रामलीला… मंचन का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व

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रामलीला की शुरूआत कब और कैसे हुई? दुनिया में किसने किया था सबसे पहली रामलीला का मंचन? इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। रामलीला भारत में परम्परागत रूप से भगवान राम के चरित्र पर आधारित नाटक है। जिसका देश में अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग भाषाओं में मंचन किया जाता है। रामलीला का मंचन विजयादशमी या दशहरा उत्सव पर किया जाता है। वैसे तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के प्रभावशाली चरित्र पर कई भाषाओं में ग्रंथ लिखे गए हैं। लेकिन दो ग्रंथ प्रमुख हैं। जिनमें पहला ग्रंथ महर्षि वाल्मीकि द्वारा ‘रामायण’ जिसमें 24 हजार श्लोक, 500 उपखण्ड, तथा सात कांड है और दूसरा ग्रंथ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है जिसका नाम ‘श्री रामचरित मानस’ है, जिसमें 9,388 चौपाइयां, 1,172 दोहे और 108 छंद हैं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई ‘रामायण’ तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्री रामचरित मानस’ से पुरानी है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन भगवान राम के जन्म की तारीख को लेकर विद्वानों और इतिहासकारों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसी तरह महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण के समय को लेकर भी विद्वानों और इतिहासकारों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। हालांकि वेद और रामायण में विभिन्न आकाशीय और खगोलीय स्थितियों के जिक्र के मुताबिक आधुनिक विज्ञान की मदद से इन तारीकों को प्रमाणिक करने की कोशिश की गई है।

  • इंस्टिट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑफ वेदास की निदेशक सरोज बाला के मुताबिक… वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का जो वर्णन किया गया है कि उस जन्मतिथि के अनुसार 10 जनवरी 5114 बीसी अब इसे लूनर कैलेंडर में कन्वर्ट कार वो चैत्र मास का शुक्ल पक्ष का नवमी निकला।
  • हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था… कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ताओं अनुसार राम का जन्म वाल्मीकि द्वारा बताए गए ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर अनुसार 4 दिसंबर 7323 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9334 वर्ष पूर्व हुआ था। शोधकर्ता डॉ. वर्तक पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी।

रामलीला का इतिहास

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जैसा की हमने बताया महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण का प्रमाण 9 हजार साल ईसा पूर्व से लेकर 7 हजार साल ईसा पूर्व तक का माना जाता है। यही कारण है कि रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। लेकिन कई सबूत ऐसे मिले हैं जो साबित करते हैं कि रामलीला का मंचन काफी पहले से किया जाता रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया में कई पुरातत्वशास्त्री और इतिहासकारों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे साबित होता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का मंचन हो रहा था। जावा के सम्राट ‘वलितुंग’ के एक शिलालेख में ऐसे मंचन का उल्लेख है यह शिलालेख 907 ई के हैं। इसी प्रकार थाईलैंड के राजा ‘ब्रह्मत्रयी’ के राजभवन की नियमावली में रामलीला का उल्लेख है जिसकी तिथि 1458 ई है।

  • मुखौटा रामलीला- मुखौटा रामलीला का मंचन इंडोनेशिया और मलेशिया में किया जाता रहा है। इंडोनेशिया में ‘लाखोन’, कंपूचिया के ‘ल्खोनखोल’ और बर्मा के ‘यामप्वे’ ऐसे कुछ जगह हैं जहां इसका आज भी मंचन होता है। इंडोनेशिया और मलेशिया में लाखोन के माध्यम से रामायण के अनेक प्रसंगों को मंचित किया जाता है। कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल के माध्यम के होता है।
  • छाया रामलीला- जावा तथा मलेशिया के ‘वेयांग’ और थाईलैंड के ‘नंग’ ऐसी जगह है जहां छाया नाटक प्रदर्शित किया जाता है। छाया नाटक कठपुतली के माध्यम से किया जाता है। विविधता और विचित्रता के कारण छाया नाटक के माध्यम से प्रदर्शित की जाने वाली रामलीला मुखौटा रामलीला से भी निराली है।

भारत में रामलीला का इतिहास

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भारत में भी रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का ईसा पू्र्व का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन 1500 ईं में गोस्वामी तुलसीदास(1497–1623)ने जब आम बोलचाल की भाषा ‘अवधी’ में भगवान राम के चरित्र को ‘श्री रामचरित मानस’ में चित्रित किया तो इस महाकाव्य के माध्यम से देशभर खासकर उत्तर भारत में रामलीला का मंचन किया जाने लगा। माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। इतिहासविदों के मुताबिक देश में मंचीय रामलीला की शुरुआत 16वीं सदी के आरंभ में हुई थी। इससे पहले रामबारात और रुक्मिणी विवाह के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। साल 1783 में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने हर साल रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया।

भरत मुनि के ‘नाट्यशास्‍त्र’ में नाटक की उत्‍पत्ति के संदर्भ में लिखा गया है। ‘नाट्यशास्‍त्र’ की उत्पत्ति 500 ई॰पू॰ 100 ई॰ के बीच मानी जाती है। नाट्यशास्‍त्र के अनुसार नाटकों विशेष रूप से लोकनाट्य के जरिए संदेश को प्रभावी रूप से जनसामान्‍य के पास पहुंचाया जा सकता है। भारत भर में गली-गली, गांव-गांव में होने वाली रामलीला को इसी लोकनाट्य रूपों की एक शैली के रूप में स्‍वीकारा गया है। राम की कथा को नाटक के रूप में मंच पर प्रदर्शित करने वाली रामलीला भी ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर वास्‍तव में कितनी विविध शैलियों वाली है, इसका खुलासा रचनाकार इन्‍दुजा अवस्‍थी ने अपने शोध-प्रबंध ‘रामलीला: परंपरा और शैलियां’ में बड़े विस्‍तार से किया है। इंदुजा अवस्‍थी के इस शोध प्रबंध की यह विशेषता है कि यह शोध पुस्‍तकालयों में बैठकर नहीं बल्कि जगह-जगह घूम-घूम कर लिखा गया है। साहित्यिक कृतियों से अलग-अलग भाषा-बोलियों, समाज-स्‍थान और लोकगीतों में रामलीला की अलग ही विशेषता है। जिसका असर उसके मंचन पर भी नजर आता है। सिर्फ उत्‍तर प्रदेश में ही ऐतिहासिक रामनगर की रामलीला, अयोध्‍या, चित्रकूट की रामलीला, अस्‍सी घाट (वाराणसी की रामलीला) इलाहाबाद और लखनऊ की रामलीलाओं के मचंन की अपनी-अपनी शैली और विशेषता है। हो सकता है कि शायद इसीलिए यह मुहावरा चल पड़ा हो… ‘अपनी-अपनी रामकहानी’।

देश की सबसे पुरानी रामलीलाएं

काशी, चित्रकूट और अवध की रामलीला- माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। काशी में गंगा और गंगा के घाटों से दूर चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन किया जाता है। माना जाता है कि ये रामलीला 500 साल पहले शुरू हुई थी। 80 वर्ष से भी बड़ी उम्र में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरित्रमानस 16 वीं शताब्दी में रामचरित्र मानस लिखी थी।

लखनऊ (अवध) के ऐशबाग की रामलीला- तकरीबन 500 साल का इतिहास समेटे यह रामलीला मुगलकाल में शुरू हुई और नवाबी दौर में खूब फली-फूली। ऐशबाग के बारे में कहा जाता है कि पहली रामलीला खुद गोस्वामी तुलसीदास ने यहां देखी थी।

बनारस (काशी) में रामनगर की रामलीला- साल 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। यहां ना तो बिजली की रोशनी और न ही लाउडस्पीकर, साधारण से मंच और खुले आसमान के नीचे होती है रामलीला। 233 साल पुरानी रामनगर की रामलीला पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज के दम पर होती है। बीच-बीच में खास घटनाओं के वक़्त आतिशबाजी जरूर देखने को मिलती है। इसके लिए करीब 4 किमी के दायरे में एक दर्जन कच्चे और पक्के मंच बनाए जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग को दर्शाया जाता है।

चित्रकूट की रामलीला- चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन होता है। माना जाता है कि ये रामलीला 475 साल पहले शुरू हुई थी। कहा जाता है चित्रकूट के घाट पर ही  गोस्वामी तुलसीदास जी को अपने आराध्य के दर्शन हुए थे। जिसके बाद उन्होंने श्री रामचरित मानस लिखी थी।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रामलीला- 5 सौ साल पुरानी रामलीला अब भी हर साल आयोजित की जाती है। इसकी खासियत ये है कि यहां की रामलीला खानाबदोश है। रामलीला मंचन हर दिन अलग जगह पर होता है और राक्षस का वध होने पर वहीं पुतला दहन भी किया जाता है। आप भी देखिए गाजीपुर की ये खानाबदोश रामलीला।

गोरखपुर में रामलीला- गोरखपुर में रामलीला की शुरुआत अतिप्राचीन है, लेकिन समिति बनाकर इसकी शुरुआत 1858 में हुई। तब गोरखपुर का पूरा परिवेश गांव का था। संस्कृति व संस्कारों के प्रति लोगों का गहरा लगाव था और अन्य जरूरी कार्यो की भांति इस क्षेत्र में भी वे समय देते थे। देखा जाए तो गोरखपुर में रामलीला का लिखित इतिहास 167 वर्ष पुराना है।

कुमायूं की रामलीला- कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई। जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व. देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में क्रमशः 1880, 1890 व 1902 में रामलीला नाटक का मंचन प्रारम्भ हुआ।

होशंगाबाद की रामलीला- करीब 125 साल पुरानी परम्परा होशंगाबाद के सेठानीघाट में आज भी निभाई जा रही है। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक त्रिवेणी बन चुकी इस रामलीला की शुरूआत वर्ष 1870 के आस-पास सेठ नन्हेलाल रईस ने की थी। हालांकि वर्ष 1885 से इसका नियमित मंचन शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।

सोहागपुर(होशंगाबाद)की रामलीला- सोहागपुर के शोभापुर में रामलीला का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। सन 1866 से शुरू हुई रामलीला मंचन की परंपरा को स्थानीय कलाकार अब तक जिंदा रखे हुए हैं। इतने लंबे अंतराल में कभी ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा जब गांव में रामलीला का मंचन न किया गया हो। आयोजन से जुड़े चंद्रगोपाल भार्गव ने बताया कि रामलीला की इस वर्ष 150 वीं वर्षगांठ है।

पीलीभीत की रामलीला- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मेला का बीसलपुर नगर में 150 वर्ष से भी अधिक पुराना गौरवमयी इतिहास है। दूर दराज से हजारों की संख्या में मेलार्थी लीलाओं का आंनद लेने आते हैं। रामलीला महोत्सव की आधारशिला डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रखी गयी थी। मेला मंच पर नहीं होता है, बल्कि रामनगर (वाराणसी) के मेला की तरह बड़े मैदान में होता है।

फतेहगढ़ (फर्रुखाबाद) की रामलीला- 150 साल पुरानी रामलीला को अंग्रेजों का भी सहयोग मिलता रहा है। तब यह परेड ग्राउंड में होती थी। 20 साल पहले सेना की छावनी बन जाने के बाद आयोजन सब्जी मंडी में होने लगा है।

दिल्ली की रामलीला- दिल्ली की सबसे पुराने रामलीला है परेड ग्राउंड की रामलीला। जो 95 साल पुरानी है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को जाने… 

रामनवमी विशेष… भगवान राम: आदर्श व्यक्तित्व

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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