कृष्ण जन्माष्टमी: दही-हांडी उत्‍सव- इतिहास, परम्परा और महत्व…

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दही-हांडी उत्सव भारत में सदियों से धूमधाम से मनाया जाता रहा है। महाराष्ट्र में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। जन्माष्टमी के दिन होने वाले इस उत्सव में लाखों युवा उत्साह से भाग लेते हैं। लोगों के उत्साह को देखते हुए राजनीतिक दल भी दही हांडी महोत्सव में पीछे नहीं रहते। बड़े-बड़े आयोजकों में कई राजनेता शामिल हैं जो ऊंची-ऊंची टंगी दही-हांडियों पर इनामी राशी रखते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसी दही हांडी महोत्सव के बारे में…

कैसे हुई दही हांडी परम्परा की शुरुआत

उत्‍सव की पौराणिक मान्‍यता…
– कृष्ण पुराण की कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ माखन की चोरी किया करते थे।
– भगवान कृष्ण ऊपर चढ़कर पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा दही और माखन चुराया करते थे।
– जब वे गोकुल के घरों में मटकियां फोड़ने का प्रयास करते थे, तो महिलाएं उन्हें रोकने के लिए पानी फेंकती थी।
– कान्‍हा के इसी रूप के कारण बड़े प्‍यार से उन्‍हें ‘माखनचोर’ कहा जाता है।
– हांडी फोड़ने वाले बच्चे को ‘गोविंदा’ कहा जाता है, जो ‘गोविंद’ का ही दूसरा नाम है।

1907 में मुंबई में शुरू हुई थी दही-हांडी की परम्परा…
– नवी मुंबई के पास घणसोली गांव में यह परंपरा पिछले 104 वर्षों से चली आ रही है।
– यहां सबसे पहले वर्ष 1907 में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई थी।
– यहां के हनुमान मंदिर में जन्माष्टमी के एक सप्ताह पहले से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाता है।
– जो दही-हांडी फोड़ने के साथ समाप्त होता है।
– दही-हांडी फोड़ने के लिए युवा लड़कों की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी मटकी तोड़ती थी।
– अंग्रेजी शासन काल में यह क्रांतिकारियों के गांव के रूप में प्रसिद्ध था।

ऐसे मनाया जाता है दही हांडी…
– दही-हांडी प्रतियोगिता में युवाओं का एक समूह पिरामिड बनाता है, जिसमें एक युवक ऊपर चढ़कर ऊंचाई पर लटकी हांडी, जिसमें दही होता है, उसे फोड़ता है।
– ये गोविंदा बनकर इस खेल में भाग लेते हैं। इस दौरान कई जगहों पर प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।
– आसपास के लोग दही-हांडी फोड़ने का प्रयास कर रही टोली पर पानी की बौछार करते हैं, ताकि वे आसानी से दही हांडी फोड़ न सके।
– प्रतियोगिता जीतने वालों पर लाखों के इनाम की बौछार होती है।
– पहले इसमें सिर्फ लड़के ही शामिल होते थे, लेकिन अब लड़कियों की टोली भी अपने जौहर को दिखा रही हैं।
– बॉलीवुड के डांस नंबर पर हजारों लोग पानी की बौछारों के बीच जमकर नाचते हैं।
– पूरे विश्व में दही हांडी की तरह ही कई अन्य फेस्टिवल रंगारंग ढंग से सेलिब्रेट किए जाते हैं।
– कहीं इन्हें रंगबिरंगी ड्रेस पहनकर, तो कहीं कीचड़ में, कहीं रात के अंधेरे और आग के बीच में इन्हें सेलिब्रेट किया जाता है।

मुंबई और आसपास ऐसे मनाई जाती है दही हांडी…
– एक-एक पथक में करीब 20 से 50 और बड़े गोविंदा पथक में 200 से 250 और इससे अधिक गोविंदा सदस्य शामिल होते हैं।
– मुंबई के कुछ प्रमुख गोविंदा पथकों में ऐरोली कोलीवाडा मंडल, ओमसाईं गोविंदा पथक, शिव गर्जना गोविंदा पथक, गोठिवली गोविंदा पथक हैं।
– मी राबाडाकर गोविंदा पथक, एकवीरा गोविंदा पथक, अभिनव मित्रमंडल, सामाजिक युवा मंच, दोस्ती ग्रुप व जय भवानी मित्रमंडल भी शामिल हैं।
– मुंबई ही नहीं, ठाणे, नवी मुंबई, डोंबिवली, कल्याण, उल्हासनगर, मीरा-भाईंदर, वसई-विरार तक दही हांडी उत्सव का आयोजन होता है।
– मुंबई के वरली में विशेष इंतजाम रहते हैं, तो उपनगरीय इलाकों में घाटकोपर, चेंबूर, अंधेरी, बोरिवली में गोविंदा पथकों का स्वागत किया जाता है।
– दादर में सबसे पहले दही हांडी फूंटती है, मुंबई में 100 से भी ज्यादा जगहों पर ये कार्यक्रम होता है।

परम्परा का ‘दही’ और राजनीति की ‘हांडी’

लाखों के इनाम होते हैं दही हांडी पर…
– पिछले कुछ सालों में महानगरी मुम्बई का दही हांडी उत्सव एक दिन में 25 करोड़ का टर्नओवर करता आ रहा है।
– उत्सव में करीब 1.5 लाख खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं।
– जिसमें सबसे छोटा दल 20 सदस्यों का होता है तो सबसे बड़ा दल 250 सदस्यों का।
– मुंबई और आसपास करीब 3300 आयोजनकर्ता हैं जो उत्सव को संचालित करते हैं।
– इन आयोजनकर्ताओं में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– 2015 में 100 आयोजनकर्ताओं ने इनाम की राशी 50 हजार से ऊपर रखी थी।
– कई बड़े आयोजनकर्ता 3 लाख से लेकर 10 लाख तक की इनामी राशी रखते हैं।
– 2013 में एनसीपी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने एक करोड़ रुपये का इनाम रखा था।
– 2013 में सचिन अहीर ने भी एक करोड़ का इनाम रखा था।

दही हांडी और राजनेता…
– 3300 आयोजनकर्ता में से 400 से ज्यादा राजनितिक दलों से ताल्लुक रखते हैं।
– प्रताप सरनाईक: शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक की संस्था संस्कृति युवा प्रतिष्ठान ठाणे के वर्तक नगर में हांडी लगाता है।
– जितेंद्र आव्हाड: एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड की संघर्ष संस्था ने पांच पाखाडी में दही-हांडी का आयोजन करते हैं।
– राजन विचारे: शिवसेना सांसद राजन विचारे की आनंद चैरिटेबल ट्रस्ट संस्था ठाणे के जांभली नाके पर दही हांडी लगाते हैं।
– रविंद्र फाटक: शिवसेना विधायक रविंद्र फाटक की संकल्प प्रतिष्ठान का दही हांडी आयोजन ग्लैमर से भरपूर रहता है।
– अविनाश जाधव: ठाणे शहर एमएनएस अध्यक्ष अविनाश जाधव भगवती मैदान में इस बार 11 लाख की दही हांडी आयोजन की है।
– गोविंदाओं का जोश बढ़ाने के लिए कई बड़े फिल्मी सितारे भी दही-हांडी महोत्सव में शामिल होते रहे हैं।

दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे रखते हैं खुद को फिट

गोविंदा आला रे आला! ये वह शबद है जो जन्माष्टमी के दिन मुंबई की हर गली में सुनाई देता है। गोविंदा पथक छोटी -बड़ी टोलियों में धूम मचाने ये गोविंदा घर-घर माखन चोरी करने पहुंचते हैं। मानव पिरामिड बनाकर ये गोविंदा दही-हाड़ी तोड़ते हैं। इस उत्सव को लेकर गोविंदाओं में जो उत्सुकता, जोश और खुशी दिखाई देती है उसके पीछे उनकी कई दिनों की मेहनत होती है। इसके लिए वे खुद को बहुत फिट रखते हैं। आइए जानते हैं कैसे दही-हांडी के लिए गोविंदा कैसे खुद को फिट रखते हैं…

तीन महीने पहले से शुरू हो जाता है अभ्यास…
– गोविंदा की एक टीम में 150 से 200 सदस्य शामिल होते हैं।
– हांडी फोड़ने का अभ्यास जन्माष्टमी के 3 महीने पहले शुरू हो जाता है।
– मांजगांव ताड़वाड़ी गोविंदा पथक उन ग्रुप्स में से है जो नौ मंजिल बनाकर दही हांडी फोड़ते हैं।
– इस कठिन करतब के लिए सभी गोविंदा सदस्य डेढ़ से तीन महीने पहले प्रैकिटस शुरू कर देते हैं।
– स्टेमिना बनाए रखने के लिए सभी गोविंदा कबड्डी, स्विमिंग और फुटबॉल जैसे खेल में भाग लेते हैं।
– इसके साथ ही रोजाना जिम भी जाते हैं, इस दौरान वे ब्राउन ब्रेड और डेयरी प्रोडक्ट ज्यादा खाते हैं।
– साथ ही ये गोविंदा प्रोटीन के भी अपनी डाइट में शामिल करते हैं।

होती है शारीरिक जांच…
– ट्रेनिंग की शुरुआत होने से पहले ही एक तरह से इनके शिविर आयोजित होते हैं। जहां पर इनके शरीर की पूरी जांच की जाती है।
– दही हंडी के त्योहार में हिस्सा लेने वाले बच्चे या नवयुवक को किसी भी तरह की कोई शारीरिक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
– हर बड़ा मंडल अपने सदस्यों का हेल्थ चेकअप करता है, ताकि हंडी को फोड़ने के लिए चढ़ते या उतरते समय किसी को कोई दिक्कत न हो।

दही हांडी के दिन कैसी होती है तैयारी…
– सुबह दूध और हल्का पौष्टिक ब्रेकफास्ट करके घर से निकलते हैं।
– सुस्ती से बचने के लिए दोपहर के लंच में चावल खाने से बचते हैं।
– दिनभर धूप में घूमने से डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है।
– इसालिए उन्हें ग्लूकोज, पानी और फ्रूट जूस दिया जाता है। द
– खास बात कि इस उत्सव में गोविंदा शराब नहीं पी सकते।
– अगर कोई अल्कोहल लेकर आया भी तो उसे भाग लेने से रोक दिया जाता है।

कराना पड़ता है बीमा…
– 24 फीट के ऊपर की मानव पिरामिड बनाने वाला हर एक मंडल को अपने हर सदस्य को बीमा करवाना पड़ता है।
– क्योंकि इस त्योहार के दौरान में सैकड़ों की तादाद में लोग घायल हो जाते हैं।
– इतनी ही नहीं जोश के चलते न जाने कितनों को तो अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
– इन्हीं सब दुर्घटनाओं को ध्यान में रखते हुए गोविंदाओं का बीमा करवाया जाता है।
– ताकि घायल या मृत्यु होने पर उसके परिवार को बीमा कंपनी की ओर से मुआवजा दिया जा सके।

लाखों का इनाम, लेकिन खर्चे भी कम नहीं…
– गोविंदाओं की मेहनत को देखते हुए लगता है कि इनकी कमाई तो सिर्फ नाम मात्र के लिए ही होती है।
– अगर सुबह से लेकर शाम तक इनकी कमाई लाखों में हो भी जाए तो इनके खर्चे भी उतने ही अधिक होते हैं।
– क्योंकि चाहें जितनी भी छोटी टीम हो, उसमें कम से कम 20 लोग तो जरूर होते हैं।
– इन सभी के लिए एक जैसी टी-शर्ट, खाना-पीना और गाड़ी-घोड़ा में ही सारे पैसे खर्च हो जाते हैं।
– हकीकत तो यह है कि ईनाम की राशि के अलावा गोविंदाओं की जेब से भी खर्चा हो जाया करता है।

जन्माष्टमी पर बॉलीवुड के मशहूर गोविंदा

फिल्म ब्लफमास्टर में शम्मी कपूर: 

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फिल्म मुकाबला में सुनील दत्त: 

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फिल्म खुद्दार में अमिताभ बच्चन: 

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फिल्म बदला में शत्रुघ्न सिन्हा: 

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फिल्म वास्तव में संजय दत्त: 

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फिल्म हैलो ब्रदर में सलमान खान: 

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फिल्म ओह माय गॉड में सोनाक्षी भी फोड़ेंगी दही-हांडी: 

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कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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