Ancient City of Dwarka: श्रीकृष्ण की ‘द्वारका’… द्वारका का पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण

द्वारका, 5000 साल पहले भगवान कृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद बसाई थी नगरी… द्वारका, हिन्दु धर्मालंबियों के लिए महान तीर्थ स्थान है… द्वारका, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित देश के चारों धाम में एक… द्वारका, पवित्र नगरी सप्तपुरियों (द्वारका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या) में से एक… कहां है वो द्वारका, भारत के किस हिस्से में है वो द्वारका… जमीन पर या पानी के नीचे वो द्वारका… आज बताने जा रहा हूं भगवान कृष्ण की उस रहस्यमयी नगरी का राज… जो 5000 हजार साल पहले हो गई थी लुप्त…

Untitled.jpg
द्वारका कई द्वारों का शहर (संस्कृत में द्वारवती)। इसी कारण इसका नाम द्वारका पड़ा। भगवान कृष्ण की पौराणिक राजधानी थी, जिसकी स्थापना मथुरा से पलायन के बाद की थी। इस शहर के चारों तरफ ऊंची-ऊंची दीवारें थी, जिनमें कई सौ दरवाजे थे। द्वारका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान के नाम से भी जाना जाता है। गुजरात के दक्षिण-पश्चिम कोने में स्थित समुद्र किनारे चार धामों में से एक धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारका। वर्तमान में दो द्वारका हैं, एक गोमती द्वारका, दसूरी बेट द्वारका। गोमती द्वारका धाम है, जबकि बेट द्वारका पुरी है। बेट द्वारका समुद्र के बीच एक टापू पर स्थित है।

कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया, तब कंस के ससुर मगधिपति जरासंघ ने यादवों को खत्म करने का फैसला किया। वे मथुरा और यादवों पर बार-बार आक्रमण करते थे। इसलिए यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरुड़ की सलाह और ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए।पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। यहीं द्वारकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर भी है। बाद में त्रिविक्रम भगवान ने कुश नामक दानव का वध भी यहीं किया था। त्रिविक्रम का मंदिर द्वारका में रणछोड़जी के मंदिर के निकट है। ऐसा जान पड़ता है कि महाराज रैवतक (बलराम की पत्नी रेवती के पिता) ने प्रथम बार, समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकाल कर यह नगरी बसाई होगी।

कृष्ण अपने 18 साथियों के साथ द्वारका आए थे। यहां उन्होंने 36 साल तक राज किया। भगवान कृष्ण के विदा होते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई थी। मान्यता है कि उस समय समुद्र में इतनी ऊंची लहरें उठी थीं द्वारका को एक ही बार में पानी में डूबो दिया था। द्वारका के डूबने के कहानी कुछ वैसी ही है जैसी दुनियाभर में ग्रीक सभ्यता का शहर ‘अटलांटिस’ की कहानी है। अटलांटिस को भी एक बड़ी बाढ़ ने तबाह कर दिया था। द्वारका के जलमगन होने के बाद कृष्ण के परपोते वज्रनाभ द्वारका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यादवों के अंतिम युद्ध में जीवित रह गए। द्वारका के समुद्र में डूब जाने के बाद अर्जुन द्वारका आए और वज्रनाभ और अन्य जीवित यादवों को हस्तिनापुर ले आए। कृष्ण के वज्रनाभ को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से मथुरा क्षेत्र को वज्रमंडल भी कहा जाता है।

  • हरिवंश पुराण के अनुसार कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था जहां यादवों ने द्वारका बसाई थी।
  • विष्णु पुराण के अनुसार आनर्त के रेवत नामक पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामक पुरी में रह कर राज्य किया।
  • विष्णु पुराण से सूचित होता है कि प्राचीन कुशावती के स्थान पर ही श्रीकृष्ण ने द्वारका बसाई थी।
  • महाभारत के अनुसार कुशस्थली रैवतक पर्वत से घिरी हुई थी-‘कुशस्थली पुरी रम्या रैवतेनोपशोभितम्’।

2005 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने द्वारा के लिए खोज की थी आरंभ 

भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी से जुड़े दावों और अनुमानों के वैज्ञानिक कसौटी पर कसे जाने का समय अब एकदम नजदीक आ गया है, क्योंकि 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोर समुद्र में समाई द्वारका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाल लाए थे।

गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहाँ पड़े चूना पत्थरों के खंडों को ढूँढ़ निकाला।

नौसेना के साथ मिलकर चलाए गए अपनी तरह के इस तीसरे अभियान के आरंभिक नतीजों की जानकारी देते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि इन दुर्लभ नमूनों को अब देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा गया था। और मिली जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिंधु घाटी की सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते।

नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहाँ पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए, जिन्हें आरंभिक तौर चूना पत्थर बताया गया था।

पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया ये खंड किसी नगर या मंदिर के अवशेष लगते हैं।

द्वारका में समुद्र के भीतर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई थी और दस मीटर गहराई तक किए इस उत्खनन में सिक्के और कई कलाकृतियाँ भी प्राप्त हुई। उन्होंने माना कि जमीन पर मिले अवशेषों की समुद्र के भीतर पाए गए खंडों से समानता मिलती है।koresh9

पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार इन अवशेष खंडों का सिंधु घाटी की सभ्यता से कोई मेल नहीं मिलता और यह आयताकार खंडों की बनावट और स्टाइल से स्पष्ट है।

आज रुका है द्वारका नगरी के रहस्य से पर्दा उठाने का काम…

पुराणों और धर्मग्रंथों में वर्णित प्राचीन द्वारका नगरी और उसके समुद्र में समा जाने से जुड़े रहस्यों का पता लगाने का काम पिछले कई वर्ष से रुका पड़ा है, हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए अगले दो साल में ‘अंडर वाटर आर्कियोलॉजी विंग’ को सुदृढ़ बनाने का निर्णय किया है.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर) ए के सिन्हा ने कहा, ‘‘पानी के भीतर खोज के काम के लिए बड़ी आधारभूत संरचना की जरुरत होती है. प्राचीन द्वारका नगरी की खोज जैसी परियोजना के लिए समुद्र में प्लेटफार्म और काफी संख्या में प्रशिक्षित गोताखोरों की जरुरत होती है जो गहराई में पानी में जा सकें.’’   उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण :एएसआई: में पानी के नीचे कार्य करने में सक्षम ऐसे आधारभूत संरचना और मानव संसाधन की कमी है. ‘‘साल दो साल में ‘अंडर वाटर आर्कियोलॉजी विंग’ को सुदृढ़ बनाया जायेगा ताकि ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा सके.’’

सिन्हा ने कहा कि एएसआई के अधिकारी रहे डा. एस आर राव ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओसेनोग्राफी के समुद्री पुरातत्व शाखा में काम करते हुए द्वारका, महाबलीपुरम नगरों से जुड़े रहस्यों पर काफी काम किया था. उनके नेतृत्व किये गए प्रयासों से प्राचीन द्वारका नगरी का पता लगाया गया और कुछ अवशेष एकत्र किये गए. हालांकि इसके बाद से काम रुका पड़ा है. गौरतलब है कि 2005 में नौसेना के सहयोग से प्रचीन द्वारका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किये गए.

Picture9प्राचीन द्वारका नगरी के समुद्र में समा जाने के रहस्य के बारे में पूछे जाने पर सिन्हा ने कहा कि द्वारका नगरी का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में डूब गया था लेकिन इसके कारण के बारे में प्रमाण के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है. ‘‘हालांकि एक मान्यता यह है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से यह प्रचीनतम नगरी डूब गई.’’  धरोहर विशेषज्ञ प्रो. आनंद वर्धन के अनुसार, महाभारत काल से अब तक पुराणों, धर्मग्रंथों एवं शोधकर्ताओं द्वारा किये गए अध्ययन में भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी के प्रमाण मिले हैं.

उन्होंने कहा कि महाभारत में एक जगह पर ‘‘द्वारका समासाध्यम’’ वर्णित है. विष्णु पुराण में भी एक स्थान पर ‘कृष्णात दुर्गम करिष्यामि’ का जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि भगवान कृष्ण की मृत्यु के बाद द्वारका समुद्र में समा गई थी. बहरहाल, सिन्हा ने समुद्र के भीतर इस तरह की खोज के लिए विशेषज्ञता हेतु भारतीय नौसेना के साथ फ्रांस, स्पेन और आस्ट्रेलिया के अनुभव से सीखने की जरुरत बतायी.

प्रो. राव और उनकी टीम ने 560 मीटर लंबी द्वारका की दीवार की खोज की। साथ में उन्‍हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिंधु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष उन्‍होंने खोजे। उन्‍होंने सिर्फ पश्चिमी भारत में नहीं बल्कि दक्षिण भारत में भी कई जगह पर खुदाई में ढेर सारी खोज कीं। उनका नाम पुरातत्‍व की दुनिया में बड़े सम्‍मान के साथ लिया जाता है और हमेशा रहेगा। उस जगह पर भी उन्‍होंने खुदाई में कई रहस्‍य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।

रहस्यमयी नगरी द्वारका पर बनी  ‘डाक्यूमेंट्री’ को देखने के लिए क्लिक करें…

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=2CbTyxy1MWo

http://www.youtube.com/watch?v=GQuMGjXfF7Y

http://www.youtube.com/watch?v=S_hgELym9yY

http://www.youtube.com/watch?v=PCYucQvL9P4

Documentary- History Channel

http://www.youtube.com/watch?v=zeDMSXOhDbY

http://www.youtube.com/watch?v=rSyfD7l9sEY

Dwaraka- A LOST CITY RECOVERED

By S.R. Rao – Recent Advances in Marine Archaeology 

dwaraka2

Since 1983 the Marine Archaeology Unit of the National Institute of Oceanography is engaged in the offshore exploration and excavation of the legendary city of Dvaraka in the coastal waters of Dwaraka in Gujarat. Brief accounts of the findings of the underwater search for the lost city have appeared in Progress and Prospects of Marine Archaeology in India, 1987, Marine Archaeology of Indian Ocean Countries, 1988, 40 years of Research – A CSIR Overview, 1988 and Journal of Marine Archaeology, 1990. The present paper deals with the more significant results of further excavations in 1988 and 1989 and discusses archaeological and literary evidence for the identification of the port city of Dvaraka of the protohistoric period. It also draws attention to the scientific data available from the underwater excavations in the Arabian Sea and the Gulf of Kutch.

Expedition 1983-90:

Picture5

Since 1983 the Marine Archaeology Unit of the National Institute of Oceanography is engaged in the offshore exploration and excavation of the legendary city of Dwaraka in the coastal waters of Dwaraka in Gujarat. Brief accounts of the findings of the underwater search for the lost city have appeared in 1987, Progress and Prospects of Marine Archaeology in India, and in 1988, Marine Archaeology of Indian Ocean Countries.

A brief account of the discovery of the submerged city of Dwaraka ofMahabarata fame and the salient features of the structures exposed as a result of underwater excavation conducted at Dwaraka and Bet Dwaraka by the Marine Archaeology Unit of the National Institute of Oceanography under the direction of Dr. S.R. Rao from 1983 to 1987 appeared in 1988 (40 years of Research – A CSIR Overview). Offshore exploration of the legendary city at Dwaraka was resumed in 1988 and continued through 1990 (see the Journal of Marine Archaeology, 1990), further seaward of the Temple of Samudranardyana (Sea God) at Dwaraka with a view to trace the plan and extent of the port-city and the purpose of the massive stone walls built on the banks of ancient Gomati. It was also necessary to ascertain whether its architectural features were in conformation with the description of the city of Dwaraka given in the epic Mahabharata. A second object was to obtain more corroborative evidence for reclamation referred to in the epic. Thirdly, the nick point where the ancient Gomati river joined the sea had to be determined. Lastly, the cause of submergence of the city was another problem that needed further investigation.

Picture4

Dwaraka was a city-state extending upto Bet Dwaraka (Sankhodhara) in the north and Okhamadhi in the south. Eastward it extended upto Pindara. The 30 to 40 meter-high hill on the eastern flank of Sankhodhara may be the Raivataka referred to in the Mahabharata. The general layout of the city of Dwaraka described in ancient texts agrees with that of the submerged city discovered. Four enclosures are laid bare; each one had one or two gateways. The port Aramda on way to Bet Dwaraka was the first gateway in the outer fortifications. The bastions flanking gateways of submerged Dwaraka resemble those of Kusinagara and Sravasti carved on the Gateways of Sanchi Stupa. The prasada referred to in the epic must be the high fort walls of Dwaraka, a part of which is extant. The epic says that flags were flying in the city of Dwaraka. This can be corroborated by the stone bases of flag posts found in the sea bed excavation. Umashankar Joshi is of the view that antardvipa in the region of Kugasthali referred to in the Mahabharata must be Bet Dwaraka. The Bhagavata Purana says that before leaving his mortal frame Sri Krishna put the ladies and children in boats and sent them to Sankhodhara.

Picture8

The buildings built of smaller fraction stone blocks are razed to the ground leaving only small portions of the thick fort walls, bastions and protection walls (built with massive stones) which are too heavy to be moved by tides and currents. From the structural remains in Dwaraka and Bet Dwaraka waters, it is possible to visualise that the city-ports were large and well planned.

Picture6

Every significant antiquity that corroborates a statement of the Harivamsais the seal bearing the motif of a three-headed animal representing the bull, unicorn and goat. The Harivamsha says that every citizen of Dwaraka had to carry a mudra as a mark of identifications The seal (mudra) found in the excavation belongs to 15th-16th century B.C.

Nearly two decades after marine archeologists found the lost city of Dwaraka off the coast of Gujarat the state government continues to drag its feet on a proposal to establish the world’s first underwater museum to view the remains of the city submerged in the Arabian Sea.

Picture7

Interview with Marine Archaeology Unit of the National Institute of Oceanography under the direction of Dr. S.R. Rao…

Picture3

PROF. S.R. Rao is a renowned archaeologist and scholar who has two path-breaking excavations to his credit (both in Gujarat) namely the Harappan port of Lothal and the submerged city of Dwaraka which have fetched him laurels. One of the first, to work on the decipherment of the Indus script, he has several books to his credit besides numerous articles. S.R. Rao shows enormous enthusiasm to unearth more submerged cities (considering he is in his Seventies). . Excerpts from an interview when he visited the city recently:

What drew you into marine archaeology?

Actually we had no idea of what it meant. It was in London that Ms Taylor, a librarian at the Institute of Archaeology who was also a diver asked me to take up some work on the Indian coast in the Seventies. She pointed to some shipwrecks of which I had no idea. When I was repairing the temple of Dwarkadeesh at Dwaraka (on land) I had to demolish a modern building in front of it and I found the 9th Century temple of Vishnu. I got curious and dug further deeper (30 ft) in 1979-80 on land. We found two earlier temples, a whole wall and figures of Vishnu. We dug further and actually found eroded material of a township lying at the bottom. Then arose the question of dating the remains of the township destroyed by the sea. Thermo-luminescence dating revealed a date of 1520 B.C. The Mahabharatarefers to Dwaraka and this was how we thought of marine archaeology.

How did you begin the excavations?

We had no experience in marine archaeology. It was a new discipline to India. The Indian National Science Academy (INSA) gave us some money and we went to the National Institute of Oceanography (NIO), Goa, as there were some divers there and started work in 1981. Real work started in 1982. We hired boats. First we found some evidence in Beth Dwaraka island because local tradition points to the antiquity of this compared to Dwaraka.

What were the remains found at Beth Dwaraka?

According to the Mahabharata Krishna built Dwaraka at Kushasthali – a fortress in the sea which is in ruins. Then he built another at the mouth of the Gomti river. AtKushasthali (Beth Dwaraka spelt Dvaraka) we found a wall (560 metres long) visible on the shore itself. Dating of pottery found here gave a date of 1528 B.C. So we were satisfied we were on the right spot. We unearthed an important find – a seal (mudra). The Mahabharata refers to how Krishna wanted every citizen to carry some sort of identity – a mudra.

Did the mudra in a way confirm it was Krishna’s Dwaraka?

Yes. Besides plenty of pottery, we found an inscribed sherd with the following maha kacha shahapa (sea, king or protector). This is dated around 1600 B.C. while the mudra is dated to 1700 B.C. We found a 580 metre long wall.

Have the structures you found deteriorated over a period of time?

Not much since they are made of stone. Some may have fallen because of currents and cyclone. We were worried about the effect of the earthquake. Fortunately the main temple standing on the shore at Dwaraka has not been affected. So the underground remains will not be affected. In Beth Dwaraka cracks have appeared in the Dwarkadeesh temple.

How did you feel when you found Krishna’s Dwaraka?

The excitement came when we found the mudra and the inscription. That was the confirming factor as by mere date one could not say it is Dwaraka. The Mahabharata mentions the city having 50 openings. We found about 25 or 30 bastions. There must be more because they must have protected the wall against currents. On the bastion invariably there are window openings. So that may be the reference.

Did this motivate you to study the epic deeply?

Not just that but other texts like the Puranas – Bhagavata, Skanda,Matsya and Vishnu which refer to Dwaraka.

According to Srimad Bhagavatam & other sciptures, Dwarka submerged in year3102 B.C (which is approx 5100 years)

श्रीकृष्ण की द्वारका… पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व

dwarka-preset2.jpg

यह आप पर निर्भर है कि आप दंतकथा, महानता और सच्‍चाई के बारे में कितना ज्ञान रखते हैं। एक बार फिर से पुराने काल में लौट जाइए, अपनी कल्‍पनाशक्ति से आप तुरंत ही 1500 बीसी से पहले के समय की याद करें और आपके मस्तिष्‍क के सामने होगा, सोने का एक शहर-मंत्रमुग्‍ध कर देने वाली द्वारका, अर्थात भगवान श्रीकृष्‍ण की राजधानी। गुजरात में श्रीकृष्‍ण को रणछोडराय के नाम से पुकारा जाता है। मथुरा से आने के बाद द्वारका को शश्रीकृष्‍ण ने अपनी राजधानी बनाया और शेष जीवन यही व्‍यतीत किया। यह स्‍थान सौराष्‍ट्र के पश्चिमी द्वीप पर है, इस जगह का हिन्‍दू धर्म में उल्‍लेखनीय महत्‍व है। यह एकमात्र ऐसा स्‍थान है, जिसे चारों धामों में से एक धाम के रूप में और सफर के लिए सप्‍तपुरी (प्राचीन सात शहर) में से एक पुरी के रूप में मान्‍यता दी गई है। इसी कारण, सदियों से लाखों तीर्थयात्री और इतिहास के विद्वान यहां आते रहे हैं।

श्रीकृष्‍ण ने यहां

Picture2

अत्‍याचारी राजा कंस का वध करके अपने श्‍वसुर जरासंध को क्रोधित कर दिया था। जरासंध ने अपने पुत्र की मृत्‍यु का प्रतिशोध लेने के लिए श्रीकृष्‍ण के राज्‍य पर 17 बार आक्रमण किया। श्रीकृष्‍ण को पता था कि उनके लोग जरासंध से एक और युद्ध लड़ने में समर्थ नहीं हैं, उन्‍हें इस बात का बखूबी ज्ञान था कि इस युद्ध से न केवल लोगों की जानें जाएंगी बल्कि इससे किसान और अर्थव्‍यवस्‍था पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसीलिए श्रीकृष्‍ण युद्ध छोड़कर भाग गए और इसी कारण उन्‍हें रणछोड़जी (वह व्‍यक्ति जो रणभूमि छोड़कर भाग जाता है) के नाम से पुकारा जाने लगा।

अपने कुछ यादव साथियों के साथ श्रीकृष्‍ण गोमांतक पर्वत पार करके सोमनाथ से 32 किमी. दूर सौराष्‍ट्र के किनारे पहुंचे। कुछ स्रोतों के मुताबिक श्रीकृष्‍ण वर्तमान स्थित ओखा के पास पहुंचे थे और बेट द्वारका नामक अपना नया राज्‍य बसाया। ऐसी धारणा है कि समुद्र देवता ने उन्‍हें अपना राज्‍य बसाने के लिए 12 योजन अर्थात लगभग 773 वर्गकिमी भूमि प्रदान की थी और हिन्‍दू मान्‍यताओं में सुंदर इमारतें बनाने वाले भगवान विश्‍वकर्मा ने श्रीकृष्‍ण की इच्‍छा को स्‍वीकार करके उनके लिए एक नए राज्‍य का निर्माण किया। धन-धान्‍य से संपन्‍न यह राज्‍य स्‍वर्ण नगरी कहलाया और द्वारका के राजा श्रीकृष्‍ण को द्वारकाधीश कहा जाने लगा। श्रीकृष्‍ण के जीवन का उद्देश्‍य एक ऐसे राज्‍य की स्‍थापना करना था, जो सत्‍य धर्म के सिद्धान्‍त पर आधारित हो। द्वारका द्वारावती के नाम से भी जानी जाती है, जो ‘द्वारा’ शब्‍द से बना है, जिसका अर्थ होता है द्वार या दरवाजा और ‘का’ का अर्थ होता है ब्रह्मा। इस प्रकार द्वारका को krishna.in.dwaraka.storyब्रह्मलोक का द्वार माना गया, जो सत्‍य की अनिर्वचनीय भूमि है। दूसरे शब्‍दों में आध्‍यात्मिक रूप से मुक्ति का द्वार है।

द्वारका नियोजित रूप से बसा शहर था, जहां छह सुसंगठित क्षेत्र थे- आवासीय, व्‍यावसायिक जोन, चौड़ी सड़कें, चौक, महल और कई सार्वजनिक सुविधाएं। जन सभाएं एक हाल में आयोजित होती थीं, जिसे सुधर्म सभा (सत्‍य धर्म सभा) कहा जाता था। नगर में सात ऐसे स्थान थे, जो सोने, चांदी व अन्‍य कीमती पत्‍थरों से बने थे, साथ ही सुंदर बाग व झीलें भी थीं। पूरा नगर चारो ओर से पानी से घिरा हुआ था, यहा से मुख्‍य भूमि तक जाने के लिए पुल बने हुए थे।

द्वारका जलमग्‍न हो गई

  • यह माना जाता है कि श्रीकृष्‍ण की मृत्‍यु और यादव वंश के पतन के पश्‍चात आई एक भयानक बाढ़ में द्वारका के साथ-साथ पूरा सोने का शहर भी समंदर की गहराई में डूब गया। हालांकि, वर्तमान की खुदाई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्‍या इस दंतकथा का कोई ऐतिहासिक आधार है, जैसे कि सभी दंतकथाओं का होता है।

Picture10

  • ऐसा माना जाता है कि नगर समुंदर में जलमग्‍न हो गया और विभिन्‍न सभ्‍यताओं ने छह बार इसका पुनर्निर्माण कराया। आधुनिक युग में द्वारका का निर्माण सातवीं बार उसी क्षेत्र में हुआ। वर्तमान में द्वारका के अवशेष अरब समुद्र में गोमती नदी के मुहाने पर स्थित हैं और दूसरे विख्‍यात ऐतिहासिक और धार्मिक स्‍थलों की तरह ही द्वारकाधीश मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्‍ण की अनन्‍य भक्‍त मीराबाई ने अपने प्राणों का परित्‍याग यहीं पर किया था। प्रतिवर्ष जन्‍माष्‍टमी के उत्‍सव में भाग लेने के लिए पूरे विश्‍व से हजारों भक्‍तगण यहां आते हैं।

मिथ्‍या या वास्‍तविकता?

  • ऐसे कई सिद्धान्‍त हैं जो द्वारका के वास्‍तविक स्‍थान के बारे में सुझाव देते हैं। लेकिन कई ऐसे पुरातात्विक संकेत हैं जो इस विश्‍वास का समर्थन करते हैं कि प्राचीन द्वारका वर्तमान द्वारका के ठीक नीचे और बेट द्वारका से आगे उत्‍तर दिशा में है, दक्षिण में ओखमंडी और पूर्व में पिंडारा है।
  • हाल ही में मिली जानकारी यह संकेत करती है कि प्राचीन द्वारका की कथाओं का ऐतिहासिक आधार है। खुदाई के दौरान जो तीस तांबे के सिक्‍के, शिलाखंड का आधार, वर्तुल और पुराने समय के प्राचीन मिट्टी के बर्तन के नमूने मिले थे, वे 1500 ईसा पूर्व के हैं।
  • भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण संस्‍था द्वारा समुद्री जल पर पानी के अंदर किया गया हालिया शोध यह दर्शाता है कि दो सहस्राब्दि पूर्व यहां एक नगर का अस्तित्‍व था। खोए हुए नगर की सन 1930 से खोज जारी है। सन 1983-1990 के बीच हुई छानबीन से यह पता चला कि नगर नदी के किनारे छह खण्‍डों में बसा हुआ था। उन्‍हें द्वारका नगरी के अवशेष भी मिले हैं, समुद्र में जिनका विस्‍तार आधे किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में है। शिलाखण्‍ड के आधार पर सीधे बनीं दीवारें यह सिद्ध करती हैं कि भूमि वापस समुद्र में चली गई थी। समुद्री पुरातत्‍व इकाई द्वारा की गई खोज और प्रचीन लेखों में द्वारका के प्रारूप का वर्णन एक समान है।

Yatra Dwarka: http://www.youtube.com/watch?v=kEN8aIOpQ_Y (T-Series)

वैसे कृष्ण जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद है… अलग-अलग शोध में कृष्ण के जन्म की तारीख अलग-अलग बताई गई है…

पहला शोध- 3112 ईसा पूर्व (यानी आज से 5125 वर्ष पूर्व) को हुआ…

downloadब्रिटेन में रहने वाले शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं, पुरातात्विक तथ्यों आदि के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय का वर्णन किया है। ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलिय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। इन गणनाओं के अनुसार कृष्ण का जन्म र्इसा पूर्व 3112 में हुआ था, यानि महाभारत युद्ध के समय कृष्ण की उम्र 54-55 साल की थी।

उन्होंने अपनी खोज के लिए टेनेसी के मेम्फिन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. नरहरि अचर द्वारा 2004-05 में किए गए शोध का हवाला भी दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने पुरातात्विक तथ्यों को भी शामिल किया। जैसे कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत, पानी में डूबी द्वारका और वहाँ मिले कृष्णबलराम के की छवियों वाले पुरातात्विक सिक्के और मोहरे, ग्रीक राजा हेलिडोरस द्वारा कृष्ण को सम्मान देने के पुरातात्विक सबूत आदि।

‘Krishna existed… Aug 29, 2009 Agency: DNA

Dr Manish Pandit, sutradhar of the documentary Krishna: History or Myth, uses four pillars archaeology, linguistics, what he calls the living tradition of India, and astronomy to arrive at the circumstantial verdict that Krishna was for real, because the Mahabharata and the battle of Kurukshetra did indeed happen. In an interview with DNA, Pandit outlines his documentary journey. Excerpts:

दूसरा शोध- 3228 ईसा पूर्व (यानी आज से 5241 वर्ष पूर्व) को हुआ

Krishna (b. July 21, 3228 BC)

 MAGAZINE | SEP 13, 2004

With some deft computer astrology, mythic Krishna gets a date of birth, and some planetary influence

Even gods come to earth with their destinies chalked out for them. So claims astrology, at any rate. So when Arun K. Bansal, the father of computer astrology in India, says that Hindu god Krishna was born on July 21, 3228 bc, it feels momentous somehow. The date essentially transforms Krishna in our minds: from a mythological figure of mystery, even if a much-loved one, into well a flesh and blood entity.  You can almost see him gurgling in Yashoda’s lap as Rishi Garg performs his naming ceremony in a cow shed more than 50 centuries ago.

But backtracking into the past can be a sloppy misadventure if you don’t get your calculations right. So Bansal rests his claims on two of his software packages—the Leo Gold and the Palm computer programmes. They can simulate any planetary configuration that has occurred or could occur in time.

All they need is a date. And July 21, 3228 bc, according to Bansal, satisfies every condition described during Krishna’s birth. Krishna was born in the Rohini nakshatra, in the Hindu month of Bhadrapada, on the 8th day of the waning moon at midnight. Bansal says this was enough information for him to nail the date, working backwards from Krishna’s death, which he says occurred at 2 pm on February 18, 3102 bc.

His entire case rests on the accuracy of this date, however. Bansal quotes extensively from the Shrimad Bhagwat and the Shri Vishnu Puranas, old Hindu calendars and the Mahabharata to illuminate the clues he chose to follow. “A shloka in the 38th chapter of the Shri Vishnu Puran, says that Kaliyuga started on the day Krishna died.” He unearths another shloka in the Shrimad Bhagwat Purana (part 11, chapter 6) where Brahma himself speaks to Krishna about how old he is. “Brahma says that 125 years have passed since Krishna’s birth; this is just before Krishna plans his death.”

Though not empirically verifiable, the advent of Kaliyuga is traditionally taken to be 3102 bc, because all our panchangas or astrological journals maintain that 5,100 years of Kaliyuga had passed before 1999 AD. The belief is supported by mathematician Aryabhatta’s astronomy treatise Aryabhattiya, the Surya Siddhanta, an astronomical text that dates back to 400 AD, and a 5th century inscription from a temple in Aihole.

Deleting 125 years from the date, Bansal figured Krishna was born either in 3327 or 3228 bc. The rest he left up to his software, merely feeding in the planetary configuration that Krishna was supposedly born under, to generate the row of figures that conforms to the epochal moment.

विशेषज्ञों ने कृष्ण जन्म को लेकर ऐतिहासिक प्रमाणिकता साबित की है

भारतवर्ष में मानव सभ्यता का इतिहास कितना प्राचीन है, इसका अंदाजा हम हडप्पा और मोहन जोदाडों से लेकर पुरातत्व के अवशेषों से लगा सकते हैं। इस अति प्राचीन और पवित्र धरती पर कई महापुरुष भी हुए। ऐसा ही ऐतिहासिक नाम है, भगवान श्री कृष्ण का, जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों से लेकर आज भी जीवंत है। लेकिन उनका जन्म किस सन् में हुआ इसकी अभी तक कोई पुष्ट जानकारी नहीं थी, परंतु खगोलीय गणनाओं, गणितीय संक्रियाओं एवं आधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद की गई। एक खोज के अनुसार यह दावा किया गया है कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व में हुआ था।

आधुनिक साफ्टवेयर की ली मदद- विशेषज्ञों के अनुसार श्रीकृष्ण के जन्म के समय वर्णित घटनाओं को संदर्भ लेने पर 5 हजार वर्ष पूर्व जाना दुस्साहस हो सकता है, परंतु इन गणितीय खगोलीय संक्रियाओं को हम पारंपरिक गणितीय विधियों द्वारा हल कर सकते हैं। इसमें आधुनिक साफ्टवेयरों की सहायता से किसी भी पूर्व या संभावित ग्रह स्थिति का पुनः चित्रण कर क्रास चैक किया जा सकता है।

संकेतों और श्लोंकों का अध्ययन- अध्ययन के मुताबिक पहले भारतीय पंचांग सातवर्षीय रहा है, जिसमें 2700 वर्षों का एक चक्र था। इसकी गणना आकाश में सप्तर्षि तारामंडल की गति के संक्रमण द्वारा की जाती थी। जिसे 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया था। धर्मग्रंथों में श्रीकृष्ण जन्म के संदर्भ में जो संकेत हैं, वे भाद्रपद माह की अष्टमी को रोहणी नक्षत्र में अर्धरात्रि को हुए। उपरोक्त सकेतों का वर्णन विस्तार से श्री विष्णु पुराण, महाभारत व श्रीमदभागवत में हैं। श्री विष्णु पुराण के 38 वें अध्याय में एक श्लोंक के अनुसार श्रीकृष्ण की मृत्यु के दिन कलियुग का प्रारंभ हुआ। श्रीमदभागवत पुराण के खंड 11 के अध्याय छह में एक श्लोक में ब्रम्हा, श्रीकृष्ण की आयु के संदर्भ म कहते हैं, कि श्रीकृष्ण के जन्म के 125 वर्ष हो चुके हैं।

कर्नाटक मंदिर में भी है अभिलेख- धर्मशास्त्रों के अनुसार कलियुग का आरंभ 3102 ईसा पूर्व से माना जाता है, क्यों हमारे सभी पंचांग या ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर 1991ई. तक कलियुग के 5100 वर्ष बीत चुके हैं। इस तरह गणितज्ञ आर्यभट्ट ने खगोलीय निबंध आर्यभट्टीय एवं संदर्भ में महाभारत के समय की खगोलीय घटनाओं का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण 90 वर्ष के थे। तब दुर्लभ चंद, सूर्यग्रहण दोनों का होना। औष्ण पक्ष की अवधि घटकर 13 दिन हो जाना एवं आकाश में एक धूमकेतू का चमकते हुये गुजर जाना। उपरोक्त खगोलीय घटनाओं का वर्णन कर्नाटक के एक मंदिर में पाए गए अभिलेख के अनुसार भी सही पाया गया है।

श्रीकृष्ण की कुंडली भी तैयार- विशेषज्ञों के अनुसार कलियुग प्रारंभ होने यानी 3102 ईसा पूर्व से 125 वर्ष घटाने पर कृष्ण के जन्म का वर्ष निकलता है जो कि 3228 ईसा पूर्व है। बाकी का कार्य ग्रहों की स्थिति डालते हुये श्री कृष्ण भगवान की कुंडली बन जाती है। 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व कृष्ण के जन्म के समय वर्णित सभी परिस्थितियों को संतुष्ट करने वाली तिथि है, इसी अधार पर कृष्ण की आयु में 125 वर्ष जोडने पर कृष्ण का अवसान 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व दोपहर को हुई थी। मृत्यु की घटनाओं से पूर्णतः मल खाती है।

krishna_by_vishnu108-d291k8zJAI SHREE KRISHNA

Advertisements

About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
This entry was posted in News, Personality, Religion, Yatra and tagged , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

2 Responses to Ancient City of Dwarka: श्रीकृष्ण की ‘द्वारका’… द्वारका का पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक प्रमाण

  1. avisspiritc2 says:

    Reblogged this on SONANT THOUGHTS.

  2. Pingback: कृष्ण जन्माष्टमी: नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल की… | कीबोर्ड के पत्रकार

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s