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गणेश चतुर्थी विशेष- भारतीय संस्कृति और भगवान गणेश

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वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

ऊँ गं गणपतये नमो नमः           ऊँ गं गणपतये नमो नमः             ऊँ गं गणपतये नमो नमः

अर्थात्- आपका एक दांत टूटा हुआ है तथा आप की काया विशाल है और आपकी आभा करोड़ सूर्यों के समान है। मेरे कार्यों में आने वाली बाधाओं को सर्वदा दूर करें।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं। एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था। ऋग्वेद में ब्रह्मणस्पति सूक्त में भी गणपति का उल्लेख है-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत्आनशृण्वं नूतिभि: सीडू नादनम्।।

अर्थात्- हे गणपति, तू विद्वानों का विद्वान है, ब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं। आचार्य सायण से भी प्राचीन वेदभाष्यकार श्री स्कन्दस्वामी अपने ऋग्वेदभाष्य के प्रारम्भ में लिखते हैं-

विघ्नेश विधिमार्तण्ड़चन्द्रेन्द्रोपेन्द्रवन्दित।

नमो गणपते तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते॥

अर्थात्- ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र तथा विष्णु के द्वारा वन्दित है। विघ्नेश गणपति! मन्त्रों के स्वामी ब्रह्मणस्पति! आपको नमस्कार है।

अनेक शास्त्रों में भगवान गणेश के अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। पर ब्रहम गणेश्वर का विशद विवेचन “गणेश-पुराण” में वर्णित है। “पुराण वाङ्‌मय” में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैं। गणेश पुराण के अनुसार गणेश प्रणव रूप में अवस्थित हैं। स्वंय ब्रहमा, विष्णु और शिव उनकी पूजा करते हैं। लिंग पुराण में भगवान गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है। उनकी कृपादृष्टि मात्र से विघ्नों के पर्वत भी धराशायी हो जाते हैं, इसीलिए अनादि काल से किसी भी कार्यारंभ में देवों एवं मानवों के द्वारा उनकी सर्वप्रथम पूजा की जाती है। विद्वानों और पुराणकारों के मत में गणेशजी ही परात्पर ब्रह्म एवं जगदरूप हैं। सगुणोपासना में जिस प्रकार निराकार ब्रह्म अनेक रूपों में अवतरित हुए है। उसी प्रकार उनका एक रूप गजानन का भी है। गणपति गणेश के रूप में वे पार्वती एवं शिव पुत्र है,समस्त देवों द्वारा उन्हें अग्रगण्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं समस्त ग्रन्थों में गणेश की महिमा वर्णित की गई है। हमारे सनातन हिन्दू धर्म के समस्त कार्यों के आरम्भ में श्री गणेश जी के स्मरण, नमनस्तवन और पूजन आदि का विधान है। इसलिये किसी भी कार्य का शुभारम्भ (श्री गणेश) के नामोच्चार से किया जाता हैं। यही नहीं कार्य के आरम्भ के लिए लोक में श्री गणेश यह पर्याय हो चुका हैं। यही नही-

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्”।

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

वास्तव में श्री गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शव इत्यादि देवों में कोई भेद नहीं है, क्योंकि गणेश शब्द की व्युत्पत्ति-

गणानां जींकजातानाम् ईशः

अर्थात् प्राणिमात्र के स्वामीही गणेश हैं, सृष्टि के आरम्भ में आसुरी शक्तियों द्वारा जो विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कीजाती हैं, उनके निवारण के लिए स्वयं गणपति रूप बनाकर ब्रह्मा जी के सृष्टि कार्य में सहायक होते हैं।

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में जो “गणानां त्वा-” इत्यादि मन्त्रों में गणपति कासुस्पष्ट उल्लेख है, वहीं, ब्रह्मा, विष्णु आदि गणों के अधिपति गणनायक ही परमात्मा कहे गये हैं।

“गणपति” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ- अनादिकाल से ही धर्मप्राण जनता वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है ।’ गणपति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है। ऋग्वेद के मन्त्रों में स्पष्ट रूप से ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित किया गया है अतएव प्रथमपंक्ति का गणपति शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्मणस्पति का अर्थ है – ब्रह्मों कापति ।।

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शुक्ल यजुर्वेद के अश्वमेघाध्याय में भी गणपति शब्द आया है- प्रारम्भिक गणराज्यों के गणपतियों के सम्बन्ध में जो भावना थी उसी आधार पर देवमण्डल के गणपतिकी कल्पना की गयी । रूद्र के गणों से गणपति का सम्बन्ध स्वतन्त्र देवता रूप में है ।

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गणानां पतिगणपतिः

सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्व ही “गणपति” तत्व है ।

समूहान्य वाचक परिकीर्तिनः 

समूहों का पालन करने वाले परमात्मा को ‘गणपति’ कहते हैं… देवादिकों के पतिको भी गणपति कहते हैं

महतत्व गणनां पतिः गणपतिः 

अथवा

निगुर्ण सगुण ब्रह्मागणाना पतिः गणपति ।

सर्वविध गणों को सत्ता देने वाला जो परमात्मा है वही गणपति है।

श्री गणेश भी भगवान का ही एक विशिष्ट स्वरूप है वे पार्वती शिव के पुत्र के रूप में प्रकट हुये । इनकी उपासना कई प्रकार की है। इनके रूप भी अनेक है रूप के अनुसार नाम भी भिन्न-भिन्न हैं, जैसे- महागणपतिचिन्तामणि गणपतिहरिद्रागणपति इत्यादि ।

पुराणों में गणेश वर्णन

पुराणों में गणपति की उत्पत्ति और उनके विविध गुणों का आश्चर्यजनक रूपकों में अतिरंजित वर्णन है- अधिकांश कथाएँ ब्रह्मवैवर्त पुराण में पाई जाती हैं । गणेश को कहीं केवल पार्वती का ही पुत्र माना गया है ।

  • पुराणों में रूद्र के मरूत आदि असंख्य गण प्रसिद्ध हैं । इनके नायक अथवा पतिको विनायक या गणपतिc884c7cc4b0700c5cd523205fdec8f22 कहते हैं। समस्त देवमण्डल के नायक भी गणपति ही हैं। डा0 सम्पूर्णानन्द ने अपने ग्रन्थों “गणेश” तथा “हिन्दू देवपरिवार का विकास” मेंगणेश को आयोत्तर देवता माना है जिसका प्रवेश और आदर हिन्दू देवमण्डल में हो गया ।अधिकांशतः कहना है कि हिन्दू लघु देव मण्डल, अर्थ देवयोनि तथा भूत-पिशाच परिवार मेंबहुत से आर्योत्तर तत्व मिलते हैं ।
  • “गणेश” नामक ग्रन्थ की विदुषी लेखिका एलिस गेट्टी ने गणेश को द्रविड़ों का स्वतन्त्र स्थानीय देवता कहा है। उस समय न उनकी कोई सुनिर्मित प्रतिमा थी न कोई नाम और न देवालय । वे किसी घने वृक्ष के नीचे या पत्थर के चौरे पर अनगढ शिलाखण्ड के रूप में आदिम गिरिजनों के ग्राम देवता रहे हैं ।
  • ऐसा “गणेश” ग्रन्थ की भूमिका में समाजशास्त्री प्रो0 अल्फ्रेड फाउशर का मत है । इस पूजा शिला को युद्ध प्रयाण से पहले ग्रामवासी योद्धा रूधिर से अभिषिक्त करते थे । गणेश का सिन्दूराभिषेक उसी आदिम परम्परा का नया रूप है ।

गणेश की उत्पत्ति से सम्बन्धित वृतान्त स्कन्द, मत्स्य पुराण एवं सुप्रभेदागम में मिलते हैं । उनका सर्वप्रथम उल्लेख एत्रेय ब्राह्माण में आया है जहाँ उन्हें ब्रह्मा, ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति से पहचाना गया है ।

मत्स्य पुराण में ही (180/66) में एक जगह कहा गया है कि महायक्ष कुबेर ने भी वाराणसी में अपना स्वभाव छोड़ दिया और गणेशत्व पद को प्राप्त हो गये । “मत्स्य पुराण के अनुसार ही शंकर से परिणीत होने के उपरान्त पार्वती को पुत्र पाने की, बल इच्छा हुई । उन्होंने एक गजाकृति पुतले को पुत्रवत पालना आरम्भ कर दिया । एक दिन गंगा में इस पुतले को स्नान कराया । उसके बाद वह लम्बा सजीव शरीर वाला हो  गया । इसी कारण वे गजानन और गांगेय कहलाते हैं ।

वराह–पुराण के अनुसार गणेश की उत्पत्ति विध्न विनाशक के रूप में हुई । भगवान गणेश वेद विहित कर्मों के प्रथम पूज्य देव हैं । एक समय देवता तथा ऋषिगणों के पवित्र कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न होने लगी । तो वे शंकर के पास पहुँचे। वहाँ भगवान रूद्र हँस पड़े तो उनके मुख से एक बालक प्रकट हुआ । उस बालक को पार्वती लगातार देखने लगी तो भगवान भोलेनाथ ने श्राप दिया कि कुमार तुम्हारा मुख हाथी जैसा व पेट लम्बा होगा तथा ,सर्प तुम्हारे यज्ञोपवीत होंगे। क्रोधित शंकर का इस पर भी क्रोध शान्त नहीं हुआ तो उनके शरीर से अनेक विनायक गण उत्पन्न हुये, बाद में ब्रह्मा की प्रार्थना पर इन गणों का कुमार को स्वामी बना दिया और ये विनायक गणपति हो गये ।

गणपति का दूसरा नाम विनायक भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी होने के कारण यह तिथि गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध हुई । समस्त देवताओं में गणेशजी सर्वप्रथम पूजे जाते हैं, कारण वे गणनायक, विध्न विनायक, संकटहारी और सिद्धि समृद्धि के दाता हैं । विद्या, बुद्धि, धन, वैभव, शक्ति, तेज अध्यात्म साधना और तन्त्र सिद्धि के लिये भक्त जन गणेशजी की शरण लेते हैं। गणेश जी की पूजा साधना के अनेक मन्त्र हैं व ब्रहद्ध सम्प्रदाय गणेश साधकों के लिये हैं । समस्त हिन्दू जाति गणेशजी का सबसे पहले नमन करती है । गणपति गण अथवा समुदायों के नायक हैं। गणपति का दूसरा नाम विनायक भी है। जो विचारने वाली आत्माओं के लिये प्रयुक्त होता है । “अथर्वशिरस” उपनिषद् में रूद्र के अनेक देवों या आत्माओं का समीकरण करते हुये विनायक का भी नाम आता है।

“महाभारत” में गणेश्वरों और विनायकों का देवताओं के साथ उल्लेख हुआ है। जो मनुष्य कार्य का सर्वत्र अवलोकन करते हैं । किरात प्रजाति (भोट–भ्रन्मा) के अनेक गण (जनजातियाँ) उस समय उत्तरी भारत में रह रही थीं — यक्ष गन्धर्व, किन्नर, गुहक, किं पुरूष, भोट पिशाच आदि । यक्षों के अधिक प्रबल होने पर इन गणों ने भी कुबेर को अपना गणपति या गणेश मान लिया और उसकी पूजा करनी आरम्भ कर दी ।  महाभारत में कुबेर को कुछ स्थानों  पर गणेश कहा गया है ।

लिंग पुराण में गणेश को विध्नेश्वर कहा गया है । लिंग पुराण के अनुसार देवों ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि आप किसी एक ऐसी शक्ति का प्रादुर्भाव करें जो कि सभी प्रकार के विध्नों का निवारण किया करें । देवों की इस प्रार्थना के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं ही “गणेश” के रूप में जन्म ग्रहण किया ।

वायु पुराण में भगवान शिव को “गजेन्द्रकर्ण”, लम्बोदर, “दृष्ट्रिन” (वा) पुणे 24/147, 30/173) आदि कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की गयी है।

ब्रह्मपुराण में गणेश जी का भगवान शिव के लिये उपयोग करके दोनों में पूर्व अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में गणेश को कृष्ण का अवतार कहा गया है । “ब्रह्मवैवर्त पुराण” के ही मतानुसार गणेश जी का विष्णु के साथ तादाम्य है।भगवान विष्णु शिवजी से कहते हैं कि पार्वती जी से एक पुत्र होगा जो समस्त विध्नों का नाश करेगा । इतना कहकर भगवान विष्णु बालक का रूप धारण करके शिव के आश्रम में गये वे पार्वती जी की शैय्या पर बालक रूप में लेट गये । पार्वती जी ने उन्हें अपना पुत्र माना यही पुत्र “गणेश जी” के नाम से लोक विश्रत हुआ ।

सौर पुराण में गणेश जी को साक्षात् शिव ही कहकर यह सिद्ध करने की चेष्टा की गयी है कि श्री गणेश एवं भगवान.. शिव दोनों एक ही हैं । गणेश सम्प्रदाय एवं गणेश पुराण में भगवान गणपति को “महाविष्णु” एवं “सदाशिव” कहा गया है और उन्हें साक्षात् ब्रह्म माना गया है वे ही प्रपच्च की सृष्टि और स्थिति संहार आदि के कारण ही उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रादुर्भाव हुआ है।

शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी ने अपने शरीर के अनुलेप से एक मानवाकृति निर्मित की और उसे आज्ञापति किया कि मैं स्नान करने जा रही हूँ जब तक न कहूँ तक तक तुम किसी को अन्दर मत आने देना । यही गृहद्वार रक्षक शक्ति “गणेश” के नाम सेअभिहित हुई और इन्हीं के साथ भगवान शंकर का संग्राम हुआ ।’ गणपति अथर्वशीर्ष एक नव्य उपनिषद् हैं और अथर्ववेद से सम्बन्धित हैं । इस उपनिषद् में गणेश विद्या बतलायी गयी है । इसी कारण गणेशोपासकों में वह अत्यन्त सम्मानित है । गणपति अथर्वशीर्ष में गणेशजी का सगुण ब्रह्मात्मक वर्णन तो है ही बल्कि उसके अन्त में उन्हें परब्रह्म भी कहा गया है। अथर्वशिरस उपनिषद् में रूद्र का अभिज्ञान अनेक देवताओं से किया गया है, जिनमें एक विनायक कहे गये हैं।

  • ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण तथा शिव पुराण के अनुसार प्रजापति विश्वकर्मा की रिद्धी-सिद्धि नामक दो कन्याएं गणेश जी की पत्नियां हैं। सिद्धि से शुभ और रिद्धी से लाभ नाम के दो कल्याणकारी पुत्र हुए।

पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से एक आकर्षक कृति बनाई, जिसका मुख हाथी के समान था। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गई। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।

गणपति नाम के विषय में ऐतरेय ब्राह्मण का कहना है कि यह ब्रह्मणस्पति अथवा वृहस्पति का वाचक है । परम सत्ता को जान लेना ही इस जीवन का चरम शिखर है । “यस्तन्न वेद किमचा करिष्यति” । (ऋ0 1/164/39) अर्थात् जो उस परमात्मा को नहीं जानता वह ऋचा से क्या करेगा । वैदिक ऋषियों की खोज और शिक्षा का सर्वोत्तम सार है, एक परम तत्व का रहस्य “एक सत्” (ऋ0 1/164/46) या “तदेकम” (ऋ0 10/129/2) जो उपनिषद् का महाकाव्य बन गया । सब देव प्रकाश और सत्य की शक्तियां एक (देव) के ही नाम और शक्तियाँ हैं। प्रत्येक देव स्वयं सब देवता हैं और उन्हें अपने में रखे हुए हैं। वह परम सत्य एक है – “तत् सत्यम् (ऋ0 3/39/5. 4/54/4 तथा 8/45/27) इत्यादि ।

अग्नि पुराण में भी गणेश जन्म एवं गणेश गौरव की गाथायें हैं, स्मार्त परम्परा में गणपति विनायक के आवेभव में “विघ्नेश्वर” की जो कल्पना है उसका समर्थन लिंग पुराण भी करता है । असुर और राक्षस तपस्या कर शिव को प्रसन्न कर लेते थे, और विभिन्न वरदान माँग लेते थे । इस पर इन्द्रादि देवों ने शिव से प्रार्थना की कि यह तो ठीक नहीं क्योंकि वरदानों से सम्पन्न ये असुर और राक्षस देवों से युद्ध करते और उन्हें परास्त भी कर देते । देवों ने भगवान से ऐसे व्यक्ति को उत्पन्न करने की प्रार्थना की जो उन असुरों के इन धार्मिक कार्यों में बाधा डाल सके और वे सफल मनोरथ न हो सके । शिव ने देवों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और विध्नेश्वर को उत्पन्न कर उसको असुरों की १,३यादि यागदिक क्रियाओं में विघ्न डालने के लिये नियुक्त किया।

भविष्य पुराण में कथा आती है कि युधिष्ठिर को कृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए गणेश पूजन का परामर्श दिया था – पूजयस्व गणाध्यक्षम् उमामल समुद्रभवम् ।। | प्रो0 एस0 ए0 डांगे ने उमा के रज रक् बिन्दु से गणेशं की उत्पत्ति कीकथाओं में यह “अर्थवाद” सिद्ध किया है कि प्रारम्भ में गाँवों में लोकपाल गणपति की पूजा शिला लाल मुद्रा (रज) से निर्मित होती रही होगी । बाद में गणेश प्रतिमा को सिंदूराभिषिक्त किया जाने लगा । आज भी गणेश को अर्पित किये जाने वाले रक्त चंदन के लेप, लाल वस्त्र और रक्त पुष्पों की अंजलि गणेश के पार्थिव (भौम) देवता होने को सिद्ध करती है । भौम मंगलगृह का नाम है और उसका रंग भी लाल माना गया है। पुराणकार मंगलगृह की उत्पत्ति भी पृथ्वी पर गिरे उमा के ऋतुकालीन रक्त बिन्दु से मानते हैं इसी कारण विनायक को मंगलरूप भी कहा जाता है ।।

गणेश पुराण और मुग्दल पुराण में गणेश पूजा का विस्तृत वर्णन है। ये पुराण उपपुराण है। इसके पांच खंड हैं।

गणेश पुराण में गणेश को ही परमब्रह्म कहा गया है। भगवान् गणेश का आविर्भाव किस प्रकार हुआ उसका पूरा वर्णन इस पुराण में है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है। गणेश पुराण के अनुसार, इसी शुभ दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था।

गणेश पुराण में गणेश के निर्गण स्वरूप के साथ ही उनके सगुण साकार स्वरूप का वर्णन है, जो पूर्व मध्यकालीन गणपति प्रतिमाओं के विकास की अवस्था को प्रकट करता है। इस पुराण में गणेश का विकसित विविध व बहुआयामी स्वरूप व्याख्यायित है। यह विविधता मुद्राओं, अलंकारों, आयुधों, वाहनों, स्वरूपों सभी में परिलक्षित होती है।

गणेश पुराण में गणेश का अत्यन्त मनोरम व भव्य स्वरूप इस प्रकार वर्णित है – विनायक की रत्नकांचन से युक्त महामूर्ति बनाकर, जिसमें उनके चतुर्भुज व त्रिनेती स्वरूप का अंकन हो, तथा जो नाना अलंकारों से शोभायमान हो, षोडशोपचार विधान के साथ पूजा करनी चाहिये।

पुराणकाल तक आते-आते। गणेश की उपासना इतनी व्याप्त हो चुकी थी कि प्रायः सभी पुराणों में गणेशोपासना का उल्लेख किया गया है। गणेश पुराण में वर्णित है-

“प्राच्यां रक्षतु बुद्धिशा, अग्नेयां सिद्धिदायक: दक्षिणस्याम उमापुत्रो,

नैऋत्यं तु गणेश्वर, प्रतिच्यां विघ्नहर्ताव्यां वायव्याम गजकर्णक

अर्थात् गणेशजी के विभिन्न स्वरूप दस दिशाओं में सुरक्षा करते हैं। शास्त्रनुसार गणेशजी की विधिवत स्थापना व पूजा-पाठ से नौ ग्रहों के दोष भी दूर हो जाते हैं।

गणेश पुराण में पूर्वमध्यकालीन समाज में प्रचलित सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों का निरूपण हुआ है। इन विशेष सन्दर्भो में गणेशकी आवश्यकता और महत्व को प्रतिपादित किया गया है। गणेश की प्राचीनता को वैदिक परम्परा से जोड़कर उसे तत्कालीन अन्य देवों से श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है।

मालती माघव (छठी शती ई0) वह पहला ग्रन्थ है जिसमें नाटक प्रारम्भ करने से पूर्व ही विनायक वंदना की गई है (प्रथम अंक, श्लोक 2) भवभूति से मात्र वर्ष पूर्व गणेश को वंदनीय एवं स्तुति योग्य माना गया था।

आनन्दतीर्थ (950 ई0) रचित “शंकर दिग्विजय” काव्य के अनुसार तांत्रिक गणपति का पूजन बांये हाथ से किया जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरितमानस” के प्रथम श्लोक में वाणी और विनायक की एक साथ वंदना की है –

वर्णानार्थसंघानां रसानां छंदसामपि ।

मंगला नाज्ञ कर्तारौ वंदे वाणी विनायकौ ।। 

अर्थात् वर्णअर्थसंघरसछंद और मंगल के विधायक वाणी और विनायक को मैं वंदन करता हूँ । यहाँ प्रसंगतः गणपति के नाम में स्थित “गण” और तुलसीकृत वंदना का विचार शब्द शास्त्र की दृष्टि से किया जाय तो “गणपति” की एक नई सूक्ष्म व्याख्या उभरती है।

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म के प्रतीक देवों में भगवान गणेश का प्रमुख स्थान हैं एकदंत, गजानन, लंबोदर, गणपति, विनायक ऐसे सहस्र नामों से भगवान गणेश को पुकारा गया है। हिंदू धर्म में श्रीगणेश की महिमा को अन्य देवताओं की तुलना में अलग से स्वीकारा गया हैं। वेदों और पुराणों में गणेश को यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता बताया गया है। अनेक शास्त्रों में उनके अलग-अलग रुपों की चर्चा हुई है। भगवान गणेश का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था।

गणेश जी को क्यों माना गया है प्रथम पूजनीय

ऋग्वेद द्वितीय मंडलके तेईसवें सूत्र के पहले मन्त्र एवं तैतिरीय संहिता में गणपति का उल्लेख आता है.उनका उल्लेख हम गणेश के रूप में पाते हैं :-

गणनां त्वां गणपति हवामहे कविं कवीनामुपं श्रवस्तम्।

अर्थात्- हे गणपतितू विद्वानों का विद्वान हैब्रह्म से भी ज्येष्ठ है। इस नई रचना को सुन।

वैसे अनादिकाल से ही वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों द्वारा गणपति की पूजा चली आ रही है। वेदों में गणपति ‘ब्रह्मणस्पति’ भी कहलाते हैं। ब्रह्मणस्पति के रूप में वे ही सर्वज्ञाननिधि तथा समस्त वाङ्मय के अधिष्ठाता हैं।

आदौं पूज्यों विनायकः।

 यह उक्ति गणेश की अग्र पूजा का प्रबल परिचायक है।

गणपत्यर्थवशीर्षोपनिषद् के अनुसार तो गणेश को ही सर्वदेवमय वर्णित करते हुए कहा गया है कि-

त्वं ब्रह्म त्वं विष्णुस्त्क्रूद्रस्त्वमिंद्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यः त्वं चन्द्रमा त्वं ब्रह्म भूर्भुः स्वरोम्

अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य चन्द्र हो। आप ही स्वयं ब्रह्म, भू, भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

गणेश शब्द की व्युत्पत्ति है-

गणानां जीवजातानां यः ईशः स्वामी सः गणेशः (गणेशः पुं)

अर्थात, जो समस्त जीव जाति के ईश-स्वामी हैं वह गणेश हैं।

इनकी पूजा से सभी विघ्न नष्ट होते हैं-

गणेशं पूजयेद्यस्तु विघ्नस्तस्य न जायते। (पद्म पुराणसृष्टि खंड 51/66)

शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें मन्त्र में भी गणपति शब्द आया है-

नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नम इति ॥” बृहस्पतिः। यथाऋग्वेदे ।२।२३।१।

अर्थात गणों और गणों के स्वामी श्री गणेश को नमस्कार। इस संदर्भ में हिन्दू शास्त्रों और धर्म ग्रन्थों में अनेकानेक कथाएँ प्रचलित हैं। विभिन्न विभिन्न स्थानों पर गणेश जी के अलग अलग रूपों का वर्णन है परन्तु सब जगह एक मत से गणेश जी की विघ्नकारी शक्ति को स्वीकार किया गया है।

वाराह पुराण एवं लिंग पुराण में वर्णन है कि एक बार ऋषि मुनियों ने असुरी शक्तियों से ग्रसित होकर देवाधिदेव भगवान शंकर से सहायता की प्रार्थना की। भगवान आशुतोष ने विनायक रूप से श्री गणेश को प्रगट किया और अपने शरीर को कंपित कर अनेक गणों की सृष्टि की, उनका अधिपति गणेश को नियुक्त किया गया। शास्त्रों में गणेश जी के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा गया है-

वक्रतुंड महाकाय। सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्न कुरु मे देव। सर्व कार्येषु सर्वदा॥

अर्थात् जिनकी सूँड़ वक्र है, जिनका शरीर महाकाय है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, ऐसे सब कुछ प्रदान करने में सक्षम शक्तिमान गणेश जी सदैव मेरे विघ्न हरें।

पुराणों में गणेश जी के जन्म से संबंधित कथाएं विभिन्न रूपों में प्राप्त होती हैं। इस संबंध में शिवपुराण, ब्रह्मवैवत्र्तपुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण एवं अन्य ग्रंथों में विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

कथाएं : गणेश कैसे बने प्रथम पूज्य

हम सभी जानते है की हमारे सभी मंगल कार्यो में हम सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करते है | उन्हें निमंत्रण देते है और अपने सभी कार्यो को निर्विघ्नं सम्पन्न करने की विनती करते है | इन्हे सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता का वरदान प्राप्त है | इसके पीछे दो कथाये जुडी हुई है | पढ़े : भगवान गणेश के लिए गये अवतार कौनसे है

पहली कथा में बताया गया है की इन्हे यह वरदान इनके माता पिता भगवान शिव और पार्वती से प्राप्त हुआ | उन्होंने अपने मातृ पितृ भक्ति और सेवा में उन्हें ही अपना सर्वश्य मान कर परिक्रमा की की | ऐसी भक्ति और सेवा देखकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया गया | ब्रह्मा जी जब ‘देवताओं में कौन प्रथम पूज्य हो’ इसका निर्णय करने लगे, तब यह तय किया गया कि जो पृथ्वी-प्रदक्षिणा सबसे पहले करके आएगा वही सबसे पहले पूज्य माना जाएगा। गणेश जी का छोटा सा मूषक कैसे सबसे आगे दौड़े। पर वे थे बुद्धि के महान देवता | उन्होंने युक्ति निकाली और  अपने पिता और माता भगवान शंकर और पार्वती जी की प्रदक्षिणा करने लगे । उनके लिए उनके  माता-पिता ही सब कुछ थे | उन्होंने सात प्रदक्षिणा कर ली। शिवजी का ह्रदय यह देखकर गदगद हो गया और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। जाहिर है भगवान गणेश शेष देवताओं से सबसे पहले पहुंचे। उनका यह बुद्धि-कौतुक देखकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें प्रथम पूज्य बनाया।

शिवपुराण में आता हैः

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत्।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा।।

पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम्।

अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम्।

पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम्।। (शि.पु., रूद्र.सं., कु. खं- 19.39-42)

‘जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं, परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है। पुत्र के लिए माता-पिता और स्त्री के पति सुन्दर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।’

दूसरी कथा… शिव महापुराण: भगवान शिव ने दिया प्रथम पूजा का वरदान

शिवमहापुराण की रुद्रसंहिता में वर्णन है कि कुमारिका खंड में माता पार्वती जी ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया।

कल्पभेद में भगवान शनि के द्वारा इनका मस्तक काटाजाना, पुनः हाथी का मस्तक लगाना यह कथा है किन्तु श्वेतकल्प में तो स्वयं भगवानशंकर उनका मस्तक छिन्न करते हैं। यह पापनाशिनी कथा शिवपुराण में इस प्रकार वर्णित है-

विचार्यति सा देवी क्पुर्षों मलसंभवम्।

पुरूषं निर्ममौसा तु सर्वलक्षणसंयुतम्।।

सर्वाक्यवनिर्दोषं सर्वाक्यव सुन्दरम्।।

विशालं सर्वंशोभाढयं महबलपराकमम्।।

वस्त्राणिं च तदा तस्मै दत्त्वा सा विविधानीहिं।

नानालंकरणं चैक ब्रह्मशिषमनुत्तमाम्।।

मत्पुत्रस्त्वं मदीयोसि नान्यः कश्चिदिहास्ति में ।

एवमुक्तस्य पुरुषों नमस्कृत्य शिका जगौं।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 13/20-23)

वह शुभ लक्षणों से सुयुक्त था। उसका सारा शरीर सभी अवयवों से सुन्दर था।उसका वह शरीर विशाल,परम शोभायमान व महान बल पराक्रम से सम्पन्न था। मातापार्वती ने उसे विभिन्न प्रकार के आभूषण तथा नाना प्रकार के वस्त्र और बहुत सेआर्शीवाद आदि देकर कहा तुम मेरे पुत्र हो,मेरे अपने ही हो, तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ दूसरा कोई नहीं हैं।

कथानुसार जब भगवान शिव और गणेशजी के बीच युद्ध हुआ और गणेशजी का सिर कट गया तो देवी पार्वती के कहने पर शिवजी ने गणेश जी के शरीर पर हाथी का सिर जोड़ दिया। जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि इस रूप में मेरे पुत्र की पूजा कौन करेगा।

आनने तव सिन्दूरं दृश्यते सांप्रतं यदि ।।

तस्मात्त्वं पूजनीयोसि सिन्दूरेण सदा नरैः ।।

पुष्पैर्वा चन्दनैर्वापि गन्धेनैव शुभेन च ।।

नैवेद्ये सुरम्येण नीराजेन विधानतः ।।

तांम्बूलैरथ दानैश्च तथा प्रक्रमणैरपि ।।

नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति ।।

तस्य वै सकला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः ।।

विघ्नान्यनेकरूपाणि क्षयं यास्यंत्यसंशयम् ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख० 18/9-12)

तब शिवजी ने वरदान दिया कि सभी देवी-देवताओं की पूजा और हर मांगलिक काम से पहले गणेश की पूजा की जाएगी। इनके बिना हर पूजा और काम अधूरा माना जाएगा।

धन्योसि कृतकृत्योसि पूर्वपूज्यो भवाधुना ।

सर्वेषाममराणां वै सर्वदा दुःखवर्जितः ।। (शिवपुराण,रुद्रसेहिता,कु०ख०18.8)

गणेश चतुर्थी

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी महोत्सव पूरे देश में उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है। शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेश पुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण+पति = गणपति। स्कृतकोशानुसार गणअर्थात पवित्रक। पतिअर्थात स्वामी, ‘गणपतिअर्थात पवित्रकों के स्वामी।

  • इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है।
  • गणेश जी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेश जी की) सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।
  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए।
  • गणेश जी की आरती और पूजा किसी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले की जाती है और प्रार्थना करते हैं कि कार्य निर्विघ्न पूरा हो।

श्रीगणेश भगवान का पूजन व व्रत विधि – भगवान गणेश को प्रातःकाल, मध्याह्न और सायाह्न में से किसी भी समय पूजा जा सकता है। परन्तु गणेश-चतुर्थी के दिन मध्याह्न का समय गणेश-पूजा के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मध्याह्न के दौरान गणेश-पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त कहलाता है।

गणेश-पूजा के समय किये जाने वाले सम्पूर्ण उपचारों को नीचे सम्मिलित किया गया है। इन उपचारों में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह उपचार भी शामिल हैं। दीप-प्रज्वलन और संकल्प, पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व किये जाते हैं। अतः दीप-प्रज्वलन और संकल्प षोडशोपचार पूजा के सोलह उपचारों में सम्मिलित नहीं होते हैं।

यदि भगवान गणपति आपके घर में अथवा पूजा स्थान में पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित हैं तो षोडशोपचार पूजा में सम्मिलित आवाहन और प्रतिष्ठापन के उपचारों को त्याग देना चाहिये। आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा नवीन गणपति मूर्ति (मिट्टी अथवा धातु से निर्मित) की ही की जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि घर अथवा पूजा स्थान में प्रतिष्ठित मूर्तियों का पूजा के पश्चात विसर्जन के स्थान पर उत्थापन किया जाता है। गणेश चतुर्थी पूजा के दौरान भक्तलोग भगवान गणपति की षोडशोपचार पूजा में एक-विंशति गणेश नाम पूजा और गणेश अङ्ग पूजा को भी सम्मिलित कर लेते हैं।

  • अपने सामथ्र्य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें (शास्त्रों में मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना को ही श्रेष्ठ माना है)।
  • संकल्प मंत्र के बाद षोडशोपचार पूजन व आरती करें।
  • गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं।
  • मंत्र बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं।
  • 21 लड्डुओं का भोग लगाएं।
  • इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास चढ़ाएं और 5 ब्राह्मण को दे दें। शेष लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें।
  • ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पूजन के समय यह मंत्र बोलें

ऊं गं गणपतये नम:

दूर्वा दल चढ़ाने का मंत्रगणेशजी को 21 दूर्वा दल चढ़ाई जाती है।

  • ऊं गणाधिपतयै नम:
  • ऊं उमापुत्राय नम:
  • ऊं विघ्ननाशनाय नम:
  • ऊं विनायकाय नम:
  • ऊं ईशपुत्राय नम:
  • ऊं सर्वसिद्धप्रदाय नम:
  • ऊं एकदन्ताय नम:
  • ऊं इभवक्त्राय नम:
  • ऊं मूषकवाहनाय नम:
  • ऊं कुमारगुरवे नम:

इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।

अनंत चतुर्दशी के दिन ही क्यों होता है गणेश विसर्जन- अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है भगवान गणपति जल तत्व के अधिपति है इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को इनका पूजन कर इनकी मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से श्री वेद व्यास जी ने भागवत कथा गणपति जी को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे गणपति जी ने अपने दांत से लिखा था। दस दिन उपरांत जब वेद व्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत अधिक हो गया है तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के कुंड में ले जाकर ठंडा किया था इसलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश स्थापना की जाती है तथा कर भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात अनंत चतुर्दशी को उन्हें शीतल कर उनका विसर्जन किया जाता है।

भगवान श्रीगणेश की आरती

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।

नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।

कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।

दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव…

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।

चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।

रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव…

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।

सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।

दास रामाचा वाट पाहे सदना।

संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,

सुरवरवंदना॥ जय देव…।

मान्यताएं- क्या करें क्या ना करें…

  • हिंदू धर्म के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए. यदि आप भूलवश चंद्रमा का दर्शन कर भी लें तो जमीन से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर पीछे की तरफ फेंक दें.
  • गणेश चतुर्थी की पूजा में किसी भी व्यक्ति को नीले और काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए. ऐसे में लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है.
  • गणपति की पूजा करते वक्त कभी तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए. मान्यता है कि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था. गणेश भगवान ने नाराज होकर उन्हें श्राप दिया था.
  • गणपति की पूजा में नई मूर्ति का इस्तेमाल करें. पुरानी मूर्ति को विसर्जित कर दें. घर में गणेश की दो मूर्तियां भी नहीं रखनी चाहिए.
  • भगवान गणेश की मूर्ति के पास अगर अंधेरा हो तो ऐसे में उनके दर्शन नहीं करने चाहिए. अंधेरे में भगवान की मूर्ति के दर्शन करना अशुभ माना जाता है.

तांत्रिक परम्परा और गणेश

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तांत्रिक परम्परा में गणपति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है वे वाममार्ग के आराध्य देवता के रूप में पूजित हुये। शिव की तरह उनके मस्तक पर चन्द्रकला विराजमान हुई और माल पर तीसरा नेत्र । विष्णु के समान चतुर्भुज धारी बनकर उन्होंने शंख, पाश, अंकुश या धनुषबाण धारण किया।’

  • एकदन्त, गजमुख और लम्बोदर, आकृति, परशु आयुद्य – गणपति की प्राचीनतम विशेषताएँ थीं। गुप्तकाल में चार भुजाओं तीन नेत्रों, व्यालयज्ञोपवीत और मूषक वाहन का वर्णन मिलने लगा, मध्ययुग में आकर इन्हीं पूर्व परम्पराओं का सुव्यवस्थितसंकलन किया ।
  • बृहतसंहिता के अनुसार हाथी के समान मुख वाली लम्बे उदर वाली, कुठार धारिणी एक दाँत वाली और मूलकन्द तथा सुनील दलकन्द धारण की हुई प्रतिमा बनायें । चिरकाल से हमारा भारतदेश आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न रहा है। हमारे पूर्वजों ने ऐसे अनेक पर्यों को प्रवर्तित किया है, जिनमें सेतू से लेकर हिमाचल पर्यन्त एक ही रीति से उत्सव मनाये जाते हैं ।
  • उनपर्यों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी विशेष महत्वपूर्ण हैं । प्रान्त के भेद से कोई इसको “विनायक चतुर्थी” कहते हैं तथा कोई “गणेश चतुर्थी” ।’ | गणेश संहारक नहीं है पर आत्मरक्षण में उनके समान समर्थ कोई दूसरा नहीं है । वे विनाशक नहीं है किन्तु उनकी रक्षात्मकता इतनी प्रबल है कि जो उसे क्षुष्ण करने जाता है, वही समाप्त हो जाता है, इसलिये भगवान गणेश विध्न विनाशक हैं

पाँच प्रमुख हिन्दू देवों में गाणपत्य के ईष्टदेव गणपति का महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद, अथर्ववेद, ऐतरेय ब्राह्मण और शुक्ल यजुर्वेद में गणपति शब्द प्रायः किसी भी गण स्वामी के लिये प्रयुक्त होने वाला एक विशेषण है।

भारतीय देव परम्परा में गजानन गणेश आदिदेव है । पौराणिक शिव परिवार में वे अम्बिका और महादेव के द्वितीय पुत्र और ऋद्धि- सिद्धि के स्वामी हैं ।

बौधायन धर्मसूत्र में गणेश

बौधायनगृह्यसूत्र और बौधायन धर्मसूत्र 4 में विध्न के पार्षदों का वर्णन है तथा बौधायन धर्म सूत्र में ही विनायक को रूद्र-पुत्र कहा गया है । ई0पू0 छठवीं शती के बौधायन धर्मसूत्र में गणेश के तर्पण का उल्लेख हुआ है, इसी प्रसंग में गणेश के अनेक नामों की भी चर्चा की गई है, जैसे- विघ्न विनायक, गजमुख, एकदन्त, वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि । पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ है, उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठी शती ई0पू0 के लगभग कर ली गई थी।

  • आठवीं शती में तंत्रयान एवं बज्रयान का उदय हुआ । विशेषकर महायान बौद्ध सम्प्रदाय में उसका प्रभाव गणेश पर भी पड़ा । साधना तंत्र के अनुसार पंचमकार (मत्स्थ, मदिरा, मैथुन, मॉस, मुद्रा) से गणेश की पूजा-अर्चना करनी चाहिए । “शारदा तिलक” तंत्र में उचिष्ट गणेश का उल्लेख है। इस रूप में उनकी प्रतिमाएं अश्लील हैं और उन्हें देवी के साथ मैथुनरत अथवा क्रामक्रीड़ा में निमग्न अंकित किया गया है । (ऐसी ही एक प्रतिमा नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित है जिसमें गणेश की जंघा पर देवी विराजमान है व गणेश आलिंगन बद्ध है)।

Popular Religion and Folklore of Northern India में ब्रिटिश प्राच्यविद William Crooke का विचार है कि गणेश मूल रूप में पशु जाति से सम्बन्धित थे ।’ गणेश का सम्बन्ध नागों से भी है । नाग शब्द संस्कृत में गज के नाम से भी जाना  जाता है ।

  • उत्तर भारत के धर्म और लोकतत्व पर लिखित अपने ग्रन्थ में कुक लिखते हैं कि ,गणेश का सम्बन्ध वन्य पशुपूजकों और ग्रामीण कृषकों के साथ रहा है। गणपति का एक दाँत वस्तुतः हल के फाल का प्रतीक है । जिससे कृषकों को समृद्धि प्राप्त होती है । भाद्रपद मास में जब फसल पकने लगती है। तब गणपति का पूजन कृषको की धन-धान्य कामना का ही ,विस्तृत विकसित रूप है । गणपति का प्रारम्भिक रूप आदिम जातियों से सम्बन्धित रहा होगा । बाद में उनका महत्व बढ़ता गया और जनमानस में लोकप्रिय हो गये । गणपति का महत्व पौराणिक काल में बहुत बढ़ गया था ।

“ब्राह्माण्ड-पुराण” में शिव भगरी वाराणसी में गणेश की नित्य पूजा का उल्लेख है सभी देवों से पूर्व उनकी पूजा करने का आदेश शिव से प्राप्त हुआ था । सभी कार्यों में सफलता प्राप्ति के लिए जातकर्म व गर्भाधान आदि संस्कारों के समय, यात्रा के समय, वाणिज्य में तथा हर तरह के कार्य को कठिनाई में गणेश की स्तुति करनी चाहिए, क्योंकि वे दक्ष्यमाण है । ये शिव के गणों के स्वामी हैं इसलिए गणेश कहे जाते हैं । उनके उदर में भूत, भविष्य तथा वर्तमान अखिल ब्रह्माण्ड व्याप्त है । इसलिये वे लम्बोदर भी  कहे जाते हैं उनका मूल मानव सिर कट गया दुबारा उन्हें गज के सिर से युक्त किये जाने के कारण उन्हें गजानन कहा गया है। प्राचीन समय में सप्त ऋषियों ने शाप से अग्नि को नष्ट ,कर दिया । उसे पुनः प्रदीप्त करने के कारण वे शूपकर्ण कहे जाते हैं । चतुर्थी के दिन ,चन्द्रमा को इन्होंने अपने मस्तक पर धारण किया । अतः वे भालचन्द्र कहे जाते हैं। देवासुर ,राक्षस के संग्राम के समय में देवताओं के विध्न दूर करने के कारण वे विध्न विनाशक कहे गये ।  तुण्ड के वक्र होने के कारण इन्हें वक्रतुण्ड भी कहा जाने लगा ।

गणेश की एकदन्त से सम्बन्धित कई कथायें प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार- जामदमय ने परशु से इनका एक दाँत तोड़ डाला था, जिससे इनका नाम एकदन्त पड़ गया । गणेश के एकदन्ती का प्रसिद्ध कथानक “ब्रह्माण्ड पुराण” में भी किया गया है । जिसके अनुसार एक बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम शिव के दर्शन के लिये कैलाश पर्वत पर गये उस समय शिव और पार्वती वार्तालाप कर रहे थे और किसी का भी प्रवेश प्रतिबन्धित था द्वार पर परशुराम के आते ही गणेश ने आगे जाने से रोक दिया, फलतः परशुराम और गणेशं में संघर्ष हो गया । परशुराम ने अपने परशु से प्रहार कर गणेश का एक दाँत तोड़ दिया, तब से गणेश एकदन्ती हो गये ।

श्री राघव चैतन्य कृत महागणपति स्तोत्र के अनुसार-

इत्वं विष्णुशिवादितत्क्तनवें श्रीं क्क्रतुण्डायहुँ

काराक्षिप्त समस्त दैत्यप्रतनान्नाताय दीप्य विषै।

आनन्दैकरसावबोध लहरीं विध्वस्त सर्वोर्मये

सर्वत्र प्रथमानमुग्धमहसें तस्मैं परस्मैं नमः ।।

अर्थात इस प्रकार विष्णु, शिव आदि तत्व शरीर वाले, हुँकार मात्र से दैत्य समूहको मार डालने में समर्थ अत्यन्त उद्वीप्त दीप्ति वाले आनन्दैकरसमय ज्ञान लहरी से समस्तउर्मियों को विध्वस्त करने वाले उन परमात्मा वक्रतुण्ड को नमस्कार है। जिनका मनोहरतेज सर्वत्र व्याप्त है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में गणेश को ब्रह्मा, विष्णु,शिव इन्द्रादि समस्त देवों  एवं इस सारी सृष्टि का आविर्भाव कर्ता बताते हुए ब्रह्म बताया गया है :-

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेत-

तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता।

तथेन्द्रादयो देवसंघा मनुष्याः ।

सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।।३।

योगशास्त्र के अनुसार मूलाधार चक्र में गणेश का वास माना गया है। इस प्रकार विश्व के उद्गम एवं विकास के परम कारण ओंकार स्वरूप गणेश ही पर ब्रह्म हैं। वे ही सत्व,रज तथा तम के अधीश्वर जगत के कारण हैं अनेक रूपों में विद्यमान हैं। दीर्घतमा ऋषि के अनुसार “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”। अर्थात एक ही होते हुए उसको अनेकों रूपों में विद्वान् लोग बताते हैं।

भगवान गणेश के विविध नामों का वर्णन

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गणेश वैदिक देव है इसी कारण उनके नामों की विविधता वैदिक वाड्मय और शास्त्रीय ग्रन्थों में बहुलता से पायी गई है। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में मान्य असंख्य देवों में प्रमुख देव अर्थात् विष्णु शिव और देवी दुर्गा एक ही तत्व होने पर क्रमशः विष्णुसहस्त्रनाम’, शिवसहस्त्रनाम और दुर्गाशतनाम सहस्त्रनाम आदि ग्रन्थों में गुण-कर्मानुसार एक हजार नामों से अभिहित किये गये है। उसी प्रकार गकारादि श्रीगणपति सहस्त्रनामस्तोत्रम में श्रीगणेश के एक हजार नाम दिये गये है।

  • इसके अतिरिक्त ‘श्रीवक्रतुण्डमहागणपति सहस्त्रनामावलिः’ और गणेश पुराण के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध ‘गणपतिसहस्त्रनाम’ आदि ग्रन्थों में श्री गणेश के एक हजार नाम है। गणेश पुराण में उपासनाखण्ड के ‘श्री गणपत्यष्टोत्तरशतनाम’ नामक स्तोत्र में गणेश के सौ नाम दिये गये है। गणेश पुराण में दिये गये गणेश कवच में भी गणेश के विविध नाम आयें है।
  • वैदिक वांड्:मय में गणेश के नाम एवं स्वरूप ऋग्वेद और यजुर्वेद के ‘गणानां त्वां गणपति हवामहें’ मंत्र में गणपति शब्द के लिये कविनाकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति और प्रियपति, निधिपति आदि नाम प्रयुक्त हुये है। इन्ही वेदों में उनके माधवन, द्वैमातुर, और वक्रतुण्ड नाम भी मिलते है। लेकिन इन मंत्रों में गणपति शब्द का प्रयोग ‘ब्रह्मणस्पति’ की उपाधि के रूप में आया है।

आचार्य सायण भी लिखते है- यह गणेश के लिये नही ब्रह्मणस्पति के लिये है जो देवादि गुणों के अधिपति है। ऋग्वेद में इन्द्र को गणपति के रूप में सम्बोधित किया गया है। तैत्तिरीय संहिता एवं वाजसनेही संहिता में इस मंत्र का अभिप्राय अश्वमेघ के घोड़े से है न कि गणेश से। ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट आया है कि ‘गणानां त्वां’ नामक मंत्र ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित है। तात्पर्य यह है कि पूर्ववर्ती ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ‘गणपति नाम का प्रयोग हुआ है किन्तु पौराणिक युग के गणपति या गणेश के रूप में उनको कल्पना नहींहुई है। अतः मध्यकाल में गणेश के विलक्षण रूप के अनुरूप जो हस्तिमुख, लम्बोदर आदि वर्णितहै वे वैदिक संहिता में नही पाये जाते है।

गणपति का स्पष्ट उल्लेख मैत्रायणी संहिता की गणेश गायत्री तथ गणपत्यर्थशीर्ष में जिसे गणेशोपनिषद् भी कहते हैं, में मिलता है। गणेश गायत्री में उनके हस्तिमुख, एकदन्त वक्रतुण्ड तथा दन्ती’ नाम मिलते है तो अथर्वशीर्ष के मंत्रों में उन्हें व्रातपति, गणपति, प्रथमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय, श्री वरदमूर्ति कहा गया। लेकिन विद्वानों ने गायत्री वाले इन भागों और गणेशोपनिषद् को बहुत बाद का माना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ईसवी सन् के बहुत पहले गणपति का साहित्य में प्रवेश हो चुका था। मूर्तिकला के क्षेत्र में उनका अस्तित्व बहुत बाद में आया। कदाचित इनकी उपासना को शास्त्रीय धरातल एवं मान्यता प्राप्त करने में समय लग गया होगा।

पौराणिक युग में गणपति या गणेश के जिस स्वरूप का विकास हुआ उसके अनेक तत्वों की कल्पना छठीं शताब्दी ई०पू० में ही कर ली होगी। क्योंकि ई०पू० छठी शताब्दी के ‘बौधायन धर्मसूत्र’ में गणेश के तर्पण की गणना की गयी है जैसे विघ्नविनायक, गजमुखी, एकदन्त वक्रतुण्ड, लम्बोदर आदि प्रारम्भ में गणेश मानवगृहसूत्र और याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के रूप में उद्धृत हुये। मानवग्रह्य सूत्र में विनायकों का उल्लेख हुआ है। उनकी संख्या चार है- शालकटंक, कुष्माण्ड राजपुत्र, उस्मित और देवयजन।

याज्ञवल्क्य स्मृति में विनायक के चार नाम है- मित, सम्मित, शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र । विश्वरूप व अपरार्क ने भी विनायक के चार नाम ही बताये है। किन्तु मिताक्षरा ने शालकटंक एवं कूष्माण्ड राजपुत्र के दो-दो भागों में तोड़कर दृढ़ नाम दिये है- मित, सम्मित शाल, कटकट, कूष्माण्ड एव राजपुत्र’ अतः यह कहा जा सकता है कि गणेश वादक दवा का पाक्तमें किसी देशोभ्दव जाति से आये और रूद्र (शिव) के साथ जुड़ गये।

छठीं-सातवीं शताब्दी के लगभग गाणपत्य सम्प्रदाय के अस्तित्व में आने के बाद गणपति-स्वरूप के विभिन्न पक्ष अस्तित्व में आये। उनके स्वरूप की कुछ विशिष्टायें पहले से ही आकार लेने लगी थी। गाणपत्य सम्प्रदाय से सम्बंधित साहित्य में वेदमंत्रों को गणेश से जोड़ते हुये उन्हें इनके लिये प्रयोग किया गया, जिससे गणेश का स्तर, देवसमूह में विशिष्ट हुआ। ऋग्देव, कविनांकवि, ज्येष्ठराज, ब्रह्मणस्पति, माधवन, द्वैमातुर तथा यजुर्वेद के देवता प्रियपतिनं, निधिपतिं वक्रतुण्ड आदि उपाधियॉ गाणपत्य उपनिषदों में गणेश के लिये प्रयुक्त है। गाणपत्य साहित्य ने

गणेश के स्वरूप के विकास में भी वैदिक देवों के स्वरूप से ही तत्व ग्रहण किया। उदाहरणार्थ अंकुश, वज्र व कमल इन्द्र से व्याघ्र चर्म और अर्ध चन्द्रमा शिव से पाश वरूण से, कुठार ब्रह्मणस्पति से ग्रहण किये गये। इस तरह उनका स्वरूप वैदिक देवों के सदृश विकसित हुआ।

पुराणों में गणेश के नाम एवं स्वरूप – परवर्ती विद्वानों ने भी अपने ग्रन्थों में श्री गणेश के अनेकों नाम दिये है। काशी के जंगमवाड़ी मठ के श्री शिवलिंग शिवाचार्य ने श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामवलिः नामकी पुस्तक में 108 नाम दिये है अमरकोश के एक श्लोंक में भी गणेशजी के आठ नाम दिये गये है।

जो इस प्रकार है- विनायकविघ्नराजद्वैमातुरगणाधिपएकदन्तहेरम्बलम्बोदर और गजानन। इनमें से कुछ नाम वेदों में प्रसिद्ध आठ नामों से साम्य रखते है और कुछ उनके प्रमुख आठ अवतरों के समान है।

वेदों में वर्णित आठ नाम है- गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजववत्रं, गुहाग्रजम् ।

प्रमुख आठ अवतार है- वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजानन, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण।

वेदों के एकदन्त, हेरम्ब और लम्बोदर ये तीन नाम अमरकोश मे मिलते है तो आठ अवतारों के एकदन्त, गजानन, लम्बोदर और विध्नराज नाम मिलते है। इन तीनों में दो-दो नामों को क्रमशः द्वैमातुर, विनायक, गजववत्र, गुहाग्रज और वक्रतुण्ड, धूम्रवर्ण का विशिष्ट विवरण प्राप्त होता है। थानाभाव के कारण उनके आठ अवतारस्वरूप नामों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है- वक्रतुण्ड- उनका यह रूप ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला मत्सरासर का वध करने वाला तथा सिंहवाहन पर चलने वाला है।

गणेश पुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तिम अध्याय में बनारस के 56 गणेश रूपों का वर्णन मिलता है– गणेश के सात आवरणों की चर्चा हैं जिनमें 56 विनायक विद्यमान है-

  1. प्रथम आवरण- मैं दुर्गा विनायक, भीमचण्डी विनायक, देहलीगणप, उदण्ड विनायक, पाशपाणि, सर्वविध्नहरण विनायक।
  2. द्वितीय- आवरण-लम्बोदर, कूटदन्त, शूलंटक, कूष्माण्ड, मुडविनायक, विकटद्विज विनायक, राजपुत्र, व प्रणवाक्य विनायक।
  3. तृतीय आवरण- वक्रतुण्ड, एकदंत, त्रिमुख विनायक, पंचास्य विनायक, हेरम्ब, मोदकप्रिय ।
  4. चतुर्थ आवरण- सिंहतुण्ड  विनायक, पुण्यताक्ष, क्षिप्रप्रसाद, चिंतामणि, दंतहस्त, प्रचण्ड और दण्डमुण्डविनायक।
  5. पाँचवा आवरण- स्थूलदंत, कलिप्रिय, चतुर्दन्त, द्वितुण्ड, गजविनायक, काल विनायक, मार्गेशालयविनायक।।
  6. छठा आवरण- मणिकार्णिका विनायक, आशासृष्टि विनायक, यक्षारण्य, गजकर्ण, चित्रघंट वसुमंगलमित्र विनाय।
  7. सातंवा आवरण- मोद, प्रमोद, सुमुख, दुर्मुख, गणय, एवं ज्ञान विनायक ।

इसके अतिरिक्त अविमुक्त, मोक्षदाता, भगीर विनायक, हरिश्चन्द्र विनायक, कपर्दी व बन्दु विनायक के नामों का भी उल्लेख हुआ है।

पदम् पुराण में उनके 12 नामों का उल्लेख भी मिलता है- गजपति, विघ्नराज,लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्बर, एकदन्त, गणाधिप विनायक, चारूकर्ण, पाशुपाल, भवत्तनय यहनाम उनके कुछ मूर्ति विज्ञानी स्वरूप की भी अभिव्यक्ति करते है।

अग्नि पुराण में जहां गणेश के प्रतिमा शास्त्रीय स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- कि वे गजमुखी, वक्रतुण्ड, एकदन्त बड़े उदर वाले, धूम्रवर्णी चतुर्भुजी है। वहीं गणेश के अनेकनामों का उल्लेख भी इस पुराण में प्राप्त होता है। कुछ नाम उनके प्रतिमा के स्वरूप को उद्घाटितकरते है। जैसे वक्रतुण्ड, एकदन्त, महोदर, गजवक्र, लम्बकुक्षी, धूम्रवर्ण।

गरूड़ पुराण में गणेश के बारह नाम दिये गये है- जिनमें एकदन्त, वक्रतुण्ड, त्रयम्बक(त्रिनेत्र.) नीलग्रीवा, लम्बोदर, धूम्रवर्ण, बालचन्द्र, हस्तिख जैसे नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप की ओर इंगित करता है।

स्कन्द पुराण में गणेश के पंचमुखीदशभुजी और त्रिनेत्र स्वरूप का वर्णन करता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उनके आठ नाम- गणेश, एकदन्त, हेरम्बर, विघ्ननायक, लम्बोदर,शूर्पकर्ण, गजववत्र और गुहाग्रज है। इनमें से कुछ नाम उनके प्रतिमाशास्त्रीय स्वरूप जैसे लम्बोदर,एकदन्त शूपकर्ण का उल्लेख करते है।

मुद्गल पुराण में भी गणेश के स्वरूप से सन्दर्भित विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। यहपुराण गणेश के नौ विभिन्न स्वरूपों का विवरण देता है, जिनमें अधिकांश प्रतिशास्त्रीय स्वरूपध्यान से जुड़े हुये है। गणेश के स्वरूप को विवेचित करते हुये एक स्थल पर इसी में उन्हें मनुष्य एकदन्त, दुढिं कहा गया है। उन्हें सिद्धि और बुद्धि का पति भी कहा गया है।

गणपति 108 नामावली

श्री गणेश, गजानन, लंबोदर, विनायक के कई हजार नाम हैं लेकिन उन सभी का वाचन संभव नहीं अत: भक्त अपनी सुविधा से 108 नामों का पाठ कर सकते हैं। यह 108 गजानन नाम श्री गणेश को प्रसन्न करते हैं और वे यश, कीर्ति, पराक्रम, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सफलता, धन, धान्य, बुद्धि, विवेक, ज्ञान और तेजस्विता का आशीष प्रदान करते हैं। श्री गणेश के 108 नामों का अर्थ-

  1. बालगणपति सबसे प्रिय बालक
  2. भालचन्द्र मस्तक पर चंद्रमा
  3. बुद्धिनाथ बुद्धि के भगवान
  4. धूम्रवण धुंए को उड़ाने वाला
  5. एकाक्षर एकल अक्षर
  6. एकदन्त एक दांत वाले
  7. गजकण हाथी की आंखें
  8. गजानन हाथी मुँख वाले
  9. गजनान हाथी के मुख वाले
  10. गजव हाथी की सूंड वाला
  11. गजवक्त्र हाथी जैसा मुंह
  12. गणाध्यक्ष गणों का मालिक
  13. गणपति गणों का मालिक
  14. गौरीसुत माता गौरी का बेटा
  15. लम्बकर्ण बड़े कान वाले देव
  16. लम्बोदर बड़े पेट वाले
  17. महाबल अत्यधिक बलशाली
  18. महागणपति देवातिदेव
  19. महेश्वर ब्रह्मांड के भगवान
  20. मंगलमूर्ति शुभ कार्य के देव
  21. मूषकवाहन जिसका सारथी मूषक
  22. निधिश्वरम  धन और निधि के दाता
  23. प्रथमेश्वर सब के बीच प्रथम 
  24. शूपकर्ण  बड़े कान वाले देव
  25. शुभम शुभ कार्यों के प्रभु
  26. सिद्धिदाता इच्छाओं के स्वामी
  27. सिद्दिविनायक सफलता के स्वामी
  28. सुरेश्वरम देवों के देव
  29. वक्रतुण्ड घुमावदार सूंड
  30. अखूरथ जिसका सारथी मूषक है
  31. अलम्पता अनन्त देव
  32. अमित अतुलनीय प्रभु
  33. अनन्तचिदरुपम अनंत चेतना
  34. अवनीश पूरे विश्व के प्रभु
  35. अविघ्न बाधाओं को हरने वाले
  36. भीम विशाल
  37. भूपति धरती के मालिक
  38. भुवनपति देवों के देव
  39. बुद्धिप्रिय ज्ञान के दाता
  40. बुद्धिविधाता बुद्धि के मालिक
  41. चतुर्भुज चार भुजाओं वाले
  42. देवादेव सभी भगवान में सर्वोपरी
  43. देवांतकनाशकारी बुराइयों और असुरों के विनाशक
  44. देवव्रत तपस्या स्वीकार करने वाले
  45. देवेन्द्राशिक  सभी देवताओं के रक्षक
  46. धामिज्क दान देने वाला
  47. दूजा अपराजित देव
  48. द्वैमातुर दो माताओं वाले
  49. एकदंष्ट एक दांत वाले
  50. ईशानपुत्र शिव के बेटे
  51. गदाधर जिसका हथियार गदा
  52. गणाध्यक्षिण पिंडों के नेता
  53. गुणिन सभी गुणों क ज्ञानी
  54. हरिद्र स्वर्ण के रंग वाला
  55. हेरम्ब मां का प्रिय पुत्र
  56. कपिल पीले भूरे रंग वाला
  57. कवीश कवियों के स्वामी
  58. कीत्ति: यश के स्वामी
  59. कृपाकर कृपा करने वाले
  60. कृष्णपिंगाश पीली भूरी आंखवाले
  61. क्षेमंकरी माफी प्रदान करने वाला
  62. क्षिप्रा  आराधना के योग्य
  63. मनोमय दिल जीतने वाले
  64. मृत्युंजय मौत को हरने वाले
  65. मूढ़ाकरम  जिन्में खुशी का वास
  66. मुक्तिदायी शाश्वत आनंद के दाता
  67. नादप्रतिष्ठित जिसे संगीत से प्यार हो
  68. नमस्थेतु सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
  69. नन्दन भगवान शिव का बेटा
  70. सिद्धांथ सफलता और उपलब्धियों की गुरु
  71. पीताम्बर पीले वस्त्र धारक
  72. प्रमोद आनंद
  73. पुरुष अद्भुत व्यक्तित्व
  74. रक्त लाल रंग के शरीर वाला
  75. रुद्रप्रिय शिव के चहेते
  76. सर्वदेवात्मन सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
  77. सर्वसिद्धांत कौशल और बुद्धि के दाता
  78. सर्वात्मन ब्रह्मांड के रक्षक
  79. ओमकार ओम के आकार वाला
  80. शशिवण रंग चंद्रमा को भाता हो
  81. शुभगुणकानन सभी गुण के गुरु
  82. श्वेता जो सफेद रंग में शुद्ध है
  83. सिद्धिप्रिय इच्छापूर्ति वाले
  84. स्कन्दपूर्व कार्तिकेय के भाई
  85. सुमुख शुभ मुख वाले
  86. स्वरुप सौंदर्य के प्रेमी
  87. तरुण जिसकी कोई आयु न हो
  88. उद्दण्ड शरारती
  89. उमापुत्र पार्व के बेटे
  90. वरगणपति  अवसरों के स्वामी
  91. वरप्रद  इच्छाओं के अनुदाता
  92. वरदविनायक सफलता के स्वामी
  93. वीरगणपति वीर प्रभु
  94. विद्यावारिधि बुद्धि की देव
  95. विघ्नहर बाधाओं को दूर करने वाले
  96. विघ्नहर्ता बुद्धि की देव
  97. विघ्नविनाशन बाधाओं के नाशक
  98. विघ्नराज सभी बाधाओं के मालिक
  99. विघ्नराजेन्द्र बाधाओं के भगवान
  100. विघ्नविनाशाय बाधाओं के नाशक
  101. विघ्नेश्वर बाधाओं के हरने वाले
  102. विकट अत्यंत विशाल
  103. विनायक सब का भगवान
  104. विश्वमुख  ब्रह्मांड के गुरु
  105. विश्वराजा संसार के स्वामी
  106. यज्ञकाय सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
  107. यशस्कर प्रसिद्धि,भाग्य के स्वामी
  108. यशस्विन सबसे लोकप्रिय देव
  109. योगाधिप ध्यान के प्रभु

भगवान गणेश से जुड़ी कथा

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पहली कहानी : गणेश के एकदंत बनने की कथा- आपने देखा होगा भगवान श्री गणेश की मूर्ति में एकदन्त आधा टुटा हुआ है | यह दांत कैसे टुटा , इसके पीछे पुराणों में अलग अलग कथाये बताई गयी है | कही लिखा हुआ है विष्णु के अवतार चिरंजीवी भगवान परशुराम जी ने इसे तोडा है | तो कही महाभारत काव्य को लिखने के लिए | कही यह भी लिखा है की कार्तिकेय ने खेल खेल में गणेश जी का दन्त तोड़ दिया था |

पूरी कथा : कैसे बने गणेश जी एकदंत , कथा

दूसरी कहानी : गणेश और तुलसी जी की कहानी- तुलसी जी और गणेश ने एक दुसरे को श्राप दे दिया जिससे तुलसी का विवाह एक असुर से तो गणेश जी का विवाह अकारण ही हो गया | तभी से तुलसी जी गणेश जी की पूजा में नही चढ़ाई जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी के तुलसी नही चढ़ाई जाती है |

तीसरी कहानी : गणेश ने किया कुबेर का घमंड चूर- एक बार धन के देवता कुबेर को अत्यंत घमंड हो गया | उन्होंने महा भोज आयोजित किया | गणेश जी को उन्हें सबक सिखाना था | इसलिए लम्बोदर गणेश ने कुबेर के सारे खजाने ही खा लिए |

पूरी कथा : कथा , कैसे गणेश ने कुबेर का घमंड दूर किया 

चौथी कहानी : कैसे हुआ गणेश का विवाह एक चूहे ने दिखाई चतुराई- गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश के रूप के कारण उनका विवाह हो नही पा रहा था | वे और उनके मूषक इसी कारण चिढचिढ़े हो गये | जब भी कही विवाह होता उनका मूषक विवाह में खाद सामग्री कुतरना शुरू कर देता।

पूरी कथा : कैसे हुआ गणेश जी का विवाह |

पांचवीं कहानी : गणेश को क्यों प्रिय है दूर्वा- गणेश ने बार बार अवतार लेकर देवी देवताओ और मनुष्यों की रक्षा की है | पर एक बार एक ऐसा असुर हुआ जिसे निगलने से गणेश जी तड़पने लगे|

पूरी कथा : कथा गणेश और दूर्वा की – क्यों गणेश जी को दूर्वा प्रिय है |

छठी कहानी :  इस कारण गणेश और लक्ष्मी के साथ पूजे जाते है- गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा दीपावली पर की जाती है | गणेश प्रथम पूज्य देवता है तो धन की देवी लक्ष्मी जी को माना गया है | व्यक्ति के पास धन के साथ बुद्धि होना भी जरुरी है , इसी कारण गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ की जाती है |

पूरी कथा : क्यों गणेश और लक्ष्मी की पूजा एक साथ की जाती है |

सातवीं कहानी :  क्यों गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है – बुद्धि के देवता ने अपने ज्ञान के बल पर छोटे से मूषक से सम्पूर्ण ब्रहमांड के साथ चक्कर लगा लिए थे | तब शिव ने इन्हे प्रथम पूज्य का वरदान दिया |

पूरी कथा : क्यों गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता का वरदान मिला |

आठवीं कहानी : चंद्रमा को गणेश का श्राप- आपने देखा होगा की भगवान चन्द्र  हर दिन अलग अलग आकार के होते है | अमावस्या पर वे दिखाई नही देते तो पूर्णिमा पर पुरे दिखाई देते है | यह सब हुआ गणेश जी के चन्द्र देवता पर रुष्ट होने के कारण

पूरी कथा :  क्यों गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया |

श्रीगणेश की प्रतिमा के दाईं या बाईं सूंड का क्या है रहस्य

दाईं सूंड- जिस प्रतिमा में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ है दक्षिण दिशा या दाईं बाजू। दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है। जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है।

  • इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को ‘जागृत’ माना जाता है।
  • दाईं सूंड वाली मूर्ति की पूजा में कर्मकांड का विषेश महत्व होता है।
  • पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक होता है।

बाईं सूंड जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है।

  • पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है।
  • इसकी पूजा प्रायिक पद्धति से की जाती है।
  • इन  गणेश जी को गृहस्थ जीवन के लिए शुभ माना गया है।
  • इन्हें विशेष विधि विधान की जरुरत नहीं लगती। यह शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
  • थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं। त्रुटियों पर क्षमा करते हैं।

गणेश जी का हर अंग है ज्ञान की पाठशाला

गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। इसलिए हर साल भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश उत्सव मनाया जाता है। गणेश को वेदों में ब्रह्मा, विष्णु, एवं शिव के समान आदि देव के रूप में वर्णित किया गया है। इनकी पूजा त्रिदेव भी करते हैं। भगवान श्री गणेश सभी देवों में प्रथम पूज्य हैं। शिव के गणों के अध्यक्ष होने के कारण इन्हें गणेश और गणाध्यक्ष भी कहा जाता है। भगवान श्री गणेश मंगलमूर्ति भी कहे जाते हैं क्योंकि इनके सभी अंग जीवन को सही दिशा देने की सिख देते हैं।

बड़ा मस्तक- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए।

छोटी आंखें- गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाले व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रकृति के होते हैं। गणेश जी की छोटी आंखें यह ज्ञान देती है कि हर चीज को सूक्ष्मता से देख-परख कर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी धोखा नहीं खाता।

सूप जैसे लंबे कान- गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं। बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देते हैं। गणेश जी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं उसे बाहर ही छोड़ दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें।

गणपति की सूंड- गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें ज्ञान देती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी दुखः और गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता है। शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हो उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश की पूजा करनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने एवं ऐश्वर्य पाने के लिए बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश की पूजा लाभप्रद होती है।

बड़ा उदर- गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण इन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली का प्रतीक होता है। गणेश जी का बड़ा पेट हमें यह ज्ञान देता है कि भोजन के साथ ही साथ बातों को भी पचना सीखें। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है वह हमेशा ही खुशहाल रहता है।

एकदंत- बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्घ हुआ था। इस युद्घ में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इस समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेश जी की बुद्घिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए।

गणपति से जुड़ी ऐसी कथाएं जो हमें जीवन का सही मार्ग दिखाती हैं

जब हुए थे माता की सेवा में उपस्थित- गणेश जी के जीवनकाल से जुड़ी यदि सबसे पहली कोई कथा का मनुष्य स्मरण करता है, तो वो माता पार्वती द्वारा गणेश की रचना. यह तब की बात है जब माता पार्वती को स्नान के लिए जाना था लेकिन उनके द्वार पर पहरा देने के लिए कोई नहीं था, तभी मां ने अपने तन की मैल से एक बच्चे की रचना की, वो थे गणेश.

मां पार्वती ने गणेश को द्वारपाल बनाकर किसी को भी अंदर ना आने का आदेश दिया. कुछ ही क्षणों में वहां भगवान शिव उपस्थित हुए, जिन्हें गणेश ने अंदर जाने के अनुमति नहीं दी. अनेक यत्नों के बाद भी जब गणेश ने भगवान शिव को अंदर ना जाने दिया तो इस बात से अंजान कि गणेश उन्हीं का पुत्र है, शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने शस्त्र से गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया. अपने पुत्र गणेश को इस तरह धरती पर कटे हुए धड़ के साथ जब माता ने देखा तो वे बेहद क्रोधित हो गईं और शिव से कहा कि वे गणेश को पहले जैसा जीवित कर दें. तभी शिव ने हाथी का सिर गणेश के शरीर से जोड़ दिया.

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे कुछ भी हो जाए हमें अपना काम बिना किसी स्वार्थ व ध्यान को ना भटकाते हुए करना चाहिए. चाहे कोई भी आवस्था हो हमें अपने से बड़ों द्वारा मिले आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए.

आपके पास जो है उसे ही उपयोगी बनाएं- यह तब की बात है जब मां पार्वती और भगवान शंकर ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिक व गणेश की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. दोनों ने अपने पुत्रों को दुनिया का तीन बार चक्कर लगाने को कहा और विजेता को इनाम के रूप में सबसे स्वादिष्ट फल देने का वादा किया. यह सुनकर कार्तिक अपने मोर पर बैठकर दुनिया का भ्रमण करने निकल गए लेकिन दूसरी ओर भगवान गणेश ने अपने माता पिता के ही चारों ओर चक्कर लगाना शुरु कर दिया. जब उनसे इस बात का कारण पूछा गया तो वे बोले कि उनका संसार स्वयं उनके माता पिता हैं, तो वे समस्त संसार का भ्रमण क्यों करें?

  • सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे पास जो भी उपस्थित चीजें हैं हमें उनमें से सबसे मूल्यवान को चुनकर उसे उपयोगी बनाना चाहिए ना कि बिना कुछ सोचे समझे जो चीज हमारे पास ना हो उसके लिए विलाप करना चाहिए. इसके अलावा यह कथा हमें अपने माता पिता को सबसे उच्च मानने की सीख भी देती है.

अच्छे कर्मों के लिए खुद का बलिदान भी करें- भगवान गणेश ने महान ऋषि वेद व्यास के कहने पर महाभारत का महान ग्रंथ स्वयं अपने हाथों से लिखा था. इस ग्रंथ को लिखने के लिए व्यास और गणेश के बीच एक समझौता हुआ था कि व्यास इसे बिना रुके सुनाएंगे व गणेश भी बिना रुके लिखेंगे. लिखते समय अचानक भगवान गणेश की कलम टूट गई लेकिन लिखावट में कोई बाधा ना आए इसके लिए भगवान गणेश ने अपना दंत तोड़कर कलम के रूप में इस्तेमाल किया.

  • सीख: अपने इस महान कार्य से भगवान गणेश हमें यह सीख देतें हैं कि जब भी किसी के भले के लिए हम कोई काम कर रहे हैं तो निस्वार्थ होकर हमें खुद का या अपनी किसी वस्तु का बलिदन करने से पीछे नहीं हटना चाहिए.

क्रोध को शांत करना सीखें- एक बार महान योद्धा परशुराम कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने आए लेकिन वहां गणेश द्वारा उनको भगवान शिव से मिलने से रोक दिया गया. जल्द क्रोधित हो जाने वाले परशुराम ने गणेश जी को युद्ध का आमंत्रण दिया. इस युद्ध में परशुराम ने गणेश जी के बाएं दांत पर प्रहार कर उसे तोड़ दिया. फलतः मां पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं. उन्होंने कहा कि परशुराम क्षत्रियों के रक्त से संतुष्ट नहीं हुए इसलिए उनके पुत्र गणेश को हानि पहुंचाना चाहते हैं. बाद में गणेश जी ने स्वयं हस्तक्षेप कर मां पार्वती को प्रसन्न किया. गणेश जी की इस अनुकम्पा को देख परशुराम जी ने उन्हें अपना परशु प्रदान कर दिया.

  • सीख: पुराणों में विख्यात इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि हमें खुद के व दूसरों के क्रोध को भी शांत करना आना चाहिए. यदि मनुष्य जीवन के संकटों को हंसी खुशी संभालना सीख जाए तो उसका सफल होना निश्चित है.

गणपति का प्रकृति प्रेम

  • गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहा उनका वाहन है, नंदी उनका मित्र और अभिभावक, मोर और सांप परिवार के सदस्य हैं, पर्वत आवास है, वन क्रीड़ा स्थल, आकाश तले निवास अर्थात छत नाम की कोई चीज है। उनका प्रचलित रूप गढ़ने में नदी की बड़ी भूमिका रही है। मान्यता है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक छोटी-सी आकृति गढ़ी और उसे गंगा में नहला दिया। गंगा के स्पर्श से आकृति में जान आई  और वह विशाल हो गई। पार्वती ने उसे पुत्र कहा, तो देवताओं ने उसे गांगेय  कहकर संबोधित किया।
  • गणेश, गणपति के रूप में गणों के अधिपति हैं, उन्हें जल का अधिपति भी माना गया है। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। उनके दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है। तीसरे हाथ में संगीत की प्रतीक वीणा है। चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या त्रिशूल है। गणेश के नाम में प्रकृति से उनके एकात्म होने का रहस्य छिपा है। यह सर्वमान्य है कि काव्य के छंद की उत्पत्ति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी।
  • गणेश, छंद शास्त्र के आठों गणों के अधिष्ठाता देवता  हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें गणेश नाम दिया गया। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है। जब तक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित न की जाए, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। 
  • शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव का एक प्रमाण यह भी है कि किसी भी मंदिर, घर या दुकान में  गणेश की मूर्ति रखते समय यह ध्यान देना होता है कि उनके पैर जमीन का निश्चित रूप से स्पर्श करें। यदि उनके पैर भूमि से सटे न हों, तो अनिष्ट की आशंका होती है। प्रकृति की शक्तियों के प्रतीक होने के कारण वह एक मासूम, शक्तिशाली, योद्धा, विद्वान, कल्याणकारी, शुभ-लाभ और कुशल-क्षेम के दाता हैं। 
  • गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। उन्हें आदिदेवता, देवताओं में प्रथम पूज्य और आदिपूज्य भी कहा गया है। इसका अर्थ है कि प्रकृति पहले, बाकी तमाम शक्तियां  और उपलब्धियां उसके बाद। हिंदू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ कहने और लिखने की परंपरा है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए  की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बैठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि तथा सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा  संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है। 
  • गणेश को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू है और इस संकट में हम  उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना और पाना है, तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हमारे भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और  जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं।

विदेशों में भी श्रीगणेश की पूजन परंपराएं

गणेशजी की मूर्तियां अफगानिस्तान, ईरान, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, थायलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, चाइना, मंगोलिया, जापान, इंडोनेशिया, ब्रुनेई, बुल्गारिया, मेक्सिको और अन्य लेटिन अमेरिकी देशों में मिल चुकी हैं।

  • जापान में भगवान गणपतिजी के 250 मंदिर हैं। जापान में श्रीगणेश को ‘कंजीटेन’ के नाम से जाना जाता है। वे वहां सौभाग्य और खुशियां लाने वाले देवता है।
  • ऑक्सफॉर्ड में छपे एक पेपर के अनुसार श्रीगणेश प्राचीन समय में सेंट्रल एशिया और विश्व की अन्य जगहों पर पूजे जाते थे।
  • श्रीगणेश की मूर्तियों और चित्रों की प्रदर्शनी दुनिया के लगभग सभी खास म्यूजियम और आर्ट गैलरियों में लग चुकी हैं। खासतौर पर यूके, जर्मनी, फ्रांस और स्वीट्जरलैंड में।
  • आयरिश लोगों का गणेशजी द्वारा भाग्य अच्छा रखने में विश्वास है। नई दिल्ली स्थित आयरलैंड एंबेसी में प्रवेश द्वार पर ही श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित की गई है।
  • गणेशजी ग्रीक सिक्के पर भी हैं। हाथी के सिर वाले भगवानों की तस्वीरें भारतीय-ग्रीक सिक्कों पर मिलीं। यह सिक्के करीबी प्रथम और तीसरी सेंचुरी बीसी के आसपास के थे।
  • इंडोनेशिया के करेंसी के नोटों पर भी श्रीगणेश की तस्वीर होती है। इंडोनेशियाई रुपिया का 20,000 का नोट। इस नोट पर की हजर देवान्तर के साथ भगवान गणेश की भी तस्वीर छपी है।

बॉलीवुड और श्रीगणेश

हिंदी फिल्मों में भी दिखती है गणेश उत्सव की धूम-

निर्माता निर्देशक दादा साहब फाल्के की 1925 में रिलीज फिल्म.. गणेशा उत्सव.. संभवत. पहली फिल्म थी जिसमें भगवान गणेश की महिमा को रपहले पर्दे पर पेश किया गया था।

1969 में फिल्म पुजारिन का गीत हो गणपति बप्पा मोरया

1977 में रिलीज फिल्म जय गणेश का गीत- जय गणेश जग गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महादेवा

1981 में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म हम से बढकर कौन का गीत देवा हो देवा गणपति देवा

1990 में फिल्म अग्निपथ का गीत गणपति अपने गांव चले कैसे हमलों चैन पडे

1999 में रिलीज वास्तव का गीत जय देव जय देव

2006 शाहरूख खान की फिल्म डॉन का गीत मोरया रे

2007 में बच्चों पर आधारित फिल्म माई फ्रेंड गणेशा और बाल गणेशा आई थी

2009 में रिलीज फिल्म ‘वांटेड’ का गीत ‘जलवा… इस गाने में गणेश चतुर्थी को बखूबी दिखाया गया था

2012 में रिलीज अग्निपथ का गीत देवा श्री गणेशा…

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तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? अठारह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।

One thought on “गणेश चतुर्थी विशेष- भारतीय संस्कृति और भगवान गणेश

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