#USPresidentialElection2016: #Hillary और #Trump का #INDIA प्रेम, जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के बीच भारतीय समयानुसार आज सुबह पहली लाइव टीवी डिबेट हुई। जिसे पूरी दुनिया में करोडो़ं लोगों ने देखा। 90 मिनट चली इस बहस पर भारतीयों की भी नजर थी। खासकर भारतीय मूल के अमेरिकी वोटर्स की, जिनकी संख्या लगभग 30 लाख है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में भारतीय मूल के वोटर्स की खासी अहमियत होती है और उन्हें अपनी तरफ खींचने के प्रयास ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ दोनों ही पार्टी के उम्मीदवार करते रहते हैं। लेकिन इस बार 2016 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय वोटर इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि इस वोट बैंक को हथियाने के लिए दोनों ही दल कुछ ऐसा कर रहे हैं जैसा कि पहले के चुनाव में कभी नहीं हुआ। जानिए भारत के लिहाज क्या है खास इन चुनावों में…

डोनाल्ड ट्रम्प का भारत प्रेम
– जहां एक ओर अमेरिकी विदेश मंत्री भारतीय मूल के वोटरर्स को रिझाने में लगे हैं।
– तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प भी पीछे नहीं हैं।
– ट्रंप इसी महीने की 24 तारीख को हिंदू संस्था के कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे हैं।
– अमेरिका में हिंदू संस्था रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)के कार्यक्रम में शिरकत करने वाले हैं ट्रंप।
– अमेरिकन-इंडियन बिजनेसमैन शलभ कुमार ने डोनाल्ड ट्रम्प का खुलकर सपोर्ट किया है।
– शलभ ने ट्रंप के समर्थन में उनकी पार्टी को 7 करोड़ का डोनेशन भी दिया है।
– शलभ कुमार ने ही 2015 में रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन(RHC)नाम की संस्था बनाई है।
– शलभ कुमार ने कहते हैं कि 21वीं सेंचुरी को ट्रंप इंडिया-यूएस सेन्चुरी बनाना चाहते हैं।
– एक इंटरव्यू में शलभ ने कहा- ट्रम्प को गलत समझा जा रहा है, वे एंटी-इंडिया नहीं हैं।
– शलभ कुमार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका में प्रभावशाली समर्थकों में से एक हैं।
– रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं।
– जब मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे तो ट्रंप ने कहा था कि सालों की सुस्ती के बाद निवेशक अब भारत लौट रहे हैं।
– ट्रंप ने कहा था, ‘मोदी से मेरी मुलाकात नहीं हुई है लेकिन वह प्रधानमंत्री के रूप में शानदार काम कर रहे हैं।
– मोदी लोगों को साथ ला रहे हैं, अब भारत के बारे में अब धारणा बदल रही है और आशावाद लौट रहा है।
– ट्रंप ने कहा था कि भारत और चीन की एक जैसी शुरुआत हुई, इंडिया अच्छी तरक्की कर रहा है।
– हाल ही में ट्रंप ने एक चुनावी सभा में भारतीयों का मजाक उड़ाते हुए उनकी अंग्रेजी की नकल उतारी थी।
– लेकिन तुरंत ही सफाई देते हुए भारत को एक महान देश बताते हुए कहा था कि वह भारतीय नेताओं से नाराज नहीं है।
– डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के लिए हिन्दू सेना के कार्यकर्ता दिल्ली के जंतर-मतंर पर हवन-पूजन भी कर चुके हैं।

इस चुनाव में ‘रिपब्लिकन’ का झुकाव भी भारत की ओर…
– अमेरिका और भारत के साझा इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ पार्टी के उम्मीदवार भारत के प्रति झुकाव रखने वाले हैं।
– डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन भारत से भावनात्मक तौर पर जुड़ी हुई हैं तो रिपब्लिकन ट्रंप राजनीतिक-रणनीतिक तौर पर भारत के समर्थक हैं।
– ओबामा से पहले राष्ट्रपति रहे जार्ज बुश ने तेजी से बदलती दुनिया को समझा और चीन की कीमत पर भारत से संबंध बढ़ाए।
– जिसे 2014 के बाद मोदी और ओबामा ने भी जारी रखा… अब बारी ट्रंप और हिलेरी की है मोदी सरकार के साथ दोस्ती बनाए रखने की।
– साल 2014 में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक अभी भी 65 फीसदी भारतीय डेमोक्रेटिक पार्टी के पाले में हैं।

हिलेरी क्लिंटन का भारतीय कनेक्शन
– अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद क्लिंटन अगर राष्ट्रपति बनती हैं तो वो पहली महिला राष्ट्रपति होंगी.
– भारत से उनका एक खास नाता रहा है, बिल क्लिंटन के 1992 में राष्ट्रपति बनने के बाद मार्च 1995 में वे भारत आई थीं.
– इसके बाद 1997 में मदर टेरेसा की मृत्यु और 2000 में आखिरी बार बतौर फर्स्ट लेडी भारत आईं थी
– इसके बाद ओबामा सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद 2009 में भारत का दौरा किया था.
– बतौर विदेश मंत्री 2009 में उनकी उपलब्धि रही कि चीन और भारत को ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के लिए राजी किया.
– 2008 में अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर डील पर सीनेटर हिलेरी क्लिंटन ने आश्वासन दिया था कि डेमोक्रेट्स न्यूक्लियर डील की राह में रोड़ा नहीं बनेंगे.
– 2011 और 2012 में ओबामा सरकार में बतौर विदेश मंत्री भारत यात्रा पर कई व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.
– अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सोमवार को कहा कि अमेरिका और भारत जितना चाहते थे,
– हिलेरी समय-समय पर पाकिस्तान में बढ़ते आतंकवाद का मुद्दा भी उठाती रही हैं
– 2009 की यात्रा के दौरान 26/11 हमले के लेकर उन्होंने पाकिस्तान को चेताया कि भारतीय हितों के विरुद्ध काम करने वाले आतंकवादी गुटों का सफाया करे.
– 2012 में उनका बयान कि “आतंकवाद से निपटने में नाकाम रहा पाकिस्तान” ने पाक सरकार को आतंकवाद के लिए कार्यवाही करने पर मजबूर किया.

भारतीय मूल के वोटर्स का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर रहा है…
– अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में मुख्यतौर पर दो पार्टियां चुनावी मैदान में रहती हैं- डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी।
– अमरीका में बसे भारतीय-अमरीकी समुदाय ने पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी को ही समर्थन माना जाता रहा है।
– भारतीयों का झुकाव डेमोक्रेट उम्मीदवार की और रहने का कारण है प्रवासियों, मध्यम वर्ग और छात्रोंके प्रति उनकी नीतियां।
– Pew Research Centre के आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में 80 फीसदी प्रवासी भारतीयों ने डेमोक्रेट को अपना वोट दिया था
– भारतीय-अमरीकी लोगों की संख्या 30 लाख है, केवल 16 फीसदी ही रिपब्लिकन उम्मीदवारों का पक्ष में रहे हैं।
– रिपब्लिकन पार्टी के कई सिनेटर भारतीय अमरीकियों पर नस्लभेदी टिप्पणी करते रहे हैं, जिससे भारतीय समाज नाराज है।
– भारतीय ही नहीं एशियाई मूल के ज्यादातर अमरीकी लोग डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति सबसे ज्यादा झुकाव दिखाते रहे हैं।

इस चुनाव से भारतीयों को क्या उम्मीद है…
– आज भारतीय-अमरीकी मूल के 70 फीसदी लोगों के पास कॉलेज डिग्री है और दो तिहाई के पास मैनेजमैंट नौकरियां हैं।
– इनकी मीडियन आमदनी 88 हजार डॉलर है जो अमरीका में सबसे ज्यादा है।
– अमरीका में रहने वाले जो भारतीय भारत में पले बढ़े हैं, वो चाहते हैं कि अमरीका सरकार अच्छा काम करे।
– ज्यादातर भारतीय-अमरीकी लोग मध्यम वर्ग से हैं और उन्हें लगता है कि डेमोक्रेटिक ही उन मुद्दों को सुलझाएंगे जो उनके दिल के करीब हैं।
– आउटसोर्सिंग पर अंकुश, कॉलेज शिक्षा की बढ़ती कीमत और सोशल सेक्यूरिटी को बचाए रखना जैसे कई मुद्दे हैं।
– भारतीय-अमरीकी लोगों को सोशल सेक्यूरिटी का प्रावधान पसंद है क्योंकि कई लोगों के बूढ़े माता-पिता रिटायरमेंट के बाद उनके पास अमरीका आ जाते हैं।

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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