ग्रीष्म ऋतु

Imageपरिवर्तनशीलता प्रकृति का स्वभाव है। यदि यह परिवर्तनशीलता न हो तो वसन्त की सुषमा का कोई मूल्य न रहे और शिशिर का तुषारापात निर्रथक हो जाए। क्योंकि दुख़ के बिना सुख़ भी निस्सार  है-

बिन  दुख  के   है  सुख  निस्सार।

बिना  आँसू  के  जीवन  भार।।

 मादक वसन्त का अन्त होते ही ग्रीष्म की प्रचंडता आरम्भ हो जाती है। वसन्त ऋतु काम से, ग्रीष्म क्रोध से सम्बन्धित है। ग्रीष्म ऋतु, भारतवर्ष की छह ऋतओं में से एक ऋतु है, जिसमें वातावरण का तापमान प्रायः उच्च रहता है। दिन बड़े हो जाते हैं रातें छोटी।  शीतल सुंगधित पवन के स्थान पर गरम-गरम लू चलने लगती है। धरती जलने लगती है। नदी-तलाब सूखने लगते हैं। कमल कुसुम मुरझा जाते हैं। दिन बड़े होने लगते हैं। सर्वत्र अग्नि की वर्षा होती-सी प्रतीत होती है। शरद ऋतु का बाल सूर्य ग्रीष्म ऋतु को प्राप्त होते ही भगवान शंकर की क्रोधाग्नि-सी बरसाने लगा है। ज्येष्ठ मास में तो ग्रीष्म की अखंडता और भी प्रखर हो जाती है। छाया भी छाया ढूंढने लगती है।–

बैठी रही अति सघन वन पैठी सदन तन माँह

देखी दुपहरी जेठ की छाँहों चाहती छाँह।।

ग्रीष्म की प्रचंडता का प्रभाव प्राणियों पर पड़े बिना नहीं रहता। शरीर में स्फूर्ति का स्थान आलस्य ले लेता है। तनिक-सा श्रम करते ही शरीर पसीने से सराबोर हो जाता है। कण्ठ सूखने लगता है। अधिक श्रम करने पर बहुत थकान हो जाती है। इस मौसम में यात्रा करना भी दूभर हो जाता है। यह ऋतु प्रकृति के सर्वाधिक उग्र रुप की द्योतक है।

भारत में सामान्यतया 15 मार्च से 15 जून तक ग्रीष्म मानी जाती है। इस समय तक सूर्य भूमध्य रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ता है, जिससे सम्पूर्ण देश में तापमान में वृद्धि होने लगती है। इस समय सूर्य के कर्क रेखा की ओर अग्रसर होने के साथ ही तापमान का अधिकतम बिन्दु भी क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता जाता है और मई के अन्त में देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग में 48डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। उत्तर पश्चिमी भारत के शुष्क भागों में इस समय चलने वाली गर्म एवं शुष्क हवाओं को ‘लू’ कहा जाता है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रायः शाम के समय धूल भरी आँधियाँ आती है, जिनके कारण दृश्यता तक कम हो जाती है। धूल की प्रकृति एवं रंग के आधार पर इन्हें काली अथवा पीली आंधियां कहा जाता है। सामुद्रिक प्रभाव के कारण दक्षिण भारत में इन गर्म पवनों तथा आंधियों का अभाव पाया जाता है।

रीतिकालीन कवियों में सेनापति का ग्रीष्म ऋतु वर्णन अत्यन्त प्रसिद्ध है।–

वृष को तरनि तेज सहसौं किरन करि

ज्वालन के जाल बिकराल बरखत हैं।

तचति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी

छाँह को पकरि पंथी पंछी बिरमत हैं॥

सेनापति नैकु दुपहरी के ढरत, होत

धमका विषम, जो नपात खरकत हैं।

मेरे जान पौनों सीरी ठौर कौ पकरि कोनों

घरी एक बैठी कहूँ घामैं बितवत हैं॥

रासो काव्य रचनाकार ‘अब्दुल रहमान’ द्वारा लिखी गई सन्देश रासक में षड्ऋतुवर्णन ग्रीष्म से प्रारम्भ होता है…

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ग्रीष्म शब्द ग्रसन से बना है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी के रस को ग्रस लेता है।

भागवत पुराण में ग्रीष्म ऋतु में कृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा आती है जिसको उपरोक्त आधार पर समझा जा सकता है । भागवत पुराण का द्वितीय स्कन्ध सृष्टि से सम्बन्धित है जिसकी व्याख्या अपेक्षित है।

शतपथ ब्राह्मण में ग्रीष्म का स्तनयन/गर्जन से तादात्म्य कहा गया है जिसकी व्याख्या अपेक्षित है।

जैमिनीय ब्राह्मण 2.51 में वाक् या अग्नि को ग्रीष्म कहा गया है ।

तैत्तिरीय संहिता में ग्रीष्म ऋतु यव प्राप्त करती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में ग्रीष्म में रुद्रों की स्तुति का निर्देश है। तैत्तरीय संहिता में ऋतुओं एवं मासों के नाम बताये गये है,जैसे :- बसंत ऋतु के दो मास- मधु माधव, ग्रीष्म ऋतु के शुक्र-शुचि, वर्षा के नभ और नभस्य, शरद के इष ऊर्ज, हेमन्त के सह सहस्य और शिशिर ऋतु के दो माह तपस और तपस्य बताये गये हैं।

चरक संहिता में कहा गया हैः …… शिशिर ऋतु उत्तम बलवाली, वसन्त ऋतु मध्यम बलवाली और ग्रीष्म ऋतु दौर्बल्यवाली होती है। ग्रीष्म ऋतु में गरम जलवायु पित्त एकत्र करती है। प्रकृति में होने वाले परिवर्तन शरीर को प्रभावित करते हैं। इसलिए व्यक्ति को साधारण रूप से भोजन तथा आचार-व्यवहार के साथ प्रकृति और उसके परिवर्तनों के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए । तापमान बढ़ने पर पित्त उत्तेजित होता है तथा शरीर में जमा हो जाता है। व्याधियों से बचाव के लिए ऋतु के अनुकूल आहार तथा गतिविधियों का पालन जरूरी है।

होलिकोत्सव में सरसों के चूर्ण से उबटन लगाने की परंपरा है, ताकि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की सुरक्षा रहे। आदिकाल से उत्तर भारत में जहाँ तेज गर्मी होती है, गरम हवाएँ चलती हैं वहाँ पर त्वाचा की लाली के शमन के लिए प्राय: लोग सरसों के बीजों के उबटन का प्रयोग करते हैं।

नवरात्री दुर्गा पूजा वर्ष में दो बार आती है। यह जलवायु प्रधान पर्व है। अतः एक बार यह पर्व ग्रीष्म काल आगमन में राम नवरात्रि चैत्र (अप्रैल मई) के नाम से जाना जाता है। दूसरी बार इसे दुर्गा नवरात्रि अश्विन(सितम्बर-अकतूबर) मास में मनाया जाता है। यह समय शीतकाल के आरम्भ का होता है। यह दोनो समय ऋतु परिवर्तन के है।

प्रकृति-चित्रण में बिहारी किसी से पीछे नहीं रहे हैं। षट ॠतुओं का उन्होंने बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। ग्रीष्म ॠतु का चित्र देखिए –

कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ।

जगत तपोतन से कियो, दरिघ दाघ निदाघ।।

कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् और ऋतुसंहार में ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया है-

अभिज्ञानशाकुन्तलम्- नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए लिखा कि वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है।

ऋतुसंहार- में छ: सर्ग हैं। इन सर्गों में क्रमश: छ: ऋतुओं- ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर तथा बसंत का चित्रण किया गया है। ‘ऋतु-संहार’ में वर्ष का प्रारंभ ग्रीष्म ऋतु से माना गया जो कि बंग देश की प्रथा रही। पहला ही पद्य ग्रीष्म की प्रखरता तथा संताप के वर्णन से आरम्भ होता है। इसके आगे कवि कहता है कि धूल के बवंडर उठ रहे हैं, कड़ी धूप से धरती दरक रही है, प्रिया के वियोग से दग्थ मानस वाले प्रवासी तो इस दृश्य को देख तक नहीं पा रहे हैं प्यास से चटकते कण्ठ वाले मृग एक जंगल से दूसरे जंगल की ओर भाग रहे हैं। ग्रीष्म ने वन के प्राणियों को ऐसा आकुल कर दिया है कि सांप मयूर के पिच्छ के नीचे धूप से बचने को आ बैठा है और मयूर को उसकी खबर नहीं। प्यास से सिंह का मृगया का उद्यम ठंडा पड़ गया है, जीभ लटकाये हाँफता हुआ वह पास से निकलते हिरणों पर भी आक्रमण नहीं कर रहा। तृषा से व्याकुल हाथियों ने भी सिंह से भय खाना छोड़ दिया है। शूकर भद्रमुस्ता से युक्त सूखते कीचड़ मात्र बचे सरोवर की धरती में धँसे से जा रहे हैं ग्रीष्मवर्णन के इस पहले सर्ग में वनप्रांत की भीषणता का वास्तविक चित्र कवि ने अत्यंत विशद रूप में अंकित कर दिया है। दावाग्नि से जल कर काष्ठ मात्र बचे वृक्ष, सूखते पत्तों का जहाँ-तहाँ ढेर और सूखे हुए सरोवर-इन सबका विस्तार देखने पर चित्त को भयभीत कर डालना है  दावाग्नि का वर्णन भी कालिदास ने इसी यथार्थ दृष्टि से किया है।

प्रिये ! आया ग्रीष्म खरतर !

सूर्य भीषण हो गया अब,चन्द्रमा स्पृहणीय सुन्दर

कर दिये हैं रिक्त सारे वारिसंचय स्नान कर-कर

रम्य सुखकर सांध्यवेला शांति देती मनोहर ।

शान्त मन्मथ का हुआ वेग अपने आप बुझकर

दीर्घ तप्त निदाघ देखो, छा गया कैसा अवनि पर

ज्येष्ठ की गर्मी- ज्येष्ठ हिन्दू पंचांग का तीसरा मास है। ज्येष्ठ या जेठ माह गर्मी का माह है। इस महीने में बहुत गर्मी पडती है। फाल्गुन माह में होली के त्योहार के बाद से ही गर्मियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। चैत्र और बैशाख माह में अपनी गर्मी दिखाते हुए ज्येष्ठ माह में वह अपने चरम पर होती है। ज्येष्ठ गर्मी का माह है। इस माह जल का महत्त्व बढ जाता है। इस माह जल की पूजा की जाती है और जल को बचाने का प्रयास किया जाता है। प्राचीन समय में ऋषि मुनियों ने पानी से जुड़े दो त्योहारों का विधान इस माह में किया है-

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी

इन त्योहारों से ऋषियों ने संदेश दिया कि गंगा नदी का पूजन करें और जल के महत्त्व को समझें। गंगा दशहरे के अगले दिन ही निर्जला एकादशी के व्रत का विधान रखा है जिससे संदेश मिलता है कि वर्ष में एक दिन ऐसा उपवास करें जिसमें जल ना ग्रहण करें और जल का महत्त्व समझें। ईश्वर की पूजा करें। गंगा नदी को ज्येष्ठ भी कहा जाता है क्योंकि गंगा नदी अपने गुणों में अन्य नदियों से ज्येष्ठ(बडी) है। ऐसी मान्यता है कि नर्मदा और यमुना नदी गंगा नदी से बडी और विस्तार में ब्रह्मपुत्र बड़ी है किंतु गुणों, गरिमा और महत्त्व की दृष्टि से गंगा नदी बड़ी है। गंगा की विशेषता बताता है ज्येष्ठ और ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की दशमी गंगा दशहरा के रूप में गंगा की आराधना का महापर्व है।

निर्जला एकादशी- भीषण गर्मी के बीच तप की पराकाष्टा को दर्शाता है यह व्रत। इसमें दान-पुण्य एवं सेवा भाव का भी बहुत बड़ा महत्व शास्त्रों में बताया गया है।  ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। अन्य महीनों की एकादशी को फलाहार किया जाता है, परंतु इस एकादशी को फल तो क्या जल भी ग्रहण नहीं किया जाता। यह एकादशी ग्रीष्म ऋतु में बड़े कष्ट और तपस्या से की जाती है। अतः अन्य एकादशियों से इसका महत्व सर्वोपरि है। इस एकादशी के करने से आयु और आरोग्य की वृद्धि तथा उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुसार अधिक माससहित एक वर्ष की छब्बीसों एकादशियां न की जा सकें तो केवल निर्जला एकादशी का ही व्रत कर लेने से पूरा फल प्राप्त हो जाता है।

वृषस्थे मिथुनस्थेऽर्के शुक्ला ह्येकादशी भवेत्‌

ज्येष्ठे मासि प्रयत्रेन सोपाष्या जलवर्जिता।

नवतपा- नवतपा को ज्येष्ठ महीने के ग्रीष्म ऋतु में तपन की अधिकता का द्योतक माना जाता है। सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के साथ नवतपा शुरू हो जाता है। शुक्ल पक्ष में आर्द्रा नक्षत्र से लेकर 9 नक्षत्रों में 9 दिनों तक नवतपा रहता है। नवतपा में तपा देने वाली भीषण गर्मी पड़ती है। नवतपा में सूर्यदेव लोगों के पसीने छुड़ा देते हैं। पारा एक दम से 48 डिग्री पर पहुंच जाता है। जबकि न्यूनतम तापमान 32 डिग्री तक रहता है। लेकिन नवतपा के बाद एक अच्छी खबर आती है आर्द्रा के 10 नक्षत्रों तक जिस नक्षत्र में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है, आगे चलकर उस नक्षत्र में 15 दिनों तक सूर्य रहते हैं और अच्छी वर्षा होती है।

राग दीपक- ग्रीष्म की जलविहीन शुष्क ऋतु में भी कलाकार की रचनाधर्मिता जागृत रहती है। संगीतकार इस उष्ण वातावरण को राग दीपक के स्वरों में प्रदर्शित करता है तो चित्रकार रंग तथा तूलिका के माध्यम से राग दीपक को चित्र में साकार करता है। भारतीय मान्यताओं के अनुसार राग के गायन के ऋतु निर्धारित है । सही समय पर गाया जाने वाला राग अधिक प्रभावी होता है । राग और उनकी ऋतु इस प्रकार है –

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तानसेन और राग दीपक- परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। ग्रीष्म की तपन के पश्चात आकाश में छाने लगते हैं – श्वेत-श्याम बादलों के समूह तथा संदेश देते हैं, जन-जन में प्राणों का संचार करने वाली बर्षा ऋतु के आगमन का। आकाश में छायी श्यामल घटाओं तथा ठंडी-ठंडी बयार के साथ झूमती आती है जन-जन को रससिक्त करती, जीवन दायिनी वर्षा की प्रथम फुहार। वर्षा की सहभागिनी ग्रीष्म की उष्णता आकाश से जल बिंदुओं के रूप में पुन: धरती पर अवतरित होती है किंतु अपने नवीन मनमोहक रूप में। उष्ण वातावरण के कारण घिर आये मेघ तत्पश्चात जीवनदान करती वर्षा का प्रसंग एक किवदंती में प्राप्त होता है जिसके अनुसार बादशाह अकबर ने दरबार में गायक तानसेन से ग्रीष्म ऋतु का राग दीपकसुनने का अनुरोध किया। तानसेन के स्वरों के साथ वातावरण में ऊष्णता व्याप्त होती गयी। सभी दरबारीगण तथा स्वयं तानसेन भी बढ़ती गरमी को सहन नहीं कर पा रहे थे। लगता था, जैसे सूर्य देव स्वयं धरती पर अवतरित होते जा रहे हैं। तभी कहीं दूर से राग मेघ के स्वरों के साथ मेघ को आमंत्रित किया जाने लगा। जल वर्षा के कारण ही गायक तानसेन की जीवन रक्षा हुई। 

नारवेस्टर या काल वैशाखी- ग्रीष्म ऋतु में मानूसन के आगमन के पूर्व पश्चिमी तटीय मैदानी भागों में भी कुछ वर्षा प्राप्त होती है, जिसे ‘मैंगों शावर’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त असम तथा पश्चिम बंगाल राज्यों में भी तीव्र एवं आर्द्र हवाएं चलने लगती हैं, जिनसे गरज के साथ वर्षा हो जाती है। यह वर्षा असम में ‘चाय वर्षा’ कहलाती है। इन हवाओं को ‘नारवेस्टर’ अथवा ‘काल वैशाखी’ के नाम से जाना जाता है। यह वर्षा पूर्व-मानसून वर्षा कहलाती है।

ग्रीष्म से बचाव के उपाय-मनुष्य जिस प्रकार अपनी अन्य समस्याओं से निजात पाने के उपाय ढूंढ़ता है उसी प्रकार आतप की प्रचण्डता से बचने के लिए भी कुछ-न-कुछ व्यवस्था करता ही है। धनी लोग पर्वतीय स्थानों पर चले जाते हैं। घरों को वातानुकूलित बनवा लेते हैं, कूलर लगवा लेते हैं। प्यास बुझाने के लिए शीतल पेयों का प्रयोग करते हैं। गरीब लोग घड़े के शीतल जल और बर्फ के सहारे ही आतप की प्रचण्डता को शांत करते हैं।

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा शरीर के द्रव तथा स्निग्ध अंश का शोषण करता है, जिससे दुर्बलता, अनुत्साह, थकान, बेचैनी आदि उपद्रव उत्पन्न होते हैं। उस समय शीघ्र बल प्राप्त करने के लिए मधुर, स्निग्ध, जलीय, शीत गुणयुक्त सुपाच्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। नींबू का शरबत, आम का पना, जीरे की शिकंजी, ठंडाई, हरे नारियल का पानी, फलों का ताजा रस, दूध आदि शीतल, जलीय पदार्थों का सेवन करना चाहिए

ग्रीष्म ऋतु में तेज मिर्च मसालेदार, खट्टे, उष्ण प्रकृति के पदार्थों का, मांसाहारी भोजन व अंडों का तथा शराब का सेवन करने से अम्लता (एसिडिटी), अम्ल पित्त, अल्सर, उच्चरक्तचाप, पेशाब में रुकावट और जलन आदि अनेक व्याधियां उत्पन्न होती हैं। अत: इन सबके सेवन का त्याग करना चहिये।

ग्रीष्म से बचने के लिए सत्तू भी अत्युत्तम है। जौ को भूनकर चक्की में पीसकर सत्तू बनाया जाता है। चने को भूनकर, छिलके अलग करके चौथाई भाग भूने हुए जौ उसमें मिलाकर बनाया गया सत्तू विशेष लाभदायक होता है। सत्तू मधुर, शीतल, बलदायक, कफ-पित्तनाशक, भूख व प्यास मिटानेवाला तथा धूप, श्रम, चलने के कारण आयी हुई थकान को मिटाने वाला है।

ग्रीष्म-ऋतु प्रकृति के सर्वाधिक उग्र रूप की द्योतक है। किन्तु इसकी उग्रता भी मानव के लिए वरदान ही है। आतप की प्रचण्डता के कारण ही फसल पकती है और भविष्य में वर्षा होती है। दरअसल आतप की यह प्रचण्डता वर्षा की भूमिका तैयार करती है। नारियल के फल की तरह ग्रीष्म का तन कठोर होते हुए भी मन अत्यन्त कोमल होता है। इसकी शुष्कता में ही रसाल की सरसता उत्पन्न होती है। ककड़ी, खरबूजे, तरबूजे, अलूचे, आलूबुखारे, और फालसों में इसकी सरसता समा जाती है।

ग्रीष्म-ऋतु हमें शक्ति एंव प्रचण्डता का सन्देश देती है। अमलतास एवं गुलमोहर के फूल सूर्य की प्रचण्डता में भी नहीं झुलसते वरन् और अधिक खिल जाते हैं। दरअसल तप से ही तेज की वृद्धी होती है। संस्कृत में कहा गया है- “न साहसं अनारुभ्य नरो भद्राणि पश्यति।”

जिस प्रकार बिना श्रम के उपभोग का आनन्द प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार आतप की प्रचण्डता के बिना वर्षा का भी वास्तविक आनन्द नही प्राप्त होता। अतएव हमें धरती के समान ही सहनशील होकर प्रचण्डता को सहना चाहिए। समय मनुष्य को सब कुछ सहने पर मजबूर कर देता है।

ग्रीष्म के शीतल मनोरंजन-(प्राचीन साहित्य के पन्नों से)

भारत में ग्रीष्म ऋतु अपने कदम बढ़ा रही होती है। सूरज गरमा रहा होता है। मुहल्लों की गलियाँ सन्नाटों से भर उठती हैं। देर रात की भीड़-भाड़ बढ़ जाती है। मौसम अनमना होने लगता है। इसी समय प्रारंभ होते हैं ग्रीष्मकाल के अनेक आयोजन और मनोरंजन। वातानुकूलन, तरह तरह के ठंडे-मीठे व्यंजनों और मानव निर्मित तरणतालों ने गरमी के मौसम का मज़ा बनाए रखा है पर प्राचीनकाल में जब तकनीकी विकास आज जैसा नहीं था, तब गरमी के लंबे दिन कैसे कटते होंगे?

हज़ारों साल पहले भारतीय गरमी के मौसम का आनंद कैसे उठाते थे इसके रोचक प्रसंग साहित्य में मिलते हैं। हड़प्पा काल के लोगों ने अपने घरों में एक फ्रिज बना रखा था। वे मिट्टी के संदूक का आकार बनाते जिसके एक भाग में जल को वाष्पीकृत किया जाता। इस प्रक्रिया द्वारा जब एक ग्राम पानी सूख कर वाष्प बनता तो साढ़े पाँच सौ कैलरी गरमी सोख लेता और मिट्टी के इस संदूक में पानी आठ अंश दस अंश सेंटीग्रेट तापमान तक ठंडा रहता। खाने पीने के अन्य सामान भी इसमें रखे जाते थे।

संस्कृत पाली तथा प्राकृत के लगभग सभी ग्रंथों में जलक्रीडा का अत्यंत मनोरंजक वर्णन मिलता है। जिससे पता लगता है कि ग्रीष्मकाल में इस क्रीडा द्वारा कितना अधिक मनोरंजन किया जाता था। माघ के ‘शिशुपाल वध’ महाकाव्य में यादवों के जलविहार का सजीव वर्णन मिलता है- संक्षेप में सभी अपनी अपनी पत्नियों के साथ तालाब में उतरे। पानी से डरने वालों पर खूब पानी फेंका गया और उन्हें पानी में ढकेल दिया गया। कुछ तालाब के ऊँचे किनारों से पानी में कूदे। जलक्रीडा करते हुए उनकी आंखों में लाली आगई और काजल व ओंठों का लाल रंग भी धुल गया।

आदिपुराणमें धारागृह का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वहाँ हर समय वर्षा ऋतु बनी रहती है। (आज के रेन डांस आयोजनों की तरह)

आखेट, जलक्रीडा, उद्यान यात्रा, नृत्यसंगीत तथा नाटक प्राचीन काल के प्रमुख ग्रीष्मकालीन मनोरंजन थे। आमोद प्रमोद के ये साधन वहाँ की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करते थे। जंगल के समीपवर्ती स्थानों में वन विहार की आकर्षक परंपरा थी। घूमने-घूमते लोग जंगल के भीतर चले जाते और ‘उत्तालक’, ‘पुष्प भंजिका’, ‘शाल भंजिका’ तथा ‘ताल भंजिका’ नामक खेलों का मज़ा लेते। इन खेलों में फूल पत्तियों को तोड़ कर एक दूसरे पर फेंकने की प्रतियोगिता सी होती थी। साखू, अशोख और ताड़ के पेड़ों के नीचे एकत्र होकर लोग हज़ारों की संख्या में फूल एक दूसरे पर फेंकते। महिलाएँ पुरुषों पर फूल फेंकतीं जिसे अत्यंत आनंददायक खेल समझा जाता था।

रामायण में कहा गया है कि अयोध्या की महिलाएँ हवा खाने के लिए नगर के बाहर बने सार्वजनिक उद्यानों में जाती थीं। हनुमान जी ने नंदी ग्राम पहुँचने पर ढेर से स्त्री पुरुषों को उद्यान में टहलते देखा।

महाभारत में अर्जुन ने एक बार कृष्ण से प्रस्ताव किया कि आइए शीतल बयार का आनंद लेने यमुना के किनारे चलें। सपरिवार सारा दिन वहाँ बिता कर संध्या होने पर वापस लौट आएँगे।

प्राचीन काल के ग्रीष्मकालीन मनबहलावों का कर्पूर मंजरीनामक नाटक में विस्तृत और सजीव वर्णन मिलता है। लोग पूरे शरीर में चंदन का लेप लगाते और शाम तक भीगे वस्त्र पहने रहते। रात के पहले पहर तक वे जलक्रीडा में मग्न रहते। इसके बाद वे शीतल सुरा का पान करते। एक स्थान पर यह भी कहा गया है कि बाँसुरी पर पंचम राग अलापने से कानों को शांति मिलती है।

वृक्षों झुरमुटों और पुष्पों की शीतल छाया में पहेलियाँ, शतरंज और समस्यापूर्ति के सुंदर खेल हुआ करते थे। जिनमें उलझे हुए गर्मी की दोपहर शीघ्र ही बीत जाती। प्राचीन काल में स्नान की परिपाटी भी किसी मनोरंजन से कम न थी। राजाओं और धनिकों के स्नान करने के अत्यंत रोचक वर्णन प्राप्त होते हैं। प्राकृत साहित्य में लिखा है कि प्रात:कालीन व्यायाम के पश्चात लोग स्नानागार में जाते जहाँ खूब कुशल मालिश करने वाले शतपाकऔर सहस्रपाकतेलों द्वारा शरीर की मालिश करते थे। ये तेल विशेष रीति से बना कर तैयार किए जाते थे। मालिश के बाद वे रंग बिरंगी चौकियों पर बैठते जहाँ सुगंधित जल का छिड़काव किया जाता था। इस सुगंधिक जलों के ‘सुखोदक’, ‘पुष्पोदक’, ‘शुद्धोदक’ आदि मनोरंजक नाम मिलते हैं। इन्हें बारी बारी से छिड़का जाता। स्नान के अवसर पर हंसी मज़ाक भी होता।

हिन्दी काव्य साहित्य में ग्रीष्म ऋतु

ग्रीष्म का आतप बढ़ते ही चहलपहल कम हो जाती है।वृक्षों के साथ हमारी निकटता बढ़ जाती हैवृक्ष हमें जीवनदाता से प्रतीत होने लगते हैं।लोग घरों में कैद होने लगते हैं। ऐसे में ग्रीष्म की अनुभूति का एक बड़ा हिस्सा तो पसीना बनकर ही निकल जाता है फिर भी कुछ रह जाता है जिसे कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता रहा है।वसन्त और पावस की तुलना में ग्रीष्म पर कम कविताएँ लिखी गई हैं।ग्रीष्म की अभिव्यक्ति सभी प्रकार की कविताओं में मिलती है चाहे वे बाल कविताएँ हो या प्रौढ़ कविताएँ।अधिकांशतः ग्रीष्म से उत्पन्न सभी स्थितियों को प्रतीकों में प्रयुक्त किया है परन्तु अनेक कविताओं में अभिधा में भी इनका प्रयोग देखने को मिलता है। रीतिकाल में तो ऋतु वर्णन पर जाने कितना श्रेष्ठ और विषद साहित्य लिखा गया है। आधुनिक साहित्य में भी ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताएँ खूब लिखी जा रही हैं। कुछ कविताएँ जिनमें ग्रीष्म के विविध क्षणों की अनुभूति कवियों ने की है

सूरज हमारी पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए अनिवार्य है परन्तु उसका अतिशय ताप हमारे मन में झुँझलाहट ही पैदा करता है। डॉ0 रामदरश मिश्र की कविताओं में ग्रीष्म के सूर्य को कष्टों को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है—
किसने बैठा दिया है मेरे कंधे पर सूरज
एक जलता हुआ असह्य बोझ कब से ढो रहा हूँ

ग्रीष्म की अनेक स्थितियाँ हमें जीवन की अन्य तल्ख सच्चाइयों को उकेरने की भाषायी शक्ति और ऊर्जा दे जाती हैं। हम अपनी मनःस्थितियों के लिए जब ग्रीष्मानुभूति का सहारा लेते हैं तो कविता प्रभावशाली हो जाती है—
कंठ प्यासा ओंठ सूखे
प्यास ही अपनी कहानी
रेत के सैलाब पाए
पर‚ न पाया बूँद पानी
प्यास की है रिक्त गागर‚ आस का जल–स्रोत गहरा
चिलचिलाती धूप है‚ और हम खड़े हैं बीच सहरा।
आत्म प्रकाश नंदवानी चक्रवर्ती

यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति प्यासा है‚ कष्टों और चिन्ताओं की असहनीय घाम ने उसे व्याकुल कर दिया है।सिर पर जलती घाम‚ गहन बन‚ प्यास से व्याकुल हिरनी का दृश्य हमारे अन्दर करुणा या दया का भाव ही नहीं जगाते बल्कि इस दग्ध अनुभूति के भीतर हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं।सबकी अपनी–अपनी प्यास है अपनी–अपनी व्याकुलता है—
प्यासी हिरनी गहन वन‚ सिर पर जलती घाम।
भटके मेरी विकलता कब तक मेरे राम।।
भ्रमते हैं रवि शशि नखत‚ भरा गगन परिमाण।
अपनी–अपनी प्यास से‚ सबके व्याकुल प्राण।।
डॉ0 रामसनेहीलाल शर्मा यायावर

जीवन का जब रास्ता लम्बा हो और कठिनाइयों के पड़ाव हों तो परेशानी तो होती ही है पर यह भी सच है कि कष्टों का सामना करने से ही व्यक्तित्व में निखार आता है।इस मायने में धूप हमारे जीवन की कुट सच्चाई है इसका आदर करना ही उचित होगा—
सूना लम्बा रास्ता‚ पग–पग रेत पहाड़।
तिल–तिल जलती धूप है‚ ऊँचे–ऊँचे ताड़।।
धूप नये तेवर लिये‚ आई मेरे द्वार।
मैंने सर माथे लिया‚ तेरा यह उपहार।।
डॉ0 शैल रस्तोगी

हमारे जीवन में दुख और सुख आते जाते रहते हैं यही जीवन है‚ दुख के समय हम घबराएँ नहीं और सुख के समय अभिमानी न हो जाएँ इसलिए यह परिवर्तन होता रहता है।ग्रीष्म के आतप के उपरान्त तप्त व्योम के हृदय पर मेघों की माला सुशोभित हो जाती है।यह आशावादी दृष्टि ग्रीष्म का आतप हमें भी दे जाता है कि हम आशावादी रहें।महाप्राण निराला के शब्दों में—
जला है जीवन यह
आतप में दीर्घकाल
सूखी भूमि‚ सूखे तरु
सूखे सिक्त आल बाल
बन्द हुआ गुंज‚ धूलि 
धूसर हो गए कुंज
किन्तु पड़ी व्योम–उर 
बन्धु‚ नील मेघ–माल।
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

बच्चों के लिए लिखी गई ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताओं में गर्मी का अभिधेय अर्थ ही देखने को मिलता है।क्योंकि ये कविताएँ बालकों के मन की तरह सीधी‚ सरल‚ सहज और लयात्मक होती हैं जो ग्रीष्म का चित्र प्रस्तुत करती हैं—
कटते न लम्बे दिन काटे
जड़ती है गालों पर चाँटे
धरती पर दौड़ रही सरपट
गर्मी की धूप बड़ी नट–खट।
— — — — 
फिर नभ से अंगारे बरसे
गर्मी के दिन आये हैं
मुश्किल हुआ निकलना घर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
लम्बे–लम्बे ज्यों अजगर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
रामानुज त्रिपाठी

ग्रीष्म ऋतु का सबसे गरम समय होता है जेठ का महीना।जेठ दोपहरी में लू चल रही है‚ मार्ग पर चलना मुश्किल हो रहा है‚ पैरों में फफोले पड़ जाते हैं।ऐसा लगता है मानों आग अपने गोले छोड़ रही हो‚ यही सब कुछ जेठ में हमें दिखाई देता है।तभी तो कवि कह उठता है—
जेठ तपी धरनी मरु सी अरु लूह चली करि बंजरु टोला
छोड़ती छाँव ठिया अपनी उत पाँजरि होय हरो तन चोला
बाढ़तु ताय तमोगुन सो अरु पाँव परें मग माँहि फफोला
व्याकुल होंय चरा चरह इत आगि छुड़ावति आपन गोला।।
रघुवीर सिंह अरविन्द

गर्मी के प्रभाव से वृक्ष भी झुलस से गए हैं और सूर्य की किरणें तप कर लाल हो गई हैं—
“प्यासे प्यासे से खड़े‚ रूखे सूखे रूख
जेठ मास के तरनि से‚ तापी मयूख मयूख।।”
जगदीश प्रसाद सारस्वत विकल

ग्रीष्म कितनी भी कष्टदायक क्यों न हो पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि ग्रीष्म के कारण ही पानी बरसता है और हरियाली लौटकर आती है—
यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहेगी प्रतीक्षा
अगले मौसम की 
बहार की।
अश्विन गांधी

गरीब मजदूर गरमी से दूसरों को बचाने के ल्एि दोपहरी में भी काम करते हैं।काश हम उनकी ओर भी ध्यान दे पाते। उषा चौधरी एक ऐसे ही दृश्य का चित्रण करते हुए कहती हैं—
ज़रा सी खिड़की खोल कर देखा
नीम के पेड़ के नीचे
दुबला पतला 
आबनूसी रंग वाला बच्चा
तपती धरती में
नंगा पड़ा रो रहा है।
और 
मां बाप औरों को
गरमी से बचाने के लिये 
ख़स के पर्दे गूंथ रहे हैं।
उषा चौधरी

धूप का वृक्षों की टहनियों और पत्तियों के बीच से छन–छनकर धरती पर आना दृष्टि का उत्सव है।ग्रीष्म की धूप का ऐसा ही एक मनभावन चित्रण करते हुए पूर्णिमा वर्मन कहती हैं—
झर रही है
ताड़ की इन उंगलियों से धूप
करतलों की
छांह बैठा
दिन फटकता सूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
पूर्णिमा वर्मन

धूप कितनी ही तेज क्यों न हो कोई काम नहीं रुकेगा‚ यही संसार का नियम है।लोग धूप में बाहर निकलेंगे भी और पाँव के छालों को भी सहलाएँगे—
तेज धूप में आना जाना लगा रहेगा
पैरों के छाले सहलाना लगा रहेगा। 
ज्ञानप्रकाश विवेक

ग्रीष्म का सुरेन्द्र सुकुमार ने बहुत ही जीवन्त चित्र खींचा है—
ज्यों ही आंगन में पड़े जेठ धूप के पांव।
कोठे भीतर घुस गयी छोटी दुल्हन छांव।।
बड़ी दूर सब हो गये पानी पनघट छांव।
झुलस गये हैं दूब के नन्हें नन्हें पांव।।
सुरेन्द्र सुकुमार

ग्रीष्म का यह आतप थोड़े दिन के लिए ही सही परन्तु सभी जीव जन्तुओं के लिए घोर तपस्या का काल खण्ड होता है।कहते हैं कि ग्रीष्म जितनी ताप छोड़ेगी पावस उतनी ही हरियाली बिखरायेगी।

डॉ0 जगदीश व्योम

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? 13 साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन ग्यारह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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