अथ श्री दामाद कथा

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उत्तर भारत में दामाद की खातिरदारी की खातिर कुछ भी कर गुजरने की परम्परा है। भले ही गैर कानूनी हो, पर दामाद को खुश करने का यह सिलसिला विवाह के समय दहेज से शुरू हो कर आगे तक चलता ही रहता है। फिर आंचलिक परंपरा तो किसी एक घर के दामाद को गांव भर का दामाद मान कर उसकी खातिरदारी करने की भी रही है।

  • आजकल देश के चर्चित दामाद चर्चा में हैं। कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाढरा की खातिरदारी में कांग्रेस की सरकारें उसी परंपरा का पालन करती नजर आ रही हैं। अपनी नेता के दामाद को पूरी कांग्रेस का ही दामाद मान कर उसकी खातिरदारी में कांग्रेस सरकारें सारे नियम-कानूनों को ही ताक पर रख कर जिस तरह जुट गयी हैं, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।
  • केंद्रीय कृषि मंत्री और एनसीपी नेता शरद पवार बेटी सुप्रिया सुले और दामाद सदानंद सुले का नाम विवादों में है… उन पर लवासा सिटी में धांधली का आरोप लगा। जिसका खण्डन एनसीपी करती रही है।

भारतीय समाज का सबसे महत्वपूर्ण आदमी- दामाद

भारतीय समाज में एक आदमी से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं होता। वो आदमी है- दामाद। दामाद सिर्फ आदमी नहीं है। एक परंपरा है। एक उत्सव है। दामाद आता है तो पूरा घर मुस्कराने लगता है। गरीब घर का बच्चा भी उछलने-कूदने लगता है।

जो घर में दाल-रोटी भी मुश्किल से जुटता है, और दाल-रोटी का साथ भाजी शायद ही कभी बनता है, दामाद के आने पर वो घर में पकवान बनता है। खीर-पूरी बनता है। खीर-पूरी बनाने का साधन किधर से आता है, ये गरीब घर के बच्चे लोग को कभी समझ में नहीं आता।

इसमें बच्चे लोग का कोई दोष नहीं है। जब देश को समझ नहीं आता, तो बच्चे किधर से समझेंगे। जी हां, दामाद देश का भी होता है।

कुछ लोग बोलते है दामाद बेटे जैसा होता है। लेकिन, आप अपने बेटे को कभी ‘जी’ कह कर नहीं बुलाते। झोंपड़ी में रहने वाला ससुर भी झोंपड़ी में रहने वाले दामाद को ‘कुंवर जी’ बोलता है।

भीखू, कालू, डमरू नाम का दामाद को भी ‘कुंवर जी’ कहलाने में कोई संकोच महसूस नहीं होता। दामाद लोग की संस्कृति में संकोच नाम की भावना नहीं पाई जाती है।

तो, दामाद एक उत्सव है। एक भारी उत्सव। इतना भारी कि वो ससुराल के लिए बोझ बन जाता है। धीरे-धीरे दामाद लोग इतने बोझिल हो गये है कि साधारण लोग का लिए आतंक बन गये है। ये डर बहुत भयानक होता है। कल को दामाद का आतंक झेलना पड़ेंगा।

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बांग्ला संस्कृति में जमाई षष्ठी पर्व की एक अलग पहचान है। बंगाल भर में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। जमाई षष्ठी में भगवान षष्ठी की पूजा होती है। इसमें दामाद को भगवान का रूप दिया जाता है। ससुराल वाले दामाद के हाथ में रक्षा सूत्र बांध उनकी लंबी आयु की कामना करते है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को बंगाली समुदाय में जमाई षष्ठी मनाई जाती है। बंगाली समुदाय की महिलाएं सुबह पीपल वृक्ष के नीचे पूजा अर्चना कर जमाई दीर्घायु होने की कामना करती हैं ।यह समय गर्मी का होता है ऐसे में उन्हें कोई परेशानी न हो इसके लिए हाथ का पंखा हिलाकर नए फल और तरह-तरह के पकवान खाने को दिए जाते हैं। बंगाल की प्रसिद्ध मिष्टी दही और माछ तो खाया ही जाता है और उसे आसपास के लोगों में बांटा भी जाता है। किसी भी उम्र के दामाद क्यों न हो ससुराल पक्ष नए वस्त्र और विभिन्न प्रकार की फल, मिठाईयां और माछ लेकर उनका स्वागत करता है। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य साथ में भोजन करते हैं।

पुराणों में कुछ बड़े दामाद

  • दुनिया के पहले दामाद- भगवान शिव, सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष के दामाद… ससुर से नहीं बनी
  • भगवान राम- सीता के पति मिथिलापुरी के राजा जनक के दामाद… ससुर के सबसे प्रिय
  • राक्षसराज रावण- मंदोदरी के पति मायासुर के दामाद… मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में रावणग्राम और मंदसौर जिले के नामदेव में दामाद की तरह पूजा जाता है रावण
  • दुनिया के पहले दामाद- पुराणों में जिर्क है भगवान शिव, सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष के दामाद, कनखल (हरिद्वार) उनका ससुराल

भगवान शंकर से पहले कहीं भी दामाद या जमाई का उल्लेख नहीं मिलता…

राजा दक्ष ने की अपने दामाद की उपेक्षा… दक्ष द्वारा किए गए यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए। नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने मना कर दिया। लेकिन सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष ने भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी और उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। तब भगवान शिव ने सती के वियोग में यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहाँ महाशक्तिपीठ का उदय होगा।

मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में रावणग्राम और मंदसौर जिले के नामदेव में दामाद की तरह पूजा जाता है रावण

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा रावण के पुतलों के दहन के साथ सम्पन्न होता है। लेकिन मध्य प्रदेश में कई जगह दशहरे पर रावण का दहन नहीं, बल्कि उसकी पूजा का आयोजन हुआ है। कोई अपने को रावण का वंशज मानता है तो कोई उसे दामाद।  राज्य के विदिशा जिले में रावणग्राम है। इस गांव में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का बाहुल्य है। यह ब्राह्मण कुल रावण को अपना पूर्वज मानता है। इस गांव में रावण का मंदिर भी है। इस मंदिर में दशहरे के मौके पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया है, और रावण बाबा नम: के मंत्र भी गूंज रहें हैं।  रावण ग्राम में 9वीं से 14वीं सदी के मध्य का एक प्राचीन मंदिर भी है। इस मंदिर में रावण की एक प्रतिमा है, जो लेटी हुई है। ग्रामीण बताते हैं कि इस प्रतिमा को जब खड़ा करने की कोशिश की गई तो अपशगुन हुआ।  गांव के लोगों का कहना है कि रावण शिव भक्त था और अत्यंत विद्वान था। लिहाजा उसके पुतलों का दहन नहीं किया जाना चाहिए। इस गांव के लोग रावण की पूजा-अर्चना कर मंगल कामना कर रहे हैं।  इसी तरह मंदसौर जिले के नामदेव सम्प्रदाय के लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं। मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मंदसौर में मायका था। खानपुर गांव में रावण की प्रतिमा है। यहां की महिलाएं विशेष रुप से अपने दामाद की पूजा करती हैं। इस गांव में रावण का वध तो होता है, मगर यहां के निवासी इससे पहले रावण से क्षमा मांगते हैं।  इंदौर में भी रावण के भक्त हैं, जो दशहरे पर शिवभक्त रावण की पूजा करते हैं। यह सिलसिला बीते चार दशकों से चला आ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। इस दशहरे पर भी ऐसा ही कुछ नजारा है। रावण की पूजा करने वालों का जय लंकेश मित्र मंडल है। इस मंडल ने रावण का मंदिर बनाने के लिए सरकार से जमीन मांगी मगर सफलता नहीं मिली। आखिर में मंडल के अध्यक्ष मेहश गोहर अपनी जमीन पर मंदिर बनवा रहे हैं।

हाई-प्रोफाइल गांधी-नेहरू परिवार के दो दामाद

नेहरू-गांधी परिवार भले ही हाई-प्रोफाइल रहा हो, लेकिन इस परिवार के दामाद हमेशा लो प्रोफाइल रहे हैं. चाहे मीडिया हो या आम आदमी कोई भी इस पारिवार के दामादों के बारे में ज्यादा नहीं जानता. यहां फिरोज गांधी और रॉबर्ट वाड्रा की बात हो रही है. फिरोज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी के दामाद थे और रॉबर्ट वाड्रा यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं.

दुनिया में दामादवाद का दर्द

यह केवल भारत का ही मामला नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी हों या कि सोनिया गांधी इन दोनों के राज में पिछले एक डेढ़ दशक में दामादवाद सभी विचारधाराओं पर भारी पड़ा है। सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया के सत्ता समीकरण में दामादवाद एक अलौकिक विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुका है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की ‘गॉडमदर’ सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वड्रा की बिचौलिया प्रवृत्ति का राष्ट्रीय पर्दाफाश हो चुका है। रॉबर्ट वड्रा पर ‘टीम केजरीवाल’ की ओर से प्रहार होते ही जिस अंदाज में कांग्रेस प्रवक्ताओं के टिड्डीदल ने आरोप लगानेवालों पर अपशब्दों की बौछार की उससे सिद्ध हो गया कि अबकी विरोधियों का तीर सत्ता संचालक शक्ति के नाजुक अंग पर हुआ है।

वैचारिक पतन: कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस के पदाधिकारियों का जो वैचारिक पतन हुआ है क्या पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकाल में परिवार के पापों का ऐसा फूहड़ बचाव संभव था? क्या कोई कांग्रेसी पं. नेहरू से फिरोज गांधी के बचाव में कांग्रेसियों से इस तरह की बयानबाजी सहने की भी उम्मीद पाल सकता था? क्या इंदिरा गांधी ने कभी सोनिया गांधी पर उछले आरोपों के लिए इस अंदाज में कांग्रेस प्रवक्ताओं को ललकारा? दरअसल 1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद पुनर्गठित हुए देशों के समाज में सत्ताधारी परिवारों के भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का स्वरूप दे दिया गया है। विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के औपनिवेशिक विस्तार ने जिस तरह भारत को रॉबर्ट वड्रा जैसा झोलर दामाद दिया है, ठीक वैसी ही संतान-रिश्तेदार पोषित-प्रेरित भ्रष्टाचार तमाम देशों में प्रश्रयप्राप्त है।

रूस में भ्रष्टाचार: भारत की तरह ही 1990 के दशक में सोवियत विघटन के बाद टूटे केजीबी के अफसर/एजेंट मय अपने रिश्तेदारों के भ्रष्टाचार के बड़े कांडों को अंजाम देने में व्यस्त हैं। सोवियत संघ से टूटकर अलग हुआ था एक देश अजरबैजान। 1993 में केजीबी के एक पूर्व मुखिया हैदर अलीयेव अजरबैजान के राष्ट्रपति बन गए। यूरोप के रेडियो लिबर्टी ने बीच के दिनों में हैदर अलीयेव के पुत्र इलहाम अलीयेव के परिजनों की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक किया। इलहाम की बेटियों लेयला (27) और आरजू अलीयेवा के नियंत्रण वाली कंपनी अजरबैजान इंटरनेशनल मिनरल रिसोर्सेज ऑपरेटिंग कंपनी (एयरॉक) को सन् 2007 में 6 स्वर्णखदानों का आबंटन कर दिया गया। सरकारी समझौते के अनुसार उत्खनित स्वर्ण का 70 फीसदी हिस्सा ‘एयरॉक’ को जबकि सिर्फ 30 प्रतिशत हिस्सा अजरबैजान सरकार को मिलेगा। इन छह खानों में अकेले चोवदार पट्टे में 44 टन स्वर्ण और 164 टन चांदी होने का अनुमान है। लेयला और आरजू पनामा में पंजीकृत हगसन मैनेजमेंट, ग्रिनेल मैनेजमेंट और ग्लैडविन मैनेजमेंट नामक तीन कंपनियों की भी नियंता है। अजरबैजान की वित्तीय सेवा, बीमा और निर्माण क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी मानी जाती है एटीए होल्डिंग्स। एटीए का 51 प्रतिशत शेयर हगसन के नाम है। अजरबैजान की सबसे बड़ी टेलिकॉम कंपनी अजेरफोन के भी 72 प्रतिशत शेयर हगसन, ग्रिनेल और ग्लैडविन के पास हैं। देश की प्रमुख एयरलाइन कंपनी ‘अजल’ पर आरजू एस.डब्ल्यू. होल्डिंग्स के माध्यम से नियंत्रण रखती है।

‘‘वॉशिंगटन पोस्ट’ का दावा: वॉशिंगटन पोस्ट’ के मुताबिक अजरबैजान के राष्ट्रपति हैदर के बच्चों ने अकेले 2009 में दुबई में 75 मिलियन डॉलर की रकम से रियल इस्टेट में खरीददारी की। राष्ट्रपति के 11 वर्षीय बेटे के नाम से दुबई के लक्जरी अपार्टमेंट ‘पाम जुमेरा’ में 44 मिलियन डॉलर के निवेश से घर खरीदा गया।

कजाकिस्तान के अमीर: सोवियत संघ के विघटित दूसरे प्रमुख देश का नाम है कजाकिस्तान। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नजरबायेव की तीन बेटियां हैं। नूर सुल्तान के दामादों का वैभव पश्चिमी देशों की पत्रिकाओं के रुचि का विषय है। राष्ट्रपति की सबसे बड़ी बेटी डारिगा और उसके पति ने खुद का राजनीतिक दल चलाया। 2007 में डारिगा के तेल व्यापारी पति राशिद सरसेनोव पर अपने ससुद के खिलाफ बगावत का षड्यंत्र रचने का आरोप लगा। तब से राशिद निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। डारिगा का उनसे तलाक हो चुका है। फिर भी डारिगा ‘फोर्ब्स पत्रिका’ के अनुसार 585 मिलियन डॉलर संपत्ति की मालकिन हैं और कजाकी अमीरों में तेरहवें स्थान पर उनका नाम है। राष्ट्रपति की दूसरी बेटी दिनारा ‘फोर्ब्स’ अमीरों की सूची में 1.3 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ कजाक अमीरों में तीसरे क्रमांक पर हैं। राष्ट्रीय तेल, गैस और रेलवे तीनों व्यापारों पर दिनारा और उसके पति का नियंत्रण है। अमेरिका के लीक हुए राजनयिक केबलों में अनुमान लगाया गया था कि कजाकिस्तान की 90 फीसद अर्थतंत्र पर दिनारा के पति का प्रभाव है। राष्ट्रपति हैदर की तीसरी बेटी आलिया ने 1998 में किर्गिजिस्तान के राष्ट्रपति असकर अकायेव के बड़े बेटे ऐदर से विवाह किया था। यह विवाह जल्द ही टूट गया और 2002 में उसने दानियर खासेनोव नामक व्यापारी से विवाह कर लिया। आलिया कजाकिस्तान में इटली के प्रख्यात ज्वेलरी ब्रांड ‘दामियनी’ की दुकानें चलाती हैं।

किर्गिजिस्तान की कहानी: सोवियत संघ से टूटे तीसरे देश किर्गिजिस्तान की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। उसके तानाशाह राष्ट्रपति कुमनिबेक बाकीयेव को 2010 के तख्तापलट में हटाया गया। बाकीयेव के पुत्र मकसीम ने देश की सबसे बड़ी बैंक एशिया यूनिवर्सल बैंक को लंबा चूना लगा दिया। सोवियत संघ के केजीबी के पूर्व प्रमुख रहे हैं। पुतिन के काल में रूसी अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण हुआ। पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तिसिन के साथ जॉर्जी सतारोव के अनुसार रूसी अर्थव्यवस्था में प्रति वर्ष 400 बिलियन डॉलर की रकम रिश्वत के रूप में ली-दी जाती है।

रूसी निवेश का सच: रूसी सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) में रिश्वत की हिस्सेदारी 20 फीसद होने का अनुमान लगाया जाता है। रूस में बढ़ते भ्रष्टाचार के चलेत वित्त वर्ष 2012 की पहली तिमाही में 42 बिलियन डॉलर का निवेश वापस चला गया। पुतिन के तमाम दोस्त और रिश्तेदार उनकी मेहरबानी से देखते-देखते अरबपति हो गए। पुतिन के दोस्तों में कोवालचुक और रोटेनबर्ग भाइयों ने अरबों डॉलर की संपत्ति जमा की। अरकाडी रोटेनबर्ग 1990 के दशक में पुतिन को ‘जूडो’ सिखाते थे। पुतिन के प्रश्रय से देखते-देखते रोटेनबर्ग परिवार का आर्थिक साम्राज्य विस्तृत हो गया। सोवियत संघ से विघटित हुए देशों में अधिकांश ने साम्यवाद का चोला उतरते ही अमेरिकोन्मुखी बाजारवाद का जायका लिया। पश्चिमी देशों से संस्कृति के साथ-साथ विलासिता और संस्थानीकृत भ्रष्टाचार का भी प्रसार हुआ।

चीन में बाजारवाद: चीन में बो शिलाई का मामला तो ताजा ही है। 1990 के दशक में लाल चीन में भी बाजारवाद की पैठ हुई। बो शिलाई की तरह ही चीन के लगभग हर प्रांत में ऐसे ‘प्रिंसलिंग’ (राजकुंवर) मिल जाएंगे जिन्होंने अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में चीन से लूटे गए धन का मोटा निवेश किया है। चीनी जनता अपना खून-पसीना बहाकर चीनी राजकोष को भरती है और उसके शासकों के परिजन उन्हें लूटकर यूरोप और अमेरिका के खजाने भरते हैं। बीते दो दशकों में चीन की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व रहे हैं जियांग जेमिन। ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ‘नोकिया’ जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चीन में प्रवेश जियांग जेमिन के पुत्र जियांग मियानहेंग को साझेदारी के बाद ही संभव हुआ। प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के बेटे वेन यूनसांग एशिया की सबसे बड़ी सैटेलाइट कंपनी का प्रमुख है। राष्ट्रपति हु जिंताओ के बेटे हु हाईफेंग को एयरपोर्ट की सुरक्षा में लगे स्कैनर का ठेका मिला हुआ है। रिश्तेदारों-परिजनों को लाभ पहुंचाने की वृत्ति वैश्विक है।

पाकिस्तानी दामाद: पाकिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ठीक उसी तरह भुट्टो परिवार के दामाद के रूप में आए जैसे रॉबर्ट वड्रा नेहरू-गांधी परिवार के दामाद बनकर आए। बेनजीर भुट्टो की मां नुसरत भुट्टो भी पाकिस्तान के लिए विदेशी मूल की थीं। नुसरत ईरानी थीं। बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो और नुसरत के संबंधों पर ही पाकिस्तानी संदेह करते हैं। आसिफ अली जरदारी की तरह ही रॉबर्ट वड्रा की सास सोनिया गांधी भी विदेशी मूल की महिला हैं। पाकिस्तान की तरह ही अफगान शासक परिवार में भी रिश्तेदारों का भ्रष्टाचार चर्चित हुआ है। अफगान राष्ट्रपति हामिद करजाई के भाई शाह वली करजाई पर 55 मिलियन डॉलर की रकम ऐनो मेना नामक परियोजना से पार देने का आरोप है।

निःसंकोच कमाई: जिस किसी के हाथ में सत्ता के सूत्र आए, फिर वह चाहे सऊदी अरब का सऊद परिवार हो, पाकिस्तान का जरदारी-भुट्टो और शरीफ परिवार हो, बांग्लादेश का खालिद जिया परिवार, रूस का पुतिन परिवार, चीन का जेमिन परिवार या भारत का गांधी-नेहरू परिवार हर किसी ने भ्रष्टाचार करने में कोई संकोच नहीं किया। जहां तक मिला सरकारी अधिकारी का उपयोग धन कमाने के लिए किया गया। इसलिए रॉबर्ट वड्रा के अकूत धन कमाने पर आम भारतीय चकित हो सकता है पर वैश्विक भोगवाद के अलंबरदार तो इसे सहज क्रिया मानेंगे। सत्ता व्यभिचारिणी कहलाती है उसकी व्यभिचारी वृत्ति का मजा शासक लेते हैं। विदेशों में भी दामादों पर विशेष कृपा हुई है। इधर भारत में सोनिया गांधी के वरदहस्त पर रॉबर्ट वड्रा के वारे-न्यारे हैं। यहां अंग्रेजी की कहावत चरितार्थ हो रही है- ईस्ट और वेस्ट दामाद इज बेस्ट।’

कुछ लोगों को अपने दामाद पर गर्व होता है

सचिन जैसा दामाद पाकर मुझे फक्र है : अनाबेल

नई दिल्ली : क्रिकेट के मैदान पर अनेक इतिहास रच चुके सचिन तेंदुलकर की सास अनाबेल मेहता का कहना है कि वह मैदान के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर भी चैम्पियन है और ऐसा दामाद पाने पर उन्हें फख्र है। सचिन की पत्नी अंजलि की मां अनाबेल ने कहा, ‘‘सचिन मैदान के भीतर ही नहीं बल्कि मैदान के बाहर भी चैम्पियन है। वह बेहतरीन इंसान है और सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचता बल्कि दूसरों की भी चिंता करता है।’’ सचिन ने 1995 में व्यवसायी आनंद मेहता और ब्रिटिश सामाजिक कार्यकत्र्ता अनाबेल मेहता की बेटी डाक्टर अंजलि से विवाह किया था। मुम्बई में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चों की बेहतरी के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन ‘अपनालय’ से जुड़ी मेहता ने कहा, ‘‘मैं अपनालय से 1972 से जुड़ी हूं। सचिन 1999 विश्व कप के दौरान अपने पिता की मृत्यु के बाद इससे जुड़े। वह बच्चों के लिए कुछ करना चाहते थे चूंकि उनके पिता एक शिक्षक थे। उन्होंने अपनालय से जुडऩे की इच्छा जताई और तभी से बच्चों के प्रायोजन में आर्थिक मदद कर रहे हैं।’’

मेरा दामाद बहुत सुंदर है : हेमा मालिनी

धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी की बड़ी बेटी ईशा देओल ने रविवार को व्यवसायी भरत तख्तानी से सगाई कर ली। बॉलीवुड की ‘ड्रीम गर्ल’ हेमा का कहना है कि उनका दामाद बहुत सुंदर है।

  • यही नहीं दामाद के ऊपर बॉलीवुड भी मेहरबान रहा है.. जैसा की दमाद पर दामाद, जमाई राजा, मेरा दामाद जैसी फिल्में भी बन चुकी है।
  • साहित्य में भी जमाई पर कहानी लिखी गई… मुंशी प्रेमचंद की कहानी “घर-जमाई”
  • कई बार दामाद हिंसक भी हो जाते हैं… खबरें आती है कि दामाद ने सास ससुर की हत्या कर दी… लेकिन कभी-कभी तो खबरें उल्टी भी हो जाती हैं जैसे “संपत्ति न मिलने पर कराई दामाद की हत्या”

कैसा रिश्ता है ये, दामाद का ?

विवाह के पश्चात् प्रत्येक पुरुष दामाद बनता है, परन्तु ससुराल वालों के लिए उसका व्यव्हार कुछ अलग ही हो जाता है क्यों?

हमारे समाज में एक रिश्ता होता है, दामाद यानि बेटी का पति. किम्वदंती है, दामाद का अर्थ है एक ऐसा शख्स जिसके सान्निध्य से आपको दमा हो जाय और कभी कभी दामाद यानि जमी को जाम अर्थात यम की उपाधि से नवाजा जाता है यह किसी एक व्यक्ति पर आक्षेप नहीं है, समाज में प्रत्येक पुरुष कभी न कभी दामाद भी होता है .प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव भी अलग अलग होता है ,परन्तु प्रत्येक पुरुष (अपवाद को छोड़ कर)का व्यव्हार सामान्यतया अपने ससुराल वालों के साथ एक सा ही होता है .

अब देखते हैं कैसा अजीब रिश्ता है यह ,जिसका व्यव्हार अच्छे अच्छे दिग्गजों को असहाय बना देता है .आप अपने कलेजे के टुकड़े को ,जिसे पाल पोस कर युवावस्था तक पहुँचाने में अथक परिश्रम किया . यानि बेटी को सौंप देते हैं (दामाद को )साथ में अपनी सामर्थ्य से भी अधिक उपहार आदि देते हैं ,अपने पुत्र के बराबर दर्जा प्रदान करते हैं और साथ में मान सम्मान का पूरा ध्यान रखते हैं .कहने का तात्पर्य यह है की एक ऐसा अनजान व्यक्ति जिसे कुछ समय पूर्व तक जानते भी नहीं थे ,अपना सब कुछ सौंप देते हैं और उनसे ही अपनी बेटी की कुशलता की कामना करते हैं .सब कुछ न्योछावर करने के पश्चात् आप याचक बन जाते हैं ,परन्तु दामाद आपका शुक्रगुजार नहीं होता .उस पर भी तुर्रा यह यदि अपने उसके मान सम्मान में कहीं कोई चूक कर दी तो आपको जलील करने या अपमानित करने में कसर नहीं छोड़ता .

उसका व्यव्हार अपने माता पिता के प्रति कुछ और एवं अपनी पत्नी के माता पिता के लिए कुछ और होता है .परन्तु पत्नी से हमेशा चाहता है की वह उसके माता पिता की सेवा सुश्रुषा करे चाहे उनका व्यव्हार कितना भी कटु क्यों न हो ?चाहे वे उसे प्रताड़ित क्यों न करते हों .

दामाद चाहे जब आपकी बेटी की ख़ुशी के बदले आपको ब्लाक मेल भी कर सकता है . आप अपने दामाद को हर प्रकार की खुशियाँ देना चाहते हैं ,परन्तु उसके लिए(दामाद) आपका सुख या दुःख कोई मायेने नहीं रखता .उसकी निगाह में ससुराल वाले दोयम दर्जे के नागरिक हैं .ससुराल वालों को प्रताड़ित करना ,बात बात पर उनमे कमियां निकलना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है .जबकि आप बेटी द्वारा सात फेरे लेने के पश्चात् उनमे कमियां निकलना तो दूर ,उफ़ तक नहीं कर सकते .और भी मजेदार बात यह है वह आपकी प्रयेक खुशियों को ग्रहण लगाने में अपनी शान समझता है ,यदि उसने आपके परिवार की खुशियों में रंग में भंग नहीं किया तो असली दामाद नहीं .

आपका कर्त्तव्य है की दामाद के प्रत्येक सुख दुःख में आप एक गुलाम की भांति सेवा भाव लिए हाथ जोड़े खड़े रहें ,परन्तु गलती से अपने दामाद को अपना बेटा समझने की भूल कर दी ,और उससे कुछ कार्य करवा लिया ,तो निश्चित रूप से उसका अहसान बहुत बड़ी कीमत देकर चुकाना पड़ सकता है .

दामाद यानि ऐसा शख्स जिसे आप सर्वस्व लुटा देते हैं ,और बदले में पाते हैं ,अपमान ,तिरस्कार ,घृणा ,और आपकी कमाई हुई दौलत पर लालच भारी निगाहें .ऐसा प्यारा जग से न्यारा रिश्ता है दामाद का .

क्या दामाद का रिश्ता पुत्र बन कर मधुरता के साथ नहीं निभाया जा सकता ?क्या ससुराल पक्ष को ओप्चारिक्ताओं का लबादा उतार कर सम्मानपूर्वक जीने का हक़ देना उचित नहीं होगा ? क्या शिकायतों के भंडार के साथ जीवन को धोना उचित है ?क्या यही रिश्तेदारी होती है ?क्या दामाद का फर्ज अपने ही परिवार की सदस्य यानि पत्नी को ससम्मान और शांती पूर्वक जीने का हक़ नहीं देना चाहिए ?क्या वह अपनी पत्नी के मैके वालों का सम्मान कर अपनी पत्नी के दिल में अपने परिवार के सदस्यों के प्रति सम्मान नहीं बढा देगा ?क्या सिर्फ नफरत एवं भय से पति – पत्नी के रिश्ते मधुर रहा सकते हैं ?क्या औप्चारिक्तों की खातिर रिश्तो की मिठास एवं प्यार को दफ़न कर देना उचित है ?ऐसी ओप्चारिक्तायें जिससे आपसी संबंधों में कडुवाहट आती हो को समाप्त नहीं कर देना चाहिए ?सामाजिक समरसता ,मधुरता का भाव लाकर समाज को उन्नति के शिखर पर ले जाने में सहायक नहीं होगा ?

दामाद की सेवा करना सबका पहला फर्ज

एक सरकारी नेता ने अपने प्रमुख विपक्षी दल पर ताना कसते हुए कहा कि भाई, हमारे दामाद पर सवाल क्यों उठाते हो? क्या हमने कभी तुम्हारे दामाद पर सवाल उठाया? सही बात है। दामाद तो सभी के होते हैं और उनकी इज्जत का ख्याल तो सबको करना पड़ता है। यह अपने देश की परंपरा रही है कि यहां दामादों को कुछ विशेषाधिकार मिले हुए होते हैं। जैसे-वे ससुराल में अपनी सालियों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। फिजूल में ही नखरे दिखा सकते हैं। मोटर-साइकिल या किसी अन्य वस्तु के लिए वे ससुराल पर दबाव डाल सकते हैं। कुछ दामाद तो ऐसे भी होते हैं, जो डिमांड पूरी न होने पर अपनी पत्नी को घर से भी निकाल सकते हैं। यानी, हमारे देश में दामाद सबसे महत्वपूर्ण प्राणी होता है। उसकी सेवा करने को लोग अपना सबसे पहला कर्तव्य समझते हैं।

हम में से जितने भी विवाहित पुरुष हैं, वे किसी न किसी के दामाद ही हैं। हम सबने कभी न कभी दामादों को मिले विशेष अधिकारों का फायदा उठाया है। हमने उस भेंट को सप्रेम स्वीकार किया है, जो हमें दामाद के रूप में ससुराल से मिलती है। जिन्होंने प्रेम-विवाह किया है और जो अब तक अपने ससुराल वालों से पटरी नहीं बैठा पाए हैं, हालांकि वे ससुराल से मिलने वाली भेंट को रिश्वत कह सकते हैं, पर सच यह भी है कि यह रिश्वत तो वे भी लेना चाहते होंगे। सासू मां यह घूस इसलिए देती है कि बेटा, मेरी बेटी का ख्याल रखना। उसे समय-समय पर महंगी साड़ियां, गहने व मेकअप का सामान देते रहना। बेटी चाय भी ठीक से नहीं बना पाती है, इसलिए किचन में उसकी मदद करते रहना।

कुछ ससुराली तो दामादजी से यह भी कह देते हैं कि बेटा, मेरी बेटी से डरना। अगर वह डाटे-डपटे, तो चूं भी नहीं करना। यदि उसकी इच्छा पीटने की बोले, तो उसे भी पूरा करना और सहनशील बने रहना, क्योंकि सहनशीलता हर पति का मूल स्वभाव होती है। जो अपने इस स्वभाव को छोड़ देता है, उसे जेल जाना पड़ता है। भले ही उसने दहेज के नाम पर एक फूटी कौड़ी न मांगी हो, पर जब बेटी शिकायत करती है, तो ससुराली दामाद के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा ही दर्ज कराते हैं। फिर, पुलिस तो सक्रिय हो ही जाती है और दामाद सहित उसके पूरे परिवार को जेल की यात्र करनी पड़ती है। यह सब इशारे ससुराली अपने दामाद को भेंट देते वक्त ही करते हैं। इसमें सुविधा रहती है। चूंकि दामाद की जेब में नोट पहुंच रहे होते हैं। अत: वह इन बातों का बुरा नहीं मानता।

वैसे, भेंट देना और उसे स्वीकार करना अपने देश में एक सामाजिक प्रथा भी है। जब राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता का विवाह भगवान राम से किया था, तो उन्होंने भी भगवान को भेंट दी थी। उन्होंने भारी सामान अयोध्या भेजा था। ऐसे में यदि सरकार के दामाद को किसी ने भेंट दे दी, तो इसमें गलत क्या हुआ? दामाद तो होते ही इसलिए हैं कि उनकी सेवा की जाए। अत: भलाई इसी में है कि कोई किसी के दामाद पर उंगली न उठाए। दामाद की सेवा तो सब करते हैं। यह बात जुदा है कि सब पकड़े नहीं जाते।

काका हाथरसी» जम और जमाई

बड़ा भयंकर जीव है , इस जग में दामाद

सास – ससुर को चूस कर, कर देता बरबाद

कर देता बरबाद , आप कुछ पियो न खाओ

मेहनत करो , कमाओ , इसको देते जाओ

कहॅं ‘ काका ‘ कविराय , सासरे पहुँची लाली

भेजो प्रति त्यौहार , मिठाई भर- भर थाली

लल्ला हो इनके यहाँ , देना पड़े दहेज

लल्ली हो अपने यहाँ , तब भी कुछ तो भेज

तब भी कुछ तो भेज , हमारे चाचा मरते

रोने की एक्टिंग दिखा , कुछ लेकर टरते

‘ काका ‘ स्वर्ग प्रयाण करे , बिटिया की सासू

चलो दक्षिणा देउ और टपकाओ आँसू

जीवन भर देते रहो , भरे न इनका पेट

जब मिल जायें कुँवर जी , तभी करो कुछ भेंट

तभी करो कुछ भेंट , जँवाई घर हो शादी

भेजो लड्डू , कपड़े, बर्तन, सोना – चाँदी

कहॅं ‘ काका ‘, हो अपने यहाँ विवाह किसी का

तब भी इनको देउ , करो मस्तक पर टीका

कितना भी दे दीजिये , तृप्त न हो यह शख़्श

तो फिर यह दामाद है अथवा लैटर बक्स ?

अथवा लैटर बक्स , मुसीबत गले लगा ली

नित्य डालते रहो , किंतु ख़ाली का ख़ाली

कहँ ‘ काका ‘ कवि , ससुर नर्क में सीधा जाता

मृत्यु – समय यदि दर्शन दे जाये जमाता

और अंत में तथ्य यह कैसे जायें भूल

आया हिंदू कोड बिल , इनको ही अनुकूल

इनको ही अनुकूल , मार कानूनी घिस्सा

छीन पिता की संपत्ति से , पुत्री का हिस्सा

‘ काका ‘ एक समान लगें , जम और जमाई

फिर भी इनसे बचने की कुछ युक्ति न पाई

मदन मोहन बाहेती घोटू… जमाई जी,आप तो देश के दामाद है

जमाई जी,आप तो देश के दामाद है

राजाजी के दामाद जी पर किसीने आरोप लगाया

कि  उनने अपने संबंधों का अनुचित लाभ उठाया

और जनता को जब इस बारे में समाचार मिलगया

तो सारा राजदरबार हिल गया

दरबार के नवरतन

करने लगे जी तोड़ जतन

इसके पहले कि विरोधी चिल्लाये

दामादजी को इस कलंक से बचाये

और इस प्रयत्न में,

राजाजी की नज़र में भी चढ़ जायें

बयान पर बयान आने लगे

दामाद जी को बचने लगे

राज दरबार के कई मंत्रियों ने अरबों खाया है

दामादजी ने तो थोडा सा कमाया है

दामादों से कहीं लोग पैसे लेते है

लाखों का माल,कोडियों में दे देते है

इतना तो दामादजी का हक बनता है,

इसमें क्या अपराध है

क्योंकि राजाजी का दामाद,

पूरेदेश का दामाद है

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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One Response to अथ श्री दामाद कथा

  1. Bhupendra Singh says:

    दामाद के पैर छुने से कहते हैं स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तो स्वर्ग इतनी आसानी से थोड़ी न मिलता है। उसके लिए तो दामाद जी को खुश रखना ही पड़ेगा ना।

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