#IndusWatersTreaty: जानिए #India #Pakistan के बीच हुए इस समझौते की पूरी ABCD…

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उरी हमले के बाद से भारत का गुस्सा पाकिस्तान को लेकर चरम पर है, इस बात को पीएम मोदी भी अच्छी तरह से जानते हैं। इसीलिए पहले उन्होंने शनिवार को पाकिस्तान को सीधे शब्दों में कड़ी चेतावनी दी और आज पीएम मोदी एक बड़ा फैसला लेने जा रहा है। फैसला जो पाकिस्तान को बना सकता है रेगिस्तान। फैसला तो पाकिस्तान को पानी की एक-एक बूंद का मौहताज कर सकता है। जी हां पीएम मोदी आज दोपहर 12 बजे सिंधु जल समझौता पर बैठक लेने जा रहे हैं। बैठक में जल संसाधन मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। पीएम इन सीनियर अफसरों से समझौते पर ब्रीफिंग लेंगे। माना जा रहा है कि पीएम सिंधु जल समझौते पर सख्त फैसला ले सकते हैं।

भारत समझौता तोड़ सकता है, विदेश मंत्रालय कर चुका है इशारा-22 सितंबर को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने सिंधु जल समझौते पर पूछे गए सवाल पर कहा था, किसी भी समझौते के लिए आपसी भरोसा और सहयोग जरूरी होता है। जब उनसे बयान को स्पष्ट करने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि कूटनीति में कई बातें पूरी तरह से साफ-साफ नहीं कही जाती हैं। फिलहाल वर्तमान में पाकिस्तान के साथ जो स्थिति है उसमें भरोसा और सहयोग दोनों ही दूर-दूर तक नहीं दिखते। अगर भारत सिंधु जल समझौता तोड़ देता है तो पाकिस्तान पानी के लिए तरस जाएगा। पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत रेगिस्तान बन जाएगा। यही कारण है कि भारत से पाकिस्तान की जंग कश्मीर और कश्मीरियों के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ पानी के लिए है। आइए जानते हैं आखिर क्या है सिंधु जल समझौता…

क्या है सिंधु जल समझौता…

– सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 में छह नदियों के पानी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था।
– समझौता पर भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाक राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
– सिंधु नदी संधि विश्व के इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा माना जाता है।
– अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति ने 2011 में इस संधि को दुनिया की सफलतम संधि करार दिया था।
– समझौते के तहत छह नदियां आती हैं सिंधु, चेनाब, झेलम ब्यास, रावी और सतलुज।
– इसके तहत पाकिस्तान को 80.52 फीसदी पानी यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी सालाना दिया जाता है।
– समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया।
– सतलुज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया।
– भारत पूर्वी नदियों सतलुज, ब्यास और रावी के पानी को पूर्ण रूप से इस्तेमाल कर सकता है।
– जबकि पश्चिमी नदियों झेलम, चेनाब और सिंधु का पानी किसी रुकावट पाकिस्तान को देना स्वीकार किया।
– लेकिन साथ ही भारत पश्चिमी नदियों का पानी बिजली, सिचांई और भंडारण के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
– समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई, जिसमें दोनो देशों ने कमिश्नर नियुक्त किए।
– अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी जानकारी देनी होगी।
– अगर किसी देश को कोई आपत्ति है तो दोनों देशों के कमिश्नर बैठक कर उसका हल निकालेंगे।
– अगर आयोग समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाती हैं तो सरकारें उसे सुलझाने की कोशिश करेंगी।
– अगल मामला नहीं सुलझता तो कोर्ट ऑफ आर्ब्रिट्रेशन में जाने का भी रास्ता खुला है।

पाकिस्तान को क्या फायदा मिल रहा है…
– इन छह नदियों के पानी से पाकिस्तान में कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
– इन्हीं नदियों की वजह से पाकिस्तान का उत्तरी और पश्चिमी भाग हरा-भरा है।
– इन्हीं नदियों ने पाकिस्तान के 65 फीसदी भू-भाग इस्लामाबाद से कराची तक को उपजाऊ बना रखा है।
– इन्हीं नदियों बेसिन में पाकिस्तान का 70 फीसदी अनाज उगता है।
– 2.6 करोड़ एकड़ कृषि भूमि सिंचाई के लिए इन नदियों के जल पर निर्भर है।
– इन्हीं नदियों बेसिन में पाकिस्तान की 36 फीसदी बिजली का उत्पादन होता है।
– यूनेसको के सर्वे के अनुसार 20 करोड़ की आबादी में से 15 करोड़ लोग सिंधु नदी बेसिन में रहते हैं।
– यहीं नहीं पाकिस्तान के दोनों बड़े न्यूक्लियर प्लांट चश्मा और खुशाब भी इन्हीं नदियों के किनारे पर लगे हैं।
– चश्मा के चारों न्यूक्लियर प्लांट पंजाब के मिंयावली में सिंधु नदी के किनारे लगे हैं।
– ऐसे ही खुशाब के चारों न्यूक्लियर प्लांट पंजाब के सरगोधा में चेनाब नदी के किनारे लगे हैं।

पाकिस्तान पर क्या होगा असर…
– अगर यह समझौता भारत रद्द कर देता है तो पाकिस्तान का 65 फीसदी भू-भाग बंजर हो जाएगा।
– पाकिस्तान की दो तिहाई आबादी पानी के लिए त्राहिमाम-त्राहिमान करने लगेगी।
– सिंधु और उसकी सहायक पांच नदियां पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से की प्यास बुझाती हैं।
– पाकिस्तानी अखबार ट्रिब्यून ने भी माना है कि सिंधु के पानी के बगैर देश का एक हिस्सा रेगिस्तान बन जाएगा।
– सिंधु, झेलम और चेनाब के पानी से पाकिस्तान में 36 फीसदी बिजली बनाई जाती है।
– अगर यह समझौता रद्द हो गया तो पाकिस्तान में बिजली को लेकर हाहाकार मच जाएगा।
– इसके अलावा इन तीनों नदियों से सिंचाई भी की जाती है, 70 फीसदी अनाज उगता है।
– अगर यह समझौता रद्द हो गया तो पाकिस्तान में आकाल के हालात पैदा हो जाएंगे।
– यही नहीं पाकिस्तान के दोनों बड़े न्यूक्लियर प्लांट चश्मा और खुशाब ठप पड़ जाएंगे।
– कर्ज में गले तक डूबे पाकिस्तान के लिए यग झटका सहन करना आसान नहीं है।

कई बार इंटरनेशनल कोर्ट के चक्कर लगा चुका है पाकिस्तान…
– चेनाब नदी पर बगलिहार और स्वलाकोते जलविद्युत परियोजनायें बन रही हैं।
– वहीं झेलम की सहायक नदियों पर दुलहस्ती और किशनगंगा परियोजनायें चल रही हैं।
– किशनगंगा प्रोजेक्ट को लेकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत हेग जा चुका है।
– 17 मई 2010 को भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत का रुख किया था।
– जिस पर 2013 को भारत के पक्ष में फैसला देते हुए पाकिस्तान की आपत्तियों को खारिज कर दिया।
– किशनगंगा प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है और सिर्फ कमीशन किया जाना बाकि है।
– किशनगंगा के अलावा भारत बगलिहार वूलर बैराज व तुलबुल परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है।

क्या भारत समझौता रद्द कर सकता है…

क्यों कर सकता है समझौता रद्द-
इस संधि को तोड़ने की मांग भारत में कई बार उठ चुकी है। 2005 में इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट और टाटा वाटर पॉलिसी प्रोग्राम ने भी इसे खत्म करने की मांग की थी। इनकी रिपोर्ट के मुताबिक संधि के चलते जम्मू-कश्मीर को हर साल 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। अकूत जल संसाधन होने के बावजूद इस संधि के चलते घाटी को बिजली नहीं मिल पा रही है। घाटी 20 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता रखती है, लेकिन उत्पादन हो रहा है सिर्फ 3200 मेगावाट।

– पूर्व वित्त और रक्षा मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने न्यूज 24 से किया खुलासा।
– यशवंत सिन्हा के मुताबिक भारत को पाकिस्तान से सिंधु जल समझौता रद्द कर देना चाहिए।
– क्योंकि किसी भी तरह के समझौते दोस्तों के बीच होते हैं ना कि दुश्मनों के बीच।
– यशवंत सिन्हा ने समझौता रद्द करने के लिएपांच मुख्य वजहें भी बताई है।
– पहली- 1972 शिमला समझौता, जिसे पाकिस्तान ने किया लेकिन आजतक पालन नहीं कर रहा।
– दूसरा- 1999 लाहौर समझौता, दोस्ती के बड़े हाथ की जगह करगिल में घुसपैठ कर पीठ में मारा चाकू।
– तीसरा- 2003 सीजफायर समझौते का उल्लंघनः पाक सेना लगातार सीमा पर फायरिंग करती रहती है।
– चौथा- 2004 इस्लामाबाद समझौते का उल्लंघनः पाकिस्तान ने माना था कि उसकी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी करते हैं।
– पांचवां- 2015 ऊफा समझौते का उल्लंघनः द्पक्षीय वार्ता में कश्मीर मुद्दा नहीं उठेगा, लेकिन पाकिस्तान ने नहीं माना।

क्यों नहीं कर सकता है समझौता रद्द-
– सिंधु नदी का उद्गम चीन से होता है, इसलिए इसमें तीन पार्टियां हैं।
– भारत पाकिस्तान के अलावा चीन भी शामिल है ऐसे में भारत एकतरफा कदम उठाने के बारे में नहीं सोच सकता है।
– 1965, 1971 और 1999 के करगिल युद्ध हों या कश्मीर में आतंकवाद, यह समझौता आज तक नहीं टूटा।
– 1960 में वर्ल्ड बैंक ने सिंधु जल समझौते में मध्यस्थता की थी, इस तरह से भारत, पाक के अलावा इस समझौते का एक तीसरा पक्ष भी है।
– सामरिक मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं, यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका मतलब है कि भारत अकेले इसे खत्म नहीं कर सकता
– अगर ऐसा हुआ तो इसका मतलब यह होगा कि हम कानूनी रूप से लागू संधि का उल्लंघन कर रहे हैं
– विशेषज्ञों का कहना है कि सिंधु जल समझौते की वजह से ही भारत इन नदियों पर कई प्रॉजेक्टस चला रहा है।
– इसकी मदद से भारत को जम्मू-कश्मीर में 1999 में बगलिहार डैम के लिए हरी झंडी मिली।
– इसी से 2007 में किशनगंगा प्रॉजेक्ट में भारत को पॉवर जेनरेशन करने का अधिकार मिला।
– पाकिस्तान यह मामला हेग की इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में ले गया, जहां इस संधि के आधार पर फैसला भारत के पक्ष में आया।

Western Rivers

सिंधु नदी- सिंधु को Indus River भी कहा जाता है। इस नदी का उद्गम तिब्बत स्थित मानसरोवर झील से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल भी यही है। सिंधु नदी तिब्बत, भारत तथा पाकिस्तान में बहते हुए अरब सागर में मिल जाती है। सिंधु नदी की कुल लंबाई लगभग 2880 किमी है तथा यह भारत में 992 किमी लम्बी है। हिमालय से गुजरती हुई, कश्मीर और गिलगिट से होती यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और मैदानी इलाकों में बहती हुई 1610 किमी का रास्ता तय करती हुई कराची के दक्षिण में अरब सागर से मिलती है। सिंधु दुनिया की 21 सबसे बड़ी नदियों में से एक है। सिंधु को Indus भी कहा जाता है जिसके नाम पर हमारे देश का नाम India पड़ा। तिब्बत, भारत और पाकिस्तान से होकर बहने वाली इस नदी में कई अन्य नदियां आकर मिलती हैं, जिनमें झेलम, चिनाब, रावी और सतलुज, व्यास सतलुज में मिलकर सिंधु तक पहुंचती है। 5500 से 8000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता भी इसी सिंधु नदी के किनारे विकसित हुई थी। जम्मू कश्मीर होकर पाकिस्तान में बहने वाली सिंधु नदी के आसपास आज भी करीब 30 करोड़ की आबादी बसती है। पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी इसी नदी पर निर्भर है। पीने से लेकर खेती और बिजली के लिए पाकिस्तान को सिंधु का ही सहारा है। 

45 MW Nimoo-Bazgo Hydroelectric- power project on the Indus River situated at Alchi village, 75KM from Leh, PM Modi inaugurated on Aug 2014.

44 MW  Chutak Hydroelectric Plant- power project on the Suru River (a tributary of Indus) in Kargil, PM Modi inaugurated on Aug 2014.

झेलम नदी- झेलम नदी का उद्गम कश्मीर घाटी की शेषनाग झील के निकट बेरनाग नामक स्थान से हुआ है। वूलर झील में मिलने के बाद यह पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं तथा चेनाब नदी में मिल जाती है। झेलम नदी की की कुल लंबाई 724 किमी है एवं भारत में इसकी लंबाई 400 किमी है

480 MW Uri Dam- hydroelectric power station on the Jhelum River near Uri in Baramula of J&K, located very near to the Line of Control, project was awarded by the National Hydroelectric Power Corporation in October 1989. On 4 July 2014 a 240 MW Uri-II power project was inaugurated.

330 MW Kishanganga Hydroelectric Plant-hydroelectric Projectthat is designed to divert water from the Kishanganga River to a power plant in the Jhelum River basin. It is located 5 km (3 mi) north of Bandipore in Jammu and Kashmir, India and will have an installed capacity of 330 MW. Construction on the project began in 2007. Project includes a 37 m (121 ft) tall concrete-face rock-fill dam which will divert a portion of the Kishanganga River south through a 24 km (15 mi) tunnel.

चेनाब नदी- चेनाब नदी हिमाचल प्रदेश के लाहौल के बारालाचा दर्रे से निकलती हैं। यह पीर पंजाल के समांतर बहते हुए किशतबार के निकट पीर पंजार में गहरा गार्ज बनाती है। भारत में चेनाब नदी की लंबाई 1180 किमी है। यह पाकिस्तान में जाकर सतलज नदी में मिल जाती है।

The government wants to expedite work on three hydro power projects in Sawalkote, Pakal Dul and Bursar on the Chenab and its tributary in Jammu and Kashmir after it reviewed the Indus Waters Treaty on Monday following the Uri attack and deterioration of ties with Pakistan.

1856 MW Sawalkot Dam- The biggest of three is the Sawalkote project in Ramban district on the Chenab river with a 192.5-metre dam and an expected power generation capacity of 1856 MW . The project is being constructed by Jammu and Kashmir State Power Development Corporation (JKSPDC).

1000 MW Pakal-Dul Dam- The Pakal Dul project has an estimated capacity of 1000 MW and is to be constructed on the Marusudar, the main tributary of the Chenab at village Drangdhuran about 45kms from Kishtwar town. It is being constructed by Chenab Valley Power Projects Limited, a joint venture of JKSPDC, NHPC and Power Trading Corporation (PTC). The project envisages a 167-metre high dam and an underground power house near village Dul.

800 MW Bursar Dam- Bursar Hydroelectric Project, has an estimated capacity of 800 MW and is to be constructed on the Marusudar, the main tributary of the Chenab at Doda district. which is to be constructed by the NHPC, is a “storage project” planned in Kishtwar district but is currently under survey and investigation for preparation of a detailed report. Marusudar is the biggest tributary of the ChenabMarusudar

690 MW Salal Hydroelectric Project- Salal – I & II Hydroelectric Project is constructed on river Chenab near Reasi in Udhampur district. project commenced in 1961 by the state government of J&K and construction was started in 1970 by Central Hydroelectric Project Control Board under Ministry of Irrigation and Power.

900 MW Baglihar Dam- Baglihar Hydroelectric Power ProjecT on the Chenab River in the southern Doda district  with a 144 metre dam and an expected power generation capacity of 900 MW. This project was conceived in 1992, approved in 1996 and construction began in 1999. The project is estimated to cost USD $1 billion. The first phase of the Baglihar Dam was completed in 2004. With the second phase completed on 10 October 2008, Prime Minister Manmohan Singh of India dedicated the 900-MW Baglihar hydroelectric power project to the nation.

Eastern Rivers

रावी नदी- रावी नदी हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे से निकलती है एवं पाकिस्तान के मुल्तान के समीप चेनाब नदी में मिल जाती है। इस नदी की लंबाई 720 किमी है।

व्यास नदी- इस नदी का उद्गम हिमालय के रोहतांग दर्रे के समीप व्यास कुण्ड से हुआ है । यह कुल लंबाई 470 किमी तय करते हुए पंजाब में सतलज नदी में मिल जाती है।

सतलुज नदी- सतलज नदी का उद्गम तिब्बत स्थित मानसरोवर झील के निकट राक्षसताल से हुआ है। यह नदी अपने उद्गम स्थल से 1500 किमी दूरी तय करके पाकिस्तान में चेनाब नदी में मिल जाती है। भारत में सतलज नदी की लंबाई 1050 किमी है। प्रसिद्ध भाखड़ा – नागल बांध सतलज नदी पर ही बना है।

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#USPresidentialElection2016: #Hillary और #Trump का #INDIA प्रेम, जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के बीच भारतीय समयानुसार आज सुबह पहली लाइव टीवी डिबेट हुई। जिसे पूरी दुनिया में करोडो़ं लोगों ने देखा। 90 मिनट चली इस बहस पर भारतीयों की भी नजर थी। खासकर भारतीय मूल के अमेरिकी वोटर्स की, जिनकी संख्या लगभग 30 लाख है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में भारतीय मूल के वोटर्स की खासी अहमियत होती है और उन्हें अपनी तरफ खींचने के प्रयास ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ दोनों ही पार्टी के उम्मीदवार करते रहते हैं। लेकिन इस बार 2016 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय वोटर इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि इस वोट बैंक को हथियाने के लिए दोनों ही दल कुछ ऐसा कर रहे हैं जैसा कि पहले के चुनाव में कभी नहीं हुआ। जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

डोनाल्ड ट्रम्प का भारत प्रेम
– जहां एक ओर अमेरिकी विदेश मंत्री भारतीय मूल के वोटरर्स को रिझाने में लगे हैं।
– तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प भी पीछे नहीं हैं।
– ट्रंप इसी महीने की 24 तारीख को हिंदू संस्था के कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं।
– अमेरिका में हिंदू संस्था रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)के कार्यक्रम में शिरकत करने वाले हैं ट्रंप।
– अमेरिकन-इंडियन बिजनेसमैन शलभ कुमार ने डोनाल्ड ट्रम्प का खुलकर सपोर्ट किया है।
– शलभ ने ट्रंप के समर्थन में उनकी पार्टी को 7 करोड़ का डोनेशन भी दिया है।
– शलभ कुमार ने ही 2015 में रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)नाम की संस्था बनाई है।
– शलभ कुमार ने कहते हैं कि 21वीं सेंचुरी को ट्रंप इंडिया-यूएस सेन्चुरी बनाना चाहते हैं।
– एक इंटरव्यू में शलभ ने कहा- ट्रम्प को गलत समझा जा रहा है, वे एंटी-इंडिया नहीं हैं।
– शलभ कुमार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका में प्रभावशाली समर्थकों में से एक हैं।
– रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं।
– जब मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे तो ट्रंप ने कहा था कि सालों की सुस्ती के बाद निवेशक अब भारत लौट रहे हैं।
– ट्रंप ने कहा था, ‘मोदी से मेरी मुलाकात नहीं हुई है लेकिन वह प्रधानमंत्री के रूप में शानदार काम कर रहे हैं।
– मोदी लोगों को साथ ला रहे हैं, अब भारत के बारे में अब धारणा बदल रही है और आशावाद लौट रहा है।
– ट्रंप ने कहा था कि भारत और चीन की एक जैसी शुरुआत हुई, इंडिया अच्छी तरक्की कर रहा है।
– हाल ही में ट्रंप ने एक चुनावी सभा में भारतीयों का मजाक उड़ाते हुए उनकी अंग्रेजी की नकल उतारी थी।
– लेकिन तुरंत ही सफाई देते हुए भारत को एक महान देश बताते हुए कहा था कि वह भारतीय नेताओं से नाराज नहीं है।
– डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के लिए हिन्दू सेना के कार्यकर्ता दिल्ली के जंतर-मतंर पर हवन-पूजन भी कर चुके हैं।

इस चुनाव में ‘रिपब्लिकन’ का झुकाव भी भारत की ओर…
– अमेरिका और भारत के साझा इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ पार्टी के उम्मीदवार भारत के प्रति झुकाव रखने वाले हैं।
– डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन भारत से भावनात्मक तौर पर जुड़ी हुई हैं तो रिपब्लिकन ट्रंप राजनीतिक-रणनीतिक तौर पर भारत के समर्थक हैं।
– ओबामा से पहले राष्ट्रपति रहे जार्ज बुश ने तेजी से बदलती दुनिया को समझा और चीन की कीमत पर भारत से संबंध बढ़ाए।
– जिसे 2014 के बाद मोदी और ओबामा ने भी जारी रखा… अब बारी ट्रंप और हिलेरी की है मोदी सरकार के साथ दोस्ती बनाए रखने की।
– साल 2014 में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी 65 फीसदी भारतीय डेमोक्रेटिक पार्टी के पाले में हैं।

हिलेरी क्लिंटन का भारतीय कनेक्शन
– अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद क्लिंटन अगर राष्ट्रपति बनती हैं तो वो पहली महिला राष्ट्रपति होंगी.
– भारत से उनका एक खास नाता रहा है, बिल क्लिंटन के 1992 में राष्ट्रपति बनने के बाद मार्च 1995 में वे भारत आई थीं.
– इसके बाद 1997 में मदर टेरेसा की मृत्यु और 2000 में आखिरी बार बतौर फर्स्ट लेडी भारत आईं थी
– इसके बाद ओबामा सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद 2009 में भारत का दौरा किया था.
– बतौर विदेश मंत्री 2009 में उनकी उपलब्धि रही कि चीन और भारत को ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के लिए राजी किया.
– 2008 में अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर डील पर सीनेटर हिलेरी क्लिंटन ने आश्वासन दिया था कि डेमोक्रेट्स न्यूक्लियर डील की राह में रोड़ा नहीं बनेंगे.
– 2011 और 2012 में ओबामा सरकार में बतौर विदेश मंत्री भारत यात्रा पर कई व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.
– अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सोमवार को कहा कि अमेरिका और भारत जितना चाहते थे,
– हिलेरी समय-समय पर पाकिस्तान में बढ़ते आतंकवाद का मुद्दा भी उठाती रही हैं
– 2009 की यात्रा के दौरान 26/11 हमले के लेकर उन्होंने पाकिस्तान को चेताया कि भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने वाले आतंकवादी गुटों का सफाया करे.
– 2012 में उनका बयान कि “आतंकवाद से निपटने में नाकाम रहा पाकिस्तान” ने पाक सरकार को आतंकवाद के लिए कार्यवाही करने पर मजबूर किया.

भारतीय मूल के वोटर्स का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर रहा है…
– अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में मुख्यतौर पर दो पार्टियां चुनावी मैदान में रहती हैं- डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी।
– अमरीका में बसे भारतीय-अमरीकी समुदाय ने पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी को ही समर्थन माना जाता रहा है।
– भारतीयों का झुकाव डेमोक्रेट उम्मीदवार की और रहने का कारण है प्रवासियों, मध्यम वर्ग और छात्रोंके प्रति उनकी नीतियां।
– Pew Research Centre के आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में 80 फीसदी प्रवासी भारतीयों ने डेमोक्रेट को अपना वोट दिया था
– भारतीय-अमरीकी लोगों की संख्या 30 लाख है, केवल 16 फीसदी ही रिपब्लिकन उम्मीदवारों का पक्ष में रहे हैं।
– रिपब्लिकन पार्टी के कई सिनेटर भारतीय अमरीकियों पर नस्लभेदी टिप्पणी करते रहे हैं, जिससे भारतीय समाज नाराज है।
– भारतीय ही नहीं एशियाई मूल के ज्यादातर अमरीकी लोग डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति सबसे ज्यादा झुकाव दिखाते रहे हैं।

इस चुनाव से भारतीयों को क्या उम्मीद है…
– आज भारतीय-अमरीकी मूल के 70 फीसदी लोगों के पास कॉलेज डिग्री है और दो तिहाई के पास मैनेजमैंट नौकरियां हैं।
– इनकी मीडियन आमदनी 88 हजार डॉलर है जो अमरीका में सबसे ज्यादा है।
– अमरीका में रहने वाले जो भारतीय भारत में पले बढ़े हैं, वो चाहते हैं कि अमरीका सरकार अच्छा काम करे।
– ज्यादातर भारतीय-अमरीकी लोग मध्यम वर्ग से हैं और उन्हें लगता है कि डेमोक्रेटिक ही उन मुद्दों को सुलझाएंगे जो उनके दिल के करीब हैं।
– आउटसोर्सिंग पर अंकुश, कॉलेज शिक्षा की बढ़ती कीमत और सोशल सेक्यूरिटी को बचाए रखना जैसे कई मुद्दे हैं।
– भारतीय-अमरीकी लोगों को सोशल सेक्यूरिटी का प्रावधान पसंद है क्योंकि कई लोगों के बूढ़े माता-पिता रिटायरमेंट के बाद उनके पास अमरीका आ जाते हैं।

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कृष्ण जन्माष्टमी: दही-हांडी उत्‍सव- इतिहास, परम्परा और महत्व…

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दही-हांडी उत्सव भारत में सदियों से धूमधाम से मनाया जाता रहा है। महाराष्ट्र में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। जन्माष्टमी के दिन होने वाले इस उत्सव में लाखों युवा उत्साह से भाग लेते हैं। लोगों के उत्साह को देखते हुए राजनीतिक दल भी दही हांडी महोत्सव में पीछे नहीं रहते। बड़े-बड़े आयोजकों में कई राजनेता शामिल हैं जो ऊंची-ऊंची टंगी दही-हांडियों पर इनामी राशी रखते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसी दही हांडी महोत्सव के बारे में…

कैसे हुई दही हांडी परम्परा की शुरुआत

उत्‍सव की पौराणिक मान्‍यता…
– कृष्ण पुराण की कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ माखन की चोरी किया करते थे।
– भगवान कृष्ण ऊपर चढ़कर पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा दही और माखन चुराया करते थे।
– जब वे गोकुल के घरों में मटकियां फोड़ने का प्रयास करते थे, तो महिलाएं उन्हें रोकने के लिए पानी फेंकती थी।
– कान्‍हा के इसी रूप के कारण बड़े प्‍यार से उन्‍हें ‘माखनचोर’ कहा जाता है।
– हांडी फोड़ने वाले बच्चे को ‘गोविंदा’ कहा जाता है, जो ‘गोविंद’ का ही दूसरा नाम है।

1907 में मुंबई में शुरू हुई थी दही-हांडी की परम्परा…
– नवी मुंबई के पास घणसोली गांव में यह परंपरा पिछले 104 वर्षों से चली आ रही है।
– यहां सबसे पहले वर्ष 1907 में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई थी।
– यहां के हनुमान मंदिर में जन्माष्टमी के एक सप्ताह पहले से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाता है।
– जो दही-हांडी फोड़ने के साथ समाप्त होता है।
– दही-हांडी फोड़ने के लिए युवा लड़कों की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी मटकी तोड़ती थी।
– अंग्रेजी शासन काल में यह क्रांतिकारियों के गांव के रूप में प्रसिद्ध था।

ऐसे मनाया जाता है दही हांडी…
– दही-हांडी प्रतियोगिता में युवाओं का एक समूह पिरामिड बनाता है, जिसमें एक युवक ऊपर चढ़कर ऊंचाई पर लटकी हांडी, जिसमें दही होता है, उसे फोड़ता है।
– ये गोविंदा बनकर इस खेल में भाग लेते हैं। इस दौरान कई जगहों पर प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।
– आसपास के लोग दही-हांडी फोड़ने का प्रयास कर रही टोली पर पानी की बौछार करते हैं, ताकि वे आसानी से दही हांडी फोड़ न सके।
– प्रतियोगिता जीतने वालों पर लाखों के इनाम की बौछार होती है।
– पहले इसमें सिर्फ लड़के ही शामिल होते थे, लेकिन अब लड़कियों की टोली भी अपने जौहर को दिखा रही हैं।
– बॉलीवुड के डांस नंबर पर हजारों लोग पानी की बौछारों के बीच जमकर नाचते हैं।
– पूरे विश्व में दही हांडी की तरह ही कई अन्य फेस्टिवल रंगारंग ढंग से सेलिब्रेट किए जाते हैं।
– कहीं इन्हें रंगबिरंगी ड्रेस पहनकर, तो कहीं कीचड़ में, कहीं रात के अंधेरे और आग के बीच में इन्हें सेलिब्रेट किया जाता है।

मुंबई और आसपास ऐसे मनाई जाती है दही हांडी…
– एक-एक पथक में करीब 20 से 50 और बड़े गोविंदा पथक में 200 से 250 और इससे अधिक गोविंदा सदस्य शामिल होते हैं।
– मुंबई के कुछ प्रमुख गोविंदा पथकों में ऐरोली कोलीवाडा मंडल, ओमसाईं गोविंदा पथक, शिव गर्जना गोविंदा पथक, गोठिवली गोविंदा पथक हैं।
– मी राबाडाकर गोविंदा पथक, एकवीरा गोविंदा पथक, अभिनव मित्रमंडल, सामाजिक युवा मंच, दोस्ती ग्रुप व जय भवानी मित्रमंडल भी शामिल हैं।
– मुंबई ही नहीं, ठाणे, नवी मुंबई, डोंबिवली, कल्याण, उल्हासनगर, मीरा-भाईंदर, वसई-विरार तक दही हांडी उत्सव का आयोजन होता है।
– मुंबई के वरली में विशेष इंतजाम रहते हैं, तो उपनगरीय इलाकों में घाटकोपर, चेंबूर, अंधेरी, बोरिवली में गोविंदा पथकों का स्वागत किया जाता है।
– दादर में सबसे पहले दही हांडी फूंटती है, मुंबई में 100 से भी ज्यादा जगहों पर ये कार्यक्रम होता है।

परम्परा का ‘दही’ और राजनीति की ‘हांडी’

लाखों के इनाम होते हैं दही हांडी पर…
– पिछले कुछ सालों में महानगरी मुम्बई का दही हांडी उत्सव एक दिन में 25 करोड़ का टर्नओवर करता आ रहा है।
– उत्सव में करीब 1.5 लाख खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।
– जिसमें सबसे छोटा दल 20 सदस्यों का होता है तो सबसे बड़ा दल 250 सदस्यों का।
– मुंबई और आसपास करीब 3300 आयोजनकर्ता हैं जो उत्सव को संचालित करते हैं।
– इन आयोजनकर्ताओं में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– 2015 में 100 आयोजनकर्ताओं ने इनाम की राशी 50 हजार से ऊपर रखी थी।
– कई बड़े आयोजनकर्ता 3 लाख से लेकर 10 लाख तक की इनामी राशी रखते हैं।
– 2013 में एनसीपी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने एक करोड़ रुपये का इनाम रखा था।
– 2013 में सचिन अहीर ने भी एक करोड़ का इनाम रखा था।

दही हांडी और राजनेता…
– 3300 आयोजनकर्ता में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– प्रताप सरनाईक: शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक की संस्था संस्कृति युवा प्रतिष्ठान ठाणे के वर्तक नगर में हांडी लगाता है।
– जितेंद्र आव्हाड: एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड की संघर्ष संस्था ने पांच पाखाडी में दही-हांडी का आयोजन करते हैं।
– राजन विचारे: शिवसेना सांसद राजन विचारे की आनंद चैरिटेबल ट्रस्ट संस्था ठाणे के जांभली नाके पर दही हांडी लगाते हैं।
– रविंद्र फाटक: शिवसेना विधायक रविंद्र फाटक की संकल्प प्रतिष्ठान का दही हांडी आयोजन ग्लैमर से भरपूर रहता है।
– अविनाश जाधव: ठाणे शहर एमएनएस अध्यक्ष अविनाश जाधव भगवती मैदान में इस बार 11 लाख की दही हांडी आयोजन की है।
– गोविंदाओं का जोश बढ़ाने के लिए कई बड़े फिल्मी सितारे भी दही-हांडी महोत्सव में शामिल होते रहे हैं।

दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे रखते हैं खुद को फिट

गोविंदा आला रे आला! ये वह शबद है जो जन्माष्टमी के दिन मुंबई की हर गली में सुनाई देता है। गोविंदा पथक छोटी -बड़ी टोलियों में धूम मचाने ये गोविंदा घर-घर माखन चोरी करने पहुंचते हैं। मानव पिरामिड बनाकर ये गोविंदा दही-हाड़ी तोड़ते हैं। इस उत्सव को लेकर गोविंदाओं में जो उत्सुकता, जोश और खुशी दिखाई देती है उसके पीछे उनकी कई दिनों की मेहनत होती है। इसके लिए वे खुद को बहुत फिट रखते हैं। आइए जानते हैं कैसे दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे खुद को फिट रखते हैं…

तीन महीने पहले से शुरू हो जाता है अभ्यास…
– गोविंदा की एक टीम में 150 से 200 सदस्य शामिल होते हैं।
– हांडी फोड़ने का अभ्यास जन्माष्टमी के 3 महीने पहले शुरू हो जाता है।
– मांजगांव ताड़वाड़ी गोविंदा पथक उन ग्रुप्स में से है जो नौ मंजिल बनाकर दही हांडी फोड़ते हैं।
– इस कठिन करतब के लिए सभी गोविंदा सदस्य डेढ़ से तीन महीने पहले प्रैकिटस शुरू कर देते हैं।
– स्टेमिना बनाए रखने के लिए सभी गोविंदा कबड्डी, स्विमिंग और फुटबॉल जैसे खेल में भाग लेते हैं।
– इसके साथ ही रोजाना जिम भी जाते हैं, इस दौरान वे ब्राउन ब्रेड और डेयरी प्रोडक्ट ज्यादा खाते हैं।
– साथ ही ये गोविंदा प्रोटीन के भी अपनी डाइट में शामिल करते हैं।

होती है शारीरिक जांच…
– ट्रेनिंग की शुरुआत होने से पहले ही एक तरह से इनके शिविर आयोजित होते हैं। जहां पर इनके शरीर की पूरी जांच की जाती है।
– दही हंडी के त्योहार में हिस्सा लेने वाले बच्चे या नवयुवक को किसी भी तरह की कोई शारीरिक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
– हर बड़ा मंडल अपने सदस्यों का हेल्थ चेकअप करता है, ताकि हंडी को फोड़ने के लिए चढ़ते या उतरते समय किसी को कोई दिक्कत न हो।

दही हांडी के दिन कैसी होती है तैयारी…
– सुबह दूध और हल्का पौष्टिक ब्रेकफास्ट करके घर से निकलते हैं।
– सुस्ती से बचने के लिए दोपहर के लंच में चावल खाने से बचते हैं।
– दिनभर धूप में घूमने से डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है।
– इसालिए उन्हें ग्लूकोज, पानी और फ्रूट जूस दिया जाता है। द
– खास बात कि इस उत्सव में गोविंदा शराब नहीं पी सकते।
– अगर कोई अल्कोहल लेकर आया भी तो उसे भाग लेने से रोक दिया जाता है।

कराना पड़ता है बीमा…
– 24 फीट के ऊपर की मानव पिरामिड बनाने वाला हर एक मंडल को अपने हर सदस्य को बीमा करवाना पड़ता है।
– क्योंकि इस त्योहार के दौरान में सैकड़ों की तादाद में लोग घायल हो जाते हैं।
– इतनी ही नहीं जोश के चलते न जाने कितनों को तो अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
– इन्हीं सब दुर्घटनाओं को ध्यान में रखते हुए गोविंदाओं का बीमा करवाया जाता है।
– ताकि घायल या मृत्यु होने पर उसके परिवार को बीमा कंपनी की ओर से मुआवजा दिया जा सके।

लाखों का इनाम, लेकिन खर्चे भी कम नहीं…
– गोविंदाओं की मेहनत को देखते हुए लगता है कि इनकी कमाई तो सिर्फ नाम मात्र के लिए ही होती है।
– अगर सुबह से लेकर शाम तक इनकी कमाई लाखों में हो भी जाए तो इनके खर्चे भी उतने ही अधिक होते हैं।
– क्योंकि चाहें जितनी भी छोटी टीम हो, उसमें कम से कम 20 लोग तो जरूर होते हैं।
– इन सभी के लिए एक जैसी टी-शर्ट, खाना-पीना और गाड़ी-घोड़ा में ही सारे पैसे खर्च हो जाते हैं।
– हकीकत तो यह है कि ईनाम की राशि के अलावा गोविंदाओं की जेब से भी खर्चा हो जाया करता है।

जन्माष्टमी पर बॉलीवुड के मशहूर गोविंदा

फिल्म ब्लफमास्टर में शम्मी कपूर: 

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फिल्म मुकाबला में सुनील दत्त: 

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फिल्म खुद्दार में अमिताभ बच्चन: 

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फिल्म बदला में शत्रुघ्न सिन्हा: 

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फिल्म वास्तव में संजय दत्त: 

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फिल्म हैलो ब्रदर में सलमान खान: 

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फिल्म ओह माय गॉड में सोनाक्षी भी फोड़ेंगी दही-हांडी: 

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कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

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Independence Day: कैसे बना INDIA… 200 साल की गुलामी से आजादी की पहली सांस तक का सफर…

Tiranga

15 अगस्त 2016 को देश आजादी की 70वीं सालगिरह मनाएगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के लिए देशवासियों को कितना संघर्ष करना पड़ा था, कितनी कुर्बानियां देनी पड़ी थीं। भारत की आजादी के लिए 1757 से 1947 के बीच कई संघर्ष हुए। इन्हीं संघर्षों का नतीजा है कि आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आईए जानते हैं भारत की आजादी से जुड़ी यह अविश्वनीय कहानियां…

भारत की आजादी का इतिहास

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ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन

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ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी व्यापारिक कंपनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। 1708 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी ‘न्यू कम्पनी’ का ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ में विलय हो गया। परिणामस्वरूप ‘द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज’ की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख ‘गर्वनर-इन-काउन्सिल’ करती थी।

1757 प्लासी का युद्ध

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प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे ‘प्लासी’ नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराजुद्दौला को हरा दिया था। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहीं से भारत की दासता की कहानी शुरू होती है। पलासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश भारत में राजनीतिक सत्ता जीत गए और 200 साल तक राज किया।

ब्रिटिश सरकार की विस्तारवादी नीति…
– 1757 में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराने के बाद कर बंगाल पर अधिकार कर लिया।
– प्लासी की लड़ाई के बाद 1773 में रेग्युलेटिंग एक्ट लाया गया।
– एक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाना था।
– इसी एक्ट के तहत भारत में गवर्नर-जनरल का पद की सृष्टि की गई।
– सबसे पहले वारेन हेस्टिंग्स इस पद पर नियुक्त हुए वे 1774 से 1786 तक इस पद पर रहे।
– इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में विस्तारवाद की नीति पर काम करना शुरू कर दिया।
– 1792 में कंपनी ने टीपू सुल्तान को हराकर दक्कन (दक्षिण)पर अपनी पकड़ मजबूत की।
– 1819 में मराठो को हारने के बाद कंपनी ने देश में बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया।
– तब भारत कुल विश्व व्यापार में 23% की भागीदारी रखता था जबकि ब्रिटेन मात्र 1.5% था।
– 1848 में लॉर्ड डलहौजी उत्तर-पश्चिमी भारत में अपना मजबूत शासन स्थापित कर रहे थे।
– लेकिन नाराज और असंतुष्ट सैनिकों ने विद्रोह कर दिया
– जिसे आमतौर पर ‘1857 का विद्रोह’ या ‘1857 के गदर’ के तौर पर जाना जाता है।
– हालांकि ब्रिगेडियर नील जेम्स ने 11 जून को इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया।
– लेकिन विद्रोह के बाद 1858 में कंपनी को समाप्त कर दिया गया।
– भारत की सत्ता सीधे ब्रिटेन के सम्राट के अधीन आ गई।
– गवर्नर-जनरल के पद को वाइसराय कर दिया गया।
– लॉर्ड कैंनिंग को पहले वायसराय का पद प्रदान किया गया।

1857 का विद्रोह

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– यह गदर मेरठ में सैनिकों के विद्रोह से शुरु हुआ। उनके विद्रोह का कारण वो नई कारतूस थी जो नई एनफील्ड राइफल में लगती थी।
– इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी से बना ग्रीस था जिसे सैनिक को राइफल इस्तेमाल करने की सूरत में मुंह से हटाना होता था।
– यह हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के सैनिकों को धार्मिक कारणों से मंजूर नहीं था और उन्होंने इसे इस्तेमाल करने से मना कर दिया था जिसके चलते वो बेरोजगार हो गए।
– जल्दी ही यह विद्रोह फैल गया खासकर दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों में।
– इस विद्रोह ने दिल्ली, अवध, रोहिलखंड, बुंदेलखंड, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया।
– हालांकि तब भी 1857 का विद्रोह असफल कहलाया और एक साल के भीतर ही खत्म हो गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

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– ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना 28 दिसम्बर, 1885 ई. में दोपहर बारह बजे बम्बई में ‘गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज’ के भवन में की गई थी।
– इसके संस्थापक ‘ए.ओ. ह्यूम’ थे और प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्‍द्र बनर्जी बनाये गए थे।
– ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ में कुल 72 सदस्य थे, जिनमें महत्त्वपूर्ण थे- दादाभाई नौरोजी, फ़िरोजशाह मेहता, दीनशा एदलजी वाचा थे।
– इसका मुख्य लक्ष्य मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिकों के विचारों को आगे रखना था।

1906 में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन

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– कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन 1906 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में सम्पन्न हुआ।
– इस अधिवेशन में नरम दल तथा गरम दल के बीच जो मतभेद थे, वह उभरकर सामने आ गये।
– इन मतभेदों के कारण अगले ही वर्ष 1907 ई. के ‘सूरत अधिवेशन’ में कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये।
– अब कांग्रेस पर नरमपंथियों का कब्जा हो गया, इस अधिवेशन में चार प्रस्तावों को पास करवाने में सफल रहा-
          #स्वराज्य की प्राप्ति
          #राष्ट्रीय शिक्षा को अपनाना
          #स्वदेशी आन्दोलन को प्रोत्साहन देना
          #विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना

1905 में बंगाल विभाजन

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– लॉर्ड कर्जन 1899 में भारत का वाइसराय बनकर आए। 1905 में उन्होंने बंगाल विभाजन का कर दिया।
– विभाजन के सम्बन्ध में कर्ज़न का तर्क था कि तत्कालीन बंगाल, जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे।
– काफ़ी विस्तृत है और अकेला लेफ्टिनेंट गवर्नर उसका प्रशासन भली-भाँति नहीं चला सकता है।
– इसके फलस्वरूप पूर्वी बंगाल के ज़िलों की प्राय: उपेक्षा होती है, जहाँ मुसलमान अधिक संख्या में हैं।
– इसीलिए उत्तरी और पूर्वी बंगाल, ढाका तथा चटगाँव डिवीजन में आने वाले पन्द्रह ज़िलों को असम में मिला दिया गया।
– पूर्वी बंगाल तथा असम नाम से एक नया प्रान्त बना दिया गया और उसे बंगाल से अलग कर दिया गया।

1909 में मॉर्ले मिंटो सुधार

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– मॉर्ले मिंटो सुधार को 1909 ई. का ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ भी कहा जाता है।
– तत्कालीन भारत सचिव जॉन मार्ले एवं वायसराय लॉर्ड मिण्टो ने सुधारों का ‘भारतीय परिषद एक्ट, 1909’ पारित किया, जिसे ‘मार्ले मिण्टो सुधार’ कहा गया।
– भारतीय परिषद सदस्यता के लिए निर्वाचक सिद्धान्त प्रस्तुत किया, साथ ही मुसलमानों के लिए अगल निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई।
– मार्ले-मिंटो सुधारों हकीकत में लक्ष्य विकास करने की जगह हिंदू और मुस्लिमों में मतभेद पैदा करना था।

स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और महात्मा गांधी

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– 1914-1918 के प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गांधी भारत लौटे और देश की हालत समझकर अहिंसक आंदोलन ‘सत्याग्रह’ के तौर पर शुरु किया।
– 1917 में बिहार में चम्पारन में सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
– 1920 में ब्रिटिश सरकार द्वारा निष्पक्ष व्यवहार ना होता देख असहयोग आंदोलन शुरु किया।
– 1921 में बम्बई में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई, साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध बम्बई में 5 दिन का उपवास, व्यापक अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया।
– 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद जन-आन्दोलन स्थगित किया, उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला तथा 6 वर्ष कारावास का दण्ड दिया गया।
– 1924 में बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए।
– 1927 में बारदोली सत्याग्रह सरदार पटेल के नेतृत्व किया।
– 1928 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन मे भाग लिया-पूर्ण स्वराज का आह्वान।
– 1930 में ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह- साबरमती से दांडी तक की यात्रा का नेतृत्व किया।
– 1931 में गांधी इरविन समझौता- द्वितीय गोलमेज परिषद के लिये इंग्लैण्ड यात्रा की।
– 1934 में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की।
– 1936 में वर्धा के निकट से गाँव का चयन जो बाद में सेवाग्राम आश्रम बना।
– 1937 में अस्पृष्यता निवारण अभियान के दौरान दक्षिण भारत की यात्रा।
– 1942 में भारत छाड़ो आन्दोलन का राष्ट्रव्यापी आह्वान, उनके नेतृत्व में अन्तिम राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह।
– 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन से भेंट- पूर्वी बंगाल के 49 गाँवों की शान्तियात्रा जहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़कीं हुई थी।
– 1947 में साम्प्रदायिक शान्ति के लिये बिहार यात्रा। नई दिल्ली में लार्ड माउन्टबैटेन तथा जिन्ना से भेंट, कलकत्ता में दंगे शान्त करने के लिये उपवास तथा प्रार्थना।
– 1948 में जीवन का अन्तिम उपवास 13 जनवरी से 5 दिनों तक दिल्ली के बिड़ला हाउस में – देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के विरोध में।
– 1948 में 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे द्वारा शाम की प्रार्थना के लियेजाते समय बिड़ला हाउस में हत्या।

1918 में खेड़ा सत्याग्रह

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– ‘चम्पारन सत्याग्रह’ के बाद गाँधीजी ने 1918 ई. में खेड़ा (गुजरात) के किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया।
– खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी।
– खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) था।
– यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था।

1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार

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– अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को शाम को करीब साढ़े चार बजे एक सभा का आयोजन हुआ, इस सभा में 20,000 व्यक्ति इकट्ठे हुए थे।
– दूसरी और जनरल डायर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सभा को अवैधानिक घोषित कर दिया था।
– डायर ने बिना किसी चेतावनी के 50 सैनिकों को गोलियाँ चलाने का आदेश दिया, 10-15 मिनट में 1650 गोलियाँ दागी गईं।
– सरकारी अनुमानों के अनुसार, लगभग 400 लोग मारे गए और 1200 के लगभग घायल हुए थे।

1920 में असहयोग आंदोलन

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– इसी संहार की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप गांधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया।
– सितम्बर, 1920 में असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कलकत्ता में ‘कांग्रेस का अधिवेशन’ हुआ।
– इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार भारत में विदेशी शासन के विरुद्ध असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।
– पश्चिमी भारत, बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आन्दोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली।
– इसी दौरान कई शिक्षण संस्थाएं जैसे काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, बनारस विद्यापीठ एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि की स्थापना की गई।

1927 में साइमन कमीशन और 1928 लाला लाजपत राय का निधन

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– असहयोग आंदोलन के खत्म होने के तुरंत बाद भारत की सरकार में नया कमीशन बनाया गया जिसमें सुधारों में किसी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया
– साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी।
– इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे।
– यही कारण था कि इसे ‘श्वेत कमीशन’ कहा गया।
– कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएं।
– इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।
– आयोग के विरोध के कारण लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द बल्लभ पंत आदि ने लाठियां खाईं।
– लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कई बड़े प्रदर्शन किए।
– लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया
– उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर टूट पड़ा उसकी लाठी की गहरी चोट के कारण लाला लाजपत राय की 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई।

1929 में सविनय अवज्ञा आंदोलन

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– भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1929 में लाहौर अधिवेशन में घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है।
– महात्मा गांधी ने अपनी इस माँग पर जोर देने के लिए 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अविज्ञा आन्दोलन छेड़ा।
– जिसका उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-कानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था।
– ब्रिटिश सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए सख्त कदम उठाये और गांधी जी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं व उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया।

1930 में दांडी मार्च

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– सविनय अविज्ञा आन्दोलन के दौरान गांधी जी ने नमक कानून को तोड़ने के उदेश्य से दांडी मार्च किया
– 12 मार्च 1930 को सुबह 6.30 बजे 78 सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 358 किमी की यात्रा आरंभ की।
– यात्रा का मुख्य उद्देश्य था- “अंग्रेज़ों द्वारा बनाये गए ‘नमक क़ानून को तोड़ना’ था।
– लगभग 24 दिन बाद 1 लाख लोगों के साथ 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा।
– महात्मा गाँधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को अपना पड़ाव बनाया था।

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भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन

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बम और पिस्तौल की राजनीति में विश्वास रखने वाले क्रान्तिकारी विचारधारा के लोग समझौते की राजनीति में कदापि विश्वास नहीं करते थे। उनका उद्देश्य था- ‘जान दो या जान लो।’ बम की राजनीति उनके लिए इसलिए आवश्यक हो गयी थी, क्योंकि उन्हें अपनी भावनायें व्यक्त करने या आज़ादी के लिए संघर्ष करने का और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। आतंकवादी शीघ्र-अतिशीघ्र परिणाम चाहते थे। वे उदारवादियों की प्रेरणा और उग्रवादियों के धीमें प्रभाव की नीति में विश्वास नहीं करते थे। मातृभूमि को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए वे हत्या करना, डाका डालना, बैंक, डाकघर अथवा रेलगाड़ियों को लूटना सभी कुछ वैध समझते थे। क्रान्तिकारी विचारधारा के सर्वाधिक समर्थक बंगाल में थे। उन्हें ब्रिटिश हुकूमत के प्रति घृणा थी। वे बोरिया-बिस्तर सहित अंग्रेज़ों को भारत से बाहर भगाना चाहते थे। ‘वारीसाल सम्मेलन’ के बाद 22 अप्रैल, 1906 ई. के अख़बार ‘युगांतर’ ने लिखा, ‘उपाय तो स्वयं लोगों के पास है। उत्पीड़न के इस अभिशाप को रोकने के लिए भारत में रहने वाले 30 करोड़ लोगों को अपने 60 करोड़ हाथ उठाने होंगें, बल को बल द्वारा ही रोका जाना चाहिए।’ इन क्रान्तिकारी युवकों ने आयरिश आतंकवादियों एवं रूसी निहलिस्टों (अतिवादी) के संघर्ष के तरीकों को अपनाकर बदनाम अंग्रेज़ अधिकारियों को मारने की योजना बनाई। इस समय देश के अनेक भागों में, मुख्यतः, महाराष्ट्र एवं पंजाब में क्रान्तिकारी कार्यवाहियाँ हुई।

बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन- अगर यह मान लिया जाये कि बंगाल क्रान्तिकारी आन्दोलन का गढ़ था, तो अतिश्योक्ति न होगी। बंगाल में क्रान्तिकारी विचारधारा को बारीन्द्र कुमार घोष एवं भूपेन्द्रनाथ (विवेकानन्द के भाई) ने फैलाया। 1906 ई. में इन दोनों युवकों ने मिलकर ‘युंगातर’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया। बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन की शुरुआत ‘भद्रलोक समाज’ नामक समाचार पत्र ने की। इस समाचार पत्र ने क्रान्ति के प्रचार में सर्वाधिक योगदान दिया। पत्र के द्वारा लोगों में राजनीतिक व धार्मिक शिक्षा का प्रचार किया गया। बारीन्द्र घोष एवं भूपेन्द्रनाथ के सहयोग से ही 1907 ई. में मिदनापुर में ‘अनुशीलन समिति’ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य था ‘खून के बदले खून’। ‘अनुशीलन समिति’ के अलावा बंगाल की ‘सुह्रद समिति’ (मायसेन सिंह), ‘स्वदेशी बांधव समिति’ (वारीसाल), ‘व्रती समिति’ (फ़रीदपुर) आदि क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करती थीं। अनेक क्रान्तिकारी समाचार पत्रों का भी बंगाल से प्रकाशन शुरु हुआ, जिसमें ब्रह्म बंद्योपाध्याय द्वारा प्रकाशित ‘सन्ध्या’, अरविन्द्र घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम’, भूपेन्द्रनाथ दत्त द्वारा सम्पादित ‘युगान्तर’ आदि प्रमुख थे। वारीसाल में पुलिस द्वारा किये गए लाठी चार्ज पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये ‘युगान्तर’ ने कहा कि ‘अंग्रेज़ सरकार के दमन को रोकने के लिए भारत की तीस करोड़ जनता अपने 60 करोड़ हाथ उठाए और ताकत का मुकाबला ताकत से किया जाये।’

बंगाल के एक और क्रान्तिकारी जतीन्द्र नाथ मुखर्जी थे, जिन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से भी जाना जाता था। 9 सितम्बर, 1915 को बालासोर में पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मारे गए। बंगाल के एक महान क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस थे, जिन्होंने कलकत्ता से दिल्ली राजधानी परिवर्तन के समय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका था। गिरफ्तारी से बचने के लिए रासबिहारी बोस जापान चले गये थे। अवध बिहारी, अमीरचन्द्र, लाल मुकुंद, बसंत कुमार को गिरफ्तार कर इन पर ‘दिल्ली षड़यंत्र’ के तहत मुकदमा चलाया गया। बंगाल में बढ़ रही क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के दमन हेतु सरकार ने 1900 ई. में ‘विस्फोटक पदार्थ अधिनियम’ तथा 1908 ई. में ‘समाचार पत्र अधिनियम’ का सहारा लेकर क्रान्ति को कुचलने का प्रयास किया। सरकार के दमन चक्र के चलते अरविन्द घोष क्रान्तिकारी क्रिया-कलापों को छोड़कर सन्न्यासी हो गए तथा पांडिचेरी में अपना आश्रम स्थापित कर लिया। ब्रह्म बंद्योपाध्याय, जिन्होंने सर्वप्रथम रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘गुरुदेव’ कहकर सम्बोधित किया था, रामकृष्ण मठ में स्वामी जी बन गए।

पंजाब में क्रान्तिकारी आन्दोलन- पंजाब में 1906 ई. के प्रारम्भ में ही क्रान्तिकारी आन्दोलन फैल गया था। पंजाब सरकार के एक ‘उपनिवेशीकरण विधेयक’ के कारण किसानों में व्यापक असन्तोष व्याप्त था। इसका उद्देश्य चिनाब नदी के क्षेत्र में भूमि की चकबन्दी को हतोत्साहित करना तथा सम्पत्ति के विभाजन के अधिकारों में हस्तक्षेप करना था। इसी समय सरकार ने जल कर में वृद्धि करने का फैसला किया, जिससे जनता में असन्तोष फैल गया। इस तूफ़ान को उठता देखकर सरकार बेचैन हो गई। उसने रावलपिन्डी में आन्दोलन को कुचलने की दृष्टि से सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दी तथा लाला लाजपत राय व अजीत सिंह को गिरफ्तार कर माण्डले जेल भेज दिया गया। 1915 ई. में पंजाब में एक संगठित आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की गई, जिसमें निश्चित किया गया कि 21 फ़रवरी, 1915 को सम्पूर्ण उत्तर भारत में एक साथ क्रान्ति का बिगुल बजाया जाय। यह योजना सरकार को पता चल गई। अनेक नेता पकड़े गये तथा इन पर ‘लाहौर षड़यन्त्र’ का मुकदमा चलाया गया। इन नेताओं में पृथ्वी सिंह, परमानंद, करतार सिंह, विनायक दामोदर सावरकर, जगत सिंह, आदि देशभक्त थे। अमेरिका में ‘ग़दर पार्टी’ की स्थापना के बाद पंजाब ग़दर पार्टी की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बन गया था। अजीत सिंह ने लाहौर में ‘अंजुमन-ए-मोहिब्बान-ए-वतन’ नामक संस्था की स्थापना की तथा ‘भारत माता’ नाम से अख़बार निकाला।

महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन- महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन को उभारने का श्रेय लोकमान्य तिलक के पत्र ‘केसरी’ को जाता है। तिलक ने 1893 ई. ‘शिवाजी उत्सव’ मनाना आरम्भ किया। इसका उद्देश्य धार्मिक कम राजनीतिक अधिक था। महाराष्ट्र में 1893-1897 ई. के बीच प्लेग फैला व अंग्रेज़ सरकार ने मरहम लगाने के बजाय दमन कार्य किया। अतः 22 जून, 1897 ई. को प्लेग कमिश्नर आमर्स्ट की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस सम्बन्ध में दामोदर चापेकर को पकड़कर मृत्यु दण्ड दे दिया गया। तिलक को भी विद्रोह भड़काने के आरोप में 18 माह का कारावास दिया गया। 1908 ई. में बम्बई प्रांत के चार देशी भाषा के समाचार पत्रों पर सरकार ने कहर ढाया। 24 जून, 1908 ई. को तिलक को फिर गिरफ्तार किया गया और ‘केसरी’ में प्रकाशित लेखों के आधार पर पहले तो उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, फिर 6 वर्ष की सज़ा दे दी गई। बम्बई में इसके विरोध में मज़दूरों ने जबरदस्त हड़ताल की, जो छह दिनों तक चली। महाराष्ट्र में नासिक भी क्रान्तिकारी आन्दोलन का गढ़ था। विनायक दामोदर सावरकर ने 1901 ई. में नासिक में ‘मित्रमेला’ नामक संस्था की स्थापना की, जो कि मेजिनी के ‘तरुण इटली’ के नमूने पर ‘अभिनव भारत’ में परिवर्तित हो गयी। इस संस्था के मुख्य सदस्य अनन्त लक्ष्मण करकरे ने नासिक के न्यायाधीश जैक्शन की गोली मारकर हत्या कर दी। इस हत्याकाण्ड से जुड़े लोगों पर ‘नासिक षड़यन्त्र केस’ के तहत मुकदमा चलाया गया, जिसमें सावरकर के भाई गणेश शामिल थे; जिन्हें आजीवन कारावास की सज़ा मिली। महाराष्ट्र से महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी पत्र ‘काल’ का सम्पादन किया गया।

राम प्रसाद बिस्मिल:

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11 जून, 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में श्री मुरलीधर और श्रीमती मूलमति के घर में इनका जन्म हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित “सत्यार्थ प्रकाश” से प्रेरित राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज से जुड़े हुए थे और एक अच्छे देशभक्ति-कवि भी थे। “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है” आज भी हमारे रोंगटे खड़े कर देता है। ये ‘राम’, ‘अज्ञात’ और ‘बिस्मिल’ आदि नामों से हिंदी और उर्दू में कविताएं लिखते थे। हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” की स्थापना का श्रेय बिस्मिल को ही जाता है। इन्होंने शुरू में ‘मातृवेदी’ नामक एक संगठन बनाया। इसका मानना था कि अंग्रेजों को जल्दी देश से निकालने के लिए हथियारों की मदद जरुरी है। इसी उद्देश्य से इन्होंने अपने एक क्रांतिकारी मित्र पंडित गेंदा लाल दिक्षित के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके में 1918 में लूट की जिसे “मैनपुरी कान्स्पिरेंसी” का नाम दिया गया। उसके बाद 1923 में इन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का गठन किया और अपनी आज़ादी की लड़ाई में सैंकड़ों क्रांतिकारियों को अपना साथी बना कर अपने मिशन पर चल दिए। अब इनका संगठन तो मजबूत और बड़ा बन गया लेकिन हथियारों की जरूरत को पूरा करने के लिए संगठन के सदस्य पैसे की मांग करने लगे। इसी के चलते इन्होंने एक बार फिर एक षड्यंत्र रचा और लखनऊ के नजदीक काकोरी स्टेशन के पास इन्होंने अपने साथियों के साथ मिल कर 9 अगस्त, 1925 को 8-डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को रुकवा लिया, जिसमें अंग्रेज सरकार का सरकारी खजाना ले जाया जा रहा था और वहां बन्दूक की नोक पर इन लोगों ने एक बार फिर लूट को अंजाम दिया। इसके बाद बिस्मिल के संगठन के करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया और आपराधिक षड्यंत्र का अभियोग चलाया गया। गिरफ्तार होने वालों में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान मुख्य थे। यह लेख आप डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट नरेशजांगड़ा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं। इन्हें ब्रिटिश सरकार ने फांसी की सजा सुना दी और 19 दिसंबर, 1927 के दिन राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में, अशफाकउल्ला खान को फैजाबाद जेल में और रोशन सिंह को नैनी जेल इलाहाबाद में फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को निर्धारित तिथि से 2 दिन पहले ही 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में सज़ा-ए-मौत दे दी गयी थी।

 
अशफाक उल्ला खान:
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इनका जन्म भी शाहजहांपुर के एक पठान परिवार में 22 अक्टूबर, 1900 को हुआ। इनके पिता शफीक़ उल्ला खान और माता मज़हूर-उन-निसा बेग़म थीं। अशफाक की राम प्रसाद बिस्मिल के साथ बड़ी घनिष्ठ मित्रता थी। दोनों ही हिंदी और उर्दू में देश भक्ति की कवितायें और शायरी लिखते थे। इन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हमेशा बिस्मिल के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साथ दिया। 1925 के काकोरी ट्रेन लूट केस में भी वे बिस्मिल के साथ ही थे और उनका नाम भी आरोपियों में शामिल था। 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले की रात अशफाक ने कुछ पंक्तियाँ लिखीं और भारत माँ की आज़ादी के लिए अपनी तड़प को कुछ इस तरह से बयान किया:
“जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा, जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा”.
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ;
हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.”

चंद्रशेखर आजाद : मातृभूमि के लिए दी प्राणों की आहुति 

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चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। आजाद का जन्म स्थान भाबरा अब ‘आजादनगर’ के रूप में जाना जाता है। आजाद आजीवन ब्रह्मचारी रहे। वे 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की।

1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जब जज ने उनसे उनके पिता नाम पूछा तो जवाब में चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया. यहीं से चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद पड़ा.

इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।जब क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़े। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र (1925) में सक्रिय भाग लिया और की आंखों में धूल झोंककर भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया और ज्यों ही जे.पी. साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले, तो राजगुरु ने पहली गोली दाग दी, जो साण्डर्स के माथे पर लग गई वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा। फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया।

जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब सराहा गया।

अलफ्रेड पार्क, इलाहाबाद में 1931 में उन्होंने रूस की बोल्शेविक क्रांति की तर्ज पर समाजवादी क्रांति का आह्वान किया। उन्होंने संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें  फांसी दे सकेगी। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए इसी पार्क में 27 फरवरी, 1931 को उन्होंने स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी।

1931 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा

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– 23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ‘लाहौर षड़यंत्र'(यानी सांडर्स की हत्या का आरोप)में ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर लटका दिया।
– लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और शिवराम ने पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी।
– उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को शाम करीब सवा चार बजे अपनी योजना को अंजाम दिया
– लेकिन गलत पहचान के चलते स्कॉट की जगह सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी़ सांडर्स मारा गया।
– इस मामले को लाहौर षडयंत्र के नाम से जाना गया जिसमें राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।
– ब्रिटिश हुकूमत ने इन तीनों क्रांतिकारियों को निर्धारित समय से एक रात पहले ही फांसी दे दी।
– मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन आक्रोश से डरी सरकार ने 23-24 मार्च को सांय 7.33 बजे ही फांसी दे दी।
– और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

मुस्लिम लीग, जिन्ना और पाकिस्तान

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– वैसे तो मुस्लिम लीग का गठन सर आगा खान के नेतृत्व में 30 दिसंबर 1906 को दक्का (अब ढाका) में हुआ था।
– मुस्लिम लीग का मकसद भारत के मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों को आगे रखना था।
– शुरु शुरू में मोहम्मद अली जिन्ना अखिल भारतीय मुस्लिम लीग में शामिल होने से बचते रहे
– लेकिन बाद में उन्होंने अल्पसंख्यक मुसलमानों को नेतृत्व देने का फैसला कर लिया।
– 1913 में जिन्ना मुस्लिम लीग में शामिल हो गये और 1916 के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता की।
– 1916 के लखनऊ समझौते के कर्ताधर्ता जिन्ना ही थे, यह समझौता लीग और कांग्रेस के बीच हुआ था।
– लेकिन 1934 में मुस्लिम लीग की कमान संभालते ही जिन्ना का मकसद ही बदल गया।
– कहा एक केवल मुस्लिम लीग ही मुसलमानों का एक मात्र राजनीतिक साधन है।
– 1935 में जिन्ना की डॉ. राजेंद्र प्रसाद से चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि कांग्रेस किसी भी जाति,नस्ल या संसकृति का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
– हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग-अलग देश के नागरिक हैं अत: उन्हें अलहदा कर दिया जाये।
– उनका यही विचार बाद में जाकर जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त कहलाया।
– 1937 में हुए सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली के चुनाव में मुस्लिम लीग ने कई सीटों पर कब्जा किया।
– 1930 में मुस्लिम लीग के एक भाषण में मोहम्मद इकबाल ने उत्तर पश्चिम भारतीय राज्य को अलग कर एक राष्ट्र बनाने की मांग की।
– 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने पहली बार अलग राष्ट्र के लिए पाकिस्तान शब्द रखा।
– रहमत अली ने ही 1933 में पाकिस्तान नेशनल मूवमेंट आरंभ किया, 1 अगस्त 1933 से पाकिस्तान नामक एक साप्ताहिक पत्र भी शुरू किया।
– 1940 के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर यह कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है।
– कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे नेताओं ने इसकी कड़ी निन्दा की।
– जिन्ना ने 1941 में डॉन समाचार पत्र की स्थापना की, जिसके द्वारा उन्होंने अपने विचार का प्रचार-प्रसार किया।
– जिन्ना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी और 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था।
– यूनियनिस्ट नेता सिकन्दर हयात खान की मृत्यु के बाद पंजाब में भी मुस्लिम लीग का वर्चस्व बढ़ गया।
– 1944 में गान्धीजी ने बम्बई में जिन्ना से चौदह बार बातचीत की, लेकिन हल कुछ भी न निकला।

सुभाष चन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज

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– द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज का गठन किया गया।
– इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।
– शुरू में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे।
– एक साल बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा करते हैं कि अंग्रेजों से आजादी की आशा करना व्यर्थ है।
– 21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी
– इसे जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी।
– 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया।
– अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया।
– 4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।
– 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी एक प्रसारण किया और शुभकामनाएं मांगीं।
– 21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आगे बड़े।
– 22 सितम्बर 1944 को उन्होंने कहा, हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की मांग है।
– किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया, जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े।
– ऐसे में सुभाष चन्द्र बोस को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन

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– 14 जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें भारत से ब्रिटिश शासन तत्काल समाप्त करने की घोषणा की गई।
– इसी मिटिंग में भारत छोड़कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर करने के लिए 1942 में सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का आवाह्न किया गया।
– सविनय अवज्ञा आन्दोलन का यह तीसरा चरण था, इससे पहले 1929 और 32 में आंदोलन हुआ था।
– 8 अगस्त 1942 को मुम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस के सत्र में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया जिसे भारत छोड़ो प्रस्ताव के नाम से जाना गया।
– गोवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने भाषण दिया, जिसमें कहा, ‘मैं आपको एक मंत्र देना चाहता हूं जिसे आप अपने दिल में उतार लें, यह मंत्र है, ‘करो या मरो’।
– इसी गोवालिया टैंक मैदान आगे चलकर अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा।
– 9 अगस्त को गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
– इसके बाद जनता ने खुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और इसे आगे बढाया क्योंकि उस समय नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था।
– आंदोलन में रेलवे स्‍टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों तथा उपनिवेश राज के संस्‍थानों पर बड़े स्‍तर पर हिंसा शुरू हो गई।
– इसमें तोड़ फोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने हिंसा की इन गतिविधियों के लिए कांग्रेस और गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया।
– कांग्रेस पर प्रतिबंद लगा दिया गया और आंदोलन को दबाने के लिए सेना को बुला लिया गया।
– सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 942 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए।
– इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए।
– ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया।
– 1942 में जापान की फौजों के साथ मिल भारत की और रूख किया।
– ब्रिटिश और कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।
– भारत छोड़ो आंदोलन की विशालता और व्यापकता को देखते हुए अंग्रेजों को विश्वास हो गया था कि उन्हें अब इस देश से जाना पड़ेगा।

द्वितीय विश्‍व युद्ध की समाप्‍ति और ब्रिटेन में लेबर पार्टी का सत्ता में आना

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– 1945 में द्वितीय विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने पर ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्‍लेमेंट रिचर्ड एटली के नेतृत्‍व में लेबर पार्टी शासन में आई।
– विश्‍व युद्ध की समाप्ति के समय ब्रिटिश आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुके थे
– वे खुद इंग्‍लैंड में स्‍वयं का शासन भी चलाने में संघर्ष कर रहे थे।
– इसी साल ब्रिटेन के चुनावों में लेबर पार्टी लेबर पार्टी की जीत हुई
– लेबर पार्टी आजादी के लिए भारतीय नागरिकों के प्रति सहानुभूति की भावना रखती थी।
– लेबर पार्टी ने भारत सहित ब्रिटेन में तत्‍कालीन उपनिवेश को स्‍वतंत्रता प्रदान करने का वायदा किया था।
– मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया, जिसके बाद भारतीय राजनैतिक परिदृश्‍य का सावधानीपूर्वक अध्‍ययन किया गया।
– एक अंतरिम सरकार के निर्माण का प्रस्‍ताव दिया गया और एक प्रां‍तीय विधान द्वारा निर्वाचित सदस्‍यों और भारतीय राज्‍यों के मनोनीत व्‍यक्तियों को लेकर संघटक सभा का गठन किया गया।

भारत को कैसे मिली आजादी

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– भारत को आजाद करने का फैसला ब्रिटेन की नई नवेली सरकार ने 20 फरवरी 1947 को ही कर लिया था।
– इंग्लैंड में लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री रिचर्ड एटली ने एक महत्वपूर्ण पॉलिसी की घोषणा की थी।
– इसमें कहा गया था कि ब्रिटेन की सरकार ने यह फैसला कर लिया है कि भारत को जून 1948 तक स्वतंत्र कर दिया जाएगा।
– इसके लिए 12 फरवरी 1947 को ही लॉर्ड माउंटबैटन को भारत का वायसरॉय नियुक्त किया गया था।
– लॉर्ड माउंटबेटन का काम था ब्रिटेन के हाथों से भारत को सभी अथॉरिटी देने का प्रबंध करना।
– 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना देश के नेताओं के सामने प्रस्तुत की।
– जिसमे उन्होंने भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा रखी।

माउंटबेटन योजना

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– भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जायेगा
– बंगाल और पंजाब का विभाजन किया जायेगा
– उत्तर पूर्वी सीमा प्रान्त और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जायेगा।
– पाकिस्तान के लिए संविधान निर्माण हेतु एक अलग संविधान सभा का गठन किया जायेगा।
– रियासतों को यह छूट होगी कि वे या तो पाकिस्तान या भारत में सम्मिलित हो जाये या फिर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दें।
– भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के लिए 14-15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया।
– ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को जुलाई 1947 में पारित कर दिया।
– इसमें ही वे प्रमुख प्रावधान शामिल थे जिन्हें माउंटबेटन योजना द्वारा आगे बढ़ाया गया था|
– सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो आयोगों का ब्रिटिश सरकार ने गठन किया।
– आयोग का कार्य विभाजन की देख-रेख और नए गठित होने वाले राष्ट्रों की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को निर्धारित करना था|
– स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी और बड़ी रियासतें थीं।

आजादी का दिन 15 अगस्‍त ही क्‍यों चुना गया

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– लार्ड माउंटबेटन ने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय करके रखा था
– माउंटबेटन इस दिन को वे अपने कार्यकाल के लिए “बेहद सौभाग्‍यशाली” मानते थे।
– इसके पीछे कि खास वजह थी कि इसी दिन जापानी सेना ने उनके सामने आत्‍मसमर्पण किया था।
– दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान माउंटबेटन ब्रिटिश सेनाओं के कमांडर थे।

आधी रात की आजादी

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– जब 3 जून को यह फैसला किया गया कि 15 अगस्त को आजादी दी जाएगी तो भारतीय ज्योतिषियों ने इस पर एतराज किया।
– उनके अनुसार यह दिन काफी अमंगल होता देश के लिए, लेकिन लॉर्ड तो इसी दिन के लिए अड़े हुए थे।
– इसलिए ज्योतिषियों ने कहा कि आजादी का समय 14 अगस्त रात 12 बजे हो।
– क्योंकि कैलेंडर के अनुसार 12 बजे से अगले दिन का आरंभ माना जाता है।
– अंग्रेज भी यह मानते हैं कि रात 12 बजे से दिन बदल जाता है, माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया।
– 14 अगस्त को आजादी की घोषणा होते ही मीटिंग बुलाई गई।
– यह मीटिंग नई दिल्ली में रात 11 बजे बुलाई गई।
– इस सेशन की अगुवाई डॉंक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की।
– मीटिंग का आरंभ सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाकर किया।
– 14 अगस्त की मध्यरात्रि को जवाहर लाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण हुआ ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’।
– इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे।
– 15 अगस्त के दिन की शुरुआत सुबह 8.30 बजे हुई, जब वायसराय भवन(राष्ट्रपति भवन) में शपथग्रहण समारोह हुआ।
– नई सरकार ने सेंट्रल हॉल (जिसे आज दरबाल हॉल कहा जाता है)में शपथ ली।
– दोपहर में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डेन में एक सभा को संबोधित किया।
– पूरा देश आजादी का उत्सव मना रहा था, राष्ट्रपति भवन, संसद आदि के आसपास करोड़ों लोगों का हुजूम था।
– नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।
– 17 अगस्त को भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण हुआ था, जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा जाता है
– भारत 15 अगस्त को आजाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था।
– रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया।

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गांधीजी और दंगे की काली रात

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– एक तरफ देश में आजादी का जश्न था तो दूसरी तरफ हिंदू-मुस्लिम दंगों में खून की होली खेली जा रही थी
– महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे
– जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे
– जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आज़ाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजा
– इस ख़त में लिखा था, “15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा. आप राष्ट्रपिता हैं. इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें”
– गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, “जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं”

भारत-पाकिस्‍तान का विभाजन

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– भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर लाखों लोगों का विस्‍थापन था, जो विश्‍व में कहीं नहीं हुआ।
– 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग एक देश की सीमा को पार कर दूसरे देश की सीमा में जा रहे थे।
– तकरीबन पौने दो करोड़ लोग जमीन, जायदाद, दुकानें, संपत्‍ति, खेती छोडकर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान लोग जा रहे थे।
– 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए।
– धर्म के नाम हुए इस विभाजन में मानवता शर्मसार हुई, 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्‍कार हुआ।
– अनुमान के मुताबिक 2 लाख से 20 लाख के बीच लोग मारे गए, सैंकड़ों बच्‍चे अनाथ हो गए।
– विभाजन का यह काला अध्‍याय आज भी इतिहास के चेहरे पर बदनुमा दाग की तरह है।

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ऐतिहासिक घटनाक्रम- एक नजर
1857- मेरठ में सैनिक विद्रोह
1857- मेरठ में सिपाहियों और भीड़ द्वारा 50 यूरोपियों की हत्या
1858- ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन का ट्रांसफर ब्रिटिश राजशाही के पास
1858- रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच लड़ाई
1876- महारानी विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी घोषित
1885- बॉम्बे में एओ हयूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की
1905- बंगाल का विभाजन
1905- सूरत में स्वदेशी आंदोलन शुरु
1906- ढाका में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन
1908- राजद्रोह के आरोप में तिलक को छह साल की सजा
1909- मॉर्ले मिंटो सुधार, हिंदू और मुस्लिमों में मतभेद पैदा किए गए
1911- दिल्ली दरबार आयोजित, बंगाल का विभाजन रद्द
1912- नई दिल्ली भारत की नई राजधानी बना
1914- सेन फ्रांसिसको में गदर पार्टी का गठन
1914- महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट
1915- मुंबई में गोपाल कृष्ण गोखले की मौत
1916- तिलक द्वारा पुणे में पहली इंडियन होम रुल लीग का गठन
1916- मद्रास में एनी बेसेंट द्वारा होम रुल लीग का नेतृत्व
1917- महात्मा गांधी द्वारा बिहार में चंपारण आंदोलन शुरु
1918- खेड़ा सत्याग्रह
1919- जलियावाला बाग नरसंहार
1919- खिलाफत आंदोलन शुरु
1920- असहयोग आंदोलन शुरु महात्मा गांधी
1920- कलकत्ता में गांधीजी द्वारा प्रस्ताव पारित जिसमें अंग्रेजों से भारत को अधिराज्य का दर्जा देने को कहा गया
1922- चोरी-चौरा घटना
1922- इलाहबाद में स्वराज पार्टी गठित
1925- काकोरी में ट्रेन लूट
1925- बारडोली सत्याग्रह
1928- बॉम्बे में साइमन कमीशन का आगमन और अखिल भारतीय हड़ताल
1928- लाहौर में लाला लाजपत राय पर पुलिस ज्यादती और जख्मों के चलते उनकी मौत
1929- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन आयोजित
1929- लाहौर में ऑल पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस ने 14 सूत्र सुझाए
1929- दिल्ली में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंका
1929- लाहौर में जवाहरलाल नेहरु ने भारतीय ध्वज फहराया
1930- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज घोषित किया
1930- साबरमती दांडी मार्च के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरु
1930- लंदन में साइमन कमीशन की रिपोर्ट पार विचार हेतु लंदन में पहली गोल मेज बैठक
1931- लाहौर में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी
1931- लंदन में महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन द्वारा गांधी इरविन पैक पर दस्तखत
1931- लंदन में दूसरी राउंड टेबल बैठक
1932- बिना ट्रायल के गांधी विद्रोह के आरोप में गिरफ्तार
1932- लंदन में तीसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस
1935- भारत सराकर अधिनियम 1935 पास
1937- भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत भारत प्रांतीय चुनाव हुए
1938- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हरीपुरा अधिवेशन हुआ
1938- सुभाष चंद्र बोस को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया
1939- त्रिपुरी अधिवेशन हुआ
1939- सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया
1940- मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग राज्य की मांग करते हुए लाहौर अधिवेशन
1941- सुभाष चंद्र बोस ने भारत छोड़ा
1942- क्रिप्स मिशन का भारत आगमन
1942- भारत छोड़ो आंदोलन
1942- गांधीजी और कांग्रेस के अन्य बड़े नेता गिरफ्तार
1942- आजाद हिंद फौज का गठन
1943- सुभाष चंद्र बोस ने भारत की अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा
1944- भारतीय राजनीतिक नेताओं और वायसराय आर्किबाल्ड वेवलीन के बीच शिमला सम्मेलन
1946- केबिनेट मिशन प्लान पास
1946- संविधान सभा का गठन
1946- नई दिल्ली में केबिनेट मिशन का आगमन
1946- जवाहरलाल नेहरु ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला
1946- भारत की अंतरिम सरकार बनी
1946- भारत की संविधान सभा का पहला सम्मेलन
1947- ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ब्रिटिश भारत को ब्रिटिश सरकार का पूर्ण सहयोग देने की घोषणा की
1947- 12 फरवरी लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय नियुक्त और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने
1947- 15 अगस्त 1947 भारत आजाद

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रामनवमी विशेष… भगवान राम: आदर्श व्यक्तित्व

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हिन्दू धर्म में राम, भगवान विष्णु के दस अवतारों में से सातवें माने जाते हैं। राम का जीवनकाल एवं पराक्रम, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित, संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में लिखा गया है|  उन पर तुलसीदास ने…

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होली का पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व

कीबोर्ड के पत्रकार

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है।यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ‘रंगों का त्योहार’ कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है।पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे ‘होलिका दहन’ भी कहते है।दूसरे दिन, जिसेधुरड्डी’, ‘धुलेंडी’, ‘धुरखेल’ या ‘धूलिवंदन’ कहा जाता है,लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है।इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग…

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“भारत माता”… भारत को क्यों “माँ” की उपाधि दी गई

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‘आदि काल से ही पृथ्वी को मातृभूमि की संज्ञा दी गई है... भारतीय अनुभूति में पृथ्वी आदरणीय बताई गई है… इसीलिए पृथ्वी को माता कहा गया…  महाभारत के यक्ष प्रश्नों में इस अनुभूति का खुलासा होता है… यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि आकाश से भी ऊंचा क्या है और पृथ्वी से भी भारी क्या है? युधिष्ठिर ने यक्ष को बताया कि पिता आकाश से ऊंचा है और माता पृथ्वी से भी भारी है… हम उनके अंश हैं… यही नहीं इसका साक्ष्य वेदों (अथर्ववेद और यजुर्वेद) में भी मिलता हैं… यही नहीं सिंधु घाटी सभ्यता जो 3300-1700 ई.पू. की मानी जाती है… विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी… सिंधु सभ्यता के लोग भी धरती को उर्वरता की देवी मानते थे और पूजा करते थे…

  • वेदों का उद्घोष – अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘माता भूमि’:, पुत्रो अहं पृथिव्या:। अर्थात भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं…  यजुर्वेद में भी कहा गया है- नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:। अर्थात माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।
  • वाल्मीकि रामायण- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ (जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उपर है।)
  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में भारतमाता की छबि बनी।
  • प्रसिद्ध बांगला लेखक और साहित्यकार भूदेव मुखोपाध्याय के 1866 में लिखे व्यंग्य – ‘उनाबिम्सा पुराणा’में ‘भारत-माता’ के लिए ‘आदि-भारती’ शब्द का उपयोग किया गया था।
  • किरण चन्द्र बन्दोपाध्याय का नाटक भारत माता सन् 1873 में सबसे पहले खेला गया था।
  • बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में सन् 1882 में वन्दे मातरम् गीत सम्मिलित था जो शीघ्र ही स्वतंतरता आन्दोलन का मुख्य गीत बन गया।
  • 1905 में प्रसिद्ध चित्रकार अवनींद्र नाथ टैगोर ने भारतमाता को चारभुजाधारी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारन किये हैं; हाथ में पुस्तक, माला, श्वेत वस्त्र तथा धान की बाली लिये हैं।
  • सन् 1936 में बनारस में शिव प्रसाद गुप्त ने भारतमाता का मन्दिर निर्मित कराया। इसका उद्घाटन गांधीजी ने किया।
  • हरिद्वार में सन् 1983 में विश्व हिन्दू परिषद ने भारतमाता का एक मन्दिर बनवाया।

‘अथर्ववेद’ के श्लोक में मातृभूमि का स्पष्ट उल्लेख है… अथर्ववेद 63 ऋचाएं हैं, जो पृथ्वी माता की स्तुति में समर्पित की गई हैं… अथर्ववेद के बारहवें कांड के प्रथम सूक्त में 63 मंत्र हैं, वे सभी मातृभूमि की वंदना में अर्पित किए गए हैं… इस सूक्त को ‘भूमि सूक्त’ कहा जाता है… भूमि सूक्त कहने का कारण संभवत: यही था कि इस सूक्त के मंत्रों में केवल भूमि की चर्चा की गई है… इसी सूक्त के कुछ मंत्रों में भूमि को माता कहकर संबोधित किया गया है तथा उसे राजा (इन्द्र) द्वारा रक्षित बतलाया गया है… अथर्वन ऋषि की इन 63 ऋचाओं में धरती के तमाम अंगों-उपांगों, उसके बदलते रूपों का पूरी आस्था के साथ विवरण है…

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ऐसा नहीं है कि हमारे पूर्वज पृथ्वी के प्रति मात्र अंधश्रद्धा ही रखते थे… धरती से मिलने वाली तमाम सुविधाओं के बारे में भी उन्हें भरपूर जानकारी थी…  इसलिए एक तरफ पर वे-
माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:।
नमो माता पृथिव्यै नमो माता पृथिव्यै।।

‘भूमि सूक्त’ के दसवें मंत्र में मातृभूमि की धारणा को स्पष्टत: इन शब्दों में व्यक्त किया गया है-

सा नौ भूमिविर्सजतां माता पुत्राय मे पय:।

अर्थात मातृभूमि मुझ पुत्र के लिए दूध आदि शक्ति प्रदायी पदार्थ प्रदान करे।

बारहवें मंत्र में कहा गया है-

माता भूमि:, पुत्रो अहं पृथिव्या:!

अर्थात भूमि (मेरा देश) मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं।

अथर्ववेद के अलावा ‘यजुर्वेद’ में भी पृथ्वी को माता कह कर पुकारा गया है…

यजुर्वेद के 9वें अध्याय में कहा गया है-

नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:।

अर्थात माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।

यजुर्वेद के ही दसवें अध्याय में मातृभूमि की वंदना करते हुए कहा गया है-

पृथ्वी मातर्मा हिंसीर्मा अहं त्वाम्।

अर्थात हे मातृभूमि! न तू हमारी हिंसा कर और न हम तेरी हिंसा करें।

कहां से आया ‘भारत माता’ शब्द ?

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Bharat Mata is an epic painting by celebrated Indian painter, Abanindranath Tagore  (7 August 1871 – 5 December 1951)

19वीं सदी में अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ इस तरह का राष्ट्रवादी सोच मातृपूजक बंगाल में उभरा था… उस समय के बंगाली लेखकों ने उसकी स्तुति में गीत व नाटक रचना शुरू किया… तब भी एक स्वतंत्र राष्ट्र-राज्य की उनकी अवधारणा लोकतांत्रिकता पर यूरोपीय सोच से ही निकली और आगे अन्य धड़ों के बीच पनपी… उस समय सबका दुश्मन अंग्रेज शासन था, इसलिए हिंदू, मुसलमान, सिख आदि अलग-अलग वर्गों के बीच के मतभेद आजादी पाने तक के लिए खुद-ब-खुद स्थगित कर दिए गए…

1866- वहीं वर्तमान समय का पहला लिखित साक्ष्य 19वीं सदी के प्रसिद्ध बांगला लेखक और साहित्यकार भूदेव मुखोपाध्याय के लिखे व्यंग्य – ‘उनाबिम्सा पुराणा’ (‘Unabimsa Purana’) यां ‘उन्नीसवें पुराण’ (‘The Nineteenth Purana’) में मिलता है। लेख का प्रकाशन सन 1866 में किया गया था। इस लेख में ‘भारत-माता’ के लिए ‘आदि-भारती’ शब्द का उपयोग किया गया था।

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1873- भारत को ‘माता’ कहकर संबोधित करने का श्रेय बंगला लेखक किरण चंद्र बन्दोपाध्याय को भी जाता है… इनके नाटक ‘भारत-माता’ में भारत के लिए ‘माता’ शब्द का प्रयोग किया गया था… बन्दोपाध्याय ने सन् 1873 में सबसे पहले नाटक का मंचन किया था…

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1882- बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में ‘भारत माता’ को मानो साकार रूप ही दे दिया… आनंद मठ ने साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह का परचम उठाने वाले संन्यासियों की राष्ट्रभक्ति को बंगाल में घर-घर होने वाली मां काली की पारंपरिक वंदना से एकाकार कर दिया… उसके माध्यम से युग-युग से सामंती शोषण के शिकार रहे अकाल-पीड़ित बंगाल का क्षेत्रीय तादात्म्य-बोध मानो सारे भारत के क्रोध की अभिव्यक्ति और मुक्ति कामना से जुड़ता चला गया… लेकिन चूंकि उस भारत देश का मूलाधार अंग्रेजों द्वारा एकीकृत भारत का भौगोलिक मानचित्र था, इसलिए भारतमाता की दैवी परिकल्पना भी भिन्न् बनी… भारत में पारंपरिक (दुर्गा, काली, सरस्वती) देवियों की तुलना में यह ऐसी पददलित भारतमाता दीन, दु:खी किंतु संतान वत्सला, पतिपरायणा माता-पत्नी थी, जिसका पीड़ादायक स्थिति से उद्धार करना उसकी संतान का कर्तव्य माना गया… यह भी बताया गया कि दुर्दम्य देवियों के विपरीत इस त्यागमयी, वत्सला मां का सम्मान बाहरी हमलावरों या देश में पैठे गद्दारों के हाथों निरंतर खतरे में है और सर्वसमर्थ दुर्गा या काली की तरह यह मातारानी हुंकार सहित खुद अपने आक्रांताओं से नहीं निपट सकती, लिहाजा उसकी रक्षा के लिए उसके बेटों की सशस्त्र और जुझारू सेनाएं यत्र-तत्र तैनात हों… इसी का वर्तमान रूप हैं भारतमाता के पूतों के वे गुट, जो हर संदिग्ध माता विरोधी से जबरन जय बुलवाकर माता की शान के खिलाफ गतिविधि के हर कथित अपराधी को पीटने निकल जाते हैं।

आज़ादी से पहले बंगाल में दुर्गा पूजा लोगों को एकजुट करने और स्वराज (आजादी) पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी हुई थी। इस दौरान बंगाल के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों के लेखों और रचनाओं में मां दुर्गा का गहरा प्रभाव रहा और इनके द्वारा लिखे गए लेखों, नाटकों और कविताओं में भी भारत को दुर्गा की तर्ज पर ‘मां’ और ‘मातृभूमि’ कहकर संबोधित किया जाने लगा।

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Bharat_Mata_literally_constitutes_India,_in_a_print_from_the_1920's-30'sBharat Mata literally constitutes India, in a print from the 1920’s-30’s.

आनन्द मठ/बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय… पढ़ने के लिए क्लिक करें…

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http://www.hindisamay.com/e-content/Bankim-Chandra-Anandmath.pdf

5आनन्द मठ बांग्ला भाषा का एक उपन्यास है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में की थी। इस कृति का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। भारत का राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् इसी उपन्यास से लिया गया है।

आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के सन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है।

आनंदमठ के प्रथम खण्ड में कथा बंगाल के दुर्भिक्ष काल से प्रारम्भ होती है जब लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे थे। सब गाँव छोड़कर यहाँ-वहाँ भाग रहे थे – एक तो खाने के लाले थे दूसरे किसान के पास खेती में अन्न उत्पन्न न होने पर भी अंग्रेजों द्वारा लगान का दबाव उन्हें पीड़ित कर रहा था।

कथा पदचिन्ह गाँव की है। महेन्द्र और कल्याणी अपने अबोध शिशु को लेकर गाँव से दूर जाना चाहते हैं। यहाँ लूट-पाट-डकैती आदि की घटनाएँ हैं। डकैतों ने कल्याणी को पकड़ लिया था पर वह जान बचाती दूर जंगल में भटक जाती है। महेन्द्र को सिपाही पकड़ लेते हैं – जहाँ हाथापाई होती है और भवानन्द नामक संन्यासी उसकी रक्षा करता है। भवानन्द आत्मरक्षा में अंग्रेज साहब को मार देता है – लूट का सामान व्यवस्था में लगाता है। वहाँ दूसरा संन्यासी जीवानन्द पहुँचता है। भवानन्द और जीवानन्द दोनों सन्यासी, प्रधान सत्यानन्द के शिष्य हैं – जो ’आनन्दमठ‘ में रहकर देश सेवा के लिए कर्म करते हैं। महेन्द्र भवानन्द का परिचय जानना चाहता है, क्योंकि यदि भवानन्द न मिलता तो उसकी जान जा सकती थी। भवानन्द ने जवाब दिया- मेरा परिचय जानकर क्या करोगे? महेन्द्र ने कहा – मैं जानना चाहता हूँ, आज आपने मेरा बहुत उपकार किया है। महेन्द्र समझ नहीं पाता कि सन्यासी डकैतों की तरह भी हो सकता है। इतने पर भी भवानन्द महेन्द्र की पत्नी और पुत्री से मिलाने का भी आश्वासन देता है। भवानन्द की मुद्रा सहसा बदल गयी थी। वह अब धीर स्थिर प्रकृति का सन्यासी नहीं लग रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर रही थी। मौन भंग करने के लिए वह व्यग्र हो रहा था, परन्तु महेन्द्र गंभीर था। तब भवानन्द ने गीत गाना शुरू किया-

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`वन्दे मातरम्’ यह  गीत रविवार, कार्तिक शुद्ध नवमी, शके 1779 (7 नोव्हेंबर 1875) इस  दिन  पूरा हुआ.

हे माते, मैं तुम्हें वंदन करता हूं ।

         जलसमृध्द तथा धनधान्यसमृध्द दक्षिणके मलय पर्वतके ऊपरसे आनेवाली वायुलहरोंसे शीतल होनेवाली तथा विपुल खेतीके कारण श्यामलवर्ण बनी हुई, हे माता !

         चमकती चांदनियोंके कारण यहांपर रातें उत्साहभरी होती हैं, फूलोंसे भरे हुए पौधोंके कारण यह भूमि वस्त्र परिधान किए समान शोभनीय प्रतित होती है । हे माता, आप निरंतर प्रसन्न रहनेवाली तथा मधुर बोलनेवाली, वरदायिनी, सुखप्रदायिनी हैं !

         तीस करोड मुखोंसे निकल रही भयानक गरजनाएं तथा साठ करोड हाथोंमें चमकदार तलवारें होते हुए, हे माते आपको अबला कहनेका धारिष्ट्य कौन करेगा ? वास्तवमें माते, आपमें सामर्थ्य हैं । शत्रुसैन्योंके आक्रमणोंको मुंह-तोड जवाब देकर हम संतानोंका रक्षण करनेवाली हे माता, मैं आपको प्रणाम करता हूं ।

         आपसेही हमारा ज्ञान, चरित्र तथा धर्म है । आपही हमारा हृदय तथा चैतन्य हैं । हमारे प्राणोंमें भी आपही हैं । हमारी कलाईयोंमें (मुठ्ठीमें) शक्ति तथा अंत:करणमें काली माता भी आपही हैं । मंदिरोंमें हम जिन मूर्तियोंकी प्रतिष्ठापना करते हैं, वे सभी आपकेही रूप हैं ।

         अपने दस हाथोंमें दस शस्त्र धारण करनेवाली शत्रुसंहारिणी दुर्गा भी आप तथा कमलपुष्पोंसे भरे सरोवरमें विहार करनेवाली कमलकोमल लक्ष्मी भी आपही हैं । विद्यादायिनी सरस्वतीभी आपही हैं । आपको हमारा प्रणाम है । माते, मैं आपको वंदन करता हूं । ऐश्वर्यदायिनी, पुण्यप्रद तथा पावन, पवित्र जलप्रवाहोंसे तथा अमृतमय फलोंसे समृद्ध माता आपकी महानता अतुलनीय है, उसे कोई सीमाही नहीं हैं । हे माते, हे जननी हमारा तुम्हें प्रणाम है ।

         माते, आपका वर्ण श्यामल है । आपका चरित्र पावन है । आपका मुख सुंदर हंसीसे विलसीत है । सर्वाभरणभूषित होनेके कारण आप कितनी सुंदर लगती हैं ! सचमें, हमें धारण करनेवाली तथा हमें संभालनेवालीभी आपही हैं । हे माते, हमारा आपके चरणोंमें पुन:श्च प्रणिपात ।

न्यूज़24 की खास पेशकश… 

Vande Mataram
Album by Hemant Kumar|© Saregama
Released: 31 December 1952
Hemant Kumar, Lata Mangeshkar

anandmath_vandemataram

Maa Tujhe Salaam
A.R. Rahman
C) SONY BMG MUSIC ENTERTAINMENT (India) Pvt. Ltd


Vande Mataram by Pt. Bhimsen Joshi

 

Doordarshan Signature Montage Vande Mataram

वंदे मातरम् से जुड़े हैं अनेक पहलू

print1940s2“Bharat Mata,” a print from the 1940’s

  • जब आज़ाद भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था तब वंदे मातरम् को न राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया और न ही उसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला.
  • लेकिन संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है.
  • वंदे मातरम् का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है. बंगाल के महान साहित्यकारों और कवियों में से एक बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में की थी.
  • उन्होंने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस माँ की संतान बताया. भारत को वो माँ बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी है. उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी माँ की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएँ.
  • भारत को दुर्गा माँ का प्रतीक मानने के कारण आने वाले वर्षों में वंदे मातरम् को मुस्लिम लीग और मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग शक की नज़रों से देखने लगा.
  • इसी विवाद के कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वंदे मातरम् को आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे. मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वंदे मातरम् का इस वजह से विरोध किया था कि वो देश को भगवान का रूप देकर उसकी पूजा करने के ख़िलाफ़ थे.
  • नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय माँगी थी. रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए.
  • हालांकि बंकिमचंद्र की राष्ट्रभक्ति पर किसी को शक नहीं था, सवाल यह था कि जब उन्होंने ‘आनंदमठ’ लिखा उसमें उन्होंने बंगाल पर शासन कर रहे मुस्लिम राजाओं और मुसलमानों पर ऐसी कई टिप्पणियाँ की थीं जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ.
  • वंदे मातरम् को हालाँकि कई वर्ष पहले एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन उसे बाद में प्रकाशित हुए आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया.

आनंदमठ को ‘मुस्लिम विरोधी नहीं कह सकते’

  • आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अँग्रेज़ और स्थानीय मुस्लिम राजा के ख़िलाफ़ सन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है.
  • आनंदमठ का सार ये है कि किस प्रकार से हिंदू सन्यासियों ने मुसलमान शासकों को हराया.
  • आनंदमठ में बंकिम चंद्र ने बंगाल के मुस्लिम राजाओं की कड़ी आलोचना की. एक जगह वो लिखते हैं,”हमने अपना धर्म, जाति, इज़्ज़त और परिवार का नाम खो दिया है. हम अब अपनी ज़िंदगी ग़वाँ देंगे. जब तक इन… (को) भगाएँगे नहीं तब तक हिंदू अपने धर्म की रक्षा कैसे करेंगे.”
  • इतिहासकार तनिका सरकार का कहना है,”बंकिम चंद्र इस बात को मानते थे कि भारत में अंग्रेज़ों के आने से पहले बंगाल की दुर्दशा मुस्लिम राजाओं के कारण थी.”
  • ‘बांग्ला इतिहासेर संबंधे एकटी कोथा’ में बंकिम चंद्र ने लिखा,”मुग़लों की विजय के बाद बंगाल की दौलत बंगाल में न रहकर दिल्ली ले जाई गई.”
  • लेकिन प्रतिष्ठित इतिहासकार केएन पणिक्कर का मानना है,”बंकिम चंद्र के साहित्य में मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ कुछ टिप्पणियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बंकिम मुस्लिम विरोधी थे. आनंदमठ एक साहित्यिक रचना है.”
  • उनका कहना है,”बंकिम चंद्र अंग्रेज़ी हुकूमत में एक कर्मचारी थे और उन पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखे गए हिस्से ‘आनंद मठ’ से निकालने का दबाव था. 19वीं शताब्दी के अंत में लिखी इस रचना को उस समय के मौजूदा हालात के संदर्भ में पढ़ना और समझना ज़रूरी है.”

क्या आजादी से पहले इस्लाम विरोधी था ‘वंदे मातरम्’?
सन 1905 में ब्रिटिस वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया गया तो उसके विरोध में ‘ बंग भंग आन्दोलन’ हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिल कर किया । इस आन्दोलन का मुख्य नारा ही ‘वन्दे मातरम्’ था । अन्ततः अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन समाप्त करना पडा ।

वन्दे मातरम् गीत में पूजा एवं अर्चना जैसी भावना नहीं है और न ही इसके शब्द किसी की मजहबी – आस्था को आहत करते है तो इस पर विवाद क्यों ! बंकिम चन्द्र चैटर्जी ने देश प्रेम के उदात्त भाव से अभिभूत होकर यह अमर गीत वन्दे मातरम् लिखा था ।

श्री मौलाना सैयद फजलुलरहमान जी के शब्दों में ‘ वन्दे मातरम् गीत में बुतपरस्ती ( मूर्ति – पूजा ) की गन्ध नहीं आती है , वरन् यह मादरे वतन ( मातृभूमि ) के प्रति अनुराग की अभिव्यक्ति है । ‘

‘नमो नमो माता अप श्रीलंका , नमो नमो माता’ ( श्रीलंका का राष्ट्रगीत )
‘इंडोनेशिया तान्हे आयरकू तान्हे पुम्पहा ताराई’ ( इंडोनेशिया का राष्ट्रगीत )

भारत के वंदे मातरम् में ही भारत माता की वंदना नहीं है , श्रीलंका और मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया के राष्ट्रगीत में भी वही सब कुछ है जो वन्दे मातरम् में है। इनके राष्ट्रगीत में भी राष्ट्र को माता की ही संज्ञा दी गई है ।

जिस आजादी की लडाई में वन्दे मातरम् का हिन्दू – मुस्लिम ने मिलकर उद्घोष किया था तो फिर क्यों आजादी के बाद यह इस्लाम विरोधी हो गया । वंदे मातरम् को गाते – गाते तो अशफाक उल्ला खां फाँसी के फंदे पर झूल गए थे । इसी वंदे मातरम् को गाकर न जाने कितने लोगों ने बलिदान दिया । जब देश के स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत गैर इस्लामी नहीं था , तो आज कैसे हो गया !

मातृभूमि या मदरलैंड का अर्थ क्या है ?

Oxford dictionary – के हिसाब से, motherland का अर्थ होता है एक ऐसी जगह जहाँ आपका जन्म हुआ हो और जिस जगह से आपका इमोशनल सम्बन्ध हो |

Webster dictionary – इस dictionary के मुताबिक motherland का अर्थ इस तरह की जगह से होता है जो कि अपने पिता या माँ की हो, मतलब ये कि जहाँ अपने माता पिता रहते हो उस जगह से|

भारत के साथ अन्य किस देश में है मदरलैंड का कॉन्सेप्ट ?

रूस (Russia) , भारत के अलावा एक और देश है जहाँ motherland का concept है | यहाँ भी मदरलैंड या मातृभूमि का प्रचलन है

भारत के साथ रूस को भी ‘मातृभूमि’ या ‘मदरलैंड’ कहा जाता है।

क्या मदरलैंड के अलावा भी कोई और टर्म प्रचलित हैं ?

हां, अमेरिका में होमलैंड, जर्मनी के लिए फादरलैंड और भारत-रूस मेंमदरलैंड शब्द प्रचलित हैं।

फादरलैंड और होमलैंड क्या हैं ?

फादरलैंड – फादरलैंड का अर्थ ऐसे देश से है जो आपके ‘पिता’ या ‘पूर्वजों’का हो। फादरलैंड शब्द का उपयोग नाजी जर्मनी के कॉन्टेक्स्ट में कियागया जहां इस शब्द को राष्ट्रीय विचारधारा के तौर पर देखा गया।

वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार, फादरलैंड का अर्थ ऐसी जगह से है जोआपके पिता या पूर्वजों की हो और जहां आपका जन्म हुआ हो।

होमलैंड– होमलैंड शब्द का प्रयोग अमेरिका के संदर्भ में किया जाता है।

द अमेरिकन हेरिटेज डिश्नरी के अनुसार,   होम लैंड यानी जन्मस्थान।वह स्थान, क्षेत्र या कोई सीमा जो किसी व्यक्ति विशेष या किसी समुदायकी पहचान हो होमलैंड या गृहस्थान कहलाती है।

भारत में मौजूद मातृसत्तात्मक परंपरा ‘खासी‘

मातृसत्तात्मक परंपरा को मेघालय में रहने वाले खासी ट्राइब के लोगआज भी फॉलो करते हैं। खासी समुदाय में संपत्ति को मां से बेटी के नामकिया जाता है। यहां सबसे रोचक बात है कि सबसे छोटी बेटी को संपत्तिमें सबसे ज्यादा हिस्सा मिलता है।

भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके भारतमाता या ‘भारतम्बा’ कहा जाता है। भारतमाता को प्राय: केसरिया या नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में भगवा ध्वज लिये हुए चित्रित किया जाता है तथा साथ में सिंह होता है।

भारत माता मन्दिर, हरिद्वार

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भारत माता मन्दिर हरिद्वार में स्थित है, जो ‘मदर इण्डिया’ के नाम से प्रसिद्ध है। भारत माता को समर्पित इस मंदिर में आठ मंजिलें हैं और यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है। आठवीं मंजिल प्रकृति प्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्ति दोनों के लिए एक उपहार के सामान है, क्योंकि यहाँ भगवान शिव का मंदिर है।

निर्माण- हरिद्वार का ‘भारत माता मंदिर’ एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर भारत माता को समर्पित है एवं इसका निर्माण प्रसिद्ध धार्मिक गुरु स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी द्वारा करवाया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने वर्ष 1983 में इस मंदिर का उद्घाटन किया था। मंदिर में आठ मंजिलें हैं एवं यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है।

मंदिर की मंजिलें- इस पवित्र स्थल की प्रत्येक मंजिल विभिन्न देवी देवताओं एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को समर्पित है।

  • मंदिर में सबसे प्रमुख पहली मंजिल पर स्थित भारत माता की मूर्ती है।
  • दूसरी मंजिल पर ‘शूर मंदिर’ है, जो भारत के शूर वीरों को समर्पित है।
  • तीसरी मंजिल पर ‘मातृ मंदिर’ है, जो भारत की स्त्री शक्ति को समर्पित है।
  • चौथी मंजिल महान भारतीय संतों को समर्पित है।
  • पांचवी मंजिल विभिन्न धर्मों, इतिहास एवं भारत के विभिन्न भागों की सुंदरता को प्रदर्शित करती है।
  • छठवीं एवं सातवीं मंजिल पर देवी शक्ति एवं भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार देखे जा सकते हैं।
  • आठवीं मंजिल प्रक्रति प्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्ति दोनों के लिए एक उपहार से सामान है, क्योंकि यहाँ शिव का मंदिर है और यहाँ से हिमालय, हरिद्वार एवं सप्त सरोवर के सुंदर दृश्यों को देखा जा सकता है।

Bharat_Mata_at_Indian_Army_base_gateBharat Mata at Indian Army base gate near Leh, Ladakh

800px-Bharat_Mata_statue_2Bharat Mata statue at Kanyakumari,India

 

‘वन्दे मातरम्’ से जुड़ी जानकारी के लिए क्लिक करें…

https://drsandeepkr.wordpress.com/2014/08/13/वन्दे-मातरम्-माँ-तुझे-सला/

vande mataram

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