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“हिन्दी दिवस”: हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

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भाषाओं की दुनिया- दुनिया भर में लगभग 7,111 भाषाएं बोली जाती हैं (Ethnologue, Directory of languages)। जिसमें से 6,700 भाषाओं के गायब होने का खतरा है (United Nations’ International Year of Indigenous Languages)।  सबसे ज्यादा 2303 भाषाएं एशिया में बोली जाती हैं। उसके बाद 2140 अफ्रीका, 1058 अमेरिका, 288 यूरोप बाकि 1322 दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। इनमें बहुत सी भाषाएं पारिवारिक रूप में परस्पर सम्बद्ध हैं। ध्वनि, व्याकरण तथा शब्द समूह के तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर एवं भौगोलिक निकटता के आधार पर भाषाओं के पारिवारिक संबन्धों का निर्णय किया गया है।

इस समय संसार में मुख्यतः कुल बारह परिवार हैं–

  1. द्रविड़,
  2. चिनी-तिब्बती,
  3. जापानी-कोरियाई,
  4. सामी (सैमेंटिक),
  5. हामी (हेमेटिक),
  6. यूरील-अल्ताई,
  7. मलय पॉलीनेशी,
  8. कंकोशी,
  9. आस्ट्रिक,
  10. बांतू,
  11. अमरीकी,
  12. भारोपीय परिवार।

यह हुई भाषा परिवार की बात। किन्तु संसार में अनेकों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। एक लोकोक्ति के अनुसार चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस परबानी, मतलब पानी का स्वाद हर चौथे कोस पर कुछ हद तक परिवर्तित हो जाता है। भाषा आठवें कोस पर किसी-न-किसी रूप में बदलाव ग्रहण करती है ।

संसार की इन 7,111 भाषाओं और बोलियों में उनका वर्गीकरण कई आधारों पर किया जा सकता है, जैसे कि…

  1. महाद्वीप के आधार पर- एशियाई भाषाएं, युरोपीय भाषाएं तथा अफ्रीकी भाषाएं आदि।
  2. देश के आधार पर – जैसे चीनी भाषाएं तथा भारतीय भाषाएं आदि।
  3. धर्म के आधार पर – जैसे मुसलमानी भाषाएँ, हिन्दू भाषाएँतथा ईसाई भाषाएँ आदि ।
  4. काल के आधार पर – प्रागैतिहासिक भाषाएँ, प्राचीनभाषाएँ, मध्य युगीन भाषाएँ तथा आधुनिक भाषाएँ आदि ।
  5. भाषाओं के परिवार के आधार पर- भारोपीय भाषाएँ, एकाक्षर भाषाएँ, द्रविड़ परिवार की भाषाएँ आदि ।
  6. भाषाओं की आकृति के आधार पर – जैसे अयोगात्मक तथा योगात्मक भाषाएँ
  7. प्रभाव के आधार पर – जैसे संस्कृत प्रभावित भाषाएँ तथाफारसी प्रभावित भाषाएँ आदि।

भारतीय उपमहाद्विप में बोली जाने वाली भाषा का परिवार- छह भाषाएं- हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली, ओड़ीसी और मलयालम हैं। ये भाषाएं भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुख रूप से बोली जाती है जिसका सम्बन्ध किस भाषागत परिवार से है यह भारत से सम्बन्धित परिवार की जानकारी को ही पता लग सकता है

भारोपीय परिवार- यह भाषा के वर्गीकरण का एक परिवार है। इसपरिवार के अन्तर्गत कई भाषाओं व प्रदेशों का समावेश किया जाता है। “भारत से लेकरप्रायः पूरे यूरोप तक बोले जाने के कारण इस परिवार को ‘भारोपीय परिवार’ कहते हैं। यह परिवार एशिया में भारत, बंगलादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, यूरोप मेंरुस, रुमानिया, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड, जर्मनी आदि तथा अमेरिका, कनाड़ा, अफ्रीकाऔर ओस्ट्रेलिया के अनेक भागों में बोला जाता है। इसकी प्रमुख भाषाओं में प्राचीनसंस्कृति, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, प्राचीन फ्रांसीसी, अवेस्ता, ग्रीक, लैटिन आदि हैं। आधुनिक भाषाओं में अंग्रेजी, रुसी, जर्मनी, स्पेन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली, इतालवी, फारसी,हिन्दी, बंगला गुजराती, मराठी आदि हैं। इस प्रकार भारतीय परिवार के अन्तर्गत समाविष्ट होने वाली भारतीय प्रदेशों मेंबोली जानेवाली भाषा में हिन्दी, बंगला, गुजराती और मराठी जैसे आधुनिक भाषाओं कासमावेश होता है।

भाषा का मानव सभ्यता में क्या महत्व है, इन पंक्तियों से पता चलता है-

महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में लिखा है कि “जो वाणी वर्गों में व्यक्त होती है उसे भाषा कहते हैं”

व्यक्तां वाचि वर्णा येषां त इमे व्यक्त वाचः

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा- 

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल’।

अर्थात्- मातृभाषा की उन्नति बिना किसी भी समाज की तरक्की संभव नहीं है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना भी मुश्किल है।

मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं- 

जिसको न निज देश तथा निज भाषा का अभिमान है,

वो नर नही निरा पशु है और मृतक समान हैं।

हिन्दी भाषा का प्रारूप

भारत एक विशाल देश है इस महादेश में छोटी-बड़ी मिल कर कई सौ भाषाएं और बोलियां हैं। भारत में माना जाता रहा है कि संस्कृत सब भाषाओं की जननी है। बोद्ध लोग पालि को अपनी भाषा कहते आ रहे हैं। हालांकि भाषागत वर्गीकरण में भारोपीय परिवार के अन्तर्गत बोली जाने वाली भाषाओं का बहुत बड़ा समूह हैं। इस परिवार की भाषाएं ज्यादात्तर भारतीय भूभाग को समाविष्ट करती है। जिसमें हिन्दी भी एक भाषा है।

आधुनिक हिन्दी भाषा के पीछे एक दीर्घकालीन परम्परा है। वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत, पालि, अपभ्रंश आदि रूपों से होते हुए आज की हिन्दी बनी है। अपभ्रंश ही वास्तव में आधुनिक आर्य भाषाओं की जननी है। वैदिक संस्कृति ही सभी भाषाओं का मूलस्रोत मानी जाती है। अपनी साहित्यिक समृद्धि और प्रतिष्ठा के कारण इस भाषा ने विश्व में अमर ख्याति प्राप्त कर ली है।

भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह ‘हिंदी’ शब्द इतना व्यापक नहीं है। भाषा विज्ञानके अनुसार केवल पश्चिमी हिंदी को ही हिंदी माना जाता है जिसके अंतर्गत ब्रज,कन्नौजी, बुंदेली, बांगरू और खड़ीबोली इत्यादि आती हैं। कुछ विद्वानों के मत में पूर्वीहिंदी भी हिंदी का रूप है अतः ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली, खड़ी बोली, अबधी, बघेली,छत्तीसगढ़ी और पश्चिमी भोजपुरी इत्यादि सभी बोलियां हिंदी का ही रूप हैं।

हिंदी का विकास ‘शौरसैनी अपभ्रंश’ से माना गया है। 1000 ई. के आस-पास साहित्यिक रचनाओं में इसका प्रयोग होने लगा। ‘हेमचंद्रशब्दानुशासन’ में दिए गए उदाहरणों से ज्ञात होता है कि हिंदी में वे सभी ध्वनियांविकसित हो गई थीं जो तत्कालीन पश्चिमी अपभ्रंश में विद्यमान थीं। आरंभिक काल मेंइस पर संस्कृत का अधिक प्रभाव था परन्तु विभिन्न बोलियों और उप-भाषाओं के रूपग्रहण करके हिंदी स्वतंत्र विकास की ओर भी अग्रसर हो रही थी। अतः इस काल की हिंदी में विभिन्न बोलियों जैसे मैथिली, ब्रज, खड़ीबोली, पंजाबी, अवधी, दखणी इत्यादि का पर्याप्त मिश्रण है। पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि चन्दबरदाई द्वारा लिखा गया ‘पृथ्वीराज रासो’ संभवतया हिंदी की पहली रचना है। हालांकि हिंदी को भाषाका नाम तब तक नहीं मिल सका था। गोरखनाथ, चन्दबरदाई, नरपति नाल्ह, विद्यापति,अमीर खुसरो, ख्वाजा बंदा नेवाज इत्यादि इस काल के प्रमुख साहित्यकार थे। 12वीं सदी के अंतिम दशक में मोहम्मद गौरी भारत आया और उसने भारत में बसने कानिर्णय कर लिया। इससे देश का राजनैतिक और सांस्कृतिक जीवन प्रभावित हुआ। वहप्रशासनिक कार्य के लिए फारसी का उपयोग करता था परन्तु रोजमर्रा की जरूरतों केलिए स्थानीय भाषा की आवश्यकता थी। अतः उसके सैनिकों ने दिल्ली और आगरा केआस-पास की भाषा को सीखा और उसमें अपनी भाषा के शब्दों का भी खूब प्रयोगकिया। दिल्ली और आगरा के आस-पास की भाषा उस समय खड़ीबोली के रूप मेंविकसित हो रही थी। उन्होंने इस भाषा को हिंदी कहकर पुकारा। विदेशी आक्रमणकारियों के यहां आने से इस स्थानीय भाषा में विदेशी शब्द शामिल होने लगे। अरबी, फारसी के शब्दों का खुलकर प्रयोग होने लगा। इस काल में धार्मिक साहित्य कीअधिक रचना होने के कारण संस्कृत शब्दों की भी बहुलता है। इस काल में हिंदी कीब्रज और अवधी बोलियों में काफी साहित्य रचा गया।1800 ई. तक हिंदी भाषा के रूप में पूर्ण रूप से विकसित हो गई थी। इससे पहले हिंदी का प्रयोग केवल पद्य के लिए होता था परन्तु अब गद्य की रचना भी होनेलगी। हिंदी की बोलियां भी इतनी विकसित हो गईं कि इन्होंने उप-भाषा का रूपधारण कर लिया।

अपभ्रंश आधुनिक भाषा तथा उपभाषा है-

  • शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी (ब्रजभाषा, खड़ी बोली, बांगरु, कन्नौजी, बुंदेली), राजस्थानी (मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, जयपुरी), गुजराती
  • अर्धमागधी-पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी)
  • मागधी-बिहारी (भोजपुरी, मैथिली, मगही), बंगला, उड़िया, असमिया
  • खस-पहाड़ी हिन्दी
  • पैशाची-लहंदा, पंजाबी
  • ब्राचड़-सिन्धी
  • महाराष्ट्री-मराठी

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा का उद्भव, अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी, मागधी रूपों से हुआ है।

हिंदी शब्द का मूल आधार संस्कृत का शब्द ‘सिंधु’ है। 500 ई. के आस-पाससिंधु नदी की समीपवर्ती भूमि ईरानी शासकों के पास थी। फारसी में ‘स’ का ‘ह’ केरूप में उच्चारण होता है। अतः ईरानी लोग सिंधु को हिंदु कहकर उच्चारित करते थे।सिंधु नदी के साथ-साथ रहने वाले लोगों को वे हिंदी कहकर पुकारते थे तथा उनकीप्रत्येक वस्तु को भी वे हिंदी कहते थे। धीरे-धीरे यह शब्द संपूर्ण भारत के सभीनिवासियों चाहे वे मुस्लिम थे, फारसी थे या ईसाई थे उनके लिए प्रयुक्त होने लगा औरउनकी भाषाओं को ‘ज़बान-ए-हिंदी’ कहा गया। ईरानी सम्राट दारा के अभिलेखों मेंसर्वत्र भारत के लिए ‘हिंदू’ शब्द आया है।

भारतीय मूल भाषा से विकसित आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं में सर्वोपरि स्थान हिंदी भाषा का है– हिंदी भाषा का साहित्य समृद्धशाली है, व्यापक है। हिंदी का विकास भी अन्य प्रादेशित भाषाओं के साथ-साथ हुआ है। भारतवर्ष की राजधानी. ‘देहली’ है, जिसे लोग ‘दिल्ली’ कहते हैं। इसके उत्तर में ‘कुरू जनपद’ है, जो मेरठ संभाग का नेतृत्व करता है। यहां की भाषा ‘कौरवी’ या ‘मेरठी’ का नाम ‘खड़ीबोली’ है। कौरवी भाषा की दो धाराएं हैं– एक ही भाषा की दो धाराएं है– इन्हें एक ही भाषा की दो प्रमुख बोलियां कहेंगे 1) खड़ी बोली- मेरठी और 2) बांगरूं या हरियाणवी। दिल्ली से लेकर देहरादून तक का प्रदेश ‘कुरू जनपद’ है और दिल्ली से अम्बाला तक तथा सहारनपुर से अम्बाला तक बांगर का क्षेत्र आता है।

इस सन्दर्भ में विद्वानों का मन्तव्य रहा है -“कौरवी के ये दो रूप ऐसे हैं, जैसे राजस्थानी के जयपुरी और जोधपुरी। ‘खडी बोली’ मेरठी है। इस ‘खेड़ी बोली’ का ही एक साहित्यिक रूप ‘उर्दू’ है और दूसरा है ‘हिन्दी’। दक्षिण की ‘दक्खिनी’ की प्रकृति ‘बाँगरू’ जान पड़ती है। उर्दू पर विदेशी प्रभाव (खड़ी बोली हिंदी में अरबी-फारसी के मेल से जो भाषा बनी वह ‘उर्दू’ कहलाई) है; हिन्दी पर राष्ट्रीय। दिल्ली हिन्दी का केन्द्र है घर है और सब भाषाओं की यह ‘देहली’ है।”

हिन्दी भाषा के दो रूप हैं- (1) पश्चिमी हिन्दी (2) पूर्वी हिन्दी। इन दोनों रूपों का उद्भव स्थान शौरसेनी, अर्धमागधी और मागधी अपभ्रंश भाषाएं हैं। हिन्दी का क्षेत्रीय विस्तार अन्य भाषाओं के क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। इसकी पश्चिमी सीमा पंजाब में है और दक्षिणी सीमा मध्य प्रदेश के दक्षिण में है और हिन्दी की छत्तीसगढ़ी बोली मराठी के सीमा प्रांत भाग में बोली जाती है। दूसरी हिन्दी आर्य भाषाओं की मध्यवर्ती भाषा है। यह मध्यप्रदेश की भाषा सदैव से राष्ट्र भाषा के पद पर आसीन रही है। संस्कृत शौरसेनी और हिन्दी ने मध्यप्रदेशीय भाषाओं में विकसित होकर राष्ट्रभाषा जैसी महत्वपूर्ण पदवी को अलंकृत किया। हिन्दी तथा अन्य प्रांतीय भाषाओं का मूल स्रोत एक ही है परंतु स्थान-भेद तथा परिस्थिति वश उनमें अंतर बहुत हो गया है।

हिन्दी भाषा का महत्व सर्वाधिक है। इसके दो कारण हैं- पहला इसका देश की मध्यस्थ भाषा का होना तथा दूसरा देश के अधिकांश भाग में इसका प्रचलित होना।

हिन्दी को अपना नाम शब्द हिन्दू से मिला- एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया।

  • भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की’स’ ध्वनि ईरानी भाषाओं की ‘ह’ ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में ‘स’ को ‘ह’ उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। ईरान में मौजूद ई.पू. पांचवीं-छठी शताब्दी के शिलालेखों में इसका उल्लेख मिलता है।
  • दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को’इन्तु’ या ‘हिंदू’ कहने लगे। और इनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी कहलाई।
  • यूनानी ‘इंदिका’ या अंग्रेजी ‘इंडिया’ आदि इस ‘हिन्दी’ के ही विकसित रूप हैं। ‘हिन्दी’ भी ‘हिन्दीक’ का परिवर्तितरूप है और इसका अर्थ है ‘हिन्दका’ । इस प्रकार यह विशेषण है किन्तु भाषा के अर्थमें संज्ञा हो गया है।

‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग आज मुख्य रूप से तीन अर्थों में होता है-

(1) ‘हिन्दी’ शब्द अपने विस्तृत अर्थ में हिन्दी प्रदेश में बोले जानेवली 17 बोलियों का द्योतक हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में होता है जहाँ ब्रज, अवधी, डिंगल, मैथिली, खड़ी बोली आदि सभी में लिखित साहित्य का विवेचन किया जाता है। वस्तुतः उर्दू और दक्खिनी साहित्य मिलाकर 17 बोलियां मानी जाती है।

(2) भाषाविज्ञान में प्रायः “पश्चिमी हिन्दी” और “पूर्वी हिन्दी” को ही हिन्दी मानते हैं । ग्रियर्सन ने इसी आधार पर हिन्दी प्रदेश की अन्य उपभाषाओं को राजस्थानी, पहाड़ी,बिहारी कहा था जिनमें ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग नहीं है किन्तु अन्य दो को हिन्दी माननेके कारण “पूर्वी हिन्दी” और “पश्चिमी हिन्दी’ नाम दिया था । इस प्रकार इस अर्थ में ‘हिन्दी’ आठ बोलियाँ – ब्रज, खड़ीबोली, बुन्देली, हरियाणी, कनोजी, मगही, बघेली, छत्तीसगढ़ी – का सामूहिक नाम है।

(3) ‘हिन्दी’ शब्द का संकुचित अर्थ है खड़ीबोली साहित्यिक हिन्दी, जो आज हिन्दीप्रदेशों की सरकारी भाषा है। पूरे भारत की राजभाषा, समाचारपत्रों, फिल्मों में जिसकाप्रयोग होता है तथा जो हिन्दी-प्रदेश के शिक्षा का माध्यम है और वह ‘परिनिष्ठि हिन्दी’या ‘मानक हिन्दी’ आदि नामों से सम्मानित होती है।

हिन्दी भाषी प्रदेश केवल पश्चिमी और पूर्वी हिन्दी प्रदेश ही नहीं मानना चाहिए वरन् उनका विस्तार विधान के अनुसार मानना चाहिए।

पूर्वी भारत की

  • असमी
  • बंगाली
  • उड़िया

दक्षिणी भारत की

  • मराठी
  • तेलुगू
  • कन्नड
  • तमिल
  • मलयालम

पश्चिमी भारत की

  • गुजराती
  • पंजाबी
  • कश्मीरी

भारत के मध्यभागीय

  • हिन्दी

“हिन्दी भाषा” से तात्पर्य देवनागरी लिपि में लिखि जानेवाली साहित्यिक खड़ी बोली से है और यह भारत के इन राज्यों की राजभाषा है: (1) बिहार, (2) उत्तर प्रदेश, (3) मध्य प्रदेश, (4) राजस्थान, (5) दिल्ली, (6) हिमाचल प्रदेश, (7) पंजाब (8) हरियाणा प्रदेश।

हिन्दी प्रदेश की प्रमुख समृद्धि और साहित्यिक उपभाषाएँ निम्न प्रकार से हैं: (2) मैथिली (2) अवधी (3) व्रज (4) खड़ीबोली (5) मारवाड़ी। जो केवल बोलचाल में प्रचलित हैं :

(1) मगधी

(2) भोजपुरी

(3) बघेली

(4) छत्तीसगढ़ी

(5) कन्नोजी

(6) बुंदेली

(7) हरियानी

(8) जयपुरी हाडौती

(9) मेबाती, अहीरवाही

(10) मालबी

(11) गढ़वाली

(12) कुमायुनी

(13) पश्चिमी पहाड़ी बोलियाँ

(14) पूर्वी पहाड़ी बोलियाँ

बोलियां- पश्चिमी हिन्दी का रूप ही हिन्दी नाम से प्रयुक्त हुआ है क्योंकि यह शौरसेनी का मध्यप्रदेशीय रूप है। पूर्वी हिन्दी अर्द्धमागधी की वंशज है। हिन्दी के प्राचीन साहित्य में इसी मध्यप्रदेशीय भाषा को हिन्दी कहते हैं। इनमें- खड़ीबोली, बांगरू, व्रज, कन्नोजी,बुंदेली पश्चिमी हिन्दी की बोलियां हैं। पूर्वी हिन्दी में अवधी, बधेली और छत्तीसगढ़ी बोलियां हैं।

खड़ीबोली: पश्चिमी बुन्देलखंड, गंगा से उत्तरी दोआब तथा अम्बाला जिले की बोली है ।दिल्ली-मेरठ प्रदेश या उसके समीपवर्ती प्रांत में बोली जाती हैं । मुसलमानों के अधिकसम्पर्क के कारण ग्रामीण खड़ीबोली में अरबी-फारसी के कारण ऐसे विदेशी शब्दों कीसंख्या बोलियों के शब्दों की संख्या से अधिक हैं, पर व्यवहार में अर्द्धतत्सम और तद्भवरूपों में शब्दों की अधिक मात्रा व्यवहृत हुई है । तत्सम शब्दों के बाहुल्य से पृथक रूपउर्दू कहा जाता था । आरंभ में मिरी गंवारू बोली थीं, पर साहित्यिक रूप से क्षमानिखार और भी बढ़ा । आज यहाँ संस्कृत शब्दावली का प्राधान्य पाया जाता है । अपनेमूल में खड़ी बोली, रामपुर, रियासत, मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर,देहरादून, अंबाला, पटियाला, रियासत के पूर्वी भाग में बोली जाती हैं । इसके बोलने वालेसाठ लाख से अधिक हैं । “सरहिन्द’ इसका दूसरा नाम है ।

बांगरू: यह खड़ीबोली का उपरूप है । यह दिल्ली, कसल, रोहतक, हिसार, नाभा औरपेप्सू के कुछ गाँव में बोली जाती है । हिन्दी भाषी क्षेत्र पानीपत और कुरुक्षेत्र बांगरू कीसीमा के अन्तर्गत है । इस दृष्टि से यह पंजाबी और राजस्थानी का मिश्रित रूप है ।इसका अन्य नाम जाटू या हरियानी भी है । लोकगीत इस बोली के अधिक प्रसिद्ध हैं ।साहित्य का अभाव है । यह बोली उच्चारण में कठोर और कटु है ।

व्रजभाषा: हिन्दी के मध्यकाल में व्रजभाषा सर्वाधिक उन्नत तथा प्रौढ़ भाषा थीं । इसमें सुंदरऔर समृद्ध साहित्य के दर्शन भक्तिकाल और रीतिकाल में होते हैं । अतः विगतकाल मेंभी यह एक प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है । हिन्दी में इसका स्थान आजकल खड़ीबोलीने ले लिया है । शुद्ध रूप में अब भी यह मथुरा, आगरा, अलीगढ़ तथा धौलपुर मेंबोली जाती है । बुलन्द शहर और बरेली की तरह इसमें खड़ीबोली एटा और मैनपुरी कीओर कनौजीपन तथा गुडगाँव, भरतपुर, करौली तथा ग्वालियर के पश्चिमोत्तर भाग मेंबुन्देली तथा राजस्थानी की झलक मिलती है । इस बोली के बोलने वालों की संख्या 60 लाख से भी अधिक की हैं ।

कन्नोजी: वास्तव में यह व्रजभाषा का एक उपरूप है । इसमें ग्रामीणता का आभास अधिक है । इस बोली का क्षेत्र व्रज और अवध का मध्यगत विस्तार हैं । इसका केन्द्र फरुखाबाद है । उत्तर में हरदोई, शाहजहाँ और पीलीपीत तक और दक्षिण में इटावा तथा कानपुर इसका क्षेत्र हैं । इस भूभाग के कवियों की साहित्यिक भाषा व्रज की रही, अतः इस बोली में साहित्यिक रचना नहीं पाई गई हैं ।

बुन्देली: बुन्देली और व्रज भाषा में पर्याप्त साम्य है, केवल दोनों के प्रादेशिक रूपो में अन्तर है । यह बुन्देल खंड़ की बोली है । इसका विस्तार झांसी, हमीरपुर, जालौन, ग्वालियर, भोपाल, ओरछा, सागर, सिवनी तथा होशंगाबाद तक है। मध्यमाल में बुंदेलखंड साहित्यिक रचना का केन्द्र रहा है पर यहाँ के स्थानीय कवियों ने बुन्देली से प्रभावित व्रजभाषा में कविता की है । अतः थोड़ा-सा साहित्य उपलब्ध है । इसके बोलने वालों की संख्या ८० लाख हैं।

अवधी: समस्त अवध ही इस बोली का क्षेत्र रहा है । यह लखनऊ उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, खीरी, फैजाबाद, बतराइच, प्रतापढ़, बाराबकी तथा सुल्तानपुर में शुद्ध रूप में बोली जाती है । इलाहाबाद, कानपुर तथा मिर्जापुर में थोड़े बहुत अंतर से अवधी बोली जाती है । बिहार के मुसलमान भी बोलचाल में इसी भाषा का प्रयोग करते हैं । तुलसीदास का प्रसिद्ध ग्रंथ “रामचरितमानस” इसी भाषा में लिखा गया है जिस पर संस्कृत साहित्य का विशेष प्रभाव है । जायसी के ‘पद्मावत’ की भाषा भी शुद्ध रूप से अवधी है । ब्रजभाषा के सम्मुख अवधी अधिक दिन नहीं टीक सकी । इसके बोलने वालों की संख्या लगभग २ करोड़ है ।

बधेली: अवधी का ही उपरूप है । अवधी से पृथक इसका कोई अन्य रूप नहीं कहा जा सकता है । अवधी के दक्षिण इसका क्षेत्र रहा है । रेवा राज्य इसका मुख्य क्षेत्र रहा । राज्याश्रित कवि अवधी को ही साहित्यिक भाषा मानकर उसीमें कविता किया करते थे । जबलपुर, मांडला तथा बालघाट के जिलों में मध्यप्रांत के दमोह तक फैली है । बोलने वालों की संख्या पचास लाख से अधिक है ।

छत्तीसगढ़ी: यह ग्रामीण बोली है । इसमें साहित्य का सर्वदा अभाव है । कुछ किताबें ही उपलब्ध है । यह मध्यप्रांत में रामपुर और विलासपुर के जिलों तक तथा कांकेर, नन्दगाँव, रायगढ़, केरिया, सरगुजा, उदयपुर आदि राज्यों में विभिन्न रूपों में प्रचलित है । इसको लहरिया या खल्वाही भी कहते हैं । इसके बोलने वालों की संख्या लगभग चालीस लाख से अधिक है।

भोजपुरी: प्राचीन काशी जनपद की बोली है । मिर्जापुर, जानपुर, गाजीपर, गोरखपुर, आजमगढ़, शाहबाद में बोली जाती है । भोजपुरी हिन्दी के अधिक निकट है । इस पर बिहारी भाषा का भी प्रभाव है, पर कोई विकसित साहित्य नहीं है । काशी संस्कृत के साथ हिन्दी का केन्द्र भी रहा है और यहाँ के कवियों ने हिन्दी साहित्य की यथेष्ट समृद्धि की है। इन भाषाओं और बोलियों के अतिरिक्त राजस्थानी और बिहारी को भी हिन्दी से निकट का संपर्क है और विभिन्न बोलियों में विषमता का मुख्य कारण उच्चारण भेद है ।

कुछ बोलियों के उच्चारण में ग्रामीणता की स्पष्ट झलक मिलती है । बांगरूँ और बधेली अधिक कर्णकटु और लट्ठामार है ।

हिन्दी की संवैधानिक स्थिति

हमारे देश का संविधान 2 वर्ष, 11 माह तथा 18 दिन की अवधि में निर्मित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व देश में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बनाये जाने की सर्वाधिक मांग की जाती रही थी।

  • संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को दृष्टिगत रखते हुए संविधान सभा ने 14/9/1949 को हिन्दी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए राजभाषा हिन्दी के संबंध में प्रावधान किए।
  • संविधान के भाग 5 एवं 6 के क्रमश: अनुच्छेद 120 तथा 210 में तथा भाग 17 के अनुचछेद 343, 344, 345, 346, 347, 348, 349, 350 तथा 351 में राजभाषा हिन्दी के संबंध में निम्न प्रावधान किये गए हैं। इन प्रावधानों के साथ ही संप्रति भारत की 22 भाषाओं को संविधान की अनुसूची-8 में मान्यता दी गई है। ये भाषाएँ इस प्रकार हैं-
  • हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, कश्मीरी, संस्कृत, असमिया, ओड़िया, बांगला, गुजराती, मराठी, सिंधी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मणिपुरी, कोंकणी, नेपाली, संथाली, मैथिली, बोड़ो ता डोगरी।
  • सन 1967 में 21वें संविधान संशोधन द्वारा सिंधी भाषा 8वीं अनुसूची में जोड़ी गई थी। सन 1992 में 71वें संविधान संशोधन द्वारा कोंकणी, नेपाली तथा मणिपुरी भाषाएँ 8वीं अनुसूची में जोड़ी गई थीं। सन 2003 में 92वें संविधान संशोधन द्वारा संथाली, मैथिली, बोडो तथा डोगरी भाषाएँ 8वीं अनुसूची में जोड़ी गई थीं।

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Source: https://censusindia.gov.in/2011Census/Language-2011/Statement-1.pdf

देश में हिन्दी बोलने वालों की संख्या

  • देश में हिन्दी बोलने वाले लोगों की सबसे ज्यादा संख्या है। कुल 52.83 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं, जिनमें उससे जुड़ी अन्य बोलियां भी शामिल हैं, जैसे हरियाणवी, भोजुपरी, अवधी, ब्रज बोली शामिल हैं।
  • 2001 से 2011 के दौरान देश में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या में 25 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2001 में 41.03% लोगों ने हिंदी को मातृभाषा बताया था जबकि 2011 में इसकी संख्या बढ़कर 43.63% हो गई है. अंग्रेजी और मंदारिन के बाद हिंदी दुनिया में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है.
  • वर्तमान में, भारत में 52,83,47,193 हिंदी वक्ताएं हैं. यह उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली समेत देश के लगभग सभी राज्यों में बोली जाती है.

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Source: https://www.mha.gov.in/MHA1/Par2017/pdfs/par2021-pdfs/LS23032021/4371.pdf

हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह राजभाषा क्यों बनाया गया…राष्ट्रभाषा और राजभाषा में क्या है अंतर

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हिन्दी को राजभाषा बनने से पूर्व कई स्तरों और अवरोधों से गुजरना पड़ा…

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राजभाषा के रूप में हिन्दी एवं हिन्दुस्तानी का विवाद तो था ही, संविधान सभा में इस समस्या का विस्तृत रूप सामने आया। हिन्दीको राजभाषा का पद प्राप्त करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हिन्दीको अपने क्षेत्र में हिन्दुस्तानी का विरोध सहना पड़ा साथ ही दक्षिण भारत के नेताओंके अंग्रेजी समर्थन का भी सामना करना पड़ा।

पक्ष में- संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी का बहुमत था और इसमें हिन्दी समर्थक मुख्यनेता पुरूषोत्तम दास टण्डन, सेठ गोविन्द दास, सम्पूर्णानन्द, रविशंकर शुक्ला एवं के.एममुन्शी थे। ये सभी नेता हिन्दी सेवी संस्थाओं से सम्बन्धित थे तथा उत्तर भारत के रहनेवाले थे। पुरूषोत्तम दास टण्डन राष्ट्रीय स्तर के नेता थे एवं 1948 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे जो बहुत कम मतों से पराजित हुए थे। सेठ गोविन्द दास मध्य प्रदेश के निवासी थे एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन के जाने-पहचानेनेता थे एवं हिन्दी के सच्चे प्रहरी तथा हिन्दू दर्शन के समर्थक के रूप में विख्यातथे। हिन्दी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अहिन्दी भाषी प्रदेशों के बहुत से नेता हिन्दीके पक्ष में थे मैसूर के एस.वी. कृष्णमूर्ति ने 9 नवबम्बर, 1948 को संविधान सभाकी बैठक में घोषणा की थी कि – हमे देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी ही राजभाषा के रूप में मान्य है।

विपक्ष में- दूसरी ओर अंग्रेजी समर्थकों का विरोध उत्तर व दक्षिण में बंटकरउत्तर भारत से सम्बन्ध विच्छेद तक उमड़ कर आया। टी.टी. कृष्णमचारी ने जोरदार शब्दों में हिन्दी का विरोध करते हुए शक्तिशाली केन्द्र के नाम पर दक्षिण के ऊपरहिन्दी के साम्राज्य की स्थापना का आरोप लगाया।  बंगाल के आर.के. चौधरी ने अंग्रेजी को भारतीय राष्ट्रीयता के विकास का आधारबताया। अलगूराय शास्त्री, चेन्हा रेड्डी, आर.आर. दिवाकर पोकर साहब, रामनाथगोयनका आदि ने अंग्रेजी के समर्थन में अपने विचार स्पष्ट किए तथा अंग्रेजी कोराजभाषा बनाए जाने की वकालत की।4 18 मई 1949 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसादने अपने भाषण में बताया कि हिन्दी, हिन्दुस्तानी या उर्दू में संविधान का प्रारूप, सदस्योंके एक बड़े समूह को मान्य नहीं है तथा समिति, संविधान का अनुवाद नहीं कर पा रही है।

जब भड़का था हिंदी विरोधी आंदोलन

हिंदी विरोध तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था.

  • तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी. लेकिन साल 1965 में दूसरी बार जब हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश की गई तो एक बार फिर से ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में पारा चढ़ गया था.
  • डीएमके नेता डोराई मुरुगन उन पहले लोगों में से थे, जिन्हें तब के मद्रास शहर के पचाइअप्पन कॉलेज से गिरफ़्तार किया गया था. मुरुगन बताते हैं, “हमारे नेता सीएन अन्नादुराई 26 जनवरी को सभी घरों की छत पर काला झंडा देखना चाहते थे. चूंकि इसी दिन गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम भी थे, इसलिए उन्होंने तारीख बदलकर 25 जनवरी कर दी थी.”

राज्यों का विरोध मुरुगन ने बताया, “राज्य भर में हज़ारों लोग गिरफ़्तार किए गए थे लेकिन मदुरई में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को ज़िंदा जला दिया गया. 25 जनवरी की उस तारीख को ‘बलिदान दिवस’ का नाम दिया गया.”

  • ये विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें तकरीबन दो हफ्ते तक चलीं और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 70 लोगों की जानें गईं. सेज़ियान कहते हैं, “यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिंदी थोपे जाने के ख़िलाफ़ थे. दक्षिण के सभी राज्य भी इसके विरोध में थे. विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे.” विरोध प्रदर्शनों के नतीजतन उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा.

6 तथा 7 अगस्त 1949 को राष्ट्रभाषा व्यवस्था परिषद का एक सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ। उसमें अनेक अहिन्दी भाषी नेताओं ने हिन्दी का खुला समर्थन किया तथा पर्याप्त विचार-विमर्श केबाद सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दीको ही देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाये। परिषद के इस फैसले कासंविधान सभा पर गहरा असर पड़ा।

अगस्त 1949 में ही राजस्थान तथा मध्य प्रान्त की सरकारों ने भी हिन्दी काखुलेआम समर्थन किया। देश की अनेक साहित्यिक तथा सामाजिक संस्थाए पहले सेही हिन्दी के लिए कटिबद्ध थी। अतः संविधान सभा में 11, 12, 13 तथा 14 सितंबर 1949 को इस प्रश्न पर काफी वाद विवाद हुआ सभा के सामने कई विकल्प रखे गये।पुरूषोत्तम दास टण्डन, सेठ गोविन्द दास, डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि ने हिन्दी तथा नागरीके समर्थन में पूरा जोर लगाया अन्ततोगत्वा पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद अन्तर्राष्ट्रीयअंकों के रोमन रूप और देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा के रूप मेंस्वीकार कर लिया गया।

फिर भी विवाद सुलझा नहीं, हिन्दी को लिखित रूप में राजभाषा स्वीकार करने के बावजूद संविधान सभा द्वारा ही 15 वर्षों के लिए फिर से अंग्रेजी को बैठा दिया गया।

संविधान का राजभाषा सम्बन्धी अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार संविधान की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोगहोने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा।

(2) खण्ड (1) से किसी बात के होते हुए भी इस संविधान के प्रारम्भ से पन्द्रह वर्षों की अवधि के लिए संघ के उन सभी राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजीभाषा का प्रयोग की जाती रहेगी, जिनके लिए ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले यह प्रयोगकी जाती थी।

परन्तु राष्ट्रपति उक्त कार्यवधि में, आदेश द्वारा संघ के राजकीय प्रयोजनों में सेकिसी के लिए अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ हिन्दी भाषा का तथा भारतीय अंकों केअन्तर्राष्ट्रीय रूप के साथ-साथ देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।

26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, तदनुसार 26 जनवरी, 1965 से हिन्दी को पूरी तरह से राजभाषा के रूप में लागू हो जाना था। उसी को ध्यान में रखकर भारत की संसद ने 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया, हालांकि परिस्थितिजन्य कारकों के चलते 1967 में उसमें कतिपय संशोधन करने पड़े। उसी अधिनियम के प्रावधानों के तहत राजभाषा नियम(1976) बने तथा संसदीय राजभाषा समिति आदि का गठन हुआ

राजभाषा अधिनियम, 1976

इस अधिनियम के अन्तर्गत हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करने केलिए कुछ प्रभावी कदम उठाए गये हैं। इस अधिनियम के कुछमुख्य प्रावधान इस प्रकार है… भारत संघ के राज्य तीन वर्गों में विभक्त किये गए हैं :–

क. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश और संघ क्षेत्र दिल्ली (ये सभी हिन्दी भाषी क्षेत्र हैं)।

ख. इस श्रेणी में पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, चण्डीगढ़,अण्डमान-निकोबार को रखा गया है।

ग. शेष सभी प्रदेश एवं संघ शसित क्षेत्र ‘ग’ श्रेणी में रखे गए

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इस वर्गीकरण के बाद यह निर्देश दिया गया है :

  1. केन्द्रीय कार्यालयों से ‘क’ श्रेणी के राज्यों को भेजे जाने वालेसभी पत्र हिन्दी में देवनागरी लिपि में भेजे जायेंगे। यदि कोईपत्र अंग्रेजी में भेजा जाता है, तो हिन्दी में अनुवाद भी अवश्यभेजा जायेगा।
  2. ‘ख’ श्रेणी के राज्यों से पत्र-व्यवहार हिन्दी-अंग्रेजी दोनोंभाषाओं में किया जा सकता है।
  3. ‘ग’ श्रेणी के राज्यों से पत्र-व्यवहार अंग्रेजी में किया जाएगा
  4. केन्द्रीय कार्यालयों में हिन्दी में आगत पत्रों का उत्तर अनिवार्यतःहिन्दी में दिया जाएगा।
  5. केन्द्र सरकार के कार्यालयों में सभी प्रपत्र, रजिस्टर, हिन्दी,अंग्रेजी दोनों में होंगे।
  6. केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणी लिखसकेंगे।
  7. प्रत्येक कार्यालय के प्रधान का यह दायित्व होगा कि वह राजभाषा अधिनियमों एवं उपबन्धों का समुचित अनुपालन कराये।

हिन्दी भाषा से जुड़ी रोचक जानकारियां

  • 2011 की जनगणना के मुताबिक 52.83 करोड़ से भी अधिक लोगों द्वारा हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जाता है और भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है।
  • सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, त्रिनिदाद, टोबागो और नेपाल में भी हिन्दी भाषा का ज्यादा प्रयोग किया जाता है।
  • संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर 1949 को हिन्दी भाषा को शासकीय भाषा के तौर पर स्वीकार किया गया, इसके लिए संविधान के भाग17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक प्रावधान किए गए। अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी। जिसके बाद से ही प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा
  • 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी सहित 14 भाषाओं को आठवें शेड्यूल में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया। संविधान के मुताबिक 26 जनवरी 1965 (पीएम लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल) में हिन्दी को अंग्रेजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिन्दी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था।
  • पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को (नागपुर में) आयोजित हुआ था, इसीलिए अब प्रतिवर्ष 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाने की परम्परा भी चल पड़ी है।
  • शुरुआती हिन्दी का कोई मानक स्वरुप स्पष्ट न होने पर भी वर्ष 769 में दोहाकोश के रचियता सिद्धकवि‘सरहद’ को प्रथम हिन्दी कवि और वर्ष 933 में ‘देवनासा’ द्वारा लिखी गई ‘सर्वाक्षर’ नामक पुस्तक को हिन्दी की पहली गधरचना माना जाता है।  हालांकि इनकी भाषा आधुनिक हिन्दी की बजाय अपभ्रंश से ज्यादा मिलती थी और लिपि भी आधुनिक देवनागरी के बदले गुप्तकाल में विकसित सिद्धमात्रिक लिपि थी, फिर भी इन्हें अपभ्रंश के नही बल्कि हिन्दी के कवि और काव्य माना जाता है।
  • 14वीं शताब्दी में अमीर खुसरो की पहेलियों और मुकरियों के माध्यम से आधुनिक हिन्दी का एक नया रुप प्रकट हुआ। इस दौर की भाषा की‘हिन्दवी’ कहा गया, जिसे सही मायनों में हिन्दी की पूर्वज माना जा सकता है। अमीर खुसरो की शब्दावली में अरबी और फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए- ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ। इस कविता की शब्दावली में हिन्दी खड़ी बोली का बीजांकुर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। बाद में भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि ने हिन्दी के उन्नयन, उत्थान और परिष्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इसी समय लगभग सारे भारतवर्ष में फैली भक्तिलहर ने हिन्दी का एक नया रुप प्रस्तुत किया । निर्गुण भक्ति शाखा के रामानन्द और कबीर जैसे कवियों की खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा से लेकर सगुण भक्ति शाखा के तुलसी औऱ सूरदास जैसे कवियों की अवधी,ब्रज और संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली में की गई कालजयी रचनाओं तक; हिन्दी ने एख निर्नायक सफर तय किया । इसकी बिलकुल साफ तस्वीर‘अष्टछाप’ के कवियों की रचनाओं में झलकती है जिनहें ब्रज और अवधि भाषाओं की प्रतिनिधि रचनाएं माना जाता है । 1623 में जटमल ने खड़ी बोली की पहली पुस्तक ‘गोरा बादल की कथा’ लिखी
  • भारत और अंग्रेजी शासन की स्थापना के बाद शिक्षा,प्रशासन और साहित्य में हिन्दी का योगदान बढ़ा। छापेखाने के आविष्कार से हिन्दी भाषा और लिपि के स्वरुप निर्धारण में मदद मिली।
  • वर्ष 1805 में फोर्टविलियम कॉलेज कलकत्ता से श्री लल्लूलाल की पुस्तक‘प्रेमसागर’ का प्रकाशन हुआ। लल्लूलाल द्वारा लिखित श्रीकृष्ण पर आधारित किताब प्रेम सागर को हिन्दी में लिखी गई पहली किताब माना जाता है।
  • कलकत्ता से ही 1926 में प्रथम हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका उदंत मार्तण्ड का प्रकाशन आरंभ हुआ। 1934 में यहीं से पहले हिन्दी दैनिक अखबार‘समाचार सुधावर्षण’ का प्रकाशन आरंभ हुआ ।
  • वर्ष 1913 में हिन्दी सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित पहली हिन्दी फिल्म‘राजा हरिशचन्द्र’ प्रदर्शित हुई । हालांकि यह मूक फिल्म थी; पर इसे हिन्दी की पहली फिल्म के रुप में मान्याता दी गई । इसके 18 वर्ष पश्चात वर्ष 1931 में हिन्दी की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ प्रदर्शित हुई।
  • हिन्दी शब्द‘हरि’ एक ऐसा शब्द है जिसके दर्जन से भी ज्यादा मतलब होते हैं जैसे यमराज, पवन, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, विष्णु, सिंह, किरण, घोड़ा, तोता, साँप, वानर और मेंढक, वायु, उपेन्द्र आदि।
  • आपको ये जानकर आश्चर्य होगा की हिन्दी साहित्य के इतिहास पर पहला लेख एक फ्रांसीसी लेखक ने लिखा था जिसका नाम ‘’ग्रासिन द तैसी’’ था।
  • 1881 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार करने वाला सबसे पहला राज्य था बिहार।
  • हिन्दी भाषा के शब्दों को टाइप करने वाला पहला टाइपराइटर बाजार में 1930 के दशक में आ गया था।
  • साल2000 में हिन्दी का पहला वेबपोर्टल अस्तित्व में आया तभी से इंटरनेट पर हिन्दी ने अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी जो अब लोगों में अपनी गहरी पकड़ बना चुकी है ।
  • वेब एड्रेस(Web Address) बनाने में दुनिया भर की 7 भाषाओं का इस्तेमाल होता है और हिन्दी उन्हीं में से एक है। वेब पते के हिन्दीकरण की माँग ने जोर पकड़ा और 2011 में अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर यानी आइसीएएनएन ने भारत सरकार की हिन्दी सहित 7 क्षेत्रीय भाषाओं में वेब पते लिखे जाने से जुड़े आवेदन को मंजूरी दी।
  • यूँ तो प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी भी विदेश में हिन्दी में सभा को सम्बोधित कर चुके हैं लेकिन भारत की ओर से सबसे पहले 1977 में उस समय के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को सम्बोधित किया था।
  • हिन्दी में सबसे ज्यादा उपयोग में लिया जाने वाला शब्द है“नमस्ते”।
  • हिन्दी भाषा में लेखनी ध्वनिप्रधान होता है, जो अंग्रेजी से बिल्कुल अलग है। इस भाषा में जो लिखा जाता है वही उच्चारण किया जाता है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं होता।
  • अंग्रेजी की रोमन लिपि में जहां कुल 26 वर्ण हैं, वहीं हिन्दी की देवनागरी लिपि में उससे दोगुने 52 वर्ण हैं, जिनमें 11 मूल स्वर वर्ण (जिनमें से’ऋ’ का उच्चारण अब स्वर जैसा नहीं होता), 33 मूल व्यंजन, 2 उत्क्षिप्त व्यंजन, 2 अयोगवाह और 4 संयुक्ताक्षर व्यंजन हैं।
  • यूनाईटेड स्टेट ऑफ अमेरिका के लगभग 45 विश्वविद्यालय सहित पूरे विश्व के लगभग 176 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई व सिखाई जाती है,  और यह कोर्स में शामिल है।
  • जंगल, कर्मा, योगा, बंगला, चीता, लूटपाट, ठग या अवतार आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका अंग्रेजी में भी इस्तेमाल होता है और इन्हें हिन्दी से ही लिया गया है।

कई विदेशी भाषा के शब्द जो हिन्दी में शामिल हुए-

  • पुर्तगाली शब्द- अचार, चाबी, संतरा, आलपिन, बाल्टी।
  • तुर्की शब्द- कैंची, चम्मच, तोप, बारूद, खंजर, चेचक, बेगम, उर्दू।
  • फ्रेंच शब्द- काजू, कारतूस, मेयर, कूपन, मीनू, सूप।
  • यूनानी शब्द- अकादमी, दाम, ग्राम, एटलस, बाइबिल, टेलिफोन।
  • अरबी शब्द औरत, अदालत, कानून, कुर्सी, लिफाफा, इज्जत, इलाज, औलाद, हिम्मत, कब्जा, दुनिया, बहस, कमाल, तहसील, आजाद, तराजू, जिला, वकील।
  • फारसी शब्द- आदमी, तनख्वाह, चश्मा, बीमार, जमीन, दवा, खून, गुब्बारा।

हिंदी दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा

वर्ल्ड लैंग्वेज डेटाबेस के 22वें संस्करण इथोनोलॉज में बताया गया है कि दुनियाभर की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने h1वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएं हैं जिनमें हिंदी तीसरे स्थान पर है. इथोनोलॉज के मुताबिक दुनियाभर में 61.5 करोड़ लोग हिंदी भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

इथोनोलॉज के मुताबिक दुनियाभर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में पहला स्थान अंग्रेजी का है और पूरी दुनिया में 113.2 करोड़ लोग इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

इसके अलावा दूसरे स्थान पर चीन में बोली जाने वाली मैंड्रेन भाषा है जिसे 111.7 करोड़ लोग बोलते हैं. चौथे नंबर पर 53.4 करोड़ लोगों के साथ स्पेनिस और पांचवें नंबर पर 28 करोड़ लोगों के साथ फ्रेंच भाषा है.

वैसे दुनिया की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं की बात करें तो उनमें 6 भारतीय भाषाएं हैं. इनमें हिंदी के बाद बंगाली भाषा का स्थान है जो लिस्ट में 26.5 करोड़ लोगों के साथ सातवें स्थान पर है.

17 करोड़ लोगों के साथ 11वें नंबर पर उर्दू का स्थान है. 9.5 करोड़ लोगों के साथ 15वें स्थान पर मराठी, 3 करोड़ के साथ 16वें नंबर पर तेलगू और 8.1 करोड़ लोगों के साथ 19वें स्थान पर तमिल भाषा आती है.

हिन्दी को लेकर भारत के महापुरुषों और महान गुरुओं के विचार

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‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल’- भारतेंदु हरिश्चंद्र

अर्थात्- मातृभाषा की उन्नति बिना किसी भी समाज की तरक्की संभव नहीं है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना भी मुश्किल है।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।

सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

जिसको न निज देश तथा निज भाषा का अभिमान है,

वो नर नही निरा पशु है और मृतक समान हैं– मैथिलीशरण गुप्त

बोली मोरी पूरबी और लखै ना कोय

मोको तो सोई लखै जो धुर पूरब का होय- कबीर

‘संस्कृत कबीरा कूप जल, भाषा बहता नीर’- कबीर

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय,

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय- रहीम

का भाषा का संस्कृत प्रेम चाहिए सांच

काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच- तुलसीदास

अर्थात्- भगवान के गुणों का गान करने के लिए भाषा या संस्कृत नहीं चाहिए। इसके लिए केवल सच्चा प्रेम ही बहुत है। जहां कंबल से काम चल जाए, वहां बढ़िया दुशाला लेने की क्या आवश्यकता?

सरल बरन भाषा सरल, सरल अर्थमय मानि,

तुलसी सरले संतजन, ताहि परी पहिचानि- तुलसीदास

अर्थात्- तुलसीदासजी कहते हैं, जो सरल भाषा और सरल हृदय के संत जन हैं, उनको इसकी पहचान हो गयी है।

भाषा बोलि न जानहिं, जिनके कुल के दास,

भाषा कवि भो मंदमति, तेहि कुल केशवदास- केशवदास

परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो अपने में अपनी भाषा में उन्नति करो.– भारतेंदु हरिश्चन्द्र

हिन्दी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है.– महर्षि स्वामी दयानन्द

मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं सह नहीं सकता. आचार्य विनोबा भावे

मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी भाषा के अध्ययन में लगावें. हम यही समझे कि हमारे प्रथम धर्मों में से एक धर्म यह भी है. आचार्य विनोबा भावे

है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। – मैथिलीशरण गुप्त

हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है, जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषा की अगली श्रेणी में समासीन हो सकती है. मैथिलीशरण गुप्त

हिन्दी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। – माखनलाल चतुर्वेदी

संस्कृत की विरासत हिन्दी को तो जन्म से ही मिली है। – राहुल सांकृत्यायन

हमारी नागरी लिपी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपी है. – राहुल सांकृत्यायन

हिन्दी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। – ग्रियर्सन

संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। – डॉ. फादर कामिल बुल्के

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। – महात्मा गाँधी

हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। – महात्मा गाँधी

हिंदुस्तान के लिए देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। – महात्मा गाँधी

हिन्दी भाषा के लिए मेरा प्रेम सब हिन्दी प्रेमी जानते हैं। – महात्मा गाँधी

हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। – महात्मा गाँधी

राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। – महात्मा गाँधी

अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। – महात्मा गाँधी

यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। – लक्ष्मण नारायण गर्दे

जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिन्दी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। – पुरुषोत्तमदास टंडन

हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। – डॉ. राजेंद्रप्रसाद

भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिए हिन्दी सबकी साझा भाषा है। – पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार

मैं मानती हूँ कि हिन्दी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। – लीलावती मुंशी

हिन्दी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। – देवी प्रसाद गुप्त

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। – अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

हिन्दी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। – बाबूराम सक्सेना

समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। – (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर

हिन्दी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। – शंकरराव कप्पीकेरी

राष्ट्रभाषा हिन्दी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। – अनंत गोपाल शेवड़े

दक्षिण की हिन्दी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। – के.सी. सारंगमठ

हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। – वी. कृष्णस्वामी अय्यर

राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिन्दी ही जोड़ सकती है। – बालकृष्ण शर्मा नवीन

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। – वाल्टर चेनिंग

हिन्दी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइए। – बेरिस कल्यएव

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से सीखें जो स्वदेश (पानी) के लिए तड़प-तड़प कर जान दे देती है। – सुभाषचंद्र बोस

यदि लिपि का बखेड़ा हट जाए तो हिन्दी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। – बृजनंदन सहाय

हिन्दुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहां कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। – सैयद अमीर अली मीर

सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिन्दी महानतम स्थान रखती है। – अमरनाथ झा

हिन्दी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं। – जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी

किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है। – गंगाप्रसाद अग्निहोत्री

जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिन्दी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। – पुरुषोत्तमदास टंडन

बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिए किसी ने हिन्दी न सीखी हो। – सकलनारायण पांडेय

संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है। – ताराचंद्र दुबे

साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा। – बिहारीलाल चौबे

देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है। – मन्नन द्विवेदी

कैसे निज सोऐ भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। – हरिऔध

हिन्दी में हम लिखें पढ़ें, हिन्दी ही बोलें। – पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी

यह जो है कुरबान खुदा का, हिन्दी करे बयान सदा का। – अज्ञात

जो सम्मान, संस्कृति और अपनापन हिंदी बोलने से आता हैं, वह अंग्रेजी में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता हैं. अज्ञात

हिंदी मेरी मां ने मुझे सिखाया हैं, इसलिए इसके प्रति प्रेम और सम्मान मेरे हृदय में अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक हैं. – अज्ञात

हिंदी है हम और हिंदी हमारी पहचान हैं. – अज्ञात

भारत के विकास में हिंदी का योगदान अति महत्वपूर्ण हैं. यदि हम भारत को विकसित देश के रूप में देखना चाहते हैं तो हिंदी के महत्व को हम सबको समझना होगा. – अज्ञात

हिंदी हृदय की भाषा हैं, जिसकी वजह से हमारे शब्द हृदय से निकलते हैं और हृदय तक पहुंचते हैं. – अज्ञात

क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। – डॉ. श्यामसुंदर दास

बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। – रमेशचंद्र दत्त

देश में मातृ भाषा के बदलने का परिणाम यह होता है कि नागरिक का आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है। – सैयद अमीर अली मीर

दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है। – गिरींद्रमोहन मित्र

नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है। – बाबू राव विष्णु पराड़कर

अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है। – अनादिधन वंद्योपाध्याय

व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता। – अनंतराम त्रिपाठी

हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है. – कमलापति त्रिपाठी

हिन्दी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है. – सुमित्रानंदन पंत

हिन्दी देश की एकता की कड़ी है.– डॉ. जाकिर हुसैन

हिंदी का प्रचार और विकास कोई रोक नहीं सकता.- पंडित गोविंद बल्लभ पंत

हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी.- राजगोपालाचारी

हिन्दी पढ़ना और पढ़ाना हमारा कर्तव्य है. उसे हम सबको अपनाना है.– लालबहादुर शास्त्री

हिंदी आज तक देश की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई

  • हर साल देश में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। देश का आम नागरिक जानता है कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है लेकिन शायद वो यह नहीं जानता कि आज तक हिंदी को हम हमारी राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित क्यों नहीं कर पाए। हिंदी आज भी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है बल्कि राजभाषा है।
  • भारत एक ऐसा देश है जो अपनी विभिन्नताओं के लिए जाना जाता है, यहां हर राज्य की अपनी राजनैतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है लेकिन उसके बाद भी देश में की कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला था लेकिन राष्ट्रभाषा को लेकर लंबी बहसें चली और नतीजा कुछ नहीं निकला।

संविधान सभा इस मुद्दे को लेकर जोर-शोर से बहस छिड़ गई, दक्षिण भारत के लोग हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के खिलाफ थे। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी में एक जगह उल्लेखित है कि मद्रास के प्रतिनिधित्व कर रहे टीटी कृष्णामचारी ने कहा कि मैं दक्षिण भारतीय लोगों की ओर से चेतावनी देना चाहूंगा कि दक्षिण भारत में पहले ही कुछ ऐसे घटक हैं जो बंटवारे के पक्ष में हैं।

अगर यूपी के दोस्त हिंदी साम्राज्यवाद की बात करे हमारी समस्या और ना बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि मेरे यूपी के मेरे दोस्त पहले यह तय कर लें कि उन्हें अखंड भारत चाहिए या हिंदी भारत। लंबी बहस के बाद सभा इस फैसले पर पहुंची कि भारत की राजभाषा हिंदी (देवनागिरी लिपि) होगी लेकिन संविधान लागू होने के 15 साल बाद यानि 1965 तक सभी राजकाज के काम अंग्रेजी भाषा में किए जाएंगे। 

हालांकि हिंदी समर्थक नेता बालकृष्णन और शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन ने अंग्रेजी का विरोध किया। 1965 में राष्ट्रभाषा पर फैसला लेना था, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का फैसला तय कर लिया था लेकिन इसके बाद तमिलनाडु में हिंसक प्रदर्शन हुए। 

प्रदर्शन के दौरान दक्षिण भारत के कई इलाकों में हिंदी की किताबें जलने लगीं, कई लोगों ने तमिल भाषा के लिए अपनी जान तक दे दी, जिसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने अपने फैसले पर नर्मी दिखाई और एलान किया है राज्य अपने यहां होने वाले सरकारी कामकाज के लिए कोई भी भाषा चुन सकता है। कांग्रेस के फैसले में कहा गया कि केंद्रीय स्तर पर हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं का इस्तेमाल किया जाएगा और इस तरह हिंदी कड़े विरोध के बाद देश की सिर्फ राजभाषा बनकर ही रह गई, राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई।

बढ़ चुकी थी क्षेत्रीय भाषाओं के पहचान पाने की चिंता

1971 के बाद, भारत की भाषाई पॉलिसी का सारा ध्यान क्षेत्रीय भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने पर रहा. जिसका मतलब था कि ये भाषाएं भी ऑफिशियल लैंग्वेज कमीशन में जगह पाएंगी और उस स्टेट की भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाएंगी. यह कदम बहुभाषाई जनता का भाषा को लेकर गुस्सा कम करने के लिए उठाया गया था. आजादी के वक्त इसमें 14 भाषाएं थीं, जो 2007 तक बढ़कर 22 हो गई थीं.

देश के 28 में से 19 राज्य हैं गैर हिंदी-भाषी

इसके अलावा भारत के दक्षिण में केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक. पश्चिम में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात. भारत के उत्तर-पश्चिम में पंजाब. पूर्व में ओडिशा और पश्चिम बंगाल. उत्तरपूर्व में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर, मेघालय और असम. ये इस देश के 28 में से 19 राज्य हैं जिनमें हिंदीभाषी बहुत कम हैं. ऐसे में हिंदी राष्ट्रभाषा हो ही नहीं सकती. जम्मू-कश्मीर जो अब केंद्र शासित प्रदेश है यह भी गैर-हिन्दी भाषी है।

इसके अलावा भारत में ही हिंदी से कहीं पुरानी भाषाएं तमिल, कन्नड़, तेलुगू, मलयालम, मराठी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी, ओड़िया, बांग्ला, नेपाली और असमिया हैं. ऐसे में एक नई भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे देना सही नहीं होगा.

गुजरात हाई कोर्ट की टिप्पणी

25 जनवरी, 2010 को दी एक टिप्पणी में गुजरात हाई कोर्ट ने कहा था, भारत की बड़ी जनसंख्या हिंदी को राष्ट्रीय भाषा मानती है. ऐसा कोई भी नियम रिकॉर्ड में नहीं है. न ही कोई ऐसा आदेश पारित किया गया है जो हिंदी के देश की राष्ट्रीय भाषा होने की घोषणा करता हो.

हिन्दी के विकास पर कुछ सर्वश्रेष्ठ लेख

संचार क्रांति के साथ आगे बढ़ती हमारी हिंदी

वर्तमान युग नि:संदेह संचार क्रांति का है | सभी क्षेत्र की प्रगति में संचार क्रांति इस तरह मिल चुकी है की अब यह उसका अभिन्न अंग बन चुकी है चाहे वह तकनीकी क्षेत्र हो, चाहे चिकित्सा , चाहे रक्षा या व्यापार अब संचार की तकनीको का प्रयोग किये बिना इन क्षेत्रो में आगे बढ़ना असंभव ही लगता है | भाषा के विकास के  क्षेत्र में भी संचार क्रांति ने अपनी भूमिका निभाई है , संचार के आधुनिकतम साधन जैसे मोबाइल या इंटरनेट (अंतरजाल) भले ही अंग्रेजी भाषा से चालू हुए हो परन्तु समय व स्थान के अनुसार इसने बाकी भाषाओ को भी जगह दी है व उन्हें समृद्ध किया है  |

हिंदी हमारी मातृभाषा है तभी तो हमें इस भाषा से एक लगाव महसूस होता है। इस लगाव ने इंटरनेट (अंतरजाल) क्रांति के युग में भी अपनी जगह बना रखी है। कहानी हो या कविता भावप्रधान तभी लगती है जब हिंदी में लिखी और पढ़ी जाये। हिंदी से अलग होना नामुमकिन है लेकिन जब कम्प्यूटर पर काम करने का समय आया तो एक बार के लिए इस भाषा पर प्रश्न चिन्ह लग गया भारत में अब जब हर छोटी-बड़ी जगह पर काम कम्प्यूटर पर होने लगे हैं तो कम्प्यूटर बनाने वाली कम्पनियाँ भी इस बात को बखूबी जानती है कि भारत में अगर अपना वर्चस्व बढ़ाना है तो हिंदी भाषा भी ऑपरेटिंग सिस्टम में होनी चाहिये। गूगल ने हिंदी के यूनिकोड फॉन्ट उपलब्ध कराये हैं। इसके साथ ही, गूगल ने ट्रांसलिट्रेशन टूल भी लॉन्च किया जिसमें इंग्लिश में टाइप किया गया हिंदी में बदल जाता है। पहले नेट किसी हिंदी अखबार या पत्रिका को पढ़ने के लिए सही लिपि के फॉन्ट का कम्प्यूटर में डाउनलोड होना आवश्यक होता था लेकिन अब रोमन लिपि में तकनीकी विकास के कारण कभी भी, कहीं भी बिना किसी विशेष फॉन्ट डाउनलोड के हिंदी को पढ़ा जा सकता है।

मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिन्दी का प्रवेश वर्ष 2005 के बाद शुरु हुआ। नोकिया के मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम सिम्बियन के कुछ संस्करणों में आंशिक हिन्दी समर्थन आया। माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज़ मोबाइल के कुछ संस्करणों में आयरॉन्स हिन्दी सपोर्ट नामक थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर के जरिये हिन्दी समर्थन आया। बाद में ऍपल के मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम आइओऍस, गूगल के मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम ऍण्ड्रॉइड तथा रिम के ब्लैकबेरी ओऍस में भी हिन्दी समर्थन उपलब्ध हुआ। वर्तमान में माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज़ फोन को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिन्दी समर्थन है। मोबाइल में हिंदी सॉफ्टवेयर की उपलब्धता ने लोगों का काम और अधिक आसान कर दिया है।

बहरहाल इंटरनेट (अंतरजाल) पर हिंदी के शुरुआती विकास के क्षेत्र में सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज) ने भी उल्लेखनीय काम किया है। शुरुआत में अंतरजाल पर हिंदी देखने के लिए जहां किसी भी फॉन्ट की इमेज (पीडीएफ) ही इस्तेमाल की जा सकती थी। जिस समय अंतरजाल पर हिंदी के लिए काम कर रहे सरकारी संस्थान टीआईडीएल (टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फॉर इंडियन लैंग्वेज)  और सी-डैक जैसे सरकारी विभाग तमाम अव्यावहारिक कोशिशें कर रहे थे, उस दौरान सीएसडीएस ने हिंदी के इस्तेमाल से संबंधित तमाम सॉफ्टवेयर बनाकर उनका मुफ्त वितरण शुरू कर दिया था।

वर्तमान में इंटरनेट (अंतरजाल) व मोबाइल के लगभग सभी काम हिंदी में किये जा सकते है | इससे भाषा के प्रचार प्रसार में बहुत मदद मिली है | अंतरजाल में तो हिंदी के आने से एक नई क्रांति का प्रारंभ हुआ है | वर्तमान में लगभग सभी समाचार हिंदी भाषा में अंतरजाल में उपलब्ध है जिसका उपयोग न केवल देश में रह रहे करोड़ो लोग उठा रहे है बल्कि विदेशो में बसे भारतीय भी हिंदी समाचार व साहित्य पढ़ कर आनंदित हो रहे हैं| हिंदी अन्य भारतीय भाषाओ की तुलना में अंतरजाल में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ी है इसका मुख्य कारण युवा पीढ़ी का इसे हाथो हाथ लेना है | नई पीढ़ी अंतरजाल में हिंदी के उपयोग को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है और ब्लॉग , सोशल मीडिया में इसे धडल्ले से उपयोग कर रही है | अंतरजाल में हिंदी के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए विश्व की जानी मानी माइक्रो ब्लॉगिंग साईट ट्विटर ने भी अपनी सेवा हिंदी में शुरू कर दी है यह हिंदी बोलने व पढने वालो के लिए गर्व की बात है | अंतरजाल ने हिंदी भाषा में लिखने वालो के हाथों को सशक्त किया है , सृजनशील व्यक्तियों को इंटरनेट (अंतरजाल) ने अपना मालिक खुद बना दिया है | पहले किसी लेखक को अपने विचार पाठको तक पहुचाने के लिए पुस्तक प्रकाशकों के कितने चक्कर लगाने पड़ते थे कइयो की रचनाये तो कभी पाठको के बीच पहुँच ही नहीं पाती थी परन्तु अंतरजाल ने उनके रास्ते की सभी बाधाओं को दूर कर उनकी राह आसान कर दी है | इससे अंतरजाल पर नए व युवा लेखको की बाढ़ सी आ गई है | जहाँ पहले अंतरजाल पर हिंदी के केवल इक्का दुक्का विषय ही मिलते थे पर अब उन विषयों का दायरा इतना बढ़ गया है की कोई सीमा नहीं रही |

एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक हिंदी बहुत जल्द इंटरनेट (अंतरजाल) पर अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा बन जाएगी। जबकि वर्तमान में हिंदी अंतरजाल पर उपयोग की जाने वाली शीर्ष 10 भाषाओ में भी नहीं है इसके बाद भी विशेषज्ञों का ऐसा सोचना हिंदी की क्षमता को ही दर्शाता है |

इंटरनेट (अंतरजाल) पर हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में ब्लॉगिंग का अहम योगदान रहा है। ब्लॉग एक ऐसा माध्यम है जो लिखने और पढने वाले को सुकून देता है। अंतरजाल पर उपलब्ध हिंदी कंटेट(सामग्री) में सबसे बड़ा योगदान हिंदी में ब्लॉग लिखने वाले ब्लॉगरों का ही है | हिंदी का सर्वप्रथम ब्लॉग लिखने का गौरव श्री आलोक कुमार जी को जाता है जिन्होंने 21 अप्रैल 2003 को पहला ब्लॉग लिखा था, इस तरह अंतरजाल में हिंदी ब्लॉगिंग के अत्यंत सफल 10 वर्ष बीत चुके है | वर्तमान में ऐसे हिंदी ब्लागों की संख्या कई लाख तक पहुँच चुकी है | अब हिंदी भाषा के ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति का एक माध्यम न होकर सामाजिक मंच बन गया है  | मौजूदा दौर में हिंदी में सामुदायिक ब्लॉगों के अलावा साहित्य, संस्कृति और सिनेमा जैसे विषयों पर कई ब्लॉग सक्रिय हैं। इन ब्लॉगों पर सामाजिक मुद्दों की भी खूब धूम रहती है।  आने वाले दस वर्ष के अंदर ब्लॉग हिंदी साहित्य के विकास का प्रतीक होगा। दुनिया की अन्य भाषाएं भी इस सर्वसुलभ माध्यम का इस्तेमाल अपनी भाषा व उसके साहित्य के विकास के लिए कर रही हैं।

जन माध्यमों में हिन्दी

संचार के माध्यम के रूप में हिन्दी का प्रयोग कोई नयी बात नहीं है, अभिव्यक्ति की क्षमता पाते ही, जन-कथा एवं पुराण कथा के रूप में हिन्दी जनसंचार का माध्यम बन गई थी। भारतीय नेता हिन्दी की शक्ति को समझते हैं, इसलिए उन्होंने जनसंचार के विभिन्न माध्यम, रंगमंच, प्रकाशन, प्रसारण, फिल्में, जनसभा संबोधन सभी में हिन्दी का व्यापक प्रयोग कर विदेशी शासन के विरुध्द सशक्त जन आंदोलन चलाया था।

ज्ञान, अनुभव, संवेदना, विचार, अभिनव परिवर्तनों की साझेदारी ही संचार है। जनसंचार, साधारण जनता के लिए होता है। इससे संदेश तीव्रतम गति से गंतव्य तक पहुंचता है। इसका रूप लिखित या मौखिक हो सकता है। इसके द्वारा जनसामान्य की प्रतिक्रिया का पता चल जाता है एवं इसका प्रभाव बहुत गहरा होता है।

हिन्दी की संप्रेषण क्षमता अतुलनीय है। संप्रेषण हमारे वातावरण के साथ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्तर पर एक प्रकार की अंत:क्रिया है। मीडिया के रूप में प्रचलन में है। प्रिन्ट मीडिया।  दूसरा है-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। आजकल हिन्दी का प्रसार वैश्विक व्यवसायीकरण के कारण निरंतर हर तरफ हो रहा है एवं संख्या बल के आधार पर हिन्दी आर्थिक एवं वाणियिक कार्यों की भाषा बनती जा रही है, विश्व-भाषा बन रही है।

प्रिंट मीडिया में समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं आती हैं। स्वतंत्रता के बाद समाज में राजनैतिक जागृति, सामाजिक, धार्मिक, आपराधिक, आर्थिक गतिविधियों एवं घटनाओं के प्रति जन सामान्य की जिज्ञासा में वृध्दि हो रही है।

सन् 2001 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में सबसे अधिक 20,589 समाचार पत्र हिन्दी (2014 में 40,159) में प्रकाशित होते हैं, जबकि अंग्रेजी में 7596 समाचार पत्र (2014 में 13,138) छपते हैं। सन् 2001 में 2057 दैनिक पत्र हिन्दी में निकलते थे।

प्रिंट मीडिया ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को हिन्दी के माध्यम से बहुत गति प्रदान की थी। स्वतंत्रता के बाद हिन्दी को राजभाषा घोषित करने के कारण हिन्दी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का निरंतर प्रसार बढ़ता जा रहा है, इनके कई संस्करण छप रहे हैं।

पत्रिकाओं ने समाज में साहित्यिक चेतना संप्रेषित की है। अधिकांश समाचार पत्रों में पृथक से साहित्यिक पृष्ठों के प्रकाश द्वारा हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में श्रेष्ठ रचनाओं का प्रकाश किया जा रहा है। विदेशों में सभी प्रमुख शहरों से हिन्दी पत्रिकाएं निरंतर छपती रहती हैं।  नई दिल्ली में अमेरिकन दूतावास द्वारा स्पेन पत्रिका एवं ब्रिटिश समीक्षा हिन्दी में भी छपती है। विदेशों में सैकड़ों पत्रिकाएं छप रही हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं इन्टरनेट पर भी हिन्दी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। हिन्दी का आजकल प्रयोजनमूलक रूप का निरंतर विकास हो रहा है। 1926 से रेडियो का भारत से प्रसारण शुरु किया गया, यह पहले गैर- सरकारी संस्था के पास था, बाद में 1930 से इसे भारत सरकार ने अपने अधीन कर लिया।

1949 से हिन्दी प्रसार के लिए अहिन्दी भाषा केन्द्रों से हिन्दी प्रशिक्षण के कार्यक्रम शुरु किए गए। अब कई केन्द्रों से हिन्दी के व्यावहारिक प्रयोग का ज्ञान बढ़ाने के लिए हिन्दी के पाठ निरंतर प्रसारित किये जाते हैं। रेडियो नाटक लेखन बीसवीं सदी में एक सशक्त साहित्य विधा के रूप में उभरा है। आकाशवाणी केन्द्रों में निरंतर हिन्दी में वार्ताएं प्रसारित की जाती हैं। कवि सम्मेलनों का भी आयोजन किया जाता है। आकाशवाणी की देश की 95 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच है। इसके विविध भारती एवं एफएम चैनल, चित्रपट संगीत द्वारा हिन्दी के प्रसार में अपूर्व योगदान कर रहे हैं।

विश्व के कई प्रमुख देशों के आकाशवाणी कंपनियां जैसे बीबीसी लंदन, वायस ऑफ अमेरिका रेडियो सिलोन, जर्मन रेडियो व अन्य केन्द्रों से हिन्दी में समाचार व हिन्दी फिल्मों के गाने वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं, इसलिए कहा जाता है कि हिन्दी का सूर्य कभी नहीं डूबता, यह विश्व भाषा बनकर रहेगी।

हिन्दुस्तान में दूरदर्शन का प्रादुर्भाव 70 के दशक से हुआ। इसे सूचना देने, ज्ञान का प्रसार करने एवं मनोरंजन का साधन मानकर बढ़ावा दिया गया। हिन्दी की साहित्यिक कृतियों में उपन्यास, नाटक, कविता, कहानी, कवि सम्मेलनों आदि के माध्यम से दूरदर्शन ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्णं योगदान दिया है। रामायण, महाभारत, कौन बनेगा करोड़पति आदि धारावाहिकों द्वारा हिन्दी घर-घर पहुंच गई है।

अंग्रेजी चैनल धीरे-धीरे विज्ञापन के लिए हिन्दी को अपना रहे हैं। विज्ञान पर आधारित कार्यक्रम, नेशनल योग्राफिक एवं डिस्कवरी भी हिन्दी में प्रसारित की जा रही है। फिल्मों के द्वारा हिन्दी की लोकप्रियता सातवें आसमान पर पहुंची है। जो हिन्दी फिल्मों के विदेशों के राईड्स हिन्दुस्तान के राईड्स से यादा राशि प्राप्त कर रहे हैं। देश कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट पर हिन्दी के ब्लाग बनाये जा रहे हैं, और इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है।इस तरह, हिन्दी जनचेतना को स्वर देने में सर्वाधिक समर्थ होकर धीरे-धीरे विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान बनाने की ओर अग्रसर हो रही है।

हिंदी के प्रसार में मीडिया की भूमिका

आज से 60 वर्ष पूर्व 14 सितंबर, 1949 को देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया गया था। इसलिए हर वर्ष 14 सितंबर का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि हिंदी दिवस पर होने वाले भव्य और ख़र्चीले आयोजनों तथा राजभाषा कानून लागू किए जाने के बावजूद हिंदी सचमुच केंद्र की राजभाषा बन गई है किंतु यह तथ्य आज सभी स्वीकार करते हैं कि हिंदी अब व्यावहारिक तौर पर इस देश की संपर्क भाषा बन चुकी है। अब तो भारत के साथ संपर्क रखने के लिए हिंदी की अनिवार्यता विदेशी सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसलिए अमरीका, चीन, यूरोप तथा अन्य प्रमुख देशों में हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था की जाने लगी है। विदेशों से बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं केंद्रीय हिंदी संस्थान, विभिन्न विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थाओं में हिंदी पढने के लिए आते हैं। वर्ष 1960 और 1970 के दशकों में दक्षिण के जिन राज्यों में हिंदी के विरूद्ध आंदोलन चले थे, अब उन राज्यों के नेता हिंदी में बोलने को आतुर दिखाई देते हैं। इसके अलाव विभिन्न विश्वविद्यालयों हिंदी विषय को लेकर बीए-एमए, करने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

उधोग और व्यापार के क्षेत्र में, जहां भारतीय भाषाओं के प्रयोग की पूर्ण उपेक्षा की जाती थी, अब हिंदी सम्मानजनक स्थान प्राप्त करती जा रही है। रेडियो, टीवी तथा पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी में विज्ञापन देने की होड़ लगी रहती है। इन तथ्यों के देखते हुए कहा जा सकता है कि हिंदी को देशव्यापी स्वीकार्यता मिल चुकी है और वह समय दूर नहीं जब हिंदी पूर्ण रूप से भारत की एकमात्र संपर्क भाषा बन जाएगी।

हम सब जानते हैं कि भारत की संपर्क भाषा और राजभाषा के रूप में हिंदी के विकास की प्रक्रिया संविधान बनने के बहुत पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही शुरू हो चुकी थी। सच तो यह है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पहल हिंदी भाषी नेताओं ने नहीं बल्कि महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, राजगोपालाचारी और सुभाषचन्द्र बोस सरीखे गैर-हिंदी भाषी लोगों की ओर से की गई। महात्मा गांधी देशभर में अपने भाषण हिंदी या हिंदुस्तानी में ही दिया करते थे। सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की तो विभिन्न राज्यों के सैनिकों को जोड़ने का काम हिंदी के माध्यम से ही किया। गांधीजी ने आज़ादी से पहले ही विभिन्न अहिंदी भाषी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी प्रचारिणी सभाएं बनाईं। इन सभाओं के माध्यम से हज़ारों हिंदीसेवी तैयार हुए जो देशभक्ति की भावना से हिंदी का प्रचार-प्रसार और शिक्षण करते थे। किंतु आज के संदर्भ में देखें तो हिंदी के प्रचार-प्रसार में सबसे अधिक योग मीडिया यानी पत्र-पत्रिकाएं और रेडियो-टेलीविज़न का रहा है।

एक समय था जब पढ़-लिखे होने का मतलब था अंग्रज़ी भाषा का ज्ञान होना। इसलिए आज़ादी के समय बड़े या तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्र अंग्रेज़ी मे ही छपते थे। किंतु शिक्षा और साक्षरता के प्रसार की दिशा मे किए गए प्रयासों के फलस्वरूप यह अवधारणा बदलने लगी तथा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अख़बार पढ़ने वाले लोगों की संख्या में इज़ाफ़ा होने लगा। यह प्रक्रिया दुतरफा चली। एक ओर जहां साक्षरता दर बढ़ने से हिंदी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने के इच्छुक लोगों की संख्या में वृद्धि हुई, वहीं हिंदी अख़बारों की प्रसार संख्या बढ़ने से हिंदी के बोलचाल और प्रयोग में बढ़ोतरी हुई। हिंदी अखबारों ने नये-नये प्रयोग किए और समाचार को औपचारिकता और स्टीरियोटाइप के घेरे से निकालकर उसे स्थानीय रंगत तथा रोचकता प्रदान की। ज़िला स्तर के विशेष संस्करण निकलने से अख़बार पढ़ना केवल उच्च शिक्षित वर्ग ही नहीं बल्कि मामूली पढ़-लिखे लोगों का भी शौक बन गया। आज हालत यह है कि आमलोगों के एकत्र होने के किसी भी स्थान पर अंग्रेज़ी अख़बार गायब हो गए हैं और ऐसे हर स्थान या केंद्र पर हिंदी अख़बार ही पढ़ने को मिलते हैं। यही बात पत्रिकाओं के बारे में भी कही जा सकती है। अंग्रेज़ी की सभी प्रमुख समाचार पत्रिकाएं अपने हिंदी संस्करण भी निकाल रहीं हैं जो काफ़ी लोकप्रिय हुई हैं। इसके अलावा हल्की-फुल्की सामाग्री देने वाली पत्रिकाओं की भरमार है और इसमें तो कुछ पत्रिकाएं लाखों की संख्या में छपती है। भले ही गंभीर विषयों पर हिंदी पत्रिकाएं कम निकलती हैं, किंतु सामान्य ज्ञान, फ़िल्म, फ़ैशन, स्वास्थ, साहित्य, पर्यटन, विज्ञान कथा-कहानियां जैसे विषयों पर बहुत अच्छी पत्रिकाएं हिंदी में निकलती हैं और खूब पढ़ी जाती हैं। बच्चों और महिलाओं की हिंदी पत्रिकाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। ज़ाहिर है कि ये सभी पत्र-पत्रिकाएं बिना शोर मचाए हिंदी भाषा को गांव-गांव तक लोकप्रिय बना रही हैं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को सर्वस्वीकार्य बनाने में रेडियो की उल्लेखनीय भूमिका रही है। आकाशवाणी ने समाचार, विचार, शिक्षा, समाजिक सरोकारों, संगीत, मनोरंजन आदि सभी स्तरों पर अपने प्रसारण के माध्यम से हिंदी को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। इसमें हिंदी फ़िल्में और फ़िल्मी गीतों का विशेष स्थान रहा है। हिंदी फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता भारत की सीमाओं को पार कर रुष, चीन और यूरोप तक जा पहुंची। आकाशवाणी की विविध भारती सेवा तथा अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत प्रसारित फ़िल्मी गानों नें हिंदी को देशभर के लोगों की ज़बान पर ला दिया। हिंदी को देशव्यापी मान्यता दिलाने में फ़िल्मों की भी महती भूमिका रही है किंतु फ़िल्मों से अधिक लोकप्रिय उनके गीत रहे हैं जिन्हें जन-जन तक पहुंचाने का काम आकाशवाणी ने किया। अब वही काम निज़ी एफएम चैनल कर रहे हैं। एफएम चैनल हल्के-फुल्के कार्यक्रमों, वाद-संवाद और हास्य- प्रहसन के ज़रिये हिंदी का प्रसार कर रहे हैं। इस समय आकाशवाणी के 225 केंद्रों और 361 ट्रांसमीटरों के साथ-साथ लगभग 400 एफएम और सामुदायिक रेडियो चैनल प्रसारण कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर चैनल हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। रेडियो प्रसारण में हिंदी के महत्व को इसी प्रकरण से समझा जा सकता है कि जब मुंबई में एफएम स्टेशनों के लाइसेंस दिए गए तो पहले आधे स्टेशन अंग्रेज़ी प्रसारण के लिए निर्धारित थे किंतु कुछ ही महीनों में वे भी हिंदी में प्रसारण करने लगे क्योंकि अंग्रज़ी श्रोता बहुत कम थे। मनोरंजन के अलावा आकाशवाणी के समाचार, खेल कार्यक्रम, प्रमुख खेल प्रतियोगिताओं का आंखों देखा हाल तथा किसानों, मजदूरों और बाल व महिला कार्यक्रमों ने हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने में बहुत बड़ा योग दिया है और आज भी दे रहे हैं।

मीडिया का सबसे मुखर, प्रभावशाली और आकर्षक माध्यम टेलीविज़न माना जाता है। टेलीविज़न श्रव्य के साथ-साथ दृश्य भी दिखाता है इसलिए यह अधिक रोचक है। भारत में अपने आरंभ से लगभग 30 वर्ष तक टेलीविज़न की प्रगति धीमी रही किंतु वर्ष 1980 और 1990 के दशक में दूरदर्शन ने राष्ट्रीय कार्यक्रम और समाचारों के प्रसारण के ज़रिये हिंदी को जनप्रिय बनाने में काफी योगदान किया। वर्ष 1990 के दशक में मनोरंजन और समाचार के निज़ी उपग्रह चैनलों के पदार्पण के उपरांत यह प्रक्रिया और तेज हो गई। रेडियो की तरह टेलीविज़न ने भी मनोरंजन कार्यक्रमों में फ़िल्मों का भरपूर उपयोग किया और फ़ीचर फ़िल्मों, वृत्तचित्रों तथा फ़िल्मों गीतों के प्रसारण से हिंदी भाषा को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के सिलसिले को आगे बढ़ाया। टेलीविज़न पर प्रसारित धारावाहिक ने दर्शकों में अपना विशेष स्थान बना लिया। सामाजिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, पारिवारिक तथा धार्मिक विषयों को लेकर बनाए गए हिंदी धारावाहिक घर-घर में देखे जाने लगे। रामायण, महाभारत हमलोग, भारत एक खोज जैसे धारावाहिक न केवल हिंदी प्रसार के वाहक बने बल्कि राष्ट्रीय एकता के सूत्र बन गए। देखते-ही-देखते टीवी कार्यक्रमों के जुड़े लोग फ़िल्मी सितारों की तरह चर्चित और विख्यात हो गए। समूचे देश में टेलीविज़न कार्यक्रमों की लोकप्रियता की बदौलत देश के अहिंदी भाषी लोग हिंदी समझने और बोलने लगे।

‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे कार्यक्रमों ने लगभग पूरे देश को बांधे रखा। हिंदी में प्रसारित ऐसे कार्यक्रमों में पूर्वोत्तर राज्यो, जम्मू-कश्मीर, और दक्षिणी राज्यों के प्रतियोगियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इस तथ्य को दृढ़ता से उजागर किया कि हिंदी की पहुंच समूचे देश में है। विभिन्न चैनलों ने अलग-अलग आयु वर्गों के लोगों के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं के सीधे प्रसारणों से भी अनेक अहिंदीभाषी राज्यों के प्रतियोगियो ने हिंदी में गीत गाकर प्रथम और द्वित्तीय स्थान प्राप्त किए। इन कार्यक्रमों में पुरस्कार के चयन में श्रोताओं द्रारा मतदान करने के नियम ने इनकी पहुंच को और विस्तृत कर दिया। टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे तरह-तरह के लाइव-शो में भाग लेने वाले लोगों को देखकर लगता ही नहीं कि हिंदी कुछ ख़ास प्रदेशों की भाषा है। हिंदी फ़िल्मों की तरह टेलीविज़न के हिंदी कार्यक्रमों ने भी भौगोलिक, भाषाई तथा सांस्कृतिक सीमाएं तोड़त दी हैं।

हिंदी समाचार भी सबसे अधिक दर्शकों द्वारा देखे-सुने जाते हैं। हालांकि इन दिनों हिंदी समाचार चैनल समाचारों के स्तरीय प्रसारण की बजाय अविश्वश्नीय और सनसनीखेज ख़बरें प्रसारित करने के लिए आलोचना झेल रहे हैं किंतु फिर भी टीआरपी के मामले में वे अंग्रेज़ी चैनलों से कहीं आगे हैं। इन आलोचनाओं के बावजूद हिंदी ख़बरिया चैनलों की संख्या लागातार बढ़ती जा रही है। जून 2009 में 22 नये चैनलों को प्रसारण की अनुमति मिली जिनमें से अधिकांश चैनल हिंदी के हैं और लगभग सभी ने ख़बरे प्रसारित करने की अनुमति मांगी है। इस समय देश से अपलिंक होने वाले चैनलों की संख्या 357 है जिनमें से 197 ख़बरिया चैनल हैं। इनमें आधे से अधिक चैनल हिंदी कार्यक्रम या समाचार प्रसारित करते हैं। विदेशों से अपलिंग होने वाले चैनलों की संख्या 60 है। इस संदर्भ में यह जानना दिलचस्प होगा कि स्टार, सोनी और ज़ी जैसे विदेशों से अपलिंक होने वाले चैनलों ने जब भारत में प्रसारण प्रारंभ किया तो उनकी योजना अंग्रेज़ी कार्यक्रम प्रसारित करने की थी, किंतु बहुत जल्दी उन्होने महसूस किया कि वे हिंदी कार्यक्रमों के जरिये ही इस देश में टिक सकते हैं और वे हिंदी चैनलों में परिवर्तित होते गए। समाचार प्रसारण में हिंदी के बढ़ते महत्व का ही प्रताप है कि रेडियो और टेलीविज़न की ख़बरों के लिए सभी विशेषज्ञ और नेता अपने साउंडबाइट, टूटी-फूटी और अंग्रेज़ी मिश्रित ही सही, हिंदी में ही देने की कोशिश करते हैं।

जब इंटरनेट ने भारत में पांव पसारने शुरू किए तो यह आशंका व्यक्त की गई थी कि कंप्यूटर के कारण देश में फिर से अंग्रेज़ी का बोलबाला हो जाएगा। किंतु यह धारणा निर्मूल साबित हुई है और आज हिंदी वेबसाइट तथा ब्लॉग न केवल धड़ल्ले से चले रहे हैं बल्कि देश के साथ-साथ विदेशों के लोग भी इन पर सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा चैटिंग कर रहे हैं। इस प्रकार इंटरनेट भी हिंदी के प्रसार में सहायक होने लगा है।

हिन्दी को लेकर कुछ लोग यह शिकायत करते हैं कि मीडिया व इंटरनेट के कारण हिंदी भाषा विकृत हो रही है और इसका मूल स्वरूप नष्ट हो रहा हैं। किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा एक बहती नदी है और जब उसका अधिक इस्तेमाल होगा तो उसके स्वरूप में कुछ-न-कुछ बदलाव अवश्य आएगा। वास्तव में यह बदलाव विकार नहीं संस्कार है। अक़सर कहा जाता है कि मीडिया में इस्तेमाल होने वाली भाषा हिंदी नहीं ‘हिंग्लिश’ है। इसी तर्क़ के आधार पर देखा जाए तो आज अंग्रेज़ी में भी हिंदी का खूब समावेश हो चुका है। अंग्रेज़ी मीडिया और विज्ञापनों में हिंदी मुहावरों, शब्दों और उक्तियों का खुलकर प्रयोग होता है। यदि मीडिया की भाषा परिनिष्ठित हिंदी ही होती तो क्या इतने अधिक अहिंदी भाषी लोग रेडियो या टीवी के कार्यक्रमों और समाचारों में अपनी बात हिंदी में रख पाते ? हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए उसमें स्वच्छंदता लाना आवश्यक है। यह ऐतिहासिक सत्य है कि जब भी कोई भाषा पुराने तटबंधो को तोड़कर नये क्षेत्र में प्रवेश करती है तो शुद्धतावादी तत्व उससे चिंतित हो जाते हैं। सच तो यह है कि हिंदी इस समय स्वीकार्यता के राजमार्ग पर सरपट दौड़ रही है और हिंदी अश्वमेध के घोड़ों को रोक पाना किसी के बस में नहीं है। मीडिया इस दौड़ को और गतिशील बना रहा है। आज का सच यह है कि जिस तरह हिंदी को अपने प्रसार के लिए मीडिया की ज़रूरत है उसी तरह मीडिया को अपने विस्तार के लिए हिंदी की आवश्यकता हैं।

भारतीय सिनेमा और हिन्दी

भारत विश्व का एक अद्भुत देश है, जहां बहुजातीय, बहुभा‍षीय, बहुनस्लीय और बहुधर्मी मानव-समुदाय परस्पर प्रेम-मिलाप और सौहार्द से मिलजुल कर रहते हुए एक गौरवशाली रा‍ष्ट्र का निर्माण करते हैं. मिली-जुली सामाजिक संस्कृति ही भारत की आन्तरिक शक्ति है. हमारी भा‍षाएं न केवल हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि वे हमारी संस्कृति की संवाहक भी है. अनेक भा‍षाएं होने के बावजूद भी हर भारतवासी, प्रत्येक भा‍षा का सम्मान करता है,जितना सम्मान वह अपनी मातृभा‍षा से करता है. सभी भा‍षाओं में हिन्दी ही एकमात्र ऎसी भा‍षा है, जो उत्तर से लेकर कश्मीर तक, सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में कामाख्या से लेकर पश्चिम में कच्छ तक बोली और समझी जाती है. यह गौरव का विषय है कि हिन्दी आज भारत की सीमा लांघकर विश्व के हर कोने तक जा पहुँची है. विश्व के करीब 192 देशों में हिन्दी न केवल पढाई जा रही है,बल्कि शान से बोली भी जा रही है. इस व्यापकता के पीछॆ अन्य कारकों के अलावा सिनेमा भी एक कारक है,जिसके माध्यम से हिन्दी विश्व में सिरमौर बन पायी है.

भारत की गौरवशाली परम्परा, उसका स्वर्णिम इतिहास और सामाजिक संस्कृति की अनुगूंज, विश्व के कोने-कोने में हिन्दी के माध्यम से प्रसारित-प्रचारित करने में भारतीय सिनेमा के योगदान को कैसे विस्मृत किया जा सकता है ?. भारत के पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरु के परामर्श को शिरोधार्य करते हुए उस दशक के जादुई करिशमा के धनी और अपने समय के सबसे बडॆ स्टार, निदेशक राजकपूर ने “श्री 420” का निर्माण किया था. उस फ़िल्म में एक गाना था “ मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशतानी, सिर पर लाल टॊपी रूसी, फ़िर भी दिल है हिन्दुस्थानी” आज भी रूस में लोग बडॆ चाव के साथ गाते-नाचते देखे जा सकते है.

सिनेमा अपनी प्रारम्भिक अवस्था से ही भारतीय समाज का आइना रहा है. भारतीय सिनेमा ने पिछले पांच-सात दशक पूर्व से ही शहरी दर्शकों के साथ-साथ सुदूर ग्रामीण अंचलों तक गहरे तक प्रभावित किया और आज भी अपना प्रभाव बनाए हुए है. टेलिविजन के आश्चर्यजनक खोज के साथ ही उसने समूचे विश्व में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया है. इसी क्रम में आज भारत के गांव-कस्बों तक के सामान्य परिवारों के बीच इसकी पहुँच हो गई है. बुद्धिबक्साकहलाए जाने वाले इस टेलीविजन के माध्यम से हिन्दी फ़िल्में तथा हिन्दी गाने धमाल मचा रहे हैं, आज हिन्दी की व्यापक लोकप्रियता और इसे संप्रेषण के माध्यम के रूप में मिली आत्म-स्वीकृति किसी संवैधानिक प्रावधान या सरकारी दवाब का परिणाम नहीं है. मनोरंजन और फ़िल्म की दुनिया ने इसे व्यापार और आर्थिक लाभ की भाषा के रूप में जिस विस्मयकारी ढंग से स्थापित किया है, वह लाजवाब है. अपने सामर्थय से जन-जन को जोडने वाली हिन्दी की स्वीकारिता जहाँ एक ओर बढी है, वही वह संचार माध्यम की भाषा के रूप में प्रयुक्त होने वाले समस्त ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक विषयों से सहज ही जुड गयी है. वह अदालतों में और प्रशासन से जुडती हुई बुद्धिजीवियों और जनता के विचारों के प्रकटीकरण और प्रसारण का आधार भी बनती है..सच्चाई का बयान कर समाज को अफ़वाहॊं से बचाती है, विकास योजनाओं के संबंध में जन शिक्षण का दायित्व भी भली-भांति निभाती है. घटनाचक्रों और समाचारों का जहाँ वह गहन विश्लेषण करती है,तथा वस्तु की प्रकृति के अनुकूल विज्ञापन की रचना करके उपभोक्ताओं कॊ उसकी अपनी भाषा में बाजार से चुनाव की सुविधा मुहैया कराती है. आज हिन्दी इन्हीं संचार माध्यमों के सहारे अपनी संप्रेषण क्षमता का बहुमुखी विकास कर रही है..

भाषा प्रचार की संस्कृति और जातीय प्रश्नों के साथ सिनेमा हमेशा से गतिमान रहा है. उसकी यह प्रक्रिया अत्यंत सहज, बोधगम्य, रोचक, संप्रेषणीय और ग्राह्य है. जब हम भारतीय सिनेमा का मूल्यांकन करते हैं तो पाते हैं कि भाषा का प्रचार-प्रसार, सहित्यिक कृतियों का फ़िल्मी रूपान्तरण, हिन्दी गीतों की लोकप्रियता, हिन्दी की अन्य उपभाषाएं/बोलियों का सिनेमा और सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में भारतीय सिनेमा का योगदान जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से हमारे सामने आते हैं. सिनेमा ने हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, कथन- बिंब धर्मिता, प्रतीकात्मकता, दृष्य विधान आदि मानकॊं कॊ गढा है. आज भारतीय सिनेमा हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर चहुं ओर पहुंचने की दिशा में अग्रसर है.

भारतीय सिनेमा के अपने शैशवकाल में जितनी भी फ़िल्में बनी उनमें भारतीय संस्कृति की महक रची-बसी होती थी. उन्नीसवीं सदी के पांचवे-छटवें दशक में अपने समय के सबसे चर्चित कलाकार साहू मोडक, मनोहर देसाई ,पृथ्वीराज, भगवान, भारतभूषण, सप्रु, रज्जन, के.एन.सिंह, गुरुदत्त, जीवन, अशोककुमार, राजकपूर, दिलीपकुमार, देवानंद, बलराज साहनी, शम्मीकपूर, शशि कपूर, गुलजार. पी.कैलाश,(हमारे गांव मुलताई के ही रहने वाले थे) आदि. महिला कलाकारॊं में सुरैया, निरूपा राय, कामिनी कौशल, मधुबाला, नरगिस, नूतन, वैजंतीमाला, सरोजादेवी, पद्मिनी, मालासिन्हा, आशा पारेख, सायरा बानू, शर्मिला टैगोर, राखी,आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. .इन कलाकारों ने अपने जानदार अभिनय के बल पर अनेकानेक पारिवारिक, राजनीतिक, ऎतिहासिक, धार्मिक फ़िल्में कीं. और इन्हें यादगार फ़िल्मीं की श्रेणी में ला खडा किया. कवि प्रदीप, कमाल अमरोही, शैलेन्द्र,आदि जैसे सिद्ध-हस्त कवियों ने देशभक्ति सहित अनेकानेक गीतों की रचनाएं की, जिसे सी,रामचन्द्र, नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, एस.डी.बर्मन, पंकज मलिक, अनिल विश्वास, रविशंकर, रोशन, के.सी.डॆ, आदि जैसे प्रख्यात संगीतकारों ने अपनी संगीतरचना के जरिए फ़िल्मों में जान फ़ूकीं, वहीं स्वरकोकिला लता मंगेशकर, आशा भोंसले, रफ़ी, किशोरकुमार, मधुबाला जैसी गायिकाओं ने अपनी खनकती आवाज से दुनिया को दिवाना बना दिया था. भले ही आज वे फ़िल्में इतिहास की वस्तु बन कर रह गई हों, लेकिन उन फ़िल्मों के नायक-नायिकाओं को आज भी याद किया जाता है और उन तमाम गानों को लोग आज भी भूले नहीं हैं. भूले-बिसरे गीत के माध्यम से आकाशवाणी आज भी इन गीतों को प्राथमिकता के आधार पर रोज प्रस्तुति दे रहा है. ये सारे कलाकार/ संगीतकार/लेखक/कवि ,जिसे आज की पीढी भले ही न जानती हो, लेकिन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उन्हें पढती और याद करती है.

हिन्दी के अलावा और भी अन्य भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनाई गई,,लेकिन हिन्दी की लोकप्रियता का ग्राफ़ इन सबसे ऊपर रहा. जिसकी प्रसिद्धि विश्व के कोने-कोने में फ़ैलती चली गई. पाकिस्तान की फ़िरकापरस्ती के चलते वहां हिन्दुस्थानी फ़िल्मों को न तो वहां दिखाया जाता है और न ही उनके गानों को सुनने दिया जाता है. दृष्य़ और श्राव दोनो पर प्रतिबंध है, बावजूद इसके लोग भारतीय सिनेमा और फ़िल्मी गानो के दिवाने बडी संख्या में देखे जा सकते हैं.

भारतीय दृष्य कला की शुरूआत स्व.श्री फ़ालकेजी ने की थी. 1870 में एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाले और मुंबई के जे.जे.स्कूल आफ़ आर्ट्स और वडौदरा के कला भवन से शिक्षा ग्रहण करने वाले फ़ालके ने लोनावाला में राजा रवि वर्मा के प्रेस से जुडने से पहले ड्राइंग, फ़ोटोग्राफ़ी, लिथोग्राफ़ी और ड्रामा का अध्ययन किया, उन्होंने जादू भी सिखा और बाद में इसे फ़िल्मकारों के लिए जरूरी शिक्षा भी बताया. जन्मजात उद्यमी होने के नाते उन्होंने जल्द ही छपाई और नक्काशी का छापाखाना खोला और क्रोमोलिथोग्राफ़ और चित्रमय बुकलेट प्रकाशित की जो कि उनकी शुरुवाती मिथकीय फ़िल्मों के आधार बने.

फ़िल्मी निर्माण का अध्ययन करने के बाद फ़ालके उपकरण खरीदने और फ़िल्म निर्माण से रू-ब-रू होने के लिए इंगलैंड गए थे. मुंबई लौटने के बाद उन्होंने अपनी फ़ालके फ़िल्म कंपनी शुरू की और राजा हरिश्चन्द्र बनाई जो 1913 में रिलीज हुई. उसे भारत की पहली फ़िचर फ़िल्म माना जाता है. लंका दहन (1917) की महान सफ़लता के साथ 19 वीं सदी के आखिर की यह अवधारणा एक दार्शनिक ताकत बन गई.

आज भारतीय सिनेमा में जीवन भर की उपलब्धियों पर जो सबसे बडा पुरस्कार है वह दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार ही है और यह भारत रत्न जैसा है. संस्कृति के इतिहासविदों के लिए यह फ़ालके की अंतिम विरासत है, तो अन्य लोगो के लिए लोकप्रिय भारतीय दृष्य कला की शुरूआत.

फ़िल्में तो आज भी बडी संख्या में बन रही हैं लेकिन उनमें पारिवारिकता, सह्विष्णुता, देशभक्ति के जज्बात आदि का दूर-दूर तक वास्ता नहीं रहा. पूरी फ़िल्मी दुनिया पश्चिमी रंग में रंगी नजर आती हैं. संगीत में न तो वह मिठास नजर आती है, जैसे की कभी पुराने संगीतकार संगीत की रचना किया करते थे. उस जमाने में हिन्दी-उर्दू के नामी-गिरामी रचनाकार पहले गीत लिखते थे. उसमे अपनी आत्मा तक उतार कर रख देते थे, बाद में संगीतकार उस रचना के आधार पर मनमोहक संगीत की रचना किया करते थे. अब धुन तैयार रहती है और गीत बाद में लिखा जाता है. आधुनिक समय में फ़िल्मों में बडी चकाचौंध है. अरबों-खरबों का खर्च इन पर होता है. और उस फ़िल्म ने कितने करोड कमाये, इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है. खैर. समय परिवर्तनशील है. अतः इसमें आश्चर्य नहीं देखा जाना चाहिए.

जो भी हो ,लेकिन इतना तो तय है कि आज फ़िल्मों के माध्यम से हिन्दी को वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त हो रहा है. हमारे फ़िल्मकार भारत ही नहीं युरोप, अमेरिका और खाडी देखों के अपने दर्शकों को ध्यान में रखकर फ़िल्मों का निर्माण कर रहे हैं. यह गौरव का विषय है कि हमारी फ़िल्में आस्कर-अवार्ड तक अपनी पहुँच बना रही है. समूचे विश्व को और ज्यादा निकट लाने के लिए, निश्चित ही इस क्षेत्र में आज भी बेहतर ढंग से काम किए जाने की आवश्यक्ता है. संचार माध्यम का योगदान इसमें लिया जा सकता है. फ़िल्मों में मनोरंजन और अर्थ उत्पादन के साथ-साथ इनकी सार्थकता का भी ध्यान रखा जाए तो हिन्दी सिनेमा सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है. इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि सिनेमा ने हिन्दी की लोकप्रियता में जहाँ चार चांद लगाए हैं, वहीं उसकी व्यवहारिकता को भी बढाया है.

ग्लोबल होती इस दुनिया में मोबाईल और कंप्युटर की संचार क्रान्ति ने हिन्दी को विश्व की सिरमौर भाषा बना दिया है. शायद आपको याद होगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबाना ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा था कि वे जितनी जल्दी हो सके हिन्दी सीखें, अन्यथा सारे कामकाज हिन्दुस्थानी हथिया लेंगे. लेकिन दुर्भाग्य कि हम हिन्दी के बढते महत्त्व को भली-भांति समझ नहीं पा रहे हैं. यह भूल कोई छॊटी सी भूल नहीं है. अगर यह क्रम जारी रहा तो संभव है कि हमें इसकी बडी कीमत चुकानी पड सकती है. लेकिन यह ध्यान में जरूर रखा जाना चाहिए कि हिन्दी आज विश्व की अन्य भाषाऒं को पीछॆ छॊडते हुए दूसरे पादान पर खडी है. पहले नम्बर पर चीन की भाषा मन्दारिन है. बहरआल ,हिन्दी आज भले ही भारत की राष्ट्रभाषा न भी बन पायी हो,लेकिन यह विश्व-भाषा जरूर बन गई है.

सोशल मीडिया और हिन्दी

एक समय था जब सोशल मीडिया पर ज्यादातर अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग होता था, और यह हिन्दी भाषियों के लिए सोशल मीडिया की राह में एक बाधा की तरह देखा जाता था। हालांकि यह बात और है कि हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन अब बदलते वक्त के साथ-साथ हिन्दी भाषा ने सोशल मीडिया के मंच पर दस्तक देकर अपने अस्तित्व को और भी बुलंद तरीके से स्थापित किया है।

वर्तमान में सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग अब हिन्दी भाषा का प्रयोग भी न केवल खुलकर बल्कि गर्व के साथ करते हैं। इससे पहले सोशल मीडिया पर अंग्रेजी का प्रयोग कई लोगों के लि‍ए सिर्फ जरूरत या मजबूरी हुआ करता था, लेकिन अब हिन्दी का प्रयोग, हिन्दी प्रेमियों के लिए प्राथमिकता और गर्व का विषय बन गया है।

सोशल मीडिया पर हिन्दी का प्रयोग, लोगों के लिए भीड़ से अलग दिखने का बेहद आकर्षक तरीका भी साबित हुआ है। जहां फेसबुक या ट्व‍िटर पर अंग्रेजी में लिखे गए पोस्ट और कमेंट्स की भीड़ में हिन्दी में लिखी गई पोस्ट या फिर कमेंट प्रयोगकर्ताओं को ज्यादा जल्दी आकर्ष‍ित करता है, वहीं हिन्दी भाषा का समृद्ध एवं अलंकृत होना, किसी भी प्रस्तुति का स्वत: ही महत्वपूर्ण बनाने में सहायक सिद्ध होता है।

न केवल फेसबुक या ट्वटर, बल्कि अब वाट्सएप और टेक्स्ट मैसेज को भी सार्थक बनाने और मैसेज की ओर ध्यान आकर्ष‍ित करने के लिए विभिन्न कंपनियां तक हिन्दी भाषा का सहारा ले रही हैं। वे जानती हैं कि हिन्दी भाषा का विस्तार काफी अधिक है और अगर उन्हें भी खुद को दूर तक स्थापित करना है तो वही भाषा चुननी होगी, जिसके प्रति पाठक या ग्रा‍हक सहज और पारिवाहिक महसूस करता हो। इसके लिए हिन्दी से अच्छा विकल्प और कोई हो ही नहीं सकता।

सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा को और भी विस्तारित करने का कार्य किया ब्लॉगर्स ने। हिन्दी ब्लॉगर्स की संख्या पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ी है। वहीं हिन्दी ब्लॉगिंग के जरिए ऐसे लोगों को विचारों की अभिव्यक्ति का बेहतरीन मंच मिला, जिनके लिए भाषा की रूकावट थी।

वर्तमान में फेसबुक, ट्वीटर, ब्लॉग्स के अलावा, सोशल मीडिया में हिन्दी को और भी बेहतर तरीके से विस्तारित करने में वॉट्सएप भी अग्रणी है, जिस पर हिन्दी  सामग्री को प्रसारित करने के लिए हिन्दी भाषा का प्रयोग सर्वाधिक होता है। सोशल मीडिया पर जोक्स, मैसेज या अन्य सामग्री का ज्यादा से ज्यादा प्रचलित और प्रसारित होने का कारण भी हिन्दी भाषा ही है, क्यों यह उपयोगकर्ता और पाठक को सीधे और सरलता से जोड़ने का कार्य करती है।

हिन्दी भाषा को सोशल मीडिया पर हाथों हाथ लिए जाने का एक कारण यह भी है, कि हिन्दी भाषा अभिव्यक्त का एक बेहतरीन माध्यम है। इसके भावों को समझने में असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता, और लिखी गई बात पाठक तक उसी भाव में पहुंचती है, जिस भाव के साथ उसे लिखा गया है। हिन्दी के तीव्र विस्तार का ग्राफ सोशल मीडिया पर मौजूद हिन्दी प्रेमी वर्ग की ओर इशारा करता है, जो लगातार वृद्ध‍ि करता देखा जा सकता है। यह हिन्दी भाषा की सुगमता, सरलता और समद्धता का ही कमाल है, कि विश्व स्तर पर आज हिन्दी, सोशल मीडिया के मंच पर खुद को सुशोभित कर पाई है, और काफी पसंद की जा रही है।

कुछ वर्ष पहले तक विश्व में 80 करोड़ लोग हिन्दी समझते, 50 करोड़ बोलते और 35 करोड़ लिखते थे, लेकिन सोशल मीडिया पर हिन्दी के बढ़ते इस्तेमाल के चलते, अब अंग्रेजी उपयोगकर्ताओं में भी हिन्दी का आकर्षण बढ़ा है और इन आंकड़ों में भी तेजी से वृद्धि हुई है। वर्तमान में भारत, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा इंटरनेट उपयोगकर्ता है, जिसका श्रेय हिन्दी भाषा को भी जाता है। दरअसल भारत की आबादी का एक बड़ा तबका हिन्दी भाषा के प्रति सबसे अधिक सहज है और उसे सोशल मीडिया से जोड़ने में हिन्दी का सबसे बड़ा योगदान है।

सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा के विस्तार की गति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अप्रैल 2015 तक देश में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 14.3 करोड़ रही, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की संख्या पिछले एक साल में 100 प्रतिशत तक बढ़कर ढाई करोड़ पहुंच गई जबकि शहरी इलाकों में यह संख्या 35 प्रतिशत बढ़कर 11.8 करोड़ रही। खास बात यह है, कि न केवल उम्रदराज भारतीय, बल्कि अंग्रेजी का अच्छा-खासा ज्ञान रखने वाले युवा भी अब सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

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तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? अठारह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।

One thought on ““हिन्दी दिवस”: हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

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