आजादी के 68वीं सालगिरह… क्या भूलूं क्या याद करुं!!!

देश को स्वतंत्र हुए 68 साल होने जा रहे हैं… जीवन आगे बढ़ते रहने का नाम हैं… इस जीवन में हमने बहुत कुछ पाया, जो हमारी यादों में सदा बसा रहा है.. इसमें से कई चीजों को हम तकनीक के नाम पर पीछे छोड़ आगे बढ़ चले हैं… और कुछ चीजों के विनाश के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं… आज ऐसी ही कई यादों को ताजा कर रहा हूं इस ब्लॉग में… आपकी भी कोई याद हो जो जरूर बताएं…

कहता है मुझसे मेरा मन
कर साहस तू आगे बढ़
भूली बिसरी सारी यादें
अब कर दे दफ़न
थाम स्वंय का हाथ
कर साहस और आगे बढ़
अश्रु तेरी तकदीर नहीं
व्यर्थ करे तू क्यों संताप
तू सिर्फ तू है
तुझमे ही है तेरा ‘आप’
पहचान स्वयं को तू ‘रश्मि’
कर साहस और आगे बढ़…

कोयले का इंजन

Steam locomotives were built in India as late as 1972 and in use until 2000; they were replaced by a combination of diesel and electric locomotives. The Bengal Sappers of the Indian Army were the first to run a steam locomotive in India. The steam locomotive named ‘Thomason’ ran with two wagons for carrying earth from Roorkee to Piran Kaliyar in 1851, two years before the first passenger train ran from Bombay to Thane in 1853.
भारत में रेल के संचालन में मद्रास के सिविल इंजीनियर एपी कॉटन का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1845 में कलकत्ता में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेल कंपनी की स्थापना हुई। 1850 में इस कंपनी ने मुंबई से ठाणे तक रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया। एशिया और भारत में प्रथम रेल यात्रा 16 अप्रैल 1853 को दोपहर 3.30 बजे बोरीबंदर (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) से प्रारंभ हुई। रेलगाड़ी को ब्रिटेन से मँगवाए गए तीन भाप इंजन सुल्तान, सिंधु और साहिब ने खींचा। 20 डिब्बों में 400 यात्रियों को लेकर यह गाड़ी रवाना हुई। इस रेलगाड़ी ने 34 किलोमीटर का सफर सवा घंटे में तय किया और सायं 4.45 बजे ठाणे पहुँची। भारत में 1856 में भाप के इंजन बनना शुरू हुए। इसके बाद धीरे-धीरे रेल की पटरियाँ बिछाई गईं। पहले नैरोगेज पर रेल चली, उसके बाद मीटरगेज और ब्रॉडगेज लाइन बिछाई गई। 1 मार्च 1969 को देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन ब्रॉडगेज लाइन पर दिल्ली से हावड़ा के बीच चलाई गई। इसका नाम राजधानी एक्सप्रेस रखा गया। भारत में आज भी भाप इंजन चलता है और वो दार्जलिंग की पहचान है पर्यटकों को लुभाने के लिए भारत सरकार आजतक इस इंजन को चला रही है। 1999 में युनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरीटेज साइट में शामिल किया था।

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फिएट प्रीमियर पद्मिनी

फिएट प्रीमियर पद्मिनी टैक्सी को इटली की कंपनी फिएट और भारत की प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स मिलकर बनाती थी, लेकिन साल 2000 के बाद से इन टैक्सियों का प्रोडक्शन बंद कर दिया। भारत में एक समय ये कारें स्टाईल स्टेटस मानी जाती थीं। लेकिन समय के साथ साथ इन कारों से बेहतर गाड़ियां मार्केट में आने लगीं। और अब तो मुंबईकर भी इन उम्रदराज टैक्सियों में सफर करने से बचते हैं। अब सरकार ने भी 20 साल पुरानी इन कारों को सड़कों पर चलाने पर रोक लगा दी है। मुंबई की मशहूर प्रीमीयर पद्मिनी टैक्सी भले ही नई जमाने की आधुनिक टैक्सियों से काफी पीछे छूट गई है, लेकिन सदियों से इस शहर के उतार चढ़ाव की गवाह रहीं ये टैक्सी, इस शहर की यादों में हमेशा बनी रहेगी।
Premier Padmini is an automobile that was manufactured in India from 1964 to 2000 by Premier Automobiles Limited, a division of the Walchand Group, under license from Fiat and marketed initially as the Fiat 1100 Delight — and beginning in 1973 as the Premier Padmini. The Padmini’s primary competitor in the Indian market was the Hindustan Ambassador. Car’s production finally ended in November 2000.

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बाइस्कोप

दादा-परदादा के जमाने में देखा जाने वाला बाइस्कोप आजकल देखने को नहीं मिलता। बाइस्कोप बच्चों के लिए दिल बहलाने का सस्ता विकल्प था। फिल्मी गीतों की धुन और नीचे लगी डिब्बियों पर आंखे गड़ाए बच्चे तन्मयता से मनोरंजन करते नजर आते थे। तब मनोरंजन के नाम पर सिनेमा होता था या किसी किसी के घर पर टीवी। ऐसे में जब बाइस्कोप गलियों से गुजरता था, तब सभी बच्चे उसी से मनोरंजन करते थे। हीरो-हीरोइन के अलावा लालकिला, ताजमहल, कुतुबमीनार, बुलेट ट्रेन की तस्वीरें देखने को मिलती थीं। भारत में बाइस्कोप का इतिहास 150 साल पुराना है।

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टाइपराइटर

अब शायद टाइपराइटर पहले की तरह नजर न आएं। टिक-टिक की आवाज के साथ शब्दों को कागज पर उतारने वाली इस मशीन का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी फैक्ट्री ने 2011 में इन्हें नहीं बनाने का फैसला किया है। यह भारतीय फर्म गोदरेज ऐंड बोएस है, जिसने मुंबई स्थित अपना प्लांट बंद कर दिया है। इसके पास अब कुछ सौ टाइपराइटर ही शेष बचे हैं, जिन्हें आगे एंटीक की तरह बेचा जाएगा। कंप्यूटर के आने और उसके जरिए टाइपिंग से लेकर पब्लिशिंग तक का काम एक ही वर्क स्टेशन पर समेट लेने से पहले करीब डेढ़ सदी तक टाइपराइटर ही व्यवस्थित आकार-प्रकार में लिखने की सुविधा देते रहे। शायद कागज पर हाथ से सुंदर अक्षर उतारने की प्रक्रिया विचारों की आवाजाही में कोई रुकावट डालती होगी, या फिर प्रकाशक कुछ का कुछ छापने की भूल करते रहे होंगे, जिस कारण कई महान लेखकों ने अपनी रचनाएं सीधे टाइपराइटर पर ही लिखीं। बताते हैं कि जेम्स बॉन्ड जैसे अनूठे किरदार के रचयिता इयान फ्लेमिंग के पास सोने से बना टाइपराइटर था।

पहला कर्मशल टाइपराइटर 1867 में ही अमेरिका में बनाया और बेचा गया था, लेकिन असल में इसका इस्तेमाल पिछली सदी के 50वें दशक में बढ़ना शुरू हुआ। उस दौरान अमेरिकी कंपनी स्मिथ-कोरोना ने महज तीन महीने में दस लाख टाइपराइटर बेचे थे। इसकी वजह थी पूरी दुनिया में दफ्तरी कामकाज का बढ़ना। सरकारी कार्यालयों, पुलिस स्टेशनों और अदालतों के बाहर ऐफिडेविट तैयार करते और मुकदमों के ब्योरे दर्ज करने वाले क्लर्कों के पास यह मशीन जरूर होती थी। अपने देश में भी स्टेनोग्राफर और टाइपिस्ट जैसी नौकरियों ने टाइपराइटर के साथ-साथ शॉर्टहैंड व टाइपिंग की ट्रेनिंग देने वाले स्कूलों को लंबे समय तक जिलाए रखा। लेकिन तेज कंप्यूटरीकरण के साथ पिछले 10-15 साल में कई चीजें एक साथ बदल गईं।

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सर्कस

भारत में 1879 से सर्कसों की परम्परा चली आ रही हैं। दि ग्रेट रॉयल सर्कस, अपोलो सर्कस, ग्रेट बॉम्बे सर्कस, जम्बो सर्कस और जैमनी सर्कस जैसे बड़े नाम हुआ करते थे। आज ये गांवों देहातों तक सिमट के रह गए हैं।
हाईटेक दौर ने आज मनोरंजन के उस साधन पर अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है जो कभी चकाचौंध भरे मंच पर अपने रोमांचक करतब और कारनामों से दर्शकों को हैरान ही नहीं करता था, हंसाता भी था और जानवरों को अपने इशारों पर नचाता था। यह है सर्कस, जिसे इतिहास के पन्नों में सिमट जाने का डर सता रहा है। एक समय था जब सर्कस मनोरंजन का प्रमुख साधन था। लेकिन आज टेलीविजन तथा इंटरनेट के दौर में सर्कस का मनोरंजन हाशिये पर पहुंच गया है। दर्शकों और समुचित मंच के अभाव के कारण प्रतिभाशाली कलाकार सर्कस से दूर होते जा रहे हैं। अपोलो सर्कस के प्रबंधक रमेश तिरूला कहते हैं पहले सर्कस जिस शहर में जाता था वहां धूम मच जाती थी। लगभग हर दिन सर्कस के लोग पशुओं को लेकर शहर में जुलूस निकालते थे। जोकर भी साथ होते थे। यह सब प्रचार के लिए होता था। अब तो लाउडस्पीकर लेकर शहर में निकल ही नहीं सकते। रमेश बताते हैं जानवर सर्कस का मुख्य आकर्षण होते थे। अब सरकार ने सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। टीवी, वीडियो गेम और इंटरनेट ने रही सही कसर पूरी कर दी। आखिर दर्शक क्या देखने के लिए सर्कस आएंगे। सर्कस से कोई क्यों जुड़ना चाहेगा। सर्कस उद्योग से जुड़े लोग मानते हैं कि सरकारी समर्थन और नई प्रतिभाओं की कमी भी इस उद्योग को लाचार बना रही है जिसके कारण इस उद्योग से जुड़े लोग अन्यत्र विकल्प तलाश रहे हैं। 2009 में भारत में चिड़ियाघरों और सर्कसों के हाथियों को राष्ट्रीय वन्यजीव पार्कों और अभ्यारण्यों में भेजे जाने के बारे में निर्देश जारी कर दिए गए हैं जो बाध्यकारी हैं. समझा जाता है कि भारत में इस समय चिड़ियाघरों और सर्कसों में लगभग 140 हाथी हैं. अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सर्कस में बच्चों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने यह फ़ैसला देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वो सर्कस में इस्तेमाल किए जा रहे बच्चों को बचाए और उनके पुनर्वास के लिए कार्यक्रम बनाए.

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टेलीग्राम

भारत के दूरदराज के इलाकों को 160 वर्षों से अधिक समय तक एक-दूसरे से जोड़कर रखने वाली टेलीग्राम सेवा सोमवार 15 जुलाई को हमेशा के लिए बंद हो गई। गौरवशाली इतिहास रखने वाली यह सेवा इतिहास के पन्नों तथा संग्रहालयों तक ही सिमट कर रह गई। तार सेवा ऐसे समय पर बंद होने जा रही है जहां बड़े शहरों में तो इंटरनेट जैसे सूचना संप्रेषण के तीव्र विकल्प मौजूद हैं, वहीं इसके बंद होने का विरोध करने वालों का मानना है कि अब भी दूरदराज के कई इलाके ऐसे हैं जहां अब भी इसकी बेहद जरूरत है। बीएसएनएल का कहना है कि उसे तार सेवा की वजह से सालाना 300 से 400 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। तार सेवा भारत का पुराना संचार माध्यम है। देश का पहला तार 5 नवंबर 1850 को तत्कालीन कलकत्ता से 50 किलोमीटर दूर स्थित डायमंड हार्बर के बीच भेजा गया था और इसके पांच वर्ष बाद इस तीव्र संचार माध्यम को आम जनता के लिए खोल दिया गया। अंग्रेजों की सत्ता भारत में सिर्फ तार सेवा की वजह से ही कायम रह सकी क्योंकि जब-जब इसे युद्धों का सामना करना पड़ा तो यह संदेश पहुंचाने की अपनी महारत के बल पर अपने शत्रुओं से कई कदम आगे थी। भारत में जब 1857 में पहला स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ तो मेरठ से चले क्रांतिकारी सिपाहियों के रवाना होने की सूचना पहले ही तार के जरिए दिल्ली के लोथियान रोड स्थित तारघर पहुंच गई थी।

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मदारी- सपेरे

मदारी का खेल हम सबने देखा सुना है, रीछ-बंदर, सांप का खेल दिखाने वाले मदारी-सपेरे। लेकिन सबका मनोरंजन करने वाला यह मदारी आज समाज में कहीं नहीं दिखता। कभी मदारी और भालू का खेल हकीकत की जमीन से हट कर बच्चों की कहानियों और किताबों तक सीमित रह गया है। खेल जन-सेवी संस्थाओं ने जब इंसान का कल्याण कर लिया तो उन्होंने पशु-कल्याण का बीड़ा उठाया। आरोप लगाया कि मदारी और सपेरे जानवरों की आज़ादी का हनन कर रहे हैं। जैसे आदमी को आज़ादी का हक है, वैसे ही जानवरों की भी। मदारी-सपेरों के लुप्त होने के कई कारण हैं। एक प्रमुख वजह बेजुबान जानवरों के हित-साधन में जुटी आदमियों की मुहिम है। इंसान, इंसानों के अलावा सबके कल्याण को कटिबद्घ है। इधर नई पीढ़ी के ठाठ हैं। उनका जी बहलाने को मल्टीप्लैक्स हैं, मॉल हैं, टी़वी़ है, इंटरनेट है। इन सबके बीच सपेरे-मदारी की हस्ती ही क्या है? इन्हें तो बेरोजगार होना ही था एक न एक दिन। उनकी नियति निश्चित थी जैसे बड़ों के सामने पिद्दी से कुटीर उद्योगों की, या मल्टीनेशनल पेय द्रव्यों के मुकाबले शर्बत-ठंडाई की। ऐसे भी विविधता तो थी नहीं, मदारी-सपेरे के मनोरंजन में। वही भालू का दो पैर का नाच, बंदर-बंदरिया का रूठना-मनाना, सांप का फन फैलाना। मदारी के साथ उसका जमूरा भी गायब है। मदारी के खेल में जमूरे का काम अपने उस्ताद के हर हुक्म का पालन करना होता है, लेकिन इसमें अक्सर वह कुछ ऐसी गलतियां या हरकतें करता है जिस से देखने वालों के लिए व्यंग्य पैदा होता है। लेकिन समाज की भीड़ में आज दोनों का अस्तित्व कहीं खो सा गया है।

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नट

बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने से जनता का मनोरंजन करने वाले नट। टीवी, इंटरनेट के बदलते दौर में आज मनोरंजन का यह साधन खात्मे के कगार पर है। नट शब्द का एक अर्थ नृत्य या नाटक (अभिनय) करना भी है। सम्भवत: इस जाति के लोगों की इसी विशेषता के कारण उन्हें समाज में यह नाम दिया गया होगा। कहीं कहीं इन्हें बाज़ीगर या कलाबाज़ भी कहते हैं। शरीर के अंग-प्रत्यंग को लचीला बनाकर भिन्न मुद्राओं में प्रदर्शित करते हुए जनता का मनोरंजन करना ही इनका मुख्य पेशा है। महिलाएं हाव-भाव प्रदर्शन करके नाच गाने में कुशल होती हैं। आजकल कभी-कभार ये नट ट्रैफिक सिगनल पर करतब दिखा कर पैसे मांगते नजर आ जाते हें। या फिर गांव देहातों के मेलों में करतब दिखाते नजर आते हैं।

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नौटंकी- नाच

नौटंकी- नाच उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल के एक लोक नृत्य और नाटक शैली का नाम है।
लोक नाट्य परम्परा में महाराष्ट्र का तमाशा, गुजरात, सौराष्ट्र का भांवी नाट्य, कर्नाटक का यक्ष गान, केरल का कुड्डियाटम, असम का ओज पाली, कश्मीर का भांड-पत्थर, हरियाणा, पंजाब का स्वांग, उत्तर प्रदेश बिहार की नौटंकी तथा रास लीला, बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा का आणिक्य-नाट, मणिपुर का अरब-पाला, राजस्थान का गौरी-ख्याल, गोवा का रनभाल्यम और काला, मध्य प्रदेश का नाच प्रसिद्ध है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनकाल से चली आ रही स्वांग परम्परा की वंशज है और इसका नाम मुल्तान (पाकिस्तानी पंजाब) की एक ऐतिहासिक ‘नौटंकी’ नामक राजकुमारी पर आधारित एक ‘शहज़ादी नौटंकी’ नाम के प्रसिद्ध नृत्य-नाटक पर पड़ा। नौटंकी और स्वांग में सबसे बड़ा अंतर यह माना जाता है कि जहाँ स्वांग ज़्यादातर धार्मिक विषयों से ताल्लोक रखता है और उसे थोड़ी गंभीरता से प्रदर्शित किया जाता है वहाँ नौटंकी के मौज़ू प्रेम और वीर-रस पर आधारित होते हैं और उनमें व्यंग्य और तंज़ मिश्रित किये जाते हैं। पंजाब से शुरू होकर नौटंकी की शैली तेज़ी से लोकप्रीय होकर पूरे उत्तर भारत में फैल गई। समाज के उच्च-दर्जे के लोग इसे ‘सस्ता’ और ‘अश्लील’ समझते थे लेकिन यह लोक-कला पनपती गई। नौटंकी में आल्हा-ऊदल, सुल्ताना डाकू, शोले, विदेशिया, राजा भरथरी, हरिश्चन्द्र, सती बिहुला, अंधेर नगरी, महात्मा गांधी का भारत प्रेम जैसे नाटकों का मंचन होता था। 1980 के पहले इसकी अधिक मांग थी। उस समय जब नाच, नौटंकी, रामलीला में लोक वाद्य यंत्रों की थाप जब क्षेत्र में गूंजती थी तो लोग लालटेन, पुआल आदि लेकर गर्मी हो या ठंडी शाम से लेकर सुबह तक देखते थे। पहले गांवों में इस कला से जुड़े लोगों की टीम होती थी जो शादी, जन्मोत्सव, मेला आदि जगहों पर कार्यक्रम करने के लिए सट्टा थे। प्रत्येक गांव के लोग इस कला से जुड़ते थे, जो अपने गांव की पहचान हुआ करते थे। लेकिन आज इस कला के कद्रदानों की कमी होने के नाते इनका परिवार भुखमरी के कगार पर आ गया है। इससे जुड़े लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों मल्टीप्लैक्स, मॉल, टी़वी़, इंटरनेट की इस दुनिया में नौटंकी कहीं खो सी गई है। यह लोक परम्परा भी गावों तक सीमित रह गई है।

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खामोश हो गया ग्रामोफ़ोन

किसी जमाने में ग्रामोफोन रिकॉर्ड ही केएल सहगल, पंकज मल्लिक, मुबारक बेगम और नूरजहां की अद्भुत आवाजों को उनके चाहने वालों से जोड़ने का जरिया हुआ करते थे. लेकिन जमाना बदला तो संगीत की तकनीक भी बदली.रिकार्ड्स की जगह पहले कैस्सेट ने और उसके बाद सीडी और इलेक्ट्रॉनिक चिप ने ले ली. अब बहुत कम लोगों के पास ये ग्रामोफोन रिकॉर्ड का बहुमूल्य खजाना सुरक्षित है. लेकिन अब मुंबई की सोसाइटी ऑफ इंडियन कलेक्टर्स के नेतृत्व में कुछ लोग इस अहम सांस्कृतिक धरोहर को बचने की कोशिश कर रहे हैं.सोसाइटी ऑफ इंडियन कलेक्टर्स के सचिव और वैज्ञानिक सुरेश चांदवनकर के पास 15 हजार से भी ज्यादा रिकॉर्ड्स हैं. उनका कहना है की अगर इन रिकॉर्ड्स को बचने की कोशिश नहीं की गई तो इतिहास का एक अहम हिस्सा नष्ट हो जाएगा.

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अब कोई नहीं पूछता मारूति 800 को

इस कार को 14 दिसंबर 1984 मे भारतीय बाजार मे उतारा गया था। उस समय यह पूर्ण रूप से आयातित पुर्जों से बनायी जाती थी। प्रथम कार दिल्ली के हरपाल सिंह को आवंटित हुई थी जिसका मुल्य 48000 रुपये था। तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रथम कार की चॉबियां दिल्ली मे आयोजित एक समारोह मे हरपाल सिंह को सौपी थी। 1984 मे इस कार की 852 प्रतिया बेची गयी जो 1984-86 तक बढ़ कर 31314 हो गयी। 1986 मे मारुति 800 का नया मॉडल प्रस्तुत किया गया जिस मे वाताकुलित कैबिन एवं म्युजिक सिस्टम मौजुद था। इस नये अवतरण का मुल्य 15000 रुपये अधिक था। 1987 मे मारुति ने इस कार का निर्यात शुरु कर दिया। प्रथम चरण मे 500 कार हंगरी को निर्यात हुई। बाद मे दक्षिण पूर्व एसिया, बांगलादेश, श्रीलंका एवं दक्षिण अमेरिका के देशो को भी निर्यात की गयी। 1999 मे मरुति ने इस कार का एक नया अवतरण बाजार मे उतारा जिसमे कार्ब्युरेटर की जगह मल्टी पाईन्ट इंजेक्शन सिस्टम लगा था। इस प्रणाली से कार से निकलने वाले प्रदुषण कणो को कम कर दिया गया था। इस मॉडल को मारुति 800 ई एक्स (EX) नाम दिया गया। सन 2004 मे आल्टो के आगमन के पूर्व यह भारत की सबसे ज्यादा बिकने वाली कार बनी रही, लेकिन उसके बाद ग्राहकों का इससे मोहभंग हो गया, और धिरे-धिरे यह कार सड़कों से गायब होने लगी। अप्रैल 2012 को मारूति ने इसका प्रोडक्शन बंद कर दिया।

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कोयले की अंगीठी

कोयले की अंगीठियां जहाँ घर घर में खाना बनाने और जाड़ों की रातों में कमरा गरम करने के काम आती थीं अब घरों में नहीं दिखाई देतीं। बदलते वक़्त में अंगीठियों का स्थान पहले केरोसिन के स्टोव उसके बाद गैस के चूल्हों और सिलिंडरों ने ले लिया और अब तो महानगरों में इनकी जगह धीरे धीरे गैस की पाइप लाइने लेती जा रही है. 80 के दशक में जब मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार पाकिस्तान के पेशावर में अपने पुश्तैनी मकान को देखने गए तो अपनी यादों को ताज़ा करते हुए उस मकान की पुरानी दालान की तरफ इशारा करके बोले कि यहाँ दादी अंगीठी जला कर तापते तापते हमें कहानियाँ सुनाया करती थी और कहानियाँ सुनते सुनते हम यहीं अंगीठी के पास ही सो जाते थे.
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ब्लैक एंड वाइट टीवी

एक वक़्त था कि मोहल्ले में किसी के घर पर ब्लैक एंड वाइट टीवी होना समाज में उसकी ऊंची हैसियत का प्रतीक हुआ करता था लेकिन ब्लैक एंड वाइट टीवी की जगह धीरे धीरे रंगीन टेलीविजन ने ले लिया और अब तो मध्यमवर्गीय घर में भी हर कमरे में दीवार पर लगे बड़े बड़े एलसीडी स्क्रीन आपकी हैसियत के गवाह बन गए हैं.
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बत्ती वाला स्टोव

पहले घरों में खाना बनाने के लिए बत्ती वाले स्टोव का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें केरोसीन भरा जाता था। 1892 में पंप से चलने वाले केरोसीन स्टोव का अविष्कार होने के बाद बत्ती वाला स्टोव पुराना पड़ गया। आधुनिक दौर में जैसे-जैसे एलपीजी गैस का प्रचलन बढ़ा। स्टोव का उपयोग काफी कम हो गया। अब तो सोलर पावर से चलने वाला स्टोव आ गया है।

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टेप रिकॉर्डर

ऑडियो टेप रिकॉर्डर का अविष्कार 1930 के आसपास हुआ था। इसमें कई तरह की आवाज मैग्नेटिक टेप में रिकॉर्ड की जाती थी। एक ही टेप में कई बार आवाज रिकॉर्ड की जा सकती थी। अर्से तक यह मनचाहे गीत-संगीत को सुनने का साधन रहा। लेकिन अब युवा पीढी टेप रिकॉर्डर को भूल कापैक्ट ऑडियो डिस्क का लुत्फ़ उठा रही है.कापैक्ट ऑडियो डिस्क न सिर्फ तकनीकी तौर पर उन्नत है बल्कि भारी-भरकम टेप रिकॉर्डर के मुकाबले बेहद हल्की और छोटी है। संगीत सुनने के लिए अब छोटे आइ फोन और स्मार्ट फोन आ गए हैं।

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ऑडियो कैसेट

एक वक्त था जब पूरी दुनिया में ऑडियो कैसेट के जरिए संगीत का लुत्फ लिया जाता था लेकिन वक्त के साथ ऑडियो कैसेट बीते जमाने की चीज होती जा रही है। आज की तारीख में संगीतप्रेमियों के पास सीडी, डीवीडी और ब्ल्यू-रे डिस्क जैसे अत्याधुनिक साधन हैं, जिनके जरिए वे संगीत की धुनों को अपने पास सहेज कर रख सकते हैं। संगीत के क्षेत्र में आई इस क्रांति ने ऑडियो कैसेट की दुनिया को लगभग खत्म कर दिया है। अब तो ऑडियो कैसेट की बात भी नहीं की जाती। टी-सीरीज के प्रबंध निदेशक भूषण कुमार इस बारे में बताते हैं, “कैसेट व्यवसाय लगभग खत्म हो चुका है। अब तो लोग इसके बारे में बात भी नहीं करना चाहते।” टिप्स के कुमार तुरानी भी भूषण से सहमत हैं। वह कहते हैं, “कुछ वर्ष पहले तक हम प्रति वर्ष 4.5 करोड़ कैसेट जारी किया करते थे लेकिन अब यह संख्या घटकर 10 लाख तक रह गई है।” संगीत के क्षेत्र में स्थापित रिटेल चेन ‘प्लेनेट एम’ के प्रवक्ता के मुताबिक आडियो कैसेटों को रखने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत होती है जबकि उतनी जगह में तीन सीडियां आराम से रखी जा सकती हैं। यही कारण है कि ऑडियो कैसेट के उत्पादन और बिक्री में भारी गिरावट आई है। बड़े शहरों में लोग जहां इंटरनेट रेडियो, आई-पॉड और ऑनलाइन संगीत का लुत्फ उठा रहे हैं, आडियो कैसेट लांग प्लेइंग रिकार्ड्स (एलपी) की तरह बीते दिनों की बात होते जा रहे हैं। अब तो आलम यह है कि बड़े संगीत स्टोर ऑडियो कैसेट रखते भी नहीं हैं। यही कारण है कि कैसेट बनाने वाली कंपनियों ने भी इसका उत्पादन कम कर दिया है। अब इनका स्थान सीडी और डीवीडी लेने लगे हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2005 में दुनिया भर में 90 करोड़ कैसेट बिके थे। यह संगीत के क्षेत्र में 54 फीसदी हिस्सेदारी थी लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या लगातार घटती गई और आज ऑडियो कैसेट या तो बनते नहीं हैं या फिर संगीत स्टोर में धूल फांकते रहते हैं।

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मरफी रेडियो

1936 में भारत में सरकारी ‘इम्पेरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ की शुरुआत हुई जो आज़ादी के बाद ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बन गया। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत होने पर भारत में भी रेडियो के सारे लाइसेंस रद्द कर दिए गए और ट्रांसमीटरों को सरकार के पास जमा करने के आदेश दे दिए गए। नरीमन प्रिंटर उन दिनों बॉम्बे टेक्निकल इंस्टीट्यूट बायकुला के प्रिंसिपल थे। उन्होंने रेडियो इंजीनियरिंग की शिक्षा पाई थी। लाइसेंस रद्द होने की ख़बर सुनते ही उन्होंने अपने रेडियो ट्रांसमीटर को खोल दिया और उसके पुर्जे अलग अलग जगह पर छुपा दिए। कांग्रेस के कुछ नेताओं के अनुरोध पर नरीमन प्रिंटर ने अपने ट्रांसमीटर के पुर्जे फिर से एकजुट किया। माइक जैसे कुछ सामान की कमी थी जो शिकागो रेडियो के मालिक नानक मोटवानी की दुकान से मिल गई और मुंबई के चौपाटी इलाक़े के सी व्यू बिल्डिंग से 27 अगस्त 1942 को नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरु हो गया। अपने पहले प्रसारण में उद्घोषक उषा मेहता ने कहा था, “41.78 मीटर पर एक अंजान जगह से यह नेशनल कांग्रेस रेडियो है।” नवम्बर 1941 में रेडियो जर्मनी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भारतीयों के नाम संदेश भारत में रेडियो के इतिहास में एक और प्रसिद्ध दिन रहा जब नेताजी ने कहा था, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा।” 1942 में आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना हुई जो पहले जर्मनी से फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिये समाचार प्रसारित करता रहा। पहले बड़े बड़े घरों में लगे बड़े साइज़ के रेडियो अन्टीना के ज़रिये रेडियो तरंगे पकड़ते थे बाद में रेडियो का आकार छोटा होने लगा. फ़िल्मी गाने हों या ओलंपिक्स या क्रिकेट की कमेंट्री लोग रेडियो के आगे झुण्ड बना कर सुना करते थे . गाँव की चौपालों पर रेडियो समाचार सुनने के लिए लोग इकठ्ठा होते थे. मरफी रेडियो और मरफी बेबी ब्रांड के तौर पर 1960 और सत्तर के दशक में छा गया था।
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वीएचएस-वीसीआर

बीटा से वीएचएस, वीएचएस से वीसीडी, वीसीडी से डीवीडी और अब डीवीडी से ‘ब्लू रे’।
70-80 के दशक में फिल्में देखने के लिए उस दूरदर्शन पर निर्भरता होती थी। लेकिन वीएचएस-वीसीआर के आने के बाद यह निर्भरता खत्म होती गई। वीएचएस क्रांति के इस दौर में फिल्म दर्शक को एक नया आयाम मिला और नई फिल्में देखने में खुद को सक्षम पाने लगे। इस दौर को वीडियो युग कहना सबसे सही होगा। इस दौर में वीसीपी और वीसीआर का स्वामी होना मुहल्ले में किसी सल्तनत के सुल्तान-सी हैसियत दिलाता था। सन 2000 में वीसीडी और आने के बाद वीसीआर और वीएचएस का दौर खत्म हो गया। वीएचएस की रील से निजाद मिला और फिल्में कॉम्पेट डिस्क में आने लगी।
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मिट्टी के सुराही और घड़े

एक दौर था जब गर्मियों के आते ही हर घर में मिट्टी की सौंधी सुगंध वाले घड़े और सुराही हर घर की अनिवार्य आवश्यकता ही नहीं शोभा हुआ करते थे। मिट्टी की सुराही और मिटटी के घडो का पानी न केवल सौंधी सुगंध देता है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक बताया जाता था. गर्मी की शुरुआत होते ही कुम्हारों की दुकाने सज जाती थी. अलग अलग शेप, अलग अलग साइज़ के घड़े और सुराहियों की खरीदारी करते लोगों की भीड़ इन दुकानों पर देखी जाती थी. घरों में ही नहीं शहर के चौक चौराहों पर भी जगह जगह मुसाफिरों की प्यास बुझाने के लिए पानी से भरे बड़े बड़े घड़े रखे दिखाई देते थे. लेकिन अब ये गुज़रे ज़माने की चीज़ हो चुकी है. बिजली आई तो रेफ्रीजरेटर ने इन पुरातन साथियों को दूर कर दिया। शहरों की तो बात छोड़िये अब तो गाँव देहातों में भी सुराही और घड़ों की जगह फ्रिज ने ले ली है.

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कपड़े और चटाई के पंखे

आज तो गर्मी के दिनों में हम बंद कमरे में कूलर या एसी चलाकर मस्त खर्राटे लेते हैं किन्तु कभी वो दिन भी थे जब ग्रीष्म ऋतु में आँगन में खाट डालकर हाथ पंखा डुलाते हुए सोना पड़ता था। घरों में हाथ से डुलाने वाले पंखे का होना अति आवश्यक हुआ करता था। ये पंखे चटाई या मोटे कपडे के बने होते थे और इसमें डुलाने के लिए डंडी लगी होती थी. घर की औरतें इन पंखों पर बड़े जातन से सिलाई कढाई और गोटा इत्यादि टांक कर इन्हें खूबसूरत बना देती थी. बड़े रईसों के घरों में मोटे कपडे के बड़े बड़े पंखे, जिनके चारों तरफ रंगीन झालरें भी टंकी होती थी, घर की सीलिंग से डोरियों के ज़रिये बांधे जाते थे. इन्हें डुलाने के लिए बाकायदा नौकर रखे जाते थे जो घंटों खड़े रह कर इससे झूलती लम्बी डोरी को खींचता और छोड़ता रहता था ताकि कमरे में बैठे कुलीन लोगों को ठंडी ठंडी हवा मिल सके. अब ये पंखे घरों से लुप्त हो चुके हैं. बिजली से चलने वाले सीलिंग फैन्स, कूलर और एसी ने इनकी जगह ले ली है.
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चारपाई

‘खटिया’ या ‘खाट’ चार पायों वाला एक प्रकार का छोटा-सा पलंग होता है, जो बाँस, बाँध, सूतली या फिर निवाड़ आदि से बनाया जाता है। मुख्य रूप से इसका प्रयोग सोने तथा उठने-बैठने के लिए होता है। कभी-कभी इसका प्रयोग अन्न आदि को सूखाने के लिए भी किया जाता है। चारपाई को ‘खाट’ भी कहते हैं। भारत के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में इसका प्रयोग अधिक होता था। काफ़ी पुराने समय से ही चारपाई घरेलू इस्तेमाल की वस्तुओं में महत्त्वपूर्ण रही है। इसकी ख़ासियत का अन्दाजा इसी से लग जाता है कि चारपाई पर हिन्दी फ़िल्मों में कई गाने भी बनाये जा चुके हैं। किंतु अब चारपाई का स्थान आधुनिक डबल बेड पलंग और फ़ोल्डिंग पलंग आदि ने ले लिया है, जिस कारण इसका प्रयोग अब कम होता जा रहा है।
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हैण्डपंप

पहले हर घर के आँगन के बीचोंबीच एक हैंडपंप लगा नज़र आता था. रास्तों पर भी सरकार प्यासों की प्यास बुझाने के लिए बोरिंग करवा कर हैण्डपम्पस लगवाती थी. इससे निकलने वाला पानी चूंकि धरती के नीचे से आता था लिहाज़ा शुद्ध और ठंडा हुआ करता था. लेकिन बढती आबादी और कुओं-तालाबों आदि ख़तम होते जाने से धरती के नीचे पानी का स्तर गिरता चला गया और इसके चलते हैण्डपंप भी गुज़रे ज़माने की बात बन गए. अब हैण्डपंप गाँव देहातों में ही दीखते हैं. शहरों और कस्बों में इनकी जगह पूरी तरह पानी के पाइप और टोंटी वाले नलों ने ले ली है.
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स्कूटर साइडकार

आपको याद होगी फिल्म शोले के जय और बीरू की जोड़ी और उनकी स्कूटर साइडकार, जिस पर बैठ कर – ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे … गीत गाते हुए उनका जोश और अंदाज़। दो दशक पहले तक ये स्कूटर साइडकार शहर की सड़कों पर खूब नज़र आया करती थी. लोग बीवी-बच्चों को बिठा कर इस गाडी में घूमते थे लेकिन अब ये वाहन सडकों से गायब हो चुका है.
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कंप्यूटर फ्लॉपी

हो सकता है आप में से कुछ को फ्लॉपी पर काम करने का एक्सपीरियंस हो, लेकिन अब ज़्यादातर कंप्यूटर फ्लॉपी को बॉय-बॉय कह चुके है। फ्लॉपी बनाने वाली वर्तमान इकलौती कंपनी सोनी इलेक्ट्रॉनिक्स ने मार्च 2011 से इसका प्रोडक्शन बंद कर दिया है। साल 2010 में दुनियाभर में फ्लॉपी डिस्क की 29वीं सालगिरह मनाई गई। 3.5 इंच की फ्लॉपी जल्द ही इतिहास तक सीमित हो जाएगी और आने वाली जेनरेशन इसके बारे में किताबों में ही पढा करेगी। फ्लॉपी को अलविदा कहने की वजह है न्यू एज और फास्टर टेक्नोलॉजी। थंब ड्राइव यानी ऑप्टिकल स्टोरेज पेन ड्राइव ने फ्लॉपी को बेरोजगार बना डाला। वहीं रही सही कसर कम्प्यूटर मैन्युफैक्चरर कंपनी डेल ने पूरी कर दी, जब साल 2003 में उसने अपने कम्प्यूटर्स में फिक्स्ड ड्राइव डिस्क यानी फ्लॉपी ड्राइव का इस्तेमाल बंद करने का ऐलान किया। 20वीं शताब्दी के आखिरी दो दशकों में फ्लॉपी का खूब बोलबाला था। उस वक्त न तो सीडी ड्राइव हुआ करती थी और न ही पेन ड्राइव। इंटरनेट भी उन दिनों इतना पॉपुलर नहीं था और क्लाउड कम्प्यूटिंग की कल्पना करने की बात भी बेमानी थी। उस वक्त में डाटा सहेज कर रखना बेहद मुश्किल हुआ करता था। ऐसे वक्त में फ्लॉपी अवतार बन कर उतरी। 1.4 एमबी की डाटा स्टोरेज वाली फ्लॉपी में हालांकि आज की पेन ड्राइव जितना डिस्क स्पेस नहीं था, लेकिन उस समय के लिहाज से यह काफी ज्यादा था। उस दौरान फ्लॉपी का इस्तेमाल सिर्फ वर्ड डॉक्यूमेंट या लाइट वेट वाली पिक्चर्स को सेव करने के लिए ही किया जाता था। यहां तक कि कम्प्यूटर का बैकअप लेने में भी फ्लॉपी डिस्क का इस्तेमाल होता था। साल 1981 में दुनिया की पहली 3.5 इंच की फ्लॉपी बनाने वाली सोनी इलेक्ट्रॉनिक्स ने 2011 में तकरीबन सवा करोड फ्लॉपी बेची, लेकिन घाटे के चलते उसे फ्लॉपी बिजनेस को बंद करने का फैसला लेना पडा। 2011 तक फ्लॉपी मैन्युफैक्चरिंग कारोबार में सिर्फ सोनी ही अकेली कंपनी बची थी, जबकि बाकी सभी कंपनियां यह कारोबार कभी का समेट चुकी थीं।
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सिक्के- चवन्नी, अट्ठन्नी और 1, 2-5 रुपये का नोट

भारत की उन गिने-चुने देशों में शुमार है जिसने सबसे पहले सिक्के जारी किए। परिणामत: इसके इतिहास में अनेक मौद्रिक इकाइयों (मुद्राओं) का उल्लेख मिलता है। आधुनिक भारतीय रुपये को 100 पैसे में विभाजित किया गया है। सिक्कों के रूप में दो पैसे, तीन पैसे, पांच पैसे, दस पैसे, बीस पैसे, चवन्नी, अट्ठन्नी तीन दशक पहले तक प्रचलन में थे. आज भी दादा दादी की तिजोरी में ये सिक्के आपको मिल जायेंगे। ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि भारत में सिक्के 800 ई. पू. प्रकाश में आये। कुछ का मानना है की सिक्के का चलन सबसे पहले शेरशाह सूरी ने शुरू किया। डा. डी. आर. भण्डारकर तथा विटरनित्ज जैसे विद्वान भारत में सिक्कों की प्राचीनता 3000 ई. पू. के आस-पास बताते हैं। सिक्कों के निर्माण के लिए अनेक धातुएं प्रयोग में लाई जाती थीं। इनमें सोना, चांदी तथा तांबा प्रमुख धातुएं थीं। सोना तो भारत में विपुल मात्रा में था। तांबा भी अयस्क के रूप में प्राप्त होता था। परंतु चांदी बहुत कम मात्रा में उपलब्ध थी इसलिए इसका आयात किया जाता था। सातवाहन वंश ने मुद्रा निर्माण में एक नया प्रयोग किया। उन्होंने मुद्रा निर्माण के लिए सीसे का प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। हिन्द यवन शासकों ने एक और धातु मुद्रा निर्माण हेतु प्रयुक्त किया जिसे निकिल के नाम से जाना जाता है। कभी-कभी सिक्कों के निर्माण हेतु पोटीन, कांस्य तथा पीतल का भी प्रयोग किया जाता था। कई बार मुद्रा निर्माण में मिश्रित धातुओं का भी प्रयोग किया जाता था। सिक्कों का चलन बहुत लम्बे वक़्त तक रहा पर अब सिक्के लगभग गायब हो चुके हैं. अब आपको एक रूपए, दो रूपए, पांच रूपए और दस रूपए के सिक्के ही बाज़ार में दिखेंगे।
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एक दो और पांच रुपये के नोट बंद

नोटों और सिक्कों की कमी सारे देश में बनी हुई है। दरअसल जब से एक दो और पांच रुपए का स्वरूप बदलकर सिक्कों में सिमट गया, तभी से बाजार में नोट कम नजर आने लगे। धीरे-धीरे इन नोटों की आपूर्ति में लगातार कमी आने लगी। उधर, ऐसे नोटों की मांग अभी भी अच्छी खासी बनी हुई है। अब तो सरकार ने एक, दो और पांच रुपये के नोटों का मुद्रण भी बंद कर दिया है।
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कलम दवात

शरपत और नरकुल की लकड़ी की ‘कलम’ और कांच की शीशी की ‘दवात’ का जमाना अब लद गया। पहले दफ्तरों में, अदालतों में और घरों में लोग लिखने के लिए कलम दवात का इस्तेमाल ही किया करते थे. दूसरी या तीसरी कक्षा तक पहुचते पहुचते बच्चे भी कलम दवात का इस्तेमाल शुरू कर देते थे. लेकिन अब तो प्राथमिक स्कूलों के बच्चों के हाथ में भी ‘कलम-दवात’ और ‘पाटी-बोरका’ नहीं, बल्कि लकड़ी के पेंसिल और बोलपॉइंट नज़र आते हैं. पहले स्कूलों में बच्चे शरपत व नरकुल की लकड़ी की ‘कलम’ के साथ कांच की शीशी में भरी सियाही से ‘सुलेख’ लिखा करते थे। कहते हैं कि नरकुल की कलम से सुलेख लिखने से लिखावट बहुत सुन्दर हो जाया करती थी. लेकिन अब कलम दवात का चलन बिलकुल ख़तम हो चुका है. कलम दवात अब घरों के ड्राइंग रूम में शोभा बढाने के लिए शोपीस के रूप में रखा दिखाई देता है.
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रहट

रहट कुएँ या तालाब से जल निकालने का एक ऐसा यंत्र है जिसमें एक रस्सी में पिरोयी हुई पानी भरने की डोलचियों की माला गोलाकार चलती रहती है जब बैलों या किसी मनुष्य के द्वारा रस्सी खींची जाती है। रहट सिंचाई तकनीक के नाम से शायद अब अधिकांश लोग वाकिफ भी नहीं है। इस सिंचाई तकनीक से किसान जहां पर्यावरण का संरक्षण करते थे वहीं बिजली और डीजल की बचत भी होती थी। वर्तमान में बदलती तकनीक और विकास की इस रफ्तार में किसानों को भी पुरानी परंपराओं को बदलने के लिए मजबूर कर दिया। दो बैलों के साथ इस सिस्टम को परंपरागत कुएं में लगाया जाता था और चेन में लगे डिब्बों के जरिये पानी खेतों तक पहुंचाया जाता था। इस सिस्टम में किसी तरह की बिजली अथवा डीजल का इस्तेमाल नहीं किया जाता था। महज बैलों को चलाने के लिए एक व्यक्ति की जरूरत रहती थी। किसानों की बात पर यकीन करें तो कुछ बैल इस तकनीक के लिए इतने फिट रहते थे कि वे बिना किसी व्यक्ति के इस सिस्टम को चलाते रहते थे। इससे बिजली की भी बचत रहती थी और साथ में पर्यावरण का भी संरक्षण होता था। बिना धुएं और बिना किसी ईंधन के इस सिस्टम को चलाया जाता था।

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लम्ब्रेटा स्कूटर

आज जहां शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर हजारों स्कूटर मोटरसाइकिलें दौड़ती हैं, वहीँ एक जमाने में लम्ब्रेटा स्कूटर शहर की सडकों की शान हुआ करता था। आजकल तो दो पहिया गाड़ी का कलर मेटेलिक होता है लेकिन लम्ब्रेटा का रंग कुछ यूं था मानो गलती से इसपर रंग गिर गया हो और फिर उससे ब्रश से फैला दिया गया हो. नए ज़माने की गाड़ियों कि तरह लम्ब्रेटा सन्नाटे से नहीं गुजरता. इसके आने कि एक अपनी आवाज होती थी. जो दूर से ही बता देती थी कि लम्ब्रेटा आ रहा है. हालाँकि अब यह आवाज़ गुम हो चुकी है. झारखन के हजारीबाग शहर में इकलौते स्कूटर लम्ब्रेटा के मालिक थे संत कोलंबा कॉलेज के तत्कालीन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. पीसी होरो। उनके स्कूटर का नम्बर था बीआरएन 83। यह स्कूटर 64 वर्ष पहले 1949 में रांची ऑटो मोबाइल सेंटर से ढाई हजार रुपए में खरीदा गया था। उस समय स्कूटर का दाम 1300 रुपये था बाकी पैसे टैक्स में लगे थे।
भारत में 70 से 80 के दशक में लम्ब्रेमटा स्कू टर अपनी पहचान बना चुका था. देश में दुपहिया और तिपहिया वाहन बनाने वाली कंपनी स्कूटर्स इंडिया लम्ब्रेटा स्कूटर की जनक थी. लेकिन धीरे धीरे कंपनी घाटे में चली गई और अंततः लम्ब्रेटा का निर्माण बंद हो गया.

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बजाज स्कूटर

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, बजाज स्कूटर के साथ जुड़ा यह नारा गुजरे वक्त के युवा वर्ग की याद अनायास ही दिला देता है। लेकिन लाखों मध्यम वर्गीय परिवारों की शान रहा यह स्कूटर बदलते समय और बदलती पीढ़ी के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाया और अचानक ही नए युवाओं के लिए पुराने फैशन का वाहन बनकर रह गया। बदलते वक्त का मिजाज भांपते हुए मोटरसाइकिल बनाने वाली देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बजाज ऑटो लिमिटेड ने बाजार की मांग को समझा और बजाज स्कूटर का निर्माण स्थगित कर दिया। एक समय था, जब भारत के मध्यम वर्ग की पहचान बजाज स्कूटर से होती थी। हर कोई नए बजाज स्कूटर की पहली सवारी का लुत्फ उठाना चाहता था। इस स्कूटर को खरीदने के लिए कतारें लगती थीं और लोगों को बजाज स्कूटर पाने में कई बार सालों लग जाते थे। बजाज स्कूटर पर शान से बैठा यह व्यक्ति आज भी इस स्कूटर से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता देखा जा सकता है। हालांकि यह सच है कि आज का युवा वर्ग बजाज स्कूटर से मुंह फेर चुका है। बजाज कंपनी इन दिनों पल्सर 135एलएस ‘लाइट स्पोर्ट’ जैसी मोटरसाइकिलें बना रही है। भारत के आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद देश में विश्वस्तरीय मोटरसाइकिलों, कारों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है हर साल 30 लाख मोटर साइकिलें देश में बन रही हैं।

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राजदूत मोटरसाइकिल

स्कूटर और फियट की ओल्ड मॉडल को याद सब करते हैं लेकिन इस बीच में राजदूत मोटरसाइकिल को लोग भूलते जा रहे हैं। हिंदी बेल्ट के सुदूर देहातों में इस फटफटिया मोटरसाइकिल को लेकर एक जमाने में लोग सबसे अधिक क्रेजी हुआ करते थे। काली रंग की यह मोटरसाइकिल तब शान की सवारी हुआ करती थी। खराब सड़कों पे भी यह सरपट दौड़ती थी। हीरो होंडा और अन्य ओटोमोबाइल कंपनियों के हाथ-पांव पसारने के बाद राजदूत का स्पेस सिमटने लगा।
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ढेंकी और जांता (आटा पीसने की बड़ी चक्की)

पुराने समय में गांवों में धान की कुटाई व पिसाई के लिए परंपरागत तरीके से ढेंकी व जाता का प्रयोग किया जाता था। मशीनी युग और आरामतलबी के कारण अब ये परंपरागत साधन समय के चलन से बाहर हो गए हैं। कुछ गांव में इक्कादुक्का घरों में ये देखने को मिल रहे हैं, पर इनका प्रयोग अब लगभग बंद ही हो चुका है। इसके पीछे कारण गांव-गांव में हालर मिल और आदमी के श्रम से बचने की प्रवृत्ति को माना जा रहा है। ढेकी व जाता का प्रयोग शरीर को थकाने वाला होता है। हालर मिल में धान कुटाई व पिसाई बहुत कम समय में बिना कोई शारीरिक श्रम के हो जाता है। यही वजह है , कि परंपरागत तरीके से चलने वाले ढेंकी और जांजा अब अनुपयोगी हो गए हैं। गांवों में पहले धान कुटाई के लिए जहां लकड़ी के भारी भरकम ढेंकी का प्रयोग किया जाता था तो वहीं चांवल व गेहूं पिसाई के लिए पत्थर से बने जांता का प्रयोग होता था। समय के साथ इन उपकरणों का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया है पर कई गांवों में ऐसे उपकरण आज भी देखने को मिल ही जाते हैं।
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ओखली और मूसल

ओखली, ओखल या खरल एक ऐसे मज़बूत कटोरे को कहते हैं जिसमें एक भारी मूसल नामक डंडे से चीज़ें तोड़ी और पीसी जाती हैं। ओखली और मूसल अक्सर सख़्त लकड़ी या पत्थर के बने होते हैं। पीसे जाने वाली चीज़ें ओखली में डाली जाती हैं और फिर उन्हें मूसल के प्रहार से तोड़ा या मूसल के साथ रौंदकर पीसा जाता है। इसका प्रयोग मसाले बनाने, चटनियाँ बनाने और औषधि पीसने में बहुत किया जाता है। कुछ ओखलियाँ बहुत बड़ी होती हैं और पारम्परिक समाजों में उसमें खाने के पदार्थ बनाने के लिए कई गृहणियाँ मिलकर भारी मूसल चलाती हैं। बहुत सी संस्कृतियों में इसका प्रयोग दवाईयाँ बनाने के लिए होने से इसे चिकित्सा या स्वास्थ्य का चिह्न भी माना जाता है। सुश्रुत और चरक जैसे प्राचीन चिकित्सकों के द्वारा प्रयोग किये जाने की वजह से इस आयुर्वेद का भी चिह्न माना जाता है।
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चरखा

चरखा एक हस्तचालित युक्ति है जिससे सूत तैयार किया जाता है। इसका उपयोग कुटीर उद्योग के रूप में सूत उत्पादन में किया जाता है। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में यह आर्थिक स्वावलम्बन का प्रतीक बन गया था। चरखा यंत्र का जन्म और विकास कब तथा कैसे हुआ, इस पर चरखा संघ की ओर से काफ़ी खोजबीन की गई थी। अंग्रेज़ों के भारत आने से पहले भारत भर में चरखे और करघे का प्रचलन था। भारत में चरखे का इतिहास बहुत प्राचीन होते हुए भी इसमें उल्लेखनीय सुधार का काम महात्मा गांधी के जीवनकाल का ही मानना चाहिए। सबसे पहले सन्‌ 1908 में गांधी जी को चरखे की बात सूझी थी जब वे इंग्लैंड में थे। उसके बाद वे बराबर इस दिशा में सोचते रहे। वे चाहते थे कि चरखा कहीं न कहीं से लाना चाहिए। सन्‌ 1916 में साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) की स्थापना हुई। बड़े प्रयत्न से दो वर्ष बाद सन्‌ 1918 में एक विधवा बहन के पास खड़ा चरखा मिला। 1500 ई. तक खादी और हस्तकला उद्योग पूरी तरह विकसित था। सन्‌ 1702 में अकेले इंग्लैंड ने भारत से 10,53,725 पाउंड की खादी ख़रीदी थी। मार्कोपोलो और टेवर्नियर ने खादी पर अनेक सुंदर कविताएँ लिखी हैं। सन्‌ 1960 में टैवर्नियर की डायरी में खादी की मृदुता, मज़बूती, बारीकी और पारदर्शिता की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है।
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जुगनू

जुगनू के बारे में तो तुम सब जानते ही होगे। हां, वही जुगनू जो रात में सितारों की तरह टिमटिमाते हैं। वैसे आजकल शहरों में ये कम ही दिखते हैं। लेकिन गांवों में इन्हें बड़ी संख्या में देखा जा सकता है। रात में लाइट की तरह चमकने वाले इस छोटे कीट की खोज रॉबर्ट बायल नामक वैज्ञानिक ने सन् 1667 में की थी। जुगनू रात में जगते हैं। देखने में ये पतले चपटे से आकार के सिलैटी भूरे रंग के होते हैं। इनकी आंखें बड़ी और टांगें छोटी होती हैं। इनके दो छोटे-छोटे पंख भी होते हैं। ये जमीन के अंदर या पेड़ों की छाल में ही अपने अण्डे देते हैं। इनका मुख्य भोजन छोटे कीट और वनस्पति होते हैं। जूगनू की तरह ही चमकने वाले और भी कई जीव हैं। ऐसे ही रोशनी देने वाले जीवों की कुछ एक हजार प्रजातियों की खोज की जा चुकी है, जिनमें से कुछ प्रजातियां पृथ्वी के ऊपर और कुछ समुद्र की गहराइयों में पाई जाती हैं। रात के समय जुगनू लगातार नहीं चमकते, बल्कि एक निश्चित अंतराल पर कुछ समय के लिए चमकते और बुझते रहते हैं। इसी रोशनी का इस्तेमाल ये अपना भोजन तलाशने में भी करते हैं। इनमें खास बात ये है कि मादा जुगनू के पंख नहीं होते, इसलिए वह एक जगह बैठी ही चमकती है, जबकि नर जुगनू उड़ते हुए भी चमकते हैं। यही एक कारण है, जिससे इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। इनमें से कुछ प्रजाति के जुगनुओं में रोशनी बहुत तेज होती है। ऐसी किस्म के जुगनू अक्सर दक्षिणी अमेरिका और वेस्टइंडीज में पाये जाते हैं। जुगनू में ये प्रकाश रासायनिक क्रिया से उत्पन्न होता है, ये रासायनिक क्रियाएं मुख्य रूप से पाचन संबंधित होती हैं।

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खड़ाऊँ

पुरातन समय में हमारे पूर्वज पैरों में पहना करते थे। यह लकड़ी से बनी होती है। प्राचीन समय से ही भारत में ऋषि-मुनियों द्वारा यह पहनी जाती रही है। खड़ाऊँ जहाँ पहनने में बेहद हल्की होती हैं, वहीं दूसरी ओर यह काफ़ी मजबूत भी होती है। पैरों में लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने के पीछे भी हमारे पूर्वजों की सोच पूर्णत: वैज्ञानिक थी। गुरुत्वाकर्षण का जो सिद्धांत वैज्ञानिकों ने बाद में प्रतिपादित किया, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने काफ़ी पहले ही समझ लिया था। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर में प्रवाहित हो रही विद्युत तरंगे गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। यदि यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे तो शरीर की जैविक शक्ति समाप्त हो जाती है। इसी जैविक शक्ति को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने पैरों में खड़ाऊँ पहनने की प्रथा प्रारंभ की, जिससे शरीर की विद्युत तंरगों का पृथ्वी की अवशोषण शक्ति के साथ संपर्क न हो सके। इसी सिद्धांत के आधार पर खड़ाऊँ पहनी जाने लगी। भगवान राम से लेकर भगवान कृष्ण तक खड़ाऊँ पहनने की कथा पुरणों और ग्रंथों में सुनने को मिलती है। पुराने समय में कपड़े के जूते का प्रयोग हर कहीं सफल नहीं हो पाया। जबकि लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने से किसी धर्म व समाज के लोगों को आपत्ति नहीं थी। इसीलिए यह अधिक प्रचलन में आई। लेकिन समय के साथ-साथ चमड़े का जूते, रबड़ की खोज के साथ उसकी चप्पलें बनने लगीं। पहनने में सुविधा होने के कारण इनका प्रयोग ज्यादा होने लगा और खड़ाऊं प्रचलन से बाहर होता गया।
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कठपुतली का नाच

कठपुतली का खेल अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है। यह खेल गुड़ियों अथवा पुतलियों द्वारा खेला जाता है। गुड़ियों के द्वारा जीवन के अनेक प्रसंगों की, विभिन्न विधियों से, इसमें अभिव्यक्ति की जाती है। कठपुतलियाँ या तो लकड़ी की होती हैं या पेरिस-प्लास्टर की या काग़ज़ की लुग्दी की। उसके शरीर के भाग इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि उनसे बँधी डोर खींचने पर वे अलग-अलग हिल सकें। भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएँ और किवदंतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फरहाद की कथाएँ ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन बाद में सम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम भी दिखाए जाने लगे। कठपुतली कला देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी थी, लेकिन आधुनिक सभ्यता में मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने के कगार पर है।

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गिद्ध

भारतीय गिद्ध पुरानी दुनिया का गिद्ध है जो नई दुनिया के गिद्धों से अपनी सूंघने की शक्ति में भिन्न हैं। यह मध्य और पश्चिमी से लेकर दक्षिणी भारत तक पाया जाता है। प्रायः यह जाति खड़ी चट्टानों के श्रंग में अपना घोंसला बनाती है, परन्तु राजस्थान में यह अपना घोंसला पेड़ों पर बनाते हुये भी पाये गये हैं। अन्य गिद्धों की भांति यह भी अपमार्जक या मुर्दाख़ोर होता है, और यह ऊँची उड़ान भरकर इंसानी आबादी के नज़दीक या जंगलों में मुर्दा पशु को ढूंढ लेते हैं और उनका आहार करते हैं। भारतीय गिद्ध का सर गंजा होता है, उसके पंख बहुत चौड़े होते हैं तथा पूँछ के पर छोटे होते हैं। इसका वज़न 5.5 से 6.3 कि. होता है। इसकी लंबाई 80-103 से.मी. तथा पंख खोलने में 1.96 से 2.38 मी. की चौड़ाई होती है। यह जाति आज से कुछ साल पहले अपने पूरे क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पायी जाती थी। 1990 के दशक में इस जाति का 97% से 99% पतन हो गया है। इसका मूलतः कारण पशु दवाई डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) है जो कि पशुओं के जोड़ों के दर्द को मिटाने में मदद करती है। जब यह दवाई खाया हुआ पशु मर जाता है, और उसको मरने से थोड़ा पहले यह दवाई दी गई होती है और उसको भारतीय गिद्ध खाता है तो उसके गुर्दे बंद हो जाते हैं और वह मर जाता है।
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गौरैया

पिछले कुछ सालों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है। आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती। सुपरमार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दूकानें घट रही हैं। इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है। ये तंरगें चिड़िया की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है। गौरैया को घास के बीज काफी पसंद होते हैं जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिल जाते हैं। ज्यादा तापमान गौरेया सहन नहीं कर सकती। प्रदूषण और विकिरण से शहरों का तापमान बढ़ रहा है। कबूतर को धार्मिक कारणों से ज्यादा महत्व दिया जाता है। चुग्गे वाली जगह कबूतर ज्यादा होते हैं। पर गौरैया के लिए इस प्रकार के इंतज़ाम नहीं हैं। खाना और घोंसले की तलाश में गौरेया शहर से दूर निकल जाती हैं और अपना नया आशियाना तलाश लेती हैं।
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कोयल

कोयल या कोकिल ‘कुक्कू कुल’ का पक्षी है, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘यूडाइनेमिस स्कोलोपेकस स्कोलोपेकस’ है। नर कोयल नीलापन लिए काला होता है, तो मादा तीतर की तरह धब्बेदार चितकबरी होती है। नर कोयल ही गाता है। उसकी आंखें लाल व पंख पीछे की ओर लंबे होते हैं। नीड़ परजीविता इस कुल के पक्षियों की विशेष नेमत है यानि ये अपना घोसला नहीं बनाती। ये दूसरे पक्षियों विशेषकर कौओं के घोंसले के अंडों को गिरा कर अपना अंडा उसमें रख देती है। स्वभाव से संकोची यह पक्षी कभी किसी के सामने पडऩे से कतराता है। इस वजह से इनका प्रिय आवास या तो आम के पेड़ हैं या फिर मौलश्री के पेड़ अथवा कुछ इसी तरह के सदाबहार घने वृक्ष, जिसमें ये अपने आपको छिपाए हुए तान छेड़ता है। कोयल की सुरीले स्वर भी गायब ही हो चुके हैं। हमारे मुल्क में जिस तादाद में आबादी तेजी से बढ़ रही है उसी अनुपात में हमारे आस-पास से कई जीव-जंतु गायब होते जा रहे हैं। उन सबमें से प्रमुखता से समाप्त होने वालों की फेहरिस्त में कई पक्षी हैं।
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सोन चिरैया

संरक्षणकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि दुनिया की सबसे वज़नदार पक्षियों में से एक सोन चिरैया की प्रजाति लुप्त होने की कगार पर है. सोन चिरैया एक मीटर उंची होती है और इसका वज़न 15 किलो होता है. इंटरनेश्नल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर का कहना है कि अब केवल 250 सोन चिरैया ही बची हैं. इंटरनेश्नल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर यानि आईयूसीएन द्वारा जारी की गई पक्षियों की ‘रेड लिस्ट’ में कहा गया है कि लुप्त होने वाले पक्षियों की तादाद अब 1,253 हो गई है, जिसका मतलब है कि पक्षियों की सभी प्रजातियों में से 13 प्रतिशत के लुप्त हो जाने का ख़तरा है. 2011 के आईयूसीएन अंक में विश्व की पक्षियों की प्रजातियों की बदलती संभावनाओं और स्थिति का आकलन किया गया है. आईयूसीएन के वैश्विक प्रजाति योजना के उप निदेशक ज़ॉ क्रिस्टॉफ़ वाई ने कहा, “एक साल के अंतराल में पक्षियों की 13 प्रजातियां दुर्लभ वर्ग में शामिल हो गई हैं.” विश्व भर में पक्षियों की 189 प्रजातियों को गंभीर रूप से विलुप्त हो चुकी है, जिसमें सोन चिरैया भी शामिल है. सोन चिरैया को कभी भारत और पाकिस्तान की घासभूमि में पाया जाता था, लेकिन अब इसे केवल एकांत भरे क्षेत्रों में देखा जाता है. आख़िरी बार राजस्थान में इस अनोखे पक्षी का गढ़ माना गया था. दूसरी प्रजाति जो विलुप्त होने की कगार पर है, वो है बहामा ओरियोल. ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार इस काले और पीले रंग के केवल 180 पक्षी बचे हैं.
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कठफोड़वा (वुडपैकर)

शहरीकरण के कारण बदलते वातावरण में इन पक्षियों की प्रजातियां खुद को ढाल पाने में असमर्थ हैं, जिस कारण ये विलुप्त होती जा रही हैं। इन प्रजातियों में वुडपैकर भी शामिल है।
वुडपैकर, जिसे हम कठफोड़वा कहते हैं, मैना के साइज का भूरा बादामी पक्षी होता है। इसका ऊपरी भाग सोने जैसा पीला और नीचे का काला होता है। इसके सफेद पंखों पर काली धारियां बनी होती हैं, जो उड़ते समय साफ दिखाई देती हैं। इसका मुकुट गहरे लाल रंग का होता है। इसकी तीन-चार प्रजातियां पाई जाती हैं, जैसे रुफस वुड पैकर, गोल्डन बैकेड वुडपैकर और यलोफ्रंटेड पाडि वुडपैकर। हम यहां गोल्डन वुडपैकर की बात कर रहे हैं। इसके मुकुट के अगले भाग पर सफेद बिंदिया होती है। यह खुले जंगलों, बगीचों में अकेले या जोड़ों में पाया जाता है। यह पेड़ की छाल में जबरदस्त टक्कर मारता है, जिसका वेग 40 किलोमीटर प्रतिघंटा होता है। यह भारत के अलावा पाकिस्तान, बंगलादेश और श्रीलंका में भी पाया जाता है। वुडपैकर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह थोड़ा झुककर उड़ता है। ये अपने घोंसले मार्च से अगस्त तक बनाते हैं। पेड़ों के तनों या डालों में चिड़िया के बनाए घोंसलों को बड़ा करके उनमें रहते हैं। ये अपने घोंसले 30 फुट की ऊंचाई पर बनाते हैं। इनके अंडों की संख्या 3-4 होती है। ये अंडे चीनी मिट्टी की तरह एकदम सफेद चमकदार होते हैं। कठफोड़वे की आयु अधिकतम 40 वर्ष होती है।
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गोल डायल वाला पुराना फोन
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पेजर

पेजर के सहारे हम लोगों को मैसेज भेजते थे. टैक्स मैसेज के लिए 160 अक्षरों की सीमा होती थी। भारत में ये सेवा 1995 में शुरू की गई थी।
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पॉकेट घड़ियां

रेट्रो लुक के फैशन में आने से पुरानी चीजें भी फिर से चलन में आ गई हैं। जी हां! आपके दादा-नाना के जमाने में चलने वाली पॉकेट वॉच(जेब घड़ी) अब फैशन स्टेटमेंट बन गई है। स्टाइलिश और ट्रेंडी लुक के लिए पॉकेट घड़ियों की नई रेंज नामी कंपनियों द्वारा बाजार में उतारी गई हैं। पहले पॉकेट घड़ियां सिर्फ लड़के ही रखा करते थे किन्तु अब लड़कियों के लिए भी पॉकेट घड़ी जरूरी एक्सेसरीज बन गई है। नई नवेली पॉकेट घड़ियों को लड़के चाहें तो शर्ट की जेब में रखें या पेंट की, दोनों ही फैशन में हैं। लड़कियां इस पॉकेट घड़ियों को खूबसूरत चैन के साथ नेकलेस की तरह गले में लटका सकती हैं या फिर कमर में भी बांध सकती हैं। यदि लड़कियां पॉकेट घड़ी को गले में नेकलेस की तरह पहनना चाहती हैं तो एंटीक लुक वाली चैन के साथ पहनें यह क्लासिक लुक देगी। पहले पॉकेट घड़ियाँ सिर्फ राउंड शेप में हुआ करती थीं किन्तु अब इनका रंग-ढंग काफी बदल गया है। अब मार्केट में बॉटल शेप, वॉयलिन शेप, ऑवल शेप से लेकर कछुए और चाबी के शेप में पॉकेट घड़ियां आपको मिल जाएंगी। इन घड़ियों के साथ आप मॉर्डन और ट्रेडीशनल स्टाइल का कॉम्बीनेशन कर सकते हैं।
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पेट्रोमैक्स
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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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One Response to आजादी के 68वीं सालगिरह… क्या भूलूं क्या याद करुं!!!

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