तिरंगा- ये आन तिरंगा है, ये शान तिरंगा है, मेरी जान तिरंगा है

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  • प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। क्या आपको पता है कि हमारा तिरंगा कैसे बना? तिरंगा जो वर्तमान रुप में है अस्तित्व में आने से पहले कई बार बनाया गया था। कभी इसमें सूरज, चांद और तारे को, तो कभी इसमें ब्रिटेन के यूनियन जैक जोड़ा गया। लेकिन वर्तमान तिरंगा 1931 में देश के सामने आया था। 1931 में कांग्रेस ने कराची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। उस समय तिरंगे के बीच अशोक चक्र नहीं चरखा हुआ करता था। 22 जुलाई 1947 को भारतीय संविधान सभा की बैठक हुई, इसमें तिरंगे को आजाद भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया, जिसके बीच में अशोक चक्र था।
  • भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की अभिकल्पना 1916 में पिंगली वैंकैया ने की थी। आंध्र प्रदेश में जन्मे पिंगली वेंकैया ने ही सबसे पहले देश का खुद का राष्ट्रीय ध्वज होने की आवश्यकता पर बल दिया था। 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पिंगली वैंकया महात्मा गांधी से मिले थे और उन्हें अपने द्वारा डिज़ाइन लाल और हरे रंग से बनाया हुआ झंडा दिखाया। गांधी जी ने उन्हें इस ध्वज के बीच में अशोक चक्र रखने की सलाह दी जो संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बाँधने का संकेत बने। दिसंबर 1923 में काकीनाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने दो रंग वाले झंडे का प्रयोग किया जिसके बीचों-बीच चरखा था। उनका यह विचार गांधी जी को बहुत पसन्द आया। गांधी जी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप तैयार करने का सुझाव दिया।
  • अखिल भारतीय संस्कृत कांग्रेस ने सन् 1924 में ध्वज में केसरिया रंग और बीच में गदा डालने की सलाह इस तर्क के साथ दी कि यह हिंदुओं का प्रतीक है। फिर इसी क्रम में किसी ने गेरुआ रंग डालने का विचार इस तर्क के साथ दिया कि ये हिन्दू, मुसलमान और सिख तीनों धर्म को व्यक्त करता है। काफ़ी तर्क वितर्क के बाद भी जब सब एकमत नहीं हो पाए तो सन् 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को मूर्त रूप देने के लिए 7 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई। इसी साल कराची कांग्रेस कमेटी की बैठक में पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार ध्वज, जिसमें केसरिया, श्वेत और हरे रंग के साथ केंद्र में अशोक चक्र स्थित था, को सहमति मिल गई। इसी ध्वज के तले आज़ादी के परवानों ने कई आंदोलन किए और 1947 में अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज़ादी की घोषणा से कुछ दिन पहले फिर कांग्रेस के सामने ये प्रश्न आ खड़ा हुआ कि अब राष्ट्रीय ध्वज को क्या रूप दिया जाए इसके लिए फिर से डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई और तीन सप्ताह बाद 14 अगस्त को इस कमेटी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज के रूप में घोषित करने की सिफ़ारिश की। 15 अगस्त 1947 को तिरंगा हमारी आज़ादी और हमारे देश की आज़ादी का प्रतीक बन गया।
  • भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

तिरंगे का सफर

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यह जानना अत्‍यंत रोचक है कि हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्‍वतंत्रता के राष्‍ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्‍यता दी गई। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्‍ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है। हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:

पहला ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।

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1906 में भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज

दूसरा ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

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1907 में भीका‍जीकामा द्वारा फहराया गया बर्लिन समिति का ध्‍वज

तीसरा ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

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इस ध्‍वज को 1917 में गघरेलू शासन आंदोलन के दौरान अपनाया गया

चौथा ध्‍वज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वेंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।

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इस ध्‍वज को 1921 में गैर अधिकारिक रूप से अपनाया गया

पांचवा ध्‍वज वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।

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इस ध्‍वज को 1931 में अपनाया गया। यह ध्‍वज भारतीय राष्‍ट्रीय सेना का संग्राम चिन्‍ह भी था।

छठा- राष्ट्रीय ध्वज 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

भारत का वर्तमान तिरंगा ध्‍वज

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महात्‍मा गांधी- “सभी राष्‍ट्रों के लिए एक ध्‍वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्‍यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप होगा। ध्‍वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्‍व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्‍वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्‍लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्‍द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।”  “हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्‍यूस, पारसी और अन्‍य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्‍वज को मान्‍यता दें और इसके लिए मर मिटें।”

एक तिरंगा और लहराया था- वो फहराया था नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने

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30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर तिरंगा लहराया था। इस तिरंगे के बीच अशोक चक्र नहीं बल्कि शेर था।

कैस मिला हमें हमारा तिरंगा

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* सन्‌ 1921 में गांधी जी द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के लिए इस झंडे की पेशकश की गई।

* सन्‌ 1931 में कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के लिए पारित स्वराज झंडा।

* सन्‌ 1947 से इस ध्वज को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया गया।

  • पं. नेहरू ने बड़ा मार्मिक भाषण भी दिया तथा सभी माननीय सदस्यों के समक्ष दो स्वरूप- एक रेशमी खादी व दूसरा सूती खादी से बना- प्रस्तुत किए। सभी ने करतल ध्वनि के साथ स्वतंत्र भारत के राष्ट्रध्वज को स्वीकार किया।
  • इससे पहले 23 जून, 1947 को ध्वज को आकार देने के लिए एक अस्थायी समिति का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष थे डॉ. राजेन्द्रप्रसाद तथा समिति में उनके साथ थे मौलाना अबुल कलाम आजाद, के.एम. पणिक्कर, श्रीमती सरोजिनी नायडू, के.एम. मुंशी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और डॉ. बी.आर. आम्बेडकर। विस्तृत विचार-विमर्श के बाद स्पष्ट निर्णय लिया गया।
  • रंग-रूप, आकार, मान-सम्मान, फहराने आदि के बारे में मानक तय किए गए। अंततः 18 जुलाई 1947 को अंतिम निर्णय हो गया और संविधान सभा में स्वीकृति प्राप्ति हेतु पं. जवाहरलाल नेहरू को अधिकृत किया, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में एक आवाज में सभी ने राष्ट्रीय ध्वज को अपना लिया।
  • 21 फीट लंबाई और 14 फीट चौड़ाई। यह राष्ट्रध्वज का सबसे बड़ा आकार है जो मानक आकारों में शामिल है लेकिन उस समय इस आकार के ध्वज को कहीं फहराया नहीं गया था। क्योंकि आजादी के समय न तो इतने विशाल भवन थे और न इतना बड़ा कहीं दंड था कि इस ध्वज को फहराया जा सके।

14 अगस्त 1947 की रात 10.45 पर काउंसिल हाउस के सेंट्रल हॉल में श्रीमती सुचेता कृपलानी के नेतृत्व में ‘वंदे मातरम्‌’ के गायन से कार्यक्रम शुरू हुआ।

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संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व पं. जवाहरलाल नेहरू के भाषण हुए। इसके पश्चात्‌ श्रीमती हंसाबेन मेहता ने अध्यक्ष राजेन्द्रप्रसाद को मेरा सिल्क वाला स्वरूप सौंपा और कहा कि आजाद भारत में पहला राष्ट्रध्वज जो इस सदन में फहराया जाएगा, वह भारतीय महिलाओं की ओर से इस राष्ट्र को एक उपहार है। सभी लोगों के समक्ष यह पहला प्रदर्शन था। ‘सारे जहाँ से अच्छा’ व ‘जन-गण-मन’ के सामूहिक गान के साथ यह समारोह सम्पन्न हुआ।

पंडित नेहरू ने ध्वज के मानक बताए, जिन्हें जानना जरूरी है (जिनका उल्लेख भारतीय मानक संस्थान के क्रमांक आई.एस.आई.-1-1951, संशोधन 1968 में किया गया)। उन्होंने कहा भारत का राष्ट्रध्वज समतल तिरंगा होगा। यह आयताकार होकर इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 होगा, तीन रंगों की समान आड़ी पट्टिका होगी। सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद तथा नीचे हरे रंग की पट्टी होगी। सफेद रंग की पट्टी पर मध्य में सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का चौबीस शलाकाओं वाला चक्र होगा, जिसका व्यास सफेद रंग की पट्टी की चौड़ाई के बराबर होगा।

निर्माण में जो वस्त्र उपयोग में लाया जाएगा, वह खादी का होगा तथा यह सूती, ऊनी या रेशमी भी हो सकता है, लेकिन शर्त यह होगी कि सूत हाथ से काता जाएगा एवं हाथ से बुना जाएगा। इसमें हथकरघा सम्मिलित है। सिलाई के लिए केवल खादी के धागों का ही प्रयोग होगा। नियमानुसार खादी के एक वर्ग फीट कपड़े का वजन 205 ग्राम होना चाहिए।

निर्माण के लिए हाथ से बनी खादी का उत्पादन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के एक समूह द्वारा पूरे देश में मात्र ‘गरग’ गांव में किया जाता है जो उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में बेंगलूर-पूना रोड पर स्थित है। इसकी स्थापना 1954 में हुई, परन्तु अब निर्माण क्रमश: ऑर्डिनेंस क्योरिंग फैक्टरी शाहजहांपुर, खादी ग्रामोद्योग आयोग मुम्बई एवं खादी ग्रामोद्योग आयोग दिल्ली में होने लगा है। निजी निर्माताओं द्वारा भी राष्ट्रध्वज का निर्माण किए जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन गौरव व गरिमा को दृष्टिगत रखते हुए यह जरूरी है कि ध्वज पर आई.एस.आई. (भारतीय मानक संस्थान) की मुहर लगी हो।

ध्‍वज के रंग

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  • भारत के राष्ट्री य ध्विज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच की पट्टी का श्वेत धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। सफ़ेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तृतीय शताब्दीईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।

चक्र

  • इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

ध्‍वज संहिता

  • 26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

विशेष परिस्थिति- राष्ट्रीय उल्लास के पर्वों पर अर्थात्‌ 15 अगस्त, 26 जनवरी के अवसर पर या किसी राष्ट्र विभूति का निधन होता है तथा राष्ट्रीय शोक घोषित होता है, तब ध्वज को झुका दिया जाना चाहिए, लेकिन जहां जिस भवन में उस राष्ट्र विभूति का पार्थिव शरीर रखा है, वहां उस भवन का ध्वज झुका रहेगा तथा जैसे ही पार्थिव शरीर अंत्येष्टि के लिए बाहर निकालते हैं, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाएगा।

शवों पर लपेटना- राष्ट्र पर प्राण न्योछावर करने वाले फौजी रणबांकुरों के शवों पर एवं राष्ट्र की महान विभूतियों के शवों पर भी ध्वज को उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए लपेटा जाता है, तब केसरिया पट्टी सिर तरफ एवं हरी पट्टी पेरों की तरफ होना चाहिए, न कि सिर से लेकर पैर तक सफेद पट्टी चक्र सहित आए और केसरिया और हरी पट्टी दाएं-बाएं हों। याद रहे शहीद या विशिष्ट व्यक्ति के शव के साथ ध्वज को जलाया या दफनाया नहीं जाए, बल्कि मुखाग्नि क्रिया से पूर्व या कब्र में शरीर रखने से पूर्व ध्वज को हटा लिया जाए।

नष्टीकरण- अमानक, बदरंग कटी-फटी स्थिति वाला ध्वज का स्वरूप फहराने योग्य नहीं होता। ऐसा करना ध्वज का अपमान होकर अपराध है, अतः वक्त की मार से जब कभी ध्वज ऐसी स्थिति हो जाए तो गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ अग्नि प्रवेश दिला दिया जाता है। या वजन/रेत बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है। यही प्रकिया पार्थिव शरीरों पर से उतारे गए ध्वजों के साथ भी किया जाता है।

राष्ट्रीय ध्वज को किस प्रकार फहराया जाए
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क्‍या करें

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
  • किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
  • नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

क्‍या न करें

  • इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
  • इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
  • किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए:

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तिरंगे को रखरखाव का नियम

  • फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत झंडे को कभी भी ज़मीन पर नहीं रखा जाएगा।
  • उसे कभी पानी में नहीं डुबोया जाएगा और किसी भी तरह नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा। यह नियम भारतीय संविधान के लिए भी लागू होता है।
  • क़ानूनी जानकार डी. बी. गोस्वामी ने बताया कि प्रिवेंशन ऑफ इन्सल्ट टु नैशनल ऑनर ऐक्ट-1971 की धारा-2 के मुताबिक, फ्लैग और संविधान की इन्सल्ट करने वालों के ख़िलाफ़ सख्त क़ानून हैं।
  • अगर कोई शख़्स झंडे को किसी के आगे झुका देता हो, उसे कपड़ा बना देता हो, मूर्ति में लपेट देता हो या फिर किसी मृत व्यक्ति (शहीद हुए आर्म्ड फोर्सेज के जवानों के अलावा) के शव पर डालता हो, तो इसे तिरंगे की इन्सल्ट माना जाएगा।
  • तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहन लेना भी ग़लत है।
  • अगर कोई शख़्स कमर के नीचे तिरंगा बनाकर कोई कपड़ा पहनता हो तो यह भी तिरंगे का अपमान है।
  • तिरंगे को अंडरगार्मेंट्स, रुमाल या कुशन आदि बनाकर भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

तिरंगे को फहराने के नियम

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  • फ्लैग कोड में आम नागरिकों को सिर्फ़ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की छूट थी लेकिन 26 जनवरी 2002 को सरकार ने इंडियन फ्लैग कोड में संशोधन किया और कहा कि कोई भी नागरिक किसी भी दिन झंडा फहरा सकता है, लेकिन वह फ्लैग कोड का पालन करेगा।
  • 2001 में इंडस्ट्रियलिस्ट नवीन जिंदल ने कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि नागरिकों को आम दिनों में भी झंडा फहराने का अधिकार मिलना चाहिए। कोर्ट ने नवीन के पक्ष में ऑर्डर दिया और सरकार से कहा कि वह इस मामले को देखे। केंद्र सरकार ने 26 जनवरी 2002 को झंडा फहराने के नियमों में बदलाव किया और इस तरह हर नागरिक को किसी भी दिन झंडा फहराने की इजाजत मिल गई।

खादी पर ही तिरंगा

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1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम अत्यंत कड़े हैं। केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता। कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी टेस्टिंग की जाती है। खादी बनाने में केवल कपास, रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है। इसकी बुनाई सामन्य बुनाई से भिन्न होती है। ये बुनाई बेहद दुर्लभ होती है। इसे बहुत कम लोग जानते हैं। धारवाण के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में ही तिरंगे की खादी की बुनाई की जाती है। जबकी ”’हुबली”’ एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहां से झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है। बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है।बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है। इसके बाद उसे तीन रंगो में रंगा जाता है। केंद्र में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बीआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है।

देश के पांच सबसे ऊंचे तिरंगे

रांची- 293 फीट

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23 जनवरी 2016 रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज यहाँ रांची के पहाड़ी मंदिर पर भारत का सबसे बड़ा और ऊंचा तिरंगा लहराया. यह तिरंगा भारत का सबसे बड़ा झंडा है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर पहाड़ी मंदिर के नीचे से बटन दबा कर तिरंगा फहराया. तिरंगा जमीन से 493 फीट की ऊंचाई पर है़. पहाड़ी मंदिर पर इसे 293 फीट लंबे पोल पर लगाया गया है़.

हैदराबाद- 291 फीट

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देश का दूसरा सबसे ऊंचा तिरंगा फहराया। यह तिरंगा राजधानी हैदराबाद में हुसैन सागर झील के किनारे लगाया गया है। इसकी ऊंचाई करीब 291 फुट है। इस तिरंगा का आकार 108*72 है। बताया गया है कि देश के दूसरे सबसे ऊंचे तिरंगे को लगाने में करीब 3 करोड़ रुपए का खर्च आया है।

रायपुर- 269 फीट

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रायपुर के मरीन ड्राइव में देश का सबसे ऊंचा तिरंगा फहराया गया। यह तिरंगा 269 फीट ऊंचे पोल पर फहराया गया है, इससे पहले रांची में जमीन से 493 फीट की ऊंचाई पर झंडा फहराया गया था लेकिन तेज हवा के चलते 10 दिन में 5 बार फटने की वजह से दो दिन पहले उसे उतार लिया गया था।

फरीदाबाद- 250 फीट

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फरीदाबाद के सेक्टर-12 स्थित टाउन पार्क में देश का सबसे ऊंचा तिरंगा 3 मार्च, 2015 को फहराया गया। इस तिरंगे को फहराने के साथ ही इसका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है। यह तिरंगा फरीदाबाद नवचेतना ट्रस्ट की तरफ से फहराया गया, जो कुतुब मीनार (72 मीटर या 237 फीट) से भी ऊंचा है।

दिल्ली- 207 फीट

 

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10 मार्च 2014 को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में देश का सबसे बड़ा तिरंगा फहराया गया 60 फुट चौड़े और 90 फुट लंबे तिरंगे को 207 फुट ऊंचे पोल पर कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने फहराया। झंडे का वजन 35 किलोग्राम है।

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21 फीट लंबाई और 14 फीट चौड़ाई के झंडे पूरे देश में केवल तीन किलों के ऊपर फहराए जाते हैं… मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला उनमें से एक है। इसके अतरिक्त कर्नाटक का नारगुंड किले और महाराष्ट्र का पनहाला किले पर भी सबसे लम्बे झंडे को फहराया जाता है। भारत में सालाना लगभग चार करोड़ झंडे बिकते हैं। भारत में सबसे बड़ा झंडा (6.3 by 4.2 मी.) राज्य प्रशासनिक मुख्यालय, महाराष्ट्र के मंत्रालय भवन से फहराया जाता है।

स्वतंत्रता दिवस पर केवल कागज से बने राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग हो :- भारतीय ध्वज संहिता के प्रावधान के अनुरूप नागरिकों एवं बच्चों से शासन की अपील है कि वे स्वतंत्रता दिवस पर केवल कागज के बने राष्ट्रीय ध्वज का ही उपयोग करें।  साथ ही कागज के झंडों को समारोह संपन्न होने के बाद न विकृत किया जाए और न ही जमीन पर फेंका जाए। ऐसे झंडों का निपटान उनकी मर्यादा के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।  आमजन से आग्रह है कि वे स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्लास्टिक से बने झंडों का उपयोग बिलकुल ही न करें, क्योंकि प्लास्टिक से बने झंडे लंबे समय तक नष्ट नहीं होते हैं और जैविक रूप से अपघट्य न होने के कारण ये वातावरण के लिए हानिकारक होते हैं।

कैसे रचा गया झंडा गीत… विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा

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झंडा गीत को 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार किया गया था। इस गीत की रचना करने वाले श्यामलाल गुप्त पार्षद कानपुर में नरवल के रहने वाले थे। उनका जन्म 16 सितंबर 1893 में हुआ था। गरीबी में भी उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की थी। उनमें देशभक्ति का जज्बा था, जिसे वह अपनी कविताओं में व्यक्त करते थे।

कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता रहने के बाद वह 1923 में फतेहपुर के जिला कांग्रेस अध्यक्ष बने। वह सचिव नाम का अखबार भी निकालते थे। जब यह लगभग तय हो गया था कि अब आजादी मिलने ही वाली है, उस वक्त कांग्रेस ने देश के झंडे (तिरंगा) का चयन कर लिया था। लेकिन एक झंडा गीत की जरूरत महसूस की जा रही थी।

इधर, गणेश शंकर विद्यार्थी पार्षद जी के काव्य कौशल के कायल थे। विद्यार्थी जी ने पार्षद जी से झंडा गीत लिखने का अनुरोध किया। पार्षद जी कई दिनों तक कोशिश करते रहे, पर वह झंडा गीत नहीं लिख पाए। जब विद्यार्थीजी ने पार्षदजी से साफ-साफ कह दिया कि मुझे हर हाल में कल सुबह तक झंडा गीत चाहिए, तो वह रात में कागज कलम लेकर बैठ गए।

आधी रात तक उन्होंने झंडे पर एक गीत तो लिखा, लेकिन वह उन्हें जमा नहीं। निराश होकर दो बजे जब वह सोने के लिए लेटे, अचानक उनके भीतर भाव उमडने लगे। वह उठकर लिखने बैठ गए। पार्षद जी को लगा जैसे कि कलम अपने आप चल रही हो और भारत माता उनसे गीत लिखा रही हों। यह गीत था- विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। यह गीत लिखकर उन्हें बहुत संतोष मिला।

सुबह होते ही पार्षद जी ने यह गीत विद्यार्थी जी को भेज दिया, जो उन्हें बहुत पसंद आया। जब यह गीत महात्मा गांधी के पास गया, तो उन्होंने गीत को छोटा करने को कहा। आखिर में, 1938 में कांग्रेस के अधिवेशन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसे देश के झंडा गीत की स्वीकृति दे दी। यह हरिपुरा का ऐतिहासिक अधिवेशन था। नेताजी ने झंडारोहण किया और वहां मौजूद करीब पांच हजार लोगों ने झंडागीत को एक सुर में गाया।

झण्डा ऊँचा रहे हमारा

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा

सदा शक्ती बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हर्षाने वाला
मातृ भूमी का तन मन सारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …

आओ प्यारे वीरों आओ
देश धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …

शान न इसकी जाने पाये
चाहे जान भले ही जाये
सत्य की विजयी कर दिखलाएं
तब होए प्रण पूर्ण हमारा – 2
झण्डा ऊँचा रहे हमारा …

दिसंबर 2009- रात में भी फहराया जा सकेगा तिरंगा… सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज को अब रात में भी फहराने की अनुमति दे दी है।  कांग्रेस सांसद एवं जानेमाने उद्योगपति नवीन जिंदल ने जून 2009 में केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर यह प्रस्ताव किया था कि देश में रात को भी विशाल ध्वज दंड पर राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगा फहराने की अनुमति दी जाए। गृह मंत्रालय ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में जिंदल के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए कहा कि प्रस्ताव को पूरी तरह से पढ़ने व समझने के पश्चात गृह मंत्रालय ने कहा है कि जिंदल को देश में राष्ट्रीय ध्वज रात को भी विशाल ध्वज दंड पर फहराने के लिए अनुमति देता है।

सबसे ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज… जिंदल ने कैथल और लाडवा (कुरुक्षेत्र), हिसार व कुरुक्षेत्र में देश के सबसे ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को फहराया है। यह राष्ट्रीय ध्वज 206 फुट ऊंचा है और इसकी चौड़ाई 48 फुट एवं लंबाई 72 फुट है।  राष्ट्रीय ध्वज का कुल वजन 40 किलोग्राम है।

तिरंगे की अलग-अलग कहानियां

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जयपुर में सबसे बडा राष्ट्रीय ध्वज

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सांसद नवीन जिंदल ने  24 अक्टूबर 2011 को जयपुर के सेंट्रल पार्क में सबसे बड़ा ध्वज (72×48 फुट आकार का) को दो सौ छह फुट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वजस्तंभ को स्थापित किया गया। फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सांसद नवीन जिंदल ने कहा कि राष्ट्रीयता को बढ़ावा देने के लिए सबसे बडा और सबसे ऊंचा ध्वज लगाने का फैसला लिया गया। उन्होंने कहा कि सबसे ऊंचा और बडा राष्ट्रीय ध्वज जयपुर आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए तथा विशेष रूप से बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहेगा। जिंदल के अनुसार, फाउडेंशन की ओर से ब्रह्मसरोवर (कुरुक्षेत्र), लाडवा, हिसार, सोनीपत, कैथल (हरियाणा), अंगुल (उड़ीसा), नेशनल मिलिटरी म्यूजियम (बेंगलुरु) और जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड विजयनगर (कर्नाटक) में दो सौ छह फुट ऊंचे ध्वज स्तंभ स्थापित किए जा चुके हैं और त्रिवेन्द्रम में इस पर काम चल रहा है। फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया और जयपुर विकास प्राद्यिकरण की ओर से स्थापित स्मरणार्थक राष्ट्रीय ध्वज को 206 छह फुट ऊंचे विशेष ध्वज स्तंभ पर स्थापित किया गया है और यह राष्ट्रीय ध्वज निटेड पोलिस्टर से बना हुआ है।

वाराणसी- तिरंगे से चल रहा है घर का चूल्हा… उत्तरप्रदेश के वाराणसी के लल्लापुरा निवासी मुहम्मद वसी के सामने अब न तो रोजगार का संकट है और न ही पहचान की। यहां साड़ी उद्योग में आई मंदी के कारण मुहम्मद वसी का परिवार बेरोजगारी की मार झेल रहा था, लेकिन अब वे तिरंगा बुन रहे हैं, जिससे उसकी बेरोजगारी तो दूर हुई ही, साथ ही इनकी अलग पहचान भी बनी है। देशभक्ति के साथ रोजगार को जोड़ने वाले अकेले केवल वसी का ही परिवार नहीं है बल्कि वाराणसी में ऐसे लगभग दस परिवार हैं, जिनके घर का चूल्हा इसी तिरंगे से चल रहा है। रेशम पर बनने वाला यह तिरंगा अब सभी वर्ग के लोगों के लिए बनने लगा है। कागज के तिरंगे की जगह अब यह तिरंगा दुपट्टे के रूप में तैयार किए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार मुहम्मद वसी अपने हैंडलूम पर केवल भारत में बने रेशम से ही तिरंगा झंडे बुनते हैं, क्योंकि वसी महसूस करते हैं कि तिरंगा तैयार करना उनके रोजगार का जरिया जरूर है, लेकिन यह भारत की शान का भी प्रतीक है।

पटना- 47 बरस से एक ही परिवार बांध रहा है तिरंगा… बिहार में राजधानी पटना के गांधी मैदान में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर होने वाले ध्वजारोहण में एक परिवार का खास योगदान है। यह परिवार पिछले 47 साल से ध्वजारोहण के लिए तिरंगा बांधता आ रहा है। बिहार पुलिस के तत्कालीन हवलदार मुनेश्वर दास ने ध्वज बांधने का कार्य वर्ष 1965 में शुरू किया था और अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वह इसे करते रहे। मुनेश्वर ने वर्ष 2010 तक स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गांधी मैदान में होने वाले मुख्य राजकीय समारोह स्थल पर राष्ट्रीय ध्वज बांधने की जिम्मेदारी निभाई। दास की मृत्यु पिछले वर्ष 15 जनवरी हो गई थी। अब यह जिम्मेदारी उनके भतीजे बिन्दा दास निभा रहे हैं। अधिकारियों का भी मानना है कि यदि मुनेश्वर झंडा न बांधे तो काम अधूरा ही माना जाता था। एक अधिकारी के अनुसार, पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस से पहले मुनेश्वर अपनी बीमारी के इलाज के लिए राज्य से बाहर गए थे, लेकिन मौत से जंग वह जीत नहीं पाए और 26 जनवरी से पहले ही उनकी मौत हो गई। समस्तीपुर जिले के पाहेपुर गांव निवासी मुनेश्वर ने बिहार पुलिस में सिपाही पद से अपनी नौकरी शुरू की थी। उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें दो बार राष्ट्रपति पदक से भी सम्मानित किया गया था।

कुछ अलग है जयपुर के इस परिवार के लिए तिरंगा फहराने का महत्त्व… राजस्थान के गुलाबी नगर में एक परिवार से तिरंगे का रिश्ता ही कुछ खास है।कुछ अलग है इस परिवार और तिरंगे की कहानी और कुछ अलग है इस परिवार के लिए तिरंगा फहराने का महत्त्व। जयपुर में रहने वाला यह परिवार अटल परिवार के नाम से जाना जाता है,  इस परिवार में है एक खास तिरंगा झंडा।वैसे तो इस तिरंगे में भी लाल, हरे और सफेद रंग की तीन पट्टियां और बीच में अशोक चक्र है, फिर भी यह तिरंगा अपने आपमें कुछ खास महत्व रखता है। इस तिरंगे से जुड़ी है बहादुरी की एक कहानी।यह कहानी जयकुमार अटल और तिरंगे की।यह कहानी है वीरता की एक मिसाल की और यह कहानी है सच्ची देशभक्ति की। बात 1971 की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था।उस समय जयपुर के जय कुमार अटल पकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे।यह सभी जानते हैं कि इस युद्ध में पाकिस्तान को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा था। अपनी हार से पाकिस्तान पूरी तरह बौखला उठा और उसी बौखलाहट में कुछ पाकिस्तानियों ने वहां तिरंगे को जलाने का प्रयास किया।जब जय कुमार अटल ने यह देखा तो अपनी वीरता का परिचय देते हुए उन्होंने तिरंगा उन पाकिस्तानियों से छीन लिया और उसे लेकर भारत आ गए। तिरंगा लेकर जब वे भारत पहुंचे तो सर्व प्रथम उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मुलाक़ात की और तिरंगा उन्हें सौंपना चाहा लेकिन श्रीमती गांधी ने तिरंगा लेने से इनकार कर दिया और तिरंगा जय कुमार को अपने साथ ले जाने को कहा। श्रीमती गांधी ने तिरंगा जयकुमार को वापस करते हुए कहा कि इस तिरंगे की लाज आपने बचाई है, इसलिए आज से यह तिरंगा आपके परिवार के पास ही सुरक्षित रहेगा, साथ ही हर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर आपके परिवार में ही इसे फहराया जाएगा। तब से जयपुर के अटल परिवार में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस दोनों ही एक त्यौहार की तरह मनाये जाते हैं जिसमें परिवार के सभी सदस्य चाहे वे जयपुर से बाहर ही क्यों न बसते हों, एक साथ इस तिरंगे को फहराते हैं।यहां तक कि जय कुमार अटल की पोती देविका तनखा जो US में रहती हैं, वे भी इस खास पर्व पर जयपुर पहुंच जाती है।

दुनिया के सात महाद्वीपों के सात सर्वोच्च शिखरों पर तिरंगा लहराने वाली महिलामहिला साहस की अद्वितीय मिसाल बन चुकीं जमशेदपुर की महिला पर्वतारोही प्रेमलता अग्रवाल ने दुनिया के सात महाद्वीपों के सर्वोच्च शिखर पर तिरंगा लहराने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है और यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं। 50 वर्षीय और दो बेटियों की मां प्रेमलता ने गत 23 मई 2013 को उत्तरी अमेरिका के अलास्का स्थित सर्वोच्च शिखर माउंट मैककिनले (6194मी) को फतह किया और इसके साथ ही उन्होंने सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचने का अद्भुत रिकार्ड बना दिया।

यूं शुरू हुआ सफर… प्रेमलता का सात महाद्वीपों की शीर्ष चोटियों को फतह करने का रोमांचक सफर छह जून 2008 को अफ्रीका में किलिमंजारो (5895 मीटर) पर जीत हासिल करने के साथ शुरू हुआ था। प्रेमलता ने फिर 20 मई 2011 को एशिया और दुनिया के सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट (8848 मी) को फतह किया। पद्मश्री से सम्मानित प्रेमलता ने 10 फरवरी 2012 को दक्षिण अमेरिका के एकोनकागुआ (6962 मी), 12 अगस्त 2012 को यूरोप के एल्ब्रास (5642 मी), 22 अक्तूबर 2012 को ऑस्ट्रेलिया ओसनिवा के कार्सटेंस पिरामिड (4884 मी), 5 जनवरी 2013 को आंटार्टिका के विनसन मैसिफ (4892 मी) और 23 मई 2013 को उत्तरी अमेरिका के माउंट मैककिनले (6194 मी) को फतह किया।

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आजादी से जुड़े चंद लम्हों की दास्तां कहता मेरठ का तिरंगा… आजादी के समय की तमाम धरोहरें संग्राहलयों में संजोई गई हैं। जिसमें आजादी के समय के तमाम ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं। आजादी से जुड़े चंद लम्हों को एक धरोहर के रुप में मेरठ में भी रखा गया है। 23 नवंबर 1946 में आजादी के पहले मेरठ के विक्टोरिया पार्क में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के दौरान फहराया गया 14 फीट चौड़ा और 9 फीट लंबा तिरंगा फहराया गया था। यह झंडा हस्तिनापुर निवासी देव नागर के पास किसी धरोहर से कम नहीं है। इस ऐतिहासिक झंडे से देश के महत्वपूर्ण लोगों की यादें जुड़ीं हैं। जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, शहनवाज खान, आचार्य कृपलानी और सुचेता कृपलानी के नाम झंडे के इतिहास से जुड़े हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में आजाद हिंद फौज के मलाया डिवीजन के कमांडर रहे, स्व कर्नल गणपत राम नागर के परिवार के लिए यह झंडा किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं है। गॉडविन पब्लिक स्कूल में उपप्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत देव नागर स्व कर्नल गणपत राम नागर के पौत्र हैं। वे बताते हैं कि आजादी के पहले विक्टोरिया पार्क में इस तिरंगे को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, जनरल शहनवाज खान, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य जेबी कृपलानी  और सुचेता कृपलानी के हाथों फहराया गया था। झंडारोहण के दौरान साथ में गणपत राम नागर भी मौजूद थे। गणपत राम नागर के पौत्र देव नागर कहते हैं कि मेरे पिता स्व सूरज नाथ नागर कहते थे कि ‘दादा से विरासत में मिला यह तिरंगा मेरे लिए देश की आजादी से जुड़ी धरोहर है। विक्टोरिया पार्क में यह झंडा जब फहराया जा रहा था, उस वक्त मैं वहां अपने पिता के साथ मौजूद था।

सबसे अधिक बार तिरंगा फहराने वाले प्रधानमंत्री

लाल किले की प्राचीर से लगातार नौवीं बार तिरंगा फहराने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सबसे अधिक बार झंडा फहराने वाले वजीर-ए-आजम की कतार में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरे स्थान पर हैं। वह नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के सबसे अधिक बार ध्वजारोहण करने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। मनमोहन, नेहरू और इंदिरा के बाद देश में तीसरे सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने का गौरव हासिल कर चुके हैं।

  • नेहरू ने सबसे अधिक 17 बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र ध्वज फहराया है। नेहरू ने देश को आजादी मिलने के दिन से लगातार 1963 तक हर 15 अगस्त पर तिरंगा फहराया।
  • इसके बाद उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री के रूप में 16 बार तिरंगा फहराने का गौरव हासिल किया। इंदिरा गांधी ने 1966 से 1976 तक और फिर 1980 से 1984 तक ध्वजारोहण किया।
  • सिंह 2004 में देश के प्रधानमंत्री बने थे और उसी साल उन्हें पहली बार तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त हुआ था। इसके बाद वे लगातार नौ बार तिरंगा फहरा चुके हैं। 15 अगस्त 2013 को 10 बार वो तिरंगा फहराएंगे।
  • अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 से 2003 तक लगातार 6 बार लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया।
  • राजीव गांधी ने 1985 से 1989 तक पांच बार ध्वजारोहण किया।
  • पीवी नरसिंह राव ने 1991 से 1995 तक पांच बार तिरंगा फहराया।

पहली बार तिंरगा ऐवरेस्ट, अंतरिक्ष और विदेशी जमीन पर फहराया गया

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Mount Everest- The Indian flag was hoisted on the highest mountain peak of the world, Mount Everest on 29th May 1953.

Space- The Indian National Flag flew to space in 1984 when Wing Commander Rakesh Sharma went to the space. The flag was attached as a medallion on the space suit of Rakesh Sharma.

Foreign Soil- Madam Bhikaji Rustom Cama was the first person to hoist Indian flag on foreign soil on 22nd August 1907 in Stuttgrat, Germany. कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था। कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। 1906 में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद 22 अगस्त 1908 को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।

15 अगस्त 2012- सुनीता विलियम्‍स ने अंतरिक्ष में फहराया तिरंगा

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https://www.youtube.com/watch?v=L4KOcasDwa0

पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है. सिर्फ देश के कोने कोने में ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी तिरंगा लहरा रहा है. जी हां, धरती से लाखों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में सुनीता विलियम्स ने स्पेस स्टेशन में आजादी का जश्न मनाया. जब देश अपने लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार मना रहा है तब हिंदुस्तान की एक बेटी अंतरिक्ष से बधाई दे रही है. सुनीता विलियम्स ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में तिरंगा लगाकर आजादी का जश्न मनाया. अंतरिक्ष स्टेशन से सुनीता धरती को देख रही हैं और धरती पर उन्हें तलाश है भारत की. सुनी‍ता ने कहा धरती यहां से बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ रही है, फिलहाल बादल हैं. समंदर भी दिखाई पड़ रहे हैं. लेकिन अफसोस यहां से भारत नहीं दिखाई पड़ रहा है.

चाँद पर पहुंचा तिरंगा

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भारत के लिए 2008 एक फलदायी साल रहा है। राजनीति से लेकर तकनीक तक भारत ने अगर कुछ खोया है तो दूसरी ओर बड़ी उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं। 15 नवंबर 2008 को चंद्रमा की सतह पर जैसे ही भारतीय ध्वज लहराने की सूचना देशवासियों को मिली उनका ‍सिर फर्ख से ऊँचा हो गया। चंद्र अभियानों के इतिहास में देश की इस शानदार उपलब्धि ने भारत को उन देशों की सूची में शामिल कर दिया है जो चाँद को छूने का इतिहास कायम कर चुके हैं। जाने-माने भारतीय गणितज्ञ आर्य भट्ट ने 1500 साल पहले चाँद की दूरी तथा उसके आकार को सटीक तौर पर मापा था। 2008 में पीएसएलवी सी-11 के जरिये चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण से आर्य भट्ट की खोज साकार हो गई है। यह सिर्फ इसरो के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए एक बड़ी सफलता है। भारत ने पहली बार चाँद की जमीनी हकीकत जानने के लिए अपना मून मिशन चंद्रयान-1 आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र के सतीश धवन स्पेस सेंटर से रवाना किया। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से यूकेलिप्टस के झुरमुटों से हवा को चीरता पीएसएलवी सी-11 जब आकाश की ओर बढ़ा तो भारत सफलतापूर्वक चंद्र अभियान भेजने वाला विश्व का छठा देश बन गया। इसकी सफलता के साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसने चाँद पर अपना नेशनल फ्लैग भेजा है। चाँद की जमीन पर चंद्रयान को पहुँचने में 15 दिनों का समय लगा।

Flags used by the Indian independence movement

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Military flags

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बॉलीवुड पर छाया तिरंगे का रंग… देशभक्ति के गीतों में तिरंगा…

भारतीय सिनेमा जगत में देश भक्ति से परिपूर्ण फिल्मों और गीतो की एक अहम भूमिका रही है और इनके माध्यम से फिल्मकार दर्शकों में देशभक्ति के जज्बे को आज भी बुलंद करते है।

चल चल रे नौजवान…‘ 

निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की वर्ष 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘बंधन’ संभवत: पहली फिल्म थी, जिसमें देश प्रेम की भावना को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। यूं तो फिल्म ‘बंधन’ मे कवि प्रदीप के लिखे सभी गीत लोकप्रिय हुए लेकिन ‘चल चल रे नौजवान… के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया।

आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है……

वर्ष 1943 में देश प्रेम की भावना से ओत प्रोत फिल्म ‘किस्मत’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में प्रदीप के लिखे गीतआज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनियां वालो हिंदुस्तान हमारा हैने जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोरा वहीं अंग्रेजों की तिरछी नजर के भी वह शिकार हुए। कवि प्रदीप का यह गीत अंग्रेज सरकार पर सीधा प्रहार था। कवि प्रदीप के क्रांतिकारी विचार को देखकर अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। गिरफ्तारी से बचने के लिये कवि प्रदीप को कुछ दिनों के लिये भूमिगत रहना पड़ा। कवि प्रदीप का लिखा यह गीत इस कदर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा हॉल में दर्शक इसे बार बार सुनने की ख्वाहिश करने लगे और फिल्म की समाप्ति पर दर्शकों की मांग पर इस गीत को सिनेमा हॉल मे दुबारा सुनाया जाने लगा। इसके साथ ही फिल्म ‘किस्मत’ ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दिये और इस फिल्म ने कोलकाता के एक सिनेमा हॉल मे लगातार लगभग चार वर्ष तक चलने का रिकार्ड बनाया।

ऐ मेरे वतन के लोगो….

यूं तो भारतीय सिनेमा जगत में वीरों को श्रद्धांजलि देने के लिए अब तक न जाने कितने गीतों की रचना हुई है लेकिन ‘ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंखो मे भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी‘ जैसे देश प्रेम की अदभुत भावना से ओत प्रोत रामचंद्र द्विवेदी उर्फ कवि प्रदीप के इस गीत की बात ही कुछ और है।

वंदे मातरम्..‘ 

वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आनंद मठ’ का अभिनेत्री गीताबाली पर लता मंगेशकर की आवाज में फिल्माया गीत ‘वंदे मातरम्.. आज भी दर्शकों और श्रोताओं को अभिभूत कर देता है।

ये देश है वीर जवानो का‘ 

आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने कई फिल्मों में देशभक्ति से परिपूर्ण गीत गाए हैं। इन गीतों में कुछ हैं ‘ये देश है वीर जवानो का’

वतन पे जो फिदा होगा अमर वो नौजवान होगा‘, 

अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नही,’ 

उस मुल्क की सरहद को कोई छू नही सकता जिस मुल्क की सरहद की निगाहबान है आंखे‘,

आज गा लो मुस्कुरा लो महफिले सजा लो‘ ,

हिंदुस्तान की कसम ना झुकेंगे सर वतन के नौजवान की कसम‘,

 मेरे देशप्रेमियो आपस में प्रेम करो देशप्रेमियो

ऐ मेरे प्यारे वतन

प्रेम धवन भी ऐसे गीतकार रहे है, जिनके ऐ मेरे प्यारे वतन‘,

मेरा रंग दे बसंती चोला‘, 

ऐ वतन ऐ वतन तुझको मेरी कसम,

जैसे देशप्रेम की भावना से ओत प्रोत गीत आज भी लोगो के दिलो दिमाग में देश भक्ति के जज्बे को बुलंद करते हैं।

छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी‘ 

वर्ष 1961 में प्रेम धवन की एक और सुपरहिट फिल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ प्रदर्शित हुई, जिसका गीत छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी‘ सुपरहिट हुआ।

ऐ वतन ऐ वतन…‘ 

वर्ष 1965 में निर्माता -निर्देशक मनोज कुमार के कहने पर प्रेम धवन ने फिल्म ‘शहीद’ के लिए संगीत निर्देशन किया। यूं तो फिल्म

शहीद के सभी गीत सुपरहिट हुये लेकिन ‘ऐ वतन ऐ वतन…‘ और ‘मेरा रंग दे बंसती चोला..‘ आज भी श्रोताओं के बीच शिद्दत के साथ सुने जाते है।

कर चले हम फिदा जानों तन….. 

भारत-चीन युद्ध पर बनी चेतन आंनद की वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘हकीकत’ भी देश भक्ति से परिपूर्ण फिल्म थी। मोहम्मद रफी की आवाज में कैफी आजमी का लिखा यह गीत कर चले हम फिदा जानों तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.. आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बें को बुलंद करता है।

जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा…..

इसी तरह गीतकारो ने कई फिल्मों में देशभक्ति से परिपूर्ण गीत की रचना की है इनमें 

जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा‘,

ऐ वतन ऐ वतन तुझको मेरी कसम‘,

नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं‘,

है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत वहां के गाता हूं‘,

मेरे देश की धरती सोना उगले‘,

हर करम अपना करेगे ऐ वतन तेरे लिए‘,

भारत हमको जान से भी प्यारा है‘,

ये दुनिया एक दुल्हन के माथे की बिंदिया ये मेरा इंडिया‘, 

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है‘,

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी‘,

जिंदगी मौत ना बन जाये संभालो यारो,

मां तुझे सलाम‘,

थोड़ सी धूल मेरी धरती की मेरी वतन की‘ 

भारतीय ध्वज, स्वतंत्र भारत की पहली डाक टिकट, 21 नवम्बर 1947 को विदेशी पत्राचार के लिए जारी की गयी।

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1983 World Cup Finals

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2007 World Cup t20 Finals

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2011 cricket world cup

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CWG 2010 Opening

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2012 Olympics

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Indian flag atop Everest

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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3 Responses to तिरंगा- ये आन तिरंगा है, ये शान तिरंगा है, मेरी जान तिरंगा है

  1. Pingback: तिरंगा- ये आन तिरंगा है, ये शान तिरंगा है, मेरी जान तिरंगा है | कीबोर्ड के पत्रकार

  2. Bhupendra Singh says:

    तिरंगे पर इतना मुल्यवान लेख लिखने के लिए धन्यवाद। ये आपके गहन अध्ययन को दर्शाता है। इससे हमें तिरंगे के बारे में बहुत ही अच्छी जानकारी मिली। उम्मीद है, आप ऐसे ही अन्य मुद्दों पर शोधपूर्ण लेख लिखते रहेंगे।

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