राम मंदिर आंदोलन की पूरी कहानी…

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मैं अयोध्या हूं… राजा राम की राजधानी अयोध्या… इक्ष्वाकु कुल के सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी अयोध्या… यहीं राम के पिता राजा दशरथ ने राज किया… यहीं श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ… यहीं बहती है सरयू…. गंगा-जमुनी तहजीब का संगम, सरयू…

मैं अयोध्या हूं.. हिंदुओं के लिए रामलला, हनुमंतलाल और नागेश्वरनाथ जैसे तीर्थ मेरे ही आंगन में हैं… यहीं मुस्लिमों के पैगंबरों, जैनियों के तीर्थकरों और बौद्धों के धर्मगुरुओं का केंद्र भी यहीं हैं…

हां मैं वही अयोध्या जो समय-समय पर विदेशी आक्रांताओं के हमलों के बावजूद भी वजूद बचाने में कामयाब रही… इतिहास की तारीख में मेरे संघर्षो की अनेक कहानियां दर्ज हैं…

लेकिन आज भी मेरे वजूद पर संकट का साया है… यह संकट किसी विदेशी आक्रांता के कारण नहीं बल्कि सियासी दांवपेंच के कारण बीते दो दशक में उभरे मंदिर-मस्जिद मुद्दे की वजह से है… कई प्रतिबंधों ने मेरे महात्म्य को कारागार में तब्दील कर दिया है…

6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में जो कुछ हुआ…हो गया… पर वो सारा मंजर अब तक याद आता है… और जब याद आता है, तो थर्रा देता है… धर्म के नाम पर जो लोग लड़े-भिड़े… आजतक ये टकराव जारी है… आज कोई शौर्य दिवस मनाता है, तो कोई कलंक दिवस, लेकिन अयोध्या के आम लोगों से पूछो…वो क्या मनाते हैं?…क्या सोचते हैं?…

विवादित ढांचा ढहाये जाने के बाद शुरू हुए प्रतिबंधों का दायरा रफ्ता-रफ्ता बढ़ता ही जा रहा है… ढांचा ध्वस्त होने के बाद सरकार ने मेरे एक अहम हिस्से को अधिग्रहीत कर लिया… करीब सत्तर एकड़ का दायरा तो लोहे की डबल बैरीकेडिंग से घेर दिया गया… इस कारण उसके भीतर जिनके भी आशियाने, पूजाघर और संस्थान थे, वे बेजान हो गये…

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था…सैकड़ों साल से मज़हबों के नाम पर कभी हिंदुओं के नेता आते हैं, तो कभी मुसलमानों के अगुआ आ धमकते हैं…वो ज़ोश से भरी तक़रीरे देते हैं… अपने-अपने लोगों को भड़काते हैं और फिर सब मिलकर मेरे सीने पर घाव बना जाते हैं… कभी हर-हर महादेव की गूंज होती है, तो कभी अल्ला-हो-अकबर… की आवाज़ें आती हैं….

लेकिन ये आवाज़ें, अपने ईश्वर को याद करने के लिए लगाई जाची हैं या उन्माद को बढ़ाने के लिए… ये तो ऊंची-ऊंची आवाज़ों में भगवान को याद करने वाले जानें, लेकिन मैंने तो देखा है… अक्सर भगवान का नाम पुकारते हुए तमाम लोगों ने खून की होलियां खेली हैं… और हमारे लोगों के घरों से मोहब्बत लूट ले गए हैं… जिन गलियों में रामधुन होती थी… जहां ईद की सेवइयां खाने हर घर से लोग जमा होते थे… वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है… आज मेरे यहां नफरतों का कारोबार होता है…

मेरी गलियों में ही बौद्ध और जैन पंथ फला-फूला.. पांच जैन तीर्थंकर यहां जन्मे… 20 बौद्ध मंदिर थे यहां… इनके मंदिर भी तो बने हैं यहां… सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आये यहां… उन्होंने दुनियाभर को मेरे सुख-समृद्धि के बारे में बताया..

लेकिन आज… दुनियाभर के मुल्क मेरा नाम लेते हैं कि यही वह जगह है जहां मजहब के नाम पर नफरत का तमाशा देखने को मिला था…

हमारे नेता तरह-तरह के बयान देते हैं… मुझे कभी हंसी आती है… तो कभी गुस्सा… सियासतदानों की जुबान के क्या मायने हैं… वही जानें… वही समझें… ना अयोध्या समझ पाती है… ना उसके मासूम बच्चे… राम के मंदिर के सामने टोकरियों में फूल बेचते मुसलमानों के बच्चे नहीं जानते कि दशरथ के बेटे का मजहब क्या था, ना ही सेवइयों और मिठाइयों का कारोबार करने वाले हिंदू हलवाइयों को पता है कि किससे कौन-सा रिश्ता रखना है और कौन-सा नहीं… वो तो बस एक ही संबंध जानते हैं… मोहब्बत का…

लेकिन मेरी किस्मत… मेरी मिट्टी पर 6 दिसंबर, 1992 को जो खून बरसा, उसके छींटों की स्याही से हज़ारों खबरें बुन दी गईं… किसने घर जलाया, किसके हाथ में आग थी… मुझको नहीं पता…हां एक बात ज़रूर पता है… मेरे जेहन में है… खयाल में है… विवादित ढांचे की जमीन पर कब्जे को लेकर सालों से 4 मुकदमे चल रहे हैं…

पहला मुकदमा तो 63 साल भी ज्यादा समय से लड़ा जा रहा है, यानी तब से, जब आजादी के जश्न के बाद पूरा मुल्क झूम रहा था… अफसोस… मजहब का जुनून भी देशप्रेम पर भारी पड़ गया…

लेकिन किसे सच कहूं और किसे झूठा बता दूं… दोनों तेरे लाल हैं… चाहे हिंदू हों या फिर मुसलमान… मैं बस इतना जानना चाहती हूं कि नफरत की जमीन पर बने घर में किसका खुदा रहने के लिए आएगा?

राम मंदिर आंदोलन की पूरी कहानी…

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1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर के सिपहसालार मीर बांकी ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.  When the Muslim emperor Zāhir ud-Dīn Muḥammad Babur came down from Farghana in 1527, he defeated the Hindu King of Chittorgarh, Rana Sangram Singh at Fatehpur Sikri, using cannon and artillery. After this victory, Babur took over the region, leaving his general, Mir Banki, in charge as Viceroy. 

1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.

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1885: 
इस विवादित मामले की गहराई में जाए तो पता चलता है कि यह अभी का झगड़ा नहीं है बल्कि 1885 से चला आ रहा है। कुछ हिंदू संगठन के दस्तावेजों पर नजर डाली जाए तो उससे पता चलता है कि बाबर ने मंदिर तोड़ कर इस विवादित स्थल पर मस्जिद बनवाई थी। लेकिन इतिहास कुछ और ही कहता है। जिसके तहत बाबर कभी अयोध्या गया ही नहीं। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि जन्म स्थान एक चबूतरा जो मस्जिद से अलग उसके सामने है जिसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम इक्कीस फिट और चैड़ाई उत्तर दक्षिण सतरह फीट है। महंत स्वयं व हिंदू इसकी पूजा करते हैं। इस दावे में यह भी कहा गया था कि यह चबूतर चारों ओर से खुला है। सर्दी गर्मी और बरसात में पूजा करने वालों को कठिनाई होती है। इस लिए इस पर मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मंदिर बनाने से रोक दिया है। इस लिए न्यायालय सरकार को आदेश दे कि वह मंदिर बनाने दे। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 24 दिसंबर 1885 को फैजाबाद के सब जज पं. हरिकृष्ण ने महंत रघुवीरदास की अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मस्जिद के सामने मंदिर की इजाजत देने से हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी। फैसले में यह भी कहा गया था कि मंदिर मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक दूसरे से अलग साबित करती है। मंदिर और मस्जिद के बीच यह दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी। फैजाबाद के सब जज पं. हरि कृष्ण के फैसले के खिलाफ राम जन्म स्थान के महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल जे आर्य के यहां अपील की जिसका मुआयना करने के बाद इसे 16 मार्च 1886 को खारिज दिया गया। जिला जज के इस फैसले के खिलाफ महंत रघुवीर दास ने ज्यूडीशिनल कमिश्नर जिसके पास पूरे अवध के लिए हाईकोर्ट के समान अधिकार थे, ने भी अपने फैसले के जरिए इस अपील को एक नवंबर 1886 को खारिज कर दिया।

इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ी जाती रही, राम जन्म स्थान चबूतरों पर हिन्दू पूजा अर्चना करते रहे। हिंदू-मुस्लिम के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। सन 1934 में गो-वध को लेकर अयोध्या में एक दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुंची। जिसे सरकार ने अपने खर्चे से बनवा दिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। कहा तो यह जाता है कि आजाद मिलने के बाद कांग्रेस ने राजनीतिक फायदा उठाने के लिए (इस समय देश के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू थे) बाबरी मस्जिद पर कब्जा करने की योजना बनाई, 22/23 दिसंबर 1949 की रात्रि कुछ शरारती लोगों ने बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रख दी। जिसकी सूचना संबंधित थाने के कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। राम दुबे ने एक नामदर्ज एफ आई आर की जिसमें कहा गया कि मुल्जिमान रामास, राम शुक्ल दास सुदर्शन दास व पचास साठ आदमी अज्ञात ने बलवा करके मस्जिद में मूर्तियां रख कर उसे नापाक किया। मुल्जिमान को ड्यूटी पर लगे लोगों और दूसरे आदमियों ने देखा। जिससे मुदकमा तैयार किया गया जो सही है। थाना इंचार्ज राम दुबे की एफ आई आर की बुनियाद पर मार्कण्डे सिंह एडीशनल सिटी मजिस्ट्रेट ने 29 दिसंबर 1949 को धारा 145 के तहत बाबरी मस्जिद कुर्क कर दी। इसके बाद बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि के तमाम मुकदमों को यकजा कर दावा नंबर 12, 1261 हाईकोर्ट लखनऊ के हवले कर दिया गया।

1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.

1949: वैसे तो राम मंदिर बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ का मामला तो सौ बरस से भी अधिक पुराना है. लेकिन यह अदालत पहुँचा 1949 में. यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ जब सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाज़ा खोलने पर पाया गया कि उसके भीतर हिंदुओं के आराध्य देव राम के बाल रूप की मूर्ति रखी थी. इस जगह हिंदुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि होने का दावा करने वाले हिंदू कट्टरपंथियों ने कहा था कि “रामलला यहाँ प्रकट हुए हैं.” लेकिन मुसलमानों का आरोप है कि रात में किसी ने चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर ये मूर्ति वहां रख दी थी.

9 अगस्त 1991 को भारतीय संसद में पेश की गई जानकारी के अनुसार फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने घटना की जो रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी उसमें लिखा था, “रात में जब मस्जिद में कोई नहीं था तब कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ एक मूर्ति रख दी.”

अगले दिन वहां हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई और पाँच जनवरी 1950 को जिलाधिकारी ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका से बाबरी मस्जिद को विवादित इमारत घोषित कर दिया और उस पर ताला लगाकर इसे सरकारी कब्ज़े में ले लिया.

16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैज़ाबाद की ज़िला अदालत में अर्ज़ी दी कि हिंदुओं को उनके भगवान के दर्शन और पूजा का अधिकार दिया जाए. मुकदमा संख्या 2 /1950 दर्ज करवाकर अनुरोध किया कि गर्भगृह में रखी मूर्तियां न हटाने और पूजा व दर्शन की अनुमति मांगी। उसी दिन इसका अस्थायी आदेश दिया गया।

पूजा शुरू- 19 जनवरी 1950 को फ़ैजाबाद के सिविल जज ने इन दोनों अर्ज़ियों पर एक साथ सुनवाई की और मूर्तियां हटाने की कोशिशों पर रोक लगाने के साथ साथ इन मूर्तियों के रखरखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाज़त दे दी.

साथ ही, अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस ‘विवादित मस्जिद’ के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएँ.

दिगंबर अखाड़ा के महंत और राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास (अब दिवंगत) ने भी ऐसी ही एक अर्ज़ी दी.

1959: में हिन्दू पक्ष की ओर से तीसरा दावा निर्मोही अखाड़े की ओर से दाखिल किया गया जो मुकदमा संख्या 26 /1959 दर्ज किया गया। इस मुकदमे में रिसीवर से कब्जा दिलाए जाने की बात कही गई।

1961: इन तीनों मुकदमों के लंबित रहने के कारण 1961 तक नहीं हो सका तो मूर्तियां रखने की तारीख से 12 साल के अन्दर मुसलमानों की ओर से एक दावा मालिकाना हक और कब्जा वापसी के बाबत 18 दिसम्बर, 1961 को दाखिल किया गया।

In 1961, yet another suit was filed by Mohammad Hashim (He is still alive), pleading restoration of property to Muslims. By 1964, the issues were settled and date was fixed for final hearing. However, the appointment of a new receiver in 1968 was obstructed by yet another appeal before the Allahabad High Court in 1971.

Subsequently, the case was not taken up until 1983, when the Vishwa Hindu Parishad launched its temple movement in a big way.

1984:  कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को “मुक्त” करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.

1 फरवरी, 1986 ताला खुला: उमेश चंद्र पांडे की एक याचिका पर फ़ैज़ाबाद के ज़िला मजिस्ट्रेट के एम पांडे ने एक फ़रवरी 1986 को विवादित मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को उसके भीतर जाकर पूजा करने की इजाज़त दे दी. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति (एकशन कमेटी) का गठन किया.

Judge KM Pandey observed, “After having heard the parties, it is clear that the members of the other community — namely Muslims– are not going to be affected by any stretch of imagination if the locks of the gates were opened and idols inside the premises are allowed to be seen and worshipped by the pilgrims and devotees.”

His observation, “heavens will not fall if the locks of the gates are removed”, however, fell flat as the order sparked off nationwide rioting and communal violence.

पहली फरवरी, 1986 के इस आदेश को मोहम्मद हाशिम अंसारी की ओर एक रिट पिटीशन दायर करके चुनौती दी गई जिसमें 3 फरवरी, 1986 ई. को हाईकोर्ट ने विवादित भवन में कोई बदलाव न करते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए।

The Sunni Waqf Board and Babri Masjid Action Committee moved the Allahabad High Court against the district judge’s order. However, the order was not stayed. Meanwhile, all cases pertaining to the Ayodhya dispute were referred to the Lucknow bench of the court.

11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया.

1987  में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए.

इस अर्ज़ी पर विचार चल ही रहा था कि 1989 में अयोध्या की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर कर मांग की गई कि विवादित मस्जिद को मंदिर घोषित किया जाए.

10 जुलाई 1989 उच्च न्यायालय ने पाँचों मुक़दमों को साथ जोड़कर तीन जजों की एक बेंच को सौंप दिया. तीन जजों की एक बेंच 21 साल (1989-2010) से सुनवाई कर रही थी. इस बीच कई जज रिटायर हो गए या उनके तबादले हो गए.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी. 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास हुआ लेकिन अगले ही दिन फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधीश ने आगे निर्माण पर रोक लगा दी.

1989-91: Meanwhile, a ‘shilaniyas’ (laying of foundation stone) for the proposed temple in 1989 gave the whole issue a hype and the police firing ordered on violent karsevaks by the Mulayam Singh government in 1990  polarised votes in favour of the BJP, forging Kalyan Singh to power in 1991. Kalyan ordered acquisition of 2.75 acres of land around the mosque in his bid to show his party’s seriousness towards building the temple.

However, BMAC convenor Zafaryab Jilani promptly moved yet another writ to prevent any kind of construction on the acquired land.

Meanwhile, Aslam Bhure moved the Supreme Court against the acquisition. But the apex court transferred the case to high court here directing for maintenance of status quo until the high court decided the five writs that were by then pending there.

1990- Advani’s Rath Yatra: Chariot of fire

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  • 1986 May: Becomes chief of the BJP
  • 1989 June: Drafts the Palampur resolution, aligning the BJP with VHP’s Ram temple agitation.
  • December: Allies with JD for LS polls. Lends outside support to the V.P. Singh government, as does the Left.
  • 1990 September 25: Launches rath yatra from Somnath for temple construction.
  • October 23: Yatra is stopped at Samastipur, Bihar; withdraws support to VP government.
  • 1992 December: Babri Masjid demolished by kar sevaks on Dec 6. Advani prime accused.

Advani’s phenomenal rath yatra changed the course of the BJP.

It was in September 1990 when BJP president L.K. Advani decided to go for a padyatra to educate the people about the Ayodhya movement. This had been the BJP’s main election plank during the 1989 elections. However, when the late Pramod Mahajan heard about this, he pointed out that Advani would make slow progress on foot. “A jeep yatra, then ?” asked Advani. It was then that Mahajan suggested that they take a mini-bus and redesign it as a rath.

And that is how Advani embarked on his first Toyota rath yatra, catalysing a chain of events that resulted in the demolition of the Babri Masjid two years later. He took off from Somnath in Gujarat and worked his way to Ayodhya via central India. The idea of a chariot worked as a great mobiliser. Hindutva supporters rang temple bells, beat thalis and shouted slogans to welcome the rath. Some smeared the rath with a tilak and smeared the dust from its wheels on their forehead.

As expected, there was a communal backlash as riots broke out in Gujarat, Karnataka, Uttar Pradesh and Andhra. Advani was arrested in Samastipur on October 23 by then chief minister Lalu Prasad Yadav before he could reach the kar seva at Ayodhya on October 30. Although in his autobiography, My Country My Life, Advani calls this rath yatra, “an exhilarating period in my political life”, it was much more than that.

It whipped up a strong Hindu fervour and increased the party’s votebank from 85 in 1989 to 120 in the 1991 general elections. It also launched Advani’s career as the Eternal Yatri as he undertook four other rath yatras. However, the rath yatra also hung the albatross of Hindutva round the BJP’s neck, an accessory that the BJP and Advani alternately embrace and at times try hard to shrug off.

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The main event: The Mandal report

The crisis, the likes of which has rarely engulfed the nation with such overwhelming intensity and rage,was of his own making and,as it mounted with increasing ferocity, PM V.P. Singh found himself facing it almost alone. The very people who had pushed him into taking the controversial decision were nowhere to be seen. Having taken the big bite from the forbidden apple of the Mandal Commission, Singh found himself unable to swallow it or to spit it out. Even as he found himself paralysed in grappling with the consequences of the hasty decision he had made, his government watched in stunned horror as city after city exploded in violent anti-Mandal agitations.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर सोमनाथ गुजरात से 25 सितम्बर 1990 से शुरू हुई रथयात्रा को 30 अक्टूबर तक अयोध्या में ख़त्म होना था. आडवाणी को 23अक्टूबर को समस्तीपुर बिहार में ग़िरफ़्तार कर लिया गया।  

1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएँ विफल हो गईं.

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1990 में देश के पूर्व प्रधान मंत्री चंद्र शेखर ने इस विवाद का हल निकालना चाहा उन्होंने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिंदू परिषद को आमने सामने बैठा दिया। दोनों के बीच सरकार ने भैरोसिंह शेखावत और शरद पवार को नियुक्त किया। बातचीत के कई दौर चले आखिर में यह तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने-अपने कागज और सबूत पेश करें, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने तो दस्तावेज पेश किए लेकिन विश्व हिन्दू परिषद ने दस्तावेज नहीं पेश किए।

30 अक्टूबर 1992: the fifth Dharma Sansad met in Keshavpuram New Delhi and decided to start the Kara Save on 6th December, 1992.

On the morning of 8th December, 1992 the Central Government took over the complete Shri Rama Janmabhoomi Parisar area under its control. The pooja for Ram Lala did continue.

अंत में 6 दिसंबर 1992 को केन्द्र में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार के रहते कार सेवा के दौरान मस्जिद को ढहा दिया गया। पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे हुए। विदेशों में भी इस घटना की निंदा हुई। जिसके दबाव में आकर केन्द्र में स्थापित कोंग्रेस सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने 26 जनवरी 1993 को लाल किले से घोषणा की कि वह उसी स्थान पर पुनः मस्जिद का निर्माण कराएंगे।

1992, 6 दिसंबर को क्या हुआ, कैसे हुआ

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1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.

5 दिसंबर, 1992

  • इस दिन अयोध्या में लाखों कारसेवक एक और नारा बार-बार लगा रहे थे। मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे। ये तैयारी एक दिन पहले की थी।
  • कारसेवकों ने अगले दिन 12 बजे का वक्त तय किया था कारसेवा शुरू करने का। एक अजीब का जोश सबसे चेहरे पर साफ देखा जा सकता था।

6 दिसंबर, सुबह 11 बजे

  • सुबह 11 बजे के करीब कारसेवकों के एक बड़े जत्थे ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की लेकिन उन्हें वापस धकेल दिया गया। इसी वक्त वहां नजर आए वीएचपी नेता अशोक सिंघल, कारसेवकों से घिरे हुए और उन्हें कुछ समझाते हुए।
  • थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी भी जुड़ गए।
  • तुरंत ही इस भीड़ में लाल कृष्ण आडवाणी भी नजर आए। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद थे और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे। तभी पहली बार मस्जिद का बाहरी दरवाजा तोड़ने की कोशिश हुई लेकिन पुलिस ने उसे नाकाम कर दिया।
  • तस्वीरें गवाह हैं कि इस दौरान पुलिस अधिकारी दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।

6 दिसंबर, सुबह साढ़े 11 बजे

  • मस्जिद अब भी सुरक्षित खड़ी थी। तभी वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचा। उसने पहले से मौजूद कारसेवकों को कुछ समझाने की कोशिश की। जैसे वो किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे थे।
  • कुछ ही देर में बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी वहां से बाहर निकलती नजर आई। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह।
  • पुलिस की इस टुकड़ी को दूर मचान पर बैठे पुलिस अधिकारी सिर्फ देखते रहे, कुछ किया नहीं। मस्जिद से पुलिस के हटने के तुरंत बाद मेन गेट पर दूसरा और बड़ा धावा बोला गया। जो कुछ पुलिसवाले वहां बचे रह गए थे वो भी पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।

6 दिसंबर, दोपहर के 12 बजे

  • दोपहर 12 बजे एक शंखनाद पूरे इलाके में गूंज उठा। कारसेवकों के नारों की आवाज पूरे इलाके में गूंजती जा रही थी। कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगा। बाड़े में लगे गेट का ताला भी तोड़ दिया गया।
  • कुछ ही देर में मस्जिद कारसेवकों के कब्जे में थी। इस वक्त की एक और तस्वीर गौर करने लायक है। तत्कालीन एसएसपी डीबी राय पुलिसवालों को मुकाबला करने के लिए कह रहे थे लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी।
  • उस वक्त भी ये सवाल उठा था कि क्या ये पुलिस का विद्रोह था या फिर कैमरे के सामने किया गया सोचा-समझा ड्रामा। इस वक्त तक पुलिसवाले पूरी तरह हथियार डाल चुके थे।
  • कुदाल लिए हुए कारसेवक तब तक मस्जिद गिराने का काम शुरू कर चुके थे। एक दिन पहले की गई रिहर्सल काम आई और कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया गया।

1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता का बयान: 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं और उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। वे फिलहाल रिसर्च एंड एनालाइसिस विंग (रॉ) में पदस्थ हैं। उनका बयान भी कोर्ट में दर्ज हुआ है। जिसके मुताबिक़ —

6 दिसंबर 1992 को विवादित स्थल से 150 मीटर दूर मंच बनाया गया था।

  • इस मंच पर आडवाणी के अलावा मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, विहिप के अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतंभरा मौजूद थे।
  • तीनों गुंबद गिरने के बाद मंच पर खुशी और जश्न का माहौल था।
  • विवादित ढांचे का पहला गुंबद दोपहर 2 बजे, दूसरा 3 बजे और तीसरा 4:30 बजे गिरा।
  • अंजु गुप्ता के मुताबिक, घटना वाले दिन वहां मौजूद भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कारसेवकों को खुश करने के लिए जोशीला भाषण दिया था। वे बार-बार कह रहे थे कि मंदिर वहीं बनेगा।
  • गुप्ता ने यह भी कहा कि विनय कटियार, उमा भारती व साध्वी ऋतंभरा ने भी उकसाने वाले भाषण दिए थे।
  • गुप्ता ने कहा कि आडवाणी के रामकथा कुंज में आते ही माहौल गर्म हो गया था। तब कुंज में भाजपा के कलराज मिश्र, दिवंगत प्रमोद महाजन और आचार्य धर्मेंद्र के अलावा भाजपा व विहिप के करीब 100 नेता मौजूद थे। आडवाणी ने अपने भाषण में बार-बार कहा कि मंदिर विवादित करार दिए गए 2.77 एकड़ में ही बनेगा।
  • गुप्ता के अनुसार उन्होंने आडवाणी के पूछने पर बताया था कि लोग गुंबदों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर आडवाणी ने विवादित स्थल पर जाने और लोगों से गुंबद से उतरने की अपील करने की इच्छा जताई। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद आडवाणी को बताया गया कि वहां जाना ठीक नहीं होगा। यदि वे किसी दुर्घटना की चपेट में आ गए तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी।
  • गुप्ता के मुताबिक, बाद में आडवाणी ने भारती को भेजा। वे जल्द ही वापस आ गईं। भारती ने बताया कि उन्होंने लोगों को छड़ों, हथौड़े आदि के साथ देखा है। जब मस्जिद के गुंबद गिरा दिए गए तब भारती व ऋतंभरा परस्पर गले लग र्गई और उन्होंने मिठाइयां बांटीं। उन्होंने आडवाणी और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को भी बधाई दी। किसी भी नेता ने विध्वंस रोकने की अपील नहीं की।
  • गुप्ता ने बताया कि तत्कालीन डीजीपी एससी दीक्षित ने ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को बधाई दी। दीक्षित ने यह भी कहा कि सहयोग करने और कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए उनका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा।

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1992: Demolition of the mosque on December 6, 1992 led the Muslims to move contempt application against which Kalyan Singh was awarded a day’s imprisonment.

While January 15 was fixed for the next hearing , the then Central government under PV Narasimha Rao issued an ordinance for acquisition of as many as 67 acres in and around the disputed site.

  • दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया था.
  • जस्टिस बाहरी आयोग की सिफारिश पर नरसिंह राव की सरकार ने विहिप पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था.

Kalyan Singh lets down the Supreme Court

कल्याण ने इंटरव्यू में बताया कि

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I had submitted an affidavit before the Supreme Cour. I had given in writing that no harm would be done to the structure.

I submitted my resignation to the governor, the Govt that was dismissed in UP was not there at that time. I had submitted my resignation at 5:15 PM, on 6th December 1992.

I resigned from my post at 5:15 PM on 6th DECEMBER, and the Central Govt took over, even then the construction by the Kar Sewaks continued for two more days. On the 7th of December when the Kar Sewaks continued the construction, the Central Govt, did not resort to any firing which means that the decision taken by me was followed by the Centre as well.

Supreme Court found that there was blatant, deliberate and intentional disobedience and flouting of orders by Kalyan Singh, the then UP chief minister and his government.

In a landmark judgment SC awarded him imprisonment for a day and asked him to pay fine of Rs 2000.

After his release he declared, “In the demolition of Babri Mosque no policemen were involved. It’s my own deed and I am proud of it. If I have to go to jail repeatedly for this offence, I am ready for this. In fact I would feel pride in going to jail for this noble purpose.”

On 26th November 1992, the Supreme Court also said that no assurances were forthcoming from the State Government regarding the safety of the Babri structure, and that the Supreme Court knew how to expect action from the state government and if necessary ‘exact’ action.

After the demolition of Babri structure on 6th December 1992, the Supreme Court lamented and observed that:

  • The demolition was in brazen defiance of Constitution, and the authorities of state and central Governments.
  • It was an unprecedented attack on secular foundations.
  • The Court thus stands betrayed as never before.

जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया. वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया.

फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.

13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.

15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं.

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला.

मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया.

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला.

मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.

जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए.

जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद चरमपंथियों ने अयोध्या के विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान ‘भड़काऊ भाषण’ देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था.

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.

04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा.

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की ‘मिलीभगत’ थी.

19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई.

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी.

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7 जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं.

24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश. आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी.

20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज.

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के स्वत्व निर्धारण या Title Suit पर सुनवाई पूरी. अपने दावे के पक्ष में हिंदुओं ने 54 और मुस्लिम पक्ष ने 34 गवाह पेश किए. इनमे धार्मिक विद्वान, इतिहासकार और पुरातत्व जानकार शामिल हैं. मुस्लिम पक्ष ने अपने समर्थन में 12 हिंदुओं को भी गवाह के तौर पर पेश किया. दोनों पक्षों ने लगभग 15 हज़ार पेज दस्तावेज़ी सबूत पेश किए. कई पुस्तकें भी अदालत में पेश की गईं.

अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है. इस तरह 1989 से अब तक कुल 18 हाईकोर्ट जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं.

30 सितंबर 2010- अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर किसी एक पक्ष में फैसला नहीं आया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पूरे जमीन पर मालिकाना हक के दावे को कोर्ट ने खारिज कर दिया है। फैसले के मुताबिक विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा। एक हिस्सा हिंदुओं को दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को मिलेगा। हाईकोर्ट ने माना है जिस स्थान पर भगवान राम की मूर्ति रखी हुई है वही रामजन्म स्थान है और यही हिस्सा हिंदुओं को मिलेगा। हालांकि तीन महीने तक विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी। कोर्ट ने कहा है कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए सभी पक्षों के पास तीन महीने का वक्त रहेगा।

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17 Nov 2011- सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन भाग में विभाजित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि यह ‘कुछ अजीब’ फैसला है क्योंकि किसी पक्ष ने भूमि को तीन भाग में बांटने की मांग नहीं की थी।

30 सितंबर 2010 निर्णय आने तक 21 साल, 13 बेंच, 18 जज

अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है.

पहली पूर्ण पीठ

  • विवाद की सुनवाई के लिए 21 जुलाई 1989 को तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केसी अग्रवाल, जस्टिस यूसी श्रीवास्तव और जस्टिस सैयद हैदर अब्बास रज़ा की पहली विशेष पूर्ण पीठ बनी.
  • अगले साल 1990 में जस्टिस रज़ा के साथ दो नए जजों जस्टिस एससी माथुर और जस्टिस ब्रजेश कुमार को मिलाकर नई बेंच बनी.
  • विवादित मस्जिद गिरने के बाद केंद्र सरकार ने जनवरी 1993 में अध्यादेश लाकर मालिकाना हक़ के चारों मामले समाप्त करके सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी कि क्या वहाँ कोई पुराना मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.
  • वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अपनी राय देने से इनकार कर दिया और मामलों को पुनर्जीवित करते हुए हाईकोर्ट को फ़ैसला करने को कहा.
  • तब 1994 में जस्टिस एपी मिश्र, जस्टिस सीए रहीम और जस्टिस आईपी वशिष्ठ की नई बेंच बनी.
  • जस्टिस रहीम के चले जाने के बाद 1996 में जस्टिस एसआर आलम को लेकर चौथी बेंच बनी. सितंबर, 1997 में जस्टिस एपी मिश्र के हटने पर जस्टिस देवकांत त्रिवेदी को मिलाकर पांचवी पीठ बनी.
  • जनवरी, 1999 में जस्टिस आईपी वशिष्ठ हटे. उनकी जगह जस्टिस जेसी मिश्र को लेकर नई बेंच बनी.

सातवीं बेंच

  • जुलाई, 2000 में जस्टिस मिश्र चले गए और उनकी जगह जस्टिस भंवर सिंह आए तो सातवीं बेंच बनी.
  • सितंबर, 2001 में जस्टिस देवकांत त्रिवेदी की जगह जस्टिस सुधीर नारायण आए.
  • जुलाई, 2003 में फिर नवीं बार बेंच पुनर्गठित हुई और जस्टिस सुधीर नारायण की जगह जस्टिस खेमकरण आ गए.
  • अगस्त, 2005 में जस्टिस खेमकरण की जगह जस्टिस ओपी श्रीवास्तव आए. जस्टिस श्रीवास्तव को एक साल का सेवा विस्तार मिला फिर भी सुनवाई पूरी नही हुई.
  • जनवरी, 2007में जस्टिस भंवर सिंह की जगह जस्टिस धर्मवीर शर्मा आए.
  • सितंबर, 2008 में जस्टिस ओपी श्रीवास्तव की जगह जस्टिस सुधीर अग्रवाल आ गए.

13वीं पूर्ण पीठ

  • फिर दिसंबर, 2009 में जस्टिस सैयद रफ़त आलम मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हो गए. उनके तबादले पर जस्टिस एसयू ख़ान को लेकर 13वीं बार विशेष पूर्ण बनी.
  • अब वर्तमान बेंच के एक सदस्य जस्टिस धर्मवीर शर्मा एक अक्टूबर को रिटायर होने वाले हैं.
  • इस तरह 1989 से अब तक कुल 18 हाईकोर्ट जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं.
  • विवाद से जुड़े अन्य मामलों को जोड़ा जाए तो यह संख्या कहीं अधिक होगी.

अयोध्या स्वत्व निर्धारण Title Suits: कितने दीवानी मामले

  • Sunni Central Waqf Board (UP) and others Vs Gopal Singh Visharad (now dead) and others
  • Bhagwan Shri Ram Virajman and others Vs Rajendra Singh and others,
  • Nirmohi Akhara and others Vs Baboo Priya Dutt Ram and others
  • Gopal Singh Visharad (now dead) and others Vs Zahoor Ahmed and others 

अयोध्या विवाद से सम्बंधित 4 मुकदमे चल रहे हैं… 23 अगस्त 1990 : महंत परमहंस ने 40 साल पहले दायर अपना मुकदमा वापस लिया… बाद में सिविल मामलों के चारों केस हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने पास ट्रांसफर कर लिए…

16 जनवरी 1950 : गोपालसिंह विशारद द्वारा सिविल जज की अदालत में मुकदमा। मूर्तियाँ न हटाने तथा पूजा की अनुमति देने के बाबत जज द्वारा अंतरिम आदेश पारित करने के साथ फैसला कि इस संपत्ति में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

  • प्रथम वाद 1950 में गोपाल सिंह विशारद द्वारा (सिविल वाद संख्या 2/1950) सिविल जज फैजाबाद की अदालत में दायर किया था जिसमें मांग की गयी थी कि भगवान के निकट जाकर दर्शन और पूजा करने का वादी का अधिकार सुरक्षित रखा जाए, इसमें किसी प्रकार की बाधा या विवाद प्रतिवादियों द्वारा खड़ा न किया जाए तथा ऐसी निषेधाज्ञा जारी की जाए ताकि प्रतिवादी भगवान को अपने वर्तमान स्थान से हटा न सके।

On 16-1-1950 a suit for permanent injunction (Regular Suit No. 2 of 1950 now marked as O.O.S. No. 1 of 1989) was filed by Sri Gopal Singh Visharad in the court of Civil Judge at Faizabad in which temporary injuction was granted against the removal of Idols from the Mosque as well as for performance of Puja and Darshan of the same.

5 दिसंबर, 1950: महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया।

  • इसी प्रकार की मांग करते हुए दूसरा वाद (संख्या 25/1950) परमहंस रामचन्द्रदास महाराज ने दायर किया। श्री विशारद के वाद में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने अन्तरिम निर्णय देकर श्रीरामलला की मूर्तियाँ उसी स्थान पर बनाए रखने तथा हिन्दुओं द्वारा उनकी पूजा अर्चा, आरती व भोग निर्बाध जारी रखने का आदेश दिया तथा एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। इस अन्तरिम आदेश की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल, 1955 में कर दी गई।

As the First Suit (Regular Suit No. 2 of 1950) filed by Sri Gopal Singh Visharad was defective on account of having been filed without giving notice to the State of U.P. and Collector Faizabad etc., under section 80 C.P.C., another suit for similar relief was filed by Sri Param Hans Ram Chardra Das which was numbered as Regular Suit No. 25 of 1950 (now marked as O.O.S. No. 2 of 1989).

17 दिसंबर, 1959: निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

  • तृतीय वाद सन् 1959 में निर्मोही अखाड़ा द्वारा (संख्या 26/1959) दायर करके मांग की गई कि श्रीराम जन्मभूमि की पूजा व्यवस्था की देखभाल का दायित्व निर्मोही अखाड़े को दिया जाए और रिसीवर को हटा दिया जाए।

The third Suit on behalf of Hindu community was filed in 1959 by Nirmohi Akhara which was numbered as Regular Suit No. 26 of 1959 (now marked as O.O.S. No. 3 of 1989).

18 दिसंबर, 1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

  • चतुर्थ वाद 18 दिसम्बर, 1961 को (11 वर्ष 11 माह व 26 दिन बाद) उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा (संख्या 12/1961) दायर किया गया। अपने वाद में विवादित ढांचे को मस्जिदघोषित करने तथा पूजा सामग्री हटाने और ढांचे के चारों ओर के आसपास के भू-भाग को कब्रिस्तान घोषित करने की मांग की। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने हकदारी मुकदमा दायर कर माँग की थी कि विवादित ढाँचे से मूर्तियाँ हटायी जाए तथा कब्जा मुसलमानों को दे दिया जाए और उस स्थान को मस्जिद घोषित कर दी जाए। इस मामले में 22 विपक्षी पार्टियाँ हैं। इस मुकदमें में राहत माँगी गई कि वाद पत्र के साथ नत्थी किए गए नक्शे में एबीसीडी अक्षरों से दिखाई गई सम्पत्ति को मस्जिद घोषित कर दिया जाए और उस स्थान पर कब्जा मुसलमानों को दिलाया जाए एवं वहाँ पर जो विराजमान मूर्तियाँ हैं, उनको हटाया जाए। उल्लेखनीय है कि सिविल जज फैजाबाद द्वारा 6 जनवरी 1964 को दिए गए आदेश के माध्यम से उपरोक्त चारों मुकदमे की सुनवाई के लिए एक साथ जोड़ दिए गए।

The fourth suit was filed by the U.P. Sunni Central Board of Waqf and 8 other Muslims in a representative capacity on 18th December, 1961 in the court of Civil Judge Faizabad. This suit was numbered as Regular Suit No.12 of 1961 (now marked as O.O.S. No. 4 of 1989). In this suit the Muslims have claimed the relief of declaration as well as possession.

1 जुलाई, 1989: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया।

  • अन्तिम व पंचम वाद भगवान रामलला विराजमान की ओर से 01 जुलाई, 1989 को देवकीनन्दन अग्रवाल (पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट) द्वारा (संख्या 236/1989) दायर किया गया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति एक जीवित इकाई है अपना मुकदमा लड़ सकती है परन्तु प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति अवयस्क मानी जाती है। अत: उनका मुकदमा लड़ने के लिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। अत: न्यायालय ने रामलला का मुकदमा लड़ने के लिए देवकीनन्दन अग्रवाल को रामलला के अभिन्न सखा (Next Friend) के रूप में अधिकृत कर दिया। इस वाद में अदालत से मांग की गई थी कि राम जन्मभूमि अयोध्या का सम्पूर्ण परिसर वादी (देव-विग्रह) का है, अत: राम जन्मभूमि पर नया मन्दिर बनाने का विरोध करने वाले अथवा इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या बाधा खड़ी करने वाले प्रतिवादियों के विरूध्द स्थायी स्थगन आदेश जारी किया जाये।

History- Babri Masjid demolition (Conspiracy ) case

The Babri Masjid demolition case stemmed from two crime files: Crime No: 197/1992 and Crime No: 198/1992. Both were filed shortly after the disputed structure of Babri Masjid was demolished on December 6, 1992.

Crime no. 197/1992 was registered in the Ayodhya Police Station against “lakhs of unknown kar sevaks”. This FIR dealt with the actual demolition of the masjid. It lined up a bunch of serious offences, including robbery or dacoity with attempt to commit murder,causing hurt by an act endangering life or safety of others, deterring public servants from doing duty and promoting enmity between different religious groups. The most severe of these offences could get the offender up to 10 years in jail.

Crime no. 198/1992, was registered against 12 persons, including Ashok Singhal, Giriraj Kishore, Advani, Murli Manohar Joshi, Vishnu Hari Dalmiya,Vinay Katiyar, Uma Bharati and Sadhvi Ritambara, who were on the dais at Ram Katha Kunj when the masjid was being demolished.

They were accused of promoting enmity, making imputations and assertions prejudicial to national integrations and statements conducing to public mischief. Maximum punishment, if found guilty for these offences, was up to five years’’ imprisonment. The cases are being tried in courts in Lucknow and Rae Bareilly, respectively.

The CBI took over Crime 197 in Lucknow, while 198 remained with the State CID in Rae Bareilly. Eventually 198 also got transferred to the CBI and began being heard in the Lucknow Court.

Now with CBI investigating both crimes as one, a joint charge sheet was filed on October 5, 1993 accusing Mr. Advani and other top parivar leaders of conspiracy.

The CBI charge sheet had alleged that a secret meeting took place at the residence of Katiyar on the eve of the demolition during which the final decision to bring down the disputed structure was taken. The Special Judicial Magistrate and the Additional Sessions Court also found the conpsiracy prima facie tenable.

However, in February 2001, the Lucknow Bench of the Allahabad High Court found a technical error in the manner Crime 198 was transferred to the CBI without consulting the High Court. Though it did not touch upon the conspiracy charge against the top leaders, the High Court asked the Uttar Pradesh government to correct the flaw. Subsequent governments failed to act and Crime 198 finally got detached and returned to Rae Bareilly.

On May 4, 2001, Special Judge, Lucknow, Shrikant Shukla, dropped the conspiracy charge against Mr. Advani and 20 others on the ground that Crime 197 – the Special Court was only trying this crime – was only regarding the actual demolition and not the hatching of any conspiracy. On May 20, 2010, the Allahabad High Court upheld Judge Shukla’s order while dismissing the CBI’s revision petition.

Arguing before the Supreme Court in its appeal on February 19, 2011, the CBI submitted that Judge Shukla made an “artificial distinction” in the demolition case in order to drop the names of Mr. Advani and the 20 others for the reason that they did not participate in the “actual demolition”. The CBI called for a joint trial of both Crime nos. 197 and 198 like how they did previously.

“Acts of instigation, facilitation, the actual demolition of the masjid, the continuous assault on media persons, thus, form a single connected transaction and can well be a concerted conspiracy under Section 120-B of the IPC. In respect of continuous criminal act attracting various offences, the transaction has to be viewed in as a whole and evidence cannot be led at two different courts,” the CBI said in its 2011 appeal.

In his defence, Mr. Advani had argued that the entire endeavour of the CBI to file a composite charge sheet and foist conspiracy charges against him and the other leaders during the UPA government’s time was a politically motivated one. He had claimed that the Special Court, in 2001, rightly came to the firm conclusion that it had no jurisdiction to hear the charge of conspiracy. He defended that the CBI’s appeals were sheer abuse of law.

December, 1992: Two FIRs filed in the Babri Masjid demolition case. Crime no. 197 deals with actual “demolition of the mosque by kar sevaks.” Crime no. 198 named L.K. Advani, Murli Manohar Joshi and others for ‘communal’ speeches before the demolition

October, 1993: CBI files a composite charge sheet and accuses Advani and other leaders of ‘conspiracy’

May 4, 2001: Special Judge S.K. Shukla drops conspiracy charge against 13 accused, including Advani and Kalyan Singh. Bifurcates Crimes 197 and 198.

May 20, 2010: Allahabad HC dismisses CBI’s revision petition.

February, 2011: CBI moves Supreme Court. Argues that “the actual demolition of the Babri Masjid and the continuous assault on media persons form a single connected transaction and can well be a concerted conspiracy”

March 6, 2017: SC indicates it may revive conspiracy charge and order a joint trial of crimes 197 and 198.

March 22, 2017: Next date of hearing in the Supreme Court

CBI ने इन चेहरों को ठहराया था जिम्‍मेदार  

लाल कृष्ण आडवाणी

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बीजेपी की राजनीति को ‘ऐतिहासिक माइलेज’ राम मंदिर आंदोलन से ही मिला और इसका सबसे बड़ा चेहरा थे लाल कृष्ण आडवाणी। वही आडवाणी जो आज बीजेपी में सबसे वरिष्ठ हैं और सबसे हाशिए पर हैं।

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक आडवाणी अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने की ‘साजिश’ के मुख्य सूत्रधार थे जो अक्टूबर 1990 में शुरू होकर दिसंबर 1992 तक चला बताया गया है. आडवाणी ने 6 दिसंबर को कहा था, ‘आज कारसेवा का आखिरी दिन है. कारसेवक आज आखिरी बार कारसेवा करेंगे.’

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने के ‘षड्यंत्र’ के मुख्य सूत्रधार हैं जो अक्टूबर 1990 में शुरू होकर दिसंबर 1992 तक चला बताया गया है. अभियोजन पक्ष का तर्क है कि बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि ढांचे का विवाद काफी समय से चला आ रहा है, जो अदालत में लंबित है. हिंदुओं के अनुसार राम जन्मभूमि पर मीर बाकी ने मस्जिद का निर्माण किया था.

विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को मुक्त करने का अभियान चलाया और इसके अंतर्गत लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा की. शिव सेना नेता बाल ठाकरे ने मुंबई के दादर में आडवाणी का स्वागत किया. उसी दिन लाल कृष्ण आडवाणी ने पंचवटी में घोषणा की थी कि बाबरी मस्जिद कभी भी मस्जिद नही रही और हिंदू संगठन प्रत्येक दशा में अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दृढ संकल्प हैं.

चार्जशीट के अनुसार 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस योजना मे सक्रिय साथ दिया. पांच दिसंबर 1992 को अयोध्या मे भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया. आडवाणी ने छह दिसंबर को कहा था, “आज कारसेवा का आखिरी दिन है. कारसेवक आज आखिरी बार कारसेवा करेंगे.”

जब उन्हें पता चला कि केन्द्रीय बल फैजाबाद से अयोध्या आ रहा है तब उन्होंने जनता से राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने को कहा. अभियोजन पक्ष का यह भी कहना है कि आडवाणी ने कल्याण सिंह को फोन पर कहा कि वे विवादित ढांचा पूर्ण रूप से गिराए जाने तक अपना त्यागपत्र न दें. आडवाणी ने राम कथा अकुंज के मंच से चिल्लाकर कहा कि “जो कार सेवक शहीद होने आए हैं, उन्हें शहीद होने दिया जाए.” आडवाणी पर आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि, “मंदिर बनाना है, मंदिर बनाकर जाएंगे. हिंदू राष्ट्र बनाएंगे.”

स्थानीय प्रशासन ने विवादित ढांचा गिराए जाने से रोकने का कोई प्रयास नही किया इसलिए अभियोजन के अनुसार तत्कालीन जिला जिला मजिस्ट्रेट आरएन श्रीवास्तव और पुलिस अधीक्षक डीबी राय इस ‘षड्यंत्र’ में शामिल थे. इनमें से राय का अब निधन हो चुका है. लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के तहत आडवाणी पर फिलहाल बाबरी मस्जिद गिराने के षड्यंत्र में शामिल होने का पहला मुकदमा नही चल रहा है.आडवाणी तथा उनके सात अन्य सहयोगियों पर रायबरेली की अदालत में केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विद्वेष भड़काने वाल भाषण देकर कारसेवकों को उकसाने का आरोप है, जिसके फलस्वरूप मस्जिद गिरा दी गई. आडवाणी और उनके साथियों ने अदालत में सभी आरोपों से इनकार किया है.

मुरली मनोहर जोशी

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आडवाणी के बाद मुरली मनोहर जोशी दूसरे बड़े बीजेपी नेता हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 6 दिसंबर को जोशी भी मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे. चार्जशीट के मुताबिक, मस्जिद का गुंबद गिरने पर उमा भारती आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से गले मिल रही थीं.

मुरली मनोहर जोशी समेत कई बीजेपी नेताओं पर आरोप लगा कि 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से प्रतीकात्मक कारसेवा का फैसला हो जाने के बाद भी इन लोगों ने पूरे प्रदेश में सांप्रदायिकता से ओत-प्रोत भाषण दिए, जिनसे सांप्रदायिक जहर फैला. मुरली मनोहर जोशी फिलवक्त कानपुर से बीजेपी सांसद हैं, हालांकि अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी ने उन्हें आडवाणी की तरह पार्टी के ‘मार्गदर्शक मंडल’ में डालकर राजनीतिक रूप से किनारे कर दिया है.

कल्याण सिंह

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मस्जिद गिराए जाने के वक्त कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उन पर आरोप है कि उग्र कारसेवकों को उनकी पुलिस और प्रशासन ने जानबूझकर नहीं रोका.

कल्याण सिंह उन 13 लोगों में हैं, जिन पर मूल चार्जशीट में मस्जिद गिराने की ‘साजिश’ में शामिल होने का आरोप लगा. इसके मुताबिक, 1991 में CM पद की शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह ने मुरली मनोहर जोशी और दूसरे नेताओं के साथ अयोध्या जाकर शपथ ली थी कि विवादित जगह पर ही मंदिर बनेगा.

अक्टूबर 1991 में उनकी सरकार ने बाबरी मस्जिद कॉम्प्लेक्स के पास 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण टूरिज्म प्रमोशन के नाम पर किया. जुलाई 1992 में संघ परिवार ने प्रस्तावित राम मंदिर का शिलान्यास किया और बाबरी मस्जिद के इर्द-गिर्द खुदाई करके वहां सीमेंट-कंक्रीट की 10 फुट मोटी परत भर दी गई. कल्याण सिंह सरकार ने इसे भजन करने का स्थान बताया और VHP ने इसे राम मंदिर की बुनियाद घोषित कर दिया.

केंद्र सरकार ने 195 कंपनी सेंट्रल मिलिट्री फ़ोर्स मदद के लिए भेजी थी, लेकिन कल्याण सिंह सरकार ने उसका इस्तेमाल नहीं किया. 5 दिसंबर को यूपी के प्रमुख सचिव (गृह) ने केंद्रीय बल का प्रयोग करने का सुझाव दिया, लेकिन कल्याण इस पर भी राजी नहीं हुए. ढांचा गिराए जाने के समय वह अयोध्या में नहीं थे, फिर भी उन पर साजिश में शामिल होने का आरोप लगा. 6 दिसंबर की शाम को ही घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. बाद में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा भंग कर दी.

घटना के बाद कल्याण सिंह ने जो ‘ऐतिहासिक और विवादित’ भाषण दिया, वह आज भी यूट्यूब पर मौजूद है. इस भाषण में उन्होंने कहा- ‘कोर्ट में केस करना है तो मेरे खिलाफ करो, जांच आयोग बैठाना है तो मेरे खिलाफ बैठाओ. किसी को दंड देना है तो मुझे दो. दोपहर 1 बजे केंद्रीय गृहमंत्री शंकरराव चह्वाण का मेरे पास फोन आया. मैंने उनसे कहा कि ये बात रिकॉर्ड कर लो चह्वाण साहब कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा.’

कल्याण सिंह फिलहाल राजस्थान के राज्यपाल हैं.

उमा भारती

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राम जन्मभूमि आंदोलन के बड़े चेहरों में मौजूदा केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती भी शामिल हैं.

बात 1984 से शुरू होती है, जब भागवत कथा वाचक उमा भारती पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ीं और हार गईं. 1989 और फिर 1991 में वह मध्य प्रदेश की खजुराहो सीट से लोकसभा चुनाव जीत गईं. लेकिन उनका राजनीतिक कद बढ़ा राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका से. उमा भारती के उग्र भाषणों से आंदोलन को गति मिली और महिलाएं बड़ी संख्या में कारसेवा के लिए पहुंचीं.

6 दिसंबर को जब ढांचा गिराया गया, वह अन्य बीजेपी और वीएचपी नेताओं के साथ मौका-ए-वारदात पर मौजूद थीं. लिब्रहान आयोग ने बाबरी ध्वंस में उनकी भूमिका दोषपूर्ण पाई. भारती ने भीड़ को उकसाने के आरोपों से इनकार किया. लेकिन यह भी कहा कि उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है और वह ढांचा गिराए जाने की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं.

बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद उमा भारती लगातार सांसद और अटल सरकार में मंत्री रहीं. फिर उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी ने दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासन को खत्म कर एमपी में बीजेपी की सत्ता वापसी हुई. मगर 2004 में अनुशासनहीनता के नाम पर उन्हें पार्टी की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया गया. फिर उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी नाम से नई पार्टी बना ली और कहा कि उनकी पार्टी संघ के विचारों की असली अनुयायी है.

7 जून 2011 में उन्हें दोबारा बीजेपी में शामिल किया गया. फिलवक्त वह यूपी की झांसी सीट से सांसद और मोदी सरकार में मंत्री हैं.

उमा भारती के अलावा ग्वालियर के राजघराने की विजयराजे सिंधिया और साध्वी ऋतंभरा भी आंदोलन की महिला अगुवा थीं. हालांकि साध्वी ऋतंभरा बाबरी ध्वंस के बाद राजनीतिक रूप से लो-प्रोफाइल हो गईं. 2002 में प्रदेश की बीजेपी सरकार ने आश्रम के लिए उन्हें 17 हेक्टेयर जमीन 99 साल के लिए एक रुपये सालाना की फीस पर आवंटित कर दी. उस वक्त इस जमीन की कीमत थी 20 करोड़ रुपये. उनके आश्रम ‘वत्सलग्राम’ ने कई अनाथ बच्चियों को आश्रय दिया है और उनकी पढ़ाई-लिखाई का खर्च भी उठाता है।

विनय कटियार

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राम मंदिर आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए वीएचपी ने 1 अक्टूबर 1984 में अपनी एक ‘दबंग’ शाखा बनाई, जिसे ‘बजरंग दल’ नाम दिया गया. संघ प्रचारक और दो साल पहले हिंदू जागरण मंच बनाने वाले तेजतर्रार 30 वर्षीय युवक विनय कटियार को इस संगठन का पहला अध्यक्ष बनाया गया. बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने जन्मभूमि आंदोलन को उग्र बनाया.

विवादित ढांचा गिराए जाने से एक दिन पहले 5 दिसंबर को अयोध्या में विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें आडवाणी के अलावा शिव सेना नेता पवन पांडे भी मौजूद थे. माना जाता है कि इसी बैठक में विवादित ढांचा गिराने का आखिरी फैसला किया गया.

चार्जशीट के मुताबिक, कटियार ने 6 दिसंबर को अपने भाषण में कहा था, ‘हमारे बजरंगियों का उत्साह समुद्री तूफान से भी आगे बढ़ चुका है, जो एक नहीं तमाम बाबरी मस्जिदों को ध्वस्त कर देगा.

विवादित ढांचे के ढहाए जाने के बाद कटियार का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. वह बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव भी बनाए गए. फैजाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट से वह तीन बार चुने गए. वर्तमान में राज्यसभा से सांसद हैं और जब-तब ‘पार्टी लाइन’ की परवाह किए बगैर राम मंदिर की मांग दोहराया करते हैं.

अशोक सिंघल

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अगर कोई राम मंदिर आंदोलन का चीफ आर्किटेक्ट था तो वह थे दिवंगत VHP अध्यक्ष अशोक सिंघल. चार्जशीट के मुताबिक, 20 नवंबर 1992 को वह शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे से मिले और उन्हें कारसेवा में हिस्सा लेने का न्योता दिया. 4 दिसंबर 1992 को बाल ठाकरे ने शिवसैनिकों को अयोध्या जाने का आदेश दिया. अशोक सिंघल ने यह भी कहा था कि 6 दिसंबर की कारसेवा में बाबरी की इमारत से मुगल कमांडर मीर बाकी का शिलालेख हटाया जाएगा, क्योंकि यही इकलौता चिह्न मस्जिद का प्रतीक है.

दूसरे दिन 5 दिसंबर को अशोक सिंघल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा- ‘मंदिर निर्माण में जो भी बाधा आएगी, हम उसे दूर कर देंगे. कार सेवा केवल भजन कीर्तन के लिए नहीं है बल्कि मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करने के लिए है.’

चार्जशीट में अशोक सिंघल पर आरोप है कि वह 6 दिसंबर को राम कथा कुंज पर बने मंच से नारा लगवा रहे थे कि ‘राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे. एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो.’ आरोप है कि जब बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो आरोपी प्रसन्न थे और मंच पर मिठाई बांटी जा रही थी. उत्तेजित कारसेवकों ने पहले बाबरी मस्जिद ढहाई और उसी दिन अयोध्या में मुसलमानों के कुछ घर तोड़े और जलाए गए.

अशोक सिंघल 2011 तक वीएचपी अध्यक्ष बने रहे. फिर स्वास्थ्य कारणों से दिसंबर 2011 में उनकी जगह प्रवीण तोगड़िया को वीएचपी की कमान दे दी गई. अपनी उम्र के आखिरी वर्षों तक भी वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे और विवादास्पद बयान देते रहे. लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी में भगवान राम की आत्मा प्रवेश कर गई है. 17 नवंबर 2015 को उनका निधन हो गया. मोदी ने श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें ‘इंस्टीट्यूशन’ कहा और उनके निधन को ‘निजी नुकसान’ बताया.

अमन सिखाती अयोध्या

अयोध्या में फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न मेले-त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिन्दू-मुसलिम साथ-साथ दिखाईदेते हैं

‘सरयू नदी में पंडे धर्म-कर्म कराते थे और मुसलिम समुदाय के लोग फूल चढ़वाने का काम करते थे. जहूर मियां बाबरी मस्जिद का केस भी लड़ते थे और संत-महंत सामने से गुजर जाएं तो दुआ-सलाम व आदर देने में कहीं भी कोताही नहीं करते  थे. हाशिम मियां के क्या कहने, उनका महंत परमहंस जी से तो याराना जैसा था. हाशिम मियां आज भी हैं वे बाबरी मस्जिद के एक पक्षकार भी हैं और इसी मामले में हिंदू पक्ष की ओर से पक्षकार रहे रामचंद्र परमहंस के साथ एक ही गाड़ी में बैठकर रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मुकदमा लड़ने के लिए जाते थे.’

September 30, 2010-1

भाजपा के सांसद रहे ब्रह्मचारी विश्वनाथ दास शास्त्री की यह बात उस अयोध्या की झलक देती है जिसकी हर ईंट में गंगा-जमुनी तहजीब और सद्भाव की मिट्टी बसी है. फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न मेले-त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिन्दू-मुसलिम साथ-साथ दिखाई देते हैं.  पूजा के लिए दिए जाने वाले फूलों से लेकर मंदिरों में चढ़ने वाली माला को पिरोने के काम में लगे मुसलिम समुदाय के लोग शहर के ताने-बाने में ऐसे रचे बसे हैं कि यदि ये न हों तो शायद अयोध्या की जिंदगी ही ठहर जाए.

कनकभवन के बगल में स्थित सुंदरभवन में रामजानकी का मंदिर है. अन्सार हुसैन उर्फ चुन्ने मियां 1945 से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक इस मंदिर के मैनेजर रहे. मेले में तो वे पुजारी के काम में मंदिर में हाथ भी बंटाते थे. वे पंचवक्ती नमाजी थे लेकिन क्या मजाल इसे लेकर अयोध्या में कोई विवाद हुआ हो.

अयोध्या के साधु-संतों के लिए विशेष तौर पर अयोध्या के मुसलिम कारीगरों द्वारा जो खड़ाऊं बनायी जाती है उसे ‘चुन्नी-मुन्नी’ कहते हैं. इसका वजन 50 से लेकर 100 ग्राम तक होता है. इसे बनाने वाले एक मोहम्मद इकबाल बताते हैं कि यह एक खास हुनर है . इनके पिता भी यही काम करते थे और खानदान के लगभग एक दर्जन लोग इसे अपना व्यवसाय और सेवा बनाए हुए हैं. 6 दिसम्बर, 1992 को बाहरी उपद्रवी लोगों ने इनका घर जलाकर खाक कर दिया फिर भी इन्होंने न तो अयोध्या छोड़ी और न खड़ाऊं बनाना. हनुमानगढ़ी सहित तमाम मंदिरों में ये खड़ाऊं चढ़ाई जाती है. जब विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या आंदोलन के कारण स्थितियां खराब होने के अंदेशे में खड़ाऊं के कारोबार में लगे मुसलिम कारीगर थोड़े दिनों के लिए अयोध्या छोड़कर दूसरी जगहों पर चले गए तो विश्व हिंदू परिषद को भरतकुंड के खड़ाऊ पूजन का कार्यक्रम पूरा करने के लिए जरूरी खड़ाऊं उपलब्ध नहीं हो सकी.

इतिहास पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि अयोध्या में कई मंदिर और अखाड़े हैं जिन्हें मुसलिम शासकों ने समय-समय पर जमीन और वित्तीय संरक्षण दिया. फैजाबाद के सेटिलमेंट कमिश्नर रहे पी कारनेगी ने भी 1870 में लिखी अपनी रिपोर्ट में इस आशय के कई उल्लेख किए हैं. रामकोट क्षेत्र, जहां अयोध्या विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु विवादित परिसर है, उसी के उत्तर में स्थित जन्मस्थान मंदिर 300 वर्ष पुराना है. यह वैष्णवों के तड़गूदड़ संप्रदाय का मंदिर है और कार्नेगी ने लिखा है कि इसके लिए जमीन अवध के नवाब मंसूर अली खान ने दी थी. रामकोट में प्रवेश द्वार पर ही एक टीलेनुमा किले के रूप में दिखती है हनुमानगढ़ी. सीढ़ियां देख लीजिए तो लगता है जैसे पहाड़ी पर चढ़ना है. हनुमानगढ़ी को नवाबों के समय में दी गई भूमि पर बनाया गया था और आसफुदौला के नायब वजीर राजा टिकैतराय ने इसे राजकोष के धन से बनवाया. आज भी यहां फारसी में लिपिबद्ध पंचायती व्यवस्था चल रही है. जिसका मुखिया गद्दीनशीन कहलाता है. इस समय रमेशदास जी इसके गद्दीनशीन हैं. हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने 2003 में अयोध्या के इतिहास में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन करके हिन्दू-मुसलिम के बीच अयोध्या आंदोलन के फलस्वरूप आई कुछ दूरियों को समाप्त करने के लिए एक नया अध्याय खोला और इसके बाद सादिक खां उर्फ बाबू टेलर ने मस्जिद परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ कराकर अवध की उसी गंगा-जमुनी तहजीब का परिचय दिया जिसका अयोध्या भी एक हिस्सा है.

हनुमानगढ़ी के महंत, षटदर्शन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं कि नागापनी संस्कार में उनके गुरू द्वारा बताया गया था कि अवध के नवाब आसफुदौला और सूबेदार मंसूर अली खान के समय में मंदिर को दान मिला था. महन्त ज्ञानदास फारसी में लिखे उस फरमान को दिखाते हैं जिसके अनुसार मंदिर को दान मिला. वे कहते हैं, ‘जहां तक मुझे ज्ञात है कि नवाब के नायब नवल राय द्वारा अयोध्या के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ. बाबा अभयराम दास को भी नवाबों के काल में भूमि दी गई थी.’

इसी अयोध्या में बाबर के समकालीन मुसलिम शासकों ने दंतधावन कुंड से लगे अचारी मंदिर जिसे दंतधावनकुण्ड मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, को पांच सौ बीघे जमीन ठाकुर के भोग, राग, आरती के लिए दान में दी थी. महंत नारायणाचारी बताते हैं कि अंग्रेजों ने भी इस जमीन पर मंदिर का मालिकाना हक बरकरार रखा और जमीन को राजस्व कर से भी मुक्त रखा, इस शर्त पर कि मंदिर द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोई कार्य नहीं किया जाएगा.

अयोध्या में ही उदासीन संप्रदाय का नानकशाही रानोपाली मंदिर भी है. यह वही मंदिर है जिसकी चौखट पर ऐतिहासिक ‘धनदेव’ शिलालेख जड़ा है जिसमें पुष्यमित्र के वंशजों द्वारा यहां एक ऐतिहासिक यज्ञ करने का वर्णन है. इस मंदिर का क्षेत्र ही इतना बड़ा है कि मंदिर परिसर के अंदर खेती भी होती है. तहलका ने कुछ साल पहले जब यहां महंत दामोदरदास से मुलाकात की थी तो उन्होंने नवाब आसफुद्दौला का एक दस्तावेज दिखाया था जो फारसी में लिखा था. उन्होंने बताया था, ‘नवाब ने मंदिर के लिए एक हजार बीघे जमीन दान में दी थी लेकिन इसकी जानकारी हमें नहीं थी. 1950 में इसका पता चला जब महंत केशवदास से मार्तंड नैयर और शकुंतला नैयर ने मंदिर की जमीन का बैनामा करा लिया. मामला आगे बढ़ा तो पता चला कि यह तो हो ही नहीं सकता क्योंकि जमीन दान की थी उसी दौरान हमें आसफुद्दौला की ग्राण्ट का यह प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था जिसे कोर्ट में लगाया गया और बैनामा खारिज हुआ. कोर्ट ने कहा कि दान की भूमि को बेचा नहीं जा सकता.’ गौरतलब है कि शकुंतला नैयर तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नैयर की पत्नी तथा मार्तंड नैयर उनके बेटे थे. केकेके नैयर के समय ही 22/23 दिसंबर 1949 को मूर्तियां बाबरी मस्जिद के अंदर रखी गई थीं. बाद में ये पति-पत्नी जनसंघ के टिकट पर सांसद भी निर्वाचित हुए थे.

सरयू किनारे स्थित लक्ष्मण किले के बारे में उल्लेख मिलता है कि यह मुबारक अली खान नाम के एक प्रभावशाली व्यक्ति ने बनवाया था. यह अब रसिक संप्रदाय का मंदिर है जिसके अनुयायी  रासलीलानुकरण को अपनी उपासना के अंग के रूप में मान्यता देते हैं. अयोध्या-फैजाबाद दो जुड़वां शहर हैं. फैजाबाद नवाबों की पहली राजधानी रही है. गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रभाव फैजाबाद की दुर्गापूजा पर भी दिखता है जब चौक घंटाघर की मस्जिद से दुर्गा प्रतिमाओं के जुलूस पर फूलों की वर्षा की जाती है. यह परंपरा कब शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन यह उसी रूप में आज भी जारी है.

अयोध्या में हिन्दू-मुस्लिमों के अटूट रिश्तों का जीवंत उदाहरण

अयोध्या। पूरे देश को झकझोर कर रख देने वाली अयोध्या की छह दिसम्बर 1992 को विवादित ढांचा ढहने की घटना के बाद भी यहां हिन्दू-मुस्लिमों के अटूट रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पडा़ है जिसके कई जीवंत उदाहरण अभी भी मौजूद हैं।

विवादित ढांचा ध्वस्त होने के बाद देश के कई हिस्सों में खूनखराबा हुआ था। यहां भी कुछ लोगों की जान गई, इसके बावजूद हिन्दू मुसलमानों के अटूट रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पडा़। दुनिया की नजरों में संवेदनशील बन गया यह धार्मिक शहर आज भी गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश दे रहा है।

अयोध्या से सटे मुमताज नगर के करीब दस साल तक ग्राम प्रधान रहने वाले डॉक्टर मेराज हों या अधिग्रहीत परिसर से सटे कजियाना मोहल्ले के अनीस। इन लोगों के साथ ही कई ऐसे लोग हैं जो न सिर्फ मिलजुल कर रहने की संस्कृति को बढा़ रहे हैं बल्कि भाईचारे की अनूठी मिसाल बन गए हैं।

पूरे क्षेत्र में मुमताज नगर की रामलीला मशहूर है। इस रामलीला कमेटी के संयोजक डॉक्टर मेराज हैं। छह दिसम्बर 1992 की घटना से पैदा हुई टीस भी उन्हें उनके इरादे से डिगा नहीं सकी और वह आज भी सफलतापूर्वक रामलीला आयोजित करा रहे हैं।

हिंदुओं से भाईचारा, खानपान… अयोध्या की कहानी हाशिम अंसारी की जुबानी

63 साल से बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे 93 वर्षीय हाशिम गज़ब के आदमी हैं. स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए. जब भी उनके घर जाएंगे, हमेशा अड़ोस पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिलेंगे.

हाशिम कहते हैं, “मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ़्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाईचारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ.”

विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के राम केवल दास और दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही. परमहंस और हाशिम तो अक्सर एक ही रिक्शे या कार में बैठकर मुक़दमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही चाय-नाश्ता करते थे.

उनके ये दोनों दोस्त अब जीवित नहीं रहे. मुक़दमे के एक और वादी भगवान सिंह विशारद भी नहीं रहे. हाशिम के समकालीन लोगों में निर्मोही अखाड़ा की ओर से मुक़दमे के मुख्य पैरोकार महंत भास्कर दास जीवित हैं.

अयोध्या में फूल बन रहे मजहबी एकता की मिसाल

फूलों से जेहन में खुशबू का अहसास होता है, लेकिन अयोध्या में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग इन्हीं फूलों के जरिए कौमी एकता का एक खूबसूरत पैगाम भी दे रहे हैं। इनके द्वारा बनाई गईं फूल की मालाएं श्रद्धालु यहां के मंदिरों में पूरे भक्ति भाव से अर्पित करते हैं।

अयोध्या के अशर्फी भवन के पास रहने वाले करीब 15 मुस्लिम परिवार दशकों से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए फूलों के हार-मालाएं व अन्य सजावटी सामान बनाने का काम कर रहे हैं। 40 साल के अशरफ अली ने कहा कि मंदिरों के लिए फूल-मालाएं बनाने का काम हमारे यहां पीढ़ियों से चला आ रहा है। हिंदू-देवी देवताओं के लिए मुसलमानों का फूलों की मालाएं बनाना बाहर के लोगों के लिए अनोखी बात होगी, लेकिन अयोध्या के लोगों के लिए यह सामान्य बात है।

उन्होंने कहा कि हिंदू श्रद्धालु या तो हम से सीधे संपर्क करके फूलों के हार व अन्य सजावटी सामान खरीद लेते हैं या वे मंदिरों के बाहर लगने वाले फूलों की दुकानों से खरीददारी करते हैं। इन दुकानों पर हम लोग फूलों की आपूर्ति करते हैं। धार्मिक त्योहारों के दौरान जब बड़ी मात्रा में फूल-मालाओं की आवश्यकता होती है तो उस समय विभिन्न मंदिरों के पुजारी भी हमसे संपर्क करके आर्डर देते हैं।

कई मुस्लिम परिवारों के खुद के फूलों के बागीचे हैं तो कुछ मालाएं बनाने के लिए बाहर से भी फूल खरीदकर लाते हैं। ज्यादा मुनाफा वाला व्यवसाय न होने के बावजूद ये लोग इससे लगातार जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि हिंदू श्रद्धालुओं के लिए मालाएं बनाना अब उनके लिए एक व्यवसाय से ज्यादा जिम्मेदारी बन गई है

यहां के निवासी सलीम के मुताबिक वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि ईश्वर ने उन्हें श्रद्धालुओं की मदद करने वाला काम सौंपा है। फूल की मालाएं बनाने वाले मुस्लिम परिवार रोज 200 से 250 रुपये कमाते हैं, लेकिन उत्सव के दौरान उनकी कमाई बढ़ जाती है। फूल व्यवसायी महताब ने बताया कि वह धार्मिक त्योहारों और उत्सवों के दौरान आम दिनों के मुकाबले दो से तीन गुना कमाई कर लेते हैं। अयोध्या मामले पर मालिकाना हक को लेकर आने वाले अदालत के फैसले के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि फैसले से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

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तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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One Response to राम मंदिर आंदोलन की पूरी कहानी…

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