होली का पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व

होली… ऋतुओं के राजा ‘वसंत’ में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है… वसंत शीत के बाद आती है… भारत में फरवरी और मार्च में इस ऋतु का आगमन होता है… वसंत बहुत सुहावनी ऋतु है… इस ऋतु में सम जलवायु रहती है अर्थात् सर्दी और गर्मी की अधिकता नहीं होती है… प्रकृति में कई प्रकार से सुखद बदलाव होते हैं… इसलिए इसे ऋतुओं का राजा या ऋतुराज भी कहा जाता है… होली हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है… ‘रंगों का त्योहार’ कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है… पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे ‘होलिका दहन’ भी कहते है… दूसरे दिन, जिसेधुरड्डी’, ‘धुलेंडी’, ‘धुरखेल’ या ‘धूलिवंदन’ कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है… ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं… एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है… इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।

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राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है।

वैदिक व पौराणिक महत्व

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होली मनाने के लिए विभिन्न वैदिक व पौराणिक मत हैं। वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवान्नेष्टि’ कहा गया है। इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है। इस अन्न को होला कहा जाता है, इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस पर्व को नवसंवत्सर का आगमन तथा बसंतागम के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है। कुछ लोग इस पर्व को अग्निदेव का पूजन मात्र मानते हैं। मनु का जन्म भी इसी दिन का माना जाता है। अत: इसे मन्वादितिथि भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से यह त्योहार मनाने का प्रचलन हुआ।

ऐतिहासिक रूप में होली

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राग रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का सन्देश वाहक भी है। चूंकि यह पर्व वसंत ऋतु में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है इसलिए इसे ‘बसंतोत्सव’ और ‘काममहोत्सव’ भी कहा गया है। राग(संगीत) और रंग तो इसके मुख्य अंग तो हैं ही पर इनको अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है | सर्वत्र वातावरण बड़ा ही मनमोहक होता है | यह त्यौहार फाल्गुन मास में मनाये जाने के कारण ‘फाल्गुनी’ के नाम से भी जाना जाता है और इस मास में चलने वाली बयारों का तो कहना ही क्या……..! हर प्राणी जीव इन बयारों का आनंद लेने के लिए मदमस्त हो जाता है……..! कोई तो अपने घरों में बंद होकर गवाक्षों से झाँक कर इस रंगीन छटा का आनंद लेता है और कोई खुले आम सर्वसम्मुख मदमस्त होकर लेता है……! यहाँ उम्र का कोई तकाज़ा नहीं बालक ,बच्चे बूढ़े वृद्ध हर कोई रंगीनी मस्तियों में छा जाते हैं…….! मेरे मन में भी एक प्रश्न का छोटा सा अंकुर जन्मा कि आखिर इस रंगोत्सव की सुन्दर छटा का आनंद लेने के पीछे इसका इतिहास क्या है जो इसके आनंद लेने का सुख बड़ा ही अद्भुत है।

  • इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था |इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है| इनमें प्रमुख जैमिनी के पूर्व मीमांसा और गार्ह्य-सूत्र हैं |
  • ‘नारद पुराण’ व ‘भविष्य पुराण’ जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों में और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है | बिंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है|
  • सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबेरुनी जो एक प्रसिद्ध फारसी विद्वान्, धर्मज्ञ, व विचारक थे ने भी अपनी एक ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में वसंत में मनाए जाने वाले ‘होलिकोत्सव’ का वर्णन किया है | 

मुस्लिम कवियों ने भी अपनी रचनाओं में होली पर्व के उत्साहपूर्ण मनाये जाने का उल्लेख किया है……|

मुग़ल काल और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं……… ! अकबर का जोधाबाई के साथ और जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है | राजस्थान के एक प्रसिद्द शहर अलवर के संग्रहालय के एक चित्र में तो जहाँगीर को नूरजहाँ के साथ होली खेलते हुए दर्शाया गया है | इतिहास में शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज़ ही बदल गया था | इतिहास में शाहजहाँ के ज़माने में होली को‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ कहा जाता था जिसे हिन्दी में ‘रंगों की बौछार’ कहते हैं| अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के बारे में प्रसिद्ध है कि वह तो होली के इतने दीवाने थे कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे | मेवाड़ की चित्रकारी में महाराणा प्रताप अपने दरबारियों के साथ मगन होकर होली खेला करते थे |

साहित्यिक रूप में होली

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प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है।  भगवान कृष्ण की लीलाओं में भी होली का वर्णन मिलता है | अन्य रचनाओं में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली[क] तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं।

कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही ‘वसन्तोत्सव’ को अर्पित है।  भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है।  चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है।

भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है।  चाहे वो सगुन साकार भक्तिमय प्रेम हो या निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम या फिर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच का प्रेम हो,फाल्गुन माह का फाग भरा रस सबको छूकर गुजरा है। होली के रंगों के साथ साथ प्रेम के रंग में रंग जाने की चाह ईश्वर को भी है तो भक्त को भी है, प्रेमी को भी है तो प्रेमिका को भी।

मीरां बाई ने इस पद में कहा है –

रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।।
उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

इस पद में मीरां ने होली के पर्व पर अपने प्रियतम कृष्ण को अनुराग भरे रंगों की पिचकारियों से रंग दिया है। मीरां अपनी सखि को सम्बोधित करते हुए कहती हैं किहे सखि मैं ने अपने प्रियतम कृष्ण के साथ रंग से भरीप्रेम के रंगों से सराबोर होली खेली। होली पर इतना गुलाल उडा कि जिसके कारण बादलों का रंग भी लाल हो गया। रंगों से भरी पिचकारियों से रंग रंग की धारायें बह चलीं। मीरां कहती हैं कि अपने प्रिय से होली खेलने के लिये मैं ने मटकी में चोवाचन्दन,अरगजाकेसर आदि भरकर रखे हुये हैं। मीरां कहती हैं कि मैं तो उन्हीं गिरधर नागर की दासी हूँ और उन्हीं के चरणों में मेरा सर्वस्व समर्पित है। इस पद में मीरां ने होली का बहुत सजीव वर्णन किया है।

महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। सूरदास जैसे नेत्रहीन कवि भी फाल्गुनी रंग और गंध की मादक धारों से बच न सके और उनके कृष्ण और राधा बहुत मधुर छेडख़ानी भरी होली खेलते हैं।

हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।
भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद

सूर के कान्हा की होली देख तो देवतागण तक अपना कौतुहल न रोक सके और आकाश से निरख रहे हैं कि आज कृष्ण के साथ ग्वाल बाल और सखियां फाग खेल रहे हैं। फाग के रंगों के बहाने ही गोपियां मानो अपने हृदय का अनुराग प्रकट कर रही हैंमानो रंग रंग नहीं उनका अनुराग ही रंग बन गया है। सभी गोपियां सुन्दर साडी पहन करचित्ताकर्षक चोली पहन कर तथा अपनी आँखों में काजल लगा कर कृष्ण की पुकार सुन बन ठन कर अपने घरों से निकल पडींऔर होली खेलने के लिये आ खडी हुई हैं।

रसखान जैसे रस की खान कहलाने वाले कवि ने तो फाग लीला के अर्न्तगत अनेकों सवैय्ये रच डाले हैं।सभी एक से एक रस और रंग से सिक्त _

फागुन लाग्यो जब तें तब तें ब्रजमण्डल में धूम मच्यौ है।
नारि नवेली बचैं नहिं एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है।।
सांझ सकारे वहि रसखानि सुरंग गुलाल ले खेल रच्यौ है।
कौ सजनी निलजी न भई अब कौन भटु बिहिं मान बच्यौ है।।

एक गोपी अपनी सखि से फाल्गुन मास के जादू का वर्णन करते हुए कहती है,कि जबसे फाल्गुन मास लगा है तभी से ब्रजमण्डल में धूम मची हुई है। कोई भी स्त्रीनवेली वधू नहीं बची है जिसने प्रेम का विशेष प्रकार का रस न चखा हो। सुबह शाम आनन्द मगन होकर श्री कृष्ण रंग और गुलाल लेकर फाग खेलते रहते हैं। हे सखि इस माह में कौन सी सजनी है जिसने अपनी लज्जा और संकोच तथा मान नहीं त्यागा हो!

खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहीं दीजै।
देखत ही बनि आवै भलै रसखन कहा है जौ बार न कीजै।।
ज्यों ज्यों छबीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यों त्यों छबीलो छकै छबि छाक सों हेरै हंसे न टरे खरो भीजै।।

एक गोपी अपनी सखि से फागलीला का वर्णन करती हुई कहती है कि ऐ सखि,मैं ने कृष्ण और उनकी प्रिया राधा को फाग खेलते हुये देखा। उस समय की जो शोभा थी उसे किसी की भी उपमा नहीं दी जा सकती। वह शोभा तो देखते बनती थीकि उस पर कोई ऐसी वस्तु भी नहीं जिसे निछावर किया जा सके। ज्यों ज्यों राधा एक के बाद एक रंग भरी पिचकारी उनपर डालती थींत्यों त्यों वे उनके रूप रस में सराबोर होकर मस्त हो रहे थे और हंस हंस कर वहां से भागे बिना खडे ख़डे भीग रहे थे।

बिहारी तो संयोग और वियोग निरुपण दोनों में सिध्दहस्त कवि हैं, संयोग हो या वियोग फागुन मास का विशेष महत्व है। प्रिय हैं तो होली मादक है और प्रिय नहीं हैं तो होली जैसा त्यौहार भी रंगहीन प्रतीत होता है। बसन्त ॠतु भी अच्छी नहीं लगती।

बन बाटनु पिक बटपरा, तकि बिरहिनु मत मैन।
कुहौ कुहौ कहि कहि उठे, करि करि राते नैन।।
हिय/ और सी हवे गई डरी अवधि के नाम।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम।।

बिहारी ने फागुन को साधन के रूप में लेकर संयोग निरुपण भी किया है। फागुन महीना आ जाने पर जब नायक नायिका के साथ होली खेलता है तो नायिका भी नायक के मुख पर गुलाल मल देती है या फिर पिचकारी से उसके शरीर को रंग में डुबो देती है।

जज्यौं उझकि झांपति बदनु, झुकति विहंसि सतराई।
तत्यौं गुलाब मुठी झुठि झझकावत प्यौ जाई।।
पीठि दियैं ही नैंक मुरि, कर घूंघट पटु डारि।
भरि गुलाल की मुठि सौं गई मुठि सी मारि।।

इस प्रकार हमारे प्राचीन कवियों ने फागुन मास और होली के रंग भरे त्योहार को अपने शब्दों में बडी सजीवता से प्रस्तुत किया है। होली का महत्व जो तब थाआज भी वही है। फागुन मास में बौराये आमों की तुर्श गंध और फूलते पलाश के पेडों के साथ तन मन आज भी बौरा जाता है। आज भी होली रूप रस गंध का त्यौहार है। होली उत्साहउमंग और प्रेम पगी छेडछाड लेकर आती है। होली सारे अलगाव और कटुता और अपनी रंग भरी धाराओं से धो जाती है। इस रंगमय त्यौहार की महत्ता अक्षुण्ण है।

पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।

सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।

आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं

संस्कृत साहित्य में बसंत ऋतु और बसंतोत्सव अनेक कवियों के विषय रहे हैं |महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘ऋतुसंहार’ में पूरा एक सर्ग ही ‘बसंतोत्सव’ को समर्पित है ! कालिदास के ‘कुमारसंभव’ और‘मालविकाग्निमित्र’ में ‘रंग ‘ नाम के उत्सव का वर्णन है ! भारवि व माघ तथा अन्य संस्कृत के कवियों ने बसंत की बहुत ही अधिक चर्चा की है ! हिन्दी व संस्कृत साहित्य के साथ- साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत,लोक गीत, और फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में भी होली का विशेष महत्त्व रहा है।

संगीत में होली

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भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा लोक संगीत की परंपरा में होली का विशेष महत्व है। हिंदी फ़िल्मों के गीत भी होली के रंग से अछूते नहीं रहे हैं। होली के सतरंगी रंगों के साथ सात सुरों का अनोखा संगम देखने को मिलता है! रंगों से खेलते समय मन में खुशी, प्यार और उमंग छा जाते हैं और अपने आप तन मन नृत्य करने को मचल उठता है। लय और ताल के साथ पैर को रोकना मुश्किल हो जाता है। रंग अपना असर बताते हैं, सुर और ताल अपनी धुन में सब को डुबोये चले जाते हैं!

शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं – चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर। इसी प्रकार संगीत के एक और अंग ध्रुपद में भी होली के सुंदर वर्णन मिलते हैं।

ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल देखिए-

“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”

धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं – आज पिया होरी खेलन आए

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। बसंत राग पर आधारित –

“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।
बहार राग पर आधारित “छम छम नाचत आई बहार”
और काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।” प्रसिद्ध बंदिशें हैं।

होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। इस अवसर पर एक विशेष लोकगीत गाया जाता है जिसे होली कहते हैं। अलग-अलग स्थानों पर होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा रहता है। जहाँ ब्रज धाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के।

जैसे गुजरात में नवरात्र, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी, पंजाब में बैसाखी, दक्षिण भारत में पोंगल, बंगाल में दुर्गा पूजा, को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है और महत्व दिया जाता है, ऐसे ही राजस्थान में होली का बहुत महत्व है और इन त्योहार में संगीत का एक अलग ही स्थान रहा है। संगीत बिना इन सब त्योहारों की कल्पना भी करना मुश्किल-सा लगता है।

इन सब त्योहारों में होली एकता का प्रतीक है। राजस्थान के अजमेर शहर में “ख्वाजा मोईउद्दीन चिश्ती” की दरगाह जाने वाली होली का विशेष रंग है। ख्वाजा मोईउद्दीन ने होली को विशेष महत्व दिया है। कहते हैं वे खुद भी होली खेला करते थे। उनकी भक्ति में जो कव्वालियाँ गाई जाती हैं, उसमें भी रंगों का उल्लेख आता है –

“आज रंग है री मन रंग है,
अपने महबूब के घर रंग है री।”

भारतीय फ़िल्मों में भी अलग-अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किए गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। ‘सिलसिला’ के गीत “रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे” और ‘नवरंग’ के “आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार,” को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।

इस तरह, रंग और संगीत चोली दामन की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। उनका असर मन पर, कैसे और कितनी हद तक होता है, यह होली के त्योहार में दिखाई देता है। मन की खुशी, प्रेम, उमंग, तरंग इन सब भावों को अभिव्यक्त करने के लिये रंग और संगीत होली के त्योहार का अनोखा माध्यम बन जाते हैं। लोग अपने मन के दुख और द्वेष भाव को मिटाकर रंगों की दुनिया में सुर और ताल के संग अपने आप को डुबो लेते हैं। चारों तरफ़ खुशी, प्यार और अपनेपन का एक अलग वातावरण बन जाता हैं। रंग मन के भावों को अभिव्यक्त करते हैं, संगीत जीवन की साधना है, और इन दोनों के समन्वय की मिसाल है होली का बेमिसाल त्योहार!!

कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं।

ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछराग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार,हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है।

उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है।

जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में।

राजस्थान के अजमेर शहर मेंख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है री।

इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता हैं।

भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। ‘सिलसिला’ के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और ‘नवरंग’ के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। (इसका उल्लेख नीचे करेंगे)

देवताओं की होली

राधा-कृष्ण की होली

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रंगों से सराबोर होली को खेलने में भला देवतागण भला पीछे क्यों रहे? राधा-कृष्ण की होली के रंग ही कुछ और है। ब्रज की होली का रंग ही निराला है। अपने भयामा भयाम के संग रंग में रंगोली बनाकर ब्रजवासी भी होली खेलने के लिए हुरियार बन जाते हैं और ब्रज की नारियाँ हुरियारिनों के रूप में साथ होते हैं और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है :-

आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भए बादर, केसर रंग में बोरी रे रसिया।
बाजत ताल मृदंग झांझ ढप, और मजीरन की जोरी रे रसिया।
फेंक गुलाल हाथ पिचकारी, मारत भर भर पिचकारी रे रसिया।
इतने आये कुँवरे कन्हैया, उतसों कुँवरि किसोरी रे रसिया।
नंदग्राम के जुरे हैं सखा सब, बरसाने की गोरी रे रसिया।
दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें, कहि कहि होरी होरी रे रसिया।

इतना ही नहीं वह भयाम सखाओं को चुनौती देती है कि होली में जीतकर दिखाओ। उनमें ऐसा अद्भूत उत्साह जागृत होता है कि सब ग्वाल-बालों को अपना चेला बनाकर बदला चुकाना चाहती हैं। जिन ब्रज बालों ने अटारी में चढ़ी हुई ब्रजगोपियों को संकोची समझा था, आज वे ही होली खेलने को तैयार हैं। पेश है इस दृश्य की एक बानगी :-

होरी खेलूँगी भयाम तोते नाय हारूँ
उड़त गुलाल लाल भए बादर, भर गडुआ रंग को डारूँ
होरी में तोय गोरी बनाऊँ लाला, पाग झगा तरी फारूँ
औचक छतियन हाथ चलाए, तोरे हाथ बाँधि गुलाल मारूँ।

राम सीता की होली

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अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी। केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। मुँह में रोरी रंग मलने पर गोरी तिनका तोड़ती लज्जा से भर गई है। झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। देवतागण आकाश से फूल बरसा रहे हैं। देखिए इस मनोरम दृश्य की एक झांकी :-

खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
छिरकत जुगल समाज परस्पर, मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोलि ढप, गृह गह भये चहुँ ओरी, नवसात संजोरी।
साधव देव भये, सुमन सुर बरसे, जय जय मचे चहुँ ओरी, मिथलापुर खोरी।

उमा महेश्वर की होली

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जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें?  हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला,चमकती हुई आँखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं। देखिए इस अद्भुत दृश्य की झाँकी :-

आजु सदासिव खेलत होरी
जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।
तीनि आँखि सुंदर चमकेला, सरप गले लिपटोरी
उदभूत रूप उमा जे दउरी, संग में सखी करोरी
हंसत लजत मुस्कात चनरमा सभे सीधि इकठोरी
लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।

शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। ऐसा लग रहा है मानो कैलाश पर्वत के ऊपर वटवृक्ष की छाया है। दिशाओं की पीले पर्दे खिंचे हुए हैं जिसकी छवि इंद्रासन जैसी दिखाई देती है। आक,धतूरा, संखिया आदि खूब पिया जा रहा है और सबने एक दूसरे को रंग लगाने की बजाय स्वयं को ही रंग लगा कर अद्भुत रूप बना लिया है, जिसे देखकर स्वयं पार्वती जी भी हँस रही हैं :-

सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चहुँ ओरी
पीत बितान तने चहुँ दिसि के, अनुपम साज सजोरी
छवि इंद्रासन सोरी।
आक धतूरा संखिया माहुर कुचिला भांग पीसोरी
नहीं अघात भये मतवारे, भरि भरि पीयत कमोरी
अपने ही मुख पोतत लै लै अद्भूत रूप बनोरी
हँसे गिरिजा मुँह मोरी।

होली का रहस्य…

प्रह्लाद की कथा… कैसे आग में बैठने के बावजूद नहीं जला प्रह्लाद

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होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं… इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है होलिका और प्रह्लाद की है.. विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार प्रह्लाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न तो पृथ्वी पर मरेगा न आकाश में, न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मानव से मारेगा न पशु से। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद वह स्वयं को अमर समझ कर नास्तिक और निरंकुश हो गया… उसने अपनी प्रजा को यह आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की वंदना न करे… अहंकार में आकर उसने जनता पर जुल्म करने आरम्भ कर दिए… यहाँ तक कि उसने लोगो को परमात्मा की जगह अपना नाम जपने का हुकम दे दिया…

कुछ समय बाद हिरण्यकश्यप के घर में एक बेटे का जन्म हुआ. उसका नाम प्रह्लाद रखा गया… प्रह्लाद कुछ बड़ा हुआ तो, उसको पाठशाला में पढने के लिए भेजा गया… पाठशाला के गुरु ने प्रह्लाद को हिरण्यकश्यप का नाम जपने की शिक्षा दी… पर प्रह्लाद हिरण्यकश्यप के स्थान पर भगवान विष्णु का नाम जपता था… वह भगवान विष्णु को हिरण्यकश्यप से बड़ा समझता था…

गुरु ने प्रह्लाद की हिरण्यकश्यप से शिकायत कर दी… हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बुला कर पूछा कि वह उसका नाम जपने के जगह पर विष्णु का नाम क्यों जपता है… प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “ईश्वर सर्व शक्तिमान है, उसने ही सारी सृष्टि को रचा है.” अपने पुत्र का उत्तर सुनकर हिरण्यकश्यप को गुस्सा आ गया… उसको खतरा पैदा हो गया कि कही बाकि जनता भी प्रह्लाद की बात ना मानने लगे… उसने आदेश दिया कहा, “मैं ही सबसे अधिक शक्तिशाली हूं, मुझे कोई नहीं मर सकता… मैं तुझे अब खत्म कर सकता हूँ…” उसकी आवाज सुनकर प्रह्लाद की माता भी वहां आ गई… उसने हिरण्यकश्यप का विनती करते हुए कहा, “आप इसको ना मारो, मैं इसे समझाने का यतन करती हूं…” वे प्रह्लाद को अपने पास बिठाकर कहने लगी, “तेरे पिता जी इस धरती पर सबसे शक्तिशाली है… उनको अमर रहने का वर मिला हुआ है… इनकी बात मान ले… ”प्रहलद बोला, “माता जी मैं मानता हूं कि मेरे पिता जी बहुत ताकतवर है पर सबसे अधिक बलवान भगवान विष्णु हैं जिसने हम सभी को बनाया है… पिता जो को भी उसने ही बनाया है… प्रह्लाद का ये उत्तर सुन कर उसकी मां बेबस हो गयी… प्रहलद अपने विश्वास पर आडिग था… ये देख हिरण्यकश्यप को और गुस्सा आ गया… उसने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि वो प्रह्लाद को सागर में डूबा कर मार दें… सिपाही प्रह्लाद को सागर में फेंकने के लिए ले गये और पहाड़ से सागर में फैंक दिया… लेकिन भगवान के चमत्कार से सागर की एक लहर ने प्रह्लाद को किनारे पर फैंक दिया… सिपाहियों ने प्रह्लाद को फिर सागर में फेंका… प्रह्लाद फिर बहार आ गया… सिपाहियों ने आकर हिरण्यकश्यप को बताया… फिर हिरण्यकश्यप बोला उसको किसी ऊंचे पर्वत से नीचे फेंक कर मार दो… सिपाहियों ने प्रह्लाद को जैसे ही पर्वत से फेंका प्रह्लाद एक घने वृक्ष पर गिरा जिस कारण उसको कोई चोट नहीं लगी… हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को एक पागल हाथी के आगे फैंका तो जो हाथी उसको अपने पैरों के नीचे कुचल दे… पर हाथी ने प्रह्लाद को कुछ नहीं कहा… लगता था जैसे सारी कुदरत प्रह्लाद की मदद कर रही हो…

हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था… होलिका अपने भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी दूर करना चाहती थी… होलिका को वरदान था कि उसको आग जला नहीं सकती… उसने अपने भाई को कहा कि वो प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ जाएगी… वरदान के कारण वो खुद आग में जलने से बच जाएगी पर प्रह्लाद जल जायेगा… लेकिन हुआ इसका उलट और आग में होलिका जल गयी पर प्रह्लाद बच गया… होलिका ने जब वरदान में मिली शक्ति का दुरूपयोग किया, तो वो वरदान उसके लिए श्राप बन गया…

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बिहार में जली थी होलिका

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महान पर्व होली के एक दिन पूर्व होलिका दहन होता है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है, परंतु यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का दहन बिहार की धरती पर हुआ था। जनश्रुति के मुताबिक तभी से प्रतिवर्ष होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत हुई।

  • मान्यता है कि बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में ही वह जगह है, जहां होलिका भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर दहकती आग के बीच बैठी थी।
  • इसी दौरान भगवान नरसिंह का अवतार हुआ था, जिन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्य का किला था।
  • यहीं भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए एक खंभे से भगवान नरसिंह अवतार लिए थे। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ा खंभा (माणिक्य स्तंभ) आज भी यहां मौजूद है।
  •  कहा जाता है कि इसे कई बार तोड़ने का प्रयास किया गया। यह स्तंभ झुक तो गया, पर टूटा नहीं। पूर्णिया जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर सिकलीगढ़ के बुजुर्गो का कहना है कि प्राचीन काल में 400 एकड़ के दायरे में कई टीले थेजो अब 100 एकड़ में सिमटकर रह गए हैं। पिछले दिनों इन टीलों की खुदाई में कई पुरातन वस्तुएं निकली थीं।
  • धार्मिक पत्रिका कल्याणके 31वें वर्ष के विशेषांक में भी सिकलीगढ़ का खास उल्लेख करते हुए इसे नरसिंह भगवान अवतार स्थल बताया गया था।

बनमनखी अनुमंडल के पूर्व अनुमंडल पदाधिकारी केशवर सिंह ने आईएएनएस को बताया कि इस जगह प्रमाणिकता के लिए कई साक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यहीं हिरन नामक नदी बहती है। वे बताते हैं कि कुछ वर्षो पहले तक नरसिंह स्तंभ में एक सुराख हुआ करता था, जिसमें पत्थर डालने से वह हिरन नदी में पहुंच जाता था। इसी भूखंड पर भीमेश्वर महादेव का विशाल मंदिर है।

मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकश्यप का भाई हिरण्याक्ष बराह क्षेत्र का राजा था जो अब नेपाल में पड़ता है…

प्रह्लाद स्तंभ की सेवा के लिए बनाए गए प्रह्लाद स्तंभ विकास ट्रस्ट के अध्यक्ष बद्री प्रसाद साह बताते हैं कि यहां साधुओं का जमावड़ा शुरू से रहा है। वे कहते हैं कि भागवत पुराण (सप्तम स्कंध के अष्टम अध्याय) में भी माणिक्य स्तंभ स्थल का जिक्र है। उसमें कहा गया है कि इसी खंभे से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।

इस स्थल की एक खास विशेषता है कि यहां राख और मिट्टी से होली खेली जाती है। ग्रामीण मनोहर कुमार बताते हैं कि मान्यताओं के मुताबिक जब होलिका भस्म हो गई थी और प्रह्लाद चिता से सकुशल वापस आ गए थे, तब प्रहलाद के समर्थकों ने खुशी में राख और मिट्टी एक-दूसरे को लगाकर खुशी मनाई थी। तभी से ऐसी होली शुरू हुई।

वे कहते हैं कि यहां होलिका दहन के दिन पूरे जिले के अलावा 40 से 50 हजार श्रद्धालु होलिका दहन के समय उपस्थित होते हैं और जमकर राख और मिट्टी से होली खेलते हैं। यही कारण है कि इस इलाके में आज भी राख और मिट्टी से होली खेलने की परंपरा है।

होली की परंपराएँ

  • होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी।
  • वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।
  • भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।
  • होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है।

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होलिका दहन की परंपरा…  बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक
शास्त्रों के अनुसार होली उत्सव मनाने से एक दिन पहले आग जलाते हैं और पूजा करते हैं। इस अग्नि को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन का एक और महत्व है, माना जाता है कि भुना हुआ धान्य या अनाज को संस्कृत में होलका कहते हैं, और कहा जाता है कि होली या होलिका शब्द, होलका यानी अनाज से लिया गया है। इन अनाज से हवन किया जाता है, फिर इसी अग्नि की राख को लोग अपने माथे पर लगाते हैं जिससे उन पर कोई बुरा साया ना पड़े। इस राख को भूमि हरि के रूप से भी जाना ता है।

होलिका दहन का महत्व
होलिका दहन की तैयारी त्योहार से 40 दिन पहले शुरू हो जाती हैं। जिसमें लोग सूखी टहनियाँ, सूखे पत्ते इकट्ठा करते हैं। फिर फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को अग्नि जलाई जाती है और रक्षोगण के मंत्रो का उच्चारण किया जाता है। दूसरे दिन सुबह नहाने से पहले इस अग्नि की राख को अपने शरीर लगाते हैं, फिर स्नान करते हैं। होलिका दहन का महत्व है कि आपकी मजबूत इच्छाशक्ति आपको सारी बुराईयों से बचा सकती है, जैसे प्रह्लाद की थी। कहा जाता है कि बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों ना हो जीत हमेशा अच्छाई की ही होती है। इसी लिए आज भी होली के त्यौहार पर होलिका दहन एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

देश के अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाया जाता है होली का त्यौहार

भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है…

  • ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 50 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।
  • कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है।
  • हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है।
  • बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है।
  • महाराष्ट्र की रंग पंचमी  में सूखा गुलाल खेलने,
  • गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन
  • पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है।
  • तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है
  • मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है।
  • दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है,
  • छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है
  • मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया, जो होली का ही एक रूप है।
  • बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है
  • नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

कुमाऊँ की बैठक होली

उत्तरांचल के कुमाऊं मंडल की सरोवर नगरी नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में तो नियत तिथि से काफी पहले ही होली की मस्ती और रंग छाने लगते हैं.

इस रंग में सिर्फ अबीर गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है. बरसाने की होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है.  फूलों के रंगों और संगीत की तानों का ये अनोखा संगम देखने लायक होता है.शाम ढलते ही कुमाऊं के घर घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती है. बैठक होली घर की बैठक में राग रागनियों के इर्द गिर्द हारमोनियम तबले पर गाई जाती है.

“…..रंग डारी दियो हो अलबेलिन में…
……गए रामाचंद्रन रंग लेने को गए….
……गए लछमन रंग लेने को गए……
……रंग डारी दियो हो सीतादेहिमें….
……रंग डारी दियो हो बहुरानिन में….”

इसकी शुरूआत यहां कब और कैसे हुई इसका कोई ऐतिहासिक या लिखित लेखाजोखा नहीं है. कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठ होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू के असर के बारे में गहराई से अध्ययन किया है.वो कहते हैं कि “यहां की होली में अवध से लेकर दरभंगा तक की छाप है. राजे-रजवाड़ों का संदर्भ देखें तो जो राजकुमारियां यहां ब्याह कर आईं वे अपने साथ वहां के रीति रिवाज भी साथ लाईं. ये परंपरा वहां भले ही खत्म हो गई हो लेकिन यहां आज भी कायम हैं. यहां की बैठकी होली में तो आज़ादी के आंदोलन से लेकर उत्तराखंड आंदोलन तक के संदर्भ भरे पड़े हैं .”

बंगाल का  “दोल उत्सव”

कहा जाता है कि बंगाल जो आज सोचता है, वो बाक़ी देश कल सोचता है. कम से कम एक त्यौहार होली के मामले में भी यही कहावत चरितार्थ होती है.

यहाँ देश के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले, एक दिन पहले ही होली मना ली जाती है. राज्य में इस त्यौहार को“दोल उत्सव” के नाम से जाना जाता है. इस दिन महिलाएँ लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ी पहन कर शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं और प्रभात-फेरी (सुबह निकलने वाला जुलूस) का आयोजन करती हैं. इसमें गाजे-बाजे के साथ, कीर्तन और गीत गाए जाते हैं. दोल शब्द का मतलब झूला होता है. झूले पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रख कर महिलाएँ भक्ति गीत गाती हैं और उनकी पूजा करती हैं. इस दिन अबीर और रंगों से होली खेली जाती है, हालांकि समय के साथ यहाँ होली मनाने का तरीक़ा भी बदला है. वरिष्ठ पत्रकार तपस मुखर्जी कहते हैं कि अब पहले जैसी बात नहीं रही. पहले यह दोल उत्सव एक सप्ताह तक चलता था.  इस मौक़े पर ज़मीदारों की हवेलियों के सिंहद्वार आम लोगों के लिए खोल दिये जाते थे. उन हवेलियों में राधा-कृष्ण का मंदिर होता था. वहाँ पूजा-अर्चना और भोज चलता रहता था. देश के बाक़ी हिस्सों की तरह, कोलकाता में भी दोल उत्सव के दिन नाना प्रकार के पकवान बनते हैं. इनमें पारंपरिक मिठाई संदेश और रसगुल्ला के अलावा, नारियल से बनी चीज़ों की प्रधानता होती है.  मुखर्जी बताते हैं कि अब एकल परिवारों की तादाद बढ़ने से होली का स्वरूप कुछ बदला ज़रूर है, लेकिन इस दोल उत्सव में अब भी वही मिठास है, जिससे मन (झूले में) डोलने लगता है. कोलकाता की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यहाँ मिली-जुली आबादी वाले इलाक़ों में मुसलमान और ईसाई तबके के लोग भी हिंदुओं के साथ होली खेलते हैं. वे राधा-कृष्ण की पूजा से भले दूर रहते हों, रंग और अबीर लगवाने में उनको कोई दिक्क़त नहीं होती.कोलकाता का यही चरित्र यहाँ की होली को सही मायने में सांप्रदायिक सदभाव का उत्सव बनाता है.

महाराष्ट्र की रंग पंचमी और कोंकण का शिमगो

महाराष्ट्र और कोंकण के लगभग सभी हिस्सों मे इस त्योहार को रंगों के त्योहार के रुप मे मनाया जाता है। मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच,गाना और मस्ती होता है। ये मौसम रिशते(शादी) तय करने के लिये मुआफिक होता है, क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक दूसरे के घरों को मिलने जाते है और काफी समय मस्ती मे व्यतीत करते हैं। महाराष्ट्र में होली के बाद पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा है। यह रंग सामान्य रूप  से सूखा गुलाल होता है। विशेष भोजन बनाया जाता है जिसमे पूरनपोली अवश्य होती है। मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच,गाना और मस्ती होता है। ये मौसम रिशते(शादी) तय करने के लिये मुआफिक होता है, क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक दूसरे के घरों को मिलने जाते है और काफी समय मस्ती मे व्यतीत करते हैं। राजस्थान में इस अवसर पर विशेष रूप से जैसलमेर के मंदिर महल में लोकनृत्यों में डूबा वातावरण देखते ही बनता है जब कि हवा में लाला नारंगी और फ़िरोज़ी रंग उड़ाए जाते हैं। मध्यप्रदेश के नगर इंदौर में इस दिन सड़कों पर रंग मिश्रित सुगंधित जल छिड़का जाता है। लगभग पूरे मालवा प्रदेश में होली पर जलूस निकालने की परंपरा है। जिसे गेर कहते हैं। जलूस में बैंड-बाजे-नाच-गाने सब शामिल होते हैं। नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है। जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है। प्राचीनकाल में जब होली का पर्व कई दिनों तक मनाया जाता था तब रंगपंचमी होली का अंतिम दिन होता था और उसके बाद कोई रंग नहीं खेलता था।

पंजाब का होला मोहल्ला

पंजाब मे भी इस त्योहार की बहुत धूम रहती है। सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री  अनन्दपुर साहिब मे होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है। सिखों के लिये यह धर्मस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है।कहते है गुरु गोबिन्द सिंह(सिक्खों के दसवें गुरु) ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी।तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में सिख शौर्यता के हथियारों का प्रदर्शन और वीरत के करतब दिखाए जाते हैं। इस दिन यहाँ पर अनन्दपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है।कभी आपको मौका मिले तो देखियेगा जरुर। सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री अनन्दपुर साहिब मे होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है। सिखों के लिये यह धर्मस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहाँ पर होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। इसीलिए दशम गुरू गोविंद सिंह जी ने होली के लिए पुल्लिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया। गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे। होला महल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छ: दिन तक चलता है। इस अवसर पर, भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहब उठाए तलवारों के करतब दिखा कर साहस, पौरुष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं। जुलूस तीन काले बकरों की बलि से प्रारंभ होता है। एक ही झटके से बकरे की गर्दन धड़ से अलग करके उसके मांस से ‘महा प्रसाद’ पका कर वितरित किया जाता है। पंज पियारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं और जुलूस में निहंगों के अखाड़े नंगी तलवारों के करतब दिखते हुए बोले सो निहाल के नारे बुलंद करते हैं। अनन्दपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है। कहते है गुरु गोबिन्द सिंह(सिक्खों के दसवें गुरु) ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी। यह जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है।

तमिलनाडु की कामन पोडिगई

तमिलनाडु में होली का दिन कामदेव को समर्पित होता है। इसके पीछे भी एक किवदन्ती है। प्राचीन काल मे देवी सती (भगवान शंकर की पत्नी) की मृत्यू के बाद शिव काफी क्रोधित और व्यथित हो गये थे।इसके साथ ही वे ध्यान मुद्रा मे प्रवेश कर गये थे।उधर पर्वत सम्राट की पुत्री भी शंकर भगवान से विवाह करने के लिये तपस्या कर रही थी। देवताओ ने भगवान शंकर की निद्रा को तोड़ने के लिये कामदेव का सहारा लिया।कामदेव ने अपने कामबाण के शंकर पर वार किया।भगवन ने गुस्से मे अपनी तपस्या को बीच मे छोड़कर कामदेव को देखा। शंकर भगवान को बहुत गुस्सा आया कि कामदेव ने उनकी तपस्या मे विध्न डाला है इसलिये उन्होने अपने त्रिनेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया। अब कामदेव का तीर तो अपना काम कर ही चुका था, सो पार्वती को शंकर भगवान पति के रुप मे प्राप्त हुए। उधर कामदेव की पत्नी रति ने विलाप किया और शंकर भगवान से कामदेव को जीवित करने की गुहार की। ईश्वर प्रसन्न हुए और उन्होने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया। यह दिन होली का दिन होता है। आज भी रति के विलाप को लोक संगीत के रुप मे गाया जाता है और चंदन की लकड़ी को अग्निदान किया जाता है ताकि कामदेव को भस्म होने मे पीड़ा ना हो। साथ ही बाद मे कामदेव के जीवित होने की खुशी मे रंगो का त्योहार मनाया जाता है।

राजस्थान की होली

होली के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। बाड़मेर में पत्थर मार होली खेली जाती है तो अजमेर में कोड़ा होली। सलंबर कस्बे में आदिवासी गेर खेलकर होली मनाते हैं। इस दिन यहां के युवक हाथ में एक बांस जिस पर घूंघरू और रूमाल बंधा होता है, जिसे गेली कहा जाता है लेकर नृत्य करते हैं। इस दिन युवतियां फाग के गीत गाती हैं।

मध्यप्रदेश में भगौरिया

भील होली को भगौरिया कहते हैं। इस दिन युवक मांदल की थाप पर नृत्य करते हैं। नृत्य करते-करते जब युवक किसी युवती के मुंह पर गुलाल लगाता है और बदले में वह भी यदि गुलाल लगा देती है तो मान लिया जाता है कि दोनों विवाह के लिए सहमत हैं। यदि वह प्रत्युत्तर नहीं देती तो वह किसी और की तलाश में जुट जाता है।

मालवा की होली- होली के दिन लोग एक-दूसरे पर अंगारे फेंकते हैं। कहते हैं कि इससे होलिका राक्षसी का अंत हो जाता है।

गुजरात में गोलगधेड़ों

भील जाति के लोग होली को गोलगधेड़ों के नाम से मनाते हैं। इसमें किसी बांस या पेड़ पर नारियल और गुड़ बांध दिया जाता है उसके चारों और युवतियां घेरा बनाकर नाचती हैं। युवक को इस घेरे को तोड़कर गुड़, नारियल प्राप्त करना होता है। इस प्रक्रिया में युवतियां उस पर जबरदस्त प्रहार करती हैं। यदि वह इसमें कामयाब हो जाता है तो जिस युवती पर वह गुलाल लगाता है वह उससे विवाह करने के लिए बाध्य हो जाती है।

बस्तर का कामुनी पेडम

इस दिन लोग कामदेव का बुत सजाते हैं, जिसे कामुनी पेडम कहा जाता है। उस बुत के साथ एक कन्या का विवाह किया जाता है। इसके उपरांत कन्या की चुड़ियां तोड़कर, सिंदूर पौंछकर विधवा का प दिया जाता है। बाद में एक चिता जलाकर उसमें खोपरे भुनकर प्रसाद बांटा जाता है।

मणिपुर में याओसांग

होली याओसांग के नाम से मनाई जाती है। यहां धुलेंडी वाले दिन को पिचकारी कहा जाता है। याओसांग का मतलब नन्हीं सी झोपड़ी जो नदी के तट पर बनाई जाती है। इस दिन इसमें चैतन्य महाप्रभु की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पूजन के बाद इस झोपड़ी को अलाव की भांति जला दिया जाता है। इस झोपड़ी में लगने वाली सामग्री को बच्चों द्वारा चुराकर लाने की प्रथा है। इसकी राख को लोग मस्तक पर लगाते हैं एवं ताबीज भी बनाया जाता है। पिचकारी के दिन सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर चांवल, सब्जी इत्यादि इकट्ठा करते हैं और फिर विशाल भोज का आयोजन किया जाता है।

ब्रज (मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गोवर्धन) की प्रसिद्ध होली

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बरसाने की प्रसिद्ध लट्ठमार होली

  • होली शुरू होते ही सबसे पहले ब्रज रंगों में डूबता है।
  • यहाँ भी सबसे ज्यादा मशहूर है बरसाना की लट्ठमार होली। बरसाना राधा का जन्मस्थान है।
  • मथुरा (उत्तर प्रदेश) के पास बरसाना में होली कुछ दिनों पहले ही शुरू हो जाती है।
  • लट्ठमार होली में शामिल होने के लिए देश विदेश से लाखों लोग यहां पहुंचते हैं।
  • होली के समय वहां का माहौल ही अलग और अद्भुत होता है। होली के कुछ दिनों पहले लट्ठमार होली खेली जाती है।
  • कहा जाता है कि कृष्ण और उनके दोस्त राधा और उनकी सहेलियों को तंग करते थे जिसपर उन्हें मार पड़ती थी।
  • इस दौरान ढोल की थापों के बीच महिलाएं पुरुषों को लाठियों से पीटती हैं।
  • हजारों की संख्या में लोग उनपर रंग फेंकते हैं।

‘बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ इस गीत के साथ ही ब्रज की होली की मस्ती शुरू होती है. वैसे तो होली पूरे भारत में मनाई जाती है लेकिन ब्रज की होली ख़ास मस्ती भरी होती है. वजह ये कि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है. होता ये है कि होली की टोलियों में नंदगाँव के पुरूष होते हैं क्योंकि कृष्ण यहीं के थे और बरसाने की महिलाएं क्योंकि राधा बरसाने की थीं. दिलचस्प बात ये होती है कि ये होली बाकी भारत में खेली जाने वाली होली से पहले खेली जाती है. दिन शुरू होते ही नंदगाँव के हुरियारों की टोलियाँ बरसाने पहुँचने लगती हैं. साथ ही पहुँचने लगती हैं कीर्तन मंडलियाँ. इस दौरान भाँग-ठंढई का ख़ूब इंतज़ाम होता है. ब्रजवासी लोगों की चिरौंटा जैसी आखों को देखकर भाँग ठंढई की व्यवस्था का अंदाज़ लगा लेते हैं. बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं. दोपहर तक घमासान लठमार होली का समाँ बंध चुका होता है.

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मान्यता

  • इस दिन लट्ठ महिलाओं के हाथ में रहता है और नन्दगाँव के पुरुषों (गोप) जो राधा के मन्दिर ‘लाडलीजी’ पर झंडा फहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें महिलाओं के लट्ठ से बचना होता है।
  • इस दिन सभी महिलाओं में राधा की आत्मा बसती है और पुरुष भी हँस-हँस कर लाठियाँ खाते हैं। आपसी वार्तालाप के लिए ‘होरी’ गाई जाती है, जो श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होती है।
  • महिलाएँ पुरुषों को लट्ठ मारती हैं, लेकिन गोपों को किसी भी तरह का प्रतिरोध करने की इजाजत नहीं होती है। उन्हें सिर्फ गुलाल छिड़क कर इन महिलाओं को चकमा देना होता है।
  • अगर वे पकड़े जाते हैं तो उनकी जमकर पिटाई होती है या महिलाओं के कपड़े पहनाकर, श्रृंगार इत्यादि करके उन्‍हें नचाया जाता है।
  • माना जाता है कि पौराणिक काल में श्रीकृष्ण को बरसाना की गोपियों ने नचाया था। दो सप्ताह तक चलने वाली इस होली का माहौल बहुत मस्ती भरा होता है।
  • एक बात और यहाँ पर जिस रंग-गुलाल का प्रयोग किया जाता है वो प्राकृतिक होता है, जिससे माहौल बहुत ही सुगन्धित रहता है।
  • अगले दिन यही प्रक्रिया दोहराई जाती है, लेकिन इस बार नन्दगाँव में, वहाँ की गोपियाँ, बरसाना के गोपों की जमकर धुलाई करती है।

परंपरा एवं महत्त्व

  • उत्तर प्रदेश में वृन्दावन और मथुरा की होली का अपना ही महत्त्व है। इस त्योहार को किसानों द्वारा फसल काटने के उत्सव एक रूप में भी मनाया जाता है। गेहूँ की बालियों को आग में रख कर भूना जाता है और फिर उसे खाते है। होली की अग्नि जलने के पश्चात बची राख को रोग प्रतिरोधक भी माना जाता है। इन सब के अलावा उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृन्दावन क्षेत्रों की होली तो विश्वप्रसिद्ध है। इसके अलावा एक और उल्लास भरी होली होती है, वो है वृन्दावन की होली यहाँ बाँके बिहारी मंदिर की होली और गुलाल कुंद की होलीबहुत महत्त्वपूर्ण है। वृन्दावन की होली में पूरा समां प्यार की ख़ुशी से सुगन्धित हो उठता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि होली पर रंग खेलने की परंपरा राधाजी व कृष्ण जी द्वारा ही शुरू की गई थी।

मुक़ाबला

नंदगाँव के लोगों के हाथ में पिचकारियाँ होती हैं और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियाँ. और शुरू हो जाती है होली. पुरूषों को बरसाने वालियों की टोली की लाठियों से बचना होता है और नंदगाँव के हुरियारे लाठियों की मार से बचने के साथ साथ उन्हें रंगों से भिगोने का पूरा प्रयास करते हैं. इस दौरान होरियों का गायन भी साथ-साथ चलता रहता है. आसपास की कीर्तन मंडलियाँ वहाँ जमा हो जाती हैं. इसे एक धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है. ‘कान्हा बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ ‘फाग खेलन आए हैं नटवर नंद किशोर’ और ‘उड़त गुलाल लाल भए बदरा’ जैसे गीतों की मस्ती से पूरा माहौल झूम उठता है. लोग मृदंग और ढोल ताशों की थाप पर थिरकने लगते हैं. कहा जाता है कि ‘सब जग होरी, जा ब्रज होरा’इसका आशय यही है कि ब्रज की होली और जगहों से बिल्कुल अलग होती है

50 दिन की होली: रसीली-रंगीली ब्रज की होली

ब्रज और होली एक दूसरे के पर्याय है। होली की चर्चा होते ही ब्रज और ब्रज की चर्चा होते ही होली की स्मृतियां साकार हो उठती है। रसराज श्रीकृष्ण और रस-साम्राज्ञी राधिका द्वारा प्रेम-प्रतीति पूर्ण होली ब्रज में खेली गई थी और इसीलिए ब्रज की होली में रंग के साथ रस की वृष्टि भी होती है। राधा-कृष्ण की लीला भूमि ब्रज की होली में मनुहार, माधुर्य और मादकता का अद्भुत संगम है। श्रीकृष्ण द्वारा राधा से होली खेलने की मनुहार, राधा की पिचकारियों से बरसे रंग की फुहार और ब्रज के गोप-गोपिकाओं के परस्पर प्रेम में सने मधुर बोलों की भावभीनी स्मृतियां आज भी ब्रज के कण-कण में व्याप्त है। आकाश में उड़ते अबीर-गुलाल और पिचकारियों से बरसते रंग के मध्य कृष्ण की बांसुरी तथा राधिका के नूपुरों की रुनझुन-रुनझुन से ब्रज रसमय है, रंगमय है।

होली-पर्व की सांस्कृतिक परम्परा में अनुपम-अद्भुत है ब्रज की होली। ब्रज की होली विशिष्ट है, विलक्षण है। देश के अन्य भागों में होली होती है एक-दो दिन की किंतु ब्रज में होली होती है 50 दिनों की। ब्रज में बसंत पंचमी के दिन सामूहिक होली जलने वाले स्थानों पर होली का दांड़ा रोप दिया जाता है और वहां लकड़ी, कन्डे आदि एकत्रित होने लगते है। बसंत पंचमी से ही मंदिरों में भगवान के श्रृंगार में अबीर-गुलाल का प्रयोग होने लगता है और धमार के स्वर गूंजने लगते है। गांव की चौपालों पर ढोलक खनकने लगती है,झांझ-मंजीरे झंकृत हो उठते है और गूंज उठते है होली के रसिया।

ब्रज की होली की यह अन्यतम विशेषता है कि यहां रंग-गुलाल के अतिरिक्त अनेकानेक प्रकार से होली खेली जाती है। एक ओर पुरुषों का दल, दूसरी ओर स्त्रियों का दल और साखी गाते हुए होली खेली जाती है। रंग में भीगे कोड़ों को मारते हुए होली खेली जाती है, लाठियों से होली खेली जाती है, अंगारों की होली होती है,फूलों की होली होती है। कुछ वर्षो पूर्व तक गोबर, कीचड़ और धूल से भी होली खेली जाती थी। होली खेलने का प्रकार कुछ भी हो, होली में जो रस बरसता है वह रस स्वर्ग में भी नहीं है इसीलिए कहा जाता है- ऐसो रस बरसै ब्रज होरी सो रस बैकुंठऊ में नांइ।

ब्रज में होली का रस-रंग मदमाते फागुन की फगुनौटी बयार के साथ तीव्रता से उभरने लगता है। फागुन माह के स्वागत में- ”भागन ते फागुन आयौ रे कोई जीबै सो खेले होरी फागु” के स्वर गूंज उठते है। ब्रज में फागुन के आगमन की सूचना पंडित जी के पत्रे या मुनादी से नहीं होती है। ब्रज की स्त्रियों के होठों और नयनों में बिहंसती मुस्कान और नयनों में हंसते काजल से हो जाती है फागुन की पहचान।

खेतों में लहलहाती सरसों और उद्यान-वाटिकाओं में सुरभित पुष्पों के मादक वातावरण में ब्रजबालाओं के नुकीले नयन होली खेलते है, प्रेम-प्रीति की पचरंग पिचकारी चलाते है-

 

आजौ नैना री नुकीले नये ढंग खेलि रहे रंग होरी
नैन ही खेलें, नैन खिलामें, नैना डारें रंग,
नैनां मारे प्रेम-प्रीत की पिचकारी रे पचरंग,
भिजोई दैं बरजोरी।

होली सामान्यत: देवर-भाभी का पर्व है किन्तु मथुरा से लगभग 50 किलोमीटर दूर जाव नामक गांव में राधा और बलराम अर्थात् जेठ और बहू का हुरंगा होता है। इस अनूठे हुरंगे में बलराम के प्रतीक रूप में बठैन गांव के हुरिहार जाव गांव की स्त्रियों से होली खेलते है किन्तु मर्यादा के साथ। चैत्र कृष्ण द्वितीया से लेकर नवमी तक हुरंगों के अतिरिक्त ब्रज के आठ गांवों- मुखराई, ऊमरी, नगरी, रामपुर, अहमल कलां, सबला का नगला तथा सौंख में चन्दा की चांदनी में रात्रि को चरकुला नृत्य के आयोजन होते है। ब्रजांगनाएं सैकड़ों दीपकों से जगमगाता काफी वजनी चरकुला सिर पर रखकर स्वर-ताल पर नृत्य करती है। नृत्य के अन्त में नृत्यांगनाओं को आशीर्वाद दिया जाता है- जुग-जुग जीऔ गोरी नाचनहारी। बसंत पंचमी से चैत्र कृष्णा नवमी तक गीत-संगीत-नृत्य संजोये 50 दिनों तक विविध रूपों से मुखरित ब्रज की होली में यमुना की लहरे पिचकारियां चलाती है और गिरिराज गोवर्धन गुलाल उड़ाता है। ब्रज की होली के रंग में रंगभीने, रसभीने ब्रजवासियों का मन तृप्त नहीं हो पाता है और उनकी सदा यह कामना रहती है- चिरंजीवी रहे ब्रज की रंग होरी, चिरंजीवी रहे ब्रज की रस-होरी।

अंगारों की होली

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मथुरा जिले की छाता तहसील में फालैन गांव आज भी जलते अंगारों पर पण्डा के चलने के का गवाह है। यह क्षेत्र भक्त प्रह्लाद का क्षेत्र कहलाता है और यहां पण्डा होलिका दहन के बाद अंगारों पर चलता है।

फूलों की होली

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मंदिर-देवालयों में रंग गुलाल-अबीर की रौनक होती है तो कहीं भक्त भगवन के साथ फूलों की होली खेलते है. इस दौरान मंदिरों की छटा इंद्रधनुषी हो जाती है. रोज़ अलग-अलग कलाकार अपने फ़न का मुज़ाहिरा कर अपने प्रिय कान्हा के साथ होली खेलने का चित्रण करते हैं.वैसे कान्हा का वृन्दावन तो जयपुर से दूर है मगर गोविंद देव मंदिर में जब फाग उत्सव का आयोजन किया गया तो वहाँ बरसाना भी था और जमुना का तट भी क्योंकि गोविंद देव जयपुर के अधिपति माने जाते है.

मंदिर से जुड़े गौरव धामानि कहते हैं, “यह ढाई सौ साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा है और रियासत काल से चली आ रही है. दरसल ठाकुर जी (भगवान) को रिझाने के लिए फाग उत्सव शुरू किया गया था, जो अब भी जारी है.”

वह बताते हैं, “तीन दिन तक चलने वाले इस उत्सव में राज्य भर के क़रीब ढाई सौ कलाकार अपनी कला का भक्ति भाव से प्रदर्शन करते हैं. इसमें जात-पात या मजहब का कोई सवाल नहीं है. कई मुस्लिम कलाकार भी इसमे भाग लेंते हैं.”

कत्थक गुरु डाक्टर शशि सांखला कहती हैं,कृष्ण कथानक और होली का गहरा रिश्ता है. कत्थक और गोविंद देव अलग-अलग नही हैं. श्रीकृष्ण को कत्थक का आराध्य देव मना जाता है. होली आती है तो कृष्ण को याद किया जाता है क्योंकि उनका स्वभाव चंचल है.”

काशी (बनारस) की होली… अक्खड़, अल्हड़

  • अपने अनूठेपन के साथ काशी की होली अलग महत्व रखती है।
  • काशी की होली बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होती है।
  • रंगभरी एकादशी के दिन काशीवासी भोले बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हैं।
  • होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है।

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भांग, पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी होली की बात ही निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंतता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में फाल्गुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है, संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन या चौराहों के होली मिलन समारोह बेजोड़ हैं। गंगा घाटों पर आपसी सौहार्द के बीच रंगों की खुमारी का दीदार करने देश-विदेश के सैलानी जुटते हैं। यहां की खास मटका फोड़ होली और हुरियारों के ऊर्जामय लोकगीत हर किसी को अपने रंग में ढाल लेते हैं। फाग के रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता यहां की विविधताओं का अहसास कराता है। गुझिया, मालपुए, जलेबी और विविध मिठाइयों, नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है।

बुढ़वा मंगल तक उल्लास

मंदिरों, गलियों और गंगा घाटों से लबरेज इस उम्दा शहर का जिक्र जेहन में पुरातनता, पौराणिकता, धर्म एवं संस्कृति के साथ साड़ी, गलीचे, लंगड़ा आम आदि विशेषणों को ताजा कर देता है। अपने अनूठेपन के साथ काशी की होली अलग महत्व रखती है। काशी की होली बाबा विश्वनाथ के दरबार से शुरू होती है। रंगभरी एकादशी के दिन काशीवासी भोले बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हैं और फिर सभी होलियाना माहौल में रंग जाते हैं। होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है।

होली पर निकलती है बारात

  • बनारस की होली का एक अनूठा और मस्ती भरा रंग है होली की बारात।
  • इसमें यहां के मुकीमगंज से बैंड-बाजे के साथ निकलने वाली होली बारात में बाकायदा दूल्हा रथ पर सवार होता है।
  • बारात के नियत स्थान पर पहुंचते ही महिलाएं परंपरागत ढंग से दूल्हे का परछन करती हैं।
  • मंडप सजाया जाता है, जिसमें दुल्हन आती है, फिर शुरू होती है वर-वधू के बीच बहस और दुल्हन के शादी से इंकार करने पर बारात रात में लौट जाती है।

भांग, ठंडाई के बिना कैसी होली

  • भांग और ठंडाई के बिना बनारसी होली की कल्पना भी नहीं कर सकते।
  • यहां भांग को शिवजी का प्रसाद मानते हैं , जिसका रंग जमाने में अहम रोल होता है।
  • होली पर यहां भांग का खास इंतजाम करते हैं। तमाम वरायटीज की ठंडाई घोटी जाती है , जिनमें केसर , पिस्ता , बादाम , मघई पान , गुलाब , चमेली , भांग की ठंडाई काफी प्रसिद्ध है।
  • कई जगह ठंडाई के साथ भांग के पकौडे़ बतौर स्नैक्स इस्तेमाल करते हैं , जो लाजवाब होते हैं।
  • भांग और ठंडाई की मिठास और ढोल – नगाड़ों की थाप पर जब काशी वासी मस्त होकर गाते हैं , तो उनके आसपास का मौजूद कोई भी शख्स शामिल हुए बिना नहीं रह सकता।

अस्सी का बहुचर्चित कवि सम्मेलन

  • अस्सी घाट के बहुचर्चित कवि सम्मेलन के बिना बनारसी होली की चर्चा अधूरी है।
  • एक समय था , जब यहां मशहूर हास्य कवि चकाचक बनारसी , पं . धर्मशील चतुर्वेदी , सांड बनारसी , बदरी विशाल , बेधड़क बनारसी , बेढब बनारसी आदि शरीक होते थे।
  • यहां हास्य के फुहारों के बीच संतरी हों या मंत्री , कलेक्टर हों या सरकार सबकी बखिया उधेड़ी जाती थीं और हंसी – मजाक के बीच संस्कृति , समाज और राष्ट्र की मौजूदा गतिविधियों से रूबरू कराया जाता था।
  • चकाचक के निधन के बाद अस्सी के हास्य कवि सम्मेलन पर विराम लग गया।

होरियारों का जोगीरा

‘जोगीरा सारा .. रा .. रा .. रा .. रा …’ की हुंकार बनारस की होली का अलग अंदाज दरसाता है। जोगीरा की पुकार पर आसपास के हुरियारे वाह – वाही लगाए बिना नहीं रह सकते और यही विशेषता अल्हड़ मस्ती दर्शाती है। इसके अलावा ‘ रंग बरसे भींगे चुनर वाली , रंग बरसे ..’ और ‘ होली खेले रघुबीरा अवध में होली खेले रघुबीरा ‘ जैसे गीतों की धुनें भी भांग और ठंडाई से सराबोर पूरे बनारस ही झूमा देती हैं। गंगा घाटों पर मस्ती का यह आलम रहता है कि विदेशी पर्यटक भी अपने को नहीं रोक पाते और रंगों में सराबोर हो ठुमके लगाते हैं।

रंग , भंग , गारी ( गाली ) और संगीत बनारसी होली की विशेषता है…

एक जमाना था , जब सिद्धेश्वरी देवी , जानकी बाई छप्पन छुरी जैसे गायकी के दिग्गज महीने भर पहले से होली गीत बनाते थे। रईसों में होड़ मचती थी कि कौन सबसे सिद्धहस्त संगीतज्ञ या गायकी के धनी का साथ पाता है। ऐसे ही , जानकी बाई का संगीत नहीं सुन पाने से एक रईस ने उन्हें छुरी से 56 बार चोट पहुंचाई , तभी से उनका नाम जानकी बाई छप्पन छुरी पड़ गया। अब गायकी लुप्त हो रही है , जिसे बचाना हमारा धर्म है , अगर बनारसी होली के सभी गाने मिला दें , तो सचमुच बनारस ( बना हुआ रस ) हो जाए। ‘

होली: रंगबिरंगे पकवानों का पर्व

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  • होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं।
  • होली में बहुत-सी वैरायटी के पकवान बनाए जाते हैं जिनमें श्रीखंड, आम या अंगूरी का श्रीखंड,मालपुआ, गुझिया, खीर, कांजी बड़ा, पूरन पोली, कचौरी, पपड़ी, मूंग हलवा आदि व्यंजन घरों में मुख्य रूप से तैयार किए जाते हैं जिसकी तैयारी गृहणियां हफ्ते भर पहले से शुरू कर देती हैं।

होली है… हिंदी फिल्मों के सुपरहिट गीत

होली के रंगीन मिजाज से भला बॉलिवुड कैसे दूर रह सकता है। मस्ती से सराबोर इस आलम के कई रंग हिंदी फिल्मों में दिखाए गए हैं। शरारत , छेड़छाड़ , प्यार , दोस्ती और यहां तक कि विरह का दर्द भी होली के रंगों में दिखाया गया है। फिल्मों में होली के गाने तो अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। चलिए डालते हैं एक नजर बॉलिवुड में होली के समां पर :

होली आई रे कन्हाई.. मदर इंडिया (1954)- मदर इंडिया का सुपरहिट गीत ‘होली आई रे कन्हाई’। इस मधुर गीत का जादू आज भी बरकरार है।

कोहिनूर (1960) तन रंग लो जी आज मन भर लो

अरे जा रे हट नटखट- नवरंग (1959) संध्या का नृत्य आज भी देखने में उतना ही ताजगी से भरा हुआ लगता है।

आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली खेलेंगे हम होली.. कटी पतंग (1971) ‘आज ना छोड़ेंगे’ गाने को भला कौन भुला सकता है! समाज के निशाने पर आई एक विधवा को होली के रंगों का महत्व और खुशियों के पाठ पढ़ाते राजेश खन्ना।

नदिया से दरिया .. नमक हराम (1973) इस गाने में होली की मस्ती के साथ भांग का नशा भी जुड़ा है।

 

आली रे आली रे होलीजख्मी दिलों का बदला चुकाने आए हैं दीवाने- जख्मी(1974)

 

जय जय शिव शंकर कांटा लगे ना कंकर जो प्याला तेरे नाम का पिया- आपकी कसम(1974)

होली के दिल दिल मिल जाते है रंगों में रंग मिल जाते है.. शोले (1975) जब गब्बर पूछता है, ‘कब है होली’, रामगढ़ के लोग रंगों के त्योहार में नाचते-झूमते घरों से बाहर निकलकर गाते हैं, ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं।’

नीला पीला हरा गुलाबी, आपबीती(1976)

रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे,… सिलसिला (1981)- नशे की आड़ में ही सही, दूसरे की पत्नी को खुलेआम छेड़ने का माद्दा सिर्फ अमिताभ बच्चन में ही है! आज तक होली के मौके पर छेड़छाड़ और मस्ती का माहौल बनाने में हरिवंशराय बच्चन के लिखे इस गीत का रिकॉर्ड कोई तोड़ नहीं पाया है।

अंग से अंग लगाना सजन .. डर (1993) इस गाने के जरिये सन्नी देओल फिल्म की नायिका जूही चावला को इशारों में यह बताते हैं कि बिना रंग फेंके भी किस तरह एक-दूसरे को रंगों से रंगा जा सकता है!

 

सोनी सोनी अंखियोंवाली.. मोहब्बतें (2000) गुरुकुल के छात्रों के दिल में प्यार की ज्योति जलाने के लिए शाहरुख खान की कोशिशें रंग लाती हैं, जब गुरुकुल के छात्र प्यार की भाषा को समझने लगते हैं। नारायण शंकर (अमिताभ बच्चन) के अनुशासन पर प्यार हावी होने लगता है।

होली खेले रघुबीरा.. बागबान (2003)- सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जब ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी के साथ फिल्म के इस गीत में थिरके थे, तब ऐसा लगा था कि सच में होली के त्योहार में हर दिल को जवान रखने की क्षमता है।

डू मी अ फेवरलेट्स प्ले होली.. वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम (2005) अनु मलिक की आवाज ने इस गाने में एक अलग ही मस्ती भर दी थी। दुर्भाग्यवश इस गाने की शूटिंग के दौरान प्रियंका घायल हो गई थीं और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था।

ये जवानी है दिखानी (2013) बालम पिचकारी जो तूने मुझे मारी तो बोले रे ज़माना ख़राबी हो गयी मेरे अंग राजा जो तेरे रंग लगा तो सीधी-सादी छोरी शराबी हो गयी.

कविताएं

होली / हरिवंशराय बच्चन

1) यह मिट्टी की चतुराई है,

रूप अलग औ’ रंग अलग,

भाव, विचार, तरंग अलग हैं,

ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर

और निकटतम भी जाओ,

रूढ़ि-रीति के और नीति के

शासन से मत घबराओ,

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

2) तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

देखी मैंने बहुत दिनों तक

दुनिया की रंगीनी,

किंतु रही कोरी की कोरी

मेरी चादर झीनी,

तन के तार छूए बहुतों ने

मन का तार न भीगा,

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

अंबर ने ओढ़ी है तन पर

चादर नीली-नीली,

हरित धरित्री के आँगन में

सरसों पीली-पीली,

सिंदूरी मंजरियों से है

अंबा शीश सजाए,

रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

होली / भारतेंदु हरिश्चंद्र

कैसी होरी खिलाई।

आग तन-मन में लगाई॥

पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई।

पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई॥

तबौ नहिं हबस बुझाई।

भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई।

टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई॥

तुम्हें कैसर दोहाई।

कर जोरत हौं बिनती करत हूँ छाँड़ो टिकस कन्हाई।

आन लगी ऐसे फाग के ऊपर भूखन जान गँवाई॥

तुन्हें कछु लाज न आई।

(भारतेन्दु जी की रचना मुशायरा’ से)

होली की बहार / नज़ीर अकबराबादी

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।

जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।

जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।

मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।

तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।

तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।

फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।

holi

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About drsandeepkohli

तमाम लोगों को अपनी-अपनी मंजीलें मिली.. कमबख्त दिल हमारा ही हैं जो अब भी सफ़र में हैं… पत्रकार बनने की कोशिश, कभी लगा सफ़ल हुआ तो कभी लगा …..??? चौदह साल हो गए पत्रकार बनने की कोशिश करते। देश के सर्वोतम संस्थान (आईआईएमसी) से 2003 में पत्रकारिता की। इस क्षेत्र में कूदने से पहले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिसर्च कर रहा था। साथ ही भारतीय सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी में रात-दिन जुटा रहता था। लगा एक दिन सफ़ल हो जाऊंगा। तभी भारतीय जनसंचार संस्थान की प्रारंभिक परिक्षा में उर्तीण हो गया। बस यहीं से सब कुछ बदल गया। दिल्ली में रहता हूं। यहीं पला बड़ा, यहीं घर बसा। और यहां के बड़े मीडिया संस्थान में पत्रकारिता जैसा कुछ करने की कोशिश कर रहा हूं। इतने सालों से इस क्षेत्र में टिके रहने का एक बड़ा और अहम कारण है कि पहले ही साल मुझे मेरे वरिष्ठों ने समझा दिया गया था कि हलवाई बनो। जैसा मालिक कहे वैसा पकवान बनाओ। सो वैसा ही बना रहा हूं, कभी मीठा तो कभी खट्टा तो कभी नमकीन, इसमें कभी-कभी कड़वापन भी आ जाता है। सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं, इन चौदह सालों के दरम्यां कई न्यूज़ चैनलों (जी न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, आजतक, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ एक्सप्रेस, न्यूज़24) से गुजरना हुआ। सभी को गहराई से देखने और परखने का मौका मिला। कई अनुभव अच्छे रहे तो कई कड़वे। पत्रकारों को ‘क़लम का सिपाही’ कहा जाता है, क़लम का पत्रकार तो नहीं बन पाया, हां ‘कीबोर्ड का पत्रकार’ जरूर बन गया। अब इस कंप्यूटर युग में कीबोर्ड का पत्रकार कहलाने से गुरेज़ नही। ख़बरों की लत ऐसी कि छोड़ना मुश्किल। अब मुश्किल भी क्यों न हो? सारा दिन तो ख़बरों में ही निकलता है। इसके अलावा अगर कुछ पसंद है तो अच्छे दोस्त बनना उनके साथ खाना, पीना, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श)। पर समस्या यह है कि हिन्दुस्तान में मुंह की खुजली दूर करने वाले (ज्यादा खुजली हो जाती है तो लिखना शुरू कर देते हैं… साथ-साथ उंगली भी करते हैं) तो प्रचुर मात्रा में मिल जाएंगे लेकिन दोस्त बहुत मुश्किल से मिलते हैं। ब्लॉगिंग का शौक कोई नया नहीं है बीच-बीच में भूत चढ़ जाता है। वैसे भी ब्लॉगिंग कम और दोस्तों को रिसर्च उपलब्ध कराने में मजा आता है। रिसर्च अलग-अलग अखबारों, विभिन्न वेवसाइटों और ब्लॉग से लिया होता है। किसी भी मित्र को जरूरत हो किसी तरह की रिसर्च की… तो जरूर संपर्क कर सकते हैं।
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One Response to होली का पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व

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