महाराष्ट्र सूखा: 1972 के बाद सबसे भयानक सूखे की चपेट में महाराष्ट्र

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1972 के बाद महाराष्ट्र सबसे बड़े सूखे की चपेट में है, करीब आधा महाराष्ट्र बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। राज्य के 15 जिले अकाल की चपेट में हैं।

पश्चिमी महाराष्ट्र के इलाके इस कदर सूखे की मार झेल रहे हैं कि वहां के खेत रेगिस्तान जैसे नजर आने लगे हैं।

अकालग्रस्त क्षेत्र में राहत कार्य शुरू करने और प्रभावित जनता को सहायता पंहुचाने की प्रक्रिया भी काफी समय ले लेगी। सबसे बड़ा खतरा किसान आत्महत्या को लेकर हैं। आत्महत्याएं नहीं थम पा रही हैं। बेबस और लाचार किसान करे भी तो करे क्या? पानी है नहीं, फसलें बर्बाद हो चुकी, जमीनों तरेटती जा रही है एक एक फुट की दरारें पड़ चुकी हैं। कर्ज का बोझ इतना की खड़ा होना भी मुश्किल, मौसम बार-बार दगा दे रहा है। स्थिति बद से बदत्तर हो चुकी है।

पानी की किल्लत इतनी की लोग इस कदर दोचार हो रहे हैं कि अब तो वो गंदा पानी भी इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। गंदा पानी लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है तो पानी की किल्लत बच्चों का भविष्य।

पानी की किल्लत का नतीजा ये है कि एक तरफ लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं तो दूसरी तरफ दूर-दूर से पानी लाने की मशक्कत में गांव के बच्चों की पढ़ाई भी चौपट हो रही है।

सूखे का आलम ये है कि लोग अब घरों को छोड़ जानवरों के साथ रह रहे हैं, दरअसल जानवरों के लिए सरकार गांवों में चारा छावनी चला रही है, जहां न सिर्फ जानवरों को चारा दिया जाता है बल्कि उनके लिए पानी का भी इंतजाम होता है। लोगों को पानी की इस कदर किल्लत है कि अब घरों में ताला लगाकर लोग जानवरों की छावनी में रह रहे हैं क्योंकि वहां पानी जो मिलता है।

सूखे का आतंक महाराष्ट्र मे इस कदर बढने लगा है की गांव के गांव खाली होने लगे है। ये कम था की अब लोग जानवरों के साथ रहने पर आमादा हो गए है। पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा का पांगरी गांव गांधी परिवार का पसंदीदा गांव रहा है, इंदिरा गांधी यहां आ चुकी हैं, राजीव गांधी भी आ चुके हैं और पिछले साल राहुल गांधी ने भी अपने काफिले के साथ इस गांव का दौरा किया था। लेकिन सूखे की मार झेल रहे इस गांव के लोगों की मानें तो तमाम आश्वासनों और वादों के बावजूद यहां कुछ नहीं बदला।

सरकार ने हालांकि इस साल बजट में इस गांव के लिए ज्यादा पैसे का इंतजाम किया है, लेकिन करीब 2,700 की आबादी वाले इस गांव की मांग है कि सरकारी वादे बहुत हुए अब पानी की समस्या का समाधान हर हाल में चाहिए।

  • महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के जालना, बीड, उस्मानाबाद और पश्चिम महाराष्ट्र के सोलापुर, सांगली, अहमदनगर और पुणे जिले में इस साल 1972 के सूखे से भी भयानक हालात हैं। लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।
  • महाऱाष्ट्र के 1880 गांवों और 5195 बस्तियों में टैंकर के जरिये पानी पहुंचाया जा रहा है। महाराष्ट्र में 7 हजार 896 गावों में पानी की भारी किल्लत है।
  • ताजा आंकड़ों के मुताबिक मराठवाड़ा की सिंचाई परिय़ोजनाओं में महज दस फीसदी पानी बचा है।
  • जब मार्च का ये हाल है तो मई-जून की कल्पना ही की जा सकती है।

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5 दिनों में एक बार पानी सप्लाई

  • पूरा महाराष्ट्र सूखे की मार झेल रहा है। पिछले 40 सालों में महाराष्ट्र ने ऐसा सूखा नहीं देखा है। खबर है कि धुले शहर में अब सिर्फ 10 दिनों के लिए पीने का पानी बचा है। इसलिए नगर निगम ने फैसला किया है कि अब धुले में सिर्फ पांच दिनों में एक बार पानी सप्लाई किया जाएगा। कोशिश है कि नजदीक के साक्री बांध से पानी लाया जाए।

सूखे से पूरे राज्य में बिजली पैदा करने वाले दो बड़े प्रोजेक्ट संकट में हैं

  • उधर सूखे से पूरे राज्य में बिजली पैदा करने वाले दो बड़े प्रोजेक्ट संकट में हैं। दाभोल पॉवर प्रोजेक्ट पिछले पांच दिनों से बंद पड़ा है। वहीं परली पॉवर प्रोजेक्ट भी पानी की कमी की वजह से बंद होने के कगार पर है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में बिजली कभी भी गुल हो सकती है। सूबे में अधिकारियों का कहना है कि इस हालात के लिए सूखे के साथ-साथ गैस और कोयले की कमी भी जिम्मेदार है। उधर सूखे से किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या पहले ही एक बड़ी समस्या है। सूखे से उन पर दोहरी मार पड़ रही है। 16 फरवरी को विदर्भ में दो किसानों ने खुदकुशी कर ली थी।

बोरवेल से जो पानी आ रहा है वो पीने लायक नहीं

  • सतारा जिले के विरली गांव में इन दिनों लोगों का ज्यादातर वक्त पानी लाने में ही बीतता है। गांव के ज्यादातर बोरवेल सूख चुके हैं। एकाध बोरवेल जिनमें पानी आ भी रहा है तो वो इतना गंदा है कि लोग उसे पी नहीं सकते है, लेकिन पानी की किल्लत की वजह से लोग गंदे पानी के इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। ये गंदा पानी अब गांव वालों की सेहत खराब कर रहा है। विरली गांव निवासी मधुकर सकट के मुताबिक बोर से पानी आने के लिए रातभर इंतेजार करना पड़ता है। उसके बाद सिर्फ 8 मटकी पानी जमा होता है। उसके बाद बोर से पानी नही आता, जो आता है वो बेहद गंदा होता है। ये पानी पीने से जुलाब शुरू हो जाते हैं। मल्हारी जाधव के मुताबिक ये पानी पीने के लायक नही है। ये पानी पीने से लोग बीमार पड़ जाते हैं।

बच्चों की पढ़ाई हो रही है बर्बाद

  • करीब 20 किलोमीटर के इलाके में एक बोरवेल ही अब लोगों का सहारा है। दिन-रात लोगों की यूं ही कतार लगी रहती है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां सिर्फ पानी ढोने में जुटी हैं। उनको दूर-दूर से पानी लाना पडता है, लोग दिन रात बैठकर पानी भरते है। गांव के बच्चों की पढ़ाई भी इन दिनों बर्बाद हो रही है। गांव के सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल से बात की तो उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि पिछले तीन सालों से उनके स्कूल का रिजल्ट 100 फीसदी रहा है, लेकिन इस साल हालात अच्छे नहीं हैं। हालांकि स्कूल अपनी ओर से कोशिश कर रहा है, उन बच्चों के लिए अलग से क्लास भी ली जा रही है जो पानी लाने की वजह से स्कूल समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।

क्यों पड़ा महाराष्ट्र में सूखा… क्या हैं कारण

  • महाराष्ट्र की गिनती देश के सबसे धनी सूबों में होती है। जहां दिनरात जगमगाने वाली मायानगरी मुंबई है जो अपनी चकाचौंध से लोगों को अपनी ओर खींचती है, लेकिन इसी सूबे की एक तस्वीर डराने वाली है। ये तस्वीर है उन इलाकों की जो पिछले दो साल से सूखे का संकट झेल रहे हैं। महाराष्ट्र में पिछले सालImage बारिश तो हुई लेकिन राज्य की 125 तहसील प्यासी ही रह गईं। इन इलाकों में लगातार बढ़ रही पानी की किल्लत ने अब सूखे का भयानक रूप अख्तियार कर लिया है। सांगली जिले के जत तहसील में सूखे ने इलाके की पूरी सूरत ही बदल डाली है।
  • महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में मॉनसून की बेरुखी और बारिश की बेहद कमी से उपजे हालात को देखते हुए 22 अगस्त 2012 को 125 तालुका में सूखा घोषित कर दिया है। महाराष्ट्र कैबिनेट की बैठक में ये फैसला लिया गया था।
  • जत, आटपाडी, कवठे-महाकाल, म्हसवड ऐसे इलाके हैं जहां पिछले कई सालों से लगातार कम बारिश होती आ रही है, लेकिन इस साल तो यहां मॉनसून पूरी तरह से गायब रहा। नतीजा, इलाके में गन्ना, हल्दी, केले की फसलें पानी ना मिलने से बर्बाद हो गईं। तालाब, नदियां, नाले, कुएं सभी से पानी गायब हो गया। पानी बस यहां के लोगों की आंखों में दिखता है। पहले यहां दो वक्त की रोटी ना मिलने पर पानी पीकर काम चलाया जा सकता था, अब तो वो भी नहीं नसीब नहीं है।
  • भूम में किसान के मुताबिक इधर रोजगार गारंटी स्कीम के काम नहीं चल रहे हैं। डैम का पानी स्टॉक करके रखा हुआ है। बिजली कनेक्शन काटे जा रहे हैं। लोगों को, जानवरों को पीने के लिए पानी नहीं है। इसीलिए लोग पुणे, मुंबई, बारामती जा रहे हैं।
  • वहीं बीड जिले के आष्टी तहसील में पानी नहीं मिलने से करीब 9 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन बंजर हो गई है। बीड जिले में खेती के साथ साथ दूध का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन जिस जमीन पर फसल ही नहीं पैदा हो रही है वहां चारा कहां से पैदा होगा, इसलिए दूध उत्पादन भी घट चुका है। यहां लोग एक एक बूंद पानी बचाने की जुगत में लगे हैं।
  • आष्टी के किसान के मुताबिक पीने के लिए पानी नहीं है। चांदनी बांध का पानी भी सूख गया।
  • सूखे का सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा में है। इसी मराठवाड़ा मे माढा इलाका है जो कि महाराष्ट्र में सबसे प्रभावशाली नेता और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का चुनाव क्षेत्र है। लेकिन कृषि मंत्री के चुनाव क्षेत्र में लोगों को जो पानी मिल रहा है उसका रंग देखकर तो जानवर भी मुंह फेर लें लेकिन क्या करें लोग इसी पानी को पीने को मजबूर हैं। माढा के किसान के मुताबिक ये पानी पीना ही पड़ता है। दूसरा कोई पानी नहीं है। पानी का पंप बंद पड़ चुका है। पानी मे किटाणू होते हैं। ये पानी पीने पर या फिर नहाने के लिए भी इस्तेमाल करें तो आदमी बीमार पड़ जाता है। जबकि बीजेपी ने पानी किल्लत को लेकर ही सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
  • मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के कई इलाकों मे इस साल औसत से 59 फीसदी कम बारिश हुई है। इन इलाकों को पानी सप्लाई करनेवाले बांधों में भी औसत से 20 से 25 फीसदी कम बारिश हुई है। पानी की किल्लत इस कदर बढ़ी है कि खुद मुख्यमंत्री साढ़े तीन लाख की आबादी वाले जालना शहर को ही दूसरी जगह बसाने की बात करने लगे हैं।
  • सोलापुर के माढ़ा की रहने वाले लोगों का कहना है कि जो हम पानी पीते है। ये पानी जो भी रंग का है पीना ही पड़ता है, हरा हो या पीला क्योंकि दूसरा पानी है ही नही। पानी का पंप बंद पड़ चुका है।
  • महाराष्ट्र बीजेपी महासचिव सुजित सिंह ठाकुर के मुताबिक बारिश के दौरान कनाल से पानी छोड़ा नहीं जाता, ये नियम है, लेकिन इन्होंने मराठवाड़ा को पानी देने के बजाए पानी कलान में छोड़ा, आज मराठवाड़ा में पानी नहीं है, और इससे लोग स्थलांतर करने लगे है। विपक्ष के आरोपों के बाद अचानक सरकार को भी सूखे से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत महसूस होने लगी है। मदद और पुनर्वास मंत्री पतंगराव कदम के मुताबिक मराठवाड़ा की स्थिति वाकई में काफी खराब है। मैं खुद वहां पर जानेवाला हूं। पीने के पानी के लिए हम प्राथमिकता देंगे। उसके बाद उद्योग और खेती के लिए पानी दिया जाएगा।

मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के कई इलाकों मे इस साल औसत से 59 फीसदी कम बारिश हुई है। इन इलाकों को पानी सप्लाई करनेवाले बांधों में भी औसत से 20 से 25 फीसदी कम बारिश हुई है। पानी की किल्लत इस कदर बढ़ी है कि खुद मुख्यमंत्री साढ़े तीन लाख की आबादी वाले जालना शहर को ही दूसरी जगह बसाने की बात करने लगे हैं। पानी किल्लत के मुद्दे को विपक्षी दलों ने राजनीतिक मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि महाराष्ट्र में इस वक्त आम आदमी को पानी किल्लत की और सत्ताधारी पार्टीयों के नेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सताने लगी है।

महाराष्ट्र में जारी पानी संकट का सबसे ज्यादा असर यहां के किसानों पर है। महाराष्ट्र के  7 हजार 896 गावों में सूखा घोषित है। सूखे के चलते इन गावों में बसने वाले किसानों के सपनों ने बेमौत दम तोड़ दिया है। इन गांवों में से एक है उस्मानाबाद जिले का परांडा गांव, मराठवाड़ा के इस गांव में रहनेवाले कोंडिबा जाधव ने सपना देखा था कि गन्ने की पैदावार से वो अपना कर्जा कम करने की कोशिश करेंगे। कोंडिबा के घर का हर सदस्य कुछ ना कुछ काम करता है। बेटे दूसरों की खेती पर जाकर मजदूरी करते हैं, और भिकाजी अकेले ही अपने खेत में पसीना बहाते हैं। लेकिन इस बार किस्मत के साथ साथ कुदरत भी ऐसी रूठी कि सूखे ने कोंडिबा की सारी फसल बर्बाद कर दी। कर्ज कम होने के बजाए और कई गुना और बढ़ गया।

किसान बाबू काले ने कहना है कि तीन एकड़ में मैंने गन्ना लगाया। रिश्तेदारों से कर्जा लेकर बीज, खाद खरीदा। डेढ़ लाख रुपए खर्च कर चांदनी डैम से यहां तक पाइपलाइन डाली। डैम में पानी आया ही नहीं तो पाइपलाइन भी बेअसर रही। बच्चों की शिक्षा का खर्च पूरा नहीं कर पा रहे थे इसलिए उसे स्कूल से निकाल लिया। गन्ने के पैसों से बेटी का ब्याह करने का सोचा था लेकिन फसल आई ही नहीं।

महाराष्ट्र के कृषि मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने बताया कि खरीफ की फसलों की स्थिती अच्छी है। रबी की फसलों पर जरूर इसका असर हुआ है। नागपुर मे हुए शीतकालीन सत्र के दौरान हमने किसानों के कर्जे को रिशेड्युल कराने के बारे में बात की थी। रबी की फसलों की बारे मे रिपोर्ट 15 जनवरी तक प्राप्त होगी उसके बाद निर्णय लिया जाएगा।

महाराष्ट्र में सूखा पड़ना कोई नहीं बात नहीं। लेकिन इस बार अगर कुछ नया है तो ये कि यहां कुदरत का कहर और तेज हो गया है। ये हाल तब है जब महाराष्ट्र में सूखा राहत संबंधी देश का सबसे बड़ा कार्यक्रम चलाया जा रहा है। मोटे तौर पर इस सूखे के दो बड़े कारण नजर आ रहे हैं पहला, कम बारिश और दूसरा, खुद इंसान। दरअसल, इस बार मॉनसून में मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र में औसत की आधी भी बारिश नहीं हुई। नतीजा ये रहा कि पानी रोककर स्टॉक बनाने वाले बांधों में भी जल स्तर घटकर चिंताजनक स्थिति मे पहुंच गया।

महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के 11 बड़े बांधों में दिसंबर 2011 तक करीब 61 फीसदी पानी था। लेकिन दिसंबर 2012 में इन बांधों में सिर्फ 16 फीसदी ही पानी मौजूद था। अगर छोटे बड़े सभी बांधों की बात की जाए तो 2011 में मराठवाड़ा के बांधों में 58 फीसदी पानी मौजूद था, जबकि 2012 में सिर्फ 19 फीसदी पानी ही बचा। पूरे महाराष्ट्र की बात करें तो 2011 में बांधों में 72 फीसदी पानी था जबकि पिछले साल सिर्फ 59 फीसदी पानी मौजूद था।

ये पानी के बेजा इस्तेमाल का ही नतीजा है कि पिछले कुछ सालों में भूगर्भ में जलस्तर 20 फीट से 200 फीट तक गिर गया है। जमीन में मौजूद पानी का एक बड़ा हिस्सा सिंचाई और पीने के लिए इस्तेमाल किया गया। लेकिन पानी दोबारा जमीन में कैसे जाएगा, इंसान इस सवाल को ही भूल गया।

दापोली कृषि विद्यापीठ के प्रमुख कृषि अभियंता दिलीप महाले ने सूखे के बारे में बताते हुए कहा कि आप जिन इलाकों के बारे में पूछ रहे है, उस मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र में अच्छी बारीश नही हुई है। जुलाई अगस्त के महीने में तो औसत से भी कम बारिश हुई है। हम सूखे पर उपाय योजना नहीं कर सकते, अगर वो पहले करते तो इसकी तीव्रता हम कम कर पाते।

देश में कुल चीनी का 66 फीसदी उत्पादन करने वाले महाराष्ट्र में गन्ने की फसल किसानों के लिए आय का बड़ा जरिया है। लेकिन गन्ने की फसल के लिए पानी ज्यादा लगता है। ऐसे में किसान मुनाफा कमाने के चक्कर में जायज-नाजायज हर तरीके से खेती को पानी देता रहता है। खेती का ये रिवाज बदलने की कोशिश किसी राजनीतिक पार्टी ने नहीं की। वजह साफ है सत्ताधारी हो या फिर विपक्षी दल सभी पार्टियों की आर्थिक रीढ़ यहां की कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रियां मानी जाती हैं। लेकिन ये स्थिति तो सालों साल महाराष्ट्र में मौजूद थी, तो ऐसा क्या हुआ कि इस साल हालात इतने बदतर हो गए। दरअसल इसका एक बड़ा कारण है सिंचाई घोटाला। महाराष्ट्र में जल आपूर्ति के लिए सिंचाई योजनाएं शुरू तो हुईं लेकिन वो सालों साल अधूरी रहीं।

जल विज्ञानी बुधाजीराव मुलीक ने बताया कि सरकार की मानें तो करोड़ों रूपए खर्च करने के वाबजूद सूखे से निपटने के लिए और 1100 करोड़ रूपयों की जरूरत है। स्थिती बदलने के लिए सरकार पैसों की नदी तो बहा रही है, लेकीन सरकारी कागजादों से शुरू होने वाली ये नदी कहां जाती है इसका किसी को पता ही नही चलता।

सूखे की सबसे ज्यादा मार झेल रहे मराठवाड़ा में 13 बड़ी, 19 मध्यम और 306 छोटी सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं। इन 338 योजनाओं की कीमत 7035 करोड़ रुपए थी, लेकिन काम पूरा ना होने की वजह से अब इन्हें पूरा करने के लिए और 5,512 करोड रुपयों की जरूरत है। मराठवाड़ा की एक सबसे बड़ी परियोजना भीमा-सीना नदी के कनाल खोदने की थी, जो पिछले 20 सालों से लटकी पड़ी है। यही हाल पश्चिम महाराष्ट्र का भी है। यहां 155 योजनाएं अधूरी पड़ी हुई हैं। जिसकी कीमत पहले 4,195 करोड़ थी जो अब बढ़कर 9,116 करोड़ तक पहुंच गई है। खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मानते हैं कि आधी अधूरी सिंचाई योजनाओं की वजह से महाराष्ट्र में स्थिति गंभीर बनी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि महाराष्ट्र में सिंचाई परियोजनाएं तो बनीं, लेकिन उनका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया। किसानों ने पानी का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया। जिससे अमीर किसानों को कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन गरीब किसान पूरी तरह से बर्बाद हो गया। उद्योगों की बढ़ती संख्या के चलते खेती का पानी शहरों की तरफ मोड़ दिया गया। जिसका नतीजा आज महाराष्ट्र का आधे से ज्यादा हिस्सा सूखे की चपेट में हैं।

Mar 13, 2013… महाराष्ट्र के लिए 1,207 करोड़ रुपये का राहत पैकेज मंजूर

कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) ने महाराष्ट्र के लिए 1,207 करोड़ रुपये का सूखा राहत पैकेज मंजूर कर दिया. सूत्रों ने कहा कि कुल 1,207 करोड़ रुपये में से 807 करोड़ रुपये राष्ट्रीय आपदा राहत कोष के तहत राज्य में 3,905 गांवों को जारी किए जाएंगे. इन गांवों में सूखा पड़ने के चलते रबी की फसल बर्बाद हो गई है. उन्होंने कहा कि शेष 400 करोड़ रुपये राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 1,100 ऐसे गांवों को जारी किए जाएंगे जहां सूखा पड़ने से खरीफ की फसल बर्बाद हो गई है. उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष के तहत 1,801 करोड़ रुपये जारी किए जाने की मांग की थी, लेकिन केंद्रीय टीम ने स्थिति का आकलन करने के बाद 872 करोड़ रुपये जारी करने की सिफारिश की थी. फसलों के नुकसान की भरपाई करने के लिए पिछले साल इस कोष के तहत राज्य के लिए 778 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे. शिंदे ने कहा कि ईजीओएम ने केरल एवं अन्य राज्यों के लिए भी सूखा राहत पैकेज मंजूर किया है.

Jan 11, 2013… बूंद-बूंद के लिए तरसते महाराष्ट्र को 778 करोड़ की सहायता

1972 के बाद पहली बार महाराष्ट्र सबसे बड़े सूखे की चपेट में है। करीब आधा महाराष्ट्र बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। केंद्र सरकार ने नेशनल डिजास्टर फंड से महाराष्ट्र को 778 करोड़ रुपये की सहायता राशि को मंजूरी दी है। महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसकी गिनती देश के सबसे धनी सूबों में होती है। समृद्धशाली कहे जाने महाराष्ट्र में पिछले साल बारिश तो हुई लेकिन राज्य की 125 तहसील प्यासी ही रह गईं। इन इलाकों में लगातार बढ़ रही पानी की किल्लत ने अब सूखे का भयानक रूप अख्तियार कर लिया है।  महाराष्ट्र के जत, आटपाडी, कवठे-महांकाल, म्हसवड ऐसे इलाके हैं जहां पिछले कई सालों से लगातार कम बारिश होती आ रही है। लेकिन इस साल तो यहां मॉनसून पूरी तरह से गायब रहा। जिसका नतीजा इलाके में गन्ना, हल्दी, केले की फसलें पानी ना मिलने से बर्बाद हो गईं। तालाब, नदियां, नाले, कुएं सभी से पानी गायब हो गया।

2012 drought worse than in 1972; study blames govt mishandling

Hindustan Times | April 04, 2013

The drought looming in one-third of the state has been compared to that in 1972. Union agriculture minister Sharad Pawar, among others, termed it as worse than the one the state faced 40 years back.

The answer to this remark can be traced more to the government’s failure in agriculture and water management than nature’s wrath.

  • South Asia Network on Dams, Rivers and People (SANDRP), a network of organisations working on water- related issues, compared and analysed rainfall figures from June to October in 1972 and 2012 in 17 drought-affected districts and found that rainfall in 1972 was much lower than in 2012 for every month except June.
  • The figures show that in 2012, eight districts witnessed more than 50% deficit rainfall in June, none in July, three districts had 50% deficit rainfall in August, one district in September and two districts in October.
  • In 1972, three districts witnessed more than 50% deficit rainfall in June, nine districts in July, nine in August, six in September and 17 in October.
  • In 1971 too, rainfall was low. But in 2011, the rainfall was above average and most of the dams were full.
  • SANDRP argued that in the intervening 40 years, Maharashtra has been able to build big dams and  it should have been able to store more water and reduce the impact of rainfall deficit. However, big dams starting with Jayakwadi, Ujani and Dudhana have nearly 0 % live storage as of now.
  • One of the reasons that SANDRP attributes this to is sugarcane farming. Overall, the area under sugarcane in Maharashtra increased from 167,000 hectares in 1972 to 102,2000 hectares in 2012. “Solapur, Pune, Ahmednagar, Satara, Sangli, Jalna, Osmanabad, Beed, Latur, Nasik, Parbhani and Aurangabad , all drought prone and drought affected districts of the state, are also major sugarcane producing districts. They collectively produce 79.5 % of sugarcane of Maharashtra and more than a quarter of sugarcane production of the country in 2012,” said Himanshu Thakkar of SANDRP.

The repeated drought cycle has not stopped farmers from taking up sugarcane farming and the government has failed to put any restrictions on this water-guzzling farming or control water releases upstream from the big dams.

Maharashtra drought man-made, says study

This year’s drought cannot be called worse than the one in 1972: SANDRP

Hindu | April 4, 2013

MEENA MENON

While the Maharashtra government is crying hoarse about this year’s drought surpassing the one in 1972 and farmers are cutting off their crops and digging deeper than ever for water, an analysis based on rainfall patterns blames it on poor long-term vision and Imageunequal water distribution.

With 3,712 major, minor and medium projects, Maharashtra has the highest number of dams in the country; yet its irrigation coverage was 17.9 per cent in 2009-10. Its projects are plagued with delays and cost overruns, and a special team headed by Madhav Chitale is investigating them.

The Maharashtra Economic Survey 2012-13, does not give any figure for irrigated area, saying it is not available. Last year, this same figure had created a furore, since it had increased by a mere 0.1 per cent from 2000-01 when it was 17.8 per cent, after a decade-long expenditure of nearly Rs 70,000 crore.

Questioning the severity of the drought and the government’s claims, South Asia Network on Dams, Rivers and People (SANDRP), in its analysis, says that while the 1972 drought could be called a natural calamity, the 2012-13 drought is a disaster of water management, accompanied by corruption, water-intensive cropping patterns and absence of a long-term view to manage water and drought.

The analysis states that a comparison of rainfall figures and the monthly rainfall pattern in 1972 and 2012 with respect to the normal rainfall pattern in 17 drought-affected districts shows a different picture. From a meteorological and agricultural point of view, this year’s drought cannot be called worse than that in 1972. Though it is possible that hydrologically, this year’s drought may prove to be worse than 1972 in some districts.

SANDRP says the blame lies squarely on building unviable large dams, wrong cropping patterns, water diversion for non-priority uses, neglect of local water systems and unaccountable water management by the State government, the Centre and the Maharashtra Water Resources Regulatory Authority (MWRRA), set up in 2005.

In the 40 years since 1972, Maharashtra has built a large number of big dams in drought-prone areas. However, the storage levels are plummeting; it is down to 30 per cent now, with 10 per cent in Marathwada as on March 25. SANDRP says that one reason for lack of water is the area under sugarcane, which was 1,67,000 hectares in 1970-71, going up to 10,22,000 hectares in 2011-12 (as per the Survey). At the post-budget press conference, Deputy Chief Minister Ajit Pawar conceded that 70 per cent of the water went to sugarcane cultivation. Add to this diversion of water for drinking, and the dams have little left for farming.

SANDRP says the drought-prone districts, for instance Solapur, Pune, Ahmednagar, Sangli, Satara, Osmanabad, Beed, Latur, Nashik, Jalna, Parbhani and Aurangabad, account for 79.5 per cent of sugar produced in the State. According to the Survey, “As on 31 st December, 2012, out of the total sugar production in the country, the share of the State was 35.3 per cent.” So the drought-prone districts produce more than a quarter of India’s sugar.

It slams the government for not making any attempt to curb either planting of sugarcane or other water-intensive crops or to curb any of the water-intensive activities like running of sugar and wine factories in drought-affected districts. Builders continued to advertise sale of houses attached with swimming pools in the affected areas.

The analysis compared the rainfall figures of 1972 and 2012, from June to October, for the 17 districts mentioned as drought-affected: Ahmednagar, Pune, Solapur, Sangli, Satara, Aurangabad, Beed, Jalna, Latur, Osmanabad, Nanded, Akola, Parbhani, Buldhana, Nashik, Dhule and Jalgaon.

In June 2012, eight districts had monthly rainfall less than half the normal. In July 2012, no district showed a deficit rainfall of more than 50 per cent. In August 2012, the deficit was more than 50 per cent in Aurangabad, Jalna and Osmanabad (these districts also experienced over 50 per cent deficit in June). This was the case for only Jalna in September 2012 and for Dhule and Jalgaon in October 2012. It seems from this comparison that Aurangabad, Jalna and Osmanabad are some of the worst-affected districts this year.

In comparison, the number of districts that faced more than 50 per cent deficit in monthly rainfall in 1972 was three in June, nine in July, nine in August, six in September and all 17 in October 1972. This comparison for the number of districts facing over 50 per cent deficit in monsoon months clearly indicates that the 1972 rainfall was much lower than the 2012 rainfall for every month, with the exception of June.

Only in two districts (Sangli and Dhule) is the 2012 rainfall substantially lower than that in 1972. In two other districts (Jalna and Satara), the rainfall in 2012 is lower than that in 1972, but the difference is less than seven per cent in both cases. In the remaining 13 districts, the monsoon rainfall in 2012 was more than that in 1972.

While comparing the 1972 and 2012-13 droughts, it must be kept in mind that the rainfall in 1971, the year before the 1972 drought, was also low, says SANDRP. In comparison, the rainfall in Maharashtra was above average in 2011 and most of the dams were full.

The Economic Survey for 2011-12 notes: “Total rainfall in the State during 2011 was 102.3 per cent of the normal rainfall.” The Agriculture Commissioner had stated in 2011: “The good distribution of rain has resulted in good quality of crops. The above average rainfall has filled up nearly all dams, which will help replenish the soil in the run-up to the rabi season.”

महाराष्ट्र सूखा, बिक रही हैं लड़कियां..!

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किसानों की आत्महत्या

  • राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2011 में कम से कम 14,027 किसानों ने आत्महत्या की है. इस तरह 1995 के बाद से आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 2,70,940 हो चुकी है. महाराष्ट्र में एक बार फिर आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है.
  • देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। जबकि एक लाख 25 हजार परिवार सूदखोरों के चंगुल में फंसे हैं।
  • महाराष्ट्र में 2010 के मुकाबले 2011 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 3141 से बढ़कर 3337 हो गई. (2009 में यह संख्या 2872 थी). बीते एक साल से राज्य स्तर पर आंकड़ों के साथ की जा रही भारी छेड़छाड़ के बावजूद यह भयावह आंकड़ा सामने आया है.
  • आंकड़ों को कम कर बताने के लिए ‘किसान’ शब्द को फिर से परिभाषित भी किया गया. साथ ही सरकारों और प्रमुख बीज कंपनियों द्वारा मीडिया और अन्य मंचों पर महंगे अभियान भी चलाये गये थे जिसमें यह प्रचार किया गया कि उनके प्रयासों से हालात बहुत बेहतर हुए हैं. महाराष्ट्र एक दशक से भी अधिक समय से एक ऐसा राज्य बना हुआ है जहां सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है.
  • महाराष्ट्र में 1995 के बाद आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 54,000 का आंकड़ा छूने को है. इनमें से 33,752 किसानों ने 2003 के बाद आत्महत्या की है यानी इन नौ सालों में हर साल 3,750 किसानों ने आत्महत्या की. साथ ही महाराष्ट्र में 1995-2002 के बीच 20,066 किसानों ने आत्महत्या की थी यानी इन आठ सालों के दौरान हर साल 2,508 किसानों ने आत्महत्या की.

सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्यों का हाल

किसानों की आत्महत्या की समस्या से सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्यों (महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) के आंकड़े 2011 में हुई कुल किसान आत्महत्याओं के 64 प्रतिशत के आसपास है. छत्तीसगढ़ के शून्यके बावजूद 2010 के मुकाबले स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है. 2010 में इन पांच राज्यों की प्रतिशत हिस्सेदारी 66 प्रतिशत के करीब थी.

  • 1995 से अब तक कुल 2,70,940 किसानों ने आत्महत्या की है.
  • महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते है.
  • आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कृषक आबादी घट रही है.
  • इस समस्या से सबसे बुरी तरह प्रभावित पांच राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश हैं.
  • उपरोक्त पांच राज्यों में सुखाड़ की आशंका के कारण अगले साल सामने आने वाले आंकड़े और भयावह हो सकते हैं.
  • छत्तीसगढ़ सरकार के दावे के अनुसार राज्य में किसी भी किसान ने 2011 में आत्महत्या नहीं की है. जबकि 2010 में राज्य में 1126 किसानों ने आत्महत्या की थी

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किसानों की आत्महत्या के पीछे चार बड़े कारण

बीज के दाम: किसानों की आत्महत्या में मुख्य वजह बीजों के ऊंचे दाम हैं. बीज को खरीदने में कई किसान गहरे कर्ज में डूब जाते हैं. जब फसल की सही कीमत नहीं मिलती है तो उन्हें आत्महत्या कर लेना ही एकमात्र विकल्प नजर आता है.

मानसून: विदर्भ जैसे इलाकों के किसानों की मुख्य चिंता तो मानसून भी है. कई-कई महीनों तक बारिश न होने से कई किसानों ने अपने-आप को मौत के गले लगा लिया.

खेती की लागत: जिस अनुपात में खेती की लागत बढ़ रही है उस अनुपात में किसानों की आमदनी नहीं बढ़ रही है. यही वजह है कि आज ज्यादातर किसान खेती छोड़कर बाहर निकलना चाह रहे हैं.

न्यूनतम समर्थन मूल्य: किसानों के लिए आमदनी का मुख्य जरिया है सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य. लेकिन यहां भी गड़बड़झाला होने की वजह किसनों को अपनी फसल की सही कीमत नहीं मिल पाती. व्यापारियों और बिचौलियों द्वारा किसानों को इतना मजबूर कर दिया जाता है कि वह अपनी फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बेचने पर तैयार हो जाएं.

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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One Response to महाराष्ट्र सूखा: 1972 के बाद सबसे भयानक सूखे की चपेट में महाराष्ट्र

  1. Bhupendra Singh says:

    अटल जी के नेतृत्व में पूर्व की राजग सरकार ने नदियों को जो़ड़ने की योजना बनाई थी। इसका मुख्य उद्देश्य था कि जहां-जहां बाढ़ की समस्या आती है, वहां की नदियों से नहरें निकाल कर सूखे से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों तक पहुचाया जाए। इससे बाढ़ वाले क्षेत्रों में जल जमाव रुकेगा व सूखे वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बनी रहेगी। पर वर्तमान यूपीए सरकार ने उस योजना पर अमल न करके बड़ी गलती करते हुए अपनी अदूरदर्शी नीतियों का परिचय दे दिया। सरकार को वह योजना फिर से अमल में लानी चाहिए।

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