हमारे लिए कितने ‘शरीफ’ हैं नवाज? 1998 में कहा था – सूखी रोटी खाकर भी भारत को करारा जवाब देंगे

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  • लेकिन नवाज जब 1997 में सत्ता में आए थे तो उन्होंने भारत के साथ शांति की बातें कही थीं। लेकिन मई 1998 में भारत ने जब परमाणु परिक्षण किया तो उसके जवाब में पाकिस्तान ने भी एटमी परीक्षण कर दिया। तब कहा था-हम सूखी रोटी खाकर भी भारत को करारा जवाब देंगे।
  • 1999 में दोस्ती का हाथ बढ़ाकर सदा-ए-सरहद बस चलवाई गई, फरवरी 1999मेंअटल बिहारीवाजपेयीने आगे बढ़कर ऐतिहासिक लाहौर यात्रा कर लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर किए… लेकिन भारत को दोस्ती के अंधेरे में रख करगिल युद्ध छेड़ दिया। आरोप मुशर्रफ पर लगाया, लेकिन मुल्क के वजीर-ए-आजम तो वे ही थे! बाद में (12 अक्टूबर 1999) मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर गद्दी ही छीन ली। साल 2000 में नवाज पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया और इसी आरोप में उनको पाकिस्तान से निकाल दिया गया।
  • हालांकि जीत के बाद शरीफ ने मॉडल टाउन स्थित अपने कार्यालय की छत से लोगों को संबोधित करते हुए कहा- मैं प्रधानमंत्री बना तो पाकिस्तान की जमीन से भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां नहीं होने दूंगा।
  • नवाज शरीफ ने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि लाहौर घोषणा पत्र के अनुसार भारत के साथ कश्मीर, सियाचीन और जल संधि समेत सारे विवादित मसले सुलझाएंगे।
  • जीत के बाद भी उन्हों ने कहा कि भारत से अच्छे रिश्ते पहली प्राथमिकता होगी। करगिल की सच्चाई भारत को बताएंगे।
  • एक इंटरव्यू में उन्होंतने मुंबई हमले में पाक सेना की साजिश मानते हुए कहा था कि हमारे यहां कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते भारत से रिश्तों में सुधार आए। लेकिन पाकिस्तान में शुरू से सेना और आईएसआई भारत से रिश्तों के खिलाफ रही है और नवाज शरीफ का इन दोनों से हमेशा टकराव रहा है। ऐसे में भारत को अब भी सतर्क रहना होगा।

पहली बार बने पाक के पीएम, घाटी में बढ़ा आतंकवाद-नवाज शरीफ ने पहली बार नवंबर 1990 में पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री पद का जिम्‍मा संभाला था। अगर ध्‍यान दिया जाए तो यही वह समय था जब कश्‍मीर में आतंकवाद और चरमपंथ ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। 90 के दशक में जब कश्‍मीर में आतंकवाद सिर उठा चुका था, भारत की ओर से कई बार पाकिस्‍तान की सरकार और आईएसआई को इसके लिए जिम्‍मेदार ठहराया गया लेकिन न तो पाकिस्‍तान सरकार ने इस पर कोई ध्‍यान दिया और न ही आईएसआई पर कोई सख्‍ती बरती गई।

आईएसआई को खुला समर्थन-मुंबई में नवंबर 2008 में 26 /11 जैसे हमले की साजिश में शामिल पाक की इंटेलीजेंस एजेंसी को नवाज शरीफ का पूरा समर्थन हासिल है। कुछ दिनों पहले जब पाक में मशहूर पत्रकार हामिद मीर पर हमला हुआ तो उस समय शरीफ ने आईएसआई की खुलकर तारीफ की थी। शरीफ ने कहा था कि जिस तरह से आईएसआई देश की सुरक्षा में तैनात है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है। इसके अलावा जब पिछले वर्ष अक्‍टूबर में नवाज शरीफ ने अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात की थी तो उन्‍होंने 26 /11 हमलों के मास्‍टर माइंड लश्‍कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद की गिरफ्तारी के बारे में ओबामा को कोई भरोसा नहीं दिलाया था।

मुंबई में ब्‍लास्‍ट के समय थे पीएम-यही नहीं मार्च 1993 में जब मुंबई में ब्‍लास्‍ट हुए तब नवाज शरीफ ही पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री थे। इस ब्‍लास्‍ट के आरोपी दाऊद इब्राहीम को न सिर्फ पाकिस्‍तान में शरण दी गई बल्कि उसे पूरी सुरक्षा भी मुहैया कराई जा रही है। दाऊद पाक में उसी इलाके में रहता है जिस इलाके में पाक आर्मी के वरिष्‍ठ अधिकारी रहते हैं।

कारगिल वॉर के समय रहे प्रधानमंत्री-मई 1999 में नवाज शरीफ जब पाक के प्रधानमंत्री थे, भारत और पाक के बीच तीसरा युद्ध यानी कारगिल वॉर शुरू हो गया। नवाज शरीफ ने अक्‍टूबर 1998 में परवेज मुशर्रफ को पाक आर्मी का प्रमुख नियुक्‍त किया था। कुछ विशेषज्ञों की मानें तो नवाज शरीफ कारगिल वॉर के ब्‍लूप्रिंट से पूरी तरह से वाकिफ थे लेकिन नवाज हमेशा इससे इंकार करते आए हैं। नवाज की मानें तो उन्‍हें इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। उन्‍हें इसके बारे में तब मालूम चला जब उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने एक अरजेंट कॉल के जरिए उनसे संपर्क किया। वह अगर मुशर्रफ की बात पर अगर यकीन किया जाए तो नवाज शरीफ ने ही कारगिल युद्ध की योजना के बारे में उनसे बात की। मुशर्रफ ने एक किताब के लेखक को जो बातें बताई उनके मुताबिक मुशर्रफ के अलावा शरीफ और तीन और जनरल को इस योजना के बारे में मालूम था। मुशर्रफ की बातों पर अगर यकीन करें तो शरीफ को 20 फरवरी 1998 की वाजपेई की लाहौर यात्रा से 20 दिन पहले ही कारगिल ऑपरेशन के बारे में सारी जानकारी दे दी गई थी।

2013 में फिर लौटा घाटी में हिंसा का दौर- नवाज शरीफ के पिछले वर्ष पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही पूरी कश्‍मीर घाटी में हिंसा का दौर फिर से लौट आया है। आए दिन सेना के काफिले पर हमला हो रहा है और विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1989 के बाद से अब घाटी के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। वर्ष 2013 में पाकिस्‍तान ने दिसंबर तक 195 बार सीजफायर का वॉयलेशन किया है, यह पिछले 10 वर्षों में सबसे ज्‍यादा है। साफ है नवाज शरीफ एक तरफ तो भारत के साथ शांति की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ आतंकी गतिविधियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने में हिचकते हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ 26 मई को नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए आ रहे हैं… लेकिन शरीफ पर दवाब कितना है इसका पता इससे चलता है कि…

  • पाकिस्तान में कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई उनके भारत दौरे के सख्त खिलाफ हैं।
  • उधर कट्टरपंथी नेता हाफिज सईद ने नवाज शरीफ को चेतावनी दी है कि उनका भारत जाना कश्मीर के लिए घातक होगा.

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं और सालों में पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हमारी सरजमीं पर आकर मुबारकबाद दे रहे हैं। ये नजारे मोदी की विदेश नीति, खास तौर पर पाकिस्तान के साथ भारत के तनावपूर्ण रिश्तों में नया मोड़ साबित हो सकते हैं। एक कदम हम चलें, एक कदम तुम चलो की तर्ज पर मोदी के न्योते को शरीफ ने कबूल लिया है मोदी ने पहल की है तो शरीफ भी पीछे दिखना नहीं चाहते।

नवाज पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के साथ दिल्ली जाएंगे। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने नवाज से कार्यक्रम में शिरकत करने की अपील करते हुए कहा था कि भारत में चुनाव प्रचार के दौरान पाकिस्तान के प्रति जो कटुता नजर आई है, वह वहां नई सरकार के गठन के बाद कम होगी। पाकिस्तान के नेशनल एसेंबली में विपक्ष के नेता खुर्शीद अहमद शाह ने भी दोनों देशों की जनता के हितों के लिए नवाज से यह न्योता स्वीकार कर लेने की अपील की थी।

नवाज शरीफ के वादे

  • पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद नवाज शरीफ ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों को 1999 में ‘हमने जहां छोड़ा था’ वहीं से शुरुआत करने की जरूरत है. उन्होंने वादा किया कि वह पाक सरजमीं से कभी भी भारत-विरोधी गतिविधियों की इजाजत नहीं देंगे
  • शरीफ ने यह भी कहा कि सत्ता में वापस आने पर वह मुंबई हमलों की यहां सुनवाई में तेजी लाएंगे और इस हमले में आईएसआई की भूमिका की जांच कराएंगे.
  • उन्होंने कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढ़ंग से सुलझाने पर जोर दिया
  • साल 1999 में जहां बाधा पड़ गई थी, हमें वहीं से शुरुआत करनी होगी. वाजपेयी (अटल बिहारी) आगे आए थे, हमने ऐतिहासिक लाहौर समझौते पर हस्ताक्षर किया था. उन्होंने पाकिस्तान के बारे में बड़ी अच्छी बातें कही थीं, जो अभी भी मेरे जेहन में तरोताजा हैं. मैं भी ऐसा ही महसूस करता हूं. मुझे लगता है कि वह समय वापस आना चाहिए.’
  • उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे कहा था, ‘नवाज साहब हम साल 1999 को भारत-पाकिस्तान के बीच सभी समस्याओं के सुलझने का वर्ष घोषित क्यों नहीं कर सकते.’
  • शरीफ ने कहा, ‘उन्होंने बहुत अच्छी बातें कही थीं. यदि हमें देश पर दोबारा सत्ता में वापस लौटने का मौका मिला तो ये चीजें हमारी मुख्य प्राथमिकता होगी.’

नवाज जब भी आए भारत में कांग्रेस की गद्दी गई…

  • 1990 में पहली बार आए तो चंद्रशेखर पीएम थे..
  • 1996 में फिर दूसरी बार शरीफ आए तो भारत में दैवेगौड़ा.. और वाजपेयी आए..
  • 2013 में तीसरी बार शरीफ आऐं तो.. तो मनमोहन की 2014 में कुर्सी गई

 

पंजाब का शेर कहा जाता है… नवाज शरीफ को

पाकिस्तान में तीसरी बारप्रधानमंत्री का ताज पहनने जा रहे नवाज शरीफ को ‘पंजाब का शेर’ कहा जाताहै,

नवाज शरीफ को शेर से कितना प्यार है कि उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी शेर है..उनके घर में भी शेर विराजमान है..

Nawaz Sharif At Home In 1993, Flanked By Two Stuffed Lions, A Party Symbol

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नवाज़ शरीफका पुश्तैनी पिंड.. जाति उमरा

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पाकिस्तान के नए होने जा रहे प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ के पैतृक गांव जातिउमरा के लोगों को ‘माटी पुत्र’ का बेसब्री से इंतजार है। नवाज शरीफ साहब के पुरखे यानि अब्बा पार्टीशन के बाद अमृतसर से लाहौर गए थे।नवाज़ शरीफ का पुश्तैनी गाँव जाति उमरा।

नवाज़ शरीफ़ के अब्बा का पिंड अमृतसर का जाति उमरा है…यही नाम खानदान ने लाहौर में अपने घर को दिया….

जब वो पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तब भी उनके पिंड ने अपने माटी के लाल के लिए खुशी में पटाखे छोड़े थे। उनके अब्बा जिन्हे सब आदर से अब्बाजी कहके बुलाते थे कि आखरी ख्वाहिश अमृतसर के पिंड जाति उमरा में दफ्न होने की थी, जिससे उनके खानदान का सदियों से नाता है. अफसोस की दोनों मुल्कों में उस दौर में वैसे हालात न थे। अब्बाजी के इंतकाल के वक्त मुशरर्फ ने नवाज शरीफ को परिवार संग देश निकाला दे दिया था.. यहाँ तक की नवाज शरीफ अब्बा मियां मोहम्मद शरीफ के इंतकाल के वक्त और अंतिम संस्कार 1 नवंबर 2004 में हिस्सा नहीं ले सके।

1999 में जब भारत-पाकिस्तान के बीच सद्भावना बस सेवा शुरू हुई थी। तबमियां नवाज शरीफ को गांव वासियों ने न्यौता भेजा था। गांव वासियों का एकशिष्टमंडल पाकिस्तान में उन्हें मिला था। गांव के बुजुर्ग मस्सा सिंह, हजारा सिंह व ज्ञान सिंह इस मुलाकात को याद करते हुए भावुक हो उठे। मियांनवाज शरीफ के साथ खिंचवाई फोटो को दिखाते हुए मस्सा सिंह ने कहा कि उनकेअब्बा रमजान शरीफ, दादी मेहरा व ताया बरकत अली के साथ उन्होंने काफी समयबिताया है। जब वह पाकिस्तान में उनसे मिलने के लिए गए थे, पूरे परिवार नेउनका ऐसे स्वागत किया था, जैसे दो भाई बिछड़े हुए मिले हों।

13 दिसंबर 2012 को – नवाज के छोटे भाई पाकिस्तान पंजाबके मुख्यमंत्री मोहम्मद शहबाज शरीफ को 5 महिने पहले जाति उमरा गांव आना था..लेकिन स्वास्थ कारणों से वो विजिट टल गई थी…शरीफ परिवार का कोई पहला सदस्य देश विभाजन के बाद पुश्तैनी गाँव आ रहा था….

गांव वासी’माटी पुत्र’  के लिए मक्की की रोटी, सरसों का साग, कड़े के गिलास में लस्सी व मक्खन परोसने के लिए चूल्हा चौके को गोबर से लेपकिया गया। जाति उमरा के लोगों ने अपने घरों में रंगरोगन किया। पंजाब सरकार ने पाकिस्तान  नवाज शरीफके पैतृक गांवजाति उमराको मॉडल ग्राम बनाने की घोषणा।

नवाज शरीफ भारत के खानदान में जब भी खुशी के मौके आते हैं तो खासतौर पर पंजाबी लोकगायिका प्रकाश कौर और सुरेन्द्र कौर अपना नज़राना पेश करती रही हैं। ये पिंड अब फिर अपने पुत्तर की जीत पर बाट जोह रहा है..कि वो आए पुरखों की मिट्टी पर..

नवाज शरीफ के पिता मियां मोहम्मद शरीफ पाकिस्तान में “अब्बा मियां” के नाम से बड़े प्रसिद्ध थे,  अपनी किताब में मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ के घर पर एक डिनर का ज़िक्र किया है. उन्होंने लिखा है- अब्बा जी का व्यक्तित्व इतना कठोर था कि दोनों नवाज़ और शाहबाज़ शांति से छोटे बच्चों की तरह बैठे थे. दोनों अपने पिता के बेटे से ज़्यादा दरबारी लग रहे थे.

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मुशर्रफ़ और नवाज शरीफ के रिश्तों की दिलचस्प कहानी

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परवेज़ मुशर्रफ और नवाज पाकिस्तान के दो ऐसे चेहरे हैं जो पिछले दशक के अंतिमसालों से लेकर आज तक अपना अलग रंग जमाए हुए हैं। वक्त के साथ-साथ नवाज शरीफऔर मुशर्रफ के रिश्तों में बहुत मोड़ आए हैं।

नवाज शरीफ का पाकिस्तान की सत्ता से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। नवाज नेसत्ता में उस वक्त कदम रखा था जब विपक्ष में जिया-उल-हक की पार्टी थी औरउनको उस वक्त सत्ता छोड़ऩी पड़ी जब मुशर्रफ सत्ता में आए थे।

लेकिन समय के साथ-साथ हालात बदले और पाक की सत्ता आज फिर नवाज के हाथों मेंआने के करीब है। आज एक तरफ नवाज के सिर पाकिस्तानी सत्ता का ताज सजने वालाहै वहीं दूसरी तरफ मुशर्रफ सलाखों के पीछे अपनी जिन्दगी काट रहे हैं।

मुशर्रफ और नवाज की कहानी 1998 से शुरू होती है जब नवाज पाकिस्तान केप्रधानमंत्री थे। नवाज ने ही मुशर्रफ को 1998 में पाकिस्तान का सेनाध्यक्षबनाया था। लेकिन उस समय नवाज इस बात से अंजान थे कि मुशर्रफ ही उनके लिएघातक साबित होंगे। 1999 में मुशर्रफ ने ही उनका तख्ता पलट कर रख दिया। साल2000 में नवाज पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया और इसी आरोप में उनकोपाकिस्तान से निकाल दिया गया।

सात साल तक साऊदी अरब में रहने के बाद साल 2007 में नवाज फिर पाकिस्तानलौटे। 2008 में नवाज ने पाकिस्तान में चुनाव भी लड़े। समय ने फिर करबट लीऔर 2008 में हुए चुनाव के बाद मुशर्रफ को पाकिस्तानी सत्ता के साथ साथ देशभी छोडऩा पड़ा।

पांच साल बाद मुशर्रफ फिर से इस उम्मीद के साथ पाकिस्तान लौटे कि पाकिस्तानमें चुनाव जीतकर वह एक बार फिर पाकिस्तान में अपनी सत्ता कायम करेंगे।लेकिन अपनी सत्ता कायम करना तो दूर वह चुनाव लड़ भी ना पाए, उल्टा उन्हेंजेल जाना पड़ा।

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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