बाल ठाकरे… मराठी राजनीति के पुरोधा

1राजनैतिक सफर

  • हिंदुओं, विशेषकर मराठियों के हित के लिए कार्य कर रही शिव सेना दल के प्रमुख बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी, 1926 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. बाल ठाकरे के समर्थक इन्हें बालासाहेब कहकर संबोधित करते हैं.

  • इनके पिता केशव ठाकरे एक प्रगतिशील समाजसेवी और जातिगत भेदभावों पर कटाक्ष करने वाले लेखक भी थे. उनकी रचनाएं प्रबोधन नामक पत्रिका में प्रकाशित होती थीं. उनके लेखों में जनजागृति की भावना प्रबल रूप से विद्यमान रहती थी, इसीलिए उन्हें प्रबोधंकर कहकर भी बुलाया जाता था.

  • 1950 में राजधानी मुंबई के साथ, महाराष्ट्र जैसे मराठी भाषी राज्य का निर्माण करने के लिए चलाए गए अभियान, समयुक्त महाराष्ट्र चल्वाल में भी केशव ठाकरे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

  • बाल ठाकरे ने फ्री प्रेस जर्नल, मुंबई में एक कार्टूनिस्ट के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की. इसके अलावा रविवार को उनके कार्टून टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रकाशित होते थे.

  • 1960 में महाराष्ट्र में गुजराती और दक्षिण भारतीय लोगों की संख्या बढ़ने का विरोध करने के लिए बाल ठाकरे ने अपने भाई के साथ मिलकर साप्ताहिक पत्रिका मार्मिक की शुरुआत की.

  • 19 जून 1966 को बाल ठाकरे ने शिव सेना का गठन अपने शिवाजी पार्क के अपने फ्लेट में किया जिसका मूल उद्देश्य मराठियों के हितों की रक्षा करना उन्हें, नौकरियों और आवास की उचित सुविधा उपलब्ध करवाना था.

  • वर्ष 1989 से शिव सेना और बाल ठाकरे के विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए सामना नामक समाचार पत्र को भी प्रकाशित किया जाने लगा.

  • बाल ठाकरे का व्यक्तित्वबाल ठाकरे एक कट्टर मराठी भाषी व्यक्ति हैं. वह अपने समुदाय के हितों की रक्षा को लेकर प्रतिबद्ध और लगातार प्रयासरत हैं. वह एक तेजतर्रार और आक्रामक स्वभाव के नेता हैं.

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कार्टूनिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत करके राजनीति में आए बाल ठाकरे ने पत्रिकाओं और अखबारों में तीखे लेख लिखकर विरोधियों पर हमला करते हुए पत्रकारिता को सहारा बनाया और राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते हुए महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली की सियासत तक दखल देते रहे।

ठाकरे ने करीब ढाई दशक पहले शिवसेना का गठन करके क्षेत्रीय राजनीति के विचार को मजबूती से देश के समक्ष रखा और क्षेत्रीय समस्याओं को प्रादेशिक स्तर की राजनीति के जरिए सुलझाकर क्षेत्रीय राजनीति को नए तेवर दिए।

ठाकरे ने अंग्रेजी दैनिक द फ्री प्रेस जर्नल के मुंबई संस्करण में कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन 1960 में उन्होंने अखबार की नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया। पत्रकारिता से नाता नहीं तोड़ा और राजनीतिक साप्ताहिक मार्मिक के जरिए अपने राजनीति मकसद को हल करते रहे।

महाराष्ट्र के हिंदूवादी नेता हमेशा उन्हें हिंदू हृदय सम्राट कहकर सम्मान देते रहे। हिंदुओं के हितों की राजनीति करके उन्होंने शिवसेना को मजबूती प्रदान की और देश के सभी राज्यों में अपनी पार्टी की पहुंच बनाई, लेकिन महाराष्ट्र में अपनी राजनीति को चमकाने के लिए उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति को ही विशेष महत्व दिया जिसके कारण उनकी अखिल भारतीय छवि कभी नहीं बन सकी।

ठाकरे ने 19 जून 1966 में शिव सेना का गठन किया। शुरुआत में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके महाराष्ट्र में अपनी पकड़ मजबूत की, लेकिन 1987 में भाजपा नेता प्रमोद महाजन के प्रयास से वे भाजपा के साथ मिलकर राजनीति करने लगे।

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ठाकरे ने हिटलर की तारीफ करके, लिट्टे का समर्थन करके, मुसलमानों के खिलाफ बयान देकर खासकर बाबरी मस्जिद विध्वंस में शिव सैनिकों के हाथ होने पर गौरवान्वित महसूस करने वाला बयाद देकर और वेलेंटाइन डे का विरोध करने जैसे चर्चित बयान देकर राजनीतिक सुर्खियां बटोरीं।

शिवसेना कम्युनिस्ट विरोधी रही है और 1969 में कम्युनिस्ट विधायक कृष्ण देसाई की हत्या का आरोप शिव सैनिकों पर लगा, जिन्हें बाद में बरी कर दिया गया। वर्ष 1990 में शिवसेना ने भाजपा के साथ शिवसेना नेता मनोहर जोशी महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता बने और 1995 में वे राज्य के मुख्यमंत्री बने।

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चुनाव आयोग की सिफारिशों के बाद बाल ठाकरे के ऊपर 11 दिसंबर, 1999 से 10 दिसंबर, 2005 तक के लिए मतदान करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. वर्ष 2006 में प्रतिबंध से मुक्त होने के बाद उन्होंने बीएमसी चुनावों में मतदान किया.

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ठाकरे ने अपनी राजनीति को धार देने के लिए मार्मिक के अलावा 23 जनवरी 1988 को मराठी दैनिक सामनाऔर 23 फरवरी 1993 को हिंदी दैनिक दोपहर का सामनाअखबार निकाले और उसके जरिए अपने विरोधियों पर हमला करते रहे। माना जाता है कि अखबार के जरिए राजनीति का सबसे अच्छा इस्तेमाल बाल ठाकरे ने ही किया।

Thackeray quits job as cartoonist, starts magazine:

  • Thackeray, who started off as a cartoonist in the Free Press Journal newspaper quit in the late 1950s, ostensibly because he wanted freedom to write or draw the cartoons the way he wished. He soon launched his own Marathi magazine, Marmik in 1960 on the lines of British magazine, Punch. Marmik advocated sons-of-the-soil agenda in the newly-created state of Maharashtra

Thackeray forms the Shiv Sena: 

  • To fight for the cause of the Marathi manoos, Thackeray formed the Shiv Sena on June 19, 1966. His father christened the party, which stands for Shivaji’s (Shiv) army (Sena) and told the people assembled at Shivaji Park, for the first Dassehra rally, “I am offering my Bal for the cause of Maharashtra”

Sena wins first election:

  • The Shiv Sena saw its first victory in an election in 1967, barely a year after it was founded, in the Thane municipal council elections. The party won 15 of the 40 seats, which established its base in Thane. Since then Sena has been ruling Thane civic body barring a few years.

Sena wins Mumbai civic body:

  • Two years after it was formed, the Sena entered Briahnmumbai Municipal Corporation in 1968 civic polls. Its candidate Hemchandra Gupte became first Sena mayor of Mumbai in 1971. Two years later in 1973 civic polls, Sena won power in the BMC and Sudhir Joshi was elected mayor.

Thackeray arrested first time:

  • Shiv Sena’s first agitation was on the Maharashtra-Karnataka border dispute. It brought Shiv Sainiks into direct confrontations with chief ministers, some were injured in police firing and died. Thackeray called them ‘martyrs’. He was arrested in February 1969 and sent to Yerwada prison. The Sena forced a ‘bandh’ on the city, commercial activities and transport services were paralysed for three days.

Sena enters Legislature:

  • In a by-election in 1970, Sena leader Wamanrao Mahadik was elected to the Assembly and became first Sena leader to become a legislator. In 1972, Pramod Nawalkar was elected to Assembly and Manohar Joshi to Legislative Council.

Sena wins assembly elections on the issue of Hindutva:

  • In 1987, Sena contested Vile Parle assembly constituency by-election in which Thackeray sought votes on the issue of Hindutva. His candidate Ramesh Prabhoo won the election which was later set aside by the Supreme Court. Thackeray was indicted by the SC and disenfranchised for six years

Sena-BJP alliance formed:

  • In 1989, Shiv Sena and BJP came together and forged a formal alliance following talks between Thackeray and Pramod Mahajan. The alliance has remained intact since then and Sena has become BJP’s oldest ally which also shares its Hindtuva ideology.

Sena gets recognition as political party:

  • The election commission in the year 1989 accepted Shiv Sena’s constitution and rules and officially accepted it as a recognized political party. Sena got ‘bow and arrow’ as its official election symbol. In the parliamentary elections this year, four Sena candidates were elected to Lok Sabha.

Mouthpiece Saamna is born:

  • On January 23, 1989, the Shiv Sena mouthpiece Saamna was launched. All the views expressed in the newspaper is known to be the opinion of Shiv Sena chief Bal Thackeray. “The Saamna will be the voice of Hindutva. It will be a weapon,” Thackeray said while launching his Marathi daily. Since then, Saamna became communicator between Thackeray and his followers.

Sena wins state elections:

  • In 1995 assembly elections, the Shiv Sena-BJP alliance emerged as largest political party in the assembly and formed the government with support of Independents. Manohar Joshi was Sena’s first chief minister. The party won 73 seats in the assembly and 31 out of 32 constituencies in Mumbai. In 1999, Narayan Rane replaced Joshi as chief minister.

Son Uddhav becomes working president:

  • Thackeray handed over the reins of his party, in 2004, to son Uddhav when he was appointed the party’s working president. This came as a reward following the BMC victory in 2002. A wildlife photographer, he was pushed to the centre-stage after his mother Meenatai and brother Bindumadhav died, when his father began depending on him. The decision shocked many as Raj was seen as Thackeray’s political heir.

Sena splits, Raj forms MNS:

  • Sena split twice, first in 2005 and again in 2006. First Narayan Rane walked out with his supporters. Then Raj who was hurt for being sidelined by working president Uddhav chose to break away and form the Maharashtra Navnirman Sena (MNS). The MNS dealt a blow to Sena in 2009 when the latter failed to win the assembly elections.

Yuva Sena is formed, grandson Aditya enters politics:

  • At the Dussera rally in 2010, Sena chief Bal Thackeray introduced grandson Aditya as the chief of the new Sena youth outfit Yuva Sena. Thackeray, who had always criticised dynasty politics, insisted that his Sainiks had chosen Aditya, and not he. Two years later, this Dussera, a frail Thackeray fervently appealed to his Sainiks to support and cooperate with Uddhav and Aditya the way they had with him.

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एक कार्टूनिस्ट के रुप में…

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अपने नेतृत्व को चमकदार बनाने के लिए फिल्म जगत में पेठ बनाए रखी

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हिटलर और लिट्टे का किया समर्थन

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  • बाल ठाकरे ने एक कलाकार और जनोत्तेजक नेता के रूप में हिटलर की तारीफ करके विवादों के साथ नाता जोड़ा. 1990 के दशक में श्रीलंका में आतंक का प्रयाय बने लिट्टे को खुला समर्थन देने को लेकर भी उनकी खूब आलोचना हुई. वेलेंटाइन डे के विरोध में लड़केलड़कियों की खुलेआम पिटाई को लेकर भी बाल ठाकरे आलोचना झेल चुके हैं. बाल ठाकरे की पत्‍नी का नाम मीना ठाकरे था, जिनका 1996 में देहांत हो गया. उनके तीन बेटे स्‍वर्गीय बिंदुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे हैं. उनके बड़े बेटे बिंदुमाधव ठाकरे की एक रोड एक्‍सीडेंट में 20 अप्रैल 1996 को मुंबईपुणे हाइवे पर मौत हो गई थी.Bal Thackrey शुरुआती दिनों से ही शिवसेना ने डर और नफरत की राजनीति की. सत्ताधारी पार्टियां तक उनसे डरती थीं, लेकिन बाद में यह डर कम हो गया. शिवसेना के गठन के बाद भी पार्टी का मुख्‍य उद्देश्‍य मराठी लोगों के लिए दक्षिण भारतीय लोगों, गुजरातियों और मारवाडियों से काम की सुनिश्चितता था.

वोट डालने तक का प्रतिबंध झेल चुके हैं ठाकरे

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  • अपने हिन्‍दूवादी एजेंडे का साथी शिवसेना को बीजेपी के रूप में मिला और दोनों ने मिलकर 1995 में महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव जीता. 1995 से 1999 तक शिवसेना नेता मनोहर जोशी महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री रहे, लेकिन बाल ठाकरे पर पर्दे के पीछे से रिमोट की तरह काम करने का आरोप लगता रहा. बीजेपीशिवसेना की इस सरकार में बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे महाराष्‍ट्र के उपमुख्‍यमंत्री रहे. 28 जुलाई 1999 को बाल ठाकरे पर चुनाव आयोग की सिफारिश पर 6 साल के लिए वोट डालने और चुनाव लड़ने का बैन लगा दिया गया था. हालांकि 2005 में उन पर से 6 साल तक लगे बैन को हटा लिया गया और उन्‍होंने इसके बाद पहली बार 2006 में बीएमसी चुनाव के लिए वोट डाला. बाल ठाकरे हमेशा मराठी मानुष की लड़ाई लड़ते रहे. उन्‍होंने मुंबई पर मराठियों का पहला अधिकार बताते हुए बाहरी लोगों को यहां से खदेड़ने का काम किया.

  • 2002 में ठाकरे ने मुस्लिम हिंसा के विरोध में हिंदू आत्‍घाती दस्‍ता बनाने का आह्वान किया. बाल ठाकरे के इस तरह के आह्वान पर कार्यवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उनके खिलाफ दो समुदायों के बीच शत्रुता फैलाने का केस दर्ज किया. हालांकि बाद में बाल ठाकरे ने साफ किया कि वे हर मुसलमान के खिलाफ नहीं हैं. उन्‍होंने कहा कि वे तो उन मुसलमानों के खिलाफ बोल रहे थे जो देश का खाते हैं, लेकिन देश का कानून नहीं मानते. उन्‍होंने कहा कि मैं ऐसे लोगों को देशद्रोही मानता हूं. 1980 के दशक में बाल ठाकरे ने मुसलमानों की तुलना कैंसर (बीमारी) से करते हुए कहा कि वे कैंसर की तरह फैल रहे हैं. देश को उनसे बचाया जाना चाहिए.

हिंदू प्रेमी और मुसलमान विरोधी बयानों से राजनीति

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  • 2008 में उन्‍होंने एक बार फिर मुसलमानों पर हमला करते हुए कहा कि मुस्लिम आतंकवाद लगातार फैल रहा है और हिन्‍दू अतिवाद से ही इससे छुटकारा पाया जा सकता है. इतना ही नहीं उन्‍होंने कहा कि हमें भारत और हिन्‍दुओं को बचाने के लिए हिन्‍दू आत्‍मघाती दस्‍तों की जरूरत है. 6 मार्च 2008 को बाल ठाकरे ने मुंबई में रोजी रोटी कमाने के लिए गए बाहरी लोगों के खिलाफ एक बार फिर आग उगली. उन्‍होंने बिहारी लोगों को महाराष्‍ट्र में अवांछनीय बताते हुए शिव सेना के मुखपत्र सामना में लिखा, ‘एक बिहारी, सौ बीमारी.

  • बाल ठाकरे ने कहा कि वे हिटलर के प्रशंसक हैं और उन्‍हें ऐसा कहने में कोई शर्म नहीं है. उन्‍होंने कहा कि वे हिटलर और खुद में कई समानताएं देखते हैं. उन्‍होंने कहा कि भारत को भी एक तानाशाह की जरूरत है. उन्‍होंने हिटलर के बारे में कहा कि हिटलर कई मायनों में कमाल था. उसके अंदर लोगों को साथ लेकर चलने की अतुलनी क्षमता थी. वह अपने आप में एक जादू था. हिटलर की तारीफों के बीच हालांकि बाल ठाकरे, हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्‍ल की भर्त्‍सना भी करते हैं. लेकिन उन्‍हें सारी बुराईयों के बीच भी हिटलर एक कलाकार के रूप में पसंद है.

  • शिवसेना का शाब्दिक अर्थ शिव की सेनाहै. शिव से अर्थ महान मराठा शिवाजी से है. इन दिनों बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पार्टी के कार्यकारी अध्‍यक्ष हैं. शिवसेना के कार्यकर्ताओं को शिव सैनिक कहा जाता है और वे पार्टी के सभी मूलभूत कामों को बखूबी निभाते हैं. बीमारी के चलते पिछले कुछ समय से बाल ठाकरे ने स्‍वयं को पार्टी के दैनिक कार्यों से अलग कर लिया है.

भय और धमकी से राज करने वाले नेता की छवि के लगे आरोप

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  • 20 नवंबर 2009 को शिव सैनिकों ने मराठी चैनल आईबीएनलोकमत और हिन्‍दी चैनल आईबीएन-7 पर पुणे और मुंबई में हमला किया और उनके ऑफिस में जमकर तोड़फोड़ की. बीबीसी ने बाल ठाकरे के बारे में लिखा कि वे पश्चिमी राज्‍य महाराष्‍ट्र के बेताज बादशाह हैं.

  • वाशिंगटन पोस्‍ट ने बाल ठाकरे के बारे में लिखा कि वे शिकागो पर राज करने वाले अल कैपन की तरह हैं जो बॉम्‍बे पर भय और धमकी से राज करते हैं. दक्षिण भारतीयों के खिलाफ 1960 और 70 के दशक में बाल ठाकरे के नेतृत्‍व में शिव सेना ने लुंगी हटाओ पुंगी बजाओअभियान चलाया. 1992 में आयोध्‍या में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिराये जाने से पहले भी बाल ठाकरे ने सामना में भडकाऊ लेख लिखा.

माइकल जैक्‍सन से प्रेम और गुलाम अली से बैर

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  • 1996 में पॉप स्‍टार माइकल जैक्‍सन एक कन्‍सर्ट के लिए मुंबई आए और शिव सेना ने उनका बड़ी ही गर्मजोशी से स्‍वागत किया. माइकल जैक्‍सन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के घर गए और कहा जाता है कि उन्‍होंने उस टॉयलेट सीट पर ऑटोग्राफ भी दिया, जिसका उन्‍होंने इस्‍तेमाल किया था.

  • 1993 में बाल ठाकरे ने कहा कि अगर मुझे गिरफ्तार किया गया तो पूरा देश उठ खड़ा होगा. अगर मेरी वजह से एक पवित्र युद्ध होता है तो फिर इसे होने दें. 25 जुलाई 2000 को मुंबई उस समय ठहर गई जब बाल ठाकरे को 1993 दंगों के दौरान मुसलमानों पर हमले करने के लिए उकसाते हुए सामना में लेख लिखने के लिए गिरफ्तार किया गया.

  • उन्‍होंने खुद को पुलिस के हवाले किया और उन्‍हें कोर्ट में पेश किया गया. मजिस्‍ट्रेट ने मामले को दर्ज कर दिया और बाल ठाकरे छूट गए. 2007 में बाल ठाकरे को शिव सेना की एक रैली में भड़काऊ भाषण देने के लिए गिरफ्तार किया गया, लेकिन तुरंत ही उन्‍हें जमानत मिल गई. बाल ठाकरे के इशारे पर ही शिव सैनिकों ने पाकिस्‍तानी गजल गायक गुलाम अली के कनसर्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

बाल ठाकरे से अलग हुए राज ठाकरे

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  • 2006 में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी. बाद में उन्‍होंने अपनी राजनीतिक पार्टी महाराष्‍ट्र नव निर्माण सेना बना ली. बाल ठाकरे से गहराई से प्रभावित राज ठाकरे भी उन्‍हीं के नक्‍शे कदम पर चलते हुए बाहरियों के खिलाफ आग उगलते रहते हैं और मराठी मानुष का राग अलापते हैं. नवंबर 2009 में बाल ठाकरे के गुस्‍से का शिकार बने क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर. उन्‍होंने तेंदुलकर की आलोचला की और सचिन से क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित रहने को कहा.

  • सचिन ने कहा था कि मुंबई पर सभी भारतवासियों का हक है. इस बार बाल ठाकरे ने कहा कि हमें क्रिकेट के मैदान में आपके छक्‍केचौक्‍के पसंद हैं, लेकिन आप अपनी जुबान का इस्‍तेमाल न करें. हम इसे बर्दाश्‍त नहीं करेंगे.

  • बाल ठाकरे ने शाहरुख खान की फिल्‍म माइ नेम इज खानका सार्वजनिक बहिष्‍कार किया और किंगखान को देशद्रोही तब बताया. दशहरे के मौके पर बाल ठाकरे हमेशा मध्‍य मुंबई में स्थित शिवाजी पार्क से शिवसैनिकों को संबोधित करते रहे हैं. इस साल वे दशहरा रैली में नहीं पहुंचे.

बाल ठाकरे: खरा अंदाज, खरी सियासत

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प्रभावशाली संदेश वाले कार्टून बनाने से लेकर महाराष्ट्र के राजनीतिक मंच पर बेहद अहम भूमिका निभाने वाले बाल ठाकरे मराठी गौरव और हिंदुत्व के प्रतीक थे, जिनके जोशीले अंदाज ने उन्हें शिवसैनिकों का भगवान बना दिया। शिवसेना के प्रमुख को उनके शिवसैनिक भगवान की तरह पूजते थे और उनके विरोधी भी उनके इस कद से पूरी तरह वाकिफ थे। अपने हर अंदाज से महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदलने वाले ठाकरे दोस्तों और विरोधियों को हमेशा यह मौका देते रहे कि वह उन्हें राजनीतिक रूप से कम करके आंकें, ताकि वह अपने इरादों को सफाई से अंजाम दे सकें। वह अकसर खुद बड़ी जिम्मेदारी लेने की बजाय किंगमेकर बनना ज्यादा पसंद करते थे। कुछ के लिए महाराष्ट्र का यह शेर अपने आप में एक सांस्कृतिक आदर्श था।

इशारा ही काफी था

एक इशारे से मुंबई की रौनक को सन्नाटे में बदलने की ताकत रखने वाले बाल ठाकरे ने आर. के. लक्ष्मण के साथ अंग्रेजी अखबार फ्री प्रेस जर्नल में 1950 के दशक के अंत में कार्टूनिस्ट के तौर पर अपना करियर शुरू किया था, लेकिन 1960 में उन्होंने कार्टून साप्ताहिक मार्मिककी शुरुआत करके एक नए रास्ते की तरफ कदम बढ़ाया। इस साप्ताहिक में ऐसी सामग्री हुआ करती थी, जो मराठी मानुषमें अपनी पहचान के लिए संघर्ष करने का जज्बा भर देती थी और इसी से शहर में प्रवासियों की बढ़ती संख्या को लेकर आवाज बुलंद की गई।

अपनी बात पर हमेशा कायम

ठाकरे की यह बात कि महाराष्ट्र मराठियों का है,’ स्थानीय लोगों में इस कदर लोकप्रिय हुई कि उनकी पार्टी ने 2007 में बीजेपी के साथ पुराना गठबंधन होने के बावजूद राष्ट्रपति के चुनाव में अलग राय बनाई और यूपीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया, जो महाराष्ट्र से थीं। उन्होंने 2009 में सचिन तेंडुलकर की आलोचना कर डाली, जिन्होंने कहा था कि मुंबई पूरे भारत की है। ठाकरे ने 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की और उसके बाद मराठियों की तमाम समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली।

खुद नहीं लड़ा चुनाव

ठाकरे ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन शिवसेना को एक पूर्ण राजनीतिक दल बनाने के बीज बोए जब उनके शिव सैनिकों ने बॉलिवुड सहित विभिन्न उद्योगों में मजदूर संगठनों पर नियंत्रण करना शुरू किया। शिवसेना ने जल्द ही जड़ें जमा लीं और 1980 के दशक में मराठी समर्थक मंत्र के सहारे बृहनमुंबई नगर निगम पर कब्जा कर लिया। बीजेपी के साथ 1995 में गठबंधन करना ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मौका था और इसी के दम पर उन्होंने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा।

विवाद, विवाद और विवाद

बहुत से लोगों का मानना है कि 1993 के मुंबई विस्फोटों के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में शिवसैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके चलते सेनाबीजेपी गठबंधन को हिंदू वोट जुटाने में मदद मिली। उन्होंने कहा था, ‘इस्लामी आतंकवाद बढ़ रहा है और हिंदू आतंकवाद ही इसका जवाब देने का एकमात्र तरीका है। हमें भारत और हिंदुओं को बचाने के लिए आत्मघाती बम दस्ते की जरूरत है।प्रवासी विरोधी विचारों के कारण ठाकरे को हिंदी भाषी राजनीतिज्ञों की नाराजगी झेलनी पड़ती थी। बिहारियों को देश के विभिन्न भागों के लिए बोझबताकर उन्होंने खासा विवाद खड़ा कर दिया था। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वह प्रशंसक थे।

शिवसेना का सफर

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मराठा तितुका मेळवावा.. महाराष्ट्र धर्म वाढवावा (मराठियों को इकट्ठा करो, महाराष्ट्र धर्म को बढ़ावा दो) इस नारे के साथ 19 जून 1966 में शिवसेना की स्थापना हुई।

19 जून 1966 को उनके आव्हान पर शिवाजी पार्क में हुई ऐतिहासिक सभा में 40 हजार लोग इकट्ठा हो गए थे। ख़ास बात यह थी कि इस जमावड़े में अधिकांश किशोरवय और युवा थे। वो मराठी युवा जो ठाकरे के मराठियों को एकजुट करने के विचार भर से रोमांचित थे। ये युवा ना दूर तक देख सकते थे ना इसकी गहराई तक जाना चाहते थे। इन्हीं युवाओं ने शेर की दहाड़ के प्रतीक चिन्ह और भगवा पताका वाली शिवसेना को जन्म दिया। इस शिवसेना ने आने वाले समय की महाराष्ट्र की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।

  • लोकसभा के 1967 के चुनाव में शिवसेना ने पहली बार दक्षिण मुंबई में कांग्रेस के स.का. पाटिल और नॉर्थ ईस्ट मुंबई में कृष्ण मेनन के खिलाफ स.जे. बर्वे जैसे मराठी उम्मीदवारों का समर्थन किया। बर्वे तो चुनाव जीत गए लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस ने पाटिल को हराया। इस चुनाव से शिवसेना को राजनीति की ऊर्जा मिली।

  • 1968 में मुंबई महापालिका के चुनाव में पहली बार शिवसेना के 40 कॉरपोरेटर चुने गए। शिवसेना की राजनीति सामाजिक कामों पर निर्भर थी। नौजवानों को अपने पक्ष में जुटाने के लिए क्रिकेट मैच से लेकर एस.एस.सी एग्जाम के लिए कोचिंग क्लास तक अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से शिवसेना ने अपना विस्तार किया।

  • बेरोजगारों की सूची बनाने का काम सेना की हर शाखा पर शुरू हुआ। मुंबई में वड़ा पाव बेचनेवाले मराठी हॉकर्स नजर आने लगे। हर नुक्कड पर शिवसेना का संदेश पहुंचानेवाले ब्लैक बोर्ड्स और हर शाखा पर मरीजों की सेवा के लिए दौड़ने वाली एम्बुलैंस दिखने लगीं। महाराष्ट्रकर्नाटक सीमा विवाद में शिवसेना ने कड़ा संघर्ष किया। आज तक यह विवाद सुलझ नहीं पाया, लेकिन 50 से अधिक शिवसैनिक इस संघर्ष में मारे गए।

  • 70 के दशक में मुंबई के कम्युनिस्ट लीडर और एमएलए कृष्णा देसाई के खून के छींटे भी शिवसेना के दामन पर गिरे। लेकिन उसी चुनाव क्षेत्र पर हुए उपचुनाव में शिवसेना के वामनराव महाडीक 1500 वोटों से जीते और शिवसेना के दबदबे को एक नई दिशा मिली। इसके बाद ही शिवसेना मुंबई की ट्रेड यूनियनों पर अपना प्रभुत्व जमाने में सफल रही।

  • देसाई की मौत के बाद कम्युनिस्ट यूनियन दत्ता सामंत के हाथों आई, मगर तब तक शिव सेना का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। हालांकि इस फेर में यह आरोप भी लगा कि कांग्रेस कम्युनिस्टों की काट के लिए शिवसेना का इस्तेमाल कर रही है।

  • ठाकरे ने 1975 में इमर्जेंसी के दौरान इंदिरा गांधी का खुला समर्थन किया। उसका खमियाजा 1978 में मुंबई महानगर पालिका के चुनाव में शिवसेना को भारी हार के रूप में भुगतना पड़ा।

  • 1978 से 1984 तक मुंबई में शिवसेना का असर काफी मात्रा में कम हो चुका था। मगर कांग्रेस से दूरी बनाकर चलते हुए ठाकरे नए मुंबई महानगर पालिका के 1985 में हुए चुनाव में 170 में 74 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि मुंबई उनकी है।

हाथ से फिसला रिमोट कंट्रोल

  • हिंदुत्व के एजेंडे को साथ लेकर बीजेपी और शिवसेना 1989 में साथ आईं और जल्द ही इस गठजोड़ का सियासी फायदा उन्हें नजर आने लगा। 1995 में शिवसेनाबीजेपी ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। बाल ठाकरे ने सरकार की कमान मनोहर जोशी के हाथों सौंपी। उस दौरान उनका सरकार को रिमोट कंट्रोल से संचालित करने वाला बयान खासी चर्चा में रहा। 90 के दशक के शुरुआत में ही ठाकरे ने मुंबई नेतृत्व के प्रति अपना रुझान साफ कर दिया था। इसीलिए मुंबई के बाहर शिवसेना खड़ी करने वाले छगन भुजबल सत्ता मिलने के पहले ही शिवसेना को अलविदा कर चुके थे। बहरहाल सत्ता में आने पर ठाकरे ने ऐसा मंत्रिमंडल बनाया, जिसमें सिर्फ मराठाओं का ही वर्चस्व नहीं था। इस दौरान शिवसेना ने विद्यार्थी सेना, कामगार सेना और स्थानीय लोकाधिकार समितियों के जरिए पूरे सूबे में अपनी पैठ बनाई। मगर 1999 में हुए चुनाव में पार्टी गुटबाजी और एंटी इनकमबैंसी के चलते सत्ता में वापसी दर्ज नहीं कर पाई। सत्ता जाने के बाद सेना में बिखराव शुरू हो गया, जो अभी तक जारी है। महाराष्ट्र के तमाम अंचलों में पार्टी खड़ी करने वाले नेता उद्धव के रुख या अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे। कोंकण से नारायण राणे, विदर्भ से सुबोध मोहिते, मराठवाड़ा से विलास गुंडेवार, सुरेश देशमुख, तुकाराम रेंगे पाटील जैसे कई सांसद और नेताओं ने पिछले एक दशक में पार्टी छोड़ी।

परिवार की कलह

  • शिवसेना का सूरज अगर लगातार डूब रहा है, तो इसके लिए ठाकरे परिवार की अंदरूनी राजनीति भी जिम्मेदार है। बाल ठाकरे के तीन बेटे थे बिंदुमाधव, जयदेव और उद्धव। इनमें से उद्धव बाल ठाकरे के राजनैतिक वारिस बनाकर पेश किए गए। इसके अलावा ठाकरे के भाई श्रीकांत के बेटे राज ठाकरे, जिन्हें 1995 में नासिक में हुए शिवसेना के पांचवें राजनैतिक अधिवेशन में उद्धव के साथ कार्यकर्ताओं के सामने पेश किया गया था। बिंदुमाधव मुंबई में ड्रम बीट नाम का एक रेस्तरां चलाते थे और एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। जयदेव अपने पिता से असहमतियों के चलते ठाकरे निवास मातोश्री काफी पहले छोड़ चुके हैं। मगर उनकी पत्नी स्मिता ठाकरे मातोश्री में ही बनी रहीं। शिवसेनाबीजेपी सरकार के दौरान स्मिता एक सत्ता केंद्र बन चुकी थीं और बाद में उद्धव और राज ने उन्हें अपने प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखा।

  • राज बाल ठाकरे शैली के नेता थे। कार्यकर्ताओं के बीच घुस जाना, आक्रामक ढंग से सरकारी मशीनरी से दोचार होना और विपक्ष के खिलाफ धारदार जुबान का इस्तेमाल। जल्द ही कार्यकर्ताओं के बीच राज की अलग जगह बनने लगी। उधर उद्धव सौम्यता की राजनीति के कायल थे। उनका मानना था कि शिवसेना को सिर्फ मराठी अस्मिता की राजनीति करने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका तलाशनी होगी। उन्होंने दिल्ली तक में पार्टी के अधिवेशन करने शुरू किए। बाल ठाकरे ने जब उद्धव को पार्टी का कार्याध्यक्ष बनाया तो राज की महत्वाकांक्षा उबाल मारने लगी। तीन साल पहले शिवसेना को गुड बाय कह कर राज ठाकरे ने नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। उन्होंने एक बार फिर आजमाए हुए फॉर्म्युले को अपनाया और मराठी मानुष की राजनीति नए कलेवर के साथ शुरू की।

अभी चुकी नहीं है सेना

  • शिवसेना पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। इसके सामने समस्या अपनी टोन सेट करने की है। उद्धव को अपनी सौम्यता को अपनी कमजोरी नहीं, मजबूती बनाना होगा। इसके अलावा पार्टी को 15 से 35 साल की उम्र वाले अपने ऊर्जावान समर्थकों के लिए नए नारे और नए कार्यक्रम तलाशने होंगे। युवा मराठी उद्धव में नहीं, बल्कि राज में अपना हीरो देख रहा है। शिवसेना इस विचार के साथ आगे बढ़ सकती है कि एमएनएस कांग्रेस की राह को आसान कर रही है। मगर ऐसा करने के लिए भी उसे आक्रामक होना होगा।

  • बहरहाल कभी खुद को मुंबई का शेर कहलवाने वाले बाल ठाकरे को भी इन चुनावों से अपनी कम होती ताकत का अंदाजा लग गया है। इसीलिए सामना के लिए लिखे उनके लेखों में अब विचार और जोश कम और खीज ज्यादा झलकती है। मगर उद्धव को इससे परे जाकर कुछ नया और ठोस करना होगा क्योंकि राजनीति विरासत की सलीब लेकर चलने वालों को मसीहा नहीं मानती।

दो रणनीतिकार और हिंदुत्व का कार्ड

  • लोकसभा 1984 के चुनाव में कांग्रेस से करारी शिकस्त मिलने के बाद बाल ठाकरे ने बीजेपी नेता प्रमोद महाजन से कहा, आनेवाले बरसों में इस देश का हर हिंदू सिर्फ हिंदुत्व के लिए वोट दे, इसके लिए कुछ करना होगा। महाजन ने उन्हें समझाया कि इस देश में हर हिंदू ब्राह्माण, मराठा, दलित, गुजराती, जाट इत्यादि बनकर वोट देता है।

  • हिंदू कभी हिंदुओं के लिए वोट नहीं करता। तब ठाकरे ने कहा, कुछ साल पहले जब शिवसेना का जन्म हुआ था, तब लोग मुझसे यही कहते थे कि संकीर्ण विचारों का मराठी मानुष उसके लिए लड़ने वाली शिवसेना को मराठी बनकर कभी वोट नहीं करेगा। लेकिन मैंने इस तर्क को गलत साबित कर दिखाया है।

  • अगले पांच साल में इस देश का हिंदू, हिंदुत्व के लिए वोट करता नजर आएगा। यह चमत्कार मैं तुम्हें करके दिखाऊंगा। इसके बाद सिर्फ तीन बरसों में मुंबई में विलेपार्ले का उपचुनाव हिंदुत्व के नाम पर जीतकर शिवसेना ने नया इतिहास रचा। इस जीत के बाद महाराष्ट्र की हर पंचायत, जिला परिषद, नगर पालिका और महानगर पालिका में शिवसेना ने अपना आक्रामक विस्तार शुरू किया।

  • ठाकरे के हिंदुत्व ब्रैंड का गहरा असर देखने के बाद, हिमाचल प्रदेश में 1989 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन का खुला समर्थन करते हुए, शिवसेना के साथ गठबंधन का प्रस्ताव पारित किया। हिंदुत्व के मुद्दे पर महाराष्ट्र में पहली बार लोकसभा के 1989 के चुनाव में शिवसेना को 4 और बीजेपी को 10 सीटें मिलीं और 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेनाबीजेपी गठबंधन ने 94 सीटें झटक लीं।

  • 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद बाल ठाकरे ने बयान दिया कि यह काम अगर मेरे शिवसैनिकों ने किया है, तो मुझे इस पर गर्व है। इसके बाद हुए धार्मिक दंगों से दिसंबर और जनवरी 1993 में मुंबई दहल उठी। जुमे की नमाज के विरोध में सड़कों पर शिवसेना ने महाआरती शुरू कर दी।

  • मार्च 1993 में मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हुए, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। दंगों की जांच सरकार ने जस्टिस कृष्ण कमिशन को सौंपी। जांच खत्म होने से पहले ही शरद पवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार महाराष्ट्र में गिर गई। शिवसेनाबीजेपी गठबंधन की सरकार महाराष्ट्र में पहली बार 1995 में सत्ता में आई।

विवाद

बाल ठाकरे एक हिंदूवादी और मराठी नेता के रूप में प्रचारित कर महाराष्ट्र के लोगों के हितैषी के रूप में अपने को सामने रखते हैं. इसके अलावा वह यह भी दावा करते हैं कि उनके द्वारा उठाया जाने वाला हर कदम मराठी मानुष के हितों और उनके भले के लिए ही उठता है. निष्ठावान हिंदू बताते हुए बाल ठाकरे मराठी लोगों के अस्तित्व और उनके धर्म को बचाने के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं.

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  • बाल ठाकरे ने बाहर से आकर मुंबई बसने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए महाराष्ट्र को सिर्फ मराठियों का कहकर संबोधित किया. खासतौर पर दक्षिण भारतीय लोगों के विरोध में उन्होंने कई भद्दे नारे भी दिए.

  • महाराष्ट्र को एक हिंदू राज्य बताते हुए और मुसलमानों के खिलाफ टिप्पणी करते हुए बाल ठाकरे ने मुंबई आने वाले मुसलमानों विशेषकर बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों को वहां से चले जाने को कहा. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर शिवसैनिकों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को भी अंजाम दिया.

  • शिवसेना का मुखपत्र माने जाने वाले सामना समाचार पत्र में बिहार और उत्तर प्रदेश से मुंबई पलायन करने वाले लोगों को मराठियों के लिए खतरा बता, बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र के लोगों को उनके साथ सहयोग ना करने की सलाह दी. साथ ही इन दो राज्यों से मुंबई बसने वाले नेताओं और अभिनेताओं की भी शिवसेना द्वारा अवमानना की गई. इस बयान के विरुद्ध बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री के पास लिखित शिकायत भेजी. उत्तर भारत में पार्टी के मुखिया जय भगवान गोयल ने शिवसेना को खालिस्तान और जम्मू कश्मीर में मौजूद आतंकवादी गुट बताकर इस दल से अपनी सदस्यता त्याग दी.

  • मोहम्मद अफज़ल की फांसी की सजा पर कोई फैसला ना सुनाने के लिए बाल ठाकरे ने तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अबुल कलाम पर भी अभद्र टिप्पणियां की.

  • वर्ष 2007 में एक समाचार पत्र को दिए अपने साक्षात्कार के दौरान हिटलर की प्रशंसा करने पर भी बाल ठाकरे को जनता की आलोचना का सामना करना पड़ा.

  • लिट्टे का समर्थन और उसकी प्रशंसा करने पर भी बाल ठाकरे को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

  • वैलेंटाइन डे को हिंदू धर्म और संस्कृति के लिए खतरा बता, दुकानों और होटलों में तोड़फोड करने के अलावा प्रेमी युगलों पर हमला, उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करने के लिए जनता में बाल ठाकरे के खिलाफ रोष उत्पन्न हो गया.

  • 2011 में हुए वर्ल्ड कप फाइनल के लिए भारतपाकिस्तान के बीच हुए क्वालिफाइंग मुकाबले पर शिवसेना ने यह टिप्पणी की कि यदि पाकिस्तान यह मैच जीत गया तो शिवसेना निर्णय करेगी कि वह फाइनल में खेलेगा या नहीं.

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Thackeray And Controversies

बहुत से लोगों का मानना है कि 1993 के मुंबई विस्फोटों के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में शिवसैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके चलते सेनाबीजेपी गठबंधन को हिंदू वोट जुटाने में मदद मिली। उन्होंने कहा था, ‘इस्लामी आतंकवाद बढ़ रहा है और हिंदू आतंकवाद ही इसका जवाब देने का एकमात्र तरीका है। हमें भारत और हिंदुओं को बचाने के लिए आत्मघाती बम दस्ते की जरूरत है।प्रवासी विरोधी विचारों के कारण ठाकरे को हिंदी भाषी राजनीतिज्ञों की नाराजगी झेलनी पड़ती थी। बिहारियों को देश के विभिन्न भागों के लिए बोझबताकर उन्होंने खासा विवाद खड़ा कर दिया था। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वह प्रशंसक थे।

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Thackeray: When he was the law

Mumbai came to a standstill in 1993 when Bal Thackeray called for a bandh because Marathwada University in Aurangabad, 400km away from here, was renamed after Dr BR Amedkar even though the city had little to do with it. The Mumbai bandh was a concept created and extensively used by Bal Thackeray, who could make thousands do his bidding in a matter of minutes, without having to justify his reasons. And many a time, the reasons had little to do with the city or its welfare. Ever since the 1970s, after Thackeray took over the city from the Communists and married the regional sentiment of the Marathi manoos to the workers’ woes, he was able to bring Mumbai to a halt at a single call to arms. The city stopped when Indira Gandhi was arrested by the Janata government of Charan Singh in 1978.

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It also came to a halt when Thackeray opposed the Maharashtra government’s decision to allow publication of Dr BR Ambedkar’s Riddles of Hinduism in 1987. And, of course, nothing moved when the Babri Masjid was demolished in 1992 in far away Ayodhya – Sainiks did not need a logical reason. Thackeray’s word was enough, his every wish a command to his supporters and nothing could stop them.

  • As Dr Ramesh Prabhoo his personal physician from 1973 to 2004, had once told me, “Shiv Sainiks might hate the Congress, but if he [Bal Thackeray] said you have to support the Congress they would support the party, through their hatred for it. They would do it without asking Thackeray any questions.” A fearful city would down its shutters as soon as they heard about a bandh.

  • In 1987, he summoned one lakh Shiv Sainiks in a day when he decided to protest the state government’s publication of Dr BR Ambedkar’s Riddles of Hindusim. A morcha was proposed to Mantralaya to hand over a petition to the chief minister. Although Thackeray and his Shiv Sainiks were stopped before they reached the secretariat building, the whole of Mumbai had shut down in anticipation of violence enroute. Shops voluntarily downed shutters, taxis went off the roads, a holiday was declared for schools and colleges, even when the protest ultimately proved a damp squib – the numbers were indeed there but there had been no violence.

  • In 1973, Bal Thackeray ignited larger nationalist sentiments among his supporters to call a bandh when Muslim corporators refused to sing Vande Mataram at the BMC.  His propensity to call for bandhs and disrupt the functioning of the city for little reason ceased only after a Supreme Court verdict on bandhs. The Shiv Sena was fined Rs. 20 lakh for calling a bandh against the state government in 2003. Thackeray stopped supporting bandhs by the BJP and the VHP after that and the city has never come to a total standstill ever since.


शिवसेना से निकाले गए या छोड़ कर गए राजनेता

July 3, 2005 Narayan Rane was expelled from the Sena, not only did he remain in the public eye but also paraded his grievances before the TV cameras. While Thackeray announced Rane’s expulsion at a meeting of Sena corporators and MLAs at the Rungshard a hall in Bandra west, Rane retaliated by addressing a press conference barely a stone’s throw away from the Mumbai suburb where he accused the Sena chief of putra prem (blind love for his son, Uddhav). Narayan Rane, who was the party’s chief minister with a huge base in the Konkan region, Rane took away close to 12 MLAs from the Sena to the Congress. Rane is the third charismatic, highprofile leader to leave the Shiv Sena. Sanjay Nirupam joined the Congress in March last year, taking the north Indian vote with him. Over the years the Shiv Sena has suffered numerous setbacks. It lost one of its top leaders Chhagan Bhujbal in the 90s. 

I have the highest regard for the senior Thackeray.Whether in power or otherwise,he ruled the state and country in a real sense.All along,he was my political mentor,but for political reasons I had no option but to quit the Shiv Sena, Rane,who is now with the Congress told. Rane, a born Sena activist,began his political career as a Sena shakha pramukh and later rose to take over the reins of the state while still in the Sena.I was an ordinary Shiv Sena worker,but Bal Thackeray made me not only a legislator and a cabinet member,but even the chief minister of Maharashtra, Rane said. In the wake of political differences,Rane quit the Shiv Sena and joined the Congress in 2006.No doubt,I joined the Congress,but I had a strong desire after that to meet the senior Thackeray.In fact,in the recent past,I made several attempts,but did not succeed, Rane said.

Chhagan Bhujbal

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PARTY HOPPERS Cartoon drawn by R K Laxman when Chhagan Bhujbal

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Chhagan Bhujbal left the party in 1991 taking 12 MLAs and a chunk of the OBC vote bank.Ganesh Naeke and Ramesh Prabhoo are other Sena MLAs who have found succour in the NCP in recent times. In 1991, Thackeray’s party suffered its first major blow when Chhagan Bhujbal, a senior leader who had served twice as mayor of Mumbai, defected to the join the Congress. With his exit, the Sena lost a chunk of its OBC votes. The reason for the defection was Thackeray’s opposition to the Mandal commission and the provision of reservations for OBCs. Bhujbal, an OBC himself, was offended by the party’s stand and walked out of the party. Bhujbal was also not pleased with the prominence given to Manohar Joshi, his arch rival within the party, whom he saw as a politician without a mass base.

December 12, 2013- Shiv Sena Will Never Be Wiped Out, Says Chhagan Bhujbal

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Old loyalties, it seems, don’t wane easily. State public works department minister Chhagan Bhujbal, who is now with the Nationalist Congress Party, seemed sympathetic to his former party, the Shiv Sena. Bhujbal said that the saffron party would never be vanquished. Bhujbal made this remark during a casual chat with mediapersons in Nagpur where the state legislature is currently in session. Even as many have been writing off the party in recent times, Bhujbal said he would reiterate his view that the Shiv Sena would not be wiped out even after the passing away of its supremo Bal Thackeray. Reminded of the recent rebellion within the party which came from its senior leaders Manohar Joshi and Mohan Rawle, he made light of it, saying that a few leaders leaving or even joining a party is nothing out of the ordinary for any political outfit. “All that doesn’t mean that a party will collapse,” said Bhujbal, adding in the same vein that it was good that Joshi had subsequently apologised to the party leadership.

Sanjay Nirupam

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With both Rane and Nirupam leaving within six months, the Sena lacks a second generation telegenic face. When Nirupam left in April 2005, Rane handled the media. Now Uddhav has to fend the TV cameras. Sanjay Nirupam,too,has a more or less similar story.Impressed by his writing skills,Thackeray appointed Nirupam to the partys Dopahar Ka Saamna.Later,Nirupam was elected to the Rajya Sabha as a Shiv Sena nominee.Subsequently,when Nirupam took on the BJP over basic issues in the Rajya Sabha during BJP-led NDA rule,the BJP lodged a strong protest.As a result,Nirupam had no option but to quit the Shiv Sena.I resigned from the Shiv Sena on my own in 2006.Since then I did not meet the senior Thackeray.However,all along I had highest regard for him, said Nirupam,who has now been elected as a Congress MP.

Even though there has been a hue and cry over the recent defections of Shiv Sena MP Anand Paranjpye and BJP MLC Dhananjay Munde, recent history shows that this trend has not been new to the state politics and it is the Shiv Sena, which has seen maximum number of high-profile desertions.

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The Man, His Moods

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Thackeray and Bollywood… Bollywood danced to the Tigers tune

Vyjayanthimala was his rakhi sister,Big B,Dilip Kumar and many other stars his close friends.Most of the Hindi film industry took care to stay on Thackerays right side

Hindi cinema is part of the Thackeray mythology from his earliest yearsthe Shiv Sena chief had,during his struggling period as an artist,done show cards for JBH Wadias films.When he rose to political pre-eminence,he counted among his friends such Tinseltown luminaries as Dilip Kumar,Lata Mangeshkar,Amitabh Bachchan and Rajesh Khanna to name only a few.Film folks would make a beeline for his bungalow,Matoshree,either to fraternise with the Sena chief or grovel for favours.Given his clout in Mumbai,most of the film fraternity never made the mistake of rubbing him the wrong way.

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For all the fear that his name may have evoked,however,Thackeray genuinely loved films (and film stars).For many years,a Raj Kapoor portrait adorned the wall in the visitors room at Matoshree.His nephew Raj Thackerays real name is Swara Raja name chosen by the tiger as a tribute to the actor in the late 1960s.Before the Sena took a strong Hindutva line,Dilip Kumar too was his friend.Dilipsaab would often drop in at Matoshree for a gupshup session and leave only after a sumptuous Maharashtrian meal, says one of Thackerays close aides.

Years ago,the thespian had sought Thackerays intervention following a Sena ban on the release of Hindi films made by South producers.This was in retaliation to the DMKs anti-Hindi movie stir in Tamil Nadu.Dilipsaab came to Matoshree with the Tamil producer of Aadmi, recalls the Thackeray aide.The producer pleaded his case before Balasaheb,who made it clear that the ban on Aadmi would be revoked only if the DMK softened its line on the Hindi film issue.The producer telephoned chief minster C Annadurai and the dispute was resolved amicably.

The Senas anti-South stir didnt seem to dim Vyjayanthimalas affection for Balasaheb and his wife Meenatai.Vyjayanthimala was my rakhi sister.If she couldnt make it to Matoshree on Narali Purnima day,she would post a rakhi to me, the Sena patriarch had once told this correspondent.Then there was Rajesh Khanna,who would always be armed with two bottles of champagne when he visitedone for him and one for Thackeray.The two would talk till past midnight, says a Thackeray kin.Outside Matoshree too,there was glamourDharmendra,Jeetendra and Mithun Chakraborty would often attend the Bharatiya Kamgar Sena meetings as star guests.

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Lata Mangeshkar,too,had an excellent equation with the Thackerays.According to Sena folklore,the singer was eager to extend financial assistance to Bal Thackeray when he launched the Sena in 1966 but without making her name public.Thackeray,so goes the story,politely turned down the hefty donation,saying that by remaining anonymous Lata wasnt going to help the Sena cause.In later years,however,Lata never concealed her close ties with the Sena.

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Many cinema folks made a beeline for Matoshree when in a crisis.Industry veterans recall how,after the Sena agitated against Sanjay Dutt for his TADA illegal weapons case,Sunil Dutt finally visited Thackeray and sought his blessings.Thackeray promptly issued a statement giving a clean chit to Sanjay,much to the consternation of many Sainiks.The Sena supremo stood behind Bachchan as well when the actor was accused in the Bofors case.The Thackeray-Bachchan friendship deepened with passing years.

It wasnt only actors who ran to Matoshree to mollify the Sena chief.If film-maker Mani Ratnam went to seek clearance for Bombay,which had a character allegedly based on Thackeray,Enron spokesperson Rebecca Mark went to discuss the future of the MNC which the Sena chief had once threatened to throw into the Arabian Sea.Global superstarMichael Jackson and southern phenomenon Rajanikanth too lit up Kalanagar with their presence.In a sense,it was always celebrity time at Matoshree.

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Roar of the Tiger

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The Washington Post had once described Shiv Sena chief Bal Thackeray as “the man who rules Bombay the way Al Capone ruled Chicago — through fear and intimidation”. On the occasion of his 85th birthday, DNA takes you on a pictorial journey through Thackeray’s life.

Born on January 23, 1926, Bal Keshav Thackeray, popularly called Balasaheb, started out as a cartoonist for the Free Press Journal. His political career began in the 1950s with the Samyukta Maharashtra movement, which called for a united Maharashtra inclusive of Mumbai, Konkan, Western Maharashtra, Vidarbha and Marathwada regions but exclusive of Gujarat.

In 1960, Thackeray launched Marmik, a cartoon weekly, which served as a mouthpiece for Thackeray’s campaign against the growing influence of non-Marathis in Mumbai. The journal contained satirical pieces that fired up the Marathi manoos to fight for his identity and existence in a city witnessing an influx of migrants.

In 1966, Bal Thackeray formed the Shiv Sena as a small Mumbai-based outfit to protect the interests of Marathi-speaking job-seekers in the city.The Shiv Sena has indeed come a long way since, going on to become one of the more indispensable partners of the BJP and a powerful regional party in Maharashtra.When the Mumbai civic elections come around next year, the Shiv Sena will have ruled the city for 20 years without interruption.

lungi hatao pungi bajao

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In the 1960s and 1970s, the Sena viciously targeted South Indians, calling them derogatory names like Yanda Gundu and Lungiwaale. Under Thackeray’s leadership, attacks on Udipi restaurants and theatres screening films by South Indian producers became regular features. With witty slogans like ‘lungi hatao pungi bajao’ , Thackeray instilled the Sena’s ideology deep in the minds of Maharashtrian youth.

The Sena’s newspaper Saamna was launched in 1989. A Hindi edition was launched in 1993. The paper still serves as a platform for the Sena chief to make witty, provocative comments on current issues. His fiery editorials have been a source of inspiration for many incidents of violence and hatred. A Saamna editorial ahead of the demolition of the Babri Masjid asked readers, “How does your Shiv Sainik appear as he is marching towards Ayodhya? Like the roaring lion spreading terror, with the gait of an intoxicated elephant, like the assault of a rhino which reduces to powder a rocky mountain, like the manoeuvres of a leopard: our infinite blessings to these Hindu warriors who are marching towards Ayodhya”.

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In 1991, Thackeray’s party suffered its first major blow when Chhagan Bhujbal, a senior leader who had served twice as mayor of Mumbai, defected to the join the Congress. With his exit, the Sena lost a chunk of its OBC votes. The reason for the defection was Thackeray’s opposition to the Mandal commission and the provision of reservations for OBCs. Bhujbal, an OBC himself, was offended by the party’s stand and walked out of the party. Bhujbal was also not pleased with the prominence given to Manohar Joshi, his arch rival within the party, whom he saw as a politician without a mass base.

From the 1980s, Thackeray promoted the ideology of ‘Maharashtra for Maharashtrians’. His anti-Muslim agenda and his propaganda for Hindutva propelled party workers to take up the cause of ‘protecting’ Hindus. Sainiks were largely involved in the communal riots of 1992-93 in which 575 Muslims and 275 Hindus were killed, according to official figures. In 2008, the Bombay high court sentenced senior Sena politician Madhukar Sarpotdar and two others to a year’s rigorous imprisonment for their role in the riots.

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In the aftermath of the riots, the serial bomb blasts of 1993 killed 250 people and injured more than 700. Masterminded by gangster Dawood Ibrahim, the attacks were organised to avenge the Muslim casualties during the riots.

Since the blasts were funded by expatriate Indian Muslim smugglers and executed by Muslims in India, Thackeray lashed out at Indian Muslims in general, saying, “All anti-national Muslims must be driven out of the country.” His definition of anti-national Muslims included “those who fired crackers of victory when Pakistan defeated India in the stadium of Bombay”.

Thackeray’s long cherished dream of coming to power in the state finally came true on March 24, 1995, when the Shiv Sena-BJP alliance won the election in Maharashtra. The government was formed with Manohar Joshi as chief minister and the BJP’s Gopinath Munde as his deputy. During its four-and-a-half-year stint, the government renamed Bombay to Mumbai and started various infrastructure projects like the Krishna Valley Irrigatiion Project and the Mumbai-Pune Expressway. It also built 56 flyovers in Mumbai and started the slum redevelopment scheme.

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While people were slotting the Sena as a conservative party, the year 1996 saw it welcome pop star Michael Jackson to Mumbai for a concert. In an age when international pop concerts were rare, Jackson’s visit rocked the nation. Jackson visited the Sena chief and reportedly autographed the toilet he used during the visit. Bal Thackeray, whose own brother was a music director, presented the king of pop with a silver tabla and taanpura. With the media frenzy that the tour created, it was hardly surprising that Thackeray was criticised for bringing in an American pop star who epitomised Western culture. Thackeray silenced his critics with a statement that said: “Michael Jackson is a great artist, and we must accept him as an artist. His movements are terrific. Not many people can dance that way. You will end up breaking your bones… and, well, what is culture? He represents certain values in America, which India should not have any qualms in accepting. We would like to accept that part of America that is represented by Jackson.”

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While 1995 saw Thackeray realise his dream of forming the government in Maharashtra, the same year saw him suffer a tragic loss. Thackeray’s wife Meena, ‘Maasaheb’ to Sena workers, died of a massive heart attack in September. Ambarish Mishra, in Raj Thackeray’s photobiography on the Sena chief, says, “Meenatai was Thackeray’s atman. She washed his wounds and nourished his soul, soothing her husband, whose life was a veritable battlefield.” Her death left the boss bereaved and sent the Sena into deep mourning.

Within a year, tragedy struck the family again when Thackeray’s oldest son Bindumadhav died in a road accident on April 20, 1996. The fatal accident took place when the Tata Sumo that Binda Thackeray was travelling in crashed into a tempo near Waksai Phata on the Mumbai-Pune highway. Conspiracy theories that the Thackeray scion was bumped off by Sena rivals did the rounds for a few days, but there was no proof to support the theory.

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In January 1993, Thackeray said, “If I am arrested, then the whole of the country up to Jammu & Kashmir will rise up. I am prepared. If a holy war is to begin because of me, then so be it.” Seven years later, the so-called ‘Hindu Hriday Samrat’ was arrested. The country watched Mumbai come to a standstill on July 25, 2000, when Thackeray was arrested for his inflammatory editorial in Saamna back in January 1993 during the Bombay riots when he openly called for attacks on Muslims.

Thackeray presented himself to the police and was produced in court. But the magistrate dismissed the case as time-barred. Thackeray walked free, much to the chagrin of one-time protege Chhagan Bhujbal, the state’s home minister.His arrest led to a few acts of violence and vandalism. Sena MLAs created a stir in the Maharashtra assembly by protesting against their leader’s arrest.In 2007, Thackeray was arrested again, this time for a provocative speech he made during a Sena rally. He was let off on bail immediately.

Thackeray might have welcomed a Western pop music sensation into his home, but his party’s anti-modern ideology remained strictly against Western customs and liberal thought.In spite of being an artist himself, Thackeray urged his Sainiks to oppose creative ventures that leaned towards liberal thought. The list included Vijay Tendulkar’s plays Sakharam Binder and Ghashiram Kotwal which were blazing remarks on traditional Maharashtrian society, Govind Nihalani’s Tamas, which was a comment on the communal tension in Indian society, and Deepa Mehta’s Fire, which talked about lesbian relationships.The Sena also protested against Pakistani ghazal singer Ghulam Ali’s concerts and celebrated Indian painter MF Husain’s works. Sainiks also spilled out on the streets to protest against Indian youth celebrating Valentine’s Day. Shops were vandalised, Valentine’s Day merchandise burnt, and couples caught celebrating the day punished.

  • In 2005, Thackeray’s health was on the decline and the party was about to suffer three major blows. In March, Sanjay Nirupam, the Shiv Sena MP who controlled the party’s North Indian vote bank, made an exit from the party. Nirupam cited nepotism and corruption within the party as reasons for his exit.

  • In July, the party lost its stronghold in the Sindhudurg region with Narayan Rane’s expulsion. Rane’s growing displeasure with Shiv Sena executive president Uddhav Thackeray and his rebellious behaviour were the reasons for the expulsion of the former chief minister.

  • The final blow came when Thackeray’s nephew Raj left the Shiv Sena. Raj’s displeasure at Uddhav being picked over him as heir apparent wasn’t unkown to those in the party or outside. Yet, it was a shock when in December 2005, the young Thackeray quit the party.

Raj floated the Maharashtra Navnirman Sena in 2006. Taking up the cause of the Marathi manoos, the MNS took away a sizeable chunk of the Sena’s Marathi votes.

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In November 2009, Bal Thackeray criticised the country’s beloved cricketer Sachin Tendulkar for making a statement that Mumbai belonged to the whole of India.The master blaster had also said that he was an Indian first and only then a Maharashtrian. The statement clearly condemned the regional politics of the Shiv Sena.Resenting Tendulkar’s ‘cheeky single’, Thackeray wrote in Saamna, “By making these remarks, you have got run out on the pitch of Marathi psyche. You were not even born when the Marathi manoos got Mumbai and 105 Marathi people sacrificed their lives to get Mumbai.”Thackeray went on to say, “Sachin, please keep in mind that we praise you for your fours and sixes on the field, but if you use your tongue as a bat to hit boundaries against the Marathi manoos, we will never tolerate it. Please don’t lose on the ground of politics whatever you have earned on the cricket pitch.”Thackeray, however, found little support for his stand against Tendulkar, with both the regional and national media as well as eminent citizens and top politicians criticising him.

During the IPL 3 auctions, all Pakistani players went unsold. Hindi film star and Knight Riders owner Shah Rukh Khan spoke in favour of the inclusion of Pakistani players in the popular tournament, attracting the wrath of the ‘Hindu Hriday Samrat’. Thackeray called for a public boycott of Khan’s film My Name is Khan and also branded him a traitor. Sena workers vandalised theatres and tore down posters of the film. But Khan stood his ground and refused to apologise to the Sena on the issue. The film was released amidst strict security at all theatres and went on to become a hit. This was another indication of the Sena’s diminishing clout in Mumbai.

Dussehra is a special day for every Shiv Sainik. It is the day on which Balasaheb addresses his followers at Shivaji Park in central Mumbai. The Sena’s 2010 Dussehra rally saw the senior Thackeray in his elements, lambasting the Congress and its inability to curb terrorism to the cheers of a huge crowd.At the 2010 rally, three generations of Thackerays — Balasaheb, son Uddhav and grandson Aditya — stood together on the stage. The octogenarian leader inducted his teenage grandson formally into the party and appointed him head of the Yuva Sena.

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Video

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शिवसेना…..इतिहास

Bal Thackeray, Shiv Sena and their main target in 1968 L’inde Fantôme

Mr. Balasaheb Thackeray in Year 1968 Speech

Mr. Balasaheb Thackeray Old Speech

Bala Saheb Thakrey Rare Vintage FearLess Speeches

Shri Balasaheb Thakare on Personal Visit to Dahisar Part – 1

Balasaheb Thackeray

November 17, 2012

मराठी मानुष की अस्मिता और हिंदुत्व की राजनीति के लिए नैतिक रूप से प्रतिबद्ध शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे अब हमारे बीच नहीं रहे। 17 नवंबर 2012, दिन शनिवार, समयदोपहर बाद करीब 3.33 बजे मुंबई स्थित अपने निवास `मातोश्री` में उन्होंने अंतिम सांस ली। माना जा रहा है कि बाल केशव ठाकरे के निधन के साथ भारतीय राजनीति के एक युग का अंत हो गया है।

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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