India में ‘Made in China’

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उरी हमले के बाद से ही देशभर में पाकिस्‍तान के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्‍सा है। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कई कदम उठाए हैं। भारतीय सेना ने पीओके में सर्जिकल स्‍ट्राइक कर आतंकी कैंपों को बर्बाद किया। वहीं भारत सरकार पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता और सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (एमएफएन)का दर्जा वापस लेने की तैयारी कर रही है। लेकिन पाकिस्तान कि नापाक हरकतें जारी हैं। पाकिस्तान लगातार भारत में आतंकी घुसपैठ कराने के लिए सीजफायर का उल्लघंन कर रहा है। यहां तक की उसकी इन हरकतों में चीन भी उसका साथ दे रहा है। चीन ने पाकिस्तान की शह पर तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का पानी रोका। यूएन में अपने वीटो पावर का उपयोग करके जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने का विरोध किया है। भारत के एनएसजी सदस्यता के प्रयास में वह रोड़ा बना। यह भारत के खिलाफ पाक की ‘चीनी साजिश’ है। जिसका भारत की जनता ने मुंहतोड़ जवाब देने का मन बना लिया है। देशभर में चीन के बने समान का बहिष्‍कार करने की अपील की जा रही है। यही नहीं चीन के खिलाफ भारतीयों का गुस्सा सोशल मीडिया पर भी दिख रहा है। ट्वीटर, फेसबुक पर लोग #BoycottChineseProducts लिखकर चीनी प्रोडक्ट्स पर बैन लगाने और इनके इस्तेमाल नहीं करने की अपील कर रहे हैं। स्वामी रामदेव और भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय खुद इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने चीन के सामान, चीन के साथ व्यापार का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। आइए जानते हैं भारत-चीन का कितना व्यापार है और देश में कैसे ‘मेड इन चाइना’ की बाढ़ आ गई…

भारत-चीन व्यापार
– भारत-चीन के बीच व्यापार संबंध मुख्य रिश्ते का आधार है।
– दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की बड़ी अर्थव्यस्थाओं में गिनी जाती है।
– दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते की शुरुआत साल 1978 में हुई थी।
– उद्योग संगठन ASSOCHAM के मुताबिक 2000-01 और 2013-14 के बीच भारत से चीन को निर्यात लगभग दोगुना हुआ।
– 2000-01 और 2013-14 के बीच भारत में चीनी सामानों का आयात रिकॉर्ड 34 गुना तक बढ़ चुका है।
– यह भारत के कुल आयात के 13 फीसदी से ज्यादा है।
– भारत और चीन के बीच अगर व्यापार की बात करें, तो ये 2003-2004 के7 अरब डॉलर था।
– जो 2014-15 में बढ़कर दोनों देशों के बीच लगभग 70 अरब डॉलर यानी 4.70 लाख करोड़ का हो गया है।
– जिसमें से भारत चीन को सिर्फ 79 हजार करोड़ रुपए का निर्यात करता है।
– जबकि 3.87 लाख करोड़ का भारत चीन से आयात करता है, यानी कुछ व्यापार घाटा 3 लाख करोड़ रुपए है।

बेडरूम में बाथरूम तक चीनी सामान
– करीब एक दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी।
– मेड इन चाइना सामान अधिक टिकाऊ और मजबूत न सही, लेकिन अपेक्षाकृत सस्ता होता है।
– सस्ता होने से कारण व्यापारियों और आम जनता में चीनी सामान पहली पसंद बन गए।
– इसके पीछे चीन का थोक उत्पादन पर बल और भारत की उत्पादन क्षमताओं में कमियां जिम्मेदार थीं।
– साथ ही चीन में 46 फीसदी स्किल वर्कस हैं जबकि भारत में सिर्फ 2 फीसदी।
– चीन निर्मित सामान अब इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक ही सीमित नहीं रह गए।
– दीवाली, होली, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहारों पर चाइना मेड सामान की मार्केट में भरमार हो गई।
– देश के सबसे बड़े होलसेल मार्केट सदर बाजार में ‘मेड इन चाइना’ सामानों की बाढ़ सी आ गई है।
– डेढ़ दशक पहले तक इस बाजार में चाइनीज सामान की हिस्सेदारी 30 फीसदी थी, जो आज 60-70 फीसदी हो गई है।
– जूते, टीशर्ट, खिलौने, साइकिल, टेलीविजन, कैलकुलेटर, घड़ियां, पंखे, ताले, बैटरियां, साइकिल।
– देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, ऑटो पाटर्स भारत में उपलब्ध है।
– ‘यूज एंड थ्रो’ की संस्कृति चीन में रही वही आदात भारत में जनता को लगा दी गई।
– बाथरूम के सामान से लेकर बेडरूम का सामान भारतीय मार्केट में भर गया था।
– सस्ता माल पाकर भारतीय काफी खुश हुए थे और धीरे-धीरे देश भर में चीनी सामान का ढेर लग गया।
– इसकी मार कमजोर देसी उत्पादकों पर पड़ी घड़ी उद्योग, खिलौना उद्योग, साइकिल उद्योग बर्बादी के कगार पर आ गए।
– कई छोटी भारतीय इकाइयों पर ताला पड़ गया, जबकि बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे ठौर तलाशने लगी।
– चीनी निर्यात पर भारत की निर्भरता को सबसे बेहतर ऊर्जा क्षेत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है।
– आज भारतीय परियोजनाओं के लिए करीब 80 फीसदी पावर प्लांट उपकरण चीन से मंगाए जाते हैं।

भारतीय उद्योग को लगाई चीनी कंपनियों ने चपत
– भारतीय बाजार में ब्रांड कंपनियों का 25 हजार रुपए में मिलने वाला टेबलेट चीनी ब्रांड में मात्र दो से पांच हजार रुपए में मिल जाता है।
– इतना ही नहीं, खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्तियां, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे चीनी उत्पाद भारत में किफायती दरों पर उपलब्ध हैं।
– होली के मौके पर चीनी रंगों, पिचकारी और स्प्रिंकल्स की भी भारत में भरमार रहती है।
– ऐसे में भारतीय रंग की तुलना में चीनी रंग और पिचकारी साठ फीसद तक सस्ते रहते हैं।
– भारत के रंगों से जुड़े पचहत्तर फीसद कारोबार पर चीन ने कब्जा कर लिया है।
– एक अध्ययन के मुताबिक, पूरे देश में छह सौ टन चीनी गुलाल का इस्तेमाल होता है।
– चीनी पटाखों के कारण शिवकाशी का पटाखा उद्योग बर्बादी के कगार पर आ चुका है
– देश में पटाखों का कारोबार करीब 6,000 करोड़ रुपये का है।
– जिसमें से अकेले चीनी पटाखों ने करीब 1000 करोड़ रुपये पर कब्जा कर लिया है।
– सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज की मानें तो सॉफ्टवेयर और संगीत ऐसे क्षेत्र हैं जहां धड़ल्ले से चीनी नकली माल बाजार में उपलब्ध हैं।
– इनके अलावा, नकली किताबों का 4 करोड़ 80 लाख डॉलर का, फिल्मों का 97 करोड़ डॉलर का।
– ऑटो के कलपुर्जों का 1.25 अरब डॉलर का और नकली सॉफ्टवेयर का 30 अरब डॉलर का कारोबार भारत में चल रहा है।
– पिछले साल ऑनलाइन कारोबार के जरिये बेचे गए 40 फीसद चीनी प्रोडेक्ट की गुणवत्ता घटिया और नकली थी।

चीनी बाजार में भारत की पहुंच आसान नहीं
– भारत लगातार अपने फार्मास्युटिकल, कृषि, मांस और आईटी सेवाओं के चीनी बाजार में आसान पहुंच की मांग करता रहा है।
– दवा, आईटी/आईटीईएस और एग्री कमोडिटीज के चीन को निर्यात में सबसे बड़ी बाधा नॉन टैरिफ बैरियर रही है।
– CII के अनुसार चीन ने अपने यहां ऐसे नियम बना रखे हैं कि भारतीय कम्पनियों या तो वहां मिलने वाले ठेकों के लिए योग्य ही नहीं मानी जाती।
– चीन के कुछ राज्यों में स्थानीय कंपनियों को सब्सिडी दी जाती है जिससे भारतीय कम्पनियां लागत ज्यादा होने से प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती हैं।
– दवा कंपनियों की बात करें तो उन्हें प्रवेश में ही सबसे बड़ी मुश्किल आती है।
– चीन में दवा की बिक्री के लिए दवा के पंजीकरण में तीन से पांच साल तक का वक्त लग जाता है
– भारत ने डब्ल्यूटीओ में चीन के भारतीय बफैलो मीट के आयात पर प्रतिबंध के फैसले पर भी सवाल खड़े किए थे।
– भारत चीन को 40 प्रतिशत लौह-अयस्क निर्यात करता है, अन्य निर्यात वस्तुओं में प्लास्टिक के उत्पाद, इस्पात, रसायन, सोयाबिन तेल हैं।

नकली सामान के निर्यात में सबसे आगे चीन
– चीन हर साल 500 अरब डालर यानी 33 लाख करोड़ रुपए का नकली और पायरेटेड सामान दुनियाभर में सप्लाई करता है।
– वैश्विक स्तर पर जब्त आयातित नकली उत्पादों में 63.2 प्रतिशत के साथ चीन पहले स्थान पर है।
– इसका सर्वाधिक नुकसान यूरोपीय संघ व अमेरिका की कंपनियों को उठाना पड़ रहा है।
– नकली वस्तुओं के व्यापार से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में अमेरिका पहले नंबर पर है।
– चीन हर साल अमेरिका में 32 लाख करोड़ का निर्यात करता है जिसमें ज्यादातर चीजें नकली होती है।
– आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओइसीडी) की रिपोर्ट से भी यह प्रमाणित हो चुका है।
– सौ से ज्यादा भारतीय कंपनियों को चीनी कंपनियों ने धोखा दिया है।
– खुद भारतीय दूतावास कह चुका है कि चीनी कंपनियों के साथ समझौते करने से पहले जांच-परख लें।
– रसायन, स्टील, सौर ऊर्जा, ऑटो वील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हार्डवेयर से जुड़ी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में लिप्त रही हैं।

चीनी सामान पर बैन
– भारत सरकार ने चीन से आने वाले घटिया प्रकार के दूध व दुग्ध उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया।
– साथ ही कुछ विशेष प्रकार के मोबाइल फोनों को 24 अप्रैल 2016 में बैन किया।
– इससे पहले 23 जनवरी 2016 को भी चीनी खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था।
– 27 अप्रैल 2016 को लोकसभा में भाजपा की ओर से ही चीनी मांझे का मुद्दा उठाया गया।
– मोदी सरकार ने हाल ही में चीन से आयातित पटाखों पर बैन लगाया

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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