रानी लक्ष्मीबाई: वीरता और शौर्य की बेमिसाल कहानी

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बुंदेले हर बोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी…. सुभद्रा कुमारी चौहान की यह पंक्तियां आज भी केवल महारानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा बयां करती हैं, बल्कि इनको पढ़नेगुनगुनाने मात्र से मन में देशभक्ति का एक अद्भुत संचार हो उठता है.

महिला सशक्तिकरण के इस दौर में भला युवतियों और महिलाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई से अधिक बड़ा प्रेरणास्रोत कौन हो सकता है, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले काल में महज 23 साल की आयु में ही अपने राज्य की कमान संभालते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। हम देश की इस अद्भुत वीरांगना की चर्चा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आज उनका जन्मदिन है। उनका जन्म 19 नवंबर, 1835 को हुआ था। रानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीते जी अंग्रेजों को झांसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

1852 में जर्मन फोटोग्राफ़रहॉफ़मैन” द्वारा खिंची गई रानी लक्ष्मीबाई की इकलौती तस्वीर

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भारत में जब भी महिलाओं के सशक्तिकरण की बात होती है तो महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा जरूर होती है रानी लक्ष्मीबाई ना सिर्फ एक महान नाम है बल्कि वह एक आदर्श हैं उन सभी महिलाओं के लिए जो खुद को बहादुर मानती हैं और उनके लिए भी एक आदर्श हैं जो महिलाएं सोचती है कि वह महिलाएं हैं तो कुछ नहीं कर सकती देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की थी और वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी हैं

  • रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्राम कहलाता है।

  • अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे।

  • अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

रानी लक्ष्मीबाई का जीवन

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  • रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 को काशी के असीघाट, वाराणसी में हुआ था. इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाईथा. इनका बचपन का नाम मणिकर्णिकारखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को मनुपुकारा जाता था.

  • पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।

  • मनु जब मात्र चार साल की थीं, तब उनकी मां का निधन हो गया. पत्नी के निधन के बाद मोरोपंत मनु को लेकर झांसी चले गए। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएँ सीखीं।

  • चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए उनके पिता मोरोपंत मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से छबीलीबुलाने थे।

शादी

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  • मनु का विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूमधाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

  • इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। किन्तु 1853 तक उनके पुत्र एवं पति दोनों का देहावसान हो गया।

  • रानी ने अब एक दत्तक पुत्र लेकर राजकाज देखने का निश्चय किया, किन्तु कम्पनी शासन उनका राज्य छीन लेना चाहता था।

  • रानी ने जितने दिन भी शासन किया। वे अत्यधिक सूझबूझ के साथ प्रजा के लिए कल्याण कार्य करती रही। इसलिए वे अपनी प्रजा की स्नेहभाजन बन गईं थीं।

  • रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्त्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए।

  • रानी लक्ष्मीबाई की बदौलत झांसी की आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार हुआ. इसके बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया.

  • अश्वारोहण और शस्त्रसंधान में निपुण महारानी लक्ष्मीबाई ने झांसी किले के अंदर ही महिलासेना खड़ी कर ली थी, जिसका संचालन वह स्वयं मर्दानी पोशाक पहनकर करती थीं. उनके पति राजा गंगाधर राव यह सब देखकर प्रसन्न रहते. कुछ समय बाद लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर कुछ ही महीने बाद बालक की मृत्यु हो गई.

दयालु स्वभाव

  • रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा दी कि एक निश्चित दिन ग़रीबों में वस्त्रादि का वितरण कराया जाए।

मुसीबतों का पहाड़

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  • सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी।

  • अपने ही परिवार के पांच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया।

  • पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 में मृत्यु हो गयी।

अंग्रेजों की कुटिल नीति

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  • उस समय भारत के बड़े भूभाग पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन था। अंग्रेज झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी।

  • अंग्रेज़ों का जब्ती सिद्धांतझाँसी की रानी, जो इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 . में उसके पति के मरने पर लॉर्ड डलहौज़ी ने जब्ती का सिद्धांत लागू करके उनका राज्य हड़प लेना चाहते थे।

  • उन्होंने रानी के दत्तकपुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा।

  • रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।

  • रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श।

झांसी का युद्धरानी लक्ष्मीबाई का चण्डी स्वरूप

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  • 14 मार्च, 1858 से आठ दिन तक तोपें किले से आग उगलती रहीं

  • रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।

  • रानी ने तोपों से युद्ध करने की रणनीति बनाते हुए कड़कबिजली, घनगर्जन, भवानीशंकर आदि तोपों को किले पर अपने विश्वासपात्र तोपची के नेतृत्व में लगा दिया

  • रानी रणचंडी का साक्षात रूप रखे पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर राव को बांधे भयंकर युद्ध करती रहीं

  • अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला जीत सके।

  • रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे।

  • अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्यबल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है।

  • अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया और 23 मार्च 1858 को जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।

  • घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं।

  • झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हरहर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी।

  • किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं।

  • अपने विश्वसनीय चारपांच घुड़सवारों को लेकर रानी कालपी की ओर बढ़ीं। लक्ष्मीबाई क़िला छोड़कर कालपी चली गई और वहाँ से युद्ध जारी रखा।

  • उस समय 1857 में मेरठ से गदर का आगाज़ हो चुका था। झांसी विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी।

  • रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया।

  • इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया।

  • 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया।

  • 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ो से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली।

  • रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के सहयोग से शिन्दे की राजधानी ग्वालियर पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था।

  • लक्ष्मीबाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए आगरा भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मीबाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई।

  • रानी लक्ष्मीबाई तथा उसके सहयोगियों ने नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया और महाराष्ट्र की ओर धावा मारने का मनसूबा बांधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए।

  • इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मीबाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जीतोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।

अंतिम जंग का दृश्य

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  • 22 मई, 1858 को क्रांतिकारियों को कालपी छोड़कर ग्वालियर जाना पड़ा 17 जून को फिर युद्ध हुआ. रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा महारानी की विजय हुई

  • रानी ने अपना घोड़ा दौड़ाया पर दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला गया। घोड़ा नाला पार कर सका। तभी अंग्रेज़ घुड़सवार वहाँ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया।

  • गंभीर रूप से घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों को मार डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी।

बाबा गंगादास की कुटिया

  • पठान सरदार गौस ख़ाँ अब भी रानी के साथ था। उसका रौद्र रूप देख कर गोरे भाग खड़े हुए। स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही बाबा गंगादास की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।

  • रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए।

  • 18 जून, 1858 को बाबा गंगादास की कुटिया में क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी।

  • उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं।

  • विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।

  • रानी झांसी की निर्भीकता और बहादुरी को देखकर ही अंग्रेज अधिकारी जनरल ह्यूरोज ने चार जून, 1858 को कहा था कि नो स्टूअर्स इफ वन परसेंट ऑफ इंडियन वुमेन बिकम सो मैड ऐज दिस गर्ल इज, वी विल हैव टू लीव आल दैट वी हैव इन दिस कंट्री (अगर भारत की एक फीसदी महिलाएं इस लड़की की तरह आजादी की दीवानी हो गईं तो हम सबको यह देश छोड़कर भागना पड़ेगा)

हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रसिद्ध कविता झाँसी की रानी’ में लिखा

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। More

लक्ष्मीबाई ने कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ बेहतरीन सेनापति हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी हैं वह महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की भी पक्षधर थीं. उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की भर्ती की थी। आज कुछ लोग जो खुद को महिला सशक्तिकरण का अगुआ बताते हैं वह भी स्त्रियों को सेना आदि में भेजने के खिलाफ हैं पर इन सब के लिए रानी लक्ष्मीबाई एक उदाहरण हैं कि अगर महिलाएं चाहें तो कोई भी मुकाम हासिल कर सकती हैं

Letters of Rani of Jhansi

लंदन में मिला रानी लक्ष्मीबाई का लिखा खत
  • शोधकर्ताओं को लंदन से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का एक खत मिला है। पूर्व में लोगों के लिए यह खत अज्ञात था। मंगलवार को बीबीसी ने यह जानकारी देते हुए इस खोज को बेहद महत्वपूर्ण बताया है।

  • रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 के भारतीय विद्रोह से कुछ समय पहले ही यह खत लिखाafh.jpg था। बीबीसी का कहना है कि शिक्षाविदों का मानना है कि चूंकि झांसी की रानी के जीवन के
    बहुत थोड़े ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं इसलिए इस खत की खोज बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

  • यह खत ईस्ट इंडिया कंपनी (ईआईसी) के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी को लिखा गया था। 19वीं शताब्दी के लेखक लीविन बेनथम बोवरिंग ने लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी के लेखागार में अन्य दस्तावेजों, छायाचित्रों और यादगार वस्तुओं के साथ इस खत को रखा था।

  • विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियमकी हाल ही में लंदन में आयोजित महाराजाप्रदर्शनी की अनुसंधान निरीक्षिका दीपिका अहलावत का कहना है कि झांसी की रानी ने खत में उस रात की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का वर्णन किया है जिस रात उनके पति की मृत्यु हुई थी।

  • डलहौजी के विलय के सिद्धांत से असहमत लक्ष्मीबाई ने गवर्नर जनरल से कहा था कि उनके पति ने दामोदर राव गंगाधर को अपने बेटे और झांसी के अगले राजा के रूप में गोद लेने के लिए सभी आवश्यक रस्में पूरी कर ली हैं।

  • लेकिन डलहौजी ने इस बच्चे को उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया और झांसी का विलय करने की धमकी दी, जिससे लक्ष्मीबाई 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ शामिल हो गईं।

Indian heroine’s letter unearthed

BBC News | Nov 16, 2009

A previously undiscovered letter written by one of India’s best known female rebels against British colonial rule has been found by academics. The letter was written by Lakshmibai, Rani of Jhansi, shortly before the Indian mutiny – or first war of independence – in 1857.

It has been found in London in the archives of the British Library. The Rani of Jhansi has often been called the “Joan of Arc” of the Indian independence struggle. Academics say the discovery of the letter is hugely significant, because so little historical evidence from the Rani of Jhansi’s lifetime exists.

Fateful events

“The letter is part of a collection of documents known as the Bowring Collection,” said Deepika Ahlawat, research curator for the Victoria and Albert Museum’s Maharaja exhibition currently being staged in London. “The collection is named after Lewin Bentham Bowring, a civil servant working in India who gathered a remarkable collection of documents, photographs and ephemera relating to the maharajas.”

The letter is written by the Rani of Jhansi to the governor-general of the East India Company (EIC), Lord Dalhousie. In it she describes the fateful events on the night her husband died. “But under the doctrine of lapse then being imposed by the EIC, any Indian kingdom whose ruler died without an heir, or who was guilty of misrule – was subsumed into Company territory,” explained Ms Ahlawat.

Fearing this doctrine, the Rani said that her husband adopted a suitable heir before his death by performing all the necessary rites for her adopted son, Damodar Rao Gangdhar, to be accepted as the next Raja of Jhansi.

But Lord Dalhousie did not recognise the adoption and threatened to annex Jhansi, now in the state of Uttar Pradesh. In 1857 the Rani joined the rebellion against the British and personally led her troops in battle. At one point she was captured by EIC troops but subsequently made a daring escape from a fort. “All this made her the stuff of legend,” said Ms Ahlawat. “According to some stories she died riding into battle against the British – another story says that she was shot while holding the ramparts of Gwalior Fort.

“Whatever the truth, the story of a female leader battling for her kingdom against the might of the EIC fired the nationalistic imagination when the contested history of 1857 came to be written. “This a letter written by an iconic talisman for the nationalist narrative in India, and her equestrian statue can be found in town squares all over the country.”

रानी झांसी का वो आखरी दिन….            

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(वृंदावनलाल वर्मा के  ऐतिहासिक  किताब झाँसी की रानीसे साभार)

ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमी। शुक्रवार।

ऊषा ने अपनी मुसकान बिखेरी।

रानी ने नित्यवत अपने रिसाले की लाल कुर्ती की मर्दाना पोशाक पहिनी। दोनों ओर एकएक तलवार तलवार बांधी और पिस्तौल लटकाई। गले में मोतियों और हीरों की माला, जिससे संग्राम के घमासान में उनके सिपाहियों को उन्हें पहिचानने में सुविधा रहे। लोहे के दास्ताने और भुजबंद पहिने। इतने में उनके पाँचों सरदार आ गए।

मुंदर ने कहा, ‘सरकार, घोड़ा लंगड़ाता है। कल की लड़ाई में या तो घायल हो गया है या ठोकर खा गया है।रानी ने आज्ञा दी, ‘तुरंत दूसरा अच्छा और मजबूत घोड़ा ले आ।

मुंदर घोड़ा लेने गई। रानी ने अपने सरदारों को हिदायतें दीं, ‘कुंवर गुल मुहम्मद, आज तुमको अपना जौहर दिखाना है। कल की लड़ाई का हाल देखकर आज जीत की आशा होती है। परंतु यदि पश्चिम या उत्तर का मोरचा उखड़ जाए, तो उसको संभालना और दक्षिण चल पडऩे की तैयारी में रहना।

सरकारगुल मुहम्मद बोला, ‘अम सब पठान आज कट जाने का कसम खाया है। जो बचेगा, वो दखन जाएगा। आप दखन जाना सरकार। अमारा राहतगढ़ लेना। अमारा भौत पठान वहाँ  मारा गया। उनका यादगार बनवाना।

नहीं कुंवर साहब, हम जीतेंगेरानी ने कहा दक्षिण जाने की बात तो तब उठेगी, जब यहाँ  कुछ हाथ न रहे। फौजदार के विचार में जीतने की बात पहले उठनी ही चाहिए।

मुंदर बोली, ‘सरकार, कुछ जलपान कर लें।

रानी ने कहा, ‘तुम लोग कुछ खा लो। दामोदर राव को खूब खिलापिला लो। पीठ पर पानी का प्रबंध रखना। मैं केवल शरबत पिऊंगी।

मुंदर और रघुनाथ सिंह चले गए। दामोदर राव आ गया। रानी ने उसको खिलायापिलाया। रानी ने जूही से कहा, ‘आज, तेरी सुगंधि ऐसी बरसे कि बैरी बिछ जाएँ।

जूही, ‘हाँ  सरकार, अवश्य।जूही जरा ज्यादा हँस पड़ी।

रानी, ‘आज तेरी हंसी भीषण है।

जूही, ‘काम इससे अधिक भीषण होगा सरकार।

मुंदर और रघुनाथ सिंह ने कुछ भी न खाकर जेबों में कलेवा डाला और पीठ पर पानी का बरतन कस लिया। झटपट शरबत बनाया।

मुंदरबाई,’ रघुनाथ सिंह बोला, ‘रानी साहब का साथ छूटने न पावे। वे आज अंतिम युद्ध लडऩे जा रही हैं।

मुंदर, ‘आप कहाँ  रहेंगे?’

रघुनाथ सिंह, ‘जहाँ  उनकी आज्ञा होगी। वैसे आप लोगों के समीप रहने का ही प्रयत्न करूंगा।

मुंदर, ‘मैं चाहती हूँ  कि आप बिलकुल निकट रहें। मुझे लगता है कि मैं आज मारी जाऊंगी। आपके निकट होने से शांति मिलेगी।

रघुनाथ सिंह, ‘मैं भी नहीं बचूंगा। रानी साहब को किसी प्रकार सुरक्षित रखना है। मैं तुम्हें तुरंत ही स्वर्ग में मिलूंगा। केवल आगेपीछे की बात है।वह जरा सूखी हँसी हँसा। मुंदर ने रघुनाथ सिंह की ओर आँसू भरी आँखों से देखा। कुछ कहने के लिए होठ हिले। रघुनाथ सिंह की आंखें भी धुंधली हुईं।

दूर से दुश्मन के बिगुल के शब्द की झाई कानों में पड़ी। रघुनाथ सिंह ने मुंदर को नमस्कार किया, फिर दोनों शरबत लिए रानी के पास पहुँचे। मुंदर ने जूही को और रघुनाथ सिंह ने रानी को। अंगरेजों के बिगुल सुनाई पड़ रहे थे।

रानी ने रामचंद्र देशमुख को आदेश दिया, ‘दामोदर को आज तुम पीठ पर बांधो। यदि मैं मारी जाऊं, तो इसको सुरक्षित दक्षिण पहुँचा देना। दूसरी बात यह कि मारी जाने पर ये विधर्मी मेरी देह न छूने पाएँ। बस। घोड़ा लाओ।

मुंदर घोड़ा ले आई। उसकी आंखें छलछला रही थीं। मुंदर की छलछलाती आँखों को देखकर रानी ने कहा, ‘यह समय आंसुओं का नहीं है मुंदर। जा, तुरंत अपने घोड़े पर सवार हो।

रानी ने घोड़े को एड़ लगाई। वह पहले जरा हिचका, फिर तेज हो गया। उत्तर और पश्चिम की दिशाओं में राव साहब के मोरचे थे। दक्षिण में बांदा के नवाब का, रानी ने पूरब की झपट लगाई।

 

रानी के पीछे पैदल पलटन थी

उसको स्थिति संभालने की आज्ञा देकर वह आगे बढ़ी। उधर हुजर सवार जूही के तोपखाने पर जा टूटे, जूही तलवार से भिड़ गई। घिर गई और मारी गई। मरते समय उसने आह तक नहीं की।

समाचार मिलते ही रानी ने तोपखाने का प्रबंध किया। इतने में ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने छिपे पैदलों को बाहर निकाला। वे संगीनें सीधी किए रानी के पीछे वाली पैदल पलटन पर दो पार्श्वों से झपटे। पेशवा की पैदल पलटन घबरा गई। उसके पैर उखड़े। वह भाग उठी। रानी ने प्रोत्साहन, उत्तेजना दी। परंतु उनके और उस भागती हुई पलटन के बीच गोरों की संगीनें, हुजरों के घोड़े आ चुके थे।

रानी ने घोड़े की लगाम अपने दांतों में थामी और दोनों हाथों से तलवार चलाकर अपना मार्ग बनाना प्रारंभ कर दिया। दक्षिणपश्चिम की ओर सोनरेखा नाला था। आगे चलकर बाबा गंगादास की कुटी थी। कुटी के दक्षिण और पश्चिम की ओर हटती हुई पेशवाई पैदल पलटन।

मुंदर रानी के साथ थी। अगलबगल रघुनाथ सिंह और रामचंद्र देशमुख। पीछे कुंवर गुल मुहम्मद और केवल बीसपच्चीस अवशिष्ट लाल सवार। अंगरेजों ने थोड़ी देर में इन सबके चारों तरफ घेरा डाल दिया। सिमटसिमटकर उस घेरे को कम करते जा रहे थे। परंतु रानी की दुहत्थू तलवारें आगे का मार्ग साफ करती चली जा रही थीं। पीछे के वीर सवारों की संख्या घटतेघटते नगण्य हो गई। उसी समय तात्या ने रुहेली और अवधी सैनिकों की सहायता से अंगरेजों के व्यूह पर प्रहार किया। अंगरेज लाल कुर्ती का पीछा छोडक़र तात्या की ओर मुड़ गए। सूर्यास्त होने में विलंब था।

लाल कुर्ती का अंतिम सवार भी मारा गया।

रानी के साथ केवल 4 सरदार और उनकी तलवारें रह गईं.. पीछे से कड़ाबीन और तलवार वाले दसपंद्रह गोरे सवार। रानी ने पीछे की ओर देखा। रघुनाथ सिंह और गुल मुहम्मद तलवार से गोरे सैनिकों की संख्या कम कर रहे थे। एक तरफ रामचंद्र देशमुख दामोदर राव की रक्षा में बचाव के साथ लड़ रहे थे। रानी ने देशमुख की सहायता के लिए मुंदर को इशारा किया और वह संगीनबरदारों को दोनों हाथों की तलवारों से खटाखट साफ करकेआगे बढऩे लगीं।

एक संगीनबरदार की हूल रानी के सीने के नीचे पड़ी..उन्होंने उसी समय तलवार से उस संगीनबरदार को खत्म किया। हूल करारी थी, परंतु आँतें बच गईं।

रानी ने सोचा, ‘स्वराज्य की नींव बनने जा रही हूँ ।

रानी का खून बह निकला.. उस संगीनबरदार के खतम होते ही बाकी भागे। रानी आगे निकल गईं। उनके साथी भी दाएँबाएँ और पीछे। गोरे घुड़सवार उनको पछियाते हुए।

रघुनाथ सिंह पास ही था।

रानी ने कहा, ‘मेरी देह को अंगरेज न छूने पावे..

एक अंगरेज सवार ने मुंदर पर गोली दागी। उसके मुँह से केवल यही शब्द निकले:बाई साहब, मैं मरी। मेरी देहभगवन्।अंतिम शब्द के साथ उसने एक दृष्टि रघुनाथ सिंह पर डाली और वह लटक गई। रानी ने मुड़कर देखा। रघुनाथ सिंह से कहा, ‘संभालो उसे, उसके शरीर को वे छूने न पावें।और वे घोड़े को मोडक़र अंगरेज सवारों पर तलवारों की बौछार करने लगीं। कई कटे। मुंदर को मारने वाला मारा गया।

रानी ने तेजी के साथ सोनरेखा नाले की ओर घोड़े को बढ़ाया..

देशमुख साथ हो गया। अंगरेज सवार चारपांच रह गए थे। गुल मुहम्मद उनको बहकाता हुआ रानी के साथ हो लिया। रानी तेजी से नाले की ढी पर आ गईं। घोड़े ने आगे बढऩे से इनकार कर दिया। रानी ने पुचकारा। कई प्रयत्न किए, परंतु सब व्यर्थ।

इतने में वे अंगरेज सवार आ पहुँचे।

एक गोरे ने पिस्तौल निकाली और रानी पर दागी..

गोली उनकी बाईं जांघ में लगी। रानी ने बाएँ हाथ की तलवार फेंककर घोड़े की अयाल पकड़ी और दूसरी जांघ तथा हाथ की सहायता से अपना आसन संभाला। इतने में हमलावर सवार और निकट आया। रानी ने दाएँ हाथ के वार से उसको समाप्त किया। उस सवार के पीछे से एक और सवार निकल पड़ा।

गुल मुहम्मद आगे बढ़े हुए अंगरेज सवार की ओर लपका। परंतु गुल के पहुँचने के पहले ही उसने तलवार का वार रानी के सिर पर किया। वह उनकी दाईं ओर पड़ा। सिर का आधा हिस्सा कट गया और दाईं आँख बाहर निकल पड़ी। इस पर भी उन्होंने अपने घातक वार से उसका कंधा काट दिया!

गुल मुहम्मद ने उस सवार के ऊपर कसकर हाथ छोड़ा, उसके दो टुकड़े हो गए। बाकी दोतीन अंगरेज सवार बचे थे। उन पर गुल बिजली की तरह टूट पड़ा। वे तीनों मैदान छोड़क़र भाग गए। अब वहाँ  कोई शत्रु नहीं था। जब गुल मुहम्मद मुड़ा, तो देखा, रामचंद्र देशमुख घोड़े से गिरती रानी को साधे हुए है।

दिन भर के थकेमादे, भूखेप्यासे, धूल और खून में सने गुल मुहम्मद ने पश्चिम की ओर मुँह फेरकर कहा, ‘या खुदा, पाक परवरदिगार, रहम कर।उस कट्टर सिपाही की आँखों से आँसुओं की मानों बरसात होने लगी।

रघुनाथ सिंह और देशमुख ने रानी को घोड़े से संभालकर उतारा। रघुनाथ सिंह ने देशमुख से कहा, ‘एक क्षण का विलंब नहीं होना चाहिए। अपने घोड़े पर इनको होशियारी के साथ रखो और बाबा गंगादास की कुटी पर चलो। सूर्यास्त हुआ ही चाहता है।

देशमुख का गला रुंधा हुआ था।

बालक दामोदर राव अपनी माता के लिए चुपचाप रो रहा थारामचंद्र ने पुचकारकर कहा, ‘इनकी दवा करेंगे, अच्छी हो जाएँगी, रोओ मत।

सब द्रुत गति से बाबा गंगादास की कुटी पर पहुँचे। बिसुरते हुए दामोदर राव को एक ओर बिठाकर रामचंद्र राव ने अपनी वर्दी पर रानी को लिटाया। और बचे हुए साफे के टुकड़े से उनके सिर के घाव को बाँधा। रघुनाथ सिंह ने अपनी वर्दी पर मुंदर के शव को रख दिया।

बाबा गंगादास ने पहिचान लिया। बोले, ‘सीता और सावित्री के देश की लड़कियां हैं ये।

रानी ने पानी के लिए मुंह खोलाबाबा गंगादास तुरंत गंगा जल ले आए। रानी को पिलाया, उनको कुछ चेत आया। पीडि़त स्वर में धीरे से निकला, ‘हरहर महादेव।उनका चेहरा कष्ट के मारे पीला पड़ गया। वह अचेत हो गईं। बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, ‘अभी कुछ प्रकाश है। परंतु अधिक बिलंब नहीं। थोड़ी दूर घास की गंजी लगी हुई है, उसी पर चिता बनाओ।

मुंदर की ओर देखकर बोले, ‘यह इस कुटी में रानी लक्ष्मीबाई के साथ कई बार आई थी।उसके मुंह में भी बाबा ने गंगा जल डाला। रानी फिर थोड़े से चेत में आई। कम से कम रघुनाथ सिंह आदि को यही जान पड़ा। दामोदरराव पास आ गया। उसको अवगत हुआ कि मां बच गई और फिर खड़ी हो जाएँगी। उत्सुकता के साथ उनकी ओर टकटकी लगाई।

रानी के मुँह से बहुत टूटे स्वर में निकला, ‘ओम् वासुदेवाय नम:

इसके उपरांत उनके मुंह से जो कुछ निकला, वह अस्पष्ट था। होठ हिल रहे थे। वे लोग कान लगाकर सुनने लगे। उनकी समझ में केवल तीन टूटे हुए शब्द आएति नैयं पावक:मुखमंडल प्रदीप्त हो गया।

देशमुख ने बिलखकर कहा, झाँसी  का सूर्य अस्त हो गया। रघुनाथ सिंह बिलखबिलखकर रोने लगा। दामोदर ने चीत्कार किया। बाबा गंगादास ने कहा, ‘प्रकाश अनंत है। वह कणकण को भासमान कर रहा है। फिर उदय होगा। फिर प्रत्येक कण मुखरित हो उठेगा।

झांसी की रानी का ऐतिहासिक पत्र

लक्ष्मीबाई ने लॉर्ड डलहौज़ी को पत्र लिखा था

भारत में ब्रितानी शासन के ख़िलाफ़ हुए 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की एक महत्वपूर्ण चिट्ठी लंदन में ब्रिटिश लाइब्रेरी के आर्काइव्स में मिली हैं. झांसी की रानी ने 1857 के विद्रोह से कुछ ही देर पहले यह पत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी को लिखा था.

लंदन में आजकल विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूज़ियम की महाराजा प्रदर्शनी की रिसर्च क्यूरेटर दीपिका अहलावत ने इस पत्र के बारे में प्रकाश डाला है.

लॉर्ड डलहौज़ी को लिखा पत्र

दीपिका अहलावत का कहना है, ” ये चिट्ठी उन दस्तावेज़ों का हिस्सा है जो बॉरिंग कलेशन के नाम से जाने जाते हैं. ये दस्तावेज़ एक ब्रितानी अधिकारी लेविन बेंथम बॉरिंग के नाम से जाने जाते हैं जिन्होंने भारत के राजाओंमहाराजाओं के बारे में दस्तावेज़, तस्वीरें और अन्य चीज़े एकत्र की थीं.”

झांसी की रानी के इस पत्र में उस रात का विवरण है जब उनके पति की मृत्यु हुई थी.

लक्ष्मीबाई ने पत्र में लिखा है कि डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स के डर से उनके पति ने विधिवत ढंग से पुत्र को गोद लिया था ताकि उसे झांसी का अगला राजा स्वीकार किया जाए लेकिन लॉर्ड डलहौज़ी ने इसे स्वीकार नहीं किया.

सुभद्रा कुमारी चौहान की वो प्रसिद्ध कविता

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी..

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्धव्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टकुलदेवी भी उसकी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
वीर बुंदेलों सी विरदावली सी वह आई झाँसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपकेचुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोकसमानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की,लिया लखनऊ बातोंबात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्रनिपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अब जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया,यह था संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वारपरवार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रतानारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
तेरा यह बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

ये हैं झांसी के 10 ऐतिहासिक स्थान, जहां से रहा रानी लक्ष्मीबाई का खास नाता

रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य की गाथा पूरा हिंदुस्तान आज भी गाता है। झांसी में कई ऐसी जगह हैं, जहां से उनका खास रिश्ता रहा है। वो यहां लगातार आया-जाया करती थीं। उन्होंने कई खास मौकों पर इन जगहों पर समय गुजारा था। ऐसी ही 10 जगहें, जहां आज भी बसी हैं रानी की यादें…

1- लक्ष्मी बाई का किला: सबसे पहले बात करते हैं किले की। साल 1613 में ओरछा के राजा वीर सिंह द्वारा बने इस किले को 400 साल हो गए हैं। कई मराठा शासकों का झांसी में शासन रहा, लेकिन किले को रानी के नाम से जाना जाता है। ये किला आज भी रानी की वीरता की कई कहानियां खुद में सहेजे हुए है।
2- 100 फीट ऊंची दीवार से लगाई थी छलांग: अप्रैल,1858 में अंग्रेजों से खुद को घिरता देख रानी लक्ष्मीबाई ने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ से बांधकर अपने सफेद घोड़े से किले की 100 फीट ऊंची दीवार से छलांग लगा दी थी। रानी ने यहां से छलांग लगाई थी या नहीं, इसमें भी इतिहासकारों में मतभेद हैं।
3- रानी महल: रानी महल भी लक्ष्मीबाई की याद दिलाता है। ये रानी की खास जगह थी। गंगाधर राव के निधन के बाद जब रानी को मजबूरन किला छोड़ना पड़ा, तब रानी इसी महल में रहीं थीं। इस महल को पहले सरकारी आवास कहा जाता था। रानी ने काफी समय यहां गुजारा। ये पूरा महल पीले रंग का है। इसके अंदर शानदार कलाकृतियां बनी हुई हैं। झांसी में ये किला शहर इलाके में स्थित है।
4- गणेश मंदिर: झांसी की पुरानी बजरिया में स्थित गणेश मंदिर रानी की जिंदगी की सबसे अहम जगह थी। बचपन में मनुकर्णिका नाम से जानी जाने वाली लक्ष्मीबाई के विवाह की रस्में इसी मंदिर में हुईं थीं। वो यहीं झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ विवाह के बंधन में बंधी थीं।
5- महालक्ष्मी मंदिर: ये मंदिर 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था। ये मंदिर उन दिनों का गवाह है ,जब झांसी पर अंग्रेजों की बुरी नजर नहीं पड़ी थी। इस मंदिर में रानी अक्सर पूजा करने आती थीं। एक समय इस मंदिर में कोछाभाँवर और गोरामछिया ग्राम राजस्व के 4,900 नानाशाही लगे थे।6- लक्ष्मी तालाब: कहा जाता है कि जब रानी लक्ष्मीबाई महालक्ष्मी मंदिर में पूजा करने के लिए जाती थीं, तब इसी तालाब से होकर गुजरती थीं। ये तालाब झांसी का बड़ा जल स्त्रोत हुआ करता था। राजा गंगाधर राव का अंतिम संस्कार भी यहीं किया गया था। हालांकि आज इस जगह जर्जर हालत में है और इसे दोबारा संवारने की कोशिश की जा रही है।

7- गंगाधर राव की छतरी: झांसी के राजा गंगाधर राव के निधन के बाद रानी शोक में डूब गईं थीं। गंगाधर राव का अंतिम संस्कार लक्ष्मी तालाब के किनारे किया गया था। इसी जगह पर रानी ने राजा की याद में उनकी समाधि बनवाई थी। झांसी में रानी द्वारा कराए गए एकमात्र निर्माण में से एक ये समाधि स्थल है।

 

अमर कहानी

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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
रामप्रसाद

२२ वर्ष और ७ माह की अल्पायु में भी अपनी बुद्धि, अपने शौर्य और अपने असाधारण कौशल से अमर हो गई। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई इतिहास के उन प्रकाशमान नक्षत्रों में प्रमुख हैं जिनकी प्रेरणा आज भी सहस्त्रों हृदयों को मार्गदर्शन करती हैं। उसी रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी प्रस्तुत है।

वीर बाला

वर्षा ऋतु के पश्चात की वह एक सायंकाल थी। बिठुर के बाहर सड़क पर, गंगा नदी के किनारे – किनारे तीन घुड़सवार तेजी से जा रहे थे। दो घोड़ों पर दो नवयुवक सवार थे और तीसरे पर थी एक बालिका। जब एक नवयुवक ने अपना घोडा आगे बढ़ा लिया तो उस बालिका ने अपने घोड़े की रफ्तार तेज की और वह आगे बढ़ गई। वह नवयुवक इस पराजय को स्वीकार करनेवाला नहीं था। उसने भी उस बालिका से आगे बढ़ने का प्रयास किया, किन्तु उसका घोडा ठोकर खाकर गिरा और वह भी गिर पड़ा।
ओ मनु, मैं मर गया। ”
बालिका ने जब यह आवाज सुनी तो उसने अपना घोडा मोड़ा। नवयुवक को चोट आ गई थी। उसके शरीर से खून बह रहा था। बड़ी कठिनाई के साथ उसने उसे उठाया और अपने घोड़े पर बैठाया। इस समय तक दूसरा घुड़सवार भी वहाँ पहुँच चुका था। तीनों महल की ओर लौट पड़े। जब घोडा बिना सवार के लौटा तो पेशवा बाजीराव द्वितीय बहुत परेशान हुए। मोरोपंत ने, जोकि उनके साथ थे, उन्हें समझाने का प्रयास किया। किन्तु उनकी बेचैनी कायम रही। जब उनके बच्चे लौट आए तब कहीं उन्होने राहत की सांस ली। वह घायल नवयुवक था बाजीराव का गोद लिया हुआ पुत्र नानासाहेब, और उसका साथी था, उसका छोटा भाई रावसाहेब। और बालिका थी पेशवा के सलाहकारमण्डल के एक सदस्य मोरोपंत की इकलौती पुत्री मनुबाई।

जब वे घर लौटे तो मोरोपंत ने कहा : “मनु, नाना गंभीर रूप से घायल हो गए हैं?”
नहीं पिताजी, उन्हें तो मामूली चोट आई है। अभिमन्यु तो जब गंभीर रूप से घायल हो गया, तब भी लड़ता रहा था।”
बेटा, वह जमाना अलग ही था, ”मोरोपंत ने कहा। “फर्क क्या है, पिताजी? वही नीला आकाश है, वही पृथ्वी है। सूर्य और चन्द्र भी तो वही है ?”
परंतु मनु देश का भाग्य बदल गया है। यह ब्रिटिश युग है। हम उनके समक्ष शक्तिहीन हैं।”
पिता की बात पुत्री को नही भायी। पिता ने स्वयं सती सीता, माता जीजाबाई, वीरांगना ताराबाई की जीवनी के आदर्श उसके सामने रखे थे। उसी बिठुर नगर में एक और घटना घटी। एक दिन नाना साहेब और रावसाहेब हाथी पर सवारी कर रहे थे। बाजीराव मनुबाई को उनके साथ भेजना चाहता था। मनु की भी यही इच्छा थी। किन्तु उनकी इच्छा पूरी नही हुई। नाना साहेब ने महावत से आगे बढ़ने के लिए कहा। मनु निराश हो गई।
जब वे घर वापिस आए तो पिता ने पुत्री से कहा, “ मनु, हमें समय के साथ चलना चाहिए। क्या हम राजा हैं जो हाथी पर चलें ? हमें ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिए जो हमारे भाग्य में नहीं।”
मनु ने उत्तर दिया “ पिताजी, मेरे भाग्य में एक नहीं अनेक हाथी हैं। ”
ऐसा ही हो बेटी”, मोरोपंत ने गदगद हो कहा।
पिताजी, मैं अब राइफल से गोली चलाने का अभ्यास करूँगी, ”यह कहते हुए वह चली गई।
मोरोपंत यह देखकर बहुत परेशान थे कि मनु में पुरुषोचित गुण हैं।

बालिका का जन्म और विवाह

बाजीराव द्वितीय केवल नाम के पेशवा थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी उन्हें प्रतिवर्ष आठ लाख रुपए पेंशन दे रही थी और उन्हें बिठुर की जागीर दी गई थी।

मोरोपंत की पत्नी का नाम भागीरथीबाई था। वह सुंदर, सुसंस्कृत, विदुषी और धार्मिक वृत्ति की थी। मनु इसी आदर्श दंपत्ति की पुत्री थी। कार्तिक द्वितीया (१९, नवंबर १८३५) को जन्मी यह बच्ची अपनी माता के समान ही सुंदर थी। उसका भाल विशाल था। आँखें भी बड़ी थीं। उसके चेहरे से राज तेज प्रकट हो रहा था। मनु जब ४ वर्ष की थी, उसकी माता का देहांत हो गया। पुत्री के पालनपोषण का संपूर्ण भार पिता पर आ पड़ा। औपचारिक शिक्षा के साथ ही उसने तलवार चलाने, घुड़सवारी करने तथा बँदूक चलाएँ का प्रशिक्षण प्राप्त किया। सन १८४२ में झाँसी के महाराजा गंगाधरराव के साथ उसका विवाह हुआ। गरीब ब्राहम्ण की बालिका झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई बन गई।

वह युग १९ शताब्दी की शुरुवात थी। अंग्रेजों ने, जो भारत में व्यापार करने आए थे, ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम पर तेजी से राजनैतिक सत्ता हथियाना प्रारम्भ कर दिया था। भारतीय राजाओं और महाराजाओं ने, जो कि परस्पर झगड़ों में उलझे हुए थे, अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बनने में एक–दूसरे से होड़ लगी थी। भारत की दृष्टि से हो रही प्रत्येक दुर्भाग्यपूर्ण घटना उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में सहायक हो रही थी।

सत्ता का ह्रास

अंग्रेजों द्वारा अंतिम पेशवा को सत्ता से हटा देने के बाद उन्हें अभिमान हो गया था। उन्होने मुगल सम्राट की भी उपेक्षा की। एक ओर स्वतन्त्रता को नष्ट करने का निश्चित प्रयास चल रहा था तो दूसरी ओर गुलामी से मुक्ति के लिए प्रयास किए जा रहे थे। स्वातंत्र्यप्रेम को कतई दबाया नहीं जा सकता। उसे जितना ही दबाया जाता है, वह उतना ही प्रबल हो जाता है। एक ओर राजाओं के ताज लड़खड़ा रहे थे, कंपनी सरकार द्वारा लादी गई अपमानास्पद शर्तों को राजा स्वीकार कर रहे थे और उनकी रियासतों को संरक्षित राज्य बनाया जा रहा था, तो दूसरी ओर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फ़ेंकने और देश की स्वतन्त्रता तथा सम्मान की रक्षा करने की इच्छा दृढ़ होती जा रही थी। किन्तु बाहर से शांति दिखाई देती थी। सब कुछ गुप्त रूप से किया जा रहा था। देश उस ज्वालामुखी के समान था, जोकि लावा उगलने के पूर्व असाधारण रूप से शांत नजर आता है।

झाँसी की कहानी

झाँसी उत्तरप्रदेश का एक जिला केंद्र है। अंग्रेजों तथा झाँसी के राजा के बीच जो संधि थी हुई थी उसकी दो शर्तें थी। प्रथम यह कि जब कभी अंग्रेजों को सहायता की आवश्यकता होगी, झाँसी उसकी सहायता करेगा। दूसरी यह कि झाँसी का शासक कौन हो, यह निश्चित करने के लिए अंग्रेजों की स्वीकृति आवश्यक है। इस प्रकार पूर्ण बरबादी के बीज बो दिए गए थे। सन १८३८ में अंग्रेजों ने गंगाधरराव को झाँसी का राजा नियुक्त किया। भूतपूर्व राजा रघुनाथराव के काल में राजकोष खाली हो चुका था। प्रशासन रहा ही नहीं था और जनता को कोई स्थान नहीं रह पाया था। गंगाधरराव ने बागडोर संभालते ही राज्यशासन को सुस्थिर किया। महल में अब गोधन, हाथी और घोड़े अच्छी संख्या में आ गए। शस्त्रागार में शस्त्रों तथा गोला –बारूद का विपुल भंडार हो गया। सेना में ५ हजार सैनिकों की थल सेना और ५०० घुड़सवार थे। इनके साथ ही तोपखाना भी था। किन्तु राज्य में ब्रिटिश सेना भी मौजूद थी। केवल सेना पर खजाने से २२ लाख ७ हजार रुपए खर्च किए जाते थे।

गंभीर आघात

१८५१ में महारानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। किन्तु भाग्य क्रूर था। ३ माह के अंदर ही बच्चे की मृत्यु हो गई। गंगाधरराव को राज्य के भविष्य की चिंता हो गई। इसके कारण उन्हें मानसिक विकार हो गया। उनके दुख का एक कारण और था। वह था तत्कालीन गवर्नर – जनरल लार्ड डलहौजी का क्रूर शासन। जब कुछ राजाओं ने अंग्रेजों की सहायता स्वीकार कर ली थी तो बदले में उनपर एक शर्त लाद दी गई थी कि, यदि संतानहीन रहते हुए राजा की मृत्यु हो जायेगी तब वह राज्य अंग्रेज़ अपने हाथ में लेंगे। यहाँ तक कि कोई राजा लड़के को गोद लेता है तो उस लड़के को भी शासन करने का अधिकार नहीं होगा। इस प्रकार का था लार्ड डलहौजी का शासन। आश्रितों के लिए वार्षिक पेंशन निश्चित की जायेगी और राज्य के संरक्षण का पूर्ण उत्तरदायित्व ब्रिटिश सरकार का होगा। यह नियम लागू कर अंग्रेजों ने अनेक राज्य हड़प लिए। अब झाँसी की बारी थी। महाराजा गंगाधरराव के लिए, जोकि वृद्ध थे, यह एक गंभीर आघात था। वे बीमार पड़ गए। १८५३ में महाराजा और लक्ष्मीबाई ने आनंद राव नामक बालक को गोद लेने का निश्चय किया। धार्मिक विधि के बाद गोद लिये बालक का नाम दामोदर राव रखा गया।

डलहौजी का कुटिल आदेश

समारोह समाप्त होने के पश्चात गंगाधरराव ने कंपनी को एक पत्र लिखा। उन्होने इस दत्तकविधान के संबध में पूर्ण ब्यौरा दिया और कंपनी से अनुरोध किया कि गोद लिये हुए बालक को उनके उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी जाय। उन्होने सुझाव दिया कि दामोदरराव के वयस्क होने तक रानी लक्ष्मीबाई को उसके प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी जाय। महाराजा ने कंपनी तथा झाँसी के बीच मैत्री पूर्ण सम्बन्धों का कंपनी को स्मरण दिलाया। महाराजा ने मेजर एलिस को पत्र सौंप दिया और उसे लार्ड डलहौजी के पास पहुँचाने का अनुरोध किया।

गंगाधरराव ने मेजर से कहा था, “मेजर साहेब, मेरी रानी एक महिला है किन्तु उसमें ऐसे अनेक गुण हैं जो कि विश्व के श्रेष्ठतम पुरुषों में होने चाहिए।” जब वे बोल रहे थे तब अंजाने में ही उनके नेत्रों में आँसू भर आये थे।

उन्होने कहा, “मेजर साहेब, कृपा कर यह ध्यान रखिये कि झाँसी किसी भी हालत में अनाथ न होने पावे।” कुछ दिनों के बाद २१, नवंबर १८५३, को गंगाधरराव का निधन हो गया। अनुभवशून्य १८ वर्षीय लक्ष्मीबाई विधवा हो गई। एक हिन्दू महिलावह भी युवती और विधवा, अनेक रीतिरिवाजों से बँधी। इसके अतिरिक्त उस पर एक राज्य का उत्तरदायित्त्व जिसे कोई संरक्षण प्राप्त नहीं था। एक ओर डलहौजी राज्य को हड़पने की प्रतीक्षा में था, तो दूसरी ओर लक्ष्मीबाई के हाथों में नन्हा शिशु दामोदरराव यह थी लक्ष्मीबाई की दीन अवस्था। उसकी समस्याएँ और दुख असीमित थे। महाराजा के प्रतिनिधित्व के लिए लक्ष्मीबाई ने अनेक याचिकाएँ डलहौजी को भेजी। ३ माह बीत गए, किन्तु कोई उत्तर नहीं आया। मार्च १८५४ का दुर्भाग्य का दिन आया। डलहौजी का आदेश पहुँचा।

उसमें लिखा था, उत्तराधिकारी को गोद लेने के स्वर्गीय महाराजा गंगाधरराव के अधिकार को कंपनी मान्यता नहीं देती। अत: झाँसी को ब्रिटिश प्रान्तों में विलीन करने का निश्चय किया गया है। रानी को किला खाली कर देना चाहिये और नगर में स्थित महल में रहना चाहिये। उसे ५ हजार रुपये मासिक पेंशन दी जाएगी। पहले तो रानी इस पर विश्वास नहीं कर सकी। कुछ समय तक वह स्तंभितसी रही। और फिर उसने कहा : “नहीं असंभव ! मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।” उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि ब्रिटिश शक्ति और उसकी चालाकी का विरोध करना झाँसी जैसे छोटे राज्य के लिए कितना कठिन था। विशेषकर ऐसे समय जबकि पेशवा अंग्रेजों के सामने झुके हुए थे। दिल्ली के बादशाह ने भी घुटने टेक दिए थे।

जब अंग्रेजों ने शासन का भार हाथ में ले लिया तो रानी की दिनचर्या बदल गई। प्रतिदिन प्रात:काल ४ बजे से ८ बजे तक का समय स्नान, पूजा, ध्यान और प्रार्थना में बीतता था। ८ से ११ बजे तक वह घुड़सवारी करती। बँदूक, तलवार तथा तीर चलाना सीखती। यह सब करते समय वह घोड़े की लगाम दांतों से दबाये रहती थी। इसके बाद वह पुन: स्नान करती।

भूखों को भोजन व गरीबों को भिक्षा देती और उसके बाद करती। भोजन के पश्चात वह थोड़ी देर विश्राम करती। इसके बाद वह रामायण का पाठ करती थी। सायंकाल वह हल्का व्यायाम करती बाद में कुछ धार्मिक पुस्तके पढ़ती और धर्मोपदेश ग्रहण करती। इसके बाद वह अपने इष्ट देव की आराधना करती। यह सब कुछ व्यवस्थित ढंग से और निश्चित समय के अनुसार होते।

विस्फोट के लिए तैयारी

जो लोग मूक रहकर अत्याचार तथा अन्याय सहन कराते हैं, वे जीवित रहकर भी मृतक के समान हैं। न्याय का सम्मान नैतिकता का गुण है और अन्याय के समक्ष झुकना कायरता। सरौते के बीच में आने पर सुपारी भी उछल पड़ती है। तेज दबाव पड़ने पर तोप का गोला फूट पड़ता है। पशु भी क्रूरता के विरुद्ध बदला लेने के लिए तैयार हो जाता है, यह सोचे बिना कि उसका परिणाम क्या होगा। वे सभी राजा जो पुत्र न होने के कारण अपने राज्य खो चुके थे, उनके परिवार के सदस्य, उनके आश्रित, उनकी बहंग हुई सेना के सैनिक, शुभचिंतक सभी असंतोष से उबाल रहे थे। तात्या टोपे, रघुनाथ सिंह, जवाहर सिंह और इसी प्रकार के अन्य स्वतन्त्रताप्रेमी गुप्त रूप से रानी लक्ष्मी बाई से मिलने आ रहे थे। वे अपने और जनता के असंतोष का ब्योरा रानी को देते थे। रानी लक्ष्मी बाई ने अपने राज्य की भौगोलिक स्थिति, सामरिक महत्त्व के क्षेत्रों तथा ब्रिटीशों के साथ लड़ाई में पंजाब में पंजाब की सीख सेना के गठन का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया था।

रानी जब घोड़े पर सवार होकर बाहर निकलती तो वह पुरुषों के समान वेश करती थी। वह धातु का टोप धारण करती थी जिसके ऊपर पगड़ी बँधी हुई होती थी। उसके सीने के निकट संरक्षण के लिए धातु की एक प्लेट बँधी हुई होती, वह पायजामा पहनती और ऊपर एक पटका बँधा रहता था। दोनों ओर वह पिस्तौल और छुरे लटकाए रहती थी। इसके अतिरिक्त वह अपने साथ कृपाण रखती थी। रानी को, जिसकी कि घुड़सवारी में अनोखी निपुड़ता थी, काठियावाड़ के श्वेत घोड़े अधिक पसंद थे। रानी अपने बाल खुले रखती थी। इसलिए टोप धारण करना और पगड़ी बांधना उसके लिए कठिन था। महाराष्ट्र की विधवाएँ अपना सिर मुंडा लेती हैं। रानी ने भी बनारस में अपना सिर मुंडा लेने का निश्चय किया। इसके अतिरिक्त देश के उस भाग में जाकर राजनैतिक स्थिति का अध्ययन करना भी उसका लक्ष्य था। किन्तु ब्रिटिश अधिकारियों उसे यात्रा की अनुमति नहीं दी। रानी ने शपथ ली, “देश को आजादी मिलने के बाद ही मैं अपने केश मुँडाऊँगी। अन्यथा यह काम श्मशान भूमि में ही हो सकता है।” असंतुष्ट नाना साहेब और राव साहेब, दिल्ली के राजा बहादुरशाह और अवध के नवाब के शुभचिंतक ये सभी मिलना चाहते थे। रानी के मन में भी यही विचार आए। किसी धार्मिक समारोह के अवसर पर ही यह सभी नेता मिल सकते थे।

संगठन
गोद लिया पुत्र दामोदर राव इस समय तक ६ वर्ष का हो चुका था और उसने ७वें वर्ष में प्रवेश किया था। उसका यज्ञोंपवीत संस्कार करने की व्यवस्थाएँ की गई। राज्य के ब्रिटिश अधिकारी को एक आवेदन पत्र भेजा गया। खजाने में दामोदरराव के नाम पर ६ लाख रुपए थे। आवेदन पत्र में धार्मिक समारोह के लिए एक लाख रुपए निकालने की अनुमति माँगी गई। ब्रिटिश अधिकारी ने कहा, “दामोदर राव अभी छोटे हैं, यदि ४ व्यक्ति जमानत देकर मुझे संतोष दिलाएँ तो राशि दी जाएगी। ” रानी ने अपमान का घूँट पी लिया और राशि प्राप्त की। नेतागण धार्मिक समारोह के लिए एकत्र हुए। जब नेताओं की बैठक चल रही थी, महिलाएँ महल के चारों ओर कड़ी निगरानी रखे हुए थीं। नेताओं को कुछ सूचनाएँ मिली थी। ब्रिटिश सेना में हिन्दू सैनिकों में इस बात को लेकर रोष था कि तिलक लगवाने की उन्हें अनुमति नहीं थी। इसी प्रकार मुसलमानों में इस बात को लेकर रोष था कि उन्हें चर्बी मिश्रित गोलियों का उपयोग करने के लिए बाध्य किया जाता था। सेना में गहन असंतोष व्याप्त था। जल्दबाज़ी अविवेकपूर्ण होती है। सेना भी इस समय पूर्णत: तैयार नहीं थी। इस बात का विश्वास दिलाना आवश्यक था कि युद्ध के दौरान लूटपाट और डकैती नहीं होगी। अन्यथा जनता की सहानुभूति समाप्त हो जाएगी। रानी की यह नीति थी। अन्य लोग भी इस पर सहमत हो गए।

विस्फोट

महिलाएँ भी गीतों, उत्सवों तथा मनोरंजन की कला के द्वारा सेना के शिविरों में असंतोष फैलाने में लग गईं। जो कुछ होता था, उसकी सूचना रानी को दी जाती थी। पूर्णिमा बीत चुकी थी। फरवरी में एक रात्रि को तात्या टोपे रानी से मिलने आया। तात्या टोपे अपने साथ एक पर्चा लाया था, जिसमें लिखा था, “अब अधिक क्षति उठाना असंभव है। सीने में भोंके गए छुरे को हम कब तक बरदाश्त कर सकते हैं। उठो और न्याय के लिए बलिदान देने को तैयार हो जाओ। कुछ निष्ठुर शासकों ने इस देश को गुलाम बना रखा है, उन्हें खदेड़ दो। देश को आजाद करो। अपना अधिकार प्राप्त करो।” रानी ने महसूस किया कि अभी समय उपयुक्त नहीं है। पर तात्या ने कहा कि, सेना में इतना तीव्र असंतोष है कि राशि जुटाना अधिक कठिन नहीं है और शस्त्र तथा गोलाबारूद तैयार हैं। यह निश्चय किया गया कि सम्पूर्ण देश में जनता, रविवार ३१ मई को विद्रोह करे। कमल का फूल विद्या की देवी सरस्वती और धन की देवी लक्ष्मी की महानता का प्रतीक है। इसी कमल को क्रान्ति का प्रतीक चुना गया। रोटी भी क्रान्ति का चिन्ह बन गई। क्रान्ति का संदेश फैलाने का तरीका यह थाएक नगर से भेजी जानेवाली रोटी दूसरे नगर में स्वीकार की जाएगी और उसके स्थान पर अन्य रोटी दूसरे नगर को भेजी जाती। किन्तु बैरकपुर में निर्धारित दिन के पूर्व ही उपद्रव भड़क उठा। १० मई को मेरठ में विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी। मेरठ और दिल्ली में भारतीय सेना मिल गई और उसने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार जमा लिया। बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित किया गया।

सिपाहीविद्रोह

ब्रिटिश शासकों ने अपने अनुकूल ढंग से जो इतिहास लिखा है उसमें उन्होने इसे “ सिपाही विद्रोह”की संज्ञा दी है। इससे यह धारणा बनती है, कि केवल सैनिकों ने विद्रोह में भाग लिया, अन्य लोगों ने नहीं। यह सत्य है कि सैनिकों ने जनता के इस युद्ध में अग्रणी भूमिका निभाई। किन्तु विद्रोह करनेवाले केवल सैनिक नहीं थे। न केवल राजामहाराजाओं, सरदारों, पेशवा, नवाबों और दिल्ली के सम्राटों ने, बल्कि हिंदुओं, मुसलमानों, मौलवियों और पुराहितों ने भी विद्रोह में भाग लिया। महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। १८ से २० माह तक रक्तपात चलता रहा। यह सत्य है, जैसा कि इतिहास कहता है, हम पराजित हुए। एक गुलाम देश स्वतन्त्रता के लिए अपनी लड़ाई में कितनी ही बार पराजित हो तो उसके लिए इसमें शर्म की कोई बात नहीं। संघर्ष स्वय जीवित जनता की निशानी है। वह स्वयं ही एक यश है। १७५२ में जब ब्रिटिशों ने मुगल सम्राट के समक्ष घुटने टेककर व्यापार के लिए अनुमति माँगी थी, उस समय कंपनी के पास केवल तीन गोदाम थे। उनके पास कुल बीस वर्ग मील भूमि थी। और सौ वर्ष में भी ६ लाख वर्ग मील भूमि पर उनका शासन हो गया। कंपनी के लिए यही पर्याप्त नही था कि देश का राजनैतिक और आर्थिक जीवन उनाके नियंत्रण में हो, कंपनी चाहती थी कि भारत उसका धर्म भी स्वीकार करे। उसने ईसाई धर्म फैलाने के अपने प्रयास तेज किए। इस प्रकार जनआंदोलन के लिए अनेक कारण बन गए।

आग फैलती गई

रानी की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। पूजा, प्रार्थना और धार्मिक कार्यों के बीच युद्ध की तैयारियाँ भी चलती रही। एक बार किसी ने उनसे प्रश्न किया, “रानीजी, अभी यह युद्ध प्रशिक्षण क्यों ? क्या आप कुछ और समय भागवत भक्ति में नहीं दे सकती?” “मैं एक क्षत्रिय महिला हूँ। अपना कर्तव्य पालन करा रही हूँ। देश तथा न्याय की रक्षा करना क्षत्रियों का कर्तव्य है। हमें लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। मैं शत्रु के समक्ष आत्म समर्पण नहीं कर सकती। एक असहाय विधवा के समान रोरोकर मैं प्राण नहीं दे सकती। मैं अपने उद्देश्य के लिए लड़ूँगी और मुसकुराते हुए मृत्यु को स्वीकार करूँगी।” ४ जून को मेरठ में क्रान्ति भड़क उठी। उसी दिन झाँसी में भी संकट के आसार दिखाई देने लगे। एक हवलदार ने कुछ सैनिकों के साथ अंग्रेजों द्वारा नव निर्मित स्टार फोर्ट में प्रवेश किया और वहाँ रखी युद्ध सामग्री और राशि हथिया ली। ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों की, जोकि अपने कैंप में थे, तत्काल किले में स्थानांतरित करने की व्यवस्थाएँ की गई। ब्रिटिश अधिकारी सहायता के लिए रानी से अनुरोध करने आए। उन्होने अनुरोध कियाहमें स्थिति को नियंत्रण में लाने का पूर्ण विश्वास है। परंतु इस कठिन समय मे आपको भी हमारी सहायता करनी चाहिए।”

रानी ने उत्तर दिया,” मेरे पास सेना अथवा शस्त्र नहीं है। यदि आप सहमत हो तो जनता की रक्षा के लिए सेना जुटाने के लिए मैं तैयार हूँ।” ब्रिटिश,इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। किन्तु दूसरे दिन जब सैनिकों ने गोली मारकर एक ब्रिटिश अधिकारी की ह्त्या कर दी, तो वे भयभीत हो गए।तुरंत एक वरिष्ठ अधिकारी रानी के पास दौड़ा गया। उसने कहा, “हम पुरुष हैं। हमें अपनी चिंता नहीं है। किन्तु हमारी महिलाओं और बच्चों को आप अपने महल में शरण दीजिए।”

रानी के मित्रों ने उन्हें सलाह दी कि ऐसा कोई वचन न दें। किन्तु उसने दृढ़तापूर्वक कहा, “हमारा युद्ध केवल अंग्रेज़ पुरुषों के विरुद्ध है, महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध नहीं। यदि मैं अपने सैनिकों को इस मामले में नहीं रोक सकती तो मैं उनकी नेता कैसे हो सकती हूँ? अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को महल में शरण मिलेगी।”

ऐसा आश्वासन रानी ने दिया और न केवल उन्हें भोजन दिया बल्कि सम्पूर्ण युद्ध के दौरान उनकी देखभाल की। नेतृत्वहीन सेना ने अंग्रेजों पर विजय प्राप्त की। सैनिक झाँसी को लूटना चाहते थे। तब रानी ने उन्हें जवाहरात और रुपए दिए। वे संतुष्ट हो गए। सेना ने दिल्ली की ओर कूच किया।

रानी ने अराजकता दूर करने के लिए तुरंत कार्यवाही की। मुखियों और कमाँडरों ने रानी से, राज्य का शासक बनने के लिए एक स्वर से अनुरोध किया। रानी ने स्वीकृति दे दी और एक बार फिर किले पर राज्य का ध्वज फहरा उठा। झाँसी दिनरात युद्ध की तैयारी में जुट गई। नए शस्त्र तैयार किए गए। किन्तु चारपाँच दिन में रानी के समक्ष एक नया खतरा उत्पन्न हो गया। यह सोचकर कि झाँसी का शासन एक कमजोर महिला चला रही है, सदाशिवराव नामक एक व्यक्ति ने राज्य के एक भाग में विद्रोह कर दिया और अपने आप को राजा घोषित कर दिया। महारानी तत्काल वहाँ पहुँची और तुरंत विद्रोह को दबा दिया।

जून १८५७ से मार्च १८५८ तक १० माह की अवधि में लक्ष्मीबाई ने झान्सी का प्रशासन ब्रिटिशों से अपने हाथों में लेने के बाद, उसमें काफी सुधार किया। खजाना भर गया। सेना सुव्यवस्थित हो गई। पुरुषों की सेना की बराबरी में महिलाओं की भी सेना थी। रानी ने अपनी कुछ तोपों के नाम रखे थे “गर्जना , “भवानीशंकर” और “चमकती बिजली ”। ये तोपें महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा बारीबारी से दागी जाती थी। पुराने शस्त्र तेज किए गए। नए शस्त्र तैयार किए गए। उन दिनों झाँसी में प्रत्येक घर में युद्ध की तैयारियाँ हो रही थी और सब कुछ महारानी के मार्गदर्शन में किया जा रहा था। २३ मार्च १८५८ में सर हयूरोज की सेना ने युद्ध की घोषणा कर दी। १०१२ दिनों में ही झासी का छोटासा राज्य विजय के प्रकाश और पराजय की छाया में डोलता रहा। एक सफलता पर जहाँ राहत मिलती थीं वहीं दूसरे क्षण पराजय का आघात लगता था। अनेक वफादार सरदार धाराशायी हो गए। दुर्भाग्य से बाहर से कोई सहायता नहीं मिली।

युद्ध की देवी

जब अंगेर्जों की शक्ति बढ़ी और हयूरोज की सेना ने झाँसी में प्रवेश किया तब रानी ने स्वय शस्त्र उठाया। उसने पुरुषों के वस्त्र पहिने और वह युद्ध की देवी के समान लड़ी। जब भी वह लड़ी उसने अंग्रेजों की सेना को झुका दिया। उसकी सेनाओं के संगठन और पुरुष के समान उसकी लड़ाई ने हयूरोज को चकित कर दिया। जब स्थिति नियंत्रण के बाहर हुई तब उसने राजदरबारियों को बुलाया और उनके समक्ष उसने अपने सुझाव रखे :”हमारे कमांडर और हमारे बहादुर सैनिक और तोप दागनेवाले सैनिक अब हमारे साथ नहीं है। किले में जो ४००० सैनिक थे उनमें से अब ४०० भी नहीं बचे हैं। किला अब मजबूत नहीं है। अतः हमें यथाशीघ्र यह स्थान छोड़ देना चाहिए। हमें एक सेना का गठन करना चाहिए और तब पुनः हमला करना चाहिए। ” सभी इस बात पर सहमत हो गए। कुछ योद्धाओं के साथ रानी शत्रुओ की पंक्तियों को चीरती हुई झाँसी से निकल गई। बोकर नामक एक ब्रिटिश अधिकारी एक सैनिक टुकड़ी के साथ उसके पीछे पीछे चला। लड़ाई में वह स्वयं घायल हो गया था और पीछे हट गया था। रानी के घोड़े की मुत्यु हो गई थी। उसके बाद भी वह हताश नहीं हुई और काल्पी जाकर तात्या टोपे और रावसाहेब से मिल गई।

ज्योति बुझने के पूर्व

काल्पी में भी रानी सेना जुटाने में लगी थी। हयूरोज ने काल्पी की घेराबँदी की। जब पराजय निश्चित दिखाई दी तब रावसाहेब, तात्या तथा अन्य लोग रानी के साथ, ग्वालियर की ओर चल पड़े। वे गोपालपुर पहुँचे। रात्रि में रावसाहेब, तात्या और बान्दा के नवाब की बैठक हुई। दूसरे दिन वे रानी से मिले। उनका इरादा युद्ध करने का नहीं था। रानी ने कहा,” हम जहाँ तक किले के अंदर रहे हमने अंग्रेजो का सामना किया। हमें लड़ाई जारी रखनी चाहिए। ग्वालियर का किला समीप है। यह सत्य है कि, वहाँ के राजा का झुकाव अंग्रेजो की ओर है, परंतु मैं जानती हूँ कि सेना और जनता अंग्रेजों के विरुद्ध है। इसके अलावा, वहाँ बँदूकों और गोला बारूदों का भारी भंडार है।” रानी का झुकाव स्वीकार हुआ। जब तात्या एक छोंटी सेना के साथ ग्वालियर पहुँचे तो वहाँ की अधिकांश सेना उनके साथ हो गई। ग्वालियर का राजा भाग खड़ा हुआ और उसने आगरा जाकर अंग्रेज़ो से संरक्षण माँगा।

परंतु उसके बाद जो हुआ वह मूर्खता की पुनरावृत्ति थी। रानी और उसके मित्रों को छोड़, अन्य सरदार आनंद में मग्न हो गए। रानी की सामयिक चेतावनी हवा में उड़ गई। रानी ने, जोकि आनंदोत्सव से दूर थी, ग्वालियर किले के नाजुक भागों का निरीक्षण किया। उसने अपना एक गढ़ तैयार किया किन्तु अन्य सरदारों ने इस महिला की सलाह पर ध्यान नहीं दिया।

युद्ध का अंत

हयूरोज प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं था। १७ जून,१८५८ को लड़ाई पुन: आरंभ हुई। रानी ने पुरुषों के वस्त्र पहने और तैयार हो गई। हयूरोज ने एक चाल चली। वह महाराजा जयाजीराव सिंधिया को, जोकि ग्वालियर से भाग गया था और आगरा में ब्रिटिश संरक्षण में रह रहा था, लेकर ग्वालियर आया।

अब पेशवाओं में कुछ विवेक जागा। वे रानी लक्ष्मीबाई के समक्ष आने में लज्जित थे। अंतत : उन्होने तात्या टोपे को भेजा। जब उन्होने क्षमा याचना की तब रानी ने उनके समक्ष युद्ध की अपनी योजना रखी। तात्या टोपे ने उसे स्वीकार कर लिया। यद्यपि रानी की सेना संख्या में कम थी, सरदारों का असाधारण साहस, युद्ध की व्यूह रचना और रानी के पराक्रम ने ब्रिटिश सेना को परास्त किया। इस दिन की विजय रानी के कारण ही हुई। दूसरे दिन ( १८ तारीख को ) सूर्योदय के पूर्व ही अंग्रेजों युद्ध का बिगुल बजाया। महाराजा जयाजीराव द्वारा घोषित क्षमादान से प्रभावित सैनिक अंग्रेजों के साथ सम्मिलित हो गए। यह भी सूचना मिली की रवासाहेब के अंतर्गत जो दो ब्रिगेड थीं उन्होने पुन: अग्रेजों के साथ अपनी निष्ठा प्रकट की।


रानी लक्ष्मीबाई ने रामचंद्र राव देशमुख को बुलाया और कहा: “आज युद्ध का अंतिम दिन दिखाई देता है। यदि मेरे मृत्यु हो जावे तो मेरे पुत्र दामोदर के जीवन को मेरे जीवन से अधिक मूल्यवान समझा जावे और इसकी देखभाल की जावे। ” एक और संदेश यह था : “यदि मेरी मृत्यु हो तो इस बात का ध्यान रहे कि मेरा शव उन लोगों के हाथ में न पड़े जो मेरे धर्म के नहीं।” हयूरोज की शक्ति अधिक थी क्रांतिकारियों की एक बड़ी सेना धराशायी हो गई। उनकी तोपें ब्रिटिश के हाथों में चली गई। ब्रिटिश सेना बाढ़ के समान किले में प्रविष्ट हो गई। रानी के समक्ष अब भागने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। घोड़े की लगाम अपने दांतों में दबाए हुए और दोनों हाथों से तलवार चलाती हुई रानी आगे बढ़ी कुछ पठान सरदार, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख भी उसके साथ चल पड़े। ब्रिटिश सेना ने उन्हें घेर लिया था। खून की धार बह रही थी। पश्चिम दिशा में अस्त होता हुआ सूर्य उसी रंग का दिखाई दे रहा था। अंधकार होता जा रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक रानी के बहुत निकट आया और उसने रानी के सीने को लक्ष्य कर छूरा फैका। रानी ने सैनिक को मार डाला पर उसके शरीर से खून बह रहा था, किन्तु विश्राम के लिए समय नहीं था। ब्रिटिश सेना उसका पीछा कर रही थी जब रानी स्वर्ण रेखा नहर पार करने ही वाली थी कि एक ब्रिटिश सैनिक की बँदूक से निकली गोली उसकी दाहिनी जांघ में आकार लगी। रानी ने बाएँ हाथ से तलवार चलाते हुए उस सैनिक को मार डाला।

क्रूर आघात – अंत

रानी के घोड़े ने भी सहायता नहीं दी। उसकी एक जांघ शून्य हो गई थी। पेट से खून बह रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक की तलवार से, जोकि तेजी से उसकी ओर बढ़ा था, उसका दाहिना गाल चिर गया था, उसकी आँखें सुर्ख थी। इसके बाद भी उसने बाएँ हाथ से उस सैनिक का हाथ काट दिया। गुल मुहम्मद, जोकि रानी का अंगरक्षक था, उसके दुख को सहन नहीं कर सका। बहदुरी से लड़नेवाले इस योद्धा ने भी रोना शुरू कर दिया। रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने रानी को घोड़े से उतारने में सहायता पहुँचाई। रघुनाथ सिंह ने कहा: “अब एक क्षण भी खोने का वक्त नहीं, हमें शीघ्र ही समीपवर्ती बाबा गंगादास के मठ पर पहुँचना चाहिए।”

रामचंद्र राव ने रोते हुए बालक दामोदर को घोड़े पर बैठाया, रानी को अपनी गोद में लिया और संत बाबा गंगादास के मकान की ओर भागा। उसके पीछेपीछे अंगरक्षक के नाते रघुनाथसिंह और गुल मोहम्म्द भी गए। अंधकार में भी बाबा गंगादास ने रानी के रक्त से सने मुख को पहिचान लिया। उन्होने ठंडे जल से उसका मुख धोया। गंगाजल पिलाया। उसे थोड़ी चेतना आई और लड़खड़ाते हुए होंठों से उसने कहा : “ हरहर महादेव।” इसके बाद वह अचेत हो गई। थोड़ी देर बाद रानी ने कठिनाई के साथ अपनी आँखें खोली और तब उसने भगवत गीता के अंशों का,जोकि उसने बचपन में सीखा था, उच्चारण किया। उसकी आवाज क्षीण होती गई, उसके अंतिम शब्द थे, “वासुदेव, मैं आपके समक्ष नतमस्तक हू।” झाँसी का भाग्य अस्त हो गया।

रघुनाथसिंह, गुलमोहमद और दामोदरराव के नेत्रों से अश्रु की धारा फूट पड़ी। बाबा गंगादास ने अपनी पवित्रवाड़ी मे कहा : प्रकाश का कोई अंत नहीं। वह हर कण मे छिपा होता है। उचित समय पर वह पुनः चमक उठता है। रानी का अतुलनीय पार्थिव शरीर अग्नि की ज्वालाओं में लोप हो गया। तेजस्वी महिला झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उसका जीवन पवित्र था। उसका जीवन नारीत्व, साहस, अमर देश बहकती और शहादत की एक उत्तेजक कथा है। शरीर से यद्यपि वह महिला थी किन्तु उसमें सिंह के समान तेज था। राजनीति में भी वह निपुण थी। सभी महिलाओं के समान वह कमजोर अवश्य थी किन्तु जब वह युद्ध के लिए जाती और हाथ में शस्त्र उठाती तब वह युद्ध की देवी काली की ही प्रतिमूर्ति दिखाई देती थी। वह सुंदर और दुर्बल थी किन्तु उसकी प्रतिभा ने पुरुषों को भी मात कर दिया था आयु में वह छोटी थी किन्तु उसकी दूरदर्शिता और दृढ़ निर्णय परिपक्व थे।

पिता के लाड़प्यार में पलने के बाद जब उसने अपने पति के घर में प्रवेश किया तब वह एक आदर्श पत्नी बन गई। पति के निधन के समय यद्यपि जीवन से उयसका कोई लगाव नहीं रहा गया था, वह अपने उत्तरदायित्वों को नहीं भूली थी। वह कट्टर हिन्दू थी। परंतु अन्य धर्मों के विषय में वह सहिष्णु थी। जब कभी वह किसी महायुद्ध में सेना का नेतृत्व करती तो हिंदुओं के समान मुसलमान भी उसकी सेना की पंक्ति में आगे रहते थे।

लक्ष्मीबाई १९ नवंबर १८३५ से १८ जून १८५८ तक २२ वर्ष ७ माह जीवित रही। वह काली रात में बिजली के समान प्रकट हुई और लुप्त हो गई। ब्रिटिश जनरल सर हयूरोज ने, जो रानी से कई बार लड़ा और बारबार पराजित हुआ और अंत में जिसने रानी को पराजित किया, रानी की महानता के विषय में निम्नलिखिए विचार प्रकट किए “ विप्ल्वकारियों की सबसे बहादुर और सबसे महान सेनापति रानी थी। ” इस अमर शहीद को को सम्मानित करते हुए १९७७ में भारतीय डाकतार विभाग ने डाक टिकट प्रकाशित किया जिसका चित्र बाँयी ओर दिया गया है।

The samadhi of Rani Lakshmibai

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Equestrian statue of Jhansi Ki Rani (the Rani of Jhansi) in Chitralekha Park, Ahmedabad, India

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Swarna Jayanti Park, at Neeti Khand, Indirapuram, Ghaziabad.

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Equestrian statue of Jhansi Ki Rani (the Rani of Jhansi) in Phul Bagh, Gwalior

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Statue of Rani of Jhansi at Pune

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STATUE OF RANI OF JHANSI AT AGRA

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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