महाशिवरात्रि विशेष… ‘शिव’ का रहस्य

Lord-Shiva

देवों के देव ‘महादेव’…शिव को महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है| हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी(शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं। हिंदू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं।

अधिक्तर चित्रों में शिव योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है | इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है |

भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है। भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं. उनका रूप बड़ा सबसे अलग है. शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकारी ज्वाला है. बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं. काल के काल और देवों के देव हैं महादेव.

  • शिव भगवान संहार करने का कार्य करते हैं, इस कारण उन्हें संहारक भी कहा जाता है.
  • भगवान शिव देवताओं के भी देव है इसीलिए उन्हें महेश अर्थात महा+ईश कहा गया है.
  • भगवान शिव अपने भक्तों की जरा सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं तो भोलेनाथ कहलाने लगे.

भगवान शिव के रौद्र रुप के कारण उन्हें रुद्र के नाम से भी पुकारा जाने लगा. भगवान शिव के रुद्र नाम का सबसे पहले उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. ऋग्वेद में शिवजी को तीन भजन समर्पित किए गए हैं. भोलेनाथ व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं. भोलेनाथ की अर्धांगिनी पार्वती है इन्हें शक्ति भी कहा गया है. इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश है.

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं।

शिव का व्यक्तित्व विशाल है, अनेक आयामों से देखकर उनके अनेक नाम रखे गये हैं:

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  1. महेश्वर- महाभूतों के ईश्वर होने के कारण तथा सूंपूर्ण लोकों की महिमा से युक्त।
  2. बडवामुख- समुद्र में स्थित मुख जलमय हविष्य का पान करता है।
  3. अनंत रुद्र- यजुर्वेद में शतरूप्रिय नामक स्तुति है।
  4. विभु और प्रभु- विश्व व्यापक होने के कारण।
  5. पशुपति- सर्पपशुओं का पालन करने के कारण।
  6. बहुरूप- अनेक रूप होने के कारण।
  7. सर्वविश्वरूप- सब लोकों में समाविष्ट हैं।
  8. धूर्जटि- धूम्रवर्ण हैं।
  9. त्र्यंबक- आकाश, जल, पृथ्वी तीनों अंबास्वरूपा देवियों को अपनाते हैं।
  10. शिव- कल्याणकारी, समृद्धि देनेवाले हैं।
  11. महादेव- महान विश्व का पालन करते हैं।
  12. स्थाणु- लिंगमय शरीर सदैव स्थिर रहता है।
  13. व्योमकेश- सूर्य-चंद्रमा की किरणें जो कि आकाश में प्रकाशित होती हैं, उनके केश माने गये हैं।
  14. भूतभव्यभवोद्भय- तीनों कालों में जगत का विस्तार करनेवाले हैं।
  15. वृषाकपि- कपि अर्थात श्रेष्ठ, वृष धर्म का नाम है।
  16. हर- सब देवताओं को काबू में करके उनका ऐश्वर्य हरनेवाले।
  17. त्रिनेत्र- अपने ललाट पर बलपूर्वक तीसरा नेत्र उत्पन्न किया था।
  18. रुद्र- रौद्र भाव के कारण।
  19. सोम- जंघा से ऊपर का भाग सोममय है। वह देवताओं के काम आता है और अग्नि- जंघा के नीचे का भाग अग्निवत् है। मनुष्य-लोक में अग्नि अथवा ‘घोर’शरीर का उपयोग होता है।
  20. श्रीकंठ- शिव की श्री प्राप्त करने की इच्छा से इन्द्र ने वज्र का प्रहार किया था। वज्र शिव ने कंठ को दग्ध कर गया था, अत: वे श्रीकंठ कहलाते हैं।

अर्धनारीश्वर – भगवान शिव का यह नाम शिव तथा शक्ति के मिलने से प्रचलित हुआ.
भोले – भगवान शिव का ह्रदय कोमल है. वह दयालु हैं तथा बहुत जल्द प्रसन्न होकर सभी को क्षमा कर देते हैं.
लिंगम – इसका अर्थ रोशनी की लौ है तथा यह शब्द समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है.
नटराज – इसका अर्थ है नृत्य के देवता. भगवान शिव तांडव नृत्य के प्रेमी हैं इसलिए इन्हें नटराज भी कहा.

शिव के व्यक्तित्व का चित्रण असंभव…

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गोस्वामी श्री तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरित मानस में बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया गया है। कथा में तुलसी दास जी बताते हैं कि भगवान शिव का व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसका पूरा चित्र प्रस्तुत कर पाना असंभव है। उनकी वेषभूषा भय और हास्य दोनों का ही सृजन करती है। भगवान भोलेनाथ का श्रृंगार भी सोचने को विवश करता है। कई प्रश्नों को जन्म देता है। शीर्ष पर घनी लंबी और उलझी हुई काली जटाएं है। जटाओं में गंगा का वास है, वहीं भल चंद्र सुशोभित है। कानों में कुंडल धारण किए हुए हैं। तन पर भस्म रमी हुई है। गले में नाग सुशोभित है। एक हाथ में डमरू और दूसरे हाथ में त्रिशूल है। भगवान शिव नंदी बैल की सवारी करते हैं। साध्वी तपस्विनी भारती भगवान शिव श्मशान भस्म का लेप करते हैं। इसके पीछे भी गूढ़ रहस्य है। यह संसार और मन तन की नश्वरता का प्रतीक है।

एक लोटा जल और एक-दो बेल पत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं भोलेनाथ, क्योंकि वे धन के नहीं, भाव के भूखे हैं। इसीलिए उन्हें आम लोगों का भगवान माना जाता है.. इसीलिए इन्हें आशुतोष यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाला कहा जाता है. अठारह पुराणों में शिव श्रेष्ठ माने गए हैं। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं। सदाशिवबडे ही सरल स्वभाव वाले,सर्वव्यापी, करुणामयी और भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। इनकी पूजा-उपासना में बहुत आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। वे सिर्फ एक लोटा जल और संभव हो तो एक-दो बेलपत्रसे ही प्रसन्न हो जाते हैं। मूल रूप से ये आदिवासी, गुहावासी,वनवासी, निर्धन और वंचित लोगों के आराध्य देव हैं।

शिव योगी भी हैं और गृहस्थ जीवन में लीन भी हैं… भगवान शिव योगी के रुप में वास करते हैं. शिव अन्य देवों से भिन्न हैं. शिव अपने रौद्र रुप तथा सौम्य आकृति दोनों के लिए विख्यात हैं. यह सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार के अधिपति हैं. सृष्टि की लय और प्रलय दोनों ही भगवान शिव के अधीन हैं. इनकी लीला अदभुत है. इनमें सभी भावों का परस्पर तालमेल दिखाई देता है. इनके मस्तक पर एक ओर चन्द्रमा विराजमान है तो दूसरी ओर साँप उनके गले का हार बनकर झूल रहा है.

यह योगी भी हैं और गृहस्थ जीवन में भी लीन हैं. स्वभाव में सौम्यता होते हुए भी भयंकर रौद्र रुप भी इनमें विद्यमान है. यह अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित कहलाते हैं. इनकेपरिवार में भूत-प्रेत, साँप, छछूंदर, सिंह, नन्दी, मूषक, मोर आदि सभी शामिल है. सभी को यह सम दृष्टि से देखते हैं. इन्हें महाकाल भी कहा गया है. महाकाल की आराधना करने का महापर्व “महाशिवरात्रि” कहलाता है.

शिव साक्षात् कल्याण हैं… शिव शुद्ध ब्रह्म हैं। सूर्य की आभा शिव हैं। शिव और शक्ति के प्रभाव से ही सूर्य प्रकाश और ऊष्मा बिखेरने में सक्षम होता है। शिव पराशक्ति हैं। पूरे ब्रह्माण्ड को दो भागों में बांटा गया है-अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। अपरा प्रकृति के आठ स्वरूप हैं-भूमि, आप (जल), अनल, वायु, नभ, मन, बुद्धि तथा अहंकार। परा प्रकृति प्राण को कहते हैं, जो आत्मा है और अमर है। इसमें प्रभा-प्रभाकर, शिवा-शिव, नारायणी-नारायणआते हैं,जो परा प्रकृति को जानते हैं। अपरा प्रकृति किसी को नहीं जानती। शिव निराकार हैं, शंकर साकार हैं। शिव जब साकार हो जाते हैं तो गंगाधर, चंद्रशेखर, त्रिलोचन, नीलकंठ एवं दिगंबर कहलाते हैं। ओम का अर्थ है कल्याण रूपी ओंकार परमात्मा। जो शिव निर्गुण निराकार रूप में रोम-रोम में ओम बिराजते, उसी शिव का ध्यान भक्तगण शंकर के रूप में करते हैं। शिव जब सगुण साकार हो कर शंकर बनते हैं तो स्वयं ओम का जाप करते हैं स्वयं की शक्ति में ओज के निमित्त। जैसे सूर्य अपनी आभा में सारी सृष्टि को देखता है, उसी तरह शिव अपनी शिवा में पूरी सृष्टि को देखते हैं। विद्वान संत शिवानन्द स्वामी ने कहा है-

ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानतअविवेका।
प्रणवाक्षरमध्य तीनों ही एका॥
गोस्वामी तुलसीदास ने भी शिव और शक्ति को इस रूप में देखा है-

भवानी शंकरौवंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यांविनान पश्यंतिसिद्धास्वांतस्थमीश्वर:॥
अर्थात् मैं श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप भवानी और शंकर की वंदना करता हूं, जिनकी कृपादृष्टि के बिना कोई भी सिद्ध योगी अपने अंतकरणमें अवस्थितईश्वर को देख नहीं सकता।

शिव की आराधना से आत्मबल में वृद्धि होती है… शिवाराधन में शुद्धता को महत्व दिया जाता है, जिसका आधार फलाहार है। फलाहार से व्यवहार शुद्ध होता है। हर जीव शिव का ही अंश है और जब वह इसकी आराधना करता है तो अंत:सुखकी प्राप्ति होती है। शिव पूजा के लिए बेलपत्र,धूप, पुष्प, जल की महत्ता तो है ही, मगर शिव-श्रद्धा से अति प्रसन्न होते हैं, क्योंकि श्रद्धा जगज्जननीपार्वती हैं और सदाशिवभगवान शंकर स्वयं विश्वास हैं। श्रावण में शिवलिंगकी पूजा का काफी महत्व है, क्योंकि शिवलिंगभी अपने आप में भगवान शिव का ही एक विग्रह है। इसे सर्वतोमुखी भी कहा गया है, क्योंकि इसके चारों ओर मुख होते हैं। हमारे सतानतधर्म में जो 33करोड देवता हैं, उनकी पूजा शिवलिंगमें बिना आह्वान के ही मान्य हो जाती है। शिव की पूजा वस्तुत:आत्मकल्याण के लिए ही किया जाना चाहिए, न कि सांसारिक वैभव के लिए।

पंचाक्षरीमंत्र है- ऊँ नम: शिवाय… ॐ देवाधिदेव महादेव को ही ओंकार कहतें हैं .ओंकार ही शाश्वत सत्य है .

“ऊँ नम: शिवाय” का जाप 108 बार करना चाहिए.

महामृत्युंजय मंत्र का जाप शिव भगवान को प्रसन्न करने का तथा सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने का महामंत्र है. इस महामंत्र का 108 बार जाप करने से प्राणी के सभी दु:खों का नाश होता है. मंत्र है :-

“ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात”

भगवान शिव की वेशभूषा के रहस्य…

आपने भगवान शंकर का चित्र या मूर्ति देखी होगी। शिव की जटाएं हैं। उन जटाओं में एक चन्द्र चिह्न होता है। उनके मस्तक पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू, SHIVA_CODES_by_VISHNU108तो दूसरे में त्रिशूल है।

वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं।

कभी आपने सोचा कि इन सब शिव प्रतीकों के ‍पीछे का रहस्य क्या है? शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। आइए जानते हैं शिव प्रतीकों के रहस्य…

चन्द्रमा- शिव का एक नाम ‘सोम’ भी है। सोम का अर्थ चन्द्र होता है। उनका दिन सोमवार है। चन्द्रमा मन का कारक है। शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। हिमालय पर्वत और समुद्र से चन्द्रमा का सीधा संबंध है।

  • चन्द्र कला का महत्व : मूलत: शिव के सभी त्योहार और पर्व चान्द्रमास पर ही आधारित होते हैं। शिवरात्रि, महाशिवरात्रि आदि शिव से जुड़े त्योहारों में चन्द्र कलाओं का महत्व है।
  • कई धर्मों का प्रतीक चिह्न : यह अर्द्धचन्द्र शैवपंथियों और चन्द्रवंशियों के पंथ का प्रतीक चिह्न है। मध्य एशिया में यह मध्य एशियाई जाति के लोगों के ध्वज पर बना होता था। चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र होता था। इस्लाम का प्रतीक चिह्न है अर्द्धचन्द्र। इस अर्धचंद्र का ध्वज पर होने का अपना ही एक अलग इतिहास है।
  • चन्द्रदेव से संबंध : भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा सोम अर्थात चन्द्रमा के श्राप का निवारण करने के कारण यहां चन्द्रमा ने शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम ‘सोमनाथ’ प्रचलित हुआ।

त्रिशूल- भगवान शिव के पास हमेशा एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। इसकी शक्ति के आगे कोई भी शक्ति ठहर नहीं सकती। त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक भी है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन।

  • त्रिशूल के 3 शूल सृष्टि के क्रमशः उदय, संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते भी हैं। शैव मतानुसार शिव इन तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं। यह शैव सिद्धांत के पशुपति, पशु एवं पाश का प्रतिनिधित्व करता है।
  • माना जाता है कि यह महाकालेश्वर के 3 कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतीक भी है। इसके अलावा यह स्वपिंड, ब्रह्मांड और शक्ति का परम पद से एकत्व स्थापित होने का प्रतीक है। यह वाम भाग में स्थिर इड़ा, दक्षिण भाग में स्थित पिंगला तथा मध्य देश में स्थित सुषुम्ना नाड़ियों का भी प्रतीक है।

वासुकि (नाग)- शिव का सेवक वासुकि : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नाग कुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट संबंध है। भारत में नागपंचमी पर नागों की पूजा की परंपरा है।
विरोधी भावों में सामंजस्य स्थापित करने वाले शिव नाग या सर्प जैसे क्रूर एवं भयानक जीव को अपने गले का हार बना लेते हैं। लिपटा हुआ नाग या सर्प जकड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।

  • नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकि, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है, तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।
  • नाग वंशावलियों में ‘शेषनाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकि हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकि का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।
  • उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कंबल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।

डमरू- सभी हिन्दू देवी और देवताओं के पास एक न एक वाद्य यंत्र रहता है। उसी तरह भगवान के पास डमरू था, जो नाद का प्रतीक है। भगवान शिव को संगीत का जनक भी माना जाता है। उनके पहले कोई भी नाचना, गाना और बजाना नहीं जानता था। भगवान शिव दो तरह से नृत्य करते हैं- एक तांडव जिसमें उनके पास डमरू नहीं होता और जब वे डमरू बजाते हैं तो आनंद पैदा होता है।

  • अब बात करते हैं नाद की। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे ‘ॐ’ कहा जाता है। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केंद्रीय स्वर नाद है। नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है- 1. पर, 2. पश्यंती, 3. मध्यमा और 4. वैखरी।
  • आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।

वृषभ (नंदी)- शिव का वाहन वृषभ : वृषभ शिव का वाहन है। वे हमेशा शिव के साथ रहते हैं। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार ‘वृषो हि भगवान धर्म:’। वेद ने धर्म को 4 पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके 4 पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। महादेव इस 4 पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनके अधीन हैं। एक मान्यता के अनुसार वृषभ को नंदी भी कहा जाता है, जो शिव के एक गण हैं। नंदी ने ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की थी।

जटाएं- शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। उनका नाम व्योमकेश है अत: आकाश उनकी जटास्वरूप है। जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं। वायु आकाश में व्याप्त रहती है। सूर्य मंडल से ऊपर परमेष्ठि मंडल है। इसके अर्थ तत्व को गंगा की संज्ञा दी गई है अत: गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्रस्वरूप उग्र और संहारक रूप धारक भी माने गए हैं।

गंगा- गंगा को जटा में धारण करने के कारण ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई। जब स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने का उपक्रम हुआ तो यह भी सवाल उठा कि गंगा के इस अपार वेग से धरती में विशालकाय छिद्र हो सकता है, तब गंगा पाताल में समा जाएगी। ऐसे में इस समाधान के लिए भगवान शिव ने गंगा को सर्वप्रथम अपनी जटा में विराजमान किया और फिर उसे धरती पर उतारा। गंगोत्री तीर्थ इसी घटना का गवाह है।

भभूत या भस्म- शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है। यज्ञ की भस्म में वैसे कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, तब केवल भस्म (राख) ही शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।

तीन नेत्र- शिव को ‘त्रिलोचन’ कहते हैं यानी उनकी तीन आंखें हैं। प्रत्येक मनुष्य की भौहों के बीच तीसरा नेत्र रहता है। शिव का तीसरा नेत्र हमेशा जाग्रत रहता है, लेकिन बंद। यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आपको भी इस नेत्र का अहसास होगा।

संसार और संन्यास- शिव का यह नेत्र आधा खुला और आधा बंद है। यह इसी बात का प्रतीक है कि व्यक्ति ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभा सकता है। त्र्यंबकेश्वर : त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के व्युत्पत्यर्थ के संबंध में मान्यता है कि तीन नेत्रों वाले शिवशंभू के यहां विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्र) के ईश्वर कहा जाता है।

पीनिअल ग्लैंड- आध्यात्मिक दृष्टि से कुंडलिनी जागरण में एक चक्र को भेदने के बाद जब षट्चक्र पूर्ण हो जाता है तो इसके बाद आत्मा का तीसरा नेत्र मलशून्य हो जाता है। वह स्वच्छ और प्रसन्न हो जाता है।कुमारस्वामी ने शिव के तीसरे नेत्र को प्रमस्तिष्क (सेरिब्रम) की पीयूष-ग्रंथि (पीनिअल ग्लैंड) माना है। पीयूष-ग्रंथि उन सभी ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है जिनसे उसका संबंध होता है। कुमारस्वामी ने पीयूष-ग्रंथि को जागृत, स्पंदित एवं विकसित करने की प्रक्रियाओं का विवेचन किया है।

हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म- शिव अपनी देह पर हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म को धारण करते हैं। हस्ती अर्थात हाथी और व्याघ्र अर्थात शेर। हस्ती अभिमान का और व्याघ्र हिंसा का प्रतीक है अत: शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है।

शिव का धनुष पिनाक- शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज को सौंप दिया गया था।

  • उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।
  • देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को धनुष दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

शिव का चक्र- चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

  • यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिवने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।

त्रिपुंड तिलक- माथे पर भगवान शिव त्रिपुंड तिलक लगाते हैं। यह तीन लंबी धारियों वाला तिलक होता है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है। यह सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी है। यह त्रिपुंड सफेद चंदन का या भस्म का होता है।

  • त्रिपुंड दो प्रकार का होता है- पहला तीन धारियों के बीच लाल रंग का एक बिंदु होता है। यह बिंदु शक्ति का प्रतीक होता है। आम इंसान को इस तरह का त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। दूसरा होता है सिर्फ तीन धारियों वाला तिलक या त्रिपुंड। इससे मन एकाग्र होता है।

कुंडल – कान में कुंडल : शिव कुंडल : हिन्दुओं में एक कर्ण छेदन संस्कार है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में दीक्षा के समय कान छिदवाकर उसमें मुद्रा या कुंडल धारण करने की प्रथा है। कर्ण छिदवाने से कई प्रकार के रोगों से तो बचा जा ही सकता है साथ ही इससे मन भी एकाग्र रहता है। मान्यता अनुसार इससे वीर्य शक्ति भी बढ़ती है।

  • कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा के आरंभ की खोज करते हुए विद्वानों ने एलोरा गुफा की मूर्ति, सालीसेटी, एलीफेंटा, आरकाट जिले के परशुरामेश्वर के शिवलिंग पर स्थापित मूर्ति आदि अनेक पुरातात्विक सामग्रियों की परीक्षा कर निष्कर्ष निकाला है कि मत्स्येंद्र और गोरक्ष के पूर्व भी कर्णकुंडल धारण करने की प्रथा थी और केवल शिव की ही मूर्तियों में यह बात पाई जाती है।
  • भगवान बुद्ध की मूर्तियों में उनके कान काफी लंबे और छेदे हुए दिखाई पड़ते हैं। प्राचीन मूर्तियों में प्राय: शिव और गणपति के कान में सर्प कुंडल, उमा तथा अन्य देवियों के कान में शंख अथवा पत्र कुंडल और विष्णु के कान में मकर कुंडल देखने में आता है।

रुद्राक्ष- माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।

 भगवान शिव से जुड़ी 12 रोचक बातें और उनके पीछे छिपे अर्थ

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पहला सवाल- क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें?
धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

दूसरा सवाल- शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

तीसरा सवाल- भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों?
त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

चौथा सवाल- भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर?
देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

पांचवा सवाल- क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?
भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है। साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

छठा सवाल- क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा?
भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

सातवां सवाल- भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी?
भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

आठवां सवाल- भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग?
भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।

नौंवा सवाल- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा?
भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

दसवां सवाल- भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र?
शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

ग्यारहवां सवाल- कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय?
शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।

बारहवां सवाल- क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण?
शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोडऩे लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

शिव के नाम में छिपे रहस्य

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भारतीय संस्कृति में बहुदेववाद की प्रतिष्ठा है, यह सत्य है किंतु भगवान शिव को ही भोले बाबा के रूप में माना गया है। इनकी अनेक नामों से पूजा की जाती है और प्रत्येक नाम इनके गुणों को प्रकाशित करता है। अपने भक्तों के दुख दारिद्रय को दूर करने के लिए बहुत जल्दी प्रसन्न होने के कारण इन्हें आशुतोष कहा जाता है और निरंतर कल्याणकारी होने के कारण ही इनका शंकर नाम पड़ा।

शिव के अद्र्धनारीश्वर रूप में देव संस्कृति का दर्शन जीवंत हो उठता है। ईश्वर के इस साक्षात शरीर का सिर से लेकर पैर तक आधा भाग शिव का और आधा भाग पार्वती का होता है। यह प्रतीक इस बात को स्पष्ट करता है कि नारी और पुरुष एक ही आत्मा है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार, अद्र्धनारीश्वर केवल इस बात का प्रतीक नहीं है कि नारी और नर जब तक अलग हैं तब तक दोनों अधूरे हैं बल्कि इस बात का भी द्योतक है कि जिसमें नारीत्व अर्थात संवेदना नहीं है वह पुरुष अधूरा है। जिस नारी में पुरुषत्व अर्थात अन्याय के विरुद्ध लडऩे का साहस नहीं है वह भी अपूर्ण है।

शिवलिंग वस्तुत: प्रकाशस्वरूप परमात्मा के प्रतीक ज्योति का ही मूर्तमान स्वरूप है। ज्योर्तिलिंग शब्द इसका प्रमाण है। प्रारंभ में उपासना स्थलों को अनवरत जलते हुए दीप रखने का प्रावधान था लेकिन इस दीए का संरक्षण कतई आसान नहीं था। इसके चलते दीप को मूर्तमान स्वरूप दिया गया। देश के विभिन्न कोनों में स्थापित बारह ज्योर्तिलिंग आज भी श्रद्धा के विराट केंद्र हैं। पुराणों में शिवलिंग से जुड़ी अनेक कथाओं का प्रतीकात्मक वर्णन है जिनके पीछे दार्शनिक सत्य छिपे हुए हैं।

भगवान शिव के तीन प्रमुख नाम… शिव, शंभु और शंकर

भगवान शंकर ही सबसे बड़े नीतिज्ञ है क्योंकि वे ही समस्त विद्याओं, वेदादि शास्त्रों, आगमों तथा कलाओं के मूल स्रोत है। इसलिए उन्हें विशुद्ध विज्ञानमय, विद्यापति तथा सस्त प्राणियों का ईश्वर कहा गया है। भगवान शिव ही समस्तप्राणियों के अंतिम विश्रामस्थान भी है। उनकी संहारिका शक्ति प्राणियों के कल्याण के लिए प्रस्फुटित होती है। जब भी जिसके द्वारा धर्म का विरोध और नीति मार्ग का उल्लंघन होता है, तब कल्याणकारी शिव उसेसन्मार्ग प्रदान करते हैं।

भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल एवं अमंगलों का उल्मूलक है। शिव, शंभु और शंकर, ये तीन नाम उनके मुख्य हैं और तीनों का अर्थ है- परम कल्याण की जन्मभूमि, संपूर्ण रूप से कल्याणमय,मंगलमय और परम शांतिमय।

  • भगवान शिव सबके पिता और भगवती पार्वती जगजननी तथा जगदम्बा कहलाती हैं। अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है। उनका नाम ही आशुतोष है। दानी और उदार ऐसे हैं कि नाम ही पड़ गयाऔढ़नदानी। उनका भोलापन भक्तों को बहुत ही भाता है। अकारण अनुग्रह करना, अपनी संतान से प्रेम करना भोलेबाबा का स्वभाव है। उनके समान कल्याणकारी व प्रजा रक्षक और कौन हो सकता है।
  • समुद्र से कालकूट विष निकला जिसकी ज्वालाओं से तीनों लोकों में सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी प्राणी काल के जाल में जाने लगे, किसी से ऐसा सामर्थ्य नहीं था कि वह कालकूट विष का शमन कर सके। प्रजा कीरक्षा का दायित्व प्रजापतिगणों का था, पर वे भी जब असमर्थ हो गए तो सभी शंकरजी की शरण में गए और अपना दुख निवेदन किया।
  • उस समय भगवान शंकर ने देवी पार्वती से जो बात कही, उससे बड़ी कल्याणकारी, शिक्षाप्रद, अनुकरणीय नीति और क्या हो सकती है। विष से आर्त और पीड़ित जीवों को देखकर भगवान बोले- ‘देवि! ये बेचारे प्राणी बड़े ही व्याकुल हैं। ये प्राणबचाने की इच्छा से मेरे पास आए हैं। मेरा कर्तव्य है कि मैं इन्हें अभय करूं क्योंकि जो समर्थ हैं, उनकी सामर्थ्य का उद्देश्य ही यह है कि वे दोनों का पालन करें।
  • साधुजन, नीतिमान जन अपने क्षणभंगुर जीवन की बलि देकर भी प्राणियों की रक्षा करते हैं। कल्याणी! जो पुरुष प्राणियों पर कृपा करता है, उससे सर्वात्मा श्री हरि संतुष्ट होते हैं और जिस पर वे श्री हरि संतुष्ट हो जाते हैं, उससे मैं तथा समस्तचराचर जगत भी संतुष्ट हो जाता है।’
  • भगवान शिव स्वयं नीतिस्वरूप हैं। अपनी चर्चा से उन्होंने जीव को थोड़ा भी परिग्रह न करने, ऐश्वर्य एवं वैभव से विरक्त रहने, संतोष, संयम, साधुता, सादगी, सच्चाई परहित-चिंतन, अपने कर्तव्य के पालन तथा सतत्‌ नाम जप-परायण रहनेका पाठ पढ़ाया है। ये सभी उनकी आदर्श अनुपालनीय नीतियां हैं।
  • अपने प्राणों की बलि देकर भी जीवों की रक्षा करना, सदा उनके हित चिंतन में संलग्न रहना- इससे बड़ी नीति और क्या हो सकती है। कृपालु शिव ने यह सब कर दिखाया। ‘मेरी प्रजाओं का हित हो इसलिए मैं इस विष को पी जाता हूं।’ ऐसा कहवे हलाहल पी गए और नीलकंठ कहलाए। तीनों लोकों की रक्षा हो गई।

भगवान शिव के 19 अवतारों का रहस्य

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1. शरभ अवतार

1भगवान शंकर का पहला अवतार है शरभ। इस अवतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (पुराणों में बताया गया आठ पैरों वाला प्राणी, जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार- हिरण्यकाश्यपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकाश्यपु के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव ने शरभावतार लिया और वे इसी रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। यह देख शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब कहीं जाकर भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।

2. पिप्पलाद अवतार
मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद मुनि ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि2 जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया कि शनि ग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया।

श्राप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिवपुराण के अनुसार, स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।

पिप्पलादेति तन्नाम चक्रे ब्रह्मा प्रसन्नधी:।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 24/61

3. नंदी अवतार
भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का 3अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है-

शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।

4. भैरव अवतार
शिवपुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। तभी वहां तेजपुंज के मध्य एक पुरुषाकृति4 दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया।

उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया। ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली।

5. अश्वत्थामा
महाभारत के अनुसार, पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के 5अंशावतार थे। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात- अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।
शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।

6. वीरभद्र अवतार
भगवान शिव का विवाह ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की पुत्री सती से हुआ था। एक बार दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उन्होंने शिव व सती को निमंत्रित नहीं किया। भगवान शिव के मना करने के बाद भी shiva-06_1456990242सती इस यज्ञ में आईं और जब उन्होंने यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान होते देखा तो यज्ञवेदी में कूदकर उन्होंने अपनी देह का त्याग कर दिया।

जब भगवान शिव को यह मालूम हुआ तो उन्होंने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे क्रोध में आकर पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

क्रुद्ध: सुदष्टपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिसटोग्ररोचिषम्।
उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥
ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं। श्रीमद् भागवत – 4/5/1

शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया। बाद में देवताओं के अनुरोध करने पर भगवान शिव ने दक्ष के सिर पर बकरे का मुंह लगाकर उसे पुन: जीवित कर दिया।

7. गृहपति अवतार
भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। इसकी कथा इस प्रकार है-

7नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत समय तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।

एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मति गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं, पितामह ब्रह्मा ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।

8. ऋषि दुर्वासा अवतार
भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्र कामना से घोर 8तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे।

समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-

अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥
श्रीमद्भागवत- 4/1/15

अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।

9. हनुमान अवतार
भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिवपुराण के अनुसार, देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी 9रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया।

सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।

हनुमानजी को भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का परम सेवक माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग में श्रीराम ने यह भी कहा है कि यदि हनुमान न होते वे सीता को रावण की कैद से मुक्त न करा पाते। हनुमानजी भी अमर हैं, उन्हें अमरता का वरदान माता सीता ने दिया था।

10. वृषभ अवतार
भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था। इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने पाताल लोक गए तो उन्हें वहां10 बहुत सी चंद्रमुखी स्त्रियां दिखाई पड़ी।

विष्णु ने उनके साथ रमण करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए। विष्णु के इन पुत्रों ने पाताल से पृथ्वी तक बड़ा उपद्रव किया। उनसे घबराकर ब्रह्माजी ऋषि मुनियों को लेकर शिवजी के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शंकर ने वृषभ रूप धारण कर विष्णु पुत्रों का संहार किया।

11. यतिनाथ अवतार
भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया था। उन्होंने इस अवतार में 11अतिथि बनकर भील दंपत्ति की परीक्षा ली थी, जिसके कारण भील दंपत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार, अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दंपत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दंपत्ति के घर रात बिताने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुष बाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा।
इस तरह आहुक धनुष-बाण लेकर बाहर चला गया। सुबह आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।

12. कृष्णदर्शन अवतार
भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है। इस प्रकार यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इक्ष्वाकु वंशीय श्राद्ध देव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का12 जन्म हुआ। विद्या-अध्ययन को गुरुकुल गए नभग जब बहुत दिनों तक न लौटे तो उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन आपस में कर लिया। नभग को जब यह पता चला तो वह अपने पिता के पास गए। पिता ने नभग से कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके, उनके धन को प्राप्त करे।

तब नभग ने यज्ञभूमि में पहुंचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण यज्ञ का अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। उसी समय शिवजी कृष्ण दर्शन रूप में प्रकट होकर बोले कि यज्ञ के अवशिष्ट धन पर तो उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्ण दर्शन रूपधारी शिवजी ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्ध देव ने कहा-वह पुरुष शंकर भगवान हैं। यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने शिवजी की स्तुति की।

13. अवधूत अवतार
13भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकरजी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।

क्रोधित होकर इंद्र ने जैसे ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोड़ना चाहा, वैसे ही उनका हाथ जड़ हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।

14. भिक्षुवर्य अवतार
भगवान शंकर देवों के देव हैं। संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला।14 उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो उसे घड़ियाल ने अपना आहार बना लिया। तब वह बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। इतने में ही शिवजी की प्रेरणा से एक भिखारिन वहां पहुंची।

शिवजी ने भिक्षुक का रूप धर उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया तथा यह भी कहा कि यह बालक विदर्भ नरेश सत्यरथ का पुत्र है। यह सब कह कर भिक्षुक रूप धारी शिव ने उस भिखारिन को अपना वास्तविक रूप दिखाया। शिव के आदेश अनुसार भिखारिन ने उस बालक का पालन-पोषण किया। बड़ा होकर उस बालक ने शिवजी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर पुन: अपना राज्य प्राप्त किया।

15. किरात अवतार
किरात अवतार में भगवान शंकर ने पांडु पुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। महाभारत के अनुसार, कौरवों 15ने छल-कपट से पांडवों का राज्य हड़प लिया, जिसके कारण उन्हें वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर (सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया, उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर पर बाण चलाया। शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाए और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है, यह कहने लगे। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अपना पाशुपात अस्त्र प्रदान किया।

16. सुनटनर्तक अवतार
16पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मांगने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर शिवजी नट के रूप में हिमाचल के घर पहुंचे और नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए। जब हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज शिव ने भिक्षा में पार्वती को मांग लिया। इस पर हिमाचलराज अति क्रोधित हुए। कुछ देर बाद नटराज वेषधारी शिवजी पार्वती को अपना रूप दिखाकर स्वयं चले गए। उनके जाने पर मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती को शिवजी को देने का निश्चय किया।

17. ब्रह्मचारी अवतार
17दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की। जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया। यह देख पार्वती अति प्रसन्न हुईं।

18. अर्धनारीश्वर अवतार
भगवान शंकर का यह अवतार हमें बताता है कि समाज, परिवार व सृष्टि के संचालन में पुरुष की भूमिका18 जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही स्त्री की भी है। अर्धनारीश्वर अवतार लेकर भगवान ने यह संदेश दिया है कि समाज तथा परिवार में महिलाओं को भी पुरुषों के समान ही आदर व प्रतिष्ठा मिले। शिवपुराण के अनुसार, सृष्टि में प्रजा की वृद्धि न होने पर ब्रह्मा चिंतित हो उठे। तभी आकाशवाणी हुई- ब्रह्म! मैथुनी सृष्टि उत्पन्न कीजिए। यह सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने का संकल्प किया। परंतु तब तक शिव से नारियों का कुल उत्पन्न नहीं हुआ था। तब ब्रह्मा ने शक्ति के साथ शिव को संतुष्ट करने के लिए तपस्या की । ब्रह्मा की तपस्या से परमात्मा शिव संतुष्ट हो ‘अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर उनके समीप गए और अपने शरीर में स्थित देवी शिवा/शक्ति के अंश को पृथक कर दिया। इसी के बाद सृष्टि का विस्तार हुआ।

19. सुरेश्वर अवतार
19भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेम भावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार, व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊं नम: शिवाय का जाप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिए और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगे। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु की भक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।

शिव के हर चेहरे के पीछे छिपा है एक अलौकिक रहस्य

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विनाशक, रुद्र, नटराज, महेश ही नहीं वरन् भगवान शिव को हम इससे भी अधिक नामों से जानते हैं। सृष्टि में अच्छाई की स्थापना करने के उद्देश्य से बुराई का सर्वनाश करने वाले शिव के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने भी विभिन्न काल में विभिन्न अवतार लिए थे। लेकिन यह सिर्फ एक भ्रांति है क्योंकि वास्तविकता में केवल विष्णु ही अवतार लेकर धरती पर आए थे। शिव के जिन अवतारों का जिक्र किया जाता है दरअसल वह उनके स्वरूप मात्र हैं।

अवतार – आज हम आपको शिव के उन्हीं कुछ मौलिक स्वरूपों, जिन्हें आम भाषा में शिव के अवतार माना जाता है, के विषय में बताएंगे।

शैव आगम
वेद व्यास द्वारा रचित महाशिव पुराण के शत रुद्र संहिता का उल्लेख करते हुए सुत मुनि ने शिव के मुख्य पांच स्वरूपों का वर्णन किया था। शैव आगम के अनुसार शिव सृष्टि को सुचारु रखने के लिए पांच तरह से कार्य करते हैं जिनमें रचना, संरक्षण, विलयन, दया करना और पापों की सजा देना शामिल हैं।

सद्योजात
शिव के इस स्वरूप का संबंध इच्छा शक्ति से है। अपने इस स्वरूप में शिव, दुखी और प्रसन्न, दोनों ही मुद्राओं में दिखाई देते हैं। शिव के इस स्वरूप में उनके भीतर के क्रोध और ज्वाला को बाहर निकालने की काबीलियत है। पांच मुखों वाले शिवलिंग में अपने इस स्वरूप में शिव पश्चिम दिशा की ओर देखते हैं।

सफेद रंग का स्वरूप
सफेद रंग में शिव अपने भीतरी अहम और क्रोध की पुष्टि करते हैं। कहते हैं जब ब्रह्मा सृष्टि की रचना करने जा रहे थे तब शिव ने उन्हें अपना आशीर्वाद इसी रूप में प्रदान किया था। शिव के इस स्वरूप का संबंध मणिपुर चक्र से है।

वामदेव
शिव का अगला स्वरूप है वामदेव, जिसका संबंध संरक्षण से है। अपने इस स्वरूप में शिव, कवि भी हैं, पालनकर्ता भी हैं और दयालु भी हैं। शिवलिंग के दाहिनी ओर पर मौजूद शिव का यह स्वरूप उत्तरी दिशा की ओर देखता है।

पीड़ाओं को दूर करने वाला
अपने इस स्वरूप में शिव का रंग लाल है। उनका यह स्वरूप, माया, शक्ति और सुंदरता के साथ जुड़ा है। बहुत से पौराणिक दस्तावेजों में यह बात उल्लिखित है कि वामदेव के भीतर दुखों और पीड़ाओं को दूर करने की भी ताकत है। शिव के संरक्षक रूप से संबंधित वामदेव, वायु तत्त्व और अनाहत चक्र से जुड़े हैं।

अघोर
दक्षिण की ओर मुख करके शिव अपने तीसरे स्वरूप में ज्ञान शक्ति और बुद्धि को प्रदर्शित करते हैं। शिव का यह स्वरूप प्राणमाया कोश से जुड़ा है। धूम्र वर्ण में शिव रुद्र की ताकत को दर्शाते हैं। जल तत्व से संबंधित शिव अपने इस स्वरूप के द्वारा मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार में संतुलन और स्वाधिष्ठान चक्र के प्रतिनिधि हैं।

तत्त्पुरुष
पूर्वी दिशा की ओर मुख कर के शिव परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिव का यह स्वरूप आनंद शक्ति या हर्ष को दर्शाने के साथ-साथ आत्मा की संरचना का प्रदर्शन करता है। पीले रंग के शिव स्वरूप का संबंध पृथ्वी तत्त्व से है।

एकाग्रता
शिव का संबंध मूलाधार चक्र से है इसलिए अगर आपको किसी चीज पर अपने मस्तिष्क को स्थिर करने में परेशानी होती है, आपकी एकाग्रता कम होती जा रही है तो आपको शिव के इस स्वरूप को अपने सामने रखकर उस पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

ईशान
अपने इस स्वरूप में शिव ऊपर की ओर देख रहे हैं। ब्रह्माण्ड की चेतना को जाग्रत करते शिव अपने इस स्वरूप में आकाश की ओर देखते प्रतीत होते हैं। शिव के इस स्वरूप का अर्थ सदा शिव है, जो ब्रह्माण्ड के हर छोटे से छोटे कण, हर ओर और हर कृति में समाहित है।

विशुद्ध चक्र
आनंदमय कोश से संबंधित शिव विशुद्ध चक्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अवतार और स्वरूप में अंतर
शिव के ये सभी कार्य उनके अलग-अलग स्वरूपों से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि इन सभी स्वरूपों से शिव का नाम, उनका कार्य और उनकी कृपा पूरी तरह एक-दूसरे से अलग है लेकिन अंत में वे शिव का ही अंग और उन्हीं का ही हिस्सा हैं।

ज्योतिषीय महत्व
सामान्य जन इन्हें शिव के अवतार और अलग व्यक्तित्व समझने की गलती कर बैठते हैं लेकिन यह मात्र उनके भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं, जिनका ज्योतिष की दुनिया में भी अपना एक अलग महत्व है।

क्यों होती है शिवलिंग की पूजा?

पूरे भारत में बारह ज्योर्तिलिंग हैं जिसके विषय में मान्यता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं हुई। इनके अलावा देश के विभिन्न भागों में लोगों ने मंदिर बनाकर शिवलिंग को स्थापित किया है और उनकी पूजा करते हैं।

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भारतीय सभ्यता के प्राचीन अभिलेखों एवं स्रोतों से भी ज्ञात होता है कि आदि काल से ही मनुष्य शिव के लिंग की पूजा करते आ रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सभी देवों में महादेव के लिंग की ही पूजा क्यों होती है। इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं हैं।

एक बार शिव को अपना होश नहीं रहा और वह निर्वस्त्र होकर भटकने लगे इससे ऋषियों ने उन्हें शाप दिया कि उनका लिंग कटकर गिर जाए। इसके बाद शिव का लिंग कटकर पाताल में चला गया। उससे निकलने वाली ज्योति से संसार में तबाही मचने लगी।

इसके बाद सभी देवतागण देवी पार्वती के पास पहुंचे और उनसे इस समस्या का समाधान करने की प्रार्थना करने लगे। इसके बाद पार्वती ने शिवलिंग को धारण कर लिया और संसार को प्रलय से बचा लिया।

इसके बाद से शिवलिंग के नीचे पार्वती का भाग विराजमान रहने लगा। यह नियम बनाया गया कि शिवलिंग की आधी परिक्रमा होगी। इस प्रकार की कथा कई पुराणों में है।

शिव पुराण में शिवलिंग की पूजा के विषय में जो तथ्य मिलता है वह तथ्य इस कथा से अलग है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरूष और निराकार ब्रह्म हैं। इसी के प्रतीकात्मक रूप में शिव के लिंग की पूजा की जाती है।

भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई।

हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने लिंग और योनी मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति के पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति लिंग और योनी से हुई है। इसी से लिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।

सभ्यता के आरंभ में लोगों का जीवन पशुओं और प्रकृति पर निर्भर था इसलिए वह पशुओं के संरक्षक देवता के रूप में पशुपति की पूजा करते थे। सैंधव सभ्यता से प्राप्त एक सील पर तीन मुंह वाले एक पुरूष को दिखाया गया है जिसके आस-पास कई पशु हैं।

इसे भगवान शिव का पशुपति रूप माना जाता है। प्रथम देवता होने के कारण ही इन्हें ही सृष्टिकर्ता मान लिया गया और लिंग रूप में इनकी पूजा शुरू हो गयी।

शिवलिंग के अद्भुत रहस्य और प्रकार…

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शिवलिंग का प्रकार : शिवलिंग ब्रह्मांड और ब्रह्मांड की समग्रता का प्रतिनिधित्व करता है। ब्रह्मांड अंडाकार ही है, जो एक अंडाकार शिवलिंग की तरह नजर आता है। शिवलिंग ‘ब्रह्मांड’ या ब्रह्मांडीय अंडे के आकार का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रमुख रूप से शिवलिंग 2 प्रकार के होते हैं- पहला आकाशीय या उल्का शिवलिंग और दूसरा पारद शिवलिंग।

  • पहला उल्कापिंड की तरह काला अंडाकार लिए हुए। इस तरह का एक शिवलिंग मक्का के काबा में स्थापित है, जो आसमान से गिरा था। ऐसे शिवलिंग को ही भारत में ज्योतिर्लिंग कहते हैं।
  • ‘पारद शिवलिंग’ दूसरा मानव द्वारा निर्मित पारे से बना शिवलिंग होता है। इसे ‘पारद शिवलिंग’ कहा जाता है। पारद विज्ञान प्राचीन वैदिक विज्ञान है। इसके अलावा पुराणों के अनुसार शिवलिंग के प्रमुख 6 प्रकार होते हैं।

1. देव लिंग : जिस शिवलिंग को देवताओं या अन्य प्राणियों द्वारा स्थापित किया गया हो, उसे देवलिंग कहते हैं। वर्तमान समय में धरती पर मूल पारंपरिक रूप से यह देवताओं के लिए पूजित है।

2. असुर लिंग : असुरों द्वारा जिसकी पूजा की जाए, वह असुर लिंग। रावण ने एक शिवलिंग स्थापित किया था, जो असुर लिंग था। देवताओं से द्वेष रखने वाले रावण की तरह शिव के असुर या दैत्य परम भक्त रहे हैं।

3. अर्श लिंग : प्राचीनकाल में अगस्त्य मुनि जैसे संतों द्वारा स्थापित इस तरह के लिंग की पूजा की जाती थी।

4. पुराण लिंग : पौराणिक काल के व्यक्तियों द्वारा स्थापित शिवलिंग को पुराण शिवलिंग कहा गया है। इस लिंग की पूजा पुराणिकों द्वारा की जाती है।

5. मनुष्य लिंग : प्राचीनकाल या मध्यकाल में ऐतिहासिक महापुरुषों, अमीरों, राजा-महाराजाओं द्वारा स्थापित किए गए लिंग को मनुष्य शिवलिंग कहा गया है।

6. स्वयंभू लिंग : भगवान शिव किसी कारणवश स्वयं शिवलिंग के रूप में प्रकट होते हैं। इस तरह के शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहते हैं। भारत में स्वयंभू शिवलिंग कई जगहों पर हैं। वरदानस्वरूप जहां शिव स्वयं प्रकट हुए थे।

शिवलिंग पूजा के नियम :

  • * शिवलिंग को पंचामृत से स्नानादि कराकर उन पर भस्म से 3 आड़ी लकीरों वाला तिलक लगाएं।
  • * शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए, लेकिन जलाधारी पर हल्दी चढ़ाई जा सकती है।
  • * शिवलिंग पर दूध, जल, काले तिल चढ़ाने के बाद बेलपत्र चढ़ाएं।
  • * केवड़ा तथा चम्पा के फूल न चढ़ाएं। गुलाब और गेंदा किसी पुजारी से पूछकर ही चढ़ाएं।
  • * कनेर, धतूरे, आक, चमेली, जूही के फूल चढ़ा सकते हैं।
  • * शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।
  • * शिवलिंग नहीं, शिव मंदिर की आधी परिक्रमा ही की जाती है।
  • * शिवलिंग के पूजन से पहले पार्वतीजी का पूजन करना जरूरी है।

शिव जी को बिल्वपत्र चढ़ाने से मिलते हैं शुभ फल

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एक करोड़ कन्यादान के फल के बराबर है बिल्वपत्र चढ़ाना

शिव शुद्ध कल्याण का पर्याय हैं। शिव उपासना शैव संप्रदाय में विशेष रूप से होती है, लेकिन भगवान शंकर की शीघ्र प्रसन्न होने की प्रवृत्ति के कारण इनकी पूजा सभी आस्तिकजन अपनी लौकिक व पारलौकिक कामना की पूर्ति के लिए हमेशा करते हैं।

प्रभु आशुतोष के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। ऋषियों ने तो यह कहा है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक समान है।

बेल का वृक्ष हमारे यहां संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। इस वृक्ष के नीचे स्तोत्र पाठ या जप करने से उसके फल में अनंत गुना की वृद्धि के साथ ही शीघ्र सिद्धि की प्राप्ति होती है। इसके फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। बिल्वपत्र के सेवन से कर्ण सहित अनेक रोगों का शमन होता है। बिल्व पत्र सभी देवी-देवताओं को अर्पित करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। ‘न यजैद् बिल्व पत्रैश्च भास्करं दिवाकरं वृन्तहीने बिल्पपत्रे समर्पयेत’ के अनुसार भगवान सूर्यनारायण को भी पूरी डंडी तोड़कर बिल्वपत्र अर्पित कर सकते हैं।

यदि साधक स्वयं बिल्वपत्र तोड़ें तो उसे ऋषि आचारेन्दु के द्वारा बताए इस मंत्र का जप करना चाहिए-

‘अमृतोद्भव श्री वृक्ष महादेवत्रिय सदा।
गृहणामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।।’

भगवान शिव के ‘नटराज’ स्वरूप से जुड़ा रहस्य
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नटराज स्वरूप और उससे जुड़ी प्रतीकात्मकता

नटराज स्वरूप और उससे जुड़ी प्रतीकात्मकता

भगवान शिव की अध्यात्म जगत में मान्यता जितनी दृढ़तर होती गयी उतने ही अधिक उनसे जुड़े कथानक प्रचलित होते गए। इसी में से एक है उनका नटराज स्वरूप और उससे जुड़ी प्रतीकात्मकता। नटराज का शाब्दिक अर्थ है नृत्य करने वालों का सम्राट यानि समस्त संसार के सभी नृत्यरत प्राणियों का नेतृत्वकर्ता। एक और अर्थ में इस चराचर जगत की जो भी सर्जना और विनाश है, उसके निर्देशक की भूमिका है नटराज की।

नटराज स्वरूप के उत्पत्ति संबंधी दो मान्यताएं

नटराज स्वरूप के उत्पत्ति संबंधी दो मान्यताएं

शिव के नटराज स्वरूप के उत्पत्ति संबंधी दो मान्यताएं चर्चित हैं। पहली धारणा दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य में आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच इसके विकास को निरूपित करती है जबकि दूसरी धारणा के अनुसार इसका विकास पल्लव साम्राज्य के तहत सातवीं शताब्दी के आसपास हुआ।

चिदंबरम स्थित नटराज की भव्य मूर्ति

चिदंबरम स्थित नटराज की भव्य मूर्ति

हालांकि इससे संबंधित पुख्ता प्रमाण के रूप में चिदंबरम स्थित नटराज की भव्य मूर्ति का उदाहरण दिया जा सकता है, जिसको योगसूत्र के प्रणेता पतंजलि ने बनवाया था। इस मूर्ति को पतंजलि ने योगेश्वर शिव के रूप में निरूपित करने की कोशिश की, जिसका अर्थ बेहद व्यापक है।

बौने राक्षस को अज्ञानता का प्रतीक माना गया

बौने राक्षस को अज्ञानता का प्रतीक माना गया

नटराज का आविर्भाव शिव के उस स्वरूप को महिमामयी बनाने के लिए हुआ, जिसका अर्थ बहुआयामी और बहुपक्षीय है। नटराज के स्वरूप में शामिल प्रतीक चिन्ह भी अपने आप में बेहद खास अर्थों को समाहित किए हुए हैं। जैसे तांडव स्वरूप में स्थित नटराज एक बौने राक्षस के ऊपर नृत्यरत हैं। यहां बौने राक्षस को अज्ञानता का प्रतीक माना गया तथा शिव का उसके ऊपर मग्न होकर एक लय से नृत्य करने को अज्ञानता के ऊपर विजय से जोड़ा गया है। शिव की ये मुद्रा आनंदम तांडवम के रूप में चर्चित है।

ब्रह्मा को पुनर्निर्माण का आमंत्रण देते हैं

ब्रह्मा को पुनर्निर्माण का आमंत्रण देते हैं

इसी प्रकार नटराज के ऊपरी बाएं में अग्नि है, जो विनाश का प्रतीक है। यानि अप्रिय सर्जना को अग्नि के द्वारा नष्ट कर शिव भगवान ब्रह्मा को पुनर्निर्माण का आमंत्रण देते हैं।

 मनुष्यता की गरिमामयी स्थिति का उद्घोषक

मनुष्यता की गरिमामयी स्थिति का उद्घोषक

इसी प्रकार उनका दूसरा बायां हाथ उनके उठे हुए पैरों की ओर संकेत करता दिखता है, जिसका अर्थ स्वतंत्रता और उठान से है। यानि शिव अपने इस स्वरूप द्वारा सार्वभौमिक स्वतंत्रता का उद्घोष करते हैं, जो मनुष्यता के सर्वाधिक गरिमामयी स्थिति का उद्घोषक है।

बिना गति के जीवन नहीं

बिना गति के जीवन नहीं

नटराज की लयबद्ध नृत्यरत स्थिति स्वयं में ब्रहाण्ड की लयबद्धता की उद्घोषणा करती है। अपनी इस स्थिति के द्वारा नटराज ये सिद्ध करते हैं बिना गति के कोई भी जीवन नहीं और जीवन के लिए लयबद्धता अनिवार्य है।

आनंदित होकर नृत्य करने की अवस्था

आनंदित होकर नृत्य करने की अवस्था

आनंदम तांडवम की अवस्था संपूर्ण यूनिवर्स के आनंदित होकर नृत्य करने की अवस्था है, जहां पर अज्ञानता व अहंकार का विनाश तथा पंचमहाभूतों सहित समस्त जैव-अजैव का एकीकरण होता है। यानि शिव के इस विशेष स्वरूप का अर्थ जितना व्यापक है, उतना ही ग्रहणीय भीहै।

यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्‍यूक्‍लियर रिसर्च की प्रयोगशाला के बाहर नटराज की मूर्ति

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भौतिक विज्ञानिक और दार्शनिक फ्रिट्जॉफ कॅप्रा ने भौतिकी विज्ञान का हवाला देते हुए बताया है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व भारतीय कलाकारों ने तांबे की श्रृंखला से भगवान शिव के नृत्‍य में लीन स्‍वरूप को बनाया। आज हमारे समय में तमाम भौतिक वैज्ञानिक फिर से उन्‍नत तकनीकों को इस्‍तेमाल करते हुए ‘कॉस्‍मिक डांस’ का प्रारूप तैयार कर रहे हैं। कॉस्मिक डांस यानि तांडव करते हुए नटराज विनाश व रचना करते सतत नृत्य में रत हैं। यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्‍यूक्‍लियर रिसर्च (सर्न) की प्रयोगशाला के बाहर नटराज का यही अद्भूत रूप स्थापित है।

दाएं हाथ का डमरू नए परमाणु की उत्पत्ति व बाएं हाथ की मशाल पुराने परमाणुओं के विनाश की कहानी बताता है। अभय मुद्रा में भगवान का दूसरा दांया हाथ हमारी सुरक्षा जबकि वरद मुद्रा में उठा दूसरा बांया हाथ हमारी जरुरतों की पूर्ति सुनिश्चित करता है।

शिव जी के नृत्य के दो रूप है एक है लास्य ( नृत्य का कोमल रूप है ) और दूसरा है तांडव जो की विनाश को दर्शाता है !

नटराज के पंजों के नीचे वाला राक्षस इस बात का प्रतीक है कि अज्ञानता उनके चरणों के नीचे है। उनके हाथ में उपस्थित अग्नि (नष्ट करने की शक्ति) इस बात की प्रतीक है कि वह बुराई को नष्ट करने वाले हैं।

उनका उठाया हुआ हाथ इस बात का प्रतीक है कि वे ही समस्त जीवों के उद्धारक हैं। उनके पीछे स्थित चक्र ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। उनके हाथ में सुशोभित डमरू जीवन की उत्पत्ति का प्रतीक है।

यह सब वे प्रमुख वस्तुएं है जिन्हें नटराज की मूर्ति और ब्रह्मांडीय नृत्य मुद्रा चित्रित करते हैं। अर्थात शिव जी का ताण्डव नृत्य ब्रह्माण्ड में हो रहे मूल कणों के नृत्य का प्रतीक है।

जीवन के वो 5 रहस्य जो भगवान शिव ने पार्वती को बताए थे… 

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भगवान शिव ने देवी पार्वती को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए-

1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप

देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते है-

श्लोक- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।।

अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।

इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।

2. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान

श्लोक- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।

अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।

कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।

3. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा

श्लोक-मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।

अर्थात- आगे भगवान शिव कहते है कि- किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।

यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मारने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।

4. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात

संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।

श्लोक-दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।।

अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।

5. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना

श्लोक-नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।।

अर्थात- आगे भगवान शिव मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है। मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएं।

भाव के भूखे भोलेनाथ

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एक लोटा जल और एक-दो बेल पत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं भोलेनाथ,क्योंकि वे धन के नहीं, भाव के भूखे हैं। इसीलिए उन्हें आम लोगों का भगवान माना जाता है.. ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव कहलाते हैं। महेश अर्थात शिव महा ईश्वर हैं यानी तीनों देवों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण। अठारह पुराणों में शिव श्रेष्ठ माने गए हैं। सदाशिवबडे ही सरल स्वभाव वाले, सर्वव्यापी, करुणामयी और भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। इनकी पूजा-उपासना में बहुत आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। वे सिर्फ एक लोटा जल और संभव हो तो एक-दो बेलपत्रसे ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए इन्हें आशुतोष यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाला कहा जाता है। मूल रूप से ये आदिवासी, गुहावासी,वनवासी, निर्धन और वंचित लोगों के आराध्य देव हैं। शिव कथा

शिवपुराण में भगवान शिव की एक कथा है, जिससे स्पष्ट होता है कि वे थोडी सी सेवा से ही अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। एक सामान्य व्यक्ति रात्रि बिताने के लिए बेल-वृक्ष पर आसीन हो गया। वृक्ष के पत्ते ओस की बूंदों से भीगे हुए थे। सुबह जब वह वृक्ष से नीचे उतरा, तो विस्मय से भर आया। उसके समक्ष जटाजूटधारी,गर्दन में सर्प लपेटे, बाघम्बर पहने, शरीर पर भस्म लपेटे एक गौरवर्णीव्यक्ति खडा था, जिसके सिर पर अ‌र्द्ध-चंद्रमा शोभित था। वह घबरा कर बोला-आप कौन?

मैं कैलाशवासी सदाशिव हूं। तुम्हारी पूजा से प्रसन्न हूं। तुम्हें दर्शन देने के लिए प्रकट हुआ हूं। मैंने तो आपकी कोई पूजा नहीं की। वह व्यक्ति बोला।

और यह क्या है? सदाशिवने उंगली से इंगित किया। उस व्यक्ति ने देखा, वहां एक शिवलिंगथा, जिस पर पानी की कुछ बूंदेंऔर बेल-वृक्ष के कुछ पत्ते पडे हुए थे। वह समझ गया कि वृक्ष पर उसके द्वारा हिलने-डुलने से ओस की कुछ बूंदेंऔर पत्ते इस शिवलिंगपर पड गए हैं।

मैंने तो कोई विधि-विधान से आपकी पूजा नहीं की। जो भी हुआ अनजाने में। प्रसन्न होने की कोई बात नहीं।

कोई बात नहीं। जैसा भी हुआ, तुम्हारे माध्यम से शिवलिंगपर जल और बिल्व-पत्र तो पड गए। मेरी पूजा पूरी हो गई।

इससे स्पष्ट होता है कि दीन-हीन और समाज के उपेक्षित लोगों के लिए कोई देवता हैं, तो वे शिव ही हैं। पंचाक्षरीमंत्र

उदार चित्त वाले और सबका कल्याण करने वाले देवाधिदेव शिवजी का व्रत है महाशिवरात्रि। जब यह महादेव का व्रत है, तो इसका महत्व भी अन्य व्रतों की तुलना में सर्वाधिक होगा। इस बार यह 12फरवरी को मनाया जा रहा है। शिवपुराणमें कहा गया है कि यह व्रत करोडों हत्याओं के पापों का विनाश करता है-

मघस्यह्यसितेपक्षेविशिसातिकीर्तिता।

निशीथव्यापिनीग्राह्यात्याकोटिविनाशिनी।। कोटिरुद्रसंहिता

जहां तक संभव हो, शिवरात्रि व्रत रात भर जाग कर किसी शिव-मंदिर में करना उचित माना जाता है। मंदिर समीप नहीं हो, तो घर के अंदर भी यह व्रत रखा जा सकता है। स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए। उपवास रह कर व्यक्ति अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार सामग्री के साथ शिव-पूजा संपन्न करे। शिव-मूर्ति या शिवलिंगनहीं हो, तो मिट्टी के शिवलिंगकम-से-कम बारह की संख्या में निर्मित कर लिए जाएं। रात्रि भर जागरण कर सपरिवार नृत्य-गान, भजन आदि करने से सदाशिवअत्यधिक प्रसन्न होते हैं। ये धन के नहीं, भाव के भूखे हैं।

एक बात उनके भक्तों के कल्याण के लिए स्पष्ट करना आवश्यक है। मंत्र के बिना पूजा अपूर्ण होती है। संस्कृत में कहा भी गया है कि देवता मंत्रों के अधीन होते हैं-मंत्राधीना: देवता:। सौभाग्य से जिस तरह सदाशिवकी पूजा सहज है, उसी तरह उनका मंत्र भी सरल और सबके द्वारा उच्चारित करने योग्य है। यह पंचाक्षरीमंत्र है- ऊँ नम: शिवाय।इस मंत्र का जाप करते हुए ही महाशिवरात्रि व्रत का पालन करना चाहिए। शिवपुराणमें कहा गया है कि मंत्र के बिना शिव का पूजन नहीं किया जाए-

यस्यमन्त्रस्ययद्द्रव्यंतेन पूजांसमाचरेत्।

अमन्त्रलंन कर्तव्यंपूजनंतुहरस्यच।।

यह सभी भक्तों के लिए सौभाग्य की बात है कि शीघ्र प्रसन्न होने वाले शिव का महाव्रत महाशिवरात्रि वर्ष में एक बार आता है। यदि इसे श्रद्धापूर्वकसंपन्न किया जाए, तो पूरा वर्ष शांति, सुख और समृद्धि से बीतता है।

शिव पूजन का महत्व

भगवान शिव की उपासना करने वाले प्राणियों को शिवरात्रि के दिन भुक्ति तथा मुक्ति दोनों ही की प्राप्ति होती है. महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शिव अर्धरात्रि में लिंगरुप में प्रकट हुए थे. मंगल ग्रह का संबंध भगवान शिव के त्रिशूल से है. गुरु ग्रह का संबंध भगवान शिव के डमरु की ध्वनि से है. चन्द्र ग्रह शिवजी के माथे पर विराजमान होकर अपनी आभा से जटाधारी शिव को प्रसन्न रखते हैं. कुण्डली में सप्तम भाव का कारक ग्रह शुक्र, शिव तथा शक्ति के सम्मिलित प्रयास से जीव सृष्टि का कारण बनता है. बाकी बचे सभी बुधादि ग्रह समभाव रखने में सहायक होते हैं.

सावन: इस तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शंकर हैं

भगवान शंकर सभी देवों में प्रमुख हैं। सृष्टि का हर परिवर्तन उन्हीं की इच्छा से होता है। इसी प्रकार सभी दिन, तिथि, माह, वर्ष आदि भगवान शंकर के ही हैं। भगवान शंकर की आराधना करने के लिए सर्वोत्तम मास श्रावन भी इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह शिव को समर्पित है। सावन के हर दिन शिव की अलग-अलग प्रकार की पूजा का विधान धर्म शास्त्रों में लिखा है। उसी के अनुसार श्रावण शुक्ल चतुर्दशी तिथि के देवता स्वयं भगवान शंकर हैं। यह तिथि शिव को विशेष प्रिय है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान कर भगवान शंकर को बिल्व पत्र, धतूरा, आंकड़ा आदि से विधि-विधान पूर्वक पूजा की जाए तो शिव अति प्रसन्न होते हैं। इस दिन भगवान शंकर को भांग का दूध चढ़ाने का विधान भी है। ऐसा करने से भगवान शंकर भक्तों के सभी रोग दूर कर देते हैं। भोलेनाथ को समर्पित काँवड़ यात्रा भी सावन माह में ही की जाती है।

‘काँवड़ के ये घट दोनों ब्रह्मा, विष्णु का रूप धरें।

बाँस की लंबी बल्ली में हैं, रुद्र देव साकार भरे।’

मोक्ष के देवता हैं भगवान शंकर

भगवान शिव मोक्ष के देवता हैं। शिव शब्द का अर्थ ही धर्म है। धर्म अलग-अलग हो सकते हैं। परंतु ईश्वर एक है। सभी का प्रारूप हो सकता है, मानने का तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन ईश्वर को तो सभी याद करते हैं। यह बात भानपुरा मठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य दिव्यानंदजी तीर्थ महाराज ने कही। वे नगर में चल रही शिवपुराण कथा के पांचवें दिन श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कंस और रावण के पैदा होने से ही अत्याचार बढ़ते हैं और फिर ईश्वर अवतार लेते हैं। जल और लहरों में कोई अंतर नहीं होता। वैसे जीव और ईश्वर में भी कोई अंतर नहीं होता।

रुद्र का अंश है रुद्राक्ष

भगवान शंकर की उपासना में रुद्राक्ष का अत्यन्त महत्व है। रुद्राक्ष शब्द की शास्त्रीय विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसकी उत्पत्ति महादेव जी के अश्रुओं से हुई है- रुद्रस्य अक्षि रुद्राक्ष:,अक्ष्युपलक्षितम्अश्रु, तज्जन्य: वृक्ष:। शिवपुराणकी विद्येश्वरसंहितातथा श्रीमद्देवीभागवतमें इस संदर्भ में कथाएं मिलती हैं। उनका सारांश यह है कि अनेक वर्षो की समाधि के बाद जब सदाशिवने अपने नेत्र खोले, तब उनके नेत्रों से कुछ आँसू पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं अश्रुबिन्दुओंसे रुद्राक्ष के महान वृक्ष उत्पन्न हुए। रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में पवित्रता का संचार होता है। रुद्राक्ष पापों के बडे से बडे समूह को भी भेद देते हैं। चार वर्णो के अनुरूप ये भी श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण वर्ण के होते हैं। ऋषियों का निर्देश है कि मनुष्य को अपने वर्ण के अनुसार रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। भोग और मोक्ष, दोनों की कामना रखने वाले लोगों को रुद्राक्ष की माला अथवा मनका जरूर पहिनना चाहिए। विशेषकर शैवोंके लिये तो रुद्राक्ष को धारण करना अनिवार्य ही है।

 भगवान शिव का योग शिव योग

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योग शिक्षा के अनुसार ” भगवान शिव ” को ही प्रथम योगी तथा आदिगुरु के रूप में देखा जाता है।

शिव योग के मूलत: तीन अंग है- धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग।

कई हजार साल पहले हिमालय में कांतिसरोवर झील के किनारे पर अदियोगी ने अपने गहरे ज्ञान को पौराणिक सप्तऋिषियों को प्रदान किया। ये ऋषि इस शक्तिशाली योग विज्ञान को एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका सहित अनेकों भागों में लग गए। आधुनिक विद्वान हैरान हैं कि पूरे संसार की प्राचीन संस्कृतियों में गहरी समानता है। किन्तु केवल भारत मे ही योग परम्परा पूरी तरह से विकसित हुई। अगस्त्य सप्तऋषि जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की, ने एक मूल योग जीवन शैली के चारों और इस संस्कृति का निर्माण किया।

शिव को स्वयंभू इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया। ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा।  वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र का स्तर कम हुआ तो पृथ्वी के अन्य क्षेत्र प्रकट हुये।

शिव कहते हैं ‘ मनुष्य पशु है ‘- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है।
योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण।

तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया।

ओम नम: शिवाय।- ‘ओम’ प्रथम नाम परमात्मा का फिर ‘नमन’ शिव को करते हैं।

‘सत्यम, शिवम और सुंदरम’ – जो सत्य है वह ब्रह्म है- ब्रह्म अर्थात परमात्मा। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र है और जो सुंदरम है वही प्रकृति है। अर्थात परमात्मा, शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है- योग।

शिव कहते हैं ‘मनुष्य पशु है’- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण। तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया।

अमरनाथ के अमृत वचन : शिव द्वारा माँ पार्वती को जो ज्ञान दिया गया वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएँ हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यन्त गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है।-मेरुतंत्र

आदि पुरुष : आदि का अर्थ प्रारम्भ। शिव को आदिदेव या आदिनाथ कहा जाता है। नाथ और शैव सम्प्रदाय के आदिदेव। शिव से ही योग का जन्म माना गया है। वैदिककाल के रुद्र का स्वरूप और जीवन दर्शन पौराणिक काल आते-आते पूरी तरह से बदल गया। वेद जिन्हें रुद्र कहते है, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। शिव का न प्रारंभ है और न अंत।

‘पशु है मनुष्य’
शिव कहते हैं ‘मनुष्य पशु है’- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण। तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है।

शिव को स्वयंभू इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया। ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ।

ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है भगवान शंकर का दर्शन और जीवन। उनके इस दर्शन और ‍‍जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है।

शैव परम्परा : ऋग्वेद में वृषभदेव का वर्णन मिलता है, जो जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ हैं, उन्हें ही वातरशना मुनि‍‍‍ कहा गया है। वे उनका जीवन अवधूत जैसा ब‍िताते थे। योगयुक्त व्यक्ति ही अवधूत हो सकता है। माना जाता है कि शिव के बाद मूलत: उन्हीं से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगम्बर और सूफी सम्प्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

कुछ धर्मों के प्रभाव में आकर सूफियों से कमंडल और धूना छूट गया, लेकिन चिमटा और खप्पर आज भी नहीं छूटा। जो माला रुद्राक्ष की होती थी, वह अब हरे, पीले, सफेद, मोतियों की होती है। जो कुछ है सब उस योगीश्वर शिव के प्रति ही है। उनके निराकार स्वरूप को शिव और साकार स्वरूप को शंकर कहते हैं।

शैव और नाथ सम्प्रदाय की बहुत प्राचीन परम्परा रही है। जैन और नाथ सम्प्रदाय में जिन नौ नाथ की चर्चा की गई है वह सभी योगी ही थे और शिव के प्रति ही थे।

शिव का शिवयोग : इसे तंत्र या वामयोग भी कहते हैं। शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है।

क्या है धारणा :- पतंजलि हते हैं चित्त का देश विशेष में बँध जाना धारणा है। इस अवस्था में मन पूरी तरह स्थिर तथा शांत रहता है। पांचों इंद्रियों को उनके स्थान से हटाकर किसी एक स्थान (भृकुटी) पर लगाना प्रत्याहार है और जब प्रत्याहरमें व्यक्ति पारंगत हो जाता है तो धारणा सधने लगती है। कल्पना और विचारों का यथार्थ रूप ले लेना ही धारणा है।

लाभ : जिसे धारणा सिद्ध हो जाती है, कहते हैं कि ऐसा योगी अपनी सोच या संकल्प मात्र से सब कुछ बदल सकता है। ऐसे ही योगी के आशीर्वाद या शाप फलित होते हैं। तब कल्पना करें की आप सेहतमंदऔर सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। धारणा से मन पूर्णत: एकाग्र रहकर शक्तिशाली बन जाता है।

क्या है ध्यान :- ध्यान का संबंध मौन से है। चुप रहकर, कुछ भी नहीं सोचते हुए, स्वयं के आसपास की गतिविधियों तथा स्वयं के बॉडी मूवमेंट का अवलोकन करते रहने से भी जागरूकता का विकास होताहै। आप चाहे तो आँखें बंद करके बैठ जाएँ और श्वास-प्रश्वास को ध्यानपूर्वक महसूस करते रहें। भीतर और बाहर से मौन होना ध्यान की शुरुआत के लिए जरूरी है।

लाभ : ध्यान करने से मन और मस्तिष्क के साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहता है और किसी भी प्रकार का अवसाद तथा तनाव नहीं रहता। ध्यान से ही समाधि या जीवन में सफलता पायी जा सकती है।

क्या है समाधि :- समाधि समयातीत है जिसे मोक्ष कहा जाता है। इस मोक्ष को ही जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहा गया है। इसके कई स्तर होते हैं।मोक्ष एक ऐसी दशा है जिसे मनोदशा नहीं कह सकते। समाधि है मन, विचार और शरीर के पार जीने की कला।

मनुष्य पशु है
शिव कहते हैं ‘मनुष्य पशु है’- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाईहुई है।

शिव का दर्शन : ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है भगवान शंकर का दर्शन और जीवन। उनके इस दर्शन और ‍‍जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है।

शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वह सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में ज‍ीयो, वर्तमान में जीयो अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हेंअजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है

भगवान शिव के शिष्य कौन थे…

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सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर सभ्यता और धर्म के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। शिव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस ‘आदिश’ शब्द से ही ‘आदेश’ शब्द बना है। नाथ साधु जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।

शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान 7 लोगों को दिया था। ये ही आगे चलकर ब्रह्मर्षि कहलाए। इन 7 ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे।

शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदिगुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया।

सप्त ऋषियों के नाम : बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे। उल्लेखनीय है कि हर काल में अलग-अलग सप्त ऋषि हुए हैं। उनमें भी जो ब्रह्मर्षि होते हैं उनको ही सप्तर्षियों में गिना जाता है। 7 ऋषि योग के 7 अंगों का प्रतीक हैं 8वां अंग मोक्ष है। मोक्ष के लिए ही 7 प्रकार के योग किए जाते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

सप्त ब्रह्मर्षि देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:।
कण्डर्षिश्च श्रुतर्षिश्च राजर्षिश्च क्रमावश:।।
अर्थात : 1. ब्रह्मर्षि, 2. देवर्षि, 3. महर्षि, 4. परमर्षि, 5. काण्डर्षि, 6. श्रुतर्षि और 7. राजर्षि। वैदिक काल में ये 7 प्रकार के ऋषिगण होते थे।

सप्त ऋषि ही शिव के मूल शिष्य : भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने 300 ईसा पूर्व मात्र 200 सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। योग का 8वां अंग मोक्ष है। 7 अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिए हैं।

महाशिवरात्रि का महात्म्य

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द्रमास के कृष्णपक्ष का 14वां या अमावस्या से पहले वाला दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक पंचांग वर्ष की सभी बारह शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ईशान संहिता में महा शिवरात्रि की महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है-

॥शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्। आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

हिंदु कलेंडर के अनुसार एक वर्ष में बारह शिवरात्रियां होतीं हैं। शिवरात्रि प्रत्येक हिन्दु माह की कृष्ण चतुर्दशी, जो कि माह का अंतिम दिन होता है के दिन मनाई जाती है। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी, महाशिवरात्री के रूप में, पूरे भारतवर्ष में धूम-धाम से मनाई जाती है। इसके दूसरे दिन से हिंदु वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन का आरंभ हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शंकर एवं मां पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था तथा इसी दिन प्रथम शिवलिंग का प्राकट्य हुआ था। शिव रात्री के दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस दिन शिव भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, भगवान शिव का अभिषेक करते हैं तथा पंचक्षरी मंत्र का जाप करतें हैं।

हिंदु शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव मनुष्य के सभी कष्टों एवं पापों को हरने वाले हैं। सांसरिक कष्टों से एकमात्र भगवान शिव ही मुक्ति दिला सकते हैं। इस कारण प्रत्येक हिंदु मास के अंतिम दिन भगवान शिव की पूजा करके जाने-अनजाने मे किए हुए पाप कर्म के लिए क्षमा मांगने और आने वाले मास में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रावधान है। शास्त्रों के अनुसार, शुद्धि एवं मुक्ति के लिए रात्री के निशीथ काल में की गई साधना सर्वाधिक फलदायक होती है। अत: इस दिन रात्री जागरण करके निशीथ काल में भगवान शिव कि साधना एवं पूजा करने का अत्यधिक महत्व है।

महाशिवरात्री वर्ष के अंत में आती है अत: इसे महाशिवरात्री के रूप में मनाया जाता है एवं इस दिन पूरे वर्ष में हुई त्रुटियों के लिए भगवान शंकर से क्षमा याचना की जाती है तथा आने वाले वर्ष में उन्नति एवं सदगुणों के विकास के लिए प्रार्थना की जाती है।

भगवान शिव सब देवों में वृहद हैं, सर्वत्र समरूप में स्थित एवं व्यापक हैं। इस कारण वे ही सबकी आत्मा हैं। भगवान शिव निष्काल एवं निराकार हैं। भगवान शिव साक्षात ब्रह्म का प्रतीक है तथा शिवलिंग भगवान शंकर के ब्रह्म तत्व का बोध करता है। इसलिए भगवान शिव की पूजा में निष्काल लिंग का प्रयोग किया जाता है। सारा चराचर जगत बिन्दु नाद स्वरूप है। बिन्दु देव है एवं नाद शिव इन दोनों का संयुक्त रूप ही शिवलिंग है। बिन्दु रूपी उमा देवी माता है तथा नाद स्वरूप भगवान शिव पिता हैं। जो इनकी पूजा सेवा करता है उस पुत्र पर इन दोनों माता-पिता की अधिकाधिक कृपा बढ़ती रहती है। वह पूजक पर कृपा करके उसे अतिरिक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

आंतरिक आनंद की प्राप्ति के लिए शिवलिंग को माता-पिता के स्वरूप मानकर उसकी सदैव पूजा करनी चाहिए। भगवान शिव प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में स्थित अवयक्त आंतरिक अधिस्ठान तथा प्रकृति मनुष्य की सुव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान है। नमः शिवाय: पंचतत्वमक मंत्र है इसे शिव पंचक्षरी मंत्र कहते हैं। इस पंचक्षरी मंत्र के जप से ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। इस मंत्र के आदि में ॐ लगाकर ही सदा इसके जप करना चाहिए। भगवान शिव का निरंतर चिंतन करते हुए इस मंत्र का जाप करें। सदा सब पर अनुग्रह करने वाले भगवान शिव का बारंबार स्मरण करते हुए पूर्वाभिमुख होकर पंचक्षरी मंत्र का जाप करें।

भक्त की पूजा से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। शिव भक्त जितना जितना भगवान शिव के पंचक्षरी मंत्र का जप कर लेता है उतना ही उसके अंतकरण की शुद्धि होती जाती है एवं वह अपने अंतकरण मे स्थित अव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान के रूप मे विराजमान भगवान शिव के समीप होता जाता है। उसके दरिद्रता, रोग, दुख एवं शत्रुजनित पीड़ा एवं कष्टों के अंत हो जाता है एवं उसे परम आनंद कि प्राप्ति होती है।

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग भागों में स्थित हैं। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। इन ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मातर के सारे पाप व दुष्क्रत्य समाप्त हो जाते हैं। वे भगवान शिव की कृपा केपात्र बनते हैं। ऐसे कल्याणकारी ज्योतिर्लिंगों के बारे में हमने यहाँ जानकारी उपलब्ध कराई है।

ज्योतिर्लिंग के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें…

श्री सोमनाथ

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श्री मल्लिकार्जुन

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श्री महाकालेश्वर

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श्री ओंकारेश्वर-श्री ममलेश्वर

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श्री केदारनाथ

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श्री त्र्यम्बकेश्वर

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श्री वैद्यनाथ

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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