपी संवाद

संदीपनी ऋषि के आश्रम से आने के बाद भगवान के मित्र बने हैं उद्धव जी। ये बड़े ज्ञानी हैं।

वृष्णीनां प्रवरो मंत्री कृष्णस्य दयितः सखा ।

शिष्यो बृहस्पतेः साक्षाद् उद्धवो बुद्धिसत्तमः ॥

उद्धवजी वृष्णिवंशियों में एक प्रधान पुरुष थे। वे साक्षात् ब्रहस्पतिजी के शिष्य और परम बुद्धिमान थे। उनकी महिमा के सम्बन्ध में इससे पढ़कर और कौन-सी बात कही जा सकती है कि वे भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा तथा मन्त्री भी थे।

उद्धव चरित्र श्रीमद भागवत का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। प्रेम का दर्शन करवाता है उद्धव चरित्र। सूरदास जी महाराज ने भी उद्धव चरित्र का बहुत वर्णन किया है। आप दर्शन कीजिये।

भगवान ने सोचा की ये उद्धव परम ज्ञानी है लेकिन अगर इस पर भक्ति रूपी रंग चढ़ जाये तो ज्ञान रूपी चादर बहुत अच्छी सुशोभित होगी। भगवान सोचते हैं की तो क्या मैं इस उद्धव को भक्ति का उपदेश दूँ?

फिर भगवान सोचते हैं की नहीं-नहीं, भक्ति उपदेश देने से नहीं बल्कि भक्ति का क्रियात्मक(practical) रूप होना चाहिए। क्योंकि ज्ञान पुरुषार्थ(मेहनत) का फल है और भक्ति कृपासाध्य है। बिना भगवान की कृपा के भक्ति नहीं मिलती है।

भगवान ने सोचा की अगर कहीं भक्ति का दर्शन हो सकता है तो वह स्थान है वृन्दावन। मैं इस उद्धव को वृन्दावन भेजूंगा।

भगवान प्रतिदिन सुबह उठकर यमुना का स्नान करने के लिए जाते थे।  आज भगवान जब यमुना का स्नान करने के लिए गए तो यमुना जी, वृन्दावन से मथुरा बहती हुई आ रही है। भगवान ने यमुना में स्नान कर रहे थे तो एक कमल का फूल बहता हुआ आ रहा है । ये राधा रानी की प्रशादी थी। राधा रानी प्रतिदिन यमुना में भगवान के लिए फूल बहाती थी और फूल बहाते समय राधा जी के मन में ये बात आती थी की मेरे गोविन्द यमुना का स्नान करने के लिए आते होंगे और इस फूल को वो देखने तो उन्हें मेरी याद अवश्य आएगी।

आज भगवान ने उस फूल को सुंघा और यमुना में मूर्छित होने लगे। पास में खड़े थे उद्धव जी।  उद्धव जी ने जब ये देखा तो तुरंत दौड़कर गए और अपने हाथ का सहारा दिया भगवान को।  भगवान को महलों में लेकर आये हैं। भगवान जी की आँखों में आज आंसू हैं।  क्योंकि उद्धव जी ने भगवान को कभी रोते हुए नहीं देखा था।

उद्धव जी ने पूछा कृष्ण, आप भी किसी को याद करते हुए रोते हो क्या? भगवान उद्धव से कहते हैं-

उद्धव मोहे ब्रज बिसरत नाही। मैं अपने ब्रज को भूल नही पा रहा हूँ।

मैं एक क्षण के लिए भी ब्रज को भूल नहीं पा रहा हूँ। मैं अपनी माँ और पिता से कहकर आया था की मैं शीघ्र ही ब्रज आऊंगा।  लेकिन मैं जा नहीं सका।  मेरी गौएँ, मेरी गोपियाँ और मेरे ग्वाल बाल कितना स्मरण करते हैं।  ऐसा कहते हुए भगवान के आंसू गिर रहे हैं।  उद्धव ने भगवान ने आंसू पोंछे और कहा – ” मैं जानता हूँ आप बहुत राज-काज में फंसे हैं और आपके ऊपर बहुत राज भर है। आपका कोई सन्देश हो तो आप मुझे दीजिये। भगवान कहते हैं उद्धव, तू आज ही ब्रज जा।  और मेरे माता पिता से मेरा सन्देश देना-

उधो मैया ते जा कहियोउधो मेरी मैया ते सुनइयो,

तेरो श्याम दुःख पावे उधो मैया ते जा कहियो ।।

उद्धव तू मेरी माँ से कहना की तेरा कृष्ण बहुत दुखी है तेरे बिना।

कोई ना ख्वावे मोहे माखन रोटी,
जल अचरान करावे।

माखन मिश्री नाम ना जानू,
कनुवा कही मोहे कोई ना पुकारे॥

उद्धव मेरी माँ से कहना की मुझे यहाँ खाने के लिए सब चीज मिल जाती है पर माखन रोटी कोई नही देता। और माँ जैसे तू मुझे कनुवा कहकर बुलाती थी ऐसे मुझे कोई नही बुलाता। कोई कृष्ण कहता है, कोई गोविन्द कहता है। पर मेरे कान तो कनुवा सुनने के लिए तरस रहे हैं माँ।

बाबा नन्द अंगुरिया गहि गहि,
पायन चलिबो सिखायो।

थको जान कन्हिया मेरो,
गोद उठावो और हिये सो लगावे॥

उद्धव जब मैं ब्रज में था तो मेरी माँ, मेरे नन्द बाबा मेरी ऊँगली पकड़कर चलना सीखते थे और जब में चलते-चलते थक जाता था, तो मेरे पिता मुझे उठाकर छाती से लगा लेते थे।

आवे गोपिन देन उल्हानो नेक ना चित पे लावे,

और नहातउ बाल खसे जो मेरो बार बार कुल देवी मनावे।

मैं उन गोपियों के यहाँ माखन चोरी करने जाता तो गोपियाँ मेरी माँ से शिकायत करने आती थी। और कहती थी की ब्रजरानी यशोदा तेरा लाला चोर है। ये माखन चुरावे है और माखन का माखन खावे है और हमारी मटकी भी फोड़ देती देता है। लेकिन मेरी माँ उन पर यकीं नही करती थी।

स्नान करते वक्त मेरे सिर से एक बाल भी टूट जाता था तो मेरी माँ कहती थी हे देवी माँ! मेरे बालक की रक्षा करना। क्योंकि मेरे लाला का आज एक बाल टूट गया है।

उधो मेरी मैया ते जा कहियोतेरो स्याम दुःख पावे।

गहर जन लाव उधोआज ही जावो ब्रज,
आवत है याद गोप और गईया की।

उठती उर पीरमन आवे नही धीर
होस करत अधीरवासु वंसिवट छईया की।

उन्हें समझाइयोआवेंगे दोउ भईया।
और जईयो नन्द रईया,

मेरो ले नाम उधोकहिओ प्रणाम मेरी,
मईया के पायन में उधमी कन्हिया की॥

उद्धव मेरी माँ के चरणों में प्रणाम करके कहना की मैया, तेरे लाला ने तेरे चरणों में प्रणाम भेजी है।

और अंत में एक प्रार्थना मेरी राधा रानी से भी करना –

हे वृषभानु सुते ललिते, मम कौन कियो अपराध तिहारो,
काढ दियो ब्रज मंडल ते, अब औरहु दंड दियो अति भारो।

सो कर ल्यो अपनों कर ल्यो, निकुंज कुटी यमुना तट प्यारो,
आप सों जान दया कि निधान, भई सो भई अब बेगी सम्हारो।

हे वृषभानु सुताश्री राधा रानी! मुझसे ऐसा क्या अपराध हो गया की आपने मुझे इस ब्रज से ही निकाल दिया। हे मेरी किशोरी जी कुछ ऐसी कृपा करो की मेरा ब्रज में फिर से आना हो जाये।

उद्धव गोपियों मुझसे निष्काम प्रेम करती हैं। मैं उन गोपियों का परम प्रियतम हूँ। मेरे यहाँ चले आने से वे मुझे दूरस्थ मानती हैं और मेरा स्मरण करके अत्यन्त मोहित हो रही हैं, बार-बार मूर्छित हो जाती हैं। वे मेरे विरह की व्यथा से विह्वल हो रही हैं,प्रतिक्षण मेरे लिये उत्कण्ठित रहती हैं ।

मेरी गोपियाँ, मेरी प्रेयसियाँ इस समय बड़े ही कष्ट और यत्न से अपने प्राणों को किसी प्रकार रख रही हैं। मैंने उनसे कहा था कि ‘मैं आऊँगा।’ वही उनके जीवन का आधार है। उद्धव! और तो क्या कहूँ, मैं ही उनकी आत्मा हूँ। वे नित्य-निरन्तर मुझमें ही तन्मय रहती हैं’ ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्! जब भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात कही, तब उद्धवजी बड़े आदर से अपने स्वामी का सन्देश लेकर रथ पर सवार हुए और नन्द गाँव के लिये चल पड़े ।

संधि काल को उद्धव जी महाराज वृन्दावन की सीमा पर पहुंचे तो ग्वाल बालों ने देखा की कृष्ण आ गए हैं। ये ग्वाल बाल प्रतिदिन गाँव की सीमा पर बैठ जाते थे और कृष्ण जी का इंतजार करते थे। जब कृष्ण जी नही आते थे तो ये शाम को नन्द बाबा के घर जाकर मैया-यशोदा और नन्द बाबा से कहते थे- बाबा! मैया! कोई बात नहीं आज कृष्ण नही आये तो। तू रोना मत, तू चिंता मत करना। क्योंकि आज कृष्ण नही आये हैं तो कोई बात नहीं कल आ जायेंगे।इस तरह से ये माता पिता को सांत्वना देते थे।

उद्धव जी ने रथ में बैठे हुए ग्वाल बालों से पूछा की- भैया! नन्द भवन कहाँ हैं? सभी ग्वाल बाल कहते हैं की आप कौन हैं। देखने में तो एकदम कृष्ण जी जैसे दिखाई पड़ते हो।

उद्धव जी कहते हैं- भैया! मैं तुम्हारी कृष्ण का मित्र हूँ। और उन्होंने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अब मुझे नन्द भवन लेकर चलिए।

सभी ग्वाल बाल उद्धव जी को लेकर नन्द भवन जाते हैं। जैसे ही नन्द भवन के द्वार पर पहुंचते हैं तो द्वार पर नन्द बाबा जी मूर्छित पड़े हुए हैं। उद्धव जी महाराज ने अपने हाथ का सहारा देकर नन्द बाबा जी को उठाया।

नन्द बाबा जी कहते हैं- लाला तू आ गयो।

उद्धव जी कहते हैं- मैं आपका लाला नही हूँ आपके लाला का मित्र हूँ। मेरा नाम है उद्धव।

नन्द बाबा कहते हैं- क्या हमारे कन्हैया नही आये? आज मेरे लाला नही आये?

जब माँ यशोदा ने द्वार पर कन्हैया का नाम सुना तो लाठी टेकती हुई आई क्योंकि बूढी हो गई थी 80 साल की। और द्वार पर उद्धव को देखा तो उद्धव को कसकर पकड़कर झकजोर कर पूछा- मेरो कनुवा कहाँ हैं? मेरा लाला कहाँ है?

उद्धव जी ने कहा की मैया! मैं तेरे लाला का मित्र हूँ उद्धव और उसका सन्देश लेकर आया हूँ।

जब माँ ने सुना तो हाथ पकड़कर उद्धव को अंदर लेकर गई और बिठाकर पूछा- बता उद्धव मेरे लाला ने क्या सन्देश भेजो है?

उद्धव ने कहा- माँ! तेरे लाला ने तेरे लिए प्रणाम भेजी है।

जैसे ही माँ ने सुना तो हंसने लगी- की बस केवल प्रणाम भेजो है। ये तो मैं कितने दिन से प्रणाम सुन रही हूँ। क्या वो वहां से प्रणाम ही भेजता रहेगो। एक बार माँ से मिलने नही आयेगो। देख उद्धव मैं अपने लाला के लिए दिन-रात रोती रहती हूँ और अगर रोते-रोते मैं अंधी हो गई तो इन आँखों से अपने लाल का दर्शन भी नही कर पाऊँगी। मेरे लाला से कहियो की एक बार अपनी माँ से आकर मिल ले।

माँ उद्धव को अब वहां पर लेकर गई जहाँ भगवान श्री कृष्ण का पलना था। और उस पालने को दिखाकर माँ कहती है- उद्धव तू शोर मत करियो मेरो लाला सो रयो है। फिर कहती है- नही, नही वो तो मथुरा में गया हुआ है ना।

फिर माँ उद्धव को उस ऊखल के पास लेकर जाती है जिस से माँ ने कन्हैया को एक बार माखन चोरी करने पर बाँध दिया था। माँ कहती है- देख उद्धव, ये वही ऊखल है, जिससे मैंने कान्हा को माखन की मटकी फोड़ने पर बाँध दिया था। तो क्या उस दिन की बात से नाराज होकर मेरा लाला , मेरा कनुवा मुझसे रूठ गया है जो मथुरा में जाकर बैठ गयो है।

देख तू उद्धव मेरे लाला से जाकर कहना की एक बार मुझे माफ़ कर दे और बस एक बार ब्रज आ। एक बार ब्रज आजा।

इस प्रकार से उद्धव ने माँ के आंसू पूंछे। रात्रि भर कृष्ण चर्चा चलती रही। कब रात बीत गई उद्धव को भी पता नहीं चला। प्रातः काल हो गई। सूर्य देव उदय हो गए। उद्धव ने नन्द बाबा से कहा की आप मुझे यमुना जी का स्नान करने की आज्ञा दो। गोपियों ने आज नन्द भवन के द्वार पर एक रथ खड़ा देखा। गोपियों को लगा की क्या कृष्ण आ गए हैं?

फिर सोचती हैं की नहीं-नहीं! अगर श्यामसुंदर आते तो हमसे जरूर मिलकर जाते। पहले तो वो क्रूर अक्रूर आया था जो हमारे प्यारे को लेकर चला गया। अब तो केवल हमारे प्राण बचे हैं। तो क्या कोई हमारे प्राण लेने आया है। क्या कोई कंस का पिंड दान करने के लिए हमारे प्राण लेने आया है। ऐसा कहकर गोपियाँ राधा रानी को साथ लेकर यमुना के तट पर गई हैं।

उद्धव जी भी यमुना के तट पर आये हैं। एक और गोपियाँ खड़ी हैं और एक और उद्धव।  उसी समय एक भ्रमर(भौंरा) आ गया है। और उस भ्रमर की आदत कभी तो उड़कर गोपियों की और जाये और कभी उद्धव जी की और जाये। जब गोपियों की और उड़कर भ्रमर आया तो गोपियों ने कहा  भ्रमर गीत गाया।

गोपी कहती हैं-  भ्रमर तू उस धूर्त कृष्ण का धूर्त मित्र है ना। हमे तुझसे घृणा हो गई है। जैसे तू फूलों का रस लेने के बाद उनका त्याग करके चला जाता है ऐसे ही कृष्ण ने हमारा त्याग कर दिया। तू हमारा स्पर्श मत कर।

कुछ संत कहते हैं की ये भ्रमर और कोई नही स्वयं श्री कृष्ण जी ही हैं।

जब उद्धव जी ने भ्रमर गीत सुना तो उद्धव ने सोचा की यहाँ तो कोई दिखाई नहीं देता। तो ये गोपियाँ बातचीत किससे कर रही हैं।

उद्धव जी महाराज गोपियों के पास गए हैं। और कहते हैं की गोपियों मैं तुम्हारे कृष्ण का मित्र हूँ। और तुम्हारे लिए कुछ सन्देश लेकर आया हूँ।

गोपियाँ कहती हैं उद्धव! आपने बड़ी कृपा की जो कृष्ण जी का सन्देश लेकर आये। लेकिन आप पहले अपने मुख से ये बात बताओ की कृष्ण ने स्वयं आने के लिए कहा भी या नही। क्योंकि उनको देखे बिना हमारे एक-एक पल एक-एक युग की तरह बीतता है। और ये भी बताइये की क्या सन्देश भेजा है। गोपियाँ उद्धव को घेरकर खड़ी हो गई।

गोपियाँ कहती हैं उद्धव! आपने बड़ी कृपा की जो कृष्ण जी का सन्देश लेकर आये। लेकिन आप पहले अपने मुख से ये बात बताओ की कृष्ण ने स्वयं आने के लिए कहा भी या नही। क्योंकि उनको देखे बिना हमारे एक-एक पल एक-एक युग की तरह बीतता है। और ये भी बताइये की क्या सन्देश भेजा है।

उद्धव ने अपने ज्ञान का पिटारा गोपियों के आगे खोला- और कहते है की भगवान ने आपके लिए कहा है – 

भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्वचित् ।
यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्निर्जलं मही ।
तथाहं च मनःप्राण भूतेन्द्रियगुणाश्रयः ॥ २९ ॥

आत्मन्येवात्मनात्मानं सृजे हन्म्यनुपालये ।
आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना ॥ ३० ॥

आत्मा ज्ञानमयः शुद्धो व्यतिरिक्तोऽगुणान्वयः ।
सुषुप्तिस्वप्नजाग्रद्‌भिः मायावृत्तिभिरीयते ॥ ३१ ॥

मैं सबका उपादान कारण होने से सबका आत्मा हूँ, सबमें अनुगत हूँ; इसलिये मुझसे कभी भी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता। जैसे संसार के सभी भौतिक पदार्थों में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पाँचो भूत व्याप्त हैं, इन्हीं से सब वस्तुएँ बनी हैं, और यही उन वस्तुओं के रूप में हैं। वैसे ही मैं मन, प्राण, पंचभूत, इन्द्रिय और उनके विषयों का आश्रय हूँ। वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूँ और सच पूछो तो मैं ही उनके रूप में प्रकट हो रहा हूँ । मैं ही अपनी माया के द्वारा भूत, इन्द्रिय और उनके विषयों के रूप में होकर उनका आश्रय बन जाता हूँ तथा स्वयं निमित्त भी बनकर अपने-आपको ही रचता हूँ, पालता हूँ और समेत लेता हूँ । आत्मा माया और माया के कार्यों से पृथक् है। वह विशुद्ध ज्ञानस्वरुप, जड़ प्रकृति, अनेक जीव तथा अपने ही अवांतर भेदों से रही सर्वथा शुद्ध है। कोई भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते। माया की तीन वृत्तियाँ हैं—सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत्। इनके द्वारा वही अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप आत्मा कबी प्राज्ञ, तो कभी तैजस और कभी विश्वरूप से प्रतीत होता है ।

राधा-कृष्ण के प्रेम की एक अद्भूत कथा

radha-krishna

‘संकेत’ में हुआ था पहली बार, राधा-कृष्ण का मिलन

भगवान विष्णु के मानव अवतारों में श्री कृष्ण का रूप सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हजारों साल पहले जब मथुरा में इनका जन्म हुआ था तो वसुदेव जी इन्हें अपने मित्र नंदराय जी के पास नंद गांव में छोड़ आए।  नंद गांव से चार मील की दूर बसे बरसाना कस्बे में उन्हें राधाजी की आहट मिली। और बहुत कम लोगों को आज पता है कि पहली बार दोनों किशार रूप कहां मिले थे। बरसाना राधाजी की जन्मस्थली है तो मथुरा की जेल श्रीकृष्ण की। माना जाता है। इन दोनों क्षेत्रों के बीच में एक स्थान हैं “संकेत”। इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था। हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं। यह गांव छाता तहसील में पड़ता है।

  • कृष्ण ने जब मथुरा में अवतार लिया तो राधा का जन्म बरसाना में हुआ। कंस के कोप से बचाने के लिए कृष्ण के पिता ने उन्हें नंद गांव पहंचा दिया जहां से महज बरसाना गांव महज चार मील की दूरी पर था। जब राधा और कृष्ण कुछ बड़े हुए तो एक दिन बरसाना और नंद गांव के बीच में एक स्थान पर दोनों पहुंचे।
  • यहां पहली बार अवतार लेने के बाद राधा और कृष्ण का मिलन हो रहा था। एक दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। यहीं से राधा कृष्ण के प्रेम लीला की शुरूआत हुई। माना जाता है कि अवतार लेने से पहले ही राधा कृष्ण ने इस स्थान पर मिलने की योजना बनाई थी। इसलिए इस स्थान को ‘संकेत’ नाम से जाना जाता है।

श्रीराधा का आविर्भाव

Picture13

भारतीय साहित्य में राधा कृष्ण की अभिन्न सहचरी हैं। यदि कृष्ण विष्णु हैं, तो राधा उनकी प्रकृति है, लीलानटी है। श्रीमद्भागवत में राधा का उल्लेख नहीं है, पर महारास के प्रसंग में स्पष्ट उल्लेख है कि अन्यान्य गोपियों को छोड़कर जिस एक भाग्यशालिनी गोपी को कृष्ण अपने साथ एकांत में ले गए थे, उसने स्वयं को सभी रमणीयों में उत्तम माना। उसे अहंकार-सा हो गया कि कृष्ण एकमात्र उससे ही अनुरक्त हैं। इस रूपाभिमान में वह थकान का अभिनय करती, कृष्ण से कहने लगी ‘मैं चलने में समर्थ नहीं हूं। अतः मुझे कंधे पर बैठाकर जहां इच्छा हो, वहां ले चलो।’ कृष्ण उस गोपी के अहंकार को समझ गए। जैसे कि उस खास गोपी ने अवनत कृष्ण के कंधे पर बैठना चाहा वह अंतर्धान हो गए। गोपी कृष्ण के विछोह में तड़पने लगी, तभी अन्य गोपियां भी कृष्ण को ढूंढती हुई वहां आ गईं। उन्होंने प्रियतम के विछोह से मूर्च्छित संतप्त सखी को देखा। वह सभी विस्मित हुईं। बाद में अर्थ निकाला गया कि वह अनाम भाग्यशाली गोपी कोई और नहीं, ‘राधा’ थीं।

पुराणों में राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। इसके अलावा संस्कृत साहित्य में जगह-जगह उल्लेख है।

कई विद्वानों का मत है कि श्रीमद्भागवत में केवल एक जगह कृष्ण की सखी के रूप में स्त्री वर्णन मिलता है बाकी श्रीमद्भागवत में कहीं नहीं है। 

गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों में जिस रासेश्वरी राधा ने कृष्ण की प्रियतमा गोपियों में अन्यतम स्थान प्राप्त किया है। आश्चर्य है कि कृष्ण कथा के समर्थ उद्बोधक श्रीमद्भागवत में उसकी चर्चा तक नहीं है। उसमें केवल गोपियों के साथ कृष्ण लीला का वर्णन ही है। विष्णु पुराण में भी यही स्थिति है, वहाँ भी भागवत की ही भाँति एक गोपी के सौभाग्य का वर्णन मिलता है जिसने अन्य गोपियों की अपेक्षा कृष्ण को विशेष आकृष्ट किया था और जिसके साथ कृष्ण ने अन्य गोपियों से दूर होकर एकांत संगति की थी।

अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः

यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतोयामनयद्रहः।।भागवत10/30/24

अर्थात- गोपियां आपस में कहती हैं अवश्य ही सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की यह आराधिका होगी। इसीलिए इस पर प्रसन्न होकर हमारे प्राण प्यारे श्यामसुंदर ने हमें छोड़ दिया है और इसे एकांत में ले गए हैं।

अत्रोपविश्य वै तेन काचित् पुष्पैरलङकृता ।

अन्यजन्ममि सर्वात्मा विष्णुरभ्यर्चितस्तया ।।विष्णुपुराण5/13/35

यद्यपि भागवत और विष्णुपुराण में उद्धृत दोनों श्लोकों के ‘अनयाराधितः’ और अभ्यर्चितस्तया’ इन दोनों पदों की टीका करने वाले गौड़ीय वैष्णवों ने स्पष्ट रूप से राधा का गूढ़संकेत निकाल लिया है, फिर भी इतना मानना ही होगा कि उन दोनों पुराणों में ‘राधा’ नाम कास्पष्ट उल्लेख नहीं है। गोपियों की चर्चा करके भी राधा-नाम-गोपन में व्यास का क्या रहस्य हैयह चिन्त्य है और वैष्णव आचार्यों ने इसका संकेत भी दिया है।

भागवत में महारास के प्रसंग का यह श्लोक भी विचारणीय है-

तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीड़ामनुव्रतै

स्त्रीरत्नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्ध बाहुभिः।।

अर्थात- भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी और सेविका गोपियां एक दूसरे की बांह में बांह डाले खड़ी थीं। उन स्त्री रत्नों के साथ यमुनाजी के पुलिन पर भगवान ने अपनी रसमर्या रासक्रीड़ा प्रारंभ की। स्पष्ट है कि सामान्य गोपियों से पृथक एक गोपी भगवान की प्रेयसी थी।

वह खास गोपी कौन थी, उसके नाम का उल्लेख नहीं है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा का पहली बार स्पष्ट उल्लेख है। (1.48-49)। ‘राधा’ शब्द का अर्थ भी विलक्षण है। महारास के अवसर पर वह मदनातुर हो कृष्ण के समक्ष आ खड़ी हुईं, इसलिए वह ‘राधा’ कहीं गई, ‘कामातुर: सस्मितां तां ददर्श रसिकेश्वर:। …तने राधा समाख्याता प्रराविद्मिर्महेश्वरी।।’(वही)

ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रथम खंड के अध्याय 49 के तीन श्लोकों में राधा-कृष्ण के मधुर दांपत्य और गहन अनुराग का वर्णन मिलता है। इसी महापुराण में उल्लिखित है कि सुदामा ने राधा को शाप दिया कि तुम अपने प्रिय की प्राणवल्लभा होती हुई भी उनसे सौ वर्ष वियुक्त रहोगी। यह वैयक्तिक अनुभूति पर सामाजिक धारणा का आरोप था। वार्धक्य में ही दोनों की भेंट तीर्थयात्रा (कुरुक्षेत्र का सूर्यग्रहण पर्व) के समय हो पाई। श्रीमद्भागवत के संकेत और ब्रह्मवैवर्तपुराण की स्पष्ट कथा को जयदेव ने ‘गीतगोविंद’ में भक्ति-प्रेम का एक लोकप्रिय गेय ढांचा दे दिया। वस्तुतः राधाकृष्ण का पुराणवर्णित प्रणय द्विभूमिक है- लौकिक तथा पारलौकिक। जबकि जयदेव के राधा-कृष्ण लौकिक और श्रृंगारपरक हैं।

राधा-कृष्ण का अद्वैत उनके रूप और वेश तक में हैं। कृषि श्याम वर्ण हैं और उन्होंने पीतांबर धारण किया है। राधा गोरी हैं और उन्होंने नीली साड़ी पहन रखी है- ‘नील वसन तन गोरी।’ कृष्ण नित्य किशोर, राधा, नित्य किशोरी। कृष्ण सोलह कलाओं के पूर्णावतार, राधा नित्य षोडशी। कृष्ण भाव-पुरुष हैं। राधा वह आह्लादिनी शक्ति है जो सच्चिदानंद ब्रह्म के ‘आनंद’ रूप को साकार करती हैं। कृष्ण रसेश्वर है, राधा रसेश्वरी। भक्त कवियों ने विभिन्न गोपियों के भाव से प्रेमसाधना की, लेकिन राधा भाव से प्रेम की साधना केवल चैतन्यदेव ने की। प्रेम की चरम प्रगाढ़ता की दृष्टि से गौड़ीय परंपरा में राधा का परकीया रूप मान्य है। दूसरी तरफ सूरदास ने राधा-कृष्ण के कैशोरिक प्रणय को अमरता दी।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा जन्म और कृष्ण के साथ उनकी बिहार-लीला का भव्य वर्णन है। इस पुराण के अनुसार राधा की उत्पत्ति दैवी मानी गई है। वह परमात्मा स्वरुप श्रीकृष्ण के वामार्ध से प्रकट हुई थीं। प्राचीन काल में गोलोक स्थित परम सुंदर वृंदावन के रासमंडल में एक शोभन रत्नमय सिंहासन पर विराजमान श्रीकृष्ण को रमन की इच्छा हुई। उनकी रिरिंसा ने ही रासेश्वरी राधा का मूर्त रूप धारण किया। जगदीश्वर दो रूपों में विभक्त हो गए। उनका दक्षिण अंग श्रीकृष्ण रूप और वाम अंग राधा रूप में स्थित हुआ।

रमणं कर्तुमिच्छा च तद् बभूव सुरेश्वरी।

इच्छया च भवेत्सर्वं तस्य स्वेच्छामयस्य च।।

एतस्मिन्नन्तरे दुर्गे द्विधारूपो बभूव सः |

दक्षिणाङ्गं च श्रीकृष्णो वामार्धङ्गं च राधिका।।- ब्रह्मवैवर्त पुराण48/26/28

इसी पुराण के अंतिम खण्ड में राधा के स्वरूप का तथा कृष्ण के साथ उनके विधिवत विवाह का चमत्कारी वर्णन के साथ-साथ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म खंड, 15 वाँ अध्याय) २६वें अध्याय में राधा-कृष्ण संवाद और २८-२९वें अध्यायों में रास-क्रीड़ा का विस्तृत वर्णन है।

पद्म पुराण– इसी प्रकार पद्म पुराण में भी राधा का स्पष्ट उल्लेख है। यह मुख्य रूप से वैष्णव पुराण माना जाता है। राधातत्व के उन्मीलन में पद्म पुराण प्रमुख स्थान रखता है। राधा के विकसित रूप का दिग्दर्शन इस पुराण में प्राप्त होता है। पद्म पुराण में ‘राधाष्टमीव्रत’ का पूर्ण विधान है। राधा-जन्म के संबंध में वर्णन है कि भाद्रमास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को वृषभानु की यज्ञ भूमि में राधा का आविर्भाव हुआ। (पद्मपुराण, ब्रह्मखण्ड, 6/39-40)

इसी पुराण के पाताल खंड के अनेक अध्यययों में वृंदावन की महिमा का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। यही पर राधा का भी प्रसंगवश उल्लेख आया है, जिसमें राधा को ‘आधा प्रकृति’ और कृष्ण की बल्लभा बतलाया गया है। (तत्प्रिया प्रकृतिस्त्वाद्या राधा कृष्ण वल्लभा,पद्मपुराण पातालखण्ड,69/118)

इस पुराण की मान्यता है कि ‘न राधिकासमा नारी न कृष्ण सदृश्य पुमान्’ अर्थात् राधा के समान न कोई नारी है और कृष्ण के समान न कोई पुरुष।

हिन्दी और संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वानसाहित्येतिहासकारनिबन्धकार तथा समालोचक आचार्य बलदेव उपाध्याय के मत में पद्मपुराण की इसी उक्ति ने साहित्य जगत् में राधा-कृष्णको आदर्श दंपत्ति के रूप में चित्रित करने की प्रेरणा दी होगी। (भारतीय वाङ्मय में राधा तत्त्व, पृ0 -17 बलदेव उपाध्याय)

इसके अतिरिक्त देवीभागवत‘ में भी राधा की उपासना और पूजा विधि का वर्णन मिलता है। श्रीकृष्ण की चिन्मयी शक्ति स्वरूपा राधा की सत्ता उनकी पूजा आराधना तथा राधा-तंत्र कीमहिमा इस तथ्य का द्योतक है कि उस समय तक राधा की पूर्ण प्रतिष्ठा धार्मिक जगत् में हो चुकी थी।

श्रीरूपगोस्वामी प्रणीत ‘उज्जवलनीलमणि‘ के अनुसार गोपालोत्तरतापिनी उपनिषद् मेंराधागंधवीं नाम से विश्रुत तथा ‘ऋक्परिशिष्ट’ में राधा-माधव के साथ कथित है।

गोपालोतरतापिन्यां गान्धर्वीति विश्रुता।

राधेत्यक परिशिष्टे च माधवेन सहोदिता।। उज्ज्वल नीलमणि – रूपगोस्वामी

पुराणों के अतिरिक्त संस्कृत साहित्य में भी अन्वेषण करने पर राधा का यत्र-तत्र उल्लेख बहुतायत में मिलता है। सर्वप्रथम ‘हाल’ की प्राकृत रचना ‘गाथासप्तशती’ (गाहासत्तसई) की अनेक गाथाओं में श्रीकृष्ण की ब्रजलीला का वर्णन तथा एक गाथा में ‘राधा’ का नाम भी अंकित है।

मुहाभासएण तं कहल गोरऊँ रहिताएँ अवणेन्तो।

एताण बलबीणं अण्णाणापि गोरअं हरसि || गाथासप्तशति1/89

संस्कृत साहित्य जगत् में हाल की इसी गाथा में ‘राधा’ का प्रथम उल्लेख माना जाता है। हाल का संस्कृत नाम ‘शालिवाहन’ था जो ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रतिष्ठानपुर में शासन करता था।

संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार महाकवि भास प्रणीत बालचरित‘ कृष्ण विषयक नाटकों में प्रसिद्ध है। इसमें बालकृष्ण विख्यात् लीलाओं का सुंदर वर्णन है। इस नाटक के तृतीय अंक में हल्लीसक नृत्य का मनोहारी वर्णन है, जिसमें कृष्ण के गोपियों के साथ नर्तन और ग्वाल मंडली द्वारा वाद्य-वादन का चित्रण है। यद्यपि इस नृत्य में भाग लेने वाली गोपियों का नाम निर्देश नहीं है फिर भी गोपियों की स्थिति में राधा का प्राधान्य व्यजित है। अधिकतर विद्वान् भास को गुप्त से पूर्ववर्ती मानने के पक्षपाती हैं। अतः तृतीय शताब्दी में कृष्ण की गोपियों के साथ नृत्यलीला प्रसिद्ध हो चुकी थी।

पं॰ विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र‘ में राधा का स्पष्ट उल्लेख है। इस कथा प्रसंग में तंतुवाय पुत्र कृष्ण राजकन्या पर आसक्त हो उसके अन्तःपुर में प्रवेश करके राजकन्या से कहता है कि’राधा’ नाम की मेरी भार्या पहले गोकुल में उत्पन्न थी। वही तुम्हारे रूप में अवतीर्ण हुई है। अतःमेरा अनुराग तुम्हारे प्रति सहज है। इसलिए मैं यहाँ आया हूँ।

राधा नाम मे भार्या गोपकुलप्रसूता प्रथमासीत्।

सा त्वमत्र अवतीर्णातेनावागता।पञ्चतन्त्रपञ्चम कथामित्र- भेद।

इस निर्देश से स्पष्ट है कि राधा का गोपकुल में उत्पन्न होना तथा कृष्ण की भार्या होनालोक प्रसिद्ध घटना थी।

सप्त शती के नाटककार भट्टनारायण ने अपने प्रसिद्ध नाटक की नान्दी में ‘राधा’ के साथकृष्ण की रासलीला का उल्लेख किया है।

कालिन्याः पुलिनेषु केलिकुपितामुत्सृज्य रासे रसं

गच्छन्तीमनुगच्छतोऽश्रुकलुषां कंसद्विषो राधिकाम्।

तत्पादप्रतिमनिवेशितपदस्योद्भूतरोमोद्गते

रक्षुण्णोऽनुनयः प्रसन्न दयितादृष्टस्य पुष्णातु वः ।।- वेणीसंहार1/2

इससे यह प्रतीत होता है कि अष्टम शती से पूर्व ही राधा तथा रासलीला का वृतांत काव्य जगत् में प्रसिद्ध था। दशमशती के अनेक कवियों ने राधा तथा कृष्ण के प्रसंगों को लेकर अनेक कमनीय रचनाएँ की है।

इसी शती के पूर्वार्ध में विद्यमान काश्मीरी टीकाकार वल्लभदेव ने संस्कृत के कतिपय महाकाव्य की टीका की। उन्होंने शिशुपाल वध की टीका में चतुर्थ सर्ग के एक श्लोक की व्याख्या में लोचक शब्द के उदाहरण के लिए एक प्राचीन पद्य को उद्धृत किया है जिसमें राधा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

यो गोपीजनकवल्लभः कुचतटव्याभोगलब्धास्पदं

छाया वात्र विरक्तको बहुगणश्चारुश्चतुर्हस्तकः।

कृष्णः सोऽपि हताशयाप्यहृतः सत्यंकयाऽप्यद्य मे

किं राधेमधुसूदनो नहि नहि प्राणप्रियो लोचकः ।।- शिशुपालवध4/35 श्लोक की टीका में उद्धृत,

राधा व कृष्ण की प्रसिद्धि 12वीं शताब्दी में जयदेव के महान ग्रन्थ गीत-गोविंद‘ से हुई- काव्य-जगत् में राधाचरित का पूर्ण विकसित रूप जयदेव कृत ‘गीत-गोविन्द’ में मिलता है,जहां श्रीकृष्ण नायक तथा राधा नायिका है और समस्त काव्य राधा-कृष्ण की ललित लीलाओं के विलासपूर्ण वर्णन से ओत-प्रोत है। परिणामतः 12वीं शती में राधा का आविर्भाव साहित्य जगत् में पूर्णरूप से सिद्ध हो चुका था।

12वीं शती में ही लालशुक विल्वमङ्गल के कृष्ण-कर्णामृत‘ तथा श्रीधर द्वारा संकलित सदुक्तिकरणामृत‘ नामक सूक्ति ग्रंथ में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं का सुंदर वर्णन मिलता है। इस तथ्य के आधार पर 12वीं शती को राधा तत्व के साहित्यिक उन्मीलन का मुख्य काल माननाचाहिए।

सूरदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र तक अनगिनत कवियों के प्रेमकाव्य के केंद्र में ‘राधा’ है। भारतेंदु राधारानी के गुलाम के रूप में अपना परिचय देने में गर्व का अनुभव करते हैं। हरिऔध ने अपने ‘प्रिय प्रवास’ में द्विवेदीयुगीन आदर्शवाद की प्रेरणा से राधा को समाज-सेविका के रूप में उपस्थित किया है। छायावादोत्तर युग में जानकीवल्लभ शास्त्री को ‘राधा’ और नई कविता के दौर में धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ में राधा का नया अनुकीर्तन है।

उसके बाद 16वीं शती में राधातत्व के पूर्ण विकास का कार्य चैतन्य देव (चैतन्य महाप्रभु) के शिष्यों द्वारा संपन्न होता है। 16वीं शती से पूर्व राधा चरित्र का पृथुल किंतु विशृङ्खल रूप सामने आता है, उसी को रूप गोस्वामी ने संवार कर नाटकी रूप देने का प्रयास किया है। चैतन्य महाप्रभु वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं।

हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में राधिका विशुद्ध गीतिकाव्यात्मक पात्र है इसलिए जयदेव, चंडीदास, विद्यापति और सूरदास आदि महाकवियों की वाणी में गीतिकाव्य की जो अमृतधारा प्रभावित हुई, उसका उत्स राधा का उज्जवल प्रेम है। इस धारा का भव्य उद्घाटन और प्रथम परिचय यद्यपि जयदेव ने संस्कृत में दिया, लेकिन इसकी तरंगों का पूर्ण विकास तो मैथिली, बांग्ला और बृजभाषा जैसी आधुनिक देशभाषाओं में हुआ। जयदेव की राधा विलास-कलावती है, तो विद्यापति की राधा मुग्धा-किशोरी है। विद्यापति की राधा में शरीर-सौंदर्य अपनी परिणिति पर पहुंचता है। तो चंडीदास कि राधा में मानस सौंदर्य। चैतन्यदेव, चंडीदास और विद्यापति के पद गाते हुए भाव-विभोर और मूर्छित हो जाया करते थे। चंडीदास कि राधा विलास प्रवण नहीं है। उसके शुद्ध सात्विक प्रेम में केवल आत्मसमर्पण का वेग है। लेकिन सूरदास की राधा इन सबसे विशिष्ट है। उसका प्रेम चिर साहचर्य और बालसंख्य की भूमिका पर प्रतिष्ठित है। उसमें पूर्वराग की वह व्याकुल वेदना नहीं है जो चंडीदास या विद्यापति की राधा में है। सूरदास की राधिका शुरू से आखिर तक सरल बालिका है। कृष्ण को पाना उसका लक्ष्य नहीं है। कृष्ण का तृप्त होना ही लक्ष्य है, ‘प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में और किसी कवि ने नहीं किया।’ (हजारी प्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन धर्मसाधना)

प्राचीनतम उल्लेख- कृष्णवल्लभा श्रीराधा का वैष्णव धर्म में आविर्भाव कब हुआ, इस प्रश्न का उत्तर देना सहज नहीं है। निष्ठावान वैष्णवों के लिए राधारानी परमतत्व, लीलामय भगवान श्रीकृष्ण की ‘नित्य-संगिनी’, ‘नित्या-ठकुरानी’ है। परंतु वह जीव द्वारा ग्राह्म होने के हेतु मृत्युलोक में अभिव्यक्ति पाती है। इसलिए जनमानस में उनकी अभिव्यक्ति के क्रमिक इतिहास का विवेचन दुष्कर होते हुए भी अकल्पनीय नहीं कहा जा सकता। उनके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख सातवाहन नरेश ‘हाल’ की प्राकृत ग्रंथ ‘गाहासत्तसई’ में हुआ है। इसलिए बहुत से विद्वान राधावाद को कम से कम इस ग्रंथ के बराबर प्राचीन मानते हैं। ‘हाल’ ने अपने समय में प्रचलित प्राकृत भाषा की प्रेम कविताओं को इस ग्रंथ में संकल्पित किया था। इनमें कई ऐसी हैं, जिसमें कृष्ण की बृजलीला और गोपियों का वर्णन हुआ है। लेकिन एक में, और केवल एक में ‘राधा’ का उल्लेख मिलता है।

“मुहमारुएण तं कहण गोरअं राहिआएँ अवणेन्तो,

एताण वल्लवीणं अण्णाण वि गोरअं हरसि”।(1/89)।।

“हे कृष्ण तुम अपनी मुख मारुति द्वारा राधिका के मुख पर लगी धूलि को दूर करके दूसरी सभी नारियों का गर्व गर्व कर रहे हो”।

सातवाहन नरेश ‘हाल’ का समय सुनिश्चित ना होते हुए भी प्राय: प्रथम शती ई. माना जाता है। लेकिन ‘गाहासत्तसई’ में आजकल उपलब्ध संस्करण में प्रदत्त सब कविताएं प्रथम शती ई. तक लिखी जा चुकी थी, यह कहने के लिए पर्याप्त साहस उपेक्षित है। इनकी भाषा को देखते हुए बहुत से विद्वान इन्हें पांचवी अथवा छठी सदी ई. में रचित मानने को भी प्रस्तुत है। इसके अतिरिक्त जैसा कि हम अभी देखेंगे, राधा के नाम का किसी अन्य स्रोत में उल्लेख लगभग 700 ई. के पूर्व नहीं मिलता। इसलिए ‘गाहासत्तसई’ वह में प्रदत्त इस श्लोक को प्रशिक्षित मानना ही उचित जान पड़ता है। ‘गाहासत्तसई’ के एक श्लोक में ‘विक्रमादित्य’ का उल्लेख जो छठी सदी ई. पूर्व किसी भी अन्य ग्रंथ में अनुपलब्ध है, इस निष्कर्ष को अति रक्ति आधार प्रदान करता है।

अन्य प्राचीन साहित्यिक कृतियों में उल्लेख

राधावाद के आविर्भाव की तिथि के विषय में अन्य कई मत आजकल प्रचलित हैं। उदाहरणार्थ, डॉ. विजयेंद्र स्नातक राधाकृष्ण की भक्ति के प्रचलन का आरंभ पांचवी सदी ई. के आसपास मानते हैं और डॉ. शशिभूषण दासगुप्त छठी सदी ई. में अथवा उसके भी कुछ पहले। इन्हीं विद्वानों के सुझावों के साथ हम अशोककुमार मजूमदार के इस मत का उल्लेख कर सकते हैं कि राधा की उपासना यद्यपि 12वीं सदी ई. तक अज्ञात थी, तथापि हाल के (जिन्हें वे दूसरी शती ई. में रखते हैं) उपरांत उनका साहित्य में बराबर उल्लेख होता रहा। लेकिन इन विद्वानों ने राधा का उल्लेख करने वाले ऐसे किसी ग्रंथ को उद्धृत नहीं किया है, जिसे आठवीं सदी ई. से पूर्व रखा जा सके। ‘गौड़वहों’ में वाक्पति ने एक श्लोक लिखा है, जिसमें राधा के नखों और वलयों से कृष्ण के वक्ष के चिह्नित हो जाने की चर्चा है।  परंतु वाक्पति का समय आठवीं सदी ई. का मध्य है। भट्टनारायण कृत ‘वेणी संहार’ में कालिन्दी के तट पर कृष्ण से कुपित अश्रुकलुषा राधिका के केलि त्याग करके जाने पर कृष्ण द्वारा अनुनयपूर्वक अनुगमन करने का उल्लेख है, लेकिन भट्टनारायण को भी आठवीं सदी ई. के पूर्व नहीं रखा जा सकता। इसी प्रकार काश्मीरी लेखक आनन्दवर्धन के ‘ध्वन्यालोक’ (नवीं शती ईं.),  श्रीधरदास की ‘सदुक्तिकर्णामृत’ (12वीं शती ईं.) में उद्धृत अभिनन्द के एक श्लोक, त्रिविक्रमभट्ट के ‘नलचम्पू’ (10वीं शती ईं.) और गुजराती लेखक हेमचंद्र (12वीं शती ईं.) की प्राकृत व्याकरण में उद्धृत दो श्लोकों आदि में राधा का उल्लेख जिस प्रकार हुआ है, उससे भी यह सिद्ध नहीं होता कि राधा-कृष्ण की भक्ति पांचवी सदी ई. के आसपास अथवा उसके पूर्व प्रचलित हो चुकी थी, अथवा इस समय से साहित्य में राधा का नाम बराबर उल्लिखित होता रहा। उल्टे इन श्लोकों के लेखकों की तिथियों से यह संकेत मिलता है कि संभवत् राधा का नाम भी लगभग 700 ई. के बहुत पहले ज्ञात नहीं था। इनके आधार पर श्री राधा के आविर्भाव की तिथि अधिक से अधिक 700 ई. के लगभग मानी जा सकती है। इस तथ्य के प्रकाश में हाल के ऊपर दिए गए श्लोक की प्रक्षिप्पता और श्री चिंतामणि विनायक वैद्य के इस मत की निष्प्राणता कि राधावाद का आरंभ 10वीं सदी ई. तक नहीं हुआ था, स्वत: सिद्ध है।

पौराणिक साक्ष्य- श्री राधा के ऐतिहासिक आविर्भाव की आपेक्षित अर्वाचीनता कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथों में उनके सर्वथा अनुल्लेख से भी सिद्ध है। उदाहरणार्थ महाभारत के पात्रों में कृष्ण की महत्ता निर्विवाद है, परंतु उनके साथ राधा पूर्णत: अनल्लिखित है। यह महाकाव्य अपने वर्तमान रूप में चौथी शती ई. तक अवश्य ही अस्तित्व में आ गया था। इसी प्रकार हरिवंश, विष्णु, ब्रह्मा, भागवत तथा बृहदधर्म पुराणों में श्रीकृष्ण की गोपियों के साथ रासकीड़ा का वर्णन होते हुए भी राधा का नाम तक नहीं आया है। जो निष्ठावान वैष्णव सातवाहन नरेश ‘हाल’ के साक्ष्य के आधार पर राधा की प्राचीनता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, उन्हें भी इन ग्रंथों में राधा के अनुल्लेख का स्पष्टीकरण देना दुष्कर हो जाता है। शेष पुराणों में भी राधा विषयक जितनी सामग्री आजकल मिलती है, वह प्राय: (वायु, मत्स्य, वराह तथा नारदी आदि में) एकार्थ श्लोक तक सीमित है और अगर विस्तृत रूप में मिलती भी है (जैसे पदम और ब्रह्मवैवर्त आदि में) तो उसके राधावाद के लोकप्रिय हो जाने के बाद जोड़े जाने के प्रमाण भी उपलब्ध हैं।

स्मरणीय है कि गौड़ीय वैष्णवों ने केवल भागवत, मत्स्य और पद्म पुराण में राधा का उल्लेख माना है। स्पष्टत: उनके समय तक दूसरे पुराणों में राधावाद का प्रवेश नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने राधावाद की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए स्मृतियों, तंत्रों तथा उप पुराणों का आश्रय लिया है। इनमें मत्स्य-पुराण में राधा का उल्लेख केवल एक श्लोक में हुआ है, जिसमें कहा गया है कि “रुक्मिणी द्वारावती में है और राधा वृंदावन के वन में”। पदम पुराण से गौड़ीय वैष्णवों ने केवल एकाध श्लोक उद्धृत किए हैं, लेकिन आजकल यह पुराण राधा संबंधी प्रसंगों से भरा पड़ा है।इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ के इन राधा विषयक स्थलों पर परिवर्तित्व की स्पष्ट छाप है। इसलिए आधुनिक विद्वान मत्स्य और पद्म पुराणों के आधार पर राधावाद की प्राचीनता मानने के लिए प्रस्तुत नहीं है।

राधावाद की प्राचीनता का विवेचन करते समय भागवत पुराण एक विशेष समय प्रस्तुत करता है। इस पुराण की रचना तिथि लगभग 800 ई. है। इसलिए इसमें राधा का उल्लेख होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उनका नाम लगभग 700 ई. के पूर्व ज्ञात था। लेकिन इसमें राधा के नाम के अनुल्लिखित अथवा कम उल्लिखित होने से यह अवश्य सिद्ध होता है कि लगभग 800 ई. तक राधावाद विशेष लोकप्रिय नहीं हो पाया था। इस पुराण में श्रीकृष्ण की बृजलीला का मधुरतम और सर्वाधिक विस्तृत वर्णन मिलता है और गौड़ीय भक्तों ने इसे राधावाद का प्रधान आलम्ब बनाया है। लेकिन इसमें केवल एक श्लोक ऐसा है, जिसमें खींचतान करके राधा का अप्रत्यक्ष उल्लेख माना जा सकता है। इस पुराण के दशम स्कंध में जहां कृष्ण की गोपियों के साथ रासलीला का वर्णन है, एक स्थल पर कृष्ण अपनी एक प्रियतमा गोपी के साथ अदृश्य हो जाते हैं और अन्य गोपियों की आड़ में उसके साथ विविध प्रकार की क्रीड़ाएं करते हैं। बाद में वह गोपी के गर्विता हो जाने के कारण उसके सामने से भी गायब हो जाते हैं। उस समय उनकी खोज करते करते विरह व्याकुल गोपियां उनके पदचिन्हों के साथ उस गोपी के पदचिन्ह लक्षित करके कहती हैं:

अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः

यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतोयामनयद्रहः।।भागवत10/30/24

अर्थात- गोपियां आपस में कहती हैं ‘अवश्य ही सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की यह आराधिका होगी। इसीलिए इस पर प्रसन्न होकर हमारे प्राण प्यारे श्यामसुंदर ने हमें छोड़ दिया है और इसे एकांत में ले गए हैं।

इस श्लोक में ‘ अनया राधित:’ और ‘ अनया आराधित:’ दोनों पाठ स्वीकार्य हैं। इनका अर्थ एक ही होता है। वैष्णव भक्त इसमें राधा के नाम का अप्रत्यक्ष अभास पाते हैं। लेकिन इस प्रसंग में राधा के नाम का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं है और शेष संपूर्ण भागवत में राधा क्यों अज्ञात है, इन शंकाओं का समुचित उत्तर नहीं दे पाते। दूसरे, भागवत की श्रीधरस्वामी कृति प्रमाणिक टीका में इस श्लोक में राधा नाम का उल्लेख नहीं माना गया है और इस ग्रंथ के 15वीं सदी में उड़िया भाषा में किए गए जगन्नाथदास कृत अनुवाद में एक कृष्णप्रिया गोपी का नाम ‘वृंदावनी’ बताया गया है।

इससे स्पष्ट है कि 15वीं शती तक एक कृष्ण प्रिया गोपी की राधा से अभिन्नता निर्विवाद नहीं हो पायी थी। इसके अतिरिक्त यह भी स्मरणीय है कि प्राचीन पुराणों में परिगणित होनेवाले विष्णु पुराण में (5/13) में रासलीला का वर्णन ठीक भागवत के अनुरूप है। इसमें भी कृष्ण के विलुप्त हो जाने पर गोपियां उनके ध्वज, बज्र, अंकुश तथा कमल आदि रेखाओं से युक्त पदचिन्हों के साथ किसी पुण्यवती मदमाती (कृत पुण्यमदालसा)  गोपी के छोटे-छोटे पतले चरणचिन्ह देखकर कहती।

बरसाना और नंदगांव : राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण का प्रेम अटूट था। बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।

बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था। बरसाने से मात्र 4 मील पर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के सौतेले पिता नंदजी का घर था। होली के दिन यहां इतनी धूम होती है कि दोनों गांव एक हो जाते हैं। बरसाने से नंदगाव टोली आती है और नंदगांव से भी टोली जाती है।

कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को ‘लाड़ली’ कहा जाता है।

बरसाना गांव के पास दो पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते थे।

गौरतलब है कि मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियां किसी चमत्कार से खुल गई थीं, तब वासुदेवजी भगवान कृष्ण को नंदगांव में नंदराय के यहां आधी रात को छोड़ आए थे। कुछ मानते हैं कि वे मथुरा के पास गोकुल में यशोदा के मायके छोड़ आए थे, जहां से यशोदा उन्हें नंदगांव ले गईं।

नंद के घर लाला का जन्म हुआ है, ऐसी खबर धीरे-धीरे गांव में फैल गई। यह सुनकर सभी नंदगांववासी खुशियां मनाने लगे। कृष्ण ने नंदगांव में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों का वध किया। यहां के घाट और उसके पास अन्य मनोरम स्थल हैं, जैसे- गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट, रमणरेती आदि।

संकेत तीर्थ : कहते हैं कि राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात नंदगांव और बरसाने के बीच हुई। एक-दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। माना जाता है कि यहीं से राधा-कृष्ण के प्रेम की शुरुआत हुई। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है। उस वक्त कृष्ण की उम्र क्या रही होगी? यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है। इन दिनों लाड़ली मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्घालु आते हैं और राधा-कृष्ण के प्रथम स्थल पर आकर इनके शाश्वत प्रेम को याद करते हैं।

Picture7

वृंदावन से राधा-कृष्ण का क्या रिश्ता है?

वृंदावन कृष्ण लीलाओं का स्थल : वृंदावन मथुरा से 14 किलोमीटर दूर है। मथुरा कंस का नगर है, जहां यमुना तट पर बनी जेल से मुक्त कराकर वासुदेवजी कृष्ण को नंदगांव ले गए। मथुरा से नंदगांव 42 किलोमीटर दूर है। प्राचीन वृंदावन गोवर्धन के निकट था। बरसाना मथुरा से 50 किमी दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 किमी दूर उत्तर में स्थित है। नंदगांव तो बरसाने के बिलकुल पास है लेकिन वृंदावन से दूर।

Picture4

श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातियों के साथ नंदगांव से वृंदावन में आकर बस गए थे। विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है। यहां श्रीकृष्‍ण ने कालिया का दमन किया था।

रासलीला : मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है। कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने ही कविताएं लिखी हैं। उनमें कितनी सच्चाई है? इतिहासकार मानते हैं कि एक सच को इतना महिमामंडित किया गया कि अब वह कल्पनापूर्ण लगता है। कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।

विशाल तमाल वृक्ष के नीचे होता था महारास

raas-leela-QI90_l

  • भगवान श्री कृष्ण और राधा अक्सर यमुना तट पर बांके बिहारी मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर बसे निधि वन में मिला करते थे।
  • इस स्थान पर भगवान ने महारास का आयोजन किया था।
  • इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऎसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो।
  • माना जाता है कि नृत्य मुद्रा में मौजूद वृक्ष गोपियां हैं हो हर रात मनुष्य रूप धारण कर कृष्ण संग रास का आनंद लेती हैं।

इसी वन में मौजूल तमाल का एक वृक्ष था जिसके करीब राधा कृष्ण मिलते थे। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद राधा इसी वृक्ष को कृष्ण समझकर इसका आलिंगन किया करती थी

Picture11

आज का हरियाणा पहले कुरूक्षेत्र हुआ करता था, इसमें जब राधा कृष्ण का मिलन हुआ था तब राधा अपने साथ वह वृक्ष लेकर कुरूक्षेत्र गई थी। कुरूक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर के पास आज भी तमाल का वह वृक्ष मौजूद है। हालांकि कुरूक्षेत्र स्थान आज भी मौजूद है ब्रज से दूर।

जहां पर राधा ने कृष्ण को प्रेम की भिक्षा दी थी वह स्थान नंद गांव से कुछ दूरी पर स्थित जावट गांव है।

राधा का कृष्ण से विरह क्यों… पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणि का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थीं। राधाजी के जन्म में और देवी रुक्मणि के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणि का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणि से कृष्णजी की शादी हुई। राधा और रुक्मणि यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।

रामचरित मानस के बालकांड में जैसा कि तुलसीदासजी ने लिखा है कि नारदजी को यह अभिमान हो गया था कि उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है। नारदजी की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक नगर का निर्माण किया। उस नगर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर में नारद मुनि भी पहुंचे और कामदेव के बाणों से घायल होकर राजकुमारी को देखकर मोहित हो गए।

राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन करने लगे कि प्रभु मुझे आप अपना सुंदर रूप प्रदान करें, क्योंकि मुझे राजकुमारी से प्रेम हो गया है और मैं उससे विवाह की इच्छा रखता हूं। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान मुस्कुराए और कहा तुम्हें विष्णु रूप देता हूं। जब नारद विष्णु रूप लेकर स्वयंवर में पहुंचे तब उस राजकुमारी ने विष्णुजी के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से दु:खी होकर चले आ रहे थे। मार्ग में उन्हें एक जलाशय दिखा जिसमें उन्होंने चेहरा देखा तो वे समझ गए कि विष्णु भगवान ने उनके साथ छल किया है और उन्हें वानर रूप दिया है।

नारदजी क्रोधित होकर वैकुंठ पहुंचे और भगवान को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें पत्नी का वियोग सहना होगा, यह श्राप दिया। नारदजी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्रजी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का।

इस तरह राधा ही श्रीकृष्ण की प्रथम प्रेयसी

Picture9

“कुरूक्षेत्र तो थोडा सा दूर हतो, रास वृंदावन में रचतो” ऎसा कहते हैं ब्रज के ग्रामीण। देवी राधा भगवान श्री कृष्ण की प्रथम प्रेयसी थी। यही कारण है कि कृष्ण को रूक्मिणी से अधिक राधा प्रिय थीं। इनके प्रेम की एक अद्भूत कथा है कि कि एक बार कृष्ण रूक्मिणी के साथ कुरूक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने पहुंचे। वहां उनकी भेंट राधा और नंद बाबा से हुई। रूक्मिणी ने राधा का खूब स्वागत किया। रात के समय जब रूक्मिणी कृष्ण के पांव दबा रही थी तब उन्होंने देखा कि श्री कृष्ण के पांव में छाले पड़े हुए हैं। रूक्मिणी को बहुत हैरानी हुई क्योंकि कृष्ण नंगे पांव नहीं चलते फिर छाले कैसे पड़े। रूक्मिणी ने जब छाले का कारण पूछा तो कृष्ण ने कहा कि तुमने जो गर्म दूध राधा को दिया था उससे यह छाले हो गये हैं। कृष्ण ने रूक्मिणी से कहा कि राधा और कृष्ण अलग-अलग नहीं हैं। राधा कृष्ण की आत्मा हैं और हमेशा ह्वदय निवास करती हैं।

एक बार राधा की ओर से सांसारिक विवाह करने की इच्छा प्रकट करने पर कृष्ण ने राधा को भी यही उत्तर दिया था कि राधा और कृष्ण अलग-अलग नहीं हैं अत: सांसारिक विवाह कैसे कर सकते हैं। विवाह दो अलग-अलग लोगों के बीच होता है। यही कारण है कि राधा और कृष्ण का अलौकिक विवाह हुआ था। इन दोनों का सांसारिक विवाह नहीं हुआ।

राधा की कृष्ण से एक और मुलाकात…

Picture6

कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेमभाव में और भी वृद्धि हुई। जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलता और दुर्लभ हो गया। राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं। राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थी। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है।

कृष्ण से पहले इसलिए लिया जाता है राधा का नाम

Picture2

भगवान श्री कृष्ण के नाम से पहले हमेशा भगवती राधा का नाम लिया जाता है। कहते हैं कि जो व्यक्ति राधा का नाम नहीं लेता है सिर्फ कृष्ण-कृष्ण रटता रहता है वह उसी प्रकार अपना समय नष्ट करता है जैसे कोई रेत पर बैठकर मछली पकड़ने का प्रयास करता है। श्रीमद् देवीभाग्वत् नामक ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जो भक्त राधा का नाम लेता है भगवान श्री कृष्ण सिर्फ उसी की पुकार सुनते हैं। इसलिए कृष्ण को पुकारना है तो राधा को पहले बुलाओ। जहां श्री भगवती राधा होंगी वहां कृष्ण खुद ही चले आएंगे।

पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि राधा उनकी आत्मा है। वह राधा में और राधा उनमें बसती है। कृष्ण को पसंद है कि लोग भले ही उनका नाम नहीं लें लेकिन राधा का नाम जपते रहें। इस नाम को सुनकर भगवान श्री कृष्ण अति प्रसन्न हो जाते हैं। इसका उल्लेख श्री कृष्ण जी ने नारद से किया है। इस संदर्भ में कथा है कि व्यास मुनि के पुत्र शुकदेव जी तोता बनकर राधा के महल में रहने लगे। शुकदेव जी हमेशा राधा-राधा रटा करते थे। एक दिन राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से तुम सिर्फ कृष्ण-कृष्ण नाम जपा करो। शुकदेव जी ऐसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोता भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे।

राधा की सखी सहेलियों पर भी कृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था। एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी नारद जी बीच आ गए। कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है। कृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है।

कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा की आंखें भर आईं। महल लौटकर राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा-राधा ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का। राधा कृष्ण की तरह सीता का नाम भी राम से पहले लिया जाता है। असल में राम और कृष्ण दोनों ही एक हैं और राधा एवं सीता भी एक हैं। यह हमेशा नित्य और शाश्वत हैं। क्योंकि यही लक्ष्मी और नारायण रूप से संसार का पालन करते हैं। नारायण लक्ष्मी से अगाध प्रेम करते हैं। यह हमेशा अपने हृदय में बसने वाली राधा का नाम सुनना चाहते हैं। इसलिए ही कृष्ण नाम से पहले राधा नाम लिया जाता है।

इन पर्वतों पर गोपियों के साथ कृष्ण करते थे रासलीला, मौजूद हैं पैरों के निशान

image006

कृष्ण की बांसुरी की धुन पर सिर्फ ब्रज की गोपियां ही फिदा नहीं थीं, ये पहाड़-पर्वत भी उनकी बांसुरी की धुन पर मोहित थे। यहां कृष्ण अपने सखाओं के साथ गाय भी चराने जाते थे। इस दौरान वहां घंटों बैठकर बांसुरी बजाया करते थे। इसकी धुन इतनी मीठी और मोहक होती थी कि ये पर्वत भी पिघल जाते थे। यहां मौजूद उनके पैरों के निशान इस बात की तस्दीक करते हैं।

पांच हजार साल पुराने हैं ये पर्वत- ब्रज रक्षक दल के विनीत नारायण कहते हैं कि ये पहाड़-पर्वत करीब पांच हजार साल पुराने हैं। इतने साल बाद भी यहां भगवान कृष्ण के पैरों के निशान साफ तौर पर दिखाई देते हैं। नंदगांव में स्थित ‘चरण पहाड़ी’ बाल स्‍वरूप कृष्‍ण की लीला की गवाह है। यहां कृष्ण के आलता लगे पैरों के निशान आज भी मौजूद हैं।

देवताओं ने जताई थी रासलीला देखने की इच्छा- ब्रज के नंदगांव में कृष्ण ने कई लीलाएं की थी। इन पहाड़-पर्वतों के पास वह गोपियों के साथ रास भी रचाते थे। एक बार सभी देवताओं ने भगवान कृष्‍ण से रासलीला देखने की इच्‍छा जताई। इस पर उन्होंने कहा कि सिर्फ गोपियां ही उनकी रासलीला देख सकती हैं। यदि आप लोगों को रासलीला देखनी है, तो ब्रज में जाकर पर्वत बन जाइए। जब वह गोपियों के साथ रासलीला करेंगे, तो आप उसको देख सकेंगे।

पर्वत बनकर देवताओं ने देखी रासलीला- इसके बाद देवताओं ने पर्वतों का रूप धारण कर लिया। उन्होंने कृष्ण की रासलीला देखी। कहा जाता है कि रासलीला करते वक्त उनके पैरों के निशान यहां पड़े थे। इसलिए इनमें से एक पर्वत को अब ‘चरण पहाड़ी’ के रूप में जाना जाता है।

यहां राधा ने कृष्ण को स्पर्श करने से किया था मना, अपने कंगन से बना दिया था कुंड

Picture5

कृष्ण कुंड की कथा- माना जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे राक्षस अरिष्टासुर का वध कर दिया। उसके बाद उन्होंने राधा को स्पर्श कर लिया। तब राधा जी उनसे कहने लगी की आप कभी मुझे स्पर्श मत कीजिएगा, क्योंकि आपके सिर पर गौ हत्या का पाप है। आपने मुझे स्पर्श कर लिया है और मैं भी गौ हत्या के पाप में भागीदार बन गई हूं। यह सुनकर श्रीकृष्ण को राधाजी के भोलेपन पर हंसी आ गई। उन्होंने कहा राधे मैंने बैल का नहीं, बल्कि असुर का वध किया है।

तब राधाजी बोलीं आप कुछ भी कहें, लेकिन उस असुर का वेष तो बैल का ही था। इसलिए आपको गौ हत्या के पापी हुए। यह बात सुनकर गोपियां बोली प्रभु जब वत्रासुर की हत्या करने पर इन्द्र को ब्रह्मा हत्या का पाप लगा था तो आपको पाप क्यों नहीं लगेगा। श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले अच्छा तो आप सब बताइए कि मैं इस पाप से कैसे मुक्त हो सकता हूं। तब राधाजी ने अपनी सखियों के साथ श्रीकृष्ण से कहा जैसा कि हमने सुना है कि सभी तीर्थों में स्नान के बाद ही आप इस पाप से मुक्त हो सकते हैं।

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपने पैर को अंगूठे को जमीन की ओर दबाया। पाताल से जल निकल आया। जल देखकर राधा और गोपियां बोली हम विश्वास कैसे करें कि यह तीर्थ की धाराओं का जल है। उनके ऐसा कहने पर सभी तीर्थ की धाराओं ने अपना परिचय दिया। इस तरह कृष्ण कुंड का निर्माण हुआ।

राधा कुंड की कथा – जब श्रीकृष्ण ने राधाजी और गोपियों को उस कुंड में स्नान करने को कहा तो वे कहने लगीं कि हम इस गौ हत्या लिप्त पाप कुंड में क्यों स्नान करें। इसमें स्नान करने से हम भी पापी हो जाएंगे। तब श्री राधिका ने अपनी सखियों से कहा कि सखियों हमें अपने लिए एक मनोहर कुंड तैयार करना चाहिए। उस कृष्ण कुंड की पश्चिम दिशा में वृष भासुर के खुर से बने एक गड्ढे को श्री राधिका ने खोदना शुरु किया। गीली मिट्टी को सभी सखियों और राधाजी ने अपने कंगन से खोदकर एक दिव्य सरोवर तैयार कर लिया।

Picture6

कृष्ण जी ने राधा जी से कहा तुम मेरे कुंड से अपने कुंड में पानी भर लो। तब राधा जी ने भोलेपन से कहा नहीं कान्हा आपके सरोवर का जल अशुद्ध है। हम घड़े-घड़़े करके मानस गंगा के जल से इसे भर लेंगे। राधा जी और सखियों ने कुंड भर लिया, लेकिन जब बारी तीर्थों के आवाहन की आई तो राधा जी को समझ नहीं आया वे क्या करें। उस समय श्रीकृष्ण के कहने पर सभी तीर्थ वहां प्रकट हुए और राधाजी से आज्ञा लेकर उनके कुंड में विद्यमान हो गए। यह देखकर राधा जी कि आंखों से आंसू आ गए और वे प्रेम से श्रीकृष्ण को निहारने लगी।

भगवान कृष्ण की 16108 पत्नियों का राज…

8 wives (2)

कहते हैं कि भगवान कृष्ण की 16,108 पत्नियां थीं। क्या यह सही है? इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं और लोगों में इसको लेकर जिज्ञासा भी है। आइए, जानते हैं कि कृष्ण की 16,108 पत्नियां होने के पीछे राज क्या है।

परब्रह्म की सम्पूर्ण कलाओं के साथ अवतरित हुए भगवान कृष्ण की 16,100 रानियां तथा 8 पटरानियां थी। जहां एक और महाभारत में सभी रानियों और पटरानियों से विवाह की कथा दी गई हैं वहीं शास्त्रकार इन कथाओं में छिपे गूढ़ रहस्य को बताते हैं। उनके अनुसार कृष्ण का अर्थ हैं अंधकार में विलीन होने वाले, सम्पूर्ण को अपने में समा लेने वाला। इसी भांति राधा शब्द भी धारा का उल्टा है। जहां धारा किसी स्रोत से बाहर आती है वहीं राधा का अर्थ है वापिस अपने स्रोत में समाना। यही कारण है कि बिना विवाह के भी राधाकृष्ण युगल को हिंदू धर्मों में शिव-पार्वती जैसी पवित्र भावना के साथ देखा जाता है। राधाकृष्ण वस्तुत कोई युगल (दो भिन्न स्त्री-पुरुष) है ही नहीं, वरन स्वयं में ध्यानलीन होना ही है।

कृष्ण की 16,100 रानियां महाभारत तथा अन्य शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की 8 पटरानियां एवं 16,100 रानियां थीं। विद्वानों के अनुसार कृष्ण की प्रमुख रानियां तो आठ ही थीं, शेष 16,100 रानियां प्रतीकात्मक थीं। इन 16,100 रानियों को वेदों की ऋचाएं माना गया है। ऐसा माना जाता है चारों वेदों में कुल एक लाख श्लोक हैं। इनमें से 80 हजार श्लोक यज्ञ के हैं, चार हजार श्लोक पराशक्तियों के हैं। शेष 16 हजार श्लोक ही गृहस्थों या आम लोगों के उपयोग के अर्थात भक्ति के हैं। जनसामान्य के लिए उपयोगी इन ऋचाओं को ही भगवान श्रीकृष्ण की रानियां कहा गया है।

आठ पटरानियों के ये हैं रहस्य भगवान कृष्ण की पटरानियां वस्तुतः आठ ही थी। इनके नाम रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रवृंदा, सत्या, रोहिणी तथा लक्ष्मणा हैं।

  1. कृष्ण की प्रमुख पटरानी के रूप में रूक्मिणी का नाम लिया जाता है। वह विदर्भ देश की राजकुमारी थी तथा मन ही मन कृष्ण को अपना पति मानती थी। इनका प्रेमपत्र पढ़ने के बाद कृष्ण ने इनका अपहरण कर रूक्मिणीजी से विवाह कर लिया था।
  2. सूर्यपुत्री कालिन्दी कृष्ण की दूसरी पत्नी थी। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर कृष्ण ने इनसे विवाह किया था।
  3. कृष्ण की तीसरी पत्नी उज्जैन की राजकुमारी मित्रवृंदा थी, कृष्ण ने इन्हें स्वयंवर में विजेता बनकर अपनी पटरानी बनाया था। इन्हें स्वयंवर में भाग लेकर कृष्ण ने अपनी रानी बनाया था।
  4. चौथी पटरानी सत्या राजा नग्नजित की पुत्री थी। इनके पिता की शर्त के मुताबिक कृष्ण ने सात बैलों को एकसाथ नथ कर इनसे विवाह किया था।
  5. पांचवी पटरानी के रूप में कृष्ण यक्षराज जाम्बवंत की कन्या जामवन्ती को ब्याह कर लाए थे।
  6. गय देश के राजा ऋतुसुकृत की पुत्री रोहिणी ने कृष्ण को स्वयंवर में वर कर विवाह किया था।
  7. कृष्ण की सातवीं रानी सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री थी। उन्होंने कृष्ण तथा यादव राजवंश से मधुर संबंध बनाने के लिए ही अपनी पुत्री का विवाह कृष्ण से किया था।
  8. कृष्ण की आठवीं पटरानी लक्ष्मणा ने भी स्वयंवर में ही कृष्ण को अपना पति मानकर उनसे विवाह किया था।

महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था- विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा।

पांडवों के लाक्षागृह से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर सात्यिकी आदि यदुवंशियों को साथ लेकर श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ गए। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुंती ने उनका आतिथ्‍य-पूजन किया।

इस प्रवास के दौरान एक दिन अर्जुन को साथ लेकर भगवान कृष्ण वन विहार के लिए निकले। जिस वन में वे विहार कर रहे थे वहां पर सूर्य पुत्री कालिन्दी, श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया।

फिर वे एक दिन उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाए। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एकसाथ नाथ कर उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात उनका कैकेय की राजकुमारी भद्रा से विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा भी कृष्ण को चाहती थी, लेकिन परिवार कृष्ण से विवाह के लिए राजी नहीं था तब लक्ष्मणा को श्रीकृष्ण अकेले ही हरकर ले आए।

कृष्ण की आठ पत्नियां थी- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।

कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।

इंद्र ने कहा, भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दरी कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।

इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।

मुर दैत्य के वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।

इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर के द्वारा हरण कर लाई गईं 16,100कन्याओं को श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया।

ये सभी अपहृत नारियां थीं या फिर भय के कारण उपहार में दी गई थीं और किसी और माध्यम से उस कारागार में लाई गई थीं। वे सभी भौमासुर के द्वारा पीड़ित थीं, दुखी थीं, अपमानित, लांछित और कलंकित थीं।

सामाजिक मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रपूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहती थीं।

भागवत पुराण में बताया गया है कि भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को समुद्र से निकाला था। इसके बाद भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पिता एक दैवीशक्ति और माता पुण्यात्मा होने पर भी पर भौमासुर क्रूर निकला। वह पशुओं से भी ज्यादा क्रूर और अधमी था। उसकी करतूतों के कारण ही उसे नरकासुर कहा जाने लगा।

नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर इंद्र को उसकी नगरी से बाहर निकाल दिया था। नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे। वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था। वह पृथ्वी की हजारों सुन्दर कन्याओं का अपहरण कर उनको बंदी बनाकर उनका शोषण करता था।

नरकासुर अपने मित्र मुर और मुर दैत्य के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण के साथ रहता था। भगवान कृष्ण ने सभी का वध करने के ‍बाद नरकासुर का वध किया और उसके एक पु‍त्र भगदत्त को अभयदान देकर उसका राजतिलक किया।

श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने लगी। मान्यता है कि नरकासुर की मृत्यु होने से उस दिन शुभ आत्माओं को मुक्ति मिली थी।

नरक चौदस के दिन प्रातःकाल में सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर नीम, चिचड़ी जैसे कड़ुवे पत्ते डाले गए जल से स्नान का अत्यधिक महत्व है। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने घरों के दरवाजों पर चौदह दीये जलाकर दक्षिण दिशा में उनका मुख करके रखते हैं तथा पूजा-पाठ करते हैं।

रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण को लिखा था दुनिया का प्रथम प्रेम पत्र

श्रीमद् भागवत गीता में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी की दिलचस्प प्रेम कहानी का वर्णन मिलता है। शिशुपाल से विवाह तय होने पर रुक्मिणी जी का दिल टूट गया था। विवाह से एक रात पूर्व उन्होंने श्रीकृष्ण के लिए एक खत लिखा था जिसमें उन्होंने अपना प्रेम व्यक्त। किया था। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण कन्या सुनन्दा के हाथ श्रीकृष्ण को ये प्रेम पत्र भिजवाया था। इस पत्र में रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण‍ से उनके विवाह से पूर्व आकर उन्हें ले जाने का भी आग्रह किया था। वहीं दूसरी ओर श्रीकृष्ण ने भी रुक्मिणी जी के सौंदर्य के बारे में खूब चर्चाएं सुनीं थीं। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी जी को अपनी पत्नी बनाना चाहते थे लेकिन कंस और जरासंध से रुक्मिणी जी के परिवार के मैत्री संबंध थे जिस कारण वे कभी भी श्रीकृष्ण को नहीं अपनाते। बस इसी बात से कृष्ण जी ने रुक्मिणी जी के घर विवाह का प्रस्ताव नहीं भेजा था। तब एक बॉलीवुड फिल्म की तरह कृष्ण जी ने रुक्मिणी को उनके घर से भगाया था। इस काम में उनके भाई बलराम ने उनकी सहायता की थी। बलराम ने अपनी सेना के साथ रुक्मी से युद्ध किया था। विवाह के दौरान जब बारात उनके द्वार पर खड़ी थी तभी श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी का अपहरण कर लिया था। तब क्रोधित होकर रुक्मी, श्रीकृष्ण का वध करने के लिए उनसे युद्ध करने निकल पड़ा था। रुक्मिणी जी के अपहरण के बाद रुक्मी और श्रीकृष्ण के मध्य युद्ध हुआ था जिसमें कृष्ण जी को विजय प्राप्त हुई थी। रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण से आग्रह किया था कि वे उनके परिवार को जीवन दान दें। भगवान कृष्ण ने ये बात स्वीकार करते हुए रुक्मी का वध नहीं किया था लेकिन उन्होंनें उस पर दो बाण जरूर चलाए थे जिससे उसके आधे बाल और आधी मूंछ कट गई थी। रुक्मि को ये अपमान सहन नहीं हुआ था। युद्ध के पश्चात् श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी से विवाह कर द्वारका की ओर प्रस्थान किया था। शास्त्रों में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के इस विवाह को राक्षस विवाह का स्थान दिया गया है।

रुक्मिणी जी ने भगवान् श्रीकृष्ण को एक प्रेमपत्र भेजा जिसकी चर्चा भागवत दशम स्कन्ध में है…

“सोपश्रुत्य मुकुन्दस्य रूपवीर्यगुणश्रियः |

गृहागतैर्गीयमानास्तं मेने सदृशं पतिम् ||–भा.पु. १०/५२/२३,

उनकी इस भावना का सम्मान उनके माता पिता आदि ने भी किया,  किन्तु उनका भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से द्वेष के कारण उन्हे रोककर अयोग्य शिशुपाल के साथ उनका विवाह करना चाहा —

“बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप |

ततो निवार्य कृष्णद्विड्रुक्मी चैद्यममन्यत ||-१०/५२/२५,

इस बात से रुक्मिणी जी का मन बड़ा खिन्न हुआ और उन्होंने भगवान् कृष्ण के पास पत्र देकर एक ब्राह्मण को भेजा —

“तदवेत्यासितापाङ्गी वैदर्भी दुर्मना भृशम् |

विचिन्तयाSSप्तं द्विजं कञ्चित् कृष्णाय प्राहिणोद्द्रुतम् ||१०/५२/२६,

रुक्मिणी जी अपने पत्र के ३९वें श्लोक में यह स्पष्ट लिखती हैं कि ” हे प्रभो ! मैंने पतिरूप में आपको वरण कर लिया है अपने आपको आपको समर्पित कर दिया है | आप आकर मुझे अपनी पत्नी बना लें, हे कमलनयन ! जैसे सिंह के भाग को सृगाल ( सियार ) नहीं स्पर्श कर सकता, वैसे ही मुझे सृगालवत् तुच्छ शिशुपाल स्पर्श न कर सके —

तन्मे भवान्खलु वृतः पतिरङ्ग जायामात्माSर्पितश्च भवतोSत्र विभो विधेहि |

मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्यआराद्गोमायुवन्मृगपतेर्बलिमम्बुजाक्ष || –१०/५२/३९,

–इस पंक्ति से स्पष्ट हो रहा है कि ” रुक्मिणी जी को अयोग्य वर के हाथ में सौंपने का निश्चय रुक्मी के कारण सब लोग कर चुके थे , अत एव उन्होंने पूर्व निर्णीत पतिरूप में स्वीकृत श्रीकृष्ण के पास पत्र भेजा और इस स्थिति में प्रत्येक कन्या ऐसा कर सकती है —

” अयोग्यं दातुमुद्युक्ते पित्रादौ कन्यका स्वयम् |

योग्यं पतिं प्रवृण्वीत न च सा दोषभागिनी ” ||–१०/५२/३९,

अर्थ –यदि माता पिता आदि अयोग्य लड़के को कन्या देने को तैयार हो जांय तो कन्या को चाहिए कि वह स्वयं योग्य पति का वरण कर ले | ऐसा करने पर वह दोषी नही मानी जा सकती |–यह वरतन्तु ऋषि का वचन है और इसे भागवत की श्रीधरी पर वंशीधरी टीका लिखने वाले श्रीवंशीधर जी ने उद्धृत भी किया है |

कृष्ण का सबसे बड़ा ‘रहस्य’… ‘निधिवन’

Nidhivan-Vrindavan

बहुत रहस्यमयी है ये महल, यहां रोज आते हैं कृष्ण छोड़ जाते हैं निशानियां

  • यह स्थान वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर यमुना तट पर बसा निधिवन है। माना जाता है कि यह वही वन है जहां भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला का आयोजन किया था। इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो।
  • मान्यता है कि यह वृक्ष गोपियां हैं जो रात के समय मनुष्य रूप लेकर श्री कृष्ण के साथ रास का आनंद लेती हैं। इस वन की विशेषता है कि शाम ढ़लते ही सभी पशु-पक्षी वन से निकलकर भाग जाते हैं। इस वन के बीचों-बीच एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर में हर दिन भगवान की सेज सजाई जाती है और श्रृंगार साम्रगी रख दी जाती है।
  • मान्यता है कि देवी राधा श्रृंगार सामग्री से अपना श्रृंगार करती हैं और भगवान श्री कृष्ण देवी राधा के साथ सेज पर विश्राम करते हैं। अगले दिन भक्तगण इस श्रृंगार सामग्री और सिंदूर को प्रसाद स्वरूप पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं।

image009

वृंदावन और मथुरा का नाम आते ही दिल और दिमाग में सबसे पहले कृष्ण जी की सुंदर छवि आती है। मथुरा को कृष्ण की जन्म स्थली और नंदगांव को उनका लीला स्थल, बरसाने को राधा जी की नगरी कहा जाता है। वहीं वृंदावन को श्रीकृष्ण और राधा की रास स्थली कहा जाता है।वृंदावन में वैसे तो अनेक मंदिर हैं, लेकिन सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र यहां निधि वन को माना जाता है।

रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण?

  • धार्मिक नगरी वृंदावन में निधि वन एक बहुत ही रहस्यमयी स्थान है।
  • मान्यता है कि निधि वन में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा आज भी अद्र्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं।
  • रास के बाद निधि वन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं।

धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है।

05-Nidhi-Van

  • शयन के लिए पलंग लगाया जाता है… सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं।
  • निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है। निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके।

सुबह मिलती है गीली दातून

  • इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं। और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।
  • इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो।

ये है रंग महल की विशेषताएं- रंगमहल में रोज रात को श्रीकृष्ण और राधा के लिए पलंग लगाया जाता है। कहा जाता है कि रात्रि में श्रीकृष्ण और राधाजी आज भी यहां शयन शयन करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया था। साथ ही, श्रृंगार सामग्री भी बिखरी हुई मिलती है। रात को जो भोग रखा जाता है। वह भी अस्त-व्यस्त मिलता है।

निधिवन क्यों है खास- लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन को श्रीकृष्ण-राधा और गोपियों के रास क्षेत्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में अनेक वृक्ष हैं।

Picture1

इन सारे पेड़ों की खासियत है कि वृक्षों इनमें से किसी भी वृक्ष के तना सीधा नहीं मिलेगा।

इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी और आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि निधिवन का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16000 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16000 हजार रानियां हैं, लेकिन वास्तविकता में इन पेड़ों की संख्या इतनी नहीं है।

मंदिर से जुड़ी हैं कुछ अनोखी ही मान्यताएं- कोई माने या न माने, लेकिन यहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि निधिवन में हर रात आज भी राधा-कृष्ण आते हैं। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। मान्यता है कि रात में यदि कोई निधिवन में रह जाए तो श्रीकृष्ण की रासलीला देखकर वह अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते हैं। वे सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

निधिवन के रहस्य का असली कारण

3368458522_784196d054

  • वास्तु गुरु कुलदीप सालूजा बताते हैं कि, सच तो यह है, कि निधिवन का वास्तु ही कुछ ऐसा है, जिसके कारण यह स्थान रहस्यमय-सा लगता है और इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने स्वार्थ के खातिर इस भ्रम तथा छल को फैलाने में वहां के पंडे-पुजारी और गाईड लगे हुए हैं, जबकि सच इस प्रकार है – अनियमित आकार के निधिवन के चारों तरफ पक्की चारदीवारी है। परिसर का मख्यद्वार पश्चिम दिशा में है।
  • परिसर का नऋत्य कोण बढ़ा हुआ है और पूर्व दिशा तथा पूर्व ईशान कोण दबा हुआ है। गाइर्ड जो 16000 वृक्ष होने की बात करते हैं वह भी पूरी तरह झूठ है क्योंकि परिसर का आकार इतना छोटा है कि 1600 वृक्ष भी मुश्किल से होंगे और छतरी की तरह फैलाव लिए हुए कम ऊँचाई के वृक्षों की शाखाएं इतनी मोटी एवं एवं मजबूत भी नहीं है कि दिन में दिखाई देने वाले बंदर रात्रि में इन पर विश्राम कर सकें इसी कारण वह रात्रि को यहाँ से चले जाते हैं।

इसलिए मिलती है गीली दातून

  • इस परिसर की चारदीवारी लगभग 10 फीट ऊंची है और बाहर के चारों ओर रिहायशी इलाका है जहां चारों ओर दो-दो, तीन-तीन मंजिला ऊँचे मकान बने हुए है और इन घरों से निधिवन की चारदीवार के अन्दर के भाग को साफ-साफ देखा जा सकता है। वह स्थान जहाँ रात्रि के समय रासलीला होना बताया जाता है वह निधिवन के मध्य भाग से थोड़ा दक्षिण दिशा की ओर खुले में स्थित है।
  • यदि सच में रासलीला देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा हो जाए या मर जाए तो ऐसी स्थिति में निश्चित ही आस-पास के रहने वाले यह इलाका छोड़कर चले गए हाते। निधिवन के अन्दर जो 15-20 समाधियां बनी हैं वह स्वामी हरिदास जी और अन्य आचार्यों की समाधियां हैं जिन पर उन आचार्यों के नाम और मृत्यु तिथि के शिलालेख लगे है। इसका उल्लेख निधिवन में लगे उत्तरप्रदेश पर्यटन विभाग के शिलालेख पर भी किया गया है।
  • इन्हीं समाधियों की आड़ में ही गाईड यह भम्र फैलाते है कि जो रासलीला देख लेता है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है और यह सभी उन्हीं की समाधियां हैं। रंगमहल के अन्दर जो दातून गीली और सामान बिखरा हुआ मिलता है। यह भ्रम इस कारण फैला हुआ है कि रंग महल के नैऋत्य कोण में रंग महल के अनुपात में बड़े आकार का ललित कुण्ड है जिसे विशाखा कुण्ड भी कहते हैं।
  • जिस स्थान पर नैऋत्य कोण में यह स्थिति होती है वहां इस प्रकार का भ्रम और छल आसानी से निर्मित हो जाता है। यहां जो वृक्ष आपस में गुंथे हुए हैं इसी प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में सेवाकुंज एवं यमुना के तटीय स्थानों पर भी देखने को मिलते है।

निधिवन के प्रसिद्घ होने के कारण

  • कुलदीप सालूजा कहते हैं कि, वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी स्थान की प्रसिद्धि के लिए उसकी उत्तर दिशा में नीचाई होना आवश्यक होता है और यदि इस नीचाई के साथ वहां पानी भी आ जाता है तो पानी प्रसिद्धि को बढ़ाने में बूस्टर की तरह काम करता है। विश्व में जो भी स्थान प्रसिद्धि प्राप्त किया हुआ है उसकी उत्तर दिशा में नीचाई के साथ-साथ भारी मात्रा में पानी का जमाव या बहाव अवश्य होता है।
  • यदि उत्तर दिशा के साथ पूर्व दिशा और ईशान कोण में नीचाई एवं पानी आ जाए तो यह सभी मिलकर उस स्थान को और अधिक प्रसिद्धि दिलाने के साथ-साथ आस्था बढ़ाने में भी सहायक होता है। यहां यमुना नदी वृंदावन की उत्तर दिशा से पूर्व दिशा की ओर घुमकर दक्षिण दिशा की ओर निकल गई है। वृंदावन की उत्तर दिशा में यमुना नदी के होने से वृन्दावन प्रसिद्ध है।
  • और निधिवन वृन्दावन नगर के उत्तरी भाग में स्थित है जहां से यमुना नदी लगभग 300 मीटर दूरी पर स्थित है। उत्तर दिशा की वास्तुनुकूलता के कारण निधिवन प्रसिद्ध है। इसी के साथ निधिवन परिसर को उत्तर ईशान, पूर्व ईशान और दक्षिण आग्नेय का मार्ग प्रहार हो रहा है। यह सभी शुभ मार्ग प्रहार है जो निधिवन परिसर की प्रसिद्धि बढ़ाने में सहायक हैं।

निधिवन में रात को कोई नहीं जाता

निधि शब्द का अर्थ सूरत क्रीड़ा से है। ग्रंथों के अनुसार निशातकाल में निधुवन के केलिकुंज में युगल (राधाकृष्ण) का शयन विलास होता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अ‌र्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है तथा प्रात: बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहा निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद (माखन मिश्री) भी ग्रहण किया है। रात्रि के समय निधिवन में कोई प्राणी नहीं रहता है, पशु-पक्षी भी नहीं। लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात्रि में रुक जाता है और भगवान की क्रीड़ा का दर्शन कर लेता है, तो सासारिक बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे उदाहरण विगत कई वर्षों में देखने में भी आये हैं।

विशाखा कुंड–

92998118

निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल–

विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे, जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी। बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं।

स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है। जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

निधिवन कहने से सहसा किसी वन का दृश्य मस्तिष्क में आ जाता है, वास्तव में यहा आने पर वन जैसा ही दृश्य देखने को मिलते हैं, यहा के वृक्ष आज भी अपनी पौराणिकता को दर्शाते हैं। इन वृक्षों को देखने से आभास होता है कि यह अति प्राचीनकाल से स्थापित वृक्ष हैं। इस प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में निधिवन, सेवाकुंज एवं तटियस्थान पर ही देखने को मिलते हैं, इन वृक्षों की खासियत है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिल पायेंगे तथा इन वृक्षों की डालिया नीचे की ओर झुकी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि ये वृक्ष भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में हमेशा झुके रहते हैं। इन वृक्षों के बारे में शास्त्रों गोपी रूप से वर्णन किया गया है।

image011

इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी और आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि निधिवन का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16000 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16000 हजार रानियां हैं, लेकिन वास्तविकता में इन पेड़ों की संख्या इतनी नहीं है।

Raas Lila

मंदिर से जुुड़ी हैं कुछ अनोखी ही मान्यताएं

कोई माने या न माने, लेकिन यहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि निधिवन में हर रात आज भी राधा-कृष्ण आते हैं। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। मान्यता है कि रात में यदि कोई निधिवन में रह जाए तो श्रीकृष्ण की रासलीला देखकर वह अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते हैं। वे सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

फिल्मों में कृष्ण

श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम

DarlingxofxVrindavan_front

यदि भारतीय फिल्म के नायकों की भूमिका को गौर से देखा जाए तो वह काफी कुछ श्रीकृष्ण से मिलती-जुलती है। कृष्ण की तरह बॉलीवुड की फिल्मों का नायक गोपियों से रास लीला रचाता है। अन्याय के विरूद्ध लड़ता है। लाचारों का साथ देता है और दुश्मनों को उनके किए की सजा देता है।

भारत में जब से फिल्म बनना शुरू हुई तब से कुछ वर्ष पूर्व तक बॉलीवुड की फिल्मों में ऐसे ही नायक हुआ करते थे। कई फिल्मों के नायक या नायिकाओं में हमें श्रीकृष्ण, राधा या मीरा की झलक मिलती थी।

आज परिस्थिति बदल गई है। अब नायक खलनायक बन गया है। वह तमाम ऐसी हरकतें करता हैं जो एक नायक नहीं करता। उसमें कृष्ण के बजाय कंस के गुण पाए जाते हैं।

इसी तरह नायिका में राधा या मीरा की झलक दिखाई देना बंद हो गई। अब कृष्ण नाम का उपयोग दूसरे अर्थ में किया जाने लगा है। घर में राम गली में श्याम जैसे मुहावरे गढ़ लिए गए हैं। श्रीकृष्ण की छबि फिल्मों से ओझल होती जा रही है।

श्रीकृष्ण पर आधारित फिल्मों की शुरूआत फालके के जमाने से हुई थी। दादा साहेब फालके ने अपनी शुरूआती फिल्मों में पौराणिक विषय चुने थे ताकि दर्शकों की फिल्म में रूचि जागे। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में काफी उथल-पुथल रही। इसलिए फालके की शुरूआती फिल्म ‘बर्थ ऑफ श्रीकृष्णा’ (1918) और ‘कालिया मर्दन’ (1919) श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित रही। इन फिल्मों में उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन की झलकियों को प्रस्तुत किया।

कई मूक फिल्मों के विषय श्रीकृष्ण के जीवन के इर्दगिर्द रहें। बाद में फिल्म वालों ने श्रीकृष्ण के जीवन को आधार बनाकर कई फिल्मों का निर्माण किया। कृष्ण अर्जुन युद्ध (1934), कृष्ण-सुदामा (1947), कृष्ण रूक्मणि (1949), से जो सिलसिला चला तो वह ‘कृष्णा’ (2006) तक जारी है। ‘किस्ना’ और कृष’ जैसी फिल्में भी कृष्ण के नाम पर ही बनाई गई। कुछ एनिमेशमन मूवी भी आईं।

इसी तरह फिल्मी गानों में भी श्रीकृष्ण की गूँज वर्षों तक छाई रहीं। कई ऐतिहासिक फिल्मों में श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों और भजनों की रचना हुई। तब नायक आदर्श हुआ करते थे। फिल्में पारिवारिक हुआ करती थी। दर्शकों में श्रद्धा और आस्था जैसे गुण विद्यमान थे। इसलिए फिल्मकारों को ऐसी सिचुएशन मिल जाया करती थी कि वे श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों को रचे।

 ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’ (मुगले आजम), ‘जागो मोहन प्यारे’ (जागते रहो), ‘श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम’ (गीत गाता चल), ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ (कोहिनूर), ‘एक राधा एक मीरा’ (राम तेरी गंगा मैली), ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला’ (सत्यम शिवम सुंदरम), ‘मैया यशोदा ये तेरा कन्हैया’ (हम साथ साथ हैं) ‘राधा कैसे न जले’ (लगान) जैसे गीत आज भी बड़े चाव से चुने जाते हैं।

आजकल न इस तरह की फिल्म बनती है और न ही इस तरह के गीत रखने की सिचुएशन। आज इस तरह का गीत रख दिया जाए तो दर्शक पॉपकार्न खाने बाहर चला जाता है। कृष्णा के कभी-कभार दर्शन होते हैं, लेकिन कृष की तरह हाईटेक रूप में।

यशोमती मैया से बोले नन्दलाला:

बल्फ मास्टर-गोविंदा आला रे आला:

तीन बाती वाला गोविंदा आला:

शोर मच गया शोर देखो आया माखन चोर:

आया रे गोंविदा:

मोहे छेड़ो ना:

श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी को जानने के लिए 28 अगस्त 2013 का ब्लॉग पर रिसर्च पड़ सकते हैं…

Ancient City of Dwarka: श्रीकृष्ण की ‘द्वारका’… द्वारका का पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण

157343

Posted in News, Personality

किशोर कुमार- आवाज़ के जादूगर, कामेडी के सरताज… ज़िदादिल और मस्तमौला अंदाज़ के कुछ रोचक किस्से

‘बीच राह में दिलबर बिछड़ जाए कहीं हम अगर
और सूनी सी लगे तुम्हे जीवन की ये डगर
हम लौट आएंगे तुम यूं ही बुलाते रहना
कभी अलविदा ना कहना ‘

जिंदगी के अनजाने सफर से बेहद प्यार करने वाले हिन्दी सिने जगत के महान पार्श्व गायक किशोर कुमार का नजरिया उनकी गाई इन पंक्तियो में समाया हुआ है। हिन्दी सिनेमा जगत में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो किशोर कुमार से प्रभावित ना हो. यदि आप हिंदी गानों के शौकीन हैं और आपकी पसंदीदा लिस्ट में किशोर दा के गाने ना हों यह मुमकिन ही नहीं. चाहे आज की युवा पीढ़ी हो या अधेड़ उम्र के लोग सभी को किशोर दा बहुत पसंद हैं. अपनी गायिकी से किशोर दा ने ऐसा असर छोड़ा है कि लोग आज भी उनके गानों को उसी तरह पसंद करते हैं जैसा जब वह जीवित थे तब करते थे. 4 अगस्त को किशोर कुमार का जन्मदिन है.

Picture75

किशोर दा का जीवन

  • किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में एक बंगाली परिवार और वहां के जाने माने वकील कुंजीलाल गांगुली के यहाँ हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था।
  • किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई अशोक कुमार, बहन सती देवी, भाई अनूप कुमार।
  • उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुम्बई में एक अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे.
  • किशोर कुमार एक ऐसी शख्सियत थे, जिसमें बहुमुखी प्रतिभा होने के साथ वह सब था जिसकी वजह से लोग उन्हें महान मानते थे. एक गायक और अभिनेता होने के साथ किशोर कुमार ने लेखक, निर्देशक, निर्माता और संवाद लेखक तक की भूमिका निभाई.
  • सिर्फ हिन्दी ही नहीं बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़ जैसी कई फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा. एक बेहतरीन गायक होने के साथ किशोर कुमार को उनकी कॉमेडियन अदाकारी के लिए आज भी याद किया जाता है.

एक हादसे से पैदा हुई किशोर कुमार की ‘जादुई आवाज’

Picture2

अपनी जादुई आवाज से कई पीढ़ियों की रूह को छूने वाले किशोर कुमार के गले से बचपन में सही ढंग से आवाज नहीं निकलती थी, जिसे लेकर उनके माता-पिता परेशान रहते थे. उसी दौरान एक हादसे ने उनके भीतर एक ऐसी सुरीली आवाज पैदा कर दी जो आगे चलकर लोगों के जेहन में हमेशा के लिए घर कर गई.

किशोर कुमार के साथ काम कर चुके और उनके पारिवारिक मित्र रहे अभिनेता रजा मुराद ने यह जानकारी दी. मुराद का कहना है, ‘किशोर दा ने मुझे एक बार बताया था कि बचपन में उनकी आवाज गले से नहीं निकलती थी. इसको लेकर उनके माता-पिता परेशान रहते थे.’

उन्होंने कहा, ‘किशोर का पैर एक बार हंसिये पर पड़ गया और वह इतना रोए कि उनमें यह ‘जादुई आवाज’ पैदा हो गई. वह अपनी सुरीली आवाज के लिए इसी हादसे को श्रेय देते थे.

• हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार एकमात्र ऐसे गायक हैं, जिन्होंने आठ बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वद गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता. इसके अलावा उन्हें कई और पुरस्कार मिले.

किशोर कुमार का कॅरियर
बड़े भाई अशोक कुमार के फिल्मों में पैर जमाने के बाद छोटे भाई आभास यानी हमारे चहेते किशोर और मझले भाई अनूप बम्बई (मुम्बई) आ गए आभास की उम्र 18 बरस थी छुटपन से ही कुंदन लाल सहगल का अनुसरण कर उनके गानों को गाया करते थे।

बम्बई आने के बाद बड़े भाई अशोक कुमार के साथ ‘बम्बई टॉकिज’ जाया करते थे जहां अशोक कुमार अपनी फिल्म शिकारी (1946) बतौर अभिनेता काम कर रहे थे। किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में इसी फिल्म से हुई।

किशोर को पहला मौका प्लेबैक सिंगर के रूप में मिला फ़िल्म “जिद्दी (1946)” में संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने उनकी आवाज सुनने के बाद उनसे एक गीत गाने को कहा- “मरने की दुआएं क्या मांगू”

http://www.youtube.com/watch?v=WzwTRLXOc_I

देव आंनद पर फिल्माए इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था

Picture3

नाम बदल आभास से हुए किशोर

उन्ही दिनों आभास ने अपना नाम बदल कर किशोर रख लिया। कहा जाता है कि नाम में बहुत कुछ होता है तभी तो यह नाम आज तक याद किया जा रहा है अदाकारी में कामयाबी की मंजिलों को चुमते दादा मुनी यानी अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय में ही मन लगाये लेकिन मन मौजी किशोर को यह दिखावे कि दुनिया कम भाती रही बड़े भाई के दबाव से अभिनय शुरू किया साथ-साथ अपने लिए गीत भी गाये लेकिन शुरुआती दौर का यह सफर इतना मशहूर नही हो पा रहा था। उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला फिल्म 1948 में बनी फिल्म जिद्दी में। जिसमें उन्होंने देव आनंद के लिए गाना गाया था।

1950-1960
1951- आन्दोलन- फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फिल्म ‘आंदोलन’ में हीरो के रूप में काम किया मगर फिल्म फ्लॉप हो गई।

1954- नौकरी- बिमल राय की ‘नौकरी’ में एक बेरोजगार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी ज़बर्दस्त अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इस फिल्म में उन्होंने गाना भी गाया- ” छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में ….” ख्याल आया ?

इसके बाद 1955 में बनी “बाप रे बाप”,

1956- फंटूस – इसका एक गीत “दुखी मन मेरे …” आज भी मन को भाव विभोर करता है यह एक ऐसा गीत है जो सच में किशोर के उन दिनों की जदोजहत को बयान करता है ध्यान से सुनने पर लगता है कि जैसे सहगल और किशोर दोनों कि आवाज़ मिली है इसमे किशोर अपने गुरु सहगल को सुनते और सीखते अपनी पहचान बनाने में लगे थे यह उसी बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है।

1956 में “नई दिल्ली”, 1957 में “मि. मेरी” और “आशा”, मे हीरो के रूप में काम किया।

1957- नौ दो ग्यारह- सदाबहार गीत “आंखों में क्या जी….” गाया

1958 – दिल्ली का ठग- अभिनेत्री नूतन और किशोर की एक सौगात – “हम तो मोहब्बत करेगा…”

एस डी बर्मन के साथ किशोर के गायकी के करियर की शुरुआत
Picture5
किशोर कई फिल्मों में नजर आए, हालांकि उनके भीतर बतौर गायक जो प्रतिभा छिपी थी, उसका अंदाजा किसी को नहीं था. इस प्रतिभा को सबसे पहले सचिन देव बर्मन ने पहचाना. एक बार बर्मन अशोक कुमार के आवास पर गए थे, जहां उन्होंने देखा कि किशोर कुमार के एल सहगल की नकल करने की कोशिश करते हुए कुछ गुनगुना रहे हैं. इस पर उन्होंने किशोर को सलाह दी कि वह अपनी खुद की शैली विकसित करें. किशोर ने उसकी सलाह मान ली और खुद की शैली विकसित की. इस तरह से एस डी बर्मन के साथ किशोर के गायकी के करियर की शुरुआत हुई और दोनों ने कई यादगार नगमे दिए. मुराद का कहना है, ‘किशोर दा सहगल के बड़े प्रशंसक थे. उनके कमरे में सहगल की कई तस्वीरें थीं. इससे पता चलता है कि वह सहगल के कितने बड़े मुरीद थे.’

सचिन देव बर्मन और किशोर दोनों के कुछ सफल प्रयोग
Picture4
1958 -“चलती का नाम गाड़ी” जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री थी मधुबाला। इस फिल्म का संगीत बर्मन दा ने दिया।‘इक लड़की भीगी भागी सी’… इस फ़िल्म के सभी गानों में तो किशोर ने आवाज़ दी थी

किशोर ने मेहनत कर अपनी पहचान तो लगभग बना ली थी लेकिन अभी तक आवाज़ से ज्यादा अभिनय के लिए ही मशहूर हुए थे.

पांच रुपया बारह आना वाले गीत की असली कहानी
Picture6
किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने एक रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने एक गीत में इस पाँच रुपया बारह आना का बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया। शायद बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह असली कहानी मालूम होगी।

1960- 1970
1960- बेवकूफ, गर्ल फ्रेंड… गर्ल फ्रेंड फ़िल्म सत्येन बोश की निर्देशित फ़िल्म थी जिसका एक गीत अपनी छाप छोड़ गया गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गीत “कश्ती का खामोश सफर है” यादगार रहा

1961– झुमरू… किशोर के हरफनमौला होने का परिचय देती यह फ़िल्म कभी भुलाई नही जा सकती इसके योडेल्लिंग अंदाज़ में गाये सारे गीत आज भी ताजे हैं “कोई हम दम ना रहा, कोई सहारा ना रहा…” यह गीत तो किशोर को भी बेहद पसंद था बड़े भाई अशोक कुमार भी इसी गीत से छोटे किशोर को याद कर लिया करते थे

1962- बॉम्बे का चोर- माला सिन्हा के साथ अभिनय किया

1962– हॉफ टिकट – अभिनेत्री मधुबाला के साथ की यह फ़िल्म मस्ती और हंसी से भरपूर थी बच्चों की तरह शरारत करते किशोर को खूब पसंद किया गया

1964- दूर गगन की छाँव में- “आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं …” यह मीठा गाना काफी लोकप्रिय हुया. यह फ़िल्म किशोर को भी पसंद थी

1965- श्रीमान फंटूस – यह नाम लेते ही गम से दिल को भर जाने वाला गाना याद आ जाता है गाना था – “वो दर्द भरा अफ़साना…” जितने भी बड़े स्टेज शो हुए, लगभग सभी में किशोर ने इस गीत को दोहराया

1967- हम दो डाकू

1968- पडोसन – यह एक ऐसी दिलचस्प फ़िल्म है कि जिसे 100 बार देखने के बाद भी देखने का मन करे साइड हीरो के रूप में किए गए अभिनय से किशोर ने इसे आज तक जवां रखा है ” एक चतुर नार…” इस भिडंत गाने के लिए सफल गायक मन्ना दे ने तक किशोर के हुनर की दाद दी शास्त्रीय संगीत से बेखबर किशोर ने तैयारी कर कामयाबी से इस गीत को पूरा किया

1968- श्रीमान, पायल की झंकार

1970- आंसू और मुस्कान…

गायक से संगीतकार का सफर
संगीत की समझ आने पर किशोर ने संगीतकार का भी काम किया उनका हुनर यहाँ भी हिट हुया
1962- झुमरू में संगीत बनाया इतना ही नही तो गीत के बोल भी लिखे और सभी जानते है गानों से ही यह फ़िल्म आज भी देखी जाती है

1964- दूर गगन की छाँव में और

1967- हम दो डाकू में भी संगीत दिया.

योडेलीन का अंदाज़
Picture7
किशोर कुमार आपने गानों में योडेलीन के अंदाज़ के कारण जाने जाते रहे. यह नुस्खा उन्होंने अपने मझले भाई अनूप कुमार के एक रिकॉर्डिंग से छिप कर सीखा था. अनूप इसे विदेश से लाये थे.

गीत और संगीत में किशोर इतने उलझे थे कि उनके अभिनय के गीत उस समय मोहम्मद रफी जी को गाने पड़े.

किशोर कुमार ने लता मंगेशकर के साथ 327 गाने गाए
किशोर दा से वो पहली मुलाक़ात… लता मंगेशकर की जुबानी
Picture8

40 के दशक में जब मैंने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था. तब मैं अपने घर से लोकल पकड़कर मलाड जाती थी. एक रिकॉर्डिंग के दौरान संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के साथ लता मंगेशकर.

वहां से उतरकर स्टूडियो बॉम्बे पैदल टॉकीज जाती. रास्ते में किशोर दा भी मिलते. लेकिन मैं उनको और वो मुझे नहीं पहचानते थे. किशोर दा मेरी तरफ देखते रहते. कभी हंसते. कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते. मुझे उनकी हरकतें अजीब सी लगतीं.

मैं उस वक़्त खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी. एक दिन किशोर दा भी मेरे पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए. मैंने खेमचंद जी से शिकायत की. “चाचा. ये लड़का मेरा पीछा करता रहता है. मुझे देखकर हंसता है.”

तब उन्होंने कहा, “अरे, ये तो अपने अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर है.” फिर उन्होंने मेरी और किशोर दा की मुलाक़ात करवाई. और हमने उस फिल्म में साथ में पहली बार गाना गाया.

  • लता मंगेशकर मानती हैं कि किशोर उन्हें गायकों में सबसे ज़्यादा अच्छे लगते थे. उन्होंने कहा कि किशोर हर तरह के गीत गा लेते थे और उन्हें ये मालूम था कि कौन सा गाना किस अंदाज़ में गाना है.
  • लता ही नहीं, उनकी बहन आशा भोसले के भी सबसे पसंदीदा गायक थे और उनका मानना है कि किशोर अपने गाने दिल और दिमाग़ दोनों से ही गाते थे.

एक बार आशा को लगा कि उन्हें छेड़ रहे हैं किशोर कुमार

Picture9
आशा भोसले और किशोर के गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन दोनों ने जब भी साथ में गाया, गाना हिट हुआ। लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि किशोर कुमार से जब आशा भोसले की पहली मुलाकात हुई थी तब आशा, किशोर कुमार को देखकर डर गयी थीं। आशा भोसले उन्हें लड़कियों का पीछा करने वाला मनचाला समझ बैठी थीं।

किस्सा यह है कि एक गाने के लिए आशा और किशोर का चुना गया। इस गाने के पहले दोनों ने ही एक-दूसरे को नहीं देखा था। गाने की रिकार्डिंग के लिए दोनों को स्टूडियो पहुंचना था। उन दिनों न तो आशा के पास अपनी गाड़ी थी और न ही किशोर कुमार के पास।

यह दोनों ही अलग-अलग जगहों से आकर मुंबई के मलाड स्टेशन में पहुंचे। फक्कड़ और सूफियाना किशोर पायजामा-कुर्ता पहने हुए थे। कुर्ता मायजामा के साथ उन्होंने गले पर स्कॉर्फ या मफलर जैसा कुछ डाल रखा था।

मुंबई में आमतौर पर लोग मफलर डालकर नहीं रहते। आशा ने किशोर को देखा तो उन्हें उनका मफलर डाले हुए किशोर बड़े अजीब लगे। मामला यहां से बनना शुरू हुआ। ट्रेन आयी और दोनों एक ही डिब्बे सवार हुए।

चूंकि मंजिल एक ही थी तो दोनों उतरे भी एक ही स्टेशन पर। बीच-बीच में दोनों ही एक-दूसरे को देख लेते थे। स्टेशन से बाहर निकलकर आशा भोंसले ने एक तांगा लिया। किशोर कुमार ने भी तांग लिया। आगे-आगे आशा का तांगा चल रहा था इसके पीछे किशोर का तांगा चल रहा था।

आशा भोंसले को लगने लगा कि यह आदमी उनका पीछा कर रहा है। आशा घबरा कर किशोर से मुंह चुराने लगीं। आशा को लगा कि लड़कियों को छेड़ने वाला कोई मनचला उनका पीछा कर रहा है। जैसे ही स्टूडियो के बाहर तांगा रूका, आशा दौड़कर स्टूडियों के अंदर घुस गयीं।

यह क्या, उन्होंने पीछे-पीछे किशोर कुमार को अंदर आते देखा। अब तो हद हो गयी थी। आशा को लगा यह मनचाला उनका पीछा नहीं छोड़ेगा। आशा को लगा कि अब स्टूडियों में किसी से उन्हें मदद मांगनी ही होगी।

तो जो पहले मिला उसे पकड़कर आशा ने अपनी आपबीती सुनायी। यह सुनकर लोग हंसने लगे। तब तक वहां किशोर कुमार भी आ चुके थे। आशा को बताया गया कि यह किशोर कुमार हैं और आपको इनके साथ गाना गाना है। बाद में इस किस्से को किशोर कुमार और आशा भोसले लोगों से शेयर करते रहे। दोनों ने साथ में कई ‌हिट फिल्गी गीत गाए।

गैर हिन्दी गाने
असल में किशोर बंगाली थे और बंगला में भी गाने गाये 1964 में सत्यजीत रॉय जैसे सफल निर्देशक की फ़िल्म “चारुलता” में उन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर के बंगला गीत ” आमी चीनी गो चीनी तोमारे …” गीत को गाकर यह साबित कर दिया कि वे एक प्रतिभाशाली ( versatile ) कलाकार थे वे सत्यजीत रॉय के करीब रहे और “पाथर पंचोली” फ़िल्म के निर्माण में उन्होंने रोय जी की आर्थिक मदद भी की इस तरह से 1960- 1970 का दशक किशोर कुमार को एक कुशल कलाकार के रूप में देखता है

गायकी में सम्मान
यह एक सफल और कई मायनो में याद गार फ़िल्म रही 1969 में शक्ति सामंत की फ़िल्म “आराधना” राजेश खन्ना पर फिल्माए गीतों ने तो हिन्दी फिल्मो में रोमांटिक गानों की कड़ी में एक हलचल सी मचा दी “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू…” और “रूप तेरा मस्ताना…” आज भी सुपर हिट है

“रूप तेरा मस्ताना…” – इस गीत के लिए किशोर को जीवन का पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला

यही फिल्म है जहाँ से मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने अपने पिता की गैरमौजूदगी में खुद ब ख़ुद काम संभाला और फ़िर बस आगे चलते ही गए. राजेश खन्ना बताते हैं कि पहली बार उनके लिए गाने से पहले किशोर दा ने उन्हें बुलाया और उनसे सवाल-जवाब किए. गानों के बन जाने पर राजेश जी को पता चला कि किशोर उस मुलाक़ात में उनके बोलने के अंदाज़ की मालूमात कर रहे थे. बस इसके बाद किशोर और राजेश खन्ना एक दुसरे के लिए पर्याय से हो गए.

किशोर कुमार ने अपने सम्पूर्ण फिल्मी कैरियर में 800 से भी अधिक हिन्दी फिल्मों में 1500 से ज्यादा गाने गाए। हिन्दी फिल्मो के अलावा उन्होंने बंगला, मराठी, आसामी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी और उडि़या फिल्मों के लिए भी उन्होंने अपनी दिलकश आवाज के जरिए श्रोताओ को भाव विभोर किया। यूं तो किशोर कुमार ने शशि कपूर, धमेन्द्र, विनोद खन्ना, संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा, रणधीर कपूर से लेकर ऋषि कपूर तक के लिए गाने गाए। लेकिन देवानंद, अमिताभ बच्चन, और राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज खूब जमती थी, साथ हीं ये तीनो सुपरस्टार भी अपनी फिल्मों के लिए किशोर कुमार द्वारा गाए जाने की मांग किया करते थे।

8 बार फिल्म फेयर पुरस्कार
Picture10
किशोर कुमार को उनके दिए गए सम्मान की चर्चा की जाए तो उन्हें बतौर गायक 8 बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिल चुका है। सबसे पहले उन्हें 1969 में अराधना फिल्म के रूप तेरा मस्ताना गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद 1975 में फिल्म अमानुष के गाने दिल ऐसा किसी ने, 1978 में डॉन के गाने खइके पान बनारस वाला, 1980 में हजार राहे जो मुड़के देखी फिल्म थोड़ी सी बेवफाई, 1082 में फिल्म नमक हलाल के पग घूंघरू बांध, 1983 में फिल्म अगर तुम न होते के अगर तुम न होते,1984 में फिल्म शराबी के मंजिलें अपनी जगह है और वर्ष 1985 में फिल्म सागर के सागर किनारे दिल गाने के लिए भी किशोर कुमार सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए।
81

किशोर की गायकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई फिल्म आराधना

Picture11
रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला
वर्ष 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के जरिये किशोर गायकी के दुनिया के बेताज बादशाह बन गये। इस समय के फिल्म के संगीतकार सचिन देव बर्मन चाहते थे कि इसके गानों को किसी एक गायक को न देकर उसे किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों से गवाया जाये। लेकिन बाद में सचिन देव बर्मन की बीमारी के कारण फिल्म अराधना में उनके पुत्र आर.डी.बर्मन ने संगीत दिया। इसमें सपनों की रानी कब आयेगी तू और रुप तेरा मस्ताना गाना किशोर कुमार ने गाया जो बेहद पसंद किया गया। रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला।

तीन नायकों को बनाया महानायक

किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

  • उनकी आवाज के जादू से देव आनंद सदाबहार हीरो कहलाए
  • किशोर ने ही बनाया था राजेश खन्ना को देश का सुपरस्टा र
  • अमिताभ बच्चन को बनाया महानायक

देव आनंद और किशोर की मरते दम तक दोस्ती

Picture12

जिद्दी में किशोर कुमार ने पहली बार पार्श्वगायन किया, वह भी देव आनंद के लिए। यहीं से किशोर और देव आनंद के बीच अभिन्न मित्रता की शुरुआत हुई। आगे चलकर देव ने अपने अधिकांश गाने किशोर से ही गवाए। 1987 में किशोर कुमार के असामयिक निधन तक यह दोस्ती कायम रही।

अंतिम बार किशोर ने ‘सच्चे का बोलबाला’ (1989) फिल्म के लिए देव आनंद को अपनी आवाज दी थी। ‘जिद्दी’ की सफलता ने देव आनंद को स्टार का दर्जा दिला दिया। उस समय तक दिलीप कुमार और राज कपूर भी स्टार का दर्जा हासिल कर चुके थे। दोनों की आठ-दस फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं।

  • Paying Guest, 1957- Maana janab ne pukara
  • Paying Guest, 1957- Chhod do aanchal
  • Johny Mera Naam, 1970- Pal bhar ke liye
  • Hare Ram Hare Krishna, 1971- Phoolon ka taaron ka

किशोर बन गए राजेश खन्ना के गीतों की आवाज

Picture13
किशोर कुमार यानी वो आवाज जिसने जवां दिलों की धड़कनों को अपने नाम कर लिया. उनकी बात करते ही सबसे पहले किसी चेहरे का ध्यान आता है तो वो है राजेश खन्ना. राजेश खन्ना की सफलता में किशोर कुमार का सबसे बड़ा हाथ माना जा सकता है. सवाल ये है कि अगर किशोर कुमार नहीं होते तो क्या राजेश खन्ना, राजेश खन्ना होते?

किशोर कुमार के गाने ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ने राजेश खन्ना को रातोंरात देश का सुपर स्टार बना दिया. राजेश खन्ना रातोंरात देश की लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन बन गए.

1969 में आई फिल्म ‘अराधना’ ने तहलका मचा दिया. किशोर कुमार की आवाज में जो एक रोमांस था उसे राजेश खन्ना का चेहरा मिल गया था. इस फिल्म की खास बात ये थी कि राजेश खन्ना और किशोर कुमार पहली बार ‘अराधना’ फिल्म के सेट पर ही मिले और दोनों की केमिस्ट्री वहीं से शुरू हो गई.
Picture14
‘अराधना’ से पहले राजेश खन्ना अपनी पहली हिट फिल्म की तलाश में घूम रहे थे, लेकिन वो फिल्म उन्हें मिली नहीं थी. 1966 में राजेश खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री में ‘राज’ फिल्म से शुरुआत की थी. हालांकि पहले ‘आखिरी खत’ रिलीज हुई.

इन दोनों फिल्मों के गाने तो अच्छे थे लेकिन, राजेश खन्ना की कोई बड़ी पहचान नहीं बन पाई. इसके बाद राजेश खन्ना ने ‘बहारों के सपने’ और ‘औरत और श्रीमानजी’ जैसी फिल्मों में काम किया लेकिन बात नहीं बनी.

शायद राजेश खन्ना को किशोर कुमार की आवाज का ही इंतजार था. जैसे ही 1969 में ‘अराधना’ आई पूरा देश राजेश खन्ना और किशोर कुमार का दीवाना हो गया.

ऐसा कहा जाता है कि राजेश खन्ना के सहारे किशोर कुमार ने भी ‘अराधना’ फिल्म से अपनी दूसरी पारी शुरू की. इससे पहले किशोर कुमार की पहचान एक एक्टर-सिंगर के तौर पर थी. वो फिल्मों में एक्टिंग भी किया करते थे और गाया भी करते थे.

1970 में ही फिल्म ‘सच्चा झूठा’ रिलीज हुई. इस फिल्म में किशोर कुमार और राजेश खन्ना की जोड़ी हिट रही. 1971 में राजेश खन्ना और किशोर कुमार की जोड़ी को आरडी बर्मन के तौर पर एक नया साथी मिला. तीनों ने पहली बार साथ में फिल्म ‘कटी पतंग’ की.

‘कटी पंतग’ के बाद से इन तीनों के बीच एक कभी न रुकने वाला सिलसिला शुरू हुआ. सत्तर के दशक में आरडी बर्मन ही नहीं, हर म्यूजिक डायरेक्टर राजेश खन्ना के गानों के लिए किशोर कुमार ही को गायक चुनता.

1973 में ‘अमर प्रेम’ के गानों ने रोमेंटिंक राजेश-किशोर की जोड़ी ने सैड सॉन्ग्स की दुनिया में भी धमाका मचाया. 1974 में आई फिल्म ‘आप की कसम’ में किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए ‘जिंदगी का सफर…’ जैसा सुपरहिट सैड सॉन्ग गाकर राजेश खन्ना को दिलीप कुमार के बाद दूसरा ट्रैजेडी किंग बना दिया.

इसी दौरान किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए ‘रोटी’, ‘प्रेमनगर’ और ‘अजनबी’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के गाए गाए. लेकिन सत्तर के दशक के अंत में राजेश खन्ना का जादू ढलने लगा था. उनकी फिल्में फ्लॉप होनी शुरू हो गई थीं. लेकिन इस दौर में भी किशोर कुमार उनकी आवाज बने रहे और ‘महबूबा’, ‘अनुरोध’ जैसी फिल्मों के गाने हिट रहे.

राजेश खन्ना को किशोर की आवाज के बगैर सोचना मुमकिन नहीं था. शायद यही वजह है कि कुछ साल पहले राजेश खन्ना ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘किशोर कुमार मेरी आत्मा थे और मैं उनका शरीर.’

किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए गाना बंद नहीं किया. लेकिन ये वो दौर था जब किशोर सिर्फ राजेश खन्ना की आवाज नहीं रह गए थे. वे अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, जीतेंद्र और विनोद खन्ना जैसे स्टार्स की भी आवाज बन चुके थे.

इस दौर से राजेश खन्ना का स्टारडम खत्म होना शुरू हो चुका था. जैसे-जैसे किशोर दूसरे के लिए गाते गाते ऊपर जा रहे थे वैसे-वैसे राजेश खन्ना नीचे आ रहे थे.

  •  Achha To Hum Chalte Hain – Aan Milo Sajna
  • Chala Jata Hoon – Mere Jeevan Saathi
  • Chingari Koi Bhadke – Amar Prem
  • Gore Rang Pe Na Itna – Roti
  • Jai Jai Shiv Shankar – Aap Ki Kasa
  • Kora Kagaz Tha Yeh Man Mera – Aradhana
  • Kuch To Log Kahenge – Amar Prem
  • Mere Dil Mein Aaj Kya Hai – Daag
  • Meri Pyari Behaniya – Sachcha Jhootha
  • Mere Sapnon Ki Raani – Aradhana
  • Pyaar Deewana Hota Hai – Kati Patang
  • Roop Tera Mastana – Aradhana
  • Woh Shaam Kuch Ajeeb Thi – Khamoshi
  • Yahan Wahan Sare Jahan – Aan Milo Sajna
  • Yeh Jo Mohabbat Hai – Kati Patang
  • Yeh Shaam Mastani – Kati Patang

किशोर कुमार और बिग बी का किस्सा

Picture15
फिल्म डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना जैसी कई फिल्मों में आज के महानायक अमिताभ बच्चन के लिए गा चुके किशोर कुमार 1980 के दशक के मध्य में एक बार उनसे इसलिए नाराज हो गए थे क्योंकि अमिताभ ने किशोर की एक होम प्रोडक्शन फिल्म में अतिथि कलाकार की भूमिका नहीं की थी. किशोर ने बिग बी के लिए गाना बंद कर दिया था. बाद में सुलह हो गई.

  • Meet Na Mila Re – Abhimaan
  • Tere Mere Milan Ki – Abhimaan
  • My Name is Anthony Gonsalves – Amar Akbar Anthony
  • Rote Rote Hasna Seekho – Andhaa Kanoon
  • Arey Deewano Mujhe – Don
  • Yeh Hai Bambai Nagariya – Don
  • Salamat Rahe Dostana – Dostana
  • Saathie Re – Muqaddar Ka Sikander
  • Rote Hue Aate Hain Sab – Muqaddar Ka Sikander
  • Rim Jhim Gire Saawan – Manzil
  • Aaj Rapat Jaye To – Namak Halal
  • Inteha Ho Gayi Intezaar Ki – Sharaabi
  • Yeh Dosti Hum Nahi – Sholay
  • Dekha Ek Khwaab – Silsila

मनमौजी किशोर
Picture1
मसूर की दाल देखकर ‘मसूरी’ घूमने का प्लैन

किशोर दा को बाजा़र जाकर छोटी- छोटी चीज़ें, तरह तरह के आईटम ख़रीदेने का शौक था और एक बार वो ऐसे ही बाज़ार गए जहां अचानक मसूर की दाल देखकर उन्होंने तुरंत ‘मसूरी’ घूमने का प्लान बना लिया. बस कुछ ऐसी ही मनमौजी प्रवृत्ति थी किशोर कुमार की, यही बताया उनके बेटे अमित कुमार ने.

रेडियो की जानी मानी हस्ती अमीन सायानी ने बीबीसी को बताया कि बड़े ही मज़ेदार आदमी थे किशोर, उनका दिल बहुत अच्छा था पर बेहद शरारती भी थे. एक दफ़ा तो उन्होंने इंटरव्यू भी अमीन साहब को इसी शर्त पर दिया कि वो अपने आप को ख़ुद ही इंटरव्यू करेंगे. इसके बाद अमीन सायानी को दिए एक और इंटरव्यू में किशोर कुमार ने ख़ूबसूरत अंदाज़ में सचिन देव बर्मन के साथ पहली मुलाक़ात की नकल करके दिखाई.

रशोकि रमाकु

किशोर कुमार को अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहने का फ़ितूर था। ख़ासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में किशोर कुमार ने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर वह कहते थे- रशोकि रमाकु।

मनोरंजन-कर

बारह साल की उम्र तक किशोर ने गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली। वे रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। फिल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ कर गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को अभिनय सहित गाने सुनाते तो ‘मनोरंजन-कर’ के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे।

बिना पैसे लिए काम नहीं करते थे

किशोर कुमार को अधिकतर फिल्मकार पसंद नहीं करते थे वह थी बिना पैसा लिए काम न करने की आदत. वह तब तक किसी गाने की रिकॉर्डिंग नहीं करते थे जब तक उन्हें पैसा नहीं मिल जाता था.

सेट पर आधे चेहरे पर ही मेक-अप लगाकर पहुंच गए

एक वाकए के अनुसार, जब एक फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्माता ने उन्हें पहले पूरे पैसे नहीं दिए तो वह फिल्म के सेट पर आधे चेहरे पर ही मेक-अप लगाकर पहुंच गए और पूछने पर कहने लगे कि “आधा पैसा तो आधा मेक-अप.” एक और बहुत ही हास्य घटना के अनुसार जब निर्माता आर.सी. तलवार ने उनके पैसे नहीं दिए तो वह हर दिन तलवार के घर सुबह-सुबह पहुंच कर बाहर से ही चिल्लाने लगते “हे तलवार, दे दे मेरे आठ हजार.”

व्यक्तिगत जीवन में कई निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें सनकी तक कहा. कुछ पत्रकारों और लेखकों के अनुसार किशोर ने वार्डन रोड स्थित अपने बंगले के बाहर ‘किशोर से सावधान’ का बोर्ड टांग रखा था. किशोर पैसे न मिलने पर काम बीच में ही छोड़ देते थे.

लेकिन इसके उलट किशोर बड़े दिलदार और हमदर्द भी थे, उनके मित्र अरुण मुखर्जी की मौत के बाद किशोर नियमित रूप से भागलपुर में उनके परिवार को पैसे भेजते थे.

कई बार फ्री में भी गाना गाए

हालांकि उनका उसूल था कि पैसा नहीं तो काम नहीं पर कई बार उन्होंने निर्माताओं के लिए फ्री में भी गाना गाए हैं. किशोर कुमार बहुत ही दयावान और दूसरों की मदद के लिए भी जाने जाते थे. काफी लोग उनके अक्खड़ और मस्तमौला व्यवहार की आलोचना भी करते थे लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करते थे.

बाथरूम-सिंगर

एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक संगीतकार सचिन देव बर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज सुनी तो दादा मुनि से पूछा, ‘कौन गा रहा है?’ अशोक कुमार ने जवाब दिया-‘मेरा छोटा भाई है। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।’ सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस गायक बना दिया।

दो बार आवाज उधार ली

Picture18

यह भी मजेदार बात है कि किशोर कुमार की शुरुआत की दो फिल्मों में मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार के लिए अपनी आवाज दी थी।

मोहम्मद रफी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज फिल्म ‘रागिनी’ में उधार दी। गीत हैं- ‘मन मोरा बावरा।’ दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फिल्म ‘शरारत’ में रफी से गवाया था किशोर के लिए-‘अजब है दास्ताँ तेरी ये जिंदगी।’

मेहमूद से लिया बदला

Picture19
फिल्म ‘प्यार किए जा’ में कॉमेडियन मेहमूद ने किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। इसका बदला उन्होंने मेहमूद से फिल्म ‘पड़ोसन’ में लिया- डबल पैसा लेकर।

‘चतुर नार’ की रिकॉर्डिंग में तो पूरे 12 घंटे लग गए

किशोर कुमार ने कई गायकों के साथ जुगलबंदी की और सभी के चहेते थे वो. सिंगर मन्ना डे कहते हैं कि किशोर दा ने संगीत की शिक्षा नहीं ली थी. उनकी गायकी उन्हें ईश्वर की देन थी. मन्ना डे ने कहा कि हालांकि मन्ना डे ख़ुद संगीत में पारंगत थे पर फिर भी जब वो किशोर के साथ गाते तो वो कमर कस के गाते थे. उन्होंने कहा कि किशोर की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती. मन्ना डे ने बताया कि फ़िल्म पड़ोसन के हिट गीत ‘चतुर नार’ की रिकॉर्डिंग में तो पूरे 12 घंटे लग गए जिसमें से तीन घंटे तो किशोर दा की बातों पर हंस हंस कर सब का पेट दर्द हो गया.

खंडवा वाले की राम-राम

किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे-‘मेरे दादा-दादियों।’ मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवा वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार।

हरफनमौला: गीतों का झोला

किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा ब