कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

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भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्येक रूप मनोहारी है। उनका बालस्वरूप तो इतना मनमोहक है कि वह बचपन का एक आदर्श बन गया है। इसीलिए जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के इसी रूप की पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें वे चुराकर माखन खाते हैं, गोपियों की मटकी तोड़ते हैं और खेल-खेल में असुरों का सफाया भी कर देते हैं। इसी प्रकार उनकी रासलीला, गोपियों के प्रति प्रेम वाला स्वरूप भी मनमोहक है। इसी प्रकार उनका योगेश्वर रूप और महाभारत में अर्जुन के पथ-प्रदर्शक वाला रूप सभी को लुभाता और प्रेरणा देता है। अपनी लीलाओं में वे माखनचोर हैं, अर्जुन के भ्रांति-विदारक हैं, गरीब सुदामा के परम मित्र हैं, द्रौपदी के रक्षक हैं, राधाजी के प्राणप्रिय हैं, इंद्र का मान भंग करने वाले गोवर्धनधारी हैं। उनके सभी रूप और उनके सभी कार्य उनकी लीलाएं हैं। उनकी लीलाएं इतनी बहुआयामी हैं कि उन्हें सनातन ग्रंथों में लीलापुरुषोत्तम कहा गया है।

चौंसठ विद्याओं और सोलह कलाओं के ज्ञाता कहे जाने वाले कला मर्मज्ञ चंद्रवंशी श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अ‌र्द्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। धर्मग्रंथों में इसे जन्म के बजाय प्रकट होना बताया गया है। उनके अनुसार, इसी तिथि को कारागारगृह में भगवान विष्णु देवकी और वसुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और कमल लिए प्रकट हुए थे, किन्तु माता देवकी के अनुरोध पर उन्होंने शिशु रूप धारण कर लिया। यही कारण है कि कुछ लोग जन्माष्टमी को गोपाल कृष्ण का जन्मोत्सव कहते हैं, तो कुछ उनका प्राकट्योत्सव।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 51वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपना परिचय इस प्रकार देते हैं: ब्रह्मा जी ने मुझसे धर्म की रक्षा और असुरों का संहार करने के लिए प्रार्थना की थी। उन्हीं की प्रार्थना से मैंने यदुवंश में वसुदेव जी के यहां अवतार ग्रहण किया है। अब मैं वसुदेव जी का पुत्र हूं, इसलिए लोग मुझे वासुदेव कहते हैं।’ महाभारत के अश्वमेध पर्व में भगवान श्रीकृष्ण अवतार लेने का कारण बताते हैं, ‘मैं धर्म की रक्षा और उसकी स्थापना के लिए बहुत सी योनियों में जन्म (अवतार) धारण करता हूं।’

जन्माष्टमी पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है झांकियां सजती हैं, मटकी फोड़ प्रतिस्पर्धाएं होती हैं। ‘गोविंदा आला रे’ गूंजता है। लीला पुरुषोत्तम का प्रत्येक प्रसंग प्रेरणा प्रदान करता है। जब मन अशांत हो, तब भगवान श्रीकृष्ण की वाणी ‘गीता’ घोर निराशा के बीच आशा की किरण दिखाने लगती है। तभी तो श्रीकृष्ण को ‘आनंदघन’ अर्थात आनंद का घनीभूत रूप कहा जाता है। नंदघर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की..। उन्होंने सिर्फ नंद के घर को आनंद से नहीं भरा, अपितु सभी के आनंद का मार्ग प्रशस्त किया।

जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण हुए 5241 वर्ष के, बना ग्रहों का अद्भुत योग

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जन-जन के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण इस वर्ष जन्ममाष्टमी पर 5240 साल के होने जा रहे हैं।

पुराणों में वर्णित युग की आयु और धरती पर भगवान श्रीकृष्ण की मौजूदगी के साक्ष्यों के अनुसार ये गणना पंचागों से की गई है। इस बार विलक्षण संयोग के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा।

भगवान श्री कृष्ण जब जन्म लिया- बताया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर के अंत में जन्म लिया। ज्योतिषाचार्य पंडित कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी के अनुसार पंचांगों के अनुसार कलियुग के गुजरे अनुमानित 5114 वर्ष और द्वापर के अंत में भगवान श्रीकृष्ण की धरती पर मौजूदगी 125 वर्ष आंकी जाती है। ऐसे में इस बार भगवान श्रीकृष्ण 5239 वर्ष पूर्ण कर 5240 वें वर्ष में प्रवेश करेंगे।

जन्माष्टमी पर अद्भुत ग्रह योग- इस बार द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय जिस तरह की नौ ग्रहों की स्थिति थी वैसे ही इस वर्ष छह ग्रहों का संयोग बन रहा है। इसमें वर्षा ऋतु भाद्रपद कृष्ण पक्ष, वृष राशि का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य, सिंह राशि का बुध, कर्क राशि में गुरु, राहु कन्या राशि के साथ केतु मीन राशि में मौजूद रहेगा। इसके अलावा मध्य रात्रि वृषभ लग्न भी रहेगा। जो द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म समय भी थी।

इस कृष्ण जन्माष्टमी पर बन रहा है ‘दुर्लभ योग’

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दशकों बाद रोहिणी नक्षत्र में मनाई जा रही है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

  • जन्माष्टमी पर इस बार फिर वही योग बन रहा है, जो 58 साल पहले था। 25 अगस्त दिन में 3 बजकर 21 मिनट से रोहिणी नक्षत्र, अष्टमी, हर्षण का जयंती योग बना रहा है। चूंकि कृष्ण का जन्म रात में हुआ था, इसलिए इसका मान 25 और 26 अगस्त के बीच की रात ही माना जाएगा। पंडित सिया राम तिवारी के अनुसार रोहिणी नक्षत्र का मान 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 50 मिनट तक रहेगा।
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का होना विशेष शुभ माना जाता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी नक्षत्र में हुआ है। इस नक्षत्र में योगेश्वर श्रीकृष्ण का पूजन सुख-शांति तथा समृद्धि देने वाला माना गया है। साधना तथा नवीन वस्तुओं की खरीदी के मान से भी यह दिन सर्वोत्तम है।

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ये विशेष उपाय करें : –
* ससंकल्प उपवास करें तथा रात्रि में भी भोजन न लें।

* काले तिल व सर्व औषधियुक्त जल से स्नान करें।

* संतान प्राप्ति तथा पारिवारिक आनंद बढ़ाने के लिए कृष्ण पूजन, अभिषेक कर जन्मोत्सव मनाएं।

* धनिए की पंजीरी का भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें।

* इष्ट मूर्ति, मंत्र, यंत्र की विशेष पूजा व साधना करें।

* श्री राधाकृष्ण बीज-मंत्र का जप करें।

* भक्ति एवं संतान प्राप्ति के लिए गोपाल, कृष्ण, राधा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ व तुलसी अर्चन करें।

* भूत-प्रेत बाधा निवारण, रक्षा प्राप्ति हेतु सुदर्शन प्रयोग, रामरक्षा, देवी कवच का पाठ करें।

* आकर्षण, सम्मोहन, वशीकरण प्रेम प्राप्ति के लिए तांत्रिक प्रयोग।

* ग्रह पीड़ा अनुसार पूजा व जप करें।

शास्त्रकारों ने व्रत पूजन, जपादि हेतु अद्र्धरात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी है। विशेषकर स्मार्त लोग अद्र्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा,हिमाचल, चंडीगढ़ आदि में  स्मार्त धर्मावलम्बी अर्थात गृहस्थ लोग गत हजारों सालों से इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अद्र्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं जबकि मथुरा, वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की परंपरा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही  केन्द्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है।

वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत हेतु ग्रहण करते हैं। सुबह स्नान के बाद ,व्रतानुष्ठान करके ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें । पूरा दिन व्रत रखें । फलाहार कर सकते हैं। रात्रि के समय ठीक बारह बजे, लगभग अभिजित मुहूर्त में भगवान की आरती करें। प्रतीक स्वरूप खीरा फोड़ कर , शंख ध्वनि से  जन्मोत्सव मनाएं। चंद्रमा को अर्ध्य देकर नमस्कार करें। तत्पश्चात मक्खन, मिश्री, धनिया, केले, मिष्ठान आदि का प्रसाद ग्रहण करें और बांटें। अगले दिन नवमी पर नन्दोत्सव मनाएं।

भगवान कृष्ण की आराधना के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं-

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते!

नमस्ते रोहिणी कान्त अघ्र्य में प्रतिगृह्यताम्!!

संतान प्राप्ति के लिए – दुर्लभ संयोग का विशेष फल, जन्माष्टमी पर पैदा होने वाले बच्चे होंगे कुछ खास

इस की इच्छा रखने वाले दंपति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति -पत्नी दोनों मिल कर  करें, अवश्य लाभ होगा।

देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते!

देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:!!

विवाह विलम्ब के लिए मंत्र है-

ओम् क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।

5114 वर्ष पहले हुआ था कृष्ण जन्म

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  • 5114 वर्ष पहले यह योग भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी में रात 12 बजकर 12 मिनट पर हुआ था। इस समय चंद्रमा अपनी उच्च वृष राशि में स्थित था, और रोहिणी नक्षत्र था।
  • वृष लग्न के साथ सूर्य स्वयं की सिंह राशि पर स्थित रहा। बुधवार के दिन श्रीकृष्ण जन्म के समय काल सर्पयोग था।
  • दुर्लभ ग्रह संयोजन के बीच पैदा होने की वजह से श्रीकृष्ण 64 गुणों से संपन्न व 16 कलाओं से पूर्ण थे।

ग्रंथों में श्रीकृष्ण जयंती का नाम

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जन्मतिथि अष्टमी-नवमी युक्त (सुबह 4.10 बजे से नवमी) होना (सिंधु ग्रंथराज) रोहणी पति चंद्रोदय रात 11.58 बजे, जन्म समय के पूर्व होना। (सिंधु श्री विश्व विजय पंचांग) भद्रा का नहीं होना, सर्वार्थ सिद्धि योग होना। इस प्रकार के संयोग को जन्माष्टमी के बजाय श्रीकृष्ण जयंती का नाम ग्रंथों में दिया गया है। (सिंधु व्रतराज) वार, तिथि व नक्षत्र द्वापर युग कइस साल जन्माष्टमी द्वापर के संयोगों के साथ आ रही है।

वार, समय, तिथि एवं नक्षत्र चारों ही द्वापर की तरह बन रहे हैं। द्वापर में श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि, बुधवार को आधी रात को हुआ था। इस बार भी 17 अगस्त भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को बुधवार व रोहणी नक्षत्र है।

ग्रहों ने बनाया हर कला में माहिर कृष्णको

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ईश्वर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का ही नाम आता है व इन्हीं त्रिदेवों ने संसार को रचा। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो भगवान विष्णु बने पालनहार तो भगवान शिव ने संहार किया। वैसे शिवजी को आदि और अंत कहा जाता है तो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को 16 कलाओं का ज्ञाता।

अवतार की श्रेणी में देखा जाए तो सिर्फ भगवान विष्णुजी ने ही अवतार लिए। वे त्रेतायुग में राम के अवतार में अवतरित हुए तो द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के। जहाँ राम 12 कलाओं के ज्ञाता थे तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं के ज्ञाता रहे।

कृष्ण की कुंडली… कृष्ण का जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगनमें हुआ था। उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लगन में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठेभाव में शुक्र और शनि बैठे थे। जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु थे।कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में थे. कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव कीकुंडली है।

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  • भगवान श्री कृष्ण की शक्तियों का राज उनके जन्म समय में छुपा है।
  • जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तब सभी ग्रह-नक्षत्र अपनी शुभ स्थिति में आकर विराजमान हो गए।
  • श्री कृष्ण की कुण्डली बताती है कि कृष्ण का जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगन में हुआ था।
  • उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लग्न में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठे भाव में शुक्र और शनि बैठे हैं।
  • जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु बैठे हैं।
  • कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में हैं।
  • कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव की कुंडली है।
  • ग्रहों की इन शुभ स्थितियों के कारण ही श्री कृष्ण ने अपनी अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन किया।

राम आदर्शवादी थे तो श्रीकृष्ण ने छल, बल, कपट का सहारा लिया लेकिन उन्होंने जग की भलाई के लिए ही कार्य किया क्योंकि आज का युग कलियुग भगवान श्रीकृष्ण के गुणों वाला ही है।

श्रावण के बाद भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में नंदगाँव मथुरा की जेल में पिता वसुदेव, माता देवकी के यहाँ हुआ।

कहते हैं भगवान ने माता कैकई को वचन दिया था कि माँ मैं तेरी कोख से द्वापर युग में जन्म लूँगा तो आपने अपना वचन निभाया। आपका जन्म वृषभ लग्न में हुआ। लग्न में तृतीयेश पराक्रम व भाई सखा आपका स्वामी चंद्रमा उच्च का होकर लग्न में होने से आपका व्यक्तित्व शानदार उत्तम कद-काठी के, हर कला में माहिर हुए। मंगल की नीच दृष्टि से आपके सगे भाई बलरामजी ने दूसरी माता रोहिणी की कोख से जन्म लिया। आज के युग में उसे परखनली या टेस्ट ट्‍यूब के रूप में जन्माते हैं।

आपकी पत्रिका में द्वितीय वाणी, धन-कुटुंब भाव का स्वामी बुध उच्च का होकर पंचम भाव विद्या-संतान-मनोरंजन में होने से आपकी वाणी में विशेष प्रभाव होता है तभी आपकी वाणी के सशक्त प्रभाव से सभी प्रभावित थे।

लेकिन आपको एक संतान प्रद्युम्न हुई जो पराक्रमी न होकर कायर थी। जनता के बीच प्रसिद्ध होना चतुर्थेश सूर्य का चतुर्थ भाव में होना रहा। सूर्य ने आपको महाप्रतापी राजा बनाया। लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव में स्वराशि का होकर भाग्येश, कर्मेश शनि के साथ केतु भी होने से आप शत्रुओं के काल रहे।

आपने बचपन से लेकर युवावस्था तक अनेक शत्रुओं को परास्त किया जिसमें आपके मामा कंस प्रमुख रहे। वैसे कालिया नाग, पूतना को भी मारा वहीं मल्लयुद्ध में अनेक पहलवानों को पछाड़ने के बाद हाथी को भी मारा। आप पराक्रमी न होकर चतुर थे अत: चतुराई से जहाँ जैसी जरूरत पड़ी वैसा काम किया। कभी युद्ध से भागे भी तभी तो रणछोड़ कहलाए।

शनि, शुक्र, केतु साथ होने से आप प्रेमी भी थे तभी आपने अपनी रणनीति के अनुसार रुक्मणि द्वारा भगाए गए। ताकि संसार ये न कहे कि श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का हरण किया। वैसे आपकी तीन पत्नियाँ रुक्मणि, सत्यभामा व जामवंती थीं।

प्रेमिकाओं में राधा का प्रेम जगजाहिर है तभी तो राधेकृष्ण यानी राधा पहले बाद में कृष्ण आते हैं। आप सखाओं के सखा,प्रेमियों में प्रेमी हैं। महाभाग्यवान मंगल का उच्च होना व शनि का उच्च होना परमोच्च कहलाया।

एकादश भाव में गुरु स्वराशि का होने से अपनी सेना व अर्थ धर्मक्षेत्र में लगाया। गुरु की उच्च दृष्‍टि पराक्रम पर होने से भाई महाबली बलरामजी का साथ रहा। सप्तम भाव पर मित्र ‍दृष्टि व मंगल सप्तमेश का उच्च होने से अनेक स्त्रियों से संबंध स्वच्छ रूप से रहे।

आपने संसार को कर्मयोग सिखाया। द्वादश भाव में राहु होने से बाहरी दुश्मन बहुत रहे। लेकिन शनि के उच्च होकर षष्ठ भाव में केतु शुक्र के साथ होने से सभी को नष्‍ट किया। आपकी आयु भी 100 वर्ष पूर्ण करने के बाद एक बहेलिए के तीर से आपकी मृत्यु हुई। ऐसे महान कर्मयोद्धा भगवान श्रीकृष्ण को शत्-शत् नमन।

16 कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण

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श्रृंगार कला – भगवान श्रीकृष्ण को श्रृंगार की बारिकियों का इतना ज्यादा ज्ञान था कि उसके श्रृंगार रूप को देखकर गोकुल की कन्याएं (गोपिया) उनके मनमोहक रूप को निहारती रहती थी। उनके गले में दुपट्टा, कमर पर तगड़ी, पीताम्बर अंग वस्त्र, सिर पर छोटा मुकुट तथा उसपर मोर पंख श्री की सुन्दरता में चार चांद लगाता था

वादन कला – भगवान को वादन के सभी स्वरों का पूर्ण ज्ञान था, जिसके परिणास्वरूप वे अपनी बांसूरी से बड़े बड़ों को अपने अनुचर बना लेते थे।

नृत्य कला – श्रीकृष्ण को नृत्य का पूर्ण ज्ञान था, इसी लिए गोकुल की देवियां उनके नृत्य की प्रशंसा करते-करते श्रीकृष्ण का नृत्य देखने की हठ करती थी।

गायन कला – श्रीकृष्ण एक अच्छे गायक भी थे। वेद के मंत्रों का गायन कर उन्होंने अर्जुन को मोहपाश के मुक्त कर दिया था।

वाकमाधूर्य कला – श्रीकृष्ण की वाणी में विलक्षण मधुरता व्याप्त थी। वे जिस किसी से भी वार्ता करते थे, वह हमेशा के लिए उनका हो जाता था।

वाकचातुर्य कला – उनकी वाणी में चतुरता भी थी। वे बडे़ सहज भाव से अपनी बात को मनवा लेते थे और सामने वाले को अपना विरोद्घि भी नही बनने देते थे। महाभारत में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आए हैं।

वक्तृत्व कला – भगवान एक महान वक्ता थे। बड़े-बड़े धूरंधरों को उन्होंने अपने प्रभावशाली वक्तव्यों से धराशाही कर उनको उनके ही बनाए जाल में फांस लिया था। कालयवन उसका एक अच्छा उदाहरण है।

लेखन कला – श्रीकृष्ण ने मात्र एक घंटे के सुक्ष्मकाल में गीता की रचना कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है। उनका मुकाबला आज तक या इससे पहले कोई नही कर सका। अतः भगवान एक उत्तम कोटी के लेखक भी थे।

वास्तुकला – भगवान श्रीकृष्ण को वास्तुकला का भी अकाटय ज्ञान था। पांडवों के लिए इन्द्रप्रस्थ और स्वयं अपने लिए राजधानी द्वारका का निर्माण वास्तुकला के बेजोड़ नमूने थे।

पाककला – भगवान श्रीकृष्ण पाक शास्त्र के भी महान पंडित थे। सम्राट युधिष्ठर के राजसूय यज्ञ के दौरान खाने-पीने का पूरा सामान उनकी देख-रेख में ही तैयार किया गया था।

नेतृत्व कला – कृष्ण में नेतृत्व करने की क्षमता बेजोड थी। वे जहां भी गए नेतृत्व उनके पीछे-पीछे हो जाता था। सभी युद्घों से लेकर आम सभाओं में हमेशा सभी ने उन्हीं के नेतृत्व को स्वीकार किया था।

युद्घ कला – श्रीकृष्ण की अधिकतर आयु युद्घों में ही व्यतीत हुई थी परन्तु हमेशा उन्होंने सभी में विजय प्राप्त की। वे युद्घ की सभी विधाओं का सम्पूर्ण ज्ञान रखते थे।

शस्त्रास्‍त्र कला – योगेश्वर श्रीकृष्ण को युद्घ में प्रयोग होने वाले सभी व्यूहों की रचना, उन्हें भंग करने की कला तथा आग्नेयास्त्र, वरूणास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र सहित सभी अस्त्र शस्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था।

अध्यापन कला – भगवान श्रीकृष्ण एक सफल अध्यापक भी थे। युद्घ क्षेत्र में जिस प्रकार उन्होंने अर्जुन को निष्कामकर्म योग, सांख्य योग, विभूति योग, भक्ति योग, मोक्ष सन्यास योग तथा विश्वरूप दर्शन योग का पाठ पढाया, वह हमेशा अनुक्रणीय रहेगा।

वैद्यक कला – श्रीकृष्ण आयूर्वेद के भी सम्पूर्ण ज्ञाता थे। कंस की फूल चुनने वाली दासी कुबड़ी के शरीर को सीधा करना तथा महाभारत युद्घ में अश्वथामा के प्रहार से मृतप्रायः हुए परीक्षित को जीवन दान देना इसके अकाट्य उदाहरण है।

पूर्वबोध कला – भगवान ने तप से अपनी आत्मा को इतना पवित्र और उर्द्घव गति को प्राप्त करवा लिया था कि उन्हें किसी भी घटना का पहले से ही अनुमान हो जाता था।

64 विद्याओं में माहिर थे श्रीकृष्ण? जानेंगे तो चौंक पड़ेंगे

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भगवान श्रीकृष्ण ‘लीलाधर’ पुकारे जाते हैं. श्रीकृष्ण ने हर लीला के जरिए अधर्म को सहन करने की आदत से सभी के दबे व सोए आत्मविश्वास और पराक्रम को जगाया. भगवान होकर भी श्रीकृष्ण का सांसारिक जीव के रूप में लीलाएं करने के पीछे मकसद उन आदर्शों को स्थापित करना ही था, जिनको साधारण इंसान देख, समझ व अपनाकर खुद की शक्तियों को पहचाने और ज़िंदगी को सही दिशा व सोच के साथ सफल बनाए.

इसी कड़ी में श्रीकृष्ण का सांसारिक धर्म का पालन कर, गुरुकुल जाना, वहां अद्भुत 16 कलाओं व 64 विद्याओं को सीखने के पीछे भी असल में, गुरुसेवा व ज्ञान की अहमियत दुनिया के सामने उजागर करने की ही एक लीला थी. यह इस बात से भी जाहिर होता है कि साक्षात जगतपालक के अवतार होने से श्रीकृष्ण स्वयं ही सारे गुण, ज्ञान व शक्तियों के स्त्रोत थे. यानी श्रीकृष्ण और बलराम ही जगत के स्वामी हैं. सारी विद्याएं व ज्ञान उनसे ही निकला है और स्वयंसिद्ध है. फिर भी उन दोनों ने मनुष्य की तरह बने रहकर उन्हें छुपाए रखा. दरअसल, किताबी ज्ञान से कोई भी व्यक्ति भरपूर पैसा और मान-सम्मान तो बटोर सकता है, किंतु मन की शांति भी मिल जाए, यह जरूरी नहीं. शांति के लिए अहम है – सेवा. क्योंकि खुद की कोशिशों से बटोरा ज्ञान अहंकार पैदा कर सकता है व अधूरापन भी. किंतु सेवा से, वह भी गुरु सेवा से पाया ज्ञान इन दोषों से बचाने के साथ संपूर्ण, विनम्र व यशस्वी बना देता है. श्रीकृष्ण व बलराम ने भी अंवतीपुर (आज के दौर का उज्जैन) नगरी में गुरु सांदीपनी से केवल 64 दिनों में ही गुरु सेवा व कृपा से ऐसी 64 विद्याओं में दक्षता हासिल की, जो न केवल कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में बड़े-बड़े सूरमाओं को पस्त करने का जरिया बनी, बल्कि गुरु से मिले इन कलाओं और ज्ञान के अक्षय व नवीन रहने का आशीर्वाद श्रीमद्भगवद्गगीता के रूप में आज भी जगतगुरु श्रीकृष्ण के साक्षात ज्ञानस्वरूप के दर्शन कराता है और हर युग में जीने की कला भी उजागर करने वाला विलक्षण धर्मग्रंथ है. गुरु संदीपन ने श्रीकृष्ण व बलराम को सारे वेद, उनका गूढ़ रहस्य बताने वाले शास्त्र, उपनिषद, मंत्र व देवाताओं से जुड़ा ज्ञान, धनुर्वेद, मनुस्मृति सहित सारे धर्मशास्त्रों, तर्क विद्या या न्यायशास्त्र का ज्ञान दिया. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध व आश्रय जैसे 6 रहस्यों वाली राजनीति भी सिखाई. यही नहीं, दोनों भाइयों ने केवल गुरु के 1 बार बोलनेभर से ही 64 दिन-रात में 64 अद्भुत विद्याओं को भी सीख लिया.

  1. गानविद्या
  2. वाद्य-भांति-भांतिके बाजे बजाना
  3. नृत्य
  4. नाट्य
  5. चित्रकारी
  6. बेल-बूटे बनाना
  7. चावल और पुष्पादिसे पूजा के उपहार की रचना करना
  8. फूलों की सेज बनान
  9. दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
  10. मणियों की फर्श बनाना
  11. शय्मा-रचना
  12. जलको बांध देना
  13. विचित्र सििद्धयां दिखलाना
  14. हार-माला आदि बनाना
  15. कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना
  16. कपड़े और गहने बनाना
  17. फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
  18. कानों के पत्तों की रचना करना
  19. सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना
  20. इंद्रजाल-जादूगरी
  21. चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
  22. हाथ की फुतीकें काम
  23. तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना
  24. तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
  25. सूई का काम
  26. कठपुतली बनाना, नाचना
  27. पहली
  28. प्रतिमा आदि बनाना
  29. कूटनीति
  30. ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी
  31. नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
  32. समस्यापूर्ति करना
  33. पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना
  34. गलीचे, दरी आदि बनाना
  35. बढ़ई की कारीगरी
  36. गृह आदि बनाने की कारीगरी
  37. सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
  38. सोना-चांदी आदि बना लेना
  39. मणियों के रंग को पहचानना
  40. खानों की पहचान
  41. वृक्षों की चिकित्सा
  42. भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
  43. तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना
  44. उच्चाटनकी विधि
  45. केशों की सफाई का कौशल
  46. मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
  47. म्लेच्छ-काव्यों का समझ लेना
  48. विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान
  49. शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
  50. नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना
  51. रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना
  52. सांकेतिक भाषा बनाना
  53. मनमें कटकरचना करना
  54. नयी-नयी बातें निकालना
  55. छल से काम निकालना
  56. समस्त कोशों का ज्ञान
  57. समस्त छन्दों का ज्ञान
  58. वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
  59. द्यू्त क्रीड़ा
  60. दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
  61. बालकों के खेल
  62. मन्त्रविद्या
  63. विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
  64. बेताल आदि को वश में रखने की विद्या

आठ के अंक का है कान्हा से खास ताल्लुक

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इस बार जन्माष्टमी 17 अगस्त को पड़ रही है। वो भी दो दिवसीय। लेकिन पूर्णावतार माने जाने वाले कन्हैया के जन्म को आठ के अंक से हर बार जोड़ कर देखा जाता है। उनकी बारे में बताने वाले ग्रंथ, गीता-वेदशास्त्र भी उनकी पूरी महिमा से अछूते हैं यह माना जाता भी है, क्योंकि उनके छोर का कोई विकल्प ही नहीं है। उनके जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरू हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं, तब उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। इसीलिए जरूरी है कि उनकी आठ के अंक से जुडी विशेष बातें सब जानें।

  1. आठवीं संतान थे वसुदेव जी के
  • ब्रज में रास रचाने वाले कान्हा और भक्तों के पालनहार श्री कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है।
  • उनका जन्म आठवें मनु के काल में हुआ था।
  • राक्षस राज कंस ने उनके माता-पिता वसुदेव और देवकी को कैद में रख रखा था।
  • ऎसा उसने एक भविष्यवाणी में खुद के अंत की सुने जाने के कारण किया था।
  • जिसमें उसकी बहन की आठवीं संतान द्वारा उसका वध करने का सत्य छुपा हुआ था।
  1. अष्टमी को जन्मे थे
  • कंस द्वारा देवकी के सात बच्चों को मार देने के पश्चात् भगवान विष्णु ने स्वंय को साधारण इंसान की तरह आश्चर्यजनिक रूप से कृष्ण के अवतार में प्रकट किया।
  • वे आठवें पुत्र के रूप में अष्टमी के दिन जन्मे थे, तब से लोग कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं।

3. आठ प्रमुख नाम लेते हैं उनके भक्त

  • श्री कृष्ण के भक्त उनकी पूजा में सर्वाधिक इन नामों को लेते हैं- नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव।
  • बाद में भक्तों ने रखे जैसे मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि।

4. आठ सखियां

  • वैसे तो भगवान् कृष्ण की काफी भक्त थीं, लेकिन ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा और भद्रा आदि आठ सखियां हैं।

5. आठ ही पत्नियां हैं

  • विभिन्न शास्त्रों में वर्णन है कि कान्हा जब बडे हो गए थे तो दैत्यों के वध के दौरान 16 हजार कन्याओं को उन्होंने कैद से मुक्त कराया। वे कृष्ण की ही भक्त थीं।
  • मगर मान्यता है कि रूक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी ही उनकी पत्नी थीं, यानी इस तरह आठ का अंक संयोग रखता है।

6. आठ चिह्न में विराजमान हैं

  • आज भक्त भगवान की पूजा के लिए जिन शुद्घ चीजों का प्रयोग करते हैं, उनमें से आठ चिह्न कृष्ण जी के हैं-सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी,पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री।
  1. आठ नगर, जो पहचाने जाते हैं श्रीकृष्ण की स्थली
  • ब्रजभूमि कई शहरों को मिलाकर बना है, जिनका मुख्यालय मथुरा है। गोकुल, नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन कस्बे श्रीकृष्ण की लीलाओं के लिए जाने जाते हैं।
  • कंस के वध के बाद वे जहां दूसरी जगह बसे वह आज गुजरात राज्य में हैं।
  • द्वारिका नामक यह नगर विश्वकर्मा महाराज द्वारा समुद्र के सहारे स्थापित कराया गया। यह कुल आठ हो गए।
  1. ये महादैत्य थे श्रीकृष्ण के शत्रु

कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कंस तो मामा था। कंस का श्वसुर जरासंध था। शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। कालयवन यवन जाति का मलेच्छ जा था जो जरासंध का मित्र था। पौंड्रक काशी नरेश था जो खुद को विष्णु का अवतार मानता था। इनके अलावा दो-एक को अर्जुन के साथ एक जंगल पर वार के दौरान मुक्ति दी गई थी।

कृष्ण और उनका जीवन

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कृष्ण पूर्ण योगी और यौद्धा थे। यमुना के तट पर और यमुना के ही जंगलों में गाय और गोपियों के संग-साथ रहकर बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना वध, शकटासुर वध, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय दमन, धेनुक वध, प्रलंब वध, अरिष्ट वध, कालयवन वध आदि का संहार किया तो किशोरावस्था में बड़े भाई बलदेव के साथ कंस का वध किया। जवान होते-होते उनकी दूर-दूर तक ख्याति फैल गई थी। फिर भी कृष्ण का जीवन सफलताओं और असफलताओं की एक लंबी और रोचक दास्तान है।

कृष्ण जन्म : पुराणों अनुसार आठवें अवतार के रूप में विष्णु ने यह अवतार लिया। मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में जन्म हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

वैसे कृष्ण जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद है… अलग-अलग शोध में कृष्ण के जन्म की तारीख अलग-अलग बताई गई है…

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पहला शोध- 3112 ईसा पूर्व (यानी आज से 5125 वर्ष पूर्व) को हुआ…

ब्रिटेन में रहने वाले शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं, पुरातात्विक तथ्यों आदि के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय का वर्णन किया है।ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलिय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। इन गणनाओं के अनुसार कृष्ण का जन्म र्इसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानि महाभारत युद्ध के समय कृष्ण की उम्र 54-55 साल की थी।

उन्होंने अपनी खोज के लिए टेनेसी के मेम्फिन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. नरहरि अचर द्वारा 2004-05 में किए गए शोध का हवाला भी दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने पुरातात्विक तथ्यों को भी शामिल किया। जैसे कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत, पानी में डूबी द्वारका और वहाँ मिले कृष्ण-बलराम के की छवियों वाले पुरातात्विक सिक्के और मोहरे, ग्रीक राजा हेलिडोरस द्वारा कृष्ण को सम्मान देने के पुरातात्विक सबूत आदि।

‘Krishna existed… Aug 29, 2009 Agency: DNA

Dr Manish Pandit, sutradhar of the documentary Krishna: History or Myth, uses four pillars archaeology, linguistics, what he calls the living tradition of India, and astronomy to arrive at the circumstantial verdict that Krishna was for real, because the Mahabharata and the battle of Kurukshetra did indeed happen. In an interview with DNA, Pandit outlines his documentary journey. Excerpts:

दूसरा शोध- 3228 ईसा पूर्व (यानी आज से 5114 वर्ष पूर्व) को हुआ

Krishna (b. July 21, 3228 BC)

 MAGAZINE | SEP 13, 2004

With some deft computer astrology, mythic Krishna gets a date of birth, and some planetary influence

Even gods come to earth with their destinies chalked out for them. So claims astrology, at any rate. So when Arun K. Bansal, the father of computer astrology in India, says that Hindu god Krishna was born on July 21, 3228 bc, it feels momentous somehow. The date essentially transforms Krishna in our minds: from a mythological figure of mystery, even if a much-loved one, into well a flesh and blood entity.  You can almost see him gurgling in Yashoda’s lap as Rishi Garg performs his naming ceremony in a cow shed more than 50 centuries ago.

But backtracking into the past can be a sloppy misadventure if you don’t get your calculations right. So Bansal rests his claims on two of his software packages—the Leo Gold and the Palm computer programmes. They can simulate any planetary configuration that has occurred or could occur in time.

All they need is a date. And July 21, 3228 bc, according to Bansal, satisfies every condition described during Krishna’s birth. Krishna was born in the Rohini nakshatra, in the Hindu month of Bhadrapada, on the 8th day of the waning moon at midnight. Bansal says this was enough information for him to nail the date, working backwards from Krishna’s death, which he says occurred at 2 pm on February 18, 3102 bc.

His entire case rests on the accuracy of this date, however. Bansal quotes extensively from the Shrimad Bhagwat and the Shri Vishnu Puranas, old Hindu calendars and the Mahabharata to illuminate the clues he chose to follow. “A shloka in the 38th chapter of the Shri Vishnu Puran, says that Kaliyuga started on the day Krishna died.” He unearths another shloka in the Shrimad Bhagwat Purana (part 11, chapter 6) where Brahma himself speaks to Krishna about how old he is. “Brahma says that 125 years have passed since Krishna’s birth; this is just before Krishna plans his death.”

Though not empirically verifiable, the advent of Kaliyuga is traditionally taken to be 3102 bc, because all our panchangas or astrological journals maintain that 5,100 years of Kaliyuga had passed before 1999 AD. The belief is supported by mathematician Aryabhatta’s astronomy treatise Aryabhattiya, the Surya Siddhanta, an astronomical text that dates back to 400 AD, and a 5th century inscription from a temple in Aihole.

Deleting 125 years from the date, Bansal figured Krishna was born either in 3327 or 3228 bc. The rest he left up to his software, merely feeding in the planetary configuration that Krishna was supposedly born under, to generate the row of figures that conforms to the epochal moment.

विशेषज्ञों ने कृष्ण जन्म को लेकर ऐतिहासिक प्रमाणिकता साबित की है…

भारतवर्ष में मानव सभ्यता का इतिहास कितना प्राचीन है, इसका अंदाजा हम हडप्पा और मोहन जोदाडों से लेकर पुरातत्व के अवशेषों से लगा सकते हैं। इस अति प्राचीन और पवित्र धरती पर कई महापुरुष भी हुए। ऐसा ही ऐतिहासिक नाम है, भगवान श्री कृष्ण का, जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों से लेकर आज भी जीवंत है। लेकिन उनका जन्म किस सन् में हुआ इसकी अभी तक कोई पुष्ट जानकारी नहीं थी, परंतु खगोलीय गणनाओं,गणितीय संक्रियाओं एवं आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद की गई। एक खोज के अनुसार यह दावा किया गया है कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व में हुआ था।

आधुनिक साफ्टवेयर की ली मदद

विशेषज्ञों के अनुसार श्रीकृष्ण के जन्म के समय वर्णित घटनाओं को संदर्भ लेने पर 5 हजार वर्ष पूर्व जाना दुस्साहस हो सकता है, परंतु इन गणितीय खगोलीय संक्रियाओं को हम पारंपरिक गणितीय विधियों द्वारा हल कर सकते हैं। इसमें आधुनिक साफ्टवेयरों की सहायता से किसी भी पूर्व या संभावित ग्रह स्थिति का पुनः चित्रण कर क्रास चैक किया जा सकता है।

संकेतों और श्लोंकों का अध्ययन

अध्ययन के मुताबिक पहले भारतीय पंचांग सातवर्षीय रहा है, जिसमें 2700 वर्षों का एक चक्र था। इसकी गणना आकाश में सप्तर्षि तारामंडल की गति के संक्रमण द्वारा की जाती थी। जिसे 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया था। धर्मग्रंथों में श्रीकृष्ण जन्म के संदर्भ में जो संकेत हैं, वे भाद्रपद माह की अष्टमी को रोहणी नक्षत्र में अर्धरात्रि को हुए। उपरोक्त सकेतों का वर्णन विस्तार से श्री विष्णु पुराण, महाभारत व श्रीमदभागवत में हैं। श्री विष्णु पुराण के 38 वें अध्याय में एक श्लोंक के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु के दिन कलियुग का प्रारंभ हुआ। श्रीमदभागवत पुराण के खंड 11 के अध्याय छह में एक श्लोक में ब्रम्हा, श्रीकृष्ण की आयु के संदर्भ म कहते हैं, कि श्रीकृष्ण के जन्म के 125 वर्ष हो चुके हैं।

कर्नाटक मंदिर में भी है अभिलेख

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलियुग का आरंभ 3102 ईसा पूर्व से माना जाता है, क्यों हमारे सभी पंचांग या ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर 1991ई. तक कलियुग के 5100 वर्ष बीत चुके हैं। इस तरह गणितज्ञ आर्यभट्ट ने खगोलीय निबंध आर्यभट्टीय एवं संदर्भ में महाभारत के समय की खगोलीय घटनाओं का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण 90 वर्ष के थे। तब दुर्लभ चंद, सूर्यग्रहण दोनों का होना। औष्ण पक्ष की अवधि घटकर 13 दिन हो जाना एवं आकाश में एक धूमकेतू का चमकते हुये गुजर जाना। उपरोक्त खगोलीय घटनाओं का वर्णन कर्नाटक के एक मंदिर में पाए गए अभिलेख के अनुसार भी सही पाया गया है।

श्रीकृष्ण की कुंडली भी तैयार

विशेषज्ञों के अनुसार कलियुग प्रारंभ होने यानी 3102 ईसा पूर्व से 125 वर्ष घटाने पर कृष्ण के जन्म का वर्ष निकलता है जो कि 3228 ईसा पूर्व है। बाकी का कार्य ग्रहों की स्थिति डालते हुये श्री कृष्ण भगवान की कुंडली बन जाती है। 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व कृष्ण के जन्म के समय वर्णित सभी परिस्थितियों को संतुष्ट करने वाली तिथि है, इसी अधार पर कृष्ण की आयु में 125 वर्ष जोडने पर कृष्ण का अवसान 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व दोपहर को हुई थी। मृत्यु की घटनाओं से पूर्णतः मल खाती है।

कृष्ण निवास : गोकुल, वृंदावन और द्वारिका में कृष्ण ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण क्षण गुजारे। पूरे भारतवर्ष में कृष्ण अनेकों स्थान पर गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए उक्त स्थान से जुड़ी उनकी गाथाएँ प्रचलित है लेकिन मथुरा उनकी जन्मभूमि होने के कारण हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

कृष्ण लीलाएँ : बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना वध, शकटासुर वध, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय दमन, धेनुक वध, प्रलंब वध, अरिष्ट वध, कालयवन वध किया…

कृष्ण के जीवन में बहुत रोचकता और उथल-पुथल रही है। बाल्यकाल में वे दुनिया के सर्वाधिक नटखट बालक रहे, तो किशोर अवस्था में गोपियों के साथ पनघट पर नृत्य करना और बाँसुरी बजाना उनके जीवन का सबसे रोचक प्रसंग है। कुछ और बड़े हुए तो मथुरा में कंस का वध कर प्रजा को अत्याचारी राजा कंस से मुक्त करने के उपरांत कृष्ण ने अपने माता-पिता को भी कारागार से मुक्त कराया। इसके अलावा कृष्ण ने पूतना,शकटासुर, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय-दमन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ट आदि राक्षसों का संहार किया था। श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। और उनमें सभी तरह की शक्तियाँ थी।

कालिया नाग दमन की कथा: कालिया नागराज, जो पहले रमण द्वीप में रहता था। गरुड़ के डर से कालिया नंदगांव के पास यमुना में जा छिपा। उसके विष से यमुना का जल जहरीला हो गया। उसे पीकर गाएं और गोप मरने लगे। एक बार जब खेलते समय गेंद यमुना में गिर जाने से कृष्ण उसे निकालने के लिए यमुना में कूदे और कालिया का दमन किया और उसके फण पर नाचने लगे। कालिया नाग के माफी मांगने के बाद कृष्ण ने से वरदान देकर दोबारा रमण द्वीप भेज दिया। यमुना का यह स्थान आज भी ‘कालियदह’ कहलाता है। इसी प्रकार वहीं ताल वन में दैत्य जाति का धनुक नाम का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसे बलदेव ने मार डाला था। उक्त दोनों घटना के कारण दोनों भाइयों की ख्यायति फैल गई थी।

इसलिए गोवर्धन पर्वत उठाया कृष्ण ने: वर्षा ऋतु के बाद गांवों में देवराज इंद्र का आभार प्रकट करने के लिए यज्ञ किए जाते थे। इंद्र मेघों के देवता हैं और उन्हीं के आदेश से मेघ धरती पर पानी बरसाते हैं। हमेशा मेघ पानी बरसाते रहें, जिससे गांव और शहरों में अकाल जैसी स्थिति ना बने, इसके लिए यज्ञ के जरिए इंद्र को प्रसन्न किया जाता था। ब्रज मंडल में भी उस दिन ऐसे ही यज्ञ का आयोजन था। लोगों का मेला लगा देख, यज्ञ की तैयारियों को देख कृष्ण ने पिता नंद से पूछा कि ये क्या हो रहा है।

नंद ने उन्हें यज्ञ के बारे में बताया। कृष्ण ने कहा इंद्र को प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ क्यों? पानी बरसाना तो मेघों का कर्तव्य है और उन्हें आदेश देना इंद्र का कर्तव्य। ऐसे में उनको प्रसन्न करने का सवाल ही कैसे उठता है? ये तो उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए रिश्वत देने जैसी बात है। ब्रजवासियों ने कृष्ण को समझाया कि अगर यज्ञ नहीं हुआ तो इंद्र क्रोधित हो जाएंगे। इससे पूरे ब्रजमंडल पर संकट आ सकता है। कृष्ण ने कहा कि अगर पूजा और यज्ञ ही करना है तो गोवर्धन पर्वत का किया जाना चाहिए, क्योंकि वो बिना किसी प्रतिफल की आशा में हमारे पशुओं का भरण-पोषण करता है, हमें औषधियां देता है।

बहुत बहस के बाद ब्रजवासी कृष्ण की बात से सहमत हो गए और उन्होंने इंद्र के यज्ञ की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल पर भयंकर बरसात शुरू कर दी। ब्रजवासी डर गए। नदियां, तालाब सभी उफन गए। बाढ़ आ गई। ब्रज डूबने लगा और लोगों के प्राण संकट में आ गए। सभी ने कृष्ण से कहा कि देखो तुम्हारे कहने पर इंद्र को नाराज किया तो उसने कैसा प्रलय मचा दिया है। अब ये गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा क्या? कृष्ण ने कहा – हां, यही गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा। कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ ही छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सारे गांव वाले उसके नीचे आ गए।

वे बारिश की बौछारों से बच गए। भगवान ने ग्वालों से कहा कि सभी मेरी तरह गोवर्धन को उठाने में सहायता करो। अपनी-अपनी लाठियों का सहारा दो। ग्वालों ने अपनी लाठियां गोवर्धन से टिका दी। इंद्र को हार माननी पड़ी। उसका अहंकार नष्ट हो गया। वो कृष्ण की शरण में आ गया। भगवान ने उसे समझाया कि अपने कर्तव्यों के पालन के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं करनी चाहिए। जो हमारा कर्तव्य है, उसे बिना किसी लालच के पूरा करना चाहिए।

कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेक गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थीं। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रृंगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थीं। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थीं जिनके नाम इस तरह हैं:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता,विशाखा तथा भद्रा।

कंस का वध : किसी ने कंस को बताया कि वासुदेव और देवकी की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण होगी। अत: कंस उक्त दोनों की संतान के उत्पन्न होते ही मार डालता था। कृष्ण वासुदेव की सातंवी संतान थे। वासुदेव इस संतान को चोरी-चोरी नंदग्राम में नंद ग्वाले के घर रख आए और फिर कृष्ण का वहीं पालन-पोषण हुआ। इसी काल में कृष्ण की दूसरी माँ के पुत्र बलराम को भी वहाँ लाकर रख दिया था। दोनों भाई वहीं पले-बढ़े।

कालिया और धनुक का सामना करने के कारण दोनो भाइयों की ख्याति के चलते कंस समझ गया कि ज्योतिष भविष्यवाणी अनुसार इतने बलशाली तो वासुदेव और देवकी के पुत्र ही हो सकते हैं। तब कंस ने दोनों भाइयों को पहलवानी के लिए निमंत्रण ‍दिया क्योंकि कंस चाहता था कि इन्हें पहलवानों के हाथों मरवा दिया जाए, लेकिन दोनों भाइयों ने पहलवानों के शिरोमणि चाणूर और मुष्टिक को मारकर कंस को पकड़ लिया और सबके देखते-देखते ही उसको भी मार दिया।

कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा: योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर हासिल की थी। उस काल में उज्जैन को उज्जयिनी व अवंतिका कहा जाता था। वहाँ से शिक्षा पाकर वे मथुरा की रक्षा करने लगे। कंस के मरने पर उन्होंने मथुरा में वृष्णि, अंधक, भोज और शनि वंशों का गणराज्य स्थापित किया था।

जरासंघ का आक्रमण: जरासंघ कंस का श्वसुर था। कंस की पत्नी मगथ नरेश जरासंघ को बार-बार इस बात के लिए उकसाती थी कि कंस का बदला लेना है। इस कारण जरासंघ ने मथुरा के राज्य को हड़पने के लिए कई आक्रमण किए तब अंतत: कृष्ण ने अपने सजातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया। वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए।- महाभारत मौसल- 14.43-50

भौमासुर से युद्ध : इस पलायन के दौरान हिमालय जिसे देवलोक कहा जाता था वहाँ भौमासुर का राज्य हो चला था जो देवताओं को सताया करता था। उसने इंद्र की माता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और वह उसे वापस नहीं कर रहा था। तब देवों के कहने पर कृष्ण ने भौमासुर से युद्ध करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उन्होंने दो शर्तें उपस्थित कर दीं। एक तो उन्होंने सुदर्शन चक्र माँगा और दूसरा युद्ध के लिए गरुड़ यान। तब ही वे युद्ध करेंगे। देवराज इंद्र ने यह स्वीकार कर लिया। चक्र और गरुढ़ यान होने के कारण उन्हें विष्णु का अवतार माना जाने लगा। क्योंकि यह दोनों ‍वस्तुएँ सिर्फ विष्णु के पास ही होती थीं। सुदर्शन चक्र को उस काल में बहुत ही घातक अस्त्र माना जाता था।

द्वारिका निर्माण : कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने गुजरात के समुद्र के तट पर द्वारिका का निर्माण कराया और वहाँ एक नए राज्य की स्थापना की। कालांतर में यह नगरी समुद्र में डूब गई, जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ भी यहीं पर स्थित है। हिंदुओं को चार धामों में से एक द्वारिका धाम को द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ कहा जाता है। स्कंदपुराण में श्रीद्वारिका महात्म्य का वर्णन मिलता है।

कृष्ण की गीता : वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार ‘गीता’ को माना है। कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो ज्ञान दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में सब कुछ है- दर्शन है, योग है, धर्म है और नीति भी। गीता कृष्ण द्वारा महाभारत के भीष्मपर्व में अर्जुन को दिया गया ज्ञान है। इसे महाभारत के साथ पढ़ने और समझने से ही लाभ मिलता है। अन्यत्र से नहीं।

स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि युद्ध क्षेत्र में जो ज्ञान मैंने तुझे दिया था उस वक्त मैं योगयुक्त था। अत: उस अवस्था में परमात्मा की बात कहते हुए, वह परमात्मा के प्रतिनिधि बनते हुए परमात्मा के लिए मैं, मेरा, मुझे इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं इससे यह आशय नहीं कि वे खुद परमात्मा हैं या उनमें किसी प्रकार का अहंकार है।

कर्म योगी कृष्ण : गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। गीता में कर्म बंधन से मुक्ति के साधन बताएँ हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से मुक्ति आवश्यक है।

कृष्ण ने जो भी कार्य किया उसे अपना कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका पालन करते थे। न अतीत में और न भविष्य में, जहाँ हैं वहीं पूरी सघनता से जीना ही उनका उद्देश्य रहा।

महाभारत युद्ध : विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध के नाम से जाना जाता है।

कृष्ण इस युद्ध में पांडवों के साथ थे। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। एक अन्य शोधानुसार यह युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी। तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है।

कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ग्रह-नक्षत्रों की जो स्थिति थी उस आधार पर ज्योतिषियों अनुसार कृष्ण की आयु 125 वर्ष आँकी गई है।

महाभारत युद्ध चंद्रवंशियों के दो परिवार कौरव और पांडव के बीच हुआ था। उक्त लड़ाई आज के हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुई मानी गई है। इस युद्ध में पांडव विजयी हुए थे। इस लड़ाई में कृष्ण पांडवों के साथ थे। बलदेव दुर्योधन की ओर से लड़ना चाहते थे लेकिन कृष्ण के पांडवों की ओर होने से उन्होंने युद्ध का त्याग कर दिया। इस युद्ध के बाद यदुवंशियों में आपसी फूट पड़ गई और वे सभी आपस में लड़कर ही मर गए। पारिवारिक युद्ध के चलते कृष्ण के पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण, और प्रद्युम्न तथा पोते अनिरुद्ध भी जब युद्ध में मारे गए तो कृष्ण ने क्रोधवश शेष बचे यादवों का नाश कर दिया।- महाभारत मौसल-3.41-3.46

तपस्या और महाप्रयाण : यादवों का नाश होने के पश्चात्य उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपने यदुवंशियों का विनाश देखा इससे पूर्व आपने कुरुवंशियों का नाश देखा। अब मैं यादवों के बिना द्वारिका की रक्षा करने में असमर्थ हूँ। अंत: वन में जाकर बलदेवजी के साथ तपस्या करूँगा।- महाभारत मौसल-4-6

वन में श्रीकृष्ण भूमि पर लेटे थे। उस समय एक व्याघ मृगों को मारने की इच्छा से उधर आ निकला। व्याघ ने दूर से श्रीकृष्ण को मृग समझकर उन पर बाण चला दिया। जब वह पास आया तो पीताम्बरधारी कृष्ण को वहाँ देख भयभीत हो खड़ा रह गया। 125 वर्ष की उम्र में कृष्ण ने देह छोड़ दी।

श्रीकृष्ण की 5 महत्वपूर्ण शिक्षाएं- 

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संपूर्ण पुरुष माने जाने वाले भगवान श्री कृष्ण ने जीवन को देखने का एक नया नजरिया अपने भक्तों को दिया। जानिए श्री कृष्ण की उन 5 शिक्षाओं को जिन्हें अगर आप आत्मसात कर लें तो परमात्मा के निकट पहुंच सकेंगे…

  1. निष्काम स्वधर्माचरणम् : बिना फल की इच्छा किए या उस कार्य की प्रकृति पर सोच-विचार किए अपना कर्म करते जाओ।
  2. अद्वैत भावना सहित भक्ति : परमात्मा के प्रति अद्वैत भावना से स्वयं को उस परम शक्ति के हाथों समर्पित कर दो। उसी की भक्ति करो।
  3. ब्रह्म भावना द्वारा सम दृष्टि : सारे संसार को समान दृष्टि से देखो। सदैव ध्यान रखो कि संसार में एक सर्वव्यापी ब्रह्म है जो सर्वोच्च शक्ति है।
  4. इंद्रीय निग्रहम् और योग साधना : इंद्रियों को उनके साथान पर केंद्रित करो। सभी प्रकार की माया से स्वयं को मुक्त करने और अपनी इंद्रियों का विकास करने का निरंतर प्रयास करते रहो।
  5. शरणगति: जिन चीजों को तुम अपना कहते हो उसे उस दिव्य शक्ति को समर्पित कर दो और उस समर्पण को सार्थक बनाओ।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक किस्से तथा उनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र बता रहे हैं-

इसलिए बढ़ गई थी द्रौपदी की साड़ी

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द्रौपदी का चीरहरण होते समय भगवान ने उसकी सहायता की और उसकी साड़ी को इतना बढ़ा दिया कि दु:शासन उतार न सका। इसके पीछे क्या कारण है कि कृष्ण ने द्रौपदी की सहायता की।

महाभारत में इस बात का जवाब है। बात उस समय की है जब पांडवों ने हस्तिनापुर से अलग होकर अपने लिए इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया। भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन में ही सारा निर्माण हुआ। उसके बाद युधिष्ठिर का राजतिलक करके राजसूय यज्ञ किया गया। इसमें दुनियाभर के राजाओं ने भाग लिया। यज्ञ में अग्रपूजा की बात आई। पंडितों ने युधिष्ठिर से कहा कि सबसे पहले वे किसकी पूजा करेंगे। भीष्म के कहने पर भगवान कृष्ण का नाम अग्रपूजा के लिए तय हुआ।

लगभग सभी राजा इसके लिए तैयार थे, लेकिन कृष्ण की बुआ का बेटा शिशुपाल इसके लिए तैयार नहीं था। उसका कहना था कि राजाओं की सभा में एक ग्वाले की अग्रपूजा करना सभी राजाओं का अपमान करने जैसा है। उसने कृष्ण को गालियां देना शुरू कर दिया। शिशुपाल के जन्म के समय ही यह भविष्यवाणी हो चुकी थी कि इसकी मौत कृष्ण के हाथों होगी, लेकिन कृष्ण ने अपनी बुआ को ये भरोसा दिलाया था कि वे सौ बार शिशुपाल से अपना अपमान सहन करेंगे।

इसके बाद ही उसका वध करेंगे। सभा में शिशुपाल ने सारी मर्यादाएं तोड़ दी और अनेकों बार कृष्ण का अपमान किया। सौ बार पूरा होते ही कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। चक्र के प्रयोग से उनकी उंगली कट गई और उसमें से खून बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। उस समय कृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया था कि इस कपड़े के एक-एक धागे का कर्ज वे समय पडऩे पर चुकाएंगे। यह ऋण उन्होंने चीरहरण के समय चुकाया।

लाइफ मैनेजमेंट- अच्छा काम भविष्य के फिक्स डिपॉजिट की तरह होता है, जो समय आने पर आपको पूरे ब्याज सहित वापस मिलता है।

इसलिए गोवर्धन पर्वत उठाया कृष्ण ने?

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वर्षा ऋतु के बाद गांवों में देवराज इंद्र का आभार प्रकट करने के लिए यज्ञ किए जाते थे। इंद्र मेघों के देवता हैं और उन्हीं के आदेश से मेघ धरती पर पानी बरसाते हैं। हमेशा मेघ पानी बरसाते रहें, जिससे गांव और शहरों में अकाल जैसी स्थिति ना बने, इसके लिए यज्ञ के जरिए इंद्र को प्रसन्न किया जाता था। ब्रज मंडल में भी उस दिन ऐसे ही यज्ञ का आयोजन था। लोगों का मेला लगा देख, यज्ञ की तैयारियों को देख कृष्ण ने पिता नंद से पूछा कि ये क्या हो रहा है।

नंद ने उन्हें यज्ञ के बारे में बताया। कृष्ण ने कहा इंद्र को प्रसन्न रखने के लिए यज्ञ क्यों? पानी बरसाना तो मेघों का कर्तव्य है और उन्हें आदेश देना इंद्र का कर्तव्य। ऐसे में उनको प्रसन्न करने का सवाल ही कैसे उठता है? ये तो उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए रिश्वत देने जैसी बात है। ब्रजवासियों ने कृष्ण को समझाया कि अगर यज्ञ नहीं हुआ तो इंद्र क्रोधित हो जाएंगे। इससे पूरे ब्रजमंडल पर संकट आ सकता है। कृष्ण ने कहा कि अगर पूजा और यज्ञ ही करना है तो गोवर्धन पर्वत का किया जाना चाहिए, क्योंकि वो बिना किसी प्रतिफल की आशा में हमारे पशुओं का भरण-पोषण करता है, हमें औषधियां देता है।

बहुत बहस के बाद ब्रजवासी कृष्ण की बात से सहमत हो गए और उन्होंने इंद्र के यज्ञ की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल पर भयंकर बरसात शुरू कर दी। ब्रजवासी डर गए। नदियां, तालाब सभी उफन गए। बाढ़ आ गई। ब्रज डूबने लगा और लोगों के प्राण संकट में आ गए। सभी ने कृष्ण से कहा कि देखो तुम्हारे कहने पर इंद्र को नाराज किया तो उसने कैसा प्रलय मचा दिया है। अब ये गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा क्या? कृष्ण ने कहा – हां, यही गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा। कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ ही छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सारे गांव वाले उसके नीचे आ गए।

वे बारिश की बौछारों से बच गए। भगवान ने ग्वालों से कहा कि सभी मेरी तरह गोवर्धन को उठाने में सहायता करो। अपनी-अपनी लाठियों का सहारा दो। ग्वालों ने अपनी लाठियां गोवर्धन से टिका दी। इंद्र को हार माननी पड़ी। उसका अहंकार नष्ट हो गया। वो कृष्ण की शरण में आ गया। भगवान ने उसे समझाया कि अपने कर्तव्यों के पालन के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं करनी चाहिए। जो हमारा कर्तव्य है, उसे बिना किसी लालच के पूरा करना चाहिए।

लाइफ मैनेजमेंट- कृष्ण ने यहां सीधे रूप से लाइफ मैनेजमेंट के तीन सूत्र दिए हैं। पहला यह कि भ्रष्टाचार बढ़ाने में दो पक्षों का हाथ होता है। एक जो कर्तव्यों के पालन के लिए अनुचित लाभ की मांग करता है, दूसरा वह पक्ष जो ऐसी मांगों पर बिना विचार और विरोध के लाभ पहुंचाने का काम करता है। इंद्र मेघों का राजा है, लेकिन पानी बरसाना उसका कर्तव्य है। इसके लिए उसकी पूजा की जाए या उसके लिए यज्ञ किए जाएं, आवश्यक नहीं है। अनुचित मांगों पर विरोध जरूरी है। जो लोग किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को उसके कर्तव्य की पूर्ति के लिए रिश्वत देते हैं तो वे भी भ्रष्टाचार फैलाने के दोषी हैं।

कृष्ण ने द्वारिका को राजधानी के लिए क्यों चुना?

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मथुरा में कंस वध के बाद भगवान कृष्ण को वसुदेव और देवकी ने शिक्षा ग्रहण करने के लिए अवंतिका नगरी (वर्तमान में मध्यप्रदेश के उज्जैन) में गुरु सांदीपनि के पास भेजा। बड़े भाई बलराम के साथ कृष्ण पढऩे के लिए आ गए। यहीं पर सुदामा से उनकी मित्रता हुई। शिक्षा ग्रहण करने के बाद जब गुरुदक्षिणा की बात आई तो ऋषि सांदीपनि ने कृष्ण से कहा कि तुमसे क्या मांगू, संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुमसे मांगी जाए और तुम न दे सको। कृष्ण ने कहा कि आप मुझसे कुछ भी मांग लीजिए, मैं लाकर दूंगा। तभी गुरु दक्षिणा पूरी हो पाएगी।

ऋषि सांदीपनि ने कहा कि शंखासुर नाम का एक दैत्य मेरे पुत्र को उठाकर ले गया है। उसे लौटा लाओ। कृष्ण ने गुरु पुत्र को लौटा लाने का वचन दे दिया और बलराम के साथ उसे खोजने निकल पड़े। खोजते-खोजते सागर किनारे तक आ गए। यह प्रभास क्षेत्र था। जहां चंद्रमा की प्रभा यानी चमक समान होती थी। समुद्र से पूछने पर उसने भगवान को बताया कि पंचज जाति का दैत्य शंख के रूप में समुद्र में छिपा है। हो सकता है कि उसी ने आपके गुरु पुत्र को खाया हो। भगवान ने समुद्र में जाकर शंखासुर को मारकर उसके पेट में अपने गुरु पुत्र को खोजा, लेकिन वो नहीं मिला। शंखासुर के शरीर का शंख लेकर भगवान यमलोक गए। इसी शंख का नाम पांचजन्य शंख पड़ा।

भगवान ने यमराज से अपने गुरु पुत्र को वापस ले लिया और गुरु सांदीपनि को उनका पुत्र लौटाकर गुरु दक्षिणा पूरी की। भगवान कृष्ण ने तभी प्रभास क्षेत्र को पहचान लिया था। यहां बाद में उन्होंने द्वारिका पुरी का निर्माण किया। भगवान ने प्रभास क्षेत्र की विशेषता देखी। उन्होंने तभी विचार कर लिया था कि समुद्र के बीच में बसाया गया नगर सुरक्षित हो सकता है। जरासंघ ने 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया। उसके बाद कालयवन के साथ मिलकर फिर हमला बोला। तब कृष्ण ने प्रभास क्षेत्र में द्वारिका निर्माण का निर्णय लिया ताकि मथुरावासी आराम से वहां रह सकें। कोई भी राक्षस या राजा उन पर आक्रमण न कर सके।

लाइफ मैनेजमेंट- कई बार वर्तमान में भी भविष्य की समस्याओं का हल छुपा होता है। बस जरूरत होती है सही नजरिये और दूरदृष्टि की।

जब कृष्ण ने खेल-खेल में किया यमुना को प्रदूषण मुक्त

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एक बार भगवान कृष्ण मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद से खेल रहे थे। भगवान ने जोर से गेंद फेंकी और वो यमुना में जा गिरी। भारी होने से वो सीधे यमुना के तल पर चली गई। मित्रों ने कृष्ण को कोसना शुरू किया। कहने लगे कि तुमने गेंद को यमुना में फेंका है, तुम ही बाहर लेकर आओ। समस्या यह थी कि उस समय यमुना में कालिया नाग रहता था। पांच फनों वाला नाग बहुत खतरनाक और विषधर था। उसके विष से यमुना काली हो रही थी और उसी जहर के कारण गोकुल के पशु यमुना का पानी पीकर मर रहे थे। कालिया नाग गरूड़ के डर से यमुना में छिपा था।

कान्हा बहुत छोटे थे, लेकिन मित्रों के जोर के कारण उन्होंने तय किया कि गेंद वो ही निकाल कर लाएंगे। कान्हा ने यमुना में छलांग लगा दी। सीधे तल में पहुंच गए। वहां कालिया नाग अपनी पत्नियों के साथ रह रहा था। कान्हा ने उसे यमुना छोड़कर सागर में जाने के लिए कहा, लेकिन वो नहीं माना और अपने विष से उन पर प्रहार करने लगा। कृष्ण ने कालिया नाग की पूंछ पकड़कर उसे मारना शुरू कर दिया। बहुत देर हो गई तो मित्रों को चिंता होने लगी। उन्हें गलती का एहसास हुआ और वे रोने-चिल्लाने लगे। कुछ दौड़ कर नंद-यशोदा और अन्य गोकुलवासियों को बुला लाए। यमुना के किनारे सभी चिल्लाने लगे।

यशोदा सहित सभी औरतें रोने लगीं। इधर, कृष्ण और कालिया नाग का युद्ध जारी था। भगवान ने उसके फन पर चढ़कर उसका सारा विष निकाल दिया। विषहीन होने और थक जाने पर कालिया नाग ने भगवान से हार मानकर उनसे माफी मांगी। भगवान कृष्ण ने उसे पत्नियों सहित सागर में जाने का आदेश दिया। खुद कालिया नाग भगवान को अपने फन पर सवार करके यमुना के तल से ऊपर लेकर आया। गोकुलवासियों को शांति मिली। कालिया नाग चला गया। यमुना को उसके विष से मुक्ति मिल गई।

लाइफ मैनेजमेंट- वास्तव में कालिया नाग प्रदूषण का प्रतीक है। हमारे देश की अधिकतर नदियां अभी भी प्रदूषण के जहर से आहत हैं। भगवान कृष्ण इस कथा के जरिए ये संदेश दे रहे हैं कि नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। अगर हम अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं तो इसका नुकसान भी हमें ही उठाना होगा। जैसे गोकुलवासियों ने विष के डर के कारण कालिया नाग को यमुना से भगाने का प्रयास नहीं किया तो उनके ही पशु उसके विष से मारे गए।

कृष्ण से सीखिए कैसी तैयारी हो युद्ध में जाने की?

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महाभारत युद्ध में भीष्म के तीरों की शय्या पर सो जाने के बाद गुरु द्रोणाचार्य को कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया गया। द्रोण को हराना मुश्किल होता जा रहा था और वो पांडवों की सेना को लगातार खत्म कर रहे थे। ऐसे में सभी पांडव भाई कृष्ण की शरण में आए। उन्होंने कृष्ण से पूछा कि गुरु द्रोण को कैसे रोका जाए? तब कृष्ण ने एक युक्ति सुझाई। उन्होंने कहा कि अवंतिका के राजपुत्रों विंद और अनुविंद की सेना में अश्वत्थामा नाम का हाथी है। उसे खोजकर मारा जाए और गुरु द्रोण तक ये संदेश पहुंचाया जाए कि अश्वत्थामा मारा गया।

अश्वत्थामा द्रोण के पुत्र का भी नाम था, जो उन्हें बहुत प्रिय था। भीम ने उस हाथी को खोजकर मार डाला और गुरु द्रोण के सामने चिल्लाने लगा कि मैंने अश्वत्थामा को मार दिया। गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर से पूछा तो उसने कहा कि अश्वत्थामा मरा है, वो हाथी है या नर, ये पता नहीं। इस पर गुरु द्रोण ध्यान लगाकर अपनी शक्ति से ये पता लगाने के लिए बैठे और धृष्टधुम्न ने उनको मार दिया।

लाइफ मैनेजमेंट- किसी भी युद्ध में जहां योद्धाओं के नाम याद रखना मुश्किल होता है, कृष्ण ने एक हाथी तक का नाम याद रखा। इसी तरह इस प्रतियोगी दुनिया में किसी भी तरह की जानकारी का होना अच्छा है, लेकिन उस जानकारी का सही उपयोग ही आपको सफल बना सकता है।

कृष्ण ने सिखाया हमेशा होना चाहिए ‘प्लान बी’

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एक बार की बात है। भगवान कृष्ण ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए बहुत दूर तक निकल गए। उन्हें भूख लगने लगी। आसपास कोई साधन नहीं था। उन्होंने ग्वालों से कहा कि पास ही एक यज्ञ का आयोजन हो रहा है। वहां जाओ और भोजन मांग कर ले आओ। ग्वालों ने वैसा ही किया। वे यज्ञ मंडप में गए और वहां भोजन की मांग की। ग्वालों ने कहा कि नंद पुत्र कृष्ण थोड़ी दूरी पर ठहरे हुए हैं, उन्हें भूख लगी है। थोड़ा भोजन दे दीजिए। यज्ञ का आयोजन कर रहे ब्राह्मणों ने भोजन देने से मना कर दिया। उनका मत था कि जब तक यज्ञ देवता को भोग न लग जाए तब तक किसी को भोजन नहीं दे सकते।

ग्वाले लौट आए। कृष्ण ने उनसे पूछा कि भोजन क्यों नहीं लाए तो ग्वालों ने ब्राह्मणों की बात उनसे कह दी। कृष्ण ने उनसे कहा एक बार फिर जाकर मांगो शायद इस बार भोजन मिल जाए। ग्वालों ने फिर वैसा ही किया, लेकिन फिर वही जवाब लेकर खाली हाथ लौट आए। भगवान ने कहा एक बार फिर जाओ। इस बार ब्राह्मणों से नहीं, उनकी पत्नियों से भोजन मांगना। ग्वालों ने कहा वे भी वही जवाब देंगी, जो उनके पतियों ने दिया है। कृष्ण ने कहा – नहीं, वे मुझे चाहती हैं, वे तुम्हें भोजन अवश्य देंगी। ग्वालों ने वैसा ही किया। ब्राह्मण की पत्नियों से कृष्ण के लिए भोजन मांगा तो वे तत्काल उनके साथ भोजन लेकर वहां आ गईं, जहां कृष्ण ठहरे थे।

सबने प्रेम से भोजन किया। ब्राह्मण पत्नियों ने कृष्ण को अपने हाथों से परोसा और भोजन कराया। ग्वाले इस बात से हैरान थे। भोजन करके सभी तृप्त हो गए। ये कहानी बहुत साधारण और छोटी है, लेकिन इसके पीछे का संदेश बहुत ही काम का है। कृष्ण ने ग्वालों को बार-बार भोजन लेने भेजा। आखिरी बार को छोड़कर हर बार निराशा ही हाथ लगी। कृष्ण कह रहे हैं कि व्यक्ति को कभी प्रयास करना नहीं छोडऩा चाहिए। सफलता के लिए लगातार प्रयास करते रहें, लेकिन अगर एक ही प्रयास में बार-बार असफलता मिले तो खुद की योजना पर भी विचार आवश्यक है।

लाइफ मैनेजमेंट- अगर एक ही दिशा में लगातार प्रयासों में असफलता मिल रही है तो अपने प्रयासों की दिशा भी बदल देनी चाहिए। किसी भी समस्या पर हमेशा दो नजरिये से सोचना चाहिए, अर्थात् आपके पास हमेशा दूसरा प्लान जरूर होना चाहिए।

बालकृष्ण की लिलाएं… बालपन में ही श्रीकृष्ण ने किन राक्षसों का वध कैसे किया था…

ब्रह्मांड के दर्शन 

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बाल लीला के अंतर्गत कृष्ण ने एक बार मिट्टी खा ली। बलदाऊ ने मां यशोदा से इसकी शिकायत की तो मां ने डांटा और मुंह खोलने के लिए कहा। पहले तो उन्होंने मुंह खोलने से मना कर दिया, जिससे यह पुष्टि हो गई कि वास्तव में कृष्ण ने मिट्टी खाई है। बाद में मां की जिद के आगे अपना मुंह खोल दिया। कृष्ण ने अपने मुंह में यशोदा को संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए। बचपन में गोकुल में रहने के दौरान उन्हें मारने के लिए आततायी कंस ने शकटासुर, बकासुर और तृणावर्तजैसे कई राक्षस भेजे, जिनका संहार कृष्ण ने खेल-खेल में कर दिया।

माखनचोर कन्हैया 

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माखनचोरी की लीला से कृष्ण ने सामाजिक न्याय की नींव डाली। उनका मानना था कि गायों के दूध पर सबसे पहला अधिकार बछड़ों का है। वह उन्हीं के घर से मक्खन चुराते थे, जो खानपान में कंजूसी दिखाते और बेचने के लिए मक्खन घरों में इकट्ठा करते थे। वैसे माखन चोरी करने की बात कृष्ण ने कभी मानी नहीं। उनका कहना था कि गोपीकाएं स्वयं अपने घर बुलाकर मक्खन खिलाती हैं। एक बार गोपिकाओं की उलाहना से तंग आकर यशोदा उन्हें रस्सी से बांधने लगीं। लेकिन वे कितनी भी लंबी रस्सी लातीं, छोटी पड़ जाती। जब यशोदा बहुत परेशान हो गईं तो कन्हैया मां के हाथों से बंध ही गए। इस लीला से उनका नाम दामोदर (दाम यानी रस्सी और उदर यानी पेट) पड़ा।

स्नान की मर्यादा 

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यमुना किनारे काली नाग का बड़ा आतंक था। उसके घाट में पानी इतना जहरीला था कि मनुष्य या पशु-पक्षी पानी पीते ही मर जाते थे। कृष्ण ने नाग को नाथ कर वहां उसे भविष्य में न आने की हिदायत दी। कृष्ण जब गाय चराने जाते, तो उनके सभी सखा साथ रहते थे। सब कृष्ण के कहे अनुसार चलते थे। ब्रह्मा जी को ईर्ष्या हुई और एक दिन सभी गायों को वे अपने लोक भगा ले गए। जब गाएं नहीं दिखीं तो गोकुलवासियों ने कृष्ण पर गायों चुराने का आरोप लगा दिया। कृष्ण ने योगमाया के बल पर सभी ग्वालों के घर उतनी ही गाएं पहुंचा दीं। ब्रह्मा ने जब यह बात सुनी तो बहुत लज्जित हुए। इंद्र पूजा का विरोध करते हुए सात वर्ष की आयु में सात दिन और सात रात गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली में उठाकर कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से गोकुल वासियों की रक्षा की। बाल लीला में ही कृष्ण ने एक बार नदी में निर्वस्त्र स्नान कर रहीं गोपिकाओं के वस्त्र चुराकर पेड़ में टांग दिए। स्नान के बाद जब गोपीकाओं को पता चला तो वे कृष्ण से मिन्नतें करने लगीं। कृष्ण ने आगाह करते हुए कहा कि नग्न स्नान से मर्यादा भंग होती है और वरुण देवता का अपमान होता है, वस्त्र लौटा दिए।

राक्षसों का वध कैसे किया था…

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पुतना का वध

बालकृष्ण ने सबसे पहले पुतना का उद्धार किया। पुतना के विषय में काफी लोग जानते भी हैं। वह कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। चूंकि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान ही हैं, अत: स्तनपान करते-करते ही उन्होंने पुतना का वध कर दिया।

तृणावर्त का वध

जब कंस को यह मालूम हुआ कि पुतना का वध हो गया है तो उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए तृणावर्त नामक राक्षस को भेजा। तृणावर्त बवंडर के रूप धारण करके बड़े-बड़े पेड़ों को भी उखाड़ सकता था। तृणावर्त बवंडर बनकर गया और उसने बालकृष्ण को भी अपने साथ उड़ा लिया। कृष्ण ने अब अपना भार बहुत बड़ा लिया, जिसे तृणावर्त भी संभाल नहीं पा रहा था। जब बवंडर शांत हुआ तो बालकृष्ण ने राक्षस का गला पकड़कर उसका वध कर दिया।

यमलार्जुन का उद्धार

माता यशोदा श्रीकृष्ण की शरारतों से परेशान हो गईं और उन्होंने कान्हा को ऊखल से बांध दिया, ताकि कृष्ण इधर-उधर न जा सके। जब माता यशोदा घर के दूसरों कामों में व्यस्त हो गई तब कृष्ण ऊखल को ही खींचने लगे। वहां आंगन में दो बड़े-बड़े वृक्ष भी लगे हुए थे, कृष्ण ने उन दोनों वृक्षों के बीच में ऊखल फंसा दिया और जोर लगाकर खींच दिया। ऐसा करते ही दोनों वृक्ष जड़ सहित उखड़ गए। वृक्षों के उखड़ते ही उनमें से दो यक्ष प्रकट हुए, जिन्हें यमलार्जुन के नाम से जाना जाता था।

ये दोनों यक्ष पूर्व जन्म कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे। इन दोनों ने एक बार देवर्षि नारद का अपमान कर दिया था, इस कारण देवर्षि ने वृक्ष बनने का शाप दे दिया था। श्रीकृष्ण ने वृक्षों को उखाड़कर इन दोनों यक्षों का उद्धार किया।

वत्सासुर का वध

जब कंस को मालूम हुआ कि कृष्ण ने पुतना के बाद तृणावर्त का भी वध कर दिया है तब उसने वत्सासुर को भेजा। वत्सासुर एक बछड़े का रूप धारण करके श्रीकृष्ण की गायों के साथ मिल गया। कान्हा उस समय गायों का चरा रहे थे। बालकृष्ण ने उस बछड़े के रूप में दैत्य को पहचान लिया और उसकी पूंछ पकड़ घुमाया और एक वृक्ष पर पटक दिया। यहीं उस दैत्य का वध हो गया।

बकासुर का वध

वत्सासुर के बाद कंस ने बकासुर को भेजा। बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए पहुंच गया। उस समय कान्हा और सभी बालक खेल रहे थे। तब बगुले ने कृष्ण को निगल लिया और कुछ ही देर बाद कान्हा ने उस बगुले को चीरकर उसका वध कर दिया।

अघासुर का वध

बकासुर के वध के बाद कंस ने कान्हा को मारने के लिए अघासुर को भेजा। अघासुर पुतना और बकासुर का छोटा भाई था। अघासुर बहुत ही भयंकर राक्षस था, सभी देवता भी उससे डरते थे। अघासुर ने कृष्ण को मारने के लिए विशाल अजगर का रूप धारण किया। इसी रूप में अघासुर अपना मुंह खोलकर रास्ते में ऐसे बन गया जैसे कोई गुफा हो। उस समय श्रीकृष्ण और सभी बालक वहां खेल रहे थे। एक बड़ी गुफा देखकर सभी बालकों ने उसमें प्रवेश करने का मन बनाया। सभी ग्वाले और कृष्ण आदि उस गुफा में घुस गए। मौका पाकर अघासुर ने अपना मुंह बंद कर लिया। जब सभी को अपने प्राणों पर संकट नजर आया तो श्रीकृष्ण से सबको बचाने की प्रार्थना करने लगे। तभी कृष्ण ने अपना शरीर तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया। अब कान्हा ने भी विशाल शरीर बना लिया था, इस कारण अघासुर सांस भी नहीं ले पा रहा था। इसी प्रकार अघासुर का भी वध हो गया।

कौन थे कृष्ण के पांच बड़े शत्रु

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भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कालनेमि विरोचन का पुत्र था। देवासुर संग्राम में कालनेमि ने भगवान हरि पर अपने सिंह पर बैठे ही बैठे बड़े वेग से त्रिशूल चलाया, पर हरि ने उस त्रिशूल को पकड़ लिया और उसी से उसको तथा उसके वाहन को मार डाला। अन्य कथा अनुसार युद्ध में उसने अनेक प्रकार की माया फैलाई और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। वर तारकामय में हरि के चक्र में मारा गया।

कंस ने मथुरा को भी अपने शासन के अधीन कर लिया था और वह प्रजा को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा। कंस की इस शक्ति का मुख्‍य कारण यह था कि उसे आर्यावर्त के तत्कालीन सर्वप्रतापी राजा जरासंध का सहारा प्राप्त था। जरासंध पौरव वंश का था और मगध के विशाल साम्राज्य का शासक था। जरासंध कंस का ससुर भी था।

कंस क्यों कृष्ण का शत्रु था? : कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था और शूरसेन के पुत्र वसुदेव का विवाह कंस की बहन देवकी से हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह रखता था, लेकिन एक दिन वह देवकी के साथ रथ पर कहीं जा रहा था, तभी आकाशवाणी सुनाई पड़ी- ‘जिसे तू चाहता है, उस देवकी का आठवां बालक तुझे मार डालेगा।’

इस भयंकर आकाशवाणी को सुनकर कंस भयभीत हो गया और उसने अपनी बहन को मारने के लिए तलवार निकाल ली। वसुदेव ने उसे जैसे-तैसे समझाकर शांत किया और वादा किया कि वे अपने पुत्र उसे सौंप देंगे।

पहला पुत्र होने पर जब वसुदेव कंस के पास पहुंचे तो कंस ने कहा कि मुझे तो आठवां बेटा चाहिए। बाद में नारद ने बताया कि तुम्हें मारने के लिए देवकी के उदर से स्वयं भगवान विष्णु जन्म लेंगे तो कंस और भयभीत हो गया और उसने वसुदेव और देवकी को कैद कर लिया। बाद में कंस ने एक-एक करके देवकी के 6 बेटों को जन्म लेते ही मार डाला।

7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। तदनंतर 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया। कृष्ण के जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सभी संतरी सो गए और जेल के दरवाजे अपने आप खुलते गए। वसुदेव मथुरा की जेल से शिशु कृष्ण को लेकर नंद के घर पहुंच गए।

बाद में कंस को जब पता चला तो उसने वसुदेव तथा देवकी को छोड़ दिया, लेकिन उसके मंत्रियों ने अपने प्रदेश के सभी नवजात शिशुओं को मारना प्रारंभ कर दिया। बाद में उसे कृष्ण के नंद के घर होने के पता चला तो उसने अनेक आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों से कृष्ण को मरवाना चाहा, पर सभी कृष्ण तथा बलराम के हाथों मारे गए।

तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया। वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की।

2- जरासंध

कंस के मारे जाने के बाद उसका ससुर जरासंध कृष्ण का कट्टर शत्रु बन गया। जरासंध मगध का अत्यंत क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है। जरासंध कंस का ससुर था।

पुराणों के अनुसार जरासंध के नाम का अर्थ भी उसके जन्म की कहानी में छुपा हुआ है। वह बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था।

कंस के मारे जाने के बाद शूरसेन जनपद के सिंहासन पर श्रीकृष्ण बैठे थे। जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद (मथुरा) पर एक बार नहीं, कई बार चढ़ाई की, लेकिन हर बार वह असफल रहा। पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासन कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया।

कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा।

उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले। वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज, शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग कोसल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज गंधार का राजा सुबल नग्नजित का मीर का राजा गोभर्द, दरद देश का राजा आदि। महाभारत युद्ध में भीम ने जरासंध के शरीर को 2 हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था।

3- कालयवन

यह जन्म से ब्राह्मण लेकिन कर्म से असुर था और अरब के पास यवन देश में रहता था। पुराणों में इसे म्लेच्छों का प्रमुख कहा गया है। कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था। गर्ग गोत्र के ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे।

उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की और उनसे एक अजेय पुत्र की मांग की। शिव ने कहा- ‘तुम्हारा पुत्र संसार में अजेय होगा। कोई अस्त्र-शस्त्र से हत्या नहीं होगी। सूर्यवंशी या चंद्रवंशी कोई योद्धा उसे परास्त नहीं कर पाएगा।’

वरदान प्राप्ति के पश्चात ऋषि शेशिरायण एक झरने के पास से जा रहे थे कि उन्होंने एक स्त्री को जल नहाते हुए देखा, जो अप्सरा रम्भा थी। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए और उनका पुत्र कालयवन हुआ। ‘रंभा’ समय समाप्ति पर स्वर्गलोक वापस चली गई और अपना पुत्र ऋषि को सौंप गई।

काल जंग नामक एक क्रूर राजा मलीच देश पर राज करता था। उसे कोई संतान न थी जिसके कारण वह परेशान रहता था। उसका मंत्री उसे आनंदगिरि पर्वत के बाबा के पास ले गया। बाबा ने उसे बताया की वह ऋषि शेशिरायण से उनका पुत्र मांग ले।

ऋषि शेशिरायण ने बाबा के अनुग्रह पर पुत्र को काल जंग को दे दिया। इस प्रकार कालयवन यवन देश का राजा बना। उसके समान वीर कोई न था। एक बार उसने नारदजी से पूछा कि वह किससे युद्ध करे, जो उसके समान वीर हो। नारदजी ने उसे श्रीकृष्ण का नाम बताया।

राम के कुल के राजा शल्य ने जरासंध को यह सलाह दी कि वे कृष्ण को हराने के लिए कालयवन से दोस्ती करें। कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण के लिए सब तैयारियां कर लीं। दूसरी ओर जरासंध भी सेना लेकर निकल गया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश कृष्ण के नाम संदेश भेजा और कालयवन को युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में संदेश भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं। कालयवन ने स्वीकार कर लिया।

अक्रूरजी और बलरामजी ने कृष्ण को इसके लिए मना किया, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कालयवन को शिव द्वारा दिए वरदान के बारे में बताया और यह भी कहा कि उसे कोई भी हरा नहीं सकता। श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि कालयवन राजा मुचुकुंद द्वारा मृत्यु को प्राप्त होगा।

एक बार इक्ष्वाकुवंशी मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद देवताओं की सहायता के लिए दानवों से युद्ध करने देवलोक पहुंच गए थे। उन्होंने देवताओं का साथ देकर और दानवों का संहार किया जिसके कारण देवता युद्ध जीत गए, तब इन्द्र ने उन्हें वर मांगने को कहा।

मुचुकुंद ने वापस पृथ्वीलोक जाने की इच्छा व्यक्त की, तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि पृथ्वी और देवलोक में समय का बहुत अंतर है जिस कारण अब वह समय नहीं रहा। अब तक तो तुम्हारे सभी बंधु-बांधव मर चुके हैं। उनके वंश का भी कोई नहीं बचा।

यह जानकर मुचुकुंद बहुत दु:खी हुए और वर मांगा कि उन्हें कलियुग के अंत तक सोना है। तब इन्द्र ने मुचुकुंद को वरदान दिया कि किसी धरती के निर्जन स्थान पर जाकर सो जाएं और यदि कोई तुम्हें उठाएगा तो तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जाएगा। इसी वरदान का प्रयोग श्रीकृष्ण कालयवन को मृत्यु देने के लिए करना चाहते थे।

श्रीकृष्ण और कालयवन का संघर्ष : जब कालयवन और कृष्ण में द्वंद्व युद्ध का जय हो गया तब कालयवन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा। श्रीकृष्ण तुरंत ही दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और कालयवन उन्हें पकडऩे के लिए उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा।

श्रीकृष्ण लीला करते हुए भाग रहे थे, कालयवन पग-पग पर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा।

उसे देखकर कालयवन ने सोचा, मुझसे बचने के लिए श्रीकृष्ण इस तरह भेष बदलकर छुप गए हैं:- ‘देखो तो सही, मुझे मूर्ख बनाकर साधु बाबा बनकर सो रहा है।’ उसने ऐसा कहकर उस सोए हुए व्यक्ति को कसकर एक लात मारी।

वह पुरुष बहुत दिनों से वहां सोया हुआ था। पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया। वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाए जाने से कुछ रुष्ट हो गया था।

उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गई और वह क्षणभर में जलकर राख का ढेर हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकुवंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद थे। इस तरह कालयवन का अंत हो गया।

4- शिशुपाल

शिशुपाल 3 जन्मों से श्रीकृष्ण से बैर-भाव रखे हुआ था। इस जन्म में भी वह विष्णु के पीछे पड़ गया। दरअसल, शिशुपाल भगवान विष्णु का वही द्वारपाल था जिसे कि सनकादि मुनियों ने शाप दिया था।

वे जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा अंतिम तीसरे जन्म में कंस और शिशुपाल बने। कृष्ण ने प्रण किया था कि मैं शिशुपाल के 100 अपमान क्षमा करूंगा अर्थात उसे सुधरने के 100 मौके दूंगा।

शिशुपाल का वध : एक बार की बात है कि जरासंघ का वध करने के बाद श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम इन्द्रप्रस्थ लौट आए, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारी करवा दी। उस यज्ञ के ऋतिज आचार्य होते थे।

यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेद व्यास, भारद्वाज, सुनत्तु, गौतम, असित, वशिष्ठ, च्यवन, कण्डव, मैत्रेय, कवष, जित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिन, क्रतु, पैल, पाराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतहोत्र, मधुद्वंदा, वीरसेन, अकृतब्रण आदि सभी को आमंत्रित किया। इसके अलावा सभी देशों के राजाधिराज को भी बुलाया गया।

यज्ञ पूजा के बाद यज्ञ की शुरुआत के लिए समस्त सभासदों में इस विषय पर विचार होने लगा कि सबसे पहले किस देवता की पूजा की जाए? तब सहदेवजी उठकर बोले- श्रीकष्ण ही सभी के देव हैं जिन्हें ब्रह्मा और शंकर भी पूजते हैं, उन्हीं को सबसे पहले पूजा जाए।

पांडु पुत्र सहदेव के वचन सुनकर सभी ने उनके कथन की प्रशंसा की। भीष्म पितामह ने स्वयं अनुमोदन करते हुए सहदेव का समर्थन किया। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने शास्त्रोक्त विधि से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आरंभ किया।

इस कार्य से चेदिराज शिशुपाल अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘हे सभासदों! मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कालवश सभी की मति मारी गई है। क्या इस बालक सहदेव से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति इस सभा में नहीं है, जो इस बालक की हां में हां मिलाकर अयोग्य व्यक्ति की पूजा स्वीकार कर ली गई है? क्या इस कृष्ण से आयु, बल तथा बुद्धि में और कोई भी बड़ा नहीं है? क्या इस गाय चराने वाल ग्वाले के समान कोई और यहां नहीं है? क्या कौआ हविश्यान्न ले सकता है? क्या गीदड़ सिंह का भाग प्राप्त कर सकता है? न इसका कोई कुल है, न जाति, न ही इसका कोई वर्ण है। राजा ययाति के शाप के कारण राजवंशियों ने इस यदुवंश को वैसे ही बहिष्कृत कर रखा है। यह जरासंघ के डर से मथुरा त्यागकर समुद्र में जा छिपा था। भला यह किस प्रकार अग्रपूजा पाने का अधिकारी है?’

इस प्रकार शिशुपाल श्रीकृष्ण को अपमानित कर गाली देने लगा। यह सुनकर शिशुपाल को मार डालने के लिए पांडव, मत्स्य, केकय और सृचयवर्षा नरपति क्रोधित होकर हाथों में हथियार ले उठ खड़े हुए, किंतु श्रीकृष्ण ने उन सभी को रोक दिया। वहां वाद-विवाद होने लगा, परंतु शिशुपाल को इससे कोई घबराहट न हुई। कृष्ण ने सभी को शांत कर यज्ञ कार्य शुरू करने को कहा।

किंतु शिशुपाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने फिर से श्रीकृष्ण को ललकारते हुए गाली दी, तब श्रीकृष्ण ने गरजते हुए कहा, ‘बस शिशुपाल! मैंने तेरे एक सौ अपशब्दों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की थी इसीलिए अब तक तेरे प्राण बचे रहे। अब तक सौ पूरे हो चुके हैं। अभी भी तुम खुद को बचा सकने में सक्षम हो। शांत होकर यहां से चले जाओ या चुप बैठ जाएं, इसी में तुम्हारी भलाई है।’

लेकिन शिशुपाल पर श्रीकृष्ण की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ अतः उसने काल के वश होकर अपनी तलवार निकालते हुए श्रीकृष्ण को फिर से गाली दी। शिशुपाल के मुख से अपशब्द के निकलते ही श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चला दिया और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर कटकर गिर गया। उसके शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गई।

वचन क्यों दिया था? : शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था। माता-पिता उससे घबराकर उसका परित्याग कर देना चाहते थे, लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा।

इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया। अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया। इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की।

श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया।

शिशुपाल क्यों करता था अपमान? : क्योंकि शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था और रुक्मणि के माता-पिता रुक्मणि का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्म ने शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं।

5- पौंड्रक

चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी की तट पर किरात, वंग, एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है।

राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों को एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।’

यह सुनकर, पौंड्रक कृष्ण के विरुद्ध युद्ध की तैयारी शुरू करने लगा। अपने मित्र काशीराज की सहायता प्राप्त करने के लिए यह काशीनगर गया। यह सुनते ही कृष्ण ने ससैन्य काशीदेश पर आक्रमण किया।

कृष्ण आक्रमण कर रहे हैं- यह देखकर पौंड्रक और काशीराज अपनी अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर आए। युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं यह गरूड़ पर आरूढ़ था।

नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपटरूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।

कृष्ण का सबसे बड़ा ‘रहस्य’… ‘निधिवन’

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बहुत रहस्यमयी है ये महल, यहां रोज आते हैं कृष्ण छोड़ जाते हैं निशानियां

  • यह स्थान वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर यमुना तट पर बसा निधिवन है। माना जाता है कि यह वही वन है जहां भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला का आयोजन किया था। इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो।
  • मान्यता है कि यह वृक्ष गोपियां हैं जो रात के समय मनुष्य रूप लेकर श्री कृष्ण के साथ रास का आनंद लेती हैं। इस वन की विशेषता है कि शाम ढ़लते ही सभी पशु-पक्षी वन से निकलकर भाग जाते हैं। इस वन के बीचों-बीच एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर में हर दिन भगवान की सेज सजाई जाती है और श्रृंगार साम्रगी रख दी जाती है।
  • मान्यता है कि देवी राधा श्रृंगार सामग्री से अपना श्रृंगार करती हैं और भगवान श्री कृष्ण देवी राधा के साथ सेज पर विश्राम करते हैं। अगले दिन भक्तगण इस श्रृंगार सामग्री और सिंदूर को प्रसाद स्वरूप पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं।

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वृंदावन और मथुरा का नाम आते ही दिल और दिमाग में सबसे पहले कृष्ण जी की सुंदर छवि आती है। मथुरा को कृष्ण की जन्म स्थली और नंदगांव को उनका लीला स्थल, बरसाने को राधा जी की नगरी कहा जाता है। वहीं वृंदावन को श्रीकृष्ण और राधा की रास स्थली कहा जाता है।वृंदावन में वैसे तो अनेक मंदिर हैं, लेकिन सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र यहां निधि वन को माना जाता है।

रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण?

  • धार्मिक नगरी वृंदावन में निधि वन एक बहुत ही रहस्यमयी स्थान है।
  • मान्यता है कि निधि वन में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा आज भी अद्र्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं।
  • रास के बाद निधि वन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं।

धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है।

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  • शयन के लिए पलंग लगाया जाता है… सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं।
  • निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है। निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके।

सुबह मिलती है गीली दातून

  • इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं। और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।
  • इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो।

ये है रंग महल की विशेषताएं- रंगमहल में रोज रात को श्रीकृष्ण और राधा के लिए पलंग लगाया जाता है। कहा जाता है कि रात्रि में श्रीकृष्ण और राधाजी आज भी यहां शयन शयन करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया था। साथ ही, श्रृंगार सामग्री भी बिखरी हुई मिलती है। रात को जो भोग रखा जाता है। वह भी अस्त-व्यस्त मिलता है।

निधिवन क्यों है खास- लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन को श्रीकृष्ण-राधा और गोपियों के रास क्षेत्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में अनेक वृक्ष हैं।

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इन सारे पेड़ों की खासियत है कि वृक्षों इनमें से किसी भी वृक्ष के तना सीधा नहीं मिलेगा।

इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी और आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि निधिवन का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16000 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16000 हजार रानियां हैं, लेकिन वास्तविकता में इन पेड़ों की संख्या इतनी नहीं है।

मंदिर से जुड़ी हैं कुछ अनोखी ही मान्यताएं- कोई माने या न माने, लेकिन यहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि निधिवन में हर रात आज भी राधा-कृष्ण आते हैं। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। मान्यता है कि रात में यदि कोई निधिवन में रह जाए तो श्रीकृष्ण की रासलीला देखकर वह अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते हैं। वे सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

निधिवन के रहस्य का असली कारण

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  • वास्तु गुरु कुलदीप सालूजा बताते हैं कि, सच तो यह है, कि निधिवन का वास्तु ही कुछ ऐसा है, जिसके कारण यह स्थान रहस्यमय-सा लगता है और इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने स्वार्थ के खातिर इस भ्रम तथा छल को फैलाने में वहां के पंडे-पुजारी और गाईड लगे हुए हैं, जबकि सच इस प्रकार है – अनियमित आकार के निधिवन के चारों तरफ पक्की चारदीवारी है। परिसर का मख्यद्वार पश्चिम दिशा में है।
  • परिसर का नऋत्य कोण बढ़ा हुआ है और पूर्व दिशा तथा पूर्व ईशान कोण दबा हुआ है। गाइर्ड जो 16000 वृक्ष होने की बात करते हैं वह भी पूरी तरह झूठ है क्योंकि परिसर का आकार इतना छोटा है कि 1600 वृक्ष भी मुश्किल से होंगे और छतरी की तरह फैलाव लिए हुए कम ऊँचाई के वृक्षों की शाखाएं इतनी मोटी एवं एवं मजबूत भी नहीं है कि दिन में दिखाई देने वाले बंदर रात्रि में इन पर विश्राम कर सकें इसी कारण वह रात्रि को यहाँ से चले जाते हैं।

इसलिए मिलती है गीली दातून

  • इस परिसर की चारदीवारी लगभग 10 फीट ऊंची है और बाहर के चारों ओर रिहायशी इलाका है जहां चारों ओर दो-दो, तीन-तीन मंजिला ऊँचे मकान बने हुए है और इन घरों से निधिवन की चारदीवार के अन्दर के भाग को साफ-साफ देखा जा सकता है। वह स्थान जहाँ रात्रि के समय रासलीला होना बताया जाता है वह निधिवन के मध्य भाग से थोड़ा दक्षिण दिशा की ओर खुले में स्थित है।
  • यदि सच में रासलीला देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा हो जाए या मर जाए तो ऐसी स्थिति में निश्चित ही आस-पास के रहने वाले यह इलाका छोड़कर चले गए हाते। निधिवन के अन्दर जो 15-20 समाधियां बनी हैं वह स्वामी हरिदास जी और अन्य आचार्यों की समाधियां हैं जिन पर उन आचार्यों के नाम और मृत्यु तिथि के शिलालेख लगे है। इसका उल्लेख निधिवन में लगे उत्तरप्रदेश पर्यटन विभाग के शिलालेख पर भी किया गया है।
  • इन्हीं समाधियों की आड़ में ही गाईड यह भम्र फैलाते है कि जो रासलीला देख लेता है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है और यह सभी उन्हीं की समाधियां हैं। रंगमहल के अन्दर जो दातून गीली और सामान बिखरा हुआ मिलता है। यह भ्रम इस कारण फैला हुआ है कि रंग महल के नैऋत्य कोण में रंग महल के अनुपात में बड़े आकार का ललित कुण्ड है जिसे विशाखा कुण्ड भी कहते हैं।
  • जिस स्थान पर नैऋत्य कोण में यह स्थिति होती है वहां इस प्रकार का भ्रम और छल आसानी से निर्मित हो जाता है। यहां जो वृक्ष आपस में गुंथे हुए हैं इसी प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में सेवाकुंज एवं यमुना के तटीय स्थानों पर भी देखने को मिलते है।

निधिवन के प्रसिद्घ होने के कारण

  • कुलदीप सालूजा कहते हैं कि, वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी स्थान की प्रसिद्धि के लिए उसकी उत्तर दिशा में नीचाई होना आवश्यक होता है और यदि इस नीचाई के साथ वहां पानी भी आ जाता है तो पानी प्रसिद्धि को बढ़ाने में बूस्टर की तरह काम करता है। विश्व में जो भी स्थान प्रसिद्धि प्राप्त किया हुआ है उसकी उत्तर दिशा में नीचाई के साथ-साथ भारी मात्रा में पानी का जमाव या बहाव अवश्य होता है।
  • यदि उत्तर दिशा के साथ पूर्व दिशा और ईशान कोण में नीचाई एवं पानी आ जाए तो यह सभी मिलकर उस स्थान को और अधिक प्रसिद्धि दिलाने के साथ-साथ आस्था बढ़ाने में भी सहायक होता है। यहां यमुना नदी वृंदावन की उत्तर दिशा से पूर्व दिशा की ओर घुमकर दक्षिण दिशा की ओर निकल गई है। वृंदावन की उत्तर दिशा में यमुना नदी के होने से वृन्दावन प्रसिद्ध है।
  • और निधिवन वृन्दावन नगर के उत्तरी भाग में स्थित है जहां से यमुना नदी लगभग 300 मीटर दूरी पर स्थित है। उत्तर दिशा की वास्तुनुकूलता के कारण निधिवन प्रसिद्ध है। इसी के साथ निधिवन परिसर को उत्तर ईशान, पूर्व ईशान और दक्षिण आग्नेय का मार्ग प्रहार हो रहा है। यह सभी शुभ मार्ग प्रहार है जो निधिवन परिसर की प्रसिद्धि बढ़ाने में सहायक हैं।

निधिवन में रात को कोई नहीं जाता

निधि शब्द का अर्थ सूरत क्रीड़ा से है। ग्रंथों के अनुसार निशातकाल में निधुवन के केलिकुंज में युगल (राधाकृष्ण) का शयन विलास होता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अ‌र्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है तथा प्रात: बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहा निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद (माखन मिश्री) भी ग्रहण किया है। रात्रि के समय निधिवन में कोई प्राणी नहीं रहता है, पशु-पक्षी भी नहीं। लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात्रि में रुक जाता है और भगवान की क्रीड़ा का दर्शन कर लेता है, तो सासारिक बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे उदाहरण विगत कई वर्षों में देखने में भी आये हैं।

विशाखा कुंड–

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निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल–

विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे, जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी। बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं।

स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है। जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

निधिवन कहने से सहसा किसी वन का दृश्य मस्तिष्क में आ जाता है, वास्तव में यहा आने पर वन जैसा ही दृश्य देखने को मिलते हैं, यहा के वृक्ष आज भी अपनी पौराणिकता को दर्शाते हैं। इन वृक्षों को देखने से आभास होता है कि यह अति प्राचीनकाल से स्थापित वृक्ष हैं। इस प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में निधिवन, सेवाकुंज एवं तटियस्थान पर ही देखने को मिलते हैं, इन वृक्षों की खासियत है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिल पायेंगे तथा इन वृक्षों की डालिया नीचे की ओर झुकी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि ये वृक्ष भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में हमेशा झुके रहते हैं। इन वृक्षों के बारे में शास्त्रों गोपी रूप से वर्णन किया गया है।

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इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी और आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि निधिवन का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16000 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16000 हजार रानियां हैं, लेकिन वास्तविकता में इन पेड़ों की संख्या इतनी नहीं है।

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मंदिर से जुुड़ी हैं कुछ अनोखी ही मान्यताएं

कोई माने या न माने, लेकिन यहां के स्थानीय लोग कहते हैं कि निधिवन में हर रात आज भी राधा-कृष्ण आते हैं। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। मान्यता है कि रात में यदि कोई निधिवन में रह जाए तो श्रीकृष्ण की रासलीला देखकर वह अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते हैं। वे सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है।

प्रेम का ही अद्वैत स्वरूप है कृष्ण का ‘महारास’

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सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ है। यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रीड़ा है , जो शृंगार और रस से पूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत के प्रेम व वासना से मुक्त है। इस रासलीला में वे अपने अंतरंग विशुद्ध भक्तों (जो उनकी निज रसरूपा राधा की सोलह हजार कायरूपा गोपियां हैं) के साथ शरत् की रात्रियों में विलास करते हैं। कृष्ण की इस रासलीला में दो धाराएं हैं , जो दोनों ओर से आती हैं और एकाकार हो जाती हैं। हर क्षण नया मिलन , नया रूप , नया रस और नई तृप्ति- यही प्रेम-रस का अद्वैत स्वरूप है और इसी का नाम रास है। श्रीमद्भागवत के दसवें भाग के 29 वें अध्याय के प्रथम श्लोक में लिखा है: ‘ भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमिलका! ‘ जो यह संकेत करता है कि भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में , इस मधुर रस लीला में शुद्ध जीव का ब्रह्म से विलासपूर्ण मिलन है , जिसमें लौकिक प्रेम व काम अंशमात्र भी नहीं है। शुद्ध जीव का अर्थ है- माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। इसीलिए गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व ‘ चीरहरण ‘ की लीला की थी। जीवात्मा का परमात्मा के सामने कोई पर्दा नहीं रह सकता। पर्दा माया में ही है। पर्दा होने से वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। चीर-हरण से गोपियों का उक्त मोह भंग हुआ। जीव का ब्रह्म से मिलन सहज नहीं होता। वह जब परमात्मा के निकट पहुंचता है , तब वे उससे पूछते हैं- मेरे पास क्यों आया है ? जैसे कृष्ण ने गोपियों से कहा- ‘ कहो , कैसे आना हुआ इस घोर रात्रि में ? अपने पति , पुत्र , सगे-सम्बन्धी , गुरु और प्रियजनों की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। तुम लौट जाओ अपने घर! ‘ गोपियां स्वर्ग-मोक्ष-काम आदि से रहित हैं। उन्होंने उत्तर दिया: ‘ पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद , याम: कथं ब्रजमधो करवाम किं वा।। ‘ ( श्रीमद्भागवत्- 10.29.34) अर्थात ‘( हे गोविन्द!) हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे ? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना वहां हम क्या करें ? तब कृष्ण ने अपने अंतिम प्रश्न में गोपियों को उनके संतान मोह की ओर इशारा करते हुए कहा: ‘ तो क्या तुम्हें अपने पुत्रों का भी मोह नहीं है ?’ गोपियों का उत्तर था- ‘ हे मोहन! आप में ही हमारा मोह सर्वोपरि है , क्योंकि पुत्रादि में भी आप ही स्थित हैं। ऐसी कौन सी वस्तु है , जो आपसे अलग है ? कृष्ण उनके प्रेम में रम गए और उनके साथ नृत्य करने लगे। नृत्य करते हुए कृष्ण ने महसूस किया कि गोपियों को उनके साथ नृत्य करने , उन्हें पा लेने का अभिमान होने लगा है। लेकिन कृष्ण और राधा के इस रास में जैसे दैहिक वासना की कोई जगह नहीं है , उसी तरह किसी अभिमान के लिए भी जगह नहीं है। गोपियों में व्याप्त अभिमान के इस भाव को दूर करने के लिए वे एकाएक उनके बीच से अर्न्तध्यान हो गए। ऐसे में गोपियां अपने प्रियतम को न देखकर स्वयं को भूल जाती हैं और कृष्णमयी होकर उन्हीं की पूर्व लीलाओं का अनुकरण करने में लीन हो जाती हैं। वे श्रीकृष्ण की चाल-ढाल , हास-विलास और चितवन आदि में उनके समान ही बनकर सुख पाती हैं। यह देख कर कृष्ण द्रवित हो जाते हैं और पुन: उनके बीच प्रकट हो कर कहते हैं , मैं तुम्हारे त्याग और प्रीति का ऋणी हूं और अनन्त जन्मों तक ऋणी बना रहूंगा। वे अपने हाथ आगे पसारते हुए कहते हैं- ‘ आओ , महारास करें! ‘ कृष्ण प्रत्येक दो गोपियों के बीच में प्रकट होकर सोलह हजार गोपियों के साथ नृत्य करने में लीन हो गए। सभी गोपियों के हाथ उनके हाथ में थे। यह महारास देखते-देखते ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता) सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं , फिर भी देह का भान भूलकर इस प्रकार क्रीड़ा करने से क्या व्यवस्था , शास्त्र और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा ? वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास , विलास नहीं , धर्म का फल है , यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे। गोपियां हैं कहां ? महारास प्रेम का अद्वैत स्वरूप है , जिसमें भगवत् स्वरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व नहीं रहता है।

आखिर क्यों, भगवान श्री कृष्ण को प्यारी हैं यह छह चीजें?

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बांसुरी भगवान श्री कृष्‍ण को अत्यंत प्रिय है, क्योंकि बांसुरी में तीन गुण है। पहला बांसुरी मं गांठ नहीं है। जो संकेत देता है कि अपने अंदर किसी भी प्रकार की गांठ मत रखो यानी मन में बदले की भावना मत रखो। दूसरा बिना बजाये यह बजती नहीं है। मानो बता रही है कि जब तक ना कहा जाए तब तक मत बोलो। और तीसरा जब भी बजती है मधुर ही बजती है। जिसका अर्थ हुआ जब भी बोलो, मीठा ही बोलो। जब ऐसे गुण किसी में भगवान देखते हैं, तो उसे उठाकर अपने होंठों से लगा लेते हैं। ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से देखें तो बांसुरी नकारात्मक उर्जा और कालसर्प के प्रभाव को दूर करता है। श्री कृष्ण की कुण्डली में भी कालसर्प योग था। इसलिए श्री कृष्ण का बांसुरी से स्नेह है।

कृष्ण को प्यारी है गाएं

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  • भगवान श्रीकृष्ण को गाय अत्यंत प्रिय है।
  • इसका कारण यह है कि गाय सब कार्यों में उदार तथा समस्त गुणों की खान है।
  • गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी, इन्हे पंचगव्य कहते हैं।
  • मान्यता है कि इनका पान कर लेने से शरीर के भीतर पाप नहीं ठहरता।
  • जो गौ की एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग का सुख भोगता है।

मोर से कृष्ण का स्नेह

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  • मोर को चिर-ब्रह्मचर्य युक्त प्राणी समझा जाता है।
  • अतः प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को समाहित करने के प्रतीक रूप में कृष्ण मोर पंख धारण करते हैं।
  • मोर मुकुट का गहरा रंग दुःख और कठिनाइयों, हल्‍का रंग सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • यह भी कालसर्प के अशुभ प्रभाव से बचाता है।

कमल से कृष्ण का प्रेम

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  • कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है।
  • इसलिए कमल पवित्रता का प्रतीक है। इसकी सुंदरता और सुगंध सभी का मन मोहने वाली होती है।
  • साथ ही कमल यह संदेश देता है कि हमें कैसे जीना चाहिए?
  • सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए इसका सरल तरीका बताता है कमल।

माखन मिसरी भाए गोपाल को

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  • कृष्ण को माखन मिसरी बहुत ही प्रिय है।
  • मिसरी का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि जब इसे माखन में मिलाया जाता है, तो उसकी मिठास माखन के कण-कण में घुल जाती है।
  • माखन के प्रत्येक हिस्से में मिसरी की मिठास समा जाती है।
  • मिसरी युक्त माखन जीवन और व्यवहार में प्रेम को अपनाने का संदेश देता है।
  • यह बताता है कि प्रेम में किसी प्रकार से घुल मिल जाना चाहिए।

कृष्ण को भाए वैजयंती माला

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  • भगवान के गले में वैजयंती माला है, जो कमल के बीजों से बनी हैं।
  • दरअसल, कमल के बीज सख्त होते हैं। कभी टूटते नहीं, सड़ते नहीं, हमेशा चमकदार बने रहते हैं।
  • इसका तात्‍पर्य है, जब तक जीवन है, तब तक ऐसे रहो जिससे तुम्हें देखकर कोई दुखी न हो।
  • दूसरा यह माला बीज है, जिसकी मंजिल होती है भूमि।
  • भगवान कहते हैं जमीन से जुड़े रहो, कितने भी बड़े क्यों न बन जाओ। हमेशा अपने अस्तित्व की असलियत के नजदीक रहो।

राधा-कृष्ण के प्रेम की एक अद्भूत कथा

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‘संकेत’ में हुआ था पहली बार, राधा-कृष्ण का मिलन

भगवान विष्णु के मानव अवतारों में श्री कृष्ण का रूप सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हजारों साल पहले जब मथुरा में इनका जन्म हुआ था तो वसुदेव जी इन्हें अपने मित्र नंदराय जी के पास नंद गांव में छोड़ आए।  नंद गांव से चार मील की दूर बसे बरसाना कस्बे में उन्हें राधाजी की आहट मिली। और बहुत कम लोगों को आज पता है कि पहली बार दोनों किशार रूप कहां मिले थे। बरसाना राधाजी की जन्मस्थली है तो मथुरा की जेल श्रीकृष्ण की। माना जाता है। इन दोनों क्षेत्रों के बीच में एक स्थान हैं “संकेत”। इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था। हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं। यह गांव छाता तहसील में पड़ता है।

  • कृष्ण ने जब मथुरा में अवतार लिया तो राधा का जन्म बरसाना में हुआ। कंस के कोप से बचाने के लिए कृष्ण के पिता ने उन्हें नंद गांव पहंचा दिया जहां से महज बरसाना गांव महज चार मील की दूरी पर था। जब राधा और कृष्ण कुछ बड़े हुए तो एक दिन बरसाना और नंद गांव के बीच में एक स्थान पर दोनों पहुंचे।
  • यहां पहली बार अवतार लेने के बाद राधा और कृष्ण का मिलन हो रहा था। एक दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। यहीं से राधा कृष्ण के प्रेम लीला की शुरूआत हुई। माना जाता है कि अवतार लेने से पहले ही राधा कृष्ण ने इस स्थान पर मिलने की योजना बनाई थी। इसलिए इस स्थान को ‘संकेत’ नाम से जाना जाता है।

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बरसाना और नंदगांव : राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण का प्रेम अटूट था। बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।

बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था। बरसाने से मात्र 4 मील पर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के सौतेले पिता नंदजी का घर था। होली के दिन यहां इतनी धूम होती है कि दोनों गांव एक हो जाते हैं। बरसाने से नंदगाव टोली आती है और नंदगांव से भी टोली जाती है।

कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को ‘लाड़ली’ कहा जाता है।

बरसाना गांव के पास दो पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते थे।

गौरतलब है कि मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियां किसी चमत्कार से खुल गई थीं, तब वासुदेवजी भगवान कृष्ण को नंदगांव में नंदराय के यहां आधी रात को छोड़ आए थे। कुछ मानते हैं कि वे मथुरा के पास गोकुल में यशोदा के मायके छोड़ आए थे, जहां से यशोदा उन्हें नंदगांव ले गईं।

नंद के घर लाला का जन्म हुआ है, ऐसी खबर धीरे-धीरे गांव में फैल गई। यह सुनकर सभी नंदगांववासी खुशियां मनाने लगे। कृष्ण ने नंदगांव में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों का वध किया। यहां के घाट और उसके पास अन्य मनोरम स्थल हैं, जैसे- गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट, रमणरेती आदि।

संकेत तीर्थ : कहते हैं कि राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात नंदगांव और बरसाने के बीच हुई। एक-दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। माना जाता है कि यहीं से राधा-कृष्ण के प्रेम की शुरुआत हुई। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है। उस वक्त कृष्ण की उम्र क्या रही होगी? यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है। इन दिनों लाड़ली मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्घालु आते हैं और राधा-कृष्ण के प्रथम स्थल पर आकर इनके शाश्वत प्रेम को याद करते हैं।

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वृंदावन से राधा-कृष्ण का क्या रिश्ता है?

वृंदावन कृष्ण लीलाओं का स्थल : वृंदावन मथुरा से 14 किलोमीटर दूर है। मथुरा कंस का नगर है, जहां यमुना तट पर बनी जेल से मुक्त कराकर वासुदेवजी कृष्ण को नंदगांव ले गए। मथुरा से नंदगांव 42 किलोमीटर दूर है। प्राचीन वृंदावन गोवर्धन के निकट था। बरसाना मथुरा से 50 किमी दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 किमी दूर उत्तर में स्थित है। नंदगांव तो बरसाने के बिलकुल पास है लेकिन वृंदावन से दूर।

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श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातियों के साथ नंदगांव से वृंदावन में आकर बस गए थे। विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है। यहां श्रीकृष्‍ण ने कालिया का दमन किया था।

रासलीला : मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है। कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने ही कविताएं लिखी हैं। उनमें कितनी सच्चाई है? इतिहासकार मानते हैं कि एक सच को इतना महिमामंडित किया गया कि अब वह कल्पनापूर्ण लगता है। कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।

विशाल तमाल वृक्ष के नीचे होता था महारास

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  • भगवान श्री कृष्ण और राधा अक्सर यमुना तट पर बांके बिहारी मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर बसे निधि वन में मिला करते थे।
  • इस स्थान पर भगवान ने महारास का आयोजन किया था।
  • इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऎसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो।
  • माना जाता है कि नृत्य मुद्रा में मौजूद वृक्ष गोपियां हैं हो हर रात मनुष्य रूप धारण कर कृष्ण संग रास का आनंद लेती हैं।

इसी वन में मौजूल तमाल का एक वृक्ष था जिसके करीब राधा कृष्ण मिलते थे। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद राधा इसी वृक्ष को कृष्ण समझकर इसका आलिंगन किया करती थी

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आज का हरियाणा पहले कुरूक्षेत्र हुआ करता था, इसमें जब राधा कृष्ण का मिलन हुआ था तब राधा अपने साथ वह वृक्ष लेकर कुरूक्षेत्र गई थी। कुरूक्षेत्र के ब्रह्म सरोवर के पास आज भी तमाल का वह वृक्ष मौजूद है। हालांकि कुरूक्षेत्र स्थान आज भी मौजूद है ब्रज से दूर।

जहां पर राधा ने कृष्ण को प्रेम की भिक्षा दी थी वह स्थान नंद गांव से कुछ दूरी पर स्थित जावट गांव है।

राधा का कृष्ण से विरह क्यों… पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणि का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थीं। राधाजी के जन्म में और देवी रुक्मणि के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणि का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणि से कृष्णजी की शादी हुई। राधा और रुक्मणि यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।

रामचरित मानस के बालकांड में जैसा कि तुलसीदासजी ने लिखा है कि नारदजी को यह अभिमान हो गया था कि उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है। नारदजी की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक नगर का निर्माण किया। उस नगर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर में नारद मुनि भी पहुंचे और कामदेव के बाणों से घायल होकर राजकुमारी को देखकर मोहित हो गए।

राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन करने लगे कि प्रभु मुझे आप अपना सुंदर रूप प्रदान करें, क्योंकि मुझे राजकुमारी से प्रेम हो गया है और मैं उससे विवाह की इच्छा रखता हूं। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान मुस्कुराए और कहा तुम्हें विष्णु रूप देता हूं। जब नारद विष्णु रूप लेकर स्वयंवर में पहुंचे तब उस राजकुमारी ने विष्णुजी के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से दु:खी होकर चले आ रहे थे। मार्ग में उन्हें एक जलाशय दिखा जिसमें उन्होंने चेहरा देखा तो वे समझ गए कि विष्णु भगवान ने उनके साथ छल किया है और उन्हें वानर रूप दिया है।

नारदजी क्रोधित होकर वैकुंठ पहुंचे और भगवान को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें पत्नी का वियोग सहना होगा, यह श्राप दिया। नारदजी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्रजी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का।

इस तरह राधा ही श्रीकृष्ण की प्रथम प्रेयसी

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“कुरूक्षेत्र तो थोडा सा दूर हतो, रास वृंदावन में रचतो” ऎसा कहते हैं ब्रज के ग्रामीण। देवी राधा भगवान श्री कृष्ण की प्रथम प्रेयसी थी। यही कारण है कि कृष्ण को रूक्मिणी से अधिक राधा प्रिय थीं। इनके प्रेम की एक अद्भूत कथा है कि कि एक बार कृष्ण रूक्मिणी के साथ कुरूक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने पहुंचे। वहां उनकी भेंट राधा और नंद बाबा से हुई। रूक्मिणी ने राधा का खूब स्वागत किया। रात के समय जब रूक्मिणी कृष्ण के पांव दबा रही थी तब उन्होंने देखा कि श्री कृष्ण के पांव में छाले पड़े हुए हैं। रूक्मिणी को बहुत हैरानी हुई क्योंकि कृष्ण नंगे पांव नहीं चलते फिर छाले कैसे पड़े। रूक्मिणी ने जब छाले का कारण पूछा तो कृष्ण ने कहा कि तुमने जो गर्म दूध राधा को दिया था उससे यह छाले हो गये हैं। कृष्ण ने रूक्मिणी से कहा कि राधा और कृष्ण अलग-अलग नहीं हैं। राधा कृष्ण की आत्मा हैं और हमेशा ह्वदय निवास करती हैं।

एक बार राधा की ओर से सांसारिक विवाह करने की इच्छा प्रकट करने पर कृष्ण ने राधा को भी यही उत्तर दिया था कि राधा और कृष्ण अलग-अलग नहीं हैं अत: सांसारिक विवाह कैसे कर सकते हैं। विवाह दो अलग-अलग लोगों के बीच होता है। यही कारण है कि राधा और कृष्ण का अलौकिक विवाह हुआ था। इन दोनों का सांसारिक विवाह नहीं हुआ।

राधा की कृष्ण से एक और मुलाकात…

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कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेमभाव में और भी वृद्धि हुई। जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलता और दुर्लभ हो गया। राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं। राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थी। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है।

कृष्ण से पहले इसलिए लिया जाता है राधा का नाम

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भगवान श्री कृष्ण के नाम से पहले हमेशा भगवती राधा का नाम लिया जाता है। कहते हैं कि जो व्यक्ति राधा का नाम नहीं लेता है सिर्फ कृष्ण-कृष्ण रटता रहता है वह उसी प्रकार अपना समय नष्ट करता है जैसे कोई रेत पर बैठकर मछली पकड़ने का प्रयास करता है। श्रीमद् देवीभाग्वत् नामक ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि जो भक्त राधा का नाम लेता है भगवान श्री कृष्ण सिर्फ उसी की पुकार सुनते हैं। इसलिए कृष्ण को पुकारना है तो राधा को पहले बुलाओ। जहां श्री भगवती राधा होंगी वहां कृष्ण खुद ही चले आएंगे।

पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि राधा उनकी आत्मा है। वह राधा में और राधा उनमें बसती है। कृष्ण को पसंद है कि लोग भले ही उनका नाम नहीं लें लेकिन राधा का नाम जपते रहें। इस नाम को सुनकर भगवान श्री कृष्ण अति प्रसन्न हो जाते हैं। इसका उल्लेख श्री कृष्ण जी ने नारद से किया है। इस संदर्भ में कथा है कि व्यास मुनि के पुत्र शुकदेव जी तोता बनकर राधा के महल में रहने लगे। शुकदेव जी हमेशा राधा-राधा रटा करते थे। एक दिन राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से तुम सिर्फ कृष्ण-कृष्ण नाम जपा करो। शुकदेव जी ऐसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोता भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे।

राधा की सखी सहेलियों पर भी कृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था। एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी नारद जी बीच आ गए। कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है। कृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है।

कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा की आंखें भर आईं। महल लौटकर राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा-राधा ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का। राधा कृष्ण की तरह सीता का नाम भी राम से पहले लिया जाता है। असल में राम और कृष्ण दोनों ही एक हैं और राधा एवं सीता भी एक हैं। यह हमेशा नित्य और शाश्वत हैं। क्योंकि यही लक्ष्मी और नारायण रूप से संसार का पालन करते हैं। नारायण लक्ष्मी से अगाध प्रेम करते हैं। यह हमेशा अपने हृदय में बसने वाली राधा का नाम सुनना चाहते हैं। इसलिए ही कृष्ण नाम से पहले राधा नाम लिया जाता है।

इन पर्वतों पर गोपियों के साथ कृष्ण करते थे रासलीला, मौजूद हैं पैरों के निशान

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कृष्ण की बांसुरी की धुन पर सिर्फ ब्रज की गोपियां ही फिदा नहीं थीं, ये पहाड़-पर्वत भी उनकी बांसुरी की धुन पर मोहित थे। यहां कृष्ण अपने सखाओं के साथ गाय भी चराने जाते थे। इस दौरान वहां घंटों बैठकर बांसुरी बजाया करते थे। इसकी धुन इतनी मीठी और मोहक होती थी कि ये पर्वत भी पिघल जाते थे। यहां मौजूद उनके पैरों के निशान इस बात की तस्दीक करते हैं।

पांच हजार साल पुराने हैं ये पर्वत- ब्रज रक्षक दल के विनीत नारायण कहते हैं कि ये पहाड़-पर्वत करीब पांच हजार साल पुराने हैं। इतने साल बाद भी यहां भगवान कृष्ण के पैरों के निशान साफ तौर पर दिखाई देते हैं। नंदगांव में स्थित ‘चरण पहाड़ी’ बाल स्‍वरूप कृष्‍ण की लीला की गवाह है। यहां कृष्ण के आलता लगे पैरों के निशान आज भी मौजूद हैं।

देवताओं ने जताई थी रासलीला देखने की इच्छा- ब्रज के नंदगांव में कृष्ण ने कई लीलाएं की थी। इन पहाड़-पर्वतों के पास वह गोपियों के साथ रास भी रचाते थे। एक बार सभी देवताओं ने भगवान कृष्‍ण से रासलीला देखने की इच्‍छा जताई। इस पर उन्होंने कहा कि सिर्फ गोपियां ही उनकी रासलीला देख सकती हैं। यदि आप लोगों को रासलीला देखनी है, तो ब्रज में जाकर पर्वत बन जाइए। जब वह गोपियों के साथ रासलीला करेंगे, तो आप उसको देख सकेंगे।

पर्वत बनकर देवताओं ने देखी रासलीला- इसके बाद देवताओं ने पर्वतों का रूप धारण कर लिया। उन्होंने कृष्ण की रासलीला देखी। कहा जाता है कि रासलीला करते वक्त उनके पैरों के निशान यहां पड़े थे। इसलिए इनमें से एक पर्वत को अब ‘चरण पहाड़ी’ के रूप में जाना जाता है।

यहां राधा ने कृष्ण को स्पर्श करने से किया था मना, अपने कंगन से बना दिया था कुंड

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कृष्ण कुंड की कथा- माना जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे राक्षस अरिष्टासुर का वध कर दिया। उसके बाद उन्होंने राधा को स्पर्श कर लिया। तब राधा जी उनसे कहने लगी की आप कभी मुझे स्पर्श मत कीजिएगा, क्योंकि आपके सिर पर गौ हत्या का पाप है। आपने मुझे स्पर्श कर लिया है और मैं भी गौ हत्या के पाप में भागीदार बन गई हूं। यह सुनकर श्रीकृष्ण को राधाजी के भोलेपन पर हंसी आ गई। उन्होंने कहा राधे मैंने बैल का नहीं, बल्कि असुर का वध किया है।

तब राधाजी बोलीं आप कुछ भी कहें, लेकिन उस असुर का वेष तो बैल का ही था। इसलिए आपको गौ हत्या के पापी हुए। यह बात सुनकर गोपियां बोली प्रभु जब वत्रासुर की हत्या करने पर इन्द्र को ब्रह्मा हत्या का पाप लगा था तो आपको पाप क्यों नहीं लगेगा। श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले अच्छा तो आप सब बताइए कि मैं इस पाप से कैसे मुक्त हो सकता हूं। तब राधाजी ने अपनी सखियों के साथ श्रीकृष्ण से कहा जैसा कि हमने सुना है कि सभी तीर्थों में स्नान के बाद ही आप इस पाप से मुक्त हो सकते हैं।

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपने पैर को अंगूठे को जमीन की ओर दबाया। पाताल से जल निकल आया। जल देखकर राधा और गोपियां बोली हम विश्वास कैसे करें कि यह तीर्थ की धाराओं का जल है। उनके ऐसा कहने पर सभी तीर्थ की धाराओं ने अपना परिचय दिया। इस तरह कृष्ण कुंड का निर्माण हुआ।

राधा कुंड की कथा – जब श्रीकृष्ण ने राधाजी और गोपियों को उस कुंड में स्नान करने को कहा तो वे कहने लगीं कि हम इस गौ हत्या लिप्त पाप कुंड में क्यों स्नान करें। इसमें स्नान करने से हम भी पापी हो जाएंगे। तब श्री राधिका ने अपनी सखियों से कहा कि सखियों हमें अपने लिए एक मनोहर कुंड तैयार करना चाहिए। उस कृष्ण कुंड की पश्चिम दिशा में वृष भासुर के खुर से बने एक गड्ढे को श्री राधिका ने खोदना शुरु किया। गीली मिट्टी को सभी सखियों और राधाजी ने अपने कंगन से खोदकर एक दिव्य सरोवर तैयार कर लिया।

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कृष्ण जी ने राधा जी से कहा तुम मेरे कुंड से अपने कुंड में पानी भर लो। तब राधा जी ने भोलेपन से कहा नहीं कान्हा आपके सरोवर का जल अशुद्ध है। हम घड़े-घड़़े करके मानस गंगा के जल से इसे भर लेंगे। राधा जी और सखियों ने कुंड भर लिया, लेकिन जब बारी तीर्थों के आवाहन की आई तो राधा जी को समझ नहीं आया वे क्या करें। उस समय श्रीकृष्ण के कहने पर सभी तीर्थ वहां प्रकट हुए और राधाजी से आज्ञा लेकर उनके कुंड में विद्यमान हो गए। यह देखकर राधा जी कि आंखों से आंसू आ गए और वे प्रेम से श्रीकृष्ण को निहारने लगी।

भगवान कृष्ण की 16108 पत्नियों का राज…

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कहते हैं कि भगवान कृष्ण की 16,108 पत्नियां थीं। क्या यह सही है? इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं और लोगों में इसको लेकर जिज्ञासा भी है। आइए, जानते हैं कि कृष्ण की 16,108 पत्नियां होने के पीछे राज क्या है।

महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा।

पांडवों के लाक्षागृह से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर सात्यिकी आदि यदुवंशियों को साथ लेकर श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ गए। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुंती ने उनका आतिथ्‍य-पूजन किया।

इस प्रवास के दौरान एक दिन अर्जुन को साथ लेकर भगवान कृष्ण वन विहार के लिए निकले। जिस वन में वे विहार कर रहे थे वहां पर सूर्य पुत्री कालिन्दी, श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया।

फिर वे एक दिन उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाए। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एकसाथ नाथ कर उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात उनका कैकेय की राजकुमारी भद्रा से विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा भी कृष्ण को चाहती थी, लेकिन परिवार कृष्ण से विवाह के लिए राजी नहीं था तब लक्ष्मणा को श्रीकृष्ण अकेले ही हरकर ले आए।

इस तरह कृष्ण की आठों पत्नियां थी- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।

कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।

इंद्र ने कहा, भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दरी कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।

इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।

मुर दैत्य के वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।

इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर के द्वारा हरण कर लाई गईं 16,100कन्याओं को श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया।

ये सभी अपहृत नारियां थीं या फिर भय के कारण उपहार में दी गई थीं और किसी और माध्यम से उस कारागार में लाई गई थीं। वे सभी भौमासुर के द्वारा पीड़ित थीं, दुखी थीं, अपमानित, लांछित और कलंकित थीं।

सामाजिक मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रपूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहती थीं।

भागवत पुराण में बताया गया है कि भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को समुद्र से निकाला था। इसके बाद भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पिता एक दैवीशक्ति और माता पुण्यात्मा होने पर भी पर भौमासुर क्रूर निकला। वह पशुओं से भी ज्यादा क्रूर और अधमी था। उसकी करतूतों के कारण ही उसे नरकासुर कहा जाने लगा।

नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर इंद्र को उसकी नगरी से बाहर निकाल दिया था। नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे। वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था। वह पृथ्वी की हजारों सुन्दर कन्याओं का अपहरण कर उनको बंदी बनाकर उनका शोषण करता था।

नरकासुर अपने मित्र मुर और मुर दैत्य के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण के साथ रहता था। भगवान कृष्ण ने सभी का वध करने के ‍बाद नरकासुर का वध किया और उसके एक पु‍त्र भगदत्त को अभयदान देकर उसका राजतिलक किया।

श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने लगी। मान्यता है कि नरकासुर की मृत्यु होने से उस दिन शुभ आत्माओं को मुक्ति मिली थी।

नरक चौदस के दिन प्रातःकाल में सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर नीम, चिचड़ी जैसे कड़ुवे पत्ते डाले गए जल से स्नान का अत्यधिक महत्व है। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने घरों के दरवाजों पर चौदह दीये जलाकर दक्षिण दिशा में उनका मुख करके रखते हैं तथा पूजा-पाठ करते हैं।

फिल्मों में कृष्ण

श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम

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यदि भारतीय फिल्म के नायकों की भूमिका को गौर से देखा जाए तो वह काफी कुछ श्रीकृष्ण से मिलती-जुलती है। कृष्ण की तरह बॉलीवुड की फिल्मों का नायक गोपियों से रास लीला रचाता है। अन्याय के विरूद्ध लड़ता है। लाचारों का साथ देता है और दुश्मनों को उनके किए की सजा देता है।

भारत में जब से फिल्म बनना शुरू हुई तब से कुछ वर्ष पूर्व तक बॉलीवुड की फिल्मों में ऐसे ही नायक हुआ करते थे। कई फिल्मों के नायक या नायिकाओं में हमें श्रीकृष्ण, राधा या मीरा की झलक मिलती थी।

आज परिस्थिति बदल गई है। अब नायक खलनायक बन गया है। वह तमाम ऐसी हरकतें करता हैं जो एक नायक नहीं करता। उसमें कृष्ण के बजाय कंस के गुण पाए जाते हैं।

इसी तरह नायिका में राधा या मीरा की झलक दिखाई देना बंद हो गई। अब कृष्ण नाम का उपयोग दूसरे अर्थ में किया जाने लगा है। घर में राम गली में श्याम जैसे मुहावरे गढ़ लिए गए हैं। श्रीकृष्ण की छबि फिल्मों से ओझल होती जा रही है।

श्रीकृष्ण पर आधारित फिल्मों की शुरूआत फालके के जमाने से हुई थी। दादा साहेब फालके ने अपनी शुरूआती फिल्मों में पौराणिक विषय चुने थे ताकि दर्शकों की फिल्म में रूचि जागे। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में काफी उथल-पुथल रही। इसलिए फालके की शुरूआती फिल्म ‘बर्थ ऑफ श्रीकृष्णा’ (1918) और ‘कालिया मर्दन’ (1919) श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित रही। इन फिल्मों में उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन की झलकियों को प्रस्तुत किया।

कई मूक फिल्मों के विषय श्रीकृष्ण के जीवन के इर्दगिर्द रहें। बाद में फिल्म वालों ने श्रीकृष्ण के जीवन को आधार बनाकर कई फिल्मों का निर्माण किया। कृष्ण अर्जुन युद्ध (1934), कृष्ण-सुदामा (1947), कृष्ण रूक्मणि (1949), से जो सिलसिला चला तो वह ‘कृष्णा’ (2006) तक जारी है। ‘किस्ना’ और कृष’ जैसी फिल्में भी कृष्ण के नाम पर ही बनाई गई। कुछ एनिमेशमन मूवी भी आईं।

इसी तरह फिल्मी गानों में भी श्रीकृष्ण की गूँज वर्षों तक छाई रहीं। कई ऐतिहासिक फिल्मों में श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों और भजनों की रचना हुई। तब नायक आदर्श हुआ करते थे। फिल्में पारिवारिक हुआ करती थी। दर्शकों में श्रद्धा और आस्था जैसे गुण विद्यमान थे। इसलिए फिल्मकारों को ऐसी सिचुएशन मिल जाया करती थी कि वे श्रीकृष्ण पर आधारित गीतों को रचे।

 ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’ (मुगले आजम), ‘जागो मोहन प्यारे’ (जागते रहो), ‘श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम’ (गीत गाता चल), ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ (कोहिनूर), ‘एक राधा एक मीरा’ (राम तेरी गंगा मैली), ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला’ (सत्यम शिवम सुंदरम), ‘मैया यशोदा ये तेरा कन्हैया’ (हम साथ साथ हैं) ‘राधा कैसे न जले’ (लगान) जैसे गीत आज भी बड़े चाव से चुने जाते हैं।

आजकल न इस तरह की फिल्म बनती है और न ही इस तरह के गीत रखने की सिचुएशन। आज इस तरह का गीत रख दिया जाए तो दर्शक पॉपकार्न खाने बाहर चला जाता है। कृष्णा के कभी-कभार दर्शन होते हैं, लेकिन कृष की तरह हाईटेक रूप में।

यशोमती मैया से बोले नन्दलाला:

https://www.youtube.com/watch?v=tJmzQ-qtsYk

बल्फ मास्टर-गोविंदा आला रे आला:

https://www.youtube.com/watch?v=Z60TE_JDsJE

तीन बाती वाला गोविंदा आला:

https://www.youtube.com/watch?v=K4ffY9IH9ng

मच गया शोर सारी नगरी में:

https://www.youtube.com/watch?v=Gbd4wZIEOD4

शोर मच गया शोर देखो आया माखन चोर:

https://www.youtube.com/watch?v=Zgu6KY5WSmA

आया रे गोंविदा:

https://www.youtube.com/watch?v=CgZ33uH6NP8

मोहे छेड़ो ना:

https://www.youtube.com/watch?v=HaEiuS0vUFE

हर तरफ है ये शोर आया गोकुल का चोर:

https://www.youtube.com/watch?v=7ggZupQt0dc

श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी को जानने के लिए 28 अगस्त 2013 का ब्लॉग पर रिसर्च पड़ सकते हैं…

Ancient City of Dwarka: श्रीकृष्ण की ‘द्वारका’… द्वारका का पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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8 Responses to कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की…

  1. v4vikey says:

    Reblogged this on Wallpaper Tadka and commented:
    As stated in the Bhagavad-gītā, the Lord says that His appearance, birth, and activities, are all transcendental, and one who understands them factually becomes immediately eligible to be transferred to the spiritual world. The Lord’s appearance or birth is not like that of an ordinary man who is forced to accept a material body according to his past deeds. The Lord’s appearance is explained in the Second Chapter: He appears out of His own sweet pleasure. When the time was mature for the appearance of the Lord, the constellations became very auspicious. The astrological influence of the star known as Rohiṇī was also predominant because this star is considered to be very auspicious. Rohiṇī is under the direct supervision of Brahmā. According to the astrological conclusion, besides the proper situation of the stars, there are auspicious and inauspicious moments due to the different situations of the different planetary systems. At the time of Kṛṣṇa’s birth, the planetary systems were automatically adjusted so that everything became auspicious.

  2. Hathi ghoda palki… Jai kanahiyalal ki 🙂

  3. Rahul says:

    बेहतरीन शोध है, कृष्ण पर, एक जगह पर इतनी चीजें एक साथ मिल गई… धन्यवाद

  4. Pingback: कृष्ण जन्माष्टमी: दही-हांडी उत्‍सव… जानिए कैसे हुई परम्परा की शुरुआत… | कीबोर्ड के पत्रकार

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