किशोर कुमार- आवाज़ के जादूगर, कामेडी के सरताज… ज़िदादिल और मस्तमौला अंदाज़ के कुछ रोचक किस्से

‘बीच राह में दिलबर बिछड़ जाए कहीं हम अगर
और सूनी सी लगे तुम्हे जीवन की ये डगर
हम लौट आएंगे तुम यूं ही बुलाते रहना
कभी अलविदा ना कहना ‘

जिंदगी के अनजाने सफर से बेहद प्यार करने वाले हिन्दी सिने जगत के महान पार्श्व गायक किशोर कुमार का नजरिया उनकी गाई इन पंक्तियो में समाया हुआ है। हिन्दी सिनेमा जगत में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो किशोर कुमार से प्रभावित ना हो. यदि आप हिंदी गानों के शौकीन हैं और आपकी पसंदीदा लिस्ट में किशोर दा के गाने ना हों यह मुमकिन ही नहीं. चाहे आज की युवा पीढ़ी हो या अधेड़ उम्र के लोग सभी को किशोर दा बहुत पसंद हैं. अपनी गायिकी से किशोर दा ने ऐसा असर छोड़ा है कि लोग आज भी उनके गानों को उसी तरह पसंद करते हैं जैसा जब वह जीवित थे तब करते थे. 4 अगस्त को किशोर कुमार का जन्मदिन है.

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किशोर दा का जीवन

  • किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में एक बंगाली परिवार और वहां के जाने माने वकील कुंजीलाल गांगुली के यहाँ हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था।
  • किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई अशोक कुमार, बहन सती देवी, भाई अनूप कुमार।
  • उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुम्बई में एक अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे.
  • किशोर कुमार एक ऐसी शख्सियत थे, जिसमें बहुमुखी प्रतिभा होने के साथ वह सब था जिसकी वजह से लोग उन्हें महान मानते थे. एक गायक और अभिनेता होने के साथ किशोर कुमार ने लेखक, निर्देशक, निर्माता और संवाद लेखक तक की भूमिका निभाई.
  • सिर्फ हिन्दी ही नहीं बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नड़ जैसी कई फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा. एक बेहतरीन गायक होने के साथ किशोर कुमार को उनकी कॉमेडियन अदाकारी के लिए आज भी याद किया जाता है.

एक हादसे से पैदा हुई किशोर कुमार की ‘जादुई आवाज’

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अपनी जादुई आवाज से कई पीढ़ियों की रूह को छूने वाले किशोर कुमार के गले से बचपन में सही ढंग से आवाज नहीं निकलती थी, जिसे लेकर उनके माता-पिता परेशान रहते थे. उसी दौरान एक हादसे ने उनके भीतर एक ऐसी सुरीली आवाज पैदा कर दी जो आगे चलकर लोगों के जेहन में हमेशा के लिए घर कर गई.

किशोर कुमार के साथ काम कर चुके और उनके पारिवारिक मित्र रहे अभिनेता रजा मुराद ने यह जानकारी दी. मुराद का कहना है, ‘किशोर दा ने मुझे एक बार बताया था कि बचपन में उनकी आवाज गले से नहीं निकलती थी. इसको लेकर उनके माता-पिता परेशान रहते थे.’

उन्होंने कहा, ‘किशोर का पैर एक बार हंसिये पर पड़ गया और वह इतना रोए कि उनमें यह ‘जादुई आवाज’ पैदा हो गई. वह अपनी सुरीली आवाज के लिए इसी हादसे को श्रेय देते थे.

• हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार एकमात्र ऐसे गायक हैं, जिन्होंने आठ बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वद गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता. इसके अलावा उन्हें कई और पुरस्कार मिले.

किशोर कुमार का कॅरियर
बड़े भाई अशोक कुमार के फिल्मों में पैर जमाने के बाद छोटे भाई आभास यानी हमारे चहेते किशोर और मझले भाई अनूप बम्बई (मुम्बई) आ गए आभास की उम्र 18 बरस थी छुटपन से ही कुंदन लाल सहगल का अनुसरण कर उनके गानों को गाया करते थे।

बम्बई आने के बाद बड़े भाई अशोक कुमार के साथ ‘बम्बई टॉकिज’ जाया करते थे जहां अशोक कुमार अपनी फिल्म शिकारी (1946) बतौर अभिनेता काम कर रहे थे। किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में इसी फिल्म से हुई।

किशोर को पहला मौका प्लेबैक सिंगर के रूप में मिला फ़िल्म “जिद्दी (1946)” में संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने उनकी आवाज सुनने के बाद उनसे एक गीत गाने को कहा- “मरने की दुआएं क्या मांगू”

http://www.youtube.com/watch?v=WzwTRLXOc_I

देव आंनद पर फिल्माए इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था

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नाम बदल आभास से हुए किशोर

उन्ही दिनों आभास ने अपना नाम बदल कर किशोर रख लिया। कहा जाता है कि नाम में बहुत कुछ होता है तभी तो यह नाम आज तक याद किया जा रहा है अदाकारी में कामयाबी की मंजिलों को चुमते दादा मुनी यानी अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय में ही मन लगाये लेकिन मन मौजी किशोर को यह दिखावे कि दुनिया कम भाती रही बड़े भाई के दबाव से अभिनय शुरू किया साथ-साथ अपने लिए गीत भी गाये लेकिन शुरुआती दौर का यह सफर इतना मशहूर नही हो पा रहा था। उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला फिल्म 1948 में बनी फिल्म जिद्दी में। जिसमें उन्होंने देव आनंद के लिए गाना गाया था।

1950-1960
1951- आन्दोलन- फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फिल्म ‘आंदोलन’ में हीरो के रूप में काम किया मगर फिल्म फ्लॉप हो गई।

1954- नौकरी- बिमल राय की ‘नौकरी’ में एक बेरोजगार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी ज़बर्दस्त अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इस फिल्म में उन्होंने गाना भी गाया- ” छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में ….” ख्याल आया ?

इसके बाद 1955 में बनी “बाप रे बाप”,

1956- फंटूस – इसका एक गीत “दुखी मन मेरे …” आज भी मन को भाव विभोर करता है यह एक ऐसा गीत है जो सच में किशोर के उन दिनों की जदोजहत को बयान करता है ध्यान से सुनने पर लगता है कि जैसे सहगल और किशोर दोनों कि आवाज़ मिली है इसमे किशोर अपने गुरु सहगल को सुनते और सीखते अपनी पहचान बनाने में लगे थे यह उसी बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है।

1956 में “नई दिल्ली”, 1957 में “मि. मेरी” और “आशा”, मे हीरो के रूप में काम किया।

1957- नौ दो ग्यारह- सदाबहार गीत “आंखों में क्या जी….” गाया

1958 – दिल्ली का ठग- अभिनेत्री नूतन और किशोर की एक सौगात – “हम तो मोहब्बत करेगा…”

एस डी बर्मन के साथ किशोर के गायकी के करियर की शुरुआत
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किशोर कई फिल्मों में नजर आए, हालांकि उनके भीतर बतौर गायक जो प्रतिभा छिपी थी, उसका अंदाजा किसी को नहीं था. इस प्रतिभा को सबसे पहले सचिन देव बर्मन ने पहचाना. एक बार बर्मन अशोक कुमार के आवास पर गए थे, जहां उन्होंने देखा कि किशोर कुमार के एल सहगल की नकल करने की कोशिश करते हुए कुछ गुनगुना रहे हैं. इस पर उन्होंने किशोर को सलाह दी कि वह अपनी खुद की शैली विकसित करें. किशोर ने उसकी सलाह मान ली और खुद की शैली विकसित की. इस तरह से एस डी बर्मन के साथ किशोर के गायकी के करियर की शुरुआत हुई और दोनों ने कई यादगार नगमे दिए. मुराद का कहना है, ‘किशोर दा सहगल के बड़े प्रशंसक थे. उनके कमरे में सहगल की कई तस्वीरें थीं. इससे पता चलता है कि वह सहगल के कितने बड़े मुरीद थे.’

सचिन देव बर्मन और किशोर दोनों के कुछ सफल प्रयोग
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1958 -“चलती का नाम गाड़ी” जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री थी मधुबाला। इस फिल्म का संगीत बर्मन दा ने दिया।‘इक लड़की भीगी भागी सी’… इस फ़िल्म के सभी गानों में तो किशोर ने आवाज़ दी थी

किशोर ने मेहनत कर अपनी पहचान तो लगभग बना ली थी लेकिन अभी तक आवाज़ से ज्यादा अभिनय के लिए ही मशहूर हुए थे.

पांच रुपया बारह आना वाले गीत की असली कहानी
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किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने एक रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने एक गीत में इस पाँच रुपया बारह आना का बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया। शायद बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह असली कहानी मालूम होगी।

1960- 1970
1960- बेवकूफ, गर्ल फ्रेंड… गर्ल फ्रेंड फ़िल्म सत्येन बोश की निर्देशित फ़िल्म थी जिसका एक गीत अपनी छाप छोड़ गया गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गीत “कश्ती का खामोश सफर है” यादगार रहा

1961– झुमरू… किशोर के हरफनमौला होने का परिचय देती यह फ़िल्म कभी भुलाई नही जा सकती इसके योडेल्लिंग अंदाज़ में गाये सारे गीत आज भी ताजे हैं “कोई हम दम ना रहा, कोई सहारा ना रहा…” यह गीत तो किशोर को भी बेहद पसंद था बड़े भाई अशोक कुमार भी इसी गीत से छोटे किशोर को याद कर लिया करते थे

1962- बॉम्बे का चोर- माला सिन्हा के साथ अभिनय किया

1962– हॉफ टिकट – अभिनेत्री मधुबाला के साथ की यह फ़िल्म मस्ती और हंसी से भरपूर थी बच्चों की तरह शरारत करते किशोर को खूब पसंद किया गया

1964- दूर गगन की छाँव में- “आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं …” यह मीठा गाना काफी लोकप्रिय हुया. यह फ़िल्म किशोर को भी पसंद थी

1965- श्रीमान फंटूस – यह नाम लेते ही गम से दिल को भर जाने वाला गाना याद आ जाता है गाना था – “वो दर्द भरा अफ़साना…” जितने भी बड़े स्टेज शो हुए, लगभग सभी में किशोर ने इस गीत को दोहराया

1967- हम दो डाकू

1968- पडोसन – यह एक ऐसी दिलचस्प फ़िल्म है कि जिसे 100 बार देखने के बाद भी देखने का मन करे साइड हीरो के रूप में किए गए अभिनय से किशोर ने इसे आज तक जवां रखा है ” एक चतुर नार…” इस भिडंत गाने के लिए सफल गायक मन्ना दे ने तक किशोर के हुनर की दाद दी शास्त्रीय संगीत से बेखबर किशोर ने तैयारी कर कामयाबी से इस गीत को पूरा किया

1968- श्रीमान, पायल की झंकार

1970- आंसू और मुस्कान…

गायक से संगीतकार का सफर
संगीत की समझ आने पर किशोर ने संगीतकार का भी काम किया उनका हुनर यहाँ भी हिट हुया
1962- झुमरू में संगीत बनाया इतना ही नही तो गीत के बोल भी लिखे और सभी जानते है गानों से ही यह फ़िल्म आज भी देखी जाती है

1964- दूर गगन की छाँव में और

1967- हम दो डाकू में भी संगीत दिया.

योडेलीन का अंदाज़
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किशोर कुमार आपने गानों में योडेलीन के अंदाज़ के कारण जाने जाते रहे. यह नुस्खा उन्होंने अपने मझले भाई अनूप कुमार के एक रिकॉर्डिंग से छिप कर सीखा था. अनूप इसे विदेश से लाये थे.

गीत और संगीत में किशोर इतने उलझे थे कि उनके अभिनय के गीत उस समय मोहम्मद रफी जी को गाने पड़े.

किशोर कुमार ने लता मंगेशकर के साथ 327 गाने गाए
किशोर दा से वो पहली मुलाक़ात… लता मंगेशकर की जुबानी
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40 के दशक में जब मैंने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था. तब मैं अपने घर से लोकल पकड़कर मलाड जाती थी. एक रिकॉर्डिंग के दौरान संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के साथ लता मंगेशकर.

वहां से उतरकर स्टूडियो बॉम्बे पैदल टॉकीज जाती. रास्ते में किशोर दा भी मिलते. लेकिन मैं उनको और वो मुझे नहीं पहचानते थे. किशोर दा मेरी तरफ देखते रहते. कभी हंसते. कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते. मुझे उनकी हरकतें अजीब सी लगतीं.

मैं उस वक़्त खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी. एक दिन किशोर दा भी मेरे पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए. मैंने खेमचंद जी से शिकायत की. “चाचा. ये लड़का मेरा पीछा करता रहता है. मुझे देखकर हंसता है.”

तब उन्होंने कहा, “अरे, ये तो अपने अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर है.” फिर उन्होंने मेरी और किशोर दा की मुलाक़ात करवाई. और हमने उस फिल्म में साथ में पहली बार गाना गाया.

  • लता मंगेशकर मानती हैं कि किशोर उन्हें गायकों में सबसे ज़्यादा अच्छे लगते थे. उन्होंने कहा कि किशोर हर तरह के गीत गा लेते थे और उन्हें ये मालूम था कि कौन सा गाना किस अंदाज़ में गाना है.
  • लता ही नहीं, उनकी बहन आशा भोसले के भी सबसे पसंदीदा गायक थे और उनका मानना है कि किशोर अपने गाने दिल और दिमाग़ दोनों से ही गाते थे.

एक बार आशा को लगा कि उन्हें छेड़ रहे हैं किशोर कुमार

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आशा भोसले और किशोर के गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन दोनों ने जब भी साथ में गाया, गाना हिट हुआ। लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि किशोर कुमार से जब आशा भोसले की पहली मुलाकात हुई थी तब आशा, किशोर कुमार को देखकर डर गयी थीं। आशा भोसले उन्हें लड़कियों का पीछा करने वाला मनचाला समझ बैठी थीं।

किस्सा यह है कि एक गाने के लिए आशा और किशोर का चुना गया। इस गाने के पहले दोनों ने ही एक-दूसरे को नहीं देखा था। गाने की रिकार्डिंग के लिए दोनों को स्टूडियो पहुंचना था। उन दिनों न तो आशा के पास अपनी गाड़ी थी और न ही किशोर कुमार के पास।

यह दोनों ही अलग-अलग जगहों से आकर मुंबई के मलाड स्टेशन में पहुंचे। फक्कड़ और सूफियाना किशोर पायजामा-कुर्ता पहने हुए थे। कुर्ता मायजामा के साथ उन्होंने गले पर स्कॉर्फ या मफलर जैसा कुछ डाल रखा था।

मुंबई में आमतौर पर लोग मफलर डालकर नहीं रहते। आशा ने किशोर को देखा तो उन्हें उनका मफलर डाले हुए किशोर बड़े अजीब लगे। मामला यहां से बनना शुरू हुआ। ट्रेन आयी और दोनों एक ही डिब्बे सवार हुए।

चूंकि मंजिल एक ही थी तो दोनों उतरे भी एक ही स्टेशन पर। बीच-बीच में दोनों ही एक-दूसरे को देख लेते थे। स्टेशन से बाहर निकलकर आशा भोंसले ने एक तांगा लिया। किशोर कुमार ने भी तांग लिया। आगे-आगे आशा का तांगा चल रहा था इसके पीछे किशोर का तांगा चल रहा था।

आशा भोंसले को लगने लगा कि यह आदमी उनका पीछा कर रहा है। आशा घबरा कर किशोर से मुंह चुराने लगीं। आशा को लगा कि लड़कियों को छेड़ने वाला कोई मनचला उनका पीछा कर रहा है। जैसे ही स्टूडियो के बाहर तांगा रूका, आशा दौड़कर स्टूडियों के अंदर घुस गयीं।

यह क्या, उन्होंने पीछे-पीछे किशोर कुमार को अंदर आते देखा। अब तो हद हो गयी थी। आशा को लगा यह मनचाला उनका पीछा नहीं छोड़ेगा। आशा को लगा कि अब स्टूडियों में किसी से उन्हें मदद मांगनी ही होगी।

तो जो पहले मिला उसे पकड़कर आशा ने अपनी आपबीती सुनायी। यह सुनकर लोग हंसने लगे। तब तक वहां किशोर कुमार भी आ चुके थे। आशा को बताया गया कि यह किशोर कुमार हैं और आपको इनके साथ गाना गाना है। बाद में इस किस्से को किशोर कुमार और आशा भोसले लोगों से शेयर करते रहे। दोनों ने साथ में कई ‌हिट फिल्गी गीत गाए।

गैर हिन्दी गाने
असल में किशोर बंगाली थे और बंगला में भी गाने गाये 1964 में सत्यजीत रॉय जैसे सफल निर्देशक की फ़िल्म “चारुलता” में उन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर के बंगला गीत ” आमी चीनी गो चीनी तोमारे …” गीत को गाकर यह साबित कर दिया कि वे एक प्रतिभाशाली ( versatile ) कलाकार थे वे सत्यजीत रॉय के करीब रहे और “पाथर पंचोली” फ़िल्म के निर्माण में उन्होंने रोय जी की आर्थिक मदद भी की इस तरह से 1960- 1970 का दशक किशोर कुमार को एक कुशल कलाकार के रूप में देखता है

गायकी में सम्मान
यह एक सफल और कई मायनो में याद गार फ़िल्म रही 1969 में शक्ति सामंत की फ़िल्म “आराधना” राजेश खन्ना पर फिल्माए गीतों ने तो हिन्दी फिल्मो में रोमांटिक गानों की कड़ी में एक हलचल सी मचा दी “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू…” और “रूप तेरा मस्ताना…” आज भी सुपर हिट है

“रूप तेरा मस्ताना…” – इस गीत के लिए किशोर को जीवन का पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला

यही फिल्म है जहाँ से मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने अपने पिता की गैरमौजूदगी में खुद ब ख़ुद काम संभाला और फ़िर बस आगे चलते ही गए. राजेश खन्ना बताते हैं कि पहली बार उनके लिए गाने से पहले किशोर दा ने उन्हें बुलाया और उनसे सवाल-जवाब किए. गानों के बन जाने पर राजेश जी को पता चला कि किशोर उस मुलाक़ात में उनके बोलने के अंदाज़ की मालूमात कर रहे थे. बस इसके बाद किशोर और राजेश खन्ना एक दुसरे के लिए पर्याय से हो गए.

किशोर कुमार ने अपने सम्पूर्ण फिल्मी कैरियर में 800 से भी अधिक हिन्दी फिल्मों में 1500 से ज्यादा गाने गाए। हिन्दी फिल्मो के अलावा उन्होंने बंगला, मराठी, आसामी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी और उडि़या फिल्मों के लिए भी उन्होंने अपनी दिलकश आवाज के जरिए श्रोताओ को भाव विभोर किया। यूं तो किशोर कुमार ने शशि कपूर, धमेन्द्र, विनोद खन्ना, संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा, रणधीर कपूर से लेकर ऋषि कपूर तक के लिए गाने गाए। लेकिन देवानंद, अमिताभ बच्चन, और राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज खूब जमती थी, साथ हीं ये तीनो सुपरस्टार भी अपनी फिल्मों के लिए किशोर कुमार द्वारा गाए जाने की मांग किया करते थे।

8 बार फिल्म फेयर पुरस्कार
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किशोर कुमार को उनके दिए गए सम्मान की चर्चा की जाए तो उन्हें बतौर गायक 8 बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिल चुका है। सबसे पहले उन्हें 1969 में अराधना फिल्म के रूप तेरा मस्ताना गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद 1975 में फिल्म अमानुष के गाने दिल ऐसा किसी ने, 1978 में डॉन के गाने खइके पान बनारस वाला, 1980 में हजार राहे जो मुड़के देखी फिल्म थोड़ी सी बेवफाई, 1082 में फिल्म नमक हलाल के पग घूंघरू बांध, 1983 में फिल्म अगर तुम न होते के अगर तुम न होते,1984 में फिल्म शराबी के मंजिलें अपनी जगह है और वर्ष 1985 में फिल्म सागर के सागर किनारे दिल गाने के लिए भी किशोर कुमार सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए।
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किशोर की गायकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई फिल्म आराधना

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रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला
वर्ष 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म आराधना के जरिये किशोर गायकी के दुनिया के बेताज बादशाह बन गये। इस समय के फिल्म के संगीतकार सचिन देव बर्मन चाहते थे कि इसके गानों को किसी एक गायक को न देकर उसे किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों से गवाया जाये। लेकिन बाद में सचिन देव बर्मन की बीमारी के कारण फिल्म अराधना में उनके पुत्र आर.डी.बर्मन ने संगीत दिया। इसमें सपनों की रानी कब आयेगी तू और रुप तेरा मस्ताना गाना किशोर कुमार ने गाया जो बेहद पसंद किया गया। रूप तेरा मस्ताना गाने के लिये किशोर कुमार को बतौर गायक पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला।

तीन नायकों को बनाया महानायक

किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

  • उनकी आवाज के जादू से देव आनंद सदाबहार हीरो कहलाए
  • किशोर ने ही बनाया था राजेश खन्ना को देश का सुपरस्टा र
  • अमिताभ बच्चन को बनाया महानायक

देव आनंद और किशोर की मरते दम तक दोस्ती

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जिद्दी में किशोर कुमार ने पहली बार पार्श्वगायन किया, वह भी देव आनंद के लिए। यहीं से किशोर और देव आनंद के बीच अभिन्न मित्रता की शुरुआत हुई। आगे चलकर देव ने अपने अधिकांश गाने किशोर से ही गवाए। 1987 में किशोर कुमार के असामयिक निधन तक यह दोस्ती कायम रही।

अंतिम बार किशोर ने ‘सच्चे का बोलबाला’ (1989) फिल्म के लिए देव आनंद को अपनी आवाज दी थी। ‘जिद्दी’ की सफलता ने देव आनंद को स्टार का दर्जा दिला दिया। उस समय तक दिलीप कुमार और राज कपूर भी स्टार का दर्जा हासिल कर चुके थे। दोनों की आठ-दस फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं।

  • Paying Guest, 1957- Maana janab ne pukara
  • Paying Guest, 1957- Chhod do aanchal
  • Johny Mera Naam, 1970- Pal bhar ke liye
  • Hare Ram Hare Krishna, 1971- Phoolon ka taaron ka

किशोर बन गए राजेश खन्ना के गीतों की आवाज

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किशोर कुमार यानी वो आवाज जिसने जवां दिलों की धड़कनों को अपने नाम कर लिया. उनकी बात करते ही सबसे पहले किसी चेहरे का ध्यान आता है तो वो है राजेश खन्ना. राजेश खन्ना की सफलता में किशोर कुमार का सबसे बड़ा हाथ माना जा सकता है. सवाल ये है कि अगर किशोर कुमार नहीं होते तो क्या राजेश खन्ना, राजेश खन्ना होते?

किशोर कुमार के गाने ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ने राजेश खन्ना को रातोंरात देश का सुपर स्टार बना दिया. राजेश खन्ना रातोंरात देश की लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन बन गए.

1969 में आई फिल्म ‘अराधना’ ने तहलका मचा दिया. किशोर कुमार की आवाज में जो एक रोमांस था उसे राजेश खन्ना का चेहरा मिल गया था. इस फिल्म की खास बात ये थी कि राजेश खन्ना और किशोर कुमार पहली बार ‘अराधना’ फिल्म के सेट पर ही मिले और दोनों की केमिस्ट्री वहीं से शुरू हो गई.
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‘अराधना’ से पहले राजेश खन्ना अपनी पहली हिट फिल्म की तलाश में घूम रहे थे, लेकिन वो फिल्म उन्हें मिली नहीं थी. 1966 में राजेश खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री में ‘राज’ फिल्म से शुरुआत की थी. हालांकि पहले ‘आखिरी खत’ रिलीज हुई.

इन दोनों फिल्मों के गाने तो अच्छे थे लेकिन, राजेश खन्ना की कोई बड़ी पहचान नहीं बन पाई. इसके बाद राजेश खन्ना ने ‘बहारों के सपने’ और ‘औरत और श्रीमानजी’ जैसी फिल्मों में काम किया लेकिन बात नहीं बनी.

शायद राजेश खन्ना को किशोर कुमार की आवाज का ही इंतजार था. जैसे ही 1969 में ‘अराधना’ आई पूरा देश राजेश खन्ना और किशोर कुमार का दीवाना हो गया.

ऐसा कहा जाता है कि राजेश खन्ना के सहारे किशोर कुमार ने भी ‘अराधना’ फिल्म से अपनी दूसरी पारी शुरू की. इससे पहले किशोर कुमार की पहचान एक एक्टर-सिंगर के तौर पर थी. वो फिल्मों में एक्टिंग भी किया करते थे और गाया भी करते थे.

1970 में ही फिल्म ‘सच्चा झूठा’ रिलीज हुई. इस फिल्म में किशोर कुमार और राजेश खन्ना की जोड़ी हिट रही. 1971 में राजेश खन्ना और किशोर कुमार की जोड़ी को आरडी बर्मन के तौर पर एक नया साथी मिला. तीनों ने पहली बार साथ में फिल्म ‘कटी पतंग’ की.

‘कटी पंतग’ के बाद से इन तीनों के बीच एक कभी न रुकने वाला सिलसिला शुरू हुआ. सत्तर के दशक में आरडी बर्मन ही नहीं, हर म्यूजिक डायरेक्टर राजेश खन्ना के गानों के लिए किशोर कुमार ही को गायक चुनता.

1973 में ‘अमर प्रेम’ के गानों ने रोमेंटिंक राजेश-किशोर की जोड़ी ने सैड सॉन्ग्स की दुनिया में भी धमाका मचाया. 1974 में आई फिल्म ‘आप की कसम’ में किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए ‘जिंदगी का सफर…’ जैसा सुपरहिट सैड सॉन्ग गाकर राजेश खन्ना को दिलीप कुमार के बाद दूसरा ट्रैजेडी किंग बना दिया.

इसी दौरान किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए ‘रोटी’, ‘प्रेमनगर’ और ‘अजनबी’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के गाए गाए. लेकिन सत्तर के दशक के अंत में राजेश खन्ना का जादू ढलने लगा था. उनकी फिल्में फ्लॉप होनी शुरू हो गई थीं. लेकिन इस दौर में भी किशोर कुमार उनकी आवाज बने रहे और ‘महबूबा’, ‘अनुरोध’ जैसी फिल्मों के गाने हिट रहे.

राजेश खन्ना को किशोर की आवाज के बगैर सोचना मुमकिन नहीं था. शायद यही वजह है कि कुछ साल पहले राजेश खन्ना ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘किशोर कुमार मेरी आत्मा थे और मैं उनका शरीर.’

किशोर कुमार ने राजेश खन्ना के लिए गाना बंद नहीं किया. लेकिन ये वो दौर था जब किशोर सिर्फ राजेश खन्ना की आवाज नहीं रह गए थे. वे अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, जीतेंद्र और विनोद खन्ना जैसे स्टार्स की भी आवाज बन चुके थे.

इस दौर से राजेश खन्ना का स्टारडम खत्म होना शुरू हो चुका था. जैसे-जैसे किशोर दूसरे के लिए गाते गाते ऊपर जा रहे थे वैसे-वैसे राजेश खन्ना नीचे आ रहे थे.

  •  Achha To Hum Chalte Hain – Aan Milo Sajna
  • Chala Jata Hoon – Mere Jeevan Saathi
  • Chingari Koi Bhadke – Amar Prem
  • Gore Rang Pe Na Itna – Roti
  • Jai Jai Shiv Shankar – Aap Ki Kasa
  • Kora Kagaz Tha Yeh Man Mera – Aradhana
  • Kuch To Log Kahenge – Amar Prem
  • Mere Dil Mein Aaj Kya Hai – Daag
  • Meri Pyari Behaniya – Sachcha Jhootha
  • Mere Sapnon Ki Raani – Aradhana
  • Pyaar Deewana Hota Hai – Kati Patang
  • Roop Tera Mastana – Aradhana
  • Woh Shaam Kuch Ajeeb Thi – Khamoshi
  • Yahan Wahan Sare Jahan – Aan Milo Sajna
  • Yeh Jo Mohabbat Hai – Kati Patang
  • Yeh Shaam Mastani – Kati Patang

किशोर कुमार और बिग बी का किस्सा

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फिल्म डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना जैसी कई फिल्मों में आज के महानायक अमिताभ बच्चन के लिए गा चुके किशोर कुमार 1980 के दशक के मध्य में एक बार उनसे इसलिए नाराज हो गए थे क्योंकि अमिताभ ने किशोर की एक होम प्रोडक्शन फिल्म में अतिथि कलाकार की भूमिका नहीं की थी. किशोर ने बिग बी के लिए गाना बंद कर दिया था. बाद में सुलह हो गई.

  • Meet Na Mila Re – Abhimaan
  • Tere Mere Milan Ki – Abhimaan
  • My Name is Anthony Gonsalves – Amar Akbar Anthony
  • Rote Rote Hasna Seekho – Andhaa Kanoon
  • Arey Deewano Mujhe – Don
  • Yeh Hai Bambai Nagariya – Don
  • Salamat Rahe Dostana – Dostana
  • Saathie Re – Muqaddar Ka Sikander
  • Rote Hue Aate Hain Sab – Muqaddar Ka Sikander
  • Rim Jhim Gire Saawan – Manzil
  • Aaj Rapat Jaye To – Namak Halal
  • Inteha Ho Gayi Intezaar Ki – Sharaabi
  • Yeh Dosti Hum Nahi – Sholay
  • Dekha Ek Khwaab – Silsila

मनमौजी किशोर
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मसूर की दाल देखकर ‘मसूरी’ घूमने का प्लैन

किशोर दा को बाजा़र जाकर छोटी- छोटी चीज़ें, तरह तरह के आईटम ख़रीदेने का शौक था और एक बार वो ऐसे ही बाज़ार गए जहां अचानक मसूर की दाल देखकर उन्होंने तुरंत ‘मसूरी’ घूमने का प्लान बना लिया. बस कुछ ऐसी ही मनमौजी प्रवृत्ति थी किशोर कुमार की, यही बताया उनके बेटे अमित कुमार ने.

रेडियो की जानी मानी हस्ती अमीन सायानी ने बीबीसी को बताया कि बड़े ही मज़ेदार आदमी थे किशोर, उनका दिल बहुत अच्छा था पर बेहद शरारती भी थे. एक दफ़ा तो उन्होंने इंटरव्यू भी अमीन साहब को इसी शर्त पर दिया कि वो अपने आप को ख़ुद ही इंटरव्यू करेंगे. इसके बाद अमीन सायानी को दिए एक और इंटरव्यू में किशोर कुमार ने ख़ूबसूरत अंदाज़ में सचिन देव बर्मन के साथ पहली मुलाक़ात की नकल करके दिखाई.

रशोकि रमाकु

किशोर कुमार को अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहने का फ़ितूर था। ख़ासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में किशोर कुमार ने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर वह कहते थे- रशोकि रमाकु।

मनोरंजन-कर

बारह साल की उम्र तक किशोर ने गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली। वे रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। फिल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ कर गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को अभिनय सहित गाने सुनाते तो ‘मनोरंजन-कर’ के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे।

बिना पैसे लिए काम नहीं करते थे

किशोर कुमार को अधिकतर फिल्मकार पसंद नहीं करते थे वह थी बिना पैसा लिए काम न करने की आदत. वह तब तक किसी गाने की रिकॉर्डिंग नहीं करते थे जब तक उन्हें पैसा नहीं मिल जाता था.

सेट पर आधे चेहरे पर ही मेक-अप लगाकर पहुंच गए

एक वाकए के अनुसार, जब एक फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्माता ने उन्हें पहले पूरे पैसे नहीं दिए तो वह फिल्म के सेट पर आधे चेहरे पर ही मेक-अप लगाकर पहुंच गए और पूछने पर कहने लगे कि “आधा पैसा तो आधा मेक-अप.” एक और बहुत ही हास्य घटना के अनुसार जब निर्माता आर.सी. तलवार ने उनके पैसे नहीं दिए तो वह हर दिन तलवार के घर सुबह-सुबह पहुंच कर बाहर से ही चिल्लाने लगते “हे तलवार, दे दे मेरे आठ हजार.”

व्यक्तिगत जीवन में कई निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें सनकी तक कहा. कुछ पत्रकारों और लेखकों के अनुसार किशोर ने वार्डन रोड स्थित अपने बंगले के बाहर ‘किशोर से सावधान’ का बोर्ड टांग रखा था. किशोर पैसे न मिलने पर काम बीच में ही छोड़ देते थे.

लेकिन इसके उलट किशोर बड़े दिलदार और हमदर्द भी थे, उनके मित्र अरुण मुखर्जी की मौत के बाद किशोर नियमित रूप से भागलपुर में उनके परिवार को पैसे भेजते थे.

कई बार फ्री में भी गाना गाए

हालांकि उनका उसूल था कि पैसा नहीं तो काम नहीं पर कई बार उन्होंने निर्माताओं के लिए फ्री में भी गाना गाए हैं. किशोर कुमार बहुत ही दयावान और दूसरों की मदद के लिए भी जाने जाते थे. काफी लोग उनके अक्खड़ और मस्तमौला व्यवहार की आलोचना भी करते थे लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करते थे.

बाथरूम-सिंगर

एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक संगीतकार सचिन देव बर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज सुनी तो दादा मुनि से पूछा, ‘कौन गा रहा है?’ अशोक कुमार ने जवाब दिया-‘मेरा छोटा भाई है। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।’ सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस गायक बना दिया।

दो बार आवाज उधार ली

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यह भी मजेदार बात है कि किशोर कुमार की शुरुआत की दो फिल्मों में मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार के लिए अपनी आवाज दी थी।

मोहम्मद रफी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज फिल्म ‘रागिनी’ में उधार दी। गीत हैं- ‘मन मोरा बावरा।’ दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फिल्म ‘शरारत’ में रफी से गवाया था किशोर के लिए-‘अजब है दास्ताँ तेरी ये जिंदगी।’

मेहमूद से लिया बदला

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फिल्म ‘प्यार किए जा’ में कॉमेडियन मेहमूद ने किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। इसका बदला उन्होंने मेहमूद से फिल्म ‘पड़ोसन’ में लिया- डबल पैसा लेकर।

‘चतुर नार’ की रिकॉर्डिंग में तो पूरे 12 घंटे लग गए

किशोर कुमार ने कई गायकों के साथ जुगलबंदी की और सभी के चहेते थे वो. सिंगर मन्ना डे कहते हैं कि किशोर दा ने संगीत की शिक्षा नहीं ली थी. उनकी गायकी उन्हें ईश्वर की देन थी. मन्ना डे ने कहा कि हालांकि मन्ना डे ख़ुद संगीत में पारंगत थे पर फिर भी जब वो किशोर के साथ गाते तो वो कमर कस के गाते थे. उन्होंने कहा कि किशोर की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती. मन्ना डे ने बताया कि फ़िल्म पड़ोसन के हिट गीत ‘चतुर नार’ की रिकॉर्डिंग में तो पूरे 12 घंटे लग गए जिसमें से तीन घंटे तो किशोर दा की बातों पर हंस हंस कर सब का पेट दर्द हो गया.

खंडवा वाले की राम-राम

किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे-‘मेरे दादा-दादियों।’ मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवा वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार।

हरफनमौला: गीतों का झोला

किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते और मुसाफिरों को नए-नए गाने सुनाकर मनोरंजन करते थे।

खंडवा की दूध-जलेबी

किशोर कुमार जिंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आखिरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे-‘फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे।

एक दर्जन बच्चे

किशोर ने अपनी दूसरी बीवी मधुबाला से शादी के बाद मजाक में कहा था-‘मैं दर्जनभर बच्चे पैदा कर खंडवा की सड़कों पर उनके साथ घूमना चाहता हूँ।’

उपकार ‘का यह गीत’ कसमे वादे प्यार वफा

मनोज कुमार किशोर कुमार को लेकर एक यादगार किस्सा सुनाते हैं। एक बार उनकी फिल्म ‘ उपकार ‘ के लिए किशोर कुमार को गाना गाने के लिए आमंत्रित किया तो वह यह कहकर भाग खड़े हुए कि वे तो फिल्म के हीरो के लिए ही गाने गाते हैं, किसी खलनायक पर फिल्माया जाने वाला गाना नहीं गा सकते। लेकिन ‘उपकार’ का यह गीत ‘कसमे वादे प्यार वफा…’ जब हिट हुआ तो किशोर कुमार मनोज कुमार के पास गए और कहने लगे इतने अच्छे गाने का मौका उन्होने छोड़ दिया। इसके साथ ही उन्होंने यह स्वीकार करने में भी देर नहीं की कि मन्ना डे ने जिस खूबसूरती से इस गाने को गाया है ऐसा तो मैं कई जन्मों तक नहीं गा सकूंगा। अच्छा ही हुआ कि मैने इस गाने को नहीं गाया नहीं तो लोग इतने अच्छे गीत में मन्ना डे की इस खूबसूरत आवाज से वंचित रह जाते।

कट तो बोलो

गायन किशोर कुमार का पहला प्यार था। अभिनय के क्षे‍त्र में वे मजबूरीवश आए थे। अभिनय से बचने के लिए वे सीन को अपने हिसाब से करते थे। निर्देशक कुछ और समझाता था और किशोर अजीबोगरीब हरकत करते थे, ताकि उन्हें फिल्म से निकाल दिया जाए। लेकिन हुआ इसके विपरीत। उनकी हरकतों को खूब पसंद किया गया। एक बार उन्हें एक दृश्य में कुछ दूरी तक कार चलाना थी। निर्देशक ने उन्हें कह दिया कि जब वे कट बोलें तब किशोर को गाड़ी रोक देना है। किशोर ने कार चलाई और वे रूके ही नहीं। सीधे चले गए। कुछ देर बाद यूनिट के लोग घबराए कि हीरो कहाँ चला गया। अभी तक वापस नहीं आया। किशोर मुम्बई से निकलकर पनवेल पहुँच गए। वहाँ से उन्होंने फोन लगाया ‍और निर्देशक से पूछा कि कट बोल रहे हो या कार और आगे तक ले जाना है।

किशोर पर प्रतिबंध

आपातकाल के दौरान किशोर कुमार को संजय गाँधी ने दिल्ली में एक सांस्कृतिक निशा में गाने का न्योता भेजा। किशोर ठहरे मन के राजा। जैसा मूड में आए वैसा वे करते थे। वे पारिश्रमिक माँग बैठे। पारिश्रमिक तो नहीं मिला, पर उन्हें आकाशवाणी और दूरदर्शन पर बैन कर दिया गया। आपातकाल हटने पर 5 जनवरी 1977 को उनका पहला गाना बजा- दुःखी मन मेरे, सुन मेरा कहना, जहाँ नहीं चैना, वहाँ नहीं रहना। किशोर को कोई पद्म पुरस्कार नहीं मिला।

हॉरर फिल्मों का शौक

किशोर कुमार ने अपने घर में एक स्पेशल कमरा तैयार किया था। इस पूरे कमरे में डरावनी फिल्मों की वीडियो कैसेट्सप रखी हुई थीं। किशोर कुमार अकसर अँधेरा कर इस कमरे में डरावनी फिल्में देखा करते थे। वे घंटों तक कब्रिस्तान में बैठे रहते थे। उनके निराले शौक देखकर फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें सनकी, डरपोक, पागल, कंजूस, सिरफिरा, मस्त कलंदर कहा जाता था।

अंग्रेज़ी ‘क्लासिक’ फ़िल्में देखने का शौक

किशोर कुमार के बड़े बेटे अमित कुमार ने बीबीसी को बताया कि वो बहुत ही अच्छे पिता और व्यक्ति थे और उन्हें अपने परिवार के साथ समय बिताना बहुत ही पसंद था. वे कहते हैं, “किशोर जी को अंग्रेज़ी ‘क्लासिक’ फ़िल्में देखने का शौक था. एक बार तो अमरीका से वो ढेर सारी ‘वेस्टर्न’ फ़िल्मों की कैसेट ले आए.” यही नहीं वीकेंड पर अक्सर अमित कुमार उनके साथ एक के बाद एक तीन फ़िल्म शो देखकर थक कर घर लौटते थे.

किशोर कुमार की निजी जिंदगी

जिंदगी के हर क्षेत्र में मस्तमौला रहने वाले किशोर कुमार के लिए उनकी लव लाइफ भी बड़ी अनोखी थी. प्यार, गम और जुदाई से भरी उनकी जिंदगी में चार पत्नियां आईं. किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई. इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया. लेकिन शादी के नौ साल बाद ही मधुबाला की मौत के साथ यह शादी भी टूट गई. 1976 में किशोर कुमार ने अभिनेत्री योगिता बाली से शादी की लेकिन यह शादी भी ज्यादा नहीं चल पाई. इसके बाद साल 1980 में उन्होंने चौथी और आखिरी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं.

रुमा गुहा

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1951 में रुमा गुहा के साथ शादी की लेकिन यह केवल 8 बरस तक ही कामयाब रही. 1958 में दोनों का तलाक हो गया. रुमा खास कर बंगला की अभिनेत्री और गायिका रही है गायक अमित कुमार रुमा और किशोर के ही बेटे हैं.

Video: Ruma Guha Thakurta singing and dancing in Palatak

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Ruma Guha, Amit Kumar, Kishore Kumar
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मधुबाला-किशोर कुमार… जब दो टूटे दिल हुए एक

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फिल्म नया दौर से हटाए जाने और दिलीप कुमार से रिश्ता तोड़ने के बाद अभिनेत्री मधुबाला का दुखी होना स्वाभाविक था और स्वाभाविक था रूमा गांगुली द्वारा तलाक लिए जाने के बाद गायक-अभिनेता किशोर कुमार का भी दुखी होना। किशोर-मधुबाला की पहली मुलाकात 1956 में हुई थी। प्रोड्यूसर जे.के. नंदा ने फिल्म शुरू की, तो उसका नाम रखा ढाके की मलमल। हीरोइन का रोल मधुबाला को दिया और हीरो बनाया किशोर कुमार को। किशोर कुमार के व्यवहार से मधुबाला बहुत प्रभावित थीं। दोनों की साथ-साथ बनने वाली यह पहली फिल्म थी और यही वह फिल्म थी, जिसकी शूटिंग करने बीमार मधुबाला आखिरी बार किसी स्टूडियो में गई, लेकिन पति के साथ बनी पहली फिल्म वे पूरी नहीं कर पाई।

1958 में क्लासिक कॉमेडी फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ आई। इसमें मधुबाला ने तीनों गांगुली भाइयों अशोक कुमार, अनूप कुमार और किशोर कुमार के साथ काम किया। फिल्म सुपर हिट रही। मधुबाला के अब्बा किशोर से बहुत प्रभावित हुए। उधर मुगल-ए-आजम की शूटिंग खत्म होने वाली थी कि अताउल्ला खान यानी मधुबाला के अब्बा ने मधुबाला पिक्चर्स के नाम से एक प्रोडक्शन कंपनी की नींव रखी और अपनी दो बेटियों मधुबाला और चंचल के साथ किशोर कुमार को लेकर महलों के ख्वाब नाम से एक फिल्म शुरू कर दी। यही वह फिल्म थी, जो मधुबाला और किशोर को नजदीक ले आई। दिलीप से अलग होने के गम को किशोर कुमार ने मधुबाला की जिंदगी से उड़ा दिया।
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पार्टी और महफिलों से दूर रहने वाले किशोर कुमार की खान खानदान के साथ धीरे-धीरे खूब जमने लगी। उधर किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा ने अपना घर बसा लिया। वे रूमा ठुकराल बन गई। अब किशोर ने अपनी जिंदगी की वीरानी को दूर करने का फैसला किया। दरअसल, खान साहब को भी अब यह यकीन होने लगा कि किशोर मधुबाला से प्यार पैसे के लालच में नहीं कर रहा है। दोनों की शादी हो जाए, तो खान खानदान को खुशी होगी। उधर किशोर अपनी शामें अक्सर गिरनार में बिताने लगे। वे मधुबाला को बाहर लेकर कम ही गए और जब गए, तो बुरका उनकी गर्लफ्रेंड को छुपाए रहता था। अक्सर प्रेमी अपनी प्रेमिका को इम्प्रेस करने के लिए महंगे तोहफे देते हैं, लेकिन कंजूसी के लिए मशहूर किशोर इन फिजूल की बातों पर पैसा वेस्ट नहीं करते थे। हां, कभी-कभार वे मधुबाला को उनके मनपसंद गुलाब के फूलों का गुलदस्ता जरूर दे जाते थे।

मधुबाला की खूबसूरती पर मर-मिटने वालों की भी कमी नहीं थी। उनको विवाह के लिये तीन अलग-अलग लोगों से प्रस्ताव मिले। वह सुझाव के लिये अपनी मित्र नर्गिस के पास गयी। नर्गिस ने भारत भूषण से विवाह करने का सुझाव दिया जो कि एक विधुर थे। नर्गिस के अनुसार भारत भूषण, प्रदीप कुमार एवं किशोर कुमार से बेहतर थे। लेकिन मधुबाला ने अपनी इच्छा से किशोर कुमार को चुना। किशोर कुमार एक तलाकशुदा व्यक्ति थे। मधुबाला के पिता ने किशोर कुमार से बताया कि वह चिकित्सा के लिये लंदन जा रही है तथा उसके लौटने पर ही वे विवाह कर सकते है। मधुबाला मृत्यु से पहले विवाह करना चाहती थीं ये बात किशोर कुमार को पता था।

ऐसा भी कहा जाता है कि शादी करने के लिए किशोर ने अपना धर्म बदल कर अपना नाम करीम अब्दुल रखा था। मधुबाला जैसी पत्नी पाने के लिए इस शर्त को मान लेने में किशोर को कोई ऐतराज नहीं था। निकाह की तारीख तय हो गई और बंगले पर निकाह की रस्म पूरी हुई।

1960 में उन्होने विवाह किया। परन्तु किशोर कुमार के माता-पिता ने कभी भी मधुबाला को स्वीकार नही किया। उनका विचार था कि मधुबाला ही उनके बेटे की पहली शादी टूटने की वज़ह थीं। किशोर कुमार ने माता-पिता को खुश करने के लिये हिन्दू रीति-रिवाज से पुनः शादी की, लेकिन वे उन्हे मना न सके। यह शादी नौ साल तक चली। 23 फरवरी 1969 को मधुबाला की मौत हो गई। किशोर एक बार फिर अकेले थे।
Video: Ankon Mein Tum Ho – Kishore Kumar, Madhubala, Half Ticket

http://www.youtube.com/watch?v=CyiAL1YVuJo

Half Ticket in Colour – Chand Raat song, Kishore Kumar, Madhubala

EK LADKI BHEEGI BAGI SI

1976 में किशोर कुमार ने अभिनेत्री योगिता बाली से शादी की लेकिन यह शादी भी ज्यादा नहीं चल पाई. इसके बाद 1978 में योगिता बाली ने किशोर कुमार से तलाक लेकर मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली.
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1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं

Video: MERE DEEWANE PAN KI BHI DAWA NAHIN

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मनमौजी किशोर… अमित कुमार ने खोले पिता के राज

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अमित ने बताया कि किशोर जी ख़ुद मानते थे कि वो बहुत ही मनमौजी थे. वो क्या करेंगे ये कोई नहीं जानता था.अमित बताते हैं, “एक बार जब उनकी फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म हुई और यूनिट के लोग उनसे पैसे मांगने आए तो किशोर बोले ये इतना ज़्यादा कैसे हो गया, इतना तो नहीं होना चाहिए, ये समझता क्या है अपने आप को डायरेक्टर, ऐसा तो नहीं होगा, मैं प्रोड्यूसर हूँ चलो भगाओ इस डायरेक्टर को इतना ज़्यादा खर्चा कर रहा है, कौन है डायरेक्टर?’ इस पर सबने कहा -आप ही तो हैं.”इस पर किशोर बोले,” हाँ अरे वो तो मैं ही हूँ.”हंसते हुए अमित ने कहा कि ऐसे कई मज़ेदार क़िस्से होते थे उनके साथ.
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‘लोग ढूढेंगे, लेकिन मैं मिलूंगा नहीं’

उनके गायक बेटे अमित कुमार ने बीबीसी को बताया “वो ऊर्जा से भरपूर थे. उनके बारे में बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है. अपने निधन से कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि मैं एक दिन मरूंगा, उसके बाद लोग मुझे ढूंढते रह जाएंगे, लेकिन मैं किसी को नहीं मिलूंगा.”

किशोर कुमार की पत्नी लीना चंदावरकर के मुताबिक वो गाना गाकर घर लौटते तो खूब मस्ती करते. घर के वॉचमैन को भी डरा देते थे.

लीना कहती हैं “वो छोटी-छोटी बातों का भी पूरा मज़ा लेते थे. जब बारिश होती तो बिलकुल बच्चों की तरह उत्साहित होकर कहते कि चलो बारिश में भीगते हैं.”

किशोर दा के साथ ‘एक चतुर नार’, ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ जैसे कई यादगार गाने गा चुके मन्ना डे ने बताया कि जब-जब उन्हें किशोर के साथ गाना होता था, तो वो पूरी तैयारी के साथ स्टूडियो जाते थे.

मन्ना डे कहते हैं “किशोर जैसी आवाज़ तो किसी के पास है ही नहीं. आज भी जहां जाओ, लोग बस किशोर-किशोर कहते रहते हैं. उनके जैसा कलाकार तो आज तक पैदा नहीं हुआ.”

जाने-माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा भी किशोर कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक हैं. यश ने बीबीसी को बताया “किशोर गाते वक़्त बहुत मस्ती करते रहते थे. वो गाते-गाते नाचने लगते. लता दीदी भी उनके साथ गातीं, तो उन्हें भी ख़ूब हंसाते.”

रेडियो की जानी-मानी हस्ती अमीन सयानी ने भी किशोर की यादों को बीबीसी के साथ बांटा.

ऐसे ही एक मज़ेदार वाकये के बारे में अमीन ने बताया कि “एक बार मुझे किशोर दा का इंटरव्यू लेना था. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तभी इंटरव्यू दूंगा, जब तुम स्टूडियो के बाहर बैठोगे. सिर्फ़ मैं बोलूंगा, क्योंकि तुम बहुत बोर करते हो.”

किशोर कुमार का गाया हुआ गाना ‘मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना’ उन पर बिलकुल सटीक बैठता है. ऐसे महान कलाकार को और उनके गानों को भला कौन भुला पाएगा.

वो खंडवा का शरारती छोरा

आभास कुमार गांगुली उर्फ किशोर कुमार मायानगरी में बस तो गए, लेकिन उनका मन आखिरी सांस तक खंडवा की ठेठ कस्बाई संस्कृति में रमा रहा. वह अक्सर कहा करते थे, दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे. इसके अलावा वह खुद को किशोर कुमार खंडवावाले कहते थे.

किशोर ने जीवन के हर क्षण में खंडवा को याद किया, वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कर्यक्रम प्रस्तुत करते थे, शान से कहते थे किशोर कुमार खंडवे वाले, अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसा ज़ज़्बा बहुत कम लोगों में दिखाई देता है।

13 अक्टूबर, 1987 को मुंबई में किशोर के निधन के साथ उनकी खंडवा में बसने की ख्वाहिश ने भी दम तोड़ दिया. हालांकि, उनकी इच्छा के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार उनके गृहनगर खंडवा में ही किया गया. खंडवा स्थित उनके पैतृक आवास पर किशोर कुमार के गीत संगीत का एक संग्रहालय बनाया गया.

सो गई वो आवाज़
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किशोर दा ने मौत से पहले ही अपने लिए तीन गाने चुन लिए थे। जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर, पल पल दिल के पास तुम रहते हो और वो मुकद्दर का सिंदर कहलाएगा..। किशोर कहते थे जब मैं छोटा था तालाब किनारे गाता था तब मेरे दादाजी कहते थे, तेरे गाने से हिरण तेरे पास आ जाते हैं। एक दिन तू बड़ा सिंगर बनेगा। उनके दादाजी की बात सही निकली और किशोर दुनिया के महान सिंगर बने।
Video: Legendary Singer Kishore Kumar Passes Away-Pay last tribute (Source: Lehren TV)

“मैंने ख़ुद को जोकर बना लिया था” : किशोर कुमार

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किशोर कुमार ने यह लेख साठ के दशक मेंफ़िल्मफ़ेयर पत्रिका के लिए लिखा था। वे कश्मीर से लौटे थे और अचानक उन्हें लगा था कि निर्माताओं की और उनकी ख़ुद की पैसे की भूख ने उन्हें एक गंभीर गायक से एक जोकर एक्टर और ऐसा गायक बनाकर रख दिया है जो बस निरर्थक यॉडलिंग में उलझा रहता है। यह दुर्लभ आत्मस्वीकृति है। हमने तहलका केसिनेमा विशेषांक में इसे फिर से प्रकाशित किया है।

कुछ महीने पहले काम से थोड़ी फ़ुर्सत पाकर मैं कश्मीर गया। बहुत पहले मैंने अपनी पत्नी से और ख़ुद से भी वादा किया था कि मैं कश्मीर जाऊंगा। मुझे ख़ुशी है कि आखिरकार मैंने वह वादा निभाया। खुशी इसलिए भी है कि बर्फ से ढकी चोटियों, गहरी घाटियों और इस जगह की शांति ने मुझ पर अनोखा असर किया। अचानक ही मुझे अहसास हुआ कि मैं कौन था और क्या हो गया हूं। मैंने यह भी देखा कि मैं कहां बढ़ा जा रहा हूं। मैंने कई चीजें साफ-साफ महसूस कीं और उन्होंने मुझे हिलाकर रख दिया।

पर इससे पहले कि मैं आगे बढ़ूं, यह ज़रूरी है कि थोड़ा पीछे लौटा जाए और जो बात मैं कह रहा हूं, उसकी पृष्ठभूमि समझी जाए।

यह एक नौजवान की कहानी है। एक ऐसे संजीदा नौजवान की कहानी, जिसे एक जोकर बना दिया गया। और वह कहानी सुनाने का वक्त आ गया है क्योंकि अब वह नौजवान उस पड़ाव पर पहुंच गया है जहां उसकी यह मसखरी ख़त्म हो जानी चाहिए।

यह किशोर कुमार की कहानी है। मेरी कहानी।

सालों पहले जब मैंने फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था तो मैं एक दुबला-पतला गंभीर नौजवान था। मुझे अच्छा काम करने का जुनून था। मैं गाता था। मेरे आदर्श केएल सहगल और खेमचंद प्रकाश थे। ऐसे नाम, जिनकी गूंज तब तक रहेगी जब तक फिल्म इंडस्ट्री का वज़ूद रहेगा। मैं हमेशा इन दोनों हस्तियों को अपने लिए मिसाल के तौर पर देखता था।
एक प्लेबैक सिंगर के तौर पर मेरी शुरुआती कोशिशें खासी कामयाब रही थीं। खेमचंद प्रकाश के साथ मैंने जो गाने गाए, वे गंभीर और सहज थे। उनमें कोई जटिलता नहीं थी। खेमचंद प्रकाश को लगता था कि एक दिन मैं बहुत अच्छा गाने लगूंगा। उनका सोचना ग़लत भी नहीं था।

लेकिन यहीं मेरी डोर ‘दूरदृष्टि’ वाले कुछ लोगों के हाथ में आ गई। उन्होंने तय किया कि इस लड़के को कुछ सलीका सिखाना चाहिए। उन्हें लगता था कि मैं खुद को एक ऐसी शैली में ढाल रहा हूं जो जल्द ही किसी काम की नहीं रहेगी। बिल्कुल उसी तरह, जैसे कल का अखबार आज के लिए बेकार की चीज हो जाता है। उन्हें लगा कि कि मुझे आने वाले कल के हिसाब से ढलना चाहिए।

उनमें से एक ने मुझे सलाह दी, “ऐसे मत गाओ। यह कुछ ज्यादा ही सादा है। इसमें थोड़ा मसाला डालो। कुछ बूम चिक टाइप चीज करो। इसमें जैज़ और यॉडलिंग डालो।”

दूसरे ने कहा, “प्लेबैक सिंगिग में कोई भविष्य नहीं है। एक्टिंग में आ जाओ। पैसा इसी में है।”

तो सलाहें आती गईं और मैं उन पर अमल करता गया। इस तरह खुद को बदलने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा। गंभीर और आदर्शवादी लड़का जल्द ही एक मगरूर और दूसरों में दोष ढूंढने वाला नौजवान बन गया। परंपराओं के लिए अब मेरे मन में कोई सम्मान नहीं था। मैं हर चीज का मज़ाक उड़ाने लगा था। कुल मिलाकर कहें तो मैं बहुत तेजी से वह किशोर कुमार बन रहा था जिसे आप सब जानते हैं।

उस दिन को मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा जब मैं अपने गुरु खेमचंद प्रकाश पर भी हंस दिया था। मैंने उनसे कहा था, “इन गंभीर चीजों को भूल जाइए खेमराज जी। अब ये नहीं चलेंगी। अब लोग जैज़ चाहते हैं। उन्हें यॉडलिंग अच्छी लगती है।”

यॉडलिंग के लिए मैंने उनके सामने एक नमूना भी पेश किया था। वे बहुत नाराज हुए थे। उन्होंने मुझे न सिर्फ खूब फटकारा बल्कि चेताया भी कि मैं एक दिन पछताऊंगा।

आज समझ में आया है कि वे सही थे। लेकिन तब मुझे इसमें ज़रा भी शक नहीं था कि वे गलत हैं। हालात ने भी तो मेरा साथ दिया था। इसलिए मैंने गानों में और ज़्यादा यॉडलिंग और जैज़ के प्रयोग किए। गाने भी हिट रहे।
प्रयोग का यह भूत सिर्फ़ गाने तक ही नहीं रहा। अभिनेता के तौर पर भी मैंने इसे दोहराया। अब तक मैं सामान्य तरीके से ही अभिनय करता आ रहा था। मुझे वह दिन याद है जब एक जाने-माने निर्माता-निर्देशक ने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए मुझसे कहा था, “तुम जो कर रहे थे किशोर, वह 25 साल पुरानी चीज है। अब जब तुम्हें बात समझ में आ गई है तो मैं तुम्हें कुछ बनाकर ही रहूंगा।”

मेरे दिमाग में उसके रहस्यमयी शब्द गूंजते रहे। शूटिंग के दिन जब मैंने अपने डायलॉग बोले तो निर्देशक साहब बोले, ‘ऐसे नहीं बच्चे। इसमें कुछ स्पेशल डालो।’

शॉट फिर से हुआ। निर्देशक साहब अब भी संतुष्ट नहीं थे। सारा दिन रीटेक में ही चला गया। हर बार मैं पहले से ज्यादा घबरा जाता। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह आदमी मुझसे डायलॉग बुलवाना कैसे चाहता है।
जब दिन ख़त्म हुआ तो मेरी हालत देखकर सेट पर मौज़ूद एक कर्मचारी ने मेरे पास आकर कहा, “उनके दिमाग में चार्ली चैप्लिन घूम रहा है। डायलॉग उसी स्टाइल में बोलो।”

किस्मत से मैंने चार्ली चैप्लिन की कई फिल्में देखी हुई थीं। अगले दिन जब शूटिंग शुरू हुई तो मैंने उसी अंदाज में अपने डायलॉग बोल दिए।

‘बहुत अच्छे’, निर्देशक साहब चिल्लाए और मुझे गले लगाते हुए बोले, “मेरा सपना पूरा हो गया है।”

फिर तो एक के बाद एक फिल्में मेरे पास आती गईं और मैं अपनी कॉमेडी भूमिकाओं को जोश से निभाता गया। फ़ॉर्मूला यही था कि मुझे बेवकूफ़ाना से बेवकूफ़ाना हरकतें करनी होती थीं। कूदना-फांदना, धड़ाम से गिरना, चेहरे बनाना और कुल मिलाकर कहें तो एक बंदर की तरह बर्ताव करना। मुझे यकीन था कि जनता भी यही चाहती है। मेरी फिल्में हों या गीत, लगातार हिट हो रहे थे। मुझे लगता था कि आलोचक कौन होते हैं यह कहने वाले कि अभिनय की मेरी शैली खराब है। आखिर मैं तो वही कर रहा हूं जो जनता चाहती है।

समय के साथ मुझे और भी लोग मिलते गए जो इसी शैली को समर्पित थे। उनमें मेरे साथी भी थे और निर्माता-निर्देशक भी। इस तरह मैं एक ऐसा बंदर बन गया जिसे भारी मेहनताना मिलता था। मैं भी पैसा कमा रहा था और मेरे प्रोड्यूसर भी। मेरी फिल्में हिट हो रही थीं और जनता खुश थी। इससे ज़्यादा किसी को क्या चाहिए?

एक फ़िल्म का उदाहरण मुझे याद आ रहा है। इस फिल्म में कुछ ऐसे सीन थे जिनमें मेरा किरदार अपने बड़े भाई को गालियां दे रहा है। उसे ‘जलील कुत्ते’ जैसे शब्द कह रहा है। मुझे लगा कि जनता निश्चित तौर पर इसे पसंद नहीं करेगी। छोटा भाई अपने बड़े भाई को गालियां दे, यह भला किसे अच्छा लगेगा? मैंने निर्देशक से यह बात कही। उसका कहना था, ‘चिंता मत करो किशोर। तुम जो भी करोगे, जनता उसे स्वीकार कर लेगी।’

और जब फिल्म के प्रीमियर के दौरान ये सीन स्क्रीन पर आए तो दर्शकों ने तालियां बजाईं। अब मुझे और पक्का यकीन हो गया था कि एक्टिंग का मेरा यह स्टाइल सही है, इसलिए मैं इसमें पूरी तरह से डूब गया। वह ऐसा वक्त था, जब मैं कहा करता था कि पैसा ही सब कुछ है।

फिर एक दिन मैंने अपनी ही फिल्म लांच की। इसका नाम था- चलती का नाम गाड़ी। अपने सही होने पर मुझे इतना यकीन था कि जब संगीतकार एसडी बर्मन ने इसके लिए बनाई हुई कुछ मौलिक धुनें मुझे सुनाईं तो मैंने उन्हें हड़का दिया। मैंने कहा, ‘क्या आपको लगता है जनता यह सुनना चाहती है? कृपा करके आप किसी म्यूजिक स्टोर में जाइए और कुछ रॉक एंड रोल रिकॉर्ड्स खरीदिए। लेकिन ध्यान रखें कि वे रिकॉर्डस न खरीद लें, जो दूसरे संगीतकार भी खरीद रहे हों।’

इसके बाद एक बड़ी अजब चीज हुई। इस फिल्म में मैं एक गायक का किरदार निभा रहा था। मेरे एक गीत के लिए संगीतकार ने कहा कि इसे मेरी नहीं, बल्कि किसी दूसरे प्लेबैक सिंगर की आवाज में रिकॉर्ड किया जाएगा। मैंने एतराज किया तो जवाब आया कि यह शास्त्रीय गीत है और मैं शास्त्रीय गीत नहीं गा सकता। यह बात उस शख़्स के लिए कही जा रही थी जिसने अपना करियर ही शास्त्रीय गीतों से शुरू किया था। सफलता और घमंड से बनी मेरी दुनिया की बुनियाद पर यह पहली चोट थी।

फिर मेरी फ़िल्म बंदी आई। ईमानदारी से कहूं तो इसे लेकर मैं सशंकित था क्योंकि इसके दूसरे हिस्से में मुझे एक बूढे़ व्यक्ति की भूमिका अदा करनी थी। यह एक गंभीर भूमिका थी। मुझे लगा कि जनता को यह पसंद नहीं आएगी। इसलिए इसकी भरपाई के चक्कर में मैंने फिल्म के पहले हिस्से में अपनी चिरपरिचित एक्टिंग की अति कर दी। लेकिन मुझे हैरानी हुई जब पहले हिस्से की आलोचना और दूसरे हिस्से की तारीफ़ हुई।

इसके बाद आंखें खोलने वाली एक और घटना हुई। मेरी एक फिल्म आई थी, आशा। यह इस सिद्धांत के साथ बनाई गई थी कि जितनी अति उतना अच्छा। इसमें वह सब कुछ था जो जनता चाहती थी। रिलीज होने के बाद यह उम्मीदों पर बमुश्किल आधी ही खरी उतर पाई। इसके बाद एक आलोचक ने लिखा कि अगर मैं इसी रास्ते पर चलता रहा तो मेरे लिए अपना दायरा बढ़ाना और दूसरी तरह की भूमिकाएं करना मुश्किल होगा। मुझे लगा कि उसकी बात सही है।

फिर अब कश्मीर में मैंने ख़ुद को अपने असली रूप में देखा। मुझे लगा कि मैं एक बेमतलब का मसखरा हूं। ऐसा आदमी, जिसे बस मसखरी के लायक ही समझा जाता है। मुझे लगा कि मैं पैसे के पीछे भागने वाला एक ऐसा इंसान हूं जिसने अपना स्तर सबसे नीचे कर दिया है, इस यकीन में कि उसकी फ़िल्में लोगों द्वारा सराही जाती हैं। मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ऐसा कलाकार हूं जिसने इतना काम सिर पर ले लिया है कि वह लगभग पागल हो गया है। वह मानसिक रूप से बेचैन रहता है, चिंता करता रहता है और उसे नींद नहीं आती।

मैं समझ गया कि मैं और मुझसे जुड़े लोग फ़िल्मों के नाम पर बेवकूफ़ी बना रहे हैं। मुझे महसूस हुआ कि समकालीन फ़िल्म संगीत एक तमाशा बन कर रह गया है। मुझे यह अहसास हुआ कि मैं ही नहीं, मेरे बड़े भाई अशोक कुमार भी उस नाव पर सवार हैं। उन्हें सब ऐसी फ़िल्में दी जा रही हैं जो उनकी महान प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करतीं।

मुझे एक किस्सा और याद आता है। मैं एक म्यूजिक स्टोर में था। वहां एक सेल्समैन ने मुझसे कहा कि आजकल विदेशी जब पूछते हैं कि इंडियन रिकॉर्ड्स में क्या नई चीज आई है तो उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। उसका कहना था, “मैं उन्हें क्या दिखाऊं? नए के नाम पर या तो मशहूर उस्तादों की कुछ रिकॉर्डिंग्स हैं या फिर केएल सहगल के गानों के रिकॉर्ड। मैं उन्हें फ़िल्म संगीत वाले रिकॉर्ड कैसे दिखाऊं? उन्हें तो झटका लग जाएगा।”

इसलिए जब मैं अपनी छुट्टी से लौटा तो मैं फ़ैसला कर चुका था। मैंने सोच लिया था कि अगर अब मुझे ऐसी भूमिकाओं के प्रस्ताव आते हैं तो मैं सीधे उन्हें ठुकरा दूंगा।

बम्बई वापस आने के बाद जल्द ही दो फ़िल्मकारों ने यह कहते हुए मुझसे संपर्क किया कि वे मुझे अपनी फ़िल्म में लेना चाहते हैं। वे सुबह-सुबह मेरे घर आए। मेरा सेक्रेटरी भी घर पर था। मेरी पत्नी पोर्च में एक सब्जीवाले से सब्जियां खरीद रही थी। इन निर्देशकों ने बात मेरी तारीफ से शुरू की। उनका कहना था कि मैं एक जीनियस हूं और उनके पास मेरे लिए एक बढ़िया किरदार है। उनमें से एक ने कहा, “आप सिचुएशन सुनिए। आप हीरोइन के बेडरूम में घुसते हैं। आपको पता है ना, किस तरह? हा हा हा..। आप एक साड़ी पहनकर कमरे में घुसते हैं। है न शानदार? इसके बाद आपको पता है ना कि क्या करना है?”

मैंने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, “एक मिनट। मैं आपको बताता हूं कि मैं क्या करूंगा।”

वे कुछ समझते, इससे पहले ही मैंने छलांग लगाई और दो कलाबाजियां खाते हुए पोर्च में पहुंच गया। दोनों लोग चकरा गए। मैंने अपने सेक्रेटरी से कहा कि आगे वह उन दोनों से बात कर ले। फिर मैं बिना कुछ कहे भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद जब मैं बाहर आया तो दोनों लोग जा चुके थे।

मैंने सेक्रेटरी से पूछा, “क्या हुआ?”

“उन्हें लगा कि आप पागल हो गए हैं। वे बहाना बनाकर निकल गए”, सेक्रेटरी ने कहा।

ख़ैर, मुद्दा यह है कि बेकार की चीजों के पीछे भागने की इस अंधी और गलत दौड़ को छोड़ने का वक्त आ गया है। मैं अब सीधा चलना चाहता हूं। अगर कॉमेडी है तो वह गूढ़ होनी चाहिए। संगीत वास्तव में हिन्दुस्तानी होना चाहिए। फ़िल्मों का कोई मतलब होना चाहिए।

मैं ख़ुद एक फ़िल्म बनाना चाहता हूं। मैं इस पर जल्द ही काम शुरू करूंगा। मैं ख़ुद इसे निर्देशित करूंगा और इसमें संगीत भी दूंगा। यह मेरी उन फिल्मों से बिल्कुल अलग होगी, जिनकी दर्शकों को आदत हो चुकी है। मुझे पता है कि मेरे कई दोस्त और शुभचिंतक यह सुनते ही मेरी तरफ दौड़ेंगे और सलाह देंगे कि मैं ऐसी बेवकूफी न करूं। वे मुझे मनाने की कोशिश करेंगे कि मैं वही करता रहूं जो मैं अब तक सफलतापूर्वक करता आ रहा हूं। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि उनकी बात न सुनूं।

अगर फ़िल्म चल जाती है तो बहुत अच्छा। अगर नहीं चली, तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता। एक फिल्म फ्लॉप हो सकती है, दूसरी भी और फिर तीसरी-चौथी भी। हो सकता है कि मैं अपना सारा पैसा गँवा दूं। वह पैसा, जिसकी कभी मैंने इतनी पूजा की है। हो सकता है कि मैं नाकामयाब हो जाऊं और मुझे इंडस्ट्री छोड़नी पड़े। पर कम से कम मुझे इस बात के लिए तो याद किया जाएगा कि मैंने कुछ अच्छा करने की कोशिश की। लोग शायद कहेंगे कि ‘बेचारा किशोर कुमार, जोकर बनकर अच्छा-खासा चल रहा था। फिर उसने कुछ अलग और अच्छा करने की कोशिश की। देखो क्या हाल हो गया उसका!’

भले ही ऐसा हो जाए लेकिन मुझे लगता है कि यह भी मेरे लिए अच्छा ही होगा।

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Kishor Live Pal pal dil ke paas

किशोर कुमार के प्रसिद्ध गाने

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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3 Responses to किशोर कुमार- आवाज़ के जादूगर, कामेडी के सरताज… ज़िदादिल और मस्तमौला अंदाज़ के कुछ रोचक किस्से

  1. kuldeep singh says:

    bhaut acha article likha h aapne sir..feeling kishor sahab inside me…

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