‘तृष्णा’ अजर-अमर, अविनाशी है

जवानी गई, बुढ़ापा आ गया है, इन्द्रियों की शक्ति जाती रही, सब तरह से दूसरों के मुहं की ओर ताकना पड़ता है, परन्तु तृष्णा नहीं मिटती। ‘कुछ और जी लूँ, बच्चों के लिए कुछ और कर जाऊं, दवा लेकर जरा ताजा हो जाऊं तो संसार का कुछ सुख और भोग लूं। मरना तो है ही, परन्तु हाथ से बच्चों का विवाह हो जाये तो अच्छी बात है, दूकान का काम बच्चे ठीक से संभाल ले, इतना सा उन्हें और ज्ञान हो जाये’, या बच्चों को अच्छी नौकरी मिल जाए, उन का घर परिवार बस जाए, बहुत से वृद्ध पुरुष ऐसी बातें करते देखे जाते है। इंसान जीवनभर यही सोचता रहता है अपने लिए उसके पास समय नहीं, कब जवानी गई और बुढ़ापा आ गया पता ही नहीं चलता। अब व्यक्ति जवानी की इच्छाएं बुढ़ापे में पूरा करने की सोचता हैतीर्थ यात्रा, समाजिक कार्य, धार्मिक कार्यों में रुचि लेना, अब पुराने जमाने की बातें हो गई हैं अब बुढ़ापा भी जवानी से कम नहीं हैरूस के पीएम ब्लादिमीर पुतिन को लीजिए 57 साल की उम्र और इश्क 27 साल की लड़की सेऔर इन्हें देखिए 73 साल के इटली के पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी पिछले दो वर्षों से लगातार सेक्स स्कैंडलों से घिरे हुए हैं। 102 वर्ष की उम्र में एक वृद्ध पिता बन रहे हैं।

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इक्कीसवीं शताब्दी की एक विशेषता यह है कि इसमें लोगों की औसत आयु बढ़ गई हैएसाथ ही एक कालक्रम में आयु सीमा में हुए इस परिवर्तन से नयी पीढ़ी पर दबाव भी बढ़ गया है. भारत सहित दुनिया की जनसंख्या पर नजर डालें तो सन् 2000 से 2050 तक पूरी दुनिया में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले लोगों की तादाद 11 फीसद से बढ़कर 22 फीसद तक पहुंच जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुमान के अनुसार वृद्ध लोगों की आबादी 605 मिलियन(6 करोड़ 5 लाखद्ध से बढ़कर 2 बिलियन ;2अरब)  हो जाएगी.  

डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन् 2050 में 300 मिलियन (30 करोड़) 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है. बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चैंकाने वाले आंकड़े भी हैं. जैसे 60 वर्र्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है. 80 वर्ष से ज्यादा के उम्र वाले वृद्ध सन 2050 तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे. अगले 5 वर्षों में ही 65 वर्ष से ज्यादा के लोगों की तादाद 5 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी. सन् 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी. और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें.

इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती…

डॉ. प्रकाश कोठारी कहते हैं कि सेक्स की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। इसकी ख्वाहिश मरते दम तक बनी रह सकती है। जो सत्ता में होते हैं, उनके पास अवसर होते हैं। कुछ दूसरे ऐसे होंगे , जिनमें इच्छा होगी , पर अवसर नहीं होगा या अवसर का लाभ उठाने का साहस नहीं होगा।

57 साल के रूस के पीएम ब्लादिमीर पुतिन को ही लीजिए उनकी प्रेमिका 27 साल की जवान रिदमिक जिमनास्ट एलिना काबएवा हैं। खबर है कि वह शीघ्र ही उससे शादी करने वाले हैं। कुछ दिनों पहले एक रूसी वेबसाइट ने दावा किया कि पुतिन और एलिना मास्को के एक रेस्तरां में एक-दूसरे को चूमते देखे जा चुके हैं। और कुछ ब्लॉगर तो कहते हैं कि उसे पुतिन से एक संतान भी है। लेकिन इस उम्र में भी दिल दे बैठने वाले पुतिन अकेले नहीं हैं। कुछ ही दिनों पहले इटली के पूर्व प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी ने कहा है कि युवतियों को युवकों के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि उनके जैसे अनुभवी और लोडेडलोगों के पास आना चाहिए। बर्लुस्कोनी 73 साल के हैं और पिछले दो वर्षों से लगातार सेक्स स्कैंडलों से घिरे हुए हैं।

डॉ. अरुणा ब्रूटा इसकी व्याख्या दूसरी तरह से करती हैं। वे कहती हैं कि बहुत सारे पुरुष अपने बूढ़े होने की वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पाते। युवा स्त्रियों से संबंध बना कर वे अपना सेल्फ एस्टीम बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इससे उन्हें लगता है कि वे बूढ़े हो रहे दूसरे आम पुरुषों से अलग हैं।

समाजशास्त्री पुष्पा वर्मा कहती हैं कि असल में शिखर पर पहुंचने के बाद स्त्री-पुरुष – किसी भी व्यक्ति को सत्ता की निस्सारता और शुष्कता का एहसास होने लगता है। तब वह भोजन और सेक्स जैसी दो आदिम सुखों की ओर भागता है – शरीर से नहीं तो मानसिक रूप से ही सही। आप वाजिद अली शाह की कहानी याद कीजिए।

यौन संबंधों में आड़े नहीं आ रहा बुढ़ापा… एक शोध में कहा गया है कि अमरीकी लोगों के लिए बुढ़ापा यौन संबंधों के आड़े नहीं आ रहा है और 70-80 साल की उम्र में भी वे यौन संबंध बना रहे हैं. 57 से 85 साल उम्र के 3005 लोगों के बीच उनके यौन जीनव या सेक्स लाइफ़ के बारे में एक शोध किया गया और बड़ी संख्या में लोगों ने कहा कि वे अभी भी यौन संबंध बनाते हैं. इस सर्वेक्षण या शोध से पता चला कि इस उम्र में भी यौन संबंधों के लिए सबसे बड़ी बाधा के रुप में साथी की कमी का ज़िक्र किया गया और यौनेच्छा की कमी और बीमारी को छोटी बाधा बताया गया.

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हरियाणा के सोनीपत जिले में 102 वर्ष की उम्र में एक वृद्ध पिता बना है। रामजीत नामक वृद्ध की 52 वर्षीय पत्नी शकुंतला ने हाल ही में अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया है।

“बुढापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छायें एक ही केंद्र पर आ जाती हैं |” – मुँशी प्रेमचंद

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि- “हमने तप नहीं तपा, किंतु तप ने हमें ताप डाला। काल जीर्ण न हुआ, किंतु हमारा शरीर ही जीर्ण हो चला है। तृष्णा को बुढ़ापा नहीं आया, पर हमें बुढ़ापा आ गया। अर्थात सांसारिक भोगों को मनुष्य नहीं भोगता अपितु यह भोग ही मुनष्य को भोग लेते हैं”।

गौतम बुद्ध ने कहा था कि संसार ‘दुखमय है और दुख का कारण ‘तृष्णा’ है, पर उम्र के साथ ये सब तृष्णायें जब मर जाती है तब दुख कम होता जाना चाहिए। किन्तु सारे संसार में वृद्धत्व आज जितना दुखी और पीड़ा में है उतना शायद ही वह कभी रहा होगा।

बौद्ध दर्शन के अनुसार दुख के 12 कारण हैं तृष्णा 5वें स्थाप पर है

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तृष्णा से मुक्ति भोग से नहीं शमन से संभव

महाभारत में राजा ययाति की कथा का उल्लेख है । कहा जाता है कि किसी समय दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री शर्मिष्ठा की शिकायत पर ययाति को शाप दे डाला कि वृद्धावस्था उन्हें समय से पूर्व ही शीघ्र आ घेरेगी । शाप के फलस्वरूप ययाति देह से जल्दी ही बूढ़े हो गये, किंतु उनकी दैहिक भोगेच्छाएं-कामनाएं समाप्त नहीं हो सकीं थीं । उन्होंने ऋषि शुक्राचार्य से क्षमा-याचना की तो उन्हें यह वरदान मिला कि वे अपने बुढ़ापे की किसी युवक की जवानी से अदला-बदली कर सकेंगे ।

भला कौन वृद्धावस्था स्वीकारने के लिए राजी होता ? राजा ययाति ने सबसे पहले अपने ही पांच पुत्रों के समक्ष अपनी चाहत की बात रखी । राजकुमार पुरु को छोड़कर शेष सब ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया । राजा ने पुत्र का यौवन प्राप्त कर लंबे समय तक दैहिक सुखों का भोग किया । अंत में उन्हें यह अनुभव हुआ कि दैहिक आनंद से उन्हें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती । तब उन्होंने अपने इस पुत्र को ‘उधार’ का यौवन लौटा दिया और उसे राजपाठ सोंपते हुए वानप्रस्थ आश्रम में चले गये । (कौरव-पांडव इन्हीं पुरु के कई पीढ़ियों के बाद के वंशज थे ।)

तृष्णा, अर्थात् भौतिक मूल के सुखों की कामना की तृप्ति, उन सुखों के अधिकाधिक भोग से नहीं बल्कि उनके ‘शमन’, यानी लालसाओं से स्वयं को मुक्त करने के माध्यम, से ही संभव है । राजा ययाति का उक्त ‘बुद्धत्व’ इस श्लोक में व्यक्त हैः

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एव अभिवर्तते ।।

(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 75, श्लोक 50)

अर्थात् मनुष्य की इच्छा कामनाओं के अनुरूप सुखभोग से नहीं तृप्त होती है । यानी व्यक्ति की इच्छा फिर भी बनी रहती है । असल में वह तो और बढ़ने लगती है, ठीक वैसे ही जैसे आग में इंधन डालने से वह अधिक प्रज्वलित हो उठती है । इसलिए इच्छाओं पर नियंत्रण (शमन) ही विवेकशील व्यक्ति के लिए अनुकरणीय मार्ग है ।

उक्त श्लोक का उल्लेख दो स्थलों पर दिखा । अध्याय 85 में भी यह श्लोक शब्दशः दुबारा शामिल है (महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 85, श्लोक 11) ।

पृथिवी रत्नसंपूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।।

(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 75, श्लोक 51)

इसका अर्थ यूं दिया जा सकता हैः पृथिवी रत्नों से भरी है; यह स्वर्ण (मूल्यवान धातुएं आदि), पशुधन, तथा स्त्रियों का भंडार है । यह सब एक व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं है ऐसा मानते हुए मनुष्य शमन का रास्ता अपनाये । ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सब मिल जाने पर भी असंतुष्ट बना रहेगा और काश! कि मेरे पास और अधिक होता जैसे भाव उसके मन में उत्पन्न होते रहते।

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ।।

(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 85, श्लोक 12)

इस श्लोक के अर्थ पहले उल्लिखित श्लोक के अर्थ के समान ही हैं । अर्थानुसार इस पृथिवी पर जो भी धान-जौ (अन्न), स्वर्ण, पशुधन एवं स्त्रियां हैं वे सब एक मनुष्य को मिलें तो भी पर्याप्त नहीं होंगे । इस तथ्य को जानते हुए व्यक्ति को चाहिए कि तृष्णा का परित्याग करे ।

इन सभी श्लोकों में जिस जीवन-दर्शन का उल्लेख है वह सार्थक है । परंतु एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि क्यों स्त्री को भी भोग्य वस्तुओं में शामिल किया गया है । ऐसा लगता है कि समस्त बातें पुरुषों को ध्यान में रखकर कही गयी हैं और धन-धान्य, रत्न, स्वर्ण, आदि एवं स्त्रियां पुरुषों के सुख-भोग के साधनों के तौर पर स्वीकारे गये हैं । मुझे ऐसी सोच आपत्तिजनक लगती है । तृष्णा के संदर्भ में कही गयी बातें तो स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिए समान रूप से लागू होती हैं; फिर क्यों केवल पुरुषों का नाम लिया गया । महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास ने स्त्री-पुरुषों के मध्य ऐसा भेद क्यों किया होगा ? प्रश्न विचारणीय है, पर इसका उत्तर मेरे पास तो नहीं है; कदाचित् संतोषप्रद उत्तर किसी के भी पास न हो ।

ययाति ग्रंथि

ययाति ग्रंथि वृद्धावस्था में यौवन की तीव्र कामना की ग्रंथि मानी जाति है। किंवदंति है कि, हस्तिनापुर के महाराज ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। ययाति पराक्रम, ऐश्वर्य और भोग-विलास करने के लिए अपने पुत्र पुरू से उसका यौवन लेते हैं और उसे अपनी जरावस्था दे देते हैं। ययाति को विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्हों ने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया। ययाति को वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने कहा-

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।

कालो न यातो वयमेव याताः

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥

अर्थात, हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !

तृष्णा अतृप्त है, कभी मर नहीं सकती है, कभी पूरी नहीं हो सकती

डॉऊजियिन ने सिकंदर से पूछा कि सिकंदर जब तू पूरा विश्व जीत लेगा तो उसके बाद क्या करेगा। सिकंदर उदास हो गया उसने कहा कि अरे इसके बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था । अतृप्ति किसी को सुख नहीं दे सकती है। मन रोज नयी चीजें मांगता है। हर बार उसे कुछ नया चाहिए। उसे एक कार की इच्छा आ गयी है। अब उसे कार में नहीं, कारों में दिलचस्पी है, संग्रह में दिलचस्पी है। धन कमाने वाला कभी धन को नहीं भोगता। कमाया फिर उसी में लगा दिया। नित नयी योजनाएँ फ़ैलाने में। योजनाएँ फ़ैलाने की इसी उधेड़बुन में पूरा जीवन चला गया। आखिरी पड़ाव पर जागा तो अब तो अकाउंट ही समाप्त हो गया। जो लोग संसार में रहते हैं वे अपने आखिरी क्षण में बहुत ही ज्यादा अस्वस्थ हो जाते है । शरीर में कमजोरी, चेहरे पर झुर्रियाँ क्योंकि अब उन्हें यह भय सताता है बुलावे का कि अब गया तब गया । पूरे जीवन भर क्या किया । चक्रव्यूह में जीवन को सही मायने में जीया ही नहीं, बस काटा है । परमात्मा में जीने की कला किसी बिरले में ही मिलती है । एक बच्चे के चेहरे को आप गौर से देखो, बड़ा ही निर्दोष, निर्भय, कोई डर नहीं, चिंता नहीं, हमेशा खिला-खिला तरोताजा । पर जब उम्र बढ़ी, समाज की परतें चढ़ी तो बाहर के धन को अंदर के धन से श्रेष्ठ समझ कर जीवन गुजारा । अंदर जो बीज परमात्मा से मिलन करवा सकता था, यूँ ही पड़ा रहा गया ।

कभी न बुढ़ाने वाली तृष्णा- नीतिवचन महाभारत से

महाकाव्य महाभारत के कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद उसके दुष्परिणामों से व्यथितयुधिष्ठिर शरशय्या पर पड़े पितामह भीष्म के समक्ष अपनी विविध शंकाएं-समस्याएं रखते हैं और उनसे उपदेशात्मक वचन सुनते हैं । तत्संबंधित अनुशासन पर्व में नीति संबंधी अनेक बातों का जिक्र मिलता है । एक स्थल पर भीष्म युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए मनुष्य की सहज वृत्ति ‘तृष्णा’ की चर्चा करते हैं – तृष्णा अर्थात् ऐहिक सुख-सुविधा, धन-संपदा, मान-प्रतिष्ठा, अधिकार-वर्चस्व आदि पाने-बटोरने की भूख । दो श्लोकों पर ध्यान विशेष तौर पर जाता है वे हैं:

या दुर्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।

यो९सौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ।।

(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ७, श्लोक २१)

जो तृष्णा सुमतिहीन व्यक्तियों द्वारा न छोड़ी जाती है, जो मनुष्य के वृद्धावस्था में पहुंच जाने पर भी स्वयं बुढ़ी नहीं होती, जो रोग की भांति प्राणघातक बनी रहती है, उस तृष्णा को त्याग देने पर ही वास्तविक सुखानुभूति मिलती है ।२१।

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।

चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते ।।

(यथा पूर्वोक्त, श्लोक २४)

मनुष्य के जराप्राप्त होने यानी बुढ़ा जाने पर उसके बाल भी वृद्ध हो जाते हैं, दांत भी उसके बूढ़े हो जाते हैं, आंख-कान भी वृद्ध हो जाते हैं, किंतु उसकी तृष्णा फिर भी यथावत् युवा बनी रहती है ।२४।

वास्तव में उम्र बढ़ने पर शरीर के विभिन्न अंग अपनी शक्ति-सामर्थ्य के चरम तक पहुंचते हैं और फिर उनमें विकार एवं ह्रास आरंभ हो जाते हैं । हमारी काया धीरे-धीरे अशक्त होने लगती है, बाल, दांत, आंख तथा कान जैसे अंग वृद्धावस्था के अनुरूप ढलने लगते हैं । सभी अंग नैसर्गिक नाश की ओर बढ़ने के संकेत देने लगते हैं । लेकिन मनुष्य की इच्छाएं तब भी सदैव की भांति तीव्र बनी रहती हैं । असहाय हो चुकने पर भी उसकी जिजीविषा, संपदा अर्जित करने की इच्छा तथा और अधिक समय तक सुख भोगने की लालसा तब भी बनी रहती हैं । अब मुझे अधिक कुछ नहीं चाहना है, बल्कि संसार से किसी समय पूर्वतः अघोषित क्षण पर अलविदा करने के लिए तैयार हो जाना चाहिये, यह भाव आम तौर पर किसी के मन में नहीं जगता है ।  इस भावना को वैदिक भारत में संन्यास कहा गया है । आज जो भी कदाचरण और आर्थिक भ्रष्टाचार अपने देश ही में नहीं बल्कि सारे विश्व में न्यूनाधिक मात्रा में देखने को मिल रहा है, वह इसी अदम्य तृष्णा या मानव मन में व्याप्त अतृप्त भूख का परिणाम है । पेट की भूख तो एक हद के बाद शांत हो जाती है, किंतु मन की भौतिक जगत् संबंधी पिपासा उतनी ही बढ़ती जाती है जितनी उसकी तृप्ति का प्रयास किया जाता है ।

Panchatantra Of Vishnu Sharma (Sampurna)

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Kabeer… Hazari Prasaad Dwivedi

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बौद्ध दर्शन के अनुसार दुख के 12 कारण हैं तृष्णा 5वें स्थाप पर है

वासना, आकर्षण व आसक्ति

चिकित्‍सा विज्ञान मानता है कि मानव शरीर प्रकृति की एक जटिलतम संरचना है। इसे नियंत्रित करने के लिए स्‍नायु तंत्र यानी नर्वस सिस्‍टम का एक बड़ा संजाल भी है, जो स्‍पर्श, दाब, दर्द की संवेदना को त्‍वचा से मस्तिष्‍क तक पहुंचाता  है। किशोरावस्‍था में विशिष्‍ट रासायनिक तत्‍व निकलते हैं जो स्‍नायुतंत्र द्वारा शरीर के विभिन्‍न हिस्‍सों तक पहुंचते हैं। इन्‍हीं में शामिल प्‍यार के कई रसायन भी हैं जो उम्र के विभिन्‍न पड़ावों पर इसकी तीव्रता या कमी का निर्धारण करते हैं। प्‍यार की तीन अवस्‍थाएं हैं-

वासना/तीव्र लालसा

इस अवस्‍था में विपरीत लिंगी को देखकर वासना का भाव उत्‍पन्‍न होता है, जो दो तरह के हार्मोन से नियंत्रित होता है। पुरुषों में ‘टेस्‍टोस्‍टेरोन’ तथा महिलाओं में ‘इस्‍ट्रोजेन’ हार्मोन होते हैं, जो वासना की आग भड़काते हैं। वासना या लालसा का दौर क्षणिक होता है।

आकर्षण
वासना की तीव्रतर उत्कंठा के बाद आकर्षण या प्रेम का चिरस्थायी दौर प्रारंभ होता है जो व्यक्ति में अनिद्रा, भूख न लगना, अच्छा न लगना, प्रेमी को तकते रहना, यादों में खोए रहना, लगातार बातें करते रहना, दिन में सपने देखना, पढ़ने या किसी काम में मन न लगना जैसे लक्षणों से पीड़ित कर देता है। इस अवस्था में डोपामिन, नॉर-एपिनेफ्रिन तथा फिनाइल-इथाइल-एमाइन नामक हारमोन रक्त में शामिल होते हैं।

डोपामिन को ‘आनन्द का रसायन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह ‘परम सुख की भावना’ उत्पन्न करता है। नॉर-एपिनेफ्रिन नामक रसायन उत्तेजना का कारक है जो प्यार में पड़ने पर आपकी हृदय गति को भी तेज कर देता है। डोपामिन और नॉर-एपिनेफ्रिन मन को उल्लास से भर देते हैं। इन्हीं हारमोनों से इंसान को प्यार में ऊर्जा मिलती है। वह अनिद्रा का शिकार होता है।  प्रेमी को देखने या मिलने की अनिवार्य लालसा प्रबल होती जाती है। वह सारा ध्यान प्रेमी पर केन्द्रित करता है।

लगाव/ अनुराग/ आसक्ति

प्यार की इस अवस्था में प्रीति-अनुराग बढ़कर उस स्तर पर पहुंच जाती है कि प्रेमी संग साथ रहने को बाध्य हो जाते हैं। उन्हें किसी अन्य का साथ अच्छा नहीं लगता और `एक में लागी लगन´ का भाव  स्थापित हो जाता है। इस अवस्था का रसायन है ऑक्सीटोसिन तथा वेसोप्रेसिन।ऑक्सीटोसिन जहां `निकटता का हार्मोन´ है, वहीं वेसोप्रेसिन प्रेमियों के मध्य लंबे समय तक सम्बंधों के कायम रखने में अपनी भूमिका निभाता है। वेसोप्रेसिन को `जुड़ाव का रसायन´ कहा जाता है।

हार्मोन का स्‍तर उम्र के साथ बदलता रहता है

शरीर में इन हार्मोंस तथा रसायनों का आवश्यक स्तर बना रहने से आपसी सम्बंधों में उष्णता कायम रहती है। शरीर में स्वाभाविक रूप से किशोरावस्था, यौवनावस्था या  विवाह के तुरन्त पूर्व व बाद में इन रसायनों व हार्मोंस का उच्च स्तर कायम रहता है। उम्र ढलते-ढलते इनका स्तर घटने लगता है और विरक्ति, विवाहेत्तर सम्बंध जैसी भूल/गलती घटित हो जाती है।

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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3 Responses to ‘तृष्णा’ अजर-अमर, अविनाशी है

  1. Deepti Katiyar says:

    Good Thought 🙂

  2. Lalan Jha says:

    उत्तम विचार…

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