मीना कुमारी: चालीस साल लम्बी दर्द की दास्तां

Picture1

‘ट्रैजेडी क्वीन’ की निजी जिंदगी किसी ‘ट्रैजेडी’ से कम नहीं रही

ट्रैजेडी क्वीन नाम से मशहूर मीना कुमारी का फिल्मी सफर भले ही किसी सुनहरे सपने से कम नहीं रहा लेकिन जब उनके निजी जीवन का जिक्र उठता है उनकी तन्हाई और उदासी साफ-साफ झलक उठती है. महजबीं से मीना कुमारी बनी यह अभिनेत्री अपने जीवन में निराशा और अकेलेपन से छुटकारा नहीं पा सकी.

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो- फिल्म पाकीजा का यह गाना मीनाकुमारी की जिंदगी का ऐसा फलसफा है, जिसके रहस्य से चादर हटाई जाना अभी बाकी है। महज चालीस साल की उम्र में महजबीं उर्फ मीना कुमारी खुद-ब-खुद मौत के मुँह में चली गईं।

मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था, बंबई में 1 अगस्त 1933 को पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मंजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था।

मुंबई में एक क्लिनिक के बाहर मास्टर अली बख्श नाम के एक शख्स बड़ी बेसब्री से अपनी तीसरी औलाद के जन्म का इंतजार कर रहे थे। दो बेटियों के जन्म लेने के बाद वह इस बात की दुआ कर रहे थे कि अल्लाह इस बार बेटे का मुंह दिखा दे तभी अंदर से खबर आई तो वह माथा पकड़ कर बैठ गए। उनके घर इस बार भी बेटी ने ही जन्म लिया था।

मास्टर अली बख्श ने तय किया कि वह बच्ची को घर नहीं ले जाएंगे और वह बच्ची को अनाथालय छोड़ आए, लेकिन बाद में उनकी पत्नी के आंसुओं ने बच्ची को अनाथालय से दो-चार घंटे बाद घर लाने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया। बच्ची का चांद सा माथा देखकर उसकी मां ने उसका नाम रखा-माहजबीं। बाद में यही माहजबीं फिल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी के नाम से मशहूर हुई।

उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो),भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था ।

परिवार की आर्थिक स्थित खराब रहने के कारण मीना कुमारी को बचपन में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। वर्ष 1939 में बतौर बाल कलाकार मीना कुमारी को विजय भट्ट की फिल्म ‘लेदरफेस’ में काम करने का मौका मिला।

मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। ‘वीर घटोत्कच’(1949) और ‘श्री गणेश महिमा’ (1950) जैसी फिल्में प्रदर्शित तो हुई, पर उन्हें इनसे कुछ खास पहचान नहीं मिली। अपनी पहचान को तलाशती मीना कुमारी को लगभग दस वर्षों तक फिल्म जगत में संघर्ष करना पड़ा।

  • – वर्ष 1952 में मीना कुमारी को विजय भट्ट के निर्देशन में ‘बैजू बावरा’ में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म की सफलता के बाद मीना कुमारी बतौर अभिनेत्री फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गईं। उनका नाम मीना कुमारी इसी फिल्म से पड़ा। ‘बैजूबावरा’ में अभिनय के लिए बेहतरीन अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं।
  • – 1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।
  • – वर्ष 1952 में मीना कुमारी ने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही के साथ शादी कर ली। वर्ष 1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही की विवाहित जिंदगी में दरार आ गई। काम के प्रति समर्पित मीना कुमारी अपने काम में कमाल अमरोही की बेवजह दखल को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। वर्ष 1964 के बाद मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग-अलग रहने लगे और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे में डूबो लिया।
  • – वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘शारदा’ में मीना कुमारी के अभिनय के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फिल्म में मीना कुमारी ने अभिनेता राजकपूर की प्रेयसी के अलावा उनकी सौतेली मां की भूमिका भी निभाई। हांलाकि इस वर्ष फिल्म ‘मदर इंडिया’ के लिए फिल्म अभिनेत्री नरगिस को सारे पुरस्कार दिए गए, लेकिन ‘बॉम्बे जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ ने मीना कुमारी को उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामित किया।
  • – वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिने करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। इस वर्ष उनकी ‘आरती’, ‘मैं चुप रहूंगी’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्में प्रदर्शित हुईं। इसके साथ ही इन फिल्मों के लिए वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार के लिए नामित की गईं। यह ‘फिल्मफेयर’ के इतिहास में पहला ऐसा मौका था, जहां एक अभिनेत्री को ‘फिल्मफेयर’ के तीन वर्गों में नामित किया गया था।
  • – गुरूदत्त की फिल्म साहिब बीबी और गुलाम में मीना कुमारी ने छोटी बहू के किरदार को जीवंत कर दिया। इस फिल्म के जरिए मीना कुमारी ने बहुत खूबसूरती से अपनी निजी जिंदगी को रूपहले पर्दे पर साकार किया। यह फिल्म आज भी हिंदी की कलाफिल्मों में शुमार की जाती है।
  • – इसके बाद कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण में लगभग चौदह वर्ष लग गए। इस दौरान मीना कुमारी कमाल अमरोही से अलग हो चुकी थीं, फिर भी उन्होंने फिल्म की शूटिंग जारी रखी क्योंकि उनका मानना था कि ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों में काम करने का मौका बार-बार नहीं मिलता। वर्ष 1972 में जब ‘पाकीजा’ प्रदर्शित हुई तो फिल्म में मीना कुमारी के अभिनय को देख दर्शक मुग्ध हो गए और यह फिल्म आज भी मीना कुमारी के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है।
  • – 1972 मे प्रदर्शित फिल्म मेरे अपने में मीना कुमारी ने एक वृद्ध महिला का किरदार निभाया। फिल्म में मीना कुमारी के संजीदा अभिनय को देख कर दर्शक भावविभोर हो गए। अभिनय मे आई एकरुपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेत्री के रूप मे स्थापित करने के लिए मीना कुमारी ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इसके बाद मीना कुमारी ने जवाब 1970 और दुश्मन 1971 जैसी चरित्र भूमिका वाली कई फिल्मों के जरिए भी दर्शकों के दिल पर राज किया।
    Picture2
    मीना कुमारी के सिने करियर में उनकी जोड़ी फिल्म अभिनेता अशोक कुमार के साथ खूब जमी। मीना कुमारी और अशोक कुमार की जोड़ी वाली फिल्मों में ‘तमाशा’, ‘परिणीता’, ‘बादबान’, ‘बंदिश’, ‘भीगी रात’, ‘शतरंज’, ‘एक ही रास्ता’, ‘सवेरा’, ‘फरिश्ता’, ‘आरती’, ‘चित्रलेखा’, ‘बेनजीर’, ‘बहू बेगम’, ‘जवाब’ और ‘पाकीजा’ जैसी फिल्में शामिल हैं।

हिन्दी फिल्म जगत में ‘ट्रेजेडी क्वीन’ कही जानी वाली मीना कुमारी की जोड़ी ‘ट्रेजेडी किंग’ दिलीप कुमार के साथ भी काफी पसंद की गई। मीना कुमारी और दिलीप कुमार की जोड़ी ने ‘फुटपाथ’, ‘आजाद’, ‘कोहीनूर’ और ‘यहूदी’ जैसी फिल्मों में एक साथ काम किया।

अभिनय में आई एकरुपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेत्री के रूप में स्थापित करने के लिए मीना कुमारी ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इसके बाद मीना कुमारी ने चरित्र भूमिका वाली ‘जवाब’ और ‘दुश्मन’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के जरिए भी दर्शकों के दिल पर राज किया।

मीना कुमारी को मिले सम्मानों की चर्चा की जाए तो उन्हें अपने अभिनय के लिए चार बार ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार से नवाजा गया। मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1964 में भी फिल्म ‘परिणीता’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया।

इसके बाद उन्हें ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार के लिए लगभग 8 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा और वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ मिला। इसके बाद वर्ष 1965 में फिल्म ‘काजल’ के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

मीना कुमारी यदि अभिनेत्री नहीं होती तो निश्चित तौर पर शायरा होती। गीतकार और शायर गुलजार से एक बार मीना कुमारी ने कहा था ये जो एक्टिग मैं करती हूं उसमें एक कमी है ये फन, ये आर्ट मुझसे नही जन्मा है ख्याल दूसरे का, किरदार किसी का और निर्देशन किसी का। मेरे अंदर से जो जन्मा है वह लिखती हूं जो मैं कहना चाहती हूं, वह लिखती हूं।

मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया, जिसे उन्होंने नाज उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपनी जिंदगी का नजरिया पेश किया है-

चांद तन्हा है आसमां तन्हा,
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा

लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली हिन्दी सिने जगत की महान अभिनेत्री मीना कुमारी, 31 मार्च 1972 को इस दुनिया से रुखसत हो गईं। चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो- फिल्म पाकीजा का यह गाना मीनाकुमारी की जिंदगी का ऐसा फलसफा है, जिसके रहस्य से चादर हटाई जाना अभी बाकी है। महज चालीस साल की उम्र में महजबीं उर्फ मीना कुमारी खुद-ब-खुद मौत के मुँह में चली गईं। इसके लिए मीना के इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार, कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
Picture39

मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी 15 बातें

  • * चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो- फिल्म पाकीजा का यह गाना मीनाकुमारी के यादगार गानों में से एक है।
  • * मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से शादी की, हालांकि उनकी शादीशुदा जिंदगी तनाव से भरी रही।
  • * फिल्म फूल और पत्थर (1966) में धर्मेन्द्र के साथ मीना कुमारी ने काम किया था।
  • * पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह साल का समय लगा।
  • * पाकीजा फिल्म मीना कुमारी ने बीमारी की हालत में की।
  • * गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू के किरदार में मीना कुमारी को सराहा गया।
  • * कहते हैं मीना कुमारी पहली तारिका थीं, जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब पी।
  • * कहते हैं धर्मेन्द्र की बेवफाई ने मीना कुमारी को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया।
  • * कहते हैं कि वे छोटी-छोटी बोतलों में देसी-विदेशी शराब भरकर पर्स में रखने लगीं। जब मौका मिला एक शीशी गटक ली।
  • * गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू के किरदार में मीना कुमारी को सराहा गया।
  • * दादामुनि अशोक कुमार ने मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में की थीं।
  • * पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह साल का समय लगा।
  • * फिल्म ‘पाकीजा’ 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई और 31 अगस्त 1972 को मीना कुमारी चल बसी।
  • * महज चालीस साल की उम्र में महजबीं उर्फ मीना कुमारी खुद-ब-खुद मौत के मुँह में चली गईं।

Winner/Nominations for Award
12 Nominations: Meena Kumari
In 1962, she made history by getting all the three nominations for Filmfare Best Actress Award, for her roles in Aarti, Main Chup Rahungi, and Sahib Bibi Aur Ghulam. She won the award for Sahib Bibi Aur Ghulam. Upperstall.com wrote about her performance
• 1954 Meena Kumari – Baiju Bawra as Gauri (Winner)
• 1955 Meena Kumari – Parineeta as Lolita(Winner)
• 1956 Meena Kumari – Azaad as Shobha
• 1959 Meena Kumari – Sahara as Leela
• 1960 Meena Kumari – Chirag Kahan Roshni Kahan as Ratna
• 1963 Meena Kumari – Sahib Bibi Aur Ghulam as Chhoti Bahu (Winner)
• 1964 Meena Kumari – Dil Ek Mandir as Sita
• 1966 Meena Kumari – Kaajal as Madhavi (Winner)
• 1967 Meena Kumari – Phool Aur Patthar as Shanti Devi
• 1973 Meena Kumari – Pakeezah as Nargis / Sahibjaan (posthumous nomination)

जीवन के कुछ पहलु
आर्थिक तंगी से बनीं बाल कलाकार
Picture40

  • मीना कुमारी को एक अभिनेत्री के रूप में, एक पत्नी के रूप में, एक प्यासी प्रेमिका के रूप में और एक भटकती-गुमराह होती हर कदम पर धोखा खाती स्त्री के रूप में देखना उनकी जिंदगी का सही पैमाना होगा।
  • मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं।
  • प्रभावती की मुलाकात थियेटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महज़बी (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)।
  • अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। महजबीं को मात्र चार साल की उम्र में फिल्मकार विजय भट्ट के सामने खड़ा कर दिया गया। इस तरह बीस फिल्में महजबीं (मीना) ने बाल कलाकार के रूप में न चाहते हुए भी की। महज़बीं को अपने पिता से नफरत सी हो गई और पुरुष का स्वार्थी चेहरा उसके जेहन में दर्ज हो गया।

कमाल साहब के साथ दूसरी बीवी का सफर
Picture19

  • फिल्म बैजू बावरा (1952) से मीना कुमारी के नाम से मशहूर और लोकप्रिय महजबीं ने अपने पिता की इमेज को धकियाते हुए उससे हमदर्दी जताने वाले कमाल अमरोही के व्यक्तित्व में अपना सुनहरा भविष्य देखा। वे उनके नजदीक होती चली गईं। नतीजा यह रहा कि दोनों ने निकाह कर लिया। लेकिन यहाँ उसे कमाल साब की दूसरी बीवी का दर्जा मिला। उनके निकाह के एकमात्र गवाह थे जीनत अमान के अब्बा अमान साहब।
  • कमाल अमरोही और मीना कुमारी की शादीशुदा जिंदगी करीब दस साल तक एक सपने की तरह चली। मगर संतान न होने से उनके संबंधों में दरार आने लगी। फिल्म फूल और पत्थर (1966) के नायक ही-मैन धर्मेन्द्र से मीना की नजदीकियाँ, बढ़ने लगीं। इस दौर तक मीना एक सफल, लोकप्रिय तथा बॉक्स ऑफिस सुपर हिट हीरोइन के रूप में अपने को स्थापित कर चुकी थी
  • धर्मेन्द्र का करियर डाँवाडोल चल रहा था। उन्हें मीना का मजबूत पल्लू थामने में अपनी सफलता महसूस होने लगी। गरम धरम ने मीना को सूनी-सपाट अंधेरी जिंदगी को एक ही-मैन की रोशन से भर दिया। कई तरह के गॉसिप और गरमा-गरम खबरों से फिल्मी पत्रिकाओं के पृष्ठ रंगे जाने लगे। इसका असर मीना-कमाल के रिश्ते पर भी हुआ।

In 1952, on the sets of one of her films, Meena Kumari fell in love with and married film director, Kamal Amrohi, who was fifteen years elder than her and was already married. She wrote about Amrohi:

“Dil saa jab saathi paya
Bechaini bhi woh saath le aaya”

Soon after marriage, Kamal Amrohi and Meena Kumari produced a film called Daera (1953), which was based on their love story. They also planned another film, Pakeezah. However, it took sixteen years (1956 to 1972) before Pakeezah reached the silver screen. (The scenes in Pakeezah’s popular song, Inhi logon ne, were originally filmed in black and white, and were later reshot in color.)

It is said that Amrohi did not want children with Meena Kumari because she was not a Syed. They raised Kamal Amrohi’s son, Tajdaar, who was greatly attached to his chhoti ammi (younger mother).

Due to their strong personalities, however, Meena Kumari and Kamal Amrohi started to develop conflicts, both professionally and in their married life. Their conflicts led to separation in 1960, and ultimately divorce in 1964. Highly affected Meena Kumari, who, once a happy woman, became depressed and found solace in heavy drinking. They remarried, but Meena Kumari had become an alcoholic by then.

She expressed her sorrows prominently in her poetry. About Kamal Amrohi she wrote:

“Tum kya karo ge sun kar mujh se meri kahani
Bay lutf zindagi ke qissay hain pheekay pheekay”

At the time of the divorce, she wrote:

“Talaaq to day rahay ho Nazar-e-qehar ke saath
Jawani bhi meri lauta do Mehar ke saath”

मीना एक: प्रेमी अनेक
Picture8

  • मीना कुमारी का नाम कई लोगों से जोड़ा गया। फिल्म बैजू बावरा के निर्माण के दौरान नायक भारत भूषण भी अपने प्रेम का इजहार मीना के प्रति कर चुके थे। जॉनी राजकुमार को मीना कुमार से इतना इश्क हो गया कि वे मीना के साथ सेट पर काम करते अपने संवाद भूल जाते थे।
  • बॉलीवुड के जानकारों के अनुसार मीना-धर्मेन्द्र के रोमांस की खबरें हवा में बम्बई से दिल्ली तक के आकाश में उड़ने लगी थीं। जब दिल्ली में वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन से एक कार्यक्रम में मिलीं तो राष्ट्रपति ने पहला सवाल पूछ लिया कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेन्द्र कैसा है?
  • इसी तरह फिल्मकार मेहबूब खान ने महाराष्ट्र के गर्वनर से कमाल अमरोही का परिचय यह कहकर दिया कि ये प्रसिद्ध स्टार मीना कुमारी के पति हैं। कमाल अमरोही यह सुन नीचे से ऊपर तक आग बबूला हो गए थे। धर्मेन्द्र और मीना के चर्चे भी उन तक पहुँच गए थे। उन्होंने पहला बदला धर्मेन्द्र से यह लिया कि उन्हें पाकीजा से आउट कर दिया। उनके स्थान पर राजकुमार की एंट्री हो गई। कहा तो यहाँ तक जाता है कि अपनी फिल्म रजिया सुल्तान में उन्होंने धर्मेन्द्र को रजिया के हब्शी गुलाम प्रेमी का रोल देकर मुँह काला कर दिया था।

छोटी बहू बन गई मीना
Picture10

  • पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह साल का समय लगा। इस देरी की वजह मीना-कमाल का अलगाव रहा। लेकिन मीना जानती थी कि फिल्म पाकीजा कमाल साब का कीमती सपना है। उन्होंने फिल्म बीमारी की हालत में की। मगर तब तक उनकी लाइफ स्टाइल बदल चुकी थी।
  • गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में समा गई थी। मीना कुमारी पहली तारिका थीं, जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब के प्याले पर प्याले खाली किए। धर्मेन्द्र की बेवफाई ने मीना को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया। वे छोटी-छोटी बोतलों में देसी-विदेशी शराब भरकर पर्स में रखने लगीं। जब मौका मिला एक शीशी गटक ली।
  •  दादा मुनि अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में कर चुके थे। एक कलाकार का इस तरह से सरे आम मौत को गले लगाना उन्हें रास नहीं आया। वे होमियोपैथी की छोटी गोलियाँ लेकर इलाज के लिए आगे आए। लेकिन जब मीना का यह जवाब सुना ‘दवा खाकर भी मैं जीऊँगी नहीं, यह जानती हूँ मैं। इसलिए कुछ तम्बाकू खा लेने दो। शराब के कुछ घूँट गले के नीचे उतर जाने दो’ तो वे भीतर तक काँप गए।

पाकीजा में मीना कुमारी– साहिब जान की भूमिका में
Picture14

  • आखिर 1956 में मुहूर्त से शुरू हुई पाकीजा 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई और 31 अगस्त 1972 को मीना चल बसी। तमाम बंधनों को पीछे छोड़ तनहा चल दी बादलों के पार अपने सच्चे प्रेमी की तलाश में।
  • पाकीजा सुपरहिट रही। अमर हो गए कमाल अमरोही। अमर हो गईं ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी। मगर अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक भी पैसे नहीं थे उस तनहा तारिका के पास। उस अस्पताल का बिल अदा किया वहाँ के एक डॉक्टर ने, जो मीना का जबरदस्त प्रशंसक था।

इस फिल्म में लता मंगेशकर की गाई गज़लें दिल को छू जाती हैं।

इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा —हो जी हो , दुपट्टा मेरा —

थाडे रहियो –ओ बांके यार रे —थाडे रहियो — इस गाने पर मीना कुमारी का नृत्य –कत्थक –गज़ब का है।

चलते चलते –यूँ ही कोई –मिल गया था –सरे राह चलते चलते — इस गाने में फिल्म का सार है। ज़रा सोचिये एक अजनबी जिसे देखा तक नहीं –लेकिन दिल में ऐसा बस गया कि जब भी ट्रेन की सीटी बजती , साहिब जान के दिल में भी घंटियाँ बजने लगती । कितना दर्द होता है , एक अनजाने इंतज़ार में ।

मौसम है आशिकाना –अ दिल –कहीं से उनको –ऐसे में –ढूंढ लाना –मौसम है आशिकाना —

यह गाना बहुत ही रोमांटिक वातावरण में फिल्माया गया है । साहिब जान इत्तेफाक से उसी जगह पहुँच जाती है , जहाँ वो अनजान प्रेमी –राज कुमार –का कैम्प है। किसी निशानी से उसको पहचान उसका इंतजार करती है और गाती है।

चलो दिलदार चलो –चाँद के पार चलो — हम हैं तैयार चलो —

ये युगल गीत तब आता है जब कैम्प में दोनों की पहली बार मुलाकात होती है । ज़ाहिर है मोहब्बत की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी। इस गाने को जितनी बार भी सुनेंगे , हर बार एक नशा सा छा जायेगा ।

धर्मेन्द्र की बेवफाई ने कर दिया था मीना कुमारी को शराबी बनने पर मजबूर!

Picture41
फिल्म फूल और पत्थर (1966) के नायक ही-मैन धर्मेन्द्र से वह एक तरफ़ा इश्क करने लगीं|

  • फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने के लिए प्रयास कर रहे धर्मेन्द्र को भी मीना जैसी स्थापित अभिनेत्री का सहारा मिला और उन्होंने करियर को आगे बढ़ाने के लिए मीना का जमकर सहारा लिया|
  • मीना की सिफारिश पर धर्मेन्द्र को कई फिल्मों में काम मिला| गरम धरम ने मीना को सूनी-सपाट अंधेरी जिंदगी को एक ही-मैन की रोशन से भर दिया। कई तरह के गॉसिप और गरमा-गरम खबरों से फिल्मी पत्रिकाओं के पृष्ठ रंगे जाने लगे।
  • जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.
  • इसके बाद धर्मेन्द्र ने भी उनका साथ छोड़ दिया और मीना गम में डूब गयीं| अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने शराब को अपना हमसफ़र बनाया| वह पहली अभिनेत्री थीं, जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब पी।
  • मीना कुमारी की जब मृत्यु हुई उस वक़्त उनकी उम्र 39 वर्ष थी. 31 मार्च 1972 को उनकी मृत्यु लीवर सिरोसिस नाम की बीमारी की वजह से हुई. मीना कुमारी के बारे में बात करते हुए चौकसे कहते हैं, ”मीना कुमारी की शराबनोशी के किस्से बहुत मशहूर हैं. अपने आखिरी के सालों में वो बहुत शराब पीने लगीं थीं.” इतना ही नहीं चौकसे बताते हैं कि कैसे मीना कुमारी के नजदीकी लोग उन्हें देसी शराब विदेशी शराब की बोतल में भर कर दे देते थे. नशे में डूबी मीना को कुछ मालूम भी नहीं पड़ता
  • फिल्मी पर्द पर दुख झेलती इस अदाकारा के असली जीवन में भी दुख ही दुख भर गये। या यू कहा जाये कि इस अदाकारा ने खुद को जमाने से दूर बहुत दूर कर दुखो से दोस्ती कर ली। पर इतनी बडी दुनिया में तन्हा जीना बडा मुश्क्लि होता है। मीना को तन्हाई खाए जा रही थी इसी दौरान न जाने कब उन्होने शराब और शायरी को अपना दोस्त बना लिया खुद उन्हे भी नही पता। मीना कुमारी शायरी के माध्यम से शोर कह कर अपने दिल का दर्द हल्खा करने लगी वो नाज नाम से उर्द् शायरी करती थी।
  • पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फिल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फरवरी, 1972 को रिलीज हुई और उसी साल 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी चल बसीं. मीना को ब्लड कैंसर हुआ था। पाकीज़ा हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया.

पाकीजा़ की सफलता का राज़
Picture21
प्राण नेविल ने यह भी बताया कि फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ की अदभुत सफलता के पीछे मीना कुमारी की बेवक़्त मौत थी. पहले तो लोगों ने इस फ़िल्म पर कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया लेकिन मीना कुमारी की मौत के बाद लोगों ने इस फ़िल्म को जिस तरह सराहा उसकी मिसाल नहीं मिलती है.

इस मौक़े से रश्मि अग्रवाल ने कहा कि मीना कुमारी की ग़ज़लों को आवाज़ देना जहां उनका सौभाग्य है वहीं उसके उतार चढ़ाव और नज़ाकत को निभा पाना उनके लिए बड़ी चुनौती है.

उन्होंने इस मौक़े पर मीना कुमारी की ग़ज़लों के साथ साथ उनकी फ़िल्मों के वे गीत भी गाए जो उन पर फ़िल्माए गए थे.

इस अवसर पर मीना कुमारी के अभिनय से सुसज्जित गीतों के प्रदर्शन के ज़रिए उनके जीवन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला गया जिससे मीना कुमारी की एक प्यासी ज़िंदगी का तसव्वुर उभरता है.

मीना कुमारी की गज़लों से कुछ पंक्तियाँ आप भी सुनते चलें
बुझ गई आस छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
आबला-पा कोइ दश्त में आया होगा
वरना आंधी में दिया किसने जलाया होगा
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की सदक़े की सहर होती है

मीना कुमारी अपनी गज़लों में अपना तख़ल्लुस ‘नाज़’ रखती थीं. वाक़ई हिंदी सिनेमा को उन पर हमेशा नाज़ रहेगा. मीना कुमारी की मौत और पाकीज़ा के बारे में किसी ने क्या ख़ूब कहा है.
मीना शराब पीती थी मजलिस में बैठ कर
पाकीज़ा बन गई तो ख़ुदा ने उठा लिया.

ट्रैजेडी से कम नहीं रहा मीना कुमारी का निजी जीवन
Picture22
ट्रैजेडी क्वीन नाम से मशहूर मीना कुमारी का फिल्मी सफर भले ही किसी सुनहरे सपने से कम नहीं रहा लेकिन जब उनके निजी जीवन का जिक्र उठता है उनकी तन्हाई और उदासी साफ-साफ झलक उठती है. महजबीं से मीना कुमारी बनी यह अभिनेत्री अपने जीवन में निराशा और अकेलेपन से छुटकारा नहीं पा सकी.

पंजाब के एक छोटे से गांव का रहने वाला धरम सिंह देयोल एक प्रतियोगिता जीतकर बॉलिवुड में आया. बॉलिवुड में आते ही उसे मीना कुमारी जैसी स्थापित अभिनेत्री के साथ काम करने का अवसर मिला. यह धरम सिंह देयोल कोई और नहीं बॉलिवुड के मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र हैं, जिन्होंने अपनी फिल्मी पारी धर्मेंद्र के नाम से शुरू की.

फिल्मों में साथ अभिनय करते-करते धर्मेंद्र और मीना कुमारी एक दूसरे को चाहने लगे. लेकिन विडंबना देखिए उस समय मीना कुमारी कमाल अमरोही से शादी कर चुकी थीं और धर्मेंद्र तो विवाह करने के बाद ही फिल्मों में आए थे. मगर फिर भी धर्मेंद्र और मीना कुमारी एक-दूसरे के साथ समय बिताते और अपनी भावनाएं बांटते थे.

फिल्म काजल के प्रीमियर की पार्टी ओडियन सिनेमा के साहनी बंधु ने अपनी दिल्ली स्थित कोठी पर दी थी. इस पार्टी में मेहमानों की भीड़ थी, सब खाने-पीने में मशगूल थे. पार्टी में धर्मेंद्र भी थे जो वहां बहुत देर तक रुके. खाने-पीने का दौर भी चल ही रहा था. थोड़ा पीने के बाद मीना कुमारी वापस होटल चली गईं. फिल्म काजल की पूरी यूनिट होटल इम्पीरियल में ठहरी थी.

होटल जाते समय मीना कुमारी को यह चिंता सताने लगी कि धर्मेंद्र कहीं ज्यादा ना पी लें. उन्हें लगा कि उन्हें वहीं धर्मेंद्र के साथ ही रुकना चाहिए था. वह वापस उस पार्टी में आ गईं. अभी तक तो मीना कुमारी और धर्मेंद्र के बीच रोमांस की केवल अटकले ही लगाई जा रही थीं लेकिन अब इन अटकलों को आधार मिल गया था. दोनों विवाहित थे इसीलिए उनके संबंध को कभी नाम नहीं मिल पाया.

हर मुलाकात में फूलों की सौगात देने वाले कमाल अमरोही भी विवाह के पश्चात मीना कुमारी को एक खुशहाल जीवन नहीं दे सके. बैजू बावरा ने मीना कुमारी और महल ने कमाल अमरोही को स्टार बना दिया था.

घरवालों को बताए बिना मीना कुमारी ने कमाल अमरोही के साथ विवाह कर लिया था और कुछ समय बाद उन्होंने घर छोड़कर कमाल के साथ रहना शुरू कर दिया. लेकिन कुछ ही समय में विवाह से जुड़े उनके सुनहरे सपने टूटने लगे. मीना के फिल्मी कॅरियर में कमाल अमरोही का हस्तक्षेप बहुत ज्यादा बढ़ गया. मीना कौन सी फिल्म करेगी कौन सी नहीं यह सब कमाल अमरोही ही देखते थे. मीना कुमारी किस हीरो के साथ काम करेंगी, कमाल इस पर बहुत सख्त होने लगे. मीना कुमारी के पास पैसे नहीं होते थे, उन्हें अपनी छोटी-छोटी जरूरत के लिए भी कमाल से पैसे मांगने पड़ते थे.

इन सब से आहत होकर मीना कुमारी घर छोड़कर चली गई. वह पहले अशोक कुमार के घर गईं लेकिन अशोक कुमार ने उन्हें घर जाने के लिए कहा. कुछ समय तक अपनी बहन मधु, जिनके पति महमूद थे, के घर रहने के बाद वह एक छोटे से घर में रहने आ गईं. धर्मेंद्र के साथ मीना कुमारी का संबंध लगभग तीन साल तक चला. लेकिन जैसे ही धर्मेंद्र को कामयाबी मिलने लगी वह मीना कुमारी को भी भूल गए. ज्यादा पीने की आदत और बीमारियों की वजह से मीना कुमारी का शरीर भारी होने लगा था. धर्मेंद्र के लिए वह एक उपयुक्त अभिनेत्री नहीं रह गई थीं. धरम ने मीना के साथ आखिरी फिल्म 1968 चंदन का पालना की. अब ही-मैन धर्मेद्र पर मर मिटने वाली हीरोइनों की कमी नहीं थी. वक्त ने धर्मेंद्र के मन में भी मीना का आकर्षण समाप्त कर दिया था.

कुंठा ने मीना को नशे का आदी बना दिया. लाखों कमाने वाली मीना के पास अपने आखिरी दिनों में एक फ्लैट और एक गाड़ी के सिवाय कुछ भी न था. एक अगस्त 1932 को मुंबई में जन्मीं महजबीं को अपने अभिनय सफर में चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार (बैजू बावरा, परिणीता, साहब बीबी और गुलाम और काजल) मिले थे.

छह नाम वाली मीना कुमारी
Picture23
फिल्मी कलाकार अक्सर पर्दे पर आकर अपने असली नाम बदल लेते हैं। इसके जीते-जागते उदाहरण हैं फिल्म इंडस्ट्री के ये कलाकार। कुमुद कुमार गांगुली अशोक कुमार और यूसुफ खान दिलीप कुमार बन गए। मुमताज जहां बेगम मधुबाला बनकर चमकीं, तो रीमा लाम्बा आज मल्लिका शेरावत के नाम से तहलका मचा रही हैं। हालांकि एक हीरोइन ऐसी भी थीं, जिनके दो नाम नहीं, आधा दर्जन नाम थे। वे थीं मीना कुमारी।

थिएटर की नर्तकी इकबाल बानो और हारमोनियम बजाने वाले मास्टर अली बख्श की तीसरी लड़की हुई, तो उन्होंने उसका नाम रखा महजबीं आरा। महजबीं की आंखें छोटी थीं, इसलिए घरवालों ने प्यार से बाद के दिनों में उसे चीनी बुलाना शुरू कर दिया, क्योंकि चीन के लोगों की आंखें छोटी होती हैं, इसीलिए महजबीं का चीनी नाम रखा गया। मां की बीमारी और पिता की बेकारी ने महजबीं को बचपन में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्मों में काम करने पर मजबूर किया। उन्होंने प्रकाश पिक्चर्स की लेदर फेस में पहली बार काम किया। उस समय उनका नाम रखा गया बेबी मीना। इस नाम से उन्होंने कई फिल्मों में काम भी किया। उल्लेखनीय यह है कि होमी वाडिया की फिल्म बच्चों का खेल में बेबी मीना ने पहली बार हीरोइन का रोल किया। वे इस फिल्म में मीना कुमारी बन गई और फिर इसी नाम से आखिरी फिल्म गोमती के किनारे तक लगातार काम करती रहीं।

वैसे, मीना कुमारी का पांचवां नाम नाज भी था। उन्हें शायरी से गहरा लगाव था और खुद भी शायरी करती थीं। शायरी के लिए वे उपनाम नाज का इस्तेमाल करती थीं। मीना कुमारी को छठा नाम उनके पति कमाल अमरोही ने दिया था। वे मीना को प्यार से मंजू कहते थे। यहां तक कि मीना कुमारी से अनबन हो जाने के बाद भी कमाल अमरोही ने उन्हें जो खत लिखे, उनमें उन्हें मेरी मंजू ही लिखा। यानी एक अभिनेत्री मीना कुमारी के ही आधा दर्जन नाम थे- महजबीं आरा, चीनी, बेबी मीना, मीना कुमारी, नाज और मंजू।

Meena Kumari & Kamal Amrohi

Picture20
Three days after Meena Kumari’s death we met Kamal Amrohi at his house, “Rembrandt,” on Pali Hill. The place wore a gloomy look. Kamal Amrohi sat engrossed, listening to the tape-recorded voice of Meena Kumari.

It was an old sponsored program, broadcast over Radio Ceylon in 1958, where Meena Kumari talked enthusiastically on her first ever visit to her husband’s home town Amroha in 1956, four years after her marriage to Amrohi. She was all praise for his household and his people, recalled visiting the shrine of saint Shah Sharifuddin Shah Valayat, and wished she too would be among the fortunate ones to find a place near the shrine after her death.
Meena Kumari spoke of Kamal Amrohi with such respect and love, nobody would have suspected they would be separated in their lifetime. Yet six years later she walked out of his house, never to return. What could be the provocation for her to take such a step? Was it true, as is generally believed, that her marriage to Amrohi was a failure? Did he ill-treat her any time, as alleged by some people?

Amrohi claimed it was a conspiracy by some people to wreck their home and then exploit the star for their own advantage. For 12 years after their marriage there had never been any trouble or differences between them. But once Meena Kumari became a top star commanding a high price, he said, some people became jealous. They apparently wanted a share in her earnings.
There were the producers who wanted Meena Kumari to act in their films. They knew they could not have their way as long as Meena Kumari was with Kamal Amrohi. Together with some of Meena Kumari’s relatives, they hatched a plot to create differences between the couple.

For two years, Amrohi says, these “sympathizers” brainwashed Meena Kumari so thoroughly that she began to believe her husband was an obstacle in her career. They started spreading rumors that he was ill-treating her. It was true, Kamal Amrohi said, that he used to advise Meena against accepting assignments which would harm her reputation. He used to be a little harsh sometimes, he admitted, but it was all in her interest.
Amrohi didn’t want us to mention the names of people who had “conspired” against him.
Within a few months, Kamal Amrohi says, the actress too realized she had been misled. Those days, she lived with the family of one of the “sympathizers”.

When she realized she had been let down, she tried to get Kamal Amrohi over the phone but he wasn’t in town. The friend who picked up the phone later told him that she was sobbing and appeared terribly disturbed. He had tried to locate her and had failed. Meena Kumari finally went away from the house. Some time after this, she moved to a house at Janaki Kutir, Juhu.

Although she lived away from him, Kamal Amrohi said, she always remembered him when she needed help or when she fell ill. In 1967 she called him to her house and pleaded him to re-start “Pakeezah.” They were meeting after three long years. They had dinner together and she gave him her diary to read.

For the next two years Amrohi and Meena Kumari continued to meet frequently. But she never talked of the sad past, neither did her husband. But the actress used to tell close friends – among them the composer Khayyam and a Delhi distributor SayeedBhai and his wife – that God would never forgive those who had wrecked her home.

The resumption of “Pakeezah” almost brought about a reunion. And now the only man in whom Meena Kumari had implicit faith was Kamal Amrohi. After seeing “Pakeezah” at a special show she was all excitement. She regarded the film as his tribute to her.
After the film’s release some common friends had suggested that Kamal Amrohi bring Meena back to his house. But Amrohi felt it would remind her of the past and that would have affected her health. In any case they used to be together most of the day and she seemed content with the arrangement.

Amrohi recalls his first meeting with Meena Kumari. The year was 1938. He was a budding film writer. Sohrab Modi was making “Jailor,” written by Amrohi. They wanted a 7 year old girl for one of the roles. He was asked to meet a Master Ali Bux to see if his daughter would suit the role. One evening he went to meet Ali Bux at his house at Dadar. Bux sent for his daughter, and the little girl came running into the room with mashed banana smeared all over her lips and hands.

Ali Bux scolded the girl and asked her to wash and come. That was Mahjabeen, who years later became Meena Kumari.

Amrohi had liked her but the role finally went to some other girl. Whenever Amrohi passed by Dadar he used to point out the house of his friend and remark that a future heroine lived there.

Years later Amrohi wanted a new girl to play the female lead in “Mahal,” which he was directing for Bombay Talkies. Somebody suggested Meena Kumari’s name. Amrohi didn’t know who the girl was and he summarily rejected the suggestion. Madhubala was eventually selected for the role.

Soon after, on the sets of “Tamasha” at Filmistan, Amrohi was introduced to Meena Kumari by Ashok Kumar. He liked her performance on the sets, but didn’t know it was the little girl Mahjabeen, now grown up.

Then Amrohi was assigned to make “Anarkali”, for Filmkar. Madhubala had been assigned the title role. Due to differences between the producer and the actress’s father, Ataullah Khan, Madhubala refused to act in the film. Amrohi suggested that they sign up Meena Kumari for the role.

Before the shooting began she was involved in a car accident. She was in hospital in Poona for five months. Amrohi used to visit her at week ends. Meena was doubtful if he would still consider her for the role. To reassure her Amrohi wrote on her wrist: “Meri Anarkali” and signed his name below. The film was finally never made.

On February 15, 1952 they were married.

Kamal Amrohi recalled Meena Kumari’s last words before she went into a coma at the nursing home on the evening of Wednesday, March 29. She said “Chandan, I will not live much longer now. My last wish is to die in your arms.” She always addressed Amrohi as Chandan, the name by which his mother called him. And Amrohi called Meena Kumari “Manju”.

The doctors had given up all hopes. They were merely ticking off time. Amorhi sat at her bedside, sobbing. On Friday afternoon around 3-20 he gently touched her forehead, then ran his fingers through her hair. The next moment her heart stopped beating… An Interview with Kamal Amrohi by A.A. Khatib (Source – Filmfare Magazine)

मीना कुमारी की रचनाएँ
• तन्हा चाँद / मीना कुमारी (गुलज़ार द्वारा संकलित)
• आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता / मीना कुमारी
• आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा / मीना कुमारी
• चांद तन्हा है आसमां तन्हा / मीना कुमारी
• टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली / मीना कुमारी
• दिन गुज़रता नहीं आता / मीना कुमारी
• पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है / मीना कुमारी
• मुहब्बत / मीना कुमारी
• मुहब्बत बहार की फूलों की तरह / मीना कुमारी
• मेरा माज़ी / मीना कुमारी
• मेरे महबूब / मीना कुमारी
• मैं जो रास्ते पे चल पड़ी / मीना कुमारी
• यह न सोचो कल क्या हो / मीना कुमारी
• यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे / मीना कुमारी
• ये रात ये तन्हाई / मीना कुमारी
• रात सुनसान है / मीना कुमारी
• सियाह नक़ाब में उसका संदली चेहरा / मीना कुमारी
• सुबह से शाम तलक / मीना कुमारी
• हर मसर्रत / मीना कुमारी
• हाँ, कोई और होगा तूने जो देखा होगा / मीना कुमारी

Meena Kumari with Kamal Amrohi
Picture18

Filmfare Cover – Meena Kumari (1953)
Picture25

Filmfare Cover – Meena Kumari April 1972
Picture24

Meena Kumari posthumously on Stardust (Dec 1972)
Picture26

Meena Kumari and Bharat Bhushan in Baiju Bawra (1952)
Picture28

Rajendra Kumar and Meena Kumari
Picture29

Ashok Kumar and Meena Kumari in scene from Bollywood film, “Benazir”(1964)

Picture34

Meena Kumari and Kishor Kumar on the sets of the film “Shararat” (1959)
Picture35

Raj Kumar and Meena Kumari in Dil Apna Aur Preet Parayi .

Picture36

Dilip Kumar Meena Kumari Azaad
Picture37

Meena Kumari and Dharmendra on the sets of Poornima at Chandivali (1965)

Picture42

Mala Sinha, Meena Kumari, Nargis, Suraiya and Nimmi at a Party at Sunil Dutt’s house.

Picture44

Meena Kumari with Ustad Bade Ghulam Ali Khan

Picture45

Meena Kumari with India’s First Prime Minister Pt. Jawahar Lal Nehru
Picture46

Meena Kumari with Prime Minister of India Mrs. Indira Gandhi
Picture47

Advertisements

About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
This entry was posted in Personality and tagged , , , , , , . Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s