तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि- 31 जुलाई

कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया

साहिल पुकारता है, समंदर चला गया।

लेकिन जो बात सच है, वो कहता नहीं कोई

दुनिया से मौसकी का, पयम्बर चला गया॥

यह पंक्तियां संगीतकार नौशाद ने उस समय कही थी, जब इस सदी के मशहूर गायक स्व. मोहम्मद रफी को दफनाया जा रहा था।

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31 जुलाई का महसूस दिन मोहम्मद रफी को उनके चाहने वालों के बीच से बड़ी बेदर्दी से खींच ले गया। उनका जाना संगीत संसार के एक अनुपम स्वर का रूठ जाना था। एक गहरी खामोशी फिजा में तारी हो गई, कोई नश्तर-सा दिल में टूटकर रह गया। रफी साहब अनजाने सफर को निकल गए। एक ऐसी खनकती आवाज जैसे तराशे गए हीरो की इन्द्रधनुषी रोशनी बिखर गई हो। एक ऐसी कशिश भरी सदा जिसके पीछे मन दौड़ने लगता था। साहिर के शब्दों में :रफी आवाज से अभिनय करते थे

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‘ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले…’ को छटपटाहट, ‘छू’ लेने दो नाजुक होठों को…’ की बेचैन खुमारी, ‘सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आयोगे…’ का थका हुआ इंतजार, ‘ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया…’ का वैराग्य ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए…’ की जवान सुलगन, ‘दोनों ने किया था प्यार मगर…’ का आर्तनाद, ‘मन तड़पत हरि दरशन को…’ का निरगुनिया मन, ‘ये जिन्दगी के मेले दुनिया में कम ना होंगे…’की तड़पा देने वाली टीस, ‘रंग और नूर की बारात…’ की खामोश हसरत, ‘यहां मैं अजनबी हूं…’ का हिन्दुस्तानीपन, ‘कही एक नाजुक सी लड़की…’ का कमसिन शबाब, पुकारता चला हूं मैं…की मस्त सदा, ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना…’का गमें जुदाई, ‘मैं जिन्दगी में हरदम रोता ही रहा हूं…’ की तड़प, गोया हर गीत का रंग अपने आप में बेकरार कर देने वाला, दिल में उतर जाने वाला और जन्नत की सैर करा देने वाला है।

इसके अलावा कुछ काफी पुराने गीत ऐसे भी हैं जिन पर समय की धूल नहीं चढ़ी बल्कि वे और आबदार हो गए। एक अवसर पर स्वयं मोहम्मद रफी ने कहा था- ‘मुझे इस मुकाम पर पहुंचाने में बहुत से लोगों का हाथ रहा है।’

एक फकीर ने रफी को लत लगा दी

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आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्लेबैक गायन करने की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी… और बडे़ भाई ने उनके मन में संगीत प्रेम को पहचाना.

पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव (अमृतसर के पास) में 24 दिसंबर 1924 को एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्में रफी एक फकीर के गीतों को सुना करते थे, जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया। रफी के बडे़ भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन में संगीत के प्रति बढ़ते रुझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने में प्रेरित किया।

जब रफी महज 2 वर्ष के थे तभी उनका परिवार लाहौर आकर रहने लगा। सुल्तानपुर (लाहौर) में उनके दरवाजे पर एक फकीर गाते हुए खैरात माँगने आता जिसे सुन नन्हे रफी में भी गाने का शौक जागा। जब रफ़ी छोटे थे तब इनके बड़े भाई की नाई दुकान थी, रफ़ी का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था। रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी को पसन्द आई और रफ़ी उसकी नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी। लोग नाई दुकान में उनके गाने की प्रशंसा करने लगे।

फकीरी गीत गाते वक्त उनके दिल में खास भक्तिभाव होता था जिसकी वजह एक फकीरी संस्कार रहा। वे उसके गीत गाने लगे। फकीर बहुत खुश हुआ और 6 साल के रफी को आशीर्वाद दिया, “बेटा एक दिन तू बहुत बड़ा गायक बनेगा”।

इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा।

13 साल की उम्र में पहला स्टेज शो

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  • लाहौर में रफी संगीत की शिक्षा उस्ताद अव्दुल वाहिद खान से लेने लगे और साथ ही उन्होंने गुलाम अली खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शरू कर दिया। एक बार भाई मोहम्मद हमीद रफी को लेकर केएल सहगल के संगीत कार्यक्रम में गये। लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण केएल सहगल ने गाने से इंकार कर दिया।
  • हमीद ने कार्यक्रम के संचालक से गुजारिश की वह उनके भाई रफी को गाने का मौका दें। रफी को 13 वर्ष की आयु में पहली बार कुंदन लाल सहगल के लाहौर-शो में गाने का अवसर मिला। रफी की मधुर आवाज़ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उस प्रोग्राम में प्रसिद्ध संगीत निर्देशक श्याम सुंदर भी थे।  उन्होंने रफी को अपनी पंजाबी फिल्म गुल-बलोच में सर्वप्रथम पाश्र्व-गायन का ऑफर दिया। यह गाना रफी का ज़ीनत बेगम के साथ एक युगल गीत था, जिसके बोल थे : नी सोहनिये नी हीरिये तेरी याद ने…। रफी साहिब की गायन-प्रतिभा को पहचानते हुए, संगीतकार फिरोज़ निज़ामी ने रफी को आल इंडिया रेडियो, लाहौर में नौकरी दिलवा दी। परंतु एक गायक बनने का सपना संजोये, रफी की अंतिम मंजिल तो मुंबई थी।
  • श्याम सुदंर के संगीत निर्देशन में रफी ने अपना पहला गाना ‘सोनिये नी हिरीये नी’ पार्श्व गायिका जीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फिल्म गुल बलोच के लिये गाया। वर्ष 1944 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्हें अपना पहला हिन्दी गाना ‘हिन्दुस्तान के हम हैं’ फिल्म पहले आप के लिये गाया।

आखिरकार 1944 में रफी नौशाद साहिब के नाम एक सिफारशी पत्र लेकर मुंबई आ गए। नौशाद ने हिन्दी फिल्म पहले आप में रफी को गवाया और इस गाने के लिए रफी को 50 रुपये मेहनताना मिला था। इस प्रकार रफी साहिब का संघर्षपूर्ण फिल्मी सफर शुरू हो गया। उन्हें प्रथम सफलता फिल्म जुगनू के गीत बदला यहां वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है… से मिली थी और वह हिन्दी फिल्मों के मशहूर गायक बन गए। कोटला सुल्तान सिंह का फीकू अब मोहम्मद रफी बन चुका था।

संघर्ष के दौर में कई लोग रफी के हमदर्द बने और उनकी मखमली आवाज का नशा अवाम के सर चढ़कर बोलने लगा। उनकी आवाज का जादू असर करता गया और वे मौसकी के मोती दामन में भरते गए। परिवार का सहयोग, प्रतिभा का धधकता ज्वालामुखी, चढ़ती जवानी का जोश और ऊपर वाले की मेहरबानी। रफी पहले रफ्ता-रफ्ता और फिर पूरी तेजी से बढ़ते चले गए।

रफी की आवाज परदे पर अभिनय करने वाले पात्रों में पूरी तरह घुल जाती थी। कभी लगता दिलीप कुमार ही गा रहे हैं, जॉनी वॉकर की ही आवाज है। कुछ फिल्में उनके गायन के बूते पर सिनेमा इतिहास में अमर हो गई। आज भी ‘बारादरी’, ‘कोहिनूर’, ‘उड़न खटोला’, ‘महुआ’, ‘ताज महल’, ‘मेला’, ‘अमर’, ‘मुझे जीने दो’, ‘बरसात’, ‘चिराग’, ‘प्यासा’, ‘नया दौर’ और जाने कितनी फिल्में हैं जो अपने मीठे सदाबहार गानों के लिए रफी की खनकती आवाज के लिए रहती दुनिया तक याद की जाती रहेंगी।

एक पार्श्व गायक के लिए जो प्यार-श्रध्दा उनकी अंतिम यात्रा के दौरान उमड़े जनसमूह में देखी गई, वैसी किसी स्टार को भी नसीब नहीं होती। जब तक दुनिया रहेगी संगीत के हसीन जलसे चलेंगे, तब तक उनकी अमर आवाज गूंजती रहेगी। आज उन्हीं के गाये शब्द याद आते हैं। ‘जाने वाले कभी नहीं आते जाने वालों की याद आती है…।’

अब्बा ने कहा “भूल आऊंगा रफी नाम का बेटा था”

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हिन्दी फिल्मों के हरदिल अजीज पार्श्वगायक मोहम्मद रफी बचपन से ही गायक बनने का ख्वाब देखा करते थे. इस धुन में उन्हें कुछ और नहीं सूझता था. घरवालों के लाख समझाने पर भी जब वह नहीं माने और अपने सपने को पूरा करने के लिए मुम्बई आने की ठान ली तो उनके अब्बा अली मोहम्मद ने भारी दिल से उन्हें विदा करते हुए कहा था “अगर तुम कामयाबी हासिल नहीं कर सके तो घर नहीं लौटना. मैं भूल जाऊंगा कि रफी नाम का मेरा कोई बेटा भी था.” बाद में रफी गायक के रूप में जब कामयाब हो गए और उनकी शोहरत का डंका चारों ओर बजने लगा तब उनके अब्बा बहुत खुश हुए और मुम्बई आकर उन्हें अपना आशीर्वाद दिया.

700 फिल्में, 5000 गाने

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From available figures, Rafi sang 4,525 Hindi film songs till his death in 1980, which were more than the number of songs sung by Mangeshkar till 1980. If you add his 112 non-Hindi film songs and 328 private non-film songs that have been documented, the total becomes 4,965 songs. So the truth is that Rafi never went beyond 5,000 songs (if we take into account some songs that were not documented). (Source: HT)

  • वर्ष 1949 मे नौशाद के संगीत निर्देशन मे दुलारी फिल्म में गाये गीत ‘सुहानी रात ढ़ल चुकी’ के जरिये रफी सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच गये और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  • दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, शशि कपूर, राजकुमार जैसे नामचीन नायकों की आवाज कहे जाने लगे।
  • मोहम्मद रफी ने हिन्दी फिल्मों के अलावे मराठी और तेलगू फिल्मों के लिये भी गाने गाये। मोहम्मद रफी अपने करियर में 6 बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किये गये।
  • रफी ने मात्र नौशाद के लिए कुल 149 गाने गाए. इनमें 81 गीत रफी के सोलो थे।
  • रफी ने सबसे अधिक गाने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए गाए [369 गाने]
  • लता मंगेशकर के साथ 315 फिल्मों में 414 गाने गाए थे।

1950 के दशक में शंकर जयकिशन, नौशाद तथा सचिनदेव बर्मन ने रफ़ी से उस समय के बहुत लोकप्रिय गीत गवाए। यह सिलसिला 1960 के दशक में भी चलता रहा। संगीतकार रवि ने मोहम्मद रफ़ी का इस्तेमाल 1960 के दशक में किया। 1960 में फ़िल्म चौदहवीं का चांद के शीर्षक गीत के लिए रफ़ी को अपना पहला फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद घराना (1961), काजल (1965), दो बदन (1966) तथा नीलकमल (1968) जैसी फिल्मो में इन दोनो की जोड़ी ने कई यादगार नगमें दिए। 1961 में रफ़ी को अपना दूसरा फ़िल्मफेयर आवार्ड फ़िल्म ससुराल के गीत तेरी प्यारी प्यारी सूरत को के लिए मिला। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपना आगाज़ ही रफ़ी के स्वर से किया और 1963 में फ़िल्म पारसमणि के लिए बहुत सुन्दर गीत बनाए। इनमें सलामत रहो तथा वो जब याद आये (लता मंगेशकर के साथ) उल्लेखनीय है। 1965 में ही लक्ष्मी-प्यारे के संगीत निर्देशन में फ़िल्म दोस्ती के लिए गाए गीत चाहूंगा मै तुझे सांझ सवेरे के लिए रफ़ी को तीसरा फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा।

1965 में संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी द्वारा फ़िल्म जब जब फूल खिले के लिए संगीतबद्ध गीत परदेसियों से ना अखियां मिलाना लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंच गया था। 1966 में फ़िल्म सूरज के गीत बहारों फूल बरसाओ बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके लिए उन्हें चौथा फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला। इसका संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। 1968 में शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ब्रह्मचारी के गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर के लिए उन्हें पाचवां फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला।

1960 के दशक में अपने करियर के शीर्ष पर पहुंचने के बाद दशक का अन्त उनके लिए सुखद नहीं रहा। 1969 में शक्ति सामंत अपनी एक फ़िल्म आराधना का निर्माण करवा रहे थे जिसके लिए उन्होने सचिन देव बर्मन (जिन्हे दादा नाम से भी जाना जाता था) को संगीतकार चुना। इसी साल दादा बीमार पड़ गए और उन्होने अपने पुत्र राहुल देव बर्मन= अवरोहन == 1960 के दशक में अपने करियर के शीर्ष पर पहुंचने के बाद दशक का अन्त उनके लिए सुखद नहीं रहा। 1969 में शक्ति सामंत अपनी एक फ़िल्म आराधना का निर्माण करवा रहे थे जिसके लिए उन्होने सचिन देव बर्मन (जिन्हे दादा नाम से भी जाना जाता था) को संगीतकार चुना। इसी साल दादा बीमार पड़ गए और उन्होने अपने पुत्र राहुल देव बर्मन(पंचमदा) से गाने रेकार्ड करवाने को कहा। उस समय रफ़ी हज के लिए गए हुए थे। पंचमदा को अपने प्रिय गायक किशोर कुमार से गवाने का मौका मिला और उन्होने रूप तेरा मस्ताना तथा मेरे सपनों की रानी गाने किशोर दा की आवाज में रेकॉर्ड करवाया। ये दोनो गाने बहुत ही लोकप्रिय हुए और इस गाने के अभिनेता राजेश खन्ना निर्देशकों तथा जनता के बीच अपार लोकप्रिय हुए। साथ ही गायक किशोर कुमार भी जनता तथा संगीत निर्देशकों की पहली पसन्द बन गए। इसके बाद रफ़ी के गायक जीवन का अवसान आरंभ हुआ। हँलांकि इसके बाद भी उन्होने कई हिट गाने दिये, जैसे ये दुनिया ये महफिल, ये जो चिलमन है, तुम जो मिल गए हो। 1977 में फ़िल्म हम किसी से कम नहीं के गीत क्या हुआ तेरा वादा के लिए उन्हे अपने जीवन का छठा तथा अन्तिम फ़िल्म फेयर एवॉर्ड मिला।

एक-दो बार उन्होंने कैमरे का सामना किया, लेकिन वह भी फिल्म ‘लैला मजनूं’ में तेरा जलवा जिसने देखा… गीत में स्वर्णलता और नजीर के साथ समूह में। इसके अलावा कुछ पलों के रोल के लिए फिल्म ‘जुगनू’ में भी वह दिखाई पड़े, लेकिन इसके बाद उन्होंने कभी कैमरे के सामने आने की इच्छा नहीं जताई।

जिन अभिनेताओं के लिए पार्श्वगायन किया

अमिताभ बच्चन, अशोक कुमार, आइ एस जौहर, ऋषि कपूर, किशोर कुमार, गुरु दत्त, गुलशन बावरा, जगदीप, जीतेन्द्र, जॉय मुखर्जी, जॉनी वाकर, तारिक हुसैन, देव आनन्द, दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र, नवीन निश्छल, प्राण, परीक्षित साहनी, पृथ्वीराज कपूर, प्रदीप कुमार, फ़िरोज ख़ान, बलराज साहनी, भरत भूषण, मनोज कुमार, महमूद, रणधीर कपूर, राजकपूर, राज कुमार, राजेन्द्र कुमार, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, विनोद मेहरा, विश्वजीत, सुनील दत्त, संजय खान,संजीव कुमार, शम्मी कपूर, शशि कपूर, किशोर कुमार ।

अन्य भाषाओं में

एन टी रामा राव (तेलगू फिल्म भाले तुम्मडु तथा आराधना के लिए), अक्किनेनी नागेश्वर राव (हिन्दी फिल्म – सुवर्ण सुन्दरी के लिए)

रफी को अल्लाह की देन थी कि वह हर प्रकार के गीत, ग़ज़ल, न गमें, कव्वाली और राग आदि सहजत्ता से गा सकते थे। र फी की आवाज़ का जादू सुनने वालों के सिर चढ़ कर बोलता था। रफी ने अपने चार दशक के गायन कॅरिअर के दौरान हिन्दी, उर्दू, पंजाबी के अतिरिक्त भारत और विश्व की बहुत सी भाषाओं (कोंकणी, भोजपुरी, ओडिआ, बंगाली, मराठी, सिन्धी, कन्नड़, गुजराती, तेलुगू, मैथिली, असमी, अंग्रेज़ी, फारसी, स्पैनिश व डच आदि) में गाने गाये हैं।

योडिलिंग की शुरूआत

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बॉलीवुड में बार बार पिच बदल कर गाने यानी योडिलिंग की शुरूआत रफ़ी ने ही पाश्र्वगायन के दौरान की थी। उनके कुछ पुराने गीत ‘हैलो स्वीट सेवेन्टीन’ ‘ओ चले हो कहाँ’, ‘दिल के आइने में’ और ‘उनसे रिप्पी टिप्पी हो गयी’ इसके उदाहरण हैं।

ऑल इंडिया रेडियो लाहौर में बिजली गुल हो गई और रफी की रौशन हो गई…

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एक बार आकाशवाणी (उस समय ऑल इंडिया रेडियो) लाहौर में उस समय के प्रख्यात गायक-अभिनेता कुन्दन लाल सहगल अपना प्रदर्शन करने आए थे। इसको सुनने हेतु मोहम्मद रफ़ी और उनके बड़े भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया की भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए मोहम्मद रफ़ी को गाने का मौका दिया जाय। उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफ़ी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था। प्रेक्षकों में श्याम सुन्दर, जो उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे, ने भी उनको सुना और काफी प्रभावित हुए। उन्होने मोहम्मद रफ़ी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया। 

बड़े संगीतकारों की संगत में ख्याति निखरती ही गई..

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संगीतकार नौशाद के साथ तो रफी का ताउम्र अटूट संबंध रहा और उनकी कुछ फिल्मों को छोड़कर लगभग सभी फिल्मों के लिए उन्होंने गाने गाए. संगीतकार ओपी नैयर उनके घनिष्ठ मित्र थे और अपनी लगभग हर फिल्म के लिए उन्होंने रफी से ही गाने गवाए. हालांकि रफी मितुभाषी और कुछ ही लफ्जों में अपनी बात कहने वाले इंसान थे और शिष्ट हास-परिहास करते थे, लेकिन नैयर के साथ उनकी बातचीत में गालियां चलती थीं. रफी अपने काम के दौरान कभी इस बात का ख्याल नहीं रखते थे कि संगीतकार बड़ा है या छोटा. वह पूरी ईमानदारी के साथ गाने पर ही ध्यान देते हुए उसे बेहतर से बेहतर बनाने की कोशिश में लगे रहते थे. कई बार ऐसा भी होता था कि नये संगीतकार के पास उन्हें देने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, ऐसी स्थिति में वह बिना कुछ लिए उसके लिए गाने गा दिया करते थे. संबंधों का भी वह बड़ा ख्याल रखते थे. अपने साथी गायक किशोर कुमार की फिल्म ‘शाबाश डैडी’ में गीत गाने के लिए उन्होंने टोकन के रूप में सिर्फ एक रूपए लिए थे. एक बार का वाकया है. संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल अपनी पहली फिल्म “छैला बाबू” के लिए एक गजल “तेरे प्यार ने मुझे गम दिया, तेरे गम की उम्र दराज हो” गीत गाने का अनुरोध लेकर उनके पास पहुंचे और कहा कि उनके पास उन्हें देने के लिए पर्याप्त राशि नहीं है. रफी यह सुनने के बाद भी गजल गाने के लिए तुरंत राजी हो गए. रिकार्डिंग के बाद फिल्म निर्माता ने रफी को एक हजार रूपए दिए. जिसे उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को देते हुए कहा “जाओ, तुम दोनों इससे कुछ मिठाई खरीद लाओ. यह तुम्हारी सुंदर संगीत रचना के लिए इनाम है. रफी अपने काम के लिए कितने समर्पित थे. यह बात इस वाकये से पता चलती है. साठ के दशक के आखिरी समय में रफी एक शो के लिए विदेश जाने वाले थे. इससे एक दिन पहले लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने उनसे कहा कि यदि वह उनके गीतों की रिकार्डिंग किए बिना विदेश चले गए तो उनकी दो फिल्में दो महीने लेट हो जाएंगी. वह रफी से एक ही दिन में पांच या छह गीतों की रिकार्डिंग कराना चाहते थे. ऐसी स्थिति में रफी ने अगले दिन सुबह दस से रात ग्यारह बजे तक ताडदेव के फेमस लैब्स में उन गीतों की रिकार्डिंग करायी.

नौशाद द्वारा सुरबद्ध गीत तेरा खिलौना टूटा (फ़िल्म अनमोल घड़ी, 1946) से रफ़ी को प्रथम बार हिन्दी जगत में ख्याति मिली।

इसके बाद शहीद, मेला तथा दुलारी में भी रफ़ी ने गाने गाए जो बहुत प्रसिद्ध हुए।

नौशाद ने तलत महमूद को सिगरेट पीने के कारण रिजेक्ट कर दिया रफी को ले लिया…

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1951 में जब नौशाद फ़िल्म बैजू बावरा के लिए गाने बना रहे थे तो उन्होने अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद से गवाने की सोची थी। कहा जाता है कि उन्होने एक बार तलत महमूद को धूम्रपान करते देखकर अपना मन बदल लिया और रफ़ी से गाने को कहा। बैजू बावरा के गानों ने रफ़ी को मुख्यधारा गायक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद नौशाद ने रफ़ी को अपने निर्देशन में कई गीत गाने को दिए।

संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को उनकी आवाज पसंद आयी और उन्होंने भी रफ़ी से गाने गवाना आरंभ किया। शंकर जयकिशन उस समय राज कपूर के पसंदीदा संगीतकार थे, पर राज कपूर अपने लिए सिर्फ मुकेश की आवाज पसन्द करते थे। बाद में जब शंकर जयकिशन के गानों की मांग बढ़ी तो उन्होंने लगभग हर जगह रफ़ी साहब का प्रयोग किया। यहाँ तक की कई बार राज कपूर के लिए रफी साहब ने गाया।

संगीतकार सचिन देव बर्मन तथा उल्लेखनीय रूप से ओ पी नैय्यर को रफ़ी की आवाज़ बहुत रास आयी और उन्होने रफ़ी से गवाना आरंभ किया।

ओ पी नैय्यर का नाम इसमें स्मरणीय रहेगा क्योंकि उन्होने अपने निराले अंदाज में रफ़ी-आशा की जोड़ी का काफी प्रयोग किया और उनकी खनकती धुनें आज भी उस जमाने के अन्य संगीतकारों से अलग प्रतीत होती हैं। उनके निर्देशन में गाए गानो से रफ़ी को बहुत ख्याति मिली।

अन्य संगीतकारों

रवि, मदन मोहन, गुलाम हैदर, जयदेव, सलिल चौधरी इत्यादि संगीतकारों की पहली पसंद रफ़ी साहब बन गए।

शम्मी कपूर तो रफ़ी की आवाज से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने अपने हर गाने में रफ़ी का इस्तेमाल किया।

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उनके लिए संगीत कभी ओ पी नैय्यर ने दिया तो कभी शंकर जयकिशन ने पर आवाज रफ़ी की ही रही।

  • चाहे कोई मुझे जंगली कहे (जंगली),
  • एहसान तेरा होगा मुझपर (जंगली),
  • ये चांद सा रोशन चेहरा (कश्मीर की कली),
  • दीवाना हुआ बादल (आशा भोंसले के साथ, कश्मीर की कली) शम्मी कपूर के ऊपर फिल्माए गए लोकप्रिय गानों में शामिल हैं।

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मोहम्मद रफी के बारे में अक्सर “एक अनार और सौ बीमार” की कहावत कही जाती थी. फिल्म जगत् का हर संगीतकार और अभिनेता चाहता था कि वह उसके लिए गाएं और विनम्र और सादे स्वभाव के रफी से कभी कहते नहीं बनता था. हालांकि अपनी इस आदत की वजह से वह कभी- कभी मुश्किल में भी पड़ जाते थे, लेकिन न कहना उनके स्वभाव में ही नहीं था. रफी ने दिलीप कुमार जैसे बड़े अभिनेता से लेकर सुधीर कुमार जैसे छोटे अभिनेता के लिए गाया, लेकिन शम्मी कपूर के साथ उनकी ट्यूनिंग अद्भुत थी. यद्यपि हर अभिनेता के लिए उनकी आवाज माकूल थी, लेकिन शम्मी कपूर के लिए गाते समय उनकी आवाज कुछ अलग ही अंदाज अपना लेती थी. ब्रह्मचारी फिल्म के लिए “दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर” गीत की रिर्काडिंग थी. अभिनेता शम्मी कपूर ने रफी को सुझाव दिया कि यदि वह इस गीत के मुखड़े को एक ही सांस में गाएं तो गीत में अनूठापन आ जाएगा. रफी ने उनके इस सुझाव को मानते हुए मुखड़े को एक ही सांस में गा दिया. इस पर शम्मी कपूर हक्के-बक्के होकर उन्हें देखते रह गए. रफी ने तब चुटकी लेते हुए कहा “अब तुम क्या चाहते हो कि मैं गाना गाऊं या यह चाहते हो कि मैं सांस लेना बंद कर दूं. जिंदा रहने पर ही मैं गा पाऊंगा. इस पर वहां मौजूद सभी लोग ठठाकर हंस पड़े.

रफी के व्यक्तित्व के बारे में उनके पुत्र शाहिद कहते हैं ‘वे बहुत शांत एवं धीर-गम्भीर प्रवृत्ति के इंसान थे। जब कभी हम उनसे पूछते कि क्या आपने सचमुच ‘याऽऽऽहू…’ जैसा जोशीला गीत गाया है तो वे सिर्फ मुस्करा देते थे।’ एक तरफ रफी शम्मी कपूर के लिए जोशीले अंदाज में ‘याऽऽऽहू…’ गाते हैं, वहीं दूसरी ओर इसी फिल्म (जंगली) में अपने चिरपरिचित सॉफ्ट अन्दाज में ‘एहसान तेरा होगा मुझ पर…’ भी गाते हैं, सचमुच ये उत्कृष्ट प्रतिभा का ही उदाहारण है।

रफी ने हर मूड के गाने बखूबी गाए

रफी जब भी कोई गीत गाते तो वे उस चरित्र में अपने आप को ढाल लेते

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मौका चाहे शादी की खुशी का हो या बेटी की बिदाई का भारी माहौल या रफी साहब ने हर समय के लिए हर मूड के गीत गाकर हमारी संगीत विरासत को इतना समृध्द कर दिया है कि उनके गाए गीत घर परिवार से लेकर मंदिर में गूंजते हैं।

ऐसा कौनसा दुल्हा होगा जिसकी बारात में उसके दोस्तों ने ये देश है वीर जवानों का (फिल्म नया दौर) जैसा गीत गाकर अपनी खुशियों और मस्ती का इजहार नहीं किया होगा, और शादी के बाद बेटी की बिदाई पर बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले जैसा गीत जब गूंजता है तो बेटी को बिदा करने वाले ही नहीं बल्कि बेटी को बहू बनाकर ले जाने वाले दुल्हे के पक्ष के लोगों की आँखों में भी आँसू आ जाते हैं।

  • ‘देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी…’ (कागज के फूल)
  • जॉनी वाकर जैसे कॉमेडियन के लिए ‘तेल मालिश…’ (प्यासा)
  • ‘ये है बॉम्बे मेरी जान…’ (सीआईडी) हो, रफी ने हर गीत के साथ पूरा न्याय किया।
  • शम्मी कपूर के लिए जोशीले अंदाज में ‘याऽऽऽहू…’ गाते हैं, वहीं दूसरी ओर इसी फिल्म (जंगली) में अपने चिरपरिचित सॉफ्ट अन्दाज में
  • ‘एहसान तेरा होगा मुझ पर…’ भी गाते हैं, सचमुच ये उत्कृष्ट प्रतिभा का ही उदाहारण है।

महेन्द्र कपूर के गुरु थे मोहम्मद रफी

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बीबीसी को दिए गए इस साक्षात्कार में महेन्द्र कपूर ने कहा कि जब मैं 13-14 साल का था, तब से मैं रफी साहब के पास जाया करता था। हालांकि रफी साहब बहुत व्यस्त थे, लेकिन जितना हो सकता है उन्होंने मुझे सिखाया।

रफी साहब के भक्ति गीत, धर्मों से ऊपर ..इंसानियत की रूह

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मन तड़पत हरि दर्शन को आज… बैजू बावरा फिल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत मन तपड़त हरिदर्शन को आज..जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था।

नौशाद साहब को अमेरिका दौरे में मिले एक संगीत प्रेमी ने बताया कि वे काशी में विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने रहते हैं, जहाँ रोज सुबह बिला नागा मंदिर के भक्ति संगीत के सुरों में नियमित बजने वाला एक स्वर था “मन तड़पत हरि दर्शन को आज”। आज भी अमेरिका में इसे सुने बगैर उनकी भोर नहीं होती। फिल्म संगीत से उनका जरा भी वास्ता न होने से उन्हें इस बात से कोई वास्ता नहीं था कि यह किस फिल्म का है और इसे किसने गाया है?

इस गीत की फिल्म रही “बैजू बावरा”। भक्ति गीत को गाते वक्त रफी सा. अपना स्वयं का मजहब भूल गीत के भक्तिभाव, मजहब से एकरूप रहे, जो उनके गीतों की खासियत रही।

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वे रोजे व नमाज के सख्त पाबंद रहे..

“संगीता”(1950) के गीत “हुक्के में धुआँ” गाने से इसलिए इंकार किया, क्योंकि रमजान के चलते “भाँग” लफ्ज गाकर वे जुबान नापाक करने को तैयार नहीं थे, तब संगीतकार सी. रामचन्द्र ने ही वह गीत गाया। मोहम्मद रफ़ी को उनके परमार्थो के लिए भी जाना जाता है । अपने शुरुआती दिनों में संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए उन्होने बहुत कम पैसों में गाया था ।

छिपाकर रखी गयी रफी की पहली शादी की बात

Picture18बालीवुड के महानतम पार्श्वगायक माने जाने वाले मोहम्मद रफी ने दो शादियां की थीं. यह बात शायद ही लोगों को मालूम होगी1 उनकी पहली शादी की बात जमाने से छिपाकर रखी गयी थी. सिर्फ उनके घरवालों को ही इस बात की जानकारी थी. रफी की पुत्रवधू यास्मीन खालिद रफी ने हाल में प्रकाशित अपनी पुस्तक.. मोहम्मद रफी. मेरे अब्बा..एक संस्मरण ..में इस बात का जिक्र किया है. उन्होंने लिखा है कि तेरह साल की उम्र में रफी की पहली शादी उनके चाचा की बेटी बशीरन बेगम से हुई थी लेकिन कुछ साल बाद ही उनका तलाक हो गया था. इस विवाह से उनका एक बेटा सईद हुआ था. उनके इस पहले विवाह के बारे में घर में सभी को मालूम था लेकिन बाहरी लोगों से इसे छिपा कर रखा गया था. घर में इस बात का जिक्र करना भी मना था क्योंकि रफी की दूसरी बीवी बिलकिस बेगम इसे नापसंद करती थी और उन्हें बर्दाश्त नहीं था कि कोई इस बारे में बात भी करे. यदि कभी कोई इसकी चर्चा करता भी था तो बिलकिस बेगम और रफी के साले जहीर बारी इसे अफवाह कहकर बात को वहीं दबा देते थे. यास्मीन रफी लिखती हैं कि वह समझ नहीं पाती थीं कि इस बात को छिपाने की क्या जरूरत है. 1944 में बीस साल की उम्र में रफी की दूसरी शादी सिराजुद्दीन अहमद बारी और तालिमुन्निसा की बेटी बिलकिस के साथ हुई. जिनसे उनके तीन बेटे खालिद, हामिद और शाहिद तथा तीन पुत्रियां.. परवीन अहमद. नसरीन अहमद और यास्मीन अहमद हुईं. रफी साहब के तीन बेटों.. सईद, खालिद और हामिद की मौत हो चुकी है. खालिद और हामिद की दिल का दौरा पडने से हुई थी. और सईद की कार दुर्घटना में मौत हुई.

रफी का परिवार… वे अपने पीछे सात संतान [सईद रफी, खालिद रफी, हामिद रफी, शाहिद रफी, परवीन, नसरीन और यास्मीन] और 18 पोते पोतियाँ छोड गए थे.

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पाकिस्तान में जुल्फीकार अली भुट्टो से ज्यादा फेमस

विदेशों में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 70 के दशक में पाकिस्तान में जितने लोकप्रिय मोहम्मद रफी थे उतनी लोकप्रियता वहां के प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो को भी हासिल नही थी।

एक गाने ने मोहम्मद रफी को खासतौर से पाकिस्तान में हर दिल अजीज बना दिया था। फिल्म समझौता का यह गाना बड़ी दूर से आए हैं प्यार का तोहफा लाए है बंटवारे के बाद अपने रिश्तेदारों से बिछडे़ हर पाकिस्तानी की आंख आज भी नम कर देता है। पाकिस्तान में ही नहीं ब्रिटेन, केन्या, वेस्ट इंडीज में भी मोहम्मद रफी के गाने पसंद किए जाते है।

रफी ने अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे कैरियर मे लगभग 26000 फिल्मी और गैर फिल्मी गाने गाए। उन्होने हिन्दी के अलावा मराठी, तेलगू, पंजाबी फिल्मो के गीतो के लिए भी अपना स्वर दिया।

लता से हुई थी रफी की अनबन

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मोहम्मद रफी ने अपने गाए गीत ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया…जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया…’ को बखूबी अपनी जिंदगी में भी उतारा। उनके इस रुख के कारण सुरों की मलिका लता मंगेश्कर के साथ एक बार उनकी बातचीत बंद हो गई थी। रफी साहब ने गाने के एवज में मिलने वाली राशि की कभी परवाह नहीं की। उन्हें निर्माता जितना देते थे वह उसी से संतोष कर लेते थे। लता मंगेश्कर गानों पर रायल्टी की पक्षधर थीं जबकि रफी ने कभी भी रायल्टी की माँग नहीं की। दोनों का विवाद इतना बढ़ा कि रफी साहब और लता के बीच बातचीत भी बंद हो गई।

4 वर्षों तक चले विवाद के कारण दोनों ने एक साथ कोई गीत भी नहीं गाया। 4 वर्ष के बाद नरगिस के प्रयास से दोनों के संबंधों पर जमी बर्फ पिघली और दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में ‘दिल पुकारे…’ गीत गाया।

मोहम्मद रफी ने लता मंगेशकर के साथ सैकड़ो गीत गाये थे, लेकिन एक वक्‍त ऐसा भी आया था जब रफी ने लता से बातचीत तक करनी बंद कर दी थी। लता मंगेशकर गानों पर रायल्टी की पक्षधर थीं, जबकि रफी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की।

रफी साहब मानते थे कि एक बार जब निर्माताओं ने गाने के पैसे दे दिए तो फिर रायल्टी किस बात की मांगी जाए। दोनों के बीच विवाद इतना बढा़ कि मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच बातचीत भी बंद हो गई और दोनों ने एक साथ गीत गाने से इंकार कर दिया। हालांकि चार वर्ष के बाद अभिनेत्री नरगिस के प्रयास से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में ‘दिल पुकारे’ गीत गाया।

दीवार में अमिताभ का अभिनय देखकर वह उनके प्रशंसक बन गए थे। पहली बार बिग बी के लिए गाने के बाद जब रफी साहब घर लौटे तो बिल्कुल बच्चों की तरह उत्साह से लबरेज होकर उन्होंने सबको बिग बी के साथ गाने की पूरी घटना सुनाई। यदा-कदा ही फिल्में देखने वाले रफी साहब को फिल्म शोले काफी पंसद थी और उन्होंने इसे तीन बार देखा था, लेकिन रफी ने कभी कोई फिल्म पूरी नहीं देखी। वह जब भी फिल्म देखने जाते तो फिल्म शुरू होने के कुछ समय बाद थियेटर में घुसते और पूरी होने के थोड़ी देर पहले ही बाहर निकल आते।

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वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म नसीब में रफी को अमिताभ के साथ युगल गीत ‘चल चल मेरे भाई’ गाने का अवसर मिला। अमिताभ के साथ इस गीत को गाने के बाद रफी बेहद खुश हुए थे। जब रफी साहब अपने घर पहुंचे तो उन्होंने अपने परिवार के लोगों को अपने पसंदीदा अभिनेता अमिताभ के साथ गाने की बात को खुश होते हुए बताया था।

अमिताभ के अलावा रफी को शम्मी कपूर और धर्मेन्द्र की फिल्में भी बेहद पसंद आती थी। मोहम्मद रफी को अमिताभ-धर्मेन्द्र की फिल्म शोले बेहद पंसद थी और उन्होंने इसे तीन बार देखा था। अपने आवाज के जादू से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले महान गायक 31 जुलाई 1980 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

शोले देखी तीन बार… अमिताभ के अलावा रफी को शम्मी कपूर और धर्मेन्द्र की फिल्में भी बेहद पसंद आती थी। मोहम्मद रफी को अमिताभ-धर्मेन्द्र की फिल्म शोले बेहद पंसद थी और उन्होंने इसे तीन बार देखा था।

चौकड़ी थी :दिलीपकुमार, नौशाद, जॉनी वाकर और रफ़ी साहब की चौकड़ी थी। हर प्रोग्राम में ये साथ दिखाई देते थे। फिर टेनिस क्लब में तो रोज़ मिलते ही थे। साहब को शिकार का शौक नहीं था, जबकि ये तीनों पक्के शिकारी थे।

जब मोहम्मद रफ़ी साहब ने किशोर कुमार के लिये अपनी आवाज़ दी  Video

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बात 1956 की है हिन्दी फिल्म “रागिनी” के संगीत निर्देशक थे श्री ओ.पी नैय्यर  और इस फ़िल्म में किशोर कुमार, अशोक कुमार और पद्मिनी ने अभिनय  किया था, इसी फ़िल्म “रागिनी”  का एक सीन जिसमें किशोर जी पर एक शास्त्रीय  गीत फ़िल्माया जाना था… तो ऐसी स्थिति में किशोर साहब ने रफ़ी साहब से मिलकर  उस गीत को गाने का आग्रह किया था

रफ़ी साहब को 23 बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए नामित हुए जिनमें 6 बार उन्हें यह पुरस्कार मिला। रफ़ी साहब को मिले नामांकन फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों की सूची:-

Year

Song

Film

Music director

Lyricist

Result

1960 “Chaudhvin Ka Chand Ho” Chaudhvin Ka Chand Ravi Shakeel Badayuni

Won

1961 “Teri Pyaari Pyaari Surat Ko” Sasural Shankar Jaikishan Hasrat Jaipuri

Won

1961 “Husnwale Tera Jawab Nahin” Gharana Ravi Shakeel Badayuni

Nominated

1962 “Aye Gulbadan Aye Gulbadan” Professor Shankar Jaikishan Shailendra

Nominated

1963 “Mere Mehboob Tujhe” Mere Mehboob Naushad Ali Shakeel Badayuni

Nominated

1964 “Chahunga Main Tujhe” Dosti Laxmikant-Pyarelal Majrooh Sultanpuri

Won

1965 “Chhoo Lene Do Nazuk Hothon Ko” Kaajal Ravi Sahir Ludhianvi

Nominated

1966 “Baharo Phool Barsao” Suraj Shankar Jaikishan Shailendra

Won

1968 “Dil Ke Jharoke Mein” Brahmachari Shankar Jaikishan Shailendra

Won

1968 “Mein Gaaon Tum Sojaao” Brahmachari Shankar Jaikishan Shailendra

Nominated

1969 “Badi Mastani Hai” Jeene Ki Raah Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1970 “Khilona Jaan Kar” Khilona Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1973 “Hum Ko To Jaan Se Pyaari” Naina Shankar Jaikishan Hasrat Jaipuri

Nominated

1974 “Achha Hi Huva Dil Toot Gaya” Maa Bahen Aur Biwi Sharda Qamar Jalalabadi, Vedpal Varma

Nominated

1977 “Kya Hua Tera Wada” Hum Kisise Kum Naheen R.D. Burman Majrooh Sultanpuri

Won

1977 Parda Hai Parda Amar Akbar Anthony Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1978 “Aadmi Musaafir Hai” Apnapan Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1979 “Chalo Re Doli Uthao Kahaar” Jaani Dushman Laxmikant-Pyarelal Varma Malik

Nominated

1980 “Mere Dost Kissa Yeh” Dostana Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1980 “Dard-e-dil Dard-e-jigar” Karz Laxmikant-Pyarelal Anand Bakshi

Nominated

1980 “Maine Poocha Chand Se” Abdullah R.D. Burman Anand Bakshi

Nominated

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

Year

Song

Film

Music director

Lyricist

Result

1977 “Kya Hua Tera Wada” Hum Kisise Kum Naheen Rahul Dev Burman Majrooh Sultanpuri

Won

भारत सरकार ने रफ़ी को 1967 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।

सादगी भरा जीवन

रफी साहिब कभी भी सम्मान पाने की चूहा-दौड़ में शामिल नहीं हुए और फिल्मी चकाचौंध से दूर एक सादा जीवन व्यतीत करते थे। वह ना तो कभी फिल्मी पार्टी में जाते थे और न ही शराब/सिगरेट पीते थे। वह तो घर से रिकॉर्डिंग स्टूडियो और वहां से सीधे वापस घर आने  में विश्वास रखते थे। वह प्रात:काल चार बजे उठकर रिआज़ करना कभी नही भूलते थे। मोहम्मद र फी ने बेगम विकलिस से शादी की थी और उनकी सात संतानें हुईं- चार बेटे तथा तीन बेटियां। मोहम्मद रफी को बैडमिंटन व कैरम खेलने का बड़ा शौक था। रफी साहिब को जब भी मौका मिलता तो पतंगबाज़ी भी करते थे। उन्हें अपने गांव की मिट्टी, मातृभाषा पंजाबी और पंजाबियत से बेहद लगाव था। वह गरीबों और जरूरतमंद इनसानों की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

रफी साहिब ने फिल्म आसपास के लिए अंतिम गीत  तूं कहीं आसपास है दोस्त, दिल फिर भी उदास है दोस्त…30 जुलाई, 1980 को गाया था। अगले दिन उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। मुंबई की मूसलाधार बारिश में लाखों सिनेमा प्रेमी उनको अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए उनके ज़नाज़े में शामिल हुए थे । जब तक इस दुनिया में फिल्म-संगीत के रसिक रहेंगे, रफी साहिब के न गमें फिज़ाओं में गूंजते रहेंगे।

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे,

संग संग तुम भी गुनगुनाओगे,

तुम मुझे हां तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे…

ओके नाओ आई विल लीव… आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने जब 31 जुलाई 1980 को एक गाने की रिकार्डिंग पूरी करने के बाद संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारे लाल से यह कहा कि ओके नाओ आई विल लीव तब यह किसी ने भी नही सोचा था कि आवाज का यह जादूगर उसी शाम इस दुनिया को अलविदा कह जायेगा। संगीत के प्रति समर्पित मोहम्मद रफी कभी भी अपने गाने को पूरा किए बिना रिकार्रि्डग रूम से बाहर नहीं निकला करते थे। उस दिन अपने संगीतकार से कहे गए शब्द उनके व्यावसायिक जीवन के आखिरी शब्द साबित हुए। उसी शाम 7 बजकर 30 मिनट पर मोहम्मद रफी को दिल का दौरा पड़ा और वह अपने करोड़ों प्रशंसकों को छोड़कर इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।

महात्‍मा गांधी के बाद मोहम्‍मद रफी ही एकमात्र ऐसे शख्‍स थे जिनकी शवयात्रा में इतना भारी जनसैलाब देखने को मिला।

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मोहम्‍मद रफी की अंतिम यात्रा   The last Journey of Mohammad Rafi

मोहम्‍मद रफी की शव यात्रा जिस समय निकाली जा रही थी, मुंबई में भयानक बारिश हो रही थी – मानो आकाश भी आंसू बहा रहा हो। इतनी भारी बारिश में भी मोहम्‍मद रफी के इंतकाल की खबर आग की तरह फैली और जिसने भी सुना वह बांद्रा की मस्ज्दि की तरफ दौड पडा। ऐसा ही होता है जननायक और जनगायक का जाना।

मोहम्‍मद रफी की अंतिम यात्रा का वर्णन महान संगीतकार नौशाद के शब्‍दों में।

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‘रमजान में मोहम्‍मद रफी का इंतेकाल हुआ था और रमजान में भी अलविदा के दिन। बांद्रा की बडी मस्जिद में उनकी नमाजे जनाजा हुई थी। पूरा ट्रैफिक जाम था। क्‍या हिंदू, क्‍या सिख, क्‍या ईसाई, हर कौम सडकों पर आ गई थी। नमाज के पीछे जो लोग नमाज में शरीक थे उनमें राज कपूर, राजेन्‍द्र कुमार, सुनील दत्‍त के अलावा इंडस्‍ट्री के तमाम लोग मौजूद थे। हर मजहब के लोगों ने उनको कंधा दिया।

VIDEO

Documentry On Rafi Sahab, By Films Division

Part 1: http://www.youtube.com/watch?v=jnMl8N7vUcU

Part 2: http://www.youtube.com/watch?v=Plu5ae2gAYM

Documentry On Rafi Sahab, By GEO TV

Part 1: http://www.youtube.com/watch?v=CSb881jowa0

Part 2: http://www.dailymotion.com/video/xw9o4c_documentary-mohammad-rafi-part-2-of-3-mp4_shortfilms

Part 3: http://www.dailymotion.com/video/xw9o4q_documentary-mohammad-rafi-part-3-of-3-mp4_shortfilms

MOHD RAFI WITH FAMILY:

Part-1: http://www.youtube.com/watch?v=xe1tHscT3Xo

Part 2: http://www.youtube.com/watch?v=hhQLHIjGX1w

Mohd Rafi on daughter wedding: http://www.youtube.com/watch?v=abnQIei7JDs

Mohammed Rafi Sahab’s Interview: http://www.youtube.com/watch?v=3_q1rlCAJzk

http://www.youtube.com/watch?v=ZTNdPlcCF-Y

Suhani Raat Dhal Chuki – MOHD RAFI LIVE: http://www.youtube.com/watch?v=yReE8e–v2c

Mohamed Rafi Live Concerts: http://www.youtube.com/watch?v=SN959Zm6at4

http://www.youtube.com/watch?v=QIB368rc7fc

http://www.youtube.com/watch?v=ARoF3eySPGk

Mohamed Rafi -Mahmood-Mukesh-Sharda-Live Concerts: http://www.youtube.com/watch?v=eDbwzNmGCH4

RAFI SAHAB LIVE AASMAN SE AYA FARISHTA: http://www.youtube.com/watch?v=lagYmu4-zp8

Madhuban Main Radhika- Mohammad Rafi Live With Naushad: http://www.youtube.com/watch?v=5DfwDvX5gYo

Rafi Saab Live – O DUNIYA:  http://www.youtube.com/watch?v=TzRmewpmeAc

AUDIO… सिनेमा के सौ साल: मो.रफी से ख़ास बातचीत

http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/04/130429_mohdrafiaudio_ks.shtml

भारतीय सिनेमा तीन मई को 100 साल का हो जाएगा. सिनेमा के इस सफर पर हम आपके लिए आज से तीन मई तक रोज़ाना बीबीसी के खज़ाने से आपके चहेते सितारों से की गई खास बातचीत आप तक लाएंगे. आज पेश है हिंदी फिल्मों के कई सुपरहिट गानों की आवाज़ मोहम्मद रफी से बीबीसी की खास मुलाकात. मोहम्मद रफी से ये बातचीत 1977 में बीबीसी के सुभाष बोहरा ने की थी.

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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