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संस्कृत- विश्व की प्राचीनतम भाषा को जानिए…

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भाषाओं की दुनिया- दुनिया भर में लगभग 7,111 भाषाएं बोली जाती हैं (Ethnologue, Directory of languages)। सबसे ज्यादा 2303 भाषाएं एशिया में बोली जाती हैं। उसके बाद 2140 अफ्रीका, 1058 अमेरिका, 288 यूरोप बाकि 1322 दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। इनमें बहुत सी भाषाएं पारिवारिक रूप में परस्पर सम्बद्ध हैं। ध्वनि, व्याकरण तथा शब्द समूह के तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर एवं भौगोलिक निकटता के आधार पर भाषाओं के पारिवारिक संबन्धों का निर्णय किया गया है।

भारतीय भाषा में संस्कृति ही सर्वस्व है। आर्य भाषाओं में यही सबसे प्राचीनतम है। आर्यभाषा के मूल रूप को जानने के लिए जितना साधन यहा है, उतना कहीं नहीं है। आजकल भारत से निकली समस्त प्रान्तीय भाषाएं द्राविड़ी भाषाओं को छोड़कर) संस्कृत भाषा से ही निकली है। भारत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त विशाल, संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध है। इसके सम्बन्ध में महामना मदनमोहन मालवीय जी कहते हैं- “हमारी पैतृक संपत्तियों में से सबसे बहुमूल्य रत्न में से सबसे बहुमूल्य रत्न हमारी संस्कृत भाषा है।

भाषा विज्ञान की दृष्टि से संसार की भाषाओं में दो ही भाषायें ऐसी है जिनके बोलने वालों ने संस्कृति तथा सभ्यता का निर्माण किया है- पहली है आर्यभाषा और दूसरी है सामी या समेंटिक भाषा। आर्य भाषा के अन्तर्गत दो विशिष्ट शाखाएं है- पश्चिमी एवं पूर्वी। पश्चिमी शाखा के अन्तर्गत सभी प्राचीन तथा आधुनिक योरोपीय भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि पूर्वी शाखा के अन्तर्गत ईरानी और भारतीय भाषाएं हैं-

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भारत में भाषा का प्राचीनतम रूप हमें वैदिक साहित्य में उपलब्ध होता है वैदिक साहित्य को जनभाषा का रूप भी कहा जाता है। ऐतिहासिक विकास क्रमकी दृष्टि से भारतीय आर्यभाषा परिवार को तीन कालों में बांटकर अध्ययन किया जाता है-

  • प्राचीन आर्यभाषा- वैदिक संस्कृत, संस्कृत
  • मध्यकालीन आर्य भाषा- पाली, प्राकृत, अपभ्रंश
  • आधुनिक आर्य भाषा- हिन्दी, गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि

ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से निम्नलिखित समय में इन्हें वर्गीकृत किया जा सकता है –

  • प्राचीन आर्य भाषा (1500 ई. पू. से 500 ई0 पू. तक)
  • मध्यकालीन आर्य भाषा काल (500 ई. पूव. से 1000 ई. तक)
  • आधुनिक आर्यभाषा काल (1000 ई. से अब तक)

वैदिक साहित्य में वेद एवं वेदों में ऋग्वेद प्राचीनतम साहित्य सर्जन है। वेद भारतीय धर्म, दर्शन एवं प्राचीन कवित्व की अपार निधि है। वेद शब्द के व्युत्पत्ति मूलक अर्थ के सम्बन्ध में विचार करते हुए ‘ऋग्वेदभाष्यभूमिका’ में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लिखा है-

‘विदन्ति, जानन्ति, विद्यन्ते भवन्ति, विदन्ति अथवा विदन्ते, लभन्ते, विन्दन्ति, विचारयन्तिसर्वे मनुष्याः सत्यविद्यां यैर्येषुवा तथा विद्वांसश्च भवन्ति ते वेदाः

अर्थात्- वेद मानव मात्र कीसत्य विद्या के साधन एवं स्रोत है। वस्तुतः अद्भुत प्रतिभासम्पन्न ऋषियों द्वारा साक्षात्कृतज्ञानराशि का नाम ही वेद है।

वैदिक साहित्य के अन्तर्गत संहिता साहित्य एवं वेदासाहित्य सम्मिलित है। लौकिक संस्कृत साहित्य में आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण एवं महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत ऐसे विशालकलेवर ग्रन्थ है जिनसे अद्यपर्यन्त साहित्य की समस्त विधाएं अनुप्राणित होती रही हैं। इसीलिए उन्हे उपजीव्य काव्य के नाम से पुकारा जाता है। इन दोनों ग्रन्थों मे सर्वाधिक काव्यों का स्रोत निहित है। पुराण संस्कृत वाङ्मय के गरिमामय ग्रन्थ हैं। इन्हें वेदों का पूरक माना जाता है। भविष्य,भागवत्, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्म, वामन, वराह, विष्णु, वायु, अग्नि, नारद, पद्म, लि ,गुरूड़, कूर्म तथा स्कन्दपुराण

वैदिक कालखण्ड

  • जर्मन विद्वान डॉ. जैकोबी नेकृतिका- जैकोबी ने वेद मन्त्रों का रचना काल 4590 ई० पू० तथा ब्राह्मण ग्रन्थों का रचनाकाल 2300 ई० पू० के बादमें स्वीकार किया है।
  • प्रो. मैक्समूलर- वैदिक साहित्य को चारभागों में विभक्त किया है बुद्ध से प्रथम होने के कारण सूत्रकाल 600 विक्रम पूर्व, ब्राह्मणकाल 600 से 800 वि० पू०, मन्त्रकाल 800 से 1000 वि० पू०. तथा छन्दकाल 1000 से 1200 वि० पू० तक स्वीकार किया है।
  • कृष्ण के समय द्वापरयुग की समाप्ति के बाद महर्षि वेद व्यास ने वेद को चार प्रभागों संपादित करके व्यवस्थित किया। श्रीराम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। इस मान से लिखित रूप में आज से 6510 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद।
  • आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ था। इसका मतलब यह कि वैवस्वत मनु (6673 ईसापूर्व) काल में वेद लिखे गए।

वेद, पुराण और उपनिषदों को जानने के लिए पढ़ें – drsandeepkr.wordpress.com/2019/08/22/भारतीय-संस्कृति-का-आधार-व/

ऋग्वैदिक कालीन ग्रंथ मुख्य रूप से संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं– इसी कारण माना गया है कि इस सम्पूर्ण संसार की समस्त परिष्कृत भाषाओं में संस्कृत प्राचीन है और संस्कृत का वैदिक रूप प्राचीनतम है। संस्कृत की मूलध्वनियों का विकास भारत में हुआ और धीरे धीरे भारत की यह भाषा दूर-दूर तक फैल गई। यह भी माना जाता है कि इसके परिणामस्वरूप ईरान और यूरोप की भाषाओं का विकास हुआ। परन्तु प्रमाणों के अभाव में निर्णायक रूप में कुछ भी कहना संभव नहीं है। संस्कृत की भाषाओं के सम्बन्ध में इतना कहना ही निश्चित है कि वैदिककालीन भाषा पूर्ण रूप से विकसित थी। जो रूप वैदिक भाषा का आज उपलब्ध है उससे पूर्व के रूप का हमें कोई प्रमाण नहीं मिलता।

संस्कृत शब्द का शाब्दिक अर्थ- संस्कृत शब्द सम् पूर्वक ‘कृ’ धातु से बना है। जिसका मौलिक अर्थ है। संस्कार सम्पन्न भाषा। संस्कार शब्द के अनेक अर्थ हैं, किन्तु यहां संस्कार पदों में विद्यमान प्रकृति और प्रत्यय आदि को कहते हैं।

संस्कृत है देववाणी- विश्व की विविध भाषाओं में यही एक भाषा है जो वस्तुतः स्वर्गावतीर्ण हुई हैं क्योंकि विश्व वाङ्गमय का सबसे पुराना अनादिग्रन्थ वेद का सृजन भगवान् ने इसी भाषा में किया है—

अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।।

आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ।।

तत्पश्चात् आर्ययुग के साक्षात्कृतधर्मा महर्षियों के अपरोक्ष अनुभव से लेकर आधुनिक काल के बड़े-बड़े भारतीय मनीषियों के सद्विचारों से ओत प्रोत होने के कारण संस्कृत वाङ्गमय का महत्व लोकोत्तर हो गया है। इस देश की समूची संस्कृति, सारा इतिहास और समस्त ज्ञान-विज्ञान संस्कृत में ही भरे पड़े हैं।

शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य का सूत्र है- प्रकृति प्रत्ययादिः संस्कारः इस प्रकार कहा गया है कि देववाणी अर्थात् प्रकृति प्रत्यय आदि के विभागों से रहित थी (प्रत्यय वे शब्द हैं जो दूसरे शब्दों के अन्त में जुड़कर, अपनी प्रकृति के अनुसार, शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं) इसका परिणाम यह होता है कि जिज्ञासु को कठिन परिश्रम व समय लगाना होता था। इस हेतु देवों ने देवराज इन्द्र के पास जाकर वैज्ञानिक परिपाटी सुझाएं जाने की प्रार्थना की, तब इन्द्र ने देवभाषा में प्रकृति प्रत्यय विभाग द्वारा, प्रत्येक शब्द के मध्य से विलग कर शब्दोपदेश एवं अध्ययन की सरल, सुगम प्रक्रिया का निर्माण किया। इसी प्रकृति प्रत्यादि विभाग के पुनः संस्कार द्वारा संस्कृति होने से देववाणी का नाम संस्कार पड़ा। जिस भाषा के शब्दों में प्रकृति और प्रत्यय का विभाग परिलक्षित होता है तथा वर्ण का आगम वर्ण लोथ और वर्ण विकार भी ज्ञात हो ऐसे शब्दों से युक्त भाषा ही संस्कृत भाषा है। संस्कृत भाषा में शब्द दो प्रकार के होते हैं- व्युत्पन्न तथा अव्युत्पन्न। जिन नामों के साथ प्रकृति प्रत्यय की कल्पना संभव है उन्हें व्युत्पन्न कहते हैं। संस्कृत भाषा में अधिकांश नामपद प्रकृति (धातु) तथा प्रत्यय के योग से बनते हैं। धातु मूलप्रकृति है तथा उससे लगने वाले प्रत्ययों को (तिभिन्न) कृत् प्रत्यय कहा जाता है।

संस्कृत भाषा के दो रूप- प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं में वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत का समावेश होता है। इस प्रकार हम देखें तो संस्कृत भाषा के दो रूप मिलते हैं-

1. वैदिक संस्कृत

2. लौकिक संस्कृत

वैदिक संस्कृत- चार वैदिक संहिताओं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, आयुर्वेदव और अथर्ववेद के अतिरिक्त इनमें ब्राह्मणों-ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों और वेदागों की रचना हुई।

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लौकिक संस्कृत- कालिदास,वाल्मीकि, भास, वेद व्यास, आदि की रचनाएँ मिलती हैं। मगर ऐसे देखा जाये तो लौकिक संस्कृत का उद्भव स्थान भी वैदिक संस्कृत है। इस संस्कृत काल में आर्यभाषा क्षेत्र में तीन स्थानीय बोलियाँ प्रचलित थीं- पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती पूर्वी। इस प्रकार प्राचीन भारतीय आर्यभाषा में वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत का समावेश होता है। वैदिक संस्कृत के कई रूप मिलते हैं, जबकि संस्कृतव्याकरणबद्ध भाषा है।

veda7.jpgसोत्र- हिंदी भाषा का स्वरूप विकास

संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी- भारत में आज समस्त प्रान्त अपनी-अपनी प्रान्तीय भाषा को राजभाषा बनाने में जो व्यस्त हो रहे हैं उसका एकमात्र निदान हिन्दी का राष्ट्र भाषा होना ही है। निष्पक्ष भाव से विचार किया जाए तो उत्तरप्रदेश या पश्चिम बिहार के कुछ अंश छोड़कर बंगाल, मिथिला, गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों को राष्ट्रभाषा हिन्दी से जितनी कठिनाई की सम्भावना है उतनी संस्कृत से नहीं। क्योंकि बंगला, मैथिली, मराठी, गुजराती आदि भाषा में संस्कृत के नब्बे प्रतिशत शब्दों का प्रयोग होता है तथा हिन्दी को भी धन-धाम और सौन्दर्य संस्कृत से ही मिल रहा है। ऐसी स्थिति में भारत की राष्ट्रभाषा यदि संस्कृत होती सम्पूर्ण भारत उस राष्ट्रभाषा का अभिनन्दन करने लगता।

भारतीयों के लिए संस्कृत केवल विचारों के आदान प्रदान का माध्यम बनने वाली भाषा ही नहीं अपितु उनकी सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास की एक अभिन्न अंग है; क्योंकि भारतीय इतिहास के आदिकाल से ही संस्कृत का यहां के जन-जीवन के विचार-चिन्तन एवं सभ्यता-संस्कृति में अभिन्न एवं महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वस्तुतः भारतीय जीवन और प्रज्ञा का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं जो कि इसके आवरण से अछूता हो। इसलिए पिछले दस हजार वर्षों में इस देश के द्वारा बहुत कुछ खो दिए जाने पर भी जिस चीज को एक अमूल्य धरोहर के रूप में अविच्छिन्न रूप से संजोये रखा गया है, वह है संस्कृत भाषा।

विश्व संस्कृत दिवस- भारत में प्रतिवर्ष ‘श्रावणी पूर्णिमा’ के दिन मनाया जाता है। श्रावणी पूर्णिमा अर्थात् रक्षा बन्धन ऋषियों के स्मरण तथा पूजा और समर्पण का पर्व माना जाता है। ऋषि ही संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत हैं, इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को “ऋषि पर्व” और “संस्कृत दिवस” के रूप में मनाया जाता है। राज्य तथा ज़िला स्तरों पर संस्कृत दिवस आयोजित किए जाते हैं। इस अवसर पर संस्कृत कवि सम्मेलन, लेखक गोष्ठी, छात्रों की भाषण तथा श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है, जिसके माध्यम से संस्कृत के विद्यार्थियों, कवियों तथा लेखकों को उचित मंच प्राप्त होता है।

1969 से हुई थी संस्कृत दिवस की शुरूआत- संस्कृत भाषा के संरक्षण और इसे बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 1969 से इसकी शुरूआत की थी। संस्कृति दिवस का आयोजन केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर किया जाता था। तभी से पूरे देश में संस्कृत दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई थी। ये भी मान्यता है कि इसी दिन से प्राचीन भारत में नया शिक्षण सत्र शुरू होता था। गुरुकुल में छात्र इसी दिन से वेदों का अध्ययन शुरू करते थे, जो पौष माह की पूर्णिमा तक चलता था। पौष माह की पूर्णिमा से सावन की पूर्णिमा तक अध्ययन बंद रहता था। आज भी देश में जो गुरुकुल हैं, वहां सावन माह की पूर्णिमा से ही वेदों का अध्ययन शुरू होता है।

संविधान में 22 भाषाओं को मिली है मान्यता- भारत के अलग-अलग हिस्सों में तकरीबन 1600 बोलियां या भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से 22 भाषाओं को संविधान में मान्यता मिली हुई है। वर्ष 2003 में चार नई भाषाओं को संविधान संशोधन कर मान्यता दी गई। इससे पहले संविधान में केवल 18 भाषाओं को ही मान्यता प्राप्त थी। जिन्हें संविधान में जगह नहीं मिला है, उन्हें बोली कहा जाता है। 2011 की जनणना में देश में लगभग 122 भाषाएं दर्ज की गईं थीं। संविधान में जिन 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, उसमें हिन्दी, अंग्रेजी, असमी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओड़िया, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलगु और उर्दू शामिल है।

संस्कृत कहा तक बोलचाल की भाषा थी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए professor Edward James Rapson (professor of Sanskrit at the University of Cambridge) कहते हैं-“संस्कृत भी वैसी ही बोलचाल की भाषा है जैसी साहित्यिक अंग्रेजी है, जिसे कि हम बोलते हैं।

भाषा के अर्थरूप में ‘संस्कृत’ का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण में मिलता है- जब वानरराज सुग्रीव प्रिय करने हेतु ऋष्यमूक पर्तत से उतर करहनूमान् श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण का परिचय प्राप्त करने हेतु उनके पासआते हैं तो उन्होंने उनसे प्रसन्नता होती है और लक्ष्मण जी से कहते हैं-

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणाः ।

ना सामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम।।

अर्थात् जिसे ऋग्वेद का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ हो जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया हो तथा जो सामवेद का निष्णात् विद्वान नहीं हो वह इस प्रकारकी उत्कृष्ट भाषा में संभाषण नहीं कर सकता।

हनूमान् जी ने ब्राह्मण भिक्षु रूप धारण करके श्री राम जी से वार्तालाप किया था, उनकी वाणी संस्कार और क्रम से सम्पन्न थी, यही कारण है कि श्री राम जी ने उनके द्वारा व्यवहृत भाषा के लिए “संस्कार क्रम सम्पन्न’ तथा आविलम्बित विशेषणों का प्रयोग किया है। अतः श्री राम जी कहते हैं कि –

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।

बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशाब्दिम् ।

अर्थात् “निःसंदेह इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण का एक बार नहीं अध्ययन किया है। क्योंकि इनके मुख से एक भी अशुद्ध शब्द नहीं निकला।।

इसकी स्पष्ट सिद्धि हमें सुन्दर काण्ड में मिलती है-

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।

रावणं मत्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।।

अर्थात् हनूमान् जी अशोकवाटिका में सीता जी से किस भाषा में वार्तालाप किया जाय? इसका विचार करते हुए सोचते हैं कि, यदि मैं द्विज समान संस्कृत वाणी में बोलूँगा तो सीता जी मुझे रावण समझ कर डर जायेंगी।

महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध और श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य हैं- पाणिनि (समय- विक्रम पूर्व षष्ठशती) ने संस्कृत भाषा को विशुद्ध तथा व्यवस्थित बनाये रखने के लिये प्रसिद्ध व्याकरण बनाया है, जो आठ अध्यायों में विभक्त होने के कारण ‘अष्टयाध्यायी’ कहलाता है। संस्कृत वैयाकरणों में पाणिनि व्याकरण ही सर्वाधिक प्रसिद्ध है। महर्षि पाणिनि ने विषय के सम्यक् विवेचन के लिए पंचांगों का निर्देश किया है- सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ, लिङ्गानुशासन। इन पंचांगों द्वारा महर्षि पाणिनि ने संस्कृत को एक सुसंस्कृत स्वरूप प्रदान किया। संस्कृत भाषा में जो एकरूपता और व्यवस्था दीख पड़ती है, यह सब पाणिनि के ही नियमन का फल है। कुछ लोग पाणिनि पर यह दोष लगाते हैं कि उन्होंने भाषा को जकड़ कर अस्वाभाविक बना दिया, परन्तु बात ऐसी नहीं है। यदि पाणिनि का व्याकरण ने रहता तो संस्कृत भाषा में देश-काल की भिन्नता से इतना रूपान्तर होता कि उसे हम पहचान भी नहीं सकते।  अष्टाध्यायी से ऊपर ‘कात्यायन’ ने वार्तिक लिखा, जिसमें उन्होंने नये प्रयुक्त शब्दों की व्याख्या दिखलाई। विक्रम-पूर्व द्वितीय शतक में पतंजलि ने ‘अष्टाध्यायी’ के ऊपर ‘भाष्य’ लिखा, जो इतना सुन्दर, उपादेय तथा प्रामाणिक है कि उसे ‘महाभाष्य’ के नाम से पुकारते हैं। लौकिक संस्कृत के कर्ता-धर्ता ये ही तीन मुनि हैं, जिनके कारण व्याकरण ‘त्रिमुनि’ के नाम से विख्यात है। पिछले युग में संस्कृत व्याकरण के ऊपर जो कुछ लिखा गया वह केवल इस ‘मुनित्रय’ के ग्रन्थों का व्याख्यानमात्र है। कुछ लोगों का कथन है कि इस ‘मुनि-त्रय’ के द्वारा व्याख्यात तथा विवृत होने के कारण से ही यह देववाणी ‘संस्कृत’ नाम के अभिहित की जाती है।

वैदिक संस्कृत से भिन्न साधारण जनता की जो बोली थी उसको यास्क ने स्थान-स्थान पर ‘भाषा’ कहा है। उन्होंने वैदिक कृदंत शब्दों की व्युत्पत्ति उन धातुओं से बतलाई है जो लोक-व्यवहार में आते थे। उस समय भिन्न-भिन्न प्रान्तों में संस्कृत शब्दों के जो रूपान्तर तथा विशिष्ट प्रयोग काम में लाये जाते थे उन सबका उल्लेख यास्क ने किया है। उदाहरणार्थ ‘शवति’ क्रियापद का प्रयोग कम्बोज देश (वर्तमान पश्चिमोत्तर–प्रान्त) में ‘जाने’ के अर्थ में किया जाता था, परन्तु इसका संज्ञापद ‘शव’ (मुर्दा) का प्रयोग आर्य लोग भिन्न अर्थ में करते थे। पूर्वी प्रान्तों (प्राच्य) में ‘दाति’ क्रियापद का प्रयोग ‘काटने’ के अर्थ में होता था, परन्तु उत्तर के लोगों में इसी से बने हुए ‘दात्र’ संज्ञा-शब्द का प्रयोग हँसिया के अर्थ में होता था। इससे स्पष्ट है कि यास्क के समय में (विक्रम पूर्व सात सौ वर्ष) संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। संस्कृत व्याकरण की भाषा में सार्थक शब्द को ‘पद’ कहते हैं। ऐसे समस्त पदों के दो भेद किए जाते हैं-(क) सुबन्त एवं (ख) तिङन्त । ‘सुप्’ और ‘तिङ्’ दोनों प्रत्यय हैं। ये प्रत्यय जब प्रकृति (मूलशब्द या धातु) से मिलते हैं तब सार्थक शब्दों का निर्माण होता है।

पाणिनि के समय में (विक्रम-पूर्व षष्ठशती) संस्कृत का यह रूप बना ही रहा। पाणिनि भी इस बोली को ‘भाषा’ ही के नाम से पुकारते हैं। दूर से पुकारने के समयतथा प्रत्यभिवादन के अवसर पर पाणिनि ने प्लुत स्वर का विधान बतलाया है। यदि दूरसे कृष्ण को पुकारना होगा तो संस्कृत में ‘आगच्छ कृष्ण’ कहना पड़ेगा। यहाँ पाणिनिके अनुसार कृष्ण का अकार प्लुत होगा। उसी प्रकार अभिवादन करने के अनन्तर जोआशीर्वाद दिया जायगा वहाँ पर भी प्लुत करना पड़ेगा। जैसे देवदत्त नामक कोई छात्रगुरु को इस प्रकार प्रणाम करे ‘आचार्य! देवदत्तोऽहं त्वमभिवादये’ (जे गुरु जी! मैंदेवदत्त आपको प्रणाम करता हूँ, तो गुरु यह कह कर आशीर्वाद देगा-‘आयुष्मान् एधिदेवदत्त’ (आयुष्मान् बनो, हे देवदत्त) इस आशीर्वाद-वाक्य में देवदत्त के अन्त का अकारप्लुत हो जायगा, यह पाणिनि की व्यवस्था है। इन नियमों का प्रयोग तभी होगा जबभाषा वस्तुतः बोली जाती होगी।

महर्षि पतञ्जलि ने ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी में संस्कृत को लोक व्यवहृत एवं लोक प्रचलित कहा है। महाभाष्य के प्रारम्भ में ही ‘अथ शब्दानुशासनम्’ पर लिखते हुए उन्होंने केषां शब्दानां? लौकिकानां वैदिकानां च।’ कहकर दोनों को स्पष्ट रूप से पृथक-पृथक निर्देश किया है।

संस्कृत भगवान बुद्ध के समय में बोलचाल की भाषा थी- कई कहानियों में सुना जाता है कि भिक्षुओं ने भगवान बुद्ध के सामने विचार रखा कि आप अपनी बोल चालकी भाषा संस्कृत को बना लें। इससे भी यही परिणाम निकलता है कि संस्कृत भगवान बुद्ध के समय में बोलचाल की भाषा थी। प्रसिद्ध बौद्ध कवि अश्वघोष (ई. द्वितीय शताब्दी) ने अपने सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए अपनेग्रन्थ संस्कृत में लिखे। इससे यह अनुमान करना सुगम है कि संस्कृत प्राकृत की अपेक्षा साधारणजनता को अपनी ओर अधिक खींचती थी, तथा संस्कृत ने कुछ समय के लिए खोए हुए अपने पदको पुनः प्राप्त कर लिया था।

संस्कृत में शिलालेख-  दूसरी शताब्दी ईं के बाद में मिलने वाले शिलालेख क्रमशः संस्कृत में अधिक मिल रहे हैं और छठीं शताब्दी से लेकर केवल जैन शिलालेखों को छोड़कर सारे के सारे शिलालेख संस्कृत में ही मिलते हैं। यह बात सर्वमान्य है कि शिलालेख प्रायः उसी भाषा में लिखे जाते हैं जिसे सर्वसाधारण पढ़ और समझ सकते हैं ।

हेनसांग ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ई. सातवीं शताब्दी में बौद्ध लोग धर्मशास्त्रीय मौखिक वादक्विकमें संस्कृत का ही व्यवहार करते थे । जैनों ने प्राकृत को बिल्कुल छोड़ तो नहीं दिया था पर वेभी संस्कृत का व्यवहार करने लगे थे ।

हिमालय और विन्ध्य तक संस्कृत बोलचाल की भाषा थी- साहित्य में ऐसे भी उल्लेख पाये जाते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि रामायण और महाभारत जनता के सामने मूलमात्र पढ़कर सुनाये जाते थे। तब तो जनता वस्तुतः संस्कृत के श्लोकों का अर्थ समझ लेती होगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि हिमालय और विन्ध्य के बीच फैले हुए सम्पूर्ण आर्यावर्त में संस्कृत बोल चाल की भाषा थी। इसका व्यवहार ब्राहमण ही नहीं, अन्य लोग भी करते थे।

संस्कृत का उत्थान, पतन और फिर उत्थान…

संस्कृत उत्तर-पश्चिमी भारत की बोल चाल की भाषा थी, जिसके विकास का पता सम्पूर्ण साहित्य दे रहा है और sanskrit1जिसकी ध्वन्यात्मक विशेषतायें उत्तर-पश्चिमी भारत के शिलालेखों में बहुत सीमा तक सुरक्षित है। मूलरूप में यह ब्राहमण धर्म की भाषा थी, जो उसी उत्तर पश्चिमी भाग से प्रचालितहुआ था। ब्राहमण धर्म के प्रसार के साथ इसका भी प्रसार हुआ और जब भारत के अन्य दो बड़े धर्म-जैन और बौद्ध धर्म फैलने लगे, तब कुछ समय के लिए इसका प्रसार रुक गया। जब भारत में दोनों धर्मों का अपकर्ष प्रारंभ हुआ तब इसने निर्विघ्न उन्नति करना प्रारम्भ किया धीरे-धीरे यह सारे भारत वर्ष में फैलने लगी। गुप्त काल को सांस्कृतिक विकास में भारत के स्वर्ण युग तथा सर्वोच्च और सबसे उत्कृष्ट समय के रूप में भी माना जाता है। गुप्त वंश के शासकों ने संस्कृत साहित्य को संरक्षित किया और उन्होंने उदारता से संस्कृत विद्वानों और कवियों की मदद की। अंततः संस्कृत भाषा सुसंस्कृत और शिक्षित लोगों की भाषा बन गई। इस दौर में कालिदास संस्कृत भाषा के सबसे महान कवि और नाटककार थे। कालिदास ने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। इसमें अभिज्ञानशाकुन्तलम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम्; मेघदूतम् और ऋतुसंहार प्रमुख हैं। समय पाकर तो यह एक विशाल राष्ट्रीय भाषा बन गयी और केवल तभी यह पदच्युत हुई जब मुस्लिम शासकों का भारत में आगमन हुआ।

काल विभाजन

संस्कृत साहित्य का इतिहास, काल विभाजन के आधार पर करना अबतक के विद्वानों के लिए टेढ़ी खीर रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय आर्य भाषाओं के कालक्रम को गैरोला (संस्कृत साहित्य का संक्षिप्त इतिहास (वाचस्पति गैरोला), पृ0 18) तीन युगों में विभाजित करते हैं

  1. आर्य भाषा युग- वैदिक काल से 900 ई0 पूर्व तक
  2. मध्यकालीन आर्य भाषा युग- 500 ई0 पू0 से 1100 ई०
  3. आधुनिक आर्यभाषा युग- 1100 ई0 से अब तक

इसके आधार पर हम संस्कृत साहित्य के कालक्रम को आदिकाल,मध्यकाल और आधुनिक में विभक्त कर अध्ययन कर सकते हैं। क्योंकि वैदिककालीन(आदि काल) से ही साहित्य सृजन का रूप हमें वेदों एवं उनकी संहिताओं तथाब्राह्मण आदि ग्रन्थों में मिलता है।

पद्मविभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय ने संस्कृत साहित्य का इतिहास, में निम्न प्रकार से विभाजित किया है-

  1. श्रुति काल : जिसमें वैदिक साहित्य ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, का निर्माणहुआ। इस काल में वाक्य रचना सरल संक्षिप्त और क्रिया बहुलता हुआ करती थी।
  2. स्मृति काल : जिसमें रामायण, महाभारत पुराण तथा वेदांगों की रचना हुई।
  3. लौकिक संस्कृत का काल : इसमें काव्य तथा नाटकों की रचना, पाणिनि केनियमों के द्वारा संयत तथा सुव्यवस्थित की गयी भाषा से होने लगी।

उपर्युक्त विद्वानों के अवलोकन के पश्चात् सबसे मान्य उपाध्याय जी केकालक्रम विभाजन को मानते हुए श्रुतिकाल को, आदि काल तथा स्मृति काल कोमध्य काल तथा लौकिक संस्कृति साहित्य के काल को आधुनिक काल मानकरसंस्कृत साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करना तर्क संगत होगा। इसके आधारपर हम संस्कृत साहित्य के कालक्रम का निर्धारण निम्न प्रकार से कर सकते हैं-

आदि काल(श्रुति काल)

  1. संहिता काल (वैदिक संहिताएँ)
  2. ब्राह्मण काल (ब्राह्मण ग्रन्थ)
  3. सूत्रकाल (वेदांग)

मध्यकाल (स्मृति काल)

  1. महाकाव्य(उपजीव्य काव्य) काल
  2. पुराण काल
  3. इसके अतिरिक्त स्मृति काल में जैन एवं बौद्ध कालीन संस्कृत साहित्य का काव्य भी दृष्टिगोचर होता है।

लौकिक साहित्य काल (आधुनिक काल)

  1. श्रव्य काव्य काल
  2. दृश्य काव्य काल

वैदिक और लौकिक साहित्य में मूलभूत भिन्नता

  1. प्रथम तो दोनों साहित्यों में विषय भेद है। वैदिक साहित्य धर्म प्रधान था,उसमें केवल दर्शन, धार्मिक व्यवस्थाएं तथा जीवन के आचार-विचार पर ही प्रकाशपड़ता था किन्तु आगे चलकर समाज विज्ञान और राजनीति आदि का समावेश होनेलगा है। रामायण की रचना से साहित्य में लौकिकता को महत्व मिला। रामायण मेंशृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, वीभत्स आदि रसों का पूर्ण परिपाक हुआ है, जिसमेंउसकी लौकिकता सिद्ध होती है।
  2. लौकिक संस्कृत के विकास के साथ साहित्य में पद्यात्मकता की प्रधानता होजाती है। सभी ग्रन्थ पद्य में रचने की प्रथा चल पड़ी है। व्याकरण, दर्शन आदिशास्त्रों को छोड़कर अन्यत्र गद्य का प्रयोग किया जाने लगा। अभिप्राय यह है किसाहित्य लिखने का माध्यम पद्य ही रह गया किन्तु इसमें पूर्व वैदिक साहित्य गद्यका पर्याप्त स्थान मिला हुआ पाते है। यजुर्वेद, उपनिषद आदि में सर्वत्र गद्य के दर्शन होते हैं। इसलिए वैदिक तथा लौकिक संस्कृत के गुण हम इस आधार पर भीबाँट सकते हैं कि. जहाँ वैदिक साहित्य में गद्य को प्रश्रय प्राप्त था वहीं लौकिकसाहित्य में पद्य को प्रश्रय प्राप्त हुआ है।
  3. भाषा की दृष्टि से भी दोनों साहित्य में अन्तर है। वैदिक भाषा स्वरूप कीदृष्टि इतनी व्यवस्थित और निश्चित नहीं जितनी लौकिक संस्कृत की। लौकिकसंस्कृत को स्थिर रूप देने का श्रेय पाणिनि को है तथापि रामायण, महाभारत तथापुराणों आदि में भी कहीं-कहीं पुरानी भाषा के प्रयोग मिल जाते हैं। उन्हें आर्षप्रयोग कहकर स्वीकृत कर लिया गया है।
  4. दोनों प्रकार के साहित्य में वर्णन शैली का भी भेद दृष्टिगोचर होता है।कविताओं में जैसी उपमाएँ तथा अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन की प्रधानता लौकिकसंस्कृत से ही आरम्भ होती है। इससे पूर्व काव्य का लालित्य वैदिक साहित्य मेंदृष्टिगोचर नहीं होता। उसमें रूपकों की प्रमुखता है। अमूर्त को मूर्त रूप देनावैदिक साहित्य की विशेषता है।

पाश्चात्य मत- पाश्चात्य मत के अनुसार संस्कृत भाषा भारोपीय परिवार की एकभाषा है। संस्कृत तथा अन्य युरोपीय भाषाएँ किसी प्राचीन भाषासे विकसित हुई जो आज उपलब्ध नहीं हैं। संस्कृत , ईरानी और यूरोप की भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर पाश्चात्यभाषा वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत और यूरोप कीभाषाओं की एक जननी थी जिसका उन्होंने भारोपीय भाषा नामदिया है।

संस्कृत- व्याकरण

दुनिया की प्रत्येक भाषा का विकास ध्वनि संकेतों के आधार पर हुआ लेकिन संस्कृत किसी देश या धर्म की भाषा नहीं यह ब्रह्मांड की भाषा है। संस्कृत की उत्पत्ति और विकास ब्रह्मांड की ध्वनियों के माध्यम से हुआ है। यह आम लोगों screen-0.jpgद्वारा बोली गई ध्वनियां नहीं हैं। धरती और ब्रह्मांड में गति सर्वत्र है। चाहे वस्तु स्थिर हो या गतिमान। गति होगी तो ध्वनि निकलेगी। ध्वनि होगी तो शब्द निकलेगा। देवों और ऋषियों ने उक्त ध्वनियों और शब्दों को पकड़कर उसे लिपि में बांधा और उसके महत्व और प्रभाव को समझा।

देव भाषा संस्कृत की वर्ण माला का उद्गम सूर्य की रश्मियां हैं। इसमें कुल 36 स्वर और 72 व्यंजन वर्ण हैं। यह ब्रह्माण्ड से निकली हुई मूल ध्वनिया है। संस्कृत को अपौरुष भाषा इसलिए कहा जाता है कि इसकी रचना ब्रह्माण्ड की ध्वनियों से हुई है। सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस प्रकार सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के 8 बसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्माण्ड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्णमाला आधारित है।

ब्रह्माण्ड की ध्वनियों के रहस्य के विषय में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को नासा ने भी माना है। अत: यह सर्वसिद्ध है कि वैदिक काल में बृह्मांड में होने वाली ध्वनियों का ज्ञान ऋषियों को था।

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मा ना जाता है कि अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किंतु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग (हिन्दी में पञ्चमाक्षर) अंत:स्थ और ऊष्म वर्गों में बांटा गया है-

  • कवर्ग- कवर्ग में ङ् का प्रयोग क, ख, ग, घ के पूर्व होता है। हालांकि ‘पराङ्मुख’ और ‘वाङ्मय’ आदि कुछ शब्दों में अपवाद स्वरूप ‘ङ्’ का ही प्रयोग मिलता है। यहाँ (ं) का प्रयोग नहीं किया जा सकता। ङ व्यंजन शब्द के आदि तथा अंत में नहीं आता। इसके अनुसार विशिष्ट ध्वन्यात्मक प्रयोगों को छोड़कर इस वर्ग के लिए अनुस्वार का प्रयोग किया जा सकता है।
  • चवर्ग- चवर्ग में ञ् का प्रयोग च, छ, ज, झ के पूर्व होता है। जैसे- अञ्चल, पञ्छी, अञ्जन एवं झञ्झट आदि। हालांकि ञ का प्रयोग हिंदी लेखन में प्रायः नहीं हो रहा है। इनके स्थान पर अब अनुस्वार का ही प्रयोग हो रहा है। ञ् भी शब्द के आदि या अंत में नहीं आता।
  • टवर्ग- टवर्ग में ण् का प्रयोग ट, ठ, ड, ढ के पूर्व होता है। जैसे- घण्टा, कण्ठ, अण्डा आदि। अब इनके स्थान पर प्रायः अनुस्वार (ं) का प्रयोग होता है। स्वतंत्र रूप से ण का प्रयोग केवल संस्कृत के शब्दों में होता है। वह भी मध्य (प्रणाम) और अंत (प्रण) में। टवर्ग के अतिरिक्त य,व एवं ण के पूर्व भी ण आता है, किन्तु ऐसी स्थिति में इसके स्थान पर अनुस्वार नहीं आता। जैसे- पुण्य, कण्व एवं विषण्ण।
  • तवर्ग- तवर्ग में न् का प्रयोग त, थ, द, ध के पूर्व होता है। जैसे- जन्तर, मन्थर, तन्दूर, गन्ध आदि। अब इनके स्थान पर भी अनुस्वार (ं) के प्रयोग की अनुशंसा की जाती है। जैसे- अंत, पंथ, आनंद एवं गंधक।
  • पवर्ग- पवर्ग में म् का प्रयोग प, फ, ब, भ के पूर्व होता है। जैसे- सम्पर्क, गुम्फित, अम्बर, गम्भीर आदि। अब इनके स्थान पर भी ङ्, ञ्, ण् एवं न् की तरह ही प्रायः अनुस्वार (ं) का प्रयोग होता है। जैसे- संपर्क, गुंफित, अंबर एवं गंभीर।

संस्कृत साहित्य 

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आदि देव ने सृष्टि के आदि में ही मनुष्य को भाषा और धर्म साथ-साथप्रदान किये जिससे संस्कृति एवं साहित्य का विकास हुआ। संस्मरणीय है किसंस्कृति “शारीरिक या मानसिक शक्तियों का दृढ़ीकरण या विकास अथवा उससेउत्पन्न अवस्था” के रूप में जानी जाती है। वहीं साहित्य शब्द और अर्थ के मञ्जुलसामञ्जस्य का सूचक है। इसकी व्युत्पत्ति है “सहितयोः शब्दार्थयोः भावः साहित्यम्अर्थात् साहित्य शब्द अर्थ का भाव है। महाकवि भर्तिहरि ने संगीत और साहित्य सेविहीन पुरुष को जब पशु कहा है, तब उसका अभिप्राय ‘साहित्य’ के उन कोमलकाव्यों से है जिसमें शब्द और अर्थ का अनुरूप सन्निवेश है। शास्त्र व साहित्य काअन्तर यही है कि शास्त्र में अर्थ प्रतीति के लिए ही शब्द का प्रयोग किया गया है,परन्तु काव्य में शब्द और अर्थ दोनों एक ही कोटि के होते है। कोई न घटकर रहताहै न बढ़कर। इसी अर्थ को ध्यान में रखकर राजशेखर ने साहित्य विद्या कोपञ्चमी विद्या कहा है, जो प्रमुख विद्याओं में पुराण, न्याय दर्शन, मीमांशा औरधर्मशास्त्र का सारभूत है। विल्हण ने अपने विक्रमांकदेवचरितम् में काव्य रूपीअमृत को साहित्य समुद्र के मन्थन से उत्पन्न होने वाला बतलाया है। 4 साहित्यशब्द का प्रयोग संकुचित अर्थ में काव्य, नाटक आदि के लिए होता है। परन्तुसाहित्य शब्द का अर्थ व्यापक रूप में भी प्रयुक्त है। साहित्य से अभिप्राय उन ग्रन्थों से है जो किसी भाषा विशेष में निबद्ध किये गये हों। इस अर्थ में वाड्.मय का प्रयोग उचित माना गया है।

साहित्य ही संस्कृति के उचित प्रसार तथा प्रचार का सर्वश्रेष्ठ साधन है।जहाँ साहित्य सामाजिक भावना एवं सामाजिक विचार की विशुद्ध अभिव्यक्ति होनेके नाते समाज का मुकुट है, वहीं सांस्कृतिक आचार तथा विचार के विपुल प्रचारकतथा प्रसारक होने के कारण संस्कृति के सन्देश को जनता तक पहुँचाने के कारणसंस्कृति का वाहक भी है। जहाँ तक भारतीय संस्कृति के प्रधान वाहक का सवालहै तो वह है संस्कृत साहित्य है और यह संस्कृति साहित्य जिस भाषा में निबद्धकिया गया है वह भाषा या देववाणी या ‘सुरभारती’ है जिससे लोक व्यवहार चलताहै तथा मुख्य धर्म सनातन धर्म है जिसमें विश्वकर्मा इस संस्था को चलाने हेतु आचार-विचार एवं नियम उपनियम दिये थे। इसकी पुष्टि प्रसिद्धि पाश्चात्य ऐतिहासिकएवं दार्शनिक विलड्यूरा के शब्दों से होती है- भारत हमारा मातृदेश है। संस्कृत समस्त यूरोपीय भाषाओं की जननी । भारतभूमि हमारे दर्शन शास्त्र की जननी थी, अरबों के माध्यम से गणित शास्त्र की भी जननीरही है। बुद्धदेव के माध्यम से इसाई धर्म में व्याप्त शासन एवं प्रजातंत्र की जननी थी।अतः कहा जा सकता है भारत माता अनेक प्रकार से हम भारतीयों की माँ हैं।

संस्कृत गद्य की परम्परा

संस्कृत गद्य का दर्शन सर्वप्रथम वैदिक साहित्य में उपलब्ध होने से संस्कृत साहित्य में गद्य भाषा की परम्परा को वैदिक संहिताओं जितना प्राचीन कहा जा सकता है। वैदिक काल से आरम्भ कर मध्यकाल तक गद्य के विकसित होने का इतिहास बड़ा ही मनोरम है। संस्कृत गद्य साहित्य का विकास मुख्यतया दो भागों में विभक्त दृष्टिगोचर होता है-

(1) वैदिक साहित्य का गद्य।

वैदिक साहित्य का गद्य- वैदिक साहित्य में चार वैदिक संहिताओं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, आयुर्वेदव और अथर्ववेद के अतिरिक्त इनमें ब्राह्मणों-ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों और वेदागों को सम्मिलित किया जाता है। वेदांग छः है- शिक्षा, कल्प,व्यायकरण, निरूक्त, छन्द, ज्योतिष। इन सभ्ज्ञी से सम्बन्धित साहित्य वैदिकसाहित्य की सीमा में आ जाता है। ऐतिहासिक गवेषणाओं से प्रतीत होताहै कि वैदिक संहिताओं में ही गद्य का प्रथम विवेचन किया गया है। गद्य से मिश्रित होने के कारण ही कृष्णयजुर्वेद का कृष्णत्त्व है। प्राचीनतम गद्यका उदाहरण इसी कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में उपलब्ध होता है।इस संहिता में गद्य भाग पद्य की अपेक्षा मात्रा में कथमपि न्यून नही है। इस वेद की अन्य संहिताओं जैसे-काठक संहिता, मैत्रायणी संहितादि में भीगद्य की सत्ता उस मात्रा में है। शुक्ल यजुर्वेद में भी कुछ गद्यात्मक मंत्रहै जिन्हें ‘यंजूषि’ कहा गया है। कालक्रम में कुछ आगे चलकर अथर्ववेद का गद्य है जिसमें गद्यांश प्रचुर मात्रा में है। यहाँ गद्य सम्पूर्ण अथर्ववेदका लगभग छठा भाग है। अथर्ववेद के 15वें तथा 16वें काण्ड में गद्यांशपाये जाते है। संहिताओं के बाद गद्य का प्रचुर प्रयोग ब्राह्मण, आरण्यकतथा उपनिषद् ग्रन्थों में मिलता है। जिनका क्रमशः वर्णन अधोलिखित है।

(क) संहिता कालीन गद्य-वैदिक संहिताओं में गद्य का प्रयोग हुआ है। यह गद्य सहज, सरलएवं सरस है। इसमें प्रौढ़ता एवं समास बहुलता नहीं है।

(ख) ब्राह्मणकालीन गद्य- ब्राह्मण ग्रन्थों में रोचक, मनोरम एवं सरस गद्य का प्रयोग हुआ है। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुशीलन से तत्कालीन साहित्यिक एवं व्यावहारिक गद्य का अनुमान किया जा सकता है।

(ग) उपनिषद्कालीन गद्य-उपनिषद् ग्रन्थों का गद्य पूर्णतः सजीव एवं व्यावहारिक है। इसकीभाषा सरल, सरस एवं सुबोध है। लम्बे-लम्बे समस्त पदों का प्रयोग नहींहुआ है। यत्र-तत्र विषय को हृदयंगम कराने के लिए पुनरूक्ति के दर्शनहोते है। उपनिषद् कालीन गद्य व्यावहारिक गद्य के अधिक समीप है।

(घ) उपनिषद् उत्तरकालीन गद्य- इस काल में वैदिक और लौकिक संस्कृत के गद्य का सामञ्जस्यरहता है। यह दोनों गद्यों की सन्धि का काल है। उपनिषद् साहित्य केपश्चात् वेदांग साहित्य में जो गद्य प्राप्त होता है, उसमें समास शैली केदर्शन होने लगते है। यही से गद्य साहित्य में संक्षेपीकरण की प्रवृत्तिदिखाई देने लगती है। इस शैली का चरम विकास महर्षि पाणिनि प्रणीतअष्टाध्यायी के सूत्रों में प्राप्त होता है। महर्षि पाणिनि ने सूत्र शैली कोअपनाकर गागर में सागर भरने की उक्ति को चरितार्थ कर दिया है।यास्क का निरूक्त भारतीय दर्शन और सम्पूर्ण वेदांग साहित्य में इस शैलीके दर्शन होते है। इस शैली ने शनैः शनैः जिस संस्कृत गद्य का प्रवर्तनकिया, उसे परिष्कृत और अलंकृत गद्य कहा जा सकता है। इस काल केगद्य को अध्ययन की सुविधा के लिए हम तीन भागों में विभक्त करसकते हैं-1. पौराणिक गद्य 2. शास्त्रीय गद्य 3. साहित्यिक गद्य

(2) लौकिक साहित्य का गद्य।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र, वात्स्यायन का कामसूत्र, भरत का नाट्यशास्त्र आदि संस्कृत के कुछ ऐसे अमूल्य ग्रंथरत्न हैं – जिनका समस्त संसार के प्राचीन वाङ्मय में स्थान है। वैदिक वाङ्मय के अनंतर सांस्कृतिक दृष्टि से वाल्मीकि के रामायण और व्यास के महाभारत की भारत में सर्वोच्च प्रतिष्ठा मानी गई है। महाभारत का आज उपलब्ध स्वरूप एक लाख पद्यों का है। प्राचीन भारत की पौराणिक गाथाओं, समाजशास्त्रीय मान्यताओं, दार्शनिक आध्यात्मिक दृष्टियों, मिथकों, भारतीय ऐतिहासिक जीवनचित्रों आदि के साथ-साथ पौराणिक इतिहास, भूगोल और परंपरा का महाभारत महाकोश है। वाल्मीकि रामायण आद्य लौकिक महाकाव्य है। उसकी गणना आज भी विश्व के उच्चतम काव्यों में की जाती है। इनके अतिरिक्त अष्टादश पुराणों और उपपुराणादिकों का महाविशाल वाङ्मय है जिनमें पौराणिक या मिथकीय पद्धति से केवल आर्यों का ही नहीं, भारत की समस्त जनता और जातियों का सांस्कृति इतिहास अनुबद्ध है। इन पुराणकार मनीषियों ने भारत और भारत के बाहर से आयात सांस्कृति एवं आध्यात्मिक ऐक्य की प्रतिष्ठा का सहस्राब्दियों तक सफल प्रयास करते हुए भारतीय सांस्कृति को एकसूत्रता में आबद्ध किया है।

संस्कृत के लोकसाहित्य के आदिकवि वाल्मीकि के बाद गद्य-पद्य के लाखों श्रव्यकाव्यों और दृश्यकाव्यरूप नाटकों की रचना होती चली जिनमें अधिकांश लुप्त या नष्ट हो गए। पर जो स्वल्पांश आज उपलब्ध है, सारा विश्व उसका महत्व स्वीकार करता है। कवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक को विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में स्थान प्राप्त है। अश्वघोष, भास, भवभूति, बाणभट्ट, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, शूद्रक, विशाखदत्त आदि कवि और नाटककारों को अपने अपने क्षेत्रों में अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। सर्जनात्मक नाटकों के विचार से भी भारत का नाटक साहित्य अत्यंत संपन्न और महत्वशाली है। साहित्यशास्त्रीय समालोचन पद्धति के विचार से नाट्यशास्त्र और साहित्यशास्त्र के अत्यंत प्रौढ़, विवेचनपूर्ण और मौलिक प्रचुरसख्यक कृतियों का संस्कृत में निर्माण हुआ है। सिद्धांत की दृष्टि से रसवाद और ध्वनिवाद के विचारों को मौलिक और अत्यंत व्यापक चिंतन माना जाता है। स्तोत्र, नीति और सुभाषित के भी अनेक उच्च कोटि के ग्रंथ हैं। इनके अतिरिक्त शिल्प, कला, संगीत, नृत्य आदि उन सभी विषयों के प्रौढ़ ग्रंथ संस्कृत भाषा के माध्यम से निर्मित हुए हैं जिनका किसी भी प्रकार से आदिमध्यकालीन भारतीय जीवन में किसी पक्ष के साथ संबंध रहा है। ऐसा समझा जाता है कि द्यूतविद्या, चौर विद्या आदि जैसे विषयों पर ग्रंथ बनाना भी संस्कृत पंडितों ने नहीं छोड़ा था। एक बात और थी। भारतीय लोकजीवन में संस्कृत की ऐसी शास्त्रीय प्रतिष्ठा रही है कि ग्रंथों की मान्यता के लिए संस्कृत में रचना को आवश्यक माना जाता था। इसी कारण बौद्धों और जैनों, के दर्शन, धर्मसिद्धान्त, पुराणगाथा आदि नाना पक्षों के हजारों ग्रंथों को पालि या प्राकृत में ही नहीं संस्कृत में सप्रयास रचना हुई है। संस्कृत विद्या की न जाने कितनी महत्वपूर्ण शाखाओं का यहाँ उल्लख भी अल्पस्थानता के कारण नहीं किया जा सकता है। परंतु निष्कर्ष रूप से पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भारत की प्राचीन संस्कृत भाषा-अत्यंत समर्थ, संपन्न और ऐतिहासिक महत्व की भाषा है। इस प्राचीन वाणी का वाङ्मय भी अत्यंत व्यापक, सर्वतोमुखी, मानवतावादी तथा परमसंपन्न रहा है। विश्व की भाषा और साहित्य में संस्कृत भाषा और साहित्य का स्थान अत्यंत महत्वशाली है। समस्त विश्व के प्रच्यविद्याप्रेमियों ने संस्कृत को जो प्रतिष्ठा और उच्चासन दिया है, उसके लिए भारत के संस्कृतप्रेमी सदा कृतज्ञ बने रहेंगे।

संस्कृत साहित्य में नाटकों की परम्परा

भारत में संस्कृत नाटक की उत्पत्ति कब और कैसे हुई यहअत्यन्त जटिल एवं विवादास्पद प्रश्न है। नाटक उत्पत्ति के विषय में भारत मेंकुछ कथाएं परम्परा से चली आई हैं। इस विषय में सर्वाधिक प्राचीन कथा हमें भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में उपलब्ध होती है। इस अध्याय कानाम ही “नाट्योत्पत्ति” है। भारतीय परम्परा अनुसार ब्रह्मा जी ने नाट्येवद कीरचना की तथा भरतमुनि ने पृथ्वी मण्डल में उसका प्रचार किया।

नाटक के प्रधान अङ्ग संवाद, संगीत, नृत्य एवंअभिनय है। वैदिक साहित्य का अनुशीलन करने से ज्ञात होता है कि वैदिक कालमें इन सभी अङ्गों का किसी न किसी रूप में अस्तित्व था तथा इस अर्थ में यहकहा जा सकता है कि संस्कृत नाटक की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। परवास्तविक नाटक के विकसित रूप का आभास वेद में कहीं लक्षित नहीं होता है। जबकि रामायण-महाभारत में इसे अग्रसर होता हुआ देखा जा सकता है। अधिकतर पुराणों में भी नाटकों का उल्लेख है। बौद्ध साहित्य में भी नाटक कीप्राचीनता सिद्ध होती है। जातक साहित्य में भी नटों के अभिनय का उल्लेख प्राप्तहोता है।’ इस प्रकार परम्परा अनुसार नाट्यवेद की सृष्टि ब्रह्म ने की थी।

प्राचीन संस्कृत नाटकों में हमारे देश की दार्शनिकता एवं भाव गाम्भीर्य की अलौकिक झलक दृष्टिगोचर होती है। हमारा धार्मिक जीवन इस कथन का ज्वलन्त व प्रत्यक्ष प्रमाण है। हमारे समस्त धार्मिक कृत्य इसी भाषा में सम्पन्न होते हैं। संस्कृत के इस लोकायायी प्रचार का एक महान कारण इसके साहित्य में नाटकों की सुमनोहरता एवं रोचकता है।

प्राचीनकालीन नाटक

  • संस्कृत रूपक के साहित्यिक विन्यास का समारम्भ प्रथम शती ईस्वी से वर्तमान काल तक निरन्तर होता आ रहा है। इस रूप में साहित्य शब्द से अश्वघोष, कालिदास, भवभूति आदि रचनाकारों की ऐसी कृतियाँ, जो रसानन्द के साथ-साथ मानव को उचित-अनुचित का विवेक कराकर प्रेय एवं श्रेय मार्ग की ओर प्रेरित करें, उन्हें साहित्य कहा जा सकता है।
  • संस्कृत साहित्य के प्राचीन नाटकों में “शारीपुत्र प्रकरण” संस्कृत का प्रथम प्राप्य रूपक है किन्तु इसके पूर्व अनेक अनगिनत रूपकों की परम्परा विराजमान थी।
  • धार्मिक नाट्य दृश्यों से सबद्ध रूपक सर्वप्रथम पुस्तक रूप में प्रथम शताब्दी ई.पू. में अश्वघोष के लिखे हुये मिलते हैं। अश्वघोष प्रथम संस्कृत नाटककार माने जाते हैं। “शारिपुत्र प्रकरण” उन्हीं द्वारा रचित रूपक है। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे दो अन्य नाटकों केखण्डित अंश भी मिले हैं।
  • दो खण्डित नाटकों में से एक “प्रबोधचन्द्रोदय” के समान रूपात्मक है। जिसमें बुद्धि, घृति, कीर्ति एवं बुद्ध पात्रों के रूप में चित्रित किये गये हैं तथा द्वितीय ‘मृच्छकटिक’ की भान्ति वैश्यानायिकात्मक नाटक है। “शारिपुत्र प्रकरण” नौ अंकों में समाप्त हुआ है।
  • महाकवि भास प्रथम शती ईस्वी के अश्वघोष के पश्चात् हैं। उनके द्वारा रचित अभी तक तेरह रूपक मिले हैं, इनके नाम इस प्रकार हैं – दूतवाक्य, कर्णभार, दूतघटोत्कच, ऊरुभङ्ग, मध्यमव्यायोग, पंचरात्र, अभिषेक, बालचरित, अविमारक, प्रतिमा, प्रतिज्ञायौगन्धरायण, स्वप्नवासदतम् तथा चारुदत्त।

संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक “अभिज्ञानशाकुन्तलम”

  • भास के पश्चात कालिदास का अवतरण हुआ। महाकवि कालिदास संस्कृत के सर्वोत्कृष्ट नाटककार माने जाते हैं उनका स्थितिकाल प्रथम शताब्दी ई. पू. माना गया है। उनके लिखे तीन नाटक कहे गये हैं – “मालिविकाग्निममित्र”, “विक्रमोर्वशीयम्” तथा “अभिज्ञानशाकुन्तलम”।
  • भारतीय नाट्यसाहित्य का पूर्ण परिपाक हमें सर्वप्रथम कालिदास की कृतियों में ही मिलता है। रचनाक्रम के अनुसार “मालविकाग्निमित्र” कालिदास का प्रथम नाटक है। प्रथम नाटक होते हुये भी यह कालिदास की नाट्यकला के विकासशील स्वरूप को प्रस्तुत करता है। कालिदास का द्वितीय नाटक ‘विक्रमोर्वशीयम्” है तथा तृतीय नाटक “अभिज्ञानशाकुन्तलम्” है जो कालिदास का ही नहीं वरन् समग्र संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है।

संस्कृत के मुस्लिम विद्वान

अलबरूनी- भारत आने वाले प्रमुख अरब यात्रियों में अलबरूनी उर्फ अबूरेहान भी था। यह महमूद गजनबी के साथ भारत आया था। यहाँ रहते हुए इसने खगोल विद्या, संस्कृत तथा रसायन शास्र आदि विषयों का विस्तृत विवरण किया।

  • अलबरूनी प्रथम मुसलमान था जिसने संस्कृत पढ़ा। अलबरूनी ने पुराणों का अध्ययन किया और लाभ उठाया। गहन अध्ययन करके उसने पुराणों की विवेचना भी की थी, उसने मत्स्य, आदित्य, विष्णु और वायु पुराण का अध्ययन किया। चूंकि उसका भारतीय ज्ञान सर्वोत्कृष्ट प्रकार का था और वह भारतीय विद्याओं में पारंगत हो चुका था, इसलिए वह अपने पूर्ववर्ती और परवर्ती मुसलमान लेखकों की तुलना में सुदृढ़ साहित्य उपलब्ध करवाता है।
  • अलबरूनी ने ज्योतिष के अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अरबी अनुवाद किया।‘किताब-उल-हिन्द’ (तहकीक-ए-हिन्द) उसकी प्रसिद्ध रचना है। उसने संस्कृत रचनाओं का उपयोग किया जिसमें ब्रह्मगुप्त, बलभद्र तथा वाराहमिहिर की रचनाए विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। उसने जगह-जगह भगवद्गीता, विष्णु पुराण तथा वायु पुराण को उद्धत किया है।

गेसू दराज- सूफी सन्त गेसू दराज का जन्म 1321ई. को दिल्ली में हुआ था। गेसू दराज़ दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी संत हजरत नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी के एक मुरीद या शिष्य थे। इनको अरबी, फ़ारसी तथा संस्कृत का अच्छा ज्ञान था। वैसे वे उर्दू भाषा के प्रारंभिक कवियों और लेखकों में से एक थे। लेकिन इनके मूल में संस्कृत वाक्य विन्यास तथा उनके स्त्रोतों से लिए गए शब्द थे।

अकबरशाह- आंध्र प्रदेश के सूफी सन्त (संस्कृत विद्वान) गेसूदराज के वंशज थे | इन्होंने संस्कृत में नायिका भेद पर ‘श्रृंगारमञ्जरी’ नामक ग्रन्थ लिखा | इन्हें बड़े साहब के नाम से भी जाना जाता है |

अब्दुलर्रहीम खानखाना- रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम (अब्दुर्रहीम) ख़ानख़ाना था। ‘खानखाना’ रहीम की उपाधि थी जिसे अकबर ने प्रदान किया था। रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे। वे एक बहुभाषाविद्‌ थे और हिन्दी, तुर्की, फ़ारसी, संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली इत्यादि पर उन्हें दक्षता प्राप्त थी।  अब्दुर्रहीम खानखाना ने अरबी, फ़ारसी के साथ ब्रज तथा संस्कृत में रचना की।

जैनुल अबादीन कश्मीर में सुल्तान जैनुल आबदीन (१४वीं सदी) जैसे अनेक संस्कृत प्रेमी शासक हुए हैं। सकी प्रेरणा से महाभारत एवं राजतरंगिणी का संस्कृत से फारसी में तथा कई अरबी और फारसी पुस्तकों का हिन्दी भाषा में अनुवाद हुआ। इस प्रकार, इन सभी गुणों के लिए, यथार्थ ही उसका कश्मीर के अकबर के रूप में वर्णन किया गया है, यद्यपि वह उससे (अकबर से) व्यक्तिगत चरित्र के कुछ लक्षणों में भिन्न था।

इब्राहिम आदिलशाह- बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय (1500 -1627 ई.) ने फारसी भाषा में ‘किताब-ए-नवरस’ नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें संस्कृत के शब्दों का प्रयोग है।  यह संगीत और कला पर लिखित ग्रन्थ है।  

हाजी इब्राहिम सरहिन्दी अ अकबर के ही शासनकाल में हाजी इब्राहिम ने शेख़भवन की सहायता सेअथर्व वेद. का फ़ारसी में अनुवाद ‘अथरबन’ नामक शीर्षक से किया।

फैजी (शेख अबु अल-फ़ैज़)- मध्यकालीन भारत का फारसी कवि थे। फैजी ने भगवतगीता का फ़ारसी भाषा में अनुवाद — राजे-ए-मगफिरत ‘ नाम से किया ।’ अकबर के आदेशनुसार फैजी ने बीजगणित के संस्कृतग्रंथ लीलावती का फ़ारसी अनुवाद किया ।

बदायूँनी- अब्दुल कादिर बदायूँनी ने सन् 1590 ई0 में रामायण का फ़ारसीभाषा में अनुवादकिया। नाकिब ख़ान और थानेश्वर के शेखसुलतान ने भी रामायण का फ़ारसी अनुवाद किया। महाभारतका भी फ़ारसी अनुवाद बदायूँनी और शेखसुलतान ने फ़ज़ी की सहायता से किया। इसकी प्रति इण्डियाआफिस लाइब्रेरी में सुरक्षित है।

मिर्ज़ा फरीकुल्लाह सैफ़ खान  औरंगजेब के ही शासनकाल में मिर्ज़ा फरीकुल्लाह सैफ़ खान ने ‘रागदर्पण’ और ‘रागसागर’ नामक संगीत ग्रन्थ का फ़ारसी में अनुवाद किया।

दाराशिकोह  दाराशिकोह मुगल बादशाहों में सबसे काबिल और विद्वान शहजादा था। वह शहंशाह शाहजहां का सबसे बड़ा बेटा था।  दाराशिकोह एक विशुद्ध साहित्यकार था। वह संस्कृत, फारसी, लातीनी, सुरियानी, अरबी भाषाओं का ज्ञाता और लेखक था। दाराशिकोह ने रामायण, महाभारत, उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया था।  दाराशिकोह ने काशी के विद्वान पंडितराज जगन्नाथ से उसने संस्कृत सीखी। शाहजहाँ ने अपने पुत्र दाराशिकोह को संस्कृत की शिक्षा देने के लिये अपने दरबार में उन्हें सम्मानित स्थान दिया था। पंडितराज जगन्नाथ दाराशिकोह के गुरु भी थे, उन्होंने दारा को संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ उनका मार्गदर्शन भी किया था। 1657 में जब दाराशिकोह ने 52 उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद किया था, तब पंडितराज उसके मार्गदर्शक थे। दारा शिकोह ने उपनिषदों का अध्ययन किया और उनका फारसी भाषा में‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से अनुवाद कराया जिसका अर्थ होता है ईश्वरीय शब्द।  दाराशिकोह ने 1654 ई. में फ़ारसी में एक किताब लिखी थी-‘मज्म-उल-बहरैन’। उसी किताब का 1655 में‘समुद्र संगम’ नाम से संस्कृत में दाराशिकोह ने अनुवाद किया था। इस पुस्तक में भारतीय दर्शन और इस्लाम के दर्शन को समुद्र मानते हुए दोनों के बीच एकता की खोज और व्याख्या है।

आधुनिक युग के संस्कृत विद्वान- मुस्लिम

वाराणसी की नाहिद आबिदी- संस्कृत की विद्वान नाहिद आबिदी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की रहने वाली हैं और भाषा के लिए उनके काम के मद्देनजर उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है. मिर्जापुर के केवी डिग्री कॉलेज से संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद नाहिद आबिदी ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएचडी की डिग्री हासिल की. 2005 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षक के रूप में पढ़ाया. नाहिद की पहली किताब 2008 में आई थी और इस किताब का नाम था’संस्कृत साहित्य में रहीम’. इसके बाद देवालयस्य दीपा नाम की किताब आई जो गालिब की किताब चिराग-ए-दयार का ट्रांसलेशन थी. साल 2014 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा उन्हें डीलिट की उपाधि भी मिली है. 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था.

प्रयागराज के हयात उल्ला- इलाहाबाद, जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता हैके पेशे से अध्यापक हयात उल्ला को संस्कृत भाषा का संपूर्ण ज्ञान है. साल 1967 में उन्हें संस्कृत भाषा पर पकड़ की वजह से चतुर्वेदी की उपाधि मिली थी. हयात उल्ला इलाहाबाद के शेरवानी इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे और वहां से रिटायर होने के बाद भी बच्चों को संस्कृत की शिक्षा पूरे मनोयोग से देते रहे हैं. 2003 में जब वह स्कूल से रिटायर हो गए। रिटायर होने के बाद अब हयात उल्ला मेहगांव इंटर कॉलेज में नि:शुल्क हिंदी और संस्कृत पढ़ा रहे हैं। 1967 में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में संस्कृत के देश भर के विद्वान इलाहाबाद में जमा हुए थे। हयात उल्ला के संस्कृत ज्ञान और वेदों की प्रति प्रेम से प्रभावित होकर उन्हें उस सम्मेलन में चतुर्वेदी की उपाधि दी गई थी। हयात उल्ला के बारे में मशहूर है कि वो उनके अध्यापन का तरीका दूसरे शिक्षकों से अलग है. वो संस्कृत समझाने के लिए अन्य भाषाओं को प्रयोग करते हैं.

मेरठ के मौलाना चतुर्वेदी- उत्तर प्रदेश के ही मेरठ जिले के एक और मौलाना हैं, जिन्हें’चतुर्वेदी’ के नाम से जाना जाता है. इनका नाम है शाहीन जमाली. जमाली के मुताबिक उन्होंने संस्कृत का अध्य्यन अपनी इच्छा के कारण किया. बाद में उन्होंने कई हिंदू धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं. उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी चारों वेदों पर समान रूप से पकड़ है.

मुंबई के पंडित गुलाम दस्तगीर- संस्कृत भाषा से कुछ ऐसा ही प्रेम मुंबई के पंडित गुलाम दस्तगीर को भी है. मुंबई के वरली इलाके में घूमते हुए अगर कभी आपको’अस्सलामु-अलेकुम गुरुजी’ सुनने को मिल जाए तो आश्चर्य न कीजिएगा. पंडित दस्तगीर बीते कई दशक से संस्कृत भाषा की सेवा में लगे हुए हैं. महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पैदा हुए पंडित दस्तगीर ने लंबे समय तक मुंबई के वरली हाई स्कूल में संस्कृत की शिक्षा दी.

मोहम्मद हनीफ़ ख़ान शास्त्री- एक भारतीय संस्कृत विद्वान हैं। साल 2009 में इन्हें व्यक्तिगत श्रेणी में राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वे राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रोफ़ेसर रहे थे। भारत सरकार ने उन्हें 2019 में चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री (साहित्य और शिक्षा) से सम्मानित किया।

प्रोफेसर असहाब अली- गोरखपुर के पंडित दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर में 32 सालों से अधिक समय तक संस्कृत पढ़ाने वाले और संस्कृत विभाग के एचओडी रह चुके प्रोफेसर असहाब अली

इंसान के मस्तिष्क पर संस्कृत का प्रभाव

इंसान के मस्तिष्क पर संस्कृत के प्रभाव को लेकर न्यूरोसाइंटिस्ट व्याख्या करते हैं- एमआरआई स्कैन बताता है कि प्राचीन मंत्रों को याद करने से संज्ञानात्मक कार्य से जुड़े मस्तिष्क के कुछ हिस्सों का आकार बढ़ जाता है-

https://blogs.scientificamerican.com/observations/a-neuroscientist-explores-the-sanskrit-effect/

यूनाइटेड नेशन्स से भी पहचाना है संस्कृत के वैज्ञानिक आधार कोसंस्कृत के महत्व और उसके वैज्ञानिक आधार को देखते हुए यूनेस्को ने इंटैजिबल कल्चरल हैरिटेज ऑफ ह्यूमैनिटी की लिस्ट में संस्कृत में वैदिक चैंटिंग (जाप) को शामिल करने का निर्णय लिया है.

UNESCO ने यह माना है कि संस्कृत भाषा में वेदिक चैंटिंग का मनुष्य के मन-मस्तिष्क, शरीर और आत्मा पर गहन प्रभाव होता हैhttps://ich.unesco.org/en/RL/tradition-of-vedic-chanting-00062

जब आप संस्कृत में मंत्रोच्चार करते हैं, तो उसका आपके स्वास्थ्य पर काफ़ी गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि उन अक्षरों के वायब्रेशन यानी कंपन से आपके चक्र जागृत होते हैं और आप ऊर्जावान महसूस करते हैं।

संस्कृत वैदिक काल में महान चिंतकों और संन्यासियों व ऋषि-मुनियों द्वारा इस्तेमाल की जाती थी. संस्कृत में ऐसे बहुत-से शब्द हैं, जो आपकी मानसिक चेतना को दर्शाते हैं।

हमें जो सबसे महत्वपूर्ण शब्द मिला है वो है ॐ, जो अस्तित्व की आवाज़ है, आंतरिक चेतना है और यह दरअसल ब्रह्मांड की आवाज है।

हर मनुष्य के मूल में जो चेतना है, वह है आत्मा. यह आत्मा ब्रह्मांड से अलग नहीं है. इस तरह से संस्कृत के जरिए आप ख़ुद को, अपने ब्रह्मांड को पहचान सकते हैं।

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तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? अठारह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।

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