रामलीला… मंचन का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व

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रामलीला की शुरूआत कब और कैसे हुई? दुनिया में किसने किया था सबसे पहली रामलीला का मंचन? इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। रामलीला भारत में परम्परागत रूप से भगवान राम के चरित्र पर आधारित नाटक है। जिसका देश में अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग भाषाओं में मंचन किया जाता है। रामलीला का मंचन विजयादशमी या दशहरा उत्सव पर किया जाता है। वैसे तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के प्रभावशाली चरित्र पर कई भाषाओं में ग्रंथ लिखे गए हैं। लेकिन दो ग्रंथ प्रमुख हैं। जिनमें पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि द्वारा ‘रामायण’ जिसमें 24 हजार श्लोक, 500 उपखण्ड, तथा सात कांड है और दूसरा ग्रंथ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है जिसका नाम ‘श्री रामचरित मानस’ है, जिसमें 9,388 चौपाइयां, 1,172 दोहे और 108 छंद हैं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई ‘रामायण’ तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्री रामचरित मानस’ से पुरानी है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन भगवान राम के जन्म की तारीख को लेकर विद्वानों और इतिहासकारों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसी तरह महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण के समय को लेकर भी विद्वानों और इतिहासकारों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। हालांकि वेद और रामायण में विभिन्न आकाशीय और खगोलीय स्थितियों के जिक्र के मुताबिक आधुनिक विज्ञान की मदद से इन तारीकों को प्रमाणिक करने की कोशिश की गई है।

  • इंस्टिट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑफ वेदास की निदेशक सरोज बाला के मुताबिक… वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का जो वर्णन किया गया है कि उस जन्मतिथि के अनुसार 10 जनवरी 5114 बीसी अब इसे लूनर कैलेंडर में कन्वर्ट कार वो चैत्र मास का शुक्ल पक्ष का नवमी निकला।
  • हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था… कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ताओं अनुसार राम का जन्म वाल्मीकि द्वारा बताए गए ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर अनुसार 4 दिसंबर 7323 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9334 वर्ष पूर्व हुआ था। शोधकर्ता डॉ. वर्तक पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी।

रामलीला का इतिहास

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जैसा की हमने बताया महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण का प्रमाण 9 हजार साल ईसा पूर्व से लेकर 7 हजार साल ईसा पूर्व तक का माना जाता है। यही कारण है कि रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। लेकिन कई सबूत ऐसे मिले हैं जो साबित करते हैं कि रामलीला का मंचन काफी पहले से किया जाता रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया में कई पुरातत्वशास्त्री और इतिहासकारों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे साबित होता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का मंचन हो रहा था। जावा के सम्राट ‘वलितुंग’ के एक शिलालेख में ऐसे मंचन का उल्लेख है यह शिलालेख 907 ई के हैं। इसी प्रकार थाईलैंड के राजा ‘ब्रह्मत्रयी’ के राजभवन की नियमावली में रामलीला का उल्लेख है जिसकी तिथि 1458 ई है।

  • मुखौटा रामलीला- मुखौटा रामलीला का मंचन इंडोनेशिया और मलेशिया में किया जाता रहा है। इंडोनेशिया में ‘लाखोन’, कंपूचिया के ‘ल्खोनखोल’ और बर्मा के ‘यामप्वे’ ऐसे कुछ जगह हैं जहां इसका आज भी मंचन होता है। इंडोनेशिया और मलेशिया में लाखोन के माध्यम से रामायण के अनेक प्रसंगों को मंचित किया जाता है। कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल के माध्यम के होता है।
  • छाया रामलीला- जावा तथा मलेशिया के ‘वेयांग’ और थाईलैंड के ‘नंग’ ऐसी जगह है जहां छाया नाटक प्रदर्शित किया जाता है। छाया नाटक कठपुतली के माध्यम से किया जाता है। विविधता और विचित्रता के कारण छाया नाटक के माध्यम से प्रदर्शित की जाने वाली रामलीला मुखौटा रामलीला से भी निराली है।

भारत में रामलीला का इतिहास

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भारत में भी रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का ईसा पू्र्व का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन 1500 ईं में गोस्वामी तुलसीदास(1497–1623)ने जब आम बोलचाल की भाषा ‘अवधी’ में भगवान राम के चरित्र को ‘श्री रामचरित मानस’ में चित्रित किया तो इस महाकाव्य के माध्यम से देशभर खासकर उत्तर भारत में रामलीला का मंचन किया जाने लगा। माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। इतिहासविदों के मुताबिक देश में मंचीय रामलीला की शुरुआत 16वीं सदी के आरंभ में हुई थी। इससे पहले रामबारात और रुक्मिणी विवाह के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। साल 1783 में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने हर साल रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया।

भरत मुनि के ‘नाट्यशास्‍त्र’ में नाटक की उत्‍पत्ति के संदर्भ में लिखा गया है। ‘नाट्यशास्‍त्र’ की उत्पत्ति 500 ई॰पू॰ 100 ई॰ के बीच मानी जाती है। नाट्यशास्‍त्र के अनुसार नाटकों विशेष रूप से लोकनाट्य के जरिए संदेश को प्रभावी रूप से जनसामान्‍य के पास पहुंचाया जा सकता है। भारत भर में गली-गली, गांव-गांव में होने वाली रामलीला को इसी लोकनाट्य रूपों की एक शैली के रूप में स्‍वीकारा गया है। राम की कथा को नाटक के रूप में मंच पर प्रदर्शित करने वाली रामलीला भी ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर वास्‍तव में कितनी विविध शैलियों वाली है, इसका खुलासा रचनाकार इन्‍दुजा अवस्‍थी ने अपने शोध-प्रबंध ‘रामलीला: परंपरा और शैलियां’ में बड़े विस्‍तार से किया है। इंदुजा अवस्‍थी के इस शोध प्रबंध की यह विशेषता है कि यह शोध पुस्‍तकालयों में बैठकर नहीं बल्कि जगह-जगह घूम-घूम कर लिखा गया है। साहित्यिक कृतियों से अलग-अलग भाषा-बोलियों, समाज-स्‍थान और लोकगीतों में रामलीला की अलग ही विशेषता है। जिसका असर उसके मंचन पर भी नजर आता है। सिर्फ उत्‍तर प्रदेश में ही ऐतिहासिक रामनगर की रामलीला, अयोध्‍या, चित्रकूट की रामलीला, अस्‍सी घाट (वाराणसी की रामलीला) इलाहाबाद और लखनऊ की रामलीलाओं के मचंन की अपनी-अपनी शैली और विशेषता है। हो सकता है कि शायद इसीलिए यह मुहावरा चल पड़ा हो… ‘अपनी-अपनी रामकहानी’।

देश की सबसे पुरानी रामलीलाएं

काशी, चित्रकूट और अवध की रामलीला- माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। काशी में गंगा और गंगा के घाटों से दूर चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन किया जाता है। माना जाता है कि ये रामलीला 500 साल पहले शुरू हुई थी। 80 वर्ष से भी बड़ी उम्र में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरित्रमानस 16 वीं शताब्दी में रामचरित्र मानस लिखी थी।

लखनऊ (अवध) के ऐशबाग की रामलीला- तकरीबन 500 साल का इतिहास समेटे यह रामलीला मुगलकाल में शुरू हुई और नवाबी दौर में खूब फली-फूली। ऐशबाग के बारे में कहा जाता है कि पहली रामलीला खुद गोस्वामी तुलसीदास ने यहां देखी थी।

बनारस (काशी) में रामनगर की रामलीला- साल 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। यहां ना तो बिजली की रोशनी और न ही लाउडस्पीकर, साधारण से मंच और खुले आसमान के नीचे होती है रामलीला। 233 साल पुरानी रामनगर की रामलीला पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज के दम पर होती है। बीच-बीच में खास घटनाओं के वक़्त आतिशबाजी जरूर देखने को मिलती है। इसके लिए करीब 4 किमी के दायरे में एक दर्जन कच्चे और पक्के मंच बनाए जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग को दर्शाया जाता है।

चित्रकूट की रामलीला- चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन होता है। माना जाता है कि ये रामलीला 475 साल पहले शुरू हुई थी। कहा जाता है चित्रकूट के घाट पर ही  गोस्वामी तुलसीदास जी को अपने आराध्य के दर्शन हुए थे। जिसके बाद उन्होंने श्री रामचरित मानस लिखी थी।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रामलीला- 5 सौ साल पुरानी रामलीला अब भी हर साल आयोजित की जाती है। इसकी खासियत ये है कि यहां की रामलीला खानाबदोश है। रामलीला मंचन हर दिन अलग जगह पर होता है और राक्षस का वध होने पर वहीं पुतला दहन भी किया जाता है। आप भी देखिए गाजीपुर की ये खानाबदोश रामलीला।

गोरखपुर में रामलीला- गोरखपुर में रामलीला की शुरुआत अतिप्राचीन है, लेकिन समिति बनाकर इसकी शुरुआत 1858 में हुई। तब गोरखपुर का पूरा परिवेश गांव का था। संस्कृति व संस्कारों के प्रति लोगों का गहरा लगाव था और अन्य जरूरी कार्यो की भांति इस क्षेत्र में भी वे समय देते थे। देखा जाए तो गोरखपुर में रामलीला का लिखित इतिहास 167 वर्ष पुराना है।

कुमायूं की रामलीला- कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई। जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व. देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में क्रमशः 1880, 1890 व 1902 में रामलीला नाटक का मंचन प्रारम्भ हुआ।

होशंगाबाद की रामलीला- करीब 125 साल पुरानी परम्परा होशंगाबाद के सेठानीघाट में आज भी निभाई जा रही है। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक त्रिवेणी बन चुकी इस रामलीला की शुरूआत वर्ष 1870 के आस-पास सेठ नन्हेलाल रईस ने की थी। हालांकि वर्ष 1885 से इसका नियमित मंचन शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।

सोहागपुर(होशंगाबाद)की रामलीला- सोहागपुर के शोभापुर में रामलीला का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। सन 1866 से शुरू हुई रामलीला मंचन की परंपरा को स्थानीय कलाकार अब तक जिंदा रखे हुए हैं। इतने लंबे अंतराल में कभी ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा जब गांव में रामलीला का मंचन न किया गया हो। आयोजन से जुड़े चंद्रगोपाल भार्गव ने बताया कि रामलीला की इस वर्ष 150 वीं वर्षगांठ है।

पीलीभीत की रामलीला- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मेला का बीसलपुर नगर में 150 वर्ष से भी अधिक पुराना गौरवमयी इतिहास है। दूर दराज से हजारों की संख्या में मेलार्थी लीलाओं का आंनद लेने आते हैं। रामलीला महोत्सव की आधारशिला डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रखी गयी थी। मेला मंच पर नहीं होता है, बल्कि रामनगर (वाराणसी) के मेला की तरह बड़े मैदान में होता है।

फतेहगढ़ (फर्रुखाबाद) की रामलीला- 150 साल पुरानी रामलीला को अंग्रेजों का भी सहयोग मिलता रहा है। तब यह परेड ग्राउंड में होती थी। 20 साल पहले सेना की छावनी बन जाने के बाद आयोजन सब्जी मंडी में होने लगा है।

दिल्ली की रामलीला- दिल्ली की सबसे पुराने रामलीला है परेड ग्राउंड की रामलीला। जो 95 साल पुरानी है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को जाने… 

रामनवमी विशेष… भगवान राम: आदर्श व्यक्तित्व

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India में ‘Made in China’

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उरी हमले के बाद से ही देशभर में पाकिस्‍तान के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्‍सा है। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कई कदम उठाए हैं। भारतीय सेना ने पीओके में सर्जिकल स्‍ट्राइक कर आतंकी कैंपों को बर्बाद किया। वहीं भारत सरकार पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता और सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (एमएफएन)का दर्जा वापस लेने की तैयारी कर रही है। लेकिन पाकिस्तान कि नापाक हरकतें जारी हैं। पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकी घुसपैठ कराने के लिए सीजफायर का उल्लघंन कर रहा है। यहां तक की उसकी इन हरकतों में चीन भी उसका साथ दे रहा है। चीन ने पाकिस्तान की शह पर तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का पानी रोका। यूएन में अपने वीटो पावर का उपयोग करके जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने का विरोध किया है। भारत के एनएसजी सदस्यता के प्रयास में वह रोड़ा बना। यह भारत के खिलाफ पाक की ‘चीनी साजिश’ है। जिसका भारत की जनता ने मुंहतोड़ जवाब देने का मन बना लिया है। देशभर में चीन के बने समान का बहिष्‍कार करने की अपील की जा रही है। यही नहीं चीन के खिलाफ भारतीयों का गुस्सा सोशल मीडिया पर भी दिख रहा है। ट्वीटर, फेसबुक पर लोग #BoycottChineseProducts लिखकर चीनी प्रोडक्ट्स पर बैन लगाने और इनके इस्तेमाल नहीं करने की अपील कर रहे हैं। स्वामी रामदेव और भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय खुद इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने चीन के सामान, चीन के साथ व्यापार का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। आइए जानते हैं भारत-चीन का कितना व्यापार है और देश में कैसे ‘मेड इन चाइना’ की बाढ़ आ गई…

भारत-चीन व्यापार
– भारत-चीन के बीच व्यापार संबंध मुख्य रिश्ते का आधार है।
– दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की बड़ी अर्थव्यस्थाओं में गिनी जाती है।
– दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते की शुरुआत साल 1978 में हुई थी।
– उद्योग संगठन ASSOCHAM के मुताबिक 2000-01 और 2013-14 के बीच भारत से चीन को निर्यात लगभग दोगुना हुआ।
– 2000-01 और 2013-14 के बीच भारत में चीनी सामानों का आयात रिकॉर्ड 34 गुना तक बढ़ चुका है।
– यह भारत के कुल आयात के 13 फीसदी से ज्यादा है।
– भारत और चीन के बीच अगर व्यापार की बात करें, तो ये 2003-2004 के7 अरब डॉलर था।
– जो 2014-15 में बढ़कर दोनों देशों के बीच लगभग 70 अरब डॉलर यानी 4.70 लाख करोड़ का हो गया है।
– जिसमें से भारत चीन को सिर्फ 79 हजार करोड़ रुपए का निर्यात करता है।
– जबकि 3.87 लाख करोड़ का भारत चीन से आयात करता है, यानी कुछ व्यापार घाटा 3 लाख करोड़ रुपए है।

बेडरूम में बाथरूम तक चीनी सामान
– करीब एक दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी।
– मेड इन चाइना सामान अधिक टिकाऊ और मजबूत न सही, लेकिन अपेक्षाकृत सस्ता होता है।
– सस्ता होने से कारण व्यापारियों और आम जनता में चीनी सामान पहली पसंद बन गए।
– इसके पीछे चीन का थोक उत्पादन पर बल और भारत की उत्पादन क्षमताओं में कमियां जिम्मेदार थीं।
– साथ ही चीन में 46 फीसदी स्किल वर्कस हैं जबकि भारत में सिर्फ 2 फीसदी।
– चीन निर्मित सामान अब इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक ही सीमित नहीं रह गए।
– दीवाली, होली, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहारों पर चाइना मेड सामान की मार्केट में भरमार हो गई।
– देश के सबसे बड़े होलसेल मार्केट सदर बाजार में ‘मेड इन चाइना’ सामानों की बाढ़ सी आ गई है।
– डेढ़ दशक पहले तक इस बाजार में चाइनीज सामान की हिस्सेदारी 30 फीसदी थी, जो आज 60-70 फीसदी हो गई है।
– जूते, टीशर्ट, खिलौने, साइकिल, टेलीविजन, कैलकुलेटर, घड़ियां, पंखे, ताले, बैटरियां, साइकिल।
– देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, ऑटो पाटर्स भारत में उपलब्ध है।
– ‘यूज एंड थ्रो’ की संस्कृति चीन में रही वही आदात भारत में जनता को लगा दी गई।
– बाथरूम के सामान से लेकर बेडरूम का सामान भारतीय मार्केट में भर गया था।
– सस्ता माल पाकर भारतीय काफी खुश हुए थे और धीरे-धीरे देश भर में चीनी सामान का ढेर लग गया।
– इसकी मार कमजोर देसी उत्पादकों पर पड़ी घड़ी उद्योग, खिलौना उद्योग, साइकिल उद्योग बर्बादी के कगार पर आ गए।
– कई छोटी भारतीय इकाइयों पर ताला पड़ गया, जबकि बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे ठौर तलाशने लगी।
– चीनी निर्यात पर भारत की निर्भरता को सबसे बेहतर ऊर्जा क्षेत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है।
– आज भारतीय परियोजनाओं के लिए करीब 80 फीसदी पावर प्लांट उपकरण चीन से मंगाए जाते हैं।

भारतीय उद्योग को लगाई चीनी कंपनियों ने चपत
– भारतीय बाजार में ब्रांड कंपनियों का 25 हजार रुपए में मिलने वाला टेबलेट चीनी ब्रांड में मात्र दो से पांच हजार रुपए में मिल जाता है।
– इतना ही नहीं, खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्तियां, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे चीनी उत्पाद भारत में किफायती दरों पर उपलब्ध हैं।
– होली के मौके पर चीनी रंगों, पिचकारी और स्प्रिंकल्स की भी भारत में भरमार रहती है।
– ऐसे में भारतीय रंग की तुलना में चीनी रंग और पिचकारी साठ फीसद तक सस्ते रहते हैं।
– भारत के रंगों से जुड़े पचहत्तर फीसद कारोबार पर चीन ने कब्जा कर लिया है।
– एक अध्ययन के मुताबिक, पूरे देश में छह सौ टन चीनी गुलाल का इस्तेमाल होता है।
– चीनी पटाखों के कारण शिवकाशी का पटाखा उद्योग बर्बादी के कगार पर आ चुका है
– देश में पटाखों का कारोबार करीब 6,000 करोड़ रुपये का है।
– जिसमें से अकेले चीनी पटाखों ने करीब 1000 करोड़ रुपये पर कब्जा कर लिया है।
– सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज की मानें तो सॉफ्टवेयर और संगीत ऐसे क्षेत्र हैं जहां धड़ल्ले से चीनी नकली माल बाजार में उपलब्ध हैं।
– इनके अलावा, नकली किताबों का 4 करोड़ 80 लाख डॉलर का, फिल्मों का 97 करोड़ डॉलर का।
– ऑटो के कलपुर्जों का 1.25 अरब डॉलर का और नकली सॉफ्टवेयर का 30 अरब डॉलर का कारोबार भारत में चल रहा है।
– पिछले साल ऑनलाइन कारोबार के जरिये बेचे गए 40 फीसद चीनी प्रोडेक्ट की गुणवत्ता घटिया और नकली थी।

चीनी बाजार में भारत की पहुंच आसान नहीं
– भारत लगातार अपने फार्मास्युटिकल, कृषि, मांस और आईटी सेवाओं के चीनी बाजार में आसान पहुंच की मांग करता रहा है।
– दवा, आईटी/आईटीईएस और एग्री कमोडिटीज के चीन को निर्यात में सबसे बड़ी बाधा नॉन टैरिफ बैरियर रही है।
– CII के अनुसार चीन ने अपने यहां ऐसे नियम बना रखे हैं कि भारतीय कम्पनियों या तो वहां मिलने वाले ठेकों के लिए योग्य ही नहीं मानी जाती।
– चीन के कुछ राज्यों में स्थानीय कंपनियों को सब्सिडी दी जाती है जिससे भारतीय कम्पनियां लागत ज्यादा होने से प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं।
– दवा कंपनियों की बात करें तो उन्हें प्रवेश में ही सबसे बड़ी मुश्किल आती है।
– चीन में दवा की बिक्री के लिए दवा के पंजीकरण में तीन से पांच साल तक का वक्त लग जाता है
– भारत ने डब्ल्यूटीओ में चीन के भारतीय बफैलो मीट के आयात पर प्रतिबंध के फैसले पर भी सवाल खड़े किए थे।
– भारत चीन को 40 प्रतिशत लौह-अयस्क निर्यात करता है, अन्य निर्यात वस्तुओं में प्लास्टिक के उत्पाद, इस्पात, रसायन, सोयाबिन तेल हैं।

नकली सामान के निर्यात में सबसे आगे चीन
– चीन हर साल 500 अरब डालर यानी 33 लाख करोड़ रुपए का नकली और पायरेटेड सामान दुनियाभर में सप्लाई करता है।
– वैश्विक स्तर पर जब्त आयातित नकली उत्पादों में 63.2 प्रतिशत के साथ चीन पहले स्थान पर है।
– इसका सर्वाधिक नुकसान यूरोपीय संघ व अमेरिका की कंपनियों को उठाना पड़ रहा है।
– नकली वस्तुओं के व्यापार से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में अमेरिका पहले नंबर पर है।
– चीन हर साल अमेरिका में 32 लाख करोड़ का निर्यात करता है जिसमें ज्यादातर चीजें नकली होती है।
– आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है।
– सौ से ज्यादा भारतीय कंपनियों को चीनी कंपनियों ने धोखा दिया है।
– खुद भारतीय दूतावास कह चुका है कि चीनी कंपनियों के साथ समझौते करने से पहले जांच-परख लें।
– रसायन, स्टील, सौर ऊर्जा, ऑटो वील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हार्डवेयर से जुड़ी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में लिप्त रही हैं।

चीनी सामान पर बैन
– भारत सरकार ने चीन से आने वाले घटिया प्रकार के दूध व दुग्ध उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया।
– साथ ही कुछ विशेष प्रकार के मोबाइल फोनों को 24 अप्रैल 2016 में बैन किया।
– इससे पहले 23 जनवरी 2016 को भी चीनी खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था।
– 27 अप्रैल 2016 को लोकसभा में भाजपा की ओर से ही चीनी मांझे का मुद्दा उठाया गया।
– मोदी सरकार ने हाल ही में चीन से आयातित पटाखों पर बैन लगाया

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#IndusWatersTreaty: जानिए #India #Pakistan के बीच हुए इस समझौते की पूरी ABCD…

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उरी हमले के बाद से भारत का गुस्सा पाकिस्तान को लेकर चरम पर है, इस बात को पीएम मोदी भी अच्छी तरह से जानते हैं। इसीलिए पहले उन्होंने शनिवार को पाकिस्तान को सीधे शब्दों में कड़ी चेतावनी दी और आज पीएम मोदी एक बड़ा फैसला लेने जा रहा है। फैसला जो पाकिस्तान को बना सकता है रेगिस्तान। फैसला तो पाकिस्तान को पानी की एक-एक बूंद का मौहताज कर सकता है। जी हां पीएम मोदी आज दोपहर 12 बजे सिंधु जल समझौता पर बैठक लेने जा रहे हैं। बैठक में जल संसाधन मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। पीएम इन सीनियर अफसरों से समझौते पर ब्रीफिंग लेंगे। माना जा रहा है कि पीएम सिंधु जल समझौते पर सख्त फैसला ले सकते हैं।

भारत समझौता तोड़ सकता है, विदेश मंत्रालय कर चुका है इशारा-22 सितंबर को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने सिंधु जल समझौते पर पूछे गए सवाल पर कहा था, किसी भी समझौते के लिए आपसी भरोसा और सहयोग जरूरी होता है। जब उनसे बयान को स्पष्ट करने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि कूटनीति में कई बातें पूरी तरह से साफ-साफ नहीं कही जाती हैं। फिलहाल वर्तमान में पाकिस्तान के साथ जो स्थिति है उसमें भरोसा और सहयोग दोनों ही दूर-दूर तक नहीं दिखते। अगर भारत सिंधु जल समझौता तोड़ देता है तो पाकिस्तान पानी के लिए तरस जाएगा। पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत रेगिस्तान बन जाएगा। यही कारण है कि भारत से पाकिस्तान की जंग कश्मीर और कश्मीरियों के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ पानी के लिए है। आइए जानते हैं आखिर क्या है सिंधु जल समझौता…

क्या है सिंधु जल समझौता…

– सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 में छह नदियों के पानी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था।
– समझौता पर भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाक राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
– सिंधु नदी संधि विश्व के इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा माना जाता है।
– अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति ने 2011 में इस संधि को दुनिया की सफलतम संधि करार दिया था।
– समझौते के तहत छह नदियां आती हैं सिंधु, चेनाब, झेलम ब्यास, रावी और सतलुज।
– इसके तहत पाकिस्तान को 80.52 फीसदी पानी यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी सालाना दिया जाता है।
– समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया।
– सतलुज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया।
– भारत पूर्वी नदियों सतलुज, ब्यास और रावी के पानी को पूर्ण रूप से इस्तेमाल कर सकता है।
– जबकि पश्चिमी नदियों झेलम, चेनाब और सिंधु का पानी किसी रुकावट पाकिस्तान को देना स्वीकार किया।
– लेकिन साथ ही भारत पश्चिमी नदियों का पानी बिजली, सिचांई और भंडारण के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
– समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई, जिसमें दोनो देशों ने कमिश्नर नियुक्त किए।
– अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी जानकारी देनी होगी।
– अगर किसी देश को कोई आपत्ति है तो दोनों देशों के कमिश्नर बैठक कर उसका हल निकालेंगे।
– अगर आयोग समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाती हैं तो सरकारें उसे सुलझाने की कोशिश करेंगी।
– अगल मामला नहीं सुलझता तो कोर्ट ऑफ आर्ब्रिट्रेशन में जाने का भी रास्ता खुला है।

पाकिस्तान को क्या फायदा मिल रहा है…
– इन छह नदियों के पानी से पाकिस्तान में कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
– इन्हीं नदियों की वजह से पाकिस्तान का उत्तरी और पश्चिमी भाग हरा-भरा है।
– इन्हीं नदियों ने पाकिस्तान के 65 फीसदी भू-भाग इस्लामाबाद से कराची तक को उपजाऊ बना रखा है।
– इन्हीं नदियों बेसिन में पाकिस्तान का 70 फीसदी अनाज उगता है।
– 2.6 करोड़ एकड़ कृषि भूमि सिंचाई के लिए इन नदियों के जल पर निर्भर है।
– इन्हीं नदियों बेसिन में पाकिस्तान की 36 फीसदी बिजली का उत्पादन होता है।
– यूनेसको के सर्वे के अनुसार 20 करोड़ की आबादी में से 15 करोड़ लोग सिंधु नदी बेसिन में रहते हैं।
– यहीं नहीं पाकिस्तान के दोनों बड़े न्यूक्लियर प्लांट चश्मा और खुशाब भी इन्हीं नदियों के किनारे पर लगे हैं।
– चश्मा के चारों न्यूक्लियर प्लांट पंजाब के मिंयावली में सिंधु नदी के किनारे लगे हैं।
– ऐसे ही खुशाब के चारों न्यूक्लियर प्लांट पंजाब के सरगोधा में चेनाब नदी के किनारे लगे हैं।

पाकिस्तान पर क्या होगा असर…
– अगर यह समझौता भारत रद्द कर देता है तो पाकिस्तान का 65 फीसदी भू-भाग बंजर हो जाएगा।
– पाकिस्तान की दो तिहाई आबादी पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमान करने लगेगी।
– सिंधु और उसकी सहायक पांच नदियां पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से की प्यास बुझाती हैं।
– पाकिस्तानी अखबार ट्रिब्यून ने भी माना है कि सिंधु के पानी के बगैर देश का एक हिस्सा रेगिस्तान बन जाएगा।
– सिंधु, झेलम और चेनाब के पानी से पाकिस्तान में 36 फीसदी बिजली बनाई जाती है।
– अगर यह समझौता रद्द हो गया तो पाकिस्तान में बिजली को लेकर हाहाकार मच जाएगा।
– इसके अलावा इन तीनों नदियों से सिंचाई भी की जाती है, 70 फीसदी अनाज उगता है।
– अगर यह समझौता रद्द हो गया तो पाकिस्तान में आकाल के हालात पैदा हो जाएंगे।
– यही नहीं पाकिस्तान के दोनों बड़े न्यूक्लियर प्लांट चश्मा और खुशाब ठप पड़ जाएंगे।
– कर्ज में गले तक डूबे पाकिस्तान के लिए यग झटका सहन करना आसान नहीं है।

कई बार इंटरनेशनल कोर्ट के चक्कर लगा चुका है पाकिस्तान…
– चेनाब नदी पर बगलिहार और स्वलाकोते जलविद्युत परियोजनायें बन रही हैं।
– वहीं झेलम की सहायक नदियों पर दुलहस्ती और किशनगंगा परियोजनायें चल रही हैं।
– किशनगंगा प्रोजेक्ट को लेकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत हेग जा चुका है।
– 17 मई 2010 को भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत का रुख किया था।
– जिस पर 2013 को भारत के पक्ष में फैसला देते हुए पाकिस्तान की आपत्तियों को खारिज कर दिया।
– किशनगंगा प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है और सिर्फ कमीशन किया जाना बाकि है।
– किशनगंगा के अलावा भारत बगलिहार वूलर बैराज व तुलबुल परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है।

क्या भारत समझौता रद्द कर सकता है…

क्यों कर सकता है समझौता रद्द-
इस संधि को तोड़ने की मांग भारत में कई बार उठ चुकी है। 2005 में इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट और टाटा वाटर पॉलिसी प्रोग्राम ने भी इसे खत्म करने की मांग की थी। इनकी रिपोर्ट के मुताबिक संधि के चलते जम्मू-कश्मीर को हर साल 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। अकूत जल संसाधन होने के बावजूद इस संधि के चलते घाटी को बिजली नहीं मिल पा रही है। घाटी 20 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता रखती है, लेकिन उत्पादन हो रहा है सिर्फ 3200 मेगावाट।

– पूर्व वित्त और रक्षा मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने न्यूज 24 से किया खुलासा।
– यशवंत सिन्हा के मुताबिक भारत को पाकिस्तान से सिंधु जल समझौता रद्द कर देना चाहिए।
– क्योंकि किसी भी तरह के समझौते दोस्तों के बीच होते हैं ना कि दुश्मनों के बीच।
– यशवंत सिन्हा ने समझौता रद्द करने के लिएपांच मुख्य वजहें भी बताई है।
– पहली- 1972 शिमला समझौता, जिसे पाकिस्तान ने किया लेकिन आजतक पालन नहीं कर रहा।
– दूसरा- 1999 लाहौर समझौता, दोस्ती के बड़े हाथ की जगह करगिल में घुसपैठ कर पीठ में मारा चाकू।
– तीसरा- 2003 सीजफायर समझौते का उल्लंघनः पाक सेना लगातार सीमा पर फायरिंग करती रहती है।
– चौथा- 2004 इस्लामाबाद समझौते का उल्लंघनः पाकिस्तान ने माना था कि उसकी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी करते हैं।
– पांचवां- 2015 ऊफा समझौते का उल्लंघनः द्पक्षीय वार्ता में कश्मीर मुद्दा नहीं उठेगा, लेकिन पाकिस्तान ने नहीं माना।

क्यों नहीं कर सकता है समझौता रद्द-
– सिंधु नदी का उद्गम चीन से होता है, इसलिए इसमें तीन पार्टियां हैं।
– भारत पाकिस्तान के अलावा चीन भी शामिल है ऐसे में भारत एकतरफा कदम उठाने के बारे में नहीं सोच सकता है।
– 1965, 1971 और 1999 के करगिल युद्ध हों या कश्मीर में आतंकवाद, यह समझौता आज तक नहीं टूटा।
– 1960 में वर्ल्ड बैंक ने सिंधु जल समझौते में मध्यस्थता की थी, इस तरह से भारत, पाक के अलावा इस समझौते का एक तीसरा पक्ष भी है।
– सामरिक मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं, यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका मतलब है कि भारत अकेले इसे खत्म नहीं कर सकता
– अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब यह होगा कि हम कानूनी रूप से लागू संधि का उल्लंघन कर रहे हैं
– विशेषज्ञों का कहना है कि सिंधु जल समझौते की वजह से ही भारत इन नदियों पर कई प्रॉजेक्टस चला रहा है।
– इसकी मदद से भारत को जम्मू-कश्मीर में 1999 में बगलिहार डैम के लिए हरी झंडी मिली।
– इसी से 2007 में किशनगंगा प्रॉजेक्ट में भारत को पॉवर जेनरेशन करने का अधिकार मिला।
– पाकिस्तान यह मामला हेग की इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में ले गया, जहां इस संधि के आधार पर फैसला भारत के पक्ष में आया।

Western Rivers

सिंधु नदी- सिंधु को Indus River भी कहा जाता है। इस नदी का उद्गम तिब्बत स्थित मानसरोवर झील से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल भी यही है। सिंधु नदी तिब्बत, भारत तथा पाकिस्तान में बहते हुए अरब सागर में मिल जाती है। सिंधु नदी की कुल लंबाई लगभग 2880 किमी है तथा यह भारत में 992 किमी लम्बी है। हिमालय से गुजरती हुई, कश्मीर और गिलगिट से होती यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और मैदानी इलाकों में बहती हुई 1610 किमी का रास्ता तय करती हुई कराची के दक्षिण में अरब सागर से मिलती है। सिंधु दुनिया की 21 सबसे बड़ी नदियों में से एक है। सिंधु को Indus भी कहा जाता है जिसके नाम पर हमारे देश का नाम India पड़ा। तिब्बत, भारत और पाकिस्तान से होकर बहने वाली इस नदी में कई अन्य नदियां आकर मिलती हैं, जिनमें झेलम, चिनाब, रावी और सतलुज, व्यास सतलुज में मिलकर सिंधु तक पहुंचती है। 5500 से 8000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता भी इसी सिंधु नदी के किनारे विकसित हुई थी। जम्मू कश्मीर होकर पाकिस्तान में बहने वाली सिंधु नदी के आसपास आज भी करीब 30 करोड़ की आबादी बसती है। पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी इसी नदी पर निर्भर है। पीने से लेकर खेती और बिजली के लिए पाकिस्तान को सिंधु का ही सहारा है। 

45 MW Nimoo-Bazgo Hydroelectric- power project on the Indus River situated at Alchi village, 75KM from Leh, PM Modi inaugurated on Aug 2014.

44 MW  Chutak Hydroelectric Plant- power project on the Suru River (a tributary of Indus) in Kargil, PM Modi inaugurated on Aug 2014.

झेलम नदी- झेलम नदी का उद्गम कश्मीर घाटी की शेषनाग झील के निकट बेरनाग नामक स्थान से हुआ है। वूलर झील में मिलने के बाद यह पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं तथा चेनाब नदी में मिल जाती है। झेलम नदी की की कुल लंबाई 724 किमी है एवं भारत में इसकी लंबाई 400 किमी है

480 MW Uri Dam- hydroelectric power station on the Jhelum River near Uri in Baramula of J&K, located very near to the Line of Control, project was awarded by the National Hydroelectric Power Corporation in October 1989. On 4 July 2014 a 240 MW Uri-II power project was inaugurated.

330 MW Kishanganga Hydroelectric Plant-hydroelectric Projectthat is designed to divert water from the Kishanganga River to a power plant in the Jhelum River basin. It is located 5 km (3 mi) north of Bandipore in Jammu and Kashmir, India and will have an installed capacity of 330 MW. Construction on the project began in 2007. Project includes a 37 m (121 ft) tall concrete-face rock-fill dam which will divert a portion of the Kishanganga River south through a 24 km (15 mi) tunnel.

चेनाब नदी- चेनाब नदी हिमाचल प्रदेश के लाहौल के बारालाचा दर्रे से निकलती हैं। यह पीर पंजाल के समांतर बहते हुए किशतबार के निकट पीर पंजार में गहरा गार्ज बनाती है। भारत में चेनाब नदी की लंबाई 1180 किमी है। यह पाकिस्तान में जाकर सतलज नदी में मिल जाती है।

The government wants to expedite work on three hydro power projects in Sawalkote, Pakal Dul and Bursar on the Chenab and its tributary in Jammu and Kashmir after it reviewed the Indus Waters Treaty on Monday following the Uri attack and deterioration of ties with Pakistan.

1856 MW Sawalkot Dam- The biggest of three is the Sawalkote project in Ramban district on the Chenab river with a 192.5-metre dam and an expected power generation capacity of 1856 MW . The project is being constructed by Jammu and Kashmir State Power Development Corporation (JKSPDC).

1000 MW Pakal-Dul Dam- The Pakal Dul project has an estimated capacity of 1000 MW and is to be constructed on the Marusudar, the main tributary of the Chenab at village Drangdhuran about 45kms from Kishtwar town. It is being constructed by Chenab Valley Power Projects Limited, a joint venture of JKSPDC, NHPC and Power Trading Corporation (PTC). The project envisages a 167-metre high dam and an underground power house near village Dul.

800 MW Bursar Dam- Bursar Hydroelectric Project, has an estimated capacity of 800 MW and is to be constructed on the Marusudar, the main tributary of the Chenab at Doda district. which is to be constructed by the NHPC, is a “storage project” planned in Kishtwar district but is currently under survey and investigation for preparation of a detailed report. Marusudar is the biggest tributary of the ChenabMarusudar

690 MW Salal Hydroelectric Project- Salal – I & II Hydroelectric Project is constructed on river Chenab near Reasi in Udhampur district. project commenced in 1961 by the state government of J&K and construction was started in 1970 by Central Hydroelectric Project Control Board under Ministry of Irrigation and Power.

900 MW Baglihar Dam- Baglihar Hydroelectric Power ProjecT on the Chenab River in the southern Doda district  with a 144 metre dam and an expected power generation capacity of 900 MW. This project was conceived in 1992, approved in 1996 and construction began in 1999. The project is estimated to cost USD $1 billion. The first phase of the Baglihar Dam was completed in 2004. With the second phase completed on 10 October 2008, Prime Minister Manmohan Singh of India dedicated the 900-MW Baglihar hydroelectric power project to the nation.

Eastern Rivers

रावी नदी- रावी नदी हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे से निकलती है एवं पाकिस्तान के मुल्तान के समीप चेनाब नदी में मिल जाती है। इस नदी की लंबाई 720 किमी है।

व्यास नदी- इस नदी का उद्गम हिमालय के रोहतांग दर्रे के समीप व्यास कुण्ड से हुआ है । यह कुल लंबाई 470 किमी तय करते हुए पंजाब में सतलज नदी में मिल जाती है।

सतलुज नदी- सतलज नदी का उद्गम तिब्बत स्थित मानसरोवर झील के निकट राक्षसताल से हुआ है। यह नदी अपने उद्गम स्थल से 1500 किमी दूरी तय करके पाकिस्तान में चेनाब नदी में मिल जाती है। भारत में सतलज नदी की लंबाई 1050 किमी है। प्रसिद्ध भाखड़ा – नागल बांध सतलज नदी पर ही बना है।

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#USPresidentialElection2016: #Hillary और #Trump का #INDIA प्रेम, जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के बीच भारतीय समयानुसार आज सुबह पहली लाइव टीवी डिबेट हुई। जिसे पूरी दुनिया में करोडो़ं लोगों ने देखा। 90 मिनट चली इस बहस पर भारतीयों की भी नजर थी। खासकर भारतीय मूल के अमेरिकी वोटर्स की, जिनकी संख्या लगभग 30 लाख है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में भारतीय मूल के वोटर्स की खासी अहमियत होती है और उन्हें अपनी तरफ खींचने के प्रयास ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ दोनों ही पार्टी के उम्मीदवार करते रहते हैं। लेकिन इस बार 2016 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय वोटर इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि इस वोट बैंक को हथियाने के लिए दोनों ही दल कुछ ऐसा कर रहे हैं जैसा कि पहले के चुनाव में कभी नहीं हुआ। जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

डोनाल्ड ट्रम्प का भारत प्रेम
– जहां एक ओर अमेरिकी विदेश मंत्री भारतीय मूल के वोटरर्स को रिझाने में लगे हैं।
– तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प भी पीछे नहीं हैं।
– ट्रंप इसी महीने की 24 तारीख को हिंदू संस्था के कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं।
– अमेरिका में हिंदू संस्था रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)के कार्यक्रम में शिरकत करने वाले हैं ट्रंप।
– अमेरिकन-इंडियन बिजनेसमैन शलभ कुमार ने डोनाल्ड ट्रम्प का खुलकर सपोर्ट किया है।
– शलभ ने ट्रंप के समर्थन में उनकी पार्टी को 7 करोड़ का डोनेशन भी दिया है।
– शलभ कुमार ने ही 2015 में रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)नाम की संस्था बनाई है।
– शलभ कुमार ने कहते हैं कि 21वीं सेंचुरी को ट्रंप इंडिया-यूएस सेन्चुरी बनाना चाहते हैं।
– एक इंटरव्यू में शलभ ने कहा- ट्रम्प को गलत समझा जा रहा है, वे एंटी-इंडिया नहीं हैं।
– शलभ कुमार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका में प्रभावशाली समर्थकों में से एक हैं।
– रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं।
– जब मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे तो ट्रंप ने कहा था कि सालों की सुस्ती के बाद निवेशक अब भारत लौट रहे हैं।
– ट्रंप ने कहा था, ‘मोदी से मेरी मुलाकात नहीं हुई है लेकिन वह प्रधानमंत्री के रूप में शानदार काम कर रहे हैं।
– मोदी लोगों को साथ ला रहे हैं, अब भारत के बारे में अब धारणा बदल रही है और आशावाद लौट रहा है।
– ट्रंप ने कहा था कि भारत और चीन की एक जैसी शुरुआत हुई, इंडिया अच्छी तरक्की कर रहा है।
– हाल ही में ट्रंप ने एक चुनावी सभा में भारतीयों का मजाक उड़ाते हुए उनकी अंग्रेजी की नकल उतारी थी।
– लेकिन तुरंत ही सफाई देते हुए भारत को एक महान देश बताते हुए कहा था कि वह भारतीय नेताओं से नाराज नहीं है।
– डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के लिए हिन्दू सेना के कार्यकर्ता दिल्ली के जंतर-मतंर पर हवन-पूजन भी कर चुके हैं।

इस चुनाव में ‘रिपब्लिकन’ का झुकाव भी भारत की ओर…
– अमेरिका और भारत के साझा इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ पार्टी के उम्मीदवार भारत के प्रति झुकाव रखने वाले हैं।
– डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन भारत से भावनात्मक तौर पर जुड़ी हुई हैं तो रिपब्लिकन ट्रंप राजनीतिक-रणनीतिक तौर पर भारत के समर्थक हैं।
– ओबामा से पहले राष्ट्रपति रहे जार्ज बुश ने तेजी से बदलती दुनिया को समझा और चीन की कीमत पर भारत से संबंध बढ़ाए।
– जिसे 2014 के बाद मोदी और ओबामा ने भी जारी रखा… अब बारी ट्रंप और हिलेरी की है मोदी सरकार के साथ दोस्ती बनाए रखने की।
– साल 2014 में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी 65 फीसदी भारतीय डेमोक्रेटिक पार्टी के पाले में हैं।

हिलेरी क्लिंटन का भारतीय कनेक्शन
– अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद क्लिंटन अगर राष्ट्रपति बनती हैं तो वो पहली महिला राष्ट्रपति होंगी.
– भारत से उनका एक खास नाता रहा है, बिल क्लिंटन के 1992 में राष्ट्रपति बनने के बाद मार्च 1995 में वे भारत आई थीं.
– इसके बाद 1997 में मदर टेरेसा की मृत्यु और 2000 में आखिरी बार बतौर फर्स्ट लेडी भारत आईं थी
– इसके बाद ओबामा सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद 2009 में भारत का दौरा किया था.
– बतौर विदेश मंत्री 2009 में उनकी उपलब्धि रही कि चीन और भारत को ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के लिए राजी किया.
– 2008 में अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर डील पर सीनेटर हिलेरी क्लिंटन ने आश्वासन दिया था कि डेमोक्रेट्स न्यूक्लियर डील की राह में रोड़ा नहीं बनेंगे.
– 2011 और 2012 में ओबामा सरकार में बतौर विदेश मंत्री भारत यात्रा पर कई व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.
– अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सोमवार को कहा कि अमेरिका और भारत जितना चाहते थे,
– हिलेरी समय-समय पर पाकिस्तान में बढ़ते आतंकवाद का मुद्दा भी उठाती रही हैं
– 2009 की यात्रा के दौरान 26/11 हमले के लेकर उन्होंने पाकिस्तान को चेताया कि भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने वाले आतंकवादी गुटों का सफाया करे.
– 2012 में उनका बयान कि “आतंकवाद से निपटने में नाकाम रहा पाकिस्तान” ने पाक सरकार को आतंकवाद के लिए कार्यवाही करने पर मजबूर किया.

भारतीय मूल के वोटर्स का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर रहा है…
– अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में मुख्यतौर पर दो पार्टियां चुनावी मैदान में रहती हैं- डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी।
– अमरीका में बसे भारतीय-अमरीकी समुदाय ने पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी को ही समर्थन माना जाता रहा है।
– भारतीयों का झुकाव डेमोक्रेट उम्मीदवार की और रहने का कारण है प्रवासियों, मध्यम वर्ग और छात्रोंके प्रति उनकी नीतियां।
– Pew Research Centre के आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में 80 फीसदी प्रवासी भारतीयों ने डेमोक्रेट को अपना वोट दिया था
– भारतीय-अमरीकी लोगों की संख्या 30 लाख है, केवल 16 फीसदी ही रिपब्लिकन उम्मीदवारों का पक्ष में रहे हैं।
– रिपब्लिकन पार्टी के कई सिनेटर भारतीय अमरीकियों पर नस्लभेदी टिप्पणी करते रहे हैं, जिससे भारतीय समाज नाराज है।
– भारतीय ही नहीं एशियाई मूल के ज्यादातर अमरीकी लोग डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति सबसे ज्यादा झुकाव दिखाते रहे हैं।

इस चुनाव से भारतीयों को क्या उम्मीद है…
– आज भारतीय-अमरीकी मूल के 70 फीसदी लोगों के पास कॉलेज डिग्री है और दो तिहाई के पास मैनेजमैंट नौकरियां हैं।
– इनकी मीडियन आमदनी 88 हजार डॉलर है जो अमरीका में सबसे ज्यादा है।
– अमरीका में रहने वाले जो भारतीय भारत में पले बढ़े हैं, वो चाहते हैं कि अमरीका सरकार अच्छा काम करे।
– ज्यादातर भारतीय-अमरीकी लोग मध्यम वर्ग से हैं और उन्हें लगता है कि डेमोक्रेटिक ही उन मुद्दों को सुलझाएंगे जो उनके दिल के करीब हैं।
– आउटसोर्सिंग पर अंकुश, कॉलेज शिक्षा की बढ़ती कीमत और सोशल सेक्यूरिटी को बचाए रखना जैसे कई मुद्दे हैं।
– भारतीय-अमरीकी लोगों को सोशल सेक्यूरिटी का प्रावधान पसंद है क्योंकि कई लोगों के बूढ़े माता-पिता रिटायरमेंट के बाद उनके पास अमरीका आ जाते हैं।

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कृष्ण जन्माष्टमी: दही-हांडी उत्‍सव- इतिहास, परम्परा और महत्व…

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दही-हांडी उत्सव भारत में सदियों से धूमधाम से मनाया जाता रहा है। महाराष्ट्र में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। जन्माष्टमी के दिन होने वाले इस उत्सव में लाखों युवा उत्साह से भाग लेते हैं। लोगों के उत्साह को देखते हुए राजनीतिक दल भी दही हांडी महोत्सव में पीछे नहीं रहते। बड़े-बड़े आयोजकों में कई राजनेता शामिल हैं जो ऊंची-ऊंची टंगी दही-हांडियों पर इनामी राशी रखते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसी दही हांडी महोत्सव के बारे में…

कैसे हुई दही हांडी परम्परा की शुरुआत

उत्‍सव की पौराणिक मान्‍यता…
– कृष्ण पुराण की कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ माखन की चोरी किया करते थे।
– भगवान कृष्ण ऊपर चढ़कर पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा दही और माखन चुराया करते थे।
– जब वे गोकुल के घरों में मटकियां फोड़ने का प्रयास करते थे, तो महिलाएं उन्हें रोकने के लिए पानी फेंकती थी।
– कान्‍हा के इसी रूप के कारण बड़े प्‍यार से उन्‍हें ‘माखनचोर’ कहा जाता है।
– हांडी फोड़ने वाले बच्चे को ‘गोविंदा’ कहा जाता है, जो ‘गोविंद’ का ही दूसरा नाम है।

1907 में मुंबई में शुरू हुई थी दही-हांडी की परम्परा…
– नवी मुंबई के पास घणसोली गांव में यह परंपरा पिछले 104 वर्षों से चली आ रही है।
– यहां सबसे पहले वर्ष 1907 में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई थी।
– यहां के हनुमान मंदिर में जन्माष्टमी के एक सप्ताह पहले से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाता है।
– जो दही-हांडी फोड़ने के साथ समाप्त होता है।
– दही-हांडी फोड़ने के लिए युवा लड़कों की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी मटकी तोड़ती थी।
– अंग्रेजी शासन काल में यह क्रांतिकारियों के गांव के रूप में प्रसिद्ध था।

ऐसे मनाया जाता है दही हांडी…
– दही-हांडी प्रतियोगिता में युवाओं का एक समूह पिरामिड बनाता है, जिसमें एक युवक ऊपर चढ़कर ऊंचाई पर लटकी हांडी, जिसमें दही होता है, उसे फोड़ता है।
– ये गोविंदा बनकर इस खेल में भाग लेते हैं। इस दौरान कई जगहों पर प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।
– आसपास के लोग दही-हांडी फोड़ने का प्रयास कर रही टोली पर पानी की बौछार करते हैं, ताकि वे आसानी से दही हांडी फोड़ न सके।
– प्रतियोगिता जीतने वालों पर लाखों के इनाम की बौछार होती है।
– पहले इसमें सिर्फ लड़के ही शामिल होते थे, लेकिन अब लड़कियों की टोली भी अपने जौहर को दिखा रही हैं।
– बॉलीवुड के डांस नंबर पर हजारों लोग पानी की बौछारों के बीच जमकर नाचते हैं।
– पूरे विश्व में दही हांडी की तरह ही कई अन्य फेस्टिवल रंगारंग ढंग से सेलिब्रेट किए जाते हैं।
– कहीं इन्हें रंगबिरंगी ड्रेस पहनकर, तो कहीं कीचड़ में, कहीं रात के अंधेरे और आग के बीच में इन्हें सेलिब्रेट किया जाता है।

मुंबई और आसपास ऐसे मनाई जाती है दही हांडी…
– एक-एक पथक में करीब 20 से 50 और बड़े गोविंदा पथक में 200 से 250 और इससे अधिक गोविंदा सदस्य शामिल होते हैं।
– मुंबई के कुछ प्रमुख गोविंदा पथकों में ऐरोली कोलीवाडा मंडल, ओमसाईं गोविंदा पथक, शिव गर्जना गोविंदा पथक, गोठिवली गोविंदा पथक हैं।
– मी राबाडाकर गोविंदा पथक, एकवीरा गोविंदा पथक, अभिनव मित्रमंडल, सामाजिक युवा मंच, दोस्ती ग्रुप व जय भवानी मित्रमंडल भी शामिल हैं।
– मुंबई ही नहीं, ठाणे, नवी मुंबई, डोंबिवली, कल्याण, उल्हासनगर, मीरा-भाईंदर, वसई-विरार तक दही हांडी उत्सव का आयोजन होता है।
– मुंबई के वरली में विशेष इंतजाम रहते हैं, तो उपनगरीय इलाकों में घाटकोपर, चेंबूर, अंधेरी, बोरिवली में गोविंदा पथकों का स्वागत किया जाता है।
– दादर में सबसे पहले दही हांडी फूंटती है, मुंबई में 100 से भी ज्यादा जगहों पर ये कार्यक्रम होता है।

परम्परा का ‘दही’ और राजनीति की ‘हांडी’

लाखों के इनाम होते हैं दही हांडी पर…
– पिछले कुछ सालों में महानगरी मुम्बई का दही हांडी उत्सव एक दिन में 25 करोड़ का टर्नओवर करता आ रहा है।
– उत्सव में करीब 1.5 लाख खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।
– जिसमें सबसे छोटा दल 20 सदस्यों का होता है तो सबसे बड़ा दल 250 सदस्यों का।
– मुंबई और आसपास करीब 3300 आयोजनकर्ता हैं जो उत्सव को संचालित करते हैं।
– इन आयोजनकर्ताओं में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– 2015 में 100 आयोजनकर्ताओं ने इनाम की राशी 50 हजार से ऊपर रखी थी।
– कई बड़े आयोजनकर्ता 3 लाख से लेकर 10 लाख तक की इनामी राशी रखते हैं।
– 2013 में एनसीपी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने एक करोड़ रुपये का इनाम रखा था।
– 2013 में सचिन अहीर ने भी एक करोड़ का इनाम रखा था।

दही हांडी और राजनेता…
– 3300 आयोजनकर्ता में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– प्रताप सरनाईक: शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक की संस्था संस्कृति युवा प्रतिष्ठान ठाणे के वर्तक नगर में हांडी लगाता है।
– जितेंद्र आव्हाड: एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड की संघर्ष संस्था ने पांच पाखाडी में दही-हांडी का आयोजन करते हैं।
– राजन विचारे: शिवसेना सांसद राजन विचारे की आनंद चैरिटेबल ट्रस्ट संस्था ठाणे के जांभली नाके पर दही हांडी लगाते हैं।
– रविंद्र फाटक: शिवसेना विधायक रविंद्र फाटक की संकल्प प्रतिष्ठान का दही हांडी आयोजन ग्लैमर से भरपूर रहता है।
– अविनाश जाधव: ठाणे शहर एमएनएस अध्यक्ष अविनाश जाधव भगवती मैदान में इस बार 11 लाख की दही हांडी आयोजन की है।
– गोविंदाओं का जोश बढ़ाने के लिए कई बड़े फिल्मी सितारे भी दही-हांडी महोत्सव में शामिल होते रहे हैं।

दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे रखते हैं खुद को फिट

गोविंदा आला रे आला! ये वह शबद है जो जन्माष्टमी के दिन मुंबई की हर गली में सुनाई देता है। गोविंदा पथक छोटी -बड़ी टोलियों में धूम मचाने ये गोविंदा घर-घर माखन चोरी करने पहुंचते हैं। मानव पिरामिड बनाकर ये गोविंदा दही-हाड़ी तोड़ते हैं। इस उत्सव को लेकर गोविंदाओं में जो उत्सुकता, जोश और खुशी दिखाई देती है उसके पीछे उनकी कई दिनों की मेहनत होती है। इसके लिए वे खुद को बहुत फिट रखते हैं। आइए जानते हैं कैसे दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे खुद को फिट रखते हैं…

तीन महीने पहले से शुरू हो जाता है अभ्यास…
– गोविंदा की एक टीम में 150 से 200 सदस्य शामिल होते हैं।
– हांडी फोड़ने का अभ्यास जन्माष्टमी के 3 महीने पहले शुरू हो जाता है।
– मांजगांव ताड़वाड़ी गोविंदा पथक उन ग्रुप्स में से है जो नौ मंजिल बनाकर दही हांडी फोड़ते हैं।
– इस कठिन करतब के लिए सभी गोविंदा सदस्य डेढ़ से तीन महीने पहले प्रैकिटस शुरू कर देते हैं।
– स्टेमिना बनाए रखने के लिए सभी गोविंदा कबड्डी, स्विमिंग और फुटबॉल जैसे खेल में भाग लेते हैं।
– इसके साथ ही रोजाना जिम भी जाते हैं, इस दौरान वे ब्राउन ब्रेड और डेयरी प्रोडक्ट ज्यादा खाते हैं।
– साथ ही ये गोविंदा प्रोटीन के भी अपनी डाइट में शामिल करते हैं।

होती है शारीरिक जांच…
– ट्रेनिंग की शुरुआत होने से पहले ही एक तरह से इनके शिविर आयोजित होते हैं। जहां पर इनके शरीर की पूरी जांच की जाती है।
– दही हंडी के त्योहार में हिस्सा लेने वाले बच्चे या नवयुवक को किसी भी तरह की कोई शारीरिक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
– हर बड़ा मंडल अपने सदस्यों का हेल्थ चेकअप करता है, ताकि हंडी को फोड़ने के लिए चढ़ते या उतरते समय किसी को कोई दिक्कत न हो।

दही हांडी के दिन कैसी होती है तैयारी…
– सुबह दूध और हल्का पौष्टिक ब्रेकफास्ट करके घर से निकलते हैं।
– सुस्ती से बचने के लिए दोपहर के लंच में चावल खाने से बचते हैं।
– दिनभर धूप में घूमने से डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है।
– इसालिए उन्हें ग्लूकोज, पानी और फ्रूट जूस दिया जाता है। द
– खास बात कि इस उत्सव में गोविंदा शराब नहीं पी सकते।
– अगर कोई अल्कोहल लेकर आया भी तो उसे भाग लेने से रोक दिया जाता है।

कराना पड़ता है बीमा…
– 24 फीट के ऊपर की मानव पिरामिड बनाने वाला हर एक मंडल को अपने हर सदस्य को बीमा करवाना पड़ता है।
– क्योंकि इस त्योहार के दौरान में सैकड़ों की तादाद में लोग घायल हो जाते हैं।
– इतनी ही नहीं जोश के चलते न जाने कितनों को तो अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
– इन्हीं सब दुर्घटनाओं को ध्यान में रखते हुए गोविंदाओं का बीमा करवाया जाता है।
– ताकि घायल या मृत्यु होने पर उसके परिवार को बीमा कंपनी की ओर से मुआवजा दिया जा सके।

लाखों का इनाम, लेकिन खर्चे भी कम नहीं…
– गोविंदाओं की मेहनत को देखते हुए लगता है कि इनकी कमाई तो सिर्फ नाम मात्र के लिए ही होती है।
– अगर सुबह से लेकर शाम तक इनकी कमाई लाखों में हो भी जाए तो इनके खर्चे भी उतने ही अधिक होते हैं।
– क्योंकि चाहें जितनी भी छोटी टीम हो, उसमें कम से कम 20 लोग तो जरूर होते हैं।
– इन सभी के लिए एक जैसी टी-शर्ट, खाना-पीना और गाड़ी-घोड़ा में ही सारे पैसे खर्च हो जाते हैं।
– हकीकत तो यह है कि ईनाम की राशि के अलावा गोविंदाओं की जेब से भी खर्चा हो जाया करता है।

जन्माष्टमी पर बॉलीवुड के मशहूर गोविंदा

फिल्म ब्लफमास्टर में शम्मी कपूर: 

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फिल्म मुकाबला में सुनील दत्त: 

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फिल्म खुद्दार में अमिताभ बच्चन: 

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फिल्म बदला में शत्रुघ्न सिन्हा: 

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फिल्म वास्तव में संजय दत्त: 

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फिल्म हैलो ब्रदर में सलमान खान: 

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फिल्म ओह माय गॉड में सोनाक्षी भी फोड़ेंगी दही-हांडी: 

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कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

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Independence Day: कैसे बना INDIA… 200 साल की गुलामी से आजादी की पहली सांस तक का सफर…

Tiranga

15 अगस्त 2016 को देश आजादी की 70वीं सालगिरह मनाएगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के लिए देशवासियों को कितना संघर्ष करना पड़ा था, कितनी कुर्बानियां देनी पड़ी थीं। भारत की आजादी के लिए 1757 से 1947 के बीच कई संघर्ष हुए। इन्हीं संघर्षों का नतीजा है कि आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आईए जानते हैं भारत की आजादी से जुड़ी यह अविश्वनीय कहानियां…

भारत की आजादी का इतिहास

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ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन

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ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी व्यापारिक कंपनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। 1708 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी ‘न्यू कम्पनी’ का ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ में विलय हो गया। परिणामस्वरूप ‘द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज’ की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख ‘गर्वनर-इन-काउन्सिल’ करती थी।

1757 प्लासी का युद्ध

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प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे ‘प्लासी’ नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराजुद्दौला को हरा दिया था। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहीं से भारत की दासता की कहानी शुरू होती है। पलासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश भारत में राजनीतिक सत्ता जीत गए और 200 साल तक राज किया।

ब्रिटिश सरकार की विस्तारवादी नीति…
– 1757 में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराने के बाद कर बंगाल पर अधिकार कर लिया।
– प्लासी की लड़ाई के बाद 1773 में रेग्युलेटिंग एक्ट लाया गया।
– एक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाना था।
– इसी एक्ट के तहत भारत में गवर्नर-जनरल का पद की सृष्टि की गई।
– सबसे पहले वारेन हेस्टिंग्स इस पद पर नियुक्त हुए वे 1774 से 1786 तक इस पद पर रहे।
– इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में विस्तारवाद की नीति पर काम करना शुरू कर दिया।
– 1792 में कंपनी ने टीपू सुल्तान को हराकर दक्कन (दक्षिण)पर अपनी पकड़ मजबूत की।
– 1819 में मराठो को हारने के बाद कंपनी ने देश में बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया।
– तब भारत कुल विश्व व्यापार में 23% की भागीदारी रखता था जबकि ब्रिटेन मात्र 1.5% था।
– 1848 में लॉर्ड डलहौजी उत्तर-पश्चिमी भारत में अपना मजबूत शासन स्थापित कर रहे थे।
– लेकिन नाराज और असंतुष्ट सैनिकों ने विद्रोह कर दिया
– जिसे आमतौर पर ‘1857 का विद्रोह’ या ‘1857 के गदर’ के तौर पर जाना जाता है।
– हालांकि ब्रिगेडियर नील जेम्स ने 11 जून को इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया।
– लेकिन विद्रोह के बाद 1858 में कंपनी को समाप्त कर दिया गया।
– भारत की सत्ता सीधे ब्रिटेन के सम्राट के अधीन आ गई।
– गवर्नर-जनरल के पद को वाइसराय कर दिया गया।
– लॉर्ड कैंनिंग को पहले वायसराय का पद प्रदान किया गया।

1857 का विद्रोह

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– यह गदर मेरठ में सैनिकों के विद्रोह से शुरु हुआ। उनके विद्रोह का कारण वो नई कारतूस थी जो नई एनफील्ड राइफल में लगती थी।
– इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी से बना ग्रीस था जिसे सैनिक को राइफल इस्तेमाल करने की सूरत में मुंह से हटाना होता था।
– यह हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के सैनिकों को धार्मिक कारणों से मंजूर नहीं था और उन्होंने इसे इस्तेमाल करने से मना कर दिया था जिसके चलते वो बेरोजगार हो गए।
– जल्दी ही यह विद्रोह फैल गया खासकर दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों में।
– इस विद्रोह ने दिल्ली, अवध, रोहिलखंड, बुंदेलखंड, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया।
– हालांकि तब भी 1857 का विद्रोह असफल कहलाया और एक साल के भीतर ही खत्म हो गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

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– ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना 28 दिसम्बर, 1885 ई. में दोपहर बारह बजे बम्बई में ‘गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज’ के भवन में की गई थी।
– इसके संस्थापक ‘ए.ओ. ह्यूम’ थे और प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्‍द्र बनर्जी बनाये गए थे।
– ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ में कुल 72 सदस्य थे, जिनमें महत्त्वपूर्ण थे- दादाभाई नौरोजी, फ़िरोजशाह मेहता, दीनशा एदलजी वाचा थे।
– इसका मुख्य लक्ष्य मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिकों के विचारों को आगे रखना था।

1906 में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन

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– कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन 1906 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में सम्पन्न हुआ।
– इस अधिवेशन में नरम दल तथा गरम दल के बीच जो मतभेद थे, वह उभरकर सामने आ गये।
– इन मतभेदों के कारण अगले ही वर्ष 1907 ई. के ‘सूरत अधिवेशन’ में कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये।
– अब कांग्रेस पर नरमपंथियों का कब्जा हो गया, इस अधिवेशन में चार प्रस्तावों को पास करवाने में सफल रहा-
          #स्वराज्य की प्राप्ति
          #राष्ट्रीय शिक्षा को अपनाना
          #स्वदेशी आन्दोलन को प्रोत्साहन देना
          #विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना

1905 में बंगाल विभाजन

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– लॉर्ड कर्जन 1899 में भारत का वाइसराय बनकर आए। 1905 में उन्होंने बंगाल विभाजन का कर दिया।
– विभाजन के सम्बन्ध में कर्ज़न का तर्क था कि तत्कालीन बंगाल, जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे।
– काफ़ी विस्तृत है और अकेला लेफ्टिनेंट गवर्नर उसका प्रशासन भली-भाँति नहीं चला सकता है।
– इसके फलस्वरूप पूर्वी बंगाल के ज़िलों की प्राय: उपेक्षा होती है, जहाँ मुसलमान अधिक संख्या में हैं।
– इसीलिए उत्तरी और पूर्वी बंगाल, ढाका तथा चटगाँव डिवीजन में आने वाले पन्द्रह ज़िलों को असम में मिला दिया गया।
– पूर्वी बंगाल तथा असम नाम से एक नया प्रान्त बना दिया गया और उसे बंगाल से अलग कर दिया गया।

1909 में मॉर्ले मिंटो सुधार

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– मॉर्ले मिंटो सुधार को 1909 ई. का ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ भी कहा जाता है।
– तत्कालीन भारत सचिव जॉन मार्ले एवं वायसराय लॉर्ड मिण्टो ने सुधारों का ‘भारतीय परिषद एक्ट, 1909’ पारित किया, जिसे ‘मार्ले मिण्टो सुधार’ कहा गया।
– भारतीय परिषद सदस्यता के लिए निर्वाचक सिद्धान्त प्रस्तुत किया, साथ ही मुसलमानों के लिए अगल निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई।
– मार्ले-मिंटो सुधारों हकीकत में लक्ष्य विकास करने की जगह हिंदू और मुस्लिमों में मतभेद पैदा करना था।

स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और महात्मा गांधी

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– 1914-1918 के प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गांधी भारत लौटे और देश की हालत समझकर अहिंसक आंदोलन ‘सत्याग्रह’ के तौर पर शुरु किया।
– 1917 में बिहार में चम्पारन में सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
– 1920 में ब्रिटिश सरकार द्वारा निष्पक्ष व्यवहार ना होता देख असहयोग आंदोलन शुरु किया।
– 1921 में बम्बई में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई, साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध बम्बई में 5 दिन का उपवास, व्यापक अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया।
– 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद जन-आन्दोलन स्थगित किया, उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला तथा 6 वर्ष कारावास का दण्ड दिया गया।
– 1924 में बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए।
– 1927 में बारदोली सत्याग्रह सरदार पटेल के नेतृत्व किया।
– 1928 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन मे भाग लिया-पूर्ण स्वराज का आह्वान।
– 1930 में ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह- साबरमती से दांडी तक की यात्रा का नेतृत्व किया।
– 1931 में गांधी इरविन समझौता- द्वितीय गोलमेज परिषद के लिये इंग्लैण्ड यात्रा की।
– 1934 में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की।
– 1936 में वर्धा के निकट से गाँव का चयन जो बाद में सेवाग्राम आश्रम बना।
– 1937 में अस्पृष्यता निवारण अभियान के दौरान दक्षिण भारत की यात्रा।
– 1942 में भारत छाड़ो आन्दोलन का राष्ट्रव्यापी आह्वान, उनके नेतृत्व में अन्तिम राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह।
– 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन से भेंट- पूर्वी बंगाल के 49 गाँवों की शान्तियात्रा जहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़कीं हुई थी।
– 1947 में साम्प्रदायिक शान्ति के लिये बिहार यात्रा। नई दिल्ली में लार्ड माउन्टबैटेन तथा जिन्ना से भेंट, कलकत्ता में दंगे शान्त करने के लिये उपवास तथा प्रार्थना।
– 1948 में जीवन का अन्तिम उपवास 13 जनवरी से 5 दिनों तक दिल्ली के बिड़ला हाउस में – देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के विरोध में।
– 1948 में 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे द्वारा शाम की प्रार्थना के लियेजाते समय बिड़ला हाउस में हत्या।

1918 में खेड़ा सत्याग्रह

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– ‘चम्पारन सत्याग्रह’ के बाद गाँधीजी ने 1918 ई. में खेड़ा (गुजरात) के किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया।
– खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी।
– खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) था।
– यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था।

1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार

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– अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को शाम को करीब साढ़े चार बजे एक सभा का आयोजन हुआ, इस सभा में 20,000 व्यक्ति इकट्ठे हुए थे।
– दूसरी और जनरल डायर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सभा को अवैधानिक घोषित कर दिया था।
– डायर ने बिना किसी चेतावनी के 50 सैनिकों को गोलियाँ चलाने का आदेश दिया, 10-15 मिनट में 1650 गोलियाँ दागी गईं।
– सरकारी अनुमानों के अनुसार, लगभग 400 लोग मारे गए और 1200 के लगभग घायल हुए थे।

1920 में असहयोग आंदोलन

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– इसी संहार की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप गांधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया।
– सितम्बर, 1920 में असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कलकत्ता में ‘कांग्रेस का अधिवेशन’ हुआ।
– इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार भारत में विदेशी शासन के विरुद्ध असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।
– पश्चिमी भारत, बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आन्दोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली।
– इसी दौरान कई शिक्षण संस्थाएं जैसे काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, बनारस विद्यापीठ एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि की स्थापना की गई।

1927 में साइमन कमीशन और 1928 लाला लाजपत राय का निधन

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– असहयोग आंदोलन के खत्म होने के तुरंत बाद भारत की सरकार में नया कमीशन बनाया गया जिसमें सुधारों में किसी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया
– साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी।
– इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे।
– यही कारण था कि इसे ‘श्वेत कमीशन’ कहा गया।
– कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएं।
– इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।
– आयोग के विरोध के कारण लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द बल्लभ पंत आदि ने लाठियां खाईं।
– लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कई बड़े प्रदर्शन किए।
– लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया
– उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर टूट पड़ा उसकी लाठी की गहरी चोट के कारण लाला लाजपत राय की 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई।

1929 में सविनय अवज्ञा आंदोलन

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– भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1929 में लाहौर अधिवेशन में घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है।
– महात्मा गांधी ने अपनी इस माँग पर जोर देने के लिए 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अविज्ञा आन्दोलन छेड़ा।
– जिसका उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-कानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था।
– ब्रिटिश सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए सख्त कदम उठाये और गांधी जी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं व उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया।

1930 में दांडी मार्च

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– सविनय अविज्ञा आन्दोलन के दौरान गांधी जी ने नमक कानून को तोड़ने के उदेश्य से दांडी मार्च किया
– 12 मार्च 1930 को सुबह 6.30 बजे 78 सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 358 किमी की यात्रा आरंभ की।
– यात्रा का मुख्य उद्देश्य था- “अंग्रेज़ों द्वारा बनाये गए ‘नमक क़ानून को तोड़ना’ था।
– लगभग 24 दिन बाद 1 लाख लोगों के साथ 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा।
– महात्मा गाँधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को अपना पड़ाव बनाया था।

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भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन

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बम और पिस्तौल की राजनीति में विश्वास रखने वाले क्रान्तिकारी विचारधारा के लोग समझौते की राजनीति में कदापि विश्वास नहीं करते थे। उनका उद्देश्य था- ‘जान दो या जान लो।’ बम की राजनीति उनके लिए इसलिए आवश्यक हो गयी थी, क्योंकि उन्हें अपनी भावनायें व्यक्त करने या आज़ादी के लिए संघर्ष करने का और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। आतंकवादी शीघ्र-अतिशीघ्र परिणाम चाहते थे। वे उदारवादियों की प्रेरणा और उग्रवादियों के धीमें प्रभाव की नीति में विश्वास नहीं करते थे। मातृभूमि को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए वे हत्या करना, डाका डालना, बैंक, डाकघर अथवा रेलगाड़ियों को लूटना सभी कुछ वैध समझते थे। क्रान्तिकारी विचारधारा के सर्वाधिक समर्थक बंगाल में थे। उन्हें ब्रिटिश हुकूमत के प्रति घृणा थी। वे बोरिया-बिस्तर सहित अंग्रेज़ों को भारत से बाहर भगाना चाहते थे। ‘वारीसाल सम्मेलन’ के बाद 22 अप्रैल, 1906 ई. के अख़बार ‘युगांतर’ ने लिखा, ‘उपाय तो स्वयं लोगों के पास है। उत्पीड़न के इस अभिशाप को रोकने के लिए भारत में रहने वाले 30 करोड़ लोगों को अपने 60 करोड़ हाथ उठाने होंगें, बल को बल द्वारा ही रोका जाना चाहिए।’ इन क्रान्तिकारी युवकों ने आयरिश आतंकवादियों एवं रूसी निहलिस्टों (अतिवादी) के संघर्ष के तरीकों को अपनाकर बदनाम अंग्रेज़ अधिकारियों को मारने की योजना बनाई। इस समय देश के अनेक भागों में, मुख्यतः, महाराष्ट्र एवं पंजाब में क्रान्तिकारी कार्यवाहियाँ हुई।

बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन- अगर यह मान लिया जाये कि बंगाल क्रान्तिकारी आन्दोलन का गढ़ था, तो अतिश्योक्ति न होगी। बंगाल में क्रान्तिकारी विचारधारा को बारीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ (विवेकानन्द के भाई) ने फैलाया। 1906 ई. में इन दोनों युवकों ने मिलकर ‘युंगातर’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया। बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन की शुरुआत ‘भद्रलोक समाज’ नामक समाचार पत्र ने की। इस समाचार पत्र ने क्रान्ति के प्रचार में सर्वाधिक योगदान दिया। पत्र के द्वारा लोगों में राजनीतिक व धार्मिक शिक्षा का प्रचार किया गया। बारीन्द्र घोष एवं भूपेन्द्रनाथ के सहयोग से ही 1907 ई. में मिदनापुर में ‘अनुशीलन समिति’ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य था ‘खून के बदले खून’। ‘अनुशीलन समिति’ के अलावा बंगाल की ‘सुह्रद समिति’ (मायसेन सिंह), ‘स्वदेशी बांधव समिति’ (वारीसाल), ‘व्रती समिति’ (फ़रीदपुर) आदि क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करती थीं। अनेक क्रान्तिकारी समाचार पत्रों का भी बंगाल से प्रकाशन शुरु हुआ, जिसमें ब्रह्म बंद्योपाध्याय द्वारा प्रकाशित ‘सन्ध्या’, अरविन्द्र घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम’, भूपेन्द्रनाथ दत्त द्वारा सम्पादित ‘युगान्तर’ आदि प्रमुख थे। वारीसाल में पुलिस द्वारा किये गए लाठी चार्ज पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये ‘युगान्तर’ ने कहा कि ‘अंग्रेज़ सरकार के दमन को रोकने के लिए भारत की तीस करोड़ जनता अपने 60 करोड़ हाथ उठाए और ताकत का मुकाबला ताकत से किया जाये।’

बंगाल के एक और क्रान्तिकारी जतीन्द्र नाथ मुखर्जी थे, जिन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से भी जाना जाता था। 9 सितम्बर, 1915 को बालासोर में पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मारे गए। बंगाल के एक महान क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस थे, जिन्होंने कलकत्ता से दिल्ली राजधानी परिवर्तन के समय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका था। गिरफ्तारी से बचने के लिए रासबिहारी बोस जापान चले गये थे। अवध बिहारी, अमीरचन्द्र, लाल मुकुंद, बसंत कुमार को गिरफ्तार कर इन पर ‘दिल्ली षड़यंत्र’ के तहत मुकदमा चलाया गया। बंगाल में बढ़ रही क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के दमन हेतु सरकार ने 1900 ई. में ‘विस्फोटक पदार्थ अधिनियम’ तथा 1908 ई. में ‘समाचार पत्र अधिनियम’ का सहारा लेकर क्रान्ति को कुचलने का प्रयास किया। सरकार के दमन चक्र के चलते अरविन्द घोष क्रान्तिकारी क्रिया-कलापों को छोड़कर सन्न्यासी हो गए तथा पांडिचेरी में अपना आश्रम स्थापित कर लिया। ब्रह्म बंद्योपाध्याय, जिन्होंने सर्वप्रथम रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘गुरुदेव’ कहकर सम्बोधित किया था, रामकृष्ण मठ में स्वामी जी बन गए।

पंजाब में क्रान्तिकारी आन्दोलन- पंजाब में 1906 ई. के प्रारम्भ में ही क्रान्तिकारी आन्दोलन फैल गया था। पंजाब सरकार के एक ‘उपनिवेशीकरण विधेयक’ के कारण किसानों में व्यापक असन्तोष व्याप्त था। इसका उद्देश्य चिनाब नदी के क्षेत्र में भूमि की चकबन्दी को हतोत्साहित करना तथा सम्पत्ति के विभाजन के अधिकारों में हस्तक्षेप करना था। इसी समय सरकार ने जल कर में वृद्धि करने का फैसला किया, जिससे जनता में असन्तोष फैल गया। इस तूफ़ान को उठता देखकर सरकार बेचैन हो गई। उसने रावलपिन्डी में आन्दोलन को कुचलने की दृष्टि से सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दी तथा लाला लाजपत राय व अजीत सिंह को गिरफ्तार कर माण्डले जेल भेज दिया गया। 1915 ई. में पंजाब में एक संगठित आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की गई, जिसमें निश्चित किया गया कि 21 फ़रवरी, 1915 को सम्पूर्ण उत्तर भारत में एक साथ क्रान्ति का बिगुल बजाया जाय। यह योजना सरकार को पता चल गई। अनेक नेता पकड़े गये तथा इन पर ‘लाहौर षड़यन्त्र’ का मुकदमा चलाया गया। इन नेताओं में पृथ्वी सिंह, परमानंद, करतार सिंह, विनायक दामोदर सावरकर, जगत सिंह, आदि देशभक्त थे। अमेरिका में ‘ग़दर पार्टी’ की स्थापना के बाद पंजाब ग़दर पार्टी की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया था। अजीत सिंह ने लाहौर में ‘अंजुमन-ए-मोहिब्बान-ए-वतन’ नामक संस्था की स्थापना की तथा ‘भारत माता’ नाम से अख़बार निकाला।

महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन- महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन को उभारने का श्रेय लोकमान्य तिलक के पत्र ‘केसरी’ को जाता है। तिलक ने 1893 ई. ‘शिवाजी उत्सव’ मनाना आरम्भ किया। इसका उद्देश्य धार्मिक कम राजनीतिक अधिक था। महाराष्ट्र में 1893-1897 ई. के बीच प्लेग फैला व अंग्रेज़ सरकार ने मरहम लगाने के बजाय दमन कार्य किया। अतः 22 जून, 1897 ई. को प्लेग कमिश्नर आमर्स्ट की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस सम्बन्ध में दामोदर चापेकर को पकड़कर मृत्यु दण्ड दे दिया गया। तिलक को भी विद्रोह भड़काने के आरोप में 18 माह का कारावास दिया गया। 1908 ई. में बम्बई प्रांत के चार देशी भाषा के समाचार पत्रों पर सरकार ने कहर ढाया। 24 जून, 1908 ई. को तिलक को फिर गिरफ्तार किया गया और ‘केसरी’ में प्रकाशित लेखों के आधार पर पहले तो उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, फिर 6 वर्ष की सज़ा दे दी गई। बम्बई में इसके विरोध में मज़दूरों ने जबरदस्त हड़ताल की, जो छह दिनों तक चली। महाराष्ट्र में नासिक भी क्रान्तिकारी आन्दोलन का गढ़ था। विनायक दामोदर सावरकर ने 1901 ई. में नासिक में ‘मित्रमेला’ नामक संस्था की स्थापना की, जो कि मेजिनी के ‘तरुण इटली’ के नमूने पर ‘अभिनव भारत’ में परिवर्तित हो गयी। इस संस्था के मुख्य सदस्य अनन्त लक्ष्मण करकरे ने नासिक के न्यायाधीश जैक्शन की गोली मारकर हत्या कर दी। इस हत्याकाण्ड से जुड़े लोगों पर ‘नासिक षड़यन्त्र केस’ के तहत मुकदमा चलाया गया, जिसमें सावरकर के भाई गणेश शामिल थे; जिन्हें आजीवन कारावास की सज़ा मिली। महाराष्ट्र से महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी पत्र ‘काल’ का सम्पादन किया गया।

राम प्रसाद बिस्मिल:

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11 जून, 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में श्री मुरलीधर और श्रीमती मूलमति के घर में इनका जन्म हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित “सत्यार्थ प्रकाश” से प्रेरित राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज से जुड़े हुए थे और एक अच्छे देशभक्ति-कवि भी थे। “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है” आज भी हमारे रोंगटे खड़े कर देता है। ये ‘राम’, ‘अज्ञात’ और ‘बिस्मिल’ आदि नामों से हिंदी और उर्दू में कविताएं लिखते थे। हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” की स्थापना का श्रेय बिस्मिल को ही जाता है। इन्होंने शुरू में ‘मातृवेदी’ नामक एक संगठन बनाया। इसका मानना था कि अंग्रेजों को जल्दी देश से निकालने के लिए हथियारों की मदद जरुरी है। इसी उद्देश्य से इन्होंने अपने एक क्रांतिकारी मित्र पंडित गेंदा लाल दिक्षित के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके में 1918 में लूट की जिसे “मैनपुरी कान्स्पिरेंसी” का नाम दिया गया। उसके बाद 1923 में इन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का गठन किया और अपनी आज़ादी की लड़ाई में सैंकड़ों क्रांतिकारियों को अपना साथी बना कर अपने मिशन पर चल दिए। अब इनका संगठन तो मजबूत और बड़ा बन गया लेकिन हथियारों की जरूरत को पूरा करने के लिए संगठन के सदस्य पैसे की मांग करने लगे। इसी के चलते इन्होंने एक बार फिर एक षड्यंत्र रचा और लखनऊ के नजदीक काकोरी स्टेशन के पास इन्होंने अपने साथियों के साथ मिल कर 9 अगस्त, 1925 को 8-डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को रुकवा लिया, जिसमें अंग्रेज सरकार का सरकारी खजाना ले जाया जा रहा था और वहां बन्दूक की नोक पर इन लोगों ने एक बार फिर लूट को अंजाम दिया। इसके बाद बिस्मिल के संगठन के करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया और आपराधिक षड्यंत्र का अभियोग चलाया गया। गिरफ्तार होने वालों में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान मुख्य थे। यह लेख आप डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट नरेशजांगड़ा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं। इन्हें ब्रिटिश सरकार ने फांसी की सजा सुना दी और 19 दिसंबर, 1927 के दिन राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में, अशफाकउल्ला खान को फैजाबाद जेल में और रोशन सिंह को नैनी जेल इलाहाबाद में फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को निर्धारित तिथि से 2 दिन पहले ही 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में सज़ा-ए-मौत दे दी गयी थी।

 
अशफाक उल्ला खान:
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इनका जन्म भी शाहजहांपुर के एक पठान परिवार में 22 अक्टूबर, 1900 को हुआ। इनके पिता शफीक़ उल्ला खान और माता मज़हूर-उन-निसा बेग़म थीं। अशफाक की राम प्रसाद बिस्मिल के साथ बड़ी घनिष्ठ मित्रता थी। दोनों ही हिंदी और उर्दू में देश भक्ति की कवितायें और शायरी लिखते थे। इन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हमेशा बिस्मिल के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साथ दिया। 1925 के काकोरी ट्रेन लूट केस में भी वे बिस्मिल के साथ ही थे और उनका नाम भी आरोपियों में शामिल था। 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले की रात अशफाक ने कुछ पंक्तियाँ लिखीं और भारत माँ की आज़ादी के लिए अपनी तड़प को कुछ इस तरह से बयान किया:
“जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा, जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”.
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ;
हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.”

चंद्रशेखर आजाद : मातृभूमि के लिए दी प्राणों की आहुति 

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चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। आजाद का जन्म स्थान भाबरा अब ‘आजादनगर’ के रूप में जाना जाता है। आजाद आजीवन ब्रह्मचारी रहे। वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की।

1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जब जज ने उनसे उनके पिता नाम पूछा तो जवाब में चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया. यहीं से चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद पड़ा.

इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया और की आंखों में धूल झोंककर भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले, तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया।

जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब सराहा गया।

अलफ्रेड पार्क, इलाहाबाद में 1931 में उन्होंने रूस की बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आह्वान किया। उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें  फांसी दे सकेगी। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए इसी पार्क में 27 फरवरी, 1931 को उन्होंने स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी।

1931 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा

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– 23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ‘लाहौर षड़यंत्र'(यानी सांडर्स की हत्या का आरोप)में ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर लटका दिया।
– लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और शिवराम ने पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी।
– उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को शाम करीब सवा चार बजे अपनी योजना को अंजाम दिया
– लेकिन गलत पहचान के चलते स्कॉट की जगह सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी़ सांडर्स मारा गया।
– इस मामले को लाहौर षडयंत्र के नाम से जाना गया जिसमें राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।
– ब्रिटिश हुकूमत ने इन तीनों क्रांतिकारियों को निर्धारित समय से एक रात पहले ही फांसी दे दी।
– मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन आक्रोश से डरी सरकार ने 23-24 मार्च को सांय 7.33 बजे ही फांसी दे दी।
– और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

मुस्लिम लीग, जिन्ना और पाकिस्तान

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– वैसे तो मुस्लिम लीग का गठन सर आगा खान के नेतृत्व में 30 दिसंबर 1906 को दक्का (अब ढाका) में हुआ था।
– मुस्लिम लीग का मकसद भारत के मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों को आगे रखना था।
– शुरु शुरू में मोहम्मद अली जिन्ना अखिल भारतीय मुस्लिम लीग में शामिल होने से बचते रहे
– लेकिन बाद में उन्होंने अल्पसंख्यक मुसलमानों को नेतृत्व देने का फैसला कर लिया।
– 1913 में जिन्ना मुस्लिम लीग में शामिल हो गये और 1916 के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता की।
– 1916 के लखनऊ समझौते के कर्ताधर्ता जिन्ना ही थे, यह समझौता लीग और कांग्रेस के बीच हुआ था।
– लेकिन 1934 में मुस्लिम लीग की कमान संभालते ही जिन्ना का मकसद ही बदल गया।
– कहा एक केवल मुस्लिम लीग ही मुसलमानों का एक मात्र राजनीतिक साधन है।
– 1935 में जिन्ना की डॉ. राजेंद्र प्रसाद से चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि कांग्रेस किसी भी जाति,नस्ल या संसकृति का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
– हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग-अलग देश के नागरिक हैं अत: उन्हें अलहदा कर दिया जाये।
– उनका यही विचार बाद में जाकर जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त कहलाया।
– 1937 में हुए सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली के चुनाव में मुस्लिम लीग ने कई सीटों पर कब्जा किया।
– 1930 में मुस्लिम लीग के एक भाषण में मोहम्मद इकबाल ने उत्तर पश्चिम भारतीय राज्य को अलग कर एक राष्ट्र बनाने की मांग की।
– 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने पहली बार अलग राष्ट्र के लिए पाकिस्तान शब्द रखा।
– रहमत अली ने ही 1933 में पाकिस्तान नेशनल मूवमेंट आरंभ किया, 1 अगस्त 1933 से पाकिस्तान नामक एक साप्ताहिक पत्र भी शुरू किया।
– 1940 के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर यह कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है।
– कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे नेताओं ने इसकी कड़ी निन्दा की।
– जिन्ना ने 1941 में डॉन समाचार पत्र की स्थापना की, जिसके द्वारा उन्होंने अपने विचार का प्रचार-प्रसार किया।
– जिन्ना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी और 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था।
– यूनियनिस्ट नेता सिकन्दर हयात खान की मृत्यु के बाद पंजाब में भी मुस्लिम लीग का वर्चस्व बढ़ गया।
– 1944 में गान्धीजी ने बम्बई में जिन्ना से चौदह बार बातचीत की, लेकिन हल कुछ भी न निकला।

सुभाष चन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज

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– द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज का गठन किया गया।
– इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।
– शुरू में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे।
– एक साल बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा करते हैं कि अंग्रेजों से आजादी की आशा करना व्यर्थ है।
– 21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी
– इसे जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी।
– 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया।
– अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया।
– 4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।
– 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी एक प्रसारण किया और शुभकामनाएं मांगीं।
– 21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आगे बड़े।
– 22 सितम्बर 1944 को उन्होंने कहा, हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की मांग है।
– किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया, जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े।
– ऐसे में सुभाष चन्द्र बोस को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन

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– 14 जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें भारत से ब्रिटिश शासन तत्काल समाप्त करने की घोषणा की गई।
– इसी मिटिंग में भारत छोड़कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर करने के लिए 1942 में सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का आवाह्न किया गया।
– सविनय अवज्ञा आन्दोलन का यह तीसरा चरण था, इससे पहले 1929 और 32 में आंदोलन हुआ था।
– 8 अगस्त 1942 को मुम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस के सत्र में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया जिसे भारत छोड़ो प्रस्ताव के नाम से जाना गया।
– गोवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने भाषण दिया, जिसमें कहा, ‘मैं आपको एक मंत्र देना चाहता हूं जिसे आप अपने दिल में उतार लें, यह मंत्र है, ‘करो या मरो’।
– इसी गोवालिया टैंक मैदान आगे चलकर अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा।
– 9 अगस्त को गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
– इसके बाद जनता ने खुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और इसे आगे बढाया क्योंकि उस समय नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था।
– आंदोलन में रेलवे स्‍टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों तथा उपनिवेश राज के संस्‍थानों पर बड़े स्‍तर पर हिंसा शुरू हो गई।
– इसमें तोड़ फोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने हिंसा की इन गतिविधियों के लिए कांग्रेस और गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया।
– कांग्रेस पर प्रतिबंद लगा दिया गया और आंदोलन को दबाने के लिए सेना को बुला लिया गया।
– सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 942 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए।
– इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए।
– ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया।
– 1942 में जापान की फौजों के साथ मिल भारत की और रूख किया।
– ब्रिटिश और कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।
– भारत छोड़ो आंदोलन की विशालता और व्यापकता को देखते हुए अंग्रेजों को विश्वास हो गया था कि उन्हें अब इस देश से जाना पड़ेगा।

द्वितीय विश्‍व युद्ध की समाप्‍ति और ब्रिटेन में लेबर पार्टी का सत्ता में आना

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– 1945 में द्वितीय विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने पर ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्‍लेमेंट रिचर्ड एटली के नेतृत्‍व में लेबर पार्टी शासन में आई।
– विश्‍व युद्ध की समाप्ति के समय ब्रिटिश आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुके थे
– वे खुद इंग्‍लैंड में स्‍वयं का शासन भी चलाने में संघर्ष कर रहे थे।
– इसी साल ब्रिटेन के चुनावों में लेबर पार्टी लेबर पार्टी की जीत हुई
– लेबर पार्टी आजादी के लिए भारतीय नागरिकों के प्रति सहानुभूति की भावना रखती थी।
– लेबर पार्टी ने भारत सहित ब्रिटेन में तत्‍कालीन उपनिवेश को स्‍वतंत्रता प्रदान करने का वायदा किया था।
– मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया, जिसके बाद भारतीय राजनैतिक परिदृश्‍य का सावधानीपूर्वक अध्‍ययन किया गया।
– एक अंतरिम सरकार के निर्माण का प्रस्‍ताव दिया गया और एक प्रां‍तीय विधान द्वारा निर्वाचित सदस्‍यों और भारतीय राज्‍यों के मनोनीत व्‍यक्तियों को लेकर संघटक सभा का गठन किया गया।

भारत को कैसे मिली आजादी

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– भारत को आजाद करने का फैसला ब्रिटेन की नई नवेली सरकार ने 20 फरवरी 1947 को ही कर लिया था।
– इंग्लैंड में लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री रिचर्ड एटली ने एक महत्वपूर्ण पॉलिसी की घोषणा की थी।
– इसमें कहा गया था कि ब्रिटेन की सरकार ने यह फैसला कर लिया है कि भारत को जून 1948 तक स्वतंत्र कर दिया जाएगा।
– इसके लिए 12 फरवरी 1947 को ही लॉर्ड माउंटबैटन को भारत का वायसरॉय नियुक्त किया गया था।
– लॉर्ड माउंटबेटन का काम था ब्रिटेन के हाथों से भारत को सभी अथॉरिटी देने का प्रबंध करना।
– 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना देश के नेताओं के सामने प्रस्तुत की।
– जिसमे उन्होंने भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा रखी।

माउंटबेटन योजना

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– भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जायेगा
– बंगाल और पंजाब का विभाजन किया जायेगा
– उत्तर पूर्वी सीमा प्रान्त और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जायेगा।
– पाकिस्तान के लिए संविधान निर्माण हेतु एक अलग संविधान सभा का गठन किया जायेगा।
– रियासतों को यह छूट होगी कि वे या तो पाकिस्तान या भारत में सम्मिलित हो जाये या फिर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दें।
– भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के लिए 14-15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया।
– ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को जुलाई 1947 में पारित कर दिया।
– इसमें ही वे प्रमुख प्रावधान शामिल थे जिन्हें माउंटबेटन योजना द्वारा आगे बढ़ाया गया था|
– सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो आयोगों का ब्रिटिश सरकार ने गठन किया।
– आयोग का कार्य विभाजन की देख-रेख और नए गठित होने वाले राष्ट्रों की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को निर्धारित करना था|
– स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी और बड़ी रियासतें थीं।

आजादी का दिन 15 अगस्‍त ही क्‍यों चुना गया

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– लार्ड माउंटबेटन ने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय करके रखा था
– माउंटबेटन इस दिन को वे अपने कार्यकाल के लिए “बेहद सौभाग्‍यशाली” मानते थे।
– इसके पीछे कि खास वजह थी कि इसी दिन जापानी सेना ने उनके सामने आत्‍मसमर्पण किया था।
– दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान माउंटबेटन ब्रिटिश सेनाओं के कमांडर थे।

आधी रात की आजादी

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– जब 3 जून को यह फैसला किया गया कि 15 अगस्त को आजादी दी जाएगी तो भारतीय ज्योतिषियों ने इस पर एतराज किया।
– उनके अनुसार यह दिन काफी अमंगल होता देश के लिए, लेकिन लॉर्ड तो इसी दिन के लिए अड़े हुए थे।
– इसलिए ज्योतिषियों ने कहा कि आजादी का समय 14 अगस्त रात 12 बजे हो।
– क्योंकि कैलेंडर के अनुसार 12 बजे से अगले दिन का आरंभ माना जाता है।
– अंग्रेज भी यह मानते हैं कि रात 12 बजे से दिन बदल जाता है, माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया।
– 14 अगस्त को आजादी की घोषणा होते ही मीटिंग बुलाई गई।
– यह मीटिंग नई दिल्ली में रात 11 बजे बुलाई गई।
– इस सेशन की अगुवाई डॉंक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की।
– मीटिंग का आरंभ सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाकर किया।
– 14 अगस्त की मध्यरात्रि को जवाहर लाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण हुआ ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’।
– इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।
– 15 अगस्त के दिन की शुरुआत सुबह 8.30 बजे हुई, जब वायसराय भवन(राष्ट्रपति भवन) में शपथग्रहण समारोह हुआ।
– नई सरकार ने सेंट्रल हॉल (जिसे आज दरबाल हॉल कहा जाता है)में शपथ ली।
– दोपहर में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डेन में एक सभा को संबोधित किया।
– पूरा देश आजादी का उत्सव मना रहा था, राष्ट्रपति भवन, संसद आदि के आसपास करोड़ों लोगों का हुजूम था।
– नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।
– 17 अगस्त को भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण हुआ था, जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा जाता है
– भारत 15 अगस्त को आजाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था।
– रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया।

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गांधीजी और दंगे की काली रात

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– एक तरफ देश में आजादी का जश्न था तो दूसरी तरफ हिंदू-मुस्लिम दंगों में खून की होली खेली जा रही थी
– महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे
– जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे
– जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आज़ाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजा
– इस ख़त में लिखा था, “15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा. आप राष्ट्रपिता हैं. इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें”
– गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, “जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं”

भारत-पाकिस्‍तान का विभाजन

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– भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर लाखों लोगों का विस्‍थापन था, जो विश्‍व में कहीं नहीं हुआ।
– 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग एक देश की सीमा को पार कर दूसरे देश की सीमा में जा रहे थे।
– तकरीबन पौने दो करोड़ लोग जमीन, जायदाद, दुकानें, संपत्‍ति, खेती छोडकर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान लोग जा रहे थे।
– 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए।
– धर्म के नाम हुए इस विभाजन में मानवता शर्मसार हुई, 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्‍कार हुआ।
– अनुमान के मुताबिक 2 लाख से 20 लाख के बीच लोग मारे गए, सैंकड़ों बच्‍चे अनाथ हो गए।
– विभाजन का यह काला अध्‍याय आज भी इतिहास के चेहरे पर बदनुमा दाग की तरह है।

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ऐतिहासिक घटनाक्रम- एक नजर
1857- मेरठ में सैनिक विद्रोह
1857- मेरठ में सिपाहियों और भीड़ द्वारा 50 यूरोपियों की हत्या
1858- ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन का ट्रांसफर ब्रिटिश राजशाही के पास
1858- रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच लड़ाई
1876- महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित
1885- बॉम्बे में एओ हयूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की
1905- बंगाल का विभाजन
1905- सूरत में स्वदेशी आंदोलन शुरु
1906- ढाका में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन
1908- राजद्रोह के आरोप में तिलक को छह साल की सजा
1909- मॉर्ले मिंटो सुधार, हिंदू और मुस्लिमों में मतभेद पैदा किए गए
1911- दिल्ली दरबार आयोजित, बंगाल का विभाजन रद्द
1912- नई दिल्ली भारत की नई राजधानी बना
1914- सेन फ्रांसिसको में गदर पार्टी का गठन
1914- महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट
1915- मुंबई में गोपाल कृष्ण गोखले की मौत
1916- तिलक द्वारा पुणे में पहली इंडियन होम रुल लीग का गठन
1916- मद्रास में एनी बेसेंट द्वारा होम रुल लीग का नेतृत्व
1917- महात्मा गांधी द्वारा बिहार में चंपारण आंदोलन शुरु
1918- खेड़ा सत्याग्रह
1919- जलियावाला बाग नरसंहार
1919- खिलाफत आंदोलन शुरु
1920- असहयोग आंदोलन शुरु महात्मा गांधी
1920- कलकत्ता में गांधीजी द्वारा प्रस्ताव पारित जिसमें अंग्रेजों से भारत को अधिराज्य का दर्जा देने को कहा गया
1922- चोरी-चौरा घटना
1922- इलाहबाद में स्वराज पार्टी गठित
1925- काकोरी में ट्रेन लूट
1925- बारडोली सत्याग्रह
1928- बॉम्बे में साइमन कमीशन का आगमन और अखिल भारतीय हड़ताल
1928- लाहौर में लाला लाजपत राय पर पुलिस ज्यादती और जख्मों के चलते उनकी मौत
1929- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन आयोजित
1929- लाहौर में ऑल पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस ने 14 सूत्र सुझाए
1929- दिल्ली में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंका
1929- लाहौर में जवाहरलाल नेहरु ने भारतीय ध्वज फहराया
1930- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज घोषित किया
1930- साबरमती दांडी मार्च के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरु
1930- लंदन में साइमन कमीशन की रिपोर्ट पार विचार हेतु लंदन में पहली गोल मेज बैठक
1931- लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी
1931- लंदन में महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन द्वारा गांधी इरविन पैक पर दस्तखत
1931- लंदन में दूसरी राउंड टेबल बैठक
1932- बिना ट्रायल के गांधी विद्रोह के आरोप में गिरफ्तार
1932- लंदन में तीसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस
1935- भारत सराकर अधिनियम 1935 पास
1937- भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत भारत प्रांतीय चुनाव हुए
1938- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हरीपुरा अधिवेशन हुआ
1938- सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया
1939- त्रिपुरी अधिवेशन हुआ
1939- सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया
1940- मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग राज्य की मांग करते हुए लाहौर अधिवेशन
1941- सुभाष चंद्र बोस ने भारत छोड़ा
1942- क्रिप्स मिशन का भारत आगमन
1942- भारत छोड़ो आंदोलन
1942- गांधीजी और कांग्रेस के अन्य बड़े नेता गिरफ्तार
1942- आजाद हिंद फौज का गठन
1943- सुभाष चंद्र बोस ने भारत की अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा
1944- भारतीय राजनीतिक नेताओं और वायसराय आर्किबाल्ड वेवलीन के बीच शिमला सम्मेलन
1946- केबिनेट मिशन प्लान पास
1946- संविधान सभा का गठन
1946- नई दिल्ली में केबिनेट मिशन का आगमन
1946- जवाहरलाल नेहरु ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला
1946- भारत की अंतरिम सरकार बनी
1946- भारत की संविधान सभा का पहला सम्मेलन
1947- ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ब्रिटिश भारत को ब्रिटिश सरकार का पूर्ण सहयोग देने की घोषणा की
1947- 12 फरवरी लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय नियुक्त और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने
1947- 15 अगस्त 1947 भारत आजाद

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रामनवमी विशेष… भगवान राम: आदर्श व्यक्तित्व

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हिन्दू धर्म में राम, भगवान विष्णु के दस अवतारों में से सातवें माने जाते हैं। राम का जीवनकाल एवं पराक्रम, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित, संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में लिखा गया है|  उन पर तुलसीदास ने…

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